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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

44 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/2-10 ]
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
और श्रीगौरभक्तोंकी जय हो ॥ २॥
तीन प्रकारसे महाप्रभुके द्वारा जीवोंका उद्धार :-
सर्वलोक उद्धारिते गौर-अवतार।
निस्तारेर हेतु तांर त्रिविध प्रकार॥ ३॥
अनुवाद—सभी लोगोंका उद्धार करनेके लिये ही
श्रीगौर-अवतार हुआ है। उन्होंने उनका उद्धार तीन
प्रकारसे किया॥ ३॥
(1) साक्षात्-दर्शन, (2) योग्य जीवमें आवेश
और (3) आविर्भाव :-
साक्षात्-दर्शन, आर योग्यभक्त-जीवे।
‘आवेश’ करये काँहा हञा ‘आविर्भावे’ ॥ 4 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहीं साक्षात्-दर्शन देकर जीवोंका
उद्धार किया। कहीं योग्यभक्त-जीवमें ‘आवेश’रूपसे
और कहीं ‘आविर्भाव’रूपसे जीवोंका उद्धार किया॥ 4॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने जीवोंको साक्षात् दर्शन
देकर, किसी योग्यभक्त-जीवमें आविष्ट होकर और
किसी भक्तजीवके समक्ष आविर्भूत होकर जीवोंका
उद्धार किया ॥ 3-4 ॥
तीन प्रकारके प्राकट्यका वर्णन :-
‘साक्षात्-दर्शने’ प्राय सब निस्तारिला।
नकुल-ब्रह्मचारीर देहे ‘आविष्ट’ हइला॥ 5 ॥
ईश्वरका स्वभाव :-
प्रद्युम्न-नृसिंहानन्द आगे कैला ‘आविर्भाव’।
‘लोक निस्तारिब’,—एइ ईश्वर-स्वभाव॥ 6 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने प्रायः सभीका तो साक्षात्-दर्शन
देकर ही उद्धार किया था। एक बार महाप्रभुने श्रीनकुल
ब्रह्मचारीकी देहमें ‘आविष्ट’ होकर उनके देहके विकारोंको
देखनेके लिये आये गौड़भक्तोंका उद्धार किया था।
महाप्रभु श्रीप्रद्युम्नके (श्रीनृसिंहानन्दके) समक्ष स्वयं
आविर्भूत हुए और उन्होंने अनेक लोगोंका उद्धार
किया। ईश्वरका स्वभाव ही जीवोंका उद्धार करना
है॥ 5-6॥
अनुभाष्य—‘साक्षात् दर्शन’ प्रदान करके, नकुल-
ब्रह्मचारीकी देहमें ‘आविष्ट’ होकर और प्रद्युम्न अथवा
नृसिंहानन्द-ब्रह्मचारीके सम्मुख ‘आविर्भूत’ होकर महाप्रभुने
लोगोंका उद्धार किया। (1) श्रीशचीके गृहमन्दिरमें,
(2) श्रीनित्यानन्द प्रभुके नर्त्तनस्थलपर, (3) श्रीवास-अङ्गनमें
कीर्त्तनस्थलपर एवं (4) श्रीराघवके भवनमें,—इन चार
स्थानोंपर महाप्रभु नित्य ‘आविर्भाव’ प्रकटित करते थे
(इसी अध्यायकी 34 संख्या देखें)॥ 5-6॥
तीन प्रकारके प्राकट्योंके फलका वर्णन;
महाप्रभुके ‘साक्षात्-दर्शन’का फल :-
साक्षात्-दर्शने सब जगत् तारिला।
एकबार ये देखिला, से कृतार्थ हइला॥ 7 ॥
अनुवाद—साक्षात्-दर्शन देकर महाप्रभुने समस्त
जगत्का उद्धार किया। एकबार भी जिसने उनका
दर्शन किया, वह कृतार्थ हो गया॥ 7॥
गौड़-देशेर भक्तगण प्रत्यब्द आसिया।
पुनः गौड़देशे याय प्रभुरे मिलिया॥ 8 ॥
अनुवाद—गौड़-देशके भक्तगण प्रत्येक वर्ष नीलाचल
आते थे। महाप्रभुसे मिलकर वे पुनः गौड़देशमें लौट
जाते थे॥ 8॥
आर नाना-देशेर लोक देखि’ जगन्नाथ।
चैतन्य-चरण देखि’ हइल कृतार्थ॥ 9 ॥
अनुवाद—अन्य देशोंके लोग भी श्रीजगन्नाथके
दर्शन करने आते थे और पुरीमें आकर श्रीचैतन्य
महाप्रभुके चरणोंका दर्शन करके कृतार्थ हो जाते
थे॥ 9॥
सप्तद्वीपेर लोक आर नवखण्डवासी।
देव, गन्धर्व, किन्नर—मनुष्य-वेशे आसि’ ॥ 10 ॥

[ 2/10-17 दूसरा अध्याय 45

प्रभुरे देखिया याय ‘वैष्णव’ हञा।
कृष्ण बलि’ नाचे सब प्रेमाविष्ट हञा ॥ 11 ॥

अनुवाद—सातों द्वीपोंके लोग, नौ खण्डोंके निवासी, देवता, गन्धर्व और किन्नर भी मनुष्यके वेशमें आकर महाप्रभुके दर्शन करके सब वैष्णव बन जाते थे। वे ‘कृष्ण’ नामका उच्चारण करके प्रेमाविष्ट होकर नृत्य करने लगते थे ॥ 10-11 ॥

अनुभाष्य—‘सप्तद्वीप’,—मध्यलीला 20/218 संख्याका अनुभाष्य और भागवतके पाँचवें स्कन्धके 16 और 20 अध्याय देखें।

‘नवखण्ड’,—सिद्धान्तशिरोमणिमें गोलाध्यायके भुवनकोशमें—
“ऐन्द्रं कशेरुसकलं किल ताम्रपर्ण-
मन्यद्गभस्तिमदतश्च कुमारिकाख्यम्।
नागञ्च सौम्यमिह वारुणमन्त्यखण्डं
गान्धर्व-संज्ञमिति भारतवर्षमध्ये॥”

  1. ऐन्द्र, (2) कशेरु, (3) ताम्रपर्ण, (4) गभस्तिमत्, (5) कुमारिका, (6) नाग, (7) सौम्य, (8) वारुण और (9) गान्धर्व—भारतवर्षमें ये नौ खण्ड हैं ॥ 10 ॥

महाप्रभुके आवेशका कारण, देश, काल और पात्रके वैशिष्ट्यका वर्णन :—
एइमत दर्शने त्रिजगत् निस्तारि’।
ये केह आसिते नारे अनेक संसारी ॥ 12 ॥
ता-सबा तारिते प्रभु सेइ सब देशे।
योग्यभक्त-जीवदेहे करेन ‘आवेश’ ॥ 13 ॥

अनुवाद—इस प्रकार अपने दर्शनोंसे महाप्रभुने त्रिभुवनका उद्धार कर दिया। संसारमें फंसे अनेक लोग ऐसे भी थे जो महाप्रभुके दर्शनोंको प्राप्त नहीं कर सके। उन सबका भी उद्धार करनेके लिये महाप्रभु उन सब देशोंमें किसी योग्यभक्त-जीवकी देहमें अपना ‘आवेश’ प्रकट कर देते थे॥ 12-13 ॥

आवेशका फल :—
सेइ जीवे निज भक्ति करेन प्रकाशे।
ताहार दर्शने ‘वैष्णव’ हय सर्वदेशे ॥ 14 ॥

अनुवाद—महाप्रभु उस जीवमें अपनी भक्तिका प्रकाश कर देते और उस जीवके दर्शनसे समस्त देशवासी वैष्णव बन जाते थे॥ 14 ॥

एइमत आवेशे तारिल त्रिभुवन।
गौड़े यैछे आवेश, करि’ दिग्दरशन ॥ 15 ॥

अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने आवेशके द्वारा त्रिभुवनका उद्धार किया। महाप्रभुने गौड़देशमें जिस प्रकारसे आवेश प्रकाशित किया, मैं (ग्रन्थकार) यहाँ उसका दिग्दर्शन करवा रहा हूँ॥ 15 ॥

‘आवेश’का दृष्टान्त—श्रीनकुल ब्रह्मचारीमें महाप्रभुका ‘आवेश’ और उनकी अवस्थाका वर्णन :—
आम्बुया-मुलुके हय नकुल ब्रह्मचारी।
परम-वैष्णव तेंहो बड़ अधिकारी ॥ 16 ॥

अनुवाद—गौड़देशमें श्रीनवद्वीपधामके निकट आम्बुया-मुलुकमें एक श्रीनकुल ब्रह्मचारी नामक परम वैष्णव रहते थे, जो कि भक्तिराज्यमें उत्तम अधिकारी थे॥ 16 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य— ‘आम्बुया-मुलुक’,—उस समय मुलुक विभाग करके एक-एक स्थानपर यवन-राजाओंकी तहसील-कचहरी थी; ‘अम्बिका’ (वर्धमान जिलेके कालना-नगरसे संलग्न एक विशेष पल्ली)-नामक स्थानपर एक मुलुक था। उसके अधिकारमें जो स्थान अब ‘प्यारीगञ्ज’के नामसे प्रसिद्ध है, वहीं श्रीनकुल ब्रह्मचारी रहते थे॥ 16 ॥

गौड़देशे लोक निस्तारिते मन हैल।
नकुल-हृदये प्रभु ‘आवेश’ करिल ॥ 17 ॥

अनुवाद—जब महाप्रभुके मनमें गौड़देशके लोगोंका

46 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/17-27 ]
उद्धार करनेकी इच्छा हुई, तब महाप्रभुने श्रीनकुल चैतन्येर आवेश हय नकुलेर देहे।
ब्रह्मचारीके हृदयमें अपना ‘आवेश’ प्रकाशित किया॥ 17॥ शुनि' शिवानन्द आइला करिया सन्देहे ॥ 22 ॥
ग्रहग्रस्तप्राय नकुल प्रेमाविष्ट हञा। श्रीशिवानन्दका संशय और परीक्षा लेनेकी इच्छा :—
हासे, कान्दे, नाचे गाय उन्मत्त हञा ॥ 18 ॥ परीक्षा करिते ताँर यबे इच्छा हैल।
बाहिरे रहिया तबे विचार करिल ॥ 23 ॥
अश्रु, कम्प, स्तम्भ, स्वेद, सात्त्विक विकार। श्रीशिवानन्दका विचार और दूरमें अवस्थान :—
निरन्तर प्रेमे नृत्य, सघन हुङ्कार ॥ 19 ॥ 'आपने बोलान मोरे, इहा यदि जानि।
अनुवाद—भूतग्रस्त व्यक्तिका जिस प्रकार अपने आमार इष्ट-मन्त्र जानि' कहेन आपनि ॥ 24 ॥
शरीरपर नियन्त्रण नहीं रहता, उसी प्रकार महाप्रभुका तबे जानि, इँहाते हय चैतन्य-आवेशे।'
'आवेश' आनेसे श्रीनकुल ब्रह्मचारी प्रेमाविष्ट हो गये। एत चिन्ति' शिवानन्द रहिला दूरदेशे ॥ 25 ॥
वे उन्मत्त होकर कभी तो हँसने लगे, कभी रोने लगे
तथा कभी नृत्य-गान करने लगे। उनकी देहमें अश्रु, अनुवाद—श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी देहमें श्रीचैतन्यदेवका
कम्प, स्तम्भ और स्वेद (पसीना आना) आदि आवेश हुआ है, यह सुनकर श्रीशिवानन्द सेनको कुछ
अष्ट-सात्त्विक विकार प्रकाशित होने लगे। वे प्रेममें सन्देह हुआ, इसलिये वे वहाँपर आये। जब उनके
डूबकर निरन्तर नृत्य और ज़ोरसे हुङ्कार करने मनमें श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी परीक्षा करनेकी इच्छा हुई,
लगे॥ 18-19॥ तब वे श्रीनकुल ब्रह्मचारीके घरसे बाहर रहकर विचार
तैछे गौरकान्ति, तैछे सदा प्रेमावेश। करने लगे,—‘यदि नकुल ब्रह्मचारी यह जान जायँ कि
ताहाते देखिते आइसे सर्व गौड़देश ॥ 20 ॥ मैं यहाँ हूँ और वे मुझे स्वयं ही भीतर बुलायें एवं
मेरे इष्ट-मन्त्रको जानकर वे स्वयं उसे मुझे बतला दें,
अनुवाद—महाप्रभुकी भाँति श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी तभी मैं मानूँगा कि उनमें श्रीचैतन्यदेवका आवेश हुआ
अङ्गकान्ति भी गौरवर्णकी हो गयी और उनमें निरन्तर है।' ऐसा विचारकर श्रीशिवानन्द सेन कुछ दूरीपर ही
प्रेमका आवेश होने लगा। गौड़देशमें सभी स्थानोंसे लोग खड़े रहे॥ 22-25॥
उनके दर्शन करनेके लिये आने लगे॥ 20॥
असंख्य लोकेर घटा,—केह आइसे याय।
अनुभाष्य—'सर्वगौड़देश',—समस्त गौड़देशवासी लोकेर संघट्टे केह दर्शन ना पाय ॥ 26 ॥
(गौड़ीयगण)॥ 20॥
अनुवाद—वहाँ असंख्य लोगोंकी भीड़ थी—कोई
ब्रह्मचारीका उपदेश :— आ रहा था, तो कोई जा रहा था। लोगोंकी भीड़के
याँरे देखे ताँरे कहे, — 'कह कृष्णनाम'। कारण किसी-किसीको तो श्रीनकुल ब्रह्मचारीके दर्शन
ताँहार दर्शने लोक हय प्रेमोद्दाम ॥ 21 ॥ भी प्राप्त नहीं हो रहे थे॥ 26॥
अनुवाद—श्रीनकुल ब्रह्मचारी जिसे भी देखते, श्रीशिवानन्दको अपने निकट बुलानेके
उसीको कहते,—'कृष्णनाम बोलो'। उनके दर्शनसे ही लिये लोगोंको भेजना :—
सभी लोग प्रेममें प्रमत्त हो उठते ॥ 21 ॥ ब्रह्मचारी कहे, — “शिवानन्द आछे दूरे।
अनुभाष्य—'प्रेमोद्दाम',—प्रेममें प्रमत्त॥ 21॥ जन दुइ-चारि याह, बोलाह ताहारे ॥”27 ॥

