भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

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29. It is only when both the man and the woman are of the same mind that the sexual pleasures are the greatest. If their minds are diverted, then the intercourse is like that of inanimate bodies.

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प्रणयमधुराः प्रेमोद्गाढा रसादलसास्तथा

भण्डितिमधुरा मुग्धप्रायाः प्रकाशितसंमदाः ॥

प्रकृतिमुग्धा विश्वम्भाहोः स्मरोदयदायिनो

रहसि किमपि स्वैरालापा हरन्ति मृगीदशाम् ॥ २० ॥

मृगनयनी कामिनियोंके प्रणय-प्रीतिसे मधुर, प्रेम-रससे पगे, कामकी अधिकतासे मन्दे, सुननेमें आनन्दप्रद, प्रायः अस्पष्ट और समझमें न आने योग्य, सहज-सुन्दर, विश्वासयोग्य और

बर्बाद करते हैं। आजकलके दगाबाज़ विज्ञापनबाज़ोंकी रंगीन बातोंमें आकर बी० पो० पर बी० पी० भँगाते और पीछे पुरुषोंको कामकी न पाकर रोते और पछुवाते हैं। हमारे भोले-भाले पाठक “सचित्र कोकयास्त्र”का विज्ञापन पढ़ते ही आडर दे देते हैं। पर इतना नहीं समझते, कि आसनोंको तन्नों देकर कोकको कौन छापनेकी हिम्मत कर सकता है ? जैससे किते भय नहीं है ? इसलिये हम फिर कहते हैं कि, आप चाहीस रुपये खर्च करके “चिकित्सा-चन्द्रोदय” सात भाग और “स्वास्थ्य रत्ना” देखें—आपको सम्पूर्ण आयुर्वेद और कामयास्त्रका ज्ञान हो जायगा। इस शास्त्रको पढ़ना आपका कर्तव्य है, धर्म है, यही हमारे मुनियोंको और यही पाश्चात्य विद्वानोंको राय है। देखिये डॉक्टर गन साहब कहते हैं—It is, therefore, every individual's duty to study the laws of his being, and to conform to

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कामोद्दीपन करनेवाले वचन, यदि स्वच्छन्दतापूर्वक एकान्तमें कहे जायें, तो, निश्चय ही, सुननेवालेके मनको हर लेते हैं ॥३०॥

खुलासा—कुटुम्बनयनी तर्षणियोंकी प्रेम-रस से पगी हुई मधुर-मधुर बातें रसिक पुरुषोंके कानोंमें अमृत सा ढालती है। मुभायें हुए पुष्प-रूपी प्राणोंको खिलाती है, सारी इन्द्रियोंको प्रसन्न करती और मनमें रसायनका काम करती है। लेकिन जब वे एकान्त-स्थलमें स्वच्छन्दतापूर्वक कही जाती हैं, तब तो और भी गूजब करती हैं। जिनसे ये कही जाती हैं, वे बात कहने-वाल्त्रियोंके कीत-दास ही हो जाते हैं।

कोई प्रेमी अपनी प्रेमिकाकी मीठी-मीठी बातें सुनकर महाकवि अकबरके शब्दोंमें कहता है—

बनोगे खुसरवे इकलीमें दिल, शीरीजँबाँ होकर ।

जहाँगीरी करेगी यह अदा, नूरजहाँ होकर ॥

मीठी-मीठी बातें करनेसे तुम संसारके सभी लोगोंके दिलोंकी रानी हो जाओगी। तुम्हारा यह गुण—मधुर भाषण नूरजहाँकी तरह सारे संसारको फतह करेगा।

them. Ignorance, or inattention on this subject, is sin, and injurious consequences of such a course make out a case of gradual suicide. चिकित्सा-शास्त्र और काम-शास्त्र पढ़ना हरेक मनुष्यका धर्म है। जो इन्हें नहीं पढ़ते वे पाप करते हैं और अन्तमें आत्महत्या आदि करके वे मौत मरते हैं।

( १२६ )

दोहा ।

प्रणय-मधुर आलस भरे, सरस सनेह समेत ।

मृगनैन के ये वचन, हरत चित्तकों लेत ॥३०॥

सार—सुनयनाओंकी मधुर-मधुर बातोंमें जादूकी सी शक्ति होती है । उनकी अमृत-भरी बातों पर कामी पुरुष लहू हो जाते हैं ।

30. Ladies with beautiful eyes always attract the mind by their unrestrained conversation which is sweet because of softness, full of love, very pleasing to the ear on account of delicacy, gives rise to joy, is naturally soothing and confiding and which arouses passions.

