भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( २१० )

दधि श्रुत श्रोदन दूध, मधुर पक्वान मलाई । नित प्रति सेवन करे, रहे बहु मोद बढाई ॥ बहु बिधि ज्ञानी नर जग भए, वे नहि मन कर सके बस । यदि होवहिं तो गिरिबिन्द्य जनु, उदधि मध्य उतराहि तस ॥६४॥

सार—जब विश्वामित्र और पराशर जैसे मुनि स्त्रियोंके माया-जालमें फँस गये, तब और कौन बच सकता है ?

65. Vishwamitra, Parashara and others who lived upon air, water and dry leaves only (they also) became captivated as soon as they saw the charming lotus-like faces of women. Surely then if those who live upon rice mixed with ghee, butter and milk, can be successful in controlling their passions, Vindhya mountains would float on the ocean.

—*—

संसारेऽस्मिन्सारे कुतुपतिश्रुवनद्वारसेवावलम्ब- व्यासंगवस्तवैर्व कथममलवियो मानसं संनिद्धुः॥ यथेतः मोद्यदिन्दुयुतिनिचयश्रुतो न स्युरम्भोजनेत्राः प्रेक्षत्कांचीकलापाः स्तनभरविनमन्मध्यभागास्तस्ययः ॥६६॥

स्त्री-त्यागकी प्रशंसा ।

अगर इस असार संसारमें, पूर्ण चन्द्रमाकी सी कान्तिवाली, कमलकी सी आँखो वाली, कमरमें लटकती हुई कर्चनी पहने वाली,

( २१८ )

स्तनोंके भारसे मुक्की हुई कमर वाली युवती स्त्रियाँ न होतीं, तो निर्मल-बुद्धि मनुष्य, दुष्ट राजाओंके द्वारकी सेवाओंमें, अनेक कष्ट उठाकर अधीर-चित्त क्यों होते ? ॥३३॥

खुलासा—पुरुषों को अपने पेट के लिये, राजा-महाराजाओं और अमीर-उमराओंकी सेवा करके, उनकी टेढ़ी भुकुटियों से हर समय काँपते रहने और बारम्बार अपमानित होने एवं अन्यान्य प्रकार की अनेकों मुसीबतें उठानेकी क्या ज़रूरत थी ? संसार में पुरुष अपनी प्राणप्यारीके लिये ही नाना प्रकारके कष्ट सहता है ; उसी के लिये रणक्षेत्रमें जाकर अपनी गर्दन दे देता है ; उसी के लिये तरह-तरहकी ज़िल्लत और बेइज्ज़ती बर्दाश्त करता है । उसी के सुखकी गरज़से, वह अपने घोर शत्रुओं तक की खुशामदे करके अपने मानको मठीन करता है । बहुत कहना व्यर्थ है, खी ही पुरुषोंके मानमर्दन और दीनता का कारण है ।

छप्पय ।

तौ बसार संसार जान, सन्तोष न तजते । भीर भारके भरे भूषको, मूल न भजते ॥ बुद्धि विवेक निधान, मान अपने नहीं देते । हुकुम विरानो राख, दुःख सम्पद नहीं लेते । जो यह नहीं होती शशि-सुखी, मृगनयनी केहरि कटी । छवि जटी छटा निकसी छरी, रस लपटी छूटी लटी ॥३३॥

( २१६ )

सार—स्त्रियोंके ही कारणसे पुरुषोंको

नाना प्रकार की तकलीफें उठानी पड़ती हैं ।

66. If there would not have been such lotus-eyed young women with face shining like a newly-risen moon, wearing sweet sounding girdle whose waist is bent under the load of breasts, then persons of pure intellect would not have put up with various insults by serving in the courts of wicked kings.

—**—

सिद्धाभ्यासितकन्दरे हरवृषस्कन्धावगाढदुमे

गंगाभौतशिलातले हिमवतः स्थाने स्थिते श्रेयसि ॥

कः कुर्वीत शिरःप्रणामममलिनं म्लानं मनस्वी जनो

यद्विन्नस्तकुर्गंगावनयना न स्युः स्मरास्त्रं स्त्रियः ॥६७॥

यदि त्रस्ता भुगशावकनयनी कामास्त्ररूपा कामिनी इस जगत्में न होती ; तो सिद्ध—महात्माओंकी गुफाओं, महादेवके वाहन—नन्दीश्वर—बैलके कन्धा गढ़नेके वृक्ष और गंगाजलसे पवित्र हुई शिलाओंवाले हिमालयके स्थान छोड़कर, कौन मनस्वी—बुद्धिमान् पुरुष लोगोंके सामने जा, उन्हें माथा झुका, प्रणाम करके, अपने मानको मलिन करता ? ॥६७॥

