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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

14/72-75 ]
फेंकी हुई जूठी हाँड़ियोंके ऊपर निमाइका बैठना :-
उच्छिष्ट-गर्त्ते त्यक्त-हाण्डीर उपर।
बसियाछेन सुखे प्रभु देव-विश्वम्भर ॥ 73 ॥
अनुवाद—एक दिन शचीदेवी किसी कारणसे क्रोधित
होकर निमाइको डाँटते हुए उन्हें पकड़ने गयीं, किन्तु
वे भाग गये। एक गढ्ढे, जिसमें जूठी हाँड़ियाँ पड़ी थीं,
उसके ऊपर प्रभु विश्वम्भर सुखपूर्वक बैठ गये ॥ 72-73 ॥
अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड सातवाँ अध्याय,-
“विष्णुनैवेद्येर यत वर्ज्य हाँड़िगण।
बसिलेन प्रभु, हाँड़ि करिया आसन ॥ 162 ॥
माये आसि' देखिया करेन हाय हाय।
ए स्थानेते बाप, बसिवारे ना युयाय ॥ 167 ॥
प्रभु बोले,-सर्वत्र मोर अद्वितीय ज्ञान।
एसब हाँड़िते मूले नाहिक दूषण ॥ 177 ॥
विष्णुर रन्धन-स्थाली कभु नाहि दुष्ट हय।
से हाँड़ि-परशे आर स्थान शुद्ध हय ॥ 178 ॥
“विष्णु नैवेद्य बनानेके बाद हाँड़ियाँ जहाँ फेंक दी
जाती थीं, वहाँ जाकर महाप्रभु एक हाँड़ीको आसन
बनाकर बैठ गये। शचीमाता यह देखकर ‘हाय’ ‘हाय’
करती हुई आयीं और कहने लगीं, - ‘बेटा! यह स्थान
बैठनेके योग्य नहीं है।' महाप्रभु बोले, - 'मेरा तो सर्वत्र
ही अद्वितीय ज्ञान है। इन सब हाँड़ियोंके मूलमें कोई
दोष नहीं है। जिस हाँड़ीमें विष्णुके लिये भोग बनाया
जाता है, वह कभी भी दूषित नहीं हो सकती और उस
हाँड़ीके स्पर्शसे सभी स्थान पवित्र हो जाते हैं'।” चैःचः
अन्त्यलीला, 4/174-176 संख्या द्रष्टव्य है। (भाः
11/28/4- श्रीकृष्णने उद्धवसे कहा)-
“किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत्।
वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥”
“अद्वयज्ञान-सम्बन्धरहित सभी मायिक प्रतीति-युक्त
वस्तुएँ वास्तवमें 'अवस्तु' और 'द्वैत' हैं, उसमें यह भली
है अथवा बुरी है, इसके सम्बन्धमें मनके द्वारा जो
चिन्तन होता है अथवा वाक्यके द्वारा जो कहा जाता
है, वह सब असत्य है।” अर्थात्
“भद्राभद्र-वस्तुज्ञान नाहि अप्राकृते।”
“अप्राकृत वस्तुमें 'भले-बुरे' की बुद्धि करना
उचित नहीं है।”
“द्वैते भद्राभद्र-ज्ञान-सब मनोधर्म।
एइ भाल, एइ मन्द, एइ सब भ्रम ॥”
“द्वैत-भावसे जो भले-बुरेका ज्ञान है, वह सब
मनोधर्म है। यह भला है, यह बुरा है-यह सब मनका
भ्रम है।” (भाः 11/19/45)-
“गुण-दोष-दृशिर्दोषो गुणस्तूभय-वर्ज्जितः ।”
“(वास्तव वस्तुसे सम्बन्धरहित होकर) गुण और
दोषका दर्शन 'दोष' और इन दोनों (गुण और दोष) को
नहीं देखना ही गुण है।” (भाः 11/21/3-4)-
“शुद्ध्यशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु।
द्रव्यस्य विचिकित्सार्थं गुणदोषौ शुभाशुभौ ॥ 3 ॥
धर्मार्थं व्यवहारार्थं यात्रार्थमिति चानघ ॥ 4 क ॥”
“हे निष्पाप उद्धव ! द्रव्य योग्य अथवा अयोग्य है,
इस सन्देहके निवारणके लिये द्रव्योंके धर्मार्थ (धर्म-सम्पादनके
लिये) शुद्धि और अशुद्धि, व्यवहारार्थ (समाजका
व्यवहार सुचारु रूपसे चले इसलिये) गुण और दोष
तथा देहयात्रा (जीवन निर्वाहकी सुविधा) के लिये शुभ
और अशुभ-निरूपण विहित है ॥” 73 ॥
शचीकी पुत्रको अशुद्धिके विचारके
द्वारा सुधारनेकी चेष्टा :-
शची आसि' कहे, - “केने अशुचि धुँइला।
गङ्गास्नान कर याइ'- अपवित्र हइला ॥” 74 ॥
अनुवाद-शचीमाताने आकर कहा,- “तुमने इस
अपवित्र स्थानका स्पर्श क्यों किया ? तुम अपवित्र हो
गये हो, इसलिये अब जाकर गङ्गामें स्नान करके
आओ ॥” 74 ॥
पुत्रका माताको ब्रह्मज्ञान-उपदेश :-
इहा शुनि' माताके कहिल ब्रह्मज्ञान।
विस्मिता हइया माता कराइला स्नान ॥ 75 ॥
चौदहवाँ अध्याय | 185

[ 14/75-84
अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने माताको ब्रह्मज्ञानका
उपदेश दिया, जिसे सुनकर माता विस्मित हो गयीं और
वे स्वयं उनको स्नान कराने लगीं॥75॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा,—‘हे माता! उच्छिष्ट
और अनुच्छिष्ट, ये दोनों मनुष्यके भावमात्र हैं, वास्तवमें
इसमें कुछ भी सत्य नहीं है। आपने इन बर्तनोंमें
विष्णुके लिये भोग-द्रव्य पकाकर विष्णुको अर्पण किया
है, इसलिये ये सब बर्तन कभी भी उच्छिष्ट नहीं हो
सकते। आत्मा नित्य पवित्र वस्तु है, उसके लिये
उच्छिष्टादिका क्या विचार है? इस प्रकारके ब्रह्मज्ञानको
सुनकर शचीमाता विस्मित हो गयीं और उनको स्नान
कराने लगीं॥” 75॥
इति अमृतप्रवाह-भाष्ये चतुर्दश परिच्छेद।
चौदहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य पूर्ण हुआ।
शयनके समय शचीके द्वारा देवताओंका दर्शन :—
कभु पुत्रसङ्गे शची करिला शयन।
देखे, दिव्यलोक आसि' भरिल भवन॥76॥
शची बले,—“याह, पुत्र, बोलाह बापेरे।”
मातृ-आज्ञा पाइया प्रभु चलिला बाहिरे॥77॥
माताके कहनेपर चलते समय चरणोंमें
नूपुर न होने पर भी नूपुर-ध्वनि :—
चलिते चरणे नूपुर बाजे झन्झन्।
शुनि' चमकित हैल पिता-मातार मन॥78॥
अनुवाद—एक दिन शचीमाता निमाइके साथ सो
रही थीं, तो उन्होंने देखा कि दिव्य लोगोंसे उनका घर
भर गया। शचीमाताने कहा,—“जाओ पुत्र, अपने पिताजीको
बुला लाओ।” माताकी आज्ञा पाकर महाप्रभु बाहर चले
और चलनेपर उनके चरणोंमें नूपुरोंकी झङ्कार होने
लगी, जिसे सुनकर पिता-माता चकित हो गये॥76-78॥
मिश्रका विस्मय :—
मिश्र कहे,—“एइ बड़ अद्भुत काहिनी।
शिशुर शून्यपदे केने नूपुरेर ध्वनि॥”79॥
अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रने कहा,—‘यह बड़े आश्चर्यकी
बात है! बालकके खाली पाँवोंसे नूपुरकी ध्वनि कैसे
आ रही है?॥”79॥
देवताओंके दर्शनसे शचीका विस्मय :—
शची कहे,—“आर एक अद्भुत देखिल।
दिव्य दिव्य लोक आसि' अङ्गन भरिल॥80॥
किबा कोलाहल करे, बुझिते ना पारि।
काहाके वा स्तुति करे, अनुमान करि॥”81॥
अनुवाद—शचीमाताने कहा,—‘मैंने भी एक आश्चर्य
देखा था। दिव्य-दिव्य लोग हमारे आङ्गनमें आये और
सारा आँगन भर गया था। वे कोलाहल करते हुए क्या
कह रहे थे, उसे मैं समझ नहीं पा रही थी। मेरे
अनुमानसे वे लोग किसीकी स्तुति कर रहे थे॥”80-81॥
दोनोंकी निमाइके कुशलकी चिन्ता :—
मिश्र बले,—“किछु हउक्, चिन्ता किछु नाइ।
विश्वम्भरेर कुशल हउक्,—एइमात्र चाइ॥”82॥
अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रने कहा,—‘कुछ भी हो,
चिन्ताकी कोई बात नहीं है। मैं केवल यही चाहता हूँ
कि हमारा पुत्र विश्वम्भर कुशलसे रहे॥”82॥
महाप्रभुकी चपलता देखकर मिश्रके
द्वारा तीव्र भर्त्सना :—
एकदिन मिश्र पुत्रेर चापल्य देखिया।
धर्म-शिक्षा दिल बहु भर्त्सना करिया॥83॥
अनुवाद—एक दिन जगन्नाथ मिश्रने निमाइकी
चपलताको देखकर उसको बहुत फटकार लगायी और
उसे धर्मके सम्बन्धमें शिक्षा प्रदान की॥83॥
रात्रिमें स्वप्न-दर्शन—एक ब्राह्मणके
द्वारा मिश्रकी भर्त्सना :—
रात्रे स्वप्न देखे,—एक आसि' ब्राह्मण।
मिश्रेरे कहये किछु सरोष वचन॥84॥
186 | श्रीचैतन्यचरितामृत