—*—

आवासः कियतां गंगे पापहारिणि वारिणि ।

स्तनमभ्ये तरुणया वा मनोहारिणि हारिणि ॥३१॥

या तो पाप-ताप नाशनी गंगाके किनारों पर ही बसना चाहिये, या मनोहर हार पड़ने हुए तरुणी स्त्रियोंके स्तनोंके मध्यमें ही बसना चाहिये ॥३१॥

खुलासा—दो में से एक काम करना चाहिये—या तो पाप-हारिणी गङ्गाके किनारे बैठकर शंकरका भजन करना चाहिये या मोतियोंके हार धारण करनेवाली हृदयहारिणी कामिनियोंके कठोर कुच सेवन करने चाहिये ।

( १३० )

इस जगत्में, कामी पुरुषोंके लिये नवयुवतियोंके कठोर कुव- युगल और सघन स्पर्श जड़ूओसे बढ़कर सुखदायी और दूसरा पदार्थ नहीं है ; इसलिये वे उन्हींका सेवन कर अपना मनुष्य- जन्म सुफल करें । पर जिन्हें इस संसारको असारता और बन्ध- लताका ज्ञान हो गया है, जिन्हें रूप-यौवनकी अनित्यताका हाल मालूम हो गया है, और इसलिये कामिनियोंसे घृणा हो गई है, उन्हें सब द्विविधा त्याग, कहीं निजें और रमणीक स्थानमें, गङ्गा के तट पर पर्णकुटी बना, शिव-शिव रटना चाहिये । कामिनियों के भोगनेसे यहाँ अपूर्व सुखकी प्राप्ति होगी, पर परलोकमें दुःखों का सामना करना पड़ेगा ; मगर सबको तज, गङ्गा किनारे जा, हर भजन करनेसे यहाँ भी सुख-शान्ति मिलेगी और वहाँ भी । पाठकोंके समक्ष दोनों राहें हैं । अब उन्हें जौनसी राह पसन्द हो उसे ही चुन लें । त्रिशङ्कु की तरह बीचमें लटकना और—

इधरके रहे न उधरके रहे ।

खुदा ही मिला न विसाले सनम ॥

वाली कहावत चरितार्थ करना भला नहीं ।

दोहा ।

वास कीजिये गंग तट, पाप निवारत बारि ।

‘के कामिनि कुच युगलको, सेवन कहु बिचारि ॥३१॥

सार—गङ्गा-तट पर बसना और कामिनि-

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योंके कठोर कुचों का सेवन करना—ये दो ही काम जगत्में मुख्य हैं । विचारवान विचारकर, इनमें से किसी एक को चुन लें ।

31. Let one take rest either on the bank of the river Ganges whose water clears away the sin or between the breasts of a woman which are very attracting and where the breast-chain is lying.

—*—

प्रियपुरतो युवतीनां तावत्पद्मातनोतु ह्दि मानः ।

भवति न यावच्चन्दनतत्पुरभिर्भुसुनिर्मलः पवनः ॥३२॥

मानिनी कामिनीयोंके हृदयोंमें अपने प्यारोंके प्रति मान तभीतक ठहरता है, जबतक चन्दनके वृक्षोंकी सुगन्धसे पूर्ण मलयाचलका वायु नहीं चलता ॥३२॥

खुलासा—मानिनीके मनमें उसी समय तक मान रहता है, और उसी समय तक उसकी भुकुटियाँ टेढ़ी रहती हैं, जब तक कि चन्दनके वृक्षोंकी सुगन्धसे मिला हुआ वायु उनके कोमल शरीरोंमें नहीं लगता ।

आमकी मनोहर मञ्जरियाँ, सुविमल चन्द्रमा, कोकिल, भौर और मलय-पवन तथा वसन्त—ये सब कामदेवके साथी और उसके अस्त्र-शस्त्र हैं । वह इन्हींसे त्रिलोकीको वशमें करता है ।

मानिनी कैसी ही कठोर क्यों न हो, किसी तरह मनाने न मनती हो ; तोभी वह कोयलके कुहुकने, मलयपवनके चलने या

