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श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)

Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished82 पृष्ठ

इसी प्रकार गुरु अष्टकम् में आया है - शरीरं सरूपं तथा वा कलत्रं यशश्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यम् । गुरोरंघ्रिपद्मे मन श्चेन्न लग्नं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिं ॥ सुन्दर सुडौल सुरुपवान शरीर, उसी भांति की रुपवती पत्नी विस्तृत विशाल निर्मल यश कीर्ति अपार धन दौलत होने पर यदि गुरु के चरण कमलों के अग्रभाग में मन नहीं रमता तो सब व्यर्थ गया यानि व्यर्थ नष्ट कर दिया। अस्तु सद्गुरु के पादपद्मों में मन को लीन करना ही जीवन धन सारवान है। प्रस्तुत लघुकाय ग्रन्थ में गुरुगीता, गुरु स्तवराज एवं गुरु अष्टकम् के श्लोकों का हिन्दी अर्थ करके दिया गया है। पीठ में रात्रि कालिक माई की आरती और क्षमापन स्तोत्र भी हिन्दी अनुवाद सहित दिया गया है। साधना के क्षेत्र में गुरु का स्थान सर्वोपरि होता है। परन्तु संस्कृत पाठ का भावार्थ जानते हुए पाठ हृदय को गुरु के सानिध्य में शीघ्रता से ले जाता है। मात्र शाब्दिक पाठ बहुत अधिक समय बाद ही प्रभावी होता है। इसी अंतप्रेरणा को शायद महाराज जी समझ गये थे और उन्होंने मुझे यह कार्य करने की शक्ति प्रदान की। इस लघुकाय ग्रन्थ की मूल प्रेरणा के रूप में हैं-श्री पीताम्बरा-पीठाधीश्वर अनन्त श्री विभूषित राष्ट्र गुरु श्री स्वामी जी महाराज। उन्हीं के शुभाशीर्वाद से प्रस्तुत पुस्तक में दिये गये श्लोकों का हिन्दी अनुवाद कर सका हूँ। ग्रन्थ के प्रकाशन का कार्य श्री पीताम्बरा पीठ कर रहा है। पीठ के न्यासी श्री हरिराम सावला जी के प्रति मैं आभार व्यक्त करता हूँ। व्याकरणाचार्य एवं पीठ के आचार्य पं. ओमनारायण शास्त्री द्विवेदः जी ने अपना बहुमूल्य समय देकर प्रस्तुत पुस्तक के श्लोकों के अनुवाद को आद्योपांत पढ़कर प्रस्तावना लिखी है। मैं उनका हृदय से सदैव ऋणी रहूंगा। उनके प्रति मैं आभार प्रकट करता हूँ। पुस्तक के मुद्रण का व्यय भार आगरा निवासी श्री नरेन्द्र पञ्जवानी ज्योतिषाचार्य ने सहर्ष वहन किया है। एतदर्थ मैं उन्हें साधुवाद ज्ञापित करता हूँ और भगवती की कृपा के लिये मैं पीताम्बरा माता से प्रार्थना भी करता हूँ। कथावाचक पं. यशोदानन्द मिश्र प्रयागराज (उ.प्र.) ने इस कार्य में अथक परिश्रम किया है अतएव उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। साधक एवं तांत्रिक डॉ. सूर्यप्रकाश मिश्र ने शुभकामना देकर मुझे अनुग्रहीत किया है। अस्तु उनके प्रति भी मैं आभार व्यक्त करता हूँ। झाँसी निवासी भाई मधुर वर्मा संचालक स्वाधीन प्रेस द्वारा पुस्तक टंकण कार्य बड़ी सावधानी से किया गया है, एतदर्थ उन्हें भी मैं साधुवाद देता हूँ। विनयावनत डॉ. मोतीलाल खङ्गरशास्त्री (मास्टर जी) (12)

शुभकामना श्री गुरुचरण सरोज रज, निजमन मुकुर सुधार। बरनऊं रघुवर विमल जस, जो दायक फल चारि॥ दुर्गम काज जगत् के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते। (हनुमान चालीसा) डॉ. श्रीमोती लाल खड्डर शास्त्री (मास्टर जी) द्वारा लिखित गुरुगीता, गुरु स्तवराज एवं गुरु अष्टक के श्लोकों का हिन्दी अनुवाद करके पुस्तक रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो समस्त भक्त-जनों का मार्ग प्रशस्त करेगा, ऐसा विश्वास है। मैं माई महाराज से उनके दीर्घायु होने की कामना करते हुए प्रार्थना भी करता हूँ कि भविष्य में इसका अंग्रेजी रूपान्तर भी हो। शुभकामना सहित नरेन्द्र पंजवानी ज्योतिषाचार्य डी-563 कमला नगर, आगरा (उ०प्र०) मो.-9410875488 (13)

