श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( ३३८ )
शब्दस्तस्मिन्नेव पर्यवस्यति। अतएव "गौरश्वो मनुष्यः" इत्या- दिप्रकारभूताकृतिवाचिनः शब्दाः प्रकारिणि पिण्डे पर्यवस्यन्तः पिण्डस्यापि चेतन शरीरत्वेन तत्प्रकारत्वात् पिण्डशरीरक चेतन- स्यापि परमात्मप्रकारत्वाच्च परमात्मन्येव पर्यवस्यतीति सर्व- शब्दानां परमात्मैव वाच्य इति परमात्मवाचिशब्देन सामामाधि- करण्यं मुख्यमेव। शरीर शरीरी का एक ही प्रकार है अत. प्रकार वाचक शब्द का प्रकारी में ही पर्यवसित होना स्वाभाविक है, इसलिए शरीर वाचक शब्दों का शरीरी में ही पर्यवसान होना चाहिए। "यह ऐसा है" इस वाक्य में "ऐसा है" यह वाक्यांश वस्तु के प्रकार का ही बोधक है। प्रकार वस्तुसापेक्ष होता है। वस्तु की प्रतीति, प्रकार अपेक्षित होती है, इसलिए वस्तु में उसके प्रकारवाची शब्द का पर्यवसान स्वाभाविक ही है, उसका प्रतिपादक शब्द भी उसी में पर्यवसित हो जाता है। "गो- मनुष्य-अश्व" इत्यादि प्रकारभूत, आकृतिवाचक, प्रकारी के देहपिण्ड के अर्थ में पर्यवसित शब्द, उन शरीरों में जो चेतनता है उसके प्रकार का बोध कराते हैं। वह देह विशिष्ट चेतन, परमात्मा का प्रकार मात्र है, इसलिए शब्दों के अर्थों का पर्यवसान उस परमात्मा में ही है। सभी शब्दों का वाच्यार्थ परमात्मा ही है। इस प्रकार परमात्मवाची शब्दों के साथ जो सामानाधिकरण्य है, वह मुख्य ही है (गौण नहीं) ननु "खण्डो गौः खण्डः शुक्लः" इति जातिगुणवाचिनामेव पदानां द्रव्यवाचिपदैः सह सामानाधिकरण्यं दृष्टं, द्रव्याणांतु द्रव्यान्तर प्रकारत्वे मतुबर्थीयप्रत्ययो दृष्टः यथा-"दण्डी कुण्डली" इति, नैवम् जातिर्गुणो वा द्रव्यं वा नैतेष्वेकमेव सामानाधिकरण्ये प्रयोजकम्, अन्योन्यस्मिन् व्यभिचारात्, यस्य पदार्थस्य कस्यचित् प्रकारतयैव सद्भावः, तस्य तदपृथक् सिद्धिस्थितिप्रतीतिभिः तद् वाचिनां शब्दानां स्वाभिधेयविशिष्टद्रव्यवाचित्वात् धर्मान्तरविशिष्ट-
( ३३६ ) तद्द्रव्यवाचिनाशब्देन सामानाधिकरण्यं युक्तमेव । यत्र पुनः पृथक्सि- द्धस्य स्वनिष्ठस्यैव द्रव्यस्य कदाचित्क्वचिद्द्रव्यान्तरप्रकारत्व- मिष्यते, तत्र मत्वर्थीयप्रत्यय इति निरवद्यम् । संदेह होता है कि “खण्ड गौ, शुक्ल खण्ड” आदि वाक्यों में जाति गुणवाची (गो और शुक्ल) पदों के साथ सामानाधिकरण्य स्पष्ट दीख रहा है, किन्तु द्रव्यवाची पदों के अन्य प्रकारक द्रव्यों के साथ मत्वर्थीय प्रत्यय वाले “दण्डी-कुण्डली” ऐसे प्रयोग भी देखे जाते हैं [अर्थात् विशेषण विशेष्य के अलग-अलग होने पर तो दोनों पदों का सामानाधिकरण्य मुख्य होता ही है, परन्तु मत् प्रत्यय से निष्पन्न विशेषण-विशेष्य युक्त “दण्डी कुण्डली” आदि प्रयोगों में सामानाधिकरण्य मुख्य है या गौण ?] उत्तर-बात ऐसी नहीं है-अपितु जाति, गुण अथवा द्रव्य इन तीनों की एकता सामानाधिकरण्य में प्रयोजक नहीं है, क्यों कि इनमें परस्पर व्यभिचार रहता है। जिस पदार्थ की किसी अन्य प्रकार (विशेषण) से ही स्थिति ज्ञात होती है; उसकी उस प्रकार (विशेषण) से अपृथक् सिद्ध स्थिति, प्रतीति से भी अभिन्न ही रहती है [अर्थात् उस पदार्थ की सत्ता और प्रतीति विशेषण से ही होती है] प्रकार (विशेषण) द्वारा पदार्थ के बोधक शब्दों की अभिधेयविशिष्ट वाचकता होने से, अन्य विशिष्ट गुणों को धारण करने वाले, उसी द्रव्य के बोधक शब्दों के साथ सामानाधि- करण्य युक्ति संगत हैं, असंगत नहीं। जहाँ कभी, पृथक् सिद्ध स्वनिष्ठ द्रव्य की, अन्य द्रव्य की प्रकारता से ही प्रतीति होती है, वहाँ मत्वर्थीय प्रत्यय ही उचित अर्थ बोधक होता है । तदेवं परमात्मनः शरीरतया तत्प्रकारत्वादचिद्विशिष्ट जीवस्यापि जीवनिर्देशविशेषरूपा अहंत्वमित्यादि शब्दाः परमात्मा- नमेवाऽचक्षत इति । “तत्त्वमसि” इति सामानाधिकरण्येनोपसंहृतम्, एवं च सति परमात्मानं प्रति जीवस्य शरीरतयाऽन्वयाज्जीवगता धर्माः परमात्मानं न स्पृशन्ति । यथास्वशरीरगता बालत्वयुवत्व- स्थविरत्वादयो धर्माः जीवं न स्पृशन्ति । श्रतः “तत्त्वमसि” इति सामानाधिकरण्ये तत्पदं जगत्कारणभूतं सत्यसंकल्पं सर्वकल्याण-