खुलासा—संसारमें, एकमात्र स्त्री के ही कारणसे, पुरुषों को अनेक तरहसे नीचा देखना पड़ता है । अगर स्त्री न होती, तो

( २२० )

पुरुष हिमालय पर्वतकी गुफाओं में अथवा गङ्गा-तट पर किसी उत्तम वृक्षकी छाया में बैठकर, शिव-शिव करता हुआ, अपने दिन सच्ची सुख-शान्तिसे व्यतीत करता । उसे अपनी मान-प्रतिष्ठा खोकर, जने-जने की खूशामद करनेकी कौनसी आवश्यकता थी ? इसमें ज़रा भी शक नहीं कि, संसारमें एकमात्र स्त्री ही के कारण, पुरुष को तरह-तरह की ज़िल्लते उठानी और जगह-जगह बे-इज्जती सहनी पड़ती है ।

कुरङ्गलिया ।

अभय हरिण-शावक-नयन, काम-वाण-सम नार ।

जो घरमें होती नहीं, तो सहजहिं होतों पार ॥

सहजहिं होतों पार, बैठ गिरगुहा सिद्ध बन ।

जहाँ तरुन सों अंग, खुजात फिरै हरवाहन ॥

स्वच्छ फटिक हिम-शैल, तले जहँ वहैं गंगपय ।

निशिदिन धरि हरि-भ्यान, चित्तकै राखिय निर्भय ॥६७॥

सार--स्त्रियोंके कारण ही पुरुषोंको जगह-जगह नीचा देखना पड़ता है ; नहीं तो वन-पर्वतोंमें किस चीजका अभाव है ?

67. If there would not have been women who are the instruments of Kamdeva and who have eyes like those of the fearless young deer, then what high-minded man would have humiliated himself by bowing his head down before men and women, leaving the

श्रद्धाशक्त

यदि जगत् में कामिनी न होती, तो महादेव के बाहन नन्दी के कन्या रगड़ने के वृक्षों और गंगाजल से पवित्र हुई शिलाओं वाले हिमालयके स्थान छोड़ कर, कौन मनस्वी पुरप लोगों के सामने जा, उन्हें सिर-भुका, अपने मान को मलिन करता ? (पृ० १६०)

Popular Press—Calcutta.

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( २२१ )

blissful region of the Himalayas in whose caves pious men reside and where the bull of God Shiva rubs his shoulder against the trees and where the mountain slabs are washed by the water of the Ganges.

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संसार तव निस्तारपदवी न दीयीसी ।

अन्तरा दुस्तरा न सूर्यदिरे मदिरेचाणाः । १३ ॥

हे संसार ! यदि तुममें मदसे मतवाले नेत्रोंवाली दुस्तरा स्त्रियाँ न होतीं, तो तेरे परली पार जाना कुछ कठिन न होता ॥१३॥

खुलासा—मनुष्य इस लोकमें, कर्म-बन्धन या जन्म-मरणकी फाँसीसे पीछा छुड़ानेकी लिय आता है। मोक्षकी साधना के लिये ही, उसे मनुष्य-देहरूपी पारसमणि मिलती है कि, वह नियत अवधि के भीतर, उससे मोक्षरूपी सोना बना ले। पर, यहाँ आने पर, उसका वचपन तो खेल-कूद और पढ़ने-लिखनेमें कट जाता है। यौवनावस्था आने पर वह चञ्चलनयनी, उन्नत-नितम्बिनी, पीनपयोधरा कामिनियों के रूप-जालमें फँस जाता है। इनमें वह ऐसा भूलता है, कि उसकी सारी उग्र बीत जाती है और उसे अपने कर्त्तव्य-कर्मकी याद तक नहीं आती। इतने में ही उसकी अवधि पूरी हो जाती है और उससे पारसमणि रूपी मनुष्य-देह छिन जाती है ; यहाँसे वह मोक्षरूपी सोना बनाये बिना ही,

( २२२ )