[ 2/27-36 दूसरा अध्याय 47
अनुवाद—श्रीनकुल ब्रह्मचारीने कहा,–"शिवानन्द
सेन कुछ दूरीपर हैं। दो-चार लोग जाकर उन्हें
बुलाकर ले आओ ॥"27॥
चारिदिके धाय लोके 'शिवानन्द' बलि' ।
“शिवानन्द कोन्, तोमाय बोलाय ब्रह्मचारी ॥ "28॥
अनुवाद—लोग 'शिवानन्द' बोलते हुए चारों दिशाओंमें
दौड़ पड़े और उनको पुकारते हुए कहने लगे,–"शिवानन्द
कौन हैं? आपको श्रीनकुल ब्रह्मचारी बुला रहे
हैं॥"28॥
श्रीशिवानन्दका शीघ्र आना :—
शुनि' शिवानन्द सेन ताँहा शीघ्र आइल।
नमस्कार करि' ताँर निकटे बसिल ॥ 29 ॥
अनुवाद—उन लोगोंकी पुकारको सुनकर श्रीशिवानन्द
सेन शीघ्रतासे वहाँ आ गये और श्रीनकुल ब्रह्मचारीको
नमस्कार करके उनके निकट बैठ गये ॥ 29 ॥
श्रीशिवानन्दके सन्देहका भङ्ग होना :—
ब्रह्मचारी बोले,–“तुमि करिला संशय।
एक मना हञा ताहा शुनह निश्चय ॥ 30॥
'गौरगोपाल-मन्त्र' तोमार चारि अक्षर।
अविश्वास छाड़, येइ करियाछ अन्तर ॥"31 ॥
अनुवाद—तब श्रीनकुल ब्रह्मचारीने श्रीशिवानन्दसे
कहा,–“आपने मुझपर संशय किया। अब आप
एकाग्रचित्त होकर उसका प्रमाण सुनो। आप चार
अक्षरवाले 'गौरगोपाल-मन्त्र'का जप करते हैं। आपके
हृदयमें जो अविश्वास है, अब उसे छोड़ो ॥"30-31॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'गौरगोपाल-मन्त्र',—गौरवादिगण
'गौराङ्ग'-नामसे चार-अक्षरवाले गौरमन्त्रको लक्ष्य करते
हैं; केवल-कृष्णावादिगण इस 'गौरगोपालमन्त्र'-शब्दसे
राधा-कृष्णके चार-अक्षरवाले मन्त्रको लक्ष्य करते
हैं॥ 31 ॥
अनुभाष्य—'अन्तर'—मनमें ॥ 31 ॥
श्रीशिवानन्दका विश्वास :—
तबे शिवानन्देर मने प्रतीति हइल।
अनेक सम्मान करि' बहु भक्ति कैल ॥ 32 ॥
अनुवाद—तब श्रीशिवानन्द सेनके हृदयमें यह पूर्ण
विश्वास हुआ कि श्रीनकुल ब्रह्मचारीमें महाप्रभुका
आवेश हुआ है और उन्होंने सम्मानपूर्वक उनकी बहुत
सेवा की ॥ 32 ॥
एइमत महाप्रभुर अचिन्त्य प्रभाव।
एबे शुन प्रभुर यैछे हय 'आविर्भाव' ॥ 33 ॥
अनुवाद—इस प्रकारसे महाप्रभुके अचिन्त्य प्रभावको
समझना चाहिये। महाप्रभुका 'आविर्भाव' जिस प्रकार
होता है, अब उसके विषयमें श्रवण करो ॥ 33 ॥
प्रेमसे आकृष्ट महाप्रभुके
'नित्य-आविर्भाव'के चार स्थान :—
शचीर मन्दिरे, आर नित्यानन्द-नर्त्तने।
श्रीवास-कीर्त्तने आर राघव-भवने ॥ 34 ॥
एइ चारि ठाञि, प्रभुर सदा 'आविर्भाव' ।
प्रेमाविष्ट हय–प्रभुर सहज स्वभाव ॥ 35 ॥
अनुवाद—श्रीशचीमाताके घरके मन्दिरमें, श्रीनित्यानन्द
प्रभुके नृत्य करनेके स्थानमें, श्रीवास पण्डितके घरपर
कीर्त्तनके समयमें और श्रीराघव पण्डितके भवनमें–इन
चारों स्थानोंपर महाप्रभुका सदा 'आविर्भाव' होता है।
भक्तोंके प्रेमसे आकृष्ट होकर महाप्रभुका आविर्भाव
होता है—यह महाप्रभुका सहज-स्वभाव है ॥ 34-35 ॥
कभी-कभी 'आविर्भाव'का दृष्टान्त; प्रद्युम्न अथवा
नृसिंह ब्रह्मचारीके वृत्तान्तका वर्णन :—
नृसिंहानन्देर आगे आविर्भूत हञा।
भोजन करिला, ताहा शुन मन दिया ॥ 36 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीनृसिंहानन्दके समक्ष आविर्भूत

48 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/36-45 ]
होकर उनके द्वारा अर्पित भोजनको ग्रहण किया, इस
प्रसङ्गको ध्यानपूर्वक श्रवण कीजिये॥ ३६॥
श्रीकान्त सेनकी कथा; महाप्रभुके दर्शनके लिये
उनका अकेले श्रीक्षेत्रमें गमन :-
शिवानन्देर भागिना श्रीकान्त-सेन नाम।
प्रभुर कृपाते तेंहो बड़ भाग्यवान् ॥ ३७॥
एक वत्सर तेंहो प्रथम एकेश्वर।
प्रभु देखिबारे आइला उत्कण्ठा अन्तर ॥ ३८ ॥
अनुवाद - श्रीशिवानन्द सेनके भाञ्जे जिनका नाम
श्रीकान्त-सेन था, वे महाप्रभुकी कृपा प्राप्त करनेके
कारण बड़े सौभाग्यशाली थे। एक वर्ष वे अकेले ही
हृदयमें उत्कण्ठाके कारण महाप्रभुके दर्शनोंके लिये
श्रीजगन्नाथपुरी गये ॥ ३७-३८ ॥
अनुभाष्य - 'एकेश्वर',—अकेले, सेवकके बिना ॥ ३८ ॥
उनके प्रति महाप्रभुकी कृपा और आदेश :-
महाप्रभु तांरे देखि' बड़ कृपा कैला।
मास-दुइ तेंहो प्रभुर निकटे रहिला ॥ ३९ ॥
अनुवाद-महाप्रभुने उनको देखकर उनपर बहुत
कृपा की। श्रीकान्त-सेन दो मास तक महाप्रभुके पास
श्रीजगन्नाथपुरीमें रहे ॥ ३९ ॥
गौड़ीय-भक्तोंको पुरी आनेके लिये निषेध-आज्ञा :-
तबे प्रभु ताँरे आज्ञा कैला गौड़े याइते।
भक्तगणे निषेधिला इहाँके आसिते ॥ ४० ॥
पौषमासमें स्वयं गौड़देशमें जानेका निर्णय :-
“ए-वत्सर ताँहा आमि याइमु आपने।
ताँहाइ मिलिमु सब अद्वैतादि सने ॥ ४१ ॥
शिवानन्दे कहिह,—आमि एइ पौषमासे।
आचम्बिते अवश्य आमि याइब ताँर पाशे ॥ ४२ ॥
जगदानन्द हय ताँहा, तेंहो भिक्षा दिबे।
सबारे कहिह,—ए वत्सर केह ना आसिबे ॥” ४३ ॥
अनुवाद-जब श्रीकान्त सेन गौड़देशमें लौटने लगे,
तब महाप्रभुने उनके माध्यमसे गौड़देशके भक्तोंको उस
वर्ष श्रीजगन्नाथपुरी आनेके लिये निषेध करते हुए
कहा,—“इस वर्ष मैं स्वयं गौड़देश आऊँगा, मैं वहींपर
ही श्रीअद्वैतादि सभी भक्तोंसे मिलूँगा। शिवानन्द सेनसे
कहना कि मैं इस पौष-मासमें अवश्य अचानक ही
उनके पास आऊँगा। जगदानन्द पण्डित वहींपर हैं, वे
मेरे लिये भोजनकी व्यवस्था कर देंगे। तुम सभीसे
कहना कि इस वर्ष यहाँ कोई भी नहीं आये॥” ४०-४३ ॥
अनुभाष्य - 'इँहाँके',—इस स्थानपर, श्रीपुरुषोत्तम-क्षेत्रमें।
'ताँहा',—गौड़देशमें ॥ ४०-४१ ॥
गौड़देशमें आकर श्रीकान्तके द्वारा महाप्रभुकी आज्ञाको
बतलाना, भक्तोंका आनन्दपूर्वक गौड़में ही रहना :-
श्रीकान्त आसिया गौड़े सन्देश कहिल।
शुनि' भक्तगण-मने आनन्द हइल ॥ ४४ ॥
अनुवाद-श्रीकान्तने गौड़देशमें आकर सभी भक्तोंको
महाप्रभुका सन्देश सुनाया। महाप्रभुके सन्देशको सुनकर
भक्तोंके मनमें बहुत आनन्द हुआ ॥ ४४ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'सन्देश',—संवाद ॥ ४४ ॥
अनुभाष्य - 'सन्देश',—अगले पौषमासमें महाप्रभुके
गौड़देशमें आगमनकी वार्त्ता ॥ ४४ ॥
श्रीशिवानन्द और श्रीजगदानन्दके द्वारा
प्रतिदिन महाप्रभुकी प्रतीक्षा :-
चलितेछिला आचार्य, रहिला स्थिर हञा।
शिवानन्द, जगदानन्द रहे प्रत्याशा करिया ॥ ४५ ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य अन्य भक्तोंके साथ श्रीजगन्नाथ
पुरी जानेके लिये तत्पर हो रहे थे, परन्तु वे महाप्रभुके
सन्देशको सुनकर रुक गये। श्रीशिवानन्द सेन
और श्रीजगदानन्द पण्डित भी प्रतिदिन महाप्रभुके
आनेकी प्रतीक्षामें वहीं रह गये ॥ ४५ ॥
अनुभाष्य - 'आचार्य',—श्रीअद्वैत प्रभु ॥ ४५ ॥