14/84–92 ]
“मिश्र, तुमि पुत्रेर तत्त्व किछुइ ना जान।
भर्त्सन-ताड़न कर,—पुत्र करि' मान'॥” 85 ॥
अनुवाद—उसी रात्रि जगन्नाथ मिश्रने स्वप्नमें देखा
कि एक ब्राह्मण आकर उन्हें क्रोधित होकर कह रहा
है,—“मिश्र, तुम अपने पुत्रके तत्त्वके सम्बन्धमें कुछ भी
नहीं जानते हो, उसे केवल अपना पुत्र मानकर उसे
डाँट-फटकार लगाते हो॥” 84-85 ॥
मिश्रका अप्राकृत स्नेहपूर्ण उत्तर :—
मिश्र कहे,—“देव, सिद्ध, मुनि केने नय।
ये से बड़ हउक्, एबे आमार तनय ॥ 86 ॥
पुत्रेर लालन-शिक्षा—पितार स्वधर्म।
आमि ना शिखाले, कैछे जानिबे धर्म-मर्म॥” 87 ॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथ मिश्रने कहा,—“यह देव, सिद्ध,
मुनि ही क्यों न हो अथवा कोई महान् पुरुष ही क्यों
न हो, किन्तु अभी तो मेरा पुत्र ही है। पुत्रका
लालन-पालन और उसे शिक्षा देना, यह पिताका
स्वधर्म है। यदि मैं इसे शिक्षा नहीं दूँगा, तो धर्मके
रहस्यको कैसे जानेगा ? ॥” 86-87 ॥
विप्र और मिश्रकी उक्ति और प्रत्युक्ति :—
विप्र कहे,—“एइ यदि दैव-सिद्ध हय।
स्वतःसिद्धज्ञान, तबे शिक्षा व्यर्थ हय ॥” 88 ॥
मिश्र कहे,—“पुत्र केने नहे नारायण।
तथापि पितार धर्म—पुत्रके शिक्षण ॥” 89 ॥
अनुवाद—ब्राह्मणने कहा,—“यदि तुम्हारा पुत्र सिद्ध
देवता है, तो इसका ज्ञान स्वतः सिद्ध ही है, तब
तुम्हारा इसे शिक्षा देना व्यर्थ है।” जगन्नाथ मिश्रने उत्तर
दिया,—“मेरा पुत्र यदि स्वयं नारायण ही क्यों न हो,
तो भी पुत्रको शिक्षा देना पिताका धर्म है॥” 88-89 ॥
अनुभाष्य—(श्रीजगन्नाथ मिश्रका) अपने पुत्र निमाईको
अशिक्षित और अनभिज्ञ समझकर उसे शिक्षा देकर
ज्ञानी बनानेकी अभिलाषाको देखकर ब्राह्मणने मिश्रसे
कहा,—“तुम्हारे पुत्रके नित्यसिद्ध देवता होनेके कारण
उसके नित्यसिद्ध स्वाभाविक ज्ञानको मूर्खता समझनेके
कारण तुम्हारा उसे शिक्षा देना व्यर्थ है, इसलिये ऐसा
करना तुम्हारे लिये अनुचित है॥” 88 ॥
महाप्रभुके प्रति मिश्रका शुद्ध वात्सल्य-स्नेह :—
एइमते दुँहे करेन धर्मेर विचार।
शुद्ध वात्सल्य मिश्रेर, नाहि जाने आर ॥ 90 ॥
अनुवाद—इस प्रकार दोनों धर्मका विचार करने
लगे। किन्तु श्रीजगन्नाथ मिश्रका महाप्रभुके प्रति
शुद्ध-वात्सल्य भाव होनेके कारण वे इसके अतिरिक्त
और कुछ नहीं जानते॥ 90 ॥
अनुभाष्य—(भक्तिरसामृतसिन्धु पश्चिम विभाग चतुर्थ
लहरी)—
“विभावाद्यैस्तु वात्सल्यं स्थायी पुष्टिमुपागतः।
एष 'वत्सल'-नामात्र प्रोक्तः ॥”
“वात्सल्य-रतिको स्थायीभाव, विभावादिके द्वारा पुष्टि
लाभ करनेपर उसे पण्डित लोग 'वात्सल्य-भक्तिरस'
कहते हैं।” (भाः 10/8/45)—
“त्रय्या चोपनिषद्भिश्च सांख्ययोगैश्च सात्वतैः।
उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं सामन्यतात्मजम् ॥”
“तीनों वेदों, उपनिषदों, सांख्य, योग और
सात्वत-शास्त्रोंमें जिनके माहात्म्यका गान किया गया है,
यशोदादेवी उन श्रीहरिको अपनी कोखसे उत्पन्न पुत्र
मानती हैं॥” 90 ॥
स्वप्न समाप्त होनेपर मिश्रका विस्मित होना और
बन्धुओंको स्वप्नके सम्बन्धमें बताना :—
एत शुनि' द्विज गेला हञा आनन्दित।
मिश्र जागिया हइला परम विस्मित ॥ 91 ॥
बन्धु-बान्धव-स्थाने स्वप्न कहिल।
शुनिया सकल लोक विस्मित हइल ॥ 92 ॥
चौदहवाँ अध्याय | 187

[ 14/91-97
एइ मत शिशुलीला करे गौरचन्द्र।
दिने दिने पिता-मातार बाड़िल आनन्द ॥ 93 ॥
अनुवाद-यह सुनकर वह ब्राह्मण आनन्दित होकर चला गया और जगन्नाथ मिश्र निद्रासे उठकर परम विस्मित हुए। जगन्नाथ मिश्रने अपने बन्धु-बान्धवोंको स्वप्नके विषयमें बतलाया, जिसे सुनकर सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। श्रीगौरचन्द्र इस प्रकार बाल्यलीला करते, जिसे देखकर पिता-माताका आनन्द दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता ॥ 91-93 ॥
निमाइके हाथमें कलम (खड़िया) :-
कत दिने मिश्र पुत्रेर हाते खड़ि दिल।
अल्प दिने द्वादश-फला अक्षर शिखिल ॥ 94 ॥
अनुवाद-कुछ दिनोंके बाद जगन्नाथ मिश्रने निमाइके हाथोंमें कलम दी और कुछ ही दिनोंमें वे द्वादश-फला अक्षर सीख गये ॥ 94 ॥
अनुभाष्य-'द्वादश-फला'-रेफ, ण, न, म, य, र, ल, व, ऋ, ॠ, ऌ और ॡ फला ॥ 94 ॥
इति अनुभाष्ये चतुर्दश परिच्छेद।
चौदहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ।
यह बाल्यलीला-सूत्र विस्तारसे श्रीचैतन्यभागवतमें वर्णित :-
बाल्यलीला-सूत्र एइ कहिल अनुक्रम।
इहा विस्तारियाछेन दास-वृन्दावन ॥ 95 ॥
अतएव बाल्यलीला संक्षेपे सूत्र कैल।
पुनरुक्ति-भये विस्तारिया ना कहिल ॥ 96 ॥
अनुवाद-इस प्रकार मैंने बाल्यलीलाको क्रमानुसार सूत्र रूपमें कहा है, क्योंकि श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने इन लीलाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। इसलिये मैंने पुनरुक्तिके भयसे विस्तारपूर्वक न कहकर बाल्यलीलाको संक्षेपमें सूत्ररूपसे ही वर्णन किया है ॥ 95-96 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 97 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे बाल्यलीला-सूत्रवर्णनं नाम चतुर्दश-परिच्छेदः।
अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 97 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला बाल्यलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