शुभकामना पीताम्बरा पीठ के वयोवृद्ध साधक मा. मोतीलाल खड्डर जी के द्वारा गुरु गीता-गुरुस्तवराज एवं गुरु अष्टक के श्लोकों का यह हिन्दी अनुवाद एक सराहनीय कार्य है। इससे हिन्दी भाषी साधक एवं संस्कृत में अर्थ न समझ पाने वाले साधक लाभान्वित होंगे। हम उनके इस कार्य को साधुवाद देते हैं। स्वामी जी की कृपा से पुस्तक लोकप्रिय होगी। शुभेच्छु सू. प्र. मिश्र (डॉ. सूर्यप्रकाश मिश्र) ( 14 )

॥ श्रीगुरुगीता प्रारंभः॥ ॥श्रीगणेशायनमः॥ ॥श्रीगुरुभ्योनमः॥ ॐ अस्य श्रीगुरुगीतास्तोत्रमन्त्रस्य भगवान् सदाशिव ऋषिः। नानाविधानि छंदांसि। श्रीगुरुपरमात्मा देवता। हं बीजं। सः शक्तिः। क्रों कीलकं। श्रीगुरु कृपा प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः। अथ करन्यासः - ॐ हं सां सूर्यात्मने अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ हं सीं सोमात्मने तर्जनीभ्यां नमः। ॐ हं सूं निरंजनात्मने मध्यमाभ्यां नमः। ॐ हं सैं निराभासात्मने अनामिकाभ्यां नमः। ॐ हं सौं अतनुसूक्ष्मात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ हं सः अव्यक्तात्मने करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। अथ हृदयादिन्यासाः- ॐ हं सां सूर्यात्मने हृदयाय नमः। ॐ हं सीं सोमात्मने शिरसे स्वाहा। ॐ हं सूं निरंजनात्मने शिखायै वषट्। ॐ हं सैं निराभासांतमने कवचाय हुँ। ॐ हं सौं अतनुसूक्षात्मने नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ हं सः अव्यक्तात्मने अस्त्राय फट्। ॐ ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोमिति दिग्बन्धः। ( 15 )

अथ ध्यानम् हंसाभ्यां परिवृत्तपत्रकमलैर्दिव्यैर्जगत्कारणै विश्वोत्कीर्णमनेकदेहनिलयैः स्वच्छन्दमात्मेच्छया॥ तद्योतं पदशांभवं तु चरणं दीपांकुरग्राहिणम्। प्रत्यक्षाक्षरविग्रहं गुरुपदं ध्यायेद्विभुं शाश्वतम्॥ मम चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थे जपेः विनियोगः। गुरुदेव का ध्यान :- ब्रह्म जीव से घिरे कमल पत्रन्त् सूक्ष्म हृदय वाले परम स्वतन्त्र अपनी रुचि के अनुसार दिव्य जगत् विश्वरूप अनेक देह वाले इस प्रपन्चात्मक जगत् को परिभाषित करने वाले शिव स्वरूप वाले जगत् कारण को प्रकाशित करने वाले नित्य व्यापक प्रत्यक्ष अक्षर आकार ब्रह्म गुरु स्वरूप का हम ध्यान करते हैं। ऋषिरुवाचः गुह्याद्गुह्यतरा विद्या गुरुगीता विशेषतः। त्वत्प्रसादाच्च श्रोतव्यं तत्सर्वं ब्रूहि सूत मे ॥१॥ ऋषिराज कथन :- नैमिषारण्य की पावन धरती पर विराजमान ८८००० शौनकादि ऋषि जो कि सुबह सत्र में हवन पूजन और सायं स्तव में कथा रसपान करने के क्रम मे प्रश्न किया - कि हे श्रीमान् ! हे भगवन् ! आप हमें परम गोपनीय रहस्यमय गुरुगीता का उपदेश दीजिये मैं विस्तार से उसे पूरा-पूरा सुनना चाहता हूं ०१ ( 16 )

