श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
404 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/55–64 ]
अनुवाद—श्रीकालिदास महाप्रभुके वासस्थानके बाहर
द्वारपर मनमें कुछ आशा लेकर खड़े थे। महाप्रभु
उनके हृदयकी बातको जानते थे, इसलिये उन्होंने
सङ्केतसे श्रीगोविन्दसे कुछ कहा॥ 55 ॥
अनुभाष्य—'ठारे',—इशारेसे, सङ्केतसे ॥ 55 ॥
प्रभुर इङ्गिते गोविन्द सब जाने।
कालिदासेरे दिल प्रभुर शेषपात्र दाने॥ 56 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके सङ्केतोंको श्रीगोविन्द भली-भाँति
समझते थे, इसलिये उन्होंने श्रीकालिदासको महाप्रभुका
उच्छिष्ट प्रदान किया ॥ 56 ॥
महाप्रभुकी चरम कृपा प्राप्तिका एकमात्र कारण :—
वैष्णवेर शेष-भक्षणेर एतेक महिमा।
कालिदासे पाओयाइल प्रभुर कृपा-सीमा ॥ 57 ॥
अनुवाद—वैष्णवोंके उच्छिष्टको खानेकी इतनी महिमा
है कि उसीने श्रीकालिदासको महाप्रभुकी चरम कृपाको
प्राप्त करवाया॥ 57 ॥
सभी साधकोंको ग्रन्थकारका उपदेश :—
ताते 'वैष्णवेर झूटा' खाओ छोड़ि' घृणा-लाज।
याहा हैते पाइबा वाञ्छित सब काज ॥ 58 ॥
अनुवाद—इसलिये आप घृणा और लज्जाका त्याग
करके वैष्णवोंका जूठा खाओ, जिसके द्वारा आपकी
समस्त वाञ्छाएँ पूर्ण हो जायेंगी ॥ 58 ॥
कृष्णके उच्छिष्ट और भक्तके उच्छिष्टकी संज्ञा :—
कृष्णेर उच्छिष्ट हय 'महाप्रसाद'–नाम।
'भक्तशेष' हैले महा–महाप्रसादाख्यान ॥ 59 ॥
अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्णके उच्छिष्टका नाम
'महाप्रसाद' होता है। उस महाप्रसादको भक्तोंके द्वारा
ग्रहण करनेके पश्चात् उनका उच्छिष्ट महा-महाप्रसाद
कहलाता है॥ 59 ॥
साधकको चित्-बल प्रदान करनेवाली
तीन अप्राकृत वस्तुएँ :—
भक्तपदधूलि आर भक्तपद-जल।
भक्तभुक्त-शेष,–एइ तिन साधनेर बल ॥ 60 ॥
अनुवाद—भक्तोंके चरणोंकी धूलि, भक्तोंके चरणोंका
जल और भक्तोंका उच्छिष्ट—ये तीन भक्तिसाधनके
बल हैं ॥ 60 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'तिन साधनेर बल',—भक्तकी
चरणधूलिको ग्रहण करना, भक्तोंके चरणोंके जलको
ग्रहण करना और भक्तोंके अधरामृतको ग्रहण करना—ये
तीनों ही समस्त साधनोंके बलस्वरूप हैं॥ 60 ॥
उपरोक्त तीन वस्तुओंका सेवन ही परमपुरुषार्थरूपी
प्रयोजनकी प्राप्तिका सर्वशास्त्र-सम्मत एकमात्र उपाय :—
एइ तिन-सेवा हैते कृष्णप्रेमा हय।
पुनः पुनः सर्वशास्त्रे फुकारिया कय ॥ 61 ॥
परमपुरुषार्थ प्रेमको प्राप्त करनेके इच्छुक समस्त
साधकोंको ग्रन्थकारके द्वारा अनुरोधपूर्वक उपदेश :—
ताते बार बार कहि,–शुन, भक्तगण।
विश्वास करिया कर ए तिन-सेवन ॥ 62 ॥
उक्त तीनों साधन ही श्रीकृष्णनाम-प्रेम-कृपाको
प्राप्त करवानेके एकमात्र उपाय :—
तिन हैते कृष्णनाम-प्रेमेर उल्लास।
कृष्णेर प्रसाद, ताते 'साक्षी' कालिदास ॥ 63 ॥
भक्तोंके उच्छिष्टमें विश्वासके कारण ही श्रीकालिदासको
पुरीमें भगवान्की कृपाकी प्राप्ति :—
नीलाचले महाप्रभु रहे एइमते।
कालिदासे महाकृपा कैला अलक्षिते ॥ 64 ॥
अनुवाद—उपरोक्त तीन वस्तुओंके सेवनसे कृष्णप्रेमकी
प्राप्ति होती है, सभी शास्त्र पुनः पुनः इसकी उच्च
स्वरसे घोषणा करते हैं। इसलिये हे भक्तों, सुनो! मैं
बार बार कह रहा हूँ कि आप विश्वास करके इन
तीनों वस्तुओंका सेवन करो। इनके सेवनसे शुद्धकृष्णनाम
और उसके द्वारा परम पुरुषार्थ प्रेमकी प्राप्ति होती है।
[ 16/61-73 सोलहवाँ अध्याय 405
इसके द्वारा श्रीकृष्णकी कृपा मिलती है, इसके साक्षी
श्रीकालिदास हैं। महाप्रभु नीलाचलमें इस प्रकार रहते
हुए लीलाएँ कर रहे थे और उन्होंने अलक्षित रूपमें
श्रीकालिदासपर महाकृपा की॥ 61-64 ॥
रथ-यात्राके उपलक्ष्यमें श्रीशिवानन्दका परमानन्दपुरीदास
नामक पुत्रके साथ पुरीमें जाना :-
से वत्सर शिवानन्द पत्नी लइया आइला।
'पुरीदास'-छोटपुत्रे सङ्गेते आनिला ॥ 65 ॥
अनुवाद-उस वर्ष श्रीशिवानन्द सेन अपने साथ
अपनी पत्नी और अपने छोटे पुत्र पुरीदासको भी
लाये ॥ 65 ॥
पुरीदासका महाप्रभुके चरणोंमें प्रणाम :-
पुत्रसङ्गे लञा तैंहो आइला प्रभु-स्थाने।
पुत्रेरे कराइला प्रभुर चरण वन्दने ॥ 66 ॥
अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेन अपने पुत्रको साथ
लेकर महाप्रभुके वासस्थानपर आये। उन्होंने अपने
पुत्रसे महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना करवायी॥ 66 ॥
उस बालकको श्रीकृष्ण-नामोच्चारणके
लिये आदेश, बालकका मौनभाव :-
'कृष्ण कह' बलि' प्रभु बलेन बार बार।
तबु कृष्णनाम बालक ना करे उच्चार ॥ 67 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने उस बालकसे बार-बार 'कृष्ण
बोलो', 'कृष्ण बोलो' कहा, किन्तु तब भी बालकने
कृष्णनामका उच्चारण नहीं किया॥ 67 ॥
उसके लिये श्रीशिवानन्दके द्वारा व्यर्थ प्रयत्न :-
शिवानन्द बालकेरे बहु यत्न करिला।
तबु सेइ बालक कृष्णनाम ना कहिला ॥ 68 ॥
अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनने भी अपने बालकके
मुखसे कृष्णनाम कहलवानेके लिये बहुत प्रयत्न किया,
तब भी उस बालकने मुखसे कृष्णनाम नहीं कहा॥ 68 ॥
ऐसा देखकर स्वयं महाप्रभुकी विस्मययुक्त उक्ति :-
प्रभु कहे,-"आमि नाम जगते लओयाइलूँ।
स्थावरे पर्यन्त कृष्णनाम कहाइलूँ ॥ 69 ॥
इहारे नारिलूँ कृष्णनाम कहाइते!"
शुनिया स्वरूप गोसाञि लागिला कहिते ॥ 70 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा पुरीदासके मौन
रहनेके तात्पर्यकी व्याख्या :-
"तुमि कृष्णनाम-मन्त्र कैला उपदेशे।
मन्त्र पाञा कार आगे ना करे प्रकाशे ॥ 71 ॥
मने मने जपे, मुखे ना करे आख्यान।
एइ इहार मनःकथा करि अनुमान ॥" 72 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"मैंने सारे जगत्को
कृष्णनाम लेनेके लिये प्रेरित किया है, यहाँ तक कि
मैंने स्थावर जीवोंसे भी कृष्णनाम करवाया है, किन्तु
मैं इस बालकके मुखसे कृष्णनाम नहीं बुलवा पाया!"