पन्द्रहवाँ अध्याय

चित्र 8

पन्द्रहवाँ अध्याय
पन्द्रहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें महाप्रभुका
गङ्गादास पण्डितसे व्याकरण पढ़ना, पञ्जी-टीकामें प्रवीणता
प्राप्त करना, माताको एकादशीमें अन्न खानेका निषेध
करना वर्णित है। विश्वरूपने संन्यास ग्रहणकर महाप्रभुको
भी संन्यास लेनेके लिये आह्वान किया, परन्तु महाप्रभुने
उनकी बात न सुनकर पिता-माताकी सेवा करनेकी
इच्छा व्यक्त की, इसलिये विश्वरूपने उन्हें वापिस घर
भेज दिया, इस प्रकार एक आख्यान है। पुरन्दर मिश्रका
परलोकगमन, वल्लभाचार्यकी पुत्री लक्ष्मीदेवीका पाणिग्रहण
आदिका विवरण सूत्ररूपमें वर्णित हुआ है। (अमृतप्रवाह
भाष्य)
श्रीगौरकी पूजा करनेसे दुर्बुद्धिकी भी सुबुद्धि :—
हरिभक्तिविलास (7/1)—
कुमनाः सुमनस्त्वं हि याति यस्य पदाब्जयोः।
सुमनोऽर्पणमात्रेण तं चैतन्य प्रभुं भजे॥1॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥1॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके श्रीचरणकमलोंमें सुमन
(पुष्प) अर्पण करने मात्रसे ही कुमनवाला व्यक्ति भी
सुमनत्व लाभ करता है, उन श्रीचैतन्य महाप्रभुका मैं
भजन करता हूँ॥1॥
अनुभाष्य—कुमनाः (कृष्णेतरविषयाविष्टं मनो यस्य सः)
यस्य (चैतन्यदेवस्य) पदाब्जयोः (चरणकमलयोः) सुमनोऽर्पणमात्रेण
(सुमनसां पुष्पाणां सु शुभं कृष्णसेवापरं मनस्तस्य वा अर्पणमात्रेण)
सुमनस्त्वम् (अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतं
कृष्णानुशीलनपर-स्वभावं) हि (निश्चितं) याति (प्राप्नोति) तं
चैतन्यप्रभुम् अहं वन्दे।
श्लोक भावानुवाद—जिसका मन श्रीकृष्णेतरविषयोंमें
आविष्ट है, ऐसे कुमनवाला व्यक्ति जिनके चरणकमलोंमें
सुमन (पुष्प अर्थात् श्रीकृष्णसेवापर मन) अर्पण करने
मात्रसे सुमनत्व (श्रीकृष्णेतर अभिलाषिताऑसे शून्य,
ज्ञान-कर्मादिसे अनावृत श्रीकृष्णानुशीलनपर स्वभाव)
निश्चित ही प्राप्त करता है, उन श्रीचैतन्य महाप्रभुकी
मैं वन्दना करता हूँ॥1॥
जय जय श्रीचैतन्य, जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥
अनुवाद—महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव की जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो।
श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥2॥
पौगण्ड-लीलामें अध्ययन-लीला ही प्रधान :—
पौगण्ड-लीलार सूत्र करिये गणन।
पौगण्ड-वयसे प्रभुर मुख्य अध्ययन॥3॥
अनुवाद—अब मैं पौगण्ड-लीलाका सूत्ररूपसे वर्णन
करूँगा। पौगण्ड अवस्थामें महाप्रभुकी अध्ययन-लीला
ही मुख्य है॥3॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'मुख्य अध्ययन'—मुख्य कार्य
ही अध्ययन-लीला है॥3॥
महाप्रभुकी सुविस्तृत पौगण्डलीला :—
पौगण्ड-लीला चैतन्यकृष्णस्यातिसुविस्तृता।
विद्यारम्भमुखा पाणिग्रहणान्ता मनोहरा॥4॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥4॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णचैतन्यकी विद्या आरम्भसे
लेकर पाणिग्रहण तक मनोहर पौगण्डलीला अत्यन्त
विस्तृत है॥4॥
अनुभाष्य—चैतन्यकृष्णस्य (भगवतो राधाकृष्णाभिन्नविग्रहस्य
विश्वम्भरस्य) विद्यारम्भमुखा (विद्याभ्यासारम्भः मुखे आदौ यस्याः
सा) पाणिग्रहणान्ता (पाणिग्रहणं च अन्तः समाप्तौ यस्यां सा)

[ 15/4-10

मनोहरा (सकलहृदयाकर्षिणी) पौगण्ड लीला (पञ्चम-हायनमारभ्य
दश-पर्यन्त-व्यापक-काल पौगण्डं तत्र या लीला) अति
सुविस्तृता (सुबहुला)।
श्लोक भावानुवाद—श्रीराधाकृष्ण अभिन्न भगवान्
श्रीचैतन्यकृष्णकी विद्यारम्भसे विवाहतक सर्वाकर्षक पौगण्ड
(पाँच वर्षकी आयुसे लेकर दस वर्षकी आयूतक)
लीला अत्यन्त विस्तृत है॥4॥
पण्डित गङ्गादाससे व्याकरण-अध्ययन :-
गङ्गादास पण्डित-स्थाने पड़ेन व्याकरण।
श्रवण-मात्रे कण्ठे कैल सूत्रवृत्तिगण॥5॥
अनुवाद—गङ्गादास पण्डितके टोलमें महाप्रभु व्याकरण
पढ़ते थे। वे केवल सुनने मात्रसे ही सूत्रवृत्ति आदिको
कण्ठस्थ कर लेते॥5॥
अमृतप्रवाह भाष्य—पहले विष्णु और सुदर्शनसे
सामान्य विद्या उपार्जन करके महाप्रभु गङ्गादास पण्डितसे
व्याकरण पढ़ने लगे॥5॥
अल्प समयमें ही पारदर्शिता :-
अल्पकाले हैला पञ्जी-टीकाते प्रवीण।
चिरकालेर पडुया जिने हइया नवीन॥6॥
अनुवाद—थोड़े समयमें ही महाप्रभु पञ्जी-टीकामें
प्रवीण हो गये। वे अभी नवीन छात्र होते हुए भी बहुत
समयसे पढ़ रहे छात्रोंको पराजित कर देते॥6॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘पञ्जी-टीका'—व्याकरणकी
'पञ्जी-टीका' नामक एक प्रसिद्ध टीका थी, महाप्रभुने
उसकी टिप्पणी प्रस्तुत की थी॥6॥
अध्ययन-लीला प्रभुर दास-वृन्दावन।
‘चैतन्यमङ्गले' कैल विस्तारित वर्णन॥7॥
अनुवाद—श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने ‘चैतन्यमङ्गल' में
महाप्रभुकी अध्ययन लीलाका विस्तारसे वर्णन किया
है॥7॥
अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड, छठा, सातवाँ, आठवाँ
और दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥7॥
एकदिन मातार पदे करिया प्रणाम।
प्रभु कहे,—“माता, मोरे देह एक दान॥"8॥
शचीमाताको एकादशी-व्रत पालनमें प्रवृत्त करना :-
माता बोले,—“ताइ दिब, या तुमि मागिबे।”
प्रभु कहे,—“एकादशीते अन्न ना खाइबे॥"9॥
शची कहे,—“ना खाइब, भालइ कहिला।”
सेइ हैते एकादशी करिते लागिला॥10॥
अनुवाद—एक दिन शचीमाताके श्रीचरणोंमें प्रणाम
करके महाप्रभुने कहा,–“माता! मुझे एक दान दीजिये।”
माताने प्रसन्नतासे कहा,–“जो तुम माँगोगे, मैं वही
दूँगी।” महाप्रभुने कहा,–“आप एकादशीके दिन अन्न
नहीं खाना।” शचीमाताने कहा,–“तुमने ठीक ही कहा
है, मैं अबसे एकादशीके दिन अन्न नहीं खाऊँगी।” उस
दिनसे शचीमाता एकादशी व्रतका पालन करने
लगीं॥8-10॥
अनुभाष्य—श्रीजीव गोस्वामीने भक्ति सन्दर्भके 299
संख्यामें लिखा है—
“स्कान्दे—‘मातृहा पितृहा चैव भ्रातृहा गुरुहा तथा।
एकादश्यान्तु यो भुङ्क्ते विष्णुलोकच्युतो भवेत्॥'
अत्र वैष्णवानां निराहारत्वं नाम महाप्रसादान्न परित्याग एव;
तेषामन्यभोजनस्य नित्यमेव निषिद्धत्वात्। आग्नेये—‘एकादश्यां
न भोक्तव्यं तद्व्रतं वैष्णवं महत्।' तत्र तावदस्य अवैष्णवेऽपि
नित्यत्वम्।”
“स्कन्दपुराणमें कहा गया है–‘जो व्यक्ति एकादशीके
दिन भोजन करता है, वह मातृ-हत्या, पितृ-हत्या,
भ्रातृ-हत्या और गुरु-हत्या न करते हुए भी उनके
पापोंका भागी होता है तथा उस व्यक्तिकी कभी भी
विष्णुलोकमें जानेकी आशा नहीं है।' यहाँ वैष्णवोंके
द्वारा निराहार रहनेसे महाप्रसादके त्यागको भी समझना
चाहिये, क्योंकि वैष्णवोंके लिये महाप्रसादको छोड़कर
अन्य भोजन सदा ही वर्जनीय है। अग्निपुराणमें भी

