स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
३३० स्पन्दकारिका औदासीन्य (मानसिक क्षोभ) शरीर में (धातु, बल, उत्साह, तेज शक्ति आदि) सभी कुछ नष्ट कर देने वाली है और उसका प्रसार अज्ञान से होता है । यदि वह उन्मेष के द्वारा उन्मूलित कर दी जाय तो कारण का अभाव होने से (वह) कहाँ से उत्पन्न हो पायेगी? ॥ ४० ॥
- सरोजिनी * अज्ञानतः सूतिः = अज्ञान से संसरण चक्र का प्रादुर्भाव होता है । बौद्ध धर्म में भी इसे 'अविद्या' के रूप में ग्रहण किया गया है । 'भवचक्र' की प्रथम श्रृंखला 'अविद्या' मानी गई है । विलुप्तं = 'विच्छिन्नं । निर्मूलतां नीतं ॥' (रामकण्ठाचार्य) उन्मेषेण = स्वभावालोकविकासेन (रामकण्ठाचार्य) विलुण्ठिका = धातुबलवर्णतेजःशक्त्यादीनां हठेन हर्त्री ॥ (रामकण्ठाचार्य) सूतिः = सरणं, प्रवृत्तिः । ग्लानि = हर्षक्षति अनुत्साहरूपा । (उत्पलाचार्य) ॥ विलुण्ठिका = विलुम्पिका । विनाशिनी । (उत्पलाचार्य) ॥ भट्टकल्लट ने 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार की है—'ग्लानिः किल शरीरस्य विनाशिनी । सा च ग्लानिरज्ञानादुत्पद्यते । तदज्ञानम् उन्मेषेणात्मस्वभावेन यदि नित्योझितं तदा सा कुतः, कारणरहिता भवेत्? अनेनैव कारणेन वलीपलितभावः शरीरदाढर्यं च योगिनाम् ॥१ उन्मेषेन = आत्मस्वभावेन (उत्पलाचार्य) दुःख की अनुभूति शरीर का चोर है । यह अज्ञान से उत्पन्न होती है । यदि यह अज्ञान उन्मेष के द्वारा विलुप्त होता है तो अपने कारण के अभाव में यह दुःख भला कहाँ रह सकता है ? दुःख की भावना जो कि व्यक्ति अपने शरीर को अपनी आत्मा मानकर अनुभव करता है—चोर की भाँति कार्य करती है जब कि यह पूर्णज्ञान के धन को चुराती है एवं बन्धन रूपा निर्धनता देती है । दुःखोत्पत्ति एवं उसकी सत्ता अज्ञान के कारण या आनन्द एवं ज्ञान से अभिन्न अपने आत्मस्वरूप की अप्रत्यभिज्ञा (Non recognition) के कारण होती है । अज्ञान एवं अप्रत्यभिज्ञान एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं । दुःखों के नष्ट हो जाने पर शरीर के अपरिहार्य दुःख भय भोग लुप्त हो जाते हैं और इनके लुप्त होने के अनुपात में योगी का यथार्थ स्वरूप उसी प्रकार प्रकट हो जाता है यथा स्वर्ण के तपाये जाने पर एवं उसके मल के नष्ट होने पर स्वर्ण अपने यथार्थ स्वरूप में प्रकट होता है अतः योगी का महत्तम धन है—अपनी दैहिक सत्ता में भी दुःखात्यन्ताभाव । जैसा कि योगिनी मदालसा ने भी कहा है कि— १. स्पन्दकारिकावृत्ति (कल्लट) ।
तृतीयः निष्यन्दः ३३१ ‘त्वं कञ्चुके शीर्यमाणे निजेस्मिन्देहे हेये मूढतां मा व्रजेथाः। शुभाशुभैः कर्मभिर्देहेमेतमदादिभिः कञ्चुकस्ते निबद्धः ॥ मा०पु० २५।१४ ॥ क्षीयमाण देह के रहने पर भी परमयोगियों को ग्लानि कभी नहीं होती—और यह ग्लान्य- भाव ही योगियों की विभूति है । 'देहावस्थितस्यापि सर्वदा ग्लान्यभाव एव परयोगिनो विभूतिः ॥' अज्ञान = 'अज्ञानं नाम जन्मपरिणामविवृद्धिक्षयविनाशात्मकविकारविर- हित नित्यनिर्विकारस्वस्वभावाप्रत्यभिज्ञानात् जन्मादिविकाराधिकरणे कलेवरादौ आत्माभि- मानः ॥ यस्मिंश्च सति प्रबुद्धो जनः तद्विकारान् जन्मादीन् आत्मनि आरोपयन् ग्लान्या विलुण्ठ्यते ॥ (रामकण्ठाचार्य) । आचार्य उत्पलदेव इस कारिका की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि आत्मसंवित् के उल्लास को कुण्ठित, लुप्त या विनष्ट करने वाली यदि कोई वस्तु इस शरीर में है तो वह है—ग्लानि । ग्लानि का अर्थ है अनुत्साह । उत्साह से ही स्वभाव की अभिव्यक्ति होती है । ग्लानि का जनक है—अज्ञान । यदि आत्मस्वभाव द्वारा उस अज्ञान को नष्ट कर दिया जाय तो जीवन में ग्लानि या अनुत्साह नहीं रह सकते । इसी अज्ञान और ग्लानि को मिटाकर योगी लोग जरा-मरण को मिटाकर शरीर को दृढ़ कर लेते हैं । ग्लानि = हर्षक्षति । अनुत्साहरूपा हर्षक्षति । विलुण्ठिका = विलुम्पिका, विनाशिनी । सृति = सरण । विलुप्त = निर्णोदित, नाशित ।१ ग्लानि = मान्द्य आदि जनित हर्ष की हानि । सा = वह ग्लानि । ‘देहे' = षाटकौशिक कलेवर में । विलुण्ठिका = धातुबलवर्णतेज एवं शक्ति आदि का हठपूर्वक हरण करने वाली । तस्याश्चाज्ञानतः = प्रतिपादित तत्त्वावगमाभाव के कारण । सृतिः = सरण अर्थात् प्रवृत्ति । तत् = अज्ञान । उन्मेषविलुप्तं = 'उन्मेष' के द्वारा अर्थात् वक्ष्यमाण स्वभावा- लोकविकास के द्वारा, विलुप्त—विच्छिन्न या निर्मूल । (ऐसी स्थिति में यह ग्लानि कारण-रहित होने के कारण भला अस्तित्व में कैसे रह सकती है? स्पष्ट है कि कारण के बिना कार्य रहता ही नहीं ।) अज्ञान—जन्म-परिणाम-विवृद्धि-क्षय-विनाश से युक्त-विकारों से विरहित, नित्य, निर्विकार, स्वस्वभाव के अप्रत्यभिज्ञात होने से जन्मादिविकाराधिकरण शरीरादिक में जो आत्माभिमान है वही अज्ञान है—'अज्ञानं नाम जन्मपरिणामविवृद्धिक्षयविनाशात्मक- विकारविरहितनित्यनिर्विकारस्वस्वभावाप्रत्यभिज्ञानात् जन्मादिविकाराधिकरणे कलेवरादौ आत्माभिमानः ॥' इसके होने से ही अप्रबुद्ध व्यक्ति उन विकारों को अर्थात् जन्मादिक विकारों को आत्मा में आरोपित करके ग्लानि के कारण विलुण्ठित हुआ करता है (लूट लिया जाता है, लँगड़ा हो जाता है) ‘लुण्ठ' = चुराना, लूटना, सामना करना, लंगड़ा होना ।— १. स्पन्दनिर्णय—क्षेमराज । २. उत्पलाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका ।
३३२ स्पन्दकारिका लुण्ठति । लुण्ठिष्यति । अलुण्ठीत । लुण्ठयति । = लुण्ठक (डाकू, चोर) । लुण्ठन = लुण्ठा (लूट, डाका) लुण्ठी (लूटपाट) । लुण्ठक = डाकू । वक्ष्यमाण उन्मेष के परिशीलन से आविर्भूत सत्यात्मप्रत्यय वाले व्यक्ति को ग्लानि कैसे हो सकती है? सहजानन्दहानिरूप ग्लानि का अभाव होना ही मुख्यफल है और साधना का गौण फल है—वलीपलितादिक का अभाव ।—इन दोनों के अभाव की स्थिति में कारण के बिना कार्याभाव के कारण—भला ग्लानि कैसे रह सकती है? कहा भी गया है—‘अनेनैव कारणेन वलीपलिताभावः शरीरदार्ढ्यं च योगिनाम्’ ।