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श्री राम कथा में भारत की सभी समस्याओं का समाधान

Shri Ram Katha Mein Bharat Ki Sabhi Samasyaon Ka Samadhan

राजीव दीक्षित / रोबिन बसराना द्वारा

स्रोत: Rashtraniti & Ram Katha Discourse · Swadeshi Robin Basrana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished32 पृष्ठ

श्री राम कथा में

भारत की सभी समस्याओं का समाधान

संकलन एवं मार्गदर्शन: -

श्री राजीव दीक्षित

संग्रहकर्ता: -

स्वदेशी रोबिन सिराना

समर्पण

पूज्यनीय राजीव भाई को जिन्होंने देश के लिए अपने सुख व वैभव के साथ अपने प्राणों को भी न्योछावर कर दिया।

परम पूज्यनीज श्री राजीव भाई और उनके पूज्यनीय माता जिनके ,हूँ करता बार-बार स्मरण का पिता-भेजा। बीच हमारे को सपूत ऐसे अपने ने माता भारत कारण के कर्मों पूण्य

मैं उन सभी कार्यकर्ताओं को धन्यवाद करना चाहता हूँ राष्ट्र चलकर पर चिन्हों पद के भाई राजीव जो , के हितलिए कार्य कर रहे हैं।

संकल्प का वाले करने कार्य कि है यह बात महत्वपूर्ण ,हैं होता नहीं असम्भव कार्य भी कोई में दुनिया“ हैं। मजबूत कितना

“हैं। सकता बन चिड़िया की सोने से फिर देश ही से नीतियों स्वदेशी केवल”

- श्री राजीव दीक्षित जी

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गांधी जी ने “भारत में राम-राज्य स्थापित हो”, इस पर बहुत कुछ उन्होंने लिखा व बोला लेकिन जब जब गांधीजी के सामने यह प्रश्न आया कि आपकी जो कल्पना है रामराज्य की है वह क्या है? तो गांधी जी ने बहुत सहजता से उत्तर दिया कि जो भगवान श्रीराम ने कहा वही, अब भगवान श्रीराम ने रामराज के बारे में, अपने राज्य के बारे में कहाँ कुछ कहा इस दृष्टि से बहुत दिन मैं खोजता रहा और बहुत सारी राम कथा के जो विद्वान लोग हैं, मर्मज्ञ हैं, उनसे मिलता रहा कि भगवान श्रीराम ने रामराज्य के बारे में क्या कहा? ज्यादातर जगह मुझे निराशा हाथ लगी जितने भी रामकथा के बादशाह हैं, जिनके पास में यह प्रश्न लेकर गया कि भगवान श्रीराम ने रामराज्य के बारे में क्या कहा अपनी राज्य के बारे में क्या कहा रामराज्य होता कैसा है? उसकी सेना कैसी होती है? उसकी अर्थव्यवस्था कैसी होती है? उसके नियम कायदे कानून कैसे होते हैं? उसकी राजनीति क्या है? उसकी सीमाएं कैसी हैं? ऐसे प्रश्नों को लेकर जब-जब मैं साधु-संतों से मिलता रहा तो निराशा ही हाथ लगी।

मैंने फिर पढ़ना शुरू किया सबसे पहली रामकथा मैंने पढ़ी तो श्रीरामचरितमानस और वह पढ़ने के पीछे तो बड़े आधार थे, सबसे बड़ा आधार यह था कि मेरी जो मां है वह हर दिन श्री रामचरितमानस के सुंदरकांड का पाठ करती हैं हर दिन यह उनका दैनिक कर्म है और जब तक वह सुंदरकांड का पाठ नहीं करती है तब तक वह ना खाना बनाती है ना किसी को खिलाती है ना खाने देती हैं, तो कानों में उनके शब्द गूंजते रहे बचपन से मैं भी सुंदरकांड पढ़ता रहा मां के माध्यम से, कभी-कभी उन्होंने मुझे पढ़ने के लिए भी बिठाया हमारे घर में एक पुरानी परंपरा सी है बहुत साल से चल रही है कि साल में एक बार श्री रामचरितमानस का पाठ होता है। 24 घंटे का जो अखंड पाठ होता है उसमें भी मैं बहुत दिन शामिल रहा बहुत दिन श्री रामचरितमानस का पाठ करने के बाद सोचा कुछ और भी पढ़ा जाए तो श्री वाल्मीकि रामायण पढ़ी उन्होंने भगवान श्री राम की कथा को जिस तरीके से कहा है या लिखा है वह गोस्वामी तुलसीदास जी की तुलना में बहुत अलग है, मेरे एक बहुत नजदीकी और जिनको मैं बहुत मानता हूँ अपने जीवन में गुरु है श्री धर्मपाल जी उनको एक बार ने चर्चा की तो श्री धर्मपाल जी ने कहा कि देखो अगर तुम रामराज्य को ही समझना चाहते हो राम कथा में से भारत में राम कथा लिखने वाले जो दक्षिण भारतीय कवि हैं या बड़े महान लोग हैं उसको भी जरा पढ़ो, तो मैंने पूछा क्यों? तो उन्होंने कहा की उसमें तुम्हें बिल्कुल भिन्न दृष्टि मिलेगी। तो दक्षिण भारत में पिछले कुछ वर्षों से घूमता हूँ तो वहां जो राम कथाएं लिखी गई हैं उनमें सबसे ज्यादा चर्चित और सबसे ज्यादा मानी जाने वाली कंब रामायण है। कंब रामायण तमिल के एक बहुत बड़े ऋषि हुए जैसे हम वाल्मिक का अपने यहाँ स्थान मानते हैं गोस्वामी तुलसीदास का मानते हैं वैसे ही तमिल समाज के लोग कम्ब ऋषि को बहुत मानते हैं। तो कम्ब बहुत बड़े ऋषि हुए उन्होंने श्री राम जी की कथा लिखी है और उसको दक्षिण भारत में कंबन रामायण के रूप में जाना जाता है और मैंने जब श्री कंबन रामायण को पढ़ा तो अद्भुत लगी मुझे ऐसा लगा कि मुझे बहुत सारा ज्ञान आसानी से उसमें में फिर श्री राम जी की कथा एक बहुत बड़े कवि ने भी लिखी है आप सब जानते हैं मध्य भारत के बड़े कवि श्री कालिदास उन्होंने श्री राम जी

की कथा लिखी है रघुवंशम , अद्भुत कथा है वह भी, मैंने पढ़ी बार-बार पढ़ी तो ऐसा करके 8-10 तरह की राम कथा है या श्री राम जी की जीवनी पढ़ी, वह सब पढ़ने के बाद कुछ मेरे समझ में आया वह निचोड़ आपको अगले 1 घंटे में कहना चाहता हूँ इस बात का ध्यान रखेंगे कि मैं जो भी कुछ कह रहा हूँ वह भारत की वर्तमान समस्याओं के समाधान के संदर्भ में कहूँगा कि राम जी की कथा में से भारत की समस्याओं के समाधान कैसे निकले? आज की जो समस्याएं हम देख रहे हैं अपने देश में राजनीतिक स्तर पर हो, या सामाजिक समस्याएं हो हमारी सभ्यता में आई हुई समस्याओं या संस्कृति के स्तर पर हो इन सभी के समाधान श्री राम जी की कथा में से मुझे दिखाई देते हैं और अब मुझे समझ में आता है कि महात्मा गांधी किस रामराज्य की बात करते थे गांधी जी जब बार-बार कहते थे कि अगर भारत में रामराज्य हो जाए तो सब समस्याओं का समाधान हो जाए अब मुझे उस बात पर बिल्कुल स्पष्टता है, और दिखाई देता है कि अगर इस देश को राम राज्य के रास्ते पर ले जाएं तो कैसे समस्याओं का बहुत सरल और सुखद समाधान हमें मिल सकता है। श्री राम जी की कथा आप सब जानते हैं कथा कहने में मैं समय खराब नहीं करूँगा क्योंकि कथा आप सभी ने सुनी है, कथा के बीच में जो बिटवीन द लाइंस होती हैं संवाद जो होते हैं जिनमें से कोई बात को पकड़कर विश्लेषण किया जा सकता है, ऐसी कुछ बातें आपके बीच में रखूँगा और श्रीराम के चरित्र में जो बातें मुझे बहुत अच्छी लगती है वह भी आपसे मैं शेयर करने की कोशिश करूँगा मैंने अपने सुविधा की दृष्टि से श्री राम जी की कथा को दो हिस्सों में बांटा या श्रीराम के जीवन को दो हिस्सों में बांटा एक हिस्सा है उनके जीवन का पूर्वार्ध और दूसरा हिस्सा है उनके जीवन का उत्तरार्ध। पूर्वार्ध का जो हिस्सा है उनके जन्म लेने से और उनके वन गमन के 1 दिन पहले तक का है। जब उनका जन्म होता है और वह अपने पिता के घर आते हैं अपनी माता कौशल्य्या की कोख से पैदा होकर तो उस दिन से लेकर और वन गमन के लिए प्रस्थान करें, वो जीवन का उनका पूर्वार्ध किया है, यह मैंने किया है किसी दूसरे का नहीं है, सुविधा की दृष्टि से समझने के लिए। तो उनके जीवन का एक तो है पूर्वार्ध और दूसरा है उत्तरार्ध। उत्तरार्ध अयोध्या की सीमा को छोड़कर वन में चले जाते हैं 14 वर्ष के लिए, वो उनके जीवन का उत्तरार्ध हैं, इन्हीं दो हिस्सों में मैंने बांटा है, और जब वह वापस लौटते है रावण पर विजय प्राप्त करके, विभीषण को राजा घोषित करके, वो हिस्सा पूर्वार्ध हैं। पूर्वार्ध में, श्रीराम का उसमें बचपन का जो है वह तो ऐसे सभी राजाओं के बेटे बेटियों का है वैसा ही है वह अपने पिता के बहुत लाडले हैं उनके पिता उम्र बहुत ज्यादा ही स्नेह रखते हैं मां भी उनको बहुत ज्यादा स्नेह करती है और श्री राम जी के बारे में माना जाता और कहा भी जाता वह खुद अपने मुंह से कहते हैं कि उनके ऊपर श्रीमती कौशल्य्या का स्नेह तो है कैकयी का विशेष स्नेह है, सुमित्रा का भी है लेकिन कैकयी का विशेष स्नेह है, और राम जी इसको बार-बार स्वीकार करते हैं वह मानते हैं कि माता की कोई कृपा मेरे ऊपर हुई है जो मुझे 14 वर्ष का वनवास मिला है जो मेरे जीवन में मैं चाहता हूँ वैसा करने का रास्ता खोल रहा हैं, बड़े होते हैं और जैसे ही उनकी उम्र 14 वर्ष के आसपास आती है तो वह राजकाज के काम में रुचि लेना प्रारंभ करते हैं तो उनके पिता श्री दशरथ ने उनको एक जिम्मेदारी सौंपी है जिसको कई वर्ष तक वह निभा रहे हैं बहुत ईमानदारी से और निष्ठा से। जिम्मेदारी क्या है, श्री दशरथ उनको