192 | श्रीचैतन्यचरितामृत

15/9-11 ]
कहा गया है—'एकादशी तिथिके दिन भोजन मत करो,
क्योंकि यह व्रत विष्णु सम्बन्धी है और महान् है।' यह
एकादशी-व्रत अवैष्णवोंके लिये भी अवश्य कर्त्तव्य
है।"
वैष्णव लोग महाप्रसादके अतिरिक्त अन्य कोई भी
वस्तु किसी दिन, किसी भी समय स्वीकार नहीं करते,
किन्तु एकादशीके दिन महाप्रसाद-त्याग करनेका नाम
ही 'उपवास' है॥9॥
अमृतानुकणिका—हःभःविः (12/3)—
“अत्र व्रतस्य नित्यत्वादवश्यं तत् समाचरेत्।
सर्वपापापहं सर्वार्थदं श्रीकृष्णतोषणम्॥”
“एकादशी व्रत नित्य और अवश्य पालनीय है।
इसका अनुष्ठान करनेसे सभी पाप नाश होते हैं,
सर्वार्थकी प्राप्ति होती है और सर्वोपरि श्रीकृष्ण प्रसन्न
होते हैं।” हःभःविः (12/5) में मत्स्य और भविष्यपुराणसे
उद्धृत श्लोक—
“एकादश्यां निराहारो यो भुङ्क्ते द्वादशीदिने।
शुक्ले वा यदि कृष्णे तद्व्रतं वैष्णवं महत्॥”
“शुक्ल और कृष्ण, दोनों पक्षोंकी एकादशीमें
उपवासी रहकर द्वादशीके दिन भोजन करनेसे इस व्रतसे
श्रीकृष्ण परम सन्तुष्ट होते हैं।”
एकादशीके दिन भोजन निषेध है। जैसे अग्निपुराणमें
(हःभःविः 12/6)—
“एकादश्यां न भुञ्जीत व्रतमेतद्धि वैष्णवम्॥”
तथा नारदीय पुराण और पद्मपुराणमें (हःभःविः
12/12) कहा गया है—
“न भोक्तव्यं न भोक्तव्यं संप्राप्ते हरिवासरे॥”
चारों आश्रमोंमें स्थित व्यक्तियोंके लिये एकादशी
पालनीय है, ऐसा विष्णुधर्मोत्तर (हःभःविः 12/25) में
कहा गया है—
“ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽथवा यतिः।
एकादश्यां हि भुञ्जानो भुङ्क्ते गोमांसमेव हि॥”
“ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, अथवा संन्यासी, जो
कोई भी हो,—हरिवासरमें भोजन करनेपर वह गोमांस
भोजन होता है।” बृहन्नारदीये पुराण (हःभःविः 12/7) में
सभी वर्णोंके लिये भी एकादशी पालनका निर्देश दिया
गया है—
“ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणाञ्चैव योषिताम्।
मोक्षदं कुर्वतां भक्त्या विष्णु प्रियतरं द्विजाः॥”
“हे द्विजवृन्द! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, नारी—जो
कोई भी क्यों न हो, भक्तिपूर्वक श्रीविष्णु-प्रीतिप्रद
एकादशी व्रतका पालन करनेसे मोक्ष प्राप्त कर सकते
हैं।” इस श्लोकमें नारी कहनेसे सधवा और विधवा,
दोनोंको लक्ष्य किया गया है। परन्तु कुछ लोगोंका मत
है कि सधवा नारीको एकादशीका व्रत नहीं करना
चाहिये, ऐसा वे एक स्मृति वाक्यको लेकर कहते हैं—
“पत्यौ जीविति या नारी उपवासव्रतंश्चरेत्।
आयुः सा हरति भर्तुर्नरकाञ्चैव गच्छति॥”
“पतिके जीवित रहते जो नारी उपवास-व्रतका
आचरण करती है, वह अपने पतिकी आयुका हरण
करके नरकमें गमन करती है।” इस वाक्यका उद्देश्य
एकादशी व्रतका निषेध नहीं है, अपितु अन्य सभी
व्रतोपवासोंका ही निषेध है, अन्यथा इस वाक्यका अन्य
शास्त्र प्रमाणोंसे विरोध होता है। विष्णुधर्मोत्तर (हःभःविः
12/47) में कहा है—
“सपुत्रश्च सभार्थ्याश्च स्वजनैर्भक्तिसंयुक्तः।
एकादश्यामुपवसेत् पक्षयोरुभयोरपि॥”
“भक्तिसे युक्त होकर पत्नी, पुत्र और स्वजनोंके
सहित दोनों पक्षोंकी एकादशी तिथिमें उपवास करना
चाहिये।” यहाँ पत्नी सहित कहनेसे यह स्पष्ट है कि
सधवा स्त्रियोंको भी एकादशीका व्रतोपवास करना
चाहिये। इसलिये महाप्रभुने भी अपनी सधवा मातासे
एकादशी उपवासके अनुरोध किया और श्रीशची माताने
उसे सहर्ष स्वीकार किया॥9-10॥
विश्वरूपका विवाह करानेकी चेष्टा :—
तबे मिश्र विश्वरूपेर देखिया यौवन।
कन्या मागि' विवाह दिते कैल मन॥11॥
पन्द्रहवाँ अध्याय | 193

[ 15/11-22
अनुवाद—जगन्नाथ मिश्र विश्वरूपके यौवनकालमें
प्रवेशको देखकर उनके विवाहके लिये किसी योग्य
कन्याका हाथ माँगनेका मनमें विचार करने लगे॥ 11॥
विश्वरूपके द्वारा संन्यास ग्रहण :-
विश्वरूप शुनि' घर छाड़ि' पलाइला।
संन्यास करिया तीर्थ करिवारे गेला॥ 12 ॥
अनुवाद—ऐसा सुनकर विश्वरूप घर छोड़कर भाग
गये। वे संन्यास लेकर तीर्थयात्रापर निकल पड़े॥ 12॥
शची और मिश्रका दुःख और
महाप्रभुके द्वारा उन्हें सान्त्वना :-
शुनि' शची-मिश्रेर दुःखी हैल मन।
तबे प्रभु माता-पितार कैल आश्वासन ॥ 13 ॥
श्रीकृष्णका भजन करनेके लिये सन्तानके
संन्याससे माता-पिताके कुलोंका उद्धार :-
“भाल हैल,—विश्वरूप संन्यास करिल।
पितृकुल, मातृकुल,—दुइ उद्धारिल ॥ 14 ॥
महाप्रभुके आश्वासनसे माता-पिताका सन्तोष :-
आमि त' करिब तोमा' दुँहार सेवन।”
शुनिया सन्तुष्ट हैल पिता-मातार मन ॥ 15 ॥
अनुवाद—ऐसा सुनकर शचीमाता और जगन्नाथ
मिश्रके मनमें बहुत दुःख हुआ। तब महाप्रभुने माता-पिताको
आश्वासन देते हुए कहा,—“अच्छा ही हुआ जो
[भगवद्भजनके लिये] विश्वरूपने संन्यास ग्रहण कर
लिया है। इसके द्वारा वे पितृकुल और मातृकुल,
दोनोंका ही उद्धार करेंगे। मैं तो आपके साथ रहकर
आप दोनोंकी सेवा करूँगा।” महाप्रभुके ऐसे मधुर
वचनोंको सुनकर पिता-माताका मन सन्तुष्ट हो
गया॥ 13-15 ॥
महाप्रभुकी मूर्च्छा :-
एकदिन नैवेद्य-ताम्बुल खाइया।
भूमिते पड़िला प्रभु अचेतन हञा ॥ 16 ॥
अनुवाद—एक दिन महाप्रभुने भगवान्‌को निवेदित
किये गये पानको खाया और वे साथ-ही-साथ मूर्च्छित
होकर भूमिपर गिर पड़े॥ 16॥
विश्वरूपके साथ साक्षात्कार और महाप्रभुके
संन्यासके सम्बन्धमें दोनोंके बीच वार्तालाप :-
आस्ते-व्यस्ते पिता-माता मुखे दिल पानि।
सुस्थ हञा कहे प्रभु अपूर्व काहिनी ॥ 17 ॥
“एथा हैते विश्वरूप मोरे लञा गेला।
‘संन्यास करह तुमि’, आमारे कहिला ॥ 18 ॥
आमि कहि,—‘आमार अनाथ पिता-माता।
आमि बालक,—संन्यासेर किबा जानि कथा ॥ 19 ॥
गृहस्थ हइया करि पितृ-मातृ-सेवन।
इहाते सन्तुष्ट हबेन लक्ष्मी-नारायण ॥' 20 ॥
तबे विश्वरूप इहाँ पाठाइल मोरे।
माताके कहिओ कोटि कोटि नमस्कारे ॥” 21 ॥
अनुवाद—शीघ्रतासे माता-पिताने महाप्रभुके मुखमें
जल दिया, जिससे वे स्वस्थ हो गये। तब उन्होंने एक
अपूर्व बात कही,—‘विश्वरूप आकर मुझे यहाँसे ले
गये और मुझसे कहा—‘तुम भी संन्यास ग्रहण करो।'
मैंने उनसे कहा,—‘यदि मैं भी संन्यास लूँगा, तो हमारे
माता-पिता निराश्रय हो जायेंगे। मैं तो अभी बालक हूँ,
मैं संन्यासके विषयमें क्या जानता हूँ? मैं गृहस्थ होकर
अपने माता-पिताकी सेवा करूँगा जिससे लक्ष्मी-नारायण
मेरे प्रति सन्तुष्ट होवेंगे।' मेरी बात सुनकर तब
विश्वरूपने मुझे पुनः यहाँ भेज दिया और कहा कि
माताको मेरी ओरसे कोटि-कोटि नमस्कार
कहना ॥” 17-21 ॥
एइ मत नाना लीला करे गौरहरि।
कि-कारणे लीला,—इहा बुझिते ना पारि ॥ 22 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरहरि नाना प्रकारकी
194 | श्रीचैतन्यचरितामृत