( ३४० ) गुणाकरं निरस्तसमस्तहेयगन्धंपरमात्मानमाचष्टे, त्वमिति च तमेव सशरीर जीव शरीरकमाचष्ट इति सामानाधिकरण्यं मुख्यवृत्तम्, प्रकरणविरोधः सर्वश्रुत्यविरोधो ब्रह्मणि निरवद्ये कल्याणैकताने अविद्यादिदोषगंधाभावश्च। अतोजीव सामाना- धिकरण्यमपि विशेषणभूताज्जीवात् अन्यत्वमेवापादयतीति विज्ञान- मयाज्जीवादन्य एव आनंदमयः परमात्मा। इस प्रकार अचिद् विशिष्ट जीव जो कि परमात्मा का शरीर है, वह उसकी प्रकारता (धर्म स्वरूप) का बोधक है, और ऐसा मानने पर अचिद् विशिष्ट जीव निर्देशक "मैं और तुम" इत्यादि संबोधन भी परमात्मा के ही बोधक हैं। ऐसा ही "तत्त्वमसि" इस सामानाधिकरण्य वाक्य में भी है। ऐसा मानने से, देह स्वरूप जीव के धर्म शरीरी परमात्मा का स्पर्श नहीं कर सकते जैसे कि-बचपन, जवानी बुढापा आदि शरीरिक धर्म जीव को स्पर्श नहीं करते। "तत्त्वमसि" वाक्य में "तत्" शब्द जगत के कारण सत्यसंकल्प सर्वकल्याणगुणाकर निर्दोष परमात्मा का बोधक है तथा "त्वम्" पद भी उसी जीव रूपी शरीर वाले शरीरी परमात्मा का ही बोधक है। इस प्रकार सामानाधिकरण्य निर्बाध रूप से सिद्ध हो जाता है तथा निर्दोष, सर्व कल्याण प्रवण ब्रह्म के विषय में प्रकरण या श्रुति विरोध भी नहीं होता। सामानाधिकरण्य में विशेषणीभूत जीव से परमात्मा की भिन्नता भी प्रतिपादित हो जाती है, इससे सिद्ध होता है कि विज्ञानमय जीवात्मा से भिन्न परमात्मा ही आनंदमय है। यदुक्तम्—"तस्यैष एव शारोर आत्मा" इत्यानंदमयस्य शारोरत्व श्रवणाज्जीवादन्यत्वं न संभवति-इति, तदयुक्तम्, अस्मिन् प्रकरणे सर्वत्र "तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य" इति परमात्मन एव शारीरात्मत्वाभिधाने कथं 'तस्माद्वा एतस्मा- दात्मन् आकाशः संभूतः" इत्याकाशादिसृज्यवर्गस्य परमकारणत्वेन ankurnagpal108@gmail.com
( ३४१ )
प्रज्ञातजीवव्यतिरेकस्य परस्य ब्रह्मण आत्मत्वेन व्यपदेशात्तद्व्यतिरिक्ता- काशादीनामन्नमयपर्यन्तानां तच्छरीरत्वमवगम्यते । “यस्य पृथिवी शरीरं, यस्यापः शरीरं, यस्य तेजः शरीरं, यस्यवायुः शरीरं, यस्याकाशः शरीरं, यस्याक्षरं शरीरं, यस्य मृत्युः शरीरं, एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेव एको नारायणः” इति सुबालश्रुत्या सर्वतत्त्वानां परमात्म शरीरत्वं स्पष्टमभिधीयते । जो यह कहते हैं कि-“यह शरीर (जीव) ही आत्मा है” इस उदा- हरण में आनन्दमय को शरीरी रूप से वर्णन किया गया है, इसलिए जीवात्मा के अतिरिक्त दूसरा शरीरी नही हो सकता । यह कथन युक्ति- युक्त नहीं है, क्यों कि-आनन्दमय के प्रकरण में सभी जगह “यही उसका शरीर (शरीराभिमानी) आत्मा है, जो कि पूर्वतन का आत्मा है” इस प्रकार परमात्मा को ही शरीरी कहा गया है, “इस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ” इस उदाहरण में सृज्यमान आकाश की तरह, आकाश से लेकर अन्नमय तक सभी पदार्थों को परमात्मा का शरीर बतलाया गया है जो कि-जीव से भिन्न, परम कारण परमात्मा की आत्मरूपता का द्योतक है । “पृथिवी जिसका शरीर है, जल जिसका शरीर है तेज जिसका शरीर है, वायु जिसका शरीर है, आकाश जिसका शरीर है अक्षर (जीव) जिसका शरीर है, मृत्यु (पंचभूत) जिसका शरीर है, ऐसे सर्वान्तर्यामी निर्दोष निष्पाप दिव्य देव एक नारायण हैं ।” ऐसी सुबाल श्रुति से, सभी तत्त्वों की परमात्म शरीरता स्पष्ट बतलाई गई है । अतः “तस्माद् वा एतस्मादात्मनः” इत्यत्रैवान्नमयस्य परमा- त्मैव शारीर आत्मेत्यवगतः । प्राणमयं प्रकृत्याह-“तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य’ इति । पूर्वस्यान्नमयस्य यः शारीर आत्मा श्रुत्यन्तरसिद्धः परमकारणभूतः परमात्मा, स एव तस्य प्राणमय स्यापि शारीर आत्मेत्यर्थः । एवं मनोमयविज्ञानमययोर्द्रष्टव्यम् आनंदमयेतु “एष एव” इति निर्देशः तस्य अनन्यात्मत्वं दर्शयितुं तत्कथंविज्ञानमयस्यापि पूर्वोक्त्या नीत्या परमात्मैव शारीर आत्मेत्य
वंगतः । एवं सति विज्ञानमयस्य यः शारीर आत्मा स एव आनन्द- मयस्यापि शारीर आत्मेत्युक्ते आनन्दमयस्य अभ्यासावगतपरमात्म- भावस्य परमात्मनः स्वयमेवात्मेत्यवगम्यते । एवं च व्यतिरिक्तं चेतनाचेतनवस्तुजातं स्वशरीरमिति स एव निरुपाधिकः शारीर आत्मा श्रतएवेदं परं ब्रह्माधिकृत्य प्रवृत्तं शास्त्रं शारीरकमित्यभि- युक्तैरभिधीयते । श्रतो विज्ञानमयाज्जीवादन्य एव परमात्मा आनन्दमयः ।
“तस्माद्वा” इत्यादि उदाहरण में उल्लेक्ष्य अन्नमय के शारीर आत्मा परमात्मा ही ज्ञात होते हैं । प्राणमय के शरीरी भी परमात्मा हैं, ऐसा “तस्यैष एव आत्मा” श्रुति में बतलाया गया है । इस श्रुति का तात्पर्य है कि—“जो पूर्व कोष अन्नमय के शारीर आत्मा हैं जो कि- अन्यान्य श्रुतियों में परमकारणभूत परमात्मा के नाम से अभिव्यक्त हैं वे ही उस प्राणमय के शरीर आत्मा हैं ।” ऐसा ही मनोमय और विज्ञानमय के लिए भी समझना चाहिए । आनंदमय प्रकरण में तो “यही” शब्द उनके अन्यात्मत्व का निर्देशक है । विज्ञानमय प्रकरण में भी पूर्वोक्त नीति के अनुसार परमात्मा ही शारीर आत्मा ज्ञात होते हैं इसी प्रकार जो विज्ञानमय का शारीर आत्मा है वही आनंदमय का भी शारीर आत्मा है, आनन्दमय का बार-बार उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि- परमात्मभाव को प्राप्त स्वयं परमात्मा ही अपने आत्मा हैं । परमात्मा से भिन्न चेतन अचेतन सभी वस्तुएं उनकी शरीर स्थानीय हैं, वे ही सब के निरुपाधि (स्वाभाविक) शारीर आत्मा है । इसी लिए परब्रह्म के प्रतिपादक इस शास्त्र को विद्वद्गण ‘शारीरक मीमांसा’ नाम से परिचय कराते हैं । इससे निश्चित होता है कि-विज्ञानमय जीव से भिन्न परमात्मा ही आनंदमय है ।