कहते हैं कि तुम्हें ब्रह्म मुहूर्त में उठना है और प्रजा के बीच में जाकर घुमना है, प्रजा के मन के सुख दुख तुम्हें पता करने हैं, ये आकर मुझे या मंत्रिमंडल के सामने रखने हैं, तो भगवान श्री राम या राजकुमार श्री राम बिना किसी तकलीफ के बिना किसी दुख को महसूस किए हुए या बिना किसी रूकावट के हर दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठते हैं, दैनिक कर्म से निर्वृत होते हैं और प्रजा के बीच में घूमते हैं प्रजा से हालचाल पूछते हैं लोगों से बात करते हैं आप क्या महसूस करते हैं? राज्य कैसा चल रहा है? नीतियां कैसी है? राजा के बारे में राजा के राज्य के अधिकारियों के बारे में नियमित रूप से वह फीडबैक लेते हैं जानकारी लेते हैं, लौटकर आकर दरबार में अपने पिता श्री दशरथ को बताते हैं यह देखो इस प्रश्न पर प्रजा ऐसा सोचती है उस प्रश्न पर ऐसे सोचती है, और दशरथ श्रीराम की दी गई सूचनाओं के अनुसार बहुत सारे फैसले करते हैं कोई नीति बदलनी है तो नीतियों को बदलते हैं, राज्य के किसी अधिकारी को दंड देते है, और दशरथ जी का ऐसा मानना है कि राम झूठ नहीं बोलता क्योंकि उसमें बहुत सारे सट्टे हैं उनमें से एक सट्टा है कि उसके मुंह से झूठ बात कभी निकलती नहीं वह झूठ कभी बोलता नहीं सत्य का आचरण हमेशा रखता है, और उसे कभी छोड़ता नहीं, तो वह जैसा भी आकर भगवान राम उनको बताते हैं दशरथ जी उनको पूरा का पूरा मान कर के अक्षर से सच है वैसे ही न्याय करते हैं, तो उनका राज्य बहुत अच्छे से चल रहा है, प्रजा में काफी सुख है, दुख नहीं है, तकलीफ नहीं है, तो श्री राम जी के 14 वर्ष के आसपास की उम्र का समय इस कार्य में बीत रहा है माने दशरथ जी के मन में यह अपेक्षा हो रही है कि एक दिन आकर ये अच्छे से गद्दी संभाल लेगा और यह अच्छा राजा सिद्ध होगा और राम जी भी अपना कर्तव्य मानकर उसको नियमित रूप से कर रहे हैं, जब-जब उनके सामने ऐसा कोई मौका आता है की जाओ अपने निहाल चले जाओ, या अपने किसी रिश्तेदार के घर चले जाओ, तो किसी न किसी कारण से अपने को रोकते हैं और वह बार-बार कहते कि मैं निहाल गया तो यह बड़ा काम रुक जाएगा। इसलिए निहाल जाना हर बार टालते हैं, जबकि उनके दो भाई हैं भरत, उनको जब मौका मिले निहाल जाने का वह सहर्ष तैयार रहते हैं और उनकी मां भी उनको बहुत प्रेरित करती है कि तुम ज्यादा समय वहीं रहो तो अच्छा है तो ऐसा कुछ अंतर सा दिखाई देता है। बाद में उनके इसी उम्र के आसपास के समय में उस राज्य के एक बड़े गुरु विश्वामित्र जी आकर श्री राम को उनके पिता से मांग लेते हैं, और वह कहते हैं कि देखो वन में यज्ञ करना चाहता हूँ और यज्ञ करने के लिए रास्ते में बहुत सारी रुकावटें हैं उन रुकावटों में सबसे बड़ी रुकावट है राक्षस , वे यज्ञ संपन्न नहीं होने देते किसी न किसी कारण कोई न कोई विघ्न डालते रहते हैं, मैं शस्त्र नहीं उठाने की कसम खा चुका हूँ वरना मैं स्वयं इन राक्षसों का संहार करने में समर्थ तो मुझे आप अपना बेटा दीजिए जो इन राक्षसों का संहार करें और मेरा यज्ञ सम्पन्न करें। बाद में विश्वामित्र जी दशरथ के दरबार में आकर पूरी कहानी बताते है कि कैसा अत्याचार मचा रखा है, कैसे ये तहस-नहस करने में लगे हुए हैं, आधी-आधी आप जानते हैं कि राजा दशरथ के जो गुरु हैं वह वशिष्ठ हैं, लेकिन विश्वामित्र भी उनसे कुछ नीचे नहीं हैं, वशिष्ठ की राज दरबार में बहुत इज्जत है सम्मान है, लेकिन विश्वामित्र का समाज में बहुत सम्मान है, उस समय का जो समाज है, उस समाज में विश्वामित्र की ऊंचाई बहुत है, और राज्य के अंदर वशिष्ठ की

ऊंचाई है तो जब विश्वामित्र आते हैं और राम जी को मांगते हैं तो दशरथ कहते हैं कि ठीक है मैं वशिष्ठ से बात करूंगा और मेरे गुरु अगर कहते हैं तो जरूर शहर जाने की अनुमति है, तो वशिष्ठ से दशरथ जी का संवाद होता है उस संवाद में श्री राम जी भी पहुंच जाते हैं हालांकि उनको उनके पिता ने अनुमति नहीं दी है कि तुम इसमें शामिल हो लेकिन वह कहते हैं कि मेरे बारे में फैसला हो रहा है इसलिए मेरा रहना आवश्यक है तो वशिष्ठ जी कुछ ऐसे इशारे में संकेत करते हैं कि राम का वहां जाना ठीक नहीं है उसकी जरूरत भी नहीं है हम चाहे तो विश्वामित्र के साथ अपनी सेना को भेज देते हैं, यह सेना जाएगी राक्षसों का संहार करके वापस आ जायेगी , इसमें कोई तकलीफ नहीं है, तो श्री राम पूछ रहे हैं आप ऐसा क्यों सोचते हैं, तो वशिष्ठ कहते हैं देखो, तुम्हारे पिताजी वृद्ध हो चुके हैं इनको अभी वानप्रस्थी होना है, राजकाज से मुक्त होना है अब तुम्हें इस राज्य को संभालना है तुम्हें यह पद मिलना है इस पर बैठकर इस की गरिमा है, इसकी इज्जत है, प्रतिष्ठा है, वह बढ़ानी है, इसलिए हम तुमको वन नहीं भेज सकते पता नहीं वहां कितना समय लगे दो वर्ष लग जाये, 5 वर्ष लग जाए, हो सकता है ज्यादा समय लग जाए, क्योंकि यह राक्षसों का साम्राज्य खास कर जो मायावी राक्षस हैं उनका साम्राज्य बहुत फैल गया है अयोध्या की सीमा को छोड़कर जितनी सीमाएं वर्णन की गई है वह सब राक्षसों के कब्जे में हैं, तो श्री राम कह रहे हैं कि जीवन में एक ही तो मौका मिल रहा है अपने को साबित करने का और आप वह भी मुझसे छीन लेना चाहते और वह कहते हैं कि मुझे तो लगता है कि विश्वामित्र मेरे बड़े हितैषी हैं आप की तुलना में । तो वशिष्ठ उनसे पूछ रहे हैं कि तुमको ऐसा क्यों लगता है? तो वह कहते हैं कि देखो जब तक मैं राज महल में रहता हूँ तो मुझे प्रजा के सुख-दुख का सिर्फ अनुभव हो जाए इसकी मैं कोशिश करता हूँ प्रयास पूर्वक । लेकिन अगर मैं राज महल छोड़कर चला जाऊं और जंगल में रहने लगे ऐसे ही जैसे सामान्य प्रजा रहती है तो मुझे प्रयास पूर्वक अनुभव नहीं करना पड़ेगा, आसानी से मुझे अनुभव होने लगेगा, जब तक मैं राजमहल के सुख नहीं छोड़ूंगा, तब तक मुझे दुख का अनुभव नहीं होगा और जब तक दुख का अनुभव नहीं होगा तब तक न्याय और अन्याय का अंतर मुझे नहीं पता होगा, क्या अभीष्ट है क्या नहीं है यह मैं समझ नहीं पाऊंगा इसलिए मुझे तो जाना ही है अब इस तरह के वाक्य बोलते हैं तो वशिष्ठ बोलते हैं, फिर ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा तो श्री राम जी कहते हैं, मेरी इच्छा नहीं, ईश्वर की इच्छा , तो वशिष्ठ कहते हैं, कि कैसे?

