शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( २२२ )
फिर कोरा चला जाता है। तात्पर्य यह कि, कामिनियोंके कारण से मनुष्य इस संसार-सागरसे पार नहीं हो सकता। उसके इस काममें वे बाधा डालती हैं। सब है, संसारमें यदि कामिनी और काञ्चन न होते, तो फिर किसीको भी इस भव-सागरके पार करनेमें कठिनाई न होती। रसिक कवि ने पू्व कहा है—
दोहा ।
जो होती नहिं नार, मदभाती मृगलोचनी । जगकेपरलीपार, गमन न दुर्लभ कहुक था ॥
सोरठा ।
जो नहिं होती नार, तो तरिबौ जगमें सुगम । यह लींबी तरवार, मार लेत अथबीचही ॥
सार--संसार-सागरसे पार होनेमें, नेत्रोंसे जादू करनेवाली सुन्दरी स्त्रियाँ ही बाधा- स्वरूप हैं ।
68. O world, it would not have been very difficult to cross you if there were not this great obstacle in the form of woman having beautiful eyes.
—*
( २२३ )
यौवन-प्रशंसा ।
राजस्तुष्णांबुराशेन हि जगति गतः कश्चिदेवावसानं को वाऽर्थोऽर्थैः प्रभूतैः स्ववपुषि गलिते यौवने सादुरागे ॥ गच्छामः सद्म यावद्विकसितनयनेन्दीवरालोकिनीनामा- कम्याकम्य रूपं भटिति न जरया लुप्यते प्रेयसीनाम् ॥१६॥
हे महाराज ! इस तृष्णा-रूपी समुद्रके पार कोई न जा सका । अतीव प्यारी यौवनावस्थाके चले जाने पर, अधिक धन-सञ्चयसे क्या लाभ होगा ! हम शीघ्र ही अपने घर क्यों न चले जायें , क्योंकि, कहीं ऐसा न हो कि, विकसित कुमुद और कमलके समान नेत्रोंवाली हमारी प्यारियोंके रूपको वृद्धावस्था घुला-घुलाकर विगाड़ डाले ॥१६॥
खुलासा—राजन् ! तृष्णा-पिशाचिनीका अन्त नहीं । यह दिन-दिन बढ़ती ही जाती है । हज़ार होने पर लाख की, लाख होने पर करोड़ की और करोड़ होने पर अरब-खरब की अथवा साम्राज्यकी इच्छा होती है । मनुष्य बूढ़ा हो जाता है, उसके बाल पक जाते हैं, दाँत गिर जाते हैं ; पर तृष्णा न बूढ़ी होती है और न उसका कोई अङ्ग क्षीण होता है । वह तो बढ़ती ही जाती है । किसी ने कहा है :—
( २२४ )
निःस्वः वष्टि शतं शती दशशतं लक्षं सहस्राधिपो, लक्षेशः क्षितिपालतां क्षितिपतिश्चक्रेशतां वाञ्छति । चक्रेशः पुनरिन्द्रतां सुरपतिर्ब्राह्मणं वाञ्छति, ब्रह्मा शिवपदं शिवो हरिपदं आशावर्धि को गतः ? ॥
निर्धन सौ रुपये चाहता है, सौ वाला दश हजार चाहता है, और हजारपति लाख रुपये चाहता है, लखपति राजा होना चाहता है, राजा सम्राट् होना चाहता है, सम्राट् इन्द्र होना चाहता है, इन्द्र ब्रह्मा होना चाहता है, ब्रह्मा शिव होना और शिवजी विष्णु होना चाहते हैं। किस की आकांक्षा का शेष हुआ है ? मतलब यह, आज तक कोई भी इस तृष्णा-नदी के पार न जा सका। क्या हम इस के पार पहुँच सकते हैं ? हरगिज नहीं। तब हम क्यों इस पिशाचिनीके फेर में पड़कर, अपनी जवानी को बर्बाद करें ; क्योंकि जवानी एक बार जाकर फिर नहीं आती ? महा- कवि दाग ने कहा है :—
रहती है कब वहारे जवानी, तमाम उम्र । मानिन्द वृये गुल, इधर आई उधर गई ॥ जो जाकर न आये, वह जवानी देखी । जो आकर न जाये, वह बुढ़ापा देखा ॥
जवानी की बहार सारी उम्र कहाँ रहती है ? वह तो फूलोंकी खुराबू की तरह इधर आती है और उधर चली जाती है।