सूत उवाच :- कैलासशिखरे रम्ये भक्तिसाधननायकं। प्रणम्य पार्वती भक्त्या शंकरं परिपृच्छति ॥२॥ सूत उवाच :- शौनकादि ऋषियों के प्रश्न को सुनकर सूत जी बोले जो कुछ आप गुरुगीता के सहारे आप हमसे जानना चाहते हैं प्राचीन काल में एक बार माता पार्वती ने भूतभावन भोलेनाथ से ऐसा ही प्रश्न बड़ी विनम्रता से पूछा और जो कुछ कैलाश पर्वत पर भोलेनाथ ने महिमा का बखान किया मैं विस्तार से उसको कहता हूं सावधानी से सुनो। ०२ पार्वत्युवाच :- ॐ नमो देवदेवेश परात्पर जगद्गुरो। सदाशिव महादेव गुरुदीक्षां प्रदेहि मे ॥३॥ केन मार्गेण भो स्वामिन् देही ब्रह्ममयो भवेत्॥४॥ त्वं कृपां कुरु मे स्वामिन्नमामि चरणं तव॥५॥ पार्वती उवाच :- सूतजी कहते हैं कि ऋषियों जगत जननी जगदम्बा स्वरूपा माता पार्वती बड़ी विनम्रता से शिवजी से पूछी "हे देवाधदेव महादेव मैं आपके चरण-शरण मे हूं इसलिये हम पर अपनी कृपा करते हुये गुरुदीक्षा के क्रम में ऐसे अनुपम मार्ग का मार्गदर्शन करिये जिसके सहारे जीवात्मा अपने आत्म स्वरूप को पूर्ण तरह पहचान ले और मुक्त हो जाए। ऐसे मार्ग का मार्गदर्शन करें। ०३ ०४ ०५ ( 17 )

ईश्वर उवाच :- मम रूपासि देवि त्वं त्वत्प्रीत्यर्थं वदाम्यहं॥ लोकोपकारकः प्रश्नो न केनापि कृतः पुरा॥६॥ ईश्वर उवाच :- सूतजी कहते हैं कि ऋषियो, मईया के प्रश्न को सुन कर भोलेनाथ प्रशंसा करने लगे और कहने लगे कि हे देवि ! आपने बड़ा ही सुन्दर प्रश्न लोकहित के लिये कर दिया इससे केवल आपका ही नहीं अपितु समूची मानव जाति का कल्याण होगा। ऐसा प्रश्न आपसे पहले अभी तक किसी ने नहीं किया था। ०६

दुर्लभं त्रिषु लोकेषु तच्छृणुष्व वदाम्यहं। किञ्चिद् गुरुं विना नान्यत्सत्यं सत्यं वरानने॥७॥ भोलेनाथ कहते हैं देवि ! सच कहूं इस त्रैलोक्य मे बिना गुरुदेव की कृपा के कुछ भी पाना सम्भव नहीं है, सब दुर्लभ है। ०७ वेदशास्त्रपुराणानि इतिहासादिकानि च। मंत्रयंत्रादिविद्यानां स्मृतिरुच्चाटनादिकं ॥८॥ सूतजी कहते हैं ऋषियो - वेद, शास्त्र, पुराण की विद्यायें, मन्त्र तन्त्र बिना गुरु की कृपा के फलीभूत नहीं होती, इसलिये गुरुदेव के ही चरण-शरण में समर्पित हो जाना चाहिए। ०८

( 18 )

शैवं शाक्तागमादीनि अन्यदबहुमतानि च। अपभ्रंशः समस्तानि जीवानां भ्रांतचेतसां ॥९॥ अब ऋषियों को समझाते हुए कह रहे हैं कि महर्षियों सरल सहज साधन तो यही है कि गुरुजी के श्री चरण में ये जीवात्मा शाश्वत रहे लेकिन बहुत सारे मलों में उलझ करके संसार में भटकते रहते हैं और अपने आत्मस्वरूप को नहीं समझ पाते। ०९ यज्ञो व्रतं तपो दानं जपस्तीर्थं तथैव च। गुरुतत्त्वमविज्ञाय मूढास्ते चेतरे जनाः ॥१०॥ सूतजी का कहना है कि ये जीवात्मा चाहे जिस प्रकार से विशेष यत्न कर ले, व्रत कर ले, तप कर ले तथा चाहे जिस तीर्थ में जाकर विशेष जप अनुष्ठान कर ले इन सब का कोई प्रभाव तब तक नहीं होता जब तक गुरु की कृपा दृष्टि नहीं होती, इसलिए गुरु की संरक्षण स्थिति में जीना चाहिये अन्यथा मूर्ख की भाँति होकर विचरण ही करेगा। १० यदंघ्रिकमलद्वंद्वं द्वंद्वतापनिवारकं । तारकं भवसिंधौ हि सद्गुरोः प्रणमाम्यहं ॥११॥ इसलिये हे महर्षियों ! हम सब मिलकर श्री सदगुरुदेव के कमलवत चरणों में कोटि कोटि प्रणाम करते हैं जिसके सहारे जीवात्मा के तीनों ताप (दैहिक, दैविक, भौतिक) तत्काल नष्ट हो जाते हैं और जीव अपने आप को पहचान जाता है उसी श्रीचरण मे हम सबका बारम्बार प्रणाम है। ११ ( 19 )