श्री राम कहते हैं कि, ये ईश्वर की इच्छा है कि मैं जाऊं वरना विश्वामित्र ऐसे ही नहीं आये हैं, विश्वामित्र खुद इतने तपस्वी हैं, बलशाली हैं, जिन्होंने अद्भुत अस्त्यों-शस्त्रों का निर्माण किया है , वह चाहे तो राक्षसों का पूरा साम्राज्य मिटा सकते वह कह रहे हैं वे कह रहे हैं कि मैंने सकल्प लिया है कि मैं राक्षसों के युद्ध नहीं लड़ूंगा, लेकिन वे सकल्प तोड़ भी सकते हैं, लेकिन कुछ विशेष सोच विचार कर वे मुझे लेने आये हैं तो मैं मानता हूँ ये ईश्वर की कोई इच्छा है और वशिष्ठ को कहते हैं कि मैं तो बहुत आस्थावान हूँ, ईश्वर के प्रति मेरा परम विश्वास है, इसलिए मुझ लगता है कि वनगमन जाना ही है तो वो निकलते हैं और अपने साथ अपने भाई लक्ष्मण को ले जाते हैं पहले तो वह सोचते हैं मैं अकेला जाऊं लेकिन लक्ष्मण उनको बहुत ज़िद करके तैयार करते हैं, नहीं मैं भी आपके साथ

चलूंगा लक्ष्मण की जो मां हैं (सुमित्रा), वो बार-बार यह सिखा रही है कि तुम्हें राम की छाया बन के रहना जीवन के किसी भी मोड़ पर उन्हें छोड़ना नहीं, तुमको उनसे सीखना है अपना ही ईष्ट उनको बनाना है, तो सुमित्रा की शिक्षा बाद में दशरथ का आशीर्वाद दोनों मिलकर विश्वामित्र के साथ जाते हैं, विश्वामित्र के साथ जब वो जा रहे हैं तो सबसे महत्व की बात जो मुझे समझ में आती है वह यह कि जब उनको कहा उनके पिता श्री दशरथ देखो राक्षसों से युद्ध होगा तुम अपनी सेना लेकर जाओ तो श्री राम कहते हैं कि सेना लेकर गया तो क्या फायदा? तो कहते हैं अच्छा ठीक है सेना लेकर नहीं जा रहे हो तो अस्त्र-शस्त्र लेकर जाओ, तो उन्होंने कहा अयोध्या के अस्त्रों से लड़ा तो क्या फायदा? फिर वह कह रहे हैं कि अच्छा ठीक है ना तुम सेना ले जाना चाहते हो, ना अस्त्र-शस्त्र ले जाना चाहते हो, इस राज्य के कुछ बहादुर सैनिक हैं उनको अपने साथ ले जाओ, उन्होंने कहा “नहीं” यह तो मैं धर्म युद्ध के लिए जा रहा हूँ न्याय युद्ध के लिए जा रहा हूँ इसलिए जहां जाऊंगा वहीं सेना बनाऊंगा, जहां जाऊंगा वहीं अस्त्र शस्त्रों का निर्माण करूंगा, जहां जाऊंगा वहीं संसाधन जुटाऊंगा। अब ये जो बात है श्री राम जी की यह आज की बहुत सारी समस्याओं की तरफ इशारा करती है। श्रीराम में लीडरशिप है, नेतृत्व करने की क्षमता है। लीडर वह होता है जो जहां जाये वही व्यवस्था बनाए, और आज के भारत की राजनीति में लीडर पैदा होना बंद हो गए हैं अब मैनेजर पैदा होते हैं, मैनेजर माने वह जिसको सब कुछ दिया जाए तब कुछ करें। हमारे आज के नेता पता क्या कहते हैं? टी.ए. चाहिए, डी.ए. चाहिए, एच.आर.ए. चाहिए, बेसिक सैलरी चाहिए, इतने करोड़ रुपये का खर्चा चाहिए, ऐ.सी. गाड़ियां चाहिए, ऐ.सी फस्ट क्लास का पास चाहिए, हवाई जहाज की नियमित यात्राएं चाहिए, तब जाकर हम करेंगे, तो ये लीडर नहीं हैं, मैनेजर हैं। क्योंकि किसी कंपनी में हम मैनेजर को नियुक्त करते हैं तो उसके लिए सब सुविधाएं जुटा कर देते हैं एक ऐसी चेंबर होता है, गाड़ी होती है, टेलीफोन होता है, मोबाइल फोन होता है, सब कुछ होता है, सुविधाएं जुटा कर हम देते हैं तब वो काम करता है वह मैनेजर होता है, और बिना सुविधाओं के काम करके जो बना लेता है वो लीडर होता है। श्रीराम में लीडरशिप है, और उन्हें भरोसा है कि वह कह रहे हैं कि मैं वन में चला गया, आप परेशान मत हो जो वन में रहने वाले लोग हैं उन्हीं के बीच से सेना खड़ी करूंगा, उनके पास जो संसाधन हैं, उन्हीं से अपने काम चला लूंगा, आयोध्या की सेना माँगने के लिए नही आऊंगा, हाँ जरूरत पड़ेगी, तो विश्वामित्र जी से युद्ध में निर्देश लेता रहूंगा, लेकिन माँगने तो नहीं आऊंगा। उनका अपना आत्मविश्वास इतने गजब का है, वो लक्ष्मण को पूछते हैं तुम्हें मंजूर है हम बिना सेना के जा रहे हैं, बिना दास दासियों के जा रहे हैं बिना संसाधनों के जा रहे हैं, हम अपना रथ भी लेकर नहीं जा रहे हैं, रथ भी यही छोड़ेंगे, अयोध्या की सीमा खत्म हो जाएगी उसके बाद रथ आगे नहीं जाएगा, पैदल ही जाना पड़ेगा जैसे विश्वामित्र कहेंगे वैसे ही करना पड़ेगा, कंदमूल खाने पड़ेंगे, जंगलों में सोना पड़ेगा, पेड़ के नीचे कुटिया बनानी पड़ेगी, हो सकता है कि बहुत सारे कीड़े-मकोड़े हमें परेशान करें उनके बीच में सुरक्षित रहना पड़ेगा, तैयार हो?

लक्ष्मण – “इसमें पूछने की क्या बात है?” तो श्री राम कह रहे हैं कि अभी तक तुमने दुख देखा नहीं है, अभी तो राज महल के सुख में तुम रहे हो , तो वह पूछ रहे हैं लक्ष्मण।

लक्ष्मण को कंबन रामायण में जो ऋषि है ना उन्होंने राम के बराबर रखा है मतलब लक्ष्मण बोलते हैं। रामचरितमानस में लक्ष्मण ज्यादा सुनते हैं। कंब रामायण में लक्ष्मण बोलते हैं और बराबर बोलते हैं, तो कम्ब रामायण में लक्ष्मण कह रहे हैं कि अच्छा आपने कौन सा दुख देखा है? आपने अभी तक सुख ही सुख देखा है तो मैंने भी देखा है अब आप दुख झेलना शुरू करेंगे मैं भी सीख लूंगा, इसमें कोई मुश्किल नहीं है, चलो! तो दोनों निकलते हैं विश्वामित्र के साथ। विश्वामित्र के साथ रास्ते भर जो संवाद उनका चला है अद्भुत है, बहुत ही अद्भुत है। विश्वामित्र राम को बहुत सारे प्रश्न करते हैं, और उन प्रश्नों के जो उत्तर देते हैं तो विश्वामित्र कहते हैं कि यह लड़का समय से पहले परिपक्व हो चुका है, और भविष्य का चक्रवर्ती सम्राट होने की सभी काबिलियत इसमें है, तो ऐसे बहुत सारे प्रश्न हैं, जो राम और विश्वामित्र के संवाद के रूप में हैं।

विश्वामित्र – “राम तुम्हें मालूम है कि हम कहाँ जा रहे हैं?”

श्री राम – “हाँ, वहाँ जा रहे हैं, जहाँ आपकी कुटिया बनी हुई है, वहाँ राक्षस बहुत उत्पात मचा रहे हैं वह आपको यज्ञ नहीं करने दे रहे हैं और आपको यज्ञ करना है क्योंकि यज्ञ आप अपने लिए नहीं कर रहे हैं, समाज के लिए कर रहे हैं, समाज को सुख मिले इसके लिए यज्ञ कर रहे हैं, तो मैं भी समाज का एक अंग हूँ, आपके यज्ञ में निर्भिकता आये, वह संपन्न हो ऐसी मेरी इच्छा है, उसमें सहयोग करने जा रहा हूँ”।

विश्वामित्र – “कि तुम जहाँ जा रहे हो वहाँ किस तरह के राक्षस रहते हैं, अंदाजा है?”

श्री राम – “अंदाजा तो नहीं है लेकिन देख लूंगा पता चल जाएगा कितने मजबूत हैं? कितने ताकतवर हैं?, उनकी शक्ति कितनी है? मेरी शक्ति कितनी है?”

विश्वामित्र – “सेना तो लिया नहीं है हमने, राजा दशरथ तो तैयार थे सेना देने के लिए, पैसा भी लिया नहीं है हमने, दास दासिया लिया नहीं है हमने, मैंनेजर लिए नहीं है, तुम्हारे सहयोगी है नहीं, तुम्हारे पास अपना तीर कमान है धनुष है, लक्ष्मण के पास इतना है, अब क्या करेंगे वहाँ?”

श्री राम – “हम जन सेना बनाएंगे, राजा दशरथ की सेना तो दूसरे तरह की है हम तो दूसरे तरह की सेना बनायेगे”

विश्वामित्र – “क्या मानना है? राजा दशरथ की सेना कैसी है?”

श्री राम – “राजा दशरथ की सेना में जितने भी सैनिक हैं, वे सब वेतन पर काम करने वाले हैं, तो इनकी जो देशभक्ति या स्वामी भक्ति है वो वेतन से जुड़ी हुई है, जब तक इन्हें समय से वेतन मिलता रहता है, तो इनके मन में देशभक्ति प्रज्वलित रहती है, यदि 1 महीने भी इनका वेतन ना मिले तो ये सब बिखर जाते हैं, इनमें दम नहीं है। इनकी ताकत से राक्षस समाज का सफाया नहीं होता”।

विश्वामित्र – “तुम्हें शक है कोई?”