15/22-24 ]
लीलाएँ करते हैं। वे किस उद्देश्यसे ऐसी लीलाएँ करते
हैं, कोई इसे नहीं समझ सकता॥ 22 ॥
मिश्रका अप्रकट होना :-
कतदिन रहि' मिश्र गेला परलोक।
माता-पुत्र दुँहार बाड़िल हृदि शोक॥ 23 ॥
अनुवाद-कुछ दिनोंके बाद श्रीजगन्नाथ मिश्र परलोक
सिधार गये। उनके विरहमें माता और पुत्र दोनोंके
हृदयका शोक दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा॥ 23 ॥
अनुभाष्य-(चैःभाः आदिखण्ड, आठवाँ अध्याय)-
“हेनमते कतदिन थाकि' मिश्रवर।
अन्तर्धान हैल नित्यसिद्ध कलेवर॥ 109 ॥
मिश्रेर विजये प्रभु कान्दिला विस्तर।
दशरथ-विजये ये हेन रघुवर॥ 110 ॥
दुःख बड़-ए सकल, विस्तार करिते।
दुःख हय, अतएव कहिलुँ संक्षेपे॥ 112 ॥”
“इस प्रकार श्रीजगन्नाथ मिश्र कुछ दिन इस अनित्य
संसारमें रहकर अपने नित्यसिद्ध शरीरके साथ अन्तर्धान
हो गये। उनके अप्रकट होनेपर महाप्रभु बहुत रोये,
जैसे दशरथ महाराजके अप्रकट होनेपर श्रीरघुवीरने
विलाप किया था। यह बहुत करुण कथा है, इसे
विस्तारसे कहनेपर बहुत दुःख होता है, इसलिये मैंने
संक्षेपमें इसका वर्णन किया है॥” 23 ॥
महाप्रभुका पितृ-श्राद्ध :-
बन्धु-बान्धव आसि' दुँहा प्रबोधिल।
पितृक्रिया विधिमते ईश्वर करिल॥ 24 ॥
अनुवाद-बन्धु-बान्धवोंने आकर दोनोंको सान्त्वना
दी। भगवान् श्रीगौरहरिने स्वयं शास्त्रविधिके अनुसार
अपने पिताका क्रिया-कर्म किया॥ 24 ॥
अमृतानुकणिका-हःभःविः (9/294) में वैष्णवश्राद्धकी
विधि दी गयी है-
“प्राप्ते श्राद्धदिनेऽपि प्रागन्नं भगवतेऽर्पयेत्।
तच्छेषेणैव कुर्वीत श्राद्धं भागवतो नरः॥”
“भगवत् परायण मनुष्य श्राद्धके दिन पहले
श्रीभगवान्‌को अन्न निवेदन करके उक्त अन्नके द्वारा
श्राद्धका अनुष्ठान करें।” विष्णुधर्ममें भगवद्-वाक्य-
“प्राणेभ्यो जुहुयादन्नं मन्निवेदितमुत्तमम्।
तृप्यन्ति सर्वदा प्राणा मन्निवेदितभक्षणात्॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रदेयं मन्निवेदितम्।
ममापि हृदयस्थस्य पितृणाञ्च विशेषतः॥”
“मेरे उद्देश्यसे निवेदित उत्कृष्ट अन्नकी आहुति
प्राणसमूहमें प्रदान करें। मेरे उद्देश्यसे निवेदित वस्तु
भक्षणके द्वारा प्राणादि वायु सर्वदा परितृप्त होते हैं।
इसलिये यत्नपूर्वक सबके हृदयमें अवस्थित परमात्मस्वरूप
मुझको विशेषतः पितृपुरुषोंको मेरे उद्देश्यसे निवेदित
अन्न प्रदान करें।”
“भक्ष्यं भोज्यञ्च यत्किञ्चिदनिवेद्याग्रभोक्तरि।
न देयं पितृदेवेभ्यः प्रायश्चिती यतो भवेत्॥”
“अग्रभोक्ता श्रीभगवान्‌को भक्ष्य भोज्य सामग्री अर्पण
न करके पितृगणको निवेदन न करे, क्योंकि अनिवेदित
वस्तु प्रदान करनेसे प्रायश्चित करना पड़ता है।” स्कन्द
पुराणमें श्रीमार्कण्डेय-भगीरथ संवादमें-
“यस्तु विद्याविनिर्मुक्तं मूर्खं मत्वा तु वैष्णवम्।
वेदविद्व्योऽददाद्विप्रः श्राद्धां तद्राक्षसं भवेत्॥
सिक्थमात्रन्तु यद्भुङ्क्ते जलं गण्डूषमात्रकम्।
तदन्नं मेरुणा तुल्यं तज्जलं सागरोपमम्॥”
“जो विप्र, विद्यारहित वैष्णवको मूर्ख मानकर
वेदज्ञोंको श्राद्धपात्र प्रदान करते हैं, वह राक्षस श्राद्ध
होता है। श्राद्धमें यदि वैष्णव, एक ग्रास अन्न भोजन
और चुल्लु भर जल पान करते हैं, तब वह अन्न
मेरुतुल्य एवं वह जल सागरतुल्य होता है।”
दूसरोंको निवेदित की हुई वस्तु उच्छिष्ट कही गयी
है। इसलिये किसी प्रकारसे ही उक्त सामग्री श्रीभगवान्‌को
समर्पण न करें। जैसे नारदपुराणमें लिखित है-
“पितृशेषन्तु यो दद्याद्धरये परमात्मने।
रेतोदाः पितरस्तस्य भवन्ति क्लेशभागिनः॥”
“जो मानव पितृपुरुषका उच्छिष्ट परमात्माको अर्पण
पन्द्रहवाँ अध्याय | 195

[ 15/24-28
करते हैं, उनके पितृगण रेत पान करके क्लेशके भागी
होते हैं।”
और भी विशेष विधि यह है कि श्राद्ध तिथि
एकादशीके (अथवा उपवास यदि द्वादशीके दिन हो, तब
उस) दिन उपस्थित होनेपर उस उपवासवाले दिन श्राद्ध
न करके पारणके दिन श्राद्ध करना चाहिये। हःभःविः
बारहवें अध्यायमें एकादशी नियमोंके प्रसङ्गमें ऐसा
वर्णित है। जैसे पद्मपुराणके पुष्कर खण्डमें लिखा है—
“एकादश्यां यदा राम श्राद्धं नैमित्तिकं भवेत्।
तद्दिने तु परित्यज्य द्वादश्यां श्राद्धमाचरेत्॥”
“हे राम! एकादशीमें नैमित्तिक श्राद्ध उपस्थित
होनेपर उस दिनको छोड़कर द्वादशीमें श्राद्ध करना
चाहिये।” पद्मपुराणके उत्तरखण्डमें लिखा है—
“एकादश्यान्तु प्राप्तायां मातापित्रोर्मृतेऽहनि।
द्वादश्यां तत् प्रदातव्यं नोपवासदिने क्वचित्।
गर्हितान्नं न चाश्नन्ति पितरश्च दिवौकसः॥”
“माता-पिताके मृत्यु-दिनमें एकादशी उपस्थित होनेपर
द्वादशीमें श्राद्ध करना चाहिये। उपवासके दिन कदापि
श्राद्ध न करे, क्योंकि देवता एवं पितृगण निन्दितान्न
भोजन नहीं करते हैं।” स्कन्द-पुराणमें भी कहा है—
“एकादशी यदा नित्या श्राद्धं नैमित्तिकं भवेत्।
उपवासं तदा कुर्याद्द्वादश्यां श्राद्धमाचरेत्॥”
“नित्य स्वरूपिणी एकादशीमें नैमित्तिक श्राद्ध समागत
होनेपर एकादशीमें उपवासी रहकर द्वादशीमें श्राद्ध करना
चाहिये।” ब्रह्मवैवर्त पुराणमें कहा है—
“ये कुर्वन्ति महीपाल श्राद्धं त्वेकादशीदिने।
त्रयस्ते नरकं यान्ति दाता भोक्ता प्रेतकः॥”
“हे राजन्! एकादशीके दिनमें श्राद्ध करनेसे दाता,
भोक्ता एवं प्रेत—तीनोंकी नरकमें गति होती है॥” 24॥
गृहस्थ-लीलाकी इच्छा :—
कत दिन प्रभु चित्ते करिला चिन्तन।
गृहस्थ हइलाम, एबे चाहि गृहधर्म ॥ 25 ॥
गृहिणीसे ही गृह :—
गृहिणी बिना गृहधर्म ना हय शोभन।
एत चिन्ति' विवाह करिते हैल मन ॥ 26 ॥
अनुवाद—कुछ समय व्यतीत होनेपर महाप्रभुने
चिन्तन किया कि अब घरका दायित्व मुझपर आ गया
है, इसलिये मुझे गृहस्थ धर्मका पालन करना चाहिये।
महाप्रभुने विचार किया कि गृहणीके बिना गृहस्थ धर्म
शोभा नहीं देता, इसलिये उन्होंने विवाह करनेका मनमें
निश्चय किया॥ 25-26 ॥
उद्वाह-तत्त्व (7)—
न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते।
तया हि सहितः सर्वान् पुरुषार्थान् समश्नुते ॥ 27 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ 27 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—गृहको 'गृह' नहीं कहते, गृहिणीको
'गृह' कहते हैं, गृहिणीके साथ समस्त पुरुषार्थोंको भोग
करूँगा॥ 27 ॥
इति अमृतप्रवाह-भाष्ये पञ्चदश परिच्छेद।
पन्द्रहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य पूर्ण हुआ।
अनुभाष्य—गृहम् (आवासमन्दिरं) गृहं न, इति आहुः।
गृहिणी (गृहाधिष्ठात्री सहधर्मिणी) एव गृहम् उच्यते। तया (गृहिण्या)
सहितः (मिलितः सन्) [मानवः] सर्वान् पुरुषार्थान् (धर्मार्थकाममोक्षादीन्
चतुर्वर्गान्) समश्नुते (प्राप्नोति)।
श्लोक भावानुवाद—केवल घरको ही गृह नहीं कहा
जाता, गृहणी (सहधर्मिणी) को ही गृह कहा जाता है।
पुरुष गृहणीके साथ मिलकर ही समस्त पुरुषार्थों
(धर्म-अर्थ-काम-मोक्षादि चतुवर्ग) को भोग कर सकता
है।
महाभारत शान्तिपर्व 144/6 श्लोक द्रष्टव्य है॥ 27 ॥
लक्ष्मीदेवीके साथ साक्षात्कार :—
दैवे एकदिन प्रभु पड़िया आसिते।
वल्लभाचार्येर कन्या देखे गङ्गा-पथे ॥ 28 ॥
196 | श्रीचैतन्यचरितामृत

