श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
१३६) (श्री भक्तमाल जोगानन्द उजागर वंश, करि निसिदिन हरिगुन गावनौ। हरिदास भलप्पन भजनबल, बावन ज्यों बढ़यौ बावनौ ॥१३६॥ श्रीपरशुरामजी जंगली देश के लोग सब, श्रीपरशुराम किय पारषद॥ ज्यों चन्दन कौ पवन, नीम्ब पुनि चन्दन करई। बहुत काल तम निबिड़, उदै दीपक ज्यों हरई॥ श्रीभट पुनि हरिव्यास, सन्त मारग अनुसरई। कथा कीरतन नेम, रसन हरिगुन उच्चरई॥ गोविन्द भक्ति गद रोग गति, तिलक दाम सद्वैद हद। जंगली देश के लोग सब, श्रीपरशुराम किय पारषद ॥१३७॥ राजसी महन्त देखि, गयौ कोऊ अन्त लैन, बोल्यौ जू अनन्त, हरि सगे माया टारियै। चले संग वाके, त्यागि पहिरि कुपीन अंग, बैठे गिरि कन्दरा में, लागी ठौर प्यारियै॥ तहाँ बनिजारौ आय, सम्पति चढ़ाय दई, दई और पालकी हूँ, महिमा निहारियै। जाय लपटायौ पाँय, भाव मैं न जान्यौ कछू, आन्यौ उर माँझ, आवै प्रान वारि डारियै॥५२२॥ मास परायण चौबीसवाँ विश्राम नवाह परायण सप्तम विश्राम श्रीगदाधरभट्टजी गुननिकर गदाधरभट्ट अति, सबहिन कौ लागै सुखद॥ सज्जन सुहृद् सुशील, वचन आरज प्रतिपालय। निर्मत्सर निहकाम, कृपा करुणा कौ आलय॥ अनन्य भजन दृढ़ करनि, धर्यौ वपु भक्तनि काजै। परम धरम कौ सेतु, विदित वृन्दावन गाजै॥ भागौत सुधा बरषै वदन, काहू कौं नाहिन दुखद। गुननिकर गदाधरभट्ट अति, सबहिन कौ लागै सुखद ॥१३८॥
श्रीगदाधरभट्टजी) (१३७ स्याम रंग रंगी पद, सुनिकै गुसाँई जीव, पत्र दै पठाये, उभै साधु वेगि धाये हैं। रैनी बिन रंग कैसे, चढ़यौ, अति सोच बढ़यौ, कागद में प्रेम मढ़यौ, तहाँ लैके आये है।। पुर ढिंग कूप, तहाँ बैठे रसरूप लगे, पूछिवे कौ तिनहीं सौं, नाम लै बताये हैं। रहौ कौन ठौर, सिरमौर वृन्दावन धाम, नाम सुनि मुरछा ह्वै, गिरे प्रान पाये हैं।। ५२३।। काहू कही भट्ट, श्रीगदाधर जू एई जानौ मानौ, उही पाती चाह, फेरिकै जिवाये हैं। दियौ पत्र हाथ, लियो सीस सौं लगाय चाय, बाँचत ही चले वेगि, वन्दावन आये हैं।। मिले श्रीगुसाँई जू सौं, आँखें भरि आई नीर, सुधि न सरीर, धरि धीर वही गाये हैं। पढ़े सब ग्रन्थ, संग नाना कृष्णकथा रंगरस की उमंग, अंग-अंग भाव छाये हैं।। ५२४।। नाम हो कल्यानसिंह, जात राजपूत पूत, बैठ्यो आय कथा, सो अभूत रंग लाग्यौ है। निपट निकट वास, धौरहा प्रकास गाँव, हास परिहास तज्यो, तिया दुख पाग्यो है।। जानी भट्ट संग सौं, अनंग वास दूर भई, करौ लैके नई आनि, हिये काम जाग्यो है। माँगत फिरत हुती, जुवती औ गर्भवती, कही लै रुपैया बीस, नेकु कहो राग्यो है।। ५२५।। गदाधर भट्ट जू की, कथा में प्रकास कहो, अहौ कृपा करी, अब मेरी सुधि लीजिये। दई लौंडी संग, लोभ रंग चित भंग किये, दिये लै बताय, बोली मेरौ काम कीजिये।। बोले आप, बैठिये जू, जाप नित करौं हिये, पाप नहीं मेरौ, गई दरसन दीजिये। श्रोता दुख पाय भाखैं, झूठी याहि मारि नाखैं, साँची कहि राखैं सुनि, तन-मन छीजिये।। ५२६।। फाटि जाय भूमि, तौ समाय जायँ श्रोता कहैं, बहे दृग नीर, ह्वै अधीर सुधि गई है। राधिकावल्लभदास, प्रगट प्रकास भास, भयौ दुखरासी सुनि, सौ बुलाय लई है।। साँच कहि दीजै नहीं, अभी जीव लीजै डारि, सबै कहि दीयौ, सुख लियौ संज्ञा भई है। काढ़ि तरवार तिया, मारिवे कल्यान गयौ, दयौ परबोध, हमें करी दया नई है।। ५२७।। रहैं काहू देस में, महन्त आये कथा माँझ, आगें लै बैठाये, देखें सबै साधु भीजे हैं। मेरे अश्रुपात क्यों न, होत सोच सोत परे, करे लै उपाय, दै लगाय मिर्च खीजे हैं।। सन्त एक जानिकै, जताय दई भट्ट जू कौ, गये उठि सब, जब मिलि अति रीझे हैं। ऐसी चाह होय, मेरे रोय कै पुकारि कही चली, जलधार नैन प्रेम आय धीजे हैं।।। ५२८।। आयौ एक चोर, घर सम्पति बटोरि, गाँठि बाँधी लै मरोरि, किहूँ उठै नाहिं भारी है। आयकै उठाय दई, देखी इन रीति नई, पूछ्यौ नाम प्रीति भई, भूलो मैं विचारी है।। बोले आप लै पधारौ, होत ही सवारौ आवै, और दसगुनी मेरे, तेरी यह ज्यारी है। प्राननि कौं आगें धरौ, आनिकै उपाय करौ, रहे समझाय भयौ, शिष्य चोरी टारी है।। ५२६।।