श्री राम – “हाँ बहुत बड़ा शक है, अगर राक्षसों का कोई राजा इनके पास आये, और हमसे ज्यादा, सैलरी ऑफर कर दे तो ये सब चले जायेंगे उनके पास, इन पर भरोसा नहीं है मुझे”।

विश्वामित्र – “ऐसा आप किस आधार पर कहते हो?”

श्री राम – “मैं प्रतिदिन इन्हें देखता हूँ अयोध्या में, ब्रह्ममूर्त में निकलता हूँ, सैनिकों के घर भी जाता हूँ, सेना प्रमुख के यहाँ भी जाकर बैठता हूँ, उनसे जो सवाद होता है तो उनसे मुझे समझ आता है, कि ये पैसे के लिए लड़ने वाले हैं, इनकी ताकत नहीं है, इसलिए मैं तो ऐसे सैनिक तैयार करूँगा जो अपने सम्मान व इज्जत के लिए लड़ेंगे, अपने अस्तित्व के लिए लड़ेंगे, उनकी ताकत इनसे कई गुनी ज्यादा होगी”।

विश्वामित्र – “ थोड़ा और स्पष्ट करो”

श्री राम – “देखो जंगल में कई लोग रहते हैं,

विश्वामित्र – “कौन लोग रहते हैं?

तो विश्वामित्र भारत के उन जनजातियों के नाम गिना रहे हैं, जो जंगलों में निवास करती हैं जैसे – गौड़, भील, कोल आदि जनजाति, ऐसी 4556 जनजाति है जो शहरों में नहीं रहती, नगरों में नहीं रहती, आज हम उन्हें दुर्भाग्य से आदिवासी कहते हैं, राम उन्हें वनजाति के रूप में सम्बोधित करते हैं,

श्री राम – “ये जो 4556 किस्म की जनजातियाँ हैं, इनका राक्षसों से क्या लेना-देना है?”

विश्वामित्र समझा रहे हैं कि “राक्षस इन्हीं को परेशान करते हैं इनके घर लूट लेते हैं, इनकी सम्पत्ति लूट लेते हैं, इनके घर की बेटियों को ले जाते हैं, इनकी पत्नियों का शील हरण कर लेते हैं, उनका सम्मान खत्म कर देते हैं, और घरों में आग लगा देते हैं, इनके घरों से पकड़े हुए लोगों को कहीं दास बनाकर बेच देते हैं, राक्षस इस किस्म के लोग हैं”, तो राम कहते हैं, “बस मेरा समाधान हो गया” तो विश्वामित्र पूछते हैं “क्या” तो राम कहते हैं कि “मैं इन्हीं के बीच जाऊँगा, चूँकि राक्षस इनको परेशान कर रहे हैं, चूँकि ये राक्षसों से पीड़ित हैं, चूँकि राक्षसों से बहुत साल से शोषित हैं, इसलिए इनके मन में थोड़ी सी चिंगारी सुलगाऊँगा, ये बहुत बड़े सैनिक बन जायेंगे”, तो विश्वामित्र कहते हैं कि “राम ये तो सब साधारण लोग हैं”, इन जनजाति में कुछ जनजाति ऐसी हैं जो लोहे के औजार बनाती हैं”, राम ने कहाँ तब तो बहुत अच्छा है, जो लुहारी जानते हैं, वो अस्त्र-शस्त्र भी बना सकते हैं, जिनको कच्चा माल पीटना आता है, वो शस्त्रों व अस्त्रों का निर्माण कर लेंगे, अब बताओ दूसरे कौन हैं?”

विश्वामित्र – “दूसरी वो जनजातियाँ हैं जो कुम्हारी का काम करती हैं, तीसरी जनजातियाँ बैलगाड़ी बनाने का काम करती हैं, चौथी जनजातियाँ बाँस का काम करती हैं”

श्री राम – “ये जितनी तरह की जनजातियाँ हैं, चूँकि सब कुछ न कुछ काम करते हैं, इसलिए मेरी सेना इन्हीं से बनेगी।”

विश्वामित्र - “अब ये सेना युद्ध कैसे करेगी ?”

श्री राम - “ये सेना हर समय युद्ध नहीं करेगी, ये हर समय अपना काम करेगी, जब युद्ध का समय आयेगा, तो काम छोड़कर, युद्ध के मैदान में लड़ेंगे”

विश्वामित्र – “फिर तो इन्हें विशेष प्रशिक्षण देना पड़ेगा”

श्री राम – “उसकी जिम्मेदारी मैं लेता हूँ, इनको विशेष प्रशिक्षण देना है, इसकी जिम्मेदारी मेरी है।

तो इस तरह का संवाद करते-करते सीमा समाप्त होती है, और विश्वामित्र के स्थान पर आकर टिकते हैं, आते ही मुठभेड होना शुरू हो जाती है, और वे वध करना शुरू कर देते हैं, आप जानते हैं, जो सबसे बड़ी राक्षसी का वध किया वो ताड़का है, और उस ताड़का का वध करने में सब समझ में आ जाता है, कि राक्षसों की राज्य व्यवस्था कैसी है, इनकी नीतियाँ कैसी हैं? न्याय कैसे हैं, कानून कैसे है? तो राम और लक्ष्मण एक दूसरे से संवाद करते हैं, तो हम कुछ भी करेंगे, इन राक्षसों का सफाया करेंगे, क्योंकि ये धर्म के विरुद्ध हैं, न्याय के विरुद्ध हैं, तो लक्ष्मण जी पूछते हैं “भइया ये न्याय क्या होता है, अन्याय क्या होता है?”

श्री राम – “जब कोई अपने स्वार्थ को छोड़कर परमार्थ के लिए लड़ता है, दूसरों की इज्जत के लिए लड़ता है, दूसरों का सम्मान बढ़ाने के लिए लड़ता है, दूसरों की रोजी-रोटी बचाने के लिए लड़ता है, वो सबसे बड़ा न्यायी है, और जो दूसरों की परवाह ही नहीं करता, और अपने ही स्वार्थ में डूबा रहता है, उससे ज्यादा अन्यायी दूसरा कोई नहीं है।”

आज के समय में ये परिभाषा बिल्कुल सटीक बैठती है। आज कलयुग आ गया है, राम जी का युग चला गया है, 5 लाख 23 साल से कुछ ज्यादा समय बीत गया है, आज भी यही दिखाई दे रहा है इस समाज में जो अपना स्वार्थ छोड़कर समाज के लिए, समाजिक लोगों के लिए काम करें वहीं महात्मा गाँधी होता है, वही लोकमान्य तिलक होता है, वहीं उधम सिंह, भगत सिंह होता है, और उन्हीं के सामने हम अपना सिर झुकाते हैं, और जो सबकुछ परमार्थ को छोड़कर स्वार्थ में डूबा रहता है, वो भले ही हजार करोड़ की सम्पत्ति का मालिक हो, समाज उसको भूल जाता है, 10 दिन भी याद नहीं करता है, हजार करोड़ की सम्पत्ति के मालिक का स्वर्गवास होता है, मैं पिछले बीस साल से देख रहा हूँ, 10 दिन के बाद 11वें दिन कोई याद नहीं करता, फिर याद कराने के लिए अखबारों में, मीडिया में कुछ करोड़ रुपये के विज्ञापन देने पड़ते है, कि हमारे सेठ जी का स्वर्गवास हुआ था, हम उन्हें याद कर रहे हैं, मानो करोड़ों रुपये का विज्ञापन खर्च कर रहे हैं, समाज उनको याद नहीं करता है, महात्मा गाँधी को याद करने के लिए कोई विज्ञापन नहीं देना पड़ता है, भगत सिंह को याद करने के लिए कोई विज्ञापन नहीं, उधम सिंह को याद करने के लिए कोई विज्ञापन नहीं लगता, तो राम जी बनाकर गये हैं ये परिभाषा, हमारी नहीं है कि जो दूसरों के लिए लड़ रहा है, उनके संधर्ष में है, तो वो तो न्याय के रास्ते पर है, जो स्वार्थ पर है वो अन्याय के रास्ते पर है।

तो बात चल रही है, कि ये जो रावण हैं वो किस रास्ते पर हैं, तो राम कह रहे हैं निश्चित रूप से अन्याय के रास्ते पर, रावण अपने लिए लड़ रहा है, अपनी जाति के लिए लड़ रहा है, इसके आगे कुछ नहीं, तो वो तो अन्याय के रास्ते पर है, राक्षस सब अन्याय के रास्ते पर है, हम सब न्याय के रास्ते पर इसलिए हैं, क्योंकि हम स्वार्थ को छोड़कर अयोध्या से यहाँ आये हैं, और यहाँ आने के बाद हम जीतेंगे इस युद्ध को, ये मेरा विश्वास है, लेकिन अपना राज्य कायम नहीं करेंगे, ये पूरा राज्य इन्हीं को सौंपकर चुपचाप यहाँ से निकल जायेंगे।

लक्ष्मण – “अरे मैं तो ये सोचकर बैठा था कि ये किशकिन्धा का पूरा राज्य हमारा होने वाला है”

किशकिन्धा एक बहुत बड़ा वन का क्षेत्र है जिसका राजा बहुत दिन तक बालि रहा है, बाद में सुग्रीव रहा है, और बालि के पहले रावण वहाँ का राजा हैं,

लक्ष्मण – “मैं तो सोच रहा था कि इसे जीतकर ये हमारे अयोध्या का अंग बनेगा”

श्री राम – “लक्ष्मण क्या तुम भी अन्याय के रास्ते पर जाना चाहते हो?”

