शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( १०० )
नहीं रहते। कहा है:—Beauty is a witch, against whose charms faith melteth into blood. Much Ado, ii. 1.
अर्थात् खूबसूरती वह जादूगरनी है, जिसके जादूसे ईमानका खून हो जाता है। महात्मा गोथेने भी एक जगह कहा है—Beauty is everywhere a right welcome guest.
अर्थात् खूबसूरती हर कहीं लायक और दिलावेज्ज मिहमान है, अथवा सौन्दर्य्यका एक योग्य अतिथिकी तरह सर्वत्र स्वागत होता है, सौन्दर्य्यका सर्वत्र बोलबाला है—खूबसूरतीकी खातिर कहाँ नहीं होती? खूबसूरतीका नशा शराबसे भी ज्व-दंस्त है। शराबके तो पीनेसे नशा आता और आदमी मतबाला होता है; पर सुन्दरी मृगनयनीसे आँखें मिलते ही नशा चढ़ आता है। परमात्माने इनकी आँखोंमें एक अजोब नशा भर दिया है। महाकवि अकबरने बहुत ही ठीक कहा है:—
करते वो निगाहोंसे, अगर बादाफ़रोशी । होता न गुजर, जानिबे-मैखाना किसी का ॥
अगर वे अपनी मद्दपूर्ण आँखोंसे मदिरा बेचतीं यानी अपनी मदभरी चितवन लोगों पर डालतीं, तो कोई भी शराबकी दूकान की तरफ न जाता। शराबका काम उनको आँखोंसे ही हो जाता—उनसे बार नज़र होते ही नशा चढ़ आता।
हमारे एक हिन्दू कविने भी ऐसी ही बात कही है और बड़ी ही मज़ेदारीसे कही है:—
( १०१ )
श्री हलाहल मद भरे, श्वेतश्याम रतनार ।
जियत मरत मुक्ति-मुक्ति परत, जेहि चित्तवत इकबार ॥
उसकी सफेद श्याम और रतनारी आँखोंमें अमृत है, हलाहल विष है और मद है ; तभी तो वह जिसकी तरफ एक बार देख लेती है,—वह जीता है, मरता है और झुक-झुक पड़ता है ।
प्रेमरसन महोदय कहते हैं—Beauty is the pilot of the young soul. अर्थात् सौन्दर्य नवयुवकोंका पथ-प्रदर्शक है । जहाज़का मार्गी जिस तरह जहाज़को राह दिखाता है, जहाँ चाहता है वहाँ ले जाता है ; उसी तरह खूबसूरती जवानोंको जहाँ चाहती है ले जाती है । सारोंश यह कि, उठती जवानीके पढ़े सुन्दरियोंसे आँख मिलाते ही उनके गुलाम हो जाते हैं । स्त्रियाँ जो चाहती हैं वही करते हैं, उनकी दिखाई राह पर चलते हैं और उनकी मरजीके खिलाफ कोई काम कर नहीं सकते । नौजवान दुनियादार इनके जालमें फँसते हैं, इसमें तो कोई अचम्भेकी बात ही नहीं । वे पहुँचे हुए चूड़ तपस्वी जो हवा और पानी मात्र पर जिन्दगी बसर करते हैं, हर क्षण जगदीशका नाम रटा करते हैं, ख्वाबमें भी कामिनीका दर्शन नहीं करते और दर्शन करने पर भी उनके दाममें न फँसनेका पक्के-से-पक्का इरादा रखते हैं, उनको देखते ही, उनसे चार आँखें होते ही, उनके गुलाम हो जाते और होगये हैं । विश्वामित्र, पराशर और श्रृंगी ऋषिको इन शब्दोंमें न सही—दूसरे शब्दोंमें अपनी-अपनी माशूकाओंसे .क्रीब-क्रीब यही कहना पड़ा होगा :—
( १०२ )
खुदाके होते बुतोंको पूँछूँ, नहीं था सुतलक गुमान ऐसा । मगर तुम्हें देखकर तो क्ल्हाह, आगया मुझको ध्यान ऐसा ॥—श्रवकर ।
संभावना नहीं थी कि, मैं ईश्वरके होते हुए, तुम जैसी सौन्दर्य की प्रतिमाओं की पूजा करूँ ; पर आज तुम्हें देखकर और ही बात हो गई । परमात्मा की कसम खाकर कहता हूँ, कि अब तुम्हारी खूबसूरती पर लट्ठू होकर मैं ईश्वरको भूल जाऊँगा ।
फिर आपलोगोंने अपनी पिछली और उस समयकी हालतका मुकाबला करते हुए कहा होगा :—
जिस दिलको कैद हरित-ये दुनियासे नंग था ।
वह दिल असीर हलक-ये जुल्फे बुतों है अब ॥
एक वह दिन था कि हमारा दिल संसारके जज्जालोंमें पड़ना शर्मकी बात समझता था और एक आज है कि, माशूकाकी जुल्फोंमें बेतरह उलझा पड़ा है । कैसा परिवर्तन है !