१३८) (श्री भक्तमाल प्रभु की टहल निज, करनि करत आप, भक्ति कौ प्रताप जानें, भागवत गाई है। देत हुते चौका कोऊ, शिष्य बहु भेंट ल्यायौ, दूर ही ते देखि, दास आयौ सो जनाई है। धोवौ हाथ, बैठौ आप, सुनिकै रिसाय उठे, सेवा ही में चाय, वाकौं खीझि समझाई है। हिये हितरासि जग, आस कौं विनास कियौ, पियौ प्रेमरस, ताकी बात लै दिखाई है।।५३०।। चारण भक्तजी चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एता हुआ।। चौमुख चौरा चण्ड, जगत् ईश्वर गुण जाने। करमानन्द अरु कोल्ह, अल्ह अक्षर परवाने।। माधौ मथुरा मध्य, साधु जीवानन्द सीवाँ। दूदा नारायणदास, नाम मांडन नत ग्रीवाँ।। चौरासी रूपक चतुर, बरनत वानी ज्यों जुवा। चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एता हुआ।। १३६।। श्रीकरमानन्दजी करमानन्द चारण की, वानी की उचारन में, दारुन जो हियौ होय सोऊ पिघलायकै। दियौ गृह त्यागि, हरिसेवा अनुराग भरे, बटुवा सुग्रीव हाथ, छरी पधराइकै।। काहू ठौर जाय, गाड़ि वहीं पधराये वापै, ल्याये उर प्रभु भूलि आये कहाँ पाइयै। फेरि चाह भई, दई स्याम को जताय बात, लई मँगवाय देखि, मति लै भिजाइयै।।५३१।। श्रीकोल्हजी, श्रीअल्हजी कोल्ह अल्ह भाई दोऊ, कथा सुखदाई सुनौ, पहिलौ विरक्त, मद मांस नही खात है। हरि ही के रूप, गुन वानी में उचार करै, धरै भक्तिभाव हिये, ताकी यह बात है।। दूसरौ अनुज जानौ, खाय सब उन मानौ, नृप ही कौं गावै, प्रभु कभूँ गाय जात है। बड़े के अधीन रहै, सोई करै जोई कहै, ईश करि चहै, आप दीनता में मात है।।५३२।। बड़े आय कही, चलौ द्वारका निहारैं सही, मिथ्या जगभोग, यामें आयु ही बिहात है। आज्ञा के अधीन चल्यौ, आये पुर लीन भये, नये चोज मन्दिर में, सुनौ कान बात है।। कोल्ह ने सुनाये सब जे-जे नाना छन्द गाये, पाछे अल्ह दोय चार कहे सकुचात है। भर्यो ही हुंकारौ प्रभु, कही माला गरें डारौ, ल्याये पहिरावैं, कह्यौ मेरौ बड़ौ भ्रात है।।५३३।।
श्रीपृथ्वीराजजी) (१३६ दयौ पै न याहि दयौ, बड़ौ अपमान भयो, गयौ बूड़ौ सागर में, दुख कौ न पार है। बूड़त ही आगे, भूमि पाई चल्यो झूमि प्रीति, सो अनीति भूलै नाहिं मानो तरवार है।। सौंही आये लैन, हरिजन मन चैन झिल्यो, मिल्यौ कृष्ण जाय, जायौ अति सुखसार है। बैठे जब भोजन कौं, दई उभै पातर लै, दूसरी जू कैसी, कही वही भाई प्यार है।। ५३४ ।। सबौ विष भयौ, दुख गयौ सोई हुयौ नयौ, दयौ परबोध, वाकी बात सुनि लीजियै। तेरो छोटो भाई, मेरो भक्त सुखदाई, ताकी कथा लै जताई, जामें आप ही सौं धीजियै।। प्रथम जनम माँझ बड़ौ, राजपुत्र भयौ गयौ, गृह त्यागि सदा मोसों मति भीजियै। आयौ वन कोऊ भूप, संग रागरंग रूप, देखि चाह भई देह, दई भोग दीजियै ।। ५३५ ।। तेरई वियोग, अन्न-जल सब त्यागि दियौ, जियौ नही जात, वापै वेगि सुधि लीजियै। हाथ पै प्रसाद दीनों, आय घर चीन्ह लीनों, सुपनौ सौ गयौ, बीति प्रीति वासौं कीजियै। द्वारका को संग सुनि, आवत ही आगै चल्यौ, मिल्यौ भूमि पर दृग, भरि वहै दिजियै। कही सब बात, स्याम धाम तज्यौ ताही छिन, कर्यौ वनवास दोऊ, अति मति भीजियै।। ५३६ ।। श्रीनारायणदासजी अल्ह ही के वंश में, प्रशंस याहि जानि लेव, बड़ौ और भाई छोटौ, श्रीनरायन दास है। दीर्घ कमाऊ, लघु उपज्यौ उड़ाऊं, भाभी दियो सीरौ भोजन, लै भयौ दुखरासि है।। देवौ मोकौं तातौ करि, बोली वह क्रोध भरि, यहूँ जा हुंकारौ भरवावै कियो हास है। गयौ गृह त्यागि, हरि पाणि कर्यो वैसे ही जू, भक्तिवश स्याम, कह्यौ प्रगट प्रकास है।। ५३७ ।। श्रीपृथ्वीराजजी नरदेव उभै भाषा निपुन, पृथीराज कविराज हुव।। सवैया गीत श्लोक, बेलि दोहा गुन नवरस। पिंगल काव्य प्रमान, विविध विधि गायौ हरि जस।। पर दुख विदुख श्लाघ्य, वचन रचना जु विचारै। अर्थ विचित्र निमोल, सबै सांरग उर धारै।। रुक्मिनी लता बरनन अनूप, बागीश वदन कल्यान सुव। नरदेव उभै भाषा निपुन, पृथीराज कविराज हुव।। १४० ।।
१४०) (श्री भक्तमाल मारवार देश बीकानेर कौ नरेस बड़ौ, पृथीराज नाम भक्तराज कविराज है। सेवा अनुराग, और विषय वैराग ऐसौ, रानी पहिचानी नाहिं, मानौं देखी आज है॥ गयौ हो विदेश तहाँ, मानसी प्रवेस कियौ, हियौ नहीं छुवै, कैसे सरै मन काज है। बीते दिन तीन, प्रभु मन्दिर न दीठि परै, पाछै हरि देखि भयौ, सुख कौ समाज है॥५३८॥ लिखिकै पठायौ देश, सुन्दर सन्देस यह, मन्दिर न देखे, हरि बीते दिन तीन हैं। लिख्यौ आयौ साँच, बाँचि अति ही प्रसन्न भये, लगे राज बैठे प्रभु, बाहर प्रवीन हैं॥ सुनौ एक और, यों प्रतिज्ञा करी हिये धरी मथुरा सरीर त्याग करें रसलीन हैं। पृथीपति आनिकै मुहीम, दई काबुल की, बल अधिकाई, नहीं काल के अधीन हैं॥५३६॥ जीवन अवधि रहै, निपट अलप दिन, कलप समान बीतै, पल न बिहात है। आगम जनाय दियौ, चाहै इन्हें साँचौ कियौ लियौ, भक्तिभाव जाके, छायौ गात-गात है॥ चल्यौ चढ़ि साँड़िनी पै, लई मधुपुरी आनि, करिकै अस्नान प्रान, तजे सुनि बात है। जै-जै धुनि भई व्यापि, गई चहुँओर अहो, भूपति चकोर जस, चन्द दिन-रात है॥५४०॥ श्रीसीवाजी द्वारका देखि पालण्टी, अचढ़ सीवैं कीधी अटल॥ असुर अजीज अनीति, अगिनि में हरिपुर कीधौ। सांगन सुत ने साद, राय रनछोरै दीधौ॥ धरा धाम धन काज, मरन बीजा हूँ माँडै। कमधुज कुटकै हुवौ, चौक चतुरभुजनी छाँडै॥ बाढ़ेल बाढ़ कीवी कटक, चाँद नाम चाँड़े सबल। द्वारका देखि पालण्टी, अचढ़ सीवैं कीधी अटल॥१४१॥ कावापति सींवा सुत, साँगन कौ प्यारौ हरि, द्वारावति ईश यों, पुकारै रक्षा कीजिये। सदा भगवान् आप, भक्त प्रतिपाल करें, करौ प्रतिपाल मेरौ, सुनि मति भीजिये॥ तुरक अजीज नाम, धाम कौ लगाई आगि, लई बाग धोरन की, आये टूक कीजिये। दुष्ट सब मारे, प्रभु कष्ट ते उवारे, निज प्रान वारि डारे, यह नयौ रस पीजिये॥५४१॥ मास परायण पच्चीसवाँ विश्राम