महाप्रभुके वचनोंको सुनकर श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने
कहा,-"आपने इस बालकको कृष्णनाम मन्त्रका उपदेश
दिया है। यह आपसे मन्त्र प्राप्त करके किसीके भी
आगे उसे प्रकाशित नहीं कर रहा है। यह मन-ही-मनमें
कृष्णनाम मन्त्रका जप कर रहा है, केवल मुखसे ही
उसका उच्चारण नहीं कर रहा है। मैं इसके मनकी
बातका यही अनुमान लगा रहा हूँ॥" 69-72 ॥
अनुभाष्य-श्रीगुरुदेवसे प्राप्त मन्त्रको अन्यके सामने
प्रकाशित करनेसे मन्त्रका बल नहीं रहता; श्रीगदाधर
पण्डितकी कथासे हमने पहले ही यह जाना है॥ 71 ॥
अन्यदिन महाप्रभुके आदेशसे बालक पुरीदासका
मौनभङ्ग और श्लोक-पठन :-
आर दिन कहेन प्रभु,-"पड़, पुरीदास।"
एइ श्लोक करि' तैंहो करिला प्रकाश ॥ 73 ॥
अनुवाद-अन्य एक दिन महाप्रभुने उस बालकसे
कहा,-"पुरीदास! कुछ पढ़कर सुनाओ।" तब पुरीदासने
एक श्लोककी रचना करके सबके सामने सुनाया॥ 73 ॥
406 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/74-81 ]
गोपीहृदय-भूषण श्रीकृष्णकी जय :-
कविकर्णपूर-कृत आर्यशतकका प्रथम श्लोक-
श्रवसोः कुवलयमक्षणोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम।
वृन्दावनरमणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति ॥ 74 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो-श्रवणयुगल (दोनों कानों) के
नीलकमल हैं, नेत्रोंके अञ्जन हैं, वक्षःस्थलके महेन्द्र
मणिमाला हैं, वृन्दावनकी रमणियोंके अखिल-भूषण हैं,
वे हरि जययुक्त हो रहे हैं ॥ 74 ॥
अनुभाष्य-
श्रवसोः (कर्णयोः) कुवलयः (नीलोत्पलं) तथा अक्षणोः
(चक्षुषोः) अञ्जनं (कज्ज्वलशोभनम्) उरसः (वक्षसः)
महेन्द्रमणिदाम (इन्द्रनीलमणिमाला) वृन्दावनरमणीनां
(व्रजललनानाम्) अखिलं (सर्वविधं) मण्डनम् (अलङ्काररूपः)
हरिः जयति।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74 ॥
बालकके द्वारा श्लोककी रचना
करनेसे सभीको विस्मय :-
सात वत्सरेर शिशु, नाहि अध्ययन।
ऐछे श्लोक करे,—लोके चमत्कार मन ॥ 75 ॥
अनुवाद-सात वर्षका बालक जिसने अभी तक
कुछ अध्ययन भी नहीं किया था, उसने ऐसे श्लोककी
रचना की—इससे लोगोंके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ ॥ 75 ॥
महाप्रभुकी कृपाके माहात्म्यका वर्णन :-
चैतन्यप्रभुर एइ कृपार महिमा।
ब्रह्मादि-देव यार नाहि पाय सीमा ॥ 76 ॥
अनुवाद-यह श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपाकी ही
महिमा है, ब्रह्मादि देवता भी इसका पार नहीं पा
सकते ॥ 76 ॥
गौड़ीय भक्तोंको गौड़ जानेका आदेश :-
भक्तगण प्रभुसङ्गे रहे चारिमासे।
प्रभु आज्ञा दिला सबे गेला गौड़देशे ॥ 77 ॥
अनुवाद-गौड़देशसे आये भक्त महाप्रभुके साथ
चार मास तक रहे, महाप्रभुके द्वारा आज्ञा देनेपर सभी
गौड़देशमें लौट गये ॥ 77 ॥
गौड़ीय भक्तोंके साथ बाह्यदशामें किये गये
श्रीकृष्णकथाकीर्तन-प्रचारके अतिरिक्त अन्तर्दशामें
श्रीकृष्णविरहिणी गोपीभावमें उन्माद :-
ताँ-सबार सङ्गे प्रभुर छिल बाह्यज्ञान।
ताँरा गेले पुनः हैला उन्माद प्रधान ॥ 78 ॥
अनुवाद-जब तक गौड़देशसे आये भक्त
श्रीजगन्नाथपुरीमें महाप्रभुके साथ थे, तब तक महाप्रभुको
बाह्यज्ञान रहता था। उनके गौड़देशमें लौट जानेपर
महाप्रभुकी पुनः उन्माद दशा ही प्रधान हो गयी ॥ 78 ॥
निरन्तर श्रीकृष्णविरहमें श्रीकृष्णसङ्गकी
अनुभूति अथवा स्फूर्ति :-
रात्रि दिने स्फुरे कृष्णेर रूप-गन्ध-रस।
साक्षादनुभवे,—येन कृष्ण-उपस्पर्श ॥ 79 ॥
अनुवाद-महाप्रभुको रात-दिन श्रीकृष्णके रूप, सुगन्ध
और रसकी स्फूर्ति होती रहती और वे साक्षात् रूपसे
अनुभव करते जैसे वे श्रीकृष्णको स्पर्श कर रहे
हों ॥ 79 ॥
महाप्रभुकी उद्घूर्णा-उक्ति और
श्रीजगन्नाथरूपी श्यामसुन्दरका दर्शन :-
एक दिन प्रभु गेला जगन्नाथ-दरशने।
सिंहद्वारे दलइ आसि' करिल वन्दने ॥ 80 ॥
अनुवाद-एक दिन जब महाप्रभु श्रीजगन्नाथके
दर्शनके लिये जा रहे थे, तब सिंहद्वारके द्वारपालने
आकर महाप्रभुकी वन्दना की ॥ 80 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'दलइ', -द्वारपाल ॥ 80 ॥
तारे बले,—“कोथा कृष्ण, मोर प्राणनाथ?
मोरे कृष्ण देखाओ” बलि' धरे तार हात ॥ 81 ॥
[ 16/81-88
सोलहवाँ अध्याय
407
अनुवाद—महाप्रभुने उस द्वारपालसे कहा,—“मेरे प्राणनाथ श्रीकृष्ण कहाँ हैं? मुझे श्रीकृष्णके दर्शन करवाओ।” ऐसा कहकर महाप्रभुने उसका हाथ पकड़ लिया॥81॥
सेह कहे,—“इँहा हय व्रजेन्द्रनन्दन।
आइस तुमि मोर सङ्गे, कराङ दरशन॥” 82॥
अनुवाद—द्वारपालने कहा,—“श्रीव्रजेन्द्रनन्दन यहींपर हैं। आप मेरे साथ चलिये, मैं आपको उनके दर्शन करवाता हूँ॥” 82॥
अनुभाष्य—‘इँहा हय’,—यहाँ हैं॥82॥
“तुमि मोर सखा, देखाह,—काँहा प्राणनाथ?”
एत बलि’ जगमोहन गेला धरि’ तार हात॥ 83॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“तुम मेरे सखा हो, मुझे दिखाओ मेरे प्राणनाथ कहाँ हैं?” यह कहकर महाप्रभु उसका हाथ पकड़कर श्रीजगन्नाथ मन्दिरके जगमोहनमें (नाट्य-मन्दिरमें) गये॥83॥
सेह बले,—“एइ देख श्रीपुरुषोत्तम।
नेत्र भरिया तुमि करह दरशन॥” 84॥
अनुवाद—द्वारपालने महाप्रभुसे कहा,—“देखिये, ये श्रीपुरुषोत्तम हैं। आप इनका दर्शन करके अपने नेत्रोंको पूर्ण सन्तुष्ट कर लीजिये॥”84॥
गरुड़ेर पाछे रहि’ करेन दरशन।
देखेन,—जगन्नाथ हय मुरलीवदन॥ 85॥
अनुवाद—महाप्रभु गरुड़ स्तम्भके पीछे खड़े होकर दर्शन करने लगे, उन्होंने देखा कि श्रीजगन्नाथ तो मुखपर मुरली धारण किये व्रजेन्द्रनन्दन हैं॥85॥
श्रीरघुनाथके द्वारा अपने ग्रन्थमें महाप्रभुका श्रीजगन्नाथ-दर्शन वर्णित :-
एइ लीला निज-ग्रन्थे रघुनाथ दास।
चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे करियाछेन प्रकाश॥ 86॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने अपने ग्रन्थ चैतन्यस्तवकल्पवृक्षमें इस लीलाका वर्णन किया है॥86॥
स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तवका (7) श्लोक—
क्व मे कान्तः कृष्णस्त्वरितमिह तं लोकय सखे।
त्वमेवेति द्वाराधिपमभिवदन्नुन्मद इव।
द्रुतः गच्छन् द्रष्टुं प्रियमिति तदुक्तेन धृत तद्-
भुजान्तर्गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति॥ 87॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥87॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'हे सखे द्वारपाल, मेरे प्राणनाथ कृष्ण कहाँ हैं? शीघ्र ही तुम उन्हें यहाँ दिखलाओ',—जो द्वारपालको उन्मत्तकी भाँति इस प्रकार कहकर, उसके हाथको पकड़कर कृष्णको देखनेके लिये द्रुतगतिसे चले थे, ऐसे गौराङ्ग मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मत्त कर रहे हैं॥87॥
अनुभाष्य—
हे सखे, मे (मम) कान्तः (कृष्णः) क्व (कुत्र)? त्वम् एव इह (अस्मिन् स्थाने समये वा) तं (कान्तं कृष्णं) त्वरितं (शीघ्रं) लोकय (दर्शय) इति (एवम्भूतेन वाक्येन) उन्मदः (उन्मत्तः) इव द्वाराधिपम् अभिवदन् (कथयन्) प्रियं (कृष्णं) द्रष्टुं द्रुतं गच्छ (आगच्छ) तदुक्तेन (द्वाराधिप-वाक्येन) धृततद्भुजान्तः (धृतः तद्भुजान्तं तस्य करप्रान्तं येन सः) गौराङ्गः मम हृदये उदयन् मां मदयति (आनन्दयति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥87॥
जगन्नाथका बाल्य-भोग :-
हेनकाले ‘गोपाल-वल्लभ’-भोग लागइल।
शङ्ख-घण्टा आदि सह आरति बाजिल॥ 88॥
अनुवाद—उसी समय श्रीजगन्नाथको उनके सेवकोंने 'गोपाल-वल्लभ' भोग लगाया और शङ्ख, घण्टा आदिकी ध्वनिके साथ आरती होने लगी॥88॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'वल्लभ-भोग',—जिसे इस प्रदेश अर्थात् बङ्गालमें 'बालभोग' कहते हैं॥88॥
408 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/89-98 ]
जगन्नाथके सेवकोंके द्वारा महाप्रभुको महाप्रसाद-प्रदान :-
भोग सरिले जगन्नाथेर सेवकगण।
प्रसाद लञा प्रभु-ठाञि कैल आगमन ॥89॥
माला पराञा प्रसाद दिल प्रभुर हाते।
आस्वाद रहु, यार गन्धे मन माते ॥90॥
महाप्रभुको प्रसाद-ग्रहण करवानेके
लिये पण्डोंके द्वारा प्रयत्न :-
बहुमूल्य प्रसाद सेइ वस्तु सर्वोत्तम।
तार अल्प खाओयाइते सेवक करिल यतन ॥91॥
अनुवाद-भोगके बाद श्रीजगन्नाथके सेवक प्रसाद
लेकर महाप्रभुके पास आये। उन्होंने महाप्रभुको माला
पहनाकर उनके हाथमें श्रीजगन्नाथका प्रसाद दिया। उस
प्रसादके आस्वादनकी बात तो बहुत दूर, उसकी
सुगन्धसे ही मन मतवाला हो उठता। बहुमूल्य द्रव्योंसे
बना हुआ वह सर्वोत्तम प्रसाद था, इसलिये श्रीजगन्नाथके
सेवकोंने महाप्रभुको उसमेंसे थोड़ा-सा अपने समक्ष
खिलानेका प्रयत्न किया॥89-91॥
महाप्रभुके द्वारा थोड़ासा महाप्रसाद-ग्रहण :-
तार अल्प लञा प्रभु जिह्वाते यदि दिला।
आर सब गोविन्देर आँचले बान्धिला ॥92॥
महाप्रसादके आस्वादनसे महाप्रभुमें
विस्मय और सात्त्विक विकार :-
कोटिअमृत-स्वाद पाञा प्रभुर चमत्कार।
सर्वाङ्गे पुलक, नेत्रे बहे अश्रुधार ॥93॥
श्रीकृष्णका अधरामृत जानकर प्रेमावेश;
ऐश्वर्याश्रित सेवकोंके दर्शनसे सङ्कोपन :-
'एइ द्रव्ये एत स्वाद काहाँ हैते आइल?
कृष्णेर अधरामृत इथे सञ्चारिल ॥'94॥
एइ बुद्धये महाप्रभुर प्रेमावेश हैल।
जगन्नाथेर सेवक देखि' सम्वरण कैल ॥95॥
अनुवाद-महाप्रभुने उस प्रसादमें-से थोड़ा-सा लेकर
अपनी जिह्वापर रखा और बाकी प्रसाद उन्होंने
श्रीगोविन्दके आँचलमें बाँध दिया। वे उस अल्प प्रसादमें
करोड़ों अमृतका आस्वादन प्राप्त करके आश्चर्यचकित
हो उठे। उनके समस्त अङ्गोंमें पुलक उदित हो गये
और उनके नेत्रोंसे अश्रुओंकी अविरल धारा प्रवाहित
होने लगी। 'इस प्रसादमें इतना स्वाद कहाँसे आया ?