( २२५ )
जवानी तो जाकर फिर नहीं आती और बुढ़ापा आकर फिर नहीं जाता ।
और भी किसी हिन्दी-कवि ने कहा है—
सदा न फूले तोरई, सदा न सावन होय ।
सदा न जीवन थिर रहे, सदा न जीवे कोय ॥
अगर तृष्णा के फेर में पड़े रहनेसे, इधर हमारी जवानी चली गई और उधर हमारी प्राणप्यारी की जवानी चली गई ; तो हमारे धन जमा करनेसे क्या लाभ होगा ? हमने अपनी आज्ञादी इसी लिये खोई है कि, हम धन कमाकर, घरमें जा, अपनी नवयुवती का यौवन-सुख भोगें ; पर हमारे एक इसी धुनमें लगे रहने से सब चौपट हो जायगा । इसलिये हमें शीघ्र ही घर जाना चाहिये और जवानी के, प्रातःकालीन दीपक के समान, निस्तेज होने से पहले, अपनी प्राणवल्लभाकी उठती जवानीका आनन्द उपभोग करना चाहिये । क्योंकि यदि हम प्रवासमें रहें और प्यारी हमारे पास न रहे—हम से दूर रहे ; तो हमारा धन और हमारी जवानी दोनों ही वृथा हैं । ऐसी जवानी और ऐसी दौलतसे कोई लाभ नहीं । किसी ने कहा है :—
वितेन किं ? वितरणं यदि नास्ति दीने,
किं सेवया ? यदि परोपकृतौ न यत्नः ।
किं संगमेन ? तनयो यदि नेच्छाधीयः,
किं यौवनेन ? विरहो यदि वल्लभायाः ॥
१५
( २२६ )
अगर ग़रीब और मुहताज़ों को धन न दिया जाय, तो धन के होनेसे क्या लाभ ? वह धन निष्फल है । यदि पराया उपकार न किया जाय, तो सेवा निष्फल है । जिस स्त्री-संगम से पुत्र न पैदा हो, वह स्त्री-संगम वृथा है । यदि प्यारो के साथ जुदाई हो, तो जवानी वृथा है । ऐसी जवानी से क्या फ़ायदा ? सारांश यह है, कि जब स्त्री-पुरुष दोनों ही जवान हों, तभी काम-श्रीङ्गाका आनन्द है । बुढ़ापेमें क्या रक्खा है ? स्त्री-भोगका आनन्द जवानीमें ही है ; क्योंकि जवानीमें ही बदनमें ताकत रहती है और जवानीमें ही कामदेवका जोश रहता है । अगर स्त्रीका यौवन उतार पर आजाय, उसके स्तन सिङ्गुड़ जायँ वा धैलेसे लट्कने लगेँ, तब क्या आनन्द है ? उस समय स्त्री उल्टी बुरी लगती है । जो मज़ा है, वह नवीना नारीमें ही है । कहा हैः—
नववस्त्रं नवच्छत्रं नव्या स्त्री नूतनं गृहम् ।
सर्वत्र नूतनं शस्तं सेवकाभिः पुरातनं ॥
सब देशोंमें नया कपड़ा, नया छाता, नयी स्त्री और नया घर—ये अच्छे समझे जाते हैं । केवल नौकर और अन्न ये पुराने अच्छे समझे जाते हैं । कहा हैः—
शशी दिवसधूसरो गलितयौवना कामिनी, सरो विगतवारिजं मुखमनहारं स्वाकृतेः ।
( २२७ )
प्रसुर्वनपरायणः सततदुर्गतः सज्जनो ।
रुपाङ्गगगगतःखलो मनसि सप्तशल्यानि मे ॥
दिनका मलिन चन्द्रमा, क्षीणयौवन कामिनी, बिना कमलों का तालाब, सुन्दर सुरतवाला निरक्षर—पूर्व, धनका लोभी स्वामी, दरिद्री सज्जन और राजसभामें दुष्ट—ये सात मेरे हृदयमें कटि की तरह खटकते हैं ।
सारंश यह है कि, सब काम अपने-अपने समय पर अच्छे लगते और अपना फल देते हैं। खेती सूख जाने पर बरसनेसे क्या लाभ ? समय पर चूरू कर, पीछे पछतानेसे क्या फायदा ? पानी आ जानेपर मेंड बाँधनेसे क्या प्रयोजन ? आग लग जाने पर, कुआँ खोदनेसे क्या मतलब ? नदी आजाने पर बन्धा बाँधने और बुढ़ापा आजाने पर शादी करनेसे क्या लाभ ? नीतिमें लिखा है :—
( १ )
निर्वाण दीपे किमु तैलदानं