आह—नायमानंदमयो जीवादन्यः विकार शब्दस्य मयट् प्रत्य- यस्य श्रवणात् “मयड्वैतयोः” प्रकृत्य “नित्यंवृद्धशरादिभ्यः” इति विकारार्थे मयट् स्मर्यते । वृद्धश्चायमानन्दशब्दः ।
( ३४३ ) (वाद) कहते हैं कि-आनंदमय जीव से भिन्न नहीं है, क्यों कि मयट् प्रत्यय का प्रयोग विकार अर्थ में किया जाता है। “मयट् वैतयो- र्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः "अर्थात् अभक्ष्य और आच्छादन को छोड़कर प्रकृतिमात्र में वैकल्पिक मयट् प्रत्यय विकार अर्थ में होता है। तथा “नित्यंवृद्धशरादिभ्यः” (वृद्धशर आदि में नित्यमयट् प्रत्यय विकार अर्थ में होता है इन दो पाणिनीय व्याकरण सूत्रों में विकारार्थक मयट् प्रत्यय का विधान किया गया है । आनंदमय शब्द वृद्ध संज्ञक है । ननु-प्राचुर्येऽपि मयडस्ति “तत्प्रकृतवचने मयट्” इति स्मृतेः । यथा “अन्नमयो यज्ञः” इति । स एवायम् भविष्यति । नैवम् अन्न- मय इत्युपक्रमे विकारार्थत्वं दृष्टम् अत श्रौचित्यादस्यापि विकारा- र्थत्वमेव युक्तम् । (विवाद) नहीं- प्राचुर्य्य अर्थ में भी मयट् प्रत्यय होता है, “तत्प्र- कृतवचने मयट्” ( प्राचुर्य्य प्रतिपादक अर्थ में मयट् होता है ) ऐसा पाणिनीय सूत्र है “अन्नमय यज्ञ” ऐसा प्राचुर्य्यार्थक प्रयोग भी होता है, उसी प्रकार आनंदमय में भी होगा । (वाद) ऐसा नहीं है, “अन्नमय विज्ञानमय” आदि के उपक्रम में स्पष्ट विकारार्थ की प्रतीति हो रही है, उचित भी यही है कि, शब्द से जो प्राथमिक वाच्यार्थलब्ध हो उसे ही अन्ततः माना जाय, इसलिए आनंदमय में विकारार्थ ही युक्ति संगत है । किं च-प्राचुर्य्यार्थत्वेऽपि जीवादन्यत्वं न सिध्यति, तथाहि आनंद प्रचुर इत्युक्ते दुःखमिश्रत्वमवर्जनीयम् । आनंदस्य हि प्राचुर्यं दुःखस्याल्पत्वमवगमयति । दुःखमिश्रत्वमेव हि जीवत्वम् । अर्थ श्रौचित्यप्राप्त विकारार्थत्वमेव युक्तम् । यदि ऐसा न भी मानें, प्राचुर्य्य अर्थ ही मानलें, तब भी जीव की परमात्मा से भिन्नता सिद्ध नहीं होती प्रचुर आनंद कहने से दुःख मिश्रण अनिवार्य हो जाता है, आनंद की प्रचुरता दुःख की अल्पता बतलाती । दुःख मिश्रता ही जीवत्व है । इसलिए विकारार्थ ही उचित है । ankurnagpal108@gmail.com
( ३४४ ) किंच-लोके मृण्मयं हिरण्मयं दारुमियमित्यादिषु वेदे च "पर्णमयी जुहू" शमीमयी अ्रसस्तु च "दर्भमयी रसना" इत्यादिषु मयटो विकारार्थे प्रयोग बाहुल्यत्वात् स एव प्रथमतरां धियमधि- रोहति । जीवस्य चानंदविकारत्वमस्त्येव । तस्य स्वत आनंद- रूपस्य सतः संसारितावस्था तद्विकार एवेति । अतो विकार वाचिनो मयट् प्रत्ययस्य श्रवणादानंदमयो जीवादनतिरिक्त इति । तदेतदनुभाष्य परिहरति । तथा-"मृन्मय" हिरण्मय "दारुमय' इत्यादि लौकिक तथा "पर्णमयी जुहू" शमीमय श्रुवाये "दर्भमयी रसना' इत्यादि वैदिक प्रयोगो में विकारार्थ का ही बाहुल्य मिलता है, इसलिए मयट् का विकारार्थ ही सबसे प्रथम बुद्धि में आरूढ होता है। जीव का आनंद विकृत ही है, स्वभावतः जीव आनंद स्वरूप है, संसारदशा में वह आनंद विकृत हो जाता है इसलिए विकारवाची मयट् प्रत्यय का वर्णन होने से निश्चित होता है कि—"आनन्दमय" तत्त्व जीव से अभिन्न वस्तु है। इस प्रकार के मत का विवेचन करते हुए परिहार करते है— विकार शब्दान्नेतिचेन्न प्राचुर्यात् १।१।१४ नैतद्युक्तं, कुतः ? प्राचुर्यात्-परस्मिन् ब्रह्मण्यानन्दप्राचुर्यात् । प्राचुर्यार्थे च मयटस्संभवात् । एतदुक्तं भवति-शतगुणितोत्तरक्रमे- णाभ्यस्यमानस्यांनंदस्य जीवाश्रयत्वासंभवात् ब्रह्माश्रयोऽयमानंद इतिनिश्चिते सति तस्मिन् ब्रह्मणि विकारासंभवात् प्राचुर्येऽपि मयड्विधिसंभवाच्चानंदमयः परंब्रह्म-इति । यह कहना ठीक नही है कि-जीवात्मा ही आनंदमय है, क्यों कि- परब्रह्म में आनंद की प्रचुरता है, इसलिए यह शब्द उन्हीं के लिए प्रयुक्त किया गया है। प्राचुर्यार्थ में भी मयट् होता है। शतगुणितोत्तर क्रम से बार बार जिस आनंद की अनुवृत्ति की गई है, वह जीव में कदापि संभव नहीं है। वह तो ब्रह्म में ही संभव है, उस ब्रह्म में विकार की शून्यता तथा प्राचुर्यार्थ में भी मयट् विधि के होने से यह निश्चित होता है कि-परब्रह्म ही आनंदमय है। ankurnagpal108@gmail.com
