सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 6/168-171 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

उनके सिद्धान्तमें निःशक्तिक-ब्रह्म—जड़मय अर्थात् 'ज्ञान',
'ज्ञेय', 'ज्ञाता',—इन तीनों अवस्थाओंसे रहित है।
जड़ाभिमानसे ग्रस्त उनका विचार-निपुणतारूपी 'अज्ञान'
प्रबल होनेके कारण वे समझते हैं कि सच्चिदानन्द
विग्रहमें भी चिन्मय 'ज्ञान', 'ज्ञेय', 'ज्ञाता'—ये धर्म नहीं
हैं। वास्तवमें अज्ञानमय अवस्थाके कारण उनका इस
प्रकार कहना है। इसलिये मायावादियोंकी वास्तविक
वस्तुके (भगवान्के) ज्ञानके सम्बन्धमें उनके अस्तित्वको
ही नकारनेवाली बुद्धि है॥168॥

ब्रह्मसूत्रमें ही जीवका परम कल्याण,
शाङ्करभाष्यमें जीवका सर्वनाश निहित :—
जीवेर निस्तार लागि' सूत्र कैल व्यास।
मायावादि-भाष्य शुनिले हय सर्वनाश॥169॥

अनुवाद—जीवोंका उद्धार करनेके लिये श्रीव्यासदेवने
ब्रह्मसूत्रकी रचना की, परन्तु जो इन सूत्रोंके मायावादी
भाष्यको सुनता है, तो उसका सर्वनाश हो जाता
है॥169॥

अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीव्यासदेवके सूत्रोंमें शुद्धभक्तिवाद
है। मायावादियोंने उन सूत्रोंके जो भाष्य लिखे हैं, उनमें
परब्रह्मका चिन्मय विग्रह अस्वीकृत हुआ है और
जीवोंकी ब्रह्मसे पृथक् सत्ता भी अस्वीकृत हुई है,
इसलिये वे शुद्धभक्तितत्त्वके अत्यन्त विरुद्ध हैं। इसलिये
मायावादियोंके भाष्यको सुननेसे जीवका सर्वनाश होता
है, क्योंकि ब्रह्मके साथ एक होनेकी इच्छारूपी दुराशासे
उत्पन्न अभिमानके द्वारा शुद्धभक्ति नष्ट होती है और
वास्तवमें यह ईश्वरको नहीं मानना है॥169॥

शक्तिपरिणामवाद ही ब्रह्मसूत्रमें उद्दिष्ट :—
'परिणाम-वाद'—व्याससूत्रे सम्मत।
अचिन्त्यशक्ति ईश्वर जगद्रूपे परिणत॥170॥

अनुवाद—'परिणाम-वाद' श्रीव्यासदेवके द्वारा रचित
ब्रह्मसूत्रके द्वारा सम्मत है, अर्थात् भगवान्की अचिन्त्यशक्ति
जड़-जगत्के रूपमें परिणत हुई है॥170॥

अनुभाष्य—आदिलीला 7/121-133 संख्याका अनुभाष्य
देखें॥170॥

प्राकृत चिन्तामणिका दृष्टान्त; शक्ति परिणत
होनेपर भी शक्तिमान् अविकृत :—
मणि यैछे अविकृते प्रसवे हेमभार।
जगद्रूप हय ईश्वर, तबु अविकार॥171॥

अनुवाद—प्राकृत चिन्तामणिमें जैसे बहुत स्वर्णका
प्रसव करनेपर भी कोई विकार नहीं आता, उसी प्रकार
अपनी अचिन्त्य शक्तिके द्वारा गुणमय जगत्के रूपमें
प्रकाशित होनेपर भी भगवान् अपने नित्य अप्राकृत
स्वरूपमें ही रहते हैं॥171॥

अनुभाष्य—शक्ति-परिमाणवाद ही 'जन्माद्यस्य' सूत्रके
द्वारा सम्मत है। असंख्य, अनन्त नित्यशक्ति जिनसे
उत्पन्न होती है, जिनमें स्थित और अव्यक्त रहती है,
तथा शक्तिसमूह जिनके अधीन हैं, ऐसी शक्तिसमूहके
प्रभु ही 'ईश्वर' हैं। अनन्त रूपोंमें विराजमान
नित्य-अनित्य-शक्ति, आत्म-अनात्म-शक्ति आदिकी एक
ही साथ ईश्वरमें अवस्थिति किस प्रकारसे सम्भव है,
उसको जीव वर्तमान जड़-बद्धावस्थामें मायाशक्तिके
अधीन रहते समय समझ नहीं सकता। इसलिये
मानवज्ञानसे इस प्रकारके परस्पर विरुद्ध गुणोंका
समाश्रय अचिन्त्य होनेपर भी ईश्वरमें नित्य अवस्थित
है। मानव जड़ज्ञानके अहङ्कारके कारण अपने क्षुद्र
अज्ञानरूपी सामर्थ्यको झूठी-कल्पनाके द्वारा बहुत बड़ा
मानकर, जिस शक्ति-रहितरूप एक अवस्थाकी 'ब्रह्म'के
रूपमें कल्पना करता है, वह (ब्रह्म न) होकर
चिन्त्य-शक्तिका प्रकारभेद मात्र है। उसके द्वारा जगत्को
ईश्वरका 'परिणाम' समझनेसे 'विवर्त्तवाद' को अवश्य
ही ग्रहण करना पड़ेगा। किन्तु ईश्वरत्वमें अचिन्त्य
नित्यशक्तिमत्ता निहित है, इसका ज्ञान होनेपर यह भी
समझमें आयेगा कि ईश्वर अपनी बहिरङ्गा-मायाशक्तिके
द्वारा परिणत खण्डज्ञान-गम्य राज्यमें (अर्थात् इस
भौतिक जगत्में) भी प्रकाशित अथवा अवतीर्ण हो

192 ।

छठा अध्याय 6/171-174 ]
सकते हैं। किसी मणिमें ऐसी शक्ति निहित होती है
जिससे मणि सोनेकी सृष्टि करके भी अपने मणिवाले
स्वरूपको किसी अन्य रूपमें परिणत अथवा परिवर्तित
नहीं करती। सोनेकी सृष्टि करनेसे पहले मणि जिस
प्रकारकी थी, सोनेको उत्पन्न करनेके बाद भी उसी
रूपमें ही रहती है। जिस प्रकार वास्तवमें अपने अन्दर
निहित शक्तिके प्रभावसे मणि स्वयं विकृत न होकर
और अपनेसे भिन्न किसी अन्य वस्तु (सोने) को उत्पन्न
करके भी अपने मणि-स्वरूपमें अवस्थित रह सकती
है, उसी प्रकार सच्चिदानन्द ईश्वर अपनी मायाशक्तिको
सञ्चालित करके, वैसी शक्तिको विकारयोग्य गुणमय
जगत्के रूपमें परिणत कर सकते हैं। ईश्वर अपनी
एक शक्तिको विकारमय जगत्रूपमें परिणत करके भी
अपने स्वरूपको विकार-रहित रख सकते हैं, - यह
नित्यशक्ति उनमें विद्यमान है॥ 171 ॥
गुरु-व्यासदेवको भ्रान्त कहनेके कारण मायावादी विवर्त्तवादी
हैं, इसलिये वे-श्रौतपथ-विरोधी नास्तिक :-
व्यास-भ्रान्त बलि' सेइ सूत्रे दोष दिया।
'विवर्त्तवाद' स्थापियाछे कल्पना करिया॥ 172 ॥
अनुवाद- शङ्कराचार्यने श्रीव्यासदेवके सूत्रमें दोष
निकालकर उनको भ्रान्त कह दिया और अपनी
कल्पनाके अनुसार सूत्रपर भाष्य लिखकर ‘विवर्त्तवाद’
को स्थापित किया॥ 172 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- ‘परिणाम-वाद’ माननेसे ईश्वर
‘विकारी’ हो जायेंगे, इसलिये व्यासदेवको तब ‘भ्रान्त’
कहना होगा, - ऐसा कहकर सूत्रके मुख्यार्थमें दोषारोपण
करके गौणार्थ करके ‘विवर्त्तवाद’को स्थापित किया॥ 172 ॥
अनुभाष्य- ‘सेइ सूत्र’ - ब्रह्मसूत्रके प्रारम्भमें “अथातो
ब्रह्मजिज्ञासा” सूत्रके उत्तरमें सर्वप्रथम “जन्माद्यस्य यतः” - यह
सूत्र परिणामवादके उद्देश्यसे ही लिखा गया है। जैसे-
“यतो वा इमानि भूतानि” - इस तैत्तिरीय-वाक्य, “यथोर्णनाभिः
सृजते गृह्णते च” - इस मुण्डक-वाक्य और श्रीमद्भागवतके
प्रारम्भमें कहे गये सभी श्लोकोंका तात्पर्य ही ‘परिणामवाद’
है। किन्तु शङ्कराचार्यका ‘परिणामवाद’ ग्रहण करनेपर
काल्पनिक लक्षणावृत्ति-वादी लोग ‘जन्माद्यस्य यतः’ - इस
सूत्रको ‘दुष्टसूत्र’ और उसके लेखक श्रीव्यासदेवको
‘भ्रान्त’ कहेंगे। इससे बचनेके लिये और अपने गुरु
व्यासको परिणामवादी एवं ‘जन्माद्यस्य’ सूत्रको परिणामवाद
कहकर वे निन्दा न करें, इस उद्देश्यसे काल्पनिक
युक्तिके द्वारा उन्होंने वेदके किसी विशेष-अंशमें लिखे
‘विवर्त्तवाद’ जिसका कोई अन्य तात्पर्य है, उसे ही
सत्य कहकर स्थापित किया॥ 172 ॥
देहमें आत्मबुद्धिरूप विवर्त्त ही मिथ्या है;
जगत्-सत्य, किन्तु नश्वर है :-
जीवेर देहे आत्मबुद्धि सेइ मिथ्या हय।
जगत् ये मिथ्या नहे, नश्वरमात्र हय॥ 173 ॥
अनुवाद-जीवकी जो देहमें आत्मबुद्धि है, वह
मिथ्या है। किन्तु यह जगत् मिथ्या नहीं है, केवल
नश्वरमात्र है॥ 173 ॥
अनुभाष्य-निर्मल जीव स्वरूपतः नित्य कृष्णदास
है। परन्तु जब वह कर्मफल भोगनेवाले स्थूल और
सूक्ष्म शरीरोंको भ्रमपूर्वक ‘मैं’ समझता है, ऐसी बुद्धि
मिथ्या है- इसको दिखलानेके लिये ‘विवर्त्तवाद’-शब्दका
प्रयोग होता है। जीवात्मा नित्य है, वह कभी भी
तात्कालिक स्थूलशरीर और सूक्ष्मशरीरके समान कालके
वशमें नहीं है। विश्व वास्तवमें मिथ्या नहीं है, तो भी
कालके द्वारा परिवर्तन-योग्य है। विश्वको अपने
भोगकी वस्तु मानना ही जीवका ‘विवर्त्त’ है। यह
जड़-जगत् ईश्वरकी शक्तिका परिणाम है। मायावादी
लोग जीवके स्वरूपमें और विश्वके स्वरूपमें ‘विवर्त्त’
विचार करते हैं, किन्तु दोनों (जीव और विश्व) ही
ईश्वरकी शक्तिके परिणाम हैं॥ 173 ॥
ओंकार ही आदि-महावाक्य और ईश्वर-मूर्ति एवं
वेद-कल्पतरुका बीज :-
'प्रणव' ये महावाक्य-ईश्वरेर मूर्ति।
प्रणव हैते सर्ववेद, जगते उत्पत्ति॥ 174 ॥
। 193