अवश्य ही इसमें कृष्णका अधरामृत सञ्चारित हुआ
है।'-ऐसा विचार मनमें आनेसे वे प्रेमाविष्ट हो गये,
किन्तु श्रीजगन्नाथके सेवकोंको अपने सामने देखकर
उन्होंने अपने भावोंको सम्वरण कर लिया॥92-95॥
भक्ति-उन्मुखी महासुकृतिके फलसे महाप्रसादकी प्राप्ति;
अज्ञ जगन्नाथके सेवकोंके द्वारा प्रश्न :-
“सुकृति-लभ्य फेला-लव” बलेन बारबार।
ईश्वर-सेवक पुछे,-“कि अर्थ इहार ?? ”96॥
अनुवाद-महाप्रभु बार बार कहने लगे,-“फेलाका
लेशमात्र [भक्ति-उन्मुखी] महासुकृतिसे प्राप्त होता है।”
इसे सुनकर श्रीजगन्नाथदेवके सेवक पूछने लगे,-“इसका
क्या अर्थ है?”96॥
अनुभाष्य-महाभारतमें और स्कन्दपुराणके उत्कल
खण्डमें वर्णन आता है-
“महाप्रसादे गोविन्दे नामब्रह्मणि वैष्णवे।
स्वल्पपुण्यवतां राजन् विश्वासो नैव जायते॥”
[अर्थात् “हे राजन्! अल्प सुकृतिवान् व्यक्तिका
महाप्रसाद, गोविन्द, भगवन्नाम और वैष्णव-इन चार
वस्तुओंमें विश्वास नहीं होता।”]॥96॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णके उच्छिष्ट अथवा
महाप्रसादके माहात्म्यकी व्याख्या :-
प्रभु कहे,-“एइ ये दिला कृष्णाधरामृत।
ब्रह्मादि-दुर्लभ एइ निन्दये ‘अमृत’ ! ! 97॥
फेला अथवा महाप्रसादकी संज्ञा :-
कृष्णेर ये भुक्त-शेष, तार ‘फेला’-नाम।
तार एक ‘लव’ ये पाय, सेइ भाग्यवान् ॥98॥
कर्म-उन्मुखी और भक्ति-उन्मुखी-सुकृतिके
फलके वैशिष्ट्यका वर्णन :-
[ 16/97-106 सोलहवाँ अध्याय 409
सामान्य भाग्य हैते तार प्राप्ति नाहि हय।
कृष्णेर याँते पूर्ण कृपा, सेइ ताहा पाय॥99॥
(भक्ति-उन्मुखी) सुकृति-शब्दका अर्थ :-
‘सुकृति’-शब्दे कहे ‘कृष्णकृपा-हेतु पुण्य’।
सेइ याँर हय, ‘फेला’ पाय सेइ धन्य॥"100॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,–“आप लोगोंने मुझे जो
श्रीकृष्णका अधरामृत प्रदान किया है, वह ब्रह्मादिके
लिये भी दुर्लभ और 'अमृत'के माधुर्यको भी पराभूत
करनेवाला है! श्रीकृष्णके द्वारा भुक्त भोगके उच्छिष्टका
नाम ही 'फेला' है। जो उसके एक कणको भी प्राप्त
करता है, वह भाग्यवान् है। सामान्य भाग्य होनेपर उस
फेलाकी प्राप्ति नहीं होती, जिनपर श्रीकृष्णकी पूर्ण कृपा
होती है, वे ही इसे प्राप्त करते हैं। सुकृति शब्दका
अर्थ 'श्रीकृष्णकी कृपाको प्राप्त करने हेतु पुण्य' है,
जिसकी ऐसी सुकृति होती है, वह धन्य व्यक्ति ही
'फेला'को प्राप्त करता है॥"97-100॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जिस पवित्र कर्मसे कृष्णकृपा
उत्पन्न होती है, उसे (भक्ति-उन्मुखी) 'सुकृति' कहते
हैं॥100॥
अनुभाष्य–'सामान्य भाग्य',-कर्मफलसे उत्पन्न
सौभाग्य॥99॥
उपलभोग देखनेके बाद महाप्रभुका
अपने वासस्थानपर आगमन :-
एत बलि' प्रभु ता-सबारे विदाय दिला।
उपल-भोग देखिया प्रभु निज-वासा आइला॥101॥
अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने उन सबको विदायी
दी। महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवके उपल-भोगको देखनेके
पश्चात् अपने वासस्थानपर आ गये॥101॥
श्रीकृष्णके उच्छिष्टके माधुर्यकी स्मृति :-
मध्याह्न करिया कैला भिक्षा निर्वाहण।
कृष्णाधरामृत सदा अन्तरे स्मरण॥102॥
अनुवाद-महाप्रभुने मध्याह्न कृत्य करनेके पश्चात्
भोजन ग्रहण किया, किन्तु उनके हृदयमें निरन्तर
श्रीकृष्णके अधरामृतकी स्मृति बनी रही॥102॥
प्रेमावेश और कठिनाईसे उसका सम्वरण :-
बाह्य-कृत्य करेन, प्रेमे गर-गर मन।
कष्टे सम्वरण करेन, आवेश सघन॥103॥
अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु बाहरके तो सब कार्य
कर रहे थे, किन्तु उनका मन प्रेममें गद्गद हो रहा
था। महाप्रभु अपने मनको बहुत कठिनाईसे सम्वरण
करनेका प्रयास कर रहे थे, किन्तु वह प्रबल आवेशके
अधीन हो रहा था॥103॥
सन्ध्याके बाद भक्तोंके साथ श्रीकृष्ण-कथाका आलाप :-
सन्ध्या-कृत्य करि' पुनः निजगण-सङ्गे।
निभृते बसिला नाना कृष्णकथा-रङ्गे॥104॥
अनुवाद-महाप्रभु अपने सन्ध्या-कृत्य करके एकान्तमें
बैठकर अपने भक्तोंके साथ आनन्दपूर्वक कृष्णकथाकी
चर्चा करने लगे॥104॥
श्रीपुरी, श्रीभारती, श्रीस्वरूप, श्रीराय और श्रीभट्टाचार्यादि
भक्तगणोंको श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रसाद प्रदान :-
प्रभुर इङ्गिते गोविन्द प्रसाद आनिला।
पुरी-भारतीरे प्रभु किछु पाठाइला॥105॥
अनुवाद-महाप्रभुके सङ्केतसे श्रीगोविन्द गोपाल-वल्लभ
प्रसाद लेकर आये। महाप्रभुने उसमेंसे कुछ प्रसाद
श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारतीके पास
भेजा॥105॥
रामानन्द-सार्वभौम-स्वरूपादि-गणे।
सबारे प्रसाद दिल करिया बन्ट्ने॥106॥
अनुवाद-बाकी प्रसादको महाप्रभुने श्रीरामानन्द
राय, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीस्वरूप दामोदर आदि
भक्तोंमें बाँट दिया॥106॥
410 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/107-115 ]
अलौकिक प्रसादके आस्वादनसे सभीका विस्मय :-
प्रसादेर सौरभ्य-माधुर्य करि' आस्वादन।
अलौकिक आस्वादे सबार विस्मय हैल मन ॥ 107 ॥
अनुवाद-प्रसादकी सुगन्ध और मधुरताका आस्वादन
करके उसके अलौकिक स्वादसे उनके मनमें बड़ा
आश्चर्य हुआ ॥ 107 ॥
महाप्रभुके द्वारा बद्धजीवके प्राकृत भोग्य-द्रव्य और
श्रीकृष्णके चित्-इन्द्रिय-भोग्य अप्राकृत चित्-उपकरण
नैवेद्यमें गुण-भेदका वर्णन :-
प्रभु कहे,—“एइ सब हय प्राकृत द्रव्य।
ऐक्षव, कर्पूर, मरिच, एलाइच, लवङ्ग, गव्य ॥ 108 ॥
रसवास, गुड़त्वक-आदि यत सब।
'प्राकृत' वस्तुर स्वाद सबार अनुभव ॥ 109 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,–“गुड़, कर्पूर, काली मिर्च,
इलाइची, लौंग, घी, सुगन्धित रसयुक्त इलायची और
दालचीनी आदि सब द्रव्य तो प्राकृत हैं। सभीको ही
प्राकृत-वस्तुओंके स्वादका अनुभव है ॥ 108-109 ॥
अनुभाष्य–'ऐक्षव',-गन्नेसे बना गुड़ अथवा चीनी;
'गव्य'-दूध, घी आदि ॥ 108 ॥
अनुभाष्य- 'रसवास',-सुगन्ध और रसयुक्त इलायची
और लौंग; 'गुड़त्वक',-दालचीनी; 'प्राकृत',-बद्धजीवके
स्व-सुख-विधानकी इच्छापर आधारित जो सब वस्तुएँ
उनकी इन्द्रियोंके भोगके लिये हैं, – वे सब खण्ड
(अपूर्ण), सीमित, नश्वर अथवा कालके साथ नष्ट
होनेवाले जड़ीय द्रव्य हैं ॥ 109 ॥
एइ द्रव्ये एत आस्वाद, गन्ध लोकातीत।
आस्वाद करिया देख, – सबार प्रतीत ॥ 110 ॥
श्रीकृष्णके उच्छिष्ट महाप्रसादका चिद्बल :-
आस्वाद दूरे रहु, गन्धे माते मन।
आपना बिना अन्य माधुर्य कराय विस्मरण ॥ 111 ॥
श्रीकृष्णके अधरके स्पर्शकी महिमा :-
ताते एइ द्रव्ये कृष्णाधरस्पर्श हैल।
अधरेर गुण सब इहाते सञ्चारिल ॥ 112 ॥
श्रीकृष्णके ओष्ठसे स्पर्श हुए चित्-उपकरण-
भक्तोंकी चित्-इन्द्रियोंके उन्मादक :-
अलौकिक-गन्ध-स्वाद अन्य-विस्मारण।
महा-मादक हय एइ कृष्णाधरेर गुण ॥ 113 ॥
सभीको अप्राकृत श्रद्धाके साथ
प्रसादका सम्मान करनेका आदेश :-
अनेक 'सुकृते' इहा हञाछे सम्प्राप्ति।
सबे एइ आस्वाद कर करि' महाभक्ति ॥”114 ॥
अनुवाद-किन्तु इन्हीं (प्राकृत) द्रव्योंसे युक्त
श्रीजगन्नाथके प्रसादका ऐसा अद्भुत स्वाद और अलौकिक
सुगन्ध है। इसका आस्वादन करके देखो, आपको स्वयं
ही इस बातका अनुभव होगा। इस प्रसादके आस्वादनकी
बात तो दूर रहे, इसकी सुगन्धसे ही मन मतवाला हो