फिर कोरा चला जाता है। तात्पर्य यह कि, कामिनियोंके कारण से मनुष्य इस संसार-सागरसे पार नहीं हो सकता। उसके इस काममें वे बाधा डालती हैं। सब है, संसारमें यदि कामिनी और काञ्चन न होते, तो फिर किसीको भी इस भव-सागरके पार करनेमें कठिनाई न होती। रसिक कवि ने पू्व कहा है—

दोहा ।

जो होती नहिं नार, मदभाती मृगलोचनी । जगकेपरलीपार, गमन न दुर्लभ कहुक था ॥

सोरठा ।

जो नहिं होती नार, तो तरिबौ जगमें सुगम । यह लींबी तरवार, मार लेत अथबीचही ॥

सार--संसार-सागरसे पार होनेमें, नेत्रोंसे जादू करनेवाली सुन्दरी स्त्रियाँ ही बाधा- स्वरूप हैं ।

68. O world, it would not have been very difficult to cross you if there were not this great obstacle in the form of woman having beautiful eyes.

—*

( २२३ )

यौवन-प्रशंसा ।

राजस्तुष्णांबुराशेन हि जगति गतः कश्चिदेवावसानं को वाऽर्थोऽर्थैः प्रभूतैः स्ववपुषि गलिते यौवने सादुरागे ॥ गच्छामः सद्म यावद्विकसितनयनेन्दीवरालोकिनीनामा- कम्याकम्य रूपं भटिति न जरया लुप्यते प्रेयसीनाम् ॥१६॥

हे महाराज ! इस तृष्णा-रूपी समुद्रके पार कोई न जा सका । अतीव प्यारी यौवनावस्थाके चले जाने पर, अधिक धन-सञ्चयसे क्या लाभ होगा ! हम शीघ्र ही अपने घर क्यों न चले जायें , क्योंकि, कहीं ऐसा न हो कि, विकसित कुमुद और कमलके समान नेत्रोंवाली हमारी प्यारियोंके रूपको वृद्धावस्था घुला-घुलाकर विगाड़ डाले ॥१६॥

खुलासा—राजन् ! तृष्णा-पिशाचिनीका अन्त नहीं । यह दिन-दिन बढ़ती ही जाती है । हज़ार होने पर लाख की, लाख होने पर करोड़ की और करोड़ होने पर अरब-खरब की अथवा साम्राज्यकी इच्छा होती है । मनुष्य बूढ़ा हो जाता है, उसके बाल पक जाते हैं, दाँत गिर जाते हैं ; पर तृष्णा न बूढ़ी होती है और न उसका कोई अङ्ग क्षीण होता है । वह तो बढ़ती ही जाती है । किसी ने कहा है :—

( २२४ )

निःस्वः वष्टि शतं शती दशशतं लक्षं सहस्राधिपो, लक्षेशः क्षितिपालतां क्षितिपतिश्चक्रेशतां वाञ्छति । चक्रेशः पुनरिन्द्रतां सुरपतिर्ब्राह्मणं वाञ्छति, ब्रह्मा शिवपदं शिवो हरिपदं आशावर्धि को गतः ? ॥

निर्धन सौ रुपये चाहता है, सौ वाला दश हजार चाहता है, और हजारपति लाख रुपये चाहता है, लखपति राजा होना चाहता है, राजा सम्राट् होना चाहता है, सम्राट् इन्द्र होना चाहता है, इन्द्र ब्रह्मा होना चाहता है, ब्रह्मा शिव होना और शिवजी विष्णु होना चाहते हैं। किस की आकांक्षा का शेष हुआ है ? मतलब यह, आज तक कोई भी इस तृष्णा-नदी के पार न जा सका। क्या हम इस के पार पहुँच सकते हैं ? हरगिज नहीं। तब हम क्यों इस पिशाचिनीके फेर में पड़कर, अपनी जवानी को बर्बाद करें ; क्योंकि जवानी एक बार जाकर फिर नहीं आती ? महा- कवि दाग ने कहा है :—

रहती है कब वहारे जवानी, तमाम उम्र । मानिन्द वृये गुल, इधर आई उधर गई ॥ जो जाकर न आये, वह जवानी देखी । जो आकर न जाये, वह बुढ़ापा देखा ॥

जवानी की बहार सारी उम्र कहाँ रहती है ? वह तो फूलोंकी खुराबू की तरह इधर आती है और उधर चली जाती है।

( २२५ )