श्रीमती रत्नावतीजी) (१४१
श्रीमती रत्नावतीजी
पृथीराज नृप कुलबधू, भक्तभूप रतनावती।। कथा कीरतन प्रीति, भीर भक्तनि की भावै। महा महाच्छौ मुदित, नित्य नँदलाल लड़ावै।। मुकुन्द चरण चिन्तवन, भक्ति महिमा ध्वजधारी। पति पर लोभ न कियौ, टेक अपनी नहीं टारि।। भलपन सबै विशेष ही, आमेर सदन सुन खाजिती। पृथीराज नृप कुलबधू, भक्तभूप रतनावती।। १४२।। मानसिंह राजा ताकौ, छोटौ भाई माधौसिंह, ताकी जानौ तिया, जाकी बात लै बखानियै। ढिंग जो खवासिनि सौं, स्वांसनि भरत नाम, रटति जटिल प्रेम, रानी उर आनियै।। नवलकिशोर कभूँ, नन्द के किशोर कभूँ, वृन्दावनचन्द कहि, आँखैं भरि पानियै। सुनत विकल भई, सुनिवे की चाह भई, रीति यह नई कछु, प्रीति पहिचानियै।। ५४२।। बार-बार कहै, कहा कहै, उर गहै मेरौ, बहै दृग नीर, हो सरीर सुधि गई है। पूछौ मत बात, सुख करौ दिन-रात, यह सहै निज गात, रागी साधु कृपा भई है।। अति उतकण्ठा देखि, कह्यौ सो विशेष सब, रसिक नरेसनि, की वानी कहि दई है। टहल छुटाई औ, सिरहाने लै बैठाई वाहि, गुरू बुद्धि आई, यह जानौ रीति नई है।। ५४३।। निसिदिन सुन्यौ करै, देखिवे को अरबरै, देखे कैसैं जात, जल जात दृग भरे हैं। कछुक उपाय कीजै, मोहन दिखाय दीजै, तबही तौ जीजै, वेतौ आनि उर अरे हैं।। दरसन दूर, राज छोड़ै लौटैं धूर, पै न पावैं छबि पूर, एक प्रेमवश करे हैं। करौ हरिसेवा, भरि भाव धरि मेवा, पकवान रस खान दै, बखान मन धरे हैं।। ५४४।। इन्द्रनीलमनी रूप, प्रगट सरूप कियौ, लियौ वहै भाव, यों सुभाव मिलि चली है। नानाविधि रागभोग, लाड़कौ प्रयोग जामें, जामिनी सुपन जोग, भई रँगरली है।। करत सिंगार छबि, सागर न पारावार, रहत निहारि वाही, माधुरी सौं पली है। कोटिक उपाय करैं, जोग जज्ञ पार परै, ऐपै नही पावै यह, दूर प्रेम गली है।। ५४५।। देख्योई चहति तऊ, कहति उपाय कहा? अहो चाह बात कहौ, कौन को सुनाइयै। कही जू बनावौ ढिंग, महल कै ठौर एक, चौकी लै बैठावौ, चहुँओर समुझाइयै।।
१४२) (श्री भक्तमाल आवैं हरिप्यारे तिन्हें, ल्यावैं वे लिवाय इहाँ, रहें ते धुवाय पाँय, रुचि उपजाइयै। नानाविधि पाक सामा, आगै आनि धरें आप, डारि चिक देखौ, स्याम दृगनि लखाइयै॥५४६॥ आवैं हरिप्यारे, साधुसेवा करि टारे दिन, किहूँ पाँव धारे जिन्हें, ब्रजभूमि प्यारियै। जुगलकिशोर गावैं, नैननि बहावैं नीर, ह्वै गई अधीर, रूप दृगनि निहारियै॥ पूछी वा खवासिन सौं, जू रानी कौन अंग? जाके इतनी अटक, संग भंग सुख भारियै। चली उठि हाथ गह्यौ, रह्यौ नहीं जात अहो, सह्यो दुख लाज बड़ी, तनक विचारियै॥५४७॥ देख्यौ मैं विचारि, हरिरूप रससार ताकौ, कीजिये अहार, लाज कानि नीकें टारियै। रोकत उतरि आई, जहाँ साधु सुखदाई, आनि लपटाई पाँय, विनती लै धारियै॥ सन्तनि जिंवायवे की, निज कर अभिलाष, लाख-लाख भाँतिन सौं, कैसे कै उच्चारियै। आज्ञा जोई दीजै, सोई कीजै सुख वाही में जु, प्रीति अवगाही कही, करौ लागी प्यारियै॥५४८॥ प्रेम में न नेम, हेम थार लै उमगि चली, चली दृगधार सो, परोसिकै जिंवाये हैं। भीजि गये साधु, नेह सागर अगाध देखि, नैननि निमेख तजी, भये मनभाये हैं॥ चन्दन लगाय, आनि बीरीऊ खवाय, स्याम चरचा चलाय, चख रूप सरसाये हैं। धूम परी गाँव, झूम आये सब देखिवे कौं, देखि नृप पास, लिखि मानस पठाये हैं॥५४६॥ ह्वै करि निशंक रानी, बंकगति लई नई, दई तजि लाज, बैठी मोड़नि की भीर में। लिख्यौ लै दिवान, नर आये सो बखान कियो बाँचि सुनि आँच लागी नृप के सरीर में॥ प्रेमसिंह सुत ताही काल सो रसाल आयौ, भाल पै तिलक माल कण्ठी कण्ठ तीर में। भूप को सलाम कियौ नरनि जताय दियौ बोल्यौ आव मोड़ी के रे पर्यौ मन पीर में॥५५०॥ कोप भरि राजा गयौ भीतर सो सोच नयौ पाछे पूछि लयौ कह्यौ नरनि बखानिकै। तबतौ विचारी अहो मोड़ा ही हमारी जाति भयौ दुख गात भक्तिभाव उर आनिकै॥ लिख्यौ पत्र माजी कौं जु प्रीति हिये साजी जोपै सीस पर बाजी आय राखौ तजि प्रानिकै। सभा मधि भूप कही मोड़ी को विरूप भयौ रहैं अब मोड़ी के ही भूलौ मति जानिकै॥५५१॥ लिख्यौ दे पठाये वेगि मानस लै आये जहाँ रानी भक्ति सानी हाथ दई पाती बाँचिये। आयो चढ़ि रंग बाँचि सुत कौ प्रसंग बार भीजे जे फुलेल दूर किये प्रेम साँचिये॥ आगे सेवा पास निसि महल बसत जाय ल्याय याही ठौर प्रभु नीके गाय नाचिये। नृप अन्न त्यागि दियौ, दियौ लिखि पत्र पुत्र भई मोड़ी आज तुम हित करि जाँचिये॥५५२॥ गये नर पत्र दियौ सीस सौं लगाय लियौ बाँचिकै मगन हियौ रीझि बहु दई है। नौबत बजाई द्वार बाँटत बधाई काहू नृपति सुनाई कही कहा रीति नई है॥