15/28–33 ]
अनुवाद—दैवयोगसे एक दिन जब महाप्रभु पढ़कर
आ रहे थे, तब उन्होंने श्रीवल्लभाचार्यकी कन्या
'लक्ष्मीदेवी' को गङ्गाकी ओर जाते देखा॥ 28॥
अमृतानुक्रमणिका—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (श्लोक 45-46) में—
“श्रीजानकी रुक्मिणी च लक्ष्मीनाम्नी च तत्सुता।
चैतन्यचरिते व्यक्ता लक्ष्मीनाम्नी च सा यथा॥ 45॥
सा वल्लभाचार्यसुता चलन्ती
स्नातुं सखीभिः सुरदीर्घिकायाम्।
लक्ष्मीरनेनैव कृतावतारा
प्रभोर्ययौ लोचनवर्त्म तत्र॥” 46॥
“श्रीजानकी और श्रीरुक्मिणी एक साथ मिलकर श्रीवल्लभाचार्यकी पुत्री श्रीलक्ष्मी अर्थात् लक्ष्मीप्रियादेवी हुई हैं। इन्हीं श्रीलक्ष्मीप्रियाके विषयमें श्रीचैतन्यचरित महाकाव्यके तृतीय सर्गके सातवें श्लोकमें कहा गया है कि श्रीवल्लभाचार्यकी कन्या श्रीलक्ष्मीप्रियादेवी, जो स्वयं लक्ष्मीका अवतार हैं, जिस समय वे सखियोंके साथ गङ्गा-स्नानके लिये जा रही थीं, तभी अकस्मात् श्रीमन् महाप्रभुकी दृष्टि उन पर पड़ी॥” 28॥
वनमाली पण्डितके द्वारा घटकका कार्य सम्पादन करना :—
पूर्वासिद्ध भाव दुँहार उदय करिला।
दैवे वनमाली घटक शची-स्थाने आइला॥ 29॥
अनुवाद—एक दूसरेको देखकर दोनोंका पूर्वासिद्ध [नित्य] भाव उदित हो गया। दैवयोगसे वनमाली नामक घटक (विवाहका सम्बन्ध करवानेवाला) शचीमाताके पास आया॥ 29॥
अनुभाष्य—'वनमाली घटक'—एक नवद्वीपवासी ब्राह्मण। इन्होंने महाप्रभुके विवाहमें घटकका कार्य किया। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 49वाँ श्लोक)—
“विश्वामित्रोऽपि घटकः श्रीरामोद्वाहकर्मणि।
रुक्मिण्या प्रेषितो विप्रो यस्य श्रीकृष्णवं प्रति।
तावयं वनमाली यत्कर्मणाचार्यतां गतः॥ 49॥”
“श्रीरामचन्द्रके विवाहमें घटक अर्थात् विवाहके संयोजकका कार्य करनेवाले विश्वामित्र और श्रीरुक्मिणीदेवीके द्वारा श्रीकृष्णके निकट भेजे गये ब्राह्मण—इन दोनोंने मिलकर वनमाली नामसे जन्म लेकर कर्मके द्वारा अर्थात् घटकका कार्य करने हेतु आचार्यत्वको प्राप्त किया है॥” 29॥
सम्बन्ध और लक्ष्मीदेवीके साथ महाप्रभुका विवाह :—
शचीर इङ्गिते सम्बन्ध करिल घटन।
लक्ष्मीरे विवाह कैल शचीर नन्दन॥ 30॥
अनुवाद—शचीमाताकी सम्मति पाकर घटकने महाप्रभु और लक्ष्मीदेवीका सम्बन्ध करवा दिया। इस प्रकार शचीनन्दनने लक्ष्मीदेवीके साथ विवाह किया॥ 30॥
चैतन्यभागवतमें पौगण्डलीलाका विस्तारसे वर्णन :—
विस्तारिया वर्णिला ताहा वृन्दावन-दास।
एइ त' पौगण्ड-लीलार सूत्र-प्रकाश॥ 31॥
अनुवाद—श्रीवृन्दावनदासने इस लीलाका विस्तारसे वर्णन किया है। यहाँ तक महाप्रभुकी पौगण्ड लीलाका मैंने सूत्ररूपमें वर्णन किया है॥ 31॥
अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है। चैःभाः आदिखण्ड, आठवें अध्यायमें उपनयन और माताको स्वर्ण-दान अधिक विस्तृत रूपमें वर्णित किया गया है॥ 31॥
इति अनुभाष्ये पञ्चदश परिच्छेद।
पन्द्रहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ।
पौगण्ड-लीलाय लीला बहुत प्रकार।
वृन्दावन-दास इहा करियाछेन विस्तार॥ 32॥
अतएव दिङमात्र इहाँ देखाइल।
चैतन्यमङ्गले सर्वलोके ख्याति हैल॥ 33॥
अनुवाद—महाप्रभुकी पौगण्ड-लीलाएँ अनेक हैं,
पन्द्रहवाँ अध्याय | 197

[ 15/33-34
जिनका श्रीवृन्दावनदासने विस्तृत रूपसे वर्णन किया है।
'चैतन्यमङ्गल' ग्रन्थके द्वारा ऐसी लीलाओंकी समस्त
जगत्में ख्याति हुई है, इसलिये मैंने केवल उनका
दिग्दर्शनमात्र कराया है॥ ३३॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ ३४ ॥
इति चैतन्यचरितामृते आदिखण्डे पौगण्ड लीलासूत्र-वर्णनं
नाम पञ्चदश परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है॥ ३४॥
श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला पौगण्ड लीलाका सूत्ररूपमें
वर्णन नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