जवानी तो जाकर फिर नहीं आती और बुढ़ापा आकर फिर नहीं जाता ।

और भी किसी हिन्दी-कवि ने कहा है—

सदा न फूले तोरई, सदा न सावन होय ।

सदा न जीवन थिर रहे, सदा न जीवे कोय ॥

अगर तृष्णा के फेर में पड़े रहनेसे, इधर हमारी जवानी चली गई और उधर हमारी प्राणप्यारी की जवानी चली गई ; तो हमारे धन जमा करनेसे क्या लाभ होगा ? हमने अपनी आज्ञादी इसी लिये खोई है कि, हम धन कमाकर, घरमें जा, अपनी नवयुवती का यौवन-सुख भोगें ; पर हमारे एक इसी धुनमें लगे रहने से सब चौपट हो जायगा । इसलिये हमें शीघ्र ही घर जाना चाहिये और जवानी के, प्रातःकालीन दीपक के समान, निस्तेज होने से पहले, अपनी प्राणवल्लभाकी उठती जवानीका आनन्द उपभोग करना चाहिये । क्योंकि यदि हम प्रवासमें रहें और प्यारी हमारे पास न रहे—हम से दूर रहे ; तो हमारा धन और हमारी जवानी दोनों ही वृथा हैं । ऐसी जवानी और ऐसी दौलतसे कोई लाभ नहीं । किसी ने कहा है :—

वितेन किं ? वितरणं यदि नास्ति दीने,

किं सेवया ? यदि परोपकृतौ न यत्नः ।

किं संगमेन ? तनयो यदि नेच्छाधीयः,

किं यौवनेन ? विरहो यदि वल्लभायाः ॥

१५

( २२६ )

अगर ग़रीब और मुहताज़ों को धन न दिया जाय, तो धन के होनेसे क्या लाभ ? वह धन निष्फल है । यदि पराया उपकार न किया जाय, तो सेवा निष्फल है । जिस स्त्री-संगम से पुत्र न पैदा हो, वह स्त्री-संगम वृथा है । यदि प्यारो के साथ जुदाई हो, तो जवानी वृथा है । ऐसी जवानी से क्या फ़ायदा ? सारांश यह है, कि जब स्त्री-पुरुष दोनों ही जवान हों, तभी काम-श्रीङ्गाका आनन्द है । बुढ़ापेमें क्या रक्खा है ? स्त्री-भोगका आनन्द जवानीमें ही है ; क्योंकि जवानीमें ही बदनमें ताकत रहती है और जवानीमें ही कामदेवका जोश रहता है । अगर स्त्रीका यौवन उतार पर आजाय, उसके स्तन सिङ्गुड़ जायँ वा धैलेसे लट्कने लगेँ, तब क्या आनन्द है ? उस समय स्त्री उल्टी बुरी लगती है । जो मज़ा है, वह नवीना नारीमें ही है । कहा हैः—

नववस्त्रं नवच्छत्रं नव्या स्त्री नूतनं गृहम् ।

सर्वत्र नूतनं शस्तं सेवकाभिः पुरातनं ॥

सब देशोंमें नया कपड़ा, नया छाता, नयी स्त्री और नया घर—ये अच्छे समझे जाते हैं । केवल नौकर और अन्न ये पुराने अच्छे समझे जाते हैं । कहा हैः—

शशी दिवसधूसरो गलितयौवना कामिनी, सरो विगतवारिजं मुखमनहारं स्वाकृतेः ।

( २२७ )

प्रसुर्वनपरायणः सततदुर्गतः सज्जनो ।

रुपाङ्गगगगतःखलो मनसि सप्तशल्यानि मे ॥

दिनका मलिन चन्द्रमा, क्षीणयौवन कामिनी, बिना कमलों का तालाब, सुन्दर सुरतवाला निरक्षर—पूर्व, धनका लोभी स्वामी, दरिद्री सज्जन और राजसभामें दुष्ट—ये सात मेरे हृदयमें कटि की तरह खटकते हैं ।

सारंश यह है कि, सब काम अपने-अपने समय पर अच्छे लगते और अपना फल देते हैं। खेती सूख जाने पर बरसनेसे क्या लाभ ? समय पर चूरू कर, पीछे पछतानेसे क्या फायदा ? पानी आ जानेपर मेंड बाँधनेसे क्या प्रयोजन ? आग लग जाने पर, कुआँ खोदनेसे क्या मतलब ? नदी आजाने पर बन्धा बाँधने और बुढ़ापा आजाने पर शादी करनेसे क्या लाभ ? नीतिमें लिखा है :—