[ 2/46-57 दूसरा अध्याय 49
पौषमासे आइल दुँहे सामग्री करिया।
सन्ध्या-पर्यन्त रहे अपेक्षा करिया ॥ 46 ॥
अनुवाद—जब पौष मास आ गया, तब श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित, दोनों प्रतिदिन महाप्रभुके अभिवादन और सेवाके लिये सभी प्रकारकी सामग्री प्रस्तुत करके सन्ध्या तक उनकी प्रतीक्षा करते थे ॥ 46 ॥
महाप्रभुके नहीं आनेके कारण दोनोंका दुःख :-
एइमत मास गेल, गोसाञि ना आइला।
जगदानन्द, शिवानन्द दुःखित हइला ॥ 47 ॥
अनुवाद—इस प्रकार धीरे-धीरे पौष-मास समाप्त होनेको आया, किन्तु महाप्रभु नहीं आये। श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीशिवानन्द सेन बहुत दुःखी हुए ॥ 47 ॥
अनुभाष्य—'गोसाञि,'—महाप्रभु ॥ 47 ॥
श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीका आगमन तथा उनके दुःखके कारणकी जिज्ञासा :-
आचम्बिते नृसिंहानन्द ताँहाइ आइला।
दुँहे ताँरे मिलि' तबे स्थाने बसाइला ॥ 48 ॥
दुँहे दुःखी भावे देखि' कहे नृसिंहानन्द।
“तोमा दुँहाकारे केने देखि निरानन्द ? ? ” 49 ॥
अनुवाद—अचानक ही श्रीनृसिंहानन्द (श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी) वहाँ आ गये। वे दोनों (श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित) उनसे मिले और उन्हें एक आसनपर बैठाया। उन दोनोंको दुःखी देखकर श्रीनृसिंहानन्दने पूछा, — “मैं आप दोनोंको दुःखी क्यों देख रहा हूँ?” 48-49 ॥
श्रीशिवानन्दके द्वारा सम्पूर्ण वृत्तान्त कहना :-
तबे शिवानन्द ताँरे सकल कहिला।
“आसिते आज्ञा दिया प्रभु केने ना आइला ॥” 50 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने उन्हें सारा वृत्तान्त सुनानेके पश्चात् कहा,—“आनेका सन्देश देकर भी महाप्रभु क्यों नहीं आये ?” 50 ॥
श्रीप्रद्युम्नके द्वारा आश्वासन तथा प्रबोध-दान :-
शुनि' ब्रह्मचारी कहे, — “करह सन्तोषे।
आमि त' आनिब ताँरे तृतीय दिवसे ॥” 51 ॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने कहा, — “आप थोड़ा शान्त रहिये। मैं महाप्रभुको आजसे तीसरे दिन ही यहाँ ले आऊँगा ॥” 51 ॥
श्रीशिवानन्द और श्रीजगदानन्द, दोनोंको विश्वास :-
ताँहार प्रभाव-प्रेम जाने दुइजने।
आनिबे प्रभुरे एबे निश्चय कैला मने ॥ 52 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीके प्रभाव एवं महाप्रभुके प्रति उनके प्रेमके विषयमें भली-भाँति जानते थे। इसलिये उनके मनमें यह विश्वास हो गया कि ये महाप्रभुको अवश्य ही यहाँ ले आयेंगे ॥ 52 ॥
'नृसिंहानन्द'-नामकी प्राप्तिका कारण :-
'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' — ताँर निज-नाम।
'नृसिंहानन्द' - नाम ताँर कैला गौरधाम ॥ 53 ॥
अनुवाद—उनका वास्तविक नाम तो 'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' था। श्रीगौरसुन्दरने उनको 'नृसिंहानन्द' नाम प्रदान किया था ॥ 53 ॥
महाप्रभुको प्रकट करनेकी प्रद्युम्न ब्रह्मचारीकी प्रतिज्ञा और भोग पकानेका प्रयास :-
दुइदिन ध्यान करि' शिवानन्देरे कहिल।
“पाणिहाटि-ग्रामे आमि प्रभुरे आनिल ॥ 54 ॥
कालि मध्याह्ने तँहो आसिबेन तोमार घरे।
पाक-सामग्री आनह, आमि भिक्षा दिमु ताँरे ॥ 55 ॥
तबे ताँरे एथा आमि आनिब सत्वर।
निश्चय कहिलाङ, किछु सन्देह ना कर ॥ 56 ॥
ये चाहिये, ताहा कर हुआ तत्पर।
अति त्वराय करिब पाक, शुन अतःपर ॥ 57 ॥

50 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/54-65 ]
पाक-सामग्री आनह, आमि याहा चाइ।”
ये मागिल, शिवानन्द आनि' दिला ताइ ॥ 58 ॥
अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने दो दिन तक
ध्यान करनेके बाद श्रीशिवानन्द सेनसे कहा, —“मैं
महाप्रभुको पाणिहाटि-ग्राम तक ले आया हूँ। कल
दोपहर तक वे आपके घरपर आ जायेंगे। आप रसोई
बनानेकी समस्त सामग्री लाकर मुझे दो, मैं स्वयं उन्हें
भोजन बनाकर खिलाऊँगा। तभी मैं उन्हें यहाँ शीघ्रतासे
ले आऊँगा। मेरी बातपर पूर्ण विश्वास रखो, मैं सत्य
कह रहा हूँ, कुछ सन्देह मत करना। मैं जो कुछ भी
चाहता हूँ, आप शीघ्रतासे उसे लाकर दे दो, क्योंकि
मैं अभी भोजन बनाना प्रारम्भ करना चाहता हूँ। मुझे
जो भी भोजनकी सामग्री चाहिये, आप उसे लेकर
आइये।” श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने जो कुछ माँगा,
श्रीशिवानन्द सेनने वह लाकर दे दिया ॥ 54-58 ॥
प्रद्युम्नका रसोई बनाना और महाप्रभु, श्रीजगन्नाथ एवं
अपने इष्टदेव श्रीनृसिंह, प्रत्येकके लिये तीन
अलग-अलग नैवेद्य-भोग सजाना :-
प्रातःकाल हैते पाक करिला अपार।
नाना सूप, व्यञ्जन, पिठा, क्षीर-उपहार ॥ 59 ॥
अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने प्रातःकालसे
प्रारम्भकर बहुतसे पकवान जैसे अनेक प्रकारकी
रसेदार सब्जियाँ, व्यञ्जन, पीठा-पाना और खीर तथा
दूधसे अनेक मिठाइयाँ बनायीं ॥ 59 ॥
जगन्नाथेर भिन्न भोग पृथक् बाड़िल।
चैतन्यप्रभुर लागि' आर भोग कैल ॥ 60 ॥
इष्टदेव नृसिंह लागि' पृथक् बाड़िल।
तिनजने समर्पिया बाहिरे ध्यान कैल ॥ 61 ॥
अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने श्रीजगन्नाथदेव और
महाप्रभुके प्रिय व्यञ्जनोंको पृथक्-पृथक् करके उन्हें
भोग अर्पित किया। फिर अपने इष्टदेव श्रीनृसिंहदेवके
लिये बनाये गये भोगको भी पृथक् सजाया। इस प्रकार
उन्होंने तीन भाग करके भोग निवेदन किया। तब वे
बाहर बैठकर ध्यान करने लगे ॥ 60-61 ॥
ब्रह्मचारीके ध्यानमें 'आविर्भूत' महाप्रभुके द्वारा
तीनों नैवेद्योंको खाना :-
देखे, शीघ्र आसि' बसिला चैतन्य-गोसाञि।
तिन भोग खाइला, किछु अवशिष्ट नाइ ॥ 62 ॥
अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने ध्यानमें देखा
कि महाप्रभु शीघ्रतासे आकर बैठ गये और तीनों भोग
खा गये, उन्होंने कुछ भी नहीं छोड़ा ॥ 62 ॥
ऐसा देखकर प्रद्युम्नके हृदयमें आनन्द,
बाहरमें दुःखका आभास :-
आनन्दे विह्वल प्रद्युम्न, पड़े अश्रुधार।
“हाहा किबा कर” बलि' करये फुत्कार ॥ 63 ॥
अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुको सम्पूर्ण भोग ग्रहण
करते देखकर श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी आनन्दसे विह्वल हो
रहे थे और उनके नेत्रोंसे अश्रुओंकी धारा प्रवाहित हो
रही थी, तथापि वे बाहरसे दुःख प्रकट करते हुए कह
रहे थे,—“हाय! हाय! [महाप्रभु!] आप यह क्या कर
रहे हैं?” 63 ॥
महाप्रभुके प्रति प्रद्युम्नका आरोप;
अपने इष्टदेव श्रीनृसिंहके प्रति निष्ठा :-
“जगन्नाथे-तोमाय ऐक्य, खाओ ताँर भोग।
नृसिंहेर भोग केने कर उपयोग ॥ 64 ॥
नृसिंहेर जानि हैल आजि उपवास।
ठाकुर उपवासी रहे, जिये कैछे दास?? 65 ॥
अनुवाद—“हे महाप्रभु! आप और श्रीजगन्नाथ तो
एक ही हैं, इसलिये आप यदि उनका भोग खा लेते
हैं, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु आप श्रीनृसिंह
भगवान्का भोग क्यों ग्रहण कर रहे हो? मैं देख रहा

[ 2/64-74 दूसरा अध्याय 51
हूँ कि आज तो श्रीनृसिंहदेवका उपवास हो गया। यदि
ठाकुरजी ही उपवासी रहेंगे, तब फिर दास किस
प्रकारसे जीवित रहेगा?” 64-65 ॥
भोजन देखि' यद्यपि ताँर हृदये उल्लास।
नृसिंह लक्ष्य करि' बाह्ये किछु करे दुःखाभास ॥ 66 ॥
अनुवाद—यद्यपि श्रीनृसिंहानन्दके हृदयमें महाप्रभुको
समस्त भोग खाते देखकर उल्लास हो रहा था, किन्तु
श्रीनृसिंहदेवको लक्ष्य करके वे बाहरसे कुछ दुःखको
प्रकट कर रहे थे॥ 66 ॥
महाप्रभुके द्वारा तीनों पात्रोंके भोजनकी लीलाके द्वारा
श्रीप्रद्युम्नको समस्त विष्णुतत्त्वोंके साथ अपने अभेद
अथवा एक होनेका प्रदर्शन :-
स्वयं भगवान् कृष्णचैतन्य-गोसाञि।
जगन्नाथ-नृसिंह-सह किछु भेद नाइ ॥ 67 ॥
इहा जानिवारे प्रद्युम्नेर गूढ़ हैल मन।
ताहा देखाइला प्रभु करिया भोजन ॥ 68 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य-गोसाईं स्वयं भगवान् हैं।
इसलिये श्रीजगन्नाथदेव एवं श्रीनृसिंहदेवके साथ उनका
कोई भेद नहीं है, इस बातको समझनेके लिये श्रीप्रद्युम्न
ब्रह्मचारीके मनमें प्रबल इच्छा थी। महाप्रभुने इस
तथ्यको समझानेके लिये सम्पूर्ण भोजनको ग्रहण
किया॥ 67-68 ॥
भोजनके अन्तमें महाप्रभुका पाणिहाटी स्थित
राघव-भवनमें नित्य-अवस्थान हेतु गमन :-
भोजन करिया प्रभु गेला पाणिहाटि।
सन्तोष पाइला देखि' व्यञ्जन-परिपाटी ॥ 69 ॥
अनुवाद—भोजन करनेके बाद महाप्रभु पाणिहाटी
चले गये। पाणिहाटीमें महाप्रभु श्रीराघव पण्डितके घरमें
बनायी गयी व्यञ्जनकी परिपाटीको देखकर बहुत
सन्तुष्ट हुए॥ 69 ॥
श्रीशिवानन्दकी ब्रह्मचारीके दुःखी होनेके कारणकी जिज्ञासा
और ब्रह्मचारीके द्वारा सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन :-
शिवानन्द कहे,—“केने करह फुत्कार?”
ब्रह्मचारी कहे,—“देख, प्रभुर व्यवहार ॥ 70 ॥
तिनजनार भोग तेंहो अकेला खाइला।
जगन्नाथ-नृसिंह उपवासी हइला ॥” 71 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीसे
कहा,—“आप किसलिये दुःख प्रकाश कर रहे हैं?”
श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने उत्तर दिया,—“महाप्रभुके व्यवहारको
तो देखो, वे तीन प्रभुओंके भोगको अकेले ही खा गये।
इसलिये श्रीजगन्नाथदेव तथा श्रीनृसिंहदेव उपवासी रह
गये॥” 70-71 ॥
श्रीशिवानन्दका सन्देह :-
शुनि' शिवानन्देर चित्ते हइल संशय।
किवा प्रेमावेशे कहे, किवा सत्य हय ॥ 72 ॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीशिवानन्द सेनके चित्तमें
संशय हुआ कि श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी यह बात प्रेमके
आवेशमें कह रहे हैं अथवा यह बात सत्य है॥ 72 ॥
श्रीशिवानन्दको श्रीनृसिंहके लिये
भोगको लानेका आदेश :-
तबे शिवानन्दे किछु कहे ब्रह्मचारी।
“सामग्री आनह नृसिंहरे, पुनः पाक करि ॥” 73 ॥
अनुवाद—तब श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने श्रीशिवानन्द
सेनसे कहा,—“आप श्रीनृसिंहदेवके लिये फिरसे भोग-सामग्री
लाकर दीजिये, मैं पुनः रसोई बनाऊँगा॥” 73 ॥
श्रीनृसिंहको पुनः भोग समर्पण :-
तबे शिवानन्द भोग-सामग्री आनिला।
पाक करि' नृसिंहरे भोग लागाइला ॥ 74 ॥
अनुवाद—तब श्रीशिवानन्द सेन पुनः भोग-सामग्री
लेकर आये तथा श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने पकवान बनाकर
श्रीनृसिंहदेवको भोग लगाया॥ 74 ॥