सोलहवाँ अध्याय

चित्र 9

सोलहवाँ अध्याय
सोलहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें महाप्रभुकी
कैशोरलीला वर्णित है। अध्यापन, पण्डित-विजय, जाह्नवी
(गङ्गा) में जलक्रीड़ा, धन एकत्रित करनेके लिये
बङ्गदेशमें (वर्तमान बाङ्गलादेशमें) जाना, वहाँपर विद्या-विचार
और नाम-सङ्कीर्तन, तपन मिश्रसे भेंट और उनको
साध्य-साधनका उपदेश तथा उन्हें वाराणसी जानेका
आदेश देना आदि लीलाएँ इस अध्यायमें वर्णित हैं।
महाप्रभुके बङ्ग-विजयके समय लक्ष्मीदेवीका सर्पके
काटे जानेके छलसे वैकुण्ठ-गमन हुआ। महाप्रभुने
स्वदेशमें लौटकर शचीदेवीको तत्त्वज्ञानके द्वारा शान्त
किया और बादमें विष्णुप्रियासे विवाह किया। महाप्रभुने
दिग्विजयी केशवकाश्मीरके साथ वार्तालाप किया और
उसके द्वारा रचित गङ्गा-माहात्म्य-श्लोकोंमेंसे एक श्लोकपर
विचार करके उसमें पाँच अलङ्कार गुण और पाँच
अलङ्कार दोष दिखाकर उसके गर्वको चूर्ण किया।
दिग्विजयी कविने रात्रिमें सरस्वती देवीसे महाप्रभुके
तत्त्वको जाना और अगले दिन प्रातःकाल उनके
शरणागत हुआ। (अमृतप्रवाह भाष्य)
सदा कृपारत श्रीगौरहरि :—
कृपासुधा-सरिद्यस्य विश्वमाप्लावयन्त्यपि।
नीचगैव सदा भाति तं चैतन्यप्रभुं भजे ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥1॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिनकी कृपा-सुधा-सरिता विश्वको
आप्लावित करनेपर भी सदैव निम्नगामिनी रूपमें प्रकाशित
हो रही है, उन्हीं श्रीचैतन्य महाप्रभुका मैं भजन करता
हूँ॥1॥
अनुभाष्य—यस्य (चैतन्यदेवस्य) कृपा-सुधा-सरित्
(कृपामृत-नदी) विश्वं (संसारं) आप्लावयन्ती (निमज्जयन्ती)
अपि, सदा नीचगा (निम्नगामिनी-ऐश्वर्यविहीनेषु अकिञ्चनेषु
दीनजनेषु करुणामयी एव) भाति (प्रकाशते), तं चैतन्यप्रभुम्
[अहं] भजे।
श्लोक भावानुवाद—जिनकी कृपामृत-नदी समस्त
विश्वको निमज्जित करके भी अकिञ्चन दीन-हीन
लोगोंके प्रति सदा करुणामयी रूपमें प्रकाशित होती है,
उन श्रीचैतन्य महाप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य, जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥
अनुवाद—महाप्रभु श्रीचैतन्यदेवकी जय हो। श्रीनित्यानन्द
प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर
भक्तवृन्दकी जय हो॥ 2 ॥
लक्ष्मी-सरस्वतीके द्वारा पूजित श्रीगौरहरि :—
जीयात् कैशोर-चैतन्यो मूर्त्तिमत्या गृहाश्रमात्।
लक्ष्म्यार्च्चितोऽथ वाग्देव्या दिशांजायिजयच्छलात् ॥ 3 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥3॥
अमृतप्रवाह भाष्य—गृहमें विराजमान मूर्तिमती
लक्ष्मीदेवीके द्वारा अर्चित और दिग्विजयीको जय करनेके
छलसे सरस्वतीदेवीके द्वारा अर्चित कैशोर-श्रीचैतन्यदेव
जययुक्त हों॥3॥
अनुभाष्य—गृहाश्रमात् (गृहगमनात् वा गृहाश्रमं प्राप्य) मूर्तिमत्या
(शरीरधारिण्या) लक्ष्म्या अर्च्चितः (सेवितः), अथ दिशांजायिजयच्छलात्
(दिग्विजयी-केशवकाश्मीराख्य-विबुधस्य जयव्यपदेशात्) वाग्देव्या
(सरस्वत्या) अर्च्चितः (पूजितः) कैशोरचैतन्यः (किशोर-वयसि
स्थितः चैतन्यः) जीयात्।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥3॥
कैशोर-लीला :—
एइ त' कैशोर-लीला-सूत्र-अनुबन्ध।
शिष्यगण पड़ाइते करिला आरम्भ॥4॥

[ 16/4-11
अनुवाद-अब महाप्रभुकी कैशोरलीलाका सूत्ररूपमें
वर्णन कर रहे हैं। महाप्रभुने अब शिष्योंको पढ़ाना
आरम्भ किया॥4॥
अनुभाष्य-'कैशोर'- ग्यारह वर्षसे पन्द्रह वर्ष तककी
अवस्थाको किशोर कहते हैं, उसी अवस्थाके अनुरूप
ही महाप्रभु भावान्वित हैं॥4॥
निमाइके अध्यापनसे सभी विस्मित :-
शत शत शिष्यसङ्गे सदा अध्यापन।
व्याख्या शुनि' सर्वलोकेर चमकित मन॥5॥
अनुवाद-सैकड़ों शिष्य आकर महाप्रभुसे शिक्षा
प्राप्त करने लगे। महाप्रभुकी व्याख्याको सुनकर सभी
चकित रह जाते ॥5॥
निमाइसे पराजित होनेपर भी पण्डितोंमें सन्तोष :-
सर्वशास्त्रे सर्व पण्डित पाय पराजय।
विनयभङ्गीते कारो दुःख नाहि हय ॥6॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥6॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभु पण्डितोंको सभी शास्त्रोंमें
पराजित कर देते, परन्तु उनके विनीतभावके कौशलसे
उन पण्डितोंको दुःख नहीं होता था॥6॥
विविध औद्धत्य करे शिष्यगण-सङ्गे।
जाह्नवीते जलकेलि करे नाना रङ्गे॥7॥
अनुवाद-शिष्योंके साथ महाप्रभु अनेक प्रकारकी
चञ्चलता करते और गङ्गामें अनेक प्रकारसे जलक्रीड़ा
करते॥7॥
पूर्व बङ्गालमें गमन और नामसङ्कीर्तन-प्रवर्त्तन :-
कत दिने कैल प्रभु बङ्गेते गमन।
याँहा याय, ताँहा लओयाय नाम-सङ्कीर्त्तन ॥8॥
महाप्रभुके पाण्डित्यकी ख्याति सुनकर
अनेक छात्रोंके द्वारा अध्ययन :-
विद्यार प्रभाव देखि' चमत्कार चित्ते।
शत शत पड़ुया आसि लागिला पड़िते॥9॥
अनुवाद-कुछ दिनोंके बाद महाप्रभु पूर्वी बङ्गाल
गये। वे जहाँ भी जाते, वहाँपर लोगोंसे नाम-सङ्कीर्तन
कराते। महाप्रभुकी विद्याके प्रभावको देखकर सभीका
चित्त चमत्कृत हो जाता और वहाँ भी सैकड़ों छात्र
उनके निकट आकर पढ़ने लगे॥8-9॥
महाप्रभुके साथ तपन मिश्रका साक्षात्कार
और साध्य-साधन-तत्त्व-जिज्ञासा :-
सेइ देशे विप्र, नाम-मिश्र तपन।
निश्चय करिते नारे साध्य-साधन ॥10॥
अनेक शास्त्रोंमें अनेक मुनियोंके
नाना-मतोंसे बुद्धि-विभ्रम :-
बहुशास्त्रे बहुवाक्ये चित्ते भ्रम हय।
साध्य-साधन श्रेष्ठ ना हय निश्चय ॥11॥
अनुवाद-उस देशमें तपन मिश्र नामक एक ब्राह्मण
रहते थे। अनेक शास्त्रोंका अध्ययन करके भी वे
साध्य-साधन तत्त्वके विषयमें निश्चय नहीं कर पा रहे
थे। बहुत शास्त्रोंके अनेक प्रकारके वाक्योंके द्वारा
उनके चित्तमें और भी भ्रम होता। इसलिये वे श्रेष्ठ
साध्य-साधन क्या है, इसका निर्णय नहीं कर पा रहे
थे॥10-11॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'साध्य-साधन'-साधनके द्वारा जो
साधित (प्राप्त) होता है, उसका नाम 'साध्य' है। जिस
उपायके अवलम्बनसे साध्यवस्तुकी प्राप्ति होती है,
उसका नाम 'साधन' है॥10॥
अनुभाष्य-(भाः 7/13/8)-
“न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान् नैवाभ्यासेद् बहून्।
न व्याख्यामुपयुञ्जीत नारम्भानारभेत् क्वचित्॥”
“अपने चरम कल्याणकी कामनावाले (भगवद्भजनके
इच्छुक) को बहुत ग्रन्थोंका कलाभ्यास और शास्त्र
व्याख्याके द्वारा जीविका उपार्जन करनेवाला नहीं बनना
चाहिये, उसे सर्वप्रथम ऐसे प्रलोभनका परित्याग करना
चाहिये।” भक्तिरसामृतसिन्धु पूर्व, द्वितीय लहरी-(भाः
11/21/34,36)-
202 | श्रीचैतन्यचरितामृत

