भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
१०१८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नरकोंकी आगमें तपाओ और इन्हें पापोंसे शुद्ध करो।' तब वे दूत शीघ्र उठकर उन राजाओंके पाँव पकड़ लेते हैं और वेगपूर्वक घुमाते हुए उन्हें खूब तपी हुई भूमिपर फेंक देते हैं और लोहेके वृक्षोंपर भी पटक देते हैं। उन प्रहारोंसे जर्जर होकर वे राजा अचेत और निश्चेष्ट हो जाते हैं। फिर वायुका स्पर्श होनेपर वे धीरे-धीरे सचेत होते हैं। तब उन्हें पापसे शुद्ध करनेके लिये यमदूत नरकके समुद्रमें डाल देते हैं। नरकोंकी अट्ठाईस श्रेणियाँ हैं, जो सातवें पातालके अन्तमें घोर अन्धकारके भीतर स्थित हैं। (१) अतिघोरा, (२) रौद्रा, (३) घोरतमा, (४) अत्यन्त दुःखजननी, (५) घोररूपा, (६) तरणतारा, (७) भयानका, (८) कालरात्रि, (९) घटोत्कटा, (१०) चण्डा, (११) महाचण्डा, (१२) चण्डकोलाहला, (१३) प्रचण्डा, (१४) वराग्निका, (१५) जघन्या, (१६) अवरालोमा, (१७) भीषणी, (१८) नायिका, (१९) कराला, (२०) विकराला, (२१) वज्रविंशति, (२२) अस्ता, (२३) पंचकोणा, (२४) सुदीर्घा, (२५) परिवर्तुला, (२६) सप्तभौमा, (२७) अष्टभौमा और (२८) दीर्घमाया—ये ही नरकोंकी अट्ठाईस कोटियाँ हैं। इन सबके क्रमशः पाँच-पाँच नायक होते हैं। इनमें पहला रौरव है, क्योंकि उसमें पड़े हुए प्राणी रोते रहते हैं। दूसरा महारौरव है, जिसकी दुःसह पीड़ाओंसे महान् साहसी भी रो देते हैं। तीसरा तम, चौथा शीत और पाँचवाँ उष्ण है—इस प्रकार पहली कोटिके ये पाँच नायक माने गये हैं। दूसरी कोटिके १ अघोर, २ तीक्ष्ण, ३ पद्म, ४ संजीवन और ५ शठ—ये पाँच नायक हैं। तीसरी कोटिके नायक हैं—१ महामाय, २ विलोम, ३ कण्टक, ४ कटक और ५ तीव्र। चौथी कोटिके नायक १ वाम, २ कराल, ३ किंकरल, ४ प्रकम्पन और ५ महाचक्र हैं। पाँचवी कोटिके नायक १ सुपद्म, २ कालसूत्र, ३ प्रगर्जन, ४ सूचीमुख और ५ सुनेमि हैं। छठी कोटिके नायक १ खादक, २ सुप्रपीडित, ३ कुम्भीपाक, ४ सुपाक और ५ क्रकच हैं। सातवीं कोटिके नायक १ सुदारुण, २ अंगाररात्रि, ३ पचन, ४ असृक्पूयभव तथा ५ सुतीक्ष्ण हैं। आठवीं कोटिके १ शुण्ड, २ शकुनि, ३ महासंवर्तक, ४ ऋतु और ५ तप्तजन्तु—ये पाँच नायक हैं। नवीं कोटिके नायक १ पंकलेप, २ पूतिमान्, ३ हृद, ४ त्रपु और ५ उच्छ्वास हैं। दसवीं कोटिके नायक १ निरुच्छ्वास, २ सुदीर्घ, ३ क्रूर, ४ शाल्मलि और ५ उष्ट्रित हैं। ग्यारहवीं कोटिके नायक १ महानाद, २ प्रवाह, ३ सुप्रवाहन, ४ वृषाश्रय तथा ५ वृषश्व हैं। बारहवीं कोटिके १ सिंहानन, २ व्याघ्रानन, ३ गजानन, ४ श्वानन और ५ सूकरानन—ये पाँच नायक हैं। तेरहवीं कोटिके नायक १ अजानन, २ महिषानन, ३ मेषानन, ४ मूषकानन तथा ५ खरानन हैं। चौदहवीं कोटिके १ ग्राहानन, २ कुम्भीरानन, ३ नक्रानन, ४ महाघोर और ५ भयानक—ये पाँच नायक हैं। पंद्रहवीं कोटिके नायक १ सर्वभक्ष, २ स्वभक्ष, ३ सर्वकर्मा, ४ अश्व तथा ५ वायस हैं। सोलहवीं कोटिके नायक १ गृध्रोलूक, २ उलूक, ३ शार्दूल, ४ कपि और ५ कच्छुर हैं। सत्रहवीं कोटिके १ गण्डक, २ पूतिवक्त्र्य, ३ रक्तास्य, ४ पूतिमूत्रिक और ५ कणधूम्र—ये पाँच नायक हैं। अठारहवीं कोटिके नायक १ तुषाराग्नि, २ कृत्रिमान्, ३ निरय, ४ आतोद्य और ५ प्रतोद्य हैं। उन्नीसवीं कोटिके नायक १ रुधिरोध, २ भोजन, ३ कालात्मग, ४ अनुभक्ष और ५ सर्वभक्षक हैं। बीसवीं कोटिके १ सुदारुण, २ कर्कट, ३ विशाल, ४ विकट और ५ कटपूतन—ये पाँच नायक हैं। इक्कीसवीं कोटिके नायक १ अम्बरीष, २ कटाह, ३ कष्टदायिनी वैतरणी, ४ सुतप्त तथा ५ लोहशंकु हैं। बाईसवीं कोटिके नायक १ एकपाद, २ अश्रुपूरण, ३ घोर असिपत्रवन, ४ प्रतिष्ठित अस्थिलिंग और ५ तिलयन्त्र हैं। तेईसवीं कोटिके १ अतसीयन्त्र, २ इक्षुयन्त्र, ३ कूट, ४ पाप तथा ५ प्रमर्दन—ये पाँच नायक हैं। चौबीसवीं कोटिके नायक १ महाचुल्ली, २ विचुल्ली, ३ तप्त लोहमयी शिला, ४ क्षुरधार

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०१९

पर्वत तथा ५ मय हैं। पचीसवीं कोटिके नायक १ यमल पर्वत, २ सूचीकूप, ३ विष्ठाकूप, ४ अन्धकूप और ५ पतन हैं। छब्बीसवीं कोटिके १ पातन, २ मुसली, ३ वृषली, ४ अशिवा तथा ५ संकटला—ये पाँच नायक हैं। सत्ताईसवीं कोटिके नायक १ तालपत्र वन, २ असिगहन, ३ महामोहक, ४ सम्मोहन तथा ५ अस्थिभंग हैं। अट्ठाईसवीं कोटिके नायक १ तप्ताचलमय, २ अगुण, ३ बहुदुःख, ४ महादुःख तथा ५ कश्मल हैं। इनके सीवा यमल, हालाहल, विरूप, श्वरूप, च्युतमानस, एकपाद, त्रिपाद और तीव्र आदि नरक हैं। इस प्रकार यहाँ नरकोंके अट्ठाईस पंचक बताये गये हैं।


पापियोंकी नरक-यातनाका वर्णन

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! मनुष्य अपने कर्मोंके अनुसार क्रमशः एक-एक नरकका उपभोग करते हैं। अपनी कुत्सित कामनाओंके कारण जो कुकर्मोंका संग्रह किया गया है, उसीके फलस्वरूप तपायी हुई लोहेकी साँकलसे बाँधकर अँधेरेमें बड़े-बड़े वृक्षोंकी शाखाओंमें पापी मनुष्य लटका दिये जाते हैं। फिर यमदूत उन सबको बड़े जोर-जोरसे झुलाते हैं। वेगपूर्वक झुलाये हुए वे सभी पापी अचेत हो जाते हैं। फिर आकाशमें लटकते हुए उनके पैरोंमें सौ भार लोहा बाँध देते हैं। उस महान् भारसे वे सब लोग अत्यन्त सन्तप्त होते हैं और अपने-अपने कर्मोंका स्मरण करते हुए निश्चल भावसे मौन रह जाते हैं। तत्पश्चात् क्रमशः आगमें तपाकर खूब लाल किये हुए लोहेके कँटीले दण्डोंसे यमदूत उनके मस्तकपर मारते हैं। इसके बाद उन्हें विष्ठा और कीटोंसे भरे हुए कुएँमें डाल देते हैं। घोर यमदूत सब ओरसे घेरकर पापियोंको आगमें पकाते हैं। उसके बाद उनके शरीरपर नमकीन पानी डाल देते हैं। कितने ही पापियोंको लोहेके कड़ाहमें बैंगनकी तरह भूनते हैं, फिर गंदे कुएँमें डाल देते हैं। मेदा, रक्त और पीबसे भरी हुई बावलीमें भी पापियोंको फेंक दिया जाता है और वहाँ उन्हें कीड़े तथा कौए लोहेके समान तीखी चोंचोंसे नोच-नोचकर खाते हैं। कितने ही पापी मनुष्योंको तीखे त्रिशूलोंमें गुम्फित करके उन्हें धधकते हुए अंगारोंपर मांसकी भाँति पकाया जाता है। इसी प्रकार यमदूत पापियोंको खूब तपे हुए तेलसे भरे कड़ाहोंमें अनेक बार पकाते हैं। जो असत्य और अप्रिय बोलनेवाले हैं, उनकी छातीपर चढ़कर और पाँवसे दबाकर तपाये हुए मजबूत सँड़सेसे उनकी जीभ उखाड़ ली जाती है। दम्भपूर्ण झूठे शास्त्रसे प्रेरित होकर जो ब्राह्मण यज्ञके नामपर अधिक धनका संग्रह करता है, उसकी जिह्वा भी तीखे भालेसे छेदी जाती है। जो मूढ़ मानव माता-पिता और गुरुको फटकारते हैं, उनके मुँहमें बार-बार बालू भरकर पानीसे सींचा जाता है। तदनन्तर खारा और गरम जल भरा जाता है। फिर खौलते हुए तेलको उड़ेल दिया जाता है। यमदूत उन पापियोंके पैर पकड़कर कीड़ोंसे भरी हुई विष्ठापर घसीटते हैं। फिर सींगसे दबाकर उन्हें लोहेके शाल्मलि वृक्षमें बाँध दिया जाता है। उसके बाद वे महाबली भयानक दूत उन्हें पीछेकी ओरसे मारते हैं। अत्यन्त प्रबल दाँतीदार आरेसे मस्तककी ओरसे चीरते हैं। अपने भयानक कर्मोंके परिणामसे वे पापी जीव भूख लगनेपर अपना ही मांस खाते और प्यास लगनेपर अपना ही रक्त पीते हैं। जिन मूढ़ पुरुषोंने कभी अन्न और जलका दान नहीं किया है और न किसीके दानका अनुमोदन ही किया है, वे मुद्गरोंसे जर्जर करके ईखकी तरह पेरे जाते हैं। घोर असिताल वनमें खण्ड-खण्ड करके काटे जाते हैं। उनके सब अंगोंमें सूई चुभोयी जाती है। तत्पश्चात् उन्हें शूलीपर चढ़ा दिया जाता है। शूलीपर चढ़ाकर उन्हें बार-बार हिलाया और खींचा जाता है। फिर भी उनकी मृत्यु नहीं होती।

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उनके शरीरसे मांस नोच लिया जाता है। लोहेके मुद्गरोंसे मारकर उनकी हड्डियाँ चूर-चूर कर दी जाती हैं। बलोन्मत्त यमदूत उस दशामें भी उन्हें अनेक बार जल्दी-जल्दी घसीटते हैं और वे पापी जीव दीर्घकालतक नरकमें रहकर दारुण यातनाएँ भोगते हैं। उनका मुँह बालूसे भरा होता है, इसलिये वे स्वाँसतक नहीं ले पाते। इन सब यातनाओंके बाद अनेक प्रकारके यमदूत रौरव आदि नरकोंमें उन्हें पीड़ा देते हैं। महारौरवकी पीड़ाओंसे महान् धीर पुरुष भी रो देते हैं। मुख, लिंग, गुदा पार्श्व, पैर, छाती और मस्तकमें तपाये हुए लोहेके तीखे मुद्गरोंसे यमदूत मारते हैं। जो स्त्रियाँ पराये पतियोंका आलिंगन करती हैं और अपने पतिकी सेवामें नहीं रहतीं, ऐसी स्त्रियोंसे यमदूत कहते हैं—'अरी! अब तू क्यों जल्दीसे भागी जा रही है? स्मरण है या नहीं, तूने अपने पतिको धोखा दिया था और एक पापान्ध परपुरुषको सुखपूर्वक गलेसे लगाया था?' ऐसा कहकर वे उन्हें लोहकुम्भ नामक नरकमें फेंक देते हैं और धीरे-धीरे पकाते हैं। कभी उन्हें प्रज्वलित अग्निमें राँधते हैं, तप्तशिलाओंपर बिठाते हैं, अँधेरे कुएँमें डालते हैं और अजगर सर्पोंद्वारा डँसाते हैं। जो धर्मका उपदेश देनेवाले महात्मा आचार्यकी निन्दा करते हैं, शिवभक्त, ब्राह्मण तथा सनातन शिवधर्मपर दोषारोपण करते हैं, उनकी छाती, कण्ठ, जिह्वा, शरीरकी सन्धियों तथा दोनों ओठोंमें काँटी ठोंककर यमदूत उन्हें कील देते हैं।