श्रीजगन्नाथ पारीषजी) (१४३ पूछे भूप लोग कह्यौ, मिटे सब सोग भये, मोड़ी के जू जोग, स्वांग कियौ बनि गई है। भूपति सुनत बात, अति दुखगात भयौ, लयौ बैरभाव, चढ़यौ त्यारी इत भई है॥५५३॥ नृप समझाय राख्यो, देश में चवाब ह्वैहै, बुधिवन्तजन आय, सुत सौं जताई है। बोल्यो, विषै लागि कोटि-कोटि तन खोये एक, भक्ति पर आवै काम, यह मन आई है॥ पाँय परि माँगि लई, दई जो प्रसन्न तुम, राजा निसि चल्यो जाय, करौ जिय भाई है। आयौ निज पुर, ढिंग ढुरि नर मिले आनि, कह्यौ सो बखानि सब, चिन्ता उपजाई है॥५५४॥ भवन प्रवेस कियौ, मन्त्री जो बुलाय लियौ, दियौ कहि कटी नाक, लोहू निरवारियै। मारिवौ कलंक हू न आवै यों सुनावै भूप, काहू बुधिवन्त नै, विचारि लै उचारियै॥ नाहर जु पींजरा में, दीजै छाँड़ि लीजै मारि, पाछे ते पकरि वह, बात दाबि डारियै। सबनि सुहाई जाय, करी मनभाई आयौ, देख्यौ वा खवासी कही, सिंह जू निहारियै॥५५५॥ करै हरिसेवा, भरि रंग अनुराग दृग, सुनी यह बात नेकु, नैन उन टारे हैं। भाव ही सौं जाने उठि, अति सनमाने अहो!, आज मेरे भाग, श्रीनृसिंह जू पधारे हैं॥ भावना सचाई वही, सोभा लै दिखाई, फूलमाल पहिराई, रुचि टीकौ लागे प्यारे हैं। भौन ते निकसि धाये, मानौ खम्भ फारि आये, विमुख समूह, ततकाल मारि डारे हैं॥५५६॥ भूप कौं खबरि भई, रानी जू की सुधि लई, सुनी नीकी भाँति, आप नम्र ह्वैकै आये हैं। भूमि पर साष्टांग, करी, हरि मति भई, दया, आप आय वाके, वचन सुनाये हैं॥ करत प्रणाम राजा, बोली अजू लाल जू कौं, नेकु फिरि देखौ, एक ओर ये लगाये हैं। बोल्यौ नृपराज, धन सबही तिहारो धारौ, पति पै न लोभ, कही करौ सुखभाये हैं॥५५७॥ राजा मानसिंह, माधौसिंह उभै भाई चढ़े, नाव पर कहूँ तहाँ बूड़िवे कौं भई है। बोल्यौ बड़ौ भ्राता, अब कीजिये जतन कौन? भौन तिया भक्त, कहि छोटे सुधि दई है॥ नेकु ध्यान कियौ, तब आनिकै किनारौ लियौ, हियौ हुलसायौ जेठ, चाह नई लई है। कर्यौ आय दरसन, बिनै करि गयौ भूप, अति ही अनूप कथा, हिये व्यापि गई है॥५५८॥ श्रीजगन्नाथजी पारीष पारीष प्रसिद्ध कुल काँथड्या, जगन्नाथ सीवाँ धरम॥ (श्री) रामानुज की रीति, प्रीति पन हिरदैं धार्यौ।
१४४) (श्री भक्तमाल संस्कार सम तत्व, हंस ज्यौं बुद्धि विचार्यौ।। सदाचार मुनिवृत्ति, इन्दिरा पधति उजागर। रामदास सुत सन्त, अनन्य दशधा कौ आगर।। पुरूषोत्तम परसाद तें, उभै अंग पहिर्यौ वरम। पारीष प्रसिद्ध कुल काँथड्या, जगन्नाथ सीवाँ धरम ।।१४३।। श्रीमधुरादासजी कीरतन करत कर सुपनेहूँ, मथुरादास न माँड़ियौ।। सदाचार सन्तोष, सुहृद् सुठि शील सुभासै। हस्तक दीपक उदय, मेटि तम वस्तु प्रकासै।। हरि कौ हिय विस्वास, नन्द-नन्दन बल भारी। कृष्ण कलस सौं नेम, जगत जानै सिर धारी।। (श्री) वर्द्धमान गुरु वचन रति, सो संग्रह नहिं छाँड़ियौ। कीरतन करत कर सुपनेहूँ, मथुरादास न माँड़ियौ ।।१४४।। वास कै तिजारे माँझ, भक्ति रसरासि करी, करी एक बात, ताकौ प्रगट सुनाइये। आयौ भेषधारी कोऊ, करै सालग्राम सेवा, डोलत सिंहासन पै, आनि भीर छाइयै।। स्वामी के जु शिष्य भयौ, तिनहूँ कै भाव देखि, वाही कौ प्रभाव आय, कह्यौ हिय भाइयै। नेकु आप चलौ, उह रीति कौ विलोकियै जु, बड़े सरवज्ञ कही, दूखै नहीं जाइयै।।५५६।। पाँय परि गये लैकै, जाय ढिंग ठाढ़े भये, चाहत फिरायौ, पे न फिरैं सोच पर्यौ है। जानि गयौ आप, कछु याही कौ प्रताप ऐपे, मारौं करि जाप, यों विचार मन धर्यौ है।। मूठ लै चलाई, भक्ति तेज आगे आई, नाहिं वाही लपटाई, भयौ ऐसौ मानौ मर्यौ है। ह्वै करि दयाल, जा जिवायौ समझायौ प्रीति, पन्थ दरसायौ हिय भायौ, शिष्य कर्यौ है ।।५६०।। श्रीनारायणदासजी नृतक नृतक नारायणदास कौ, प्रेमपुंज आगे बढ़्यौ।। पद लीनौ परसिद्ध, प्रीति जामें दृढ़ नातो। अक्षर तनमय भयौ, मदनमोहन रँगरातौ।।