२. द्वितीय अध्याय: गुरु-मन्त्र, गुरु-दीक्षा, पादुका-पूजन एवं तत्त्व-ज्ञान

गूढ़विद्या जगन्माया देहे चाज्ञानसंभवा। उदयं स्वप्रकाशेन गुरुशब्देन कथ्यते ॥१२॥ सूतजी कहते हैं कि हे महर्षियों - इस संसार के गुरु तत्व को और संसार की माया से अर्थात (तत्वज्ञान पाने के लिये - और माया के प्रभाव से बचने के लिये) गुरुदेव के उपदेशों का श्रवण करना चाहिये और इसी के सहारे अपने आपको जगा लेना चाहिये, पहचान लेना चाहिये। १२

देही ब्रह्म भवेत्तस्य तत्कृपार्थं वदामि ते। सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादपंकजं ॥१३॥ इस प्रकार गुरु महिमा के क्रम में सूतजी कहते हैं कि है ब्रह्मर्षियों ये जीवात्मा गुरुदेव के चरणों में समर्पित होकर सेवा करते - करते उनकी कृपा के सहारे शुद्ध विशुद्ध को जाता है और साक्षात वही सिद्धान्तों के अनुपालन करने के कारण ब्रह्ममय हो जाता है अर्थात हर रूप में प्रभु का दर्शन करता है। १३

सर्वतीर्थावगाहस्य प्राप्नोति स फलं नरः । गुरुपादोदकं पीत्वा जलं शिरसि धारयेत् ॥१४॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों ये जीवात्मा जो अनेक तीर्थ स्थलों पर जा-जाकर पुष्प अर्जित करने का प्रयास करता है। यदि पूर्ण तन्मयता से गुरुदेव के चरणों का प्रक्षालन करके श्रद्धापूर्वक उसी जल का पान कर ले तो सारा का सारा फल उसे उतने से प्राप्त हो जाएगा, तो तीर्थों में जाने का क्या लाभ ? १४

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शोषणं पापपंकस्य दीपनं ज्ञानतेजसां । गुरुपादोदकं सम्यक् संसारार्णवतारकं ॥१५॥ पूज्य गुरुदेव जी के श्रीचरण का प्रक्षालन जल पीकर ये जीवात्मा इस संसार सागर से पार हो जाता है और उसके सारे पाप समाप्त हो जाते हैं और साथ ही साथ एक दिव्य ज्ञान ज्योति प्रकाशित हो जाती है जिसके कारण सहजता में मुक्त हो जाता है। १५ अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारणं । ज्ञानवैराग्यसिद्धयर्थं गुरुपादोदकं पिबेत् ॥१६॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियो - गुरुदेव के पाँव प्रक्षालन जल के सहारे इस जीवात्मा के सारे बन्धन जड़ से मिट जाते हैं जन्म कर्म का बन्धन समाप्त हो जाता है और साथ ही साथ ज्ञान वैराग्य जीवन में जागृत हो जाता है। १६ गुरुपदोदकं पानं गुरोरुच्छिष्टभोजनं । गुरुमूर्तेः सदा ध्यानं गुरुस्तोत्रं सदा जपेत् ॥१७॥ इसलिये हे ऋषिगणों - गुरुदेव के प्रक्षालित चरण जल का पान करना चाहिये, मिल सके, सम्भव हो तो जूठा भोजन भी प्रसाद रूप में ग्रहण करना चाहिए और सदैव उन्हीं के ध्यान में डूबकर इस जीवात्मा को अपना कल्याण कर लेना चाहिए। १७