जाता है। यह प्रसाद अपने अतिरिक्त अन्य सब
वस्तुओंकी मधुरताको सम्पूर्ण रूपमें भुला देता है।
इसीसे प्रमाणित होता है कि इन द्रव्योंसे श्रीकृष्णके
अधरोंका स्पर्श हुआ है और श्रीकृष्णके अधरोंके
समस्त गुण इस प्रसादमें सञ्चारित हो गये हैं।
अलौकिक सुगन्ध और स्वादका महा-मादक होना जो
अन्य वस्तुओंके स्वादको विस्मृत करवा दे, वास्तवमें
वह श्रीकृष्णके अधरोंका ही गुण है। अनेक सुकृतियोंके
फलसे इस गोपाल-वल्लभ महाप्रसादकी प्राप्ति हुई है।
आप सभी महा-भक्तिपूर्वक इस प्रसादका आस्वादन
करो॥”110-114 ॥
श्रीकृष्णके अधरामृतके आस्वादनसे सभीमें प्रेमावेश :-
हरिध्वनि करि' सबे कैला आस्वादन।
आस्वादिते प्रेमे मत्त हइल सबार मन ॥ 115 ॥
अनुवाद-उच्च स्वरसे हरिध्वनि करते हुए सभीने
उस प्रसादका आस्वादन किया। प्रसादका आस्वादन
करते ही सभी भक्तोंका मन प्रेममें मत्त हो उठा ॥ 115 ॥
[ 16/116-119
सोलहवाँ अध्याय
411
महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीरायके द्वारा श्लोकका पाठ :-
प्रेमावेशे महाप्रभु यबे आज्ञा दिला।
रामानन्द-राय श्लोक पड़िते लागिला ॥ 116 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने प्रेममें आविष्ट होकर जब श्रीरामानन्द रायको श्लोक सुनानेके लिये आदेश दिया, तब उन्होंने यह श्लोक पढ़ा ॥ 116 ॥
गोपियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अधरामृतकी याचना (चित्रजल्प) :-
श्रीमद्भागवत (10/31/14)में -
सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठुचुम्बितम्।
इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥ 117 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 117 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे वीर, तुम्हारे प्रेमको वर्धित करनेवाला, जगत्के शोकका नाश करनेवाला, स्वरयुक्त वेणुके द्वारा सुन्दररूपसे चुम्बित और चित्तसे अतिरिक्त अन्य वस्तुओंके प्रति रागको भुला देनेवाला तुम्हारा जो अधरामृत है, उसे हमें प्रदान करो॥ 117॥
अनुभाष्य-रासलीलाके समय कृष्णके अचानक अन्तर्धान होनेसे कृष्णमें ही अपने प्राणोंको अर्पित करनेवाली गोपियाँ कृष्णके विरहमें अत्यन्त कातर होकर रासस्थलीसे यमुनातटपर आकर इस प्रकार विलाप कर रही हैं-
हे वीर (दानवीर,) सुरतवर्धनं (सम्भोगेच्छां वर्धयति यत्तत्) शोकनाशनं (अप्राप्तिजन्यदुःखध्वंसकं) स्वरितवेणुना (स्वरितेन नादितेन वेणुना) सुष्ठुचुम्बितं (नादामृत-वासितं) नृणाम् इतररागविस्मारणम् (इतरेषु कृष्णेतर-विषयसुखेषु यः रागः इच्छा, तत् विस्मारयति विलोपयति इति तथा तत्) ते (तव) अधरामृतम् (अधर एव अमृतं) नः (अस्माकं) वितर (देहि)।
श्लोक-भावानुवाद-हे दानवीर, सम्भोग इच्छाको वर्धित करनेवाले, तुम्हारी अप्राप्तिसे उत्पन्न दुःखको ध्वंस करनेवाले, नादयुक्त वेणुके द्वारा नादामृतसे सुवासित, मनुष्योंको अपनेसे (कृष्णसे) अतिरिक्त विषयसुखोंकी इच्छाओंको विलुप्त कर देनेवाले अपने अधरामृतको हमें प्रदान करो ॥ 117 ॥
स्वयं महाप्रभुके द्वारा उसीके सूचक श्लोकका पाठ :-
श्लोक शुनि' महाप्रभु महातुष्ट हैला।
राधार उत्कण्ठा-श्लोक पड़िते लागिला ॥ 118 ॥
अनुवाद-महाप्रभु श्रीरामानन्द रायके मुखसे श्लोक सुनकर बहुत सन्तुष्ट हुए। तब वे स्वयं श्रीराधाके द्वारा उत्कण्ठाकी अवस्थामें कथित श्लोकका पाठ करने लगे ॥ 118 ॥
श्रीकृष्ण-सेवोन्मुख चित्-जिह्वाके लोभको वर्धित करनेवाला श्रीकृष्ण-फेला-लवामृत :-
गोविन्दलीलामृत (8/8)में विशाखाके प्रति श्रीराधाके वचन-
व्रजातुलकुलाङ्गनेतर-रसालितृष्णाहर-
प्रदीव्यदधरामृतः सुकृतिलभ्य-फेलालवः।
सुधाजिदहिवल्लिका-सुदलवीटिका-चर्वितः
स मे मदनमोहनः सखि तनोति जिह्वा-स्पृहाम् ॥ 119 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 119 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखि, जिनका अधरामृत-व्रजकी अतुलनीया कुलाङ्गनाओंके अन्यान्य रससमूहोंमें तृष्णाका हरण करनेवाला है, जिनका फेलाकण-सुकृतिसे ही प्राप्त होता है, अमृतको भी पराजित करनेवाले ताम्बुलका चर्वण करनेवाले वे मदनमोहन मेरी जिह्वाकी स्पृहाका विस्तार कर रहे हैं ॥ 119 ॥
अनुभाष्य-
हे सखि, यः व्रजातुलकुलाङ्गनेतररसालितृष्णाहरप्रदीव्यदधरामृतः (व्रजे याः अतुलाः निरुपमाः कुलाङ्गनाः ब्रजवध्वः तासाम् इतरेषु रसालिषु या तृष्णा तां हर्तुं शीलं यस्य तत् प्रदीव्यत् प्रकृष्टरूपेण सर्वोपरि शोभमानम् अधरामृतं यस्य सः) सुकृतिलभ्य-फेला-लवः (सुकृतिभिः सौभाग्यवद्भिः लभ्यः प्राप्यः फेलायाः अधरसुधायाः लवः स्वल्पांशः यस्य सः) सुधाजिदहिवल्लिका-सुदलवीटिका-चर्वितः (सुधाजित् अमृतनिन्दितं तथा अहिवल्लिका ताम्बुलवल्ली तस्यां सुदलैः शोभनपत्रैः निर्मिता याः वीटिकाः तासां चर्वितं चर्वणं यस्य सः) मदनमोहनः [स्व-फेलया] जिह्वा-स्पृहां (सेवोन्मुखी-जिह्वालोल्यं) तनोति (वर्धयति)।
412 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/119–132 ]
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 119॥ तबे मोरे क्रोध करि', लज्जा, भय, धर्म छाड़ि',
छाड़ि' दिमु, कर आसि' पान।
महाप्रभुके द्वारा दोनों श्लोकोंकी व्याख्या :-
एत कहि' गौरप्रभु भावाविष्ट हञा। नहे पिमु निरन्तर, तोमाय मोर नाहिक डर,
दुइ श्लोकेर अर्थ करे प्रलाप करिया॥ 120॥ अन्ये देखों तृणेर समान॥' 126॥
वेणु और अधरामृतके सम्मिलित
अनुवाद—यह कहकर श्रीगौराङ्ग महाप्रभु भावाविष्ट बलके प्रयोगका फल :-
होकर प्रलाप करते हुए उपरोक्त दोनों श्लोकोंका अर्थ अधरामृत निज-स्वरे, सञ्चारिया सेइ बले,
करने लगे॥ 120॥ आकर्षय त्रिजगत्-जन।
आमरा धर्मे भय करि', रहि यदि धैर्य धरि',
प्रथम श्लोककी व्याख्या; तबे आमाय करे विड़म्बन॥ 127॥
श्रीकृष्णधरामृतके चिद्बलका वर्णन :-
यथा राग— नीवि खसाय गुरु-आगे, लज्जा-धर्म कराय त्यागे,
“तनु-मन कराय क्षोभ, बाड़ाय सुरत-लोभ, केशे धरि' येन लञा याय।
हर्ष-शोकादि-भार विनाशय। आनि' कथाय तोमार दासी, शुनि' लोक करे हासि,
पासराय अन्य रस, जगत् करे आत्मवश, एइ मत नारीरे नाचाय॥ 128॥
लज्जा, धर्म, धैर्य करे क्षय॥ 121॥
श्रीराधा आदिका मौन-भाव :-
नागर, शुन तोमार अधर-चरित। शुष्क बाँशेर लाठिखान, एत करे अपमान,
माताय नारीर मन, जिह्वा करे आकर्षण, एइ दशा करिल गोसाञि।
विचारिते सब विपरीत॥ 122॥ ध्रु॥ ना सहिं' कि करिते पारि, ताहे रहि मौन धरि',
आछुक नारीर काय, कहिते वासिये लाज, चोरार माके डाकि' कान्दिते नाइ॥ 129॥
तोमार अधर बड़ धृष्ट-राय।
पुरुषे करे आकर्षण, आपना पियाइते मन, द्वितीय श्लोककी व्याख्या; श्रीकृष्णके
अधरामृतके माहात्म्यका वर्णन :-
अन्यरस सब पासराय॥ 123॥ अधरेर एइ रीति, आर शुन
श्रीकृष्णके वेणुके प्रति श्रीराधाकी ईर्ष्या :- कुनीति,
सचेतन रहु दूरे, अचेतन सचेतन करे, से अधर-सने यार मेला।
तोमार अधर—बड़ बाजिकर। सेइ भक्ष्य-भोज्य-पान, हय अमृत-समान,
तोमार वेणु शुष्केन्धन, तार जन्माय इन्द्रिय-मन, नाम तार हय 'कृष्ण-फेला'॥ 130॥
तारे आपना पियाय निरन्तर॥ 124॥ से फेलार एक लव, ना पाय देवता सब,
वेणु धृष्ट-पुरुष हञा, पुरुषाधर पिया पिया, ए दम्भे केबा पातियाय?