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घटाओंके छा जानेसे शीघ्र ही मान छोड़, अपने प्रीतमकी गोदमें आ जाती है। जो कामिनी पुरुषकी अनेक तरहकी खुशामदोंसे भी राजी न होती हो, वह मलयपवन प्रभृतिकी मददसे सहजमें राजी हो जाती है। कविने ठीक कहा है कि, मानिनीका मान तभी तक है, जब तक मलयाचलकी हवा नहीं चलती। उसके चलते ही मानिनी आप खुशामद करने लगती है; क्योंकि वसन्त में मलयाचलकी ओरकी हवा चलती है और वह स्त्रियोंके दिलोंमें बड़ी गुदगुदी पैदा करती है। इसीसे आयुर्वेद-आचार्योंने वसन्त में रात-दिन स्त्री-पुरुषोंके अङ्गमें कामदेवका रहना लिखा है। इस मौसममें, मनहूससे मनहूसका भी काम जाग उठता है और रुटी हुई * स्त्रियाँ सहजमें मन जाती हैं।

❁ कामशास्त्रमें स्त्रीके नाराज या उदासीन रहनेके सम्बन्धमें लिखा है— कार्पण्यादतिमानरोगविरहोद्योगादि पारुष्यतो, मालिन्यासममञ्जतादि भयतः शोकाहृद्भिद्रादिपि। भर्तृषां तनुतादिभिश्च वपुषः काठिन्यतःशंकता, ह्योषाणाञ्च वृथा प्रयाति वनितावैराग्यमुच्यैः सदा ॥

पतिकी प्रत्यन्त कंजूसी, पतिका त्रिषादा प्यार करके सिर पर चढ़ो लेना, पतिका सदा रोगी बना रहना, पतिका मिलह या पुरुषार्थाहीन होना; पतिका उग्र, यौवन, विद्या, बुद्धि और कुल-शौल आदिमें पत्नीके समान न होना; पतिकी मूर्खता, पति और सास-सखर आदिका प्रत्यन्त भय, शोक, दरिद्रता, पतिके शरीरको सख्खो और कठोरता, पतिका अधिक शंकायुत रहना और व्यभिचार या झिगालेकी भूटी बुद्धमत लगाना—प्रवृत्ति

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दोहा ।

तबही लों मन मान यह, तब ही लों भ्रमंग ।

जों लौँ चन्दनसे मिल्यो, पवन न परसत भ्रंग ॥३२॥

सार—मलयपवनके चलते ही मानिनी स्त्रियाँ आप ही सीधी हो जाती हैं ।

32. The pride of a woman before her lover remains only so long as the pure spring air bearing the sweet smell of sandal does not touch her body,

कार्यात्ति स्त्रियां अपने पतिपूर्ति अकृसर विरक्त, उदासीन, नाराज् वा असन्तुष्ट रहती है । जिन पुरुषोंको स्त्री-मूलकी झरत हो, उन्हें उपरोक्त कारण यथासाध्य दूर करनेकी चेष्टा करनी चाहिये । ऐसा करने से ही स्त्री वाहने लगेगी ।

ऋतु-वर्णन

वसन्त-महिमा ।

परिमलभृतो वाताः शाखा नवांकुरकोटयो ।

मधुरविरुतोत्कण्ठा वावः प्रियाः पिकपञ्चिणाम् ॥

विरलसुरतस्वेदोद्गारा वृषवृदनेन्दवः ।

प्रसरति मधौ राच्यां जातो न कस्य गुणोदयः ॥३३॥

जबकि सुगन्धयुक्त पवन चला करती है, इक्षुओंकी शाखाओंमें नये-नये अंकुर निकलते हैं, कोकिला मदमत्त या उत्कण्ठित होकर मधुर कलरव करती है, स्त्रियोंके मुखचन्द्र पर मैथुनके परिश्रमसे निकले हुए पसीनोंकी हलकी-हलकी धारें मजा देने लगती हैं, उस वसन्तकी रातमें, किसे काम पीड़ित नहीं करता ? ॥३३॥

खुलासा—वसन्त कामदेवका साथी और ऋतुओंका राजा

❖ मधौ—चैत्र । चैत वसन्तके दो महिनेंमेंसे एकका नाम है, पर यह— यह सारे ही वसन्तके मौसमके लिए इस्तेमाल किया गया है ।