( ३४५ ) औचित्यात् प्रयोग प्रौढ्याच मयटो विकारार्थत्वमर्थविरोधान्न संभवति । किंच औचित्यं प्राणमय एव परित्यक्तम् तत्र विकारा- र्थत्वासंभवात् । अतस्तत्र पंचवृत्तेर्वायोः प्राणवृत्तिमत्तामात्रेण प्राणमयत्वम्, प्राणापानादिषु पंचषु वृत्तिषु प्राणवृत्तेः प्राचुर्याद्वा । न च प्राचुर्ये मयट् प्रत्ययस्य प्रौढिर्नास्ति “अन्नमयो यज्ञः, शकटमयी यात्रा” इत्यादिषु दर्शनात् । औचित्य और प्रयोग प्रौढ़ि से भी मयट् का विकारार्थत्व, अर्थ विरोध होने से, संभव नहीं है। प्राणमय में तो प्रचुरार्थ मानना ही उचित था, जिसकी आपने अवहेलना कर दी, वहाँ विकारार्थ किसी भी प्रकार हो ही नहीं सकता। पंचवृत्ति वाले वायु में प्राणवृत्तिमत्ता श्रेष्ठ और विशिष्ट है इसलिए तथा प्राण, अपान आदि पांचवृत्तियों में प्राण वृत्ति की प्रचुरता होने से ही उसकी प्राणमयता है। यह भी नहीं कह सकते कि—मयट् प्रत्यय के प्राचुर्यार्थक प्रयोग अधिक नहीं देखे जाते, जिससे प्राचुर्यार्थ की प्रौढ़ि सिद्ध हो सके, “अन्नमय यज्ञ” “शकटमयी यात्रा” आदि अनेक प्राचुर्यार्थक प्रयोग होते हैं। यदुक्तमानंदप्राचुर्यमल्पदुःखसद्भावमवगमयतीति, तदसत् तत्प्रचुरत्वं हि तत्प्रभूतत्वम् तच्चेतरस्य सत्तां नावगमयति, अपितु तस्याल्पत्वं निवर्तयति इतरसद्भावासद्भावौतु प्रमाणान्तरावसेयौ; इह च प्रमाणान्तरेण तदभावोऽवगम्यते “अपहतपाप्मा” इत्यादिना तत्रैतावदेववक्तव्यं, ब्रह्मानंदस्य प्रभूतत्वमन्यानन्दस्याल्पत्वपेक्षत इति । उच्यते च तत् “स एको मानुष आनंदः” इत्यादिना जीवा- नन्दापेक्षया ब्रह्मानंदो निरतिशयदशापन्नः प्रभूत् इति । जो यह कहा कि प्राचुर्य आनंद अर्थ करने से अल्प दुःख की प्रतीति होती है, सो यह कथन भी असत् है। आनंद की प्रचुरता, प्रभूतत्व का बोध कराती है उसके अतिरिक्त उसमें दूसरे की सत्ता की प्रतीति नहीं होती अपितु उसकी अल्पता का निराकरण करती है। दूसरी वस्तुओं के सद्- ankurnagpal108@gmail.com
( ३४६ ) भाव और असद्भाव का निराकरण तो प्रमाणान्तरों पर आधारित होता है, पर इसमें प्रमाणान्तरों से अभाव की ही प्रतीति होती है "अपहत- पाप्मा" इत्यादि प्रमाण दुःख के अभाव के ही परिचायक हैं, यहाँ केवल इतना ही कहना पर्याप्त है कि—ब्रह्मानंद की जो प्रभूतता है वह अन्यान्य आनंदों से अपेक्षाकृत श्रेष्ठ, है उसके समक्ष सारे आनंद अल्प हैं—इसके लिए कहा भी गया है कि—"मानुष आनंद एक अंश मात्र है।" जीव नद की अपेक्षा ब्रह्मानंद अत्यन्त आनंदपूर्ण हैं। यच्चोक्तं जीवस्यानंदविकारत्वं संभवतीति, तदपि नोपपद्यते, जीवस्य ज्ञानानन्दस्वरूपस्य केनचिदाकारेण मृद इव घटाद्या- कारेण परिणामः सकल श्रुतिस्मृतिन्यायविरुद्धः संसारदशायां तु कर्मण ज्ञानानंदौ सकुचितावित्युपपादयिष्यते। अतश्चानन्दमयो जीवादन्यः परब्रह्म । जो यह कहते हो कि—जीव की विकारता ही संभव है सो यह कथन भी असंगत है, मिट्टी का जैसा घट आदि आकार वाला विकृत परिणाम होता है, वैसा ज्ञान और आनंद स्वरूप जीव का भी संभव हो, ऐसा श्रुति स्मृति और युक्ति से विरुद्ध है। संसार दशा में कर्म से, ज्ञान और आनंद संकुचित हो जाते हैं, इसका विवेचन आगे करेंगे। जीव से भिन्न परमात्मा ही आनंदमय है। इतश्च जीवादन्य आनंदमयः परंब्रह्म इसलिए भी जीव से भिन्न परब्रह्म आनंदमय है कि— तद्धेतुव्यपदेशाच्च १।१।१५। “को ह्येवान्यात् को प्राण्यात् यदेष आकाश आनंदो न स्यात् एष ह्येवानन्दयति” इति। एष एव जीवानन्दयतीति। जीवानन्द हेतुरयं व्यपदिश्यते। अतश्चानन्दयितव्याज्जीवादानंदयिताऽयमन्य आनंदमयः परमात्मेति विज्ञायते। आनंदमय एवात्र आनंद शब्देनो- क्त इति चानन्तरमेव वक्ष्यते। ankurnagpal108@gmail.com
( ३४७ ) “यदि यह आकाश (ब्रह्म) आनंद (जीवान्तरवर्त्ती दहराकाश) न होता तो कौन चेष्टा करता और कौन प्राण धारण करता” इस उदाहरण से ज्ञात होता है कि—परमात्मा ही जीवो के आनंद का हेतु और जीवों का आनंददाता है। आनंद करने वाले जीवात्मा से, आनंद- दाता ब्रह्म भिन्न ही है, जो कि—आनंदमय शब्द से जाना जाता है। उक्त उदाहरण में आनंद शब्द से आनंदमय की ही व्याख्या की गई है, और उसकी भिन्नता बतलाई गई है। इतश्च जीवादन्य आनंदमयः— इसलिए भी आनंदमय जीव से भिन्न है कि— मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते १।१।१६ “सत्यंज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इति मंत्रवर्णोदितं ब्रह्मैवानंदमय इति गीयते । तत्तु जीवस्वरूपादन्यत् परंब्रह्म “ब्रह्म विदाप्नोति परं” इति जीवस्य प्राप्यतया ब्रह्म निर्दिष्टम् । ‘ सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” इस मंत्र में उल्लेख्य ब्रह्म को ही बार-बार “आनंदमय” नाम से बतलाया गया है। इसलिए जीव स्वरूप से भिन्न परब्रह्म है, ऐसा निश्चित होता है। “ब्रह्मवेत्ता ही परब्रह्म को प्राप्त करता है” इस मंत्र में भी जीव के प्राप्य ब्रह्म का निर्देश किया गया है। “तदेषाभ्युक्ता” इति तत् ब्रह्म अभिमुखीकृत्य प्रतिपाद्यतया परिगृह्य, ऋगेषा अध्येतृभिरुक्ता । ब्राह्मणोक्तस्यार्थस्य वैशद्यमनेन मंत्रेण क्रियत इत्यर्थः, जीवस्योपासकस्य प्राप्यं ब्रह्म तस्माद् विलक्षणमेव अनंतरंच “तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” इत्यारभ्य उत्तरोत्तरैर्ब्राह्मणैर्मन्त्रैश्च तदेव विशदो क्रियते । अतो जीवादन्य आनंदमयः । “तदेषाभ्युक्ता” ( तत् = ब्रह्म को अभिमुख करके एषा = ऋक् मन्त्र + उक्ता = पाठकों द्वारा कहा गया ) इस मंत्र में ब्रह्म को प्रतिपाद्य ankurnagpal108@gmail.com