काशीक्षेत्र निवासोऽसौ जाह्नवीचरणोदकं । गुरुर्विश्वेश्वरः साक्षात् तारको ब्रह्म निश्चितं ॥१८॥ अब सूतजी कहते हैं कि हे महर्षियों, गुरुदेव की कृपा महिमा के बखान क्रम में भोलेनाथ पार्वती से कहते हैं कि हे प्रिये वाराणसी नगरी में निवास कर रहे जो भक्तजन हैं, गंगा में स्नान करके जलपान करके साक्षात गुरुदेव के ही धाम को प्राप्त होते हैं। १८

गुरोः पादांकितं भूत्वा गयास्ते सोक्षयो वटः । तीर्थराजः प्रयागस्तु गुरुमूर्ते नमोनमः ॥१९॥ इसलिए महर्षियो - गुरुदेव के चरणों को अंकितरूप समझकर गया धाम में विराजमान अक्षयवट को और तीर्थराज प्रयाग को गुरुमूर्तिमय मानकर हम प्रणाम करते हैं। १९

गुरुमूर्तिं स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत् । गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यन्न भावयेत् ॥२०॥ इसलिए गुरुदेव की छवि का ध्यान प्रति क्षण करना चाहिए और शंकर रूपी गुरु का नाम जप करते रहना चाहिए, बिना गुरु की आज्ञा के कुछ भी नहीं करना चाहिए, जो गुरुदेव की भावना के अनुसार हो, वही कर्म करना चाहिए। २०

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गुरुवक्त्रंस्थितं ब्रह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः । गुरुमूर्तेः सदा ध्यानं कुलस्त्री स्वपतेर्यथा ॥२१॥ सूतजी कहते हैं कि गुरुदेव के बताए सिद्धान्तों पर चलने से जीवात्मा ब्रह्म मे स्थित होकर जीने लगता है, इसलिए पतिव्रता को भी चाहिए कि जैसे पति मे डूबी रहती है, ऐसे ही गुरु के प्रति भी आदर भाव रखे। २१ स्वाश्रमं च स्वजातिं च स्वकीर्तिपुष्टिवर्धनं । अन्यत्सर्वं परित्यज्य गुरोरन्यं न भावयेत् ॥२२॥ इसलिए सूतजी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि हे महर्षियों बिना गुरु की कृपा के कोई भी अपने आश्रम को पवित्र नहीं कर सकता, न ही अपनी जाति को सम्मानित कर सकता है और न ही अपने कुल की कीर्ति बढ़ा सकता है इसलिए गुरुदेव के चरण-कमल मे दण्डवत रहना चाहिए। २२ अनन्याश्चिंतयंतो मां सुलभं परमं पदम्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराराधनं कुरु ॥२३॥ इसलिए अनन्य भाव से इसी को सर्वथा सरल सहज शाश्वत साधन स्वीकारते हुए सभी को गुरुदेव के ध्यान में डूबकर अपने को संसार के दुष्प्रभाव से मुक्त कर लेना चाहिए। २३ गुरुवक्त्रस्थिता विद्या गुरुभक्त्या तु लभ्यते । त्रैलोक्ये स्फुटवक्तारो देवाद्याः सुरपन्नगाः ॥२४॥ ( 23 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

सूतजी कहते हैं कि चाहे जितना गुणवान वक्ता हो (मनुष्य, देव) वो ये वाकपटुता, गुरु के पास से तभी ग्रहण कर सकता है जब उसमें भक्ति का भाव हो, अतः गुरु के प्रति स्नेहभाव रखना चाहिए। २४ गुकारस्त्वंधकारःस्यादरुकारस्तं निरासकृत्। अंधःकारविनाशत्वादुहुरित्यभिधीयते ॥२५॥ कहने का भाव यह है कि हे ऋषियों, गुरुनाम के उच्चारण मात्र से ही जीवात्मा के सारे अज्ञान समाप्त हो जाते हैं इसीलिए गुरु से बड़ा कोई और नहीं। २५ गुकारः प्रथमो वर्णो मायादि गुणभासकः । रुकारो द्वितीयं ब्रह्म मायाभ्रांतिविमोचकं ॥२६॥ सूतजी कहते हैं कि गुरु, दो वर्णों के मेल से बना हुआ शब्द है और इसका जो पहला शब्द गु-कार है, यह संसार की माया को पूरी तरह से व्यक्त करता है, और रु-कार इस माया के प्रभाव को नष्ट करता है, और इसी शब्द के उच्चारण भाव से ही जीव माया से मुक्त हो जाता है। २६ एवं गुरुपदं श्रेष्ठं देवानामपि दुर्लभं । हाहाहूहूगणैश्चैव गंधर्वाद्यैश्च पूज्यते ॥२७॥ इस तरीके गुरु शब्द की महिमा का उल्लेख करते हुए सूतजी ने कहा कि ऋषियों, गुरुदेव भगवान के पद से बढ़कर कोई दूसरा पद नहीं है, यह पद देवताओं के लिये भी दुर्लभ है, और आज भी हा हा हू हू गन्धर्व अपने समस्त गुण के सहित गुरु की पूजा करते हैं जो कि गन्धर्वराज हैं। २७ ( 24 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