चौरंगते वा किमु सावधानम् ।
वयोगते किं वनिता-विलासः
पयोगते किं खलु सेतुबन्धः ॥
( २ )
शीतेऽतीते वसनमशनं बासरान्ते निशान्ते
जीडारम्भः कुवल्यदृशां यौवनान्ते विवाहः ॥
( २२८ )
सेतोर्वन्धः पयसि गलिते प्रस्थिते लघ्वचिन्ता सर्वञ्चैतद्भवति विफलं स्वस्वकाले व्यतीते ॥
दीपक बुभ्रु जाने पर तेल डालनेसे क्या ? चोरके माल ले जाने पर सावधानीसे क्या ? जवानी चली जानेपर बनिता-बिहार से क्या ? जलके चले जाने पर पुल बाँधनेसे क्या ? ॥१॥
जाड़ा चला जाने पर कपड़े पहननेसे क्या ? सर्फ हो जाने पर भोजन करनेसे क्या ? रात बीत जाने पर नीलकमलोंके समान नेत्रोंवाली स्त्रियोंके साथ प्रसङ्ग करनेसे क्या ? जवानी चली जाने पर विवाह करनेसे क्या ? जलके चले जानेपर पुल बाँधनेसे क्या ? प्रस्थान कर देने पर, लघ्व-चिन्तासे क्या ? अर्थात् ये सब अपना-अपना समय बीतने पर निष्फल हैं ॥२॥
बुढ़ापमें चौदह-चौदह और सोलह-सोलह बरसकी उठती जवानीकी कामिनियोंके साथ जो ना-समभ बूढ़े 'खुरांट' विवाह करते हैं ; वे इस श्लोकसे शिक्षा ग्रहण करें । क्या सिरसका फूल हीरोंमें छेद कर सकता है ? ऐसे अशर्मियोंकी इस लोकमें बदनामी होती और परलोकमें उन्हें भयंकर दण्ड मिलता है ! इन की खिरियाँ इनके लात मार कर, या तो कहाँ और रसोईयोंसे आशनाई करतीं अथवा साईस और कोचवानोंके साथ भाग जाती हैं । हाँ, कोई-कोई कलियुगी पतिव्रता, अपने बूढ़े-बालम को, बिना ज़रासा भी कष्ट दिये, संत-मेंतमें पुत्रव्रत देकर, उसके कुलका नाम चला देती अथवा वंशको डूबनेसे बचा लेती है ।
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श्रृङ्गारशतक
दुस्कारे पोर मुख पर जो तिल शोभायमान है, उसे मैं अणाम करता हूँ ; क्योंकि मुझे ऐसा जान पड़ता है, मानो चन्द्रमाको विद्यकर शालग्राम सो रहे हों । पृष्ठ २३९
( २२६ )
धिकार है ! ऐसे विवाह और ऐसी औलादको ? ऐसी वर्णसंकर सन्तानसे वंशका नाम लेप हो जाना कहीं भला ।
कुरडलिया ।
नरवर ! तुष्णासिन्धुके, पार न कोई जाय ।
कहा अर्थ संचय किये, कालसर्प वय खाय ?।
कालसर्प वय खाय, नेह श्रुत श्रेम नसावै ।
कहा होय घर गये, तबै कछु हाथ न आवै ?।
तासों तबलों वेग, भाग चलिये द्वारे घर ।
कमलनयन तिय रूप, जरा जबलों नहि नरवर ॥६६॥
सार—कमलनयनी कामिनियोंके भोगने का समय युवावस्था ही है । जो पुरुष धन-तृष्णामे फँस, अपनी और अपनी पत्नी की जवानीका सुख नहीं भोगते, वे बड़े ही मूर्ख हैं । धन भी तो सुख-भोगोंके लिये ही कमाया जाता है ; जब सुख-भोग न भोगे, तब धन कमाना वृथा ही हुआ ।
69. O Sovereign, no one has been able to cross this ocean of desires ; and when this my young age full of affection is lost in itself, then what is the use of earning much wealth. I should there-
( २३० )
fore go home before old age takes away the beauty of my beloved lady whose eyes are like blossomed lotuses,
—❧—
रागस्यागारभेकं नरकशतमहादुःखसंप्राप्तिहेतु- मोहस्योत्पत्तिवीजं जलथरपटलं ज्ञानताराधिपस्य ॥ कन्दर्पस्यैकमित्रं प्रकटितविविधस्पष्टदोषप्रबन्धं लोकैऽस्मिन्बन्धनर्थनिजकुलदहनयौवनादन्यदस्ति ॥७०॥