१ ‘उन्मेष’ द्वारा अज्ञान उन्मूलित होता है । ‘उन्मेष’ का स्वरूप क्या है? कारिकाकार कहता है— 'एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥ उन्मेष = आत्मबल । आकस्मिक आत्मबल । यदि किसी चिन्तनकर्ता का चित्त किसी एक विषय से सम्बद्ध चिन्ता में एकाग्रभाव से डूबा हुआ हो तो उसमें जिस स्वभाव के द्वारा सहसा कोई अन्य चिन्ता उभर आती है तो उस दूसरी चिन्ता की उत्पत्ति का कारण उन्मेष (आत्म बल का आकस्मिक विकास) है । कारिकाकार का कथन है कि ‘ग्लानि’ (औदासीन्य, बौद्धिक शैथिल्य, क्षोभ) शरीर के बल, तेज, धातु आदि सभी का विनाश करने वाली है । यह ‘ग्लानि’ अज्ञान से उत्पन्न होती है । यदि ‘उन्मेष’ का विकास किया जाय तो इस अज्ञान का मूलोच्छेद किया जा सकता है । अज्ञान के नष्ट होने पर (कारण के उच्छिन्न हो जाने पर) ग्लानि रूप कार्य का स्वयमेव उच्छेद हो जाता है । ग्लानि अज्ञान एवं उन्मेष—कारणकार्यवाद (Causation) (क) ‘कारण’ = ‘अज्ञान’ (ख) ‘कार्य’ = ‘ग्लानि’ । कारण का उच्छेद हो जाने पर कार्य स्वयं उच्छिन्न हो जाता है । कारण (अज्ञान)–कार्य (ग्लानि) । उन्मेष—अज्ञान का ध्वंस—ग्लानि का ध्वंस । ग्लानि = शरीर की विनाशक शक्ति है—‘ग्लानिः किल शरीरस्य विनाशिनी’,२ ‘ग्लानिर्विलुम्पिका देहे’ ।३ ‘ग्लानि’ और ‘अज्ञान’ का क्या सम्बन्ध है? यह ‘ग्लानि’ नामक मानसिक वृत्ति केवल ‘अज्ञान’ से उत्पन्न होती है—‘सा च ग्लानिरज्ञानादुत्पद्यते ॥’४ ‘अज्ञान’ का उच्छेद कैसे हो सकता है?—अज्ञानोच्छेद ‘उन्मेष’ से हो सकता है ‘तदज्ञानम् उन्मेषेणात्मस्वभावेन यदि नित्योज्झितं तदा सा कुतः, कारणरहिता भवेत् ॥’५ योगियों के शरीर पर जरा के लक्षण क्यों नहीं होते?—कारणरूप ‘अज्ञान’ के नष्ट हो जाने पर कार्यरूप ‘ग्लानि’ भी नष्ट हो जाती है और ‘उन्मेषतत्त्व’ का प्राचुर्य १. रामकण्ठाचार्य—‘स्पन्दकारिकाविवृति’ । २. भट्टकल्लट—‘स्पन्दसर्वस्व’ । ३-५. स्पन्दकारिका ।
तृतीयः निष्यन्दः ३३३ भी वर्तमान रहता है अतः योगी के शरीर में 'वलीपलित' नहीं होतीं और योगी का शरीर इनके अभाव के परिणामस्वरूप अत्यन्त दृढ़ रहता है— 'अनेनैव कारणेन वलीपलिताभावः शरीरदार्ढ्यं च योगिनाम्'१ अर्थात् योगियों के शरीर जराजन्य झुर्रियों एवं श्वेत बालों से मुक्त होते हैं। उन्मेष के दो पक्ष हैं—(१) सायोगिक (आकस्मिक) (२) साधनात्मक । (क) साधनात्मक दशा में एकाग्रता की स्थिति में उत्पन्न उन्मेष—जब कोई योगी विरागी होकर किसी निश्चित धारणा का आलम्बन लेकर एकाग्रता की चरमसीमा पर आरूढ़ हो जाता है तब उसमें स्वयमेव 'उन्मेष' का आविर्भाव हो जाता है। (ख) भट्टकल्लट की व्याख्या—आकस्मिक या सायोगिक उन्मेष—भट्टकल्लट कहते हैं कि—किसी विशिष्ट विषय के विमर्शन में व्यापृत चित्त में स्वभाव द्वारा ही अकस्मात् जो चिन्ता प्रादुर्भूत हो जाती है उस चिन्ता का कारण 'उन्मेष' है। 'एकत्र विषये व्यापृतचित्तस्य यतो यस्मात् स्वभावात् झगित्यन्या चिन्तोत्पद्यते, स चिन्तायाः कारणम् उन्मेषो ज्ञातव्यः ॥'२ यह (उन्मेषतत्त्व) दो चिन्ताओं के मध्यवर्ती सन्धिकाल में अनुभव में आता है। यह आन्तर विमर्श का विषय है। 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' कारिका (१।१) में प्रयुक्त 'उन्मेष' शब्द सङ्कल्पात्मक गतिमयता—इच्छाशक्ति—सङ्कल्प के द्योतक हैं— 'स्वस्वभावस्यैव शिवात्मक सङ्कल्पमात्रेण (प्रलयोदयौ) जगदुत्पत्तिसंहारयोः कार- णत्वं' (स्पन्दकारिकावृत्तिः भट्टकल्लट) यह 'एकचिन्ताप्रसक्तस्य' वाली कारिका के 'उन्मेष' से पृथक् अर्थ वाला है। उन्मेष का स्वरूप— एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥ ४१ ॥ किसी एक विचार में संल्लीन व्यक्ति के मन में जहाँ से अन्य विचार उत्पन्न होता है उसे 'उन्मेष' समझना चाहिए तथा (व्यक्ति को) स्वयं उसको (अन्तरावलोकन के द्वारा) जानना चाहिए ॥ ४१ ॥
- सरोजिनी * एकचिन्ताप्रसक्तस्य = दृश्यमान या स्मर्यमाण विशिष्ट वस्तुओं या दृश्यों के प्रति प्रसक्त व्यक्ति का इनमें से एक वस्तु की चिन्ता में मग्न होने पर 'यतो' जिस कारण से। चिन्त्याभासानुपरक्तज्ञानात्मा स्वस्वभावप्रकाश के कारणभूत 'अपर' (अन्य) चिन्ता से सम्बद्ध ज्ञानान्तर उत्पन्न हो जाता है।३ १. स्पन्दसर्वस्व । २. भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' । ३. रामकण्ठाचार्यः ।
३३४ स्पन्दकारिका पुरुष एक चिन्ता में संलग्न रहता है कि तत्काल दूसरी चिन्ता का उदय हो जाता है। यह किसके द्वारा होता है? इसी का अभिधान है—'उन्मेष' । प्रति व्यक्ति को उसी का अनुभव करना चाहिए। प्रथम चिन्ता की विस्मृति एवं दूसरी चिन्ता का उदय होना—इन दोनों के मध्य 'उन्मेष' स्थित है। उस उन्मेष से अपनी आत्मा को पहचानना चाहिए। दो चिन्ताओं के मध्य व्यापक रूप से अनुभूयमान 'स्वसंवेद्य' वही है किन्तु यह युवती के सहवास- सुख के समान उपदेश देने योग्य नहीं है।१ आचार्य क्षेमराज स्पन्दनिर्णय में कहते हैं—यह 'उन्मेष' किस स्वरूप वाला है? यह किस उपाय से प्राप्य है—ऐसी आशङ्का का उत्तर देने के लिए ही ग्रन्थकार ने निम्न श्लोक कहा—'एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः..... उपलक्षयेत्।' प्रसक्त = एकाग्रीभूत । प्रत्यभिज्ञा-टीका में भी कहा गया है कि—'शरीरमपि ये षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं शिव- रूपतया पश्यन्ति अर्चयन्ति च ते सिद्ध्यन्ति घटादिकमपि तथाभिनिविश्य पश्यन्ति अर्चयन्ति च तेऽपि इति नास्त्यत्र विवादः। इस विषय में कोई विवाद नहीं है कि केवल वे ही साफल्य नहीं पाते जो कि शरीर को भी शिव के रूप में मानते एवं पूजते हैं प्रत्युत वे भी जो शिव को ३६ तत्त्वों से अभिन्नमानकर पूजते हैं। उस दृष्टि से तो जो घटादि की भी पूजा करते हैं वे भी साफल्य पा लेते हैं।२ भट्टश्रीवामन का कथन है कि—क्योंकि ज्ञात वस्तु चेतना पर स्वयं आधृत है तथा क्योंकि इसे चेतना से पृथक् रूप में विद्यमान के रूप में कल्पित नहीं किया जा सकता अतः सब कुछ चेतना का विषय है अतः प्रत्येक को चेतना के साथ अपनी अभिन्नता की अनुभूति करनी चाहिए— 'आलम्ब्य संविदं यस्मात्संवेद्यं न स्वभावतः । तस्मात्संविदितं सर्वमिति संविन्मयो भवेत् ॥' श्रीज्ञानगर्भस्तोत्र में कहा गया है—'तुम्हारी क्रीड़ामय इच्छा (Playful desire) भेद का कारण बनती है जो कि 'प्रमाता' 'प्रमा' या 'ज्ञान' एवं 'ज्ञेय' के रूप में स्थित है। वह भेद (बहुत्व) तुम्हारी क्रीड़ात्मिका इच्छा के समाप्त हो जाने पर समाप्त हो जाती है। इस प्रकाश में कोई ज्ञानी पुरुष इसे अनुभव करता है—३ 'प्रमातृ-मिति-मान-मेयमय भेदजातस्य ते । विहार इह हेतुतां समुपयाति यस्मात्त्वयि ॥ निवृत्तविवृतौ क्वचितदपयाति तेनाध्वधुना । नयेन पुनरीक्षते जगति जातुचित् केनचित् ॥' १. स्पन्दप्रदीपिका २-३. स्पन्दनिर्णय