( ३४८ ) मानकर पाठकों ने उसका विश्लेषण किया है यह मंत्र उपरोक्त ब्राह्मण मंत्र का ही परिष्कृत अर्थ है। इससे निश्चित होता है कि—उपासक जीव का उपास्य ब्रह्म जीव से निश्चित ही विलक्षण है। अन्य प्रकरण में भी जैसे—'इसी आत्मा से आकाश हुआ" इस वाक्य से प्रारंभ करके उत्त- रोत्तर ब्राह्मण और वैदिक मंत्रों में इसी तथ्य को विशद किया गया है इसलिए जीव से भिन्न ही आनंदमय है, ऐसा सिद्ध होता है। अत्राह-यद्यप्युपासकात्प्राप्यस्य भेदेन भवितव्यम् । तथापि न वस्त्वंतरं जीवान्मान्त्रवर्णिकं ब्रह्म, किन्तु तस्यैवोपासकस्य निरस्त- समस्ताविद्यागंधनिविशेषचिन्मात्रैकरसंशुद्ध'स्वरूपं तदेव "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" इति मंत्रेण विशोध्यते । तदेव च "यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह" इति वाङ्मनसागोचरतया निर्वि- शेषमिति मन्यते । अतस्तदेव मांन्त्रवर्णिकमिति तस्मादनतिरिक्त आनन्दमय इति । अत उत्तरं पठति— उक्त मत पर विपक्षी कहते हैं कि—उपासक से उपास्य का भेद होना चाहिए परन्तु मंत्रोक्त ब्रह्म, जीव से भिन्न नहीं है, उपासक का जो अविद्या रहित निर्विशेष चिन्मात्र एकरस शुद्ध स्वरूप है उसी को "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" मंत्र द्वारा बतलाया गया है। उसी का "यतो वाचो" आदि मंत्र से अवाङ् मनस अगोचर प्रतिपादन किया गया है, शुद्धावस्था- पन्न जीव ही मंत्रों का प्रतिपाद्य है, उससे भिन्न कोई अन्य आनंदमय नहीं है। इस कथन का उत्तर देते हैं— नेतरोऽनुपपत्तेः १।१।१७ परमात्मन इतरो जीवशब्दाभिलप्यो मुक्तावस्थोऽपि न भवति मांन्त्रवर्णिकः । कुतः ? अनुपपत्तेः । तथाविधस्यात्मनो निरुपाधिकं विपश्चित्वं "सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेय" इति सत्यसंकल्पत्व प्रदर्शनेन विवरिष्यते । विविधं पश्यंश्चित्वं हि विपश्चित्त्वम् ।
( १४६ ) पृषोदरादित्वात्पश्यच्छब्दावयवस्य यच्छब्दस्यलोपं कृत्वा व्युत्पादितो विपश्चिच्छब्दः । यद्यपि मुक्तस्य विपश्चित्वं संभवति, तथापितस्यै- वात्मनः संसारदशायामविपश्चित्वमप्यस्तीत निरुपाधिकं विपश्चित्त्वं नोपपद्यते । निर्विशेषचिन्मात्रतापन्नस्यमुक्तस्य विविध दर्शनाभावा- त्सुतरांविपश्चित्त्वं न संभवतीति न केनापि प्रमाणेन निर्विशेषवस्तु प्रतिपाद्यत इति च पूर्वमेवोक्तम् । परमात्मा से भिन्न जीव, मुक्तावस्था में भी ब्रह्म नहीं हो सकता । मंत्रों से उसकी अभिज्ञता सिद्ध नहीं होती । उसका अभिन्न रूप से किसी भी मंत्र में उल्लेख नहीं मिलता । निर्विशेष विशुद्ध स्वरूप आत्मा का निरुपाधिक विपश्चित्व “सोऽकामयत" इत्यादि मंत्र में सत्य संकल्पत्व के रूप से बतलाया गया है । अनेक तत्त्वों की युगपत दर्शन शक्ति को ही विपश्चित्त्व कहते हैं । "पृषोदरादि" व्याकरणोय सूत्र से पश्यत् पद के अवयव यत् अंश को लुप्त करके विपश्चित् शब्द बनाया जाता है । यद्यपि मुक्त जीवात्मा में भी विपश्चित्व हो सकता है, उसी आत्मा का संसार दशा में अविपश्चित्व भी संभव है, उसमें निरुपाधिक विपश्चित्त्व नहीं हो सकता । निर्विशेष चिन्मात्र अवस्था वाले मुक्तात्मा में एक साथ सब कुछ जान लेने की क्षमता भी नहीं है, इसलिए उसमें विपश्चित्त्व नहीं हो सकता, और न किसी भी प्रमाण से निर्विशेष वस्तु प्रमाणित की जा सकती है, ऐसा हम पहिले ही बतला चुके हैं । “यतो वाचो निवर्तन्ते" इति च वाक्यं यदि वाङ्मनसयोर्ब्रह्मणो निवृत्तिमभिदधीत, न ततो निर्विशेषतां वस्तुनोऽवगयितुं शक्नुयात् । अपितु वाङ्मनसयोस्तत्राप्रमाणतां वदेत्, तथा च सति तस्य तुच्छ- त्वमेवापद्यते । “ब्रह्मविदाप्नोति” इत्यारभ्य ब्रह्मणोविपश्चित्त्वं जगत्- कारणत्वं ज्ञानानन्दैकतानतामितरान्प्रत्यानंदयितृत्वं कामादेव चिद- चिदात्मकस्यकृत्स्नस्य स्रष्टृत्वं सृज्यवर्गानुप्रवेशकृततदात्मकत्वं भयाभयहेतुत्वं वाग्वादित्यादीनां प्रशासितृत्वं शतगुणितोत्तरक्रमेण निरतिशयानंदत्वमन्यच्चानेकं प्रतिपाद्य वाङ्मनसयोः ब्रह्मणि प्रवृत्त्य-
( ३५० )