अनुरागके घर, नरकके नाना प्रकारके दुःखोंके हेतु, मोहकी उत्पत्तिके बीज, ज्ञानरूपी चन्द्रमाके टकनेको मेघ-समूह, कामदेवके मुख्य मित्र, नाना दोषोंको स्पष्ट प्रकटानेवाले और अपने कुलको दहन करनेवाले—यौवनेके सिवा, इस लोकमें, दूसरा कोई अनर्थ नहीं है ॥७०॥
खुलासा—सारी आफूतोंका मूल—अनुराग, यौवनावस्थामें ही होता है। इस अवस्थामें ही मनुष्यको प्रेम या इश्वरकी बीमारी लगती है। उस्ताद जौक कहते हैं :—
इश्वरका जोश है जब तक, कि जवानीके हैं दिन । यह मर्ज करता है शिहत, इन्हीं अश्याय में खास ॥
प्रेमरूप व्याधिके उभरनेका खटका जवानीमें ही रहता है। ये दिन ही इस बीमारीके लिये खास हैं।
( २३१ )
जब मनुष्य पर इक्षुका भूत सवार हो जाता है ; तब वह, झानी और पण्डित होने पर भी, अज्ञानी और मूर्ख हो जाता है ; उसे बुरे-भलेका विचार नहीं रहता । उसकी आँखोंके सामने उसका माशूक ही हरदम फिरता रहता है । वह अपने माशूक को प्राप्त करनेके लिये नाना प्रकारके उपाय करता है । यदि मनोकामना पूरी नहीं होती, तो वह कुपित होता है । क्रोधसे उसकी रहीं-सही बुद्धि भी मारी जाती है । बुद्धि के नष्ट होनेसे मनुष्य बिना पतवार की नावकी तरह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । अनेकों नौजवान इस प्रेम या इक्षु की बीमारीमें गिरफ्तार होकर जानसे मारे गये । अनेकोंके घर तबाह हो गये और अनेकों करोड़पति स्नाकपति हो गये । स्पष्ट है कि, अनुराग या मुहब्बत हज़ारों आफतोंकी जड़ है । अनुरागी इस जन्ममें खीका गुलाम होकर रहता है । वह कठपुतलीकी तरह उसे जो नाच नचाती है, वह वही नाच नाचता है । परमात्माको कभी भूल कर भी याद नहीं करता । मौतका खयाल न रहनेसे, नाना प्रकारके अत्याचार और जुल्म करता है । लेकिन यह अनुराग जवानीमें ही होता है ; इसीलिये कविने जवानीकी निन्दा की है । इसमें शक नहीं कि, जवानी अनेक प्रकारके अनर्थोंकी जड़ है ।
कहा है :—
यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकता । एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ? ॥
( २३२ )
जवानी, धनसम्पत्ति, प्रभुता और अज्ञानता,—इनमें से प्रत्येक अनर्थकारी है। जहाँ ये चारों एकत्र हों, वहाँकी तो बात ही न पृच्छिये।
क्षप्य ।
इन्द्रिन को हित-धाम, कामको मित्र महावर।
नरक-दुःखको हेतु, मोहको बीज मनोहर।
ज्ञान-सुधाकर-सीस, सजल सावनको बादर।
नाना विधि बक्वाद करन कों, बड़ो बहादुर।
सब ही अधको है मूल्य, यह यौवन अङ्गतहि को कवच ।
या विना और को कर सके, सुन्दर सुख पर श्याम कव ? ॥७०॥
सार—जवानी अनर्थोंकी जड़ है। अतः जवानीमें मनुष्यको खूब सावधानीसे चलना चाहिये।
70. In this world there is nothing more harmful than young age, which is the seat of affection, the root cause of the miseries of a hundred hells, the very seed for the growth of delusion, the clouds as it were for covering the moon of reasoning, the only friend of Kamdev, the doer of many kinds of vices and the destroyer of its own self.