तृतीयः निष्यन्दः ३३५ (१) 'जीव' समग्र का एक रूप है। (२) 'जीव' की ही समस्त शक्तियाँ हैं क्योंकि विश्व उससे ही उत्पन्न होता है। ('सर्वभावसमुद्भवत्वं जीवस्य। संविद्येय प्रसूतायां जगतः सद्भावात्सर्वभावसमुद्भव- वत्वं जीवस्य। जीवादेव उदयति विश्वं अतः अयं सर्वमयो विश्वशक्तिः ।')¹ जीवात्मा सर्वमयता से अभिन्न है। जीव समग्र से अभिन्न है। समग्र से जीव की एकात्मता या अभिन्नता इस बात से प्रमाणित होती है कि जीव की समस्त वस्तुनिष्ठ जगत् के ज्ञान से अभिन्नता है। जगत् नील सुख दुःखादि रूप है। उपर्युक्त दोनों श्लोकों द्वारा समस्त भेदों के उन्मूलन का प्रतिपादन किया गया है। स्पन्दतत्त्व द्वारा विश्वोपदेश, मोक्ष एवं अभेद का उपदेश दिया गया है— (१) 'सर्वभेदपाद्योन्मूलन उपपत्ति परिघटिताश्च ज्ञानोपदेशकथाः ।' (२) 'स्पन्दतत्त्वेन एव विश्वोपदेशः स्वीकृतः ।' (३) 'एतत् प्रतिपत्ति सारतया एव मोक्षः ।' द्वैतवाद या व्यक्तिवाद के वृक्ष का उन्मूलन एवं समस्त विश्व के साथ ऐकात्म्य- भाव, अभिन्नता एवं अद्वैत भावना ही मुक्ति है।² 'उन्मेष'—किसी व्यक्ति का चित्त कभी किसी प्रकार की चिन्ता में लीन रहता है और तत्क्षण उसमें किसी अलक्षित आत्मशक्ति के कारण अकस्मात् कोई अन्य चिन्ता उदित हो जाती है। आत्मबल के इस तत्कालिक उदय को ही 'उन्मेष' का अभिधान दिया गया है। इसका साक्षात्कार या इसकी संवेदना साधक के स्वयं के सूक्ष्म आत्मनिरीक्षण के द्वारा ही संभव हो पाती है स्वतः नहीं। 'उन्मेष' का स्वभाव—भट्टकल्लट कहते हैं— यदि किसी विषयविशेष में चित्त पूर्णतः लीन है—चिन्तन एवं विचार-विमर्श में निमग्न है तो जिस स्वभाव के द्वारा उसमें अकस्मात् किसी अन्य चिन्ता का आगमन या उदय होता है उस अन्य चिन्ता के उदय (आविर्भाव) का वह मूल कारण ही 'उन्मेष' है। 'एकत्रविषये व्यापृतचित्तस्य यतो यस्मात् स्वभावात् झगित्यन्या चिन्तोत्पद्यते स चिन्तायाः कारणम् उन्मेषो ज्ञातव्यः ॥'³ भाव यह कि चित्त में एक चिन्ता के व्याप्त रहने पर भी जो अन्य चिन्ता अकस्मात् उदित हो जाती है उस अकस्मात् उदित चिन्ता का कारण 'उन्मेष' कहलाता है। 'उन्मेष' अज्ञान का उच्छेदक है—'उन्मेष' (१) एकचिन्ताप्रसक्त (एक विशिष्ट विचार-विमर्श में एकाग्र एवं निमग्न) चित्त में अकस्मात् जो अपर विचार या चिन्ता आविर्भूत हो जाती है उसका कारण मात्र 'उन्मेष' है। (२) इसकी अनुभूति योगियों को आत्म-शोध द्वारा ही संभव हो पाती है—'स तु स्वयमेव योगिना लक्षणीयः ॥'⁴ १-२. स्पन्दनिर्णय। ३-४. स्पन्दसर्वस्व।
३३६ स्पन्दकारिका (३) यह दो चिन्ताओं के अन्तरालवर्ती संधि-काल की वह अनुभूति है जो कि व्यापक रूप में अनुभूत हुआ करती है—'स तु स्वयमेव योगिना लक्षणीयः, चिन्ता द्वयान्तर्व्यापकतयानुभूयमानः ॥'१ एकचिन्ताप्रसक्तस्य—'स्पन्दनिर्णय' नामक ग्रन्थ में आचार्य क्षेमराज ने इस पदावली की व्याख्या यह की है कि— जब कोई योगी अपने दैनिक जीवन के समस्त दैनन्दिन आवश्यक कार्यों का त्याग करके किसी आलम्बन विशेष को पृथक्-पृथक् रूप में अपनी धारणा का विषय बनाकर उसकी गंभीर गवेषणा करते हुए एकाग्रता के चरम शृंग पर आरूढ़ हो जाता है तब उसमें स्वयमेव चित्ततत्त्व का चमत्कारमण्डित 'उन्मेष' उदित हो जाता है। विवेचना—'स्पन्दनिर्णय' के अनुसार 'उन्मेष' के उदय के लिए किसी भी व्यक्ति को वीतराग होकर चित्त को योगियों की भाँति एकाग्र करना चाहिए। एकाग्रता की यह प्रचण्डता एवं तीव्रता ही 'उन्मेष' के उदय का कारण बनती है न कि सामान्य व्यक्ति के व्यावहारिक जीवन में उदित सामान्य एकाग्रता। भट्टकल्लट का मत इससे भिन्न सा प्रतीत होता है क्योंकि वे 'एकचिन्ता- प्रसक्तस्य' का अर्थ यह करते हैं—'एकत्र विषये व्यापृतचित्तस्य' क्षेमराज की व्याख्या के अनुसार तो 'उन्मेष तत्त्व' का उदय मात्र योगियों में२ ही संभव है—प्रचण्ड एकाग्रता के साधक योगियों में ही इसका आविर्भाव संभव है। काश्मीरी शैवदर्शन संसारित्व में भी शिवत्व के साक्षात्कार की संभावना में विश्वास रखता है क्योंकि विश्व भी तो शिवत्व का ही स्वरूप-विकास है—शक्ति का आत्मप्रसार है—शिवशक्ति का बाह्योन्मुखी विराट् प्रसार है और उसकी बाह्यवर्ती अभिव्यक्ति है। अतः 'उन्मेष' के उदय के लिए संसार का त्याग करके गुफागत, एकान्तिक एवं वैराग्यपूर्ण जीवन ही आवश्यक नहीं है प्रत्युत् संसार के प्रतिकण में विद्यमान उस उन्मेष तत्त्व को संसार के किसी भी पदार्थ एवं उसकी किसी भी अवस्था में देखा जा सकता है। भट्टकल्लट 'एक विषये व्यापृतचित्तस्य' कहकर यह सिद्ध करते हैं कि 'उन्मेष तत्त्व' चित्त में प्रतिक्षण आविर्भूत एवं लयीभूत अनन्त चिन्ताओं के अन्तरालवर्ती संधिकालों में नित्य उदीयमान तत्त्व है और इसकी अनुभूति योगी ही नहीं प्रत्युत् प्रत्येक गृहस्थ भी एकाग्रता के क्षण में दो चिन्ताओं के मध्यवर्ती क्षणों में कर सकता है। यह प्रत्येक व्यक्ति के आन्तर विमर्श का विषय है और यह 'उन्मेष तत्त्व' 'ग्लानि' के उत्पादक 'अज्ञान' का भी उच्छेदक है— 'ग्लानिर्विलुम्पिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः। तदुन्मेषविलुप्तं चेत् कुतः सा स्यादहेतुका ॥'३ 'अज्ञान' बौद्ध धर्म में 'अविद्या' के रूप में ग्रहण किया गया है। यह 'अविद्या'— भवचक्र की प्रथम श्रृंखला है। 'प्रतीत्यसमुत्पाद' का भी इससे संबन्ध है— १-२. स्पन्दसर्वस्व। ३. स्पन्दकारिका (४०)।
तृतीयः निष्यन्दः ३३७ प्रतीत्य-समुत्पाद के अंग- अविद्या संस्कार विज्ञान नामरूप षडायतन स्पर्श वेदना तृष्णा उपादान भव जाति जरा-मरण यही भव-श्रृंखला भी है । ये ही है— ‘भवचक्र’ के १२ अंग— ‘अविज्जा पच्चया संखारा, संखार पच्चया विज्ञाणं, विञ्जापच्चया नामरूपं, नामरूप पच्चया षडायतनं, षडायतन पच्चया फस्सो, फस्स पच्चया .... ‘भवचक्र’ प्रथम अंग = ‘अविद्या’ अन्तिम अंग = ‘मृत्यु’ । यौगिक सिद्धियाँ और उन्मेषानुशीलन— अतो बिन्दुरतो नादो रूपमस्मादतो रसः । प्रवर्ततेऽचिरेणैव क्षोभकत्वेन देहिनः ॥ ४२ ॥ इसलिए (उन्मेष के अनुशीलन करने से) स्वल्पकाल में ही ‘बिन्दु’ ‘नाद’ ‘रूप’ एवं ‘रस’ (अभिधान वाली) सिद्धियाँ अभिव्यक्त हो जाती है किन्तु (देहाभिमानी प्राणियों को ये सिद्धियाँ) क्षोभ में डाल देती हैं ॥ ४२ ॥
- सरोजिनी * अतः = उन्मेष के अनुशीलन से 'अनुशील्यमानात्' इस कारिका में यौगिक सिद्धियों पर प्रकाश डाला गया है । अतो = (अस्मात्) इससे । अर्थात्—इस उन्मेष से । इस प्रतिपादित स्वरूप वाले उन्मेष से । 'अचिरेण' = अल्प काल में । शीघ्र ही । प्रवर्तन्ते = आविर्भूत होते हैं । बिन्दु = भ्रूमध्य आदि प्रदेशों में ध्यानाभ्यासप्रकर्ष से प्रवर्धमान उत्तरोत्तर प्रसाद तेज- विशेष । धरातत्त्व का ध्यान करने वाले योगियों के द्वारा बिन्दु के भेदाभ्यास द्वारा यह तेज विशेष आविर्भूत होता है । नाद—इसे व्योमतत्त्वाभ्यासी सुनते हैं । नदी—घन आदि के निर्घोष सूक्ष्मीभावाभिव्यज्यमान होकर मधुमत्त मधुकर ध्वनि का अनुकरण करने वाली स्वोच्चरित ध्वनिविशेष ॥ रूपं—इसे तेजस्तत्व के अभ्यासी देखते हैं । दृश्य एवं वस्तु का आकार ही रूप है । रसो = रसवान वस्तु की अनुपस्थिति में भी मुख में होने वाला अमृतास्वाद । इसका अनुभव लोलाग्रलम्बिका आदि में धारणा करने वालों को होता है । पवन तत्त्व का ध्यान करने वालों को स्पर्श विशेष एवं जलतत्त्व का ध्यान करने वालों को रसविशेष का अनुभव होता है ।१ १. स्पन्दकारिकाविवृति । स्पं० २२