गोपीगणे जानाय निज-पान। बहु जन्म पुण्य करे, तार 'सुकृति' नाम धरे,
'ओहे, शुन, गोपीगण, बले पिउने तोमार धन, से 'सुकृते' तार लव पाय॥ 131॥
तोमार यदि थाके अभिमान॥ 125॥ कृष्ण ये खाय ताम्बुल, कहे तार नाहि मूल,
[ 16/121-133
सोलहवाँ अध्याय
413
ताहे आर दम्भ-परिपाटी।
तार येबा उद्गार, तारे कय 'अमृत-सार',
गोपीर मुख करे 'आलबाटी' ॥ 132 ॥
एसब—तोमार कुटिनाटि, छाड़ एइ परिपाटी,
वेणुद्वारे काँहे हर प्राण।
आपनार हासि लागि', नह नारीर वधभागी,
देह' निजाधरामृत दान ॥" 133 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 121–133 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे नागर, तुम्हारे अधरके चरित्रका वर्णन कर रही हूँ, तुम सुनो। वह लोगोंके तन और मनको क्षोभित करता है, कन्दर्पके लोभकी वृद्धि करता है, हर्ष-शोक आदिके भारका विनाश करता है, अन्य रसोंको भुला देता है, जगत्को अपने वशमें कर लेता है, लज्जा, धर्म और धैर्यका क्षय कर देता है, नारियोंके मनको मत्त कर देता है और जिह्वाकी लालसा वर्धित कराकर उसका आकर्षण करता है, विचार करनेपर मैं उसका सबकुछ ही विपरीत देखती हूँ। हे कृष्ण,—तुम पुरुष हो, तुम्हारा अधरामृत नारियोंका मन आकर्षित करेगा,—यही नियम है; किन्तु वह पुरुषरूपी वेणुको आकर्षित करके स्वयंको पान करवाकर अन्य समस्त रसोंको भुला देता है; सचेतनकी तो बात दूर रहे, अचेतनको भी सचेतन कर देता है, अतएव तुम्हारा अधर—एक महा-जादूगर है। और भी विपरीत बात देखो,—तुम्हारा जो वेणु है, वह—सूखी लकड़ी मात्र है; तुम्हारा अधरामृत वेणुको निरन्तर स्वयंका पान करवाकर उसकी इन्द्रियों और मनको प्रस्तुत करके (चेतनवृत्तिसे युक्त करके) उसे सुख देता है। वह वेणु धृष्ट पुरुषके रूपमें स्वयं पुरुषाधरका (पुनः पुनः) पान करके अपने पीनेकी घोषणा करता है और ऐसा कहता है,—'ओहे गोपियों, तुममें यदि 'स्त्री' होनेका अभिमान हो, तो फिर पुरुषके अधरामृतरूपी अपने निज-धनका पान करो।' राधिका कह रही हैं,—“वह वेणु मेरे प्रति क्रोध करते हुए कहता है, तुम लज्जा-भयको छोड़कर इसका पान करो, तभी मैं (तुम्हारे लिये यह अधर) छोड़ दूँगा; और यदि तुम लज्जा-भयको नहीं छोड़ोगी, तब मैं ही निरन्तर पान करूँगा; कृष्ण-अधरामृतमें तुम्हारा विशेष अधिकार देखकर मुझे थोड़ा भय होता है; अन्य सभीको तो मैं तृणके समान देखता हूँ।” वह वेणु अपने स्वरमें अधरामृतका सञ्चार करके अर्थात् उसके साथ मिलकर (एकसाथ बल लगाकर) इस प्रकार त्रिजगत्को आकर्षित करता है। हम गोपियाँ यदि धर्मका भय करके धैर्य धारण करती हैं, तब फिर हमारा उपहास करता है; यहाँ तक कि हमारा लज्जा-धर्म छुड़वाकर हमारे गुरुजनोंके सामने ही हमारी नीवि अर्थात् हमारे कमरके नाड़ेको नीचे खिसका देता है,—हमें जैसे केशोंसे पकड़कर ले जाता है,—हमें तुम्हारी दासी बना देता है; लोग इसे सुनकर हास्य किया करते हैं (इस प्रकार गोपियोंको अपनी इच्छानुसार चलाता है)। वेणु सूखी बाँसकी लकड़ी मात्र होनेपर भी (प्रभुरूपमें) हमारा अपमान करके हमारी ऐसी दशा कर देता है। हम इसे सहन करनेके अतिरिक्त और कर भी क्या सकती हैं? चोरको दण्ड देनेपर उसकी माँ जिस प्रकार (रक्षा अथवा निरपेक्ष विचारके लिये अन्य व्यक्तियोंको) बुलाकर चीत्कार करते हुए रो नहीं सकती (अर्थात् उसके लिये अन्य लोगोंको बुलाकर रोना उचित नहीं है,) मैं भी उसी प्रकार मौन धारण करके रहती हूँ,—अधरकी ऐसी ही रीति है। अधरके साथ जिसका मिलन है, उसकी कुनीतिका पुनः श्रवण करो;—उस अधरसे स्पर्श हुआ भक्ष्य [दाँतके द्वारा खण्डित होनेवाले चना आदि], भोज्य [चावल आदि] और पीनेवाले द्रव्य अमृतके समान होनेके कारण 'कृष्णफेला' नाम धारण करते हैं। देवता आराधना करके भी उस फेलाका एक-कण भी प्राप्त नहीं कर पाते। उसपर, फेलाका ऐसा दम्भ है कि उसपर साधारण लोग विश्वास नहीं कर सकते; क्योंकि, बहुत जन्मोंके पुण्योंके फलस्वरूप जो भक्ति-उन्मुखी सुकृति प्राप्त होती है, उसी 'सुकृति'के बलसे ही सेवक
414 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/121-140 ]
कृष्णफेलाके लव अथवा कणको प्राप्त करते हैं।
कृष्णके द्वारा चबाये गये ताम्बुल (पान)-प्रसादके
उद्गारको 'अमृतसार' कहते हैं; गोपियोंका मुख—उसे
रखनेकी आलवाटी अर्थात् पीकदानीके समान है।
अतएव हे श्याम, तुम अपनी इस कुटीनाटीकी
परिपाटीका (कुशलताका) परित्याग करो; वेणुके द्वारा
गोपियोंके प्राणोंका नाश मत करो; तुम हँसते-हँसते
नारियोंके वधके भागीदार मत बनो, हमें अपना
अधरामृत दान करो।
'आपणार हासि लागि',—प्रथम अर्थ यह है कि
नारीके वधके भागीदार होनेके कारण आपकी ही निन्दा
होगी, वैसा नहीं करके अपना अधरामृत दो; दूसरा
अर्थ यह है कि अपने कौतुकके लिये नारीका वध मत
करो ॥ 121-133 ॥
अनुभाष्य—'भार विनाशय',—पाठान्तरमें 'भाव विलास्य'
और 'भाव-विनाशय'। 'धृष्ट-राय',—प्रगल्भ अथवा उद्धत-
प्रधान। 'नीवि',—कटिबन्ध, वस्त्रको बाँधनेवाला नाड़ा;
'खसाय',—खोल देता है। 'मेला',—मिलन। 'पातिआय',—प्रतीति
होती है। 'आलबाटी',—लारकी कटोरी, पीकदानी।
'कुटिनाटि',—कपटता; 'परिपाटी',—कारीगिरि, निपुणता,
कुशलता ॥ 121-133 ॥
महाप्रभुकी उत्कण्ठा :—
कहिते कहिते प्रभुर मन फिरि' गेल।
क्रोध मन शान्त हैल, उत्कण्ठा बाड़िल ॥ 134 ॥
अनुवाद—इस प्रकार कहते-कहते श्रीगौरहरिका
मन बदल गया। उनके मनका क्रोध शान्त हो गया
और उत्कण्ठा बढ़ गयी॥ 134 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्ण-अधरामृतकी
परम-महिमाका कीर्तन :—
“परम दुर्लभ एइ कृष्णाधरामृत।
ताहा येइ पाय, तार सफल जीवित ॥ 135 ॥
योग्य हञा केह करिते ना पाय पान।
तथापि से निर्लज्ज, वृथा धरे प्राण ॥ 136 ॥
अयोग्य हञा ताहा केह सदा पान करे।
योग्य जन नाहि पाय, लोभे मात्र मरे ॥ 137 ॥
ताते जानि,—कोन तपस्यार आछे बल।
अयोग्येरे देओयाय कृष्णाधरामृत-फल ॥ 138 ॥
महाप्रभुके आदेशसे श्रीरायके द्वारा श्लोकका पाठ :—
कह राम राय, किछु शुनिते हय मन।”
भाव जानि' पड़े राय गोपीर वचन ॥ 139 ॥
अनुवाद—महाप्रभु आगे कहने लगे,—“श्रीकृष्णका
अधरामृत परम दुर्लभ है, उसे जो प्राप्त करता है,
उसीका जन्म सफल है। यदि कोई व्यक्ति योग्य होनेपर
भी उस अधरामृतको पान नहीं कर पाता, तो वह
निर्लज्ज व्यर्थ ही अपने प्राणोंको धारण करता है। और
ऐसे भी व्यक्ति हैं जो अयोग्य होनेपर भी उस
अधरामृतका सदैव पान करते हैं। कुछ योग्य व्यक्ति
उसे नहीं पाकर उसकी लालसामें ही मरते हैं। इससे
यह जाना जाता है कि अयोग्य दिखलायी देनेवालेमें भी
किसी तपस्याका बल है, जो उसे कृष्ण-अधरामृतरूपी
फल प्रदान कराता है। हे रामानन्द राय! मेरा कुछ
श्रवण करनेका मन है।” महाप्रभुके भावको जानकर
श्रीरायने गोपियोंके वचनका पाठ किया॥ 135-139॥
गोपियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अधरके
स्पर्शसे सुखी वेणुकी प्रशंसा :—
श्रीमद्भागवत (10/21/9) में—
गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणु-
र्दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्।
भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं हृदिन्यो
हृष्यत्त्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवो यथार्याः॥ 140 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 140 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—[किसी एक गोपीने अन्य गोपियोंसे
कहा,—] हे गोपियों, इस वेणुने क्या सुकृति की थी कि
[ 16/140-149 सोलहवाँ अध्याय 415
यह गोपियोंको प्राप्त होनेवाले कृष्णकी अधरसुधाका
भोग कर रहा है? आर्य व्यक्ति जिस प्रकार (किसी
भगवद्भक्त) श्रेष्ठ सन्तानका (जन्म देखकर उसके लिये
आनन्दमें अश्रु विसर्जित) करता है, उसी प्रकार यह
