श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 3/44-62 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्रकारके खट्टे पदार्थादि तथा जितने प्रकारके व्यञ्जन
लोक-प्रसिद्ध हैं, उन्हें भी भोगमें सजाया। मूँगकी
दालका बड़ा, उड़दकी दालका बड़ा, केलेका बड़ा,
रबड़ी और नारियल और अनेक प्रकारका पीठा बनाया
गया था। बत्तिशा-आठिया केलेके पत्तोंके दोने बड़े
और बहुत मजबूत थे, इसलिये वे हिल-डुल नहीं रहे
थे। इस प्रकार पचास-पचास दोने व्यञ्जनोंसे भरकर
तीनों भोगोंके आस-पास रखे गये थे। घीसे बनी
खीरको नये मिट्टीके बर्तनोंमें भरकर रखा गया था तथा
तीन पात्रोंमें दूधको गाढ़ा करके बनायी रबड़ी भी रखी
गयी। चिड़वा और केलेको दूधमें मिलाकर बनाये गये
व्यञ्जन तथा लौकीकी खीर आदि जितने और व्यञ्जन
प्रस्तुत किये गये, जिनका वर्णन करना सम्भव नहीं है,
वे मिट्टीके कसोरोंमें रखे हुए थे। छोटे-छोटे केले, दही
और सन्देश आदि विविध प्रकारके व्यञ्जन भी थे,
जिनका वर्णन करना सम्भव नहीं है॥ 44-55 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- ‘बत्तिशा-आठिया-कलार
आङ्गटिया’—जिसमें बत्तीस या अधिक केलोंका गुच्छा
आता है, ऐसा केलेका वृक्ष। आङ्गटिया अर्थात्
अखण्ड केलेका पत्ता ॥ 43 ॥
अनुभाष्य-ग्रन्थकार श्रील कविराज गोस्वामी अपनी
पाक-कलाके नैपुण्यको सुन्दर रूपसे प्रदर्शित कर रहे
हैं। ‘लोके’—जगत्में। ‘इष्ट’—प्रयोजनीय, वाञ्छित। ‘चले-हाले
नाहि’—हिलता-डुलता नहीं। ‘दृढ़’—दृढ़, मजबूत।
‘शक्ति’—कर सकता हूँ॥ 44-55 ॥
नैवेद्यके ऊपर तुलसी और उसके साथ
आचमन-जल प्रदान करना :-
अन्न-व्यञ्जन-उपरि दिल तुलसीमञ्जरी।
तिन जलपात्रे सुवासित जल भरि' ॥ 56 ॥
तिन शुभ्रपीठ, तार उपरि वसन।
कृष्णेर भोग साक्षात् कृष्णे कराइल भोजन ॥ 57 ॥
अनुवाद—तब श्रीअद्वैताचार्यने उन सब अन्न और
व्यञ्जनोंके ऊपर तुलसी मञ्जरी रख दी और तीन
जलपात्रोंमें सुगन्धित जल भरकर रख दिया तथा भोग
लगानेके उद्देश्यसे तीन सुन्दर लकड़ीके आसनोंपर
कपड़ा बिछा दिया। इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यने भगवान्
श्रीकृष्णके लिये सजाये गये भोगको साक्षात् श्रीकृष्ण
(महाप्रभु)को भोजन कराया॥ 56-57 ॥
अनुभाष्य- ‘साक्षात् कृष्णे’—श्रीमन् महाप्रभुको ॥ 57 ॥
स्वयं श्रीअद्वैतके द्वारा आरती-सम्पादन और दोनों
प्रभुओंका अपने भक्तोंके साथ आरती-दर्शन :-
आरतिर काले दुइ प्रभु बोलाइल।
प्रभु-सङ्गे सबे आसिं आरति देखिल ॥ 58 ॥
अनुवाद—भोग निवेदन करनेके बाद भोग-आरतीके
समय श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द
प्रभुको बुलवा लिया। महाप्रभुके साथ आकर सभी
भक्तोंने आरतीके दर्शन किये॥ 58 ॥
ठाकुरको शयन प्रदान करना :-
आरति करिया कृष्णे करा'ल शयन।
आचार्य आसिं प्रभुरे तबै कैला निवेदन ॥ 59 ॥
दोनों प्रभुओंका भोजन करनेके लिये
घरके भीतर आना :-
दुइ भाइ आइला तबै करिते भोजन।
गृहेर भितरे प्रभु करेन गमन ॥ 60 ॥
अनुवाद-आरती करके श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने श्रीकृष्णको
शयन कराया और महाप्रभुके पास आकर घरके भीतर
आनेका निवेदन किया। उनकी प्रार्थनाको सुनकर दोनों
भाई भोजन करनेके लिये अन्दर आये॥ 59-60 ॥
मुकुन्द और हरिदासको भोजनके लिये प्रार्थना करनेपर
उन दोनोंकी अपनी मर्यादाकी रक्षा और दैन्य-विनय :-
मुकुन्द, हरिदास,–दुइ प्रभु बोलाइल।
जोड़हाते दुइ जन कहिते लागिल ॥ 61 ॥
मुकुन्द बोले,–“मोर किछु कृत्य नाहि सरे।
पाछे मुञि प्रसाद पामु, तुमि याह घरे ॥”62 ॥
90 ।
तीसरा अध्याय 3/61-69 ]
हरिदास बले,-"मुञि पापिष्ठ अधम।
बाहिरे एक मुष्टि पाछे करिमु भोजन॥" 63 ॥
अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीमुकुन्द और श्रीहरिदासको
भी भोजन करनेके लिये घरके भीतर आनेके लिये
कहा। उनकी बात सुनकर श्रीमुकुन्द और श्रीहरिदास
हाथ जोड़कर इस प्रकार कहने लगे। श्रीमुकुन्दने
कहा, - "मेरा कुछ नित्यकार्य अभी बाकी हैं, इसलिये
मैं बादमें प्रसाद पाऊँगा, आप भीतर जाइये।" श्रीहरिदासने
कहा,-"मैं पापी और अधम हूँ, इसलिये बाहर बैठकर
बादमें एक मुट्ठी प्रसाद ग्रहण करूँगा॥" 61-63 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'कृत्य नाहि सरे'-कर्त्तव्य कुछ
बाकी है॥ 62 ॥
प्रसादके दर्शनसे महाप्रभुको आनन्द
और श्रीअद्वैतको सम्मान देना :-
दुइ प्रभु लञा आचार्य गेला भितर-घरे।
प्रसाद देखिया प्रभुर आनन्द अन्तरे॥ 64 ॥
"ऐछे अन्न ये कृष्णके कराय भोजन।
जन्मे जन्मे शिरे धरौं ताँहार चरण॥" 65 ॥
अनुवाद-महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको जब
श्रीअद्वैताचार्य घरके भीतर ले गये, तब प्रसादको
देखकर आनन्दित होकर महाप्रभुने कहा, - "जो व्यक्ति
इस प्रकार श्रीकृष्णको अन्न-व्यञ्जनादि अर्पण कर
भोजन कराता है, मैं उसके चरणोंको जन्म-जन्मान्तर
तक अपने सिरपर धारण करता हूँ॥" 64-65 ॥
महाप्रभुको न बतलाकर श्रीअद्वैतका दोनों
प्रभुओंके लिये आसन प्रदान करना :-
प्रभु जाने तिन भोग-कृष्णेर नैवेद्य।
आचार्येर मन-कथा नहे प्रभुर वेद्य ॥ 66 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने यह समझा कि तीनों भोग
श्रीकृष्णको समर्पित हुए हैं, परन्तु श्रीअद्वैताचार्यके
मनकी बातको महाप्रभु नहीं जान पाये ॥ 66 ॥
अनुभाष्य-श्रीअद्वैतप्रभुने तीन भागोंमें भोगको समान
मात्रामें बाँटकर सजा दिया था। (इसी अध्यायकी 42
संख्या देखें), उसमेंसे धातुके पात्रमें सजाया गया भोग
श्रीकृष्णके लिये था; और बाकी दो भाग केलेके पत्तोंके
ऊपर सजाये गये थे। धातुके पात्रवाले भोगको श्रीअद्वैतप्रभुने
स्वयं श्रीकृष्णको निवेदन किया था। बाकी केलेके
पत्तोंवाले दो भोग श्रीमन्महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके
लिये अनिवेदित अवस्थामें ही रखे हुए थे, -उनको
श्रीअद्वैताचार्यने मन-ही-मनमें रखा था, महाप्रभुके सामने
उन्होंने इस बातको प्रकाशित नहीं किया। इसलिये
महाप्रभुने तीनों भोगोंको ही श्रीकृष्णका नैवेद्य-प्रसाद ही
समझा था॥ 66 ॥
महाप्रभु और श्रीअद्वैताचार्य, दोनोंका ही एक दूसरेको
भोजन करनेके लिये अनुरोध :-
प्रभु बले,-"वैस तुमि करिते भोजन।"
आचार्य कहे,-"आमि करिब परिवेश्न ॥" 67 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यसे कहा,-"आप
भी बैठकर भोजन कीजिये।" यह सुनकर श्रीअद्वैताचार्यने
कहा,-"मैं भोजन परोसूँगा ॥" 67 ॥
महाप्रभुके वचन :-
"कोन् स्थाने बसिब, आर आन दुइ पात।
अल्प करि' ताहे आनि' देह व्यञ्जन भात ॥" 68 ॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 68 ॥
अनुभाष्य-श्रीमहाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यसे पूछा,-"मैं
और नित्यानन्द किस स्थानपर बैठेंगे?" भोगके परिमाणको
बहुत अधिक देखकर और भी अन्य दो पात्रको लाकर
उनमें ही कम मात्रामें अन्न-व्यञ्जन देनेको कहा ॥ 68 ॥
श्रीअद्वैताचार्यका दोनों प्रभुओंको आसन-प्रदान :-
आचार्य कहे,-"बैस दाँहे पिण्डार उपरे।"
एत बलि' हाते धरि' बसाइल दुँहारे ॥ 69 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने कहा,-"आप दोनों यहाँ
। 91
[ 3/69-74 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
आसनोंपर बैठ जाइये।” यह कहकर श्रीअद्वैताचार्यने