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हैं। इस ऋतुमें सुगन्धि-मिश्रित पवन चलने लगते हैं। शाखा-प्रशाखाओंमें नवीन पत्राङ्कुर शोभा देने लगते हैं। चारों ओर फूल खिलते हैं। कोकिला मधुर कलरव करती है। साँभ सुहावनी और दिन रमणीय होने लगते हैं। स्त्रियाँ अनुरागिनी होने लगती हैं। बहुत क्या—इस ऋतुमें सभी पदार्थोंमें मनोहरता आ जाती है।

हम अपने पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ महाकवि कालिदास-विरचित “ऋतुसंहार”से चन्द सुन्दर-सुन्दर पद्य उद्धृत करते हैं :—

आकम्पितानि हृद्यानि मनस्विनीनां वतिः प्रफुल्ल सहकार कृताधिवासेः । सम्भावितम्परभृतस्य मदाकुलस्य श्रोत्रप्रियैर्मधुकस्य च गीतनादैः ॥

इस ऋतुमें बौर हुए आमके वृक्षोंकी सुगन्धसे सुगन्धित वायुने धीरज धरनेवाली कामिनियोंके हृदयोंमें भी खलबली मचा दी है। मदोन्मत्त कोकिलोंकी कुहुक और भौरोंके मधुर गुञ्जारसे चारों दिशाए भर गयी हैं।

औरभी :—

पुस्कोकिलश्चूतरसेन मत्तः प्रियामुखं चुम्बति सादरोयम् । गुञ्जद्द्विरेफोऽप्ययमन्मुखस्यः प्रियं प्रियायाः प्रकरोति चाटुम् ॥

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आमके रससे मतवाला हुआ कोकिल, सादर, अपनी प्यारी का मुख चूम रहा है। गूँजता हुआ भौरा भी कमल पर बैठ कर अपनी प्यारीकी खूशामद कर रहा है।

औरभी :—

तन्नि पायङ्नि मदालसानि

मुहुर्मुहुर्जुम्भणतपरणि ।

अगान्यनेगः प्रमदानस्य

करोति लावययरसोत्सुकानि ॥

इस श्रुतुमें मीनकेतन—कामदेव, स्त्रियोंके नाज़ुक, गौर, मतवाले और बारम्बार जम्हाइयाँ लेते हुए अङ्गोंको श्रद्धार-रसमें मद्य कर देता है।

बहुत लिखनेको हमारे पास स्थानका अभाव है, इसलिये इतना ही यथेष्ट होगा। बसन्तमें नामर्द भी मर्द हो जाता है। स्त्रियोंको तो इतना मद छ़ा जाता है कि, वे सीना उभार कर और अकड़ कर चलती हैं। रसीले और छेले-छबीले पतियोंके पास रहने पर भी नहीं दबतीं ; बल्कि उत्कण्ठित ही रहा करती हैं।

छप्पय ।

चले सुगन्धित पवन, फूल चहुँ दिशियें फूले ।

बोलत पिक मृदु बचन, काम-शर उरमें शूले ॥

मुकुलित मञ्जरी आम, करै उत्कर्षटा-भारी ।

रतिश्रम स्वेदित बदन, चन्द्रसम श्रद्धुत नारी ॥

This is a high-contrast, black and white photograph of a blank, aged page from a book. The paper is off-white with visible signs of aging, including yellowing, foxing, and small dark spots. The left edge shows the binding structure, with several small, dark marks indicating where the page was attached. On the right side, a person's hand is visible, with the thumb and part of the index finger holding the page. The background to the right of the hand is dark and indistinct.

शृङ्गारशतक

शत्रुराज वसन्त कोकिल के मधुर-मधुर भङ्कार और भलय पवन से विरही स्त्री-पुरुषों के प्राणान्तर करता है। इस चित्र में यह दिखलाया गया है कि, कामिनी का पति घर में नहीं है, विदेश में है। उधर से वसन्त की श्रवाई होगई है, वृत्तों में नये-नये पत्र आ गये हैं, कोकिलकुंडक नहीं है ; अतः विरह-वेदना से व्याकुल कामिनी मन मलीन किये गई है।

( पृष्ठ ८४ )

( १३० )

यह केहि पदार्थके गुणनकों, उदय करत नहि जगत् महीं।

शुठि स्मृतु वमन्तकी है निशा, मंगलदायक सकल कहैं ॥३३॥

सार—बसन्तमें सभीकी उत्कण्ठा और कामवासना बढ़ जाती है।

33. What objects do not assume their qualities in the dead of night of the spring season when the scented breeze blows, new sprouts of leaves come out on the branches of trees, the sweet sound of cuckoo and other birds appear very pleasing and the stray drops of perspiration shine on the moon-like face of women after the exertion of sexual intercourse.