[ 6/131-179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—'प्रणव' ही वेदोंका महावाक्य है, यह साक्षात् भगवान्‌की मूर्ति है। प्रणवसे ही सभी वेदोंकी और जगत्‌की उत्पत्ति हुई है॥ 174॥
अनुभाष्य—'प्रणव'—ईश्वरका नामविग्रह है; वही महावाक्य है। नामस्वरूप 'ओंकार' से इस नश्वर-जगत्‌में रहते समय भी विवर्त्तबुद्धिको (देहमें आत्मबुद्धिको) छोड़नेसे अप्राकृत स्वरूपका उदय होता है॥ 174॥
तत्त्वमस्यादि वाक्य—वेदके एकदेश-सूचक :—
'तत्त्वमसि'—जीव-हेतु प्रादेशिक वाक्य।
प्रणव ना मानि' तारे कहे महावाक्य॥" 175॥
अनुवाद—'तत्त्वमसि'—यह वेद-वाक्य जीवके लिये एक प्रादेशिक वाक्य है। प्रणवको महावाक्य न मानकर शङ्कराचार्यने तत्त्वमसिको महावाक्य कहा है॥" 175॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जीवकी चिन्मय सत्ताको समझानेके लिये 'तत्त्वमसि' वाक्य वेदके एक स्थानपर पाया जाता है, वह महावाक्य नहीं है॥ 175॥
अनुभाष्य—ईश्वर, जीव और जगत्‌के स्वरूपको विवर्त्तवादका विषय बनाकर शङ्कराचार्यने ॐकार-रूप नामाश्रयके बदले 'तत्त्वमसि' को महावाक्य कहा है। किन्तु जीवकी देहमें आत्मबुद्धि होकर कहीं मिथ्या भ्रमको उदित न कर दे, इसलिये वह वस्तुतः केवल भ्रान्त जीवोंके उद्देश्यसे कहा गया प्रादेशिक वाक्य है। पक्षान्तरमें, शङ्कराचार्यने 'तत्त्वमसि'को महावाक्य कहकर ब्रह्मस्वरूप, वेदोंके जीवन 'प्रणव'-नामका ही अनादर किया है॥ 175॥
श्रीसार्वभौमके अनेक पूर्वपक्ष और महाप्रभुके द्वारा उन सबका खण्डन :—
एइमते कल्पित भाष्ये शत दोष दिल।
भट्टाचार्य पूर्वपक्ष अपार करिल॥ 176॥
वितण्डा, छल, निग्रहादि अनेक उठाइल।
सब खण्डि' प्रभु निज-मत से स्थापिल॥ 177॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने शङ्कराचार्यके भाष्यको कल्पित कहकर उसमें सैकड़ो दोष दिखलाये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने भी शङ्कराचार्यके भाष्यके पक्षमें पूर्वपक्षकी ओरसे अनेक प्रश्न उठाये। वितण्डा, छल, निग्रहादिके द्वारा अनेक प्रकारकी बातें उठायीं। परन्तु महाप्रभुने उन सबका खण्डन करके अपने मतको स्थापित किया॥ 176-177॥
अनुभाष्य—आदिलीला 7/106-147 संख्या देखें।
'वितण्डा'—अपने मतकी स्थापना ना करके केवल दूसरेके मतका खण्डन करना। 'छल'—शब्दके वास्तविक तात्पर्यको किसी अन्य काल्पनिक विषयरूपमें आरोप करके खण्डन करना। 'निग्रह'—दूसरे पक्षकी पराजय॥ 131-177॥
महाप्रभुके द्वारा यथार्थ वेदमतकी स्थापना :—
भगवान्—'सम्बन्ध', भक्ति—'अभिधेय' हय।
प्रेमा—'प्रयोजन', वेदे तिनवस्तु कय॥ 178॥
अनुवाद—महाप्रभुने आगे कहा,—भगवान् ही 'सम्बन्ध' हैं, भक्ति ही 'अभिधेय' है और भगवत्प्रेम ही 'प्रयोजन' है—वेद इन तीन वस्तुओंको ही प्रतिपादित करते हैं॥ 178॥
इन सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनके निर्देशके अतिरिक्त सभी मतवाद ही काल्पनिक :—
आर ये ये-किछु कहे, सकलेइ कल्पना।
स्वतःप्रमाण वेद-वाक्ये न करिये लक्षणा॥ 179॥
अनुवाद—और कोई यदि वेदोंकी व्याख्या किसी और प्रकारसे करता है, तो वह उसकी कल्पनाके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। स्वतःप्रमाण वेद वाक्योंका लक्षणावृत्तिसे अर्थ नहीं करना चाहिये॥ 179॥
अनुभाष्य—मायाके गुणोंसे अतीत निर्मल जीव ही भगवद्भक्त हैं। उनका सम्बन्ध केवल भगवान्‌से ही है, अभिधेय भक्ति है और उनका प्रयोजन भगवद्-प्रेम है, यही वेदशास्त्रोंमें कहा गया है। किन्तु किसी-किसी मतवादमें देखा जाता है कि जीवका सम्बन्ध—निःशक्तिक
194

छठा अध्याय 6/179-182 ]
ब्रह्मसे है, अभिधेय-ज्ञान-वैराग्य है और प्रयोजन-मुक्ति
है; यह बद्धजीवकी कल्पना-मात्र है। वेद स्वयं ही
प्रमाण है; 'लक्षणा' वृत्तिके द्वारा उनका काल्पनिक अर्थ
होता है॥ 179 ॥
ईश्वरके आदेशसे शङ्करके द्वारा असुर-मोहन :-
आचाय्येर दोष नाहि, ईश्वर-आज्ञा हैल।
अतएव कल्पना करि' नास्तिक-शास्त्र कैल ॥ 180 ॥
अनुवाद—इसमें वास्तवमें शङ्कराचार्यका दोष नहीं
है, भगवान्की आज्ञासे ही उन्होंने ऐसा प्रचार किया है।
इसलिये उन्होंने काल्पनिक नास्तिक शास्त्रोंकी रचना
की है॥ 180 ॥
अनुभाष्य—कूर्मपुराणके पूर्वभागमें 16/115-117 संख्यामें
श्रीभगवद्-वाक्य—
“तस्माद् हि वेदवाह्यानां रक्षणार्थाय पापिनाम्।
विमोहनाय शास्त्राणि करिष्यसि वृषध्वज॥
एवं संचोदितो रुद्रो माधवेनासुरारिणा।
चकार मोहशास्त्राणि केशवोऽपि शिवे स्थितः॥
कापालं नाकुलं वामं भैरवं पूर्वपश्चिमम्।
पाञ्चरात्र-पाशुपतं तथान्यानि सहस्रशः॥” 180 ॥
अर्थात् “इसलिये हे वृषध्वज ! वेदसे बाह्य लोगोंकी
रक्षाके उद्देश्यसे और पापियोंको मोहित करनेके लिये
सभी शास्त्रोंको प्रकाश करूँँगा। इस प्रकारसे श्रीरुद्रने
असुर-विनाशक श्रीमाधवके द्वारा प्रेरित होकर और
श्रीकेशवने भी शिव-बुद्धिमें अवस्थित होकर कापाल,
नाकुल, वाम, भैरव, पूर्व-पश्चिम (अथवा पूर्वभैरव,
पश्चिमभैरव ?), पाशुपत-पञ्चरात्र तथा अन्य सहस्र
शास्त्रोंका प्रवर्त्तन किया॥” 180 ॥
पद्मपुराणके उत्तरखण्डमें सहस्रनामका वाक्य (62/31) :-
स्वागमैः कल्पितैस्त्वञ्च जनान् मद्दिमुखान् कुरु।
माञ्च गोपय येन स्यात् सृष्टिरेषोत्तरोत्तरा ॥ 181 ॥
अनुवाद—भगवान्ने श्रीमहादेवको कहा, —'कलियुगमें
मनुष्योंको वेदोंके काल्पनिक अर्थोंके द्वारा उन्हें मुझसे
विमुख करो। उन कल्पित-शास्त्रोंमें मेरे नित्य-भगवत्
स्वरूपका विषय गुप्त रखो। इससे जगत्की बहिर्मुख
सृष्टि उत्तरोतर परिवर्द्धित होती रहेगी ॥ 181 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान्ने श्रीमहादेवसे कहा,-अपने
कल्पित आगमके द्वारा मनुष्योंको मुझसे विमुख करो।
मुझे इस प्रकार गोपन करो, जिसके द्वारा बहिर्मुख-जीवोंकी
जीववृद्धिकार्यसे विरक्ति उत्पन्न नहीं हो॥181॥
अनुभाष्य—
[हे शिव], त्वं कल्पितैः (सत्याद्द्र
(निजतन्र्त्रादिकैः) जनान् (जड़विषयरतान् लोकान्) मद्दिमुखान्
(हरिजनविमुखान् कर्मज्ञाननिरतान्) कुरु; मां गोपय च, येन
(भगवद्गोपन-कार्येण) उत्तरोत्तरा एषा सृष्टिः (संसारप्रवृत्तिः)
स्यात्।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें।
देहात्मबुद्धि होनेसे केवल शौक्र-विचारकी प्रबलताके
कारण संसारको भोग करनेकी प्रवृत्ति होती है और
जहाँ भोग-प्रवृत्ति होती है, वहाँ शुद्धभक्ति गुप्त रहती
है॥ 181 ॥
पद्मपुराणके उत्तरखण्ड (25/7) में :-
मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमुच्यते।
मयैव विहितं देवि कलौ ब्राह्मणमूर्तिना ॥” 182 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 182 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमहादेवने कहा, —मैं कलियुगमें
ब्राह्मणमूर्ति धारण करके असत्-शास्त्रके द्वारा मायावादरूप
प्रच्छन्न-बौद्धमतका विधान करूँगा॥ 182 ॥
अनुभाष्य—
मायावादम् (ईश्वर-जीव-विश्व-स्वरूपत्रयं माया-
कल्पित-मिथ्या-विकारमात्रं ब्रह्मणः भिन्नमिति विचारपरम्) असच्छास्त्रं
(नित्य-भगवद्बहिर्मुखकर्मज्ञानपरम् अनित्योपदेशमयं ग्रन्थं) प्रच्छन्नं
(कपट-वेदविचार-परं श्रौतपथविरुद्धं) बौद्धं (नास्तिक-
बौद्धमतानुगतम्) उच्यते। हे देवि! मया ब्राह्मणमूर्तिना
(मालवरदेशोद्भूतेन शङ्कराख्येन देहेन) कलौ (विवादयुगारम्भे)
[मायावादमतम् एव] विहितं (स्थापितम्)।
। 195