ऐ जौक ! आज सामने उस चरम मस्तके ।
बातिल सब अपने दाव-ये दानिशवरी हुए ॥
उसकी मद्दमस्त मनोहर आँखके सामने आज हमारी योग्यता, बुद्धिमत्ता और प्रतिष्ठाका अन्त हो गया ।
( १०३ )
वैराग्य पञ्च ।
विषयोंका यही हाल है । ज्यों-ज्यों हमारी इच्छायें पूरी होती हैं, त्यों-त्यों वे और बढ़ती हैं ; इसलिये विषय-विषये बचनेके लिये, मनुष्यको विषयोंका ध्यान ही न करना चाहिये । असल में, विषयोंका ध्यान ही सारे अनर्थोंका मूल है । अगर मन द्वारा विषयोंका ध्यान ही न किया जाय, तो विषयोंमें प्रीति ही क्यों हो ? जब विषयोंसे प्रीति ही न होगी, तब कोई भी अनर्थ हो न सकेगा ।
स्त्रीको एकवार देख लेने पर, उसे बार-बार देखनेको मन चाहता है । वस, यहींसे सिर पर भून सवार हो जाता है । इसलिये जिनको जन्म-मरणके जज्जालसे बचना हो, जिनको दुर्लभ मोक्ष-पद लाभ करना हो, जिनको अक्षय सुख भोगना हो, वे ऐसे निर्जन वनमें जाकर रहें, जहाँ इन ललित ललनाओंके दर्शन ही न हों । जब ये मीहिनी दीर्घेगी ही नहीं, तो मन कैसे चलेगा ? न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसरी ।
छप्पय ।
धिन देखे मन होय, वाय कैसे कर देखै । देखे तैं चित होय, अंग आलिगन सेवै ॥ आलिगन तैं होत, याहि तनमय कर राखै । जैसै जल अरु दूध, एक रस त्यों अभिलाषै ॥ मिल रहे तऊ मिलवौँ चहत, कहा नाम या विरह को ? । वरन्यो न जात अदुसुत चरित, प्रेम-पाठकी गिरह को ॥२३॥
( १०४ )
सार—नवयुवती कामिनीके बशलमें आने पर, उसे कोई भी कामो पुरुष, ब्रह्मभरको भी छाड़ना नहीं चाहता अथवा एकवार स्त्रियोंका चन्द्रानन देख लेने पर, उनके फन्देमें न फँसना असम्भव है ।
23. So long as I do not see her I desire to see her, but having seen her, I long to embrace her and after having embraced her I desire that there may not be separation from her, whose eyes become extended at the time of embraced union.