—*—
गुंगारदुमनीरदे प्रचुरतः कीडारसखोतसि
प्रभुस्रपियवान्वये चतुरतासुत्ताफलोदनन्ति ॥
( २३३ )
तन्वीनेनचकोरपावैणविधौ सौभाग्यलक्ष्मीनिधौ
धन्यःकोऽपि न विक्रियां कलयति प्राप्ते नवे यौवने ॥७१॥
शृंगार रूपी वृद्धोंके सौचनेवाले, क्रीड़ासको विस्तारसे प्रवाहित करनेवाले, कामदेवके प्यारे मित्र, चातुर्थ्यरूपी मोतियोंके समुद्र, कामिनियोंके नेत्ररूपी चकोरोंको पूर्णचन्द्र, सौभाग्य-लक्ष्मीके खजाने—यौवनको पाकर, जो विकारोंके वशीभूत नहीं होते, वे निश्चय ही भाग्यवान् हैं ॥७१॥
खुलासा—यौवन विषयवासनाओंको बढ़ाने वाला और भोग-चिलासका ज्वर्दस्त स्रोता है। यह स्त्रियोंको प्यारा लगनेवाला तथा चतुराई और सुख-सम्पत्तियोंकी खान है। जवानोंमें, मनुष्य की भोगचिलास की इच्छाएँ बहुत ही तेज हो जाती हैं ; इसलिए ये बड़ा ही नाज़ुक समय है। इस अवस्थामें, जो पुरुष अपनी इन्द्रियोंको वशमें रख सकता है, उन्हें कुमार्गमें जानेसे रोक सकता है, वह सबमुच ही भाग्यवान् है। धातुओंके क्षीण होने पर, बुढ़ापा आने पर, तो सभी शान्त हो जाते हैं ; पर इस जवानी दीवानोंमें ही जो शान्त रहे, स्त्रियोंके जालमें न फँसे, वही प्रशंसा-योग्य है। भीष्म पितामहने अपनी सारी उम्र बिना स्त्रीके ही बिता दी ; जीवन-भर ब्रह्मवर्ष-व्रत पालन किया। यदि वे चाहते तो अनेक स्वर्गकी अप्सरायें उनके चरणोंको धो-धोकर पीतीं। पर यदि वे ऐसा करते, तो महाशक्तिशालियोंमें उनकी गणना न होती और संसार उन्हें धर्मधुरीण शूरशिरसोमणि न कहता।

( १४ ) बुढ़ापा आने पर सुन्दरी कामिनी की भी दुर्दशा हो जाती है ।
( २३५ )
दृष्ट्वा मायति मोदतेऽभिरमते प्रस्तौति जाननपि प्रत्यज्ञाशुचिपुत्तिकां स्त्रियमहो मोहस्य दुश्चेष्टितम् ॥७२॥
अहो ! मोहकी कैसी विचित्र महिमा है कि, बड़े-बड़े विद्वान् पण्डित भी, प्रत्यज्ञा ही अपवित्रताकी पुतली—लौको देखकर मोहित हो जाते हैं , उसकी स्तुति करते हैं, आनन्दित होते हैं, रमण करते हैं और उत्कण्ठित होकर हे कमलनयनी ! हे विशाल नितम्बोवाली ! हे विशालाक्षी ! हे कल्याणि ! हे शुभे ! हे पुष्टपोधरवाली ! हे सुन्दर भौहोवाली प्रभृति नाना प्रकारके सम्बोधनोसे उसे सम्बोधित करते हैं ॥७२॥