वेणु जिन (सब नदियोंके) जलसे पुष्ट हुआ है, (वे
सब नदियाँ अपने-अपने ऊपरी भागमें स्थित विकसित
कमलसमूहरूपी रोमसमूहके द्वारा प्रसन्न हो रही हैं) एवं
जिस वृक्षसे इसका जन्म हुआ है, उसी जातिके समस्त
वृक्ष ही आनन्दवशतः मधुधारारूपी अश्रु बहा रहे
हैं॥ 140॥
अनुभाष्य—व्रजमें शरत्कालके उपस्थित होनेपर
श्रीकृष्णके द्वारा वनमें गोचारण करते हुए वंशीकी ध्वनि
करनेपर गोपियाँ कृष्णसङ्गके लिये कामातुर होकर
कृष्णकी मनोहर गुणावलीका गान करके इधर-उधर
भ्रमण करते करते कृष्णके वेणुके सौभाग्यका वर्णन
कर रही हैं—
अन्या अन्या ऊचुः—हे गोप्यः, अयं वेणुः किं कुशलं
(पुण्यम्) आचरत् (अनुष्ठितवान्) स्म, यत् (यस्मात्) गोपिकानाम्
(एव भोग्यां सतीमपि) दामोदराधरासुधां (कृष्णाधरामृतं) स्वयं
(स्वातन्त्र्येण) अवशिष्टरसं (केवलमवशिष्टरसमात्रं यथा भवति,
तथा) भुङ्क्ते; ह्रदिन्यः (यासां पयसा पुष्टः ताः मातृतुल्याः
नद्यः) हृष्यत्त्वचः (जात-रोमहर्षाः विकसितकमलवन-मिषेण
रोमाञ्चिताः) [लक्ष्यन्ते]; आर्याः (कुलवृद्धाः) यथा [स्ववंशे
भगवत्सेवकं दृष्ट्वा पुलकिताः सन्तः अश्रु मुञ्चन्ति, तद्वत्]
तरवः (येषां वंशे स जातः ते) अश्रु (मधुधारा-मिषेण
आनन्दाश्रु) मुमुचुः।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 140॥
महाप्रभुके द्वारा भावावेशमें प्रलाप-व्याख्या :-
एइ श्लोक शुनि' प्रभु भावाविष्ट हञा।
उत्कण्ठाते अर्थ करे प्रलाप करिया॥ 141॥
अनुवाद—इस श्लोकको सुनकर महाप्रभु भावाविष्ट
हो गये और उत्कण्ठित होकर प्रलाप करते हुए उस
श्लोकका अर्थ प्रकाशित करने लगे॥ 141॥
श्लोकका अर्थ; वेणुके द्वारा श्रीकृष्णके
अधरामृतके पानके सौभाग्यको देखकर
गोपियोंमें ईर्ष्या तथापि स्तुतिपूर्ण वचन (चित्रजल्प) :-
“अहो, व्रजेन्द्रनन्दन, व्रजेर कोन कन्यागण,
अवश्य करिब परिणय।
से-सम्बन्धे गोपीगण, यारे जाने निजधन,
से सुधा अन्येर लभ्य नय॥ 142॥
गोपीगण, कह सब करिया विचारे।
कोन तीर्थ, कोन तप, कोन सिद्धमन्त्र-जप,
एइ वेणु कैल जन्मान्तरे??143॥ ध्रु॥
हेन कृष्णाधर-सुधा, ये कैल अमृत मुदा,
यार आशाय गोपी धरे प्राण।
एइ वेणु अयोग्य अति, स्थावर 'पुरुषजाति',
सेइ सुधा सदा करे पान॥ 144॥
यार धन, ना कहे तारे, पान करे बलात्कारे,
पिते तारे डाकिया जानाय।
तार तपस्यार फल, देख इहार भाग्य-बल,
इहार उच्छिष्ट महाजने खाय॥ 145॥
मानसगङ्गा, कालिन्दी, भुवन-पावनी नदी,
कृष्ण यदि ताते करे स्नान।
वेणु-झुटाधर-रस, हञा लोभे परवश,
सेइकाले हर्षे करे पान॥ 146॥
एत नदी रहु दूरे, वृक्ष सब तार तीरे,
तप करे पर-उपकारी।
नदीर शेष-रस पाञा, मूलद्वारे आकर्षिया,
केने पिये, बुझिते ना पारि॥ 147॥
निजाङ्कुरे पुलकित, पुष्पे हास्य विकसित,
मधु-मिषे बहे अश्रुधार।
वेणुरे मानि' निज जाति, आर्येर येन पुत्र-नाति,
'वैष्णव' हैले आनन्द-विकार॥ 148॥
वेणुर तप जानि यबे, सेइ तप करि तबे,
ए-अयोग्य, आमरा-योग्या नारी।
याहा ना पाञा दुःखे मरि, अयोग्य पिये सइते नारि,
416 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 16/142-149 ]
ताहा लागि' तपस्या विचारि॥" 149॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142-149 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—कोई गोपी अन्य गोपियोंसे कह
रही है,—'देखो, व्रजेन्द्रनन्दनकी यह कैसी आश्चर्यमय
लीला है। यह अवश्य ही ब्रजकी कन्याओंसे विवाह
करेगा, अतएव गोपियाँ जानती हैं कि कृष्णका
अधरामृत—उन्हींका निजधन है एवं वह अधरामृत
अन्योंका प्राप्य नहीं है।' हे गोपीगण, विचार करके देखो
कि कृष्णके इस वेणुने अपने किसी अन्य जन्ममें
अवश्य ही कोई तीर्थाटन, कोई तप अथवा किसी
सिद्धमन्त्रका जप किया था, जिसके द्वारा उसने इस
प्रकार कृष्णकी अधरसुधाको, — जिसके लिये गोपियाँ
प्राण धारण कर रही हैं, उसे—अपनी ‘अमृत मुद्रा
(धन)’ बना लिया है। यह वेणु—अतिशय अयोग्य है,
स्थावर वंशमें उत्पन्न हुआ है; उसपर भी 'पुरुषजाति'का
होकर कृष्णकी अधरसुधाका सर्वदा पान किया करता
है। यह गोपियोंका अपना धन होनेपर भी वेणु उन्हें
नहीं बतलाकर उसे बलपूर्वक पान करता है एवं
गोपियोंको उच्च स्वरसे पान करते हुए आह्वान करता
है। पुनः, इस वेणुकी तपस्याका फल और भाग्यका
बल देखो, — इसका उच्छिष्ट महाजन तक खा रहे हैं,
कृष्ण जब भुवनपावनी कलिन्द-नन्दिनी और मानसगङ्गामें
स्नान करते हैं, तब वे (यमुना एवं मानस-गङ्गारूपी
महाजन) लोभके वशीभूत होकर वेणुके उच्छिष्ट
अधररसका प्रसन्नतापूर्वक पान करती हैं। नदीकी बात
दूर रहे, उस नदीके तटपर लगे तापस [जिसके बेरसे
औषधीय तेल बनता है]—जैसे परोपकारी वृक्ष भी
किसलिये जड़के द्वारा नदीके उपभुक्त बचे हुए रसको
आकर्षित करके पान करते हैं, मैं उसे नहीं समझ पा
रही हूँ। वे सब वृक्ष अपने-अपने अङ्कुरसे पुलकित
और पुष्प-विकासके रूपमें हास्यसे विकसित होकर
'मधुमिषे' अर्थात् मधुके छलसे अश्रुधाराको बहाते हैं;
ऐसा लगता है, आर्यपुरुष अपने पुत्र-पौत्रके वैष्णव
होनेपर जिस प्रकार आनन्द-विकारको प्राप्त करते हैं,
वृक्षगण स्व-वंशीय वृक्षजातिरूपी वेणुको वैसा मानकर
कार्य कर रहे हैं। अब बात यह है कि, वेणु—अत्यन्त
अयोग्य है, किन्तु हम—योग्य नारियाँ हैं; वेणुने ऐसी
कौन-सी तपस्या की है, उसे जाननेपर हम भी वैसी
ही तपस्या करेंगी। हमारे मनकी बात यह है कि
अयोग्य वेणुको कृष्ण-अधरामृतका पान करते देखकर
हम दुःखसे मर रही हैं; इसलिये ही वेणुकी तपस्याका
[ 16/142-151 सोलहवाँ अध्याय 417
विचार कर रही हैं।
'महाजने',—मानस-गङ्गा और यमुना; ये पुण्य-नदियाँ होनेके कारण 'महाजन' हैं।
पवित्र नदी होनेपर भी यह—नदी है, इसलिये उसके द्वारा यही कार्य (अर्थात् वेणुके उच्छिष्ट कृष्णके अधरामृतके रसका पान) सम्भव हो सकता है।
'ए अयोग्य',—यह वेणु स्थावर-वस्तु है, इसलिये कृष्णके अधरामृतको प्राप्त करनेके अयोग्य है॥ 142-149॥
सोलहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—किसी-किसीके मतानुसार, 'ये कैल अमृतमुदा',—अमृतको भी जो स्वमाधुर्यके बलसे आच्छादन (पराजित) करता है। 'मधु-मिषे',—मधुधाराके छलसे (श्रीधरस्वामि-टीका देखें) ॥ 144-148 ॥
सोलहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
महाप्रभुका गोपीभावमें श्रीकृष्ण-प्रेमोन्माद :—
एतेक विलाप करि', प्रेमावेशे गौरहरि,
सङ्गे लञा स्वरूप-रामराय।
कभु नाचे, कभु गाय, भावावेशे मूर्च्छा याय,
एइरूपे रात्रि-दिन याय ॥ 150 ॥
अनुवाद—श्रीगौरहरिने इस प्रकार प्रेमावेशमें विलाप किया। महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराम force श्रीरामानन्द रायको साथमें लेकर कभी नृत्य करते, कभी गीत गाते और कभी भावावेशमें मूर्च्छित हो जाते। इस प्रकार महाप्रभुके दिन-रात व्यतीत होते ॥ 150 ॥
स्वरूप, रूप, सनातन, रघुनाथेर श्रीचरण,
शिरे धरि' करि यार आश।
चैतन्यचरितामृत, अमृत हैते परामृत,
गाय दीनहीन कृष्णदास ॥ 151 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे
कालिदासप्रसाद-विरहोन्माद-प्रलापो नाम षोड़शः परिच्छेदः।
अनुवाद—मैं, दीनहीन कृष्णदास, कृपाकी अभिलाषा करते हुए श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके श्रीचरणोंको अपने सिरपर धारण करके अमृतसे भी अत्यधिक श्रेष्ठ अमृत श्रीचैतन्यचरितामृतका गान कर रहा हूँ॥ 151 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें
कालिदासप्रसाद-विरहोन्माद-प्रलाप नामक सोलहवें
अध्यायका अनुवाद समाप्त।
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सतरहवाँ अध्याय
कथासार—अनेक प्रकारके प्रेमोन्मादके बीचमें रात्रिमें
द्वारको नहीं खोल करके तीन प्राचीरोंको लाँघकर
महाप्रभु तैलङ्गी-गायोंके बीचमें कछुएके आकारमें भूमिपर