[ 6/182–187 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्लोक-भावानुवाद—मैं कलियुगमें मालवर देशमें
शङ्कर नामसे जन्म ग्रहण करके असत्-शास्त्र जिसमें
नित्य भगवद्-विमुख कर्म-ज्ञानको परम कहा गया है,
उसके द्वारा (ब्रह्मसे भिन्न ईश्वर-जीव-विश्व, तीनों
मायासे कल्पित मिथ्या विकारमात्र हैं) ऐसे मायावादरूप
प्रच्छन्न-बौद्धमतको स्थापित करूँगा॥ 182॥
विलासहीन केवल चिद्-साहित्य-वाद और
चिद्-राहित्य-वाद, दोनों ही जागतिक विचारसे उत्पन्न
मनोधर्मके अन्तर्गत हैं॥ 182॥
महाप्रभुकी व्याख्या सुनकर भट्टाचार्य विस्मित :—
शुनि' भट्टाचार्य हैल परम विस्मित।
मुखे ना निःसरे वाणी, हइला स्तम्भित ॥ 183 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी व्याख्याको सुनकर श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्य आश्चर्यचकित हो गये। कुछ भी बोलनेमें वे
असमर्थ हो गये और वे स्तम्भित हो गये ॥ 183 ॥
श्रीकृष्णभक्ति ही जीवका परम पुरुषार्थ :—
प्रभु कहे,—“भट्टाचार्य, ना कर विस्मय।
भगवाने भक्ति—परम-पुरुषार्थ हय ॥ 184 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“भट्टाचार्य ! आश्चर्य मत
करो। भगवद्भक्ति ही परम पुरुषार्थ है ॥ 184 ॥
दिव्यसूरिगण भी श्रीकृष्ण-चरणोंके प्रति आकृष्ट :—
'आत्माराम' पर्यन्त करे ईश्वर-भजन।
ऐछे अचिन्त्य भगवानरे गुणगण ॥ 185 ॥
अनुवाद—आत्माराम अर्थात् आत्मामें रमण करनेवाले
मुक्त पुरुष भी भगवान्‌का भजन करते हैं, क्योंकि
भगवान्‌में ऐसे अचिन्त्य गुण हैं कि वे आत्माराम
मुनियोंके चित्तको भी आकर्षित करते हैं ॥ 185 ॥
श्रीमद्भागवत (1/7/10) :—
आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ ”186 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 186 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—आत्मामें ही जिनकी रति है,
ऐसे वासना-ग्रन्थियोंसे शून्य सभी मुनि भी बृहत्कर्मा
श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं; क्योंकि जगत्‌के
चित्तहारी श्रीहरिका ऐसा ही एक गुण है ॥ 186 ॥
अनुभाष्य—स्वभावतः ब्रह्मानन्दमें निमग्न परमहंस
श्रीशुकदेवने किसलिये श्रीकृष्ण-नाम-रूप-गुण-लीला और
कथापूर्ण श्रीमद्भागवतका अभ्यास किया,—शौनक आदि
ऋषियोंके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूतकी उक्ति,—
आत्मारामः (आत्मनि भगवति रमन्ते ये ते कृष्णक्रीड़नशीलाः)
मुनयः (भोगपर-जड़-विषयरहिताः) निर्ग्रन्थाः (हृदयजकामग्रन्थिहीनाः
ब्रह्मभूताः) अपि उरुक्रमे (अजिते कृष्णे) अहैतुकीम्
(अन्याभिलाषिताशून्यं कर्मज्ञानाद्यनावृतं शुद्धां कृष्णानुशीलनमयी)
भक्तिं (सेवां) कुर्वन्ति। हरिः इत्थम्भूतगुणः
(मुक्तामुक्त-सर्वास्थ-जीवाकर्षण-धर्मयुतः)। [अलौकिक-गुणाधारः
हरिर्मायावादनिरतानां जनानां तत्तन्मत-वादात् मोचयित्वा कृपया
तेभ्यः स्वचरणं प्रयच्छति]।
श्लोक-भावानुवाद—स्वभावतः श्रीकृष्णकी लीलाओंमें
रमण करनेवाले आत्माराम, जड़विषयोंसे विरक्त मुनि
और जिनकी हृदयकी कामनाओंकी ग्रन्थि खुल गयी
है—ऐसे ब्रह्मभूत पुरुष, सभी उरुक्रम अर्थात् अजित
भगवान्‌की अन्याभिलाषिता-शून्य, कर्म-ज्ञानसे अनावृत
शुद्ध कृष्णानुशीलनमयी भक्ति करते हैं। हरि अपने
स्वाभाविक गुणोंसे मुक्त और बद्ध अवस्थावाले सभी
जीवोंको आकर्षण करनेवाले हैं। [हरि अलौकिक
गुणोंके आधार हैं, वे मायावादादिमें निरत लोगोंको
उन-उन मतवादोंसे मुक्त करके कृपापूर्वक अपने
चरणोंका आश्रय प्रदान करते हैं।] ॥ 186 ॥
श्रीसार्वभौमकी श्लोककी व्याख्या सुननेकी इच्छा :—
शुनि' भट्टाचार्य कहे,—“शुन, महाशय।
एइ श्लोकेर अर्थ शुनिते वाञ्छा हय ॥” 187 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे कहा,—“सुनो
महाशय ! इस श्लोकका अर्थ सुननेकी मेरी इच्छा हो
रही है॥” 187 ॥
196 ।

छठा अध्याय 6/188-198 ]
महाप्रभुके अनुरोधसे श्रीसार्वभौमके द्वारा व्याख्या
करते हुए अपने पाण्डित्यका प्रकाश :-
प्रभु कहे, —"तुमि कि अर्थ कर, ताहा शुनि'।
पाछे आमि करिब अर्थ, येबा किछु जानि ॥" 188 ॥
शुनि' भट्टाचार्य श्लोक करिल व्याख्यान।
तर्कशास्त्र-मत उठाय विविध विधान ॥ 189 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —"आप इस श्लोकका
क्या अर्थ करते हैं, मैं उसे सुनना चाहता हूँ। बादमें
मैं जो कुछ जानता हूँ, उसके अनुसार अर्थ करूँगा।"
यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उपरोक्त श्लोककी
व्याख्या की और तर्कशास्त्रके मतानुसार उन्होंने विविध
अर्थ बतलाये ॥ 188-189 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा यथाशक्ति नौ प्रकारकी व्याख्या :-
नवविध अर्थ कैल शास्त्रमत लञा।
शुनि' प्रभु कहे किछु ईषत् हासिया ॥ 190 ॥
महाप्रभुका मान देनेका धर्म-श्रीसार्वभौमकी प्रशंसा :-
“भट्टाचार्य, जानि—तुमि साक्षात् बृहस्पति।
शास्त्रव्याख्या करिते ऐछे कारो नाहि शक्ति ॥ 191 ॥
किन्तु तुमि अर्थ कैले पाण्डित्य-प्रतिभाय।
इहा वइ श्लोकेर आछे आरो अभिप्राय ॥" 192 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने शास्त्रोंके मतानुसार
इस श्लोकके नौ प्रकारके अर्थ किये। जिसे सुनकर
महाप्रभुने मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए कहा, —"भट्टाचार्य !
ऐसा लगता है कि आप तो साक्षात् देवगुरु बृहस्पति
हैं। इस जगत्में शास्त्रोंकी ऐसी व्याख्या करनेकी शक्ति
और किसीमें नहीं है। किन्तु आपने पाण्डित्य प्रतिभासे
जो अर्थ प्रकाशित किये हैं, इनके अतिरिक्त भी इस
श्लोकका और भी अभिप्राय है ॥" 190-192 ॥
भट्टाचार्यकी प्रार्थनासे महाप्रभुकी स्वतन्त्र व्याख्या :-
भट्टाचार्येर प्रार्थनाते प्रभु व्याख्या कैल।
ताँर नव अर्थ-मध्ये एक ना छुँइल ॥ 193 ॥
महाप्रभुके द्वारा अठारह प्रकारसे व्याख्या :-
आत्मारामश्च-श्लोके 'एकादश' पद हय।
पृथक् पृथक् कैले पदेर अर्थ निश्चय ॥ 194 ॥
तत्तत्पद-प्राधान्ये 'आत्माराम' मिलाञा।
अष्टादश अर्थ कैल अभिप्राय लञा ॥ 195 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी प्रार्थनापर महाप्रभुने
उनके द्वारा किये हुए नौ प्रकारके अर्थोंमेंसे किसीको
स्पर्श किये बिना 'आत्मारामश्च'-श्लोककी व्याख्या
आरम्भ की। आत्मारामश्च-श्लोकमें 'ग्यारह' पद हैं।
महाप्रभुने सभी पदोंकी एक-एक करके व्याख्या की।
महाप्रभुने श्लोकके प्रधान पदोंके लेकर प्रत्येकके साथ
'आत्माराम' पदको जोड़कर अठारह प्रकारसे व्याख्या
की ॥ 193-195 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्लोकके ग्यारह शब्दोंके ग्यारह
अर्थ हैं और श्लोकमें 'मुनयः', 'निर्ग्रन्थाः', 'उरुक्रम',
'अहैतुकी', 'भक्ति', 'गुण' और 'हरि'—इन सात प्रधान
पदोंमें 'आत्माराम'-पद जोड़कर और सात अर्थ होते
हैं—अर्थात् कुल मिलाकर अठारह अर्थ हैं ॥ 194-195 ॥
अनुभाष्य— 'एकादशपद'- 1) आत्मारामः, 2) च,
3) मुनयः, 4) निर्ग्रन्थाः, 5) अपि, 6) उरुक्रमे,
7) कुर्वन्ति, 8) अहैतुकीं, 9) भक्तिं, 10) इत्थम्भूतगुणः,
11) हरिः ॥ 194 ॥
भगवद्गुणशक्ति अचिन्त्य और आत्माराम-आकर्षिणी :-
भगवान्, ताँर शक्ति, ताँर गुणगण।
अचिन्त्य प्रभाव तिनेर ना याय कथन ॥ 196 ॥
अन्य यत साध्य-साधन करि' आच्छादन।
एइ तिने हरे सिद्ध-साधकेर मन ॥ 197 ॥
सनकादि-शुकदेव ताहाते प्रमाण।
एइमत नाना अर्थ करेन व्याख्यान ॥ 198 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान्, उनकी शक्ति और उनके
गुणसमूह—इन तीनोंका ही प्रभाव अचिन्त्य है, इनका
। 197

[ 6/196-202 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सम्पूर्ण रूपसे वर्णन सम्भव नहीं है। ये तीनों अन्य होकर वे श्रीकृष्णका निर्मल भजन करने लगे।
सभी प्रकारके साध्य और उनके लिये किये जानेवाले श्रीव्यासदेवकी कृपासे शुकदेव गोस्वामी श्रीकृष्णकी
साधनोंको आच्छादित करके सिद्ध एवं साधकोंके भी लीलाओंके प्रति आकृष्ट हुए। श्रीकृष्णके गुणोंसे
मनका हरण करते हैं। श्रीसनकादि और श्रीशुकदेव आकृष्ट होकर वे भी श्रीकृष्णका भजन करने लगे।
गोस्वामी इसके प्रमाण हैं। इस प्रकार महाप्रभुने अनेक ब्रह्मानन्दसे कोटि गुणा पूर्ण आनन्द श्रीकृष्णके चिन्मय-गुणोंमें
प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या की ॥ 196-198 ॥ है, इसलिये वे आत्माराम मुनियोंके चित्तको भी
अमृतप्रवाह भाष्य—'तिने'—भगवान्, भगवद्-शक्ति आकर्षित कर लेते हैं।"
और भगवद्-गुणसमूह ॥ 197 ॥
इस प्रसङ्गमें भाः 3/15/43 देखें। मध्यलीला 24/3-308 संख्या भी देखें ॥ 193-198 ॥
अनुभाष्य—ज्ञानी, कर्मी और अन्याभिलाषियोंके
दलोंमें जितने प्रकारके सम्बन्ध और अभिधेय कल्पित श्रीसार्वभौमकी आत्मग्लानि :—
होते हैं, उनको आच्छादित करके अचिन्त्य प्रभाववाले शुनि' भट्टाचार्येर मने हैल चमत्कार।
भगवान्, उनकी शक्ति और उनके गुणसमूह—ये तीन प्रभुके कृष्ण जानि' करे आपना धिक्कार ॥ 199 ॥
वस्तुएँ साधक-जीव और सिद्धोंके मनका हरण करते इँहो त' साक्षात् कृष्ण, —मुञि ना जानिया।
हैं। सनकादि और शुकदेव आदि मुक्त-मनीषियोंका महा-अपराध कैनु गर्वित हइया ॥ '200 ॥
श्रीकृष्णके प्रति आकृष्ट होना ही इसका उदाहरण है।
मध्यलीला, 24/107-109, 111— अनुवाद—महाप्रभुसे 'आत्माराम श्लोक'की व्याख्या
“मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते॥” सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका मन आश्चर्यचकित हो
“जन्म हैते शुक-सनकादि 'ब्रह्ममय'। गया। वे महाप्रभुको श्रीकृष्ण जानकर अपनेको धिक्कारने
कृष्णगुणाकृष्ट हञा कृष्णेरे भजय॥ लगे,—'ये तो साक्षात् श्रीकृष्ण हैं, मैंने ऐसा नहीं समझा
सनकाद्येरे कृष्णकृपाय सौरभे हरे मन। और अपने ज्ञानके अभिमानमें गर्वित होकर महा-अपराध
गुणाकृष्ट हञा करे निर्मल भजन॥ किया है॥'199-200॥
व्यासकृपाय शुकदेवेर लीलादि-स्मरण।
कृष्णगुणाकृष्ट हञा करेन भजन॥” श्रीसार्वभौमकी महाप्रभुके चरणोंमें शरणागति
मध्यलीला, 17/139— और महाप्रभुकी कृपा :—
“ब्रह्मानन्द हैते पूर्णानन्द कृष्णगुण। आत्मनिन्दा करि' लैल प्रभुर शरण।
अतएव आकर्षये आत्मारामेर मन॥” कृपा करिवारे तबे प्रभुर हैल मन ॥ 201 ॥
अर्थात् “ब्रह्ममें लीन मुक्त जीव भी श्रीकृष्णकी अनुवाद—इस प्रकार श्रीसार्वभौमने अपनी निन्दा
लीलाओंके प्रति आकर्षित होकर उनका भजन करते करते हुए महाप्रभुकी शरण ग्रहण की। महाप्रभुकी भी
हैं। यद्यपि शुकदेव गोस्वामी और सनकादि चार कुमार श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यपर कृपा करनेकी इच्छा हो गयी॥ 201 ॥
ब्रह्मके ध्यानमें लीन रहते थे, तथापि वे भी श्रीकृष्णके
चिन्मय गुणों और लीलाओंके प्रति आकर्षित हुए और महाप्रभुके द्वारा पहले चतुर्भुज रूप और बादमें
वे भी श्रीकृष्णका भजन करने लगे। सनकादि चार द्विभुज-रूपका प्रदर्शन :—
कुमारोंका मन श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें समर्पित तुलसीकी निज-रूप प्रभु ताँरे कराइल दर्शन।
गन्धसे आकृष्ट हुआ। तब उनके गुणोंसे आकृष्ट चतुर्भुज-रूप प्रभु हइला तखन ॥ 202 ॥
198 ।