—*—
मालती शिरसि जूम्भणोन्मुखी चन्दनं वपुषि कुंकुमान्वितम् ।
वत्तसि प्रियतमा मनोहरा स्वर्ग एव परिशिष्ट आगतः ॥२४॥
अधखिले मालतीके सुगन्धित फूलोंकी माला गलेमें पड़ी हो, केशर-मिला चन्दन शरीरमें लगा हो और हृदयहारिणी प्राणप्यारी छातीसे चिपटी हो, तो समझ लो कि, स्वर्गका शेष सुख यहीं मिल गया ।
खुलासा—गलेमें खिलने ही वाले मालतीके फूलोंकी माला पहनना, केशर और चन्दन शरीरमें लगाना और मनोहर प्यारी को छातीसे लगाना—स्वर्ग-सुख है । जिन्हें इस पाप-ताप-पूर्ण संसारमें यह सुख प्राप्त हो, उनके लिये यहीं स्वर्ग हैं । स्वर्गमें
( १०५ )
इससे अधिक और कुछ नहीं है। पण्डितराज जगन्नाथ महोदय कहते हैं :—
विधाय सा मद्भदनातुङ्गलं कपोजमूलं हृदये शयाना ।
तन्वी तदानीमतुलां बलारेः साम्राज्यलक्ष्मीमथरीचकार ॥
मेरी छातीपर सोनेवाली नाज़ुनीने जब अपनी चिबुक—ठोड़ी मेरे मुँह पर, जहाँ वह रक्खी जानी चाहिये थी वहाँ रक्खी ; तब मेहनद्दकी अतुल राजलक्ष्मी का सुख भी मुझे तुच्छ प्रतीत होने लगा ।
किसीने पू्व और सब कहा है :—
संसारे तु धरासारं धरायां नगरं मतम् ।
आगारं नगरे तव सारं सारंगलोचना ॥
सारंगलोचनायाश्च सुरतं सारसुच्यते ।
नातः परतरं सारं विद्यते सुखदं दृणाम् ॥
सारभूतन्तु सर्वेषां परमानन्द सोदरम् ।
सुरतं ये न सेवन्ते तेषां जन्मैव निष्फलम् ॥
संसारमें पृथ्वी सार है, पृथ्वी पर नगर सार है। नगरमें घर सार है और घरमें भुगनयनी कामिनी सार है। भुगनयनीमें सुरत * सम्भोग सार है। इससे अधिक सुखदायी और सार
❁ सुरत=खो-गुल्फका सम्भोग, रतिकर्म, मैथुन। इसे अँगरेज़ोंमें copulation या coition कह सकते हैं ; क्योंकि हरतके समय खो-गुल्फ एक हो जाते या एक दूसरेमें मिल जाते हैं।
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वस्तु पुरुषोंके लिए और नहीं है। जो पुरुष-बोलेमें आकर समस्त पदार्थोंके सार, परमानन्दके सगे भाई सुरतको सेवन नहीं करते—सम्भोग-सुख नहीं भोगते, उनका इस दुनियामें जन्म लेना ही बेकार है।
निश्चय ही संसारियोंके लिये ऐश-आराम के ऐसे सामानोंका मयस्सर होना,—स्वर्ग-सुख उपभोग करना है। इस बातकी सचाईको वे ही समझ सकते हैं, जो चतुर और कामशास्त्र-विशारद रसिक हैं। नपुंसकोंको इस आनन्द का हाल क्या मालूम ?
वैराग्य पद्म ।
अपनी-अपनी रुचि अलग-अलग है। सबकी इच्छायें एक दूसरेसे भिन्न हैं। एक जिस चीज़को अच्छी समझता है, दूसरा उसीको बुरी समझता है। जो चीज़ जिसको प्यारी न हो, वह कौसी ही सुन्दर और रसीली क्यों न हो, उसे अच्छी नहीं लगती।
अंगरेज़ीमें भी एक कहावत है—“Fair is not fair, but that which pleaseth.” सुन्दर सुन्दर नहीं है; किन्तु वही सुन्दर है, जो अपने मनको भावे।
चन्द्रमा सबको प्यारा लगता है, पर कमलिनियों और विरही जनोंको अप्रिय लगता है। संसारका यही हाल है। रसिक पुरुष मालतीके फूलोंकी माला पहनने, केशर चन्दनसे अङ्गारण करने और प्राणप्यायियोंको डातीसे लगानेको ही स्वर्ग-सुख समझते हैं। और कोई-कोई रसिक ऐसे भी हैं, जो इस सुखके आगे
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स्वर्गकी भी सारी सस्यदाको तुच्छ समझते हैं। एक ओर ऐसे लोग हैं; तो दूसरी ओर कुछ ऐसे भी हैं, जो इन सभी सुखोंको मिथ्या, अनित्य और परिणाममें शोक, मोह, रोग और नरकका दाता समझते हैं। जिन नवयौवनाओंको कामी अवला समझते हैं, उन्हें वे सबला समझते हैं। जिन्हें कामी कोमलाड़ी कहते हैं, उन्हें वे वज्राड़ी कहते हैं। जिन्हें कामी निर्मला और रूपमाधुरी की खान समझते हैं, उन्हें वे कुमला और घुणित गन्दी चीज़ोंका पिटारा समझते हैं। कामी पुरुष स्त्रियोंको ही ध्यान करना पसन्द करते हैं, पर वे ब्रह्मका ध्यान करना ही अच्छा समझते हैं। उनका कहना है, कामियोंके भोग-बिलासमें जो सुख है, वह अनित्य और परिणाममें घोर दुःखोंके देनेवाला है; पर ब्रह्म-विचार में लीन होनेका सुख नित्य और परिणाममें कल्याण करनेवाला है। तात्पर्य यह है, कि कामियोंको ही सुन्दरियोंमें स्वर्ग-सुख प्रतीत होता है; विरामियोंको तो इनमें नरक-दुख—किन्तु ब्रह्म-विचारमें वर्णनातीत परम सुख मालूम होता है।
दोहा।
कैसर सों अँगिया सनी, बनी नयन की नोक।
मिली प्राणध्यारी मनों, घर आयो सुरलोक ॥२४॥
सार—खबरू और कमसिन नाजनी को छातीसे लगानेमें जो मजा है, वहिश्तमें उससे बढ़कर मजा नहीं।
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24. If there be on the head a garland of Malti flowers which are about to blossom, if sandal mixed with saffron is besmeared on the body and the beloved beautiful lady is embraced on the bosom, then I take this as the pleasure of heaven.