उनको हाथोंसे पकड़कर आसनपर बैठा दिया॥ ६९॥
महाप्रभुकी विधिमार्गमें आचार्योचित वैराग्य-लीला :-
प्रभु कहे, — “संन्यासीर भक्ष्य नहे उपकरण।
इहा खाइले कैछे हय इन्द्रिय-वारण॥” 70॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “संन्यासीके लिये इतने
प्रकारके व्यञ्जनोंका भोजन करना उचित नहीं है। इन्हें
खाकर अपनी इन्द्रियोंपर संयम कैसे रखा जा सकता
है?” ॥ 70 ॥
अनुभाष्य — 'उपकरण'—दाल, सब्जी आदि जिनके
साथ उत्तम स्वाद लेते हुए चावलका भोजन किया जा
सकता है। परन्तु संन्यासीका जिह्वाको अच्छे लगनेवाले
द्रव्योंमें अधिकार नहीं है। इन्द्रियोंको प्रिय लगनेवाली
वस्तुओंके सेवनसे भोग प्रवृत्ति और अधिक प्रबल होती
है, इसलिये महाप्रभुने वैराग्य प्रधान भक्तोंके सम्बन्धमें
श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको कहा था—
“भाल ना परिबे आर भाल ना खाइबे।”
अर्थात् “बहुत अच्छे-अच्छे वस्त्र मत पहनना
और बहुत स्वादिष्ट वस्तुएँ मत खाना।”
भक्तगण कृष्णप्रसादके अतिरिक्त कभी भी और
कोई वस्तु ग्रहण नहीं करते। धनी गृहस्थ व्यक्ति
अत्यन्त स्वादिष्ट लगनेवाले उत्तम-उत्तम द्रव्योंका
श्रीकृष्णको भोग अर्पण करते हैं। श्रीकृष्णविलासके
सहचर मुखशुद्धि ताम्बूल (पान), सुगन्धित मसाले,
पुष्प-मालाएँ, पलङ्ग, वस्त्र, आभूषणादि प्रसादी वस्तुएँ
यद्यपि वैष्णवोंके लिये आदरणीय हैं, तथापि महाप्रभुकी
आज्ञानुसार अकिञ्चन वैष्णव अपनी देहको घृणित
प्राकृत मानकर इन वस्तुओंको स्वीकार करनेमें अपनी
अयोग्यता दिखलाते हैं कि इसके द्वारा अपराध होगा।
वैष्णवाभिमानी अवैष्णव सहजिया आदि अनर्थोंमें प्रवृत्त
व्यक्ति महाप्रभुके आदेशके तात्पर्यको समझनेमें असमर्थ
हैं॥ 70॥
गौरगतप्राण आचार्यके द्वारा महाप्रभुको
भोजनके लिये अत्यधिक अनुरोध :-
आचार्य कहे, — “छाड़ तुमि आपनार चुरि।
आमि जानि तोमार संन्यासेर भारिभूरि॥ 71॥
भोजन करह, छाड़ वचन चातुरी।”
प्रभु कह, — “एत अन्न खाइते ना पारि॥” 72॥
आचार्य बोले, — “अकपटे करह आहार।
यदि ना खाइते पार, रहिबेक आर॥” 73॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा, — “आप अपने आपको
छिपानेकी चेष्टा मत करो। मैं आपको और आपके
संन्यास ग्रहणके रहस्यको भी अच्छी तरह जानता हूँ।
अपनी वाक्-चातुरीको छोड़कर भोजन कीजिये।” यह
सुनकर महाप्रभुने कहा, — “मैं इतना भोजन नहीं कर
सकता।” श्रीअद्वैताचार्य कहने लगे, — “आप बहाने मत
बनाइये और भोजन कीजिये। यदि पूरा नहीं खा सकते,
तो उच्छिष्ट पत्तेमें ही छोड़ दीजिये॥” 71-73 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'भारिभूरि'— गोपनीय बात ॥ 71॥
भोजन-पात्रमें उच्छिष्ट छोड़ना संन्यासीके लिये निषेध :-
प्रभु बोले, — “एत अन्न नारिब खाइते।
संन्यासीर धर्म नहे उच्छिष्ट राखिते॥” 74॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “मैं इतना भोजन नहीं
खा सकूँगा और उच्छिष्ट छोड़ना संन्यासीका धर्म नहीं
है॥” 74॥
अनुभाष्य—संन्यासी उच्छिष्ट नहीं छोड़ते
(भाः 11/18/19)—
“बहिर्जलाशयं गत्वा तत्रोपस्पृश्य वाग्यतः।
विभज्य पारितं शेषं भुञ्जीताशेषमाहृतम्॥”
अर्थात् “संन्यासी भिक्षा प्राप्त करनेके पश्चात्
ग्रामके बाहर स्थित जलाशयमें जाकर स्नान-आचमन
करके जलके द्वारा भिक्षाको पवित्र कर ले। फिर
शास्त्रोक्त पद्धतिसे जिन्हें भिक्षाका भाग देना चाहिये,
92 ।
तीसरा अध्याय 3/74-83 ]
उन्हें देकर जो कुछ बचे उसे मौन रहकर पूरा खा
लेना चाहिये। दूसरे समयके लिये बचाकर न रखे और
न ही अधिक माँगकर लाये।”
उक्त श्लोककी श्रील विश्वनाथ चक्रवर्तीकी टीका—
“विभज्य विष्णु ब्रह्मार्कभूतैभ्यः, अशेषमिति भोजनपात्रेऽवशिष्टं
न रक्षणीयमित्यर्थः।”
अर्थात् “विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य आदि देवताओं तथा
अन्य प्राणियोंके उद्देश्यसे विभक्त करके बचे हुए
भोजनको पूरा खाकर भोजनपात्रमें अवशिष्ट न छोड़े—यह
अर्थ है॥”74॥
आचार्यका महाप्रभुपर आक्षेप और दीनता प्रदर्शन :-
आचार्य बले,—“नीलाचले खाओ चौयान्नबार।
एकबारे अन्न खाओ शत शत भार ॥ 75॥
तीन जनार भक्ष्यपिण्ड—तोमार एक ग्रास।
तार लेखाय एइ अन्न नहे पञ्चग्रास ॥ 76॥
मोर भाग्ये, मोर घरे, तोमार आगमन।
छाड़ह चातुरी, प्रभु, करह भोजन ॥”77॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य (महाप्रभुको श्रीजगन्नाथसे अभिन्न
जानते हुए) कहने लगे,—“नीलाचलमें (श्रीजगन्नाथ रूपमें)
तो आप चौवन बार भोजन करते हो और एक-एक
बारमें सौ-सौ पात्रोंमें भरे हुए अन्न खा जाते हो। तीन
लोग जितना भोजन करते हैं, उतना तो आपका एक
ग्रास मात्र होता है। उस अनुपातमें तो यह अन्न आपके
पाँच ग्रासके भी बराबर नहीं है। मेरे परम सौभाग्यसे
आज आपका मेरे घरमें आगमन हुआ है। इसलिये हे
प्रभो! अपनी चतुराईको छोड़कर भोजन करो॥”75-77॥
अनुभाष्य—'लेखाय'—अनुपातमें॥ 76॥
दोनों प्रभुओंका अलग-अलग जलसे
आचमन करनेके बाद भोजन आरम्भ :-
एत बलि' जल दिल दुइ गोसाञिर हाते।
हासिया लागिला दुँहे भोजन करिते ॥ 78 ॥
अनुवाद—इतना कहकर श्रीअद्वैताचार्यने दोनों प्रभुओंके
हाथोंमें आचमनके लिये जल दिया और दोनों हँसते हुए
भोजन करने लगे॥78॥
श्रीअद्वैतके साथ श्रीनिताइका प्रेम कौतुकमय-कलह :-
नित्यानन्द कहे,—“कैलुँ तिन उपवास।
आजि पारणा करिते बड़ छिल आश ॥ 79॥
आजि उपवास हैल आचार्य-निमन्त्रणे।
अर्धपेट ना भरिल एइ ग्रासेक अन्ने ॥”80॥
अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने उपहास करते
हुए कहा,—“मैं तीन दिनसे उपवास कर रहा हूँ और
आज पारण करनेकी अर्थात् पेट भरकर खानेकी बड़ी
आशा थी। श्रीआचार्यने मुझे अपने घरपर भोजनके
लिये निमन्त्रण तो दिया है, परन्तु लगता है आज भी
उपवास करना पड़ेगा, क्योंकि केवल इस एक ग्रास
अन्नसे मेरा आधा पेट भी नहीं भरेगा॥”79-80॥
आचार्य कहे,—“तुमि तैर्थिक संन्यासी।
कभु फल-मूल खाओ, कभु उपवासी ॥ 81 ॥
दरिद्र-ब्राह्मण-घरे ये पाइला मुष्टिकात्र।
इहाते सन्तुष्ट हओ, छाड़ लोभ-मन ॥”82॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“आप
तीर्थोंमें भ्रमण करनेवाले एक संन्यासी हो। (वहाँ तो
आपको भर पेट भोजन नहीं मिलता) इसलिये कभी
मिल जाय, तो आप फल-मूल खाते हो और वह भी
नहीं मिले, तो उपवास करते हो। इस दरिद्र ब्राह्मणके
घर जो मुट्ठी भर अन्न आपको मिला है, उसीमें सन्तुष्ट
रहो, मनमें अधिक लोभ मत करो॥”81-82॥
नित्यानन्द बले,—“यबे कैले निमन्त्रण।
तत दिते चाह, यत करिये भोजन ॥”83॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,—“मैं
जो भी हूँ, परन्तु आपने मुझे भोजनके लिये निमन्त्रण
। 93
[ 3/81-90 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
दिया है। इसलिये मैंने जितना खाना है, उतना आपको
देना पड़ेगा॥”83॥
शुनि' नित्यानन्देर कथा ठाकुर अद्वैत।
कहेन ताँहारे किछु पाइया पिरीत॥84॥
“भ्रष्ट अवधूत तुमि, उदर भरिते।
संन्यास लइयाछ, बूझि, ब्राह्मण दण्डिते॥85॥
तुमि खेते पार दश-विश मानेर अन्न।
आमि ताहा काँहा पाब, दरिद्र ब्राह्मण॥86॥
ये पाञाछ मुष्टिकान्न, ताहा खाञा उठ।
पागलामि ना करिह, ना छाड़ाइओ झूठ॥”87॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुकी बातको सुनकर