( १ )

निर्वाण दीपे किमु तैलदानं

चौरंगते वा किमु सावधानम् ।

वयोगते किं वनिता-विलासः

पयोगते किं खलु सेतुबन्धः ॥

( २ )

शीतेऽतीते वसनमशनं बासरान्ते निशान्ते

जीडारम्भः कुवल्यदृशां यौवनान्ते विवाहः ॥

( २२८ )

सेतोर्वन्धः पयसि गलिते प्रस्थिते लघ्वचिन्ता सर्वञ्चैतद्भवति विफलं स्वस्वकाले व्यतीते ॥

दीपक बुभ्रु जाने पर तेल डालनेसे क्या ? चोरके माल ले जाने पर सावधानीसे क्या ? जवानी चली जानेपर बनिता-बिहार से क्या ? जलके चले जाने पर पुल बाँधनेसे क्या ? ॥१॥

जाड़ा चला जाने पर कपड़े पहननेसे क्या ? सर्फ हो जाने पर भोजन करनेसे क्या ? रात बीत जाने पर नीलकमलोंके समान नेत्रोंवाली स्त्रियोंके साथ प्रसङ्ग करनेसे क्या ? जवानी चली जाने पर विवाह करनेसे क्या ? जलके चले जानेपर पुल बाँधनेसे क्या ? प्रस्थान कर देने पर, लघ्व-चिन्तासे क्या ? अर्थात् ये सब अपना-अपना समय बीतने पर निष्फल हैं ॥२॥

बुढ़ापमें चौदह-चौदह और सोलह-सोलह बरसकी उठती जवानीकी कामिनियोंके साथ जो ना-समभ बूढ़े 'खुरांट' विवाह करते हैं ; वे इस श्लोकसे शिक्षा ग्रहण करें । क्या सिरसका फूल हीरोंमें छेद कर सकता है ? ऐसे अशर्मियोंकी इस लोकमें बदनामी होती और परलोकमें उन्हें भयंकर दण्ड मिलता है ! इन की खिरियाँ इनके लात मार कर, या तो कहाँ और रसोईयोंसे आशनाई करतीं अथवा साईस और कोचवानोंके साथ भाग जाती हैं । हाँ, कोई-कोई कलियुगी पतिव्रता, अपने बूढ़े-बालम को, बिना ज़रासा भी कष्ट दिये, संत-मेंतमें पुत्रव्रत देकर, उसके कुलका नाम चला देती अथवा वंशको डूबनेसे बचा लेती है ।

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श्रृङ्गारशतक

दुस्कारे पोर मुख पर जो तिल शोभायमान है, उसे मैं अणाम करता हूँ ; क्योंकि मुझे ऐसा जान पड़ता है, मानो चन्द्रमाको विद्यकर शालग्राम सो रहे हों । पृष्ठ २३९

( २२६ )

धिकार है ! ऐसे विवाह और ऐसी औलादको ? ऐसी वर्णसंकर सन्तानसे वंशका नाम लेप हो जाना कहीं भला ।

कुरडलिया ।

नरवर ! तुष्णासिन्धुके, पार न कोई जाय ।

कहा अर्थ संचय किये, कालसर्प वय खाय ?।

कालसर्प वय खाय, नेह श्रुत श्रेम नसावै ।

कहा होय घर गये, तबै कछु हाथ न आवै ?।

तासों तबलों वेग, भाग चलिये द्वारे घर ।

कमलनयन तिय रूप, जरा जबलों नहि नरवर ॥६६॥

सार—कमलनयनी कामिनियोंके भोगने का समय युवावस्था ही है । जो पुरुष धन-तृष्णामे फँस, अपनी और अपनी पत्नी की जवानीका सुख नहीं भोगते, वे बड़े ही मूर्ख हैं । धन भी तो सुख-भोगोंके लिये ही कमाया जाता है ; जब सुख-भोग न भोगे, तब धन कमाना वृथा ही हुआ ।

69. O Sovereign, no one has been able to cross this ocean of desires ; and when this my young age full of affection is lost in itself, then what is the use of earning much wealth. I should there-

( २३० )

fore go home before old age takes away the beauty of my beloved lady whose eyes are like blossomed lotuses,