—❧—
प्राङ्मायेति मनागमानितगुणां जाताभिलाषं ततः सवीरं तदनु शलथोद्यतमवृषत्यस्तथैवं पुनः ॥ प्रेमाद्रैःपृथ्वाणीयनिर्भरहः क्रीडाप्रगल्भंतो निःशंकांगविकर्षणादिकसुखं रम्यं कुलस्वीरतम् ॥२५॥
पहले-पहल तो “न न” कहती* है। इसके बाद थोड़ी-थोड़ी अभिलाषा करती है। इसके पीछे लजाती हुई अंगोंको ढीला कर देती है और फिर अवीर हो, प्रेमके रसमें शराबेर हो जाती है। इसके भी पीछे; एकान्त क्रीडाकी इच्छा करती है और भोग-विलासमें तरह-तरहकी चातुरी दिखाती हुई, निःशंक होकर मर्दन चुम्बनादिसे असाधारण सुख देती है। ये सब मनोहर गुण कुलबालाओंमें ही होते हैं; इसलिये कुलकामिनियोंके साथ ही रमण करना चाहिये ॥२५॥
❧ जीन पाल महोदय कहते हैं—Women are shy of nothing so much as the little word “Yes” at least they say it only after they have said “No,” स्त्रियोंको “हाँ” कहनेमें जितनी लज्जा मालूम होती है, उतनी और किसी दूसरी बातमें नहीं। वे कम-से-कम “नहीं” कह चुकने पर ही “हाँ” कहते हैं।
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इस श्लोकमें, महाराजा भर्तृहरिने, नबोढ़ा—नई व्याही हुई बहसे लेकर, प्रौढ़ा—पूर्ण युवती और अंधेड़ अवस्था तककी अपनी खीके हाव-भाव और भोग-विलासके सुखोंका वर्णन बड़ी ही खूबीसे किया है। उनके सुरतका चित्र ज्योंका त्यों खींच दिया है।
नई व्याही हुई वह पुरुषके साथ समागम होते समय भयके मारे “न न” कहती है, अथवा अधिक सामर्थ्य न होनेके कारण, “अव नहीं, अव नहीं” कहती है। बुद्धिमान् कामियोंको, इन “न न” या “नहीं नहीं”के शब्दोंमें विचित्र प्रकारका रस और मज़ा मालूम होता है। उस मज़ेकी बात भुक्तभोगी, जानते हुए भी, ज़बान या कलमसे लिखकर बता नहीं सकते। क्योंकि उस मज़ेका हाल दिल जानता है ; पर दिलके ज़बान नहीं हैं और ज़बानके दिल नहीं। रसिक-शिरोगमणि पण्डितराज जगन्नाथ कहते हैं :—
श्रुतिशतमपि भूयः शीलितं भारतं वा । विरचयति तथा नो हंत सन्तापशान्तिम् ॥ अपि सपदि यथायं कैलिविश्रान्तकान्ता । वदनकमल वल्यत्कांति सान्द्रोनकारः ॥
काम-क्रीडासे थकी हुई खीके मुखकमलसे निकला हुआ रसमय “नकार” “नहीं-नहीं” कहना, जिस तरह पुरुषके सन्ताप को शीघ्र ही हर लेता है ; उस तरह सैकड़ों श्रुतियों और महा-भारत प्रभृति पुराणोंका अध्ययन और मनन भी नहीं कर सकता।
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दूसरी अवस्थामें “न न” कहते-कहते, फिर कामिनीकी स्वयं इच्छा होती है। इच्छा होने पर वह लज्जाका भाव भी दिखाती है और अपने अङ्गोंको ढीला भी कर देती है।
तीसरी अवस्थामें जब वह पूर्ण युवती हो जाती है ; उसकी उम्र कोई २५।३० साल या इससे अधिक हो जाती है ; तब उसे कन्दर्प-सुखका अनुभव हो जाता है और साथ ही उसका डर भी जाता रहता है। उस वक्त वह प्रेम-रसमें शराबौर होकर अधीर हो जाती है और एकांत स्थलमें रति-केलि करनेकी इच्छा प्रकट करती है। उस समय, कामकलानिपुण अनुभवी और निर्भय होनेसे, वह निर्लज्ज होकर, नाना प्रकारके आसन-भेदों और चुम्बन आदिसे ऐसा सुख देती है कि उसे, गूँगेके सुपनेकी तरह, ज्वान या कलमसे बताना कठिन है।