श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने भी परिहास करते हुए कहा, — “तुम
एक भ्रष्ट अवधूत हो। मैं जानता हूँ कि अपना पेट
भरनेके लिये ही तुमने संन्यास लिया है और मुझ जैसे
सरल ब्राह्मणोंको परेशान करते हो। तुम तो दस-बीस
'मान' चावल खा सकते हो। मैं दरिद्र ब्राह्मण हूँ। इतना
चावल कहाँसे लाऊँगा ? इसलिये जो एक मुट्ठी अन्न
मिला है, उसे खाकर उठ जाओ। पागलपन मत करो
और कुछ झूठा भी मत छोड़ना॥”84-87॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'मान'-चार सेर (लगभग साढ़े
तीन किलो) को एक 'मान' कहते हैं॥ 86॥
अनुभाष्य—'तैर्थिक संन्यासी'—श्रीनित्यानन्द प्रभु स्वयं
अवधूत होनेपर भी तीर्थ भ्रमण करनेवाले बहुदक
संन्यासीका अभिनय कर रहे थे। 85 संख्याका
अनुभाष्य देखें।
'भ्रष्ट'—प्राकृत-स्मार्त्तसमाज-भ्रष्ट अर्थात् विधि और
निषेधसे अतीत, यहाँ निन्दाके छलसे स्तुतिके अर्थमें
व्यवहार हुआ है।
संन्यासकी चरम अवस्था—परमहंस कहलाती है;
उसीका ही दूसरा नाम 'अवधूत' है। अवधूत स्वेच्छाचारी
होते हैं। विषय ग्रहण करनेपर भी वे विषयोंके द्वारा
बाध्य नहीं है। संन्यासके चिह्न वे कभी तो ग्रहण करते
हैं और कभी परित्याग करते हैं। श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा
कहे गये ये सब वचन परिहासमात्र हैं, वास्तवमें सत्य
नहीं हैं। कोई-कोई खड़दहमें त्रिपुरासुन्दरीको श्रीश्यामसुन्दरके
साथ अधिष्ठित देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके अवधूत
आचरणको शाक्त सम्प्रदायके कौल-अवधूतका आचरण
समझकर भ्रमित होते हैं—
“अन्तः शाक्तः बहिः शैवः सभायां वैष्णवो मतः।”
अर्थात् “अन्तरमें शाक्त, बाहरसे शैव और सभामें
वैष्णव”—वास्तवमें ऐसा नहीं है। श्रीनित्यानन्दस्वरूप
एक वैदिक-संन्यासीके अनुगत 'स्वरूप'-नामक ब्रह्मचारी
हैं अर्थात् वैदिक-संन्यासी गुरुने उन्हें ब्रह्मचारी नाम
'स्वरूप' दिया था, परन्तु वास्तवमें वे स्वयं परमहंस हैं।
और कोई-कोई कहते हैं कि श्रीलक्ष्मीपति तीर्थ ही
उनके आचार्य (गुरु) हैं, किन्तु वैसा होनेपर भी वे
श्रीमध्व सम्प्रदायके ही अन्तर्गत हैं, — वे बङ्गदेशीय
तान्त्रिक नहीं हैं।
'झूट'—उच्छिष्ट ॥ 81-87 ॥
श्रीअद्वैत और श्रीनिताइ दोनों प्रभुओंके प्रीतिपूर्वक
कलह-कौतुकको देखकर महाप्रभुका हँसना :—
एइ मत हास्यरसे करेन भोजन।
अर्ध-अर्ध खाञा प्रभु छाड़ेन व्यञ्जन ॥ 88 ॥
आचार्यकी इच्छानुसार महाप्रभुका परिपूर्ण भोजन :—
सेइ व्यञ्जन आचार्य पुनः करेन पूरण।
एइ मत पुनः पुनः परिवेशे व्यञ्जन ॥ 89 ॥
अनुवाद—इस प्रकार परस्पर हास-परिहास करते
हुए दोनों प्रभु भोजन कर रहे थे। महाप्रभु थोड़ा-थोड़ा
खाकर हर व्यञ्जन दोनेमें छोड़ रहे थे। श्रीअद्वैताचार्य
उन-उन व्यञ्जनोंसे दोने पुनः भर देते थे। इस प्रकार
श्रीअद्वैताचार्य बार-बार व्यञ्जन परोस रहे थे॥ 88-89 ॥
दोना व्यञ्जने भरि' करेन प्रार्थन।
प्रभु बलेन,–“आर कत करिब भोजन ॥”90॥
94 ।
तीसरा अध्याय 3/90-98 ]
आचार्य कहे, — “ये दियाछि, ताहा ना छाड़िबा।
एखन ये दिये, तार अर्द्धेक खाइबा ॥” 91 ॥
नाना यत्ने-दैन्ये प्रभुर कराइल भोजन।
आचार्येर इच्छा प्रभु करिल पूरण ॥ 92 ॥
अनुवाद—इस प्रकार दोने व्यञ्जनोंसे भरकर
श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुसे और भोजन करनेके लिये
प्रार्थना करने लगे, तो महाप्रभु बोले, — “और कितना
भोजन करूँगा?” श्रीअद्वैताचार्यने कहा, — “मैंने जो पहले
दिया है, उसे मत छोड़ना। और अब जो दिया है,
उसका आधा तो खाइयेगा ही।” इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यने
बड़े यत्नसे और दीनतापूर्वक महाप्रभुको भोजन कराया।
महाप्रभुने भी श्रीअद्वैताचार्यकी इच्छाको पूर्ण किया ॥ 90-92 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘दोना'—दोना। ‘करेन प्रार्थना'—
खानेके लिये प्रार्थना करना ॥ 90 ॥
आधा पेट भरे होनेका भान करते हुए कृत्रिम
क्रोध भरे श्रीनिताइका एक मुट्ठी अन्न फेंकना :—
नित्यानन्द कहे, — “आमार पेट ना भरिल।
लञा याह, तोर अन्न किछु ना खाइल ॥” 93 ॥
एत बलि' एकग्रास अन्न हाते लञा।
उझालि' फेलिल आगे येन क्रुद्ध हञा ॥ 94 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, — “मेरा पेट ही
नहीं भरा। अपना भोजन वापिस ले जाओ, मैंने तुम्हारे
अन्नमेंसे कुछ भी नहीं खाया है।” इतना कहकर उन्होंने
चावलका एक ग्रास हाथमें लेकर फेंककर सामने
भूमिपर बिखेर दिया जैसे वे क्रोधमें हैं॥ 93-94 ॥
अनुभाष्य—‘उझालि'—बिखेरना ॥ 94 ॥
श्रीनिताइके द्वारा फेंके हुए उच्छिष्टका अङ्गोंसे
स्पर्श होनेसे श्रीअद्वैतका प्रेमपूर्वक नृत्य :—
भात दुइ-चारि लागे आचार्येर अङ्गे।
भात गाये लञा आचार्य नाचे बहुरङ्गे ॥ 95 ॥
“अवधूतेर झूटा मोर लागिल अङ्गे।
परम पवित्र मोरे कैल एइ ढङ्गे ॥ 96 ॥
निन्दाके छलसे श्रीअद्वैतके द्वारा श्रीनित्यानन्द-स्तुति :—
तोरे निमन्त्रण करि' पाइनु तार फल।
तोर जाति-कुल नाहि, सहजे पागल ॥ 97 ॥
आपनार सम मोरे करिबार तरे।
झूठा दिले, विप्र बलि' भय ना करिले ॥” 98 ॥
अनुवाद—फेंके हुए चावलके दो-चार दाने
श्रीअद्वैताचार्यके अङ्गमें लगे। वे अङ्गोंमें चावल लगे-लगे
ही तरह-तरहसे नाचने लगे और कहने लगे, — “इस
अवधूतका जूठा मेरे अङ्गसे लगा है। इस प्रकार उसने
मुझे परम पवित्र कर दिया है। तुम्हें निमन्त्रण देकर
मैंने उसका फल पा लिया है। तुम्हारा जाति-कुल
आदि कुछ भी निश्चित नहीं है। तुम तो स्वभावसे
पागल हो। मुझे अपने जैसे पागल बनानेके लिये ही
तुमने अपना जूठा मेरे अङ्गोंपर फेंका है। मैं ब्राह्मण
हूँ, इस बातका भी तुम्हें भय नहीं हुआ।” (यह
श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा श्रीनित्यानन्द प्रभुकी निन्दाके छलसे
स्तुति ही है) ॥ 95-98 ॥
अनुभाष्य—‘अवधूत'—असंस्कृतदेह (भाः 3/1/19
श्लोककी श्रीधरस्वामी-टीका देखें)। परमहंस-आचरणकी
लीला करनेवाले श्रीनित्यानन्द प्रभुने अन्नको फेंककर
पागलपन जैसे व्यवहारको दिखानेका छल किया।
अभक्त स्मार्त्तसमाजकी विधिके अनुसार उच्छिष्टके
स्पर्शसे व्यक्ति अपवित्र हो जाता है, परन्तु इस
उच्छिष्टके स्पर्शसे अपवित्र होनेके बदले वास्तवमें मैं
(अद्वैताचार्य) परम पवित्र और शुद्ध हुआ था।
वैष्णव अथवा परमहंसका उच्छिष्ट—महामहाप्रसाद
होता है, वह स्वयं चेतनमय विष्णुके समान है।
महामहाप्रसाद अभक्तोंकी इन्द्रियोंकी तृप्ति करनेवाला
साधारण चावल-दाल नहीं है। वर्णाश्रमसे अतीत
परमहंसश्रेष्ठ श्रीगुरुदेवके या परमहंस अर्थात् वैष्णवोंके
। 95
[ 3/96-102
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
उच्छिष्टका स्पर्श और सेवनरूपी सङ्ग सांसारिक
जीवोंके हृदयमें स्थित हरि-विमुखताको सम्पूर्ण रूपसे
दूर करके उनको अप्राकृत परमहंस-दास्यरूप शुद्ध
ब्राह्मणत्वमें प्रतिष्ठित करता है, —यही आचार्य श्रीअद्वैतप्रभुने
स्वयं मूढ़ जीवोंके मङ्गलके लिये बोला।
‘सहजे पागल’—आत्मा अर्थात् चेतनाके साथ ही
उत्पन्न अप्राकृत परमहंस धर्मपरायण, प्रतिक्षण सभी
इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णकी सेवामें रत (भाः 11/18/28-29)
देखें।
‘आपणार सम’—अर्थात् सिद्धवैष्णव या विधि-निषेधसे
अतीत परमहंस। श्रीगुरु नित्यानन्द और परमहंस या
वैष्णव और उनके दास कभी भी हरिविमुख प्राकृत