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मधुरयं मधुरैरपि कोकिला—

कलकलैर्मलयस्य च वायुभिः ॥

विरहिणः प्रणिहन्ति शरीरिणो

विपदि हन्त सुधाऽपि विषायते ॥३४॥

ऋतुराज बसन्त कोकिलके मधुर-मधुर शब्दों और मलय पवनसे बिरही स्त्री-पुरुषोंके प्राण नाश करता है। बड़े ही दुःखका विषय है कि, प्राणियोंके लिये विपद्कालमें ऋतु भी विष हो जाता है ॥३४॥

खुलासा—कोकिलका मधुर कलरव और मलयाचल की सुगन्धिपूर्ण हवा प्राणिमात्रमें नवजीवनका सञ्चार करते हैं।

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इनसे शोकार्त्ता और मनहसोंके दिलोंमें भी गुदगुदी होने लगती है। सभीके चेहरों पर प्रसन्नता छा जाती है ; पर कर्मों के फेर या दुर्दिनके कारणसे, यही दोनों विरही स्त्री-पुरुषोंको मछलीकी तरह तड़फाते हैं। सब है, विपद्कालमें सोना मिट्टी हो जाता है और अमृत विष हो जाता है। पण्डितराज जगन्नाथ अपने “भामिनी-विलास”में कहते हैं :—

मलयानिलमनलीयति मणिभवने काननीयति द्वाणतः ।

विरहेण विकलहृदया निर्जलमीनायते महिला ॥

विरह-वेदनासे विकल कामिनी मलयाचलकी पवनको आग और मणिमय भवनको वन समझकर मछलीका सा आवरण करती है ; यानी जलहीन मछलीकी तरह तड़फती है।

औरभी :—

पाटीरदुमुजंगुंगवमुखायाताइवातापिनो,

वाता वांति दहन्ति लोचनमयी ताप्त्रा रसालदुमाः ।

एते हन्त किरन्ति कृजितमयंहालाहल कोकिलाः, —

बाला बालमृणालकोमलतनुः प्राणान् कथं रक्षतु ॥

चन्दनके वृक्षोंमें बसनेवाले सर्पोंके मुखसे निकली हुई हवाके समान सन्तप्त—गरम हवा चलती है ; लाल-लाल पत्तों वाले आमके वृक्ष नेत्रोंको जलाते हैं ; कोयलकी वाणी विष सा बरसाती है। इस दशामें नवीन कमलकी-डंडीके समान कोमलाङ्गी बाला किस तरह अपनी प्राणरक्षा करेगी ?

( १३६ )

पाठक ! देख लिया, बसन्तमें विरहीजनोंकी कैसी दुर्दशा होती है। विरही स्त्री-पुरुष सभी शीतल और शान्तिमय पदार्थों को अश्रिवत् समझते हैं। विरह-व्याकुला बाला काले अगर और चन्दनके रसको हलाहल विष और नील कमलोंकी मालाको सर्पोंकी कृतार समझने लगती है।

एक विरहिणी बसन्तमें अपने प्रीतमके घर न आने पर स्वपति, कोकिला, कामदेव और चन्द्रमा पर कैसी कुपित हो रही है और उनसे बदला लेनेकी ठान रही है। हम इस मनोहर उक्तिको महाकवि कालिदास-कृत “श्रृङ्गारतिलक”से उद्धृत करते हैं। लीजिये पाठक ! इसका भी रसास्वादन कीजिये :—

आयाता मधुयामिनी यदि पुनर्ना— यात एव प्रभुः प्राण यान्तु विभावसौ यदि पुनर्जन्मप्रहं प्राथये । व्याधःकोकिलबन्धने हिमकर— ध्वंसे च राहुप्रहः कन्दर्पे हरनेत्र- दीधितिर्ह प्रोषोश्चरे मन्यथः ॥