एवं तेषां च सर्वेषां नास्ति तत्वं गुरोः परं । आसनं शयनं वस्त्रं वाहनं भूषणादिकं ॥२८॥ इसलिए हे शौनकादि ऋषियों गुरु से बढ़ कर इस त्रैलोक्य मे कोई दूसरा तत्व नहीं है, इसलिए चाहिए कि संसारी लोग, आसन, शयनसेज, वस्त्र, आभूषण, गो, इत्यादि गुरुदेव को दान करते हुए अपने आप को उनकी कृपा छांव से जोड़ कर रखें। २८ साधकेन प्रदातव्यं गुरुसंतोषकारकं । गुरोराराधनं कार्यं जीवितं वै निवेदयेत् ॥२९॥ हे महर्षियों - साधक को चाहिए कि गुरुदेव को संतुष्ट करने के लिये हर सम्भव प्रयास करे और उन्ही के नाम स्मरण के सहारे अपना कोई भी छोटा बड़ा कार्य करना शुरु करे, उनकी (सद्गुरुदेव) कृपा से कोई बाधा नहीं होगी। २९ कर्मणा मनसा वाचा नित्यमाराधयेद्गुरुं । दीर्घदंडं नमस्कृत्य निर्लज्जो गुरुसन्निधौ ॥३०॥ इसलिए इस जीवत्मा को मन से, कर्म से, वाणी से हमेशा गुरुदेव के चरणों में प्रेमभाव होना चाहिये और उन्हीं के सानिध्य मे जीना चाहिये। ३० शरीरार्थं च संप्राप्तं पशुपुत्रगृहाणि च । आत्मदारादिकं चैव सद्गुरुं वै निवेदयेत् ॥३१॥ अब सूतजी कहते हैं कि ऋषियों अपने शारीरिक स्वास्थ्य के लिये, सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये, पशु, पुत्र, परिवारजन के कल्याण के लिये, ( 25 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