स्मार्त्त-समाजके भयसे उनके विधि-विधानसे नहीं चलते
हैं—यही श्रीअद्वैताचार्यके कहनेका तात्पर्य है। शुद्धवैष्णव
या परमहंसोंके दास चेतनमय महाप्रसादका सेवन और
सम्मान करते हैं, उसे प्रकृतिसे उत्पन्न जड़ेन्द्रियोंकी
तृप्ति करनेवाले चावल-दालके समान मानकर उसमें
स्पर्शदोषका विचार नहीं करते। वे यह जानते हैं—शुद्ध
वैष्णवकी तो बात दूर है, चण्डालके मुखसे भी गिरे
महाप्रसादके सेवनके फलसे भी ब्राह्मणका ब्राह्मणत्व
पूरी तरहसे अटूट रहता है, ब्राह्मणत्वमें किसी प्रकारकी
अपवित्रता स्पर्श नहीं करती। महाप्रसादके सेवनसे
जड़-जगत्की समस्त पवित्र और अपवित्र वस्तुएँ
श्रीकृष्णकी सेवामें नियुक्त होकर अप्राकृत (दिव्य) पवित्र
वस्तुके रूपमें दिखायी देती हैं॥96-98॥
किया है। यदि तुम सौ संन्यासियोंको भोजन कराओगे,
तभी तुम्हारा यह अपराध दूर होगा॥”99-100॥
अनुभाष्य—बृहद्विष्णुपुराणमें—
“नैवेद्यं जगदीशस्य अन्नपानादिकञ्च यत्।
भक्ष्याभक्ष्यविचारश्च नास्ति तद्भक्षणे द्विजाः।
ब्रह्मवनिर्विकारं हि यथा विष्णुस्तथैव तत्।
विकारं ये प्रकुर्वन्ति भक्षणे तद्द्विजातयः॥
कुष्ठव्याधिसमायुक्ताः पुत्रदारविवर्जिताः।
निरयं यान्ति ते विप्रास्तस्मान्नावर्त्तते पुनः॥”
अर्थात् “हे ब्राह्मणों! श्रीहरिका नैवेद्य और अन्नपान
आदि द्रव्य सेवन करते समय किसी प्रकारके
खाद्य-अखाद्यका विचार न करें। श्रीहरिका नैवेद्य
ब्रह्मकी भाँति निर्विकार और विष्णुके सदृश है।
विष्णुका नैवेद्य आदि ग्रहण करनेमें जिनके चित्तमें
संशय आदि विकार उत्पन्न होते हैं, उनको कुष्ठरोगसे
युक्त और पुत्र-स्त्री-विहीन होकर नरकगामी होना पड़ता
है। वहाँसे उनका पुनरागमन नहीं होता।”
महाप्रसादको साधारण चावल-दालके समान मानकर
उसमें भोग-बुद्धि रखनेके अपराधसे सावधान करनेके
लिये ही ग्रन्थकारने महाप्रसादके माहात्म्यके विषयमें
(अन्त्यलीला, 16/56-63 संख्यामें) लिखा है॥99-100॥
वैष्णव संन्यासके द्वारा स्मार्त्त विधिका लुप्त होना :—
आचार्य कहे, —“ना करिब संन्यासि-निमन्त्रण।
संन्यासी नाशिल मोर सब स्मृति-धर्म॥”101॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने उत्तर दिया,—“मैं आजके
बाद किसी भी संन्यासीको निमन्त्रण नहीं दूँगा, क्योंकि
एक संन्यासीने ही मेरे ब्राह्मण स्मृति-धर्मको नष्ट कर
दिया है॥”101॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘स्मृतिधर्म’—स्मार्त्तधर्म॥101॥
श्रीनित्यानन्दके द्वारा श्रीअद्वैतको दण्डका भय
दिखाना और उसके प्रायश्चित्तकी व्यवस्था :—
नित्यानन्द बोले,—“एइ कृष्णेर प्रसाद।
इहाके ‘झुठा’ कहिले, कैले अपराध॥99॥
शतेक संन्यासी यदि कराह भोजन।
तबे एइ अपराध हइबे खण्डन॥”100॥
अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,—“यह
श्रीकृष्णका प्रसाद है। इसे 'झूठा' कहकर तुमने अपराध
आचमन देनेके बाद श्रीअद्वैतके द्वारा दोनों
प्रभुओंकी समयके अनुसार सेवा :—
एत बलि’ दुइ जने कराइल आचमन।
उत्तम शय्याते लइया कराइल शयन॥102॥
96 ।
तीसरा अध्याय 3/102-113 ]
लवङ्ग एलाची-बीज-उत्तम रसवास।
तुलसी-मञ्जरीसह दिल मुखवास ॥ 103 ॥
सुगन्धि चन्दने लिप्त कैल कलेवर।
सुगन्धि पुष्पमाला आनि' दिल हृदय-उपर ॥ 104 ॥
अनुवाद-यह कहकर श्रीअद्वैताचार्यने दोनों प्रभुओंको आचमन कराया और उनको शयनके लिये उत्तम शय्या प्रदान की। मुखके अच्छे स्वादके लिये लौंग, इलायचीके दानेसे बने उत्तम रसवासको तुलसी मञ्जरीके साथ दिया। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने तब सुगन्धित चन्दनके द्वारा उनके अङ्गोंका लेपन किया और सुगन्धित पुष्पमाला उनके वक्षःस्थलपर धारण करा दी ॥ 102-104 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'रसवास'-रसयुक्त गन्ध ॥ 103 ॥
श्रीअद्वैतके द्वारा महाप्रभुके पाद-सम्वाहनकी चेष्टा :-
आचार्य करिते चाहे पाद-सम्वाहन।
सङ्कुचित हञा प्रभु बलेन वचन ॥ 105 ॥
महाप्रभुकी लज्जा ओर श्रीअद्वैताचार्यको मुकुन्द तथा हरिदासके साथ भोजन करनेकी आज्ञा :-
“बहुत नाचाइले तुमि, छाड़ नाचान।
मुकुन्द-हरिदास लइया करह भोजन ॥” 106 ॥
तबे त' आचार्य सङ्गे लञा दुइ जने।
करिल भोजन, इच्छा ये आछिल मने ॥ 107 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुका पाद-सम्वाहन करना चाहते थे, परन्तु महाप्रभुने सङ्कोच करके कहा,-“आपने मुझे बहुत नचाया है, अब और नचाना छोड़ो। जाकर मुकुन्द और हरिदासके साथ भोजन करो।” तब श्रीअद्वैताचार्यने श्रीमुकुन्द तथा श्रीहरिदासको साथ ले जाकर, महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रसादको पाकर अपने मनकी इच्छाको पूर्ण किया ॥ 105-107 ॥
अनुभाष्य-संन्यासीको उत्तम शय्या, लौंग, इलायची, चन्दन, पुष्पमालादान ओर स्वयं श्रीअद्वैताचार्यकी पाद सम्वाहन अर्थात् चरण दबानेकी चेष्टाको देखकर (यह सब संन्यासीके लिये उचित नहीं है, ऐसा जनानेके लिये) महाप्रभुने कहा, - “तुमने मुझे बहुत नचाया है, अब और नचाना बन्द करो ॥" 106-107 ॥
स्थानीय लोगोंका महाप्रभुके दर्शनके लिये आना :-
शान्तिपुरेर लोक शुनि' प्रभुर आगमन।
देखिते आइला लोक प्रभुर चरण ॥ 108 ॥
चारों ओर हरिध्वनि और महाप्रभुके रूपका दर्शन कर लोगोंको आनन्दकी प्राप्ति :-
'हरि' 'हरि' बले लोक आनन्दित हञा।
चमत्कार पाइल प्रभुर सौन्दर्य देखिञा ॥ 109 ॥
गौर-देह-कान्ति सूर्य जिनिया उज्ज्वल।
अरुण-वस्त्रकान्ति ताहे करे झलमल ॥ 110 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके आगमनकी बात सुनकर शान्तिपुरके लोग उनके श्रीचरणोंके दर्शनके लिये आये। महाप्रभुका दर्शन करके लोग आनन्दसे 'हरि' 'हरि' बोलने लगे। महाप्रभुके सौन्दर्यको देखकर वे आश्चर्यचकित हो गये। उनके गौर-देहकी उज्ज्वल कान्ति सूर्यकी कान्तिको भी परास्त कर रही थी और संन्यासके गेरुए वस्त्र उनकी देहपर झलमल कर रहे थे ॥ 109-110 ॥
सारा दिन लोगोंका आना-जाना :-
आइसे याय लोक सब, नाहि समाधान।
लोकेर सङ्घट्टे दिन हैल अवसान ॥ 111 ॥
अनुवाद-कितने लोग आये और गये, इसका कोई हिसाब नहीं था। सारा दिन लोगोंका जमघट लगा रहा ॥ 111 ॥
अनुभाष्य - 'समाधान'- हिसाब, मीमांसा ॥ 111 ॥
सन्ध्याके समय श्रीअद्वैतका सङ्कीर्तन :-
सन्ध्याते आचार्य आरम्भिल सङ्कीर्त्तन।
आचार्य नाचेन, प्रभु करेन दर्शन ॥ 112 ॥
नित्यानन्द गोसाञि बुले आचार्य धरिञा।
हरिदास पाछे नाचे हरषित हञा ॥ 113 ॥
। 97
[ 3/112-118 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—सन्ध्यामें श्रीअद्वैताचार्यने सङ्कीर्तन आरम्भ
किया। श्रीअद्वैताचार्य प्रेमावेशमें नाचने लगे और महाप्रभु
उन्हें देख रहे थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीअद्वैताचार्यको
पकड़कर उनके साथ चलने लगे (कहीं वे गिर न
जाँय)। श्रीहरिदास ठाकुर भी परमानन्दित होकर उनके
पीछे-पीछे नृत्य करने लगे॥112-113॥
अनुभाष्य—'बुले'—नाचते हुए चल रहे थे॥113॥
विद्यापतिका पद :—
कि कहिब रे सखि आजुक आनन्द ओर।
चिरदिने माधव मन्दिरे मोर॥114॥ध्रु॥
एइ पद गाओयाइया हर्षे करेन नर्त्तन।
स्वेद-कम्प-पुलकाश्रु-हुङ्कार-गर्जन॥115॥
अनुवाद—(श्रीअद्वैताचार्य इस पदको गाने लगे),—“हे
सखि! आजके मैं अपने आनन्दकी सीमाके विषयमें
क्या कहूँ? चिरकालके बाद आज माधव मेरे घरमें