इस प्रकार पापाचारी पुरुषोंको यमलोकमें बड़ी भयानक यातनाएँ दी जाती हैं। एक-एक नरकमें सैकड़ों और सहस्रों प्रकारकी ऐसी यातनाएँ जाननी चाहिये, जो समस्त पापकर्मियोंको प्राप्त होती हैं। सम्पूर्ण नरकोंमें ऐसी-ऐसी अनन्त पीड़ाएँ भोगनी पड़ती हैं। अपने-अपने कर्मोंसे नरकोंमें गिराये हुए पापी जीव क्रमशः सभी नरकोंमें पकाये जाते हैं। महापातकी मनुष्य सब नरकोंमें चन्द्रमा और नक्षत्रोंकी स्थितिकालतक अनेकानेक यमदूतोंद्वारा पीड़ा भोगते रहते हैं। यही दशा पातकियोंकी भी होती है। उपपातकियोंको इनसे आधी यातना प्राप्त होती है। तात युधिष्ठिर! कब किसकी मृत्यु हो जायगी, यह ज्ञात नहीं होता और अकस्मात् यदि मृत्यु आ गयी तो कौन मनुष्य यहाँ वर्ष या दिन पा सकता है। फिर तो सब कुछ छोड़कर अकेले ही परलोककी यात्रा करनी पड़ेगी। इसलिये पूर्ण प्रयत्न करके सत्यधर्मपरायण होओ। यह सब नरकोंका लक्षण तुमसे बताया गया।

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दान, पुण्य, शिवध्यान और नर्मदासेवनसे नरकसे उद्धार होनेका तथा संसारसे वैराग्यका उपदेश

युधिष्ठिरने पूछा— मुने! किस धर्मके द्वारा इस परम दुस्तर संसार-सागरको पार किया जा सकता है?

मार्कण्डेयजी बोले— मनुष्य अनेक प्रकारके राग और लोभके वशीभूत होकर संसारमें नाना प्रकारके क्लेश उठाता है। गर्भमें पड़ जानेसे मनुष्य कहे हुए शास्त्रको नहीं समझता और स्वर्ग तथा मोक्षसाधक कर्मोंकी चर्चा नहीं सुनता। सम्पूर्ण कामनाओं और प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाले भगवान् शंकरके ध्यानमें वह अज्ञानवश कष्ट मानने लगता है। वास्तवमें भगवान् शिवका चिन्तन ही नरकसे छुड़ाकर अपना परम अद्भुत कल्याण करनेवाला है। जो जम्बूद्वीपमें आकर मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है, तथापि नर्मदादेवीकी शरणमें नहीं जाता, वह भाग्यहीन है। इस संसारमें पापसे दूषित चित्तवाले मनुष्योंको उत्तम गति देनेवाली नर्मदासे बढ़कर दूसरी कौन नदी है? जो पापहारिणी महादेवी नर्मदाका ध्यान करते हैं, उनकी पापराशि नष्ट हो जाती है। जो नर्मदाका मनसे स्मरण और वाणीद्वारा कीर्तन करता है, वह परलोकमें जानेपर

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यमदूतोंद्वारा पीड़ित नहीं होता। नरकमें स्थित होनेपर भी जो नर्मदा नदी एवं भगवान् शिव और विष्णुका स्मरण करता है, उसे यमराजके दूत तत्काल त्याग देते हैं। यदि वैदूर्य पर्वत एवं अमरकण्टकपर भोग और मोक्ष फल देनेवाले परमेश्वर 'ॐकारजी' विद्यमान हैं, तो पापी मनुष्य यहाँ क्यों शोक करते हैं? वहीं सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले सिद्धलिंग सिद्धेश्वर, यज्ञेश्वर और शशिभूषण हैं। नर्मदाके दक्षिण भागमें महेश्वर एवं कपिलेश्वरलिंग हैं। उस स्थानको विद्वान् पुरुष शिवक्षेत्र कहते हैं। जो मनुष्य सदा पुष्प, धूप, आरती और तर्पण आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक इन लिंगोंकी अर्चना करते हैं, वे नरकसे छूटकर शिवलोकको जाते हैं। अनघ! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बताया। पापी पुरुषोंको यमराजने यह बताया है कि 'जो लोग गोदान, स्वर्णदान, तिलदान, अन्नदान, जलदान, सब सामग्रियोंका दान तथा महल और बगीचेका दान करते हैं, वे घोर नरकस्वरूप यमलोकमें नहीं जाते। भगवान् शिवके वचनानुसार वे सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं।'

सम्मानको अपमानने, प्रियजनोंके संयोगको वियोगने और जवानीको बुढ़ापेने ग्रस लिया है। सारा सुख दुःखके उपद्रवसे युक्त है। जब बाल पक जाते हैं, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, तब वृद्धावस्थामें जर्जरशरीर होकर विद्वान् मनुष्य क्या कर सकता है? स्त्री और पुरुषोंका यौवन तथा रूप, जो एक-दूसरेको बहुत ही प्रिय लगता है, जराग्रस्त हो जानेपर दोनोंके लिये अप्रिय हो जाता है। जो अपने-आपको अपूर्व शिथिलतासे युक्त देखकर भी संसारसे विरक्त नहीं होता, उससे बढ़कर मूर्ख दूसरा कौन हो सकता है? जराग्रस्त मनुष्य अशक्त होनेके कारण पत्नी-पुत्र आदि बान्धवों तथा दुराचारी सेवकोंद्वारा भी अपमानित होता है। वृद्ध मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष किसी भी पुरुषार्थका साधन करनेमें समर्थ नहीं होता। इसलिये बुढ़ापा आनेसे पहले ही धर्माचरण करे। युधिष्ठिर! शरीरमें वात, पित्त और कफ आदिकी विषमता होती रहती है तथा वात, पित्त, कफका समूह शरीरसे ही उत्पन्न बताया गया है। इसलिये अपना यह शरीर सदा रोगोंका ही आश्रय है, ऐसा जानना चाहिये। जब वातका प्रकोप होता है और मनुष्य ज्वरसे पीड़ित होता है, तब अनेक प्रकारसे होनेवाले रोगोंके कारण उसे बहुत दुःख सहन करने पड़ते हैं। इस शरीरमें मृत्युके साधन सौसे भी अधिक हैं। इनमेंसे एक मृत्यु तो कालरूप है और शेष मृत्युएँ आगन्तुक मानी गयी हैं। जो आगन्तुक होती हैं वे ओषधिसेवन तथा जप, होम और दान आदिसे शान्त हो जाती हैं; परंतु कालरूप मृत्यु किसी उपायसे भी शान्त नहीं होती। विष और मद्य आदिसे मनुष्यकी अपमृत्यु होती है। अतः इन सब वस्तुओंका सेवन कदापि न करे। अनेक प्रकारके रोग, कष्ट, सर्प आदि जीव, विष और मारण आदिके प्रयोग—ये सब देहधारियोंके लिये मृत्युके द्वार हैं। यदि मनुष्यका मृत्युकाल आ पहुँचा है, उस समय रोग, सर्प आदिसे पीड़ित हो तो साक्षात् धन्वन्तरि भी उसे नहीं बचा सकते। कालपीड़ित मनुष्यकी रक्षा करनेमें ओषधि, तप, दान, मित्र और बान्धव—कोई भी समर्थ नहीं हैं। मृत्युके समान कोई दुःख नहीं है, मृत्युके समान कोई शत्रु नहीं है तथा समस्त देहधारियोंके लिये मृत्युके समान दूसरा कोई काल नहीं है। युधिष्ठिर! श्रेष्ठ और सुन्दर स्त्री, पुत्र, मित्र, राज्य तथा ऐश्वर्य आदि नाना प्रकारके सम्पूर्ण सुखोंको मृत्यु सहसा छीन लेती है। राजन्! भाई-बन्धु आदिके रूपमें जो यह दुस्तर संसार है, इसका तुम्हें यत्किंचित् परिचय दिया गया है। यह सब परिणामी—नाशवान् है, कालका भोजन है। ऐसा जानकर प्रयत्नपूर्वक नर्मदाका सेवन करना चाहिये। नर्मदा सब दुःखोंका निवारण और सम्पूर्ण शोकोंका नाश करनेवाली है। जो जिन कामनाओंको पाना चाहता है, नर्मदादेवी उसे वे सभी वस्तुएँ देती हैं।


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१०२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


मातंग, मृगवन और वाराहतीर्थकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—माहिष्मतीपुरीके पश्चिम अशोकवनिका नामक एक पापहारी तीर्थ है, जो सब प्रकारके शोकोंका विनाश करनेवाला है। वहाँ स्नान करके अपने वैभवके अनुसार गौरीदेवीका पूजन करे। वहीं मातंगमुनिका आश्रम है। जो स्त्री शुक्ल और कृष्ण पक्षकी तृतीयाको गन्ध, धूप, चन्दन, नाना प्रकारके उपहार तथा दीपावली जलाने आदिके द्वारा वहाँ भक्तिपूर्वक गौरीदेवीका पूजन करती है, वह रूप और सौभाग्यसे सम्पन्न पति प्राप्त करती है।

युधिष्ठिर ! पूर्व कल्पकी बात है—मातंग नामसे प्रसिद्ध देवर्षिने नर्मदा नदीके तटपर रहकर बड़ी दुष्कर तपस्या की थी। महर्षियोंके सत्संग और नर्मदाके दर्शनसे उन्होंने पाप-बुद्धिका परित्याग करके धर्म-बुद्धिका आश्रय लिया था। 'मैं विरक्त और भिक्षु हूँ' ऐसा विचारकर वे अशोकवनिकामें गये और जटा, वल्कल धारण करके कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक भगवान् शिवकी आराधनामें तत्पर रहे। सब मन्त्रोंमें उत्तम 'ॐ नमः शिवाय' इस षडक्षर मन्त्रका वे दिन-रात अपने हृदयमें चिन्तन करते थे। उनकी उस पराभक्तिको जानकर देवाधिदेव महादेवजीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'सुव्रत ! इस ध्यानसे तुम्हारा कल्याण हो, तुम वर माँगो।'

मातंग बोले—देवेश्वर ! यह तीर्थ मातंगके नामसे विख्यात हो। इसमें चाण्डाल, श्वपच आदि पापयोनिके जीव तथा जप आदिसे रहित पुरुष भी पापमुक्त होते रहें। जो यहाँ स्नान करके नर्मदातटवर्ती मातंगेश्वरलिंगका पूजन करे, उसका संसार-बन्धन छूट जाय।

मातंग मुनिका यह वचन सुनकर महादेवजी बोले—मुने ! मेरे प्रसादसे यह सब कुछ तुम्हारे इच्छानुसार होगा। ऐसा कहकर भगवान् शिव पर्वतश्रेष्ठ कैलासको चले गये और मातंग मुनि वरदान पाकर दिव्य विमानपर आरूढ़ हो उमा-महेश्वर-धामको चले गये। चैत्रके कृष्ण पक्षमें जो चतुर्दशी और अमावास्या तिथि आती है, उसमें वहाँ जो कुछ दान, होम आदि किया जाता है, वह अक्षय फल देनेवाला होता है। उस तीर्थमें तिल और जलद्वारा तर्पण करनेसे और गुड़-सत्तूका पिण्डदान देनेसे चौदह इन्द्रोंके स्थित कालतक पितर तृप्त रहते हैं। अशोकवनिका नामसे प्रसिद्ध स्थान मातंग-तीर्थ कहलाता है, वह नर्मदाके उत्तर तटपर विद्यमान है।

युधिष्ठिर ! अब मैं नर्मदाके दक्षिण तटपर विद्यमान मृगवन नामक तीर्थका वर्णन करूँगा। महाराज ! वहाँ एकादशीको स्नान करके शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णुका अर्चन करे और निराहार रहकर रात बितावे। प्रातःकाल होनेपर फिर गन्ध और पुष्पोंद्वारा मृगवनमें श्रीहरिकी पूजा करे। वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर लाख ब्राह्मणोंको भोजन करानेका पुण्य होता है। तिल और जलकी अंजलि देनेसे पितरोंको वैष्णव पदकी प्राप्ति होती है। वहीं उत्तम वाराहतीर्थ है, जहाँ वाराहरूप धारण करके भगवान्ने इस पृथ्वीका उद्धार किया था और वहीं अमित तेजस्वी श्रीहरिने विश्वरूपको भी धारण किया था। जो पतिव्रता नारी मासोपवास व्रत करके वहाँ विधिपूर्वक स्नान करती है, वह विष्णुधामको जाती है।