संसार से निवृत्त भक्तजन जी) (१४५ नाचत सब कोउ आहि, काहि पै यह बनि आवै। चित्र लिखित सौ रह्यौ, त्रिभंग देसी जु दिखावै॥ हँड़िया सराय देखत दुनी, हरिपुर पदवीं कौं चढ़यौ। नृतक नारायणदास कौ, प्रेमपुंज आगे बढ़यौ॥१४५॥ हरि ही कें आगे नृत्य करें, हिये धरैं यही, ढरै देश देशनि में, जहाँ भक्त भीर है। हँड़िया सराय मध्य, जाइकै निवास लियौ, लियौ सुनि नाम सो, मलेच्छ जाति मीर है॥ बोलिकै पठाये महाजन, हरिजन सबै, आयौ है सदन गुनी, ल्यावौ चाह पीर है। आनिकै सुनाई भई, बड़ी कठिनाई अब, कीजै जोई भाई वह, निपट अधीर है॥५६१॥ बिना प्रभु आगें नृत्य, करियै न नेम यहै, सेवा वाके आगें कहौ, कैसें बिसतारियै। कियो यों विचार, ऊँचे सिंहासन माला धारि, तुलसी निहारि, हरिगान कर्यो भारियै॥ एक ओर बैठ्यौ मीर, निरखैं न कोर दृग, मगन किशोर रूप, सुनिलै बिसारियै। चाहै कछु वारौं, परे औचक ही प्रान हाथ, रीझि सनमान कीनौ, मीच लागी प्यारियै॥५६२॥ मास परायण छब्बीसवाँ विश्राम भूरिदा भक्तजनजी गुनगन विशद् गोपाल के, एते जन भये भूरिदा।। वोहिथ रामगुपाल कुँवँरवर, गोविन्द मांडिल। छीति स्वामि जसवन्त, गदाधर अनन्तानन्द भल।। हरिनाभ मिश्र दीनदास, बछपाल कन्हर जस गायन। गोसू रामदास नारद, स्याम पुनि हरिनारायन।। कृष्णजीवन भगवान जन, स्यामदासविहारी अमृतदा। गुनगन विशद् गोपाल के, एते जन भये भूरिदा।। १४६।। संसार से निवृत्त भक्तजनजी निरवर्त्त भये संसार ते, ते मेरे जजमान सब।। उद्धव रामरेनु परसराम, गंगा धूषेत निवासी। अच्युतकुल ब्रह्मदास विश्राम, सेषसाई के वासी।।
१४६) (श्री भक्तमाल किंकर कुण्डा कृष्णदास, खेम सोठा गोपानन्द। जैदेव राघौ विदुर, दयाल दामोदर मोहन परमानन्द ।। उद्धव रघुनाथी चतुरोनगन, कुँज ओक जे बसत अब। निरवर्त्त भये संसार ते, ते मेरे जजमान सब ।।१४७ ।। श्री जयतारन विदुरजी झीथड़ै ढिंग ही में जैतारन विदुर भयौ, भयौ हरि भक्त साधुसेवा मति पागी है। बरषा न भई, सब खेती सूखि गई, चिन्ता नई प्रभु आज्ञा दई, बड़ौ बड़भागी है।। खेत कौ कटावौ, औ गहावो, लै उड़ावौ, पावौ, दो हजार मन, अन्न, सुनी प्रीति जागी है। करी वही रीति, लोग देखैं न प्रतीति होत, गाये हरि मीत, रासि लागी अनुरागी है।।५६३ ।। स्वामी श्रीचतुरोनगनजी श्री स्वामी चतुरोनगन मगन, रैन दिन, भजन हित ।। सदा युक्त अनुरक्त, भक्त मण्डल को पोषत। पुर मथुरा ब्रजभूमि, रमत सबहिं को तोषत ।। परम धरम दृढ़ करन, देव श्रीगुरू आराध्यौ। मधुर वैन सुठि ठौर-ठौर, हरिजन सुख साध्यौ ।। सन्त महन्त अनन्त जन, जस विस्तारन जासु नित । श्रीस्वामी चतुरोनगन, मगन रैन दिन, भजन हित ।। १४८ ।। आयौ गुरु गेह यों सनेह सौं ले सेवा करैं, धरैं साँचौ भाव हियें, अति मति भीजियै। टहल लगाय दई, नई रुपवती तिया, दियौ वासौं कहि, स्वामी कहैं सोई कीजियै।। सेवा कै रिझाये याते, प्रेम उर नित नयो, दयौ घर धन, बधू कृपा करि लीजियै। धाम पधराय सुख, पायकै प्रनाम करी, धरी ब्रजभूमि उर, बसे रस पिजियै ।।५६४।। श्रीगोविन्दचन्द जू कौ, भोर ही दरस करि केशव सिंगार, राजभोग नन्दग्राम में। गोवर्धन राधाकुण्ड, ह्वैकै आवैं वृन्दावन, मन में हुलास नित, करैं चारि जाम में ।। रहे पुनि पावन पै, भूखे दिन तीन बीते, आये दूध ले प्रवीन, एऊ रँगे स्याम में। माँग्यौ नेकु पानी, ल्यावौ फेरि वह प्रानी कहाँ? दुख मतिसानी निसि कही, कियौ काम में ।।५६५।।
श्रीकूब़ाजी केवलदास) (१४७ पानी सौं न काज, ब्रजभूमि में विराज दूध, पीवै घर-घर यह, आज्ञा प्रभु दई है। एतौ ब्रजवासी, सब क्षीर के उपासी, कैसें मोको लेन दैहैं कही दैहैं, सुनी नई है।। डोलैं धाम-धाम, स्याम कह्यौ जोई मानि लियौ, दियौ परचे हूँ, परतीति तब भई है। जहाँ जा छिपावैं पात्र, वेगि आप ढूँढ़ि ल्यावैं, अति सुख पावैं, कीनी लीला रसमई है।।५६६।। भक्तसेवी मधुकरिया भक्तजी मधुकरी माँगि सेवैं, भगत, तिन पर हौं, बलिहार कियौ।। गोमा परमानन्द प्रधान, द्वारका मथुरा खोरा। कालुख सांगानेर भलौ, भगवान् को जोरा।। बीठल टोंड़े खेम, पण्डा गूनौरै गाजै। स्यामसेन के वंश, चीधर पीपोर विराजै।। जैतारन गोपाल के, केवल कूबै मोल लियौ। मधुकरी माँगि सेवैं भगत, तिन पर हौं बलिहार कियौ।।५४६।। श्रीकूबा (केवलदासजी) कहत कुम्हार जग, कुल निसतार कियौ, केवल सुनाम, साधुसेवा अभिराम है। आये बहु सन्त, प्रीति करी लै अनन्त जाकौ, अन्त कौन पावै, ऐपै सीधौ नहीं धाम है।। बड़ी ए गरज चले, करज निकासिवे कौं, बनिया न देत, कुँवा खोदौ कीजै काम है। कही बोल कियौ, तोल लियौ नीके रोल करि, हित सौं जिमाये, जिन्हें प्यारो एक स्याम है।।५६७।। गये कुँवा खोदिवे कौं, सुवा ज्यौं उचारै नाम, हुआ काम जान्यौ, वानै भयौ सुख भारी है। आई रेत भूमि, झूमि माटी गिरि दबे वामें, केतिक हजार मन, होत कैसे न्यारी है।। शोक करि आये धाम राम-नाम धुनि काहूँ, कान परी बीत्यो, मास, कही बात प्यारी है। चले वाही ठौर, स्वर सुनि प्रीति भौर परे, रीति कछु और, यह, सुनि बुधि टारी है।।५६८।। माटी दूर करी सब, पहुँचे निकट जब, बोलिकै सुनायौ, हरे वानी लागी प्यारियै। दरसन भयौ जाय, पाँय लपटाय गये, रही मिहराबसी ह्वै, कूबहूँ निहारियै।। धर्यौ जलपात्र एक, देखि बड़े पात्र जाने, आने निज गेह, पूजा लागी अति भारियै। भई द्वार भीर, नर उमड़ि अपार आये, महिमा विचारि बहु, सम्पति लै वारियै।।५६६।।