लक्ष्मण – “हमारे भारत में तो चक्रवती सम्राट वही होता है, जो दूसरों के राज्य को जीत लेता है” ।

श्री राम – “मैं चक्रवतित्व की परिभाषा बदलना चाहता हूँ, और एक नई परिभाषा गढ़ना चाहता हूँ”

अब देखिये इस बात को, श्री राम से पहले जितने भी राजा हुए, रघु हुए, दिलीप हुए इन सबने चक्रवतित्व की परिभाषा इस प्रकार बनाई है, कि किसी राज्य के लिए वो लड़े, जीत लिया, तो राज्य उनके अधीन आया, और इस तरह से रघु चक्रवती हुए, अज चक्रवती हुए, दीलीप चक्रवती हुए, ये सब दशरथ के पूर्वज हैं, दशरथ के पिता, पितामह सब हैं, तो राम कहते हैं कि मैं अपने कुल में चक्रवतित्व की परिभाषा बदलना चाहता हूँ, और आज से नई परिभाषा गढ़ना चाहता हूँ, कि हम राज्य को जीतेंगे, लेकिन अपने राज्य का अंग नहीं बनायेंगे, इसी राज्य में से किसी को निकालकर, उसको राजा बनाकर हम वापस अपने घर चले जायेंगे ।

लक्ष्मण – “भैया इनमें हैसियत नहीं है राजा बनने की”

श्री राम – “तो हम हैसियत पैदा करेंगे, ये तो ठीक है, कि इनमें हैसियत नहीं है, लेकिन हम हैसियत पैदा करेंगे, इनको ट्रेनिंग देंगे, विचार का प्रशिक्षण, अस्त-शस्त्र का प्रशिक्षण, राज्य नीति का प्रशिक्षण । ये सब देंगे तो राज्य चलाने के लिए भी पर्याप्त हो जायेंगे” ।

लक्ष्मण “तो ये कौन-सा तंत्र बनेगा?”

श्री राम – “यह गणतंत्र बनेगा, यही प्रजातंत्र बनेगा”

मुझे समझ आता है कि प्रजातंत्र के मूल श्री राम ही हैं, उनके पहले इस देश प्रजातंत्र कही नहीं है, प्रजातंत्र में आज जो परिभाषा चलती है न, लोगो का शासन, लोगो के लिए, लोगो के द्वारा । श्री राम जी ने तो यही सिद्ध कर दिया, वन में गये हैं, और छोटे छोटे राज्य जो राक्षसों के कब्जे में हैं, उनको मुक्त कराया है, संहार किया है, रावण के सहयोगी राक्षसों का, और अच्छे तरह से किया है, जड़-मूल को खत्म कर दिया है, लेकिन किसी भी राज्य को अयोध्या में नहीं मिलाया है, हर स्थानीय के किसी एक व्यक्ति को राजा बना दिया है, तो गौड जाति का राज्य स्थापित करा दिया, भीलों का राज्य स्थापित करा दिया, कोलो का

राज्य स्थापित करा दिया, और वो राज्य हजारों साल तक इस देश में चलता आया, अगर आप गौंड जनजाति या भील जनजाति, या कोल जनजाति के लोगों के बीच में जाकर संवाद करे तो कहते हैं, कि ये राज्य को राम का दिया हुआ है, मैं पिछले 4-5 वर्षों में मध्य और दक्षिण भारत में रहने वाली जो जनजातियां हैं, गौंड जनजाति सबसे ज्यादा मध्य भारत में हैं, यो जो मध्य प्रदेश का हिस्सा हैं, थोड़ा महाराष्ट्र का, और बहुत बड़ा आन्ध्र प्रदेश का, यहाँ पर गौंड जनजातियों के लोग रहते हैं, कोल जनजाति थोड़ा उससे नीचे है, और भील काफी बड़े इलाके में हैं, इन तीनों जनजातियों के बीच में जाकर कई दिन रहा हूँ और उनकी रामकथा सुनी हैं, वो हर बार रामकथा की शुरुआत में कहते हैं, कि हे श्री राम ये राज्य आपका दिया हुआ है, हम तो आपके सेवक हैं, जब कम्ब रामायण मैने पढ़ा तो बिल्कुल बात समझ में आयी, वो लक्ष्मण को कह रहे हैं कि राज्य हम जीतेगे, देगे इनको वापस, राजा इन्हीं का होगा, हमारा कोई व्यक्ति राजा बनकर नहीं बैठेगा, तो राक्षसों से राज्य छीन कर भीलों को, कोलों को, और दूसरी जनजातियों को राजा बनाते हुए चले जाना, ये राम ने चक्रवर्तित्व की नई परिभाषा दी हैं, और इसलिए वे आदर्श और मर्यादा पुरुषोत्तम माने गये हैं। हमारे यहाँ इसके पहले ऐसा कभी हुआ नहीं, श्री राम जी के पहले का इतिहास जो भी पढ़ा गया या जिसको भी थोड़ी समझ है वो ये हैं जिस भी राजा ने दूसरे को जीत लिया, अपने राज्य में उसे मिला लिया, लेकिन श्री राम कहते हैं कि जीता और उसी में से राजा बनाया, फिर ये कहानी का हिस्सा पूरा होता है। भगवान श्री राम अच्छे से विश्वामित्र जी का यज्ञ करवा वापस लौटने की तैयारी करते हैं तो विश्वामित्र कहते हैं, देखो ईश्वर की एक इच्छा और हैं अभी, एक तो ही गयी, वन में यज्ञ सम्पन्न हो गया, वन के जो मालिक हैं, उनको उनका राज्य मिल गया, अभी दूसरी इच्छा बाकी है।

श्री राम – “वो क्या?”

विश्वामित्र – “तुम्हारा विवाह, वो भी ईश्वर की इच्छा से ही निश्चित हैं”

श्री राम – “आपने कहाँ देखा हैं मेरे विवाह के लिए”

विश्वामित्र – “मैने देखा हैं, और तय भी कर लिया, विवाह तुम्हारा वही होना हैं”

फिर राजा जनक की कहानी वे श्री राम को सुनाते हैं, कि एक राजा जनक हैं, उनकी एक पुत्री है जिसको उन्होंने उत्पन्न तो नहीं किया है, लेकिन उसको पुत्री की तरह से पाला है”

श्री राम - “उन्होंने उत्पन्न नहीं किया, माने उनकी कुल की नहीं हैं, तो कहाँ से मिली”

विश्वामित्र – “खेत में मिली है, तो उसके कुल का पता नहीं हैं, और तुम्हारा विवाह वहीं होना है”

श्री राम – “आपने पिताजी से पूछा है? ”

विश्वामित्र – “पूछे या न पूछे ये तो हरि की इच्छा हैं, होना तो वहीं है”

श्री राम – “क्या ईश्वर मुझसे दूसरा ऐसा भी कार्य कराना चाहता है?”

विश्वामित्र – “जिस कन्या के परिवार का कुछ पता नहीं, कुल का कुछ पता नहीं, जब तुम उससे विवाह करोगे, और तब उसको जो प्रतिष्ठा मिलेगी तो एक दूसरी मर्यादा बनेगी”

श्री राम – “तो ठीक है, आपको ऐसा ही लगता है, कि इसमें कोई मर्यादा बन रही है मैं तैयार हूँ”

लक्ष्मण – “सोच लो भईया, दूसरा मौका नहीं मिलेगा”

विश्वामित्र – “क्यों नहीं मिलेगा? तुम्हारे पिताजी ने तो तीन-तीन शादियाँ की हैं, तुम चाहो तो दूसरी कर लेना”

श्री राम – “हाँ, लेकिन पिता जी से वो गलती हुई है”

विश्वामित्र – “तुम मानते हो की वो गलती हुई है? तो कौशल्य ही तुम्हारी माँ नहीं है, कैकयी भी है, सुमित्रा भी है, और तुम ये भी मानते हो की तुम्हारे पिता ने तीन शादियाँ करके गलती की है, तो फिर ये कैसे हैं?”

श्री राम – “पिता जी ने शादियाँ कर ली हैं तो मैंने उनको माँ मान लिया है लेकिन मेरा मन कहता है कि पिता ने ये गलती की है”

विश्वामित्र – “तुम्हारे पिता ने कोई गलती नहीं की है, तुम्हारे जो दादा-परदादा थे उन्होंने ने भी यही किया है और राम का जो वंश है जिसको रघु वंश कहते हैं, रघु वंश के सभी राजाओं ने एक से ज्यादा शादियाँ कि हैं”

श्री राम – “गुरुदेव मैं आपके सामने संकल्प करता हूँ कि मैं दूसरी मर्यादा एक पत्नीव्रत की सिद्ध करके रहूँगा”

विश्वामित्र – “कैसे?”

श्री राम – “मैंने अपने महल में देखा है, कौशल्य दशरथ की पहली पत्नी है, जैसे ही दूसरी आयी, तो दशरथ के अन्दर कौशल्य के प्रति उपेक्षा भाव आया, तीसरी आयी तब कौशल्य व सुमित्रा के प्रति उपेक्षा भाव आया और कैकयी के प्रति समर्पण भाव आया, और उसी समर्पण भाव का परिणाम है कि हमारे महल में बहुत कुछ ऐसा हुआ जो होने लायक नहीं है”

विश्वामित्र – “राम तुम समय से पहले परिपक्व हो चुके हो”

श्री राम – “मैं परिपक्व हुआ हूँ, ये तो मैं नहीं जानता, लेकिन ईश्वर मुझसे बहुत कुछ कहलवाता है, मुझे कई बार मालूम नहीं होता मैं क्या कह रहा हूँ”

लक्ष्मण – “यदि श्री राम एक पत्नी व्रत का संकल्प लेते हैं तो मैं आजीवन इनके चरणों की वंदना करूँगा, और मैं ये कहूँगा जोर-जोर कर कि मेरे भाई के चरण मेरे पिता के चरण से ज्यादा पवित्र है”

श्री राम – “देख दशरथ पिता हैं” (डाटेंते हुए)

लक्ष्मण – “भले ही वो मेरे पिता हैं, लेकिन चरित्र में उतने ऊँचे नहीं हैं, जितने आप हैं, कोई कितना भी महान राजा हो, कितना भी महान सेनापति हो, कोई कितना भी महान करोड़पति हो, कोई कितना भी महान विद्वान हो, यदि उसका चरित्र नहीं है, तो वो कुछ भी नहीं हैं, भारत की भारतीयता तो चरित्र पर जाती है, बाकि सब चीजें गूढ़ हो जाती हैं, यदि आप एक पत्नी व्रत का संकल्प ले रहे हैं, तो आप चरित्र की किसी ऊँचाई की स्थापना करने जा रहे हैं, इसलिए आज से मैं आपके चरणों की वन्दना करने का संकल्प लेता हूँ”