16/11–15 ]
“एवं पुष्पिताया वाचा व्याक्षिप्तमनसां नृणाम्।
मानिनाञ्चातिलुब्धानां मद्दार्त्तापि न रोचते॥ 34 ॥
शब्दब्रह्म-सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम्।
अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत् ॥ 36 ॥ ”
“कर्म और ज्ञानकाण्डके पोषक शास्त्रोंको जीविका
बनानेवाले वक्ता मधुपुष्पित (मनोहर) वाक्योंके द्वारा
निष्काम-भगवद्भक्ति-विरोधी तथा मात्सर्य और [स्वर्गादि]
फलभोग-तात्पर्यमय कथा करते हैं। उनके वाक्योंको
श्रवण अथवा पाठ करके अनभिज्ञ सरलमति कोमल
श्रद्धावाले व्यक्ति जीवके नित्यसाधन और नित्यसाध्य
श्रीकृष्णभक्ति और श्रीकृष्णप्रेमकी परम महिमा तथा
सौन्दर्यको नहीं समझ पाते। जिसके फलस्वरूप वे
अनादि बहिर्मुखतासे बँधे व्यक्ति बहुत सरलतासे कर्मी
और ज्ञानीके आनुगत्यको स्वीकार कर लेते हैं। इस
प्रकार वे लोग जीवोंके निर्मत्सर परम-हितैषी शुद्ध
कृष्णभक्तोंकी कृपा प्राप्त करनेसे वञ्चित हो जाते हैं।
इसलिये ऐसे व्यक्ति भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके अभावमें
एकमात्र नित्य कल्याणके मार्ग शुद्ध-भक्तिसे अत्यधिक
दूर जाकर अन्तमें केवल दुर्गति तथा दुर्दशाकी चरम
सीमाको प्राप्त करते हैं। जिस समय श्रीगौरसुन्दरने
वाराणसी धाममें श्रीसनातन गोस्वामी प्रभुके प्रश्नके
उत्तरमें साध्य-साधन तत्त्वको बतलाया था, उस समय
वहाँपर तपन मिश्र भी उपस्थित थे और उसे श्रवण
करके उनको निज संशयकी मीमांसा (गम्भीर आलोचना)
प्राप्त हुई थी। अनेक शास्त्रों और अनेक गुरुब्रुवोंके
(अयोग्य गुरुओंके) आनुगत्यको स्वीकार करनेवाले
अबोध जीवोंके मङ्गल हेतु महाप्रभुने अपने भक्त
तपनमिश्रके चरित्रसे (इस संशयकी मीमांसाके द्वारा)
शिक्षा प्रदानकी है॥ 11 ॥
स्वप्नमें एक ब्राह्मणके द्वारा उनको निमाइ
पण्डितसे तत्त्व जिज्ञासा करनेका उपदेश :–
स्वप्ने एक विप्र कहे,–“शुनह तपन।
निमाञिपण्डित-स्थाने करह गमन ॥ 12 ॥
तेंहो तोमार साध्य-साधन करिबे निश्चय।
साक्षात् ईश्वर तेंहो,–नाहिक संशय ॥ ” 13 ॥
अनुवाद—[एक दिन] स्वप्नमें एक ब्राह्मणने
कहा,–“तपन! सुनो, तुम निमाइ पण्डितके पास जाओ।
वे तुम्हारे लिये साध्य-साधन तत्त्वको निश्चित रूपमें
बतलायेंगे। वे साक्षात् ईश्वर हैं, इसमें कोई भी संशय
नहीं है॥” 12–13 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—शास्त्र अनेक हैं। इन-इन शास्त्रोंमें
जिसको 'साध्य' और जिसको 'साधन' कहकर निर्देश
किया गया है, वे भिन्न-भिन्न दिखायी देते हैं। बहुत
शास्त्र पढ़नेपर, कौन-सा साध्य श्रेष्ठ है और कौन-सा
साधन श्रेष्ठ है—यह स्थिर नहीं कर पानेके कारण चित्त
भ्रमित हो जाता है। तपनमिश्रके चित्तमें इस प्रकारका
भ्रम होनेपर उन्हें निमाइ-पण्डितके निकट जाकर उनसे
साध्य-साधन निश्चित कर लेनेके लिये स्वप्नमें आदेश
प्राप्त हुआ। उस स्वप्नमें यह भी कहा था कि
'निमाइ-पण्डित साक्षात् ईश्वर हैं, इस बातमें कोई
संशय नहीं करना।' ॥ 11–13 ॥
महाप्रभुको स्वप्नका वृत्तान्त सुनाना :–
स्वप्न देखि' मिश्र आसि' प्रभुर चरणे।
स्वप्नेर वृत्तान्त सब कैल निवेदने ॥ 14 ॥
अनुवाद—स्वप्न देखनेके बाद तपन मिश्रने महाप्रभुके
पास आकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया और उन्होंने
स्वप्नमें जो देखा था, उसे महाप्रभुसे कहा॥ 14 ॥
महाप्रभुका हरिनामको ही साध्य-साधनके
रूपमें बतलाना :–
प्रभु तुष्ट हञा साध्य-साधन कहिल।
'नाम-सङ्कीर्त्तन कर',–उपदेश कैल ॥ 15 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने प्रसन्न होकर उन्हें साध्य-साधन
तत्त्वके विषयमें बतलाया और उन्हें नाम-सङ्कीर्तन
करनेका उपदेश दिया॥ 15 ॥
सोलहवाँ अध्याय | 203

[ 16/15-21
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने कहा, - "अभेद ब्रह्मज्ञान
और स्वर्गादि भुक्ति - ये जीवके लिये साध्यवस्तु नहीं हैं;
श्रीकृष्णप्रेम ही जीवके लिये एकमात्र साध्यवस्तु है।
कर्म और ज्ञान, - ये उक्त साध्यवस्तुके प्राप्तिके साधन
अथवा उपाय नहीं हैं। शुद्ध श्रीकृष्णनामाश्रय ग्रहण
करके भक्ति ही साध्यवस्तु प्राप्त करनेका एकमात्र
उपाय है॥" 15 ॥
उनको काशी जानेका आदेश :-
ताँर इच्छा, - "प्रभुसङ्गे नवद्वीपे बसि'।"
प्रभु आज्ञा दिल, - "तुमि याओ वाराणसी ॥ 16 ॥
ताँहा आमा-सङ्गे तोमार हवे दरशन।"
आज्ञा पाञा मिश्र कैल काशीते गमन ॥ 17 ॥
भविष्यमें काशीमें महाप्रभु-सेवाका सौभाग्य और
श्रीसनातनके प्रश्नोंसे महाप्रभुके श्रीमुखसे साध्य-साधन-
तत्त्वकी पूर्ण मीमांसा श्रवण करनेका सौभाग्य :-
प्रभुर अनन्त-लीला बुझिते ना पारि।
स्वसङ्ग छाड़ाञा केने पाठान काशीपुरी ॥ 18 ॥
अनुवाद-तब तपन मिश्रने इच्छा प्रकाश की, - "मैं
आपके साथ नवद्वीपमें वास करना चाहता हूँ।" परन्तु
महाप्रभुने उन्हें आज्ञा दी, - "तुम वाराणसी जाओ।
वहींपर ही तुम्हें मेरे दर्शन होंगे।" महाप्रभुकी आज्ञा
पाकर तपन मिश्रने काशीके लिये प्रस्थान किया।
महाप्रभुकी लीलाएँ अनन्त हैं, उन्हें कौन समझ सकता
है? अपना सङ्ग छुड़ाकर उन्हें काशी नगरीमें क्यों भेज
दिया ? ॥ 16-18 ॥
पूर्वी बंगालके सभी निवासियोंका मङ्गल :-
एइ मत बङ्गेर लोकेर कैल सबार हित।
'नाम' दिया भक्त कैल, पड़ाञा पण्डित ॥ 19 ॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने पूर्वबङ्गालके लोगोंको
'नाम' प्रदान करके श्रीकृष्णभक्त और शास्त्र-विद्या
दानकर उन्हें पण्डित बनाकर उनका कल्याण किया॥ 19॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'नाम दिया' अर्थात् "हरे कृष्ण
हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम
राम हरे हरे॥" - इस कृष्णनामको प्रदानकर बङ्गवासियोंको
भक्त बनाया और शास्त्र पढ़ाकर अनेक लोगोंको
पण्डित बना दिया ॥ 19 ॥
एइ मत बङ्गे प्रभु करे नाना लीला।
एथा नवद्वीपे लक्ष्मी विरहे दुःखी हैला ॥ 20 ॥
महाप्रभुके विच्छेदरूपी कालसर्पके
डँसनेसे लक्ष्मीदेवी अप्रकट :-
प्रभुर विरह-सर्प लक्ष्मीरें दंशिल।
विरह-सर्प-विषे ताँर परलोक हैल ॥ 21 ॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु जब पूर्व बङ्गालमें
अनेक लीलाएँ कर रहे थे, तब इधर नवद्वीपमें
श्रीलक्ष्मीप्रिया देवी उनके विरहमें अत्यन्त दुःखी हो रही
थीं। महाप्रभुके विरहरूपी सर्पने श्रीलक्ष्मीप्रिया देवीको
डँस लिया। विरहरूपी सर्पके विषसे वे परलोक सिधार
गयीं ॥ 20-21 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुके विच्छेदके क्लेशने
सर्पका रूप धारणकर लक्ष्मीप्रिया देवीको डँस लिया
और उन्होंने परलोक अर्थात् सर्वश्रेष्ठ लोकरूप अपने
वैकुण्ठधाममें गमन किया ॥ 21 ॥
अमृतानुकणिका-चैःभाः आदिखण्ड चौदह अध्यायमें
इसका वर्णन इस प्रकार है-
“एथा नवद्वीपे लक्ष्मी प्रभुर विरहे।
अन्तरे दुःखिता देवी कारे नाहि कहे ॥ 99 ॥
निरवधि करे देवी आडर सेवन।
प्रभु गियाछेन हैते नाहिक भोजन ॥ 100 ॥
नामे से अन्नमात्र परिग्रह करे।
ईश्वर-विच्छेदे बड़ दुःखिता अन्तरे ॥ 101 ॥
एकेश्वर सर्वरात्रि करेन क्रन्दन।
चित्ते स्वास्थ्य लक्ष्मी ना पायेन कोन क्षण ॥ 102 ॥
ईश्वर-विच्छेदे लक्ष्मी ना पारे सहिते।
इच्छा करिलेन प्रभुर समीपे याइते ॥ 103 ॥
निज-प्रतिकृति-देह थुइ' पृथिवीते।
चलिलेन प्रभु-पाशे अति अलक्षिते ॥ 104 ॥
204 | श्रीचैतन्यचरितामृत