आये हैं।” इस पदको गाते हुए श्रीअद्वैताचार्य हर्षसे नृत्य
करने लगे और उनके शरीरमें स्वेद, कम्प, पुलक,
अश्रु, हुँकार तथा गर्जन आदि सात्त्विक भाव उत्पन्न हो
गये॥114-115॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'ओर'—सीमा; यह विद्यापतिका
पद है॥114॥
अनुभाष्य—विद्यापति द्वारा रचित गीत—
“कि कहब रे सखि आजुक आनन्द ओर।
चिरदिने माधव मन्दिरे मोर॥
पाप सुधाकर यत सुख देल।
पियामुख-दरशने तत सुख भेल॥
आचर भरिया यदि महानिधि पाइ।
तब् हाम् पिया दूरदेशे ना पाठाइ॥
*शीतेर ओड़नी पिया, गिरिशीर वा'। *
वरिषार छत्र पिया, दरियार ना'॥
भणये विद्यापति, शुन, वरनारि।
सुजनक दुख दिवस दुइ चारि॥”
अर्थात् “हे सखि! क्या बताऊँ, आज मेरे
आनन्दकी कोई सीमा नहीं है, बड़े दिनोंके बाद
माधव आज मेरे घरमें आये हैं। रात्रिमें चन्द्रमा जैसे
सुख प्रदान करता है, माधवके मुखके दर्शन करके मैं
वैसी ही सुखी हुई हूँ। आँचल भरकर भी यदि
महानिधि कोई दे, तो भी मैं उसे छोड़कर अपने
प्रियतमको अपने पास ही रखना चाहूँगी, उन्हें दूरदेश
नहीं भेजूँगी। प्रियतमका सङ्ग शीतकालमें ओढ़नीके
समान और ग्रीष्म एवं वर्षाकालमें छातेके समान
सुखदायक होता है। हे सखि! विद्यापति कहते हैं कि
सज्जनोंके दुःख दिन दो-चार ही होते हैं, एक न एक
दिन उन्हें अपने प्रियतम मिल ही जाते हैं।”
श्रीलराधामोहन ठाकुरने 'पदामृत-समुद्र' ग्रन्थमें इस
गीतकी पहली चार पंक्तियोंको नहीं लिखा। कोई-कोई
'माधव'-शब्दसे श्रीमाधवेन्द्रपुरीको लक्ष्य करके इसे
श्रीअद्वैताचार्य प्रभुका गीत मानते हैं, किन्तु ऐसा विचार
सङ्गत नहीं है। माथुर-विरहके बाद सम्भोग, इसकी यहाँ
अधिक सङ्गति है, ऐसा जानना होगा॥114॥
श्रीअद्वैतके द्वारा महाप्रभुके निकट सविनय प्रार्थना :—
फिरि' फिरि' कभु प्रभुर धरेन चरण।
चरण धरिया प्रभुरे बलेन वचन॥116॥
“अनेक दिन तुमि मोरे बेड़ाइले भाण्डिया।
घरेते पाञाछि, एबे राखिब बाँधिया॥”117॥
एत बलि' आनन्दे आचार्य करेन नर्त्तन।
प्रहरेक-रात्रि आचार्य कैल सङ्कीर्त्तन॥118॥
अनुवाद—घूमते-घूमते श्रीअद्वैताचार्य कभी महाप्रभुके
चरण पकड़ लेते और चरण पकड़कर उनसे
कहते,—“बहुत दिनोंसे मुझे धोखा देकर भागते रहे हो,
किन्तु अब आप मेरे घरमें हो, मैं आपको बाँधकर
रखूँगा।” यह कहकर श्रीअद्वैताचार्यने आनन्दपूर्वक नृत्य
करते हुए उस रात एक प्रहर तक सङ्कीर्तन
किया॥116-118॥
98 ।
तीसरा अध्याय 3/117–128 ]
अनुभाष्य—'भण्डिया'—धोखा करके॥ 117 ॥
महाप्रभुका श्रीकृष्ण-विरह :-
प्रेमेर उत्कण्ठा,—प्रभुर नाहि कृष्णसङ्ग।
विरह बाड़िल, प्रेमज्वालार तरङ्ग ॥ 119 ॥
व्याकुल हञा प्रभु भूमेते पड़िला।
गोसाञि देखिया आचार्य्य नृत्य सम्वरिला ॥ 120 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य प्रभु जब इस प्रकार नृत्य
कर रहे थे, तब महाप्रभु श्रीकृष्णप्रेममें उत्कण्ठित हो
उठे, किन्तु श्रीकृष्ण-सङ्ग प्राप्त न करनेके कारण
विरहमें उनकी प्रेम-ज्वालाकी तरङ्गें बढ़ने लगीं।
श्रीकृष्ण-विरहमें व्याकुल होकर महाप्रभु भूमिपर गिर
पड़े और महाप्रभुको गिरते हुए देखकर श्रीअद्वैताचार्यने
नृत्य करना बन्द कर दिया ॥ 119–120 ॥
मुकुन्दका समयके अनुसार गीत गाना :-
प्रभुर अन्तर मुकुन्द जाने भालमते।
भावेर सदृश पद लागिला गाइते ॥ 121 ॥
आचार्य उठाइल प्रभुके करिते नर्त्तन।
पद शुनि' प्रभुर अङ्ग ना याय धारण ॥ 122 ॥
महाप्रभुके अष्टसात्त्विक विकार :-
अश्रु, कम्प, पुलक, स्वेद, गदगद वचन।
क्षणे उठे, क्षणे पड़े, क्षणेक रोदन ॥ 123 ॥
अनुवाद—श्रीमुकुन्द महाप्रभुके अन्तरङ्ग भावोंको
भलीभाँति जानते थे और वे उनके भावोंके अनुरूप
पदका गान करने लगे। तब श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुको
नृत्य करनेके लिये उठाने लगे, परन्तु मुकुन्दके पदको
सुनकर महाप्रभु इतने अधिक भावाविष्ट हो गये कि
उन्हें पकड़ा नहीं जा रहा था। उनकी आँखोंसे अश्रुपात
हो रहा था, सारा शरीर काँप रहा था, देहमें पुलक हो
रहा था, शरीर पसीनेसे तर-बतर हो रहा था तथा
उनका गला रुद्ध हो गया था। एक क्षण वे उठते, क्षण
भरमें गिर पड़ते तथा अगले क्षण क्रन्दन करने
लगते ॥ 121–123 ॥
यथा पद :-
हा हा प्राणप्रियसखि, कि ना हैल मोरे।
कानुप्रेमविषे मोर तनु-मन जरे ॥ 124 ॥
रात्रि-दिने पोड़े मन, सोयास्ति ना पाइ।
याँहा गेले कानु पाउँ, ताँहा उड़ि' याइ ॥ 125 ॥
एइ पद गाय मुकुन्द मधुर सुस्वरे।
शुनिया प्रभुर चित्त हइल कातरे ॥ 126 ॥
अनुवाद—हा! हा! प्राणप्रियसखि! मुझे क्या नहीं
हुआ है? कृष्णके प्रेमरूपी विषके प्रभावसे मेरा तन
और मन संतप्त हो रहा है। रात-दिन मेरा मन जलता
रहता है। मुझे इससे तनिक भी आराम नहीं मिलता।
यदि कहीं जानेसे कृष्ण मिलेंगे, तो मैं वहाँ उड़कर
पहुँच जाऊँ।—श्रीमुकुन्द इस पदको मधुर सुस्वरमें गान
कर रहे थे और इसे सुनकर महाप्रभुका हृदय विरहमें
कातर हो रहा था॥ 124-126॥
अनुभाष्य—सम्भोग-रसके गानमें श्रीकृष्णसङ्गके
अभाववशतः महाप्रभुमें विप्रलम्भ रसका पूर्ण प्राकट्य
देखकर श्रीमुकुन्दने उसीके अनुरूप पदका गान आरम्भ
किया। श्रीअद्वैतप्रभुने भी नृत्य बन्द कर दिया।
विद्यापतिको अनुरूप पद—
“कि करिब कोथा याब सोयाथ ना हय।
पियार लागिया हाम् कोने देशे याब॥”
अर्थात् “क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, हृदयको शान्ति
नहीं मिल रही। अपने प्रियतमको खोजने मैं कौनसे
देशको जाऊँ?”॥ 124 ॥
महाप्रभुके भाव :-
निर्वेद, विषाद, हर्ष, चापल्य, गर्व, दैन्य।
प्रभुर सहित युद्ध करे भाव-सैन्य ॥ 127 ॥
जर-जर हैल प्रभु भावेर प्रहारे।
भूमिते पड़िल, श्वास नाहिक शरीरे ॥ 128 ॥
। 99
[ 3/127-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
देखिया चिन्तित हैला यत भक्तगण।
आचम्बिते उठे प्रभु करिया गर्जन ॥ 129 ॥
‘बल्’ ‘बल्’ बले, नाचे, आनन्दे विह्वल।
बुझन ना जाय, भाव-तरङ्ग प्रबल ॥ 130 ॥
अनुवाद-निर्वेद, विषाद, हर्ष, चापल्य, गर्व और
दैन्य आदि भाव सैनिकोंके जैसे आकर महाप्रभुके साथ
युद्ध कर रहे थे। उन सात्त्विक भावोंके प्रहारसे
महाप्रभुका शरीर जर्जर हो गया और वे भूमिपर गिर
पड़े तथा उनकी श्वास लगभग बन्द हो गयी। यह
देखकर सभी भक्त चिन्तित हो गये। तभी महाप्रभु
अचानक उठ खड़े हुए और जोरसे गर्जन करते हुए
कहा 'बोलो' 'बोलो'। वे आनन्दमें विह्वल होकर नृत्य
करने लगे। महाप्रभुके इस प्रकारके भावोंकी प्रबल
तरङ्गोंको कोई नहीं समझ सकता ॥ 127-130 ॥
अनुभाष्य- 'हर्ष' - भःरःसिः, दःविः, चतुर्थ लः-
“अभीष्टेक्षणलाभादिजाता चेतःप्रसन्नता।
हर्षः स्यादिह रोमाञ्चः स्वेदोऽश्रुमुखफुल्लता।
आवेगोन्मादजड़तास्तथा मोहादयोऽपि च॥”
अर्थात् “अभीष्टके दर्शन प्राप्त करनेपर चित्तमें जो
प्रसन्नता होती है, उसीका नाम 'हर्ष' है। हर्ष होनेपर
रोमाञ्च, स्वेद (पसीना), अश्रु, मुख फूलना, आवेग,
उन्माद, जड़ता और मोह आदि होता है।”
'गर्व'- भःरःसिः, दःविः, चतुर्थ लः-
“सौभाग्यरूपतारुण्यगुणसर्वोत्तमाश्रयैः।
इष्टलाभादिना चान्य-हेलनं गर्व ईर्य्यते॥
तत्र सोलुण्ठवचनं लीलानुत्तरदायिता।
स्वाङ्गेक्षा निह्ववोऽन्यस्य वचनाश्रवणादयः॥”
अर्थात् “इष्टवस्तुकी प्राप्तिसे अपने सौभाग्य, रूप,
तारुण्य, गुण, सर्वोत्तम आश्रय आदिके सहारे दूसरोंकी