पड़े मिले थे, यही इस अध्यायमें वर्णित हुआ है।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
गुरुके मुखसे श्रौतपन्थायें श्रीगौरकी
अप्राकृत-लीलाका वर्णन :-
लिख्यते श्रीलगौरेन्दोरत्यद्भुतमलौकिकम् ।।
यैर्दृष्टं तन्मुखाच्छ्रुत्वा दिव्योन्माद-विचेष्टितम् ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौराङ्गके अतिशय अद्भुत
अलौकिक दिव्योन्मादकी चेष्टा जिन्होंने (अपने नेत्रोंसे)
देखी है, मैं उनके मुखसे श्रवण करके ही लिख रहा
हूँ॥ 1 ॥
अनुभाष्य—
यैः (सौभाग्यवद्भिर्द्दामोदर-रघुनाथ-प्रमुखैः अन्तरङ्गैः भक्तैः)
श्रीलगौरेन्दोः (गौरचन्द्रस्य) अद्भुतम् (अश्रुतचरम्) अलौकिकम्
(अदृष्टचरं) दिव्योन्माद-विचेष्टितं (महाभावोन्मत्तेहितं) दृष्टं
(प्रत्यक्षीकृतं) तन्मुखात् (तेषां श्रीगुरूणां कीर्त्तनकारिणां श्रीमुखादेव)
तत् श्रुत्वा [मया] लिख्यते।
श्लोक-भावानुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी महाभावमें उन्मत्त
चेष्टा, जो पहले कभी सुनी और देखी नहीं गयी, उसे
महाप्रभुके जिन प्रमुख अन्तरङ्ग भक्त सौभाग्यवान्
श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने प्रत्यक्ष
देखा है, उन श्रीगुरुओंके श्रीमुखसे वर्णित उस लीलाको
श्रवण करके मैं लिख रहा हूँ॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभुकी जय
हो और समस्त गौरभक्तोंकी जय हो॥ 2 ॥
महाप्रभुका उन्माद और प्रलाप :-
एइमत महाप्रभु रात्रि-दिवसे।
उन्मादेर चेष्टा प्रलाप करे प्रेमावेशे ॥ 3 ॥
अनुवाद—इसी प्रकार महाप्रभुकी रात-दिन चेष्टाएँ
उन्मत्तकी भाँति होतीं और वे प्रेमके आवेशमें प्रलाप
करते ॥ 3 ॥
महाप्रभुके तत्कालीन नित्यसङ्गी :-
एकदिन प्रभु स्वरूप-रामानन्द-सङ्गे।
अर्द्धरात्रि गोञाइला कृष्णकथा-रङ्गे ॥ 4 ॥
अनुवाद—एकदिन महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदर और
श्रीरामानन्द रायके साथ आनन्दपूर्वक कृष्णलीलाके
आस्वादनमें आधी रात व्यतीत कर दी॥ 4 ॥
भाव-उपयोगी गानके द्वारा श्रीस्वरूपकी महाप्रभु-सेवा :-
यबे येइ भाव प्रभु करये उदय।
भावानुरूप गीत गाय स्वरूप-महाशय ॥ 5 ॥
अनुवाद—महाप्रभुमें जब जिस प्रकारका भाव उदित
होता, तब श्रीस्वरूप दामोदर उनके भावके अनुरूप गीत
गाते ॥ 5 ॥
महाप्रभुके प्रिय ग्रन्थसे श्रीरायके द्वारा श्लोकका पाठ :-
विद्यापति, चण्डीदास, श्रीगीतगोविन्द ।
भावानुरूप श्लोक पड़ेन राय-रामानन्द ॥ 6 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द राय भी महाप्रभुके भावोंके
अनुरूप श्रीविद्यापति, श्रीचण्डीदास और श्रीगीतगोविन्दके
श्लोक पढ़ते ॥ 6 ॥
420 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/7-16 ]
स्वयं महाप्रभुके द्वारा श्लोकका
पाठ और विलापमयी उक्ति :-
मध्ये मध्ये आपने प्रभु श्लोक पड़िया।
श्लोकेर अर्थ करेन प्रभु विलाप करिया ॥ 7 ॥
अनुवाद—बीच-बीचमें स्वयं महाप्रभु भी श्लोक
पढ़ते और विलाप करते हुए श्लोकके अर्थको
प्रकाशित करते ॥ 7 ॥
महाप्रभुके शयनके बाद दोनोंका प्रस्थान :-
एइमते नानाभावे अर्द्धरात्रि हैल।
गोसाञिरे शयन कराइ' दुँहे घरे गेल ॥ 8 ॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुके अनेक प्रकारके
भावोंमें आधी रात बीत गयी। महाप्रभुको शय्यापर
लिटाकर श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द राय भी
अपने-अपने वासस्थानपर चले गये ॥ 8 ॥
महाप्रभुके द्वारा उच्च नाम-सङ्कीर्तन :-
गम्भीरार द्वारे गोविन्द करिला शयन।
अर्द्धरात्रित्रे प्रभु करेन उच्चसङ्कीर्त्तन ॥ 9 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्द गम्भीराके (महाप्रभुके कमरेके)
द्वारपर लेट गये। तब आधी रातमें महाप्रभु उच्च स्वरसे
सङ्कीर्तन करने लगे ॥ 9 ॥
महाप्रभुका दिव्योन्माद :-
आचम्बिते शुनेन प्रभु कृष्णवेणु-गान।
भावावेशे प्रभु ताँहा करिला प्रयाण ॥ 10 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने अकस्मात् श्रीकृष्णका वेणुगान
सुना। तब भावावेशमें उन्होंने जहाँ श्रीकृष्ण वेणुगान
कर रहे थे, उस स्थानकी ओर गमन किया ॥ 10 ॥
तिनद्वारे कपाट ऐछे आछे त' लागिया।
भावावेशे प्रभु गेला बाहिर हञा ॥ 11 ॥
अनुवाद—गम्भीराके तीनों द्वारोंके कपाट बन्द थे,
किन्तु भावावेशमें महाप्रभु बाहर निकलकर चले गये ॥ 11 ॥
सिंहद्वार-दक्षिणे आछे तैलङ्गी-गाभीगण।
ताँहा याइ' पड़िला प्रभु हञा अचेतन ॥ 12 ॥
अनुवाद—सिंहद्वारके दक्षिणमें तैलङ्गी (तेलगु प्रदेश
की) गायें थी, महाप्रभु वहाँ भावावेशमें अचेतन होकर
उन गायोंके बीचमें गिर पड़े ॥ 12 ॥
महाप्रभुके शब्दको नहीं सुनकर सभीके
द्वारा महाप्रभुको ढूँढ़ना और उनकी प्राप्ति :-
एथा गोविन्द प्रभुर शब्द ना पाञा।
स्वरूपे बोलाइल कपाट खुलिया ॥ 13 ॥
अनुवाद—इधर श्रीगोविन्दने महाप्रभुका कोई भी
शब्द नहीं सुनकर द्वार खोला। महाप्रभुको भीतर नहीं
देखकर श्रीगोविन्दने श्रीस्वरूप दामोदरको बुलवाया ॥ 13 ॥
तबे स्वरूप-गोसाञि सङ्गे लञा भक्तगण।
देउटि ज्वालिया करेन प्रभुर अन्वेषण ॥ 14 ॥
अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदरने मशाल जलायी
और भक्तोंको अपने साथ लेकर महाप्रभुको ढूँढ़ने
लगे ॥ 14 ॥
अनुभाष्य— 'देउटि',—दीपकाष्ठ (मशाल) ॥ 14 ॥
इति-उति अन्वेषिया सिंहद्वारे गेला।
गाभीगण-मध्ये याइ' प्रभुरे पाइला ॥ 15 ॥
अनुवाद—इधर-उधर ढूँढ़ते हुए जब वे सिंहद्वारपर
पहुँचे, तब उन्हें महाप्रभु गायोंके बीच अचेतन अवस्थामें
मिले ॥ 15 ॥
महाप्रभुकी अवस्था :-
पेटेर भितर हस्त-पाद—कूर्मेर आकार।
मुखे फेन, पुलकाङ्ग, नेत्रे अश्रुधार ॥ 16 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके हाथ और पाँव उनके पेटके
भीतर चले जानेसे उनका शरीर कछुएके आकारका हो
गया था। उनके मुखसे फेन निकल रहा था, अङ्ग
पुलकित हो रहे थे और नेत्रोंसे अश्रुओंकी धारा
[ 17/16-28 सतरहवाँ अध्याय 421
प्रवाहित हो रही थी॥16॥
अचेतन पड़ियाछेन,—येन कुष्माण्ड-फल।
बाहिरे जड़िमा, अन्तरे आनन्द-विह्वल॥17॥
अनुवाद—महाप्रभु अचेतन अवस्थामें पड़े थे, उनका
शरीर कुम्हड़ेके (काशीफलके) समान दिख रहा था।
यद्यपि महाप्रभु बाहरमें जड़वत् (निष्क्रिय) थे, किन्तु
भीतरमें वे आनन्दसे विह्वल हो रहे थे॥17॥
गाभी-सब चौदिके शुँके प्रभुर श्रीअङ्ग।
दूर कैले नाहि छाड़े प्रभुर श्रीअङ्ग-सङ्ग॥18॥
अनुवाद—सभी गायें महाप्रभुको चारों ओरसे घेरकर
उनके श्रीअङ्गोंको सूंघ रही थी। उनको वहाँसे हटानेका
प्रयास करनेपर भी वे महाप्रभुके दिव्य कलेवरको
छोड़कर पीछे नहीं हट रही थीं॥18॥
महाप्रभुकी चेतनताको सम्पादित करनेमें
बहुत प्रयत्न और घरमें लाना :-
अनेक करिला यत्न, ना हय चेतन।
प्रभुरे उठाञा घरे आनिला भक्तगण॥19॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंके द्वारा बहुत
प्रयत्न करनेपर भी महाप्रभुकी चेतनता नहीं लौटी।
सभी भक्त महाप्रभुको उसी अवस्थामें उठाकर गम्भीरामें
ले आये॥19॥
उच्च-सङ्कीर्तनसे महाप्रभुकी चेतनता
और अर्द्धबाह्यदशामें आना :-
उच्च करि' श्रवणे करे नामसङ्कीर्त्तन।
अनेकक्षणे महाप्रभु पाइला चेतन॥20॥
अनुवाद—सभी भक्त महाप्रभुके कानके निकट
उच्च स्वरसे नाम-सङ्कीर्तन करने लगे, तब बहुत देरके
बाद महाप्रभुमें चेतनता आयी॥20॥
चेतन हइले हस्त-पाद बाहिरे आइल।
पूर्ववत् यथायोग्य शरीर हइल॥21॥
अनुवाद—महाप्रभुमें चेतनता आनेपर उनके हाथ-पाँव
पेटसे बाहर आ गये, उनका दिव्य कलेवर पहलेकी
भाँति सामान्य हो गया॥21॥
श्रीस्वरूपको अपनी अवस्थाके विषयमें बतलाना :-
उठिया बसिलेन प्रभु, चाहेन इति-उति।
स्वरूपे कहेन,—“तुमि आमा आनिला कति??22॥
वेणु-शब्द शुनि' आमि गेलाङ वृन्दावन।
देखि,—गोष्ठे वेणु बाजाय व्रजेन्द्रनन्दन॥23॥
सङ्केते वेणुनादे राधा गेला कुञ्ज-घरे।
कुञ्जेरे चलिला कृष्ण क्रीड़ा करिवारे॥24॥
ताँर पाछे पाछे आमि करिनु गमन।