३३८ स्पन्दकारिका इस 'उन्मेष' का अनुशीलन करने के ही समय में भ्रूमध्य में तेजोबिन्दु का अनुभव होने लगता है । बिन्दु के पश्चात् अनाहत-अकृत्रिम नाद की अनुभूति होती है । इसे ही 'शब्दब्रह्म' कहते हैं । दूर से श्रवण की सिद्धि भी हो जाती है । अंधकार में रूप का दर्शन, देवता का दर्शन, सूक्ष्मातिसूक्ष्म का दर्शन, मुख में अमृत और षड्रस का आस्वादन आदि भी अनुभव में आते हैं । ये क्षोभक हैं? अर्थात् आत्मसंवित् की अनुभूति में विघ्न है । पंतजलि ने योगदर्शन में व्युत्थान काल में उत्पन्न सिद्धि को समाधि में विघ्न माना है । इस कारिका में प्रोक्त बिन्दु-नाद आदि का निरूपण सृष्टि-क्रम को भी ध्वनित करता है । 'उन्मेष' से सृष्टि होती है । उन्मेष से पूर्व बिन्दु (इच्छा = दृक् शक्ति का प्रसार) फिर शब्दात्मक नाद की उत्पत्ति होती है । वह क्रियाशक्ति रूपवाक् है । इसके अनन्तर रूप का उदय होता है । वह है पदार्थ का दर्शन एवं विचार । फिर उसी में इस अर्थात् अभिलाषा और उपभोग का जन्म होता है । जो रहस्यवेदी अनुभवी महापुरुष हैं वे इनको 'उद्योग', 'अवभास', 'चर्वण' और 'विलापन' कहते हैं । इससे स्वयं आत्म- संवित् का साक्षात्कार हो जाता है ।१ 'नाद' शब्दात्मक, वागाख्य एवं क्रियाशक्तिरूप है । आत्मसाक्षात्कार कैसे होता है? इसका उपाय निम्नांकित है— दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते । तदा किं बहुनोक्तेन स्वयमेवावभोत्स्यते ॥ ४३ ॥ सारांश—इस कारिका में, प्राप्त होने वाली सिद्धियों से योगियों को सावधान किया गया है क्योंकि ये सिद्धियाँ उपलब्धियाँ नहीं प्रत्युत् विघ्नपरम्परायें हैं ।२ योगदर्शन में भी इन्हें उपसर्ग कहा गया है— 'ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥ (पा०यो०सूत्र ३.३७) स्पन्दात्मक शाक्त भूमिका की अनुभूति प्राप्त करना या शिवत्व या 'प्रत्यभिज्ञा' ही साध्य है—न कि निम्नकोटिक सिद्धियाँ ॥ उन्मेष से उपलक्ष्यमाण प्रलीयमान स्थूल सूक्ष्मादिक देहाहंभाव वाले योगी को शीघ्र ही भ्रूमध्य आदि में तारक का प्रकाश रूप 'बिन्दु' (अशेष वेद्य सामान्य प्रकाशात्मा बिन्दु), 'नाद' (सकल वाचक अविभेदशब्दनरूप अनाहत ध्वनि रूप नाद), 'रूप'— अंधकार में भी प्रकाशक तेज 'रस'—रसनाग्र पर लोकोत्तर आस्वाद की प्राप्ति होती है । किन्तु ये सिद्धियाँ क्षोभक हैं और विघ्न हैं— 'ते क्षोभकत्वेन स्पन्दतत्त्वसमासादनविघ्नभूतसंतोषप्रदत्वेन वर्तन्ते ।।' यदाहुः—'ते समाधातुपसर्गौ व्युत्थाने सिद्धयः ।।' (पातं०सू० ३।३७) इस प्रकार उन्मेष निभालन (उन्मेष का अन्तरावलोकन) में उद्यत योगी के लिए भी देहात्माभिमानी के लिए बिन्दु एवं नाद की उक्त सिद्धियाँ मात्र विघ्न हैं । जो योगी अपनी देह प्रमातृत्ता का उन्मेष के यथार्थ स्वरूप में विलय कर देता है वह सशरीरी होने पर भी १. स्पन्दप्रदीपिका । २. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य)।
तृतीयः निष्यन्दः ३३९ परप्रमातृता प्राप्त कर लेता है—'उन्मेषात्मनिस्वभावे देहप्रमातृतां च निमज्जयति, तदा- कारामपि परप्रमातृतां लभत इत्याह ॥'१ भट्टकल्लट 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में कहते हैं— 'अतः अस्माद् उन्मेषाद् अनुशील्यमानात् 'बिन्दुः' तेजोरूपः, 'नादः' प्रणवाख्यः शब्दः, 'रूपम्' अंधकारे दर्शनम्, 'रसः' अमृतास्वादो मुखे, ऐन क्षोभकत्वेन प्रवर्तन्ते अचिरेण कालेन ॥' भाव यह कि सततानुशीलन किये जाने वाले उन्मेष के द्वारा योगी में अत्यल्पकाल में ही 'बिन्दु' (एक विशिष्ट विलक्षण तेज) 'नाद' (प्रणव या ओंकार नामक अनाहत शब्द), 'रूप' सघन तमिश्रा में भी पदार्थों को देख सकने का सामर्थ्य एवं 'रस' (मुख में अमृतवत मधुर अस्वाद)—एतत् प्रकार अनेक सिद्धियाँ आविर्भूत हो जाती हैं किन्तु ये सिद्धियाँ व्युत्सर्ग हैं क्योंकि ये क्षोभ में डाल देती हैं । विनायक गण साधकों को सिद्धियों के द्वारा अधःपतित भी करते हैं अतः योगसिद्धियों की वाञ्छा स्पृहणीय नहीं है— 'तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः । तस्मान्न तेषु संसक्तिं कुर्वीतोत्तमवाञ्छया ॥' (मा०वि०) (शिवसूत्रः २।१०) अपने स्थिर मन को स्पन्दात्मक स्वभाव में नियोजित न करके क्षणिक प्रलोभनों में फँसाना केवल अधःपतन का कारण बनता है क्योंकि सिद्धियाँ— 'प्रसह्य चंचलीत्येव योगिनामपि यन्मनः' (स्व०तं० ४।३११) किन्तु—'यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिरः पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतस्य तु ॥ (स्व०तं० ४।३१२) कारिकाकार का कथन है कि स्वल्प समय में ही 'बिन्दु', 'नाद', 'रूप' एवं 'रस' नाम्नी सिद्धियाँ व्यक्त हो जाती हैं किन्तु जिस योगी का देहाभिमान पूर्णतः गलित न हुआ हो उनके लिए ये क्षोभकारक हैं । आचार्य भट्टकल्लट कहते हैं—'अतः अस्माद उन्मेषाद् अनुशील्यमानात् 'बिन्दुः' तेजोरूपः, 'नादः' प्रणवाख्यः 'शब्दः', 'रूपम्' अंधकारे दर्शनम्, 'रसः' अमृतास्वादो मुखे, एते क्षोभकत्वेन प्रवर्तन्ते अचिरेण कालेन ॥ यौगिक सिद्धियाँ—सारांश—योगी उन्मेषानुशीलन के क्षण शीघ्र ही (साधना में स्वल्प कालातिक्रम के अनन्तर ही)— (क) बिन्दु अर्थात् विशेष प्रकार के तेज का साक्षात्कार करने लगता है = आँख (ख) नाद—प्रणव (ॐ) नामक अनाहत ध्वनि का श्रवण करने लगता है 'कान' (ग) रूप—प्रगाढान्धकार में भी पदार्थों को देखने की क्षमता प्राप्त कर लेता है— 'आँख' । १. स्पन्दनिर्णय