छठा अध्याय 6/202-211 ]
देखाइल ताँरे आगे चतुर्भुज-रूप।
पाछे श्याम-वंशीमुख स्वकीय स्वरूप ॥ 203 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कृपा करके श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको
पहले चतुर्भुज रूप प्रकट करके अपना (नारायण) रूप
दिखलाया। अपना नारायण रूप दिखलानेके बादमें
अपना नित्य श्यामसुन्दर-वंशीधारी श्रीकृष्ण स्वरूप
दिखलाया ॥ 202-203 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा स्तव-स्तुति :-
देखि' सार्वभौम दण्डवत् करि' पड़ि'।
पुन: उठि' स्तुति करे दुइ कर जुड़ि' ॥ 204 ॥
अनुवाद—महाप्रभुमें श्रीकृष्णके स्वरूपको प्रकाशित
देखकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने भूमिपर गिरकर उन्हें
दण्डवत् प्रणाम किया। फिर उठकर हाथ जोड़कर
उनकी स्तव-स्तुति करने लगे ॥ 204 ॥
महाप्रभु-कृपासे श्रीसार्वभौमके चित्तमें तत्त्वकी स्फूर्ति :-
प्रभुर कृपाय ताँर स्फुरिल सब तत्त्व।
नाम-प्रेमदान-आदि वर्णन महत्त्व ॥ 205 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी कृपासे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके
हृदयमें समस्त तत्त्व स्फुरित हो गये और वे महाप्रभुके
द्वारा भगवान्‌के नाम और भगवद्-प्रेमके सर्वत्र दानकी
महिमाको समझ गये ॥ 205 ॥
अतिशीघ्र रचना करनेकी शक्ति :-
शत श्लोक कैल दण्ड एक ना याइते।
बृहस्पति तैछे श्लोक ना पारे करिते ॥ 206 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने एक दण्ड (चौबीस
मिनट) से भी कम समयमें ही सौ श्लोकोंकी रचना
करके महाप्रभुकी स्तुति की। देवगुरु बृहस्पति भी इतने
कम समयमें इतने श्लोकोंकी रचना नहीं कर सकते ॥ 206 ॥
अनुभाष्य—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा रचित इन
सौ श्लोकोंके ग्रन्थका नाम ‘सुश्लोक-शतक' है ॥ 206 ॥
महाप्रभुके आलिङ्गनसे श्रीसार्वभौममें सात्त्विक भाव :-
शुनि' सुखे प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन।
भट्टाचार्य प्रेमावेशे हैल अचेतन ॥ 207 ॥
अश्रु, स्तम्भ, पुलक, स्वेद, कम्प थरहरि।
नाचे, गाय, कान्दे, पड़े प्रभु-पद धरि' ॥ 208 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने वे सौ श्लोक सुनकर श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यका सुखपूर्वक आलिङ्गन किया। श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्य महाप्रभुके आलिङ्गनसे प्रेमावेशमें आविष्ट
होकर मूर्च्छित हो गये। उनके शरीरमें अश्रु, स्तम्भ,
पुलक, पसीना, कम्प आदि अष्ट-सात्त्विक भाव उदित
हो गये तथा वे नाचने-गाने लगे, कभी रोने लगे और
कभी भूमिपर गिरकर महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़ने
लगे ॥ 207-208 ॥
श्रीगोपीनाथकी प्रसन्नता :-
देखि' गोपीनाथाचार्य हर्षित मन।
भट्टाचार्येर नृत्य देखि' हासे प्रभुर गण ॥ 209 ॥
अनुवाद—इसे देखकर श्रीगोपीनाथाचार्य मनमें बहुत
प्रसन्न हुए और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके नृत्यको देखकर
महाप्रभुके सङ्गी हँसने लगे ॥ 209 ॥
श्रीसार्वभौमकी दशाका दर्शन करनेसे गोपीनाथके द्वारा महाप्रभुकी महिमाका कीर्तन :-
गोपीनाथाचार्य कहे महाप्रभुर प्रति।
“सेइ भट्टाचार्येर तुमि कैले एइ गति ॥” 210 ॥
अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्यने महाप्रभुसे कहा, —
“प्रभो! आपने भट्टाचार्यकी ऐसी गति कर दी ॥” 210 ॥
महाप्रभुके द्वारा भक्तका सम्मान :-
प्रभु कहे, —“तुमि भक्त, तोमार सङ्ग हैते।
जगन्नाथ इँहारे कृपा कैल भालमते ॥” 211 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने उत्तर दिया, —“आप भक्त हैं,
आपके सङ्गके कारण ही श्रीजगन्नाथदेवने इनपर पूर्ण
कृपा की है॥” 211 ॥
। 199

[ 6/212-224 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
स्थिर होकर श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुकी स्तुति :-
तबे भट्टाचार्ये प्रभु सुस्थिर करिल।
स्थिर हञा भट्टाचार्य बहु स्तुति कैल॥ 212 ॥
“जगत् निस्तारिले तुमि, — सेह अल्पकार्य।
आमा उद्धारिले तुमि, —ए शक्ति आश्चर्य॥ 213 ॥
तर्क-शास्त्रे जड़ आमि, यैछे लौहपिण्ड।
आमा द्रवाइले तुमि, प्रताप प्रचण्ड ॥” 214 ॥
अनुवाद - तब महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको शान्त किया। स्थिर होकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुकी बहुत स्तुति की। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य कहने लगे, - “जगत्का उद्धार करना तो आपके लिये छोटा सा कार्य है, परन्तु आपने जो मेरा उद्धार किया है, यह वास्तवमें आपकी आश्चर्यमय शक्तिका परिचय है। तर्क-शास्त्रके अध्ययनसे मैं जड़बुद्धि हो गया था। मेरा हृदय लोहेके पिण्डकी भाँति कठोर हो गया था, परन्तु आपने इसे द्रवीभूत कर दिया, आपका प्रभाव अति महान् है॥” 212-214॥
महाप्रभुका अपने स्थानपर आगमन :-
स्तुति शुनि' महाप्रभु निज वासा आइला।
भट्टाचार्य आचार्य-द्वारे भिक्षा कराइला ॥ 215 ॥
अनुवाद- श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी स्तुति सुनकर महाप्रभु अपने वासस्थानपर लौट आये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीगोपीनाथाचार्यके द्वारा महाप्रसाद मँगवाकर महाप्रभुको भोजन करवाया॥ 215 ॥
अगले दिन प्रातःकाल महाप्रभुके द्वारा प्रसादान्न-संग्रह :-
आर दिन प्रभु गेला जगन्नाथ-दरशने।
दर्शन करिला जगन्नाथ-शय्योत्थाने ॥ 216 ॥
पूजारी आनिया माला-प्रसादान्न दिला।
प्रसादान्न-माला पाञा प्रभु हर्ष हैला ॥ 217 ॥
अनुवाद - अगले दिन सूर्योदयसे पहले महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शन करने गये और श्रीजगन्नाथदेवके शय्या-उत्थान अर्थात् मङ्गलारतीके दर्शन किये। पुजारीने श्रीजगन्नाथदेवकी प्रसादी-माला और प्रसाद-अन्न लाकर उन्हें दिया। महाप्रभु प्रसाद-अन्न और माला पाकर बहुत प्रसन्न हुए॥ 216-217 ॥
भट्टाचार्यके घरमें आगमन :-
सेइ प्रसादान्न-माला अञ्चले बाँधिया।
भट्टाचार्येर घरे आइला त्वरायुक्त हञा ॥ 218 ॥
अनुवाद - उस प्रसाद-अन्न और मालाको अपने आँचलमें सावधानीपूर्वक बाँधकर महाप्रभु तेजीसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर आये ॥ 218 ॥
भट्टाचार्यके द्वारा प्रातःकृत्यसे पहले ही महाप्रभुके द्वारा दिये गये प्रसादका सम्मान :-
अरुणोदय-काले हैल प्रभुर आगमन।
सेइकाले भट्टाचार्येर हैल जागरण ॥ 219 ॥
'कृष्ण' 'कृष्ण' स्फुट कहि' भट्टाचार्य जागिला।
कृष्णनाम शुनि' प्रभुर आनन्द बाड़िला ॥ 220 ॥
बाहिरे प्रभुर तेंहो पाइल दरशन।
आस्ते-व्यस्ते आसि' कैल चरण-वन्दन ॥ 221 ॥
बसिते आसन दिया दुँहे त' बसिला।
प्रसादान्न खुलि' प्रभु ताँर हाते दिला ॥ 222 ॥
प्रसादान्न पाञा भट्टाचार्येर आनन्द हैल।
स्नान, सन्ध्या, दन्तधावन यद्यपि ना कैल ॥ 223 ॥
श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपासे जाड्यका नाश :-
चैतन्य-प्रसादे मनेर सब जाड्य गेल।
एइ श्लोक पड़ि' अन्न भक्षण करिल ॥ 224 ॥
अनुवाद - महाप्रभु अरुणोदयके समय ही श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर पहुँच गये। उस समय श्रीभट्टाचार्य अभी नींदसे जागे ही थे और वे उच्च स्वरसे 'कृष्ण' 'कृष्ण' नामका उच्चारण करते हुए उठे थे। उनके मुखसे 'कृष्ण' नाम सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने देखा कि महाप्रभु उनके घरके
200 ।