बसन्तकी रात आगई ; पर मेरे स्वामी न आये। इसलिये मेरे प्राण आगमें नष्ट हों। अगर मरनेके बाद फिर जन्म होता हो, तो मैं परमात्मासे प्रार्थना करती हूँ कि, कोकिलके बन्धनके लिये मैं व्याध होऊँ ; चन्द्रमाके नाश करनेके लिये राहु होऊँ ; कामदेवके संहारके लिये शिवजीके नेत्रकी किरण बन्नी और

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अपने प्राणप्यारके लिये कामदेव बन्नुं ; अर्थात् बसन्तमें, ये सब मुझे जिस तरह सता रहे हैं ; परकालमें, मैं भी इन्हें सताऊँ और अपना बदला लूँ ।

दोहा ।

सुतु बसन्त कोकिल कुहक, त्यौही पवन श्रृणुप ।

विरह विपतके परत ही, सुवा होय विपरूप ॥३४॥

सार—विरही स्त्री पुरुषोंके लिये “बसन्त” कालके समान है ।

34. This month of Chaitra kills (as it were) those who are suffering from the pangs of separation, by the sweet sound of cuckoo and by the air of Malyachala mountain. Alas! even nectar becomes poison in adversity. (Sweet sound of the cuckoo and the gentle breeze in the spring season please every one—but those whose beloved ones are away feel their absence all the more by these messengers of spring.)

—*—

आवासः किल किञ्चिदेव दयितापारवं विलासालासः

कणै कोकिलकाकलीकलरवः स्मेरो लतामण्डपः ॥

गोष्ठी सत्कविभिः सर्म कतिपयेः सेव्याः सितान्शोः कराः

केषांचित्सुखयन्ति नेत्रहृदये चैवे विचित्राः च्छपाः ॥३४॥

भोगविलाससे शिथिल होकर कुछ समय तक अपनी प्यारीके

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पास आराम करना, कोकिलाओंके मधुर शब्द सुनना, प्रफुल्लित लतामयडपके नीचे टहलना, सुन्दरे कवियोंसे बातचीत करना और चन्द्रमाकी शीतल चाँदनीकी बहार देखना—ऐसी सामग्रीसे चैत्र मासकी विचित्र रात्रियाँ किसी-किसी ही भाग्यवान्के नेत्र और हृदयोंको सुखी करती हैं ॥३५॥

खुलासा—कोयल कुहुकती हो, छताएँ फूल रही हों, चाँदनी छिटक रही हो, श्रेष्ठ कवि अपनी रसीली कविताएँ सुनाते हों और भोग-विलाससे थक कर अपनी प्राणप्यारीके पास आराम कर रहे हों—चैतके महोनेकी रातोंमें, जिन्हें ये सब मयस्सर हों, वे निश्चय ही भाग्यवान हैं। जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्य सञ्चय किये हैं, उन्हें ही ये स्वर्गीय सुख मिलते हैं; सब किसीको नहीं।

दोहा।

कोकिल-रव फूली लता, चैत चाँदनी रैन।

प्रिया सहित निज महलमें, सुकती करत सुचैन ॥३५॥

सार—चैतकी चाँदनी रातमें, विरले पुण्यात्मा ही अपने महलकी छतपर, अपनी प्राणप्यारीके साथ आनन्द करते हैं।

35 These wonderful nights of the month of Chaitra give pleasure to the mind and eyes of a man who enjoys the sweet company of his beloved wife being tired with pleasurable copulation, hears the sweet songs of the cuckoo and takes

( १४२ )

delight in bright moon-light, whose time is passed in company with birds, but to others whose beloved ones are away, these nights give pain.