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* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२३

संसारसे मुक्त होनेके लिये पाप और पाखण्डी जनोंके त्याग तथा शिव एवं नर्मदाके आश्रय लेनेका उपदेश

मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! नर्मदातटपर उत्तम सिद्धि देनेवाला मनोरथ नामक एक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है। वहाँ स्नान करके मनुष्य जिस-जिस मनोरथको चाहता है, उस तीर्थके प्रभावसे वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। वहीं संगमपर अंगारेश्वरदेव स्थित हैं, जहाँ स्नान-मात्र करनेवाला मनुष्य गणपति-पदपर प्रतिष्ठित होता है।

पाप बड़े ही कड़वे और अत्यन्त दुःख देनेवाले होते हैं। इसलिये पाप कभी नहीं करना चाहिये। जिस देश-कालमें और जैसी आयुके द्वारा मनुष्य शुभाशुभ कर्म करता है, वह उसी प्रकार उसे भोगना पड़ता है। अतः अपनी शक्तिके अनुसार याचकको निरन्तर दान देना चाहिये। विद्वान् पुरुष शास्त्र और युक्तियोंद्वारा सदा आत्माके कल्याणका विचार करे। केवल अनुमानके ही द्वारा उसपर विचार नहीं करना चाहिये। कर्मोंके हीन और उत्तम नाना प्रकारके फल बताये गये हैं; अतः मनुष्य कोई कर्म करनेके पहले उसकी परीक्षा कर ले। जिसका श्रेष्ठ और महान् फल हो, वही पुण्यकर्म है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह पाखण्डी, शास्त्रविपरीत कर्म करनेवाले, वैडालव्रती (दम्भी), शठ, युक्तिवादी, तीर्थनिन्दक, दिगम्बर तथा अन्यान्य पाखण्डी जनोंको दूरसे ही त्याग दे। नंगे, मथमुण्डे और विष्ठाभोजी अघोरी—कलियुगमें धर्मके विपरीत आचार उपस्थित करते हैं। अतः उनके चलाये हुए पाखण्डका परित्याग करके तीनों वेदोंद्वारा प्रतिपादित धर्मका आचरण करे। सब धर्मोंमें ब्रह्मा, विष्णु और शिवजीके वचन ही प्रमाण हैं। जो उनके विपरीत बर्ताव करता है वह निश्चय ही नरकमें गिरता है। पितरोंका तर्पण करे, भिखारीको भीख दे, सब प्राणियोंपर दया करे तथा नर्मदाजीकी माहात्म्य-कथाका चिन्तन करे। यही सब कर्मोंको शुद्ध करनेवाला सम्पूर्ण ज्ञान है। जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित, स्वभावसे सबके स्वामी, सर्वज्ञ और परिपूर्ण हैं, वे भगवान् शिव शैवशास्त्रोंद्वारा जाननेयोग्य हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित जो ज्ञान है, वह संशयरहित एवं सम्पूर्ण प्रयोजनोंकी सिद्धि करनेवाला है। जो सर्वज्ञ हैं, सम्पूर्ण हैं, स्वभावतः निर्मल तथा सम्पूर्ण दोषोंसे रहित हैं, वे कल्याणमय शिव कोई विपरीत बात कैसे कह सकते हैं?

भगवान् शिवकी आज्ञाके बिना संसारकी सृष्टि कैसे हो सकती है? यदि कहें कि प्रकृतिसे सृष्टि होती है, तो ठीक नहीं, क्योंकि वह जड है। यदि कहा जाय कि जीवात्मा ही सृष्टि करता है, तो यह भी उचित नहीं है; क्योंकि वह सर्वज्ञ नहीं, अज्ञ है। परमाणु आदि जो प्राकृत तत्त्व हैं, वे सब अचेतन हैं; अतः वे किसी बुद्धिमान् सहायकके बिना न तो स्वयं रचना कर सकते हैं, न देख ही सकते हैं। जैसे कुम्भकारके बिना मिट्टी स्वयं घड़ेके रूपमें नहीं परिणत होती, उसी प्रकार जड प्रकृति बुद्धिमान् चेतनके बिना स्वयं कुछ नहीं कर सकती। जैसे यह घोर संसार-समुद्र अनादिकालसे चला आ रहा है, उसी प्रकार इस संसारसे छुड़ानेवाले भगवान् शिव भी अनादि हैं। जैसे ओषधि स्वभावसे ही रोगोंका निवारण करनेवाली है, उसी प्रकार भगवान् शिव भी स्वभावसे ही घोर संसार-बन्धनका नाश करनेवाले माने गये हैं। जैसे वैद्यके बिना रोगी क्लेश उठाते हैं, उसी प्रकार भगवान् शिवके बिना सम्पूर्ण जगत् दुःख उठाता है। अतः अनादि, सर्वज्ञ, परिपूर्ण, परम शिव ही सबके त्राता हैं। उनके सिवा दूसरा कोई पुरुष इस संसार-समुद्रसे रक्षा करनेवाला नहीं है। जो अपने हृदयमें भगवान् शिवका चिन्तन करते हुए शिवज्ञानका अभ्यास करते हैं, उन्हें अवश्य ज्ञान होता है। नरश्रेष्ठ! ऐसा जानकर शिवस्वरूपा नर्मदादेवीका आश्रय

१०२४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

लेकर उसके तटपर धन-धान्यसे सम्पन्न दिव्य गृह तथा अच्छे-अच्छे अन्य आवश्यक सामान ब्राह्मणोंको आदरपूर्वक देने चाहिये। अनाथ, अत्यन्त वृद्ध, विकल एवं कुटुम्बी ब्राह्मणको विशेषरूपसे देना चाहिये। जो ब्राह्मणको काठ और मिट्टीसे बना हुआ गृह दान करता है अथवा उसके लिये अमरकण्टकपर सब ओर सुन्दर-सुन्दर दिव्य भवन निर्माण कराता है, वह सर्वोत्तम दानका फल प्राप्त करता है। केवल यही दान उसके समस्त कामनाओं और प्रयोजनोंका साधक होता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस प्रसंगको सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता है।


शिवलोककी उत्कृष्टता, गोसेवाका महत्त्व, दानकी महिमा तथा नर्मदातटपर दान एवं शिवध्यानका माहात्म्य

**युधिष्ठिरजी बोले—**भगवन्! गोलोक कैसा बताया गया है, किस कर्मसे उसकी प्राप्ति होती है और कौन-कौन वहाँ निरन्तर रहते हैं?

**मार्कण्डेयजीने कहा—**सब लोकोंसे ऊपर महादेवजीका लोक है, वह परम दिव्य और सर्वश्रेष्ठ है। वहीं वृषभरूपसे धर्म भी विद्यमान हैं। जहाँ उनके पति वृषभरूप धर्म हैं, वहीं गोमाताएँ भी निवास करती हैं और उसी लोकमें देवताओं और असुरोंसे पूजित नर्मदादेवी भी विद्यमान हैं। उन्हींके जलसे गौएँ, बछड़े तथा सब देवता तृप्त होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, उमासहित महेश्वर, देवता, ऋषि, पितृगण, मातृगण तथा अन्यान्य लोकोंसहित शिवलोक और नर्मदालोक भी इस गोलोकके अन्तर्गत हैं। रुद्रलोकके जो गुण हैं, वही गोलोकके हैं। नन्दा, भद्रा, सुभद्रा, सुशीला तथा सुरभि—ये पाँच गोमाताएँ शिवलोकसे प्रकट हुई हैं। छठी नर्मदादेवी भी वहींसे सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे प्रकट हुई हैं। महाराज! ये सब लोकमाताएँ अपने गुणोंद्वारा इस सम्पूर्ण जगत्को सदा तृप्त करती रहती हैं।

शिवलोकसे प्रकट हुई गौएँ यहाँ आकर घास खाती हैं, वनमें चरती हैं, निर्मल जल पीती हैं, शरीरको पवित्र करती हैं और मधुर दूध देती हैं, जिससे सम्पूर्ण जीव-जगत् जीवन धारण करता है। जैसे छोटे बच्चेवाली स्त्रियोंसे घरकी शोभा होती है, उसी प्रकार छोटे बछड़ेवाली गौओंसे जिनका घर सुशोभित है, उनके शरीरमें पाप कहाँसे रह सकते हैं। जो लोग ॐकार और नर्मदाका सदैव शिवरूपसे स्मरण करते हैं, उनका पुनः इस संसार-सागरमें जन्म नहीं होता। जो घास और जल देकर गौओंके प्रति परम भक्तिभाव रखते हैं, वे उन गौओंके प्रसादसे शिवलोकमें जाते हैं। ये गोमाताएँ सदा अनुकूल रहनेपर समस्त कामनाओंको देनेवाली हैं। जो इन कल्याणमयी गौओंकी रक्षा करते हैं, वे शिवलोकमें जाते हैं। जो उत्तम विधिके साथ एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक भगवान् शिवका पूजन करते हैं, वे निश्चय ही शिवके धामको जाते हैं। भगवान् शिवके निवासस्थानरूप तीर्थोंमें जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक जाते हैं, विशेषतः जो नर्मदा और अमरकण्टककी यात्रा करते हैं, वे ब्रह्मा, विष्णु और शिवके लोकोंमें विहार करते हैं। राजन्! इस प्रकार तुम्हें नर्मदाका मंगलमय अवतार बताया गया है।

**युधिष्ठिरजी बोले—**मुने! अब मैं दान-धर्मका विधान सुनना चाहता हूँ। जो लोग दरिद्र और भिक्षुक हैं, उन्हें शिवधामकी प्राप्ति कैसे होती है?

**मार्कण्डेयजीने कहा—**राजन्! कमल, बिल्वपत्र, कुश और नर्मदाका जल—इन सबको भगवान् ब्रह्माजीने सामान्यतः धर्मका हेतु बताया है (ये सर्वसुलभ हैं)। सभी धर्म, पुराण और श्रुतियाँ—ये श्रद्धा और विश्वाससे ही पावन होते हैं।

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२५


पुराणों और श्रुतियोंके उपदेश किये हुए धर्मका आचरण करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं। जो शिवजीका ध्यान करनेवाले ब्राह्मणको श्रद्धापूर्वक रूई भरा हुआ बिस्तर, कटिसूत्रसहित लाल वस्त्र, नवीन वस्त्रमें लपेटा हुआ तथा पवित्र धूपसे सुवासित किया हुआ यज्ञोपवीत देता है, वह रूईके उन वस्त्रोंमें जितने तन्तु होते हैं और उन तन्तुओंमें जितने रोम होते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो भगवान् शिवके उद्देश्यसे शिवभक्तको नैवेद्य देता है अथवा शाक, मूल, फल आदि अर्पण करता है, वह तण्डुल, फल और दल आदिकी जितनी संख्या होती है, उतने सहस्र वर्षोंतक शिवलोकमें सम्मानित होता है। जो शिवभक्तको दही-भातसे भरा हुआ सुन्दर भिक्षापात्र अर्पण करता है, वह शिवधाममें निवास करता है। जो अपनी शक्तिके अनुसार शैवव्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणको भोजन कराता है, वह भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो भक्तिपूर्वक शिवकी पूजा करते हैं, वे शिवलोकमें जाते हैं।

इस प्रकार प्रसंगवश शिवलोक, गोलोक* और नर्मदालोकका वर्णन किया गया है, जहाँ शिवभक्त पुरुषोंका निवास है। जो ज्ञानयोगसे शान्तचित्त हो परम शिवका जप करते हैं, वे सब दुःखोंसे मुक्त हो सदा सुखी बने रहते हैं। पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार, सत्त्वगुण और प्रकृति—इन आठ आवरणोंसे युक्त शिवलोक है। वह दस हजार सूर्योंके समान कान्तिमान् परम स्थान है। ज्ञान और ध्यानमें संलग्न, शान्त, भिक्षान्नभोजी, जितेन्द्रिय, भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये सत्कर्म करनेवाले और जिनके पाप दग्ध हो गये हैं, ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मण ही उस परम धाम शिवलोकको पानेके अधिकारी हैं। जिस सत्यस्वरूप लोकमें शुद्धचित्त एवं अविद्या आदिके क्लेशोंसे रहित महात्मा पुरुष निवास करते हैं, उसी उत्तम पदको नर्मदाजीका सेवन करनेवाले मनुष्य भी पा लेते हैं।

जो नर्मदाके तटपर मेरे बताये अनुसार दान करते हैं, वे सब कुछ जाननेवाले, सर्वत्र जानेकी शक्ति रखनेवाले शुद्ध एवं परिपूर्ण हो जाते हैं। जो शुद्धकर्मोंमें तत्पर रहते हैं, वे परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो अपनी इच्छाके अनुसार साकार या निराकार रूपमें स्थित होते हैं। सम्पूर्ण जगत्के स्वामी पार्वतीवल्लभ भगवान् नीलकण्ठका यह दिव्य स्थान नित्य, विशुद्ध, अविनाशी एवं सदा एकरस रहनेवाला है। जो लोग नर्मदाके तटपर रहकर शिवजीके ज्ञानका अभ्यास करते हैं, वे काम-तृष्णासे मुक्त होकर शिवलोकमें जाते हैं। जो एक दिन भी शिवधर्मका पालन करते हुए भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर होता है, उसके धर्मका अन्त नहीं है।