जो अवहेलना होती है, वही 'गर्व' है। इसमें स्तुतिवाक्य,
उत्तर न देना, अपने अङ्गोंको देखना, अपने अभिप्राय
आदिको गोपन रखना और दूसरोंकी बातको श्रवण
आदि न करने जैसी क्रियाएँ वर्तमान होती हैं॥ 127 ॥
महाप्रभुके साथ सतर्क श्रीनित्यानन्द :-
नित्यानन्द सङ्गे बुले प्रभुके धरिञा।
आचार्य, हरिदास बुले पाछे त' नाचिञा ॥ 131 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु महाप्रभुको पकड़कर
साथ चलने लगे ताकि वे गिरें नहीं और श्रीअद्वैताचार्य
तथा श्रीहरिदास महाप्रभुके पीछे-पीछे नृत्य करते चल
रहे थे॥ 131 ॥
महाप्रभुमें अनेक भावोंका वैचित्र्य :-
एइ मत प्रहरेक नाचे प्रभु रङ्गे।
कभु हर्ष, कभु विषाद, भावेर तरङ्गे ॥ 132 ॥
अनुवाद-इस प्रकार आनन्दमग्न होकर महाप्रभु
एक प्रहर तक नृत्य करते रहे। भावोंकी तरङ्गोंमें कभी
उनके हृदयमें हर्ष और कभी विषाद (दुःख) छा
जाता ॥ 132 ॥
उपवासके बाद अधिक नृत्य करनेसे
महाप्रभुको थकावट :-
तिन दिन उपवासे करिया भोजन।
उद्दण्ड-नृत्यते प्रभुर हैल परिश्रम ॥ 133 ॥
श्रीकृष्णप्रेममें महाप्रभुको थकावटका अनुभव नहीं
होनेपर भी थकावटको दूर करना :-
तबु त' ना जाने श्रम प्रेमाविष्ट हञा।
नित्यानन्द महाप्रभुके राखिल धरिञा ॥ 134 ॥
आचार्य-गोसाञि तब राखिल कीर्त्तन।
नाना सेवा करि' प्रभुके कराइल शयन ॥ 135 ॥
अनुवाद-तीन दिनके उपवासके बाद महाप्रभुने
बहुत मात्रामें भोजन किया था। इसलिये उसके बाद
उद्दण्ड नृत्य करनेमें महाप्रभुको कुछ थकान हो गयी।
यद्यपि प्रेममें आविष्ट होनेके कारण महाप्रभुको थकान
अनुभव नहीं हो रही थी, तथापि श्रीनित्यानन्द प्रभुने
महाप्रभुको पकड़कर नृत्य करनेसे रोक दिया। तब
श्रीअद्वैताचार्यने सङ्कीर्त्तनको विश्राम देकर महाप्रभुकी
अनेक प्रकारसे सेवा करके उन्हें शयन कराया॥ 133-135॥
100 ।
तीसरा अध्याय [3/136-147]
दस दिन तक शान्तिपुरमें वास :-
एइमत दशदिन भोजन-कीर्त्तन।
एकरूपे करि' करे प्रभुर सेवन ॥ 136 ॥
अनुवाद-इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यके घर दस दिन
महाप्रभुने भोजन किया और कीर्त्तनका आनन्द लिया।
प्रतिदिन ही श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुकी इसी प्रकारसे
सेवा की ॥ 136 ॥
नवद्वीपके भक्तोंके साथ शचीमाताका पालकीमें आना :-
प्रभाते आचार्य-रत्न दोलाय चड़ञा।
भक्तगण-सङ्गे आइला शचीमाता लञा ॥ 137 ॥
नदीया-नगरेर लोक-स्त्री-बालक-वृद्ध।
सब लोक आइल, हैल संघट्ट समृद्ध ॥ 138 ॥
अनुवाद- (महाप्रभुके शान्तिपुर आनेके) अगले
दिन प्रातःकालमें श्रीचन्द्रशेखर आचार्य नवद्वीपसे शचीमाताको
पालकीमें बैठाकर भक्तोंके साथ श्रीअद्वैताचार्यके घर ले
आये। महाप्रभुके दर्शनके लिये नदीया नगरके सभी
लोग, क्या स्त्री, क्या बालक और क्या वृद्ध-सभी वहाँ
आये। उनके आनेसे वहाँ लोगोंकी भीड़ हो गयी ॥ 137-138 ॥
प्रातःकाल शचीमाताका महाप्रभुसे मिलन :-
प्रातःकृत्य करि' करे नाम-सङ्कीर्त्तन।
शचीमाता लञा आइला अद्वैत-भवन ॥ 139 ॥
अनुवाद-प्रातःकालकी क्रियाओंको समाप्त करके
जब महाप्रभु नाम-सङ्कीर्तन कर रहे थे, उस समय
श्रीचन्द्रशेखर शचीमाताको लेकर श्रीअद्वैत-भवनमें
पहुँचे ॥ 139 ॥
महाप्रभुके दर्शनसे शचीमाताका स्नेहसे क्रन्दन :-
शची-आगे पड़िला प्रभु दण्डवत् हञा।
कान्दिते लागिला शची कोले उठाइञा ॥ 140 ॥
अनुवाद-शचीमाताको देखते ही महाप्रभुने उन्हें
दण्डवत् प्रणाम किया और शचीमाता रोने लगीं और
उन्होंने महाप्रभुको अपनी गोदमें ले लिया ॥ 140 ॥
शचीमाताका महाप्रभुके प्रति वात्सल्य-प्रेमका वर्णन :-
दोँहार दर्शने दुँहे हइला विह्वल।
केश ना देखिया शची हइला विकल ॥ 141 ॥
अङ्ग मुछे, मुख चुम्बे, करे निरीक्षण।
देखिते ना पाय, — अश्रु भरिल नयन ॥ 142 ॥
अनुवाद-एक-दूसरेको देखकर दोनों ही विह्वल हो
उठे। महाप्रभुके केशोंको न देखकर शचीमाता व्याकुल
हो गयीं। पुत्र-स्नेहके कारण वे महाप्रभुके अङ्गोंको
सहलाने लगीं। महाप्रभुका मुख चुम्बन करके वे उनके
निरीक्षणका प्रयास करने लगीं, परन्तु आँखोंमें अश्रु भर
जानेके कारण उन्हें देख न सकीं ॥ 141-142 ॥
शचीमाताका पुत्रके निकट विलाप और प्रार्थना :-
कान्दिया कहेन शची,-"बाछारे निमाञि।
विश्वरूपसम ना करिह निठुराइ ॥ 143 ॥
संन्यासी हइया पुनः ना दिल दरशन।
तुमि तैछे कैले मोर हइबे मरण॥" 144 ॥
अनुवाद-रोते-रोते शचीमाता कहने लगीं, - 'हे पुत्र
निमाइ ! तुम भी विश्वरूपकी भाँति निष्ठुर मत बनना।
उसने संन्यासी होकर मुझे पुनः दर्शन नहीं दिया। यदि
तुम भी वैसा ही करोगे, तो मैं अवश्य ही मर
जाऊँगी ॥ "143-144 ॥
अनुभाष्य—'निठुराइ'–निष्ठुरता ॥ 143 ॥
शचीमाताको मातृभक्त-शिरोमणि
महाप्रभुके द्वारा सान्त्वना प्रदान :-
कान्दिया बलेन प्रभु,-"शुन, मोर आइ।
तोमार शरीर एइ, मोर किछु नाइ ॥ 145 ॥
तोमार पालित देह, जन्म तोमा हैते।
कोटि जन्मे तोमार ऋण ना पारि शोधिते ॥ 146 ॥
शचीमाताके प्रति महाप्रभुका चिरस्नेह :-
जानि' वा ना जानि' यदि करिलुँ संन्यास।
तथापि तोमारे कभु नहिब उदास ॥ 147 ॥
। 101
[ 3/145-157 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
शचीमाताके कहे स्थानपर महाप्रभुकी रहनेकी प्रतिज्ञा :-
तुमि याँहा कह, आमि ताँहाइ रहिब।
तुमि येइ आज्ञा कर, सेइ से करिब॥”148॥
अनुवाद-महाप्रभु भी रोते हुए कहने लगे,-“मेरी
प्यारी माता! सुनो, यह शरीर तुम्हारा ही है, मेरा कुछ
भी नहीं है। आपसे ही मेरा जन्म हुआ है और आपने
ही मेरे इस शरीरका पालन-पोषण किया है। मैं करोड़ों
जन्मोंमें भी आपके इस ऋणको नहीं चुका सकता।
जानकर अथवा न जानकर यद्यपि मैंने संन्यास ग्रहण
किया है, तथापि मैं कभी भी आपके प्रति उदासीन नहीं
होऊँगा। आप मुझे जहाँ कहेंगी, मैं वहीं रहूँगा। आप
मुझे जो आज्ञा देंगी, मैं वैसा ही करूँगा॥ 145-148॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'आइ'-आर्या, शचीमाता ॥ 145॥
महाप्रभुका प्रणाम और शचीमाताका स्नेह भावसे
महाप्रभुको अपनी गोदमें धारण करना :-
एत बलि' पुनः पुनः करे नमस्कार।
तुष्ट हञा आइ कोले करे बार-बार ॥ 149॥
अनुवाद-यह कहकर महाप्रभु बार-बार माताको
प्रणाम करने लगे और शचीमाता भी सन्तुष्ट होकर
उनको बार-बार गोदमें लेने लगीं॥ 149॥
भक्तोंके साथ महाप्रभुका मिलन और प्रेमालिङ्गन :-
तबे आइ लञा आचार्य गेला अभ्यन्तरे।
भक्तगण मिलिते प्रभु हइला सत्वरे ॥ 150 ॥
एके एके मिलिला प्रभु सब भक्तगणे।
सबार मुख देखि' करे दृढ़ आलिङ्गने ॥ 151 ॥
अनुवाद-तब श्रीअद्वैताचार्य शचीमाताको घरके
भीतर ले गये। महाप्रभु तब सभी भक्तोंसे मिलने लगे।
एक-एक करके महाप्रभु सभी भक्तोंसे मिले और
सभीके मुखको देखकर वे उन्हें गाढ़ आलिङ्गन करने
लगे॥ 150-151॥
महाप्रभुके दर्शनसे भक्तोंका सुख
आत्मइन्द्रिय-प्रीति-वाञ्छा नहीं :-
केश ना देखिया भक्त यद्यपि पाय दुःख।
सौन्दर्य देखिते तबु पाय महासुख ॥ 152 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके केशोंको न देखकर यद्यपि
भक्तोंको दुःख हो रहा था, तथापि महाप्रभुके सौन्दर्यको
देखकर उन्हें अत्यन्त सुख भी हुआ॥ 152 ॥
नवद्वीपवासी भक्तगण :-
श्रीवास, रामाइ, विद्यानिधि, गदाधर।
गङ्गादास, वक्रेश्वर, मुरारि, शुक्लाम्वर ॥ 153 ॥
बुद्धिमन्त खाँन, नन्दन, श्रीधर, विजय।
वासुदेव, दामोदर, मुकुन्द, सञ्जय ॥ 154 ॥