१४८) (श्री भक्तमाल सुन्दर स्वरूप स्याम ल्याये पधरायवे कौं, साधु निज धाम आय, कूब्रा जू के बसे हैं। रूप कौं निहारि, मन में विचार कियौ आप, करै कृपा मोकौं प्रभु, अचल ह्वै लसे हैं।। करत उपाय सन्त, टरत न नेक किहूँ, कही जू अनन्त हरि, रीझे स्वामी हँसे हैं। धर्यौ जानराय नाम, जानि लई जिय की बात, अंग में न मात, सदा सेवासुख रसे हैं।।५७०।। चले द्वारावति छाप, ल्यावैं यह मति भई, आज्ञा प्रभु दई, फिरी घर ही को आये हैं। करौ साधुसेवा, धरौ भाव दृढ़ हिये माँझ, टरौ जिनि कहूँ कीजै, जे-जे मन भाये हैं।। गेह ही में शंख चक्र, आदि निज देह भये, नये-नये कौतुक, प्रगट जग गाये हैं। गोमती कौ सागर सौं सगंम हो रह्यौ सुन्यौ, सुमिरनी पठायकै यों, दोऊ लै मिलाये हैं।।५७१।। भये शिष्य शाखा, अभिलाषा साधुसेवा ही की, महिमा अगाध जग, प्रगट दिखाई है। आये घर सन्त, तिया करति रसोई कोई, आयौ वाको भाई, ताकौं खीर लै बनाई है।। कूब़ाजी निहारि जानी, याकौ हित सोदर सौं, कीजियै विचार एक, सुमति उपाई है। कही भरि ल्यावो जल, गई डरि कलपै न, लई तसमई सब, भक्तनि जिंवाई है।।५७२।। वेगि जल ल्याई, देखि आगि-सी बराई हियें, झाँके मुँह भाई, दुखसागर बुड़ाई है। विमुख विचारि, तिया कूब़ा जू निकारि दई, गई पति कियो और, ऐसी मन आई है।। पर्य्यौई अकाल, बेटा-बेटी सो न पालि सकैं, तकै कोऊ ठौर मति, अति अकुलाई है। लिये संग कर्यौ जोई पुत्र सुता भूख भोई आय परी झींथड़ा में स्वामी को सुनाई है।।५७३।। नानाविधि पाक होत, सन्त आवैं जेसें सीत, सुख अधिकाई, रीति कैसे जात गाई है। सुनत वचन वाके, दीन दुखलीन महा, निपट प्रवीन मन, माँझ दया आई है।। देखि पति मेरौ, और तेरौ पति देखि याहि, कैसे कै निबाहि, सके परी कठिनाई है। रहौ द्वार झाऱ्यौ करौ पहुँचै अहार तुम्हें महिमा निहारि दृगधार लै बहाई है।।५७४।। कियौ प्रतिपाल तिया, पूरी कौ अकाल मास, भयौ जब समैं, विदा कीनी उठि गई है। अति पछितायत वह, बात अब पावै कहाँ ? जहाँ साधु संग, रंग सभा रसमई है।। करैं जाकौं शिष्य, सन्तसेवा ही बतावैं करौ, जो अनन्त रूप, गुन चाह मन भई है। नाभा जू बखान कियौ, मोकौं इन मोल लियौ, दियौ दरसाय सब, लीला नित नई है।।५७५।। सप्ताह परायण छठवाँ विश्राम
श्रीकान्हरजी) (१४६ श्रीअग्रदेवजी के शिष्य श्रीअग्र अनुग्रह तें भये, शिष्य सबै धर्म की धुजा।। जंगी प्रसिद्ध प्रयाग, विनोदी पूरन वनवारी। नरसिंह भल भगवान, दिवाकर दृढ़व्रत धारी।। कोमल हृदै किशोर, जगत् जगन्नाथ सलूधौ। औरौ अनुग उदार, खेम खीची धरमधीर लघु ऊधौ।। त्रिविध ताप मोचन सबै, सौरभ प्रभु निज सिर भुजा। श्रीअग्र अनुग्रह तें भये, शिष्य सबै धर्म की धुजा।। १५० ।। श्रीटीलाजी का वंश भरतखण्ड भूधर सुमेर, टीला लाहा की पद्धति प्रगट।। अंगद परमानन्द, दास जोगी जग जागै। खरतर खेम उदार, ध्यान केसौ हरिजन अनुरागै।। सस्फुट त्योला शब्द, लोहकर वंश उजागर। हरिदास कपि प्रेम, सबै नवधा के आगर।। अच्युतकुल सेवैं सदा, दासन तन दसधा अघट। भरतखण्ड भूधर सुमेर, टीला लाहा की पद्धति प्रगट ।। १५१।। श्रीकान्हरदासजी मधुपुरी महोच्छौ मंगलरूप, कान्हर को सौ को करें। चारि वरन आश्रम, रंक राजा अँन पावै। भक्तनि कौ बहु मान, विमुख कोऊ नहिं जावै।। बीरी चन्दन वसन, कृष्ण को कीरतन बरखैं। प्रभु के भूषन देय, महामन अतिसय हरखैं।। वीठल सुत विमल्यौ फिरै, दास चरणरज सिर धरैं। मधुपुरी महोच्छौ मंगलरूप, कान्हर को सौ को करें ।। १५२ ।।
१५०) (श्री भक्तमाल श्रीनीवाजी भक्तनि सौं कलिजुग भलें, निबाही नीवा खेतसी ।। आवहिं दास अनेक, उठि सु आदर करि लीजै। चरण धोय दण्डौत, सदन में डेरा दीजै।। ठौर-ठौर हरिकथा, हृदै अति हरिजन भावैं। मधुर वचन मुँह लाय, विविध भाँतिन्ह जू लड़ावैं।। सावधान सेवा करैं, निर्दूषन रति चेतसी। भक्तनि सौं कलिजुग भलें, निबाही नीवा खेतसी ।। १५३ ।। श्री तूँवर भगवान्जी बसन बढ़े कुन्ती बधू, त्यों तूँवर भगवान् के।। यह अचरज भयौ एक, खाँड़ घृत मैदा बरषै। रजत रुक्म की रेल, सृष्टि सबही मन हरषै।। भोजन रास विलास, कृष्ण को कीरतन कीनौ। भक्तनि कौ बहुमान, दान सबही कौ दीनौं।। कीरति कीनी भीम सुत, सुनि भूप मनोरथ आनके। बसन बढ़े कुन्ती बधू, त्यों तूँवर भगवान् के ।। १५४ ।। बीतत बरस मास, आवै मधुपुरी नेम, प्रेम सौं महोच्छौ, रास हेमहीं लुटाइयै। सन्तनि जिंवाय, नाना पट पहिराय, पाछे द्विजन बुलाय, कछु पूजैं, पै न भाइयै। आयौ कोऊ काल, धनमाल जा बिहाल भये, चाहैं पन पार्यौ, आये अलप कराइयै। रहे विप्र दूषि, सुनि भयौ सुख, भूख बढ़ी, आयौ यों समाज करौ, ख्वारी मन आइयै ।। ५७६ ।। अति सनमान कियौ, ल्याये जोई सौंपि दियौ, लियौ गाँठ बाँधि, तब विनती सुनाइयै। सन्तनि जिवावौ, भावै रास लै करावौ, भावै जेंवौ सुख पावौ, कीजै बात मन भाइयै। सीधौ लाय कोठे धर्यो, रोक ही, सो थैली भर्यो, द्विजन बुलाय देत, किहूँ निघटाइयै। जितनौ निकासैं, ताते सौगुनौ बढ़त और, एक-एक ठौर, बीसगुनो दै पठाइयै ।। ५७७ ।।