छठा अध्याय 6/219-234 ]
बाहर आये हैं, तो हड़बड़ाकर वे उनके पास आये (प्रसादग्रहणविषये) कालविचारणा न (नास्ति)। तत्र
और उनके श्रीचरणकमलोंकी वन्दना की। श्रीसार्वभौम (प्रसादग्रहणविषये) देशनियमः न, तथा कालनियमः न,
भट्टाचार्यने महाप्रभुको बैठनेके लिये आसन दिया तथा प्राप्तमन्नं (कृष्णप्रसादं) द्रुतं (तत्क्षणमेव) शिष्टैः (वैष्णवैः)
वे स्वयं भी बैठ गये। तब महाप्रभुने अपने आँचलको भोक्तव्यं (प्रसादार्चने स्थानकाल-व्यवधानादिकं न ग्राह्यम्) इति
खोलकर उसमेंसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके हाथमें प्रसाद हरिः अब्रवीत्।
दिया। प्रसादको पाकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बहुत श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 225-226 ॥
आनन्दित हो गये। यद्यपि अभी तक उन्होंने स्नान, श्रीसार्वभौमके द्वारा प्रसादका सम्मान देखकर महाप्रभुको
सन्ध्या तथा दन्त-धावन आदि कुछ भी नहीं किया था, परमानन्द और प्रेमपूर्वक दोनोंका नृत्य :-
तथापि महाप्रभुकी कृपासे उनके मनकी जड़ता दूर हो देखिया आनन्द हैल महाप्रभुर मन।
गयी और उन्होंने निम्नोक्त श्लोकका पाठ करके प्रसाद प्रेमाविष्ट हञा प्रभु कैला आलिङ्गन ॥ 227 ॥
ग्रहण किया ॥ 219-224 ॥ दुइजने धरि' दुँहे करेन नर्त्तन।
अनुभाष्य- 'अरुणोदय-काल'-सूर्य उदय होनेसे प्रभु-भृत्य दुँहा स्पर्शे, दुँहे फूले मन ॥ 228 ॥
पहलेके चार दण्ड (96 मिनट) समयको 'अरुणोदय-काल' अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यकी प्रसादमें इस प्रकारकी श्रद्धाको
कहते हैं॥ 219 ॥ देखकर महाप्रभु प्रसन्न हो गये और उन्होंने प्रेमाविष्ट
अप्राकृत-प्रसादके सम्मानमें कालाकालका विचार नहीं :- होकर श्रीसार्वभौमका आलिङ्गन किया। दोनों एक-दूसरेको
पद्मपुराण- पकड़कर नृत्य करने लगे। महाप्रभु और दास-दोनोंका
शुष्कं पर्युषितं वापि नीतं वा दूरदेशतः। मन एक-दूसरेको स्पर्श करके प्रफुल्लित हो
प्राप्तिमात्रेण भोक्तव्यं नात्र कालविचारणा ॥ 225 ॥ गया ॥ 227-228 ॥
स्वेद-कम्प-अश्रु दुँहे आनन्दे भासिला।
न देशनियमस्तत्र न कालनियमस्तथा। प्रेमाविष्ट हञा प्रभु कहिते लागिला ॥ 229 ॥
प्राप्तमन्नं द्रुतं शिष्टैर्भुक्तव्यं हरिरब्रवीत् ॥ 226 ॥ श्रीसार्वभौमके उद्धारसे महाप्रभुका आत्मगौरव :-
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 225-226 ॥ “आजि मुञि अनायासे जिनिनु त्रिभुवन।
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रसाद सूख गया हो, भले आजि मुञि करिनु वैकुण्ठ आरोहण ॥ 230 ॥
ही बासा हो या किसी दूरदेशसे लाया गया हो, प्राप्त आजि मोर पूर्ण हैल सर्व अभिलाष।
करनेके साथ-ही-साथ उसे खानेकी विधि है; इसमें सार्वभौमेर हैल महाप्रसादे विश्वास ॥ 231 ॥
समयका विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। सार्वभौमको महाप्रभुका आशीर्वाद :-
भगवान्ने ऐसी आज्ञा दी है कि श्रीकृष्णके अन्न-प्रसादको आजि तुमि निष्कपटे हैला कृष्णाश्रय।
प्राप्त करते ही सज्जन व्यक्ति उसका भोजन करेंगे, कृष्ण आजि निष्कपटे तोमा हैल सदय ॥ 232 ॥
इसमें देश और कालका कोई नियम नहीं है ॥ 225-226 ॥ आजि से खण्डिल तोमार देहादि-बन्धन।
अनुभाष्य- आजि तुमि छिन्न कैले मायार बन्धन ॥ 233 ॥
शुष्कं (रसरहितं) पर्युषितं (पूर्वपूर्वदिनपक्वं) दूरदेशतः आजि कृष्णप्राप्ति-योग्य हैल तोमार मन।
(सुदूरविदेशात्) नीतम् (आनीतं) वा [कृष्णप्रसादं] प्राप्ति-मात्रेण
(लाभमात्रेण) भोक्तव्यं (सादरेण गृहीत्वयं सेव्यं) अत्र वेद-धर्म लङ्घि' कैले प्रसाद भक्षण ॥ "234 ॥
। 201

[ 6/232–239 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—उनके दोनोंके अङ्गोंमें स्वेद, कम्प, अश्रु
आदि सात्त्विक विकार प्रकट होकर उन्हें आनन्दके
समुद्रमें डुबोने लगे। महाप्रभु प्रेममें आविष्ट होकर
कहने लगे,—“आज मैंने अनायास ही त्रिभुवनपर विजय
प्राप्त कर ली है और वैकुण्ठ प्राप्त किया है। आज
मेरी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो गयी हैं, क्योंकि
श्रीसार्वभौमका महाप्रसादमें विश्वास उत्पन्न हुआ है।
आज आपने निष्कपट होकर श्रीकृष्णका आश्रय ग्रहण
किया है और श्रीकृष्णने भी निष्कपट होकर आपपर
कृपा की है। आजसे आपके देहादि-बन्धन टूट गये
हैं और आज आपने मायाके बन्धनोंको तोड़ दिया है।
आज आपका मन श्रीकृष्णको प्राप्त करनेके योग्य
हुआ है, क्योंकि आज आपने वेद-धर्मका उल्लङ्घन
करके प्रसादका सेवन किया है॥” 232–234 ॥
श्रीकृष्णके प्रति निष्कपट शरणागत
भक्तोंकी ही मायासे मुक्ति :—
श्रीमद्भागवत (2/7/42)—
येषां स एष भगवान् दययेदनन्तः
सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्।
ते दुस्तरामतितरन्ति च देवमायां
नेषां ममाहमितिधीः श्वशृगालभक्ष्ये ॥ 235 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 235 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अनन्तस्वरूप भगवान् उनपर
ही अकपट दया करते हैं, जो सब प्रकारसे उनके
श्रीचरणकमलोंका आश्रय ग्रहण करते हैं और वे ही
इस दुस्तर दैवी मायाको पार करते हैं। सियार और
कुत्तेके आहार इस जड़ शरीरमें जिनकी 'मैं' और 'मेरा'
की बुद्धि है, उनपर भगवान् दया नहीं करते॥ 235 ॥
अनुभाष्य—श्रीनारदजीसे भगवान्के लीलावतार-समूहके
कर्म, प्रयोजन और विभूतियोंका वर्णन करके ब्रह्माजी
भगवान्की माया और भक्तोंके माहात्म्यको बता रहे
हैं—
स एष अनन्तः भगवान् येषां (एकान्तप्रपन्नानां) दययेत्
(अनुकम्पां कुर्यात्) यदि निर्व्यलीकं (निष्कपटं यथा स्यात्
तथा) सर्वात्मना (सर्वतोभावेन, न तु अंशेन) आश्रितपदः
(कृष्णपादैकप्रपन्नाः) भवन्ति, ते दुस्तरां (तर्तुमशक्यामपि)
देवमायां अतितरन्ति। एषां (प्रपन्नानां) श्व-शृगाल-भक्ष्ये (पशुभोजन-
योग्ये देहे) अहं-मम-इति-धीः (बुद्धिः) न (नास्ति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 235 ॥
भट्टाचार्यके द्वारा जड़ाभिमानका त्याग :—
एत कहि' महाप्रभु आइला निज-स्थाने।
सेइ हैते भट्टाचार्येर खण्डिल अभिमाने ॥ 236 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु अपने वासस्थानपर
आ गये। उसी समयसे ही श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका
पाण्डित्यका अभिमान दूर हो गया ॥ 236 ॥
श्रीसार्वभौमका सब प्रकारसे भक्तिमार्गका आश्रय :—
चैतन्य-चरण बिना नाहि जाने आन।
भक्ति बिना शास्त्रे अन्य ना करे व्याख्यान ॥ 237 ॥
गोपीनाथका प्रसन्नता-पूर्वक नृत्य :—
गोपीनाथाचार्य ताँर वैष्णवता देखिया।
'हरि' 'हरि' बलि' नाचे हाते तालि दिया ॥ 238 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य-चरणोंके अतिरिक्त अब वे
और कुछ नहीं जानते थे और तबसे वे शास्त्रोंकी
केवल भक्तिपरक व्याख्या ही करते थे। श्रीगोपीनाथाचार्य
भी उनकी वैष्णवताको देखकर 'हरि' 'हरि' बोलकर
ताली बजाते हुए नाचने लगे॥ 237–238 ॥
भट्टाचार्यकी श्रीजगन्नाथकी अपेक्षा
महाप्रभुके प्रति अधिक प्रीति :—
आर दिन भट्टाचार्य आइला दर्शने।
जगन्नाथ ना देखि' आइला प्रभु-स्थाने ॥ 239 ॥
अनुवाद—अगले दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य
श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करने निकले, परन्तु मन्दिर न
जाकर पहले महाप्रभुके दर्शनके लिये उनके वासस्थानपर
आ गये॥ 239 ॥
202 ।

छठा अध्याय 6/240-247 ]
श्रीसार्वभौमकी दीनता :—
दण्डवत् करि' कैल बहुविध स्तुति।
दैन्य करि' कहे निज-पूर्वदुर्मति ॥ 240 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा पूछनेपर कि सर्वश्रेष्ठ साधन क्या है?
महाप्रभुके द्वारा नामसङ्कीर्तनकी महिमाका वर्णन :—
भक्तिसाधन-श्रेष्ठ शुनिते हैल मन।
प्रभु उपदेश कैल नाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 241 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 7/76 संख्या देखें ॥ 242 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्लोककी व्याख्याको
सुनकर भट्टाचार्य विस्मित :—
एइ श्लोकेर अर्थ शुनाइल करिया विस्तार।
शुनि' भट्टाचार्य-मने हैल चमत्कार ॥ 243 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने इस श्लोकका विस्तारपूर्वक
अर्थ सुनाया, जिसे सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके मनमें
चमत्कार हुआ ॥ 243 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुको दण्डवत्
प्रणामकर उनकी अनेक प्रकारसे स्तुति की। तब
उन्होंने दीनतापूर्वक अपनी पहलेकी दुर्मतिकी बात कही
और भक्ति-साधनोंमेंसे सर्वश्रेष्ठ साधनको जाननेकी
इच्छा प्रकट की। तब महाप्रभुने उनको सर्वश्रेष्ठ साधन
श्रीनाम-सङ्कीर्तनका उपदेश दिया ॥ 240-241 ॥
श्रीगोपीनाथकी भविष्यवाणीकी सफलता :—
गोपीनाथाचार्य बले,—“आमि पूर्वे ये कहिल।
शुन, भट्टाचार्य, तोमार सेइ त' हइल ॥” 244 ॥
अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा,—“सुनो भट्टाचार्य !
मैंने आपको पहले जो कहा था, अब आपके साथ वही
हुआ न ॥” 244 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा
प्रश्न करनेपर कि चौंसठ प्रकारकी साधनभक्तिमेंसे
कौनसा अङ्ग सर्वश्रेष्ठ है, तो उसके उत्तरमें महाप्रभुने
कहा,—नामसङ्कीर्तन ही एकमात्र सर्वश्रेष्ठ है ॥ 241 ॥
श्रीगोपीनाथके साथ सम्बन्ध होनेके कारण श्रीसार्वभौमको
महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :—
भट्टाचार्य कहे ताँरे करि' नमस्कारे।
“तोमार सम्बन्धे प्रभु कृपा कैल मोरे ॥ 245 ॥
तुमि—महाभागवत, आमि—तर्क-अन्धे।
प्रभु कृपा कैल मोरे तोमार सम्बन्धे ॥” 246 ॥
बृहन्नारदीय-पुराण (38/126) :—
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥ 242 ॥
अनुवाद—कलियुगमें हरिनाम ही, हरिनाम ही, हरिनाम
ही एकमात्र साधन है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई गति
नहीं है, नहीं है, नहीं है ॥ 242 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीगोपीनाथाचार्यको
प्रणाम करके कहा,—“आपके साथ सम्बन्ध होनेके
कारण ही महाप्रभुने मुझपर कृपा की है। आप
महाभागवत हैं और मैं तर्कका आश्रय करनेवाला
अन्धा था। वास्तवमें आपके साथ सम्बन्धके कारण ही
महाप्रभुने मुझपर कृपाकी है ॥” 245-246 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—
“कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्त्तनात्॥”
अर्थात् “सत्ययुगमें भगवान् विष्णुका ध्यान करनेसे,
त्रेतामें बड़े-बड़े यज्ञोंके द्वारा उनकी आराधना करनेसे
और द्वापरमें विधिपूर्वक उनका अर्चन करनेसे जो फल
मिलता है, वह कलियुगमें केवल भगवन्नामका कीर्तन
करनेसे ही प्राप्त हो जाता है ॥” 242 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टाचार्यको
श्रीजगन्नाथके दर्शनकी अनुमति :—
विनय शुनि' तुष्ट्ये प्रभु कैल आलिङ्गन।
कहिल, —“करह याञा ईश्वर दरशन ॥” 247 ॥
। 203