श्री राम – “विश्वामित्र गुरुदेव आप पिताजी को संदेश भेज दीजिए, आप जहाँ कहे, मैं विवाह करने के लिए तैयार हूँ”

विश्वामित्र – “एक बार देख तो लो सीता को”

श्री राम - “देखना क्या हैं, तय हो गया है, कि वो बिना किसी कुल की हैं, उसका कोई खानदान नहीं है, उसके पिता का पता नहीं, माता का पता नहीं, जनक ने उसको पाला है, लेकिन उसके असली माता-पिता का पता नहीं है, मेरी भार्या बनेगी तो उसकी सब स्थिति स्पष्ट हो जायेगी, मैं मानता हूँ कि समाज के लिए कोई आदर्श ही बनेगा”

विश्वामित्र – “यदि तुम्हारे पिता को यह सूचना मिलेगी, तो विवाह नहीं होने देगे, क्योंकि जनक से उनकी पुरानी दुश्मनी है, कई पीढ़ियों की है”

श्री राम – “तब तो ओर भी अच्छा हैं, ये दुश्मनी का अध्याय ही खत्म हो जायेगा, दोस्ती शुरू हो जायेगी”

विश्वामित्र – “तुम्हें क्यों लगता है कि दुश्मनी खत्म हो जानी चाहिए?”

श्री राम – “क्योंकि रावण का संहार करना है, तो राजा जनक भी चाहिए, दशरथ भी चाहिए, बाकि सब चाहिए, और रावण का अकेला का संहार नहीं करना है, उसकी प्रशासनिक व्यवस्था, उसकी राजनीतिक व्यवस्था का संहार करना है, क्योंकि वो स्वार्थ आधारित हैं, हमें परमार्थ आधारित राजनीति स्थापित करनी है”

विश्वामित्र – “चलो भाई, जैसी तुम्हारी इच्छा, तुम्हारे पिता को बिना बताये चलते हैं, और पहुँच जाते हैं, राजा जनक के दरबार में”

राजा जनक – “मेरी पुत्री का विवाह मैं तय नहीं करूँगा, मेरी पुत्र तय करेगी, क्योंकि वो स्वयंबरा हैं, अपने वर को स्वयं चुनेगी, उसमें बहुत सारे सतगुण हैं, और उन्हीं सतगुणों के आधार पर मैं कहता हूँ वो स्वयंबरा हैं”

विश्वामित्र – “ठीक हैं, आप तय कर लो, अपनी पुत्री से पूछ लो”

तो जो धनुष की कहानी हैं, वो कम्ब रामायण में सीता जी की कहानी हैं, सीता जी ने कहाँ – “ठीक हैं ये जो बड़ा धनुष रखा है, जो तोड़ दे, मैं तय कर लूँगी”

तो बड़े-बड़े राजा-महाराजा आये हैं, कोई तोड़ नहीं पाया, और राम जी ने जाकर उसको तोड़ दिया है तो सीता जी ने उनको अपना पति मान लिया है तो अब वो सीता जी को लेकर

घर वापस आते हैं तो दशरथ बहुत परेशान हो जाते हैं कि बिना बिताये इस तरह से विवाह हुआ है, तो राम कहते हैं “कि जो भी हुआ है ईश्वर की इच्छा से हुआ है, इसमें ना आपकी चलेगी, ना मेरी चलेगी”।

फिर कुछ दिन पश्चात वो घटना घटित होती है, कि कैकयी दशरथ से कहती है, कि अब मुझे वर माँगने दो, अब समय आ गया है, कि मेरा पुत्र गद्दी का अधिकारी बनें, ये मेरी अभीष्ट इच्छा है, अब आप राम को वन भेजो और मेरे भरत को गद्दी दिलाओ, दशरथ परेशान हो जाते हैं। लेकिन राम को जब पता चलता है तो वे सहज स्वीकार करते हैं और फिर दशरथ से कहते हैं कि इसमें ईश्वर की ही कोई इच्छा है, माने हर बार राम जी ईश्वर के प्रति भक्ति ऐसे दिखाते हैं।

आस्थावान व्यक्ति कैसा होता है, जो हर परिस्थिति में ईश्वर की इच्छा देखता है। लक्ष्मण को बहुत गलत लगता है, लक्ष्मण विद्रोह करने के लिए तैयार है।

लक्ष्मण – “ऐसे कैसे हो सकता है? ये आपका अधिकार है, आप बड़े हैं, गद्दी पर आपको ही बैठना है, राज्य आपको ही चलाना है, नीतियां आपको आती हैं, न्याय अन्याय आप जानते हैं, भरत को तो कोई समझ भी नहीं है, वो जिंदगी भर ननिहाल में रहा है, सुखों ही सुखों में रहा है, उसने दुख कभी देखा नहीं है, आपने तो दुख का अनुभव किया है, इसलिए राजा बनने के अधिकारी तो आप ही हैं”

श्री राम – “नहीं, यदि राजा बनकर मैं यहाँ बैठ गया तो इससे भी बड़े कार्य होने वाले हैं, वे नहीं हो पायेंगे, इसलिए वन गमन तो जाना है”।

फिर वन गमन जाना तय होता है, उनके साथ उनकी भार्या सीता और लक्ष्मण भी जाते हैं, राजा दशरथ कहते हैं कि तुम वन जा रहे हो तो दास-दासियों को साथ लेकर जाओ, हाथी-घोड़े लेकर जाओ, धन सम्पत्ति लेकर जाओ, अस्त्र-शस्त्र लेकर जाओ। तब श्री राम कहते हैं कि “नहीं, मैं जहाँ जाऊँगा वही सेना बनाऊँगा, वही के संसाधनों से रहूँगा, मुझे एक साधारण व्यक्ति का जीवन बिताना है और मैं सब साधारण व्यक्तियों के बीच साधारण रहूँगा, तो उनमें ज्यादा प्रेरणा पैदा होगी, और शायद वो अपना लक्ष्य हासिल कर सके, एक राजा की हैसियत से जाऊँगा तो मेरे और उनके बीच में दूरी रहेगी, ये दूरी पट नहीं पाई, तो जो हासिल करना है वो मिलेगा नहीं, और 14 वर्ष का जो उनका वनवास है जगह-जगह जाना, कंद-मूल खाना, वही कुटिया बनाकर रहना, वही के संसाधनों से जीवन चलाना, सुख में रहना, दुख में रहना, अलग-अलग तरीके से जीवन बिताते हुए, राक्षसों का संहार करते हुए और जनजातियों का राज्य स्थापित कराते हुए, अंत में पहुँचते हैं जब उनकी पत्नी का अपहरण होता है, रावण उठाकर ले जाता है फिर युद्ध का नाद होता है और युद्ध होता है, युद्ध में राम विजयी होते हैं, रावण हारता है और विभीषण को लंका का राजा बनाते हैं, विभीषण खुद हैरान है कि ये मुझे राजा बना रहे हैं, अब तक सोच कर बैठा था कि राम राजा बनेगे, तो राम कह रहे हैं कि मेरी आज तक की परंपरा नहीं है जिस राज्य को जीता मैं राजा बना, ऐसा हुआ नहीं, मैंने उसी राज्य के नागरिकों को राजा बनाया, तब विभीषण पूछ लेते हैं, कि मुझे एक जिज्ञासा है, कि आपने बाली का संहार किया था

और सुग्रीव को राजा बनाया था, आपके यहाँ अन्याय तो नहीं है, अधर्म भी नहीं है, क्या बाली का वध न्याय था? तो राम पूछ रहे हैं कि इतने बाद क्यों पूछ रहे हो तुम?

अभी तो सब कहानी खत्म हो गई है, तो वह कह रहे हैं कि अभी तक हिम्मत नहीं पड़ी पूछने की।

तो वो कह रहे हैं सुग्रीव आपका सहयोगी है और उसके सामने मैं अब यह पूछूँ तो मुश्किल हो जाएगी क्या पता आपके और सुग्रीव के बीच में मनभेद हो जाए हमारा लक्ष्य रावण को खत्म करना है वह आपको पहले पूरा करना था इसलिए मैं प्रश्न पूछ रहा हूँ तो राम कहते हैं देखो बाली अधर्मी ही था धर्मी नहीं था।

विभीषण कहते हैं की “कहानी सुनाओ” -

तो सुग्रीव कहता है, “मैं और बाली सगे भाई थे और भाई हर समय मेरा अपमान करता था बारबार मेरी पत्नी का- अपमान करता था, और मेरी पत्नी का अपमान करना इतना ही नहीं राज्यों के विद्वानों की पत्नियों का भी अपमान करता रहता था, रावण के जैसा बनने की कोशिश करता रहता था, जितना ज्यादा शोषण रावण करता था, वैसा ही वह करता था, जब यह सब कहानी सुनते हैं सुग्रीव के मुंह से तब विभीषण कहते हैं बात तो आपकी सही है, बाली अधर्मी में ही था।