52 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/75-84 ]
अगली वर्षाऋतुके समय गौड़ीय-भक्तोंका पुरीमें गमन :-
वर्षान्तरे शिवानन्द लञा भक्तगण।
नीलाचले देखे याञा प्रभुर चरण॥ 75॥
अनुवाद—अगले वर्ष महाप्रभुके चरणकमलोंके दर्शनके
लिये श्रीशिवानन्द सेन भक्तोंको साथ लेकर नीलाचल
श्रीजगन्नाथपुरीमें गये॥ 75॥
एकदिन महाप्रभुके द्वारा श्रीनृसिंहानन्दके
पूर्वोक्त भोजनके वृत्तान्तका वर्णन :-
एकदिन सभाते प्रभु बात चालाइला।
नृसिंहानन्देर गुण कहिते लागिला॥ 76॥
“गतवर्ष पौषे मोरे कराइल भोजन।
कभु नाहि खाइ ऐछे मिष्टान्न-व्यञ्जन॥" 77॥
अनुवाद—एकदिन भक्तोंकी सभामें बातचीत करते
हुए महाप्रभु प्रसङ्ग उठाकर श्रीनृसिंहानन्दके गुणोंका
वर्णन करने लगे,—“पिछले वर्ष पौष मासमें नृसिंहानन्दने
मुझे भोजन कराया था। मैंने वैसे मिष्टान्न और व्यञ्जन
पहले कभी नहीं खाये थे॥" 76-77॥
अनुभाष्य—'बात चालाइला',—प्रसङ्ग उठाया॥ 76॥
महाप्रभुके वचनोंसे श्रीशिवानन्दका पूर्व-सन्देह भङ्ग :-
शुनि' सभ्यगण मने आश्चर्य मानिल।
शिवानन्देर मने तबै प्रत्यय जन्मिल॥ 78॥
अनुवाद—यह सुनकर सभी भक्तोंके मनमें आश्चर्य
हुआ और श्रीशिवानन्द सेनके मनमें दृढ़ विश्वास
उत्पन्न हुआ कि वह घटना सत्य थी॥ 78॥
चार स्थानोंपर महाप्रभुका 'नित्य-आविर्भाव' :-
एइमत शचीगृहे सतत भोजन।
श्रीवासेर गृहे करेन कीर्त्तन-दर्शन॥ 79॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु श्रीशचीमाताके घरमें
सदा भोजन करते तथा श्रीवास पण्डितके घरमें
कीर्तनके समय वहाँ उपस्थित होते॥ 79॥
नित्यानन्देर नृत्य देखेन आसि' बारे बारे।
'निरन्तर आविर्भाव' राघवेर घरे॥ 80॥
अनुवाद—महाप्रभु बार-बार आकर श्रीनित्यानन्द
प्रभुके नृत्यको देखते तथा श्रीराघव पण्डितके घरमें भी
उनका 'निरन्तर आविर्भाव' होता॥ 80॥
भक्तोंके प्रेमके वशीभूत श्रीगौरसुन्दर :-
प्रेमवश गौरप्रभु, याँहा प्रेमोत्तम।
प्रेमवश हञा ताहा देन दरशन॥ 81॥
अनुवाद—श्रीगौराङ्ग महाप्रभु प्रेमके वशीभूत हैं। वे
जहाँ कहींपर भी उत्तम प्रेमको देखते हैं, वहींपर ही
प्रेमके वशीभूत होकर दर्शन देते हैं॥ 81॥
श्रीशिवानन्दका अनिर्वचनीय गौरप्रेम :-
शिवानन्देर प्रेमसीमा के कहिते पारे?
याँर प्रेमे वश प्रभु आइसे बारे बारे॥ 82॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके प्रेमकी सीमाका कौन
वर्णन कर सकता है? जिनके प्रेमके वशीभूत होकर
महाप्रभु बार बार उनके निकट आते हैं॥ 82॥
श्रीगौरके 'आविर्भाव'के श्रवणसे
श्रीकृष्णचैतन्यकी महिमाको जानना :-
एइ त' कहिलु गौरेर 'आविर्भाव'।
इहा येइ शुने, जाने चैतन्य-प्रभाव॥ 83॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने महाप्रभुके [नित्य और
कभी-कभी] 'आविर्भाव'के विषयमें वर्णन किया। इसे
जो कोई भी श्रवण करता है, वह श्रीचैतन्य महाप्रभुकी
महिमाको जान जाता है॥ 83॥
अन्य प्रसङ्ग-वर्णन, भगवान् आचार्यका वृत्तान्त-वर्णन :-
पुरुषोत्तमे प्रभु-पाशे भगवान् आचार्य।
परम वैष्णव तँहो सुपण्डित आर्य॥ 84॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथपुरीमें महाप्रभुके पास भगवान्
आचार्य रहते थे, वे परम वैष्णव, सुविद्वान और सज्जन
व्यक्ति थे॥ 84॥

[ 2/84-91 दूसरा अध्याय 53 ]

अनुभाष्य—'भगवान् आचार्य'—आदिलीलाकी 10/136
संख्या देखें ॥ 84 ॥
सख्यभावाक्रान्त-चित्त, गोप-अवतार।
स्वरूप-गोसाञि-सह सख्य-व्यवहार ॥ 85 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यका चित्त सख्य-भावसे
विभावित था, क्योंकि वे व्रजलीलाके गोपबालकके
अवतार थे। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके साथ भी
उनका सख्य व्यवहार था ॥ 85 ॥
बीच-बीचमें अपने घरपर रसोई बनाकर
एकमात्र महाप्रभुको ही निमन्त्रण :—
एकान्तभावे आश्रियाछेन चैतन्यचरण।
मध्ये मध्ये प्रभुर तेंहो करेन निमन्त्रण ॥ 86 ॥
अनुवाद—उन्होंने एकान्तिक भावसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके
चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण किया हुआ था। बीच-बीचमें
वे रसोई बनाकर श्रीचैतन्य महाप्रभुको निमन्त्रण भी
किया करते थे ॥ 86 ॥
घरे भात करि' करेन विविध व्यञ्जन।
एकले गोसाञि लञा करान भोजन ॥ 87 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्य अपने घरमें अनेक
प्रकारके पकवान बनाते थे और वे महाप्रभुको अकेले
ले जाकर उनको ही भोजन कराते थे ॥ 87 ॥
अनुभाष्य—'घरे भात करि'—श्रीजगन्नाथदेवके प्रसादको
मँगवाकर उसके द्वारा अपने परिवारके सदस्यों, भिक्षुकों
तथा निमन्त्रित व्यक्तियोंको तृप्त करनेके स्थानपर उन्हें
घरपर भोजन करवाने हेतु चावल आदि अर्थात्
साधारण द्रव्य आदि बनानेको 'घरभात' कहते हैं।
उड़ीसामें 'आमानी' एवं 'प्रसादी'—दो शब्दोंका व्यवहार
होता है; श्रीजगन्नाथदेवके उद्देश्यसे बनाये गये नैवेद्य-भोगके
समर्पित होनेपर वह 'प्रसाद' एवं साधारण खाद्य
वस्तुओंको पकानेपर वह 'आमानी' अर्थात् श्रीजगन्नाथदेवका
'उच्छिष्ट नहीं' है, ऐसा समझना होगा ॥ 87 ॥

भगवान् आचार्य एवं उनके पिता
और छोटे भाईका चरित्र :—
ताँर पिता 'विषयी' बड़ शतानन्द-खाँन।
'विषयविमुख' आचार्य—'वैराग्यप्रधान' ॥ 88 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यके पिता शतानन्द खाँन
बहुत ही अधिक 'विषयी' अर्थात् धनवान् थे, किन्तु
श्रीभगवान् आचार्य धन-सम्पत्तिसे विरक्त थे। उनका
जीवन वैराग्यपूर्ण था ॥ 88 ॥
'गोपाल-भट्टाचार्य' नाम, ताँर छोट भाइ।
काशीते वेदान्त पड़ि' गेला आचार्य ठाञि ॥ 89 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यके छोटे भाईका नाम
गोपाल भट्टाचार्य था, वह काशीमें वेदान्त पढ़कर
श्रीभगवान् आचार्यके घर श्रीजगन्नाथ पुरीमें आया ॥ 89 ॥
अनुभाष्य—'वेदान्त',—यहाँपर वेदान्त या शारीरक
सूत्रका तात्पर्य शङ्कराचार्य-कृत निर्विशेष-ब्रह्मपरक भाष्यसे
है। 'आचार्य',—बड़े भाई श्रीभगवान् आचार्य ॥ 89 ॥
आचार्य ताहारे प्रभुपदे मिलाइला।
अन्तर्यामी प्रभु चित्ते सुख ना पाइला ॥ 90 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यने अपने छोटे भाईको
महाप्रभुसे मिलवाया। अन्तर्यामी महाप्रभुको गोपाल भट्टाचार्यसे
मिलकर हृदयमें आनन्द नहीं हुआ ॥ 90 ॥
शुद्धकृष्णभजनसे ही गौर-प्रीति, अभक्तकी भक्ति विरोधी
बिद्धा-चेष्टासे महाप्रभुके द्वारा उसका अनादर :—
आचार्य-सम्बन्धे बाह्ये करे प्रीत्याभास।
कृष्णभक्ति बिना प्रभुर ना हय उल्लास ॥ 91 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीभगवान् आचार्यके भाई होनेके
कारण उसके प्रति बाहरमें प्रसन्नता दिखलायी, किन्तु
जिसके हृदयमें श्रीकृष्णभक्ति न हो, उससे मिलनेपर
महाप्रभुको उल्लास नहीं होता ॥ 91 ॥