[ 6/247-254 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके ऐसे दीनतापूर्वक
वचनोंको सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें
आलिङ्गनकर कहने लगे, - "अब जाकर श्रीजगन्नाथदेवका
दर्शन करो ॥ "247 ॥
घर आकर प्रसाद और महाप्रभुके महिमासूचक
श्लोकको भेजना :-
जगदानन्द-दामोदर,- दुइ सङ्गे लञा।
घरे आइल भट्टाचार्य जगन्नाथ देखिया ॥ 248 ॥
उत्तम उत्तम प्रसाद बहुत आनिला।
निजविप्र-हाते दुइ जना सङ्गे दिला ॥ 249 ॥
निज-कृत दुइ श्लोक लिखिया तालपाते।
'प्रभुके दिह' बलि' दिल जगदानन्द-हाते ॥ 250 ॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करनेके बाद
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य श्रीजगदानन्द और श्रीदामोदरको
साथ लेकर अपने घर लौट आये। मन्दिरसे वे अपने
साथ बहुतसा उत्तम-उत्तम प्रसाद भी लाये। उस
प्रसादको अपने एक ब्राह्मण और श्रीजगदानन्द तथा
श्रीदामोदरके हाथोंमें दिया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने अपने
द्वारा रचित दो श्लोकोंको तालपत्रपर लिखकर श्रीजगदानन्द
पण्डितके हाथमें देकर कहा, - 'इसे महाप्रभुको दे
देना ॥ '248-250 ॥
महाप्रभुके द्वारा पत्रकी प्राप्तिसे पहले श्रीमुकुन्दके द्वारा
दोनों श्लोकोंकी नकलके द्वारा रक्षा :-
प्रभु-स्थाने आइला दुँहे प्रसाद-पत्री लञा।
मुकुन्द दत्त पत्र निल तार हाते पाञा ॥ 251 ॥
श्रीजगदानन्दका महाप्रभुको श्रीभट्टाचार्यके
श्लोकवाला पत्र देना :-
दुइ श्लोक बाहिर-भिते लिखिया राखिल।
तबे जगदानन्द पत्री प्रभुके लञा दिल ॥ 252 ॥
प्रभु श्लोक पड़ि' पत्र छिण्डिया फेलिल।
भित्ते देखि' भक्त सब श्लोक कण्ठे कैल ॥ 253 ॥
अनुवाद-श्रीजगदानन्द और श्रीदामोदर, प्रसाद और
पत्रीको लेकर महाप्रभुके पास आये। भीतर जानेसे
पहले श्रीमुकुन्द दत्तने श्रीजगदानन्दके हाथसे वह पत्री
ले ली और उन दो श्लोकोंको बाहर दीवारपर लिख
दिया। तब श्रीजगदानन्दने भीतर जाकर महाप्रभुको वह
पत्री दी। महाप्रभुने उन श्लोकोंको पढ़ते ही पत्रीको
फाड़कर फेंक दिया। परन्तु भक्तोंने दीवारपर लिखे उन
दोनों श्लोकोंको देखकर कण्ठस्थ कर लिया था। वे दो
श्लोक इस प्रकार हैं ॥ 251-253 ॥
ज्ञान-वैराग्य-भक्ति-वितरणकारी श्रीगौरको प्रणाम :-
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (6/74)-
वैराग्यविद्या-निजभक्तियोग-
शिक्षार्थमेकः पुरुषः पुराणः।
श्रीकृष्णचैतन्यशरीरधारी
कृपाम्बुधिर्यस्तमहं प्रपद्ये ॥ 254 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 254 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-वैराग्य, विद्या और निजभक्तियोगकी
शिक्षा देनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्यरूपधारी एक सनातन
पुरुष-जो सर्वदा कृपाके समुद्र हैं, उनके प्रति मैं
शरणागत होता हूँ ॥ 254 ॥
अनुभाष्य-
वैराग्यविद्यानिज-भक्तियोगशिक्षार्थं (कृष्णेतरवस्तुविरक्ति-
परेशानुभूति-निजनाम-रूप-गुण-लीला-सेवनयोग्योपदेशार्थम्) एकः
पुराणः (सनातनः) कृपाम्बुधिः (जड़ासक्तजनेष्वपि परमोत्तम-मुक्त-
जनोचित-व्रजप्रेमदानरूप-दयार्णवः) पुरुषः श्रीकृष्णचैतन्यशरीरधारी
(श्रीकृष्णचैतन्य एव शरीरं धर्तुं शीलमस्य सः) अहं तं प्रपद्ये
(आश्रयामि)।
श्लोक-भावानुवाद-जड़ विषयोंमें आसक्त लोगोंको
भी मुक्तजनोंके लिये उचित परम-उत्तम व्रजप्रेमदानरूप
दयाके समुद्र; श्रीकृष्णसे इतर वस्तुओंसे विरक्ति, पर-ईशकी
अनुभूति और निज नाम-रूप-गुण-लीला-सेवाके योग्य
उपदेश देनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्य-शरीरधारी एक सनातन
पुरुषके मैं शरणागत होता हूँ ॥ 254 ॥
204 |

छठा अध्याय 6/255-261 ]
गुप्तभक्ति-व्यक्तकारी श्रीगौरमें निष्ठा :-
कालान्नष्टं भक्तियोगं निजं यः
प्रादुष्कर्त्तुं कृष्णचैतन्यनामा।
आविर्भूतस्तस्य पादारविन्दे
गाढं गाढं लीयतां चित्तभृङ्गः॥ 255॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 255॥
अमृतप्रवाह भाष्य—कालके प्रभावसे निजभक्तियोगको
प्राय विनष्ट देखकर जो 'श्रीकृष्णचैतन्य'—नामक पुरुष
उसका पुनः प्रचार करनेके लिये आविर्भूत हुए हैं,
उनके श्रीचरणकमलोंमें मेरा चित्तरूपी भ्रमर गाढ़रूपसे
लीन हो जाय॥ 255॥
अनुभाष्य—
कालात् (अन्याभिलाषकर्मज्ञानजड़ासक्तिप्राबल्यात् काल-
धर्मवशेन) नष्टं (लुप्तं) निजं (कृष्णनामरूपगुणलीलामयं) भक्तियोगं
प्रादुष्कर्तुं (पुनः प्रकटयितुं) यः कृष्णचैतन्यनामा [सन्] आविर्भूतः
(प्रकाशितः), तस्य पादारविन्दे (चरण-कमले) चित्तभृङ्गः
(चञ्चलमनाभ्रमरः) गाढं गाढं लीयतां (निमज्जतु)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 255॥
दोनों श्लोकोंके द्वारा श्रीसार्वभौमकी महिमाका विस्तार :-
एइ दुइ श्लोक—भक्तकण्ठे मणिहार।
सार्वभौमेर कीर्त्ति घोषे ढक्कावाद्याकार॥ 256॥
अनुवाद—ये दो श्लोक नगाड़ेके भाँति उच्च स्वरसे
श्रीसार्वभौमकी कीर्ति सब समयके लिये घोषित करते
रहेंगे, क्योंकि ये सब भक्तोंके कण्ठके मणिमय हार
स्वरूप बन गये हैं॥ 256॥
श्रीगौरगत प्राण सार्वभौम :-
सार्वभौम हैला प्रभुर भक्त एकजन।
महाप्रभुर सेवा-बिना नाहि अन्य मन॥ 257॥
'श्रीकृष्णचैतन्य शचीसुत गुणधाम।'
एइ ध्यान, एइ जप, लय एइ नाम॥ 258॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभुके अनन्य
भक्त बन गये। अब वे महाप्रभुकी सेवाके अतिरिक्त
और कुछ भी नहीं जानते थे। 'समस्त गुणोंके सागर
शचीनन्दन श्रीकृष्णचैतन्य'के नामका सब समय जप-कीर्तन
करते और उन्हींका ध्यान करते॥ 257-258॥
महाप्रभुके निकट श्रीसार्वभौमके द्वारा ब्रह्मस्तुतिके एक
श्लोकका पाठान्तरपूर्वक पाठ करना :-
एकदिन सार्वभौम प्रभु-आगे आइला।
नमस्कार करि' श्लोक पड़िते लागिला॥ 259॥
भागवतेर 'ब्रह्मस्तवे'र श्लोक पड़िला।
श्लोक-शेषे दुइ अक्षर-पाठ फिराइला॥ 260॥
अनुवाद—एक दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुके
पास आकर उनको प्रणाम करनेके बाद भागवतसे
ब्रह्म-स्तुतिका एक श्लोक पढ़ा। पढ़ते हुए उन्होंने
श्लोकके अन्तिम चरणके दो अक्षरोंका पाठ बदल
दिया॥ 259-260॥
श्रीमद्भागवत (10/14/8) परिवर्तित :-
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत
यो भक्तिपदे स दायभाक्॥ 261॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 261॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो आपकी अनुकम्पा प्राप्तिकी
उद्देश्यसे अपने कर्मोंके मन्द फलोंको भोग करते-करते
मन, वाक्य और शरीरके द्वारा आपके प्रति भक्ति करते
हुए जीवन यापन करते हैं, वे 'मुक्तिपदे दायभाक्'
अर्थात् वे मुक्तिपदको प्राप्त करते हैं। इस श्लोकका
पाठ करते समय श्रीसार्वभौमने “भक्तिपदे स दायभाक्”—
ऐसा उच्चारण किया था॥ 261॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णके द्वारा गर्व चूर्ण होनेपर ब्रह्मा
एकान्त शरणागत होकर श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं—
तत् (तस्मात्) ते अनुकम्पां (कृपां) सुसमीक्ष्यमाणः (सम्यक्
। 205