ऐसा अपूर्व स्वर्गीय सम्भोग-सुख सलज्ज कुलवालाओंसे ही मिल सकता है ; वारवधुओंसे नहीं। निर्लज्ज और निर्भय वाराहूनाओंमें ये आनन्द कहाँ ? क्योंकि कुलवालाओंमें लज्जा है, भय है और प्रेम है ; पर वारवधुओंमें इन तीनोंमेंसे एक भी नहीं। कुलवधुएँ जिस आनन्द और मञ्जेके साथ पुरुषकी काम-पीड़ा और सन्ताप को हर सकती हैं, उस तरह वारवधू नहीं ;
छप्पय ।
ना ना कहि गुण प्रगट करति, श्रमिलाप लाज जूत । शियिल होय धर धीर, प्रेम की इच्छा करि उत ॥
( १११ )
निभंय रसको लेत, सेज-रग-खेतहि माँहीं ।
क्रीडा माँहि प्रवीण, नारि सुरिया मन माँहीं ।
यह सुरत माँझ अतिही सुरत, करत हरत चितगति करें ।
कुलबधू कामिनी केलि कर, कलह कामकी सब हैं ॥२५॥
25. A lady born of a noble family gives the best pleasures of sexual intercourse—Her qualification is that she at first refuses intercourse and shortly afterwards becomes herself desirous of intercourse, then she shyly allows herself to approach loosely, gradually she loses patience, and with eager and amorous looks shows her cleverness in secret movements and then she freely gives the pleasure of allowing parts of her body to be pulled and enjoyed.
—ॐ—
उरसि निपतितानां क्षस्तवमिच्छकानां
मुकुलितनयनानां किञ्चिदुन्मीलितानाम् ॥
सुरतजनितखेदस्विकमण्डल्यलीना—
मधरमधु वधूनां भाग्यवन्तः पिबन्ति ॥२६॥
छाती पर लेटी हुई हैं, बाल खुल रहे हैं, आधे नेत्र बन्द हो रहे हैं और मैथुनके परिश्रमसे आये हुए पसीने गालोंपर फलक रहे हैं,—ऐसी स्त्रियोंके अधरामृतको भाग्यवान् लोग ही पीते हैं ॥२६॥
खुलासा—छी छाती पर पड़ी हो, उसके केश खुल रहे हों, आधी पलकें खुली हों और आधी बन्द हों, गुलाबी गालोंपर रति-
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श्रमसे पैदा हुए पसीने आ रहे हों—इस दशामें कोई-कोई भाग्य-शाली ही अपनी प्राणप्यारीके नीचले ओंठका रस पान करती है।
स्त्रिके अधराश्रुत पान करनेमें एक अजीब मज़ा है, तभी तो कविलोग उस मज़ेकी इतनी तारीफ़ करते हैं। उस्ताद जौक भी फ़रमाते हैं—
तेरा जुँबासे मिलाना जुँबा, जो याद आया ।
न हाय हाय मैं, तालूसे फिर जुबान लगी ॥
तेरी जीभसे जीभ मिलाते * या तेरे अधराश्रुत पान करनेका ध्यान जब मुझे आया, तब मैं घण्टों हाय हाय करता रहा, इस लिए मेरी जीभ घण्टोंतक तालुप से न लगी।
छप्पय ।
खुले केश चहुँ ओर, फैल फूलनकी बरसत ।
सद मद छाके नैन, दुरत उधरतसे दसत ॥
सुरत खेदके खेद, कलित सुन्दर कपोल गहि ।
करत अघर रस पान, परत अश्रुत समान लहि ॥
ते धन्य धन्य सुकती पुरुष, जे ऐसे उरके रहत ।
हित भरे रुप यौवन भरे, दम्यति सुख-सम्यति लहत ॥२॥
❁ संस्कृत काव्यमें ज़बान बसनेके बजाय अधराश्रुत हो पान किया जाता है; यानी मुसलमान कवि ज़बान चूसना लिखते हैं और संस्कृत कवि अधराश्रुत पीना ।
( ११३ )
26. Fortunate must be the man who enjoys the honey of the lips of a lady who is lying on his bosom, whose scented hairs are unfastened, whose eyes are half-shut and whose cheeks shine with drops of perspiration after the exertion of sexual intercourse.