अमरावतीके दक्षिण विष्णु-मन्दिरकी महिमा, मेघवनका महत्त्व तथा विभिन्न तीर्थोंकी महाशक्तियोंके नाम

मार्कण्डेयजी कहते हैं— गौएँ बड़ी पवित्र वस्तु हैं; वे सब प्रयोजनोंकी सिद्धि करनेवाली हैं। अतः गोदान और शिवभक्तिसे मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। वैवस्वत मन्वन्तरमें राजर्षि वीरणके पुरोहित मैत्रेयजी हुए थे, जिन्होंने नर्मदाके तटपर भगवान् विष्णुका मन्दिर बनवाया है। वह मन्दिर अमरावती पुरीके दक्षिण दिशामें नर्मदा-तटपर विद्यमान है। उसके माहात्म्यसे और नर्मदाके प्रभावसे वे द्विजश्रेष्ठ भगवान् विष्णुके लोकमें आनन्द भोगते हैं।

युधिष्ठिर ! नर्मदाके पश्चिम और उत्तर तटपर जो-जो उत्तम तीर्थ हैं, उनका वर्णन सुनो। यज्ञ पर्वतपर मेघवन नामसे प्रसिद्ध एक वन है, जहाँ


* यह गोलोक शिवलोकका ही एक अंग है।

१०२६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पूर्वकालमें चक्रवर्ती राजा रन्तिदेवने देवता, असुर और मनुष्योंसहित अपने कुलको गोलोकमें पहुँचाया है।

विभिन्न तीर्थोंकी महाशक्तियोंके नाम इस प्रकार हैं— (१) काशीमें विशालाक्षी, (२) नैमिषारण्यमें लिंगधारिणी, (३) प्रयागमें ललिता देवी, (४) गन्धमादनमें कामुका देवी, (५) मानसमें कुमुदा, (६) अम्बरमें विश्वयोनि, (७) गोमन्त पर्वतपर गोमती, (८) मन्दराचलपर कामचारिणी, (९) चित्ररथ वनमें मदोत्कटा, (१०) हस्तिनापुरमें तपन्ती, (११) कान्यकुब्जमें गौरी, (१२) कमल पर्वतपर प्रभा, (१३) एकाग्रक्षेत्रमें कीर्तिमती, (१४) विश्वेश्वरक्षेत्रमें विश्वा, (१५) पुष्करमें पुरूहूता (१६) केदारमें मार्गदायिनी, (१७) हिमालयपर नन्दा, (१८) गोकर्णक्षेत्रमें भद्रकर्णिका, (१९) स्थानेश्वरमें भवानी, (२०) विल्वकमैं विल्व-पत्रिका, (२१) श्रीशैलपर माधवी, (२२) भद्रेश्वरमें भद्रा, (२३) वाराह पर्वतपर जया, (२४) कमलालयमें कमला, (२५) रुद्रकोटिमैं रुद्राणी, (२६) कालंजरेमें कोटि, (२७) महालिंगमें कपिला, (२८) माकोटमें मुकुटेश्वरी, (२९) शालग्राममें महादेवी, (३०) शिवलिंगमें जलप्रिया, (३१) मायापुरीमें कुमारी, (३२) सन्तानमें ललिता, (३३) उत्पलक्षेत्रमें सहस्राक्षी, (३४) हिरण्याक्षमें महोत्पला, (३५) तीर्थामैं मंगला, (३६) पुरुषोत्तमक्षेत्रमें विमला, (३७) विपाशामैं अमोघाक्षी, (३८) पुण्ड्रवर्धनमें पाटला, (३९) सुपार्श्वमें नारायणी, (४०) त्रिकूटमें भद्रसुन्दरी, (४१) विपुलमें विपुला, (४२) प्रलयाचलमें कल्याणी, (४३) विकोटितीर्थमें कोटी, (४४) यमुनामें मृगावती, (४५) करवीरमें महालक्ष्मी, (४६) विनायकमें उमादेवी, (४७) वैद्यनाथमें आरोग्या, (४८) महाकालमें महेश्वरी, (४९) कृष्णतीर्थमें अभया, (५०) विन्ध्य-गिरिकी कन्दरामें अमृता, (५१) माण्डव्यतीर्थमें माण्डुका, (५२) माहेश्वरपुरमें स्वाहा, (५३) प्रचण्डतीर्थमें छागलम्बा, (५४) अमरकण्टकमें चण्डिका, (५५) सोमेश्वरमें वाराही, (५६) प्रभासमें पुष्करावती, (५७) सरस्वतीमें देवमाता, (५८) पारावतमें पारा, (५९) महालयमें महाभागा, (६०) पयोष्णीमें पिंगलेश्वरी, (६१) कृतशौतीतर्थमें संहिता, (६२) कार्तिकेयमें शांकरी, (६३) उत्पलावर्षकमें लोला, (६४) शोणसंगममें सुभद्रा, (६५) मालासिद्धतलमें लक्ष्मी, (६६) भारताश्रममें अनन्ता, (६७) जालन्धरेमें सिद्धमुखी, (६८) किष्किन्धा पर्वतपर तारा, (६९) देवदारुवनमें पुष्टि, (७०) कश्मीरमण्डलमें मेधा, (७१) हिमालयमें भीमा देवी, (७२) वस्त्रेश्वरतीर्थमें तुष्टि, (७३) कपालमोचनमें सिद्धि, (७४) कायावरोहणमें माता, (७५) शंखोद्धारमें धृति, (७६) पिण्डारकमें ध्वनि, (७७) चन्द्रभागामें कला, (७८) अक्षोदमें शिवधारिणी, (७९) वैजयन्तीमें ऋता, (८०) बदरीमें ओषधि, (८१) उत्तरकुरुमें भी ओषधि, (८२) कुशद्वीपमें कुशोदका, (८३) हिमकूटमें मन्मथा, (८४) प्रमतमें सत्यवादिनी, (८५) अश्वत्थमें वन्दिनी, (८६) वैश्रवण (कुबेरतीर्थ)-में निधि, (८७) वेदवदनमें गायत्री, (८८) शिवके समीप पार्वती, (८९) देवलोकमें इन्द्राणी, (९०) ब्राह्मणके मुखमें सरस्वती, (९१) सूर्यबिम्बमें प्रभा, (९२) मातृकातीर्थमें मातृका, (९३) वैष्णवतीर्थमें वैष्णवी, (९४) सतियोंमें अरुन्धती, (९५) अप्सराओंमें तिलोत्तमा, (९६) सब देहधारियोंमें चिति, (९७) ब्रह्मकला तथा (९८) शक्ति।

ये नाम और तीर्थ संक्षेपसे बताये गये हैं। जो प्रातःकाल उठकर इनका पाठ करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। इन तीर्थोंमें स्नान करके जो मनुष्य इन शक्तियोंका दर्शन करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो इन देवियोंके तीर्थस्थानोंमें अपने शरीरका त्याग करता है, वह ब्रह्मलोकको भेदकर शिवजीके परम धामको प्राप्त करता है। गोदानके समय, श्राद्धमें, विवाह आदि मंगलकार्योंमें तथा देवार्चनके समय भी जो इन नामोंका पाठ करता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है।

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२७

अशोकवनिकातीर्थमें महाराज रविश्चन्द्रके द्वारा यज्ञ, दान तथा मुनियोंका उद्धार

मार्कण्डेयजी कहते हैं—नर्मदाके दक्षिण भागमें माण्डव्यमुनिका आश्रम है। उसमें विभाण्डक, गार्ग्य तथा ऋष्यशृंग आदि उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि सहस्रोंकी संख्यामें निवास करते हैं। राजन्! अशोकवनिका नामसे प्रसिद्ध उत्तम तीर्थकी महिमा सुनो। वहाँ भगवान् शंकर पार्वतीदेवीके साथ निवास करते हैं। वहाँ विशोका नदी और नर्मदाका संगम हुआ है। वहाँ स्नान करनेवाले मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं और जिनकी वहाँ मृत्यु हो जाती है, वे मुक्त हो जाते हैं। वहीं अशोकेश्वरलिंग है, जो प्रत्यक्ष ही सिद्धि एवं कल्याण प्रदान करनेवाला है। उसी तीर्थमें देवर्षि नारदने शापभ्रष्ट ब्राह्मणोंको शापसे मुक्त किया था और अब वे ब्राह्मण उस तीर्थके माहात्म्यसे देवता होकर देवलोकमें आनन्द भोगते हैं।

स्वायम्भुव मन्वन्तरके आदिकल्पके सत्ययुगकी बात है। चन्द्रवंशमें रविश्चन्द्र नामसे प्रसिद्ध एक महायशस्वी चक्रवर्ती राजा हो गये हैं, जो कांची नगरीके नरेश थे। उन्होंने समस्त पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया था। एक समय वे अगस्त्येश्वरतीर्थमें गये जहाँ भगवान् शंकरका सुन्दर मन्दिर विद्यमान है। अगस्त्य आदि सभी तपस्वी मुनि उस तीर्थका सेवन करते हैं। वहाँ नर्मदा बहती हैं और अमरकण्टक पर्वत भी सुशोभित होता है। सूर्यग्रहणके समय राजा रविश्चन्द्र उस स्थानपर गये जहाँ मुनिमण्डलीसे घिरे हुए महर्षि अगस्त्य तपस्या करते थे। उस समय महातपस्वी शाण्डिल्यजीने महर्षि अगस्त्यको प्रणाम करके पूछा—'तपोनिधे! महातेजस्वी राजा रविश्चन्द्र आपके आश्रमपर पधारे हैं। मैं उनका पुरोहित हूँ। यदि आप कृपापूर्वक स्वीकार करें तो राजा आपके चरणारविन्दोंका अर्चन करना चाहते हैं।'

अगस्त्यजी बोले—नृपश्रेष्ठ रविश्चन्द्र यहाँ शीघ्र आवें और सिंहासनपर विराजमान हों। उनकी आज्ञा पाकर राजा वहाँ आये और उन्होंने मुनिके चरणोंका स्पर्श किया। मुनिने अर्घ्य और पाद्य आदिके द्वारा राजाका सत्कार किया और कुशल-समाचार पूछते हुए कहा—'महाभाग! आप अन्तःपुर और परिवारके साथ सकुशल तो हैं न?'

राजा बोले—मुनीश्वर! आज मेरा जन्म और जीवन सफल हुआ, जो आपके चरणारविन्दोंका दर्शन पाकर मैं सब पापोंसे मुक्त हो गया। मुनिश्रेष्ठ! सर्वतीर्थमयी नर्मदा नदी तो सर्वत्र शुभ और पावन हैं। मैं किस स्थानपर यज्ञ करूँ?

अगस्त्यजीने कहा—राजन्! एकमात्र नर्मदादेवी ही पुण्यमयी और शुभ हैं। जम्बूद्वीप एक लाख योजनका बताया गया है, उसमें जितने भी चराचर प्राणी हैं, उनमेंसे जो तपस्यासे हीन हैं वे भी नर्मदाका जलपान करनेसे भगवान् शिवके लोकमें जाते हैं। ॐकार आदि शिवलिंग और वैदूर्य आदि पर्वत, द्वापर और कलियुगमें परम पावन होते हैं। नर्मदाके दक्षिण और उत्तर भागमें जो यह देव-दानववन्दित भूमि है इसे यज्ञभूमि कहते हैं। इसीमें अशोकवनिका है, जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर निवास करते हैं। यहाँ किया हुआ यज्ञ बिना किसी विघ्न-बाधाके परिपूर्ण होता है। ऐसा भगवान् शंकरका कथन है।

राजा बोले—महामुने! आपका कल्याण हो, मैं आपके साथ वहीं चलूँगा।

ऐसा कहकर मुनियोंसे घिरे हुए राजा रविश्चन्द्र नर्मदाके दक्षिण तटपर वर्तमान सुन्दर पुण्यतीर्थ अशोकवनिकामें आये। वहाँ दस योजन विस्तृत भूमिमें यज्ञमण्डप बनाया गया और यूप गाड़े गये। उस मण्डपके सभी द्वार और स्तम्भ मणि-माणिक्य तथा रत्नोंकी राशिसे शोभा पा रहे थे। विश्वामित्र, भरद्वाज, कश्यप, भार्गव, ब्रह्मदृश्य, लोमश था दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ महर्षि उस यज्ञमें