अपने आत्म कल्याण के लिये, पत्नी इत्यादि की सुदृढ़ वैभवपूर्ण स्थिति के लिये गुरुदेव से ही प्रार्थना करनी चाहिये, क्योंकि ये सब उन्हीं से सम्भव है। ३१ संसारवृक्षमारूढाः पतन्तो नरकार्णवे । येन चैवोद्धृताः सर्वे तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३२॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों हम उन गुरुदेव के चरण-कमल में प्रणाम करते हैं जो संसार रूपी वृक्ष पर आरूढ़ समस्त जीवात्माओं को नरकगामी होने से बचाते हुए आत्मस्वरूप का बोध कराते हुए मोक्ष की स्थिति प्रदान करते हैं। ३२ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुदेवो महेश्वरः । गुरुरेकं परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३३॥ इसलिए महर्षियों और क्या कहें, साक्षात गुरुदेव ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं, गुरु ही साक्षात परमब्रह्म हैं उनके अतिरिक्त कहीं कुछ भी और नहीं, उनके श्रीचरण में मेरा प्रणाम है। ३३ हेतवे जगतामेव, संसारार्णव सेतवे । प्रभवे सर्वविद्यानां शंभवे गुरवे नमः ॥३४॥ इस प्रकार गुरुदेव की महिमा का विस्तारित वर्णन शुरु करते हैं और बताते हैं कि महर्षियों गुरुदेव ही संसार को प्रकटित करने के लिये स्रोत हैं और वही संसार सागर से पार पाने के लिए सभी के लिए पुल रूप होकर मुक्त भी करते हैं और वही समस्त विद्याओं के स्वामी हैं ऐसे शिव- स्वरूप गुरुदेव के दिव्य श्रीचरण में मेरा कोटि कोटि प्रणाम। ३४ ( 26 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३५॥ सूतजी कहते हैं कि महर्षियों - जिन श्री सद्गुरुदेव के ज्ञान रूपी अंजन के सहारे संसारी लोग अपने हृदय के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटा देते हैं तो ये अनुपम स्थिति में जिनके दिव्य ज्ञान अंजन को शलाका के सहारे आँख में लगाते ही संसार के दोष समाप्त हो जाते हैं ऐसे सर्वशक्तिमान गुरुदेव के श्री चरणों मे मेरा प्रणाम है। ३५ अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३६॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों ये जो चराचर जगत जड़ और चैतन्य से व्याप्त दिख रहा है यह सब कुछ (जड़, चेतन) रूप मे साक्षात गुरुदेव ही हैं और जिनकी कृपा होते ही ये जीवत्मा संसार न देखकर प्रत्यक्ष गुरुरूप का दर्शन करने लगती है ऐसे श्री गुरु के चरणों मे प्रणाम करता हूं। ३६ सर्वश्रुतिशिरोरत्नं विराजितपदांबुजं । वेदांतांबुजसूर्याय तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३७॥ अब सूतजी समझाते हैं कि ऋषियों - श्रुतियां कहती हैं कि गुरुदेव सारे रत्नों से सुशोभित हैं वही वेद, जल और सूर्य रूप में भी है उनके कमलवत चरण मे मेरा प्रणाम है। ३७ ( 27 )

यस्य स्मरणमात्रेण ज्ञानमुत्पद्यते स्वयं । स एव सर्वसंपत्तिः तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३८॥ इसलिए महर्षियों जिनके नाम स्मरण मात्र से ही ज्ञान अपने आप में ही (हृदय) में प्रकाशित हो उठता है और जिनकी कृपा से भारी सम्पत्ति जीव को प्राप्त हो जाती है ऐसे गुरुदेव के श्री चरण में मेरा प्रणाम है। ३८ चैतन्यं शाश्वतं शांतं व्योमातीतं निरंजनं । बिंदुनादकलातीतं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३९॥ अतः ऋषियों जो गुरुदेव साक्षात चैतन्य हैं शाश्वत हैं नित्य हैं और अपने ही आत्म स्वरूप में डूबे निर्गुण निराकार हैं ऐसे बिन्दुनाद की कला से परे गुरु के चरण मे मैं बारम्बार प्रणाम करता हूं। ३९ स्थावरं जंगमं चैव तथा चैव चराचरम् । व्याप्तं येन जगत् सर्वं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥४०॥ सूतजी कहते हैं कि इस चराचर संसार में जो भी स्थावर और जंगम जीव हैं (स्थावर जड़) जंगम (चलते-फिरते) हर जीव में हम गुरु स्वरूप का दर्शन करते हुए हम उनके चरणों में प्रणाम करते हैं। ४० ज्ञानशक्तिसमारूढं तत्वमालाविभूषितं । भुक्तिमुक्तिप्रदातारं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥४१॥ सूतजी कहते हैं कि वही गुरुदेव ही, ज्ञान शक्ति से युक्त तत्व की अलौकिक माला से विभूषित और भोग मोक्ष के दाता हैं ऐसे समर्थवान गुरु के श्रीचरण में मेरा प्रणाम है। ४१ ( 28 )