54 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/92-98 ]
एकदिन श्रीस्वरूपको अपने छोटे भाईके मुखसे शाङ्कर-
मायावाद-भाष्यके श्रवणके लिये आचार्यका अनुरोध :-
स्वरूपेरे आचार्य कहे आर दिने।
“वेदान्त पड़िया गोपाल आसियाछे एखाने ॥ 92 ॥
सबे मेलि' आइस, शुनि 'भाष्य' इहार स्थाने।”
प्रेम-क्रोध करि' स्वरूप बलय वचने ॥ 93 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा तिरस्कार :-
“बुद्धिभ्रष्ट हैल तोमार गोपालेर सङ्गे।
मायावाद शुनिवारे उपजिल रङ्गे ॥ 94 ॥
समस्त वैष्णवोंके गुरु श्रीदामोदर-स्वरूपके द्वारा
मायावादके दोषोंका वर्णन और उसकी निन्दा;
शङ्करके मायावाद-भाष्यके प्रति शुद्धविष्णुभजन
करनेके इच्छुक व्यक्तिके व्यवहारकी विधि :-
वैष्णव हञा येबा शारीरक-भाष्य शुने।
सेव्य-सेवक-भाव छाड़ि' आपनारे 'ईश्वर' माने ॥ 95 ॥
अनुवाद—एकदिन श्रीभगवान् आचार्यने श्रीस्वरूप
दामोदर गोस्वामीसे कहा, - “मेरा भाई गोपाल काशीसे
वेदान्त पढ़कर यहाँ आया है। हम सब मिलकर उससे
वेदान्तके भाष्यका श्रवण करेंगे।” श्रीभगवान् आचार्यके
प्रति प्रेम होनेके कारण श्रीस्वरूप दामोदरने क्रोध करते
हुए कहा, –“गोपालका सङ्ग करनेसे तुम्हारी बुद्धि भी
भ्रष्ट हो गयी है, इसलिये तुम मायावाद सिद्धान्त
सुननेके लिये उत्कण्ठित हो रहे हो। वैष्णव होकर भी
जो वेदान्तके शारीरक-भाष्यका श्रवण करता है, वह
सेव्य और सेवकके भावको छोड़कर स्वयंको ही
'ईश्वर' मानने लगता है ॥ 92-95 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'शारीरक-भाष्य', - श्रीमत्
शङ्कराचार्य-कृत वेदान्त-सूत्र-भाष्य ॥ 95 ॥
अनुभाष्य-केवलाद्वैतवादी शङ्करने कल्पनाका आश्रय
लेकर शारीरक-ब्रह्मसूत्र-भाष्यमें 'मायावाद' अथवा 'बिद्ध
केवलाद्वैतवाद'की स्थापना की है; किन्तु ब्रह्मसूत्रके
श्रीसम्प्रदायी श्रीरामानुज-कृत श्रीभाष्यमें 'विशिष्टाद्वैतवाद',
ब्रह्म-सम्प्रदायी श्रीमध्व-कृत पूर्णप्रज्ञ-भाष्यमें 'शुद्धाद्वैतवाद',
चतुःसन-सम्प्रदायी श्रीनिम्बार्क-कृत पारिजात-सौरभ-भाष्यमें
'द्वैताद्वैतवाद' एवं रुद्रसम्प्रदायी श्रीविष्णुस्वामि-कृत
सर्वज्ञ-भाष्यमें 'शुद्धाद्वैतवाद' वेदान्त-तात्पर्य कहा गया
है एवं उनमें सेव्य-सेवक-भाव विद्यमान रहनेके कारण
ये-भगवान् विष्णुके भक्तोंके लिये पठनीय एवं उनमें
निहित तत्त्वसमूह - सत्-सम्प्रदायके द्वारा अर्थात् वैष्णवोंके
द्वारा चिरकालसे अत्यन्त आदरणीय हैं। आदिलाला
7/101 संख्याका अनुभाष्य देखें। ब्रह्मसूत्र अथवा
वेदान्तकी व्याख्यामें बिद्ध केवलाद्वैतवाद अथवा निर्विशेषब्रह्म-
मत-स्थापन हेतु प्रयास करनेपर, वह पूर्णतया शुद्धभक्तिके
विरुद्ध कुमतवाद मात्र है ॥ 95 ॥
मायावाद-विषकी तीव्रताका वर्णन और
श्रवणसे पतनकी आशङ्का :-
महाभागवत, कृष्ण प्राणधन याँर।
मायावाद-श्रवणे चित्त अवश्य फिरे ताँर ॥” 96 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 96 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - जिनके प्राणधन- कृष्ण हैं, ऐसे
जो महाभागवत हैं, वे भी यदि मायावादपूर्ण शारीरकभाष्यको
श्रवण करें, तब उनका चित्त भी उस ओर झुककर
भक्तिसे च्युत हो जाता है ॥” 96 ॥
आचार्यके द्वारा अपनी श्रीकृष्ण-निष्ठाकी प्रशंसा :-
आचार्य कहे, –“आमा सबार कृष्णनिष्ठ-चित्ते।
आमा-सबार मन भाष्य नारे फिराइते ॥” 97 ॥
अनुवाद-श्रीभगवान् आचार्यने कहा, - “हम सबका
चित्त तो कृष्णनिष्ठ है, इसलिये शारीरक भाष्य हम
सबके मनको विचलित नहीं कर सकता ॥” 97 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा शुद्धभक्तोंके हृदयविदारक
मायावादके अर्थका निरूपण :-
स्वरूप कहे, –“तथापि मायावाद-श्रवणे।
'चित्, ब्रह्म, माया, मिथ्या'- एइमात्र शुने ॥ 98 ॥

[ 2/98-107
दूसरा अध्याय
55
जीवज्ञान-कल्पित, ईश्वरे-सकल अज्ञान।
याहार श्रवणे भक्तेर फाटे मन-प्राण॥”99॥
महाप्रभुके ‘छोटा-हरिदास’ नामक कीर्तनीयाको अपने
घरपर बुलाकर कहा,-“तुम शिखि-माहितिकी बहन
माधवी देवीके घरमें जाकर मेरा नाम लेकर उनसे एक
‘मान’ श्वेत चावल माँगकर ले आओ॥”101-103॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 98-99॥
अमृतप्रवाह भाष्य-[श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-]
“यद्यपि तुम्हारा चित्त कृष्णनिष्ठ होनेके कारण शाङ्कर-भाष्य
आदि सुनकर विकृत नहीं होता, तथापि उस मायावादमें,
‘ब्रह्म-चित्स्वरूप निराकार’; ‘यह जगत्-मायामात्र अथवा
मिथ्या’, ‘जीव वास्तवमें नहीं है,-वह केवल अज्ञान-कल्पित
है’ एवं ‘ईश्वरमें माया-मुग्धतारूप अज्ञान ही विद्यमान
है’ आदि विचार हैं। इन सब बातोंको सुननेसे भक्तोंको
अत्यन्त दुःख होता है॥”98-99॥
अनुभाष्य-पाठान्तरमें, ‘अड़ोया चाउलं’-‘अरोया’-
नामक आतप चावल (धानको उबालनेके बदले सूर्यमें
तपाकर प्राप्त चावल); ‘मान’-उड़ीसामें प्रचलित चावल
और अन्य अनाजके भार मापनेकी इकाई॥103॥
महाभागवत माधवीदेवीका परिचय :-
माहितिर भगिनीर नाम-माधवी देवी।
वृद्धा तपस्विनी आर परमा वैष्णवी॥104॥
अनुभाष्य-आदिलीला 5/58 संख्या एवं 7/113,
121-126 संख्या देखें॥ 98-99॥
अनुवाद-श्रीमाहितिकी बहनका नाम माधवी देवी
था। वे वृद्धा, तपस्विनी तथा परम-वैष्णवी थीं॥104॥
आचार्यको श्रीस्वरूपके वचनोंके वास्तविक अर्थकी
उपलब्धि और छोटे भाईको अपने गाँवमें भेजना :-
लज्जा-भय पाञा आचार्य मौन हइला।
आर दिन गोपालेरे देशे पाठाइला॥100॥
महाप्रभुके समस्त भक्तोंमें-से केवल
साढ़े तीन जन ही श्रीमतीके गण :-
प्रभु लेखा करे यारे-‘राधिकार गण’।
जगतेर मध्ये ‘पात्र’-साड़े तिनजन॥105॥
स्वरूप गोसाञि आर राय-रामानन्द।
शिखि-माहिति-तिन, ताँर भगिनी-अर्द्धजन॥106॥
अनुवाद-श्रीभगवान् आचार्य बहुत लज्जित और
भयभीत हो गये तथा वे कुछ नहीं कह सके। उन्होंने
अगले दिन ही गोपालको अपने ग्राममें भेज दिया॥100॥
अनुवाद-महाप्रभु जिन्हें ‘श्रीमती राधिकाका गण’
कहकर गिनते थे, ऐसे पात्र इस जगत्में केवल साढ़े
तीन व्यक्ति ही थे। श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरामानन्द राय,
श्रीशिखि माहिति-ये तीन लोग और श्रीशिखि माहितिकी
बहन श्रीमाधवी देवीको आधा गिनकर कुल साढ़े तीन
व्यक्ति होते हैं॥105-106॥
अन्य एकदिन छोटे-हरिदासको महाप्रभुके भोजनके उद्देश्यसे
श्रीमाधवीदेवीसे चावल लानेके लिये भेजना :-
एकदिन आचार्य प्रभुरे कैला निमन्त्रण।
घरे भात करि’ करे विविध व्यञ्जन॥101॥
माधवीदेवीसे हरिदासके द्वारा सूक्ष्म-चावल लाना
और आचार्यके द्वारा रसोई बनाना :-
ताँर ठाञि तण्डुल मागि’ आनिल हरिदास।
तण्डुल देखि’ आचार्येर अधिक उल्लास॥107॥
‘छोट हरिदास’ नाम प्रभुर कीर्त्तनीया।
ताहारे कहेन डाकि’ आपने आनिया॥102॥
“मोर नामे शिखि-माहितिर भगिनी-स्थाने गिया।
शुक्लचाउल एक मान आनह मागिया॥”103॥
अनुवाद-छोटे-हरिदास श्रीमाधवी देवीसे चावल
माँगकर ले आये। उन चावलोंको देखकर श्रीभगवान्
आचार्यको बहुत आनन्द हुआ॥107॥
अनुवाद-एकदिन श्रीभगवान् आचार्यने महाप्रभुको
निमन्त्रण किया। वे घरपर ही चावल और अनेक
प्रकारके पकवान बनानेके लिये तत्पर हुए। उन्होंने

56 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/108-116 ]
स्नेहे रान्धिल प्रभुर प्रिय ये व्यञ्जन।
देउल-प्रसाद, आदा-चाकि, लेम्बु-सलवण ॥ 108 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यने बहुत प्रेमसे महाप्रभुको
प्रिय लगनेवाले पकवान बनाये। उन्होंने श्रीजगन्नाथदेवका
प्रसाद और पचानेके लिये घिसी हुई अदरक, नींबूके
साथ नमक एकत्रित करके रखे ॥ 108 ॥
अनुभाष्य— देउल प्रसाद,—देवालयका प्रसाद अर्थात्
श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे लाया गया महाप्रसाद ॥ 108 ॥
महाप्रभुके द्वारा भोजन और सूक्ष्म-चावलकी
प्राप्तिके कारणकी जिज्ञासा :—
मध्याह्ने आसिया प्रभु भोजने बसिला।
शाल्यन्न देखि' प्रभु आचार्ये पुछिला ॥ 109 ॥
“उत्तम अन्न एत तण्डुल काँहाते पाइला ?”
आचार्य कहे,—माधवी-पाश मागिया आनिला ॥ 110 ॥
अनुवाद—मध्याह्नके समय महाप्रभु श्रीभगवान् आचार्यके
स्थानपर आकर भोजनके लिये बैठे। भोजनमें श्वेत
पतले चावलोंको देखकर महाप्रभुने उनसे पूछा,—“ये
बड़े उत्तम चावल हैं, इतने चावल तुम्हें कहाँसे मिले ?”
श्रीभगवान् आचार्यने उत्तर दिया, —‘माधवी देवीसे माँगकर
लाये गये हैं ॥'109-110 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'शाल्यन्न',—श्वेत पतले
चावल ॥ 109 ॥
आचार्यके द्वारा माधवी और छोटे-हरिदासके
नामका उल्लेख :—
प्रभु कहे,—“कोन् याइ' मागिया आनिल ?”
छोट हरिदासेर नाम आचार्य कहिल ॥ 111 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, —“कौन जाकर माँगकर
लाया है ?” श्रीभगवान् आचार्यने छोटे-हरिदासका नाम
बताया ॥ 111 ॥
भोजनके अन्तमें महाप्रभुके द्वारा श्रीगोविन्दको छोटे-
हरिदासके अपने घरमें प्रवेशके लिये निषेध-आज्ञा :—
अन्न प्रशंसिया प्रभु भोजने बसिला।
निजगृहे आसि' गोविन्देरे आज्ञा दिला ॥ 112 ॥
“आजि हैते एइ मोर आज्ञा पालिबा।
छोट हरिदासे इँहा आसिते ना दिबा ॥”113 ॥
अनुवाद—चावलोंकी प्रशंसा करके बैठकर महाप्रभुने
भोजन किया। तब अपने वासस्थानपर आकर उन्होंने
अपने सेवक श्रीगोविन्दको आदेश दिया,—“आजसे मेरी
इस आज्ञाका पालन करना—छोटे-हरिदासको यहाँ मत
आने देना ॥”112-113 ॥
हरिदासका गम्भीर दुःख और उपवास :—
द्वार-माना, हरिदास दुःखी हैल मने।
कि लागिया द्वार-माना केह नाहि जाने ॥ 114 ॥
अनुवाद—'महाप्रभुका द्वार मेरे लिये बन्द हैं'—ऐसा
सुनकर छोटे-हरिदासका मन बहुत दुःखी हुआ। कोई
नहीं समझ पाया कि छोटे-हरिदासको वहाँ आनेके
लिये मना क्यों किया है ॥ 114 ॥
तिन दिन हरिदास करे उपवास।
स्वरूपादि सबे पुछिला प्रभुर पाश ॥ 115 ॥
महाप्रभुके निकट जाकर श्रीस्वरूप आदिके द्वारा हरिदासके
प्रवेश-निषेधके कारणकी जिज्ञासा :—
“कोन् अपराध प्रभु, कैल हरिदास ?
कि लागिया द्वार-माना, करे उपवास ?”116 ॥
अनुवाद—छोटे-हरिदासने तीन दिन तक उपवास
किया। तब श्रीस्वरूप दामोदर आदि सभी भक्तों ने
महाप्रभुसे पूछा,—“हे प्रभो! छोटे-हरिदासने कौन-सा
अपराध किया है ? आपने किस कारणसे उसे अपने
द्वारपर आनेके लिये मना किया है ? वह तीन दिनसे
उपवास कर रहा है ॥”115-116 ॥