खुलासा—खी हर तरहसे अपवित्र और गन्दगी का पिटाशा है । उसके स्तन मांसके लौदे हैं, उसका मुँह कफका आगार है, उसकी जाँघें मूत्रसे अपवित्र रहती हैं और उसके मल-मूत्र त्यागने के स्थानों में दो-अंगुलका भी अन्तर नहीं—ऐसी स्त्रीकी, साधारण नहीं, बड़े-बड़े विद्वान् और पण्डित खुशामद करते हैं, उसे अच्छे-से-अच्छे नामोंसे सम्बोधन करते हैं, यह क्या मोहकी महिमा नहीं है ? मोह उनकी विद्या-बुद्धि और ज्ञानको नष्ट कर देता है, इसीसे वे अपवित्रता की पुतलीको संसारके सभी पदार्थों से अधिक चाहते और प्यार करते हैं । निश्चय ही, मोहने जगत् को अन्ध कर रक्खा है । देखिये, विद्वानोंने स्त्रियोंकी कैसी तारीफें की हैं :—
( २३६ )
स्त्रियोंकी तारीफोंके नमूने ।
—○○—
संस्कृत कवियोंकी उक्तियाँ ।
सुविरलमौक्तिकतारे धवलशुक्लचन्द्रिकाचमत्कारे ।
वदनपरिपूर्णाचन्द्रे सुन्दरि राकाऽसिनात्र सन्देहः ॥
हे सुन्दरि ! तेरे हारके मोती तारोंकी तरह खिल रहे हैं । तेरे सफेद वस्त्र चाँदनीका चमत्कार दिखा रहे हैं और तेरा मुख पूर्णमासीके चन्द्रमाकी तरह शोभायमान है ; अतः तू निश्चय ही पौर्णिमा है ।
श्यामलेनांकितं बाले भाले केनापि लक्ष्मणा ।
मुण्वं तवांतरासुसमृद्धाऽकुलंखुजायते ॥ १ ॥
हे बाले ! तेरी पेशानी या मस्तक में जो एक काला-काला चिह्ना है, उससे तेरा चेहरा ऐसा मालूम होता है, गोया खिले हुए कमलके बीचमें भौरा सो रहा हो ।
स्मयमाननानां तत्र तां विलोक्य विलासिनीम् ।
चकोराश्चंचरीकाश्च मुदे परतरां ययुः ॥ २ ॥
उस मन्द-मन्द मुस्करानेवाली नायिका को देखकर चक्रों और भौरोंको खूब आनन्द आया ; यानी चकोर उसे चन्द्रमा समझ कर खुश हुए और भौरै कमल समझ कर ।
( २३७ )
दिवानिशं वारिणि कण्ठद्वन्ने दिवाकराराधनामार्चन्ती ।
वद्गोजतायै किमु पद्मलाह्यास्तपश्चरत्यंबुजपंक्तिरप्रा ॥ ३ ॥
जलमें कण्ठ तक रहकर, दिन रात सूर्यकी आराधना करने वाली, यह कमलोंकी कृत्तार क्या सुनयनी नायिकाके कुछ बननेके लिये तप कर रही है ?
आननं भृगशावाह्या वीक्ष्य लोलालकाहृतम् ।
भ्रमद्भ्रमरसम्भारं स्मरामि सरोरुहम् ॥ ४ ॥
हिरनके बच्चेकी सी आँखोंवाली सुन्दरीके मुँहको चञ्चल अलकोंसे ढका हुआ देखनेसे मुझे ऐसा मालूम होता है, गोया कमलके ऊपर भौरोंका झुण्ड घूम रहा है ।
जगदन्तरमभुतभयैर्यशुभिराप्रयन्त्रितराम् ।
उदयति वदनव्याजात् किमु राजा हरिणशावनयनायाः ॥५॥
भृगशावकनयनीके चेहरेके बहानेसे संसार को अपनी अमृत-मय किरणोंसे भर देनेके लिये, क्या चन्द्रमा उदय हुआ है ?