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri अनेकजन्मसंप्राप्तं कर्म बंधविदाहनं । स्वात्मज्ञानप्रभावेन तस्मै 'श्रीगुरवे नमः ॥४२॥ कहने का भाव यह है कि जो गुरुदेव अपने ज्ञान उपदेश के माध्यम से जीवात्माओं के अनेक जन्मों के पाप को नष्ट करते हुए उसे कर्म बन्धन से मुक्त कर देते है उन्हें मैं प्रणाम करता हूं। ४२ मन्नाथः श्रीजगन्नाथो मुद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः । सर्वात्मा सर्व भूतात्मा तस्मै श्री गुरवे नमः ॥४३॥ सूतजी कहते हैं कि मेरे गुरु ही जगतनाथ हैं वही जगतगुरु हैं और वही सबकी आत्मा हैं ऐसे सर्वभूत सर्वात्मा श्री शिवस्वरूप गुरु के चरण मे प्रणाम करता हूं। ४३ ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोःपदं । मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ॥४४॥ इसलिए अगर ध्यान मुद्रा में हो तो गुरुदेव के स्वरूप का ध्यान करो, पूजा करने की इच्छा है तो गुरु के चरण की पूजा करो, मंत्र जाप करने की इच्छा है तो उनके वाक्यों को भरिए और इस प्रकार उन्हीं की कृपा के सहारे संसार से मुक्त हो जाइए। ४४ सप्तसागरपर्यंतं तीर्थस्नानादिजं फलं । गुरोरंघ्रिपयो बिंदुसहस्रांशे न दुर्लभम् ॥४५॥ सूतजी कहते हैं कि ऋषियों सात समुद्र की यात्रा तथा समस्त तीर्थस्थलों ( 29 ) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

पर पहुंच कर स्नान करने से जो फल प्राप्त होता हैं उसका १००० गुना फल केवल गुरु को दूध पिलाने से ही प्राप्त होता हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है। ४५ ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभतेः गुरुभक्तितः । गुरोः समानता नास्ति श्रेयोऽसौ गुरुमार्गिणां ॥४६॥ महर्षियो - जीवात्माएँ संसार सागर से अपने आप को मोक्षपद की प्राप्ति तभी करा सकती हैं जब ज्ञान की प्राप्ति होगी और ये दिव्य ज्ञान की प्राप्ति तभी होगी जब गुरु के प्रति प्रीति विश्वास भक्ति का भाव होगा, इसलिए गुरु से बढ़कर उनके समान कोई और नहीं, अतः गुरु के ही अधीन होना चाहिए। ४६ यस्मात्परतरं नास्ति नेतिनेति च वै श्रुतिः । मनसा वचसा चैव सर्वदाऽऽराधयेद्गुरूम् ॥४७॥ सूतजी कहते हैं कि इसलिए श्रुतियां बार-बार गाती हैं, समझाती हैं कि गुरु से बढ़कर कोई और नहीं, इसलिए मन से, वाणी से सदैव गुरुदेव का ही ध्यान करना चाहिए और उन्हीं का गुणगान करना चाहिए। ४७ मदाहंकारगर्वेण विद्या तपबलान्वितः । संसारकुहरावर्ते घटीयंत्रं यथा पुनः ॥४८॥ अब सूतजी कहते हैं कि महर्षियों चाहे जैसा उच्चकोटि का विद्वान हो, चाहे जितना बड़ा तपस्वी हो, बलवान हो, लेकिन अगर इन सारी गुणवत्ता के साथ वह गुरु के चरण-शरण में न होकर अभिमान करता है

तो उसका सब कुछ तप, बल, धन पौरुष क्षणभाव में ऐसे क्षीण हो जाता है जैसे सूर्य का प्रकाश कुहरा भेद देता है, ऐसे ही जीव का अभिमान उसको खा लेता है। ४८ न मुक्ता देवगंधर्वाः पितरो यक्षकिन्नराः । ऋषयः सर्वसिद्धाश्च गुरुसेवापराङ्मुखाः ॥४९॥ चाहे देवता हो, गन्धर्वा हो, पितरगण, यक्ष, किन्नर, ऋषि हों, ये सब गुरुदेव भगवान के ही सहारे सिद्धि पद को प्राप्त होते हैं बिना गुरु के कुछ भी सम्भव नहीं है। ४९ ध्यानं शृणु महादेवि सर्वानंदप्रदायकं । सर्वसौख्यकरं चैव भुक्तिमुक्तिविशारदं ॥५०॥ इसलिए ऋषियों शिवजी कहते हैं कि हे पार्वती ! ध्यान से सुनो, संसार का सारा सुख, सारा वैभव, आनन्द की प्राप्ति, भोग और मोक्ष ये सब गुरुदेव से ही प्राप्त किया जा सकता है इसलिए उनके आश्रय में जीना चाहिए। ५० ब्रह्मानंदं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं । द्वन्दातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यं॥ एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं। भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरूंतं नमामि ॥५१॥ सूतजी कहते हैं कि गुरुदेव ही जो ज्ञानमूर्ति हैं वही हमेशा ब्रह्म के आनन्द में डूबकर सुख प्राप्त करते हैं और जीव रूप संसार में प्रकट होकर ( 31 )