१०२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


सम्मिलित हुए। प्रचुर दक्षिणा पानेवाले ब्राह्मणोंने यज्ञ प्रारम्भ किया। सब देवता बड़े प्रसन्न और तृप्त हुए। इसी समय महान् क्रोधी दुर्वासाजी, यमराज, चित्रगुप्त, काल और मृत्यु भी आये। उस यज्ञमें इनके लिये कोई भाग नहीं दिया गया था। यह देखकर ये सभी कुपित हो उठे। उन सबको रुष्ट देखकर राजा रविश्चन्द्रने कहा— 'यज्ञके समयमें कोई मनुष्य भी आ जाय तो वह चार भुजाधारी भगवान् विष्णुके समान पूजनीय होता है। आपलोगोंको भी मैं अभीष्ट वस्तु दूँगा। अतः प्रसन्न हों।' इस प्रकार राजाके द्वारा अर्घ्य, पाद्य आदि देकर प्रसन्न कराये जानेपर वे सब मुनि सन्तुष्ट हुए।

उस समय दुर्वासाजीने कहा—राजन्! पूर्वकालमें जटा और वल्कल धारण करनेवाले तपस्वीलोग नेपालमें देवताओंके देवता भगवान् पशुपतिकी भक्तिभावसे पूजा करते थे, परंतु उनके साथ उन्होंने पार्वतीजीकी पूजा नहीं की। इसलिये पार्वतीजीने उन ब्राह्मणोंको शाप दिया—'तुमलोग एक सहस्र वर्षोंतक कुत्तेकी योनिमें रहोगे।' तबसे वे मुनीश्वर लोग कुत्तेकी योनिमें पड़े हुए हैं। राजन्! हमारा प्रिय करनेकी इच्छासे तुम उन सबको शापसे मुक्त कर दो।

राजा बोले—मैं उन ब्राह्मणोंको उस शापसे मुक्त करूँगा।

ऐसा कहकर राजाने अपने दूतोंको वनमें भेजा। दूतोंने उन वनवासी मुनियोंको नमस्कार करके उनके पूर्वजन्मका स्मरण कराया। तब वे सब लोग अशोकवनिकामें आये। उन सबको देखकर चक्रवर्ती राजा रविश्चन्द्रने बड़ी प्रसन्नताके साथ कहा—'भगवान् अशोकेश्वर एवं नर्मदादेवीकी महिमासे, मेरे दानके प्रभावसे तथा महर्षियोंके प्रसादसे ये सब मुनि कुत्तेकी योनि त्याग कर शिवलोकमें चले जायें और इनका सब पाप मुझमें आ जाय।'

राजाके ऐसा कहते ही वे सब मुनि तत्क्षण शापसे मुक्त हो गये और राजासे इस प्रकार बोले—आप ही हमारे माता-पिता और मोक्षदाता गुरु हैं। ऐसा कहकर वे सब महर्षि उमामहेश्वर-धामको चले गये।

तब सम्पूर्ण देवताओंने राजाको धन्यवाद दिया। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुई।

उस समय दुर्वासाजीने कहा—महाराज! क्षत्रियोंमें मैंने तुम्हारे समान दूसरे किसीको न तो देखा है और न सुना ही है। मनुष्योंके लिये अपने प्राणोंको त्याग देना तो सुकर है, परंतु अपने संचित धर्मका त्याग करना बहुत ही कठिन है। तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।

तब राजा हँसते हुए बोले—मुने! हमारे दानके प्रभावसे पापबुद्धिवाले मनुष्य भी उत्तम पदको प्राप्त हों, यही मेरा प्रिय वर है।

'एवमस्तु'—ऐसा ही होगा—यह कहकर मुनिवर दुर्वासा वहीं अन्तर्धान हो गये। अमित तेजस्वी राजाके उस अद्भुत कर्मको देखकर धर्मराजने कहा—'राजन्! मैं तुम्हें वर देता हूँ, जिसने अपना उत्तम पुण्य दे दिया, उसने यमलोक और देवलोकको भी जीत लिया। राजेन्द्र! तुम अवश्य वर पानेके योग्य हो।'

रविश्चन्द्र बोले—सूर्यनन्दन! मेरे सौ यज्ञ, दान और तपस्याके प्रभावसे वे सभी पापी जीव शिवधामको प्राप्त हो जायँ, जो इस समय पापयोनिमें पड़े हुए हैं। मैं इसी वरको प्राप्त करना चाहता हूँ, आप मुझपर कृपा करें।

यमराजने कहा—सत्यधर्मका पालन करनेवाले राजेन्द्र! तुम्हारी यह इच्छा पूर्ण हो। सुव्रत! इस सत्यके प्रभावसे तुम उत्तम लोकको जाओ। राजन्! तुमने जिन सैकड़ों क्षत्रियों और सहस्रों अन्यान्य जीवोंका पापसे उद्धार किया है, उन सबकी कोई गणना नहीं है।

ऐसा कहकर धर्मराज देव-दानववन्दित कामिक विमानपर आरूढ़ हो अपने लोकको चले गये।

$\sim\sim\circ\sim\sim$

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२९

वागीश्वरतीर्थमें राजा ब्रह्मदत्तके यज्ञमें प्रेतोंका उद्धार तथा सहस्रावर्त आदि तीर्थोंकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—नर्मदाके उत्तर तटपर वागीश्वर नामका एक पुर है, वहाँ वागु नामवाली नदी नर्मदाके साथ मिली है। उस संगममें जो स्नान करते हैं वे स्वर्गको जाते हैं और जो मरते हैं वे मुक्त हो जाते हैं। वहाँ दानवोंका विनाश करनेवाली वागीशा चामुण्डा रहती हैं। मणिभद्र और वीरभद्र आदि सैकड़ों राजा उस तीर्थके प्रभावसे शापमुक्त हुए हैं। वहाँ तिलसहित पिण्डदान करनेसे पितरोंको उत्तम गति प्राप्त होती है। सूर्यवंशमें अयोध्याके चक्रवर्ती राजा ब्रह्मदत्त प्रसिद्ध हैं। वे धन-धान्यसे सम्पन्न तथा भय और दरिद्रतासे रहित थे। उनके शासनकालमें समस्त प्रजा बड़े आनन्दसे रहती थी। उन्होंने नर्मदा और वागुके संगममें एक श्रेष्ठ यज्ञ किया था, जिसमें ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, गणेश तथा महादेवजी आदिने प्रत्यक्ष प्रकट होकर अपना भाग ग्रहण किया। राजा ब्रह्मदत्तकी यज्ञभूमि दस योजनतक फैली हुई थी। उनका यह यज्ञ स्वारोचिष मन्वन्तरके आदि-कल्पवाले सत्ययुगमें हुआ था। उस समय ब्रह्मदत्तके यज्ञसे तथा वागीश्वर और नर्मदाके प्रसादसे प्रेतोंको भी बड़ी तृप्ति हुई। वे प्रेत पहलेके वानप्रस्थ ऋषि थे। उन्होंने स्त्रियोंके आग्रहसे सूर्यग्रहणके अवसरपर कुरुक्षेत्रमें बहुत-सा दान लिया था। इसीसे वे प्रेतभावको प्राप्त हुए थे। प्रेत होनेपर भी उन्हें पूर्वजन्मका स्मरण बना रहा। अतः एकान्तमें बैठकर वे अपने विषयमें इस प्रकार शोक करने लगे—'अहो! जिनके लिये हमने प्रतिग्रह स्वीकार किया, वे हमारे पुत्र, पत्नी, भृत्य और भाई-बन्धु तो ज्यों-के-त्यों बने हुए हैं; वे उस प्रतिग्रहकी आगमें दग्ध नहीं हुए हैं। हमें अकेले ही उस आगमें जलना पड़ा है। यमदूतोंसे पकड़े हुए प्राणियोंके साथ उनके माता-पिता, भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र और धन आदि भी नहीं जाते, एकमात्र धर्म ही उनका साथ देता है।'

इस प्रकार दीर्घकालतक शोक करके स्त्री-पुत्रसे रहित हुए वे प्रेतगण सारी पृथ्वीपर घूम-घामकर नारदजीके उपदेशसे उमापति शिवका ध्यान करते हुए उसी वागीशपुरमें चले आये। वहाँ स्नान करके उन्होंने भगवान् शिव, विष्णु और सूर्यदेवका पूजन किया। ब्रह्मदत्तके उस यज्ञमें आकर वे सभी पापमुक्त हो गये और ब्रह्माजीके लोकमें गये। तदनन्तर राजा ब्रह्मदत्तके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! प्रतिग्रह एक भारी ग्रह है। जो लोभ और मोहसे मोहित हो उस ग्रहसे ग्रस्त हो गये हैं, वे घोर नरकमें डूबते हैं। यद्यपि वेदोक्त यज्ञ और तीर्थयात्रा आदि सत्कर्म भी सफल होते हैं, उनके द्वारा सद्गतिमें सहायता मिलती है, तथापि प्रतिग्रह (दान) लेनेवाले मनुष्य अपने आत्माको क्लेश देते हैं। दाता और याचककी क्या गति होती है, इसकी सूचना उनके हाथोंसे ही मिल जाती है। देनेवाला ऊपरको जाता है और लेनेवाला नीचेको।

सहस्रावर्त नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ है। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करनेवाले पुरुषको वृषोत्सर्गका फल प्राप्त होता है और वह अपनी सात पीढ़ीहतकको पवित्र कर देता है। नर्मदाके उत्तर तटपर यह तीर्थ सहस्र धनुषतक फैला हुआ है। उसके अन्तमें काराका उत्तम वन है। वहाँ स्नान करनेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है और मनुष्य स्वर्गलोकको जाता है। नर्मदाके उत्तर भागमें सौगन्धिक नामक परम सुन्दर वन है, जिसमें प्रवेश करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। तदनन्तर नदियोंमें उत्तम सरस्वती नदी हैं। उनके जलमें स्नान करना चाहिये। वहाँ देवताओं और पितरोंका तर्पण करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। वहीं ईशानाध्युषित नामक परम दुर्लभ तीर्थ है। नरश्रेष्ठ ! व्यतिपात योग, संक्रान्ति और ग्रहणके समय उस

१०३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तीर्थमें स्नान करके मनुष्य सहस्र कपिला गौओं, सुगन्धित पदार्थों और सुवर्णोंके दानका तथा पंच-यज्ञोंके अनुष्ठानका फल पाकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। भारत! वहीं त्रिशूल नामक तीर्थ है। वहाँ जाकर जो स्नान और देवता-पितरोंका पूजन करता है, वह देहत्यागके पश्चात् गणपति-पदको प्राप्त होता है। युधिष्ठिर! नर्मदाके उत्तर तटपर ब्रह्मह्रद नामसे विख्यात एक तीर्थ है जो इच्छानुसार भोग एवं फल देनेवाला है। यहाँपर श्राद्धका दान देनेसे पितर ब्रह्मलोकमें जाते हैं। नर्मदाके उत्तर भागमें अत्यन्त उत्तम सोमतीर्थ है। वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है।

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देवपथतीर्थ, शुक्लतीर्थ, दीप्तिकेश्वरकी महिमा, देवासुरोंके द्वारा महादेवजीकी स्तुति तथा वैष्णव तीर्थकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—तदनन्तर देवपथ नामक सर्वदेवमय शुभ तीर्थ है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करनेवाला पुरुष सब यज्ञोंका फल पाता है। वहीं देवपथ नामसे प्रसिद्ध शिवलिंग भी है, जिसका श्रद्धापूर्वक दर्शन करनेसे पितरोंकी उत्तम गति होती है। वहीं सहस्रयज्ञ नामका उत्तम तीर्थ है, जहाँ मार्गशीर्ष मासमें एकादशी तिथिको भगवान् विष्णुकी पूजा करके मनुष्य सहस्र यज्ञोंके अनुष्ठानका फल पाता है। उस तीर्थके प्रभावसे वह पापरहित हो जाता है। वह यमलोकको नहीं देखता और पशु-पक्षियोंकी योनिमें भी नहीं जाता। तदनन्तर शुक्लतीर्थमें जाय। उसमें स्नान करनेवाला मनुष्य दस गोदानका फल पाता है। शुक्लतीर्थ आठ हाथका है। वहाँ कालाग्निरुद्र तथा श्रीकण्ठदेव हैं। पूर्वकालमें इन्द्रने भी देवदेव उमापतिको नर्मदाके जलसे नहलाकर बिल्वपत्रोंद्वारा उनका पूजन किया था। शुक्लतीर्थके प्रभावसे ही देवता उद्दीप्त हो रहे हैं। वहीं कश्यपजीका देवताओं और सिद्धोंसे सेवित पुण्य आश्रम है। वहाँ दस हजार मुनि शुक्लेश्वरकी उपासना करते हैं। कुबेरने सूर्यग्रहणके अवसरपर शुक्लतीर्थमें चन्दन, अगर, कपूर, फूल-माला, चँदोवा, ध्वज तथा दीपमाला आदि उपचारोंसे महेश्वरका पूजन किया था। अतः उस तीर्थके प्रभावसे ही वे यक्षोंके राजा और धनके स्वामी हुए हैं। उसी तीर्थके प्रभावसे देवताओंने देवलोकमें नाना प्रकारके भोग प्राप्त किये हैं। वह तीर्थ सर्वतीर्थमय और सर्वदेवमय है। वहाँ स्नान और महादेवजीका पूजन करके मनुष्य सब देवताओं और दैत्योंके गणोंसे पूजित होता है।