[ 2/117-119 दूसरा अध्याय 57
स्त्रीसे बातचीत करनेवाले वैरागीके
प्रति महाप्रभुका असन्तोष :-
प्रभु कहे,–“वैरागी करे प्रकृति सम्भाषण।
देखिते ना पारों आमि ताहार वदन ॥ 117 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“जो वैरागी होकर स्त्रीसे
सम्भाषण अर्थात् भोगमय बुद्धिसे वार्तालाप करता है,
मैं उस व्यक्तिका मुख नहीं देख सकता ॥ 117 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—वैष्णव, या तो गृहस्थ होकर
स्त्री-परिवारके साथ रहेंगे, अन्यथा स्त्री-सम्बन्धको परित्याग
करके 'वैरागी' होंगे। वैरागी होनेपर फिर स्त्रियोंका दर्शन
अथवा उनसे वार्तालाप करनेका अधिकार नहीं रहता।
पापवासनाके नहीं रहनेपर भी अथवा बाहरी रूपसे
किसी भक्तिके कार्यको उद्देश्य करनेपर भी उस प्रकारसे
[स्त्रीके साथ सम्बन्ध-युक्त होना] वैरागीका कर्त्तव्य नहीं
है। इसलिये वैरागी होकर जो व्यक्ति स्त्रीसे सम्भाषण
करता है, धर्मका नाश करनेवाला होनेके कारण उसका
मुख मैं देख नहीं पाऊँगा ॥ 117 ॥
अनुभाष्य—'सरलता'—वैष्णवका प्रधान लक्षण है,
एवं 'कपटता'—भक्तिकी विरोधी विशेष उपशाखा है।
श्रीकृष्णसे आसक्ति होनेपर श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य
वस्तुओंसे विरक्त होकर भक्त जड़़ीय-भोगमय-दर्शनसे
उत्पन्न विषयोंका त्याग करता है। किन्तु लोगोंकी दृष्टिमें
उसकी [श्रीकृष्णके प्रति] वैसी आसक्ति प्रमाणित हो
जानेके पश्चात् भी पुनः कपटताके प्रकाशित होनेपर
लोग उसके व्यवहारके प्रति श्रद्धा नहीं कर पाते ॥ 117 ॥
जड़़ीय इन्द्रियोंका भोग-उन्मुखतारूपी स्वभाव और
स्त्री-दर्शनका विषममय फल :-
दुर्वार इन्द्रिय करे विषय-ग्रहण।
दारु-प्रकृति हरे मुनेरपि मन ॥ 118 ॥
अनुवाद—इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंको ग्रहण करनेसे
निरोध करना इतना कठिन है कि लकड़ीसे बनी स्त्रीकी
मूर्ति भी मुनि तकके मनको हरण कर लेती है ॥ 118 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'दारु-प्रकृति हरे मुनेरपि
मन',—लकड़ीसे बनी नारी भी मुनिके मनका हरण कर
सकती है, अतएव वैरागी व्यक्ति स्त्रीसे सम्बन्धका
अवश्य ही त्याग करेंगे ॥ 118 ॥
अनुभाष्य—रूप, शब्द, गन्ध, रस और स्पर्श,—इन
पाँच विषयोंको ग्रहण करना ही क्रमशः नेत्र, कान,
नाक, जिह्वा और त्वचारूपी पाँच इन्द्रियोंका स्वभाव है।
बद्धजीवोंमें-से किसी-किसीके द्वारा स्वयंको इन्द्रियोंके
दमन करनेमें समर्थ समझनेपर भी वास्तवमें बहिर्मुखताके
कारण उसके लिये इन्द्रियोंका दमन करना अति कठिन
है। भोगमय दर्शनसे विषयोंके उपस्थित होनेपर
प्राकृत-बुद्धिसम्पन्न मानव मुनिधर्मको ग्रहण करनेपर भी
लकड़ीसे बनी नारीकी मूर्तिको देखकर ही क्षुब्ध तथा
चञ्चल हो जाता है ॥ 118 ॥
अग्नि और घीकी भाँति पुरुष अभिमानीके
लिये स्त्री-सङ्ग-निषेध :-
श्रीमद्भागवत (9/19/17)में और मनुसंहिता (2/215) में—
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो वसेत्।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ 119 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 119 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—माताके साथ, बहनके साथ एवं
पुत्रीके साथ निर्जनमें कभी भी मत रहना; क्योंकि
बलवान् इन्द्रियाँ विद्वान पुरुषके भी मनको आकर्षित
कर सकती हैं ॥ 119 ॥
अनुभाष्य—महाराज ययाति कामके वशीभूत और
स्त्रीके द्वारा पराजित होकर ग्राम्य विषयसमूह भोग
करते-करते अपने सर्वनाशको समझकर अन्तमें निर्वेदयुक्त
होकर पत्नी देवयानीको अपने चरित्र और व्यवहारका
वर्णन करते हुए स्त्री-सङ्गकी निन्दा कर रहे हैं—
मात्रा (जनन्या) स्वस्रा (भगिन्या) दुहित्रा (कन्यया वा सह)
अविविक्तासनः (अविविक्तं सङ्कीर्णम् आसनं यस्य सः तथाभूतः)
न वसेत् (भवेत् इति पाठान्तरम्; यतः) बलवान् (प्रचुरबल-

58 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/119-123 ]
विशिष्टः) इन्द्रियग्रामः (इन्द्रियसमूहः) विद्वांसं (बन्धमोक्षवित्-
पुरुषम्) अपि कर्षति (आकर्षति, बन्धाय नियोजयति)।
श्लोक-भावानुवाद—माता, बहन अथवा पुत्रीके साथ
सटकर नहीं बैठना चाहिये, क्योंकि प्रचुर बलयुक्त
इन्द्रियाँ बन्धन और मोक्षके तत्त्वको जाननेवाले पुरुषको
भी आकर्षित कर लेती हैं अर्थात् उसे बन्धनमें
नियोजित कर देती हैं॥ 119॥
श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंकी तृप्तिके विधानको छोड़नेपर ही
अनधिकारी कृत्रिम-वैरागीका पुरुषाभिमानमें प्रकृतिका भोग
एवं बाहरी वेषके आश्रयमें कृत्रिम अस्थिर वैराग्य हेतु
जिह्वा-उदर-उपस्थ लाम्पट्य :-
क्षुद्रजीव सब मर्कट-वैराग्य करिया।
इन्द्रिय चराञा बुले 'प्रकृति' सम्भाषिया॥ ”120 ॥
अनुवाद—अनेक लोग संसारमें विषयोंको प्राप्त
करनेमें असफल होकर वैरागीका वेश धारण करके
मर्कट-वैराग्य (मध्यलीला 16/238 संख्याका अमृतप्रवाह
भाष्य देखें) प्रदर्शित करते हैं। वे इन्द्रियोंके वशीभूत
होकर इधर-उधर भ्रमण करते हुए स्त्रियोंसे सम्भाषण
करते हैं॥ ”120 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—साधनभक्तिका विवेचन करते
करते भावके उदित होनेपर जिस पुरुषमें विरक्ति उत्पन्न
होती है, उसका ही वैराग्यमें अधिकार है। उस
अवस्थाको प्राप्त करनेसे पहले जो 'भेक' (वैरागी-वेष)
ग्रहण करते हैं, उन्हींके वैराग्यका नाम 'मर्कटवैराग्य' है।
अनधिकारी जीव किसी-न-किसी कारणसे अनुचित
समयपर वैराग्य ग्रहण करके उसके बाद इन्द्रियोंके
वशीभूत होकर प्रकृति अर्थात् स्त्रियोंके साथ सम्भाषण
करने लगता है। इन्हें धर्मध्वजी अथवा धर्मके नामपर
कलङ्क जानकर अवश्य ही दूर रखना चाहिये॥ 120॥
अनुभाष्य—'मर्कट',—सौत्र मर्क (गत्यर्थक)+अटन्
कर्तृवाच्ये,—चञ्चल, अस्थिर; 'इन्द्रिय चराञा',—इन्द्रियोंके
वशीभूत होकर; 'बुले',—भ्रमण करता है। बाहरसे
वैराग्य दिखलाकर जो लोगोंसे सम्मान संग्रह करते हैं
एवं विषय-भोगवासनासे निर्मुक्त हृदयवाले नहीं हो
सकनेके कारण स्त्रियोंके साथ भोगबुद्धिसे वार्तालाप
करके स्वयंको 'पुरुष' मानकर आठ प्रकारसे स्त्रियोंके
सङ्गकी वासना करते हैं, ऐसे प्राकृत-सहजिया जीव
कभी भी 'महत्'-शब्दसे सम्बोधन योग्य नहीं हैं।
विवित्सा अथवा धीर-संन्यासियोंमें स्त्री-सम्भाषणरूप
अपराध—उनके स्वयंके लिये विशेष रूपसे अमङ्गलका
कारण है, किन्तु श्रीरामानन्द आदि प्रमुख 'विद्वत्'
अथवा 'नरोत्तम'-संन्यासी परमहंसोंको यदि कोई अक्षजज्ञानी
[जिनका ज्ञान इन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञान तक ही सीमित है]
अपने दुर्भाग्यवशातः स्त्री-सम्भाषी समझें, तब उनका
पतन अवश्यम्भावी है॥ 120॥
महाप्रभुका क्रोधके आवेशमें स्थानका त्याग,
सभी भक्तोंके द्वारा मौन धारण :-
एत कहिं महाप्रभु अभ्यन्तरे गेला।
गोसाञिर आवेश देखि' सबे मौन हैला॥ 121 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु भीतर चले गये।
उनके क्रोधके आवेशको देखकर सभी मौन हो
गये॥ 121 ॥
अनुभाष्य—'आवेश',—क्रोधका आवेश॥ 121 ॥
अगले दिन हरिदासके लिये भक्तोंका
महाप्रभुके निकट आवेदन :-
आर दिने सबे मेलि' प्रभुर चरणे।
हरिदास लागि' किछु कैला निवेदने ॥ 122 ॥
“अल्प अपराध, प्रभु, करह प्रसाद।
एबे शिक्षा हइल, ना करिबे अपराध ॥ ”123 ॥
अनुवाद—अगले दिन सभी भक्तोंने मिलकर
छोटे-हरिदासके लिये महाप्रभुके चरणोंमें कुछ निवेदन
किया,—“हे प्रभो! छोटे-हरिदाससे थोड़ा अपराध हो
गया है, आप उसपर कृपा कीजिये। अब उसे अच्छी
शिक्षा मिल गयी है, वह अब पुनः अपराध नहीं
करेगा॥ ”122-123 ॥