भावेन निष्प्रमाणकं ब्रह्मेत्युच्यत इति भ्रान्तजल्पितम् । “यतो वाचो निवर्त्तन्ते” इति यच्छब्दनिर्दिष्टमर्थम् “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्” इत्यानन्दशब्देन प्रतिनिर्दिश्य तस्य ब्रह्म संबन्धित्वं ब्रह्मण इति व्यति- रेकनिर्देशेन प्रतिपाद्य तदेव वाङ्मनसगोचर “विद्वान्” इति तद्वेद- नमभिदधद्वाक्यं जरद्गवादिवाक्यवदनर्थकं वाच्यानंतर्गतं च स्यात् । “यतो वाचो निवर्त्तन्ते” इस वाक्य को यदि, वाणी और मन से निवृत्ति प्रतिपादक मान लें तो भी निर्विशेष वस्तु की प्रतीति उक्त वाक्य से नहीं होगी। अपितु वाणी और मन से उसकी अप्रामाणिकता ज्ञात होती है, यदि वाणी और मन से उसे अज्ञात मानकर निर्विशेष बतलाने की चेष्टा करेंगे तो ब्रह्म में तुच्छता आ जायगी । “ब्रह्मविदाप्नोति परं” वाक्य से प्रारंभ करके ब्रह्म की विपश्चित्त्व, जगत्कारणता, आनंदैकान्ता आनंददातृता, संकल्प मात्र से जड चेतन संपूर्ण जगत सृष्टि की शक्तिमत्ता, सृष्टि जगत में अनुस्यूत होकर तदात्मकता, भय अभय की कारणता, वायु आदि की शासकता, निरतिशय आनंदमयता आदि अनेक शतगुणितोत्तर क्रम से वर्णित गुणों का प्रति- पादन करके अन्त में यह कह दिया जाय कि उक्त वाक्य ब्रह्म की निर्वि- शेषता का प्रतिपादक है, तो ऐसा कथन नितान्त भ्रामक है । “यतो वाचो” वाक्य मे “यत्” पद जिस तत्त्व का निर्देश करता है “आनंद ब्रह्मणो” वाक्य “आनंद” पद से उसी तत्त्व का प्रतिनिर्देश करके ‘ब्रह्मणः’ पद से उसका संबंध बतलाता है, यदि उसी वाङ्मनसातीत को “विद्वान्” पद वाच्य ज्ञाता कहा जाय तो उक्त वाक्य ‘जरद्गव” इत्यादि वाक्य की तरह निरर्थक हो जायगा (अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय का स्पष्ट भेदोल्लेख होते हुए भी उसे अभिन्न बतलाना क्लिष्ट कल्पना मात्र है । अतः शतगुणितोत्तरक्रमेण ब्रह्मानन्दस्यातिशयेयत्तांवक्तुमुद्यम्य तद्ध्येयत्ता या अभावादेव वाङ्मनसयोस्ततो निवृत्तिः “यतो वाचो निवर्त्तन्ते” इत्युच्यते । एवमियत्ता रहितं “ब्रह्मण आनन्दं विद्वान्
( ३५१ ) कुतश्चन न बिभेति" इत्युच्यते । किं च अस्य मांत्रवर्णिकस्य विपश्चितः "सोऽकामयत" इत्यारभ्य वक्ष्यमाणस्वसंकल्पावकॢप्त- जगज्जन्मस्थितिजगदन्त रात्मत्वादेर्मुक्तात्मस्वरूपादन्यत्वंसुस्पष्टमेव । शतगुणितोत्तर क्रम से सर्वाधिक ब्रह्मानंद ही अतिशय इयत्ता रहित निस्सीम है, इसीलिए वाक्य और मन उसकी थाह न पाकर निवृत्त हो जाते हैं, यही “यतो वाचो” वाक्य का तात्पर्य है । ऐसे निस्सीम ब्रह्म के लिए ही कहा गया कि “जो उसे जानता है वह किसी से भयभीत नहीं होता ।” मंत्राक्षरों के उल्लेख्य “विपश्चित्” की 'सोऽकामयत्” से लेकर स्वसंकल्प संपादित जगत सृष्टि स्थिति और जगदन्तर्यामिता पर्यन्त छवि बतलाकर, जीव के स्वरूप से सुस्पष्ट भिन्नता बतलाई गई है । इतश्चोभयावस्थात् प्रत्यगात्मनोऽन्य आनंदमयः बद्ध-मुक्त अवस्था वाले जीवात्मा से आनंदमय इसलिए भी भिन्न हैं कि— भेदव्यपदेशाच्च १।१।१८॥ “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः” इत्यारभ्य मांत्रवर्णिकं ब्रह्म व्यंजयद्वाक्यमन्नप्राणमनोभ्य इव जीवादपि तस्य भेदं व्यपदि शति “तस्माद् वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्योऽन्तर आत्मानंद- मयः “इति । अतोजीवाद्भेदस्य व्यपदेशाच्चायं मांत्रवर्णिक आनंदमयोऽ न्य एवेति ज्ञायते । “उसी आत्मा से यह आकाश हुआ” ऐसा प्रारंभ करके मांत्रवर्णिक ब्रह्मबोधक “उस आनंदमय से विज्ञानमय आदि भिन्न हैं” इस वाक्य में प्राणमय आदि से जैसे आनंदमय की भिन्नता दिखलाई गई है, वैसे ही जीवात्मा से भी भेद का उल्लेख होने से, मंत्रवर्णोक्त आनंदमय निश्चित ही भिन्न प्रतीत होता है । इतश्च जीवान्य = इसलिए भी वह जीवात्मा से भिन्न है कि— कामाच्च नानुमानापेक्षा १।१।१९॥ जीवस्याविद्यापरवशस्य जगतकारणत्वे ह्यवर्जनाया आनुमानिक ankurnagpal108@gmail.com
( ३५२ ) प्रधानादि शब्दाभिधेयाचिद्वस्तुसंसर्गापेक्षा, तथैव हि चतुर्मुखादीनां कारणत्वं, इह च “सोऽकामयत, बहुस्यां प्रजायेय” इत्यचित्'संगं रहितस्य स्वकामादेव विचित्रचिदचिद्वस्तुनः सृष्टिः “इदं सर्वम- सृजत यदिदं किं च” इत्याम्नायते । अतोऽस्यानंदमयस्य जगत् सृजतो नानुमानिकाचिद्वस्तुसंसर्गापेक्षा प्रतीयते । ततश्च जीवा- दन्य आनन्दमयः । प्रधान आदि शब्द वाच्य आनुमानिक जड प्रकृति की अपेक्षा तो अविद्याऽधीन जीवात्मा को ही जगत् का कारण मानना पड़ेगा, इसीलिए जीव विशेष ब्रह्मा आदि को जगत् कर्त्ता माना भी गया । किंतु इस प्रसंग में ‘सोऽकामयत’ वाक्य से जड़संसर्ग रहित केवल ब्रह्म से ही जड़ चेतनात्मक समस्त सृष्टि ‘इदं सब’ इत्यादि से बतलाई गई है । प्रसंग से तो आनंदमय की जगत्सर्जन्ता, आनुमानिक जड प्रधान ( प्रकृति ) संसर्गसापेक्ष ज्ञात नहीं होती । इससे भी जीव से भिन्न आनंदमय सिद्ध होता है । इतश्च—इससे भी भिन्नता सिद्ध होती है कि-- अस्मिन्नस्य च तद्योगंशास्ति ।१।१।२०।। अस्मिन्-आनन्दमये, अस्य-जीवस्य, तद्योगम्-आनन्द योगम्, शास्ति-शास्त्रम्—“रसोवैसः रसं ह्येवायंलब्ध्वानन्दी भवति” इति । रसशब्दाभिधेयानन्दमयलाभादयं जीवशब्दाभिलपनीय आनन्दी भवतीत्युच्यमाने यल्लाभादानन्दी भवति स एव इत्यनुन्मत्तः को ब्रवीतीत्यर्थः । “वह रस स्वरूप है—यह जीव उस रस का आस्वादन करके आनंदित होता है” इत्यादि प्रसिद्ध मंत्र इस जीव का, आनंदमय से आनंद संबंध बतलाता है । इस वाक्य में “रस” का अर्थ आनंदमय तथा “अयं” का अर्थ जीव है । यह जीव, आनंदमय रस को प्राप्त कर आनंदित होता है, ऐसा स्पष्ट उल्लेख होने पर भी, जिसकी प्राप्ति से जो