ताँर भूषण-ध्वनिते आमार हरिल श्रवण॥25॥
गोपीगण-सह विहार, हास-परिहास।
कण्ठध्वनि-उक्ति शुनि' मोर कर्णोल्लास॥26॥
हेनकाले तुमि सब कोलाहल करि'।
आमा लञा आइला बलात्कार करि'॥27॥
कृष्णकी ध्वनिका श्रवण करनेसे
वञ्चित महाप्रभुका विलाप :-
शुनिते ना पाइनु सेइ अमृतसम वाणी।
शुनिते ना पाइनु भूषण-मुरलीर ध्वनि॥”28॥
अनुवाद—महाप्रभु उठकर बैठ गये और इधर-उधर
देखने लगे। महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा,—“तुम
मुझे कहाँ ले आये हो? मैं वेणु-ध्वनिको सुनकर
वृन्दावन गया था, वहाँ मैंने देखा कि व्रजेन्द्रनन्दन
गायोंके चरनेके स्थानमें वेणु बजा रहे हैं। वेणुकी
ध्वनिके द्वारा किये गये सङ्केतके अनुसार श्रीराधाने
कुञ्ज-कुटीरमें प्रवेश किया और श्रीकृष्ण भी उनके
साथ क्रीड़ा करनेके लिये उस कुञ्जकी ओर चल
दिये। मैं भी श्रीकृष्णके पीछे-पीछे चलने लगा। उनके
आभूषणोंकी ध्वनिसे मेरे कान मुग्ध हो गये। उनके
द्वारा गोपियोंके साथ विहार, हास-परिहास करते समय
422 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/22-37 ]
उनके कण्ठकी ध्वनिके मेरे कानमें पड़नेपर कान
उल्लसित हो रहे थे। किन्तु उसी समय तुम सब
कोलाहल करके मुझे बलपूर्वक यहाँ ले आये। इसलिये
मैं श्रीकृष्णकी गोपियोंके साथ अमृतसम हास-परिहासकी
वाणीको और नहीं सुन पाया और न ही मैं उनके
आभूषणों और मुरलीकी ध्वनिको सुन पाया॥"22-28॥
भावावेशे स्वरूपे कहेन गद्गद-वाणी।
“कर्ण-तृष्णाय मरि, पड़ 'रसामृत' शुनि॥"29॥
अनुवाद-भावके आवेशमें महाप्रभुने गद्गद वाणीके
द्वारा श्रीस्वरूप दामोदरसे कहा,-"श्रीकृष्णके गुणोंके
श्रवणकी प्याससे मेरे कान मर रहे हैं, तुम रसामृत
पढ़कर मेरे कानोंकी प्यास बुझाओ, मैं उसे सुनना
चाहता हूँ॥"29॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'कर्ण-तृष्णाय',-कृष्णके गुणोंके
श्रवणकी प्याससे ॥ 29 ॥
श्रीगौरके आदेशसे श्रीस्वरूपके द्वारा श्लोकका पाठ :-
स्वरूप-गोसाञि प्रभुर भाव जानिया।
भागवतेर श्लोक पड़े मधुर करिया ॥ 30 ॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुके
भावको जानकर मधुर स्वरमें भागवतका एक श्लोक
पढ़ा ॥ 30 ॥
श्रीकृष्णवेणुके माधुर्यसे सब प्रकारके
सेवक ही मुग्ध और आकृष्ट :-
श्रीमद्भागवत (10/29/40) में-
का स्त्र्यङ्ग ते कलपदामृतवेणुगीत-
सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत् त्रिलोक्याम्।
त्रैलोक्य-सौभगमिदञ्च निरीक्ष्य रूपं
यद्गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यविभ्रन्॥ 31 ॥
अनुवाद-हे कृष्ण, तुम्हारे अमृतमय वेणुगीतके
द्वारा सम्मोहित होकर त्रिभुवनमें कौन-सी स्त्री आर्यचरितसे
(धर्मसे) विचलित नहीं होती? त्रिभुवनके सौभाग्य-स्वरूप
तुम्हारे इस रूपको देखकर समस्त गायें, पक्षी, वृक्ष
और हिरन भी पुलक-धारण किया करते हैं॥31॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 24/52 संख्या देखें॥31॥
गोपीभावमें आविष्ट महाप्रभुका चित्रजल्प :-
शुनि' प्रभु गोपीभावे आविष्ट हइला।
भागवतेर श्लोकार्थ करिते लागिला ॥ 32 ॥
अनुवाद-इस श्लोकको सुनकर महाप्रभु गोपीभावमें
आविष्ट हो गये और भागवतके इस श्लोकका अर्थ
करने लगे॥ 32 ॥
श्रीकृष्णके प्रति गोपियोंका अपना
भाव-वर्णन (चित्रजल्प) :-
यथा राग-
हैल गोपी भावावेश, कैल रासे परवेश,
कृष्णेर शुनि' उपेक्षा-वचन।
कृष्णेर मुख-हास्य वाणी, त्यागे ताहा सत्य मानि',
रोषे कृष्णे देन ओलाहन ॥ 33 ॥
श्लोकके अर्थका वर्णन-आरम्भ :-
“नागर, कह, तुमि करिया निश्चय।
एइ त्रिजगत् भरि', आछे यत योग्या नारी,
तोमार वेणु काँहा ना आकर्षय??34॥
वेणुके माधुर्यके बलका वर्णन-
कैला जगते वेणुध्वनि, सिद्धमन्त्रा योगिनी,
दूती हञा मोहे नारी-मन।
महोत्कण्ठा बाड़ाञा, आर्यपथ छोड़ाञा,
आनि' तोमाय करे समर्पण ॥ 35 ॥
अप्राकृत नवीन-मदन अथवा कामदेव अनङ्ग :-
धर्म छोड़ाय वेणुद्वारे, हाने कटाक्ष-कामशरे,
लज्जा भय सकल छोड़ाय।
एबे आमाय करि' रोष, कहिं 'पतित्यागे दोष',
धार्मिक हञा धर्म शिखाओ ! ! 36 ॥
अन्यकथा, अन्यमन, बाहिरे अन्य आचरण,
एइ सब शठ-परिपाटी।
तुमि जान परिहास, हय नारीर सर्वनाश,
छाड़ एइ सब कुटीनाटी ॥ 37 ॥
[ 17/33-40 सतरहवाँ अध्याय 423
वेणुनाद-अमृत-घोलेले, अमृत-समान मिठा-बोले, अनुभाष्य- 'घोलेले,'-साधारण भाषामें 'घोल खिलाती
अमृत-समान भूषण-शिञ्जित। है' अर्थात् आच्छादन अथवा पराजित करती है;
तिन अमृते हरे काण, हरे मन, हरे प्राण, पाठान्तरमें 'रोले' अर्थात् शोरसे, शब्दसे; पाठान्तरमें
केमने नारी धरिबेक चित? ?" 38 ॥ 'उगारे' अर्थात् डकारती है ॥ ३८ ॥
श्रीराधाभावमें महाप्रभुका श्रीकृष्णमाधुर्यका आस्वादन :-
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 33-38 ॥ एत कहि' क्रोधावेशे, भावेर तरङ्गे भासे,
अमृतप्रवाह भाष्य - गोपियाँ भावमें आविष्ट होकर उत्कण्ठा-सागरे डुबे मन।
रासलीलामें प्रवेश करके कृष्णके उपेक्षा-वचन अर्थात् राधार उत्कण्ठा-वाणी, पड़ि' आपने बाखानि,
उदासीनता पूर्ण वचनोंको श्रवण करके 'कृष्णने उनका कृष्णमाधुर्य करे आस्वादन ॥ 39 ॥
त्याग कर दिया' -इसे सत्य मानकर कृष्णको रोषसहित अनुवाद - श्रीराधाके भावोंकी तरङ्गोंपर डूबते-उतराते
वचन कह रही हैं, -"ओहे नागर, बोलो, इस त्रिजगत्में महाप्रभुने क्रोधके आवेशमें यह कहा और फिर उनका
जितनी योग्य नारियाँ हैं, तुम्हारी वेणु किसको आकर्षित मन उत्कण्ठाके सागरमें डूब गया। महाप्रभु श्रीराधिकाकी
नहीं करती? जगत्में तुम्हारे द्वारा वेणुध्वनि करनेपर, उत्कण्ठामयी वाणीको पढ़कर श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन
वह [ध्वनि] मन्त्रादि-सिद्धा योगिनीरूपमें दूती बनकर करते हुए स्वयं उसकी व्याख्या करने लगे ॥ ३९ ॥
नारियोंके मनको मोहित (प्रलोभित) करती है एवं
उनकी अतिशय उत्कण्ठा बढ़ाकर (पति और गुरुजनों मधुरविग्रह मदनमोहन :-
आदिकी सेवारूपी) वेद-विहित पथका परित्याग करवाकर गोविन्दलीलामृत (8/5) में-
(परकीया-कान्ताभावमें) उन्हें तुम्हारे पास समर्पित नदज्ज्वलदनिस्वनः श्रवणकर्षिसञ्छिञ्जितः
करती है। वह वेणुध्वनि और आपका कटाक्षरूपी सनर्मरससूचकाक्षरपदार्थभङ्ग्युक्तिकः।
कामबाणके द्वारा हमें विद्ध करना, हमें धर्मपथ और रमादिक-वराङ्गणा-हृदयहारि-वंशीकलः
लज्जा-भयसे छुड़ाकर तुम्हारे निकट ले आये हैं। स मे मदनमोहनः सखि तनोति कर्णस्पृहाम् ॥ 40 ॥
किन्तु पति-त्यागादि दोष दिखलाकर और करवाकर
अब तुम धार्मिक व्यक्तिकी भाँति हमें धर्मकी शिक्षा दे अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 40 ॥
रहे हो ! तुम्हारा मन-एक प्रकारका, बात - दूसरी अमृतप्रवाह भाष्य - हे सखि, जिनके कण्ठका स्वर
प्रकारकी और आचरण-तीसरे प्रकारका है। यह मेघके [मन्दगर्जनकी] भाँति गम्भीर है, जिनके आभूषणोंका
सब - शठताकी परिपाटी (कुशलतामात्र) है; तुम तो शब्द कानोंको आकर्षित करता है, जिनके नर्म-वचनोंमें
परिहास करना जानते हो, किन्तु उससे नारियोंका अनेक प्रकारकी परिपाटी है, जिनकी मुरलीध्वनि लक्ष्मी
सर्वनाश होता है, इसलिये इस सब कपटताको छोड़ो। आदि स्त्रियोंके हृदयको आकर्षित करती है, वे मदनमोहन
एक तो वेणुनादरूपी अमृतका घोल, उसपर तुम्हारी मेरे कानोंकी स्पृहाको वर्धित कर रहे हैं ॥ 40 ॥
वाक्यामृतरूपी मीठी-बोली, फिर उसपर भी अमृतके अनुभाष्य-
समान तुम्हारे आभूषणोंकी ध्वनि, - ये तीन प्रकारके हे सखि, नदज्ज्वलदनिस्वनः (नदतः गर्जनशीलस्य जलदस्य
अमृत मिलकर हमारे कान, मन और प्राणोंका हरण मेघस्य निस्वनः इव गम्भीरकण्ठध्वनिः यस्य सः) श्रवणकर्षिसत्
कर रहे हैं।" शिञ्जितः (गोपीकर्णस्य कर्षणे शीलं यस्य तत् सच्छिञ्जितः
'शिञ्जित,' - ध्वनि ॥ 33-38 ॥ सुमधुरं भूषणानां ध्वनिः यस्य सः) सनर्मरससूचकाक्षर-