—❧—

रागस्यागारभेकं नरकशतमहादुःखसंप्राप्तिहेतु- मोहस्योत्पत्तिवीजं जलथरपटलं ज्ञानताराधिपस्य ॥ कन्दर्पस्यैकमित्रं प्रकटितविविधस्पष्टदोषप्रबन्धं लोकैऽस्मिन्बन्धनर्थनिजकुलदहनयौवनादन्यदस्ति ॥७०॥

अनुरागके घर, नरकके नाना प्रकारके दुःखोंके हेतु, मोहकी उत्पत्तिके बीज, ज्ञानरूपी चन्द्रमाके टकनेको मेघ-समूह, कामदेवके मुख्य मित्र, नाना दोषोंको स्पष्ट प्रकटानेवाले और अपने कुलको दहन करनेवाले—यौवनेके सिवा, इस लोकमें, दूसरा कोई अनर्थ नहीं है ॥७०॥

खुलासा—सारी आफूतोंका मूल—अनुराग, यौवनावस्थामें ही होता है। इस अवस्थामें ही मनुष्यको प्रेम या इश्वरकी बीमारी लगती है। उस्ताद जौक कहते हैं :—

इश्वरका जोश है जब तक, कि जवानीके हैं दिन । यह मर्ज करता है शिहत, इन्हीं अश्याय में खास ॥

प्रेमरूप व्याधिके उभरनेका खटका जवानीमें ही रहता है। ये दिन ही इस बीमारीके लिये खास हैं।

( २३१ )

जब मनुष्य पर इक्षुका भूत सवार हो जाता है ; तब वह, झानी और पण्डित होने पर भी, अज्ञानी और मूर्ख हो जाता है ; उसे बुरे-भलेका विचार नहीं रहता । उसकी आँखोंके सामने उसका माशूक ही हरदम फिरता रहता है । वह अपने माशूक को प्राप्त करनेके लिये नाना प्रकारके उपाय करता है । यदि मनोकामना पूरी नहीं होती, तो वह कुपित होता है । क्रोधसे उसकी रहीं-सही बुद्धि भी मारी जाती है । बुद्धि के नष्ट होनेसे मनुष्य बिना पतवार की नावकी तरह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । अनेकों नौजवान इस प्रेम या इक्षु की बीमारीमें गिरफ्तार होकर जानसे मारे गये । अनेकोंके घर तबाह हो गये और अनेकों करोड़पति स्नाकपति हो गये । स्पष्ट है कि, अनुराग या मुहब्बत हज़ारों आफतोंकी जड़ है । अनुरागी इस जन्ममें खीका गुलाम होकर रहता है । वह कठपुतलीकी तरह उसे जो नाच नचाती है, वह वही नाच नाचता है । परमात्माको कभी भूल कर भी याद नहीं करता । मौतका खयाल न रहनेसे, नाना प्रकारके अत्याचार और जुल्म करता है । लेकिन यह अनुराग जवानीमें ही होता है ; इसीलिये कविने जवानीकी निन्दा की है । इसमें शक नहीं कि, जवानी अनेक प्रकारके अनर्थोंकी जड़ है ।

कहा है :—

यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकता । एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ? ॥

( २३२ )

जवानी, धनसम्पत्ति, प्रभुता और अज्ञानता,—इनमें से प्रत्येक अनर्थकारी है। जहाँ ये चारों एकत्र हों, वहाँकी तो बात ही न पृच्छिये।

क्षप्य ।

इन्द्रिन को हित-धाम, कामको मित्र महावर।

नरक-दुःखको हेतु, मोहको बीज मनोहर।

ज्ञान-सुधाकर-सीस, सजल सावनको बादर।

नाना विधि बक्वाद करन कों, बड़ो बहादुर।

सब ही अधको है मूल्य, यह यौवन अङ्गतहि को कवच ।

या विना और को कर सके, सुन्दर सुख पर श्याम कव ? ॥७०॥

सार—जवानी अनर्थोंकी जड़ है। अतः जवानीमें मनुष्यको खूब सावधानीसे चलना चाहिये।

70. In this world there is nothing more harmful than young age, which is the seat of affection, the root cause of the miseries of a hundred hells, the very seed for the growth of delusion, the clouds as it were for covering the moon of reasoning, the only friend of Kamdev, the doer of many kinds of vices and the destroyer of its own self.

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गुंगारदुमनीरदे प्रचुरतः कीडारसखोतसि

प्रभुस्रपियवान्वये चतुरतासुत्ताफलोदनन्ति ॥