( ३५३ ) आनंदित होता है वे भिन्न दो प्राप्य-प्रापक, एक हैं, ऐसा पागल के अति- रिक्त कोई और तो कह नहीं सकता । एवमानन्दमयः परंब्रह्मेति निश्चितेसति "यदेष आकाश आनन्दः" विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" इत्यादिष्वानन्दशब्देनानन्दमय एव परामृश्यते, यथा विज्ञान शब्देन विज्ञानमयः । अतएव "आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्" इति व्यतिरेक निर्देशः । अतएव च "आनन्दमय- मात्मानमुपसंक्रामति" इति फलनिर्देशश्च । उत्तरेचानुवाके पूर्वानु- वाकोक्तानामन्नमयादीनां "अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् प्राणोब्रह्मेति व्यजानात्"-मनोब्रह्मेति व्यजानात्-"विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्" इति प्रतिपादनात् "आनन्दो ब्रह्म" इत्यप्यानन्दमयस्यैव प्रतिपाद- नमिति विज्ञायते, तत एव च तत्रापि "आनन्दमयमात्मानमुप संक्रम्य" इत्युपसंहृतम् । अतः प्रधानशब्दाभिप्रेयादर्थान्तरभूतस्य परस्यब्रह्मणो जीव- शब्दाभिलपनीयादपि वस्तुनोऽर्थान्तरत्वं सिद्धम् । आनंदमय तत्त्व परब्रह्म ही है, ऐसा निश्चित हो जाने पर "विज्ञान" शब्द से जैसे विज्ञानमय अर्थ की प्रतीति होती है उसी प्रकार "यदेष आकाश आनंदः" "विज्ञानमानंदं ब्रह्म" इत्यादि वाक्योक्त "आनंद" शब्द से आनंदमय अर्थ की प्रतीति होती है । "आनंद ब्रह्मणो विद्वान्" वाक्य में ज्ञाता ज्ञेय का भेद दिखलाया गया है, तथा "आनंद- मयमात्मानमुपसंक्रामति" में आनंदमय आत्मा की प्राप्ति रूप फल का निर्देश है । परवर्त्ती अनुवाक ( परिच्छेद ) में, पूर्व अनुवाक में बतलाये गए अन्नमय आदि को-अन्न ब्रह्म है-प्राण ब्रह्म है-मन ब्रह्म है-विज्ञान ( जीव ) ब्रह्म है" जिस प्रकार प्रतिपादन किया गया है उससे निश्चित होता है कि-"आनंद ब्रह्म है" इस वाक्य का उल्लेख "आनंद" शब्द भी आनंदमय शब्द का प्रतिपादक है । इसीलिए उक्त प्रकरण के अन्त में "आनंदमयमात्मानमुपसंक्रम्य" ऐसा आनंदमय निर्देशक उपसंहार किया गया है । ankurnagpal108@gmail.com
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इस प्रकार प्रधान शब्द वाच्य प्रकृति से भिन्न परब्रह्म की, जीवा- त्मा से भी भिन्नता सिद्ध होती है। ७. अधिकरणः— यद्यपि मन्दपुण्यानां जीवानां कामाज्जगत्सृष्टिरतिशयिता- नन्दयोगो भयाभय हेतुत्वमित्यादि न संभवत्येवेतीमामाशंकां निरा- करोति । यद्यपि अल्पपुण्य वाले जीवों में संकल्पमात्र से सृष्टि, अतिशय आनंद योग, भय या अभय देने की शक्ति आदि संभव नहीं है, फिर भी विलक्षण पुण्यवान जीवविशेष आदित्य, इन्द्र प्रजापति आदि में तो ये संभव हैं फिर परमात्मा ही जगत् के कारण हैं ऐसा क्यों कहते हैं ? इस शंका का निराकरण करते हैं— अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् १।१।१२ ॥ इदमाम्नायते छांदोग्ये 'य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः तस्य यथा कप्या
( ३५५ ) पुंडरीक के समान रमणीक नेत्रों वाला है उसका नाम “ओत” है, वह संपूर्ण पापों से मुक्त है, उस निष्पाप को जो जानता है वह भी पापों से मुक्त हो जाता है। ऋक् और साम में उसी का गान किया गया है वही अधिदेव है।” इसके बाद इसी का अध्यात्म रूप भी जैसे—“जो यह आँखों में पुरुष दीखता है; ऋक्-साम-उक्थ (सामवेदीय स्तोत्र विशेष) यजु और ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णित पूर्व पुरुष का जैसा रूप है, यह वैसे ही रूपवाला है, उसका जैसा गान करते हैं, इसका भी वैसा ही गान करते हैं, उसका जो नाम है, इसका भी वही नाम है।” उक्त विषय में संशय होता है कि—उक्त आदित्य और नेत्र स्थित पुरुष, क्या अधिक पुण्यशाली ऐश्वर्यवान् सूर्यमंडल को प्राप्त करने वाला जीवात्मा ही है ? अथवा उससे भिन्न परमात्मा है ? किसको मानना उचित होगा ? उपचितपुण्यो जीव एवेति । कुतः ? स शरीरत्वश्रवणात् शरीरसंबंधो हि जीवानामेव संभवति । कर्मानुगु णप्रिययोगाय हि शरीर संबंधः । अतएव हि कर्मसंबंधरहितस्यमोक्षस्य प्राप्यत्वम शरीरत्वेनोच्यते “न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति, अशरीरं वा व सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः” इति । संभवति च पुण्यातिशयात् ज्ञानाधिक्यम्, शक्त्याधिक्यंच । अतएवं लोककामेश- त्त्वादि तस्यैवोपपद्यते । ततएव चोपास्यत्वम्, फलदायित्वम्, पाप- क्षपणकत्वेन मोक्षोपयोगित्वं च । मनुष्येष्वप्युपचितपुण्याः केचित् ज्ञानशक्त्यादिभिरधिकतरा दृश्यन्ते, ततश्च सिद्धगंधर्वादयः ततश्च देवाः ततश्चेंद्रादयः । अतो ब्रह्मादिष्वन्यतमएवैकैकस्मिन्कल्पे पुण्यविशेषेणैवम्भूतमैश्वर्यम्प्राप्तो जगत्सृष्ट्याद्यपि करोतीति जगत्का- रणत्वजगदन्तरात्मत्वादिवाक्यमस्मिन्नेवौपचितपुण्यविशेषे सर्वज्ञे सर्वशक्तौ वर्त्तते । अतो न जीवादतिरिक्तः परमात्मा नाम कश्चि- ankurnagpal108@gmail.com