[ 6/261-265 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
मन्यमानः) आत्मकृतं (निजानुष्ठितं) विपाकं (कर्मफलं) भुञ्जानः
एव हृद्वाग्वपुभिः (कायमनोवाक्यैः) ते (तुभ्यं) नमः विदधत्
(जड़ीयाहङ्कारं त्यक्त्वा आत्मसमर्पणं कुर्वन्) यः जीवेत्, सः
मुक्तिपदे दायभाक् (योग्यपात्रः) भवति।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥261॥
महाप्रभु द्वारा भागवतके पाठका समर्थन और संरक्षण :-
प्रभु कहे,-" 'मुक्तिपदे'–इहा पाठ हय।
'भक्तिपदे' केने पड़, कि तोमार आशय ॥" 262 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने उनसे कहा,-"श्लोकमें तो
'मुक्तिपदे'–यह पाठ है। आप 'भक्तिपदे' पाठ क्यों कह
रहे हैं? आपका ऐसा कहनेका क्या अभिप्राय है?"॥262॥
भट्टाचार्यकी मुक्तिके स्थानपर
भक्ति-पाठ-रक्षा करनेकी इच्छा :-
भट्टाचार्य कहे,-" 'भक्ति'-सम नहे मुक्तिफल।
भगवद्भक्तिविमुखेर हय दण्ड केवल ॥ 263 ॥
पाषण्ड, मायावादी और विष्णुविद्वेषी
दैत्यगणको सायुज्य मुक्ति :-
कृष्णेर विग्रह येइ सत्य नाहि माने।
येइ निन्दा-युद्धादिक करे ताँर सने ॥ 264 ॥
सेइ दुइर दण्ड हय-'ब्रह्मसायुज्य-मुक्ति'।
तार मुक्ति फल नहे, येइ करे भक्ति ॥ 265 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,-" 'भक्ति'के
समान मुक्तिका फल नहीं है। मुक्ति तो भगवद्भक्ति-विमुख
लोगोंके लिये केवल दण्डमात्र है। श्रीकृष्णके विग्रहको
जो लोग सत्य नहीं मानते और जो लोग उनकी निन्दा
एवं उनसे युद्धादि करते हैं,-इन दोनों प्रकारके
लोगोंको 'ब्रह्मसायुज्य-मुक्ति' रूप दण्ड मिलता है। परन्तु
जो भक्ति करते हैं, उसका फल ऐसी मुक्ति नहीं
है॥263-265॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीभट्टाचार्यने कहा,- (प्रेम)-भक्ति
ही भक्तिका सर्वोत्तम फल है, मुक्ति भक्तिका फल नहीं
है। भगवद्भक्तिसे विमुख व्यक्तिके लिये सायुज्यमुक्ति
केवल एक प्रकारका दण्ड है॥ 263 ॥
अनुभाष्य-श्रीरूप गोस्वामी द्वारा रचित लघुभागवतामृतमें
ब्रह्मलोकके वर्णनके प्रसङ्गमें उनके द्वारा रचित कारिका-
"भक्तेरव्यभिचारायाः प्रेमसैवेव यत्फलम्।
केवलं ब्रह्मभावस्तु विद्वेषेणापि लभ्यते ॥"
अर्थात् "प्रेमसेवा ही अव्यभिचारिणी भक्तिका फल
है। (पक्षान्तरमें) यह निश्चित है कि ब्रह्मभाव (भगवान्के)
विद्वेषके द्वारा भी प्राप्त होता है।"
श्रीबलदेवविद्याभूषणके द्वारा रचित टीका-
"ननु चित्परमाणोर्जीवस्य चिद्राशौ तस्मिन् ब्रह्मणि लयेनैव
भाव्यं, न पुनस्ततो निःसृत्य तदाश्रयस्य कृष्णस्य सेवनं
सम्भवेदिति चेत्? तत्राह-भक्तेरिति। तस्मिन् ब्रह्मणि विलीनतया
स्थितिस्तु भगवता कृष्णेन् निहतानां विद्वेषिणामपि भवेत्,
'सिद्धलोकस्तु तमसाः पारे यत्र वसन्ति हि। सिद्धा ब्रह्मसुखे
मग्ना दैत्याश्च हरिणा हताः ॥' (ब्रह्माण्डपुराणे) इति स्मरणात्।
तस्मात् तल्लीनत्वमात्रं भक्तेः फलं न भवतीति। तमसाः-
अष्टमावरणात् प्रकृतिमण्डलात्, पारे ब्रह्मलोकः- 'चयस्त्विषाम्'
इति न्यायेन निराकारचित्पुअरूपं स्थानमित्यर्थः।
सिद्धाः-अनवज्ञातभगवदङ्घ्रयस्तादृग्ब्रह्मचिन्तकाः तच्चिन्तनात्
विध्वस्त-लिङ्गाः, यत्र वसन्ति-लीयन्ते; तच्चरणावज्ञाताणान्तु
ज्ञानलव-दग्धनामधःपातो भवति, 'येऽन्येऽरविन्दाक्ष !
विमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रं
पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥" (भाः 10/2/32) इति
श्रीभागवतात्।"
अर्थात् "यदि चित्परमाणु जीवका चित्पुञ्ज ब्रह्ममें
ही लय हो गया, ऐसा होनेपर तो ब्रह्मसे निकलकर
जीवके लिये पुनः उसके आश्रय श्रीकृष्णकी सेवा
सम्भव नहीं होगी ? इस आशङ्काके उत्तरमें उल्लिखित
श्लोक कहा गया है। ब्रह्ममें लीन होकर अवस्थान
करना तो अति तुच्छ है, - वह स्थिति तो श्रीकृष्णके
हाथों मारे गये विद्वेषी दैत्योंको भी प्राप्त होती है;
क्योंकि ब्रह्माण्डपुराणमें ही इसका प्रमाण मिलता है
(आदिलीला 5/39 संख्या देखें)। इस श्लोकमें,
"चयस्त्विषाम्' –इस न्यायके अनुसार 'ब्रह्म या सिद्धलोक'
शब्दसे निराकार चित्पुञ्जरूप विशेष स्थानको समझना
होगा। 'सिद्धाः'-शब्दका तात्पर्य, जो सब जीव भगवान्के
चरणकमलोंकी अवज्ञा नहीं करते हैं, अपितु इस
206 ।

छठा अध्याय 6/263-269 ]
प्रकारकी ब्रह्मचिन्ताके द्वारा जिनके लिङ्गदेहका आवरण
दूर हो गया है-वे 'वसन्ति' अर्थात् लय प्राप्त करते
हैं। किन्तु जो भगवान्‌के श्रीचरणोंकी अवज्ञा करनेवाले
हैं, उनका (भाः 10/2/32)-“येऽन्योरविन्दाक्ष” श्लोकके
अनुसार जो सामान्य ज्ञान पहले सहारा था, वह भी
भगवान्‌की अवज्ञा करनेके फलस्वरूप सम्पूर्ण रूपसे
नष्ट हो जाता है, इसलिये उनका अधःपतन होता है
अर्थात् उनको नरककी प्राप्ति होती है ॥ "263-265 ॥
पाँच प्रकारकी मुक्ति :-
यद्यपि मुक्ति हय एइ पञ्च-प्रकार ।
सालोक्य-सामीप्य-सारूप्य-सार्ष्टि-सायुज्य आर ॥ 266 ॥
सायुज्यके अतिरिक्त चार प्रकारकी
मुक्तियाँ भक्तिकी आनुषङ्गिक :-
'सालोक्यादि' चारि यदि हय सेवा-द्वार।
तबु कदाचित् भक्त करे अङ्गीकार ॥ 267 ॥
नरक-सदृश सायुज्य 'भक्तिविनाशक'
होनेके कारण सर्वथा परित्याज्य :-
'सायुज्य' शुनिते भक्तेर हय घृणा-भय।
'नरक' वाञ्छये, तबु सायुज्य ना लय ॥ 268 ॥
अनुवाद-यद्यपि मुक्ति 'सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य,
सार्ष्टि और सायुज्य'-पाँच प्रकारकी होती है, तथापि
सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्तियाँ यदि भगवद्-सेवाका
द्वार हों, तो कदाचित् भक्त उन्हें स्वीकार करते हैं।
'सायुज्य' मुक्तिका नाम सुनते ही भक्तोंको उससे घृणा
और भय होता है। भक्त सायुज्य मुक्तिको अङ्गीकार
करनेके स्थानपर नरक जाना श्रेयस्कर समझते
हैं॥ 266-268 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि
और सायुज्य, - इन पाँच प्रकारकी मुक्तियोंमेंसे पहली
सालोक्यादि चार इतनी निन्दनीय नहीं हैं, क्योंकि वे
भगवत्सेवाके द्वार-स्वरूप हैं। तथापि श्रीकृष्णभक्त उपरोक्त
चार प्रकारकी मुक्तियोंको भी स्वीकार नहीं करते,
क्योंकि वे जन्म-जन्मान्तर श्रीकृष्णभक्तिकी ही अभिलाषा
करते हैं। 'सायुज्य'-शब्द सुनने मात्रसे भक्तमें उसको
तुच्छ समझकर घृणा और 'भक्तिविरोधिकारी अपराध'
जानकर भय होता है ॥ 267-268 ॥
दो प्रकारके सायुज्य :-
ब्रह्मे, ईश्वरे सायुज्य दुइ त' प्रकार।
ब्रह्म-सायुज्य हैते ईश्वर-सायुज्य धिक्कार ॥ 269 ॥
अनुवाद-सायुज्य मुक्ति दो प्रकारकी है-
'ब्रह्म-सायुज्य' और 'ईश्वर-सायुज्य'। ब्रह्म-सायुज्यसे
ईश्वर-सायुज्य और भी अधिक धिक्कारके योग्य है॥269॥
अमृतप्रवाह भाष्य-सायुज्य दो प्रकारका होता
है—ब्रह्मसायुज्य और ईश्वरसायुज्य। मायावादी वेदान्तियोंके
मतानुसार जीवका चरमफल—ब्रह्मसायुज्य है; पातञ्जलके
मतानुसार, कैवल्य-अवस्थामें ईश्वर-सायुज्य है। इन
दोनों प्रकारके सायुज्योंमेंसे ईश्वरसायुज्य ही अधिक
घृणित है। ब्रह्मसायुज्यमें निर्विशेषज्ञानके द्वारा निर्विशेष
गति प्राप्त होती है; किन्तु सविशेष-ईश्वरका ही ध्यान
करके जो कैवल्यरूपी ईश्वरसायुज्य प्राप्त होता है, वही
वासनादोषके कारण और अधिक पतनरूपी फल है।
“क्लेशकर्मविपाकाशयैर परामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ।”
अर्थात् “क्लेशों और कर्मफलकी वासनाओंसे अस्पृष्ट
विशेष पुरुष ही ईश्वर है।", “स पूर्वेषामपि गुरुः
कालेनावच्छेदात् ।” अर्थात् “वह सनत् कुमारादिसे भी
पूर्व विद्यमान है और कालसे कभी भी ढका या
प्रभावित नहीं होता।” इसके द्वारा सविशेष-ईश्वरका
नित्यत्व देखा जाता है। पुनः इस पातञ्जलमें कैवल्यपादमें
“पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा
वा चितिशक्तिरिति” अर्थात् “प्रकृतिके तीनों गुणोंके
प्रभाव दूर होनेपर शुद्ध आत्मा अपने चिद्-स्वरूपमें
कैवल्य-मुक्तिको प्राप्त होती है।” इस सूत्रके द्वारा
साधककी सिद्धावस्थामें अन्य पुरुष-ईश्वरके अवस्थानका
अभाव है। सविशेषतत्त्वके आश्रयके छलसे योगमार्ग
अत्यन्त तुच्छ है। तात्पर्य यह है कि (योगपन्थामें)
सविशेष तत्त्वकी उपासनासे सविशेष-फल ना होकर
अत्यन्त सुदूरवर्ती धिक्कारयोग्य फल प्राप्त होता है ॥ 269 ॥
। 207