राजन्! ययाति नामसे प्रसिद्ध एक चक्रवर्ती राजा हो गये हैं। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषका पूजन किया है। जहाँ पुण्यसलिला मधुमती नदी नर्मदाके साथ मिली है, वहाँ उन्होंने ब्राह्मण-ऋत्विजोंके साथ यज्ञ प्रारम्भ किया था। वहीं मध्येश्वरलिंग है जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर निवास करते हैं। वहाँ स्नान करनेवाले स्वर्गमें जाते हैं और जो वहाँ मरते हैं वे मुक्त हो जाते हैं। उसी स्थानपर भगवान् विष्णुने मधु और कैटभ नामक दैत्योंका वध किया था। वहाँ श्रीविष्णुदेवके पूजनसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। उस तीर्थमें तिलोंके साथ जलदान और पिण्डदान करनेसे पितर चौदह इन्द्रोंकी स्थिति-कालतक तृप्त रहते हैं। ययातिका यज्ञ पूर्ण होनेके पश्चात् वहाँ पातालसे कालाग्निके समान कान्तिमान् एक शिवलिंग प्रकट हुआ। भारत! उस लिंगकी प्रभासे सम्पूर्ण जगत् उज्ज्वल हो गया। तब लिंगरूपधारी भगवान् वृषध्वजने राजा ययातिसे कहा—'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।'

ययाति बोले—देव! आप भगवती पार्वतीके साथ यहाँ रहें और इस स्थानका कभी त्याग न करें। यहाँ किये हुए यज्ञ, दान आदि सब

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०३१

कार्य सदा अक्षय हों। तपस्या और दानसे रहित पापी मनुष्य भी यहाँ स्नान करके शुक्लतीर्थके प्रभावसे आपके लोकमें चले जायें।

महादेवजीने कहा—राजन्! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब सत्य होगा।

तत्पश्चात् सब देवता अपने-अपने विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको चले गये। राजर्षि ययाति भी दीर्घकालतक राज्यका पालन करके अन्तमें स्वर्गलोकको गये।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—दीप्तिकेश्वर नामसे प्रसिद्ध एक सिद्धलिंग कहा गया है, जिससे श्रेष्ठ तीनों लोकोंमें दूसरा कोई भी प्रसिद्ध नहीं है। दीप्तिकेश्वर देवका दर्शन, स्पर्श और पूजन करनेसे अनेक जन्मोंका घोर पाप क्षणभरमें नष्ट हो जाता है। जो मानव एक दिन या दो घड़ी भी उनकी पूजा करता है वह इस भयानक संसार-समुद्रमें फिर जन्म नहीं लेता।

देवताओंके स्वामी विष्णु, ब्रह्मा तथा अन्यान्य देवताओंके द्वारा विभिन्न नामोंसे उन उमावल्लभ महादेवजीकी स्तुति इस प्रकार की गयी— भगवान् शिव सदा रहनेवाले, अचल, प्रभा, प्रकाशरूप, दीप्तिमान्, श्रेष्ठ वर देनेवाले, अभीष्ट मनोरथ, पापहारी, श्वेतवर्ण, सब प्राणियोंका संहार करनेवाले, सर्वसमर्थ, संसारके कारण, वैराग्य एवं मोक्षके कारण, संयमरूप, सनातन, अटल, श्मशानवासी, भगवान्, आकाशमें विचरनेवाले, इन्द्रियोंमें व्याप्त, वन्दना करनेयोग्य, महान् कर्म करनेवाले, तपस्वी, समस्त प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, मतवाले वेषमें अपने स्वरूपको छिपाये रखनेवाले, सम्पूर्ण लोकोंकी प्रजाके पालक और स्वामी, विराट्स्वरूप, विशाल शरीरवाले, समस्त लोकोंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, समस्त प्राणियोंके परमात्मा, विविध रूपोंवाले, छोटे रूपवाले, मनन करनेवाले, सम्पूर्ण विश्वके पालक, छिपे रूपवाले, सदाप्रसन्न, संसार-बन्धनका नाश करनेवाले, प्रवृत्तिमार्गमें स्थित, महान् अंगोंवाले, समष्टिरूप, सबके सुनिश्चित आधार, सब कामनाओंसे सम्पन्न, स्वतः प्रकट होनेवाले, आदि और अन्त अर्थात् सृष्टि और संहार करनेवाले, जीवोंके आश्रय, सहस्रों नेत्रोंवाले, भयंकर नेत्रोंवाले, चन्द्रस्वरूप अथवा उमासहित, नक्षत्रोंको सिद्ध करनेवाले, चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु, ग्रह, ग्रहपति, श्रेष्ठ, तपस्याके साक्षी, बलस्वरूप, खड़े रहनेवाले, यज्ञरूपी मृगपर बाण चलानेवाले, पापरहित, महान् तपस्वी, दीर्घकालतक तपस्या करनेवाले, सबकी उत्पत्तिके आदिकारण, दीनोंपर दया करनेवाले, सूर्यरूपसे वर्ष पूरा करनेवाले, मन्त्र, प्रमाण, परम तपःस्वरूप, योगी, योगकी महान् शक्तिसे सम्पन्न, महान् वीर्यवाले, हर, महाचेता, सर्वज्ञ, कारणसहित, संहारकारी, हरण करनेवाले, कमण्डलुधारी, धनुष धारण करनेवाले, सबके प्राणोंको अपने हाथपर रखनेवाले, प्रतापवान्, जीवात्मारूप, अपनेसे भिन्न अन्य किसी ईश्वरसे रहित, शूलधारी, खट्वांगधारी, पट्टिशधारी, पवित्र, पवित्रस्वरूप, तेजःस्वरूप, तेज प्रकट करनेवाले, आश्रयस्वरूप, मुकुट धारण करनेवाले, सुमुख, जलमें रहनेवाले, विस्तार करनेवाले, सूर्यरूप, सूर्य और चन्द्रमारूपी नेत्रवाले, सुन्दर तीर्थरूप, अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले, शृगालेश्वररूपसे प्रकट, सर्वप्रयोजनरूप, सूँड धारण करनेवाले गणेशरूप, निर्मल, जलके आधारभूत कमण्डलुकी भाँति सम्पूर्ण संसारके आश्रय, अजन्मा, सुगन्धित माला धारण करनेवाले, हरिणरूपधारी, कपाल धारण करनेवाले, जिनके वीर्यकी गति ऊपरकी ओर है ऐसे, ऊपरके लोकोंके साक्षी, ऊँची उठी हुई भुजाओंवाले, नभ, अष्टमूर्तियोंमेंसे आकाशरूप, तीन जटा धारण करनेवाले, सब जीवोंके आवासस्थान, रुद्र, कार्तिकेयरूपसे देवताओंके सेनानायक, सर्वव्यापक, दिनमें चलने-फिरनेवाले, रातमें विचरनेवाले, जिनके श्रीअंगोंसे उत्तम सुगन्ध निकल रही है ऐसे, सम्पूर्ण दिशाओंके स्वामी राजाओंको मारनेवाले परशुरामरूप, त्रिपुरासुर-अन्धकासुर आदि दैत्योंको मारनेवाले, धारण-पोषण करनेवाले, रूपगुणस्वरूप, सिंह और

१०३२संक्षिप्त स्कन्दपुराण

शार्दूलरूपसे प्रकट—व्याघ्रेश्वर, गजासुरका गीला चमड़ा धारण करनेवाले, पीड़ा हरनेवाले, समयसे योगसाधनामें तत्पर, महानादस्वरूप, सबके निवासस्थान, चारों ओर जानेवाले मार्गस्वरूप, दुर्धर्ष प्रेतोंमें विचरनेवाले, समस्त प्राणियोंमें रहनेवाले, महान् ईश्वर, अनेक रूपोंमें प्रकट, बहुत धनवाले, समस्त पुरुषार्थस्वरूप, उत्तम गतिस्वरूप, ताण्डव-नृत्यको पसंद करनेवाले, ताण्डव-नृत्य करनेवाले, नाचनेवाले, मेघस्वरूप, भयंकर, बड़ी भारी तपस्या करनेवाले, सबमें वास करनेवाले, अविनाशी, पर्वतोंको धारण करनेवाले आकाशरूप, सहस्रों रूपोंमें प्रकट, जाननेयोग्य, उद्योग एवं निश्चयरूप, निर्णय एवं सिद्धान्तरूप, अन्याय न सहनेवाले, क्षमाशील, चतुर, दक्ष-यज्ञका विध्वंस करनेवाले, दक्षयज्ञका अपहरण करनेवाले, उत्तम उत्सवरूप, मध्यस्थ, विरोधियोंके तेजका अपहरण करनेवाले, दक्ष-यज्ञमें देवताओंके यज्ञभागका हनन करनेवाले, प्रसन्न, पूजित, सबके उत्पादक, गम्भीर गर्जना करनेवाले, गाम्भीर्ययुक्त, गम्भीर, हविष्य पहुँचानेवाले अग्निस्वरूप, वटवृक्षरूप, बरगद या अक्षयवटरूप, नक्षत्रोंकी भाँति चमकनेवाले, समर्थ, विभु, तीखे बाणवाले, सूर्य और चन्द्ररूप नेत्रोंवाले, महादेव, कर्म और कालके ज्ञाता, यज्ञ एवं व्रतकी दीक्षा देनेवाले, भक्तोंद्वारा प्रसन्न किये जानेवाले, यज्ञस्वरूप, समुद्ररूप, समुद्रान्तर्वर्ती बडवानल नामक अग्नि, यज्ञमें आहुतिरूपसे प्राप्त हविष्यके भोक्ता, अग्निमुख, प्रसन्नात्मा, अग्निरूप, महान् तेजस्वी, उत्तम तेजस्वी, विजय, जय, ज्योतिर्मण्डलके आश्रय, सिद्धिरूप, शत्रुओंसे मेल रखनेकी नीतिरूप, अवसर देखकर शत्रुके साथ युद्ध करनेकी नीतिरूप, शिखाधारी, दण्डधारी, जटा धारण करनेवाले, लपटवाले, मूर्तिमान् जलरूप, बलहीन, बाह्यस्वरूप, बाँसका डंडा धारण करनेवाले, पापियोंको वेतालकी भाँति भय देनेवाले, कालाग्नि, कालको भी दण्ड देनेवाले, तारास्वरूप अथवा अविनाशी शरीरवाले, अभ्युदयरूप, ब्रह्मारूप, सुगन्ध वहन करनेवाले वायुरूप, सबसे ज्येष्ठ, प्रजाजनोंके रक्षक, विष्णुस्वरूप, भुजाकी भाँति सबके सहायक, यज्ञमें विशिष्ट भाग ग्रहण करनेवाले, सब ओर मुखवाले, संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाले, देवसमुदायरूप, सुवर्णमय कवच धारण करनेवाले, जगत्स्वरूप रजोगुणरहित, भस्म लगानेवाले, बड़े आचारवान्, विख्यात यशवाले, आदिरहित, सब प्राणियोंके आदिकारण, सबके आदिपुरुष, सबके जन्मदाता, सबके ज्ञानदाता, सर्पस्वरूप, महान् आवाससे युक्त, तुच्छ वस्तु (धतूरों)-की माला धारण करनेवाले, मस्तकपर उठती हुई गंगाकी लहरोंको जाननेवाले, तीन वेद और तीनों लोक जिनके पद अर्थात् स्थान हैं, वे भगवान् शिव त्रिनेत्रधारी, अव्यक्त, सब बन्धनोंसे मुक्त करनेवाले, ज्ञानसे प्रसन्न होनेवाले, असुन्दर वस्त्र धारण करनेवाले, समस्त साधनोंसे सेवित, अपने मस्तकसे गंगाजीका स्रोत बहानेवाले, विभागरहित, सदा एकरस, यज्ञविभागके ज्ञाता, सबमें सदा रहनेवाले, सर्वत्र विचरनेवाले, दुर्वासामुनिस्वरूप, भैरव, यमराजस्वरूप, शीतल, चन्द्रस्वरूप, यज्ञस्वरूप, सबका धारण-पोषण करनेवाले, विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ, लाल-लाल आँखोंवाले, बड़े-बड़े नेत्रोंवाले, विजयस्वरूप, विशिष्ट विद्वान्, संग्रह, विग्रह, कर्म, नागेन्द्र-हारसे विभूषित, सबमें प्रमुख, विमुक्तदेह, शरीरमें रहनेवाले प्राणस्वरूप, कर्दमरूप, सर्वाचारस्वरूप, प्रसन्नतारूप, खेचरस्वरूप, बल और रूप धारण करनेवाले, आकाशवृत्तिरूप, निपात, सर्परूप, खलरूप, रौद्ररूप, देवताओंमें सूर्यरूप, रत्नस्वरूप किरणोंसे युक्त, उत्तम तेजवाले, वायुके समान वेगवाले, महान् वेगवाले, मनके समान वेगवाले, रात्रिचारी, सर्वावास, लक्ष्मीके निवासस्थान, व्यापक, लोकेश जिनकी कलाएँ हैं वे, हर, मुनि, आत्मगति, लोक, सहस्रमुख, विभुस्वरूप, यक्षोंसे युक्त, कुबेररूप, बाज पक्षीके समान वेगवाले, प्रकाशरूप, प्रजाओंके स्वामी, मतवाले, कामदेवके तुल्य रूपवाले, अर्थ और अनर्थकी प्राप्तिमें कारण, महान् सिद्धयोगस्वरूप, भक्तोंके क्लेशोंका अपहरण