तिमिरं शारदं चन्द्रिं चन्द्रिकाः कमलविटुम चम्पककोरकाः ।
यदि मिलकति तदापि तदाननं खलु तदा कलया तुल्यामहे ॥६॥
घोर अन्धकार, शरदका चन्द्रमा, चाँदनी, कमल, मूँगगा और चम्पाकली,— ये सब अगर किसी समय एकही पदार्थमें इकट्ठे पाये जायें, तो मैं उस नायिकाके चेहरेके एक अंशकी तुलना कर सकूँ ; यानी घोर अन्धकारसे उसके काले-स्याह बालोंकी, शरद
( २३८ )
के चाँदसे उसके मुखकी, चाँदनीसे ठावण्यकी, कमलसे नेत्रोंकी, प्रवालसे होठोंकी और चम्पाकी कलियोंसे दाँतोंकी तुलना करू ।
उर्दू कवियोंकी मनोहर उक्तियाँ ।
कोई खियोंके दाँतोंकी तारीफ़ करता है, तो कोई उसके होठोंकी प्रशंसामें कविता रचता है, और कोई उसके गालके तिल पर ही अपनी शायरीका खातमा करता है । उर्दू-कवियोंकी तारीफ़ोंके नमूने भी देखिये :—
दाँत तूँ चमके हँसीमें रात उस माहपारिके ।
मैंने जाना, माहतावों पारा-पारा हो गया ॥१॥
अरुणके कतरे, नहीं देखते हैं उस खूब पर ।
सितारे धूपमें, हम देापहरको देखते हैं ॥२॥
बहरमें मोती पानी पानी, लाल का तूँ पत्थर में ।
देखो, लबो दन्दोंसे, तुम्हारे लालो गुहरेके मगड़े हैं ॥३॥
न क्यों तेरे दाँतोंसे, फूँटा हो जाती ।
कि दावा किया था, सफ़ाईका फूटा ॥४॥
वह चन्द्रमुखी रातको जो हँसी, तो उसकी दाँतों की क़तर की चमकसे मुके ऐसा मालूम हुआ ; गोया चन्द्रमाके टुकड़े-टुकड़े हो गये ॥१॥
माहतावों=चाँद । माहपारा=चन्द्रबदनी । पारा पारा हो गया=टुकड़े-टुकड़े हो गया । अरुण=ब्राह्म । खूब=गाल । क़तरा=बूँद । बहर=अमुद । खब=होठ ।
( २३६ )
उसके गाल पर पसीनेकी बूँदें नहीं हैं, वे तो द्रोणहरके समय धूपमें तारे दिखाई दे रहे हैं ॥२॥
तेरे दाँतों की आभाको देखकर, समन्दरमें मोती शर्मके मारे पानी-पानी हो रहा है और तेरे ओठों की सुखीको देखकर लाल-का दिल पहाड़ की गुफामें स्पन्दकिके मारे खून हो गया है । देख तो सही, तेरे दाँत और होठोंके कारण, मोती और लालों की कौसी बुरी दशा हो रही है ॥३॥
मोतीने तेरे दाँतोंसे सफाईमें बढ जानेका दावा किया था ; मगर वह तेरे दाँतोंके मुकाबलेमें झूठा निकला ॥४॥
एक हिन्दी कवि की भी फाब्यकला-कुशलताका नमूना देखिये :—
गोरे मुख पर तिल लसत, ताहि करूँ प्रणाम ।
मानो चन्द्र विद्याय कर, पौड़े शालग्राम ॥
गोरे मुँह पर जो तिल शोभायमान है, उसमें प्रणाम करता हूँ ; क्योंकि मुझे ऐसा जान पड़ता है, मानो चन्द्रमाको बिछाकर शालग्राम सो रहे हों ।
मिथ्या नज़ीर अकबराबादीकी तारीफ़ोंके भी चन्द्र नमूने देखिये :—
छोटासा खाल, उस खूब खुशोद ताब में ।
ज़रा समा गया है, दिले भापताबमें ॥