( ३५६ ) दस्ति । एवं च सति “अस्थूलमनण्वह्रस्वम्” इत्यादयो जीवात्मन्- स्वाभिप्राया भवंति मोक्षशास्त्राण्यपि तत्स्वरूपतत्प्राप्त्युपायोपदेश- पराणि-इति ' विशेष पुण्यवान जीव ही उक्त पुरुष हो सकता है क्यों उसके शरीर का वर्णन किया गया है, शरीर संबंध तो जीवो का ही हो सकता है । शुभाशुभ कर्म और गुण के संयोग से ही शरीर संबंध होता है । तभी कर्म संबंध रहित शरीर हीन मोक्ष की प्राप्ति कही गई है— “शरीराभिमान के रहते पाप पुण्य नष्ट नहीं होते, शरीराभिमान शून्य हो जाने पर पाप पुण्य स्पर्श नहीं कर सकते ।” इत्यादि । पुण्य की अधिकता से अधिक ज्ञान और अधिक शक्ति संपन्न होना भी संभव है, लोकेश कामेश इत्यादि उपाधियां भी जीवात्मा के लिए ही प्रयुक्त होती हैं । उपास्यता, फलदातृता, पापप्रक्षालनता और मोक्षदातृता आदि क्षमतायें भी उसमें हो सकती हैं । मनुष्यों में ही प्रायः अधिक पुण्यवान और ज्ञान शक्ति संपन्न महापुरुष देखे जाते हैं, सिद्ध, गंधर्व, देव तथा देवाधिदेव इन्द्र उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं । मनुष्य से ब्रह्मा पर्यन्त में से कोई विशेष पुण्यवान महापुरुष एक- एक कल्प तक ऐश्वर्य संपन्न होकर जगत् सृष्टि आदि का संपादन करते हैं । जगत्कारणता और जगदन्तरात्मकता के बोधक वाक्य भी ऐसे ही सर्वज्ञ सर्वशक्ति संपन्न महापुरुष के लिए घटित होते हैं । इसलिए जीवात्मा से अतिरिक्त परमात्मा नामक कोई विशेष नहीं है । “अस्थूल, अनणु-अह्रस्व’ इत्यादि विशेषण भी जीवात्मा बोधक ही सिद्ध होते हैं तथा मोक्षोपदेशक शास्त्र वाक्य भी जीव स्वरूप निर्देशक एवं प्राप्ति उपाय के रूप में ही घटित होते हैं, ऐसा मानना होगा । सिद्धान्त—एवं प्राप्तेऽभिधीयते—अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्—अंतरादित्ये ऽन्तरक्षिणि च यः पुरुषः प्रतीयते, स जीवादन्यः परमात्मैव, कुतः ? तद्धर्मोपदेशात् जीवेष्वसंभवस्तदतिरिक्तस्यैव परमात्मनो धर्मोऽ- यमपहतपाप्मत्वादिः “स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः” इत्यादिना- ankurnagpal108@gmail.com
( ३५७ ) पदिश्यते । अपहतपाप्मत्वम् हि अपहतकर्मत्वं, कर्मवश्यतागंधरहित- त्वमित्यर्थः । कर्माधीनसुखदुःख भागत्वेन कर्मवश्याः हि जीवाः । अतो अपहतपाप्मत्वं जीवादन्यस्य परमात्मन एव धर्मः । उक्त संशय के निराकरणार्थ ही सूत्रकार ने सिद्धांत निर्णय करते हुए “अन्तस्तद्धर्मोपदेशात” सूत्र कहा है, जिसका तात्पर्य है कि—सूर्यं मंडल और नेत्र में जो पुरुष दीखता है वह जीवात्मा से भिन्न परमात्मा ही है । उसी की विशेषताओं का उपदेश वेद में किया गया है । जो जीवों में कभी संभव नहीं हैं उन्हीं निष्पापता आदि विशेषताओं का परमात्मा के लिए “स एष सर्वेभ्य” इत्यादि वाक्यों में किया गया है अपहतपापता का तात्पर्य है, निष्कर्मता, कर्मबन्धन शून्यता । कर्माधीन सुख दुःखानुसार कर्म के वशीभूत जीव ही है । निष्पापता आदि तो जीव से विलक्षण परमात्मा के ही धर्म हैं । यत्पूर्वकं स्वरूपोपाधिकं लोककामेशत्वम्, सत्यसंकल्पत्वादिकं सर्वभूतान्तरात्मत्वंच तस्यैवधर्मः । यथााह—‘‘एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोकोविजिघत्सोऽपिपासस्सत्यकामस्सत्यसंकल्पः’’ इति तथा ‘एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेवएको नारायणः’’ इति । ‘‘सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति’’ इत्यादि सत्यसंकल्पत्वपूर्वकसमस्तचिदचिद्वस्तुसृष्टियोगो निरूपाधिक भया- भय हेतुत्वं, वाङ्मनसपरिमितकृतपरिच्छेदराहितानवधिकाति- शयानन्दयोग इत्यादयोऽकर्मसंपाद्यास्वाभाविकाधर्मा जीवस्य न संभवंति । उसी प्रकार लोकेशता, कामेश्वरता, सत्य संकल्पता, सर्वभूतान्त रात्मकता, आदि स्वाभाविक धर्म भी परमात्मा के ही हैं। ऐसा ही— “यह सर्वान्तर्यामी, निष्पाप, जरामृत्यु शोक भूख प्यास रहित, सत्यकाम और सत्य संकल्प है” इस वाक्य से ज्ञात होता है । तथा “ऐसे सर्वान्तर्यामी निष्पाप दिव्य देव स्वरूप एकमात्र नारायण ही हैं” उन्होंने संकल्प किया कि एक से अनेक हो जाऊँ “इत्यादि में वर्णित सत्य ankurnagpal108@gmail.com