कत नाम लइब यत नवद्वीपवासी।
सबारे मिलिला प्रभु कृपादृष्ट्ये हासि' ॥ 155 ॥
अनुवाद-श्रीवास, श्रीरामाइ, श्रीविद्यानिधि, श्रीगदाधर,
श्रीगङ्गादास, श्रीवक्रेश्वर, श्रीमुरारि, श्रीशुक्लाम्बर, श्रीबुद्धिमन्त
खाँन, श्रीनन्दन, श्रीधर, श्रीविजय, श्रीवासुदेव, श्रीदामोदर,
श्रीमुकुन्द और श्रीसञ्जय आदि जितने नवद्वीपवासी
भक्त वहाँ आये थे, कहाँ तक उन सबके नामोंका
उल्लेख करूँ? महाप्रभु मन्द-मन्द मुसकानके साथ
कृपादृष्टि वर्षण करते हुए सबसे मिले॥ 153-155 ॥
अद्वैतभवन-वैकुण्ठ, सब समय हरिसेवामय :-
आनन्दे नाचये सबे बलि' 'हरि' 'हरि'।
आचार्य-मन्दिर हैल श्रीवैकुण्ठपुरी ॥ 156 ॥
अनुवाद-सभी आनन्दपूर्वक नाचते हुए 'हरि' 'हरि'
बोल रहे थे। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुका घर श्रीवैकुण्ठपुरी
बन गया ॥ 156 ॥
एकत्रित सभी लोगोंको श्रीअद्वैताचार्यके
द्वारा स्थान और भोजन प्रदान :-
यत लोक आइल महाप्रभुके देखिते।
नाना-ग्राम हैते, आर नवद्वीप हैते ॥ 157 ॥
102 ।
तीसरा अध्याय 3/157-166 ]
सबाकारे वासा दिल-भक्ष्य, अन्नपान।
बहुदिन आचार्य-गोसाञि कैल समाधान ॥ 158 ॥
अनुवाद-महाप्रभुको मिलनेके लिये जितने भी
भक्त नवद्वीप और अनेक गाँवोंसे आये थे, बहुत दिनों
तक श्रीअद्वैताचार्यने उन सबके लिये रहनेके स्थान तथा
भोजन आदिकी सारी व्यवस्था की ॥ 157-158 ॥
अच्युत आचार्यका अच्युत भण्डार :-
आचार्य-गोसाञिर भाण्डार-अक्षय, अव्यय।
यत द्रव्य व्यय करे, तत द्रव्य हय ॥ 159 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यका भण्डार अक्षय तथा अव्यय
था। वे जितने द्रव्य व्यय करते, उतने ही द्रव्य फिर
आ जाते ॥ 159 ॥
शचीमाताके द्वारा बनाये अन्नसे महाप्रभुका भोजन :-
सेइ दिन हैते शची करेन रन्धन।
भक्तगण लञा प्रभु करेन भोजन ॥ 160 ॥
अनुवाद-उस दिनसे शचीमाता स्वयं भोजन बनाती
थीं और सभी भक्तोंको साथ लेकर महाप्रभु भोजन
करते थे ॥ 160 ॥
दिनके समय आचार्यका और रातके समय अन्य-अन्य
लोगोंको महाप्रभुका दर्शन :-
दिने आचार्येर प्रीति-प्रभुर दर्शन।
रात्रे लोक देखे प्रभुर नर्त्तन-कीर्त्तन ॥ 161 ॥
अनुवाद-दिनमें जो लोग आते, वे महाप्रभुके
साथ-साथ श्रीअद्वैताचार्यके उनके प्रति प्रीतिपूर्ण व्यवहारके
भी दर्शन करते। रातके समय वे महाप्रभुके नृत्यके
दर्शन करते और उनके कीर्त्तनको सुनते ॥ 161 ॥
कीर्त्तनके समय भावावेशमें महाप्रभुका भूमिपर गिरना :-
कीर्त्तन करिते प्रभुर सर्वभावोदय।
स्तम्भ, कम्प, पुलकाश्रु, गदगद, प्रलय ॥ 162 ॥
अनुवाद-कीर्तन करते समय महाप्रभुमें स्तम्भ,
कम्प, पुलक, अश्रु, गदगद-कण्ठ और प्रलय (मूर्च्छा)
आदि सभी सात्त्विक भाव उदित हो जाते ॥ 162 ॥
अनुभाष्य-‘पुलकाश्रु'-भःरःसिः, दःविः, चतुर्थ लः-
“हर्षरोषविषादाद्यैरश्रुनेत्रे जलोद्गमः।
हर्षजेऽश्रुणि शीतत्वमौष्णयं रोषादिसम्भवे।
सर्वत्रनयनक्षोभ रागसमार्जनादयः ॥ ”
अर्थात् “हर्ष, क्रोध और विषाद आदिसे बिना
किसी प्रयत्नके नेत्रोंसे जो जल गिरता है, वही
‘पुलकाश्रु' है। हर्षसे उत्पन्न अश्रुओंमें शीतलता, क्रोधसे
उत्पन्न अश्रुओंमें उष्णता तथा दोनों प्रकारके पुलकसे
नयनक्षोभ (नेत्रोंमें चञ्चलता) तथा राग समार्जनादि होता
है।”
'प्रलय'-भःरःसिः, दःविः, तृतीय लः-
“प्रलयः सुखदुःखाम्यां चेष्टाज्ञाननिराकृतिः।
अत्रानुभावाः कथिता महीनिपतनादयः ॥ ”
अर्थात् “सुख और दुःख-दोनों प्रकारकी चेष्टासे
ज्ञान दूर हो जाता है। इसी प्रकार प्रलयमें भूमिपर
गिरना आदि सभी अनुभाव दिखायी देते हैं।”
'सर्वभाव' अर्थात् स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वरभेद,
कम्प, वैवर्ण्य, पुलकाश्रु और प्रलय-ये अष्ट-सात्त्विक
विकार ॥ 162 ॥
स्नेह-सिक्त भयसे विह्वल शचीमाताकी
पुत्रके स्वास्थ्यके लिये श्रीविष्णुसे प्रार्थना :-
क्षणे क्षणे पड़े प्रभु आछाड़ खाञा।
देखि' शचीमाता कहे रोदन करिया ॥ 163 ॥
“चूर्ण हैल, हेन वासों निमाञि-कलेवर।”
हाहा करि' विष्णु-पाशे मागे एड वर ॥ 164 ॥
“बाल्यकाल हैते तोमार ये कैलुँ सेवन।
तार प्रतिफल मोरे देह, नारायण ॥ 165 ॥
ये-काले निमाञि पड़े धरणी-उपरे।
व्यथा येन नाहि लागे निमाञि-शरीरे ॥ ”166 ॥
। 103
[ 3/163-176 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
एइमत शचीदेवी वात्सल्ये विह्वल। यावत आचार्य-गृहे निमाञिर अवस्थान।
हर्ष-भय-दैन्यभावे हइल विकल॥167॥ मुञि भिक्षा दिब, सबाकारे मागौँ दान॥"171॥
अनुवाद—महाप्रभु बार-बार पछाड़ खाकर गिर अनुवाद—श्रीवासादिको इच्छाको सुनकर शचीमाताने
जाते, जिसे देखकर शचीमाता रोते हुए कहने लगतीं,—“ऐसे सभीसे प्रार्थना की,—“मुझे और फिर कहाँ निमाइका
गिरनेसे तो लगता है निमाइका शरीर चूर-चूर हो दर्शन प्राप्त होगा? तुम लोगोंके साथ तो निमाइका
जायेगा।” “हाय! हाय!” करती हुई शचीमाता विष्णुसे मिलन कहीं और भी अनेक बार हो जायेगा, परन्तु
यही वर माँगने लगतीं,—“हे नारायण! बाल्यकालसे मैंने मुझ अभागिनीके लिये तो मात्र यहीं दर्शन है (मैं तो
जो आपकी सेवा की है, उसका फल मुझे यही दो घरमें ही रहूँगी और संन्यासी घर लौटकर कभी नहीं
कि जिस समय निमाइ पृथ्वीपर गिरे, उसके शरीरमें आता)। इसलिये मैं आप सबसे यही भिक्षा माँगती हूँ
किसी प्रकारका कष्ट न हो।” इस प्रकार शचीमाता कि जब तक निमाइ अद्वैताचार्यके घरमें रहे, तब तक
वात्सल्य रसमें विह्वल हो जातीं। (निमाइके दर्शनसे) मैं ही इसे भोजन कराऊँ॥”169-171॥
हर्ष, (निमाइको गिरनेसे कष्टसे) भय और (नारायणसे
प्रार्थना करते हुए) दैन्य आदि भावोंसे व्याकुल हो अनुभाष्य—‘कति’—कहाँ॥169॥
जातीं॥163-167॥
भक्तोंकी सम्मति :—
अनुभाष्य—‘बाल्यकाल हैते’—बालिका अवस्थासे ही, शुनि' सब भक्तगण कहे करि' नमस्कार।
शैशवकालसे ही। नित्यसिद्धा मूर्तिमती-वात्सल्यकी विग्रहा “मातार ये इच्छा, सेइ सम्मत सबार॥”172॥
यशोदास्वरूपिणी शचीमाता जन्मसे ही श्रीकृष्णसेवा-
परायणा हैं,—वे कभी भी प्राकृत (साधारण) जीव नहीं अनुवाद—यह सुनकर सभी भक्तोंने शचीमाताको
हैं, यह इस स्थानपर उनके अपने ही मुखसे कहा गया प्रणाम करके कहा,—“माता! आपकी जो इच्छा है, हम
है॥165॥ सब उससे सहमत हैं॥”172॥
भक्तोंकी महाप्रभुको निमन्त्रण करनेकी इच्छा :— माताकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये
श्रीवासादि यत प्रभुर विप्र-भक्तगण। मातृभक्तशिरोमणि महाप्रभुका भक्तोंसे अनुरोध :—
प्रभुके भिक्षा दिते हैल सबाकार मन॥168॥ मातार व्यग्रता देखि' प्रभुर व्यग्र मन।
भक्तगण एकत्र करि' बलिला वचन॥173॥
अनुवाद—महाप्रभुके श्रीवासादि जितने ब्राह्मण भक्त
आये थे, उन सबकी महाप्रभुको भोजन करानेकी इच्छा महाप्रभुकी भक्तवश्यता :—
हुई॥168॥ “तोमा-सबार आज्ञा बिना चलिलाम वृन्दावन।
याइते नारिल, विघ्न कैल निवर्त्तन॥174॥
शचीमाताके द्वारा भक्तोंका निवारण और
स्वयं महाप्रभुको भिक्षा देनेका प्रस्ताव :— महाप्रभुका भक्तों और माताके प्रति वात्सल्य :—
शुनि' शची सबाकारे करिल मिनति। यद्यपि सहसा आमि कर्याछोँ संन्यास।
“निमाञिर दरशन आर मुञि पाब कति॥169॥ तथापि तोमा-सबा हैते नहिब उदास॥175॥
तोमा-सबा-सने हबे अन्यत्र मिलन। तोमा-सब ना छाड़िब, यावत आमि जीव'।
मुञि अभागिनीर मात्र एइ दरशन॥170॥ मातारे तावत् आमि छाड़िते नारिब॥176॥
104 ।
तीसरा अध्याय 3/173-183 ]