—❧—
आर्षाजितनयनानां यः सुरतरसोऽखुसविदं कुरुते ॥
मिथैनैर्मिथोवधारितमवितथमिदमेवकामनिर्वहणम् ॥२७॥
आलस्यपूर्ण नेत्रोंवाली स्त्रियोंकी कामसे तृप्ति करना, स्त्री-पुरुष दोनोंका परस्पर कामपूजन है, जिसको काम-क्रीड़ा करनेवाले दोनों स्त्री-पुरुष ही जानते हैं ॥२७॥
खुलासा-काम-मदकी अधिकताके कारण जिन स्त्रियोंकी आँखोंमें आलस्य भरा है, इसलिये वे ज़रा-ज़रा खुल रही हैं—ऐसी स्त्रियोंकी कामसे तृप्ति करना पुरुषका परम पुरुषार्थ है। ऐसी स्त्रीके साथ सम्भोग करनेमें जो सुख मिलता है, उस सुख की तुलना नहीं। उस सुखका हाल काम-क्रीड़ा करनेवाले दोनों स्त्री-पुरुष ही जानते हैं।
स्त्रीके नेत्रोंका भारी सा हो जाना, आधे नेत्रोंका खुला रहना और आधे नेत्रोंका बन्द रहना—स्त्रीके पूर्णतया कामोन्मत्त होनेके चिह्न है। यह समय और अवस्था ही काम-क्रीड़ाके लिये उचित है। ऐसी कामोन्मत्त नारीको जो चतुर पुरुष भोगता और सन्तुष्ट करता है, वह भाग्यवान् है और स्त्री भी ऐसे पुरुषकी दासी हो जाती है। अगर स्त्री अपने-आप ऐसी कामोन्मत्ता
८
( ११४ )
नहीं होती, तो कोक-कलाविद चतुर रसिक पुरुष बुभुषन-मर्दन आदि तरकीबोंसे उसे काम-मदसे मतवाली कर लेते हैं।
दोहा ।
मृगनैनी थालस भरी, सुरत सेज सुख साज ।
पूजहिं दम्यति काम मिल, करहिं सुमंगल काज ॥२७॥
27. The pleasure arising out of sexual intercourse with a lady with her eyes partly closed is known to both man and woman as the result of mutual intercourse and is their duty.