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करनेवाले, सिद्ध, सर्वार्थसाधक, भिक्षु, भिक्षुरूप, छः प्रकारके ऐश्वर्योंके स्वामी, कोमल चमड़ीवाले, विशाल सेनावाले कार्तिकेयरूप, विशाख—स्कन्द, जिनका भाग लाठीमें बाँधा जाता है वे, गौओंके पालक, हाथमें वज्र धारण करनेवाले, रोकनेवाले, विशेष रूपसे स्थित, स्तब्ध करनेवाले, नक्षत्ररूप, शत्रुको भी सहारा देनेवाले, काल, वसन्तरूप, महुआके समान नेत्रोंवाले, बृहस्पतीरूप, अन्न ही जिनकी सेना है ऐसे, निष्ठावान् आश्रमसूचक, ब्रह्मचारी, लोकचारी, सर्वचारी, उत्तम रत्नोंके ज्ञाता, ईशान, ईश्वर, काल, निशाचारी, एकमात्र सबके धारण करनेवाले, अमित प्रमाणातीत, नदों और नदियोंको उत्पन्न करनेवाले, अव्यय, नन्दीश्वर, सुनन्दी, नन्दन, नन्दवर्धन, नागहारी, विहारी, काल, ब्रह्मवेत्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ, चतुर्मुख, महालिंग, चतुर्लिंग, लिंगाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, कालाध्यक्ष, युगोंको धारण करनेवाले, उमापति, उमाकान्त, गंगाधर, वर, सर्वार्थ, सब प्राणियोंका अर्थ सिद्ध करनेवाले, नित्य, सब व्रतोंके पालक तथा शुचि (पवित्र) हैं। नाथ! ब्रह्मा आदि देवताओं और महर्षियोंको भी जिनका ज्ञान नहीं होता, उन्हीं आप परात्पर परमात्माकी स्तुति कैसे की जा सकती है?

मार्कण्डेयजी कहते हैं—इस स्तोत्रको सुनकर श्रीमान् द्वीपेश्‍वर शिव प्रसन्नतापूर्वक मुसकराते हुए बोले—‘देवताओ! तुमलोग वर माँगो।’

देवता बोले—महेश्वर! आप दैत्योंके विनाश और हमारी रक्षाके लिये उद्यत रहें। जो पापपरायण अधम मनुष्य भी यहाँके पाँच लिंगोंका अर्चन करे उसे वह उत्तम गति प्राप्त हो, जो बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा भी दुर्लभ है।

पूर्वकालमें उसी तीर्थमें इन्द्रने देव-दानववन्दित देवाधिदेव उमापतिकी सहस्र नामोंद्वारा स्तवन किया था। इससे भगवान् शंकरका प्रसाद प्राप्त करके वे देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुए। इसी प्रकार कुबेरने लक्षेश्वर देवका स्तवन किया था। युधिष्ठिर! उस तीर्थमें जो मोक्षदा नामवाली देवी हैं, उन्हींको पार्वती जानो। मोक्षेश्वर सिद्धलिंग है, वहाँ देवता और असुर भी मस्तक नवाते हैं।

तदनन्तर परम उत्तम वैष्णवतीर्थको जाय। वह तीर्थ कोकिला नामसे विख्यात है और सब पापोंका नाश करनेवाला है। देवाधिदेव भगवान् जनार्दन उसे वैष्णवक्षेत्र कहते हैं। जो मनुष्य वहाँ परम पवित्र एकादशी व्रत करके दीपमालाको जगाता है, उसकी इस दुःखद मर्त्यलोकमें पुनः आवृत्ति नहीं होती। वहाँपर श्राद्ध आदि करनेसे पितरोंको अनन्त कालतक तृप्ति बनी रहती है। इसी तीर्थमें किये हुए पुण्यसे ध्रुव नक्षत्रोंके तेजसे परम उज्ज्वल होकर ध्रुवपदको प्राप्त हुए हैं। नर्मदा सर्वतीर्थमयी है, महादेवजी भी सर्वदेवमय हैं, बुद्धि सर्वधर्ममयी है तथा तपस्या क्षमा और सत्यमय है। पाँचों इन्द्रियोंको वशमें करना ब्रह्मचर्य है और यह ब्रह्मचर्य ही तपस्याका मूल है। क्षमा, सत्य, जप, स्वाध्याय और तप—इन्हींका नाम संयम है। राजन्! जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर द्वीपेश्‍वर, कपिलेश्वर और नरकेश्वर—इन सबका नाम लेता है, वह सब तीर्थोंका फल पाकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

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नर्मदाजीकी तथा भगवान् विष्णुकी स्तुति

मार्कण्डेयजी कहते हैं—पूर्वकालमें जब नर्मदा इस लोकमें आ रही थीं, उस समय देवताओं और ब्रह्मर्षियोंने उन्हें नमस्कार करके उनका स्तवन किया—‘देवि! आपने चराचर प्राणियोंसहित मर्त्यलोकको पवित्र एवं पुण्यमय कर दिया है। जलके रूपमें प्राप्त हुई नर्मदाजी महादेवजीकी उत्तम कला हैं। आप ही उमा, कात्यायनी, गंगा, यमुना, सरस्वती, चामुण्डा, चर्चिकादेवी तथा रेवा हैं। देवि! आपका प्रादुर्भाव भगवान् शंकरसे हुआ है। आप पुण्यमय प्रवाहस्वरूपा हैं। मेकल नामक

१०३४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


पर्वतसे प्रकट होनेके कारण आपको उसकी कन्या कहते हैं। सबने आपका स्तवन किया है। आपके तट यज्ञयूपसे सुशोभित हैं। आप समस्त तीर्थोंकी मुकुटमणि हैं और स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंको तारनेवाली और उनके पापोंका नाश करनेवाली हैं। लक्ष्मी, स्वाहा, स्वधा और यशस्विनी पुरुहूता भी आप ही हैं। सुव्रते! आपने जलरूपसे सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है। आपके संगम और सिद्धलिंगको देवता तथा असुर भी नमस्कार करते हैं।

युधिष्ठिरने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! जिस मनुष्यके कर्मरूप बन्धन नहीं टूटे हैं, उसे किस प्रकार परमपदकी प्राप्ति हो सकती है ?

मार्कण्डेयजी बोले—राजन् ! पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने महात्मा ब्रह्माजीको परमपद-प्राप्तिका उपाय बताया था। वह उपाय है—भगवान् विष्णुका स्तवन, जो इस प्रकार है—

'मैं कमलके समान नेत्रोंवाले पापहारी हरि श्रीनारायणदेवकी शरण लेता हूँ। जो सम्पूर्ण लोकोंके रक्षक, सहस्रों नेत्रोंसे विभूषित, अविनाशी एवं परम पदस्वरूप हैं तथा भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। जो सब भूतोंकी सृष्टि करनेवाले तथा अनन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं, जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, जो इन्द्रियोंके स्वामी, सत्यस्वरूप तथा विकाररहित हैं, उन श्रीविष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। जो हिरण्यगर्भस्वरूप, पृथ्वीको अपने गर्भमें रखनेवाले, अमृत (अविनाशी), सब ओर मुखवाले, नाशहीन तथा अपने सिवा किसी अन्य स्वामीसे रहित हैं, उन सूर्यके सदृश कान्तिमान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ। जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो द्युतिमान् देव, वैकुण्ठधामके अधिपति, सूक्ष्म, अचल, वरेण्य और अभयदाता हैं, उन भगवान् गरुड़वाहनकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्हें नारायण और हरि कहा गया है, जो योगात्मा, सनातन पुरुष तथा सब लोकोंको शरण देनेवाले हैं, उन अविनाशी ईश्वरकी मैं शरण लेता हूँ। जो सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी हैं, जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है तथा जो संहारकारी देवता हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। पूर्वकालमें जिनसे कमलयोनि प्रजापति ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ है, वे पितामह ब्रह्मासे भी परे विराजमान भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। प्राचीन कालमें जब महाप्रलय हो गया था, सम्पूर्ण चराचर जगत् नष्ट हो चुका था, उस समय जो योगस्वरूप परमात्मा अकेले ही शेष थे, वे श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जो पृथुरूपसे इस पृथ्वीको जीत लेते हैं, अथवा वाराहरूप धारण करके पृथ्वीको अपने अधिकारमें करते हैं, जो सत्य, काल, धर्म, क्रिया, फल और गुणस्वरूप हैं, सत्पुरुषोंकी वाणीरूप वे भगवान् वासुदेव मुझपर प्रसन्न हों।'

'योगावास ! आपको नमस्कार है। सबके आवासस्थान ! वरदायक ! यज्ञभोगी और पंचभोगी नारायण ! आपको नमस्कार है। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार रूपोंवाले जगद्धाम ! लक्ष्मीनिवास ! वरप्रद ! विश्वावास ! साक्षीभूत ! जगत्पते ! आपको नमस्कार है। ज्ञानसागर ! आप अजेय हैं। छः प्रकारकी ऊर्मियोंसे जिसका विभाग किया जाता है, वह सम्पूर्ण विश्व एकमात्र आपका ही स्वरूप है। आप वृषाकपि (शिव और विष्णु), मृगाधिप (नृसिंह) और काल हैं, आपको नमस्कार है। अव्यक्त प्रकृतिसे इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति हुई है और प्रभु श्रीविष्णु अव्यक्तसे परे हैं। जिनसे परे कोई वस्तु नहीं है, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ। ब्रह्मा और शिव आदि जिन शक्तिशाली श्रीहरिका नित्य चिन्तन करते हैं, जो व्यापक परमात्मा अपने एक अंशसे सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त करके स्थित हैं, जिनका किसी भी इन्द्रियसे ग्रहण नहीं होता, जो निर्गुण होकर भी सम्पूर्ण जगत्‌के शासक हैं, उन श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ। जो सूर्यनाड़ी पिंगला और चन्द्रनाड़ी इडाके मध्यभाग—सुषुम्णामें ज्योतिर्मय स्वरूपसे विराजमान हैं, जिन्हें क्षेत्रज्ञ कहते हैं, वे महात्मा श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जो कोई सिद्ध और महर्षि

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०३५


ज्ञानयोगके द्वारा जिनके तत्त्वको जानकर संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं, वे महात्मा मुझपर प्रसन्न हों। सब ओरसे कल्याणमय परमेश्वर! आपको नमस्कार है। आपके नेत्र, सिर और मुख सब ओर हैं। निर्विकार! आदिकल्प! हृदयस्थित परमेश्वर! आपको नमस्कार है। इन्द्रियातीत! आपको नमस्कार है। परमात्मन्! आपको नमस्कार है। जो राग-द्वेषसे मुक्त और लोभ-मोह आदिसे रहित पुरुष आपको जानते हैं, वे संसारमें आसक्त नहीं होते। आप शरीरसे रहित और अव्यक्त होते हुए भी सम्पूर्ण शरीरोंमें तदाकार हुए-से रहते हैं। अव्यक्त प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, पंचमहाभूत और इन्द्रियाँ—ये सब आपमें स्थित हैं, आप उनमें नहीं हैं। वे आपके आश्रयके बिना स्वयं नहीं टिक सकतीं। आप अव्यक्त पुरुष हैं, अति कूटस्थ हैं, गुणोंके स्वामी और ईश्वर हैं, हेतुरहित आवर्त, प्रभु तथा अपने-आपमें स्थित हैं। पुण्डरीकाक्ष! आपको नमस्कार है। वासुदेव! आपको नमस्कार है। जगन्नाथ! आप ईश्वर हैं; इससे परे और क्या कहा जा सकता है। आप भक्तोंको मुक्ति देनेवाले, गुरु और देवताओंके स्वामी हैं। समस्त प्राणियोंका पालन करनेवाले वे ही आप श्रीहरि जन्म-जन्ममें मेरे स्वामी हों। मैं अहंकार तथा सत्त्व आदि तीनों गुणोंसे बँधा हूँ। मेरी नासिका अपने कारणभूत पृथ्वीतत्त्वमें मिल जाय, मेरी जिह्वा जलतत्त्वमें विलीन हो जाय, मेरे नेत्र तेजस्-तत्त्वमें समा जायँ, स्पर्शेन्द्रिय वायुमें विलीन हो जाय, श्रोत्रेन्द्रिय आकाशमें लीन हो जाय, मन अपने कारणतत्त्व अहंकारमें लीन हो जाय और मेरा अहंकार मेरी बुद्धिमें प्रवेश कर जाय तथा मेरी बुद्धि आपमें तल्लीन हो जाय। समस्त इन्द्रियों, शब्दादि विषयों और पंचभूतोंसे मेरा वियोग हो जाय। मेरे सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण अपनी आश्रयभूता प्रकृतिमें समा जायें। मैं तो प्रभुओंके भी प्रभु, दोषरहित श्रीहरिकी शरण लेता हूँ। जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो महान् ऋषि तथा सम्पूर्ण भूतोंको उत्पन्न करनेवाले हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। जो ब्रह्मस्वरूप और सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्तिस्थान हैं, वे श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। महाप्रलयकालमें जब स्थावर-जंगम नष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण भूत ब्रह्मपत्नी—मायामें विलीन हो जाते हैं और महत्तत्त्व प्रकृतिमें लीन हो जाता है तथा वह प्रकृति जिनके आश्रित रहती है और वैदिक मन्त्रोंद्वारा जिनके लिये आहुति दी जाती है, वे श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, देवता, ब्रह्म, रुद्र, इन्द्र तथा योगियोंके तेजोंको जो सदा बढ़ाते हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। प्रभो! आप अजन्मा हैं, जगत्के लिये वास्तविक मार्ग आप ही हैं। आपकी कोई मूर्ति नहीं है तो भी विश्वकी सब मूर्तियोंपर आपका अधिकार है। आप नित्य नूतन हैं। प्रकृति, महत्तत्त्व और चेतन पुरुष रूपसे आप ही सुशोभित होते हैं। जो आत्मरूपसे अगोप्य (अपरोक्ष अनुभवके योग्य) और सबसे श्रेष्ठ हैं, उन श्रीहरिकी मैं शरणमें आया हूँ। चन्द्रमा और सूर्यके सदृश जो अपने तेजको स्वयं ही इस धराधामपर उतारते हैं, जिनसे सम्पूर्ण दिशाएँ प्रकट हुई हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों। जो सगुण, निर्गुण, चेतन, अचेतन, स्थूल, सूक्ष्म, सर्वगत और देहरहित हैं, वे महात्मा श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। सूर्यके समीपमें चन्द्रमाकी स्थिति है अर्थात् पिंगला नाड़ीके निकट जो इड़ा नाड़ी है—इन दोनोंके मध्यभाग अर्थात् सुषुम्णा नाड़ीमें जिनका चिन्तन किया जाता है, जो वहाँ अविचल, तेजोमय स्वरूपसे प्रकाशित होते हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों। प्रभो! जो नानात्वमें भी आपके एकत्वका दर्शन करते हैं, वे परमगतिको प्राप्त होते हैं। जो सब प्राणियोंमें सम, शत्रु, मित्र और उदासीन जनोंको प्रिय हैं, सबको समभावसे ग्रहण करते हैं, किसीसे कोई इच्छा नहीं रखते तथापि अपने भक्तोंको विशेषरूपसे अपनाते हैं, जो सब प्रकारसे जाननेयोग्य हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। यह समस्त चराचर जगत् और अण्डज, पिण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज—इन चार भेदोंवाला

१०३६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

प्राणिसमुदाय आपमें उसी प्रकार गूँथा हुआ है, जैसे डोरेमें मनके पिरोये होते हैं। आपके लिये धर्म और अधर्म नहीं है, आपका गर्भवास और जन्म भी नहीं होता। मैं जरा-जन्म और मृत्युके संकटोंसे मुक्ति पानेके लिये आप श्रीहरिकी शरणमें आया हूँ। श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ, शब्द आदि विषय तथा श्वास-प्रश्वास आदि चेष्टाएँ सभी योनियोंमें सुलभ हैं। यह शरीर काष्ठकी भाँति एक दिन नष्ट हो जानेवाला है। आत्माके लिये तो यह बड़ी भारी विपत्तिरूप है। अपने-आपका अकेला होना तो स्वयंसिद्ध है। केवल शरीरके जन्मसे ही इसमें पुनर्जन्मकी प्रतीति होती है। भगवन्! मैं अपने मन, बुद्धि और प्राणोंको आपमें ही लगाकर, आपके भजनमें तत्पर और आपकी ही शरण प्राप्त होकर मृत्युकालमें भी आपका ही स्मरण करूँगा। प्रभो! मेरे द्वारा पूर्वजन्ममें जो अशुभ कर्म किये गये हों वे वातादिजनित रोगोंके रूपमें मेरे शरीरमें प्रवेश करें, जिससे उन सबका ऋण उतर जाय।'

अन्यान्य यशस्वी पुरुषोंके लिये भी कल्याणका सबसे श्रेष्ठ उपाय यही है कि वे इस स्तोत्रका पाठ करें। यह सब पापोंकी शुद्धि करनेवाला, पुण्यस्वरूप तथा परमपदरूप है। सदा प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और सायंकालमें उठकर सब पापोंकी शान्ति करनेवाले इस जपनीय स्तोत्रका निरन्तर जप करना चाहिये—'मैं हरि, कृष्ण, हृषीकेश, वासुदेव, जनार्दन तथा जगन्नाथको प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापोंका निवारण करें। शंख, चक्र तथा शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले, मधुसूदन, लक्ष्मीपति श्रीविष्णुको प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापोंका नाश करें। जो जगत्‌का पालन करनेके लिये उद्यत रहनेवाले हैं, यशोदा माताके द्वारा कटिमें रस्सीसे बँधनेके कारण जो दामोदर नाम धारण करते हैं, सदा प्रसन्न रहते हैं तथा कमलके समान जिनके नेत्र हैं, उन अविनाशी विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ—वे मेरे पापोंका नाश करें। जो सब भूतोंके ईश्वर, अक्षर और अनिर्देश्य हैं और इसी रूपमें महात्मा पुरुष जिनका सदैव ध्यान करते हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरणमें आया हूँ। सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हुआ पुरुष जिनमें प्रवेश करके पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होता, उन श्रीहरिकी मैं शरणमें आया हूँ। जो ब्रह्माजीका शरीर धारण करके देवता, असुर और मनुष्यसहित सम्पूर्ण जगत्‌की बार-बार सृष्टि करते हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरणमें आया हूँ। सम्पूर्ण जगत्‌की योनिरूप जो भगवान् जनार्दन ब्रह्माजीका शरीर धारण करके सदा सृष्टिकर्ममें संलग्न रहते हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनसे परे दूसरी कोई वस्तु नहीं है, जिनमें यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है, जो सबके भीतर अन्तर्यामीरूपसे विराजमान एवं अनन्त हैं, उन सर्वव्यापी श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सम्पूर्ण चराचर भूतोंमें व्याप्त हैं, वे श्रीविष्णु ही मेरे समस्त पापोंका नाश करें। मेरे द्वारा जो निवृत्तिप्रधान कर्म अथवा भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये कर्म किया गया है, उससे मेरे अनेक जन्मोंके कर्मोंद्वारा संचित पाप अभी नष्ट हो जायँ। रात्रि, प्रातःकाल, मध्याह्न तथा अपराह्नकालमें अज्ञानवश मन, वाणी और क्रियाद्वारा जो कोई अशुभ कर्म किया गया हो, वह अभी क्षणभरमें नष्ट हो जाय। जैसे पानीमें नमक घुल-मिल जाता है, उसी प्रकार वह पापराशि भी विलीन हो जाय। दूसरोंको पीड़ा देना और परायीं निन्दा करना आदि दोष जो मैंने जन्मभर किये हैं, उनसे तथा दूसरोंके धन, खेत आदिके प्रति लोभ होनेके कारण क्रोध होनेसे जो मेरे द्वारा पापराशिका संग्रह किया गया है, वह पानीमें पिघलनेवाले नमककी भाँति विलीन हो जाय। विष्णु, वासुदेव, हरि, केशव, जनार्दन तथा श्रीकृष्णको नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है।'

युधिष्ठिर! इस स्तोत्रको ब्रह्माजीसे अंगिराने और अंगिरासे इन्द्रने प्राप्त किया। इधर, वसिष्ठजीने इस स्तोत्रको राजाओंमें श्रेष्ठ नाभागको सुनाया था। प्रजापालक राजर्षि नाभागने अतुल प्रभावशाली

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०३७


इस विष्णुस्तोत्रका सदैव पाठ किया। तत्पश्चात् नर्मदाके जलमें स्नान और अनेक प्रकारके दान करके राजा नाभाग अपनी पुरीको गये।

जो इस स्तोत्रद्वारा भगवान् जनार्दनकी स्तुति करता है, उसका इस घोर संसार-सागरमें पुनरागमन नहीं होता।


मेघनादतीर्थका प्राकट्य और उसकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! प्राचीन त्रेतायुगकी बात है। पुलस्त्यपौत्र त्रिलोकविजयी रावण देवताओंके लिये कण्टक हो गया था। वह वरदान पाकर देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग तथा राक्षस सबके लिये अवध्य हो गया था और पृथ्वीपर सब ओर इच्छानुसार विचरण करता था। उन दिनों परम सुन्दर देवगिरिपर मय नामसे विख्यात एक बलोन्मत्त दानव रहता था। रावण वहाँ मयको उपस्थित जान उसके समीप जाकर विनीतभावसे खड़ा हो गया। मयने दान और सम्मानपूर्वक रावणका स्वागत-सत्कार किया। तब रावणने मयसे पूछा—'प्रभो! यह किसकी कन्या है, इसका नाम क्या है और यह किसलिये उग्र तपस्या कर रही है?'

मय बोला—राक्षसराज! मैं दानवोंका राजा मय हूँ, मेरी पत्नीका नाम तेजवती है। यह सुन्दरी कन्या भी मेरी ही है। इसका नाम मन्दोदरी है। यह पतिके लिये तपस्या कर रही है।

मयका यह वचन सुनकर मदोन्मत्त रावण मयसे विनीत होकर बोला—महाभाग! मैं देवताओं और दानवोंका दर्प दलन करनेवाला पुलस्त्यपौत्र राजा रावण हूँ और आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप अपनी कन्या मुझे दे दें। उसे पितामह ब्रह्माजीके कुलमें उत्पन्न जान महात्मा मयने भी विधि-विधानसे उसके साथ अपनी पुत्रीका ब्याह कर दिया। मन्दोदरीको लेकर दुरात्माद्वारा पूजित राक्षस दिव्य विमानोंपर बैठकर उसके साथ क्रीड़ा करने लगा। कुछ कालमें पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ रावणने एक पुत्रको जन्म दिया। उस पुत्रने जन्म लेते ही संवर्तक मेघके समान बड़ी भारी गर्जना की, इसलिये ब्रह्माजीने उसका नाम मेघनाद रख दिया। मेघनादने बड़े होनेपर उत्तम व्रतका आश्रय लिया और उमासहित देवेश्वर भगवान् शंकरकी आराधना प्रारम्भ की। वह विधिपूर्वक व्रत, नियम, दान, होम, जप एवं दिव्य कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रतोंद्वारा अपने शरीरको कष्ट देने लगा। एक दिन मेघनाद कैलास पर्वतपर गया और वहाँसे एक शिवलिंग लेकर दक्षिण दिशाकी ओर लौट पड़ा। नर्मदाके किनारे पहुँचनेपर उसने उस लिंगको एक स्थानपर रख दिया और स्नान करके महादेवजीका पूजन किया। फिर अपना जप पूरा करके जब वह लंकामें जानेको उद्यत हुआ तब उसने वहाँ पड़े हुए एक अन्य शिवलिंगको बायें हाथसे उठाया। इस प्रकार जब वह पहलेवाले और दूसरे शिवलिंगको भी भक्तिपूर्वक ले जाने लगा, तब महादेवजीका वह महालिंग नर्मदाके जलमें गिर पड़ा और दूसरा भी नर्मदाके उत्तर तटपर गिर गया। जो नर्मदाके उत्तर तटपर गिरा, वह शोभायमान लिंग वहाँ मेघनादेश्वरके नामसे विख्यात हुआ और जो जलके भीतर गिर पड़ा, उसका नाम मध्यमेश्वर हुआ। मेघनाद उस लिंगको उठाना चाहता था, पर सफल न हुआ। उन दोनों विग्रहोंका अभिप्राय जानकर वह राक्षस आकाशमार्गसे लौट गया। तभीसे वह तीर्थ मेघनाद तथा मेघारव नामसे विख्यात हुआ। उत्तर तटपर खेटक नामक उत्तम तीर्थ हुआ। उसके पूर्वभागमें सब पापोंका नाश करनेवाला गर्जन नामक तीर्थ है। राजेन्द्र! जो उस तीर्थमें स्नान और एक दिन-रातका उपवास करता है, वह सनातन कल्याणका भागी होता है। जो उस तीर्थमें पिण्डदान करता है, उससे देवलोकमें पितृगण बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं। जो वहाँ ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह योगीजनॉंको मिलनेवाले उत्तम फलको पाता है।