राम कहते हैं “मैंने उसको मारने का संकल्प लिया था लेकिन बाली के लिए नहीं सुग्रीव के लिए अगर सुग्रीव को राजा बनाना है तो बाली को हटाना बहुत आवश्यक था, वरना बाली, सुग्रीव को मार डालता और सुग्रीव अगर मर जाता तो हनुमान के रहने का स्थान नहीं रहता और हनुमान तो भगवान के भेजे हुए कोई दूत है, जिनके हाथों बहुत बड़े काम इस देश में होने वाले हैं। आपको मालूम है कि किशकिन्धा राज्य का जो मालिक था बाली उसने हैरान कर दिया था कि इनमें से मैं किसी को नहीं रहने दूंगा ना सुग्रीव को, न हनुमान को, न नल और नील को। यह नल नील भी भगवान के भेजे हुए हैं, इनके हाथों कोई विशेष काम होना है, आप जानते हैं अगर बाली के हाथों यह लोग मरे होते तो भारत में बहुत सारे इतिहास लिखने से वंचित हो जाता यदि हनुमान के विषय में हम यह कल्पना करें कि बाली ने उनको मरवा दिया होता, तो हनुमान का जो सबसे बड़ा चरित्र आता है वह यह कि वह भारत के नागरिकों को भारत की जड़ी बूटियों से परिचित कराने वाले आदि वैद्य थे। क्योंकि श्री राम को पता ही नहीं था, जब लक्ष्मण को अचेत स्थिति आई, तो उन्हें कौन सी जड़ी बूटियां दी जाएगी तो वैद्य सुषेण ने हनुमान जी को समझाया कि हिमालय जाओ और वहां से कुछ जड़ी बूटी ले आओ तो हनुमान जी को लगा इस जड़ी बूटी से काम ना चले तो पूरा पर्वत ही उठा कर ले आए और उन जड़ी बूटियों का परिचय श्री राम को कराया, लक्ष्मण को कराया, और पूरी सेना को कराया ”, तो राम कहते हैं “यह काम वंचित हो जाता। फिर विभीषण ने नल नील के विषय में पूछा तब श्री राम कहते हैं “नल-नील तो अन्दुत है, इन्होंने सेना को रावण के राज्य में भेजने के लिए पुल बनाया”। अब तक तो सब हम यह मानते थे कि रामचंद्र जी की सेना जो रावण के राज्य में पहुंची उसके लिए कोई पुल बना तो बना होगा हमारे दिमाग में नहीं

बैठता था कोई कल्पना नहीं आती थी लेकिन अब अमेरिका की सबसे बड़ी संस्था नासा ने उस पुल के चित्र निकाल कर जब सब को दिखाएँ और उसकी कार्बन डेटिंग हुई तो पता चला कि वह पुल 5 लाख 13 साल पुराना है और कुछ 100 वर्ष पुराना है और राम से रावण का युद्ध भी उतना ही पुराना है तो सिद्ध हो गया कि यह पुल उनके समय में बना और श्री राम, विभीषण को कह रहे हैं "देखो मुझे नहीं पता यह पुल कैसे बनाया जाता है? यह नल नील दोनों जानते हैं , नल और नील दोनों कंस्ट्रक्शन के बहुत बड़े इंजीनियर थे जो पुल बनाया वो पत्थरों का पुल समुंदर के बीच में बनाय उसकी कल्पना भी मुश्किल है। समुद्र में पत्थरों को ले जाने के लिए, नाव में पत्थरों को रखना और नाव में किसी तीर को मार कर उसको डुबो देना यह काम वह कर रहे हैं, भगवान श्री राम के साथ पत्थरों को डुबो-डुबो कर फिर एक ऊंचाई तक लाए, फिर कंस्ट्रक्शन हुआ है और उस पुल का कंस्ट्रक्शन पत्थर और पत्थर को जोड़ने वाले चूने के साथ इतना मजबूत बन गया है कि आज तक वह सुरक्षित है 5 लाख 13 साल पुराना पुल सुरक्षित है जो कभी भारत में नल नील ने भगवान श्रीराम के लिए बनाया था और अब अमेरिका के वैज्ञानिक जानते हैं कि भारत का साइंस और टेक्नोलॉजी बहुत ऊंचे स्तर की रही है वरना कैसे संभव है? पत्थरों से समुद्र के बीच में पुल बनाना । नदी के बीच में पुल बनाना तो समझ में आता है, क्योंकि नदी की गहराई निश्चित होती है लेकिन समुंदर की गहराई निश्चित नहीं है कभी कहीं पर 100 किलोमीटर गहरा हो सकता है कभी कहीं 40 किलोमीटर गहरा हो सकता है कभी कहीं 200 किलोमीटर गहरा हो सकता है इतने गहरे समुद्र में पुल बांध दिया और वह पुल के फोटोग्राफ मैंने देखे हैं मेरे पास मेरे कंप्यूटर में वह पड़े हुए हैं बहुत अच्छे से सेव किए हुए हैं, कभी मौका मिला तो प्रोजेक्टर की सहायता से आपको दिखाऊंगा कि कैसे एक पत्थर से दूसरे पत्थर को जोड़ा गया है, उसके अंदर के जो चित्र निकालें हैं पुल के पत्थरों को एक दूसरे से जोड़ा है, बीच में चूना लगाकर । लेकिन पत्थर बिखर ना जाए तो लोहे कील लगी हुई है दोनों तरफ जोड़ों में । यह विज्ञान उस समय था और पुल को जब ऊपर से देखते हैं सेटलाइट से जब देखते हैं , तो सेटलाइट से जो उसके फोटोग्राफ खींचे गए हैं वह शायद दैनिक भास्कर अखबार में तो छप चुके हैं मेरे पास तो उसके ओरिजिनल फोटोग्राफ है और उन फोटोग्राफ को जब हम ऊपर से देखते हैं तो दिखाई देता है कि पुल जेड शेप में बना हुआ है स्टेट लाइन नहीं है, बहुत दिन तक मैं सोचता रहा ऐसी शेप में पुल कैसे बनाया और क्यों बनाया क्या जरूरत थी जैसे आजकल डैम(बाँध) बनाते हैं तो बिल्कुल सीधी लाइन में बनाते हैं, तो शायद भारत की तकनीकी नहीं है सीधी लाइन में पुल बनाया जाए यह यूरोप की टेक्नोलॉजी है । यदि पुल एक सीधी रेखा में होगा तो उस पर पानी का दबाव सबसे ज्यादा पड़ेगा क्योंकि समतल चीज होती है तो उस पर दबाव ज्यादा पड़ता है पानी का दबाव ज्यादा आएगा तो टूट जाएगा । इसलिए 5 लाख 13 साल पहले, नल-नील ने ऐसा पुल बनाया जिस पर पानी का दबाव कम पड़े, उसे एक दूसरे के ऊपर डिस्टीब्यूट कर दे इसलिए उसको जेड शेप दे दी । आजकल के जो जल विज्ञान के वैज्ञानिक है उनसे मैं कहता हूँ जरा ऐसे डिजाइन की कल्पना करो तो वह एक ही शब्द कहते हैं अद्भुत ! वह यह कहते हैं 5 लाख 13 साल पुराने दो व्यक्ति ऐसे हुए जिन्होंने एक कल्पना थी । कि इसका माने कि वे बहुत बड़े वैज्ञानिक रहे होंगे, यह तभी हो

सकता है, साधारण लोगों के दिमाग में कल्पना कभी नहीं आ सकती कि पानी के प्रेशर को बराबर डिसेटीब्यूट करना है और उसमें जेड शेप को देना है ,ताकि वह ज्यादा दिन सुरक्षित रहे पहले जब हम चर्चा करते थे तो कुछ आधुनिक पढ़े लिखे लोगों से सुना है कि भारत बहुत महान था ” सुना है, लेकिन इसकी महानता क्या थी? यह अब दिखाई देती है 5 लाख 13 साल पहले इस तरीके के पुल का डिजाइन कर देना और इतने साल तक टिके रहना और इसके बीच में कहीं भी टूट-फूट नहीं, क्रैक नहीं है अब वह तो भला हो दक्षिण भारत के जयललिता का जिसने जिद पकड़ ली थी कि इस पुल को तोड़ ही देना है, क्योंकि यह चेन्नई के रास्ते में आने वाले बड़े जहाजों को रोककर ,जहाजों के लिए बाधा डालता है अच्छा हुआ जयललिता अपने पद से निकल गई इसलिए पुल बच गया वरना वह तोड़ने की तैयारी में थी, तो नेता कैसे हैं हमारे? इस से अंदाजा लगा लो और राम के जमाने में कितनी मेहनत से बना होगा उसका अंदाजा लगा लो इस तरह की कालिटी और इस तरह के के काम और अब समझ में आता है कि जब पुल सत्य था तो सब कुछ सत्य रहा होगा अब तक हमारे देश में कुछ ऐसे ही इतिहासकार हो गये, जो वामपंथी हैं, वह मानते ही नहीं हैं कि भगवान राम की कहानी सत्य है वे कहते हैं हाइपोथिसिस हैं , हाइपोथिसिस माने कल्पना में गढ़ी हुई बातें, और अभी यह जो पुल का हो जाना और उसी समय का हो जाना जो राम का समय है तो यह सिद्ध कर देता है कि यह सत्य है इसमें काल्पनिक कुछ नहीं है और अगर इसी विषय पर आगे हम खोज करें तो बहुत कुछ ऐसा निकल आएगा क्योंकि वैज्ञानिकों ने अभी यह माना है यह पुल जो नीचे गया है इसके साथ पूरी सभ्यता नीचे गई होगी और यह पुल अकेला ही नीचे नहीं गया होगा हो सकता है लंका भी नीचे चली गई हो उसके साथ मिलकर । द्वारिका के बारे में तो वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि द्वारिका तो पूरी समुंदर में समा गई थी जो अभी भी मिलती है समुंदर के नीचे । तो हो सकता है लंका भी चली गई हो, क्योंकि सुनामी आने से पहले मेरी भी कल्पना काम नहीं करती थी, कि यह नीचे गई कैसे होगी लेकिन सुनामी पर मैंने अपनी आंखों से देखा है कि 20 -20 मंजिला बिल्डिंग नीचे चली गई तो यह भी चला गया होगा और पता नहीं पिछले कितने लाख वर्षों में कितनी बार सुनामी आई है, कोई कैलकुलेशन नहीं है । अब डूबी हुई सभ्यता पर कोई काम करें कोई करोड़ों का बजट निकले तो और भी बहुत कुछ निकल आएगा क्योंकि यह पुल अकेले में नहीं है, इस पुल की बहुत विशेषता है नल और नील को राम पूछ रहे है कंब रामायण में, “कि तुम ने पुल निर्माण की जोड़ी बनाई है उसकी डिजाइन दिखाओ” नल-नील – “जो हमने डिजाइन बनाई है वह आपको हम जरूर स्पष्ट करेंगे” तो वह कह रहे हैं “इस पर से अपनी सेना तो जाएगी लेकिन दुश्मन की सेना इधर नहीं आ पाएगी ऐसा डिजाइन हमने बनाया है अपनी सेना तो जाएगी लेकिन दुश्मन की सेना इधर नहीं आ पाएगी” । तो राम पूछ रहे हैं कि “इसमें ऐसी क्या विशेषता है कि दुश्मन की सेना इधर नहीं आ पाएगी तो नलनील- कहते हैं कि अपनी सेना में ज्यादातर बंदर है और बंदर में वजन में बहुत हल्के होते हैं और इनके शरीर का सारा वजन पैरों में नहीं आता है चार पैरों में आता है वह डिसेटीब्यूट हो जाता है इसलिए इनका जाना तो आसान है और रावण की सेना में सब दो पैरों वाले हैं, हमारी सेना में सब चार पैर वाले हैं तो यह जो चार पैर वाले हैं इनका चलना बहुत आसान है, यह दो पैर वाले आए तो यह पुल