—❧—
इदमनुचितमकमश्च पुंसां
यदिह जरास्वपि मान्मथा विकाराः ॥
यदपि च न कृतं नितिबिनीनां
स्तनपतनावधि जीवितं रतं वा ॥२८॥
विद्याताने दो बातें बड़ी ही अनुचित की हैं :—( १ ) पुरुषोंमें, अत्यन्त बुढ़ापा होने पर भी, काम-विकारका होना ; ( २ ) स्त्रियोंका स्तन गिर जाने पर भी जीवित रहना और काम-चेष्टा करना । ॥२८॥
खुलासा—ब्रह्माको उचित था कि, वह बूढ़ोंमें काम-विकार न प्रकट होने देता और स्त्रियोंको तभी तक जीवित रखता, जब तक कि उनके कुच-गुगल सुन्दर सघन और कठोर रहते । बुढ़ापे में काम-विकार का प्रकट होना और स्तनोंके सुकड़ जाने, गिर
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जाने अथवा शैलोंकी तरह लटक जाने पर भी स्त्रियोंका जिन्दा रहना और काम-चेष्टा करना—दोनोंही विदम्बनामात्र हैं । जवानी जाते ही पुरुषकी और स्तन गिरते ही स्त्रीकी काम-चेष्टा रसिकों के मनमें खटकती है ।
जब तक स्त्रीके कुछ छोटी-छोटी नारदियों, अथवा अनारों या कच्चे-कच्चे सेबोंकी तरह रहते हैं, तभी तक स्त्री-भोगमें आनन्द है ; स्तन गिर जाने पर मजा नहीं । किसीने इन कई बातोंके लिये ब्रह्माको दोषी उद्घाटया है । कहा है :—
शशनि खलुकलंकः कण्टकं पद्मनाले ।
युवतिकुचनिपातः पकता केशजाले ॥
जलधिजलमपेयं पण्डिते निर्धनन्तं ।
वयसि धनविवेको निर्विवेको विधाता ॥
चन्द्रमामें कलंक, पद्मनालमें काँटे, युवतियोंके स्तनोंका गिरना, बालोंका पकना, समुद्रके जलका खारी होना, पण्डितोंका निर्धन होना और बुढ़ापेमें धन की चिन्ता—ये सब ब्रह्माकी मति-हीनताके परिचायक हैं ।
दोहा ।
विधिना द्वै श्रयुचित् करी, वृद्ध नरन तन काम ।
कुच ढरकतहू जगतमें, जीवित राखी वाम ॥२८॥
सार—स्त्री-सम्भोगका आनन्द पुरुषकी
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जवानीमें और स्त्रीके कुचोंके कठोर और
सघन बने रहने तक ही है ।
28. It is very improper and contradictory that males are subject to passions in old age and it is also very improper and contradictory that females were not made to live and to have sexual intercourse only up to the time when their breasts are protuberant.
—❧—
एतत्कामफलं लोके यद्वयोरैकचित्ता ।।
अन्यचित्तत्वे कामे शवयोरिव संगमः ॥२६॥
समागमके समय स्त्री-पुरुषोंका एकचित्त हो जाना ही कामका फल है । यदि समागममें दोनोंका चित्त एक न हो, तो वह समागम—गम नहीं ; वह तो मृतकोंका सा समागम है ॥२६॥
किस्तीने कहा है :—
सुरते च समाधौ च, मनो यत्र न लीयते ।
ध्यानेनापि हि किं तेन, किं तेन सुरतेनवा ॥
सुरतके समय सुरतमें और समाधिके समय समाधिमें यदि मन लीन न हो जाय, चित्त उन्हीं कामोंमें गर्क न हो जाय, तो उस सुरत और समाधिसे कोई लाभ नहीं । स्त्री-पुरुषके समागमके समय, दोनोंका एक दिल हो जाना परमाविश्यक है । दोनों का दिल एक हुए बिना कुछ आनन्द नहीं । यदि एकका दिल
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कहीं और दूसरेका कहीं हो और सद्गम किया जाय, तो उस सद्गमको स्त्री-पुरुषोंका सद्गम नहीं, बल्कि दो लारोंका सद्गम कह सकते हैं।
समागमके समय यदि दोनोंमेंसे किसी का भी चित्त समागमके लिये उत्कर्षित न हो, तो समागम न करना चाहिये। वैसे समागमसे आनन्द नहीं आता और वृथा बल क्षीण होता है। अगर एक का दिल हो और दूसरेका न हो, तो जिसका दिल हो उसे दूसरेका काम जगाना उचित है। जब दोनों ही कामोन्मत्त होंगे, तब अवश्य दोनों ही का दिल एक हो जायगा। अगर चित्त उद्भिन्न हो, मन मलीन हो और उद्भिन्नता या मलीनता दूर न हो सकती हो, तो समागम न करना ही अच्छा है।