वान्ताशी होना संन्यासीका कर्तव्य नहीं :-
संन्यासीर धर्म नहे—संन्यास करिञा।
निज जन्मस्थाने रहे कुटुम्ब लञा ॥ 177 ॥
फल्गु वैराग्यके कारण उनकी निन्दा न हो, इसलिये
भक्तोंके निकट महाप्रभुकी युक्तिकी प्रार्थना :-
केह येन एइ बलि' ना करे निन्दन।
सेइ युक्ति कह, याते रहे दुइ धर्म॥"178 ॥
अनुवाद—शचीमाताकी व्याकुलताको देखकर महाप्रभुका
मन भी विह्वल हो गया। तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको
एकत्रित करके कहा,—“मैं आप सबसे आज्ञा लिये
बिना ही वृन्दावन जा रहा था। परन्तु कुछ विघ्न
आनेसे मैं जा नहीं सका और वापिस लौट आया।
यद्यपि मैंने अचानक संन्यास ग्रहण किया है, तथापि मैं
आप सबके प्रति उदासीन नहीं हो सकता। जब तक
मेरा जीवन है, तब तक मैं आप सबको नहीं छोड़ूँगा
और न ही अपनी माताको छोड़ पाऊँगा। किन्तु
संन्यास ग्रहण करनेके बाद संन्यासीका यह धर्म नहीं
है कि वह अपने कुटुम्बके साथ अपने जन्मस्थानपर
वास करे। कोई ऐसा कहकर मेरी निन्दा न करे,
इसलिये कोई ऐसी युक्ति करो जिससे मेरे दोनों धर्मोंकी
(संन्यासके कारण जन्मस्थानपर नहीं रहनेके धर्मकी,
और आप सभीको न छोड़नेके भक्त-वात्सल्यरूपी
धर्मकी) रक्षा हो जाय॥ 173-178 ॥
अनुभाष्य—'जीव'- बचूँगा, प्रकट रहूँगा ॥ 176 ॥
शचीमातासे श्रीअद्वैतादिकी प्रार्थना :-
शुनिया प्रभुर एइ मधुर वचन।
शचीपाश आचार्यादि करिल गमन ॥ 179 ॥
प्रभुर निवेदन ताँरे सकल कहिल।
शुनि' शची जगन्माता कहिते लागिल ॥ 180 ॥
महाप्रभुके सुखमें ही शचीमाताका सुख :-
“तेंहो यदि इँहा रहे, तबे मोर सुख।
ताँर निन्दा हय यदि, तबे मोर दुःख ॥ 181 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके ऐसे मधुर वचनोंको सुनकर
श्रीअद्वैताचार्य आदि सब भक्त शचीमाताके पास गये
और उन्हें महाप्रभुके इस निवेदनके बारेमें बतलाया।
यह सुनकर जगत्-जननी श्रीशचीदेवी कहने लगीं,– “यदि
निमाइ यहाँ रहे, तो मुझे बहुत सुख होगा। परन्तु यदि
उसकी [यहाँ रहनेसे] निन्दा होगी, तो मुझे बहुत दुःख
होगा ॥ 179-181 ॥
अनुभाष्य—मातृकुलकी आदर्श जगन्माता शचीठाकुराणी
ऐसी बात कहकर समस्त मातृकुलको शिक्षा दे रही
हैं—'पुत्रके द्वारा श्रीकृष्णको ढूँढ़नेकी चेष्टाका परित्याग
करके घरमें ही रहनेपर, माताको इन्द्रियतृप्तिरूपी
(पुत्र-दर्शनरूपी) सुख तो होगा, परन्तु साथ ही
श्रीकृष्णसेवाको त्यागनेके कारण पुत्र निन्दाका पात्र होगा,
ऐसा सोचकर वास्तविक स्नेहशीला माताको दुःख ही
होगा। इसलिये पुत्र दर्शनरूपी अपने सुख या भोगकी
अपेक्षा पुत्रकी श्रीकृष्ण-सेवामें ही उसके नित्य मङ्गलरूपी
सुखकी आकाङ्क्षा रखनेवाली वास्तविक माताको वास्तवमें
सुख होता है। नहीं तो, मा-'माया' शब्द वाच्या, (अर्थात्
'मा'-का अर्थ माया हो जायेगा)। इस प्रसङ्गमें यह
श्लोक विचारणीय है, (भा: 5/5/18)—
“गुरुर्न स स्यात् स्वजनो न स स्यात्
पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्।
दैवं न तत् स्यान्न पतिश्च स स्या-
न्न मोचयेद्यः समुपेतमृत्युम्॥"
अर्थात् “जो अपने प्रिय सम्बन्धीको भगवद्भक्तिका
उपदेश देकर जन्म-मृत्युके चक्रसे नहीं छुड़ाता, वह
गुरु गुरु नहीं है, स्वजन स्वजन नहीं है, पिता पिता
नहीं है, माता माता नहीं है, इष्टदेव इष्टदेव नहीं है
और पति पति नहीं है॥”181 ॥
शचीमाताका पुत्र-सुखके लिये पुरीवासका अनुमोदन :-
ताते एइ युक्ति भाल, मोर मने लय।
नीलाचले रहे यदि, दुइ कार्य हय ॥ 182 ॥
नीलाचले-नवद्वीपे येन दुइ घर।
लोक-गतागति-वार्त्ता पाब निरन्तर ॥ 183 ॥
। 105
[ 3/182-193 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
तुमि सब करिते पार गमनागमन।
गङ्गास्नाने कभु ताँर हबे आगमन ॥ १८४ ॥
शचीमाताका शुद्ध वात्सल्य-प्रेम :-
आपनार दुःख-सुख ताँहा नाहि गणि।
ताँर येइ सुख, ताहा निज सुख मानि ॥” १८५ ॥
अनुवाद—इसलिये मेरे मनको तो यह युक्ति अच्छी
लगती है कि यदि निमाइ नीलाचलमें रहे, तो दोनों
कार्य हो जायेंगे। नीलाचल और नवद्वीप दोनों ही एक
घरके दो कमरोंके समान हैं। दोनों स्थानोंसे लोगोंका
आना-जाना लगा रहता है और उनसे मुझे निमाइका
समाचार भी प्राप्त होता रहेगा। तुम सब भी नीलाचल
आना-जाना कर सकते हो और कभी निमाइ भी गङ्गा
स्नानके लिये यहाँ आयेगा। मुझे अपने दुःख-सुखकी
चिन्ता नहीं है। निमाइके सुखमें ही मैं अपना सुख
मानती हूँ॥” १८२-१८५ ॥
अनुभाष्य—इस पयारमें श्रीकृष्ण-सेवकोंकी श्रीकृष्णको
सब प्रकारसे सुखी करनेवाली सेवाकी सुन्दर अभिव्यक्ति
है। इस सन्दर्भमें आदिलीला 4/174-175, 201, 204
संख्या; मध्यलीला 4/186 संख्या तथा ठाकुर श्रीभक्तिविनोद
रचित ‘शरणागति’में “सेवा-सुख-दुःख—परम सम्पद”
देखें ॥ १८५ ॥
भक्तोंके द्वारा शचीमाताकी स्तुति :-
शुनि’ भक्तगण ताँरे करिल स्तवन।
“वेद-आज्ञा यैछे, माता, तोमार वचन ॥” १८६ ॥
अनुवाद—शचीमाताकी इस बातको सुनकर उनकी
स्तुति करते हुए भक्तोंंने कहा,—“हे माता! आपके
वचन वेद-आज्ञाके समान मान्य हैं॥” १८६ ॥
शचीमाताके अभिप्रायको जानकर महाप्रभुको आनन्द :-
प्रभु-आगे भक्तगण कहिते लागिल।
शुनिया प्रभुर मने आनन्द हइल ॥ १८७ ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुके पास आकर सभी भक्तोंंने
शचीमाताके विचारको सुनाया, जिसे सुनकर महाप्रभु
बहुत आनन्दित हुए ॥ १८७ ॥
भक्तोंके निकट महाप्रभुकी प्रार्थना :-
नवद्वीप-वासी आदि यत भक्तगण।
सबारे सम्मान करि’ बलिला वचन ॥ १८८ ॥
“तुमि-सब लोक-मोर परम बान्धव।
एइ भिक्षा मागों,—मोरे देह तुमि-सब ॥ १८९ ॥
सभीको श्रीकृष्ण-कीर्तन करनेका आदेश :-
घरे याञा कर सदा कृष्णसङ्कीर्त्तन।
कृष्णनाम, कृष्णकथा, कृष्ण-आराधन ॥ १९० ॥
पुरी जाते हुए महाप्रभुकी आज्ञा-प्रार्थना :-
आज्ञा देह नीलाचले करिये गमन।
मध्ये मध्ये आसिं’ तोमाय दिब दरशन ॥” १९१ ॥
अनुवाद—नवद्वीपवासी आदि समस्त भक्तोंको सम्मान
देते हुए महाप्रभु कहने लगे,—“आप सब लोग मेरे परम
बान्धव हो। मैं आप सबसे एक भिक्षा माँगता हूँ, कृपा
करके मुझे वह प्रदान कीजिये। आप सब घर जाकर
सदैव श्रीकृष्णसङ्कीर्तन करना। और साथमें श्रीकृष्णकी
आराधना, श्रीकृष्णनाम तथा श्रीकृष्णकथा करना। अब
आप मुझे नीलाचल जानेकी आज्ञा प्रदान करें। मैं
आश्वासन देता हूँ कि मैं बीच-बीचमें आकर आपसे
मिलता रहूँगा॥” १८८-१९१ ॥
यथायोग्य सम्मान देकर सभीको विदायी देना :-
एत बलि’ सबाकारे ईषत् हासिञा।
विदाय करिल प्रभु सम्मान करिञा ॥ १९२ ॥
अनुवाद—इस प्रकार सभी भक्तोंका सम्मान करके
महाप्रभुने मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए सभीको विदा
किया॥ १९२ ॥
हरिदासकी दीनता और अकिञ्चन भाव :-
सबा विदाय दिया चलिते हैल मन।
हरिदास कान्दि’ कहे करुण-वचन ॥ १९३ ॥
106 ।
तीसरा अध्याय 3/193-202 ]
“नीलाचले याबे तुमि, मोर कोन् गति।
नीलाचले याइते मोर नाहिक शक्ति ॥194॥
मुञि अधम ना पाइनु तोमार दरशन।
केमते धरिब एइ पापिष्ठ जीवन ॥”195॥
अनुवाद—सबको विदा करके महाप्रभुने नीलाचल
जानेका निर्णय किया। तब श्रीहरिदास ठाकुर रोते हुए
करुण वचन कहने लगे,—“आप तो नीलाचल चले
जायेंगे, किन्तु मेरी क्या गति होगी? मुझमें तो नीलाचल
जानेकी शक्ति नहीं है। मुझ अधमको यदि आपके
दर्शन नहीं होंगे, तो मैं यह पापमय जीवन कैसे धारण
करूँगा?॥”193-195॥
अनुभाष्य—यद्यपि श