५. अर्वाचीन भक्त एवं भक्तमाल उपसंहार
श्रीहरीदासजी) (१५१ श्रीजसवन्तजी जसवन्त भक्ति जयमाल की, रूड़ा राखी राठवड़॥ भक्तनि सौं अति भाव, निरन्तर अन्तर नाहीं। करजोरे इक पाँय, मुदित मन आज्ञा माहीं॥ श्रीवृंदावन वास, कुँज क्रीड़ा रुचि भावै। राधावल्लभलाल, नित्तप्रति ताहि लड़ावै॥ परम धरम नवधा प्रधान सदन साँच निधि प्रेम जड़। जसवन्त भक्ति जयमाल की रूड़ा राखी राठवड़॥ १५५॥ श्रीहरीदासजी हरीदास भक्तनि हित, धनि जननी एकै जन्यौ॥ अमित महागुन गोप्य, सार वित सोई जानै। देखत कौ तुलाधार, दूर आसै उनमानै॥ देय दमामौ पैंज, विदित वृन्दावन पायौ। राधावल्लभ भजन, प्रगट परताप दिखायौ॥ परम धरम साधन सुदृढ़, कलियुग कामधेनु में गन्यौ। हरीदास भक्तनि हित, धनि जननी एकै जन्यौ॥ १५६॥ हरीदास बनिक सो, काशी ढिंग वास जाकौ, ताकौ यह पन, तन त्यागौं ब्रजभूमहीं। भयौ ज्वर नाड़ी छीन, छोड़ि गये वैद तीन, बोल्यौ यों प्रवीन, वृन्दावन रस झूमहीं।। बेटी चारि सन्तनि कौ, दई अंगीकार करौ, धरौ डोली माँझ मोको, ध्यान दृग धूमहीं। चले सावधान राधावल्लभ कौ गान करै, करै अचरज लोग परी गाँव धूमहीं॥ ५७८॥ आवत ही मग माँझ, छूटि गयौ तन पन, साँचौ कियौ स्याम वन, प्रगट दिखायौ है। आय दरसन कियौ, इष्ट गुरु प्रेम भरि, नेम पर्यौ पूरौ, जाय चीरघाट न्हायौ है।। पाछें आये लोग, शोक करत भरत नैन, बैन सब कही, कही ताहि दिन आयौ है। भक्ति कौ प्रभाव यामें, भाव और आनौ जिनि, बिन हरिकृपा यह, कैसे जात पायौ है।। ५७९।।
१५२) (श्री भक्तमाल
श्रीगोपालदासजी, श्रीविष्णुदास जी भक्ति भार जूड़ैं जुगल, धर्म धुरन्धर जग विदित॥ बाँबोली गोपाल, गुननि गम्भीर गुनारट। दच्छिन दिसि विष्णुदास, गाँव काशीर भजन भट॥ भक्तनि सो यह भाय, भजै गुरु गोविन्द जैसे। तिलक दाम आधीन, सुवर सन्तनि प्रति तैसे॥ अच्युतकुल पन एकरस, निबह्यौ ज्यौं श्रीमुख गदित। भक्ति भार जूड़ैं जुगल, धर्म धुरन्धर जग विदित॥१५७॥
रहैं गुरूभाई, दोऊ भाई, साधुसेवा हिये, ऐसे सुखदाई नई रीति लै चलाइयै। जायँ जा महोच्छौं में, बुलाये हुलसाये अंग, संग गाड़ी सामा सो, भण्डारी दै मिलाइयै॥ याकौ तात्पर्य्य, सन्त घटती न सही जात, बात वे न जाने, सुखमानै मन भाइयै। बड़े गुरु सिद्ध, जग-महिमा प्रसिद्ध बोले, विनै कर जोरि, सोई कहिकै सुनाइयै॥५८०॥
चाहत महोत्छौ कियौ, हुलसत हियौ नित, लियौ सुनि बोले, करौ वेगि दै तयारियै। चहुँदिसि डार्यौ नीर, कर्यौ न्यौतो ऐसे धीर, आवै बहु भीर, सन्त ठौरनि सँवारिये॥ आये हरिप्यारे, चारो खूँट ते निहारे नैन, जाय पगु धारे, सीस विनै लै उचारिये। भोजन कराय दिन, पाँच लगि छाय रहे, पट पहिराय, सुख दियौ अति भारिये॥५८१॥
आज्ञा गुरु दई, भोर आवौ फिरि आस-पास, महा सुखरासि, नामदेव जू निहारिये। उज्ज्वल वसन तन, एकले प्रसन्न मन, चले जात वेगि, सीस पाँयनि पै धारिये। वेई दें बताय, श्रीकबीर अति धीर साधु, चले दोऊ भाई, परदच्छिना विचारियै। प्रथम निरखि नाम, हरखि लपटि पग, लगि रहे छोड़त न, बोले सुनौ धारियै॥५८२॥
साधु अपराध जहाँ, होत तहाँ आवत न, होय सनमान सब, सन्त तहीं आइयै। देखि प्रीति रीति, हम निपट प्रसन्न भये, लये उर लाय, जावौ श्री कबीर पाइयै॥ आगें जो निहारैं, भक्तराज दृग धारैं चलीं, बोले हँसि आप, कोऊ मिल्यौ सुखदाइयै। कह्यौ हाँ जू मान दई, भई कृपा पूरन यों, सेवा कौ प्रताप कहौ, कहाँ लगि गाइयै॥५८३॥
मास परायण सत्तइसवाँ विश्राम
श्रीकरमैतीजी) (१५३ श्री कील्हदेवजी के शिष्यजन कील्ह कृपा कीरति विशद्, परम पारषद सिष प्रगट।। आसकरन रिषिराज, रूप भगवान् भक्त गुर। चतुरदास जग अभय, छाप छीतर जू चतुरवर।। लाखै अद्भुत रायमल, खेम मनसा क्रम वाचा। रसिक रायमल गौर, देवा दामोदर हरिरँग राँचा।। सबै सुमंगल दास दृढ़, धर्म धुरन्धर भजन भट। कील्ह कृपा कीरति विशद्, परम पारषद सिष प्रगट।।१५८।। श्रीनाथभट्टजी रसरास उपासक भक्तराज, नाथभट्ट निर्मल वयन।। आगम निगम पुरान, सार शास्त्रनि जु विचार्यौ। ज्यौं पारौ दे पुटहिं, सबनि कौ सार उधार्यौ।। श्रीरूप-सनातन जीव, भट्ट नारायण भाख्यौ। सो सर्वसु उर साँच, जतन करि नीके राख्योँ।। फनीवंश गोपाल सुव, रागा अनुगा कौ अयन। रसरास उपासक भक्तराज, नाथभट्ट निर्मल वयन।।१५६।। श्रीकरमैतीजी कठिन काल कलियुग्ग में, करमैती निकलंक रही।। नश्वर पति-रति त्यागि, कृष्णपद सौं रति जोरी। सबै जगत् की फाँसि, तरकि तिनुका ज्यौं तोरी।। निरमल कुल काँथड्या, धन्य परसा जिहिं जाई। विदित वृन्दावन वास, सन्त मुख करत बड़ाई।। संसार स्वाद सुख बांत करि, फेरि नहीं तिन तन चही। कठिन काल कलियुग्ग में, करमैती निकलंक रही।।१६०।।