बोसा या चूमा वह शै है, जिसमें चुम्बनेवाले और चूमे जानेवाले दोनोंको ही आनन्द आता है। ऐसा हो नहीं सकता कि, एक को आनन्द आवे और दूसरेको न आवे। कविने कहा है :—
सुँह पै सुँह रखके लिपट जाव तुम्हारे सिदके।
बोसा वह शै है जो दोनोंको मजा देता है ॥
निश्चय ही, चुम्बनमें दोनोंको आनन्द आता है; लेकिन अगर एक का दिल हो और दूसरेका दिल न हो, एक की इच्छा न हो और दूसरा ज़बर्दस्ती करे तो किसीको भी आनन्द नहीं आनेका। पुंश्चली या परपुरुषरता स्त्रियाँ अपने पतियोंको नहीं चाहती;
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पर उनके पति, कामशास्त्रके पण्डित न होनेकी वजहसे, उनको नहीं पहचानते, उन्हें अपनेसे विरक्ता और परपुरुषरता नहीं समझते। इसलिये, जब वे उन्हें चूमते हैं, तब वे मन न होने पर भी ईकार तो नहीं करतीं; पर तुरन्त ही गालको पोंछ डालती हैं *। इस तरह पुरुष और स्त्री किसी को भी चुम्बनका आनन्द नहीं आता। महाकवि अकबर कहते हैं :—
खैर, चुप रहिये, मजा ही न मिला बोसेका।
मैं भी वै-लुत्फ़ दुश्वा, आपके भुंभलानेसे॥
आपके भुंभलानेसे, आपके बेमन होनेसे, चुम्बनका मजा मुझे
*नाभि पश्यति भतारं नोत्तरसम्प्रतीच्छति।
वियोगे सुखमाप्नोति संयोगे चाति सीदति॥
शय्यासुपगता शेतै वदनमाष्टि चुम्बने।
तन्निमंत्र द्वेष्टि मानन्ध्व विरक्तानाभिवांछति॥
जो स्त्री अपने पतिके सामने नहीं देखती, उससे आँखें नहीं मिखाती, उसकी पछी हुई बातका जवाब नहीं देती, पति जबतक घरमें रहता है दुबो रहती और भुनभुनाती फिरती है, जब पति घरसे बाहर चला जाता है, तब खुश होकर उड़लती-कूदती फिरती है; जबल तो पतिके साथ एक पलंग पर नहीं सोती, अगर मजबूरीसे सो भी जाती है, तो करबट ले जाती है और पतिके चूमने पर गालको पोंछ डालती है, पतिके मित्रसे द्वेष रखती है और पतिके दिलसे चाहने पर भी उससे नाराज़ हो रहती है—उसे “पतिद्रु क या पतिद्रु हा” कहते हैं। ये पतिको न चाहनेवाली—उससे वैर-विरोध रखनेवाली स्त्रियोंके लक्षण हैं।
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आया न आपको। अब खामोश रहिये, और भुंभुलानेसे क्या फ़ायदा? आपने भुंभुलाकर, एक दिल न होकर, चुम्बनका सारा मज़ा मिट्टी कर दिया।
सारांश—जिस तरह चुम्बनके समय एक दिल न होनेसे चुम्बनका आनन्द नहीं आता; उसी तरह एक दिल हुए बिना समागम करनेसे समागमका कुछ भी आनन्द नहीं आता। वैसा समागम समागम नहीं—दो लाशोंका मिलना (Contact of two corpses) है।
समागमके समय दोनोंके दिलोंका एक होना बहुत ज़रूरी है; इसी ग़ज़से रतिशास्त्रके ज्ञाताओंने स्त्री-पुरुषोंके परस्पर काम जगानेको अनेकों तरकोंबँ लिखी हैं; क्योंकि बिना परस्पर काम जगाये कोई लाभ नहीं। स्त्रीके किस अङ्गमें किस दिन काम रहता है, अथवा स्त्री काममदसे किस वक्त या किस ऋतुमें मत-वाली होती है और वह काम किस तरह जगाया जाता है,—ये बातें चतुर पुरुषोंको जाननी चाहियँ। काम जगानेकी सबसे अच्छी विधि चुम्बन करना अथवा स्तनोंके अगले भागों—बीठनियों, काली-काली घुण्डियोंको धीरे-धीरे मलना है। चुम्बन करते ही और बीठनियोंके धीरे-धीरे मलते ही, स्त्रीके नेत्र लाल हो जाते हैं, साँस गरम होकर बड़े जोरसे चलने लगता है और स्त्री सिस-कियाँ भरने लगती है। जब स्त्री सिसकियाँ भरने लगे और शर्म छोड़कर पुरुषसे छेड़-छाड़ करे, तब समझना चाहिये कि, काम चैतन्य हो गया। वही समय सुरत या मैथुनके लिये उत्तम है और