—*

पान्थस्वीविरहानलाहुतिकथामातन्वती मञ्जरी माकन्देषु पिकांगनाभिरधुना सोत्कण्टमालोक्यते ॥ अध्येते नवपाटलापरिमलभ्रमभारपाटचरा वान्तिक्कान्तिवितानतानवकृताः श्रीखण्डशैलानिलाः ॥३६॥

इस वसन्तमें, जगह-जगह, बटोहियोंकी विरहव्याकुल स्त्रियोंकी विरहाग्निमें आहुतिका काम करनेवाली आमकी मञ्जरियाँ खिल रही हैं। कोकिला उन्हें बड़ी अभिलाष या उत्कंठासे देख रही है। नये पलाशके फूलोंकी सुगन्धको चुरानेवाले और राहकी थकानको मिटानेवाले मलय वायु चल रहे हैं ॥२६॥

यहाँ मृत्युराजकी स्वाभाविक महिमाका चित्र खींचा गया है।

ॐ श्रीखण्डशैल मलयपाचल पर्वतका ही दूसरा नाम है। मलयपाचल भारतको सात मुख्य पर्वत-श्रेणियोंमेंसे एक है। संभवतः, यह वाटोंका दक्षिणीय भाग है, जो मंसूरके दक्षिणसे शुरू होकर ट्रावनकोरकी पूर्वी सीमा बनाता है। कीलहानों साहब कहते हैं, मलयपाचल उस पर्वत-श्रेणीका नाम है जो भारतीय प्रायद्वीपके पश्चिमीय तट पर है, और जहाँ चन्द्रनके वृक्ष बहुतायतसे लगते हैं।

( १४३ )

हम भी अपने मनचले पाठकोंके मनोरञ्जनार्थ महाकवि कालि- दासके “अतुल्यहार”से एक श्लोक नीचे उद्धृत करते हैं :—

समदमधुकराणां कोकिलानाञ्च नादैः

कुसुमितसहकारैः कर्णिकारैश्च रम्यैः ।

इषुभिरिव सुतीक्ष्णैर्मानस मानिनीनां

तुदति कुसुममासो मन्मथोदीपनाय ॥

यह कुसुम मास मतवाले भौरों, कोकिलके शब्दों, अत्यन्त तेज तीरोंके समान बौर हुए आमके वृक्षों और मनाहर करनेके वृक्षोंके द्वारा, कामोद्दीपन करनेके लिये, मानिनी स्त्रियोंके मनो को विद्व कर रहे हैं ।

छ्पय ।

विरहीजन-मन ताप करन, वन अम्बा मोरे ।

पिकहू पञ्चम हेर टेर, बिरही किये बौर ॥

भौर रहे मबाय, पुहुप पांडलके महकत ।

प्रकुलित भये पलास, दर्शों दिशि दौसी दहकत ॥

मलयगिरिवासी पवनहु, काम धनिन प्रज्वलित करत ।

बिन कृत वसन्त असन्त ज्यों, घेर रखो यह नहि टरत ॥३३॥

सार—आम की मंजरियोंका खिलना, कोकिलाका उन्हें उत्कंठासे देखना और मलय

( १४२ )

delight in bright moon-light, whose time is passed in company with bards, but to others whose beloved ones are away, these nights give pain.

—*—

पान्थस्त्रीविरहानलाहुतिकथामातन्वती मञ्जरी माकन्देषु पिकांगनाभिरधुना सोत्कण्टमालोक्यते ॥ अग्न्येते नवपाटलापरिमलप्रभारपाटचरा वान्तिष्कान्तिवितानतानवक्रताः श्रीखण्डशैलानिलाः ॥३६॥

इस बसन्तमें, जगह-जगह, बटोहियोंकी विरहव्याकुल स्त्रियोंकी विरहाग्निमें आहुतिका काम करनेवाली आमकी मञ्जरियाँ खिल रही हैं। कोकिला उन्हें बड़ी अभिलाष या उत्कंठासे देख रही है। नये पलाशके फूलोंकी सुगन्धको चुरानेवाले और राहकी थकानको मिटानेवाले मलय वायु चल रहे हैं ॥२९॥

यहाँ ऋतुराजकी स्वाभाविक महिमाका चित्र खींचा गया है।

ॐ श्रीखण्डशैल मलयचल पर्वतका ही दूसरा नाम है। मलयचल भारतको सात मुख्य पर्वत-श्रेणियोंमेंसे एक है। संभवतः यह घाटोंका दक्षिणीय भाग है, जो मैसूरके दक्खनसे शुरू होकर द्रावनकोरकी पूर्वी सीमा बनाता है। कीलडार्न साहब कहते हैं, मलयचल उस पर्वत-श्रेणीका नाम है जो भारतीय प्रायद्वीपके पश्चिमीय तट पर है, और जहाँ चन्द्रनके वृक्ष बहुतायतसे लगते हैं।