१५४) (श्री भक्तमाल शेषावति नृप के, पुरोहित की बेटी जानौ, वास हो खँड़ेला, करमैती सो बखानियै। बस्यौ उर स्याम, अभिराम कोटि काम हूँ ते, भूले धाम काम, सेवा मानसी पिछानियै।। बीत जात जाम, तन बाम अनुकूल भयौ, फूलि-फूलि अंग, गति मति छबि सानियै।। आयौ पति गौनो लैन, भायौ पितु-मातु हिये, लिये चित चाव पट आभरन आनियै।।५८४।। पर्यौ सोच भारी, कहा कीजिये विचारी, हाड़-चाम सौं सँवारी देह, रति के न काम की। तावें देवौ त्यागि, मन सोवै जनि जाग, अरे मिटै उर दाग, एक साँची प्रीति स्याम की।। लाज कौन काज, जोपै चाहै ब्रजराज सुत, बड़ोई अकाज जोपै, करै सुधि धाम की। जानी भोर गौनो होत, सानी अनुराग रंग, संग एक वही चली भीजी मति बाम की।।५८५।। आधी निसि निकसी यों, बसी हिये मूरति सो, पूरति सनेह तन, सुधि बिसराई है। भोर भये शोर पर्यौ, पर्यौ पितु-मातु सोच, करयौ लै जतन, ठौर-ठौर ढूँढि आई है।। चारो ओर दौरे नर, आये ढिंग डुरि जानि, ऊँट के करंक मध्य देह जा दुराई है। जग दुरगन्ध, कोऊ ऐसी बुरी लागी जामें, वह दुरगन्ध सो सुगन्ध-सी सुहाई है।।५८६।। बीते दिन तीन, वा कंरक ही में शंक नहीं, बंक प्रीति रीति, यह कैसें करि गाइयै। आयौ कोऊ संग, ताही संग, गंग तीर आई, तहाँ सो अन्हाई, दै भूषन वन आइयै।। ढूँढ़त परसराम, पिता मधुपुरी आये, पते ले बताये, जाय माथुर मिलाइयै। सघन विपिन, बह्मकुण्ड पर बर एक, चढ़ि करि देखी, भूमि अँसुवा भिजाइयै।।५८७।। उतरिकै आय, रोय पाँय लपटाय गयौ, कटी मेरी नाक, जग मुख न दिखाइयै। चलौ गृह वास करौ, लोक उपहास मिटै, सासु घर जावौ, मत सेवा चित लाइयै।। कोऊ सिंह व्याघ्र अजू, वपु कौ विनास करै, त्रास मेरे होत, फिरि मृतक जिवाइयै। बोली कही साँच, बिन भक्ति तन ऐसो जानौ, जोपै जियौ चाहौ, करौ प्रीति जस गाइयै।।५८८।। कही तुम कटी नाक, कटै जोपै होय कहूँ, नाक एक भक्ति, नाक लोक में न पाइयै। बरस पचास लगि, विषै ही में वास कियौ, तऊ न उदास भये, चबे को चबाइयै।। देखे सब भोग, मैं न देखे एक, देखे स्याम, तातें तजि काम, तन सेवा में लगाइयै। रात तें ज्यौं प्रात होत, ऐसे तम जात भयौ, दयौ लै सरूप, प्रभु गयौ हिये आइयै।।५८६।। आये निसि घर, हरिसेवा पधराय चाय, मन को लगाय, वही टहल सुहाई है। कहूँ जात आवत न, भावत मिलाप कहूँ, आप नृप पूछे, द्विज कहाँ? सुधि आई है।। बोल्यौ कोऊ जन, धाम स्याम संग पागे सुनि, अति अनुरागे वेगि, खबर मँगाई है। कहौ तुम जाय, ईश इहाँई असीस करौं, कही भूप आयौ हिये, चाह उपजाई है।।५६०।।
श्रीगंगग्वालजी) (१५५ देखी नृप प्रीति, रीति पूछी, सब बात कही, नैन अश्रुपात, वह रँगी स्याम रंग में। बरजत आयौ भूप, जायके लिवाय ल्याऊँ, पाऊँ जोपै भाग, मेरे बढ़ी चाह अंग मे।। कालिन्दी के तीर ठाढ़ी, नीर दृग भूप लखी, रूप कछु औरै, कहा कहैं वे उमंग में। कियौ मने लाख बेर, ऐपै अभिलाष राजा, कीनी कुटी आये, देश भीजे सो प्रसंग में ।।५६१।। नवाह परायण अष्टम विश्राम श्रीखंगसेनजी कायस्थ गोविन्दचन्द गुन ग्रथन को, खर्गसेन वानी विशद्।। गोपी ग्वाल पितु मातु, नाम निरनै कियौ भारी। दान केलि दीपक, प्रचुर अति बुद्धि उचारी।। सखा सखी गोपाल, काल लीला में बितयौ। कायथकुल उद्धार, भक्ति दृढ़ अनत न चितयौ।। गोतमी तन्त्र उर ध्यान धरि, तन त्याग्यो मण्डल शरद्। गोविन्दचन्द गुन ग्रथन को, खर्गसेन वानी विशद् ।। १६१।। ग्वालियर वास, सदा रास कौ समाज करैं, सरद् उजारी अति, रंग चढ़यौ भारी है। भाव की बढ़नि, दृग रूप की चढ़नि, ततथेई की रढ़नि, जोरी सुन्दर निहारी है।। खेलत में जाय मिले, त्यागि तन भावना सौं, झेलत अपार सुख, रीझि देह वारी है। प्रेम की सचाई, ताकी रीति लै दिखाई भई, भावुकनि सरसाई, बात लागी प्यारी है।।५६२।। श्रीगंगग्वालजी सखा श्याम मन भावतौ, गंगग्वाल गम्भीर मति ।। श्यामा जू की सखी, नाम आगम विधि पायौ। ग्वाल गाय ब्रज गाँव, पृथक् नीके करि गायौ ।। कृष्ण केलि सुखसिन्धु, अघट उर अन्तर धरई। ता रस में नित मगन, असद् आलाप न करई ।। ब्रजवास आस ब्रजनाथ गुरू, भक्त चरणरज अननि गति। सखा श्याम मन भावतौ, गंगग्वाल गम्भीर मति ।।१६२।।