[ 2/123-132 दूसरा अध्याय 59
अमृतप्रवाह भाष्य- 'अल्प अपराध',- माधवी देवीके
पास जाकर चावलकी भिक्षा करनेमें छोटे-हरिदासका
अन्य कोई उद्देश्य नहीं था, केवल महाप्रभुकी
सेवासुख-वासना ही थी, तथापि उस कार्यमें एक
अपराध हुआ था। वैरागीका वेश लेकर पुनः स्त्रियोंके
साथमें सम्भाषण करना जो एक अपराध है, वह यद्यपि
वैरागीके लिये महत् अपराध है, किन्तु प्रभुकी सेवाके
लिये उस प्रकारके अपराधको 'सामान्य' कहकर भी
कहा जा सकता है ॥ 123 ॥
जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुकी निरपेक्षता
और वज्रसे भी अधिक कठोरता :-
प्रभु कहे,- “मोर वश नहे मोर मन।
प्रकृति-सम्भाषी वैरागी ना करे स्पर्शन ॥ 124 ॥
महाप्रभुका तीव्र शासन :-
निज कार्ये याह सबे, छाड़ वृथा कथा।
कह यदि पुनः, आमा ना देखिबे हेथा ॥" 125 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “मेरा मन मेरे वशमें
नहीं है। वह स्त्रीसे सम्भाषण करनेवाले वैरागीका स्पर्श
नहीं करना चाहता। व्यर्थकी बातें छोड़कर सभी
अपने-अपने कामपर जाओ। यदि पुनः आप लोगोंने
ऐसी बात कही तो फिर मुझे यहाँपर कभी नहीं
देखोगे ॥” 124-125 ॥
महाप्रभुके वचन सुनकर सभीको भय और लज्जा :-
एत शुनि' सबे निज-कर्णे हस्त दिया।
निज-निज कार्ये सबे गेल त' उठिया ॥ 126 ॥
अनुवाद-यह सुनकर सबने अपने कानोंको हाथोंसे
ढक लिया और सभी उठकर अपने-अपने कामपर
चले गये ॥ 126 ॥
दुर्बोध्य महाप्रभुकी लीलाका तात्पर्य :-
महाप्रभु मध्याह्न करिते चलि' गेला।
बुझन ना याय एइ महाप्रभुर लीला ॥ 127 ॥
अनुवाद-महाप्रभु भी मध्याह्नके कृत्य करनेके
लिये चले गये। महाप्रभुकी इस लीलाको कोई भी
समझ नहीं पा रहा था ॥ 127 ॥
हरिदासके लिये श्रीपरमानन्दपुरी गोस्वामीके द्वारा
महाप्रभुके समीप आवेदन :-
आर दिन सबे परमानन्दपुरी-स्थाने।
'प्रभुके प्रसन्न कर'-कैला निवेदने ॥ 128 ॥
अनुवाद-अगले दिन सभी भक्त श्रीपरमानन्द
पुरीके स्थानपर गये और उनसे निवेदन किया,- 'आप
ही महाप्रभुको शान्त कीजिये ॥' 128 ॥
तबे पुरी-गोसाञि एका प्रभुस्थाने आइला।
नमस्करि' प्रभु ताँरे सम्भ्रमे बसाइला ॥ 129 ॥
अनुवाद-तब श्रीपरमानन्दपुरी गोस्वामी अकेले
महाप्रभुके वासस्थानपर आये। महाप्रभुने उन्हें प्रणाम
करके आदरसहित बैठाया ॥ 129 ॥
पुछिला,- “कि आज्ञा, केने हैल आगमन ?”
हरिदासे प्रसाद लागि' कैला निवेदन ॥ 130 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, - “मेरे लिये क्या आदेश
है? आपका किस उद्देश्यसे आगमन हुआ है?"
श्रीपरमानन्द पुरीने निवेदन करते हुए कहा कि
'छोटे-हरिदासके प्रति आप कृपा करें'- मैं इस उद्देश्यसे
आया हूँ ॥ 130 ॥
महागम्भीर महाप्रभुके द्वारा असन्तुष्ट चित्तके कारण
श्रीगोविन्दके साथ पुरी त्याग करके आलालनाथ
जानेके भयका प्रदर्शन :-
शुनिया कहेन प्रभु, - “शुनह, गोसाञि।
सब वैष्णव लञा तुमि रह एइ ठाञि ॥ 131 ॥
मोरे आज्ञा हय, मुञि याङ आलालनाथ।
एकले रहिब ताँहा, गोविन्द-मात्र साथ ॥" 132 ॥
अनुवाद-श्रीपरमानन्दपुरीकी बात सुनकर महाप्रभुने
कहा,- “हे गोसाईं, सुनिये ! आप सभी वैष्णवोंके साथ
मिलकर यहीं रहिये। मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं

60 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/131–142 ]
आलालनाथ चला जाऊँ। मैं वहाँ अकेला रहूँगा, केवल
गोविन्दको अपने साथ ले जाऊँगा॥"131–132॥
एत बलि' प्रभु यदि गोविन्दे बोलाइला।
पुरीरे नमस्कार करि' उठिया चलिला ॥ 133 ॥
अनुवाद—यह कहकर तभी महाप्रभुने श्रीगोविन्दको
बुलाया और श्रीपरमानन्द पुरीको प्रणाम करके उठकर
चल दिये॥ 133 ॥
श्रीपुरी-गोस्वामीको लज्जा और भय एवं दैन्यपूर्वक
महाप्रभुको घरमें लौटाकर लाना :—
आस्ते-व्यस्ते पुरी गोसाञि प्रभु-आगे गेला।
अनुनय करि' प्रभुरे घरे फिराइला ॥ 134 ॥
अनुवाद—शीघ्रतासे श्रीपरमानन्द पुरी गोसाईं महाप्रभुके
आगे गये और अनुनय-विनय करके महाप्रभुको उनके
वासस्थानमें लौटा लाये॥ 134 ॥
श्रीपुरीके द्वारा महाप्रभुकी स्तुति और
अपने स्थानपर लौटना :—
“तोमार ये इच्छा कर, स्वतन्त्र ईश्वर।
केबा कि बलिते पारे तोमार उपर ? ? 135॥
लोकहित लागि' तोमार सब व्यवहार।
आमि सब ना जानि गम्भीर हृदय तोमार ॥” 136 ॥
अनुवाद—श्रीपरमानन्द पुरीने कहा,—“आप स्वतन्त्र
ईश्वर हैं, आपकी जैसी इच्छा हो आप वैसा ही
कीजिये। आपके ऊपर कौन क्या कह सकता है?
आपके सभी व्यवहार लोगोंके हितके लिये ही हैं। हम
उन सबको नहीं समझ सकते, क्योंकि आपके हृदयके
विचार अति गम्भीर हैं॥” 135–136 ॥
विफल-मनोरथ होकर भक्तोंका हरिदासके समीप जाना :—
एत बलि' पुरी-गोसाञि गेला निज-स्थाने।
हरिदास-स्थाने गेला सब भक्तगणे ॥ 137 ॥
अनुवाद—यह कहकर श्रीपरमानन्द पुरी गोस्वामी
अपने स्थानपर लौट गये। सभी भक्त मिलकर
छोटे-हरिदासके स्थानपर गये॥ 137 ॥
श्रीस्वरूप-गोस्वामीके द्वारा हरिदासको
आशा और सान्त्वना देना :—
स्वरूप-गोसाञि कहे,—“शुन, हरिदास।
सबे तोमार हित वाञ्छि, करह विश्वास ॥ 138 ॥
प्रभु हठ पड़ियाछे स्वतन्त्र ईश्वर।
कभु कृपा करिबेन दयालु अन्तर ॥ 139 ॥
तुमि हठ कैले ताँर हठ से बाड़िबे।
स्नान-भोजन कैले, आपने क्रोध याबे ॥” 140 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने कहा,—“हे
हरिदास, सुनो! हम सब तुम्हारा हित चाहते हैं, तुम
हमारी बातपर विश्वास करो। महाप्रभु स्वतन्त्र ईश्वर हैं,
अभी उन्होंने हठ पकड़ ली है। कभी-न-कभी तो वे
अवश्य ही तुमपर कृपा करेंगे, क्योंकि उनका हृदय तो
भीतरसे दयासे पूर्ण है। यदि तुम हठ करोगे, तो फिर
उसे देखकर महाप्रभुका हठ भी बढ़ जायेगा। इसलिये
तुम स्नान तथा भोजन करो। धीरे-धीरे महाप्रभुका क्रोध
भी स्वयं ही दूर हो जायेगा॥” 138–140 ॥
अनुभाष्य—'हठ',—बलका प्रयोग, ज़िद॥ 139 ॥
एत बलि' तारे स्नान-भोजन करावा।
आपन भवन आइला तारे आश्वासिया ॥ 141 ॥
अनुवाद—यह कहकर श्रीस्वरूप दामोदरने
छोटे-हरिदासको स्नान तथा भोजन करनेके लिये प्रेरित
किया और उन्हें आश्वासन देकर वे अपने स्थानपर
लौट गये॥ 141 ॥
दूर रहकर हरिदासके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :—
प्रभु यदि यान जगन्नाथ-दरशने।
दूरे राहि' हरिदास करेन दर्शने ॥ 142 ॥
अनुवाद—जब महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके

[ 2/142-147 दूसरा अध्याय 61
लिये जाते, तब छोटे-हरिदास दूरमें रहकर ही उनके
दर्शन करते ॥ 142 ॥
धर्मसेतु धर्मरक्षक महाप्रभुका परम कारुण्य :-
महाप्रभु-कृपासिन्धु, के पारे बुझिते?
निज-भक्ते दण्ड करेन धर्म बुझाइते ॥ 143 ॥
अनुवाद-महाप्रभु कृपाके सिन्धु हैं, इसे कौन
समझ सकता है? जगत्में धर्मकी शिक्षा देनेके लिये
वे अपने भक्त तकको दण्ड प्रदान करते हैं॥ 143 ॥
अनुभाष्य-यद्यपि कपटतापूर्वक अवैध स्त्री-सङ्ग
भी पापोंमें-से एक पाप मात्र है, तथापि जगतवासियोंको
दो मुख्य शिक्षा देनेके लिये महाप्रभुने अपने भक्त
हरिदासको दण्ड प्रदान किया-(1) वास्तविक वैष्णवोंकी
त्रिगुणातीत अप्राकृत परमोच्च स्थिति है एवं (2)
भविष्यकालके बिद्ध प्राकृत-सहजिया आदि उपधर्म और
अपधर्मका पालन करनेवाले नारकी व्यक्तियोंका व्यवहार
अत्यन्त अधर्मकी नींवके ऊपर बना हुआ और शुद्ध
वैष्णव धर्मके सम्पूर्ण विपरीत और स्वतन्त्र है। श्रीमाधवी
देवी-उच्चाधिकारिणी महाभागवत हैं; उनके पास जाकर
चावलकी भिक्षा ग्रहण करना हरिदास जैसे प्रभु-पार्षदका
अवैध-कार्य नहीं होनेपर भी भविष्यमें ऐसे उदाहरण
अथवा आदर्शका अनुकरण करके अनेक लोग शठता
और कपटताका विस्तार करके कलिजनोचित
अवैष्णव-मतका प्रचार कर सकते हैं, - उसको रोकनेके
उद्देश्यसे जगद्गुरु लोकशिक्षक भगवान्की यह
हरिदास-सम्बन्धिनी दण्ड-लीला है। श्रीगौरसुन्दरने असामान्य
दयाके सागर होनेपर भी कलियुगके जीवोंकी दुर्बलताको
समझकर ही इस प्रकारके सङ्गत्याग रूपी सुकठोर
दण्डका विधान करके अमन्दोदया-दयाकी पराकाष्ठाको
प्रदर्शित किया ॥ 143 ॥
छोटे हरिदासके दण्डको देखकर साधकोंका पुरुष
अथवा भोक्ताके अभिमानसे इन्द्रिय-तर्पणके उद्देश्यसे
भोगमय नेत्रोंसे भोग्य-स्त्री-दर्शनका त्याग :-
देखि' त्रास उपजिल सब भक्तगणे।
स्वप्नेह छाड़िल सबे स्त्री-सम्भाषणे ॥ 144 ॥
अनुवाद-छोटे-हरिदासको दिये जा रहे दण्डको
देखकर सभी भक्तोंके हृदयमें भय उत्पन्न हो गया।
इसलिये सभीने स्वप्न तकमें भी स्त्रीके साथ सम्भाषण
करना छोड़ दिया ॥ 144 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'त्रास उपजिल सब भक्तगणे',-
वैरागी-वेषधारी (साधक) भक्तोंमें ऐसा भय उपस्थित
हुआ कि उन्होंने किसी स्त्रीके साथ बात तक करना
छोड़ दिया ॥ 144 ॥
अनुभाष्य- 'स्त्री-सम्भाषण',- भोक्ता अथवा पुरुष-
अभिमानसे अपनी इन्द्रियोंकी भोग्या समझकर स्त्रीके
साथ विषयी व्यक्तिकी जो बातचीत होती है, वह
स्त्री-सम्भाषण है॥ 144 ॥
एक वर्षके बाद भी महाप्रभुकी अटल निरपेक्षता :-
एइमते हरिदासेर एकवत्सर गेल।
तबु महाप्रभुर मने प्रसाद नहिल ॥ 145 ॥
अनुवाद-इस प्रकार छोटे-हरिदासका एक वर्ष
व्यतीत हो गया, किन्तु तब भी महाप्रभुके मनमें उनके
प्रति कृपाका आभास भी नहीं दिखा ॥ 145 ॥
महाप्रभुके ऐसे व्यवहारको देखकर छोटे-हरिदासके
द्वारा महाप्रभुकी सेवाकी प्राप्तिका सङ्कल्प
लेकर प्रयागमें जाकर त्रिवेणीमें देहत्याग :-
रात्रि-शेषे प्रभुरे दण्डवत् हञा।
प्रयागेते गेल कारेह किछु ना बलिया ॥ 146 ॥
अनुवाद-एक रात्रिके अन्तमें छोटे-हरिदास महाप्रभुको
बाहरसे ही दण्डवत् प्रणाम करके बिना किसीको बताये
प्रयाग चले गये ॥ 146 ॥
प्रभुपद-प्राप्ति लागि' सङ्कल्प करिल।
त्रिवेणी प्रवेश करि' प्राण छाड़िल ॥ 147 ॥
अनुवाद-छोटे-हरिदासने महाप्रभुके चरणोंकी प्राप्तिका
सङ्कल्प किया और त्रिवेणीमें प्रवेश करके उन्होंने अपने
प्राण त्याग दिये ॥ 147 ॥