डुबो देगा यह पक्का है, हमने ऐसा डिजाइन किया है, इतने माइक्रो लेवल का डिजाइन करके पुल बनाया है, मैं एक इंजीनियर का विद्यार्थी इसलिए मैं समझ सकता हूँ कि चार पैर का जो वजन होता है वह जब डिस्टीब्यूट होता है, और दो पैरों का जो वजन होता है वह डिस्टीब्यूट नहीं होता है, तो धरती पर वजन दो पैरों का ज्यादा होता है चार पैर का बहुत कम, और बंदर दुनिया में बहुत अद्भुत चार पैर वाला है जिसका वजन सबसे कम पड़ता है। बंदर के अलावा जितने भी चार पैर वाले हैं जैसे शेर है चीता है, बब्बर शेर है, जिनमें वजन कई गुना ज्यादा है तो आप कहेंगे कि बंदर का साइज तो बहुत कम है बंदर के बराबर जितने भी जानवर हैं, उनका भी वजन धरती पर ज्यादा पड़ता है लेकिन बंदर का नहीं पड़ता क्योंकि बंदर पूरा पंजा कभी नहीं रखता है उंगलियों के पोरों से जंप लगाता है, और उसमें लगातार क्षमता है कूदने की, तो नल नील कहते हैं हमारी सेना में तो वानर ज्यादा है इसलिए चिंता मत करो यह पार जाएंगे लेकिन उधर से आएंये तो डूब जाएंगे, ऐसी डिजाइन हमने तैयार की है”।

श्री राम पूछ रहे हैं “इसकी दूसरी विशेषता बताओ”

नल-नील – “दूसरी विशेषता यह है कि अगर यह पुल बनेगा तो जब तक आप नहीं कहेंगे तब तक यह टूटेगा नहीं तो”

श्री राम – “मेरे कहने से मतलब”

नल-नील - “आपके जो बाण हैं इनमें एक ही बाण ऐसा है जो इसको तोड़ने की शक्ति रखता है बाकी से टूटने वाला नहीं, वह जब तक आप नहीं चलाएंगे तब तक टूटने वाला नहीं” तो पूछ रहे हैं क्यों? तो नल नील कह रहे हैं “हमने जो केमिकल लगाया है इसमें वह एक कैलकुलेशन करके लगाया है कि उसका रिएक्शन राम के बाण से ही हो बाकी किसी बाण से नहीं हो। तो खोज कर ऐसा केमिकल लाए।

आप जानते हैं कि बाण के सामने जो तीर की नोक होती है उसमें केमिकल लगाकर ही चलाए जाते हैं तो उनको मालूम है कि राम के बाण में किस तरीके के केमिकल है और पुल में किस तरीके के केमिकल इस्तेमाल करने हैं और किस तरीके के नहीं करने हैं, फिर वह कहते हैं कि हां हम इस पुल से जाएंगे और वापस जब आएंगे तो यह कितने दिन टिकने वाला है, तो वह कहते जब तक आप चाहे तब, अगर आप चाहेंगे तो हम लोग लौटने के बाद इसको खत्म कर देंगे, इस तरीके की विशेषताओं वाला पुल बनाकर वह गए हैं लंका में, और रावण को मार कर लौटे हैं, लौटने के बाद विभीषण को को बात कहकर जा रहे हैं उनमें से एक यह है, कि यह तुम्हारी इच्छा है इस पुल को चाहो तो तुम रखो, चाहो तो इस पुल को तोड़ दो, बाण मेरा यह है जब चाहे जब मेरा स्मरण करके इसको तोड़ दो। विभीषण को राजा बना दिया उसको उसकी गद्दी सौंप दी, अब विदा ले रहे हैं तो विभीषण पूछ रहा है कि “इसको कैसे चलाऊं अपने राज्य को? तो भगवान राम एक ही बात कहते हैं, “देखो, अभी मैंने सत्ता का हस्ताक्षरण करवाया है, प्रशासन व्यवस्था वही है, जो रावण के जमाने की है, जब तक तुम इस पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को नहीं बदलोगे, तो तुम्हारे राज्य की किसी समस्या का समाधान नहीं होगा। ट्रांसफर ऑफ पॉवर हुआ है रावण की

सत्ता, विभीषण को मिली, लेकिन रावण का राज्य वैसा का वैसा ही है इसके मंत्री, इसके महामंत्री, इसके बाद इसके खजांची, इसके अधिकारी, इसकी सेना, इसका सेनापति, यह सब वैसे के वैसे ही है, अगर तुम चाहो तो इनको बदलो तो तुम्हारे राज्य की समस्याएं हल होगी अगर तुमने इन प्रशासनिक व्यवस्था को नहीं बदला तो एक भी समस्या का समाधान नहीं होगा ,और मैं यह कह सकता हूँ कि समस्याएं बढ़ेंगी, तो वह पूछ रहे हैं कि यह आप कैसे कह रहे हैं? तो उन्होंने कहा कि देखो रावण ने अपना राज्य स्थापित किया उसके आधार पर है धर्म को अधर्म बनाया और धार्मिक कार्य को अधार्मिक बनाकर उसने परिवर्तन करा दिया अगर यही कानून कायदे चलाये गए तो तुम्हारी प्रजा को कोई लाभ नहीं मिलेगा, तुम मजा कर सकते हो लेकिन प्रजा की समस्या वैसे ही रहेगी, अब तुम फैसला करो कि तुम्हें प्रजा का राजा होना है या गद्दी का । तो विभीषण कह रहे हैं कि मैं तो प्रजा का राजा होना चाहता हूँ, तो राम कह रहे हैं कि सबसे पहला काम करो रावण के बनाये हुए कायदे कानून और नियम सब खत्म करो, जला दो, नए नियम कानून बनाओ और ऐसे नियम कानून बनाओ जो सनातन पर आधारित हो, ऐसा सत्य नहीं जो आज है और कल बदल जाए, ऐसा सत्य है जो हजारों साल पहले था हजारों साल रहेगा और राम कहते हैं किसी भी राज्य की सत्ता का हस्ताक्षरण हो और राज्य की व्यवस्था ना बदले तो उस राज्य या उस देश की समस्या का समाधान नहीं होता ।

भारत की समस्याओं को मैं भी इसी तरह देखता हूँ अब श्री राम जी की बात करें 15 अगस्त 1947 को भारत में सत्ता का हस्तांतरण हुआ लॉर्ड माउंटबेटन के हाथ से सत्ता निकलकर पंडित जवाहरलाल नेहरू के हाथ में आ गए, बाकी क्या बदला? अंग्रेजों ने भारत का जो लूटमार करने के 34735 कानून बनाए वह सब के सब भारत की आजादी के बाद भी चल रहे हैं, तो श्री राम जी के शब्दों के अनुसार भारत की किसी भी समस्या का समाधान नहीं होगा, क्योंकि व्यवस्था वही है जो रावण के समय थी रावण का समय, माने अंग्रेजों का समय, और रावण का ही राज्य था, एक भी कानून नहीं बदला अंग्रेज माने रावण, मैं बिल्कुल स्पष्ट कह रहा हूँ रावण और अंग्रेजों में कोई अंतर नहीं था, तो रावण ने और अंग्रेजो ने जो कानून बनाए सीआरपीसी, सीपीसी, सब के सब वैसे के वैसे ही चल रहे हैं, अंग्रेजों ने कानून बनाये इंडियन पुलिस एक्ट, वो वैसा का वैसा ही चल रहा है, अंग्रेजों ने कानून बनाया लैंड रेवेन्यू एक्ट, वैसे ही आज चल रहा है ,और अंग्रेजों के बनाए राज्य स्तर पर वह सब कानून वैसे के वैसे ही चल रहे इसलिए भारत की कोई भी समस्या का समाधान आजादी मिलने के 60 साल बाद भी नहीं हो रहा है । गरीबी आजादी के साल में जितनी थी उससे बढ़ी है कम नहीं हुई । 1947 में हम आजाद हुए तो भारत में चार करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे थे अब सन 2006 में 40 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे है।

अब आप कहोगे की जनसंख्या बढ़ गई है जनसंख्या तो बहुत थोड़ी बड़ी है 1947 में हम 34 करोड़ थे अब हम 108 करोड़ हो गए जनसंख्या पर 3 गुना बढ़ी है और गरीबी 10 गुना बढ़ी है आजादी के साल में हमारे देश में बेरोजगारों की संख्या 2 करोड़ थी अब 2006 में 20 करोड़ हुई है, तो बेरोजगारी भी बढ़ी है, गरीबी भी बढ़ी है, आजादी के साल में जितना भ्रष्टाचार था उससे हजारों गुना भ्रष्टाचार बढ़ा है, यह हम सब मानते हैं आजादी के