[ 6/270-278 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सेव्यकी निष्काम-सेवाके अतिरिक्त सेवककी
किसी भी मुक्तिकी कामना नहीं :-
श्रीमद्भागवत (3/29/13)-
सालोक्य-सार्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमप्युत।
दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥ २70 ॥
अनुवाद-[मेरे द्वारा] सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्टि
(ऐश्वर्यसम्पत्ति), सामीप्य (निकटवास), सारूप्य
(चतुर्भुजाकार) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति)
प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते, क्योंकि
मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी
अभिलाषा नहीं है॥ 270 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/207 संख्या देखें ॥ 270 ॥
महाप्रभुके द्वारा मुक्तिपदकी व्याख्या :-
प्रभु कहे,–“मुक्तिपदे'र आर अर्थ हय।
मुक्तिपद-शब्दे 'साक्षात् ईश्वर' कहय ॥ 271 ॥
मुक्ति पदे याँर, सेइ 'मुक्तिपद' हय।
किम्वा नवम पदार्थ 'मुक्तिर' समाश्रय ॥ 272 ॥
दुइ-अर्थे 'कृष्ण' कहि, केने पाठ फिरि।”
सार्वभौम कहे,-"ओ-पाठ कहिते ना पारि ॥ 273 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मुक्तिपदके और भी
अर्थ हैं। मुक्तिपद-शब्दसे 'साक्षात् ईश्वर'को कहा जाता
है। मुक्ति जिनके चरणोंमें रहती है, वे 'मुक्तिपद' हैं।
अथवा [भागवतके दस लक्षणोंमेंसे] नौवें पदार्थ मुक्तिके
जो सम्पूर्ण आश्रय हैं, वे मुक्तिपद हैं। इसलिये जब ये
दोनों अर्थ 'मुक्तिपद'के द्वारा श्रीकृष्णको ही कहते हैं,
तब क्यों पाठमें परिवर्तन करते हो?" श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यने कहा,-"मैं वह पाठ [मुक्तिका उच्चारण] नहीं
कर सकता ॥ 271-273 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - जिनके चरणोंमें मुक्ति है,
वे-'मुक्तिपद' अर्थात् 'दसवें' पदार्थ श्रीकृष्ण हैं; अथवा
नौवाँ पदार्थ जो मुक्ति है, वह जिनको आश्रय करके
रहती है, वे-श्रीकृष्ण हैं॥ 272 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 2/91-92 संख्या देखें ॥ 272 ॥
तथापि श्रीसार्वभौमके द्वारा मुक्ति-शब्दके 'सायुज्य' अर्थका
अनादर और 'भक्ति'-शब्दका आदर :-
यद्यपि तोमार अर्थ एइ शब्दे कय।
तथापि 'आश्लिष्य-दोषे' कहन ना याय ॥ 274 ॥
यद्यपि 'मुक्ति'-शब्देर हय पञ्च वृत्ति।
'रूढ़िवृत्यॆ' कहे तबु 'सायुज्ये' प्रतीति ॥ 275 ॥
मुक्ति-शब्द कहिते मने हय घृणा-त्रास।
भक्ति-शब्द कहिते मने हय त' उल्लास ॥ २76 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा, - यद्यपि आपके
अर्थोंमें 'मुक्तिपद' श्रीभगवान् ही हैं, तथापि 'आश्लिष्य-दोष'
(संशय) के कारण 'मुक्तिपद' शब्द कहा नहीं जाता।
यद्यपि 'मुक्ति' शब्दकी पाँच प्रकारकी वृत्तियाँ हैं, तथापि
रूढ़िवृत्तिके द्वारा मुक्ति शब्दसे 'सायुज्य'की ही प्रतीति
होती है। मुक्ति-शब्द कहते ही मनमें घृणा होती है
और भय लगता है। परन्तु भक्ति-शब्द कहते ही मनमें
उल्लास हो जाता है॥ 274-276 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'आश्लिष्य-दोष'-जिसका दो
प्रकारसे अर्थ हो सकता है; जिसमें मुख्य अर्थकी कुछ
हानि होती है, वह दोष। 'रूढ़िवृत्ति'-मुख्यवृत्ति ॥ 274-275 ॥
छठे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
श्रीसार्वभौमकी निष्काम भक्तिको
देखकर महाप्रभुकी प्रसन्नता :-
शुनिय़ा हासेन प्रभु आनन्दित मने।
भट्टाचार्य कैल प्रभु दृढ़ आलिङ्गने ॥ 277 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके वचनोंको सुनकर
महाप्रभु बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उनका प्रगाढ़
आलिङ्गन किया ॥ 277 ॥
ग्रन्थकारके द्वारा श्रीकृष्णचैतन्यकी
कृपाकी महिमाका कीर्तन :-
येइ भट्टाचार्य पड़े पड़ाय मायावादे।
ताँर ऐछे वाक्य स्फुरे चैतन्य-प्रसादे ॥ 278 ॥
208 ।

छठा अध्याय 6/278-286 ]
लोहाके यावत् स्पर्शि' हेम नाहि करे।
तावत् स्पर्शमणि केह चिनिते ना पारे ॥ 279 ॥
अनुवाद-[ग्रन्थकार श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी
कह रहे हैं] जो श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य मायावादको पढ़ते
और पढ़ाते थे, आज महाप्रभुकी कृपासे उनके मुखसे
ऐसे वाक्य निकल रहे हैं। जब तक अपने स्पर्शसे वह
लोहेको सोना नहीं बनाती, तब तक स्पर्शमणिको कोई
पहचान नहीं पाता ॥ 278-279 ॥
महाप्रभुका 'परमेश्वर श्रीकृष्ण' होनेमें सभीका विश्वास :-
भट्टाचार्येर वैष्णवता देखि' सर्वजन।
प्रभुके जानिल,-'साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन' ॥ 280 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी वैष्णवताको देखकर
सभी जान गये कि महाप्रभु 'साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन'
श्रीकृष्ण हैं ॥ 280 ॥
काशीमिश्रादिकी महाप्रभुके चरणोंमें शरणागति :-
काशीमिश्र-आदि यत नीलाचलवासी।
शरण लइल सबे प्रभु-पदे आसि' ॥ 281 ॥
अनुवाद-तदुपरान्त काशीमिश्रादि जितने नीलाचलवासी
थे, सभीने आकर महाप्रभुके चरणकमलोंकी शरण ग्रहण
की ॥ 281 ॥
इसके बाद महाप्रभुका दक्षिण भारतमें भ्रमण :-
सेइ सब कथा आगे करिब वर्णन।
एबे कहि प्रभुर दक्षिण-यात्रा-विवरण ॥ 282 ॥
अनुवाद-इन सब कथाओंका मैं बादमें वर्णन
करूँगा, अभी मैं महाप्रभुकी दक्षिण-भारतकी यात्राका
वर्णन करूँगा ॥ 282 ॥
सार्वभौम करे यैछे प्रभुर सेवन।
यैछे परिपाटी करे भिक्षा-निर्वाहण ॥ 283 ॥
विस्तारिया आगे ताहा करिब वर्णन।
एइ महाप्रभुर लीला-सार्वभौम-मिलन ॥ 284 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने जिस प्रकार भिक्षादि
करवाकर अनेक प्रकारसे महाप्रभुकी सेवा की, इन सब
लीलाओंका मैं विस्तारपूर्वक बादमें वर्णन करूँगा। यह
महाप्रभुकी श्रीसार्वभौम-मिलन लीला है ॥ 283-284 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला पन्द्रहवाँ अध्याय देखें ॥ 284 ॥
छठे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
श्रीसार्वभौम और चैतन्य महाप्रभुके संवादको
श्रवण करनेसे निष्काम भक्तिकी प्राप्ति,
यह कर्मकाण्डीय फलश्रुति मात्र नहीं :-
इहा येइ श्रद्धा करि' करये श्रवण।
ज्ञान-कर्मपाश हैते हय विमोचन ॥ 284 ॥
श्रद्धाय चैतन्यलीला सुने येइजन।
अचिरे मिलये ताँरे चैतन्य-चरण ॥ 285 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 286 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे सार्वभौमोद्धारो
नाम षष्ठ-परिच्छेदः।
अनुवाद-इस लीलाको जो श्रद्धापूर्वक सुनते हैं, वे
ज्ञान और कर्मके बन्धनसे छूट जाते हैं। जो
श्रद्धापूर्वक श्रीचैतन्यलीलाको सुनते हैं, उन्हें शीघ्र ही
महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है। श्रीरूप-रघुनाथ
गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास
इस चैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 284-286 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतमें मध्यखण्डमें सार्वभौम-उद्धार
नामक छठे अध्यायका अनुवाद समाप्त।
। 209

इस पृष्ठ पर कोई पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है, यह पृष्ठ पूरी तरह से रिक्त (blank) है।

सातवाँ अध्याय
कथासार—माघमासके शुक्ल पक्षमें महाप्रभुने संन्यास
ग्रहण करके फाल्गुन मासमें नीलाचलमें वास किया।
फाल्गुनमासमें दोलयात्राका दर्शन करके चैत्रमासमें
श्रीसार्वभौमका उद्धार किया। वैशाखमासमें दक्षिणकी
ओर यात्रा की। अकेले ही दक्षिणमें भ्रमण करेंगे,—ऐसा
प्रस्ताव रखनेपर, श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनके साथ 'कृष्णदास'
नामक एक ब्राह्मणको भेजा। जानेके समय श्रीसार्वभौमने
महाप्रभुको साथ ले जानेके लिये चार कौपीन-बहिर्वास
दिये और श्रीरामानन्द रायके साथ गोदावरीके तटपर
साक्षात्कार करनेके लिये अनुरोध किया। आलालनाथ
तक श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि कुछ भक्त महाप्रभुके साथ
गये थे। उन सबको वहीं छोड़कर केवल कृष्णदासको
साथ ले जाना स्वीकार करके महाप्रभु 'कृष्ण' 'कृष्ण'
बोलते-बोलते चलने लगे। जिस गाँवमें वे रात्रिमें वास
करते थे, वहाँ शरणागत व्यक्तियोंमें शक्ति सञ्चार
करके उसे सम्पूर्ण देशको ही 'वैष्णव' बनानेकी आज्ञा
देते। वे सब (महाप्रभुसे शक्ति-प्राप्त लोग) पुनः दूसरे
लोगोंकी भक्तिकी शिक्षा देकर अन्यान्य गाँवोंमें भक्तोंकी
संख्यामें वृद्धि करने लगे। इस प्रकार सबको वैष्णव
बनाते हुए महाप्रभु कूर्मस्थानमें पहुँचे, वहाँ 'कूर्म'-नामक
ब्राह्मणपर कृपा की और 'वासुदेव' नामक ब्राह्मणका
गलितकुष्ठ (ऐसा कोढ़, जिसमें कीड़े पड़ गये हों, उस)
रोगसे उद्धार किया। वासुदेवका उद्धार करके 'वासुदेवामृतप्रद'
नामक महाप्रभुका एक नाम हुआ।
—(अमृतप्रवाहभाष्य)
'वासुदेवामृतप्रद'-प्रभुको प्रणाम :-
धन्यं तं नौमि चैतन्यं वासुदेवं दयार्द्रधीः।
नष्टकुष्ठं रूपपुष्टं भक्तितुष्टं चकार यः॥1॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने दयार्द्रबुद्धि (दयासे द्रवित
बुद्धि) होकर 'वासुदेव'-नामक भक्तको कोढ़-रोगसे मुक्त
करके सुन्दर रूपमें पुष्ट किया और उसे भक्ति देकर
सन्तुष्ट किया था, उन्हीं धन्य श्रीचैतन्यदेवको मैं प्रणाम
करता हूँ॥ 1 ॥
अनुभाष्य—
यः दयार्द्रधीः (दयया आर्द्रा धीर्यस्य सः) [कुष्ठ रोगाक्रान्तं]
वासुदेवं नष्टकुष्ठं (विगतकुष्ठरोगं) रूपपुष्टं (सौन्दर्यमयं) भक्तितुष्टं
चकार, तं धन्यं चैतन्यं नौमि।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो,
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
और श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो ॥ 2 ॥
माघ मासमें संन्यास, फाल्गुन मासमें पुरीधाममें वास,
चैत्र मासमें श्रीसार्वभौमका उद्धार, वैशाख मासमें
दक्षिण भारत जानेकी इच्छा :-
एइमते सार्वभौमेर निस्तार करिल।
दक्षिण-गमने प्रभुर इच्छा उपजिल ॥ 3 ॥
माघ-शुक्लपक्षे प्रभु करिल संन्यास।
फाल्गुने आसिया कैल नीलाचले वास ॥ 4 ॥
फाल्गुनेर शेषे दोलयात्रा से देखिल।
प्रेमावेशे बहुविध नृत्यगीत कैल ॥ 5 ॥
चैत्रे रहि' कैल सार्वभौम-विमोचन।
वैशाखेर प्रथमे दक्षिण याइते हैल मन ॥ 6 ॥
। 211