62 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/148-157 ]
छोटे-हरिदासके द्वारा अपनी दिव्य देहसे अलक्षित
रूपमें महाप्रभुके समीप कीर्तन-गान-सेवा :-
सेइक्षणे प्रभुस्थाने दिव्यदेहे आइला।
प्रभुकृपा लञा अन्तर्धाने रहिला ॥ 148 ॥
अनुवाद-छोटे-हरिदास उसी समय दिव्य देह
धारण करके महाप्रभुके निकट आये और महाप्रभुकी
कृपा प्राप्त की। वे सभीके लिये अदृश्य ही रहे॥ 148 ॥
गन्धर्वदेहे गान करेन अन्तर्धाने।
रात्रे प्रभुरे शुनाय, अन्य नाहि जाने ॥ 149 ॥
अनुवाद-छोटे-हरिदास अदृश्य रूपमें गन्धर्वके
समान दिव्य देहके द्वारा रात्रिके समय महाप्रभुको अपने
गानका श्रवण कराते। महाप्रभुके अतिरिक्त अन्य कोई
भी इस बातको नहीं जानता था॥ 149 ॥
एकदिन महाप्रभुके द्वारा भक्तोंसे
हरिदासके विषयमें पूछना :-
एकदिन महाप्रभु पुछिला भक्तगणे।
“हरिदास काँहा? तारे आनह एखाने ॥” 150 ॥
अनुवाद-एकदिन महाप्रभुने भक्तोंसे पूछा,—“छोटा-
हरिदास कहाँ है? उसे यहाँपर लेकर आओ॥” 150 ॥
सभीके द्वारा हरिदासके सम्बन्धमें
अपनी अनभिज्ञता बतलाना :-
सबे कहे,—“हरिदास वर्षपूर्ण दिने।
रात्रे उठि' काँहा गेला, केह नाहि जाने ॥” 151 ॥
अनुवाद-सभी भक्तोंने कहा,—“एक वर्ष पूर्ण
होनेके बाद छोटा-हरिदास रात्रिमें उठकर कहीं चला
गया। वह कहाँ गया, यह कोई भी नहीं जानता॥” 151 ॥
महाप्रभुका हास्य; उसे देखकर भक्तोंको विस्मय :-
शुनि' महाप्रभु ईषत् हासिया रहिला।
सब भक्तगण-मने विस्मय जन्मिला ॥ 152 ॥
अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभु थोड़ा-सा मुस्कुराये।
महाप्रभुको मुस्कुराते देखकर सब भक्तोंके मनमें विस्मय
हुआ ॥ 152 ॥
एकदिन समुद्र-स्नानके समय श्रीस्वरूप और श्रीगोविन्दादि
भक्तोंके द्वारा अलक्षित हरिदासके गानका श्रवण :-
एकदिन जगदानन्द, स्वरूप, गोविन्द।
काशीश्वर, शङ्कर, दामोदर, मुकुन्द ॥ 153 ॥
समुद्रस्नाने गेला सबे, शुने कथो दूरे ।
हरिदास गायेन, येन डाकि' कण्ठस्वरे ॥ 154 ॥
अनुवाद-एकदिन श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीस्वरूप
दामोदर, श्रीगोविन्द, श्रीकाशीश्वर पण्डित, श्रीशङ्कर,
श्रीदामोदर पण्डित और श्रीमुकुन्द-सभी भक्त मिलकर
समुद्र स्नान करनेके लिये गये। उन्होंने छोटे-हरिदासको
कुछ दूरीपर गान करते हुए सुना जैसे वे अपने पूर्व
स्वरमें उन्हें बुला रहे हैं॥ 153-154 ॥
मनुष्य ना देखे-मधुर गीतमात्र सुने।
गोविन्दादि सब मेलि' कैल अनुमाने ॥ 155 ॥
श्रीस्वरूपके अतिरिक्त श्रीगोविन्दादि भक्तोंका
अनुमान-हरिदासको आत्महत्याके फलसे
ब्रह्मराक्षसयोनिकी प्राप्ति :-
“विषादि खाञा हरिदास आत्मघात कैल।
सेइ पापे जानि 'ब्रह्मराक्षस' हैल ॥ 156 ॥
आकार ना देखि मात्र शुनि तार गान।”
स्वरूप कहेन, - “एइ मिथ्या अनुमान ॥ 157 ॥
अनुवाद-परन्तु किसीको भी गान करते छोटे-हरिदास
दिखलायी नहीं दिये, उन्हें केवल मधुर गीत ही सुनायी
दे रहा था। इसी कारण श्रीगोविन्दादि सभी भक्तोंने
अनुमान लगाया,—“लगता है कि छोटे-हरिदासने विष
आदि खाकर आत्महत्या की है, जिस पापके फलस्वरूप
वह 'ब्रह्मराक्षस' बन गया है। इसी कारण हमें उसका
रूप दिखायी नहीं दे रहा, केवलमात्र उसका गान ही
सुनायी दे रहा है।” श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“आप
लोगोंका ऐसा अनुमान मिथ्या है॥ 155-157 ॥

[ 2/158–166 दूसरा अध्याय 63
श्रीस्वरूपके द्वारा छोटे-हरिदासके गुण
और सद्गतिकी प्रशंसा :-
आजन्म कृष्णकीर्त्तन, प्रभुर सेवन।
प्रभु-कृपापात्र, आर क्षेत्रेर मरण ॥ 158 ॥
दुर्गति ना हय तार, सद्गति से हय।
प्रभु-भङ्गी एइ, पाछे जानिबा निश्चय ॥” 159 ॥
अनुवाद—सम्पूर्ण जीवन ही छोटे-हरिदासने श्रीकृष्णका
कीर्त्तन किया है, महाप्रभुकी सेवा की है, वह महाप्रभुका
कृपा-पात्र है तथा क्षेत्रमें उसने देह त्याग किया है।
उसकी कभी भी दुर्गति नहीं हो सकती, उसकी सद्गति
ही हुई होगी। यह महाप्रभुकी कोई लीला है, निश्चय
ही तुम लोगोंको बादमें उसका पता चलेगा॥” 158-159 ॥
प्रयागसे नवद्वीपमें लौटे एक वैष्णवके मुखसे श्रीवासादिके
द्वारा हरिदासके देहत्यागका श्रवण :-
प्रयाग हइते एक वैष्णव नवद्वीप आइल।
हरिदासेर वार्त्ता तेंहो सबारे कहिल ॥ 160 ॥
अनुवाद—प्रयागसे एक वैष्णव नवद्वीपमें आये तथा
उन्होंने छोटे-हरिदासकी आत्महत्याके विषयमें सबको
बतलाया॥ 160 ॥
यैछे सङ्कल्प, यैछे त्रिवेणी प्रवेशिल।
शुनि' श्रीवासादिरे मने विस्मय हइल ॥ 161 ॥
अनुवाद—छोटे-हरिदासने जिस प्रकारसे सङ्कल्प
ग्रहण किया था, जिस प्रकारसे त्रिवेणीमें प्रवेश किया था,
यह सब बतलाया। इसे सुनकर श्रीवासादि भक्तोंके
मनमें बहुत विस्मय हुआ॥ 161 ॥
अगले वर्ष गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें आगमन :-
वर्षान्तरे शिवानन्द सब भक्त लञा।
प्रभुरे मिलिला आसि' आनन्दित हञा ॥ 162 ॥
अनुवाद—एक वर्षके बाद श्रीशिवानन्द सेन सभी
भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीजगन्नाथपुरी आये और
बड़े आनन्दसे महाप्रभुसे आकर मिले॥ 162 ॥
श्रीवासके द्वारा महाप्रभुसे छोटे हरिदासके सम्बन्धमें
जिज्ञासा और महाप्रभुका उत्तर :-
“हरिदास काँहा ?” यदि श्रीवास पुछिला।
“स्वकर्मफलभुक् पुमान्”—प्रभु उत्तर दिला ॥ 163 ॥
अनुवाद—तब श्रीवास पण्डितने पूछा,—“छोटा-हरिदास
कहाँ है?” महाप्रभुने उत्तर दिया,—“मनुष्य अपने
कर्मोंका फल भोग करता है॥” 163 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— “स्वकर्मफलभुक् पुमान्”—मनुष्य
अपने कर्मोंके फलका भोग करता है॥ 163 ॥
श्रीवासके द्वारा छोटे-हरिदासके
देहत्यागके वृत्तान्तका वर्णन :-
तबे श्रीवास तार वृत्तान्त कहिल।
यैछे सङ्कल्प, यैछे त्रिवेणी प्रवेशिल ॥ 164 ॥
अनुवाद—तब श्रीवास पण्डितने छोटे-हरिदासने
जैसे सङ्कल्प किया और जैसे त्रिवेणीमें प्रवेश किया—यह
सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ 164 ॥
सद्धर्मके रक्षक जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा
विधिकी व्यवस्थाका विधान :-
शुनि' प्रभु हासि' कहे सुप्रसन्न चित्त।
“प्रकृति-दर्शन कैले एइ प्रायश्चित ॥” 165 ॥
अनुवाद—श्रीवास पण्डितकी बात सुनकर महाप्रभुने
हृदयमें बहुत प्रसन्न होकर मुस्कुराते हुए कहा,—“स्त्रीका
भोगबुद्धिसे दर्शन करनेका यही प्रायश्चित है॥” 165 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—भेकधारी अर्थात् वैरागी-वेषधारी
साधक वैष्णव यदि इच्छापूर्वक स्त्रीका दर्शन करता है,
तो अगले जन्ममें इस दोषसे मुक्त होनेके अभिप्रायसे
त्रिवेणीमें डूबकर मरना ही प्रायश्चित्त है॥ 165 ॥
दूसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
त्रिवेणी आदि विष्णुतीर्थमें देहत्यागका फल :-
स्वरूपादि मिलि' तबे विचार करिला।
त्रिवेणी-प्रभावे हरिदास प्रभुपाश आइला ॥ 166 ॥