३४० स्पन्दकारिका (घ) रस—मुख में अकारण अमृततुल्य स्वादों की अनुभूति करने लगता है 'जीभ' किन्तु देहाभिमानी साधकों को ये सिद्धियाँ पतन के गर्त में ढकेल देती है—उनके क्षोभ का विषय बनती है। 'स्पन्दकारिकाविवृति' में इन सिद्धियों का सविस्तार विवेचन किया गया है जो निम्नानुसार है— (१) बिन्दु = पृथ्वी तत्त्व को धारण करने वाले योगियों को ध्यान की एकाग्रता की प्रखरता के कारण भ्रूमध्य के स्थान पर एक विशेष प्रकार का अत्यन्त प्रखर तेज प्रत्यक्षीकृत होता है। इसे ही 'बिन्दु' या 'बिन्दु-भेदन' (बिन्दु-भेद) कहते हैं। 'बिन्दु', भ्रूमध्यादौ प्रदेशे ध्यानाभ्यासप्रकर्षप्रवर्धनमानोत्तरप्रसादस्तेजोविशेषो, यो बिन्दुभेदाभ्यासाद् धरातत्त्वध्यायिनामभिव्यज्यते ॥१ (२) नाद—आकाशतत्त्वाभ्यासीसाधक एक स्वयंभू अनाहत ध्वनि सुनने लगते हैं। यह ध्वनि प्रखर वेग प्रवाहिता किसी सरिता की उत्तुंग तरंगों की भीषण ध्वनि के समतुल्य होती है और यही ध्वनि शनैः शनैः मधुमत्त भ्रमरों की मधुर झंकृति के समान श्रुतिगोचर होती है—'नादो'—वेगवन्नद्यौधनिर्घोषघनोपक्रमः क्रमसूक्ष्मीभावाभिव्यञ्जमान- मधुमत्तमधुकरध्वनितानुकारी स्वोच्चरितो ध्वनिविशेषो, य व्योमतत्त्वाभ्यासिन शृण्वन्ति।२ (३) रूप—अग्नितत्त्व (तेजस्तत्व) की धारणा करने वाले योगियों को प्रगाढान्ध- कार में भी अदृश्य वस्तुएँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं—'रूप'—सन्तमसाद्यावरणोऽपि सति तत्तददृश्यवस्त्वाकारदर्शने, यत् तेजस्तत्वन्यक्षनिक्षिप्तमतयो निरीक्षन्ते ॥'३ (४) रस—जलतत्त्व की धारणा करने वाले योगी अपने जिह्वा के अग्र भाग में या उसके समीपस्थ लम्बिका पर धारणाभ्यास करते हैं। इस धारणा की सिद्धि होने पर वस्तु को खाये बिना ही योगी को इन स्वादिष्ट पदार्थों के सुमधुर स्वादों की अनुभूति होने लगती है। 'रसो' रसवद्वस्तुनि विरहेऽपि अमृतास्वादो मुखे लोलग्रलम्बिकादिधारणा निरन्तर- भारतत्त्वध्यायिभिर्डपलभ्यते ॥'४ इसी प्रकार की सिद्धियाँ स्पर्शतन्मात्रा एवं गंध की भी हैं किन्तु इनका उल्लेख कारिका-व्याख्या में नहीं किया गया है; यथा 'तन्त्रालोक' में, 'मालिनीविजय', 'विज्ञानभैरव' आदि ग्रन्थों में एवं पतञ्जलि के योगसूत्रों में ऐसी सिद्धियों का सविस्तार वर्णन किया गया है। कारिकाकार ने इस कारिका में मात्र चार तत्त्वों एवं तीन इन्द्रियों से सम्बद्ध (पृथ्वीतत्त्व, आकाशतत्त्व, जलतत्त्व एवं अग्नितत्त्व तथा चक्षुरेन्द्रिय, श्रवणेन्द्रिय एवं रस-नेन्द्रिय से सम्बद्ध) मात्र सिद्धियों का ही उल्लेख किया है अन्य सिद्धियों का नहीं। १-४. स्पन्दकारिकाविवृति।
तृतीयः निष्यन्दः ३४१ कारण यह है कि सिद्धियाँ साधनमार्ग के विघ्न हैं—'ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ।' (३।३७)१ स्पन्दशास्त्र के आचार्यों ने इन्हें हेय मानकर इनको कोई महत्त्व नहीं दिया क्योंकि ये सिद्धियाँ स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका की दिव्यानुभूतियों के मार्ग के प्रत्यूह हैं । 'मालिनी वार्तिक' में कहा गया है कि विनायक गण स्वरूपानुसन्धान के यात्रियों को सिद्धियों के विघ्नों की सहायता से आगे यात्रा करने से रोककर उनको पथभ्रष्ट कर देती हैं— 'वासना मात्रलाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते । तम नित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः । तस्मान्न तेषु संसक्तिं कुर्वीतोत्तमवांञ्छया ।।' (मालिनीविजय) । आचार्य क्षेमराज 'शिवसूत्रविमर्शिनी' में सूत्र (२.४) की व्याख्या में कहते हैं कि—ये सिद्धियाँ केवल 'अख्याति' (अज्ञान या महामाया) के समतुल्य हैं और साधक इन्हें प्राप्त करने के बाद मित जगत् की मित उपलब्धि मात्र से ही संतोष करके परोपलब्धि की यात्रा बन्द कर देता है । ये सिद्धियाँ अशुद्ध विद्या तथा किंचिज्ज्ञातृत्वादि भ्रामक विकल्प एवं भ्रम के कारक होने के कारण हेय हैं— 'गर्भे चित्तविकासोऽविशिष्टविद्यास्वप्नः ।। २।४ ।। 'गर्भः अख्यातिर्महामाया' तत्र तदात्मके मितमन्त्रसिद्धिप्रपंच चे यश्चित्तस्य विकासः, तावन्मात्रे प्रपंचे संतोषः, असावेव अविशिष्टा, सर्व जनन साधारणी विद्या, किंचिज्ज्ञत्व- रूपा अशुद्धविद्या, सैव स्वप्नो, भेद निष्ठो विचित्रो विकल्पात्मा भ्रमः तदुक्तं पातञ्जले— 'ते समाधावुपसर्गों व्युत्थाने सिद्धयः ।। (३।३७)'२ महर्षि पतञ्जलि का मत—महर्षि पतञ्जलि का कथन है कि 'ऋतंभरा प्रज्ञा' से मण्डित साधकों को पथभ्रष्ट करने के लिए इन सिद्धियों की अधिष्ठात्री देवियाँ इन्हें प्रलोभनों के चक्रव्यूह में फँसाने के लिए सदैव तत्पर रहती है । 'स्वच्छन्दतन्त्र' में भी इसी दृष्टि का प्रतिपादन किया गया है— (क) प्रसह्य चंचलीत्येव योगिनामपि यन्मनः । (स्व०तं० ४.३११) किन्तु— (ख) यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिर पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतस्य तु (स्वं०तं० ४.३१२) सिद्धियों के अनेक प्रकार हैं तथा— (१) अणिमा (२) गरिम (३) लघिमा, (४) महिमा (५) प्राप्ति (६) प्राकाम्य (७) ईशित्व (८) वशित्व तथा—दूर दर्शन, दूर श्रवण, दूरास्वाद परकायप्रवेश, परचित्तज्ञान, भूचरत्व आदि ।। महर्षि पतञ्जलि सिद्धियों को साधना मार्ग का 'उपसर्ग' मानते हैं— १. योगसूत्र । २. शिवसूत्रविमर्शिनी (२.४) ।
३४२ स्पन्दकारिका प्रत्येक भाव में स्पन्दात्मक स्वरूप की अनुभूति द्वारा प्रथमाभास— दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते । तदा किं बहुनोक्तेन स्वयमेवावभोत्स्यते ।। ४३ ।। जब योगी दिदृक्षा¹ (देखने की इच्छा) के द्वारा ही समस्त पदार्थों को व्याप्त करके दृढ़ रूप में स्थित रहता है तब अधिक कहने से क्या लाभ? (तब तो वह यह) स्वयं अनुभव करेगा ।। ४३ ।।
- सरोजिनी * आभास के दो प्रकार होते हैं—(१) ‘निर्विकल्प’ (२) ‘सविकल्प’ अतः आभास के ‘सविकल्प आभास’ एवं ‘निर्विकल्प आभास’ के रूप में द्विभेदरूप हैं। प्रथमाभास के स्तर पर समस्त भाव सामान्य स्पन्द रूप या चिद्रूप रहते हैं। उनका संवेदन भी विशुद्ध अहं के रूप वाला होता है। सविकल्पक आभास—स्वरूप, देश, काल एवं आकार सभी दृष्टियों से भिन्न होने के कारण इदमात्मक (इदं रूप) तथा विकल्पात्मक होते हैं। आभासों की समष्टि ही तो प्रमेयात्मक जगत् है। जहाँ भावों में भिन्नता होगी (यथा संसार में) वहाँ सविकल्प आभास ही होगा। योगी प्रथमाभास में ही स्वरूप साक्षात्कार करते हैं। अवभोत्स्यते—अनुभव करेगा (अनुभविष्यति) ।। योगियों को जगत् में नानात्मकता दृष्टिगत नहीं होती प्रत्युत् सर्वत्र आत्मा का विकास ही—आत्म प्रसार ही दृष्टिगत होता है जिस पदार्थ को देखने की उत्कण्ठा जाग्रत हुई हो वह पदार्थ वस्तु की अनिश्चित या संदिग्ध दिदृक्षा के समय जो कि अपने को ‘पश्यन्ती वाक्’ के रूप में प्रस्तुत करता है, अपनी आन्तरिक एकता या अभिन्नता में अपने को व्यक्त करता है। उसी प्रकार जब योगी अन्दर लीन हो या उन्मेष की दशा में मग्न हो, शिव से क्षिति पर्यन्त समस्त पदार्थों को व्याप्त करके या अपने सङ्कल्प या निर्णय द्वारा समस्त विश्व को ध्यानावस्था के समय अपने से अभिन्न मानकर स्थित हो और सोचता हो कि ‘मैं सदाशिव की भाँति समस्त विश्व का प्रतिनिधित्व करता हूँ’— तब वह फल जो कि प्रमातृत्ता (Supreme experienceship) में प्रवेश के आनन्द से निर्मित हो और जो समस्त ‘प्रमेयों’ (Knowable) की एकता (Unification) से जागृत किया गया है—अपने द्वारा जान लिया जाएगा या अपनी चेतना द्वारा अनुभूत कर लिया जाएगा। इस विषय में अधिक कहना ही व्यर्थ है।² आचार्य उत्पलदेव आत्मसंवित् के साक्षात्कार के उपायों पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि जब पुरुष दिदृक्षु होकर समस्त पदार्थों में व्याप्त होते हुए साधना में अग्रपद होता है तब स्वभाव का अवबोध प्राप्त कर लेता है। यहाँ इस उपदेश का आशय ज्ञातव्य है। १. प्रथमाभास (स्वरूपाभास या निर्विकल्पाभास) में अवस्थित योगी की प्रत्येक भाव में स्वस्वरूप के साक्षात्कार करने की तीव्रोत्कण्ठा ही है ‘दिदृक्षा’। २. क्षेमराज: ‘स्पन्दनिर्णय’।
तृतीयः निष्यन्दः ३४३ जैसे कोई कौतूहल की वस्तु देखने के लिए सावधान होकर विकासवृत्ति से सजग हो जाता है वैसे ही समस्त पदार्थों के दर्शन की उन्मुखता रूपी वृत्ति से उदयंत्रित होकर अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। वह स्वयं सर्वज्ञता आदि गुणास्पद अपने स्वभाव को प्राप्त कर लेता है। यह स्थिति ही 'तत्वार्थचिन्तामणि' में 'रहस्यमुद्रा' कही गई है। 'भोगमोक्षप्रदीपिका' में इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है—उन्मेष के बल से उद्यंत्रित होकर अपने स्वरूप में रहना चाहिए। वह योगी आनन्दभूमि में रहकर स्वयं आये हुए विषयों का उपभोग भी करता रहता है। यह आनन्दभूमि अत्यन्त उच्छृंखल एवं परम विकस्वर है किन्तु केवल उन लोगों के लिए जिनकी बुद्धि प्रबुद्ध है। सिद्ध पुरुष सदैव इसी में आनन्दरत रहते हैं। यह परा मुद्रा है। उद्यन्तृताबलेन तु विकासवृत्या स्वरूपगस्तिष्ठेत् । स्वयमुपसृतेन्द्रियार्थानशनन्नानन्दभूमिगो योगी ॥ एषोच्छृंखलरूपा विकस्वरतरा प्रबुद्धबुद्धीनाम् । सिद्धाः स्थिता सदाऽस्यां ह्यानन्दरताः परा च मुद्रैषा ॥ अन्य स्थलों पर भी कहा गया है— 'सर्वाः शक्तीश्चेतसा दर्शनाद्याः स्वे स्वे वेद्ये यौगपद्येन विष्वक् । क्षिप्त्वा मध्ये हाटकस्तंभभूतस्तिष्ठन्विश्वाधारएकोऽवभासि ॥' अर्थात् दर्शनादि समस्त शक्तियों को चित्त से उनके विषयों से एक साथ फेंककर 'उनके मध्य में स्वर्ण-स्तंभों के समान स्थिर हो जाओ। वस्तुतः तुम एक ही विश्वाधार हो ॥' इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि—वेश्या नारी के समान चंचल नेत्रादि शक्तियाँ जहाँ तहाँ स्वच्छन्द जाती रहती हैं। उन्हें केवल देखते रहो। इनका अनुगमन मत करो। वस्तुतः तुम सम्पूर्ण विश्व को धारण कर रहे हो और विश्व से पृथक् हो— 'स्वच्छन्दं वा यत्र तत्र व्रजन्तीर्वेशस्त्रीवच्चञ्चला या दृगाद्याः । शक्तीः पश्यन् केवलं नानुगच्छेद्विश्वं बिभ्रद्भासितस्य त्वमन्यः ॥' इस स्थिति में अवस्थान के लिए अगली कारिका (४४) कही गई हैं।१ यदा = जिस काल में। दिदृक्षयेव = साधक देखने की इच्छा से ही। सर्वार्थान् = अखिल प्रमेयों को। व्याप्य = (समस्त प्रमेयों को) व्याप्त करके अर्थात् स्वसंवित् प्रकाश से आच्छा- दित करके। उन्हें अन्तर्लीन करके। अवतिष्ठते = नानात्व के दर्शन की भ्रान्ति को दूर करके एक ही अद्वैततत्त्व में विश्राम करता है (विश्राम्यति) ॥ तदा = तब। उस दशा में (वह उस समय जिन फलों का वहाँ अनुभव करता है) १. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका'।
३४४ स्पन्दकारिका बहुना = (भूयसा) = अत्यधिक मात्रा में । उक्तेन = उस कहे गये फल से, ('उस कहे गये से') ॥ किं = क्या? क्या प्रयोजन? अर्थात् उसका प्रतिपादन करने की इच्छा से हजारों ग्रन्थ भी निरर्थक हो जाते हैं, क्योंकि वह अनुभवगम्य तो है किन्तु वह वचनगोचरातीत है—वाणी से परे है । स्वयं तदवभोत्स्यते = उस फल के स्वसंवेद्य होने के कारण, किसी व्यतिरिक्त साधन की बिना अपेक्षा किये हुए वह स्वयं ही प्राप्त कर लेगा (प्रतिपत्स्यते) ॥ तात्पर्य यह है कि—यदि योगी समस्त भावों को स्वस्वभाव से अव्यतिरिक्त देखने की जिज्ञासा रखता है तो उसे चाहिए कि अपनी इस दिदृक्षा को, अपने अनुभव द्वारा उदाहरण प्रस्तुत करते हुए, —सम्पूर्तित करे ॥ वह जिन भावों को देखना चाहता है वे स्वस्वभाव से अभिन्न होकर स्थित हैं—'द्रष्टुमभीष्टाः भावाः स्वस्वभावाभेदेन व्यव- तिष्ठन्ते ।'—क्योंकि योगी की इस तात्विक दिदृक्षा की उत्कण्ठा के समय 'इदन्ता- प्रत्ययात्मक' भावभेद उन्मिषित होते ही नहीं । उस समय (जिस प्रकार कि दिदृक्षावस्था में क्षेत्रज्ञ के साथ भावों का अभेद रहता है) परमात्मस्वभाव के उन्मिषित होने पर समस्त जगद्भावों के साथ दिदृक्षु के साथ जगत् के समस्त भाव भी अभिन्न रूप में स्थित हो जाते हैं 'परमात्मस्वभावात् अखिलजगद्भावानामभेद एव ॥' माया शक्ति से आविर्भूत विकल्परूपी अंधकार के द्वारा सम्यक् ज्ञान से रहित तथा निर्विभाग चिन्मात्रस्वरूप आत्मतत्त्व को प्रमाता एवं प्रमेय के भेद से भिन्न-भिन्न रूप में देखने वाले साधक, दिदृक्षित प्रमेयों के जीवस्वभाव से अभिन्न होने पर भी, उनका अभिन्न रूप में परामर्श कर पाने में असमर्थ रहते हैं ।१ जब वे इस स्तर पर ही असमर्थ रहते हैं तो फिर भला जगद्भावों एवं परमात्मभावों के साथ अपनी अभेदता कैसे स्थापित कर पायेंगे? अतः योगियों को चाहिए कि वे भेद के अंधकार को सूर्य की भाँति नष्ट करते हुए जगद्भावों एवं परमात्मस्वभावों तथा स्वस्वभाव के साथ अखिलभुवन के भावाभासों के साथ अभेदता का परामर्श करते हुए अभेदभाव का साक्षात्कार करने का उदाहरण प्रस्तुत करें ॥ दिदृक्षा क्या है? 'दिदृक्षा द्रष्टुमिच्छा तदवस्थास्थ इव' ।२ आचार्य भट्टकल्लट कहते हैं कि— 'दिदृक्षा द्रष्टुमिच्छा, तदवस्थास्थ इव सर्वान् भावान् यदा व्याप्यावनिष्ठते तदा किं बहुना उक्तेन, स्वयमेव तत्त्वस्वभावम् अवभोत्स्यते ज्ञास्यति ॥'३ उनका कथन है कि—(१) जब योगी समस्त भावों में अपने सत्वस्वरूप (संवित् तत्त्व) की सार्वभौम व्यापकता का साक्षात्कार करने की सामर्थ्य रखकर उनमें अपने सत्स्वरूप के साथ प्रविष्ट होकर उनके स्वरूप को देखने की कामना (दिदृक्षा) करता है १-२. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति' । ३. स्पन्दसर्वस्व ।
तृतीयः निष्यन्दः ३४५ तब वह स्वयं ही (सहज ही) स्वभावभूत स्पन्द तत्त्व की अनुभूति कर लेता है। (२) किसी भी पदार्थ के विषय में पूर्ण जानकारी पाने हेतु दिदृक्षु, जिज्ञासु एवं अनुसंधित्सु को उस पदार्थ में स्वयं ही स्वस्वरूप के साथ प्रविष्ट हो जाना चाहिए तथा सभी पदार्थों में एक ही स्पन्दतत्त्व की व्यापकता को देख सकने या अनुभव कर सकने की क्षमता का विकास करना चाहिए। तभी वह प्रमेयों का यथार्थ प्रमाता बन पायेगा और उसका तद्विषयक ज्ञान 'प्रमा' बन पायेगा। सारांश यह है कि यदि तुच्छ यौगिक सिद्धियों का त्याग करके योगी विश्वात्मभाव ('अहमिदं' का भाव 'अहं व्याप्तोस्मि सर्वेषु' का भाव) को ग्रहण कर ले तो प्रकृति, महामाया एवं दैवी शक्तियों के समस्त रहस्य अपने आप उद्घाटित हो जाते हैं। शैवदर्शन का आभास-प्रक्रिया—'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' के ज्ञानाधिकार में इसका सविस्तार विवेचन किया गया है। किसी भी भाव के साक्षात्कार हेतु आभासद्वय की भूमिकायें हैं जो निम्न हैं—(१) 'सविकल्पक आभास' (२) 'निर्विकल्पक आभास'। (क) इन्द्रिय एवं भाव का संयोग होने पर प्राथमिक क्षण के 'आभास' जो कि विकल्पों से रहित होते हैं = विकल्पशून्य आभास। (ख) इन्द्रिय एवं भाव का संयोग होने पर आने वाले अगले क्षण जो कि विकल्प-सहित होते हैं = सविकल्पक आभास ॥ 'निर्विकल्पक आभास' विद्युतवत तीव्र गति से कौंध जाता है। इसमें सामान्य स्वरूपसत्ता ही वर्तमान रहती है। इसमें जाति, गुण क्रिया आदि अभीष्ट विशेषताएँ परिलक्षित नहीं होतीं। इसे ही 'निर्विकल्पाभास' 'स्वलक्षणाभास' 'निर्विकल्पाभास' एवं 'स्वरूपाभास' कहा जाता है। सविकल्पक आभास में अनेक आभासों का मिश्रण होता है। 'निर्विकल्पक आभास' यथा 'घट' नामक भाव गोलार्द्ध, चौड़ाई, लम्बाई, वर्ण आदि विकल्प से शून्य है। (सामान्य रूप) ॥ 'सविकल्पक आभास' यथा 'घट' नामक भाव गोलार्ध, चौड़ाई, लम्बाई, व्यास, वर्ण आदि से युक्त हैं। प्रथमाभास के ठीक परवर्ती आने वाला आभास सविकल्पक है। भेद पूर्ण आभासों की सर्जना इसकी विशेषता है। निर्विकल्पक आभास = समस्त भाव सामान्य स्पन्द है। इसकी संवेदना विशुद्ध अहंरूपात्मक है। सविकल्पक आभास के भाव काल, आकार, स्वरूप एवं देश के आधारों पर भिन्नता रखते हैं। यह संवेदना 'इदंरूप' है। समस्त प्रमेय जगत् अधिकांशतः इसी से सम्बद्ध है। जागतिक व्यवहारों के लिए सविकल्पक आभास आवश्यक है। जगत् भेदों, वैचित्र्यों और भिन्नताओं पर आश्रित हैं। मित सिद्धियाँ भी सविकल्पक आभास हैं। प्रथमाभास विश्व के प्रत्येक अणु में चिद्रूप आत्मस्वरूप की अभिव्यक्ति का संकेतक है। ये इन्द्रिय बोध गम्य नहीं है। अतीन्द्रिय बोध एवं प्रातिमज्ञान योगियों में
३४६ स्पन्दकारिका पाया जाता है अतः ऐसी क्षमतासम्पन्न योगी प्रथमाभास के क्षण में ही चित्तत्त्व की सार्वभौम व्यापकता का अनुभव करता है। प्रथमाभास में स्थित योगी का प्रत्येक भाव में स्वरूप साक्षात्कार करने की तीव्रोत्कण्ठा ही 'दिदृक्षा' है। यह योगी को शाक्त भूमिका पर आरूढ़ कर देती है। योगियों को भी नानात्मक, वैचित्र्यपूर्ण एवं भेदात्मक जगत् का बोध होता है किन्तु वे उसके समस्त भेदों, अनेकात्मकताओं एवं भिन्नताओं में भी एकात्मकता का सूत्र अर्थात् अखण्ड स्वरूप भाव का साक्षात्कार करते हैं। उनकी दृष्टि में 'भेदमात्र अभेद का, द्वैतमात्र अद्वैत का तथा अनेकात्मकता मात्र एकात्मकता का विकास मात्र है।' उत्पलदेवाचार्य ने भेद एवं अनेकात्मकता या द्वैत प्रथा को शङ्कराचार्य की भाँति मिथ्या तो नहीं कहा है किन्तु उसे सत्य का आभास माना है—सत्य का विस्तार माना है, परमेश्वर ही माया शक्ति के द्वारा स्वात्मरूप को भेदों में रूपान्तरित करके एक से अनेक हो जाता है— 'प्रकाशात्मनः परमेश्वरस्य मायाशक्त्या स्वात्मरूपं विश्वं भेदेनाभासयते ॥' (प्र०का० वृत्ति १।४९) चिदात्मा ही बाहर एवं भीतर सर्वत्र व्याप्त है अतः एक ही अनेक है और अनेक ही एक है—अनेकात्मकता में एकात्मकता निहित है— 'चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद्बहिः । योगीव निरुपदानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ (प्रत्यभिज्ञा का० वृत्ति) प्रत्येक भाव में स्वस्वरूप की व्यापकता की अनुभूति करने विषयक योगोपदेश— प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेज्ज्ञानेनालोक्य गोचरम् । एकत्रारोपयेत् सर्वं ततोऽन्येन न पीडयते ॥ ४४ ॥ योगी को समस्त इन्द्रिय गम्य जगत् को अपनी ज्ञान-दृष्टि से देखकर सदैव पूर्ण प्रबोध के साथ स्थित रहना चाहिए तथा उसे (इस विधि से) निखिल प्रमेय वर्ग को एक ही तत्त्व में लय कर देना चाहिए। ऐसा करने से (साधक) किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा पीड़ित नहीं किया जा सकता ॥ ४४ ॥
- सरोजिनी * सर्वदा = सदैव । जागृतावस्था-स्वप्नावस्था-सुषुप्ति अवस्था एवं संविदादि मध्यान्तपदों में । प्रबुद्धः = 'प्रकर्षेण बुद्धः' अत्यधिक 'जाग्रत होकर । उन्मीलित स्पन्दतत्त्वावष्टंभादिव्यदृष्टि । तिष्ठेत् = स्थित होना चाहिए । सुप्रबुद्धता को प्राप्त करना चाहिए । ज्ञानेन = ज्ञान के द्वारा । बहिर्मुख अवभास द्वारा सर्वं गोचरं = समस्त इन्द्रियगम्य जगत् को । नील सुखादि रूप विषय को एकत्र = एक जगह स्थित । स्रष्टा शङ्करात्मा स्वभाव में ।¹ १. स्पन्दनिर्णय
तृतीयः निष्यन्दः ३४७ सर्वमारोपयेत् = निमीलन-उन्मीलन-दशाओं को अभिन्न रूप में जानना चाहिए। ('पूर्वापर कोट्यवष्टंभ दाढर्यान्मध्यभूमिमपि चिद्रसाश्यानतावरूपतयैव पश्येत् इति' ) ॥ इस प्रकार करने से योगी किसी अन्य व्यतिरिक्त वस्तु से बाधित नहीं होगा क्योंकि वह सभी अपने को ही देखेगा । प्रत्यभिज्ञाकार ने (उ०स्तो० १३।१६) में कहा भी है—१ 'योऽविकल्पमिदमर्थमण्डलं पश्यतीशनिखिलं भवद्वपुः । स्वात्मपक्षपरिपूरिते जगत्यस्यनित्यसुखिनः कुतो भयम्? ॥' योगी को सदैव चेतना के आदि, (प्रारम्भ) मध्य एवं अन्त में, जागृति, स्वप्न एवं सुषुप्ति में सदैव सावधान रहना चाहिए । या उसे पूर्ण प्रबोध का आश्रय ग्रहण करना चाहिए । उसे दिव्य दृष्टि (Divine vision) के साथ, स्पन्दतत्त्व के आधार के प्रति जाग्रत रहना चाहिए । यह कैसे संभव हों?—उसे निम्नांकित श्लोक की दृष्टि के साथ चिन्तन-मनन करते हुए जाग्रत रहना चाहिए— २ 'तस्माच्छब्दार्थ चिन्तासु न सावस्था न या शिवः ॥' (२।१४) योगी को इस समग्र ज्ञेय को स्रष्टा शङ्कर से अभिन्न देखते हुए केवल एक यथार्थ स्वरूप में स्थित समझना चाहिए या उसे इसे यथार्थस्वरूप से अभिन्न समझना चाहिए जो कि Involution एवं Evolution दोनों दशाओं में स्थित है । उसे 'मध्य' की दशा को भी चिदानन्द के भौतिकीकरण मूर्तिकरण (Materialiesation of the bliss of concious) के साथ अभिन्न समझना चाहिए । इससे दुःखों का नाश हो जाता है । क्योंकि अपने से परिपूरित जगत् में भला सदाह्लादित योगी को भय या दुःख कैसे हो सकता है? वह तो इस पदार्थान्वित विश्व को परमात्मा का शरीर मानता है । ३ समावेश की प्रक्रिया के विवेचन का परिणाम निकालते हुए ग्रन्थकार उस स्पन्द तत्त्व को यहाँ पर प्रस्तुत करता है जो कि अनेक पदार्थों में विभक्त है । 'स्पन्दतत्त्व' में प्रवेश उसी के लिए संभव हो जाता है जोकि पूर्णतया प्रबुद्ध (Enlightened) है और जो प्रवेश के उपायों पर अविरत ध्यान आकृष्ट किये रहता है । 'उपपादित उपायजातं (Varities of means) परिशीलनतः सततं स्पन्दतत्त्वसमाविष्टं सुप्रबुद्धस्य भवति ॥'४ आचार्य उत्पलदेव 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहते हैं कि साधन को चाहिए कि वह अपनी शक्तियों का सङ्कोच किये बिना प्रबुद्ध, निर्विकल्प एवं सदा उद्युक्त रहे । ज्ञान के सम्मुख जो भी विषय उपस्थित हो, उसको देखकर संवित् की दीप्ति से ज्ञेय का लोप कर दे, उनको अविभाग में प्रतिष्ठित कर दे, तब उसे दूसरा कोई पीड़ा नहीं पहुँचा सकता । भोगमोक्षप्रदीपिका में कहा गया है—अविभाग-बोध की अग्नि से विभाग को विलुप्त करके वेद्य-पीयूष को पीकर एवं शीघ्र ही संतुत्त, नीरोग एवं एकाकी विचरण करने लगता है । यह क्रमार्थ का सार है और शक्तियों की परधारा भूमिका । उसी की अनुज्ञा से सच्छिष्यों के ज्ञान के लिए इसका वर्णन किया गया है क्योंकि यह परधारा भूमिका निर्विभाग है— १-४. क्षेमराजाचार्य—स्पन्दनिर्णय ।
३४८ स्पन्दकारिका अथवा विभागबोधज्वलनेन विलाप्य वेद्यपीयूषम् । पीत्वा तृप्तोविचरन्त्रीरोगो योऽचिरात् सदैकाकी ॥ एतत्क्रममार्थसारं परधाराभूमिका च शक्तीनाम् । तदनुज्ञयाऽत्र कथितं सच्छिष्य विबोधनाय यथा ॥ कहा भी गया है—विभाग के हेतु ये प्रसिद्ध हैं—देश, काल, क्रिया और आकार। जिसमें ये नहीं हैं, उसमें विभाग का कोई कारण ही नहीं है— 'देशकालक्रियाकाराः प्रसिद्धा भागहेतवः । तेन सन्ति पुनर्यस्य विभागस्तस्य किंकृतः ॥' अन्यत्र भी कहा गया है—विषय सहित मन भस्म करना है। ज्ञानाग्नि अपनी दृष्टि से उसे भस्म करती है। उसके भस्म हो जाने पर अन्तर्मुखता और बहिर्मुखता दोनों समाधि हो जाती है— मनः सविषयं दाह्यं ज्ञानाग्निदर्शनैर्दहेत् । अन्तर्बहिर्मुखश्चैवं समाधिरुपपद्यते ॥ इसके अतिरिक्त भी विद्वानों द्वारा कहा गया है कि— विज्ञान की वाडवाग्नि प्रदीप्त होकर अपनी शक्ति से ज्ञेय विषय रूप समुद्रों को निरन्तर ग्रस्त रहती है। अन्य कोई उसको ग्रस्त करने में समर्थ नहीं है। जल न मिलने से पिपासा संवर्द्धित नहीं होती और बहुत सा जल मिल जाने पर तृप्ति या कृत- कृत्यता नहीं होती । यह ज्ञान ऐसा विलक्षण बड़वानल है विज्ञान वाडवो दीप्तः स्व शक्त्या ज्ञेयतोयधीन् । अजस्रं ग्रसते नान्यस्तद्ग्रासे शक्तिमान् भवेत् । नाऽप्राप्त्या पयसां तृष्णां प्राप्त्या वा भूयसामपि । यस्यास्ति कृतकृत्यत्वं कोऽप्यसौ वडवामुखम् ॥ 'यस्मात्सर्वमयो जीवः' में इस विषय का सयुक्तिक वर्णन किया जा चुका है। तत्त्व का स्वभाव विद्यात्मक ज्ञान स्वरूप है । अतः संपूर्ण ज्ञेय को उससे एक कर देना चाहिए। बस, इस ऐक्य के होते ही दूसरी कलात्मक विकल्परूप शक्तियाँ फिर किसी प्रकार की पीड़ा-बाधा नहीं पहुँचा सकतीं-अर्थात् स्वरूप से प्रच्युत नहीं कर सकतीं । कहा भी गया है— आकाश एक और व्यापक है । दीवार आदि के संयोग से उसमें बाह्य-आभ्यन्तर का भेद प्रतीत होता है । इसी प्रकार पशुपति तत्त्वज्ञ ग्राह्य और ग्राहक को एक ही रूप देखता है । आपके समाधि स्वरूप में विक्षेप्य और विक्षेपक, व्याक्षिप्त और व्याक्षेप्य का कोई भेद नहीं है— एकं व्याप्ति व्योमकुड्यादियोगात्तस्मिन् बाह्याभ्यन्तरत्वं समाधिः । पश्यत्येकं ग्राहक ग्राह्यरूपं व्याक्षिप्ताक्षेप्यतस्त्वत्समाधिः ॥१ १. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३४९ सर्वदा = समस्त अनुभव की दशाओं में । प्रबुद्धस्तिष्ठेत् = प्रतिपादित उपदेशों के अभ्यास से अनिमीलितसम्यक् ज्ञान दृष्टि वाला होकर जाग्रत हुआ स्थित रहता है । किस प्रकार? ज्ञानेन = संवेदन के द्वारा । गोचरं = विषय को । आलोच्य = (परिच्छेद्य) = सत्यासत्य का विवेचन करके । (आलोचन = देखना, परख, गुणदोष विवेचन) । आरोपयेत् = अर्पित करना चाहिए ।। अभिन्न रूप से प्रतिपादित करना चाहिए ततश्च = और उसके द्वारा । समस्त भावों के एक प्रमातृस्वरूपाभेद की प्रतिपत्तिरूप आरोपण से ।। अन्येन = व्यतिरिक्ततापूर्वक अवभासमान प्रमेयों के द्वारा ।। वक्ष्यमाण कलाद्यात्मक भावजात द्वारा । न पीड्यते = पीड़ित नहीं किया जाता । अहंभाव प्रति- पत्तिरूपविनश्वर भाव द्वारा संसार-चक्र में, बन्धन के पाश से बन्धकर तिरस्कृत नहीं होता ।। कदर्थना = पीड़ा, अत्याचार । कदर्थित = तिरस्कृत, घृणित । तुच्छीकृत ।। अत्याचार पीड़ित, तुच्छ। सारांश— प्रमाता जिन-जिन रूपादिक अर्थों को चक्षु आदि के ज्ञान से आलोचना करता है—निश्चय करता है (निश्चिनोति)—वे वे निश्चयावस्था में प्रामातृरूप से अभिन्न होते हैं । निश्चितत्व वस्तु का प्रकाशमानत्व है । वह प्रकाशमान होने के कारण अभिन्न है क्योंकि वह अन्य वस्तु बन ही नहीं सकता क्योंकि प्रकाश व्यतिरिक्त रूप संभव है ही नहीं क्योंकि तब रूप प्रकाशित ही नहीं होगा । रूप की अभिव्यक्ति प्रकाश से ही संभव है न कि प्रकाशाभाव से ।¹ भट्टकल्लट की व्याख्या—'स्पन्दकारिकावृत्ति' में भट्टकल्लट इस कारिका की व्याख्या करते हुए कहते हैं— 'प्रबुद्धोऽसंकुचितशक्तिः सर्वकालं तिष्ठेत्, ज्ञानेनालोच्य गोचरमज्ञेयं परिच्छिद्य । एवमेकत्र तत्वसद्भावे विद्यात्मके आरोपयेत् सर्वम् । ततोऽन्येन वक्ष्यमाणेन कलासमूहेन न पीड्यते ॥² प्रत्येक भाव में आत्मस्वरूप की व्याप्ति की अनुभूति के साधन—योगी को चाहिए कि वह प्रत्येक प्रमेय (ज्ञेय) विषय का विश्लेषण करके (पर्यालोचना करके) ज्ञेय विषय के साक्षात्कार की तीनों कोटियों—आदिकोटि, मध्य कोटि एवं अन्त कोटि—(ग्रहणेच्छा काल, ग्रहण काल एवं विश्रान्ति काल) के स्तरों पर अपनी स्वरूपावस्था में अवस्थित रहे । वह ऐसा करके भावना की शक्ति के द्वारा प्रत्येक विषय को एक ही तत्त्व के सद्भाव पर (स्पन्दसत्ता पर) अभिन्न रक्खे । ऐसा करने से साधक को कलासमूह की पीड़ा का शिकार नहीं होना पड़ेगा । भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं³—प्रबुद्धः = १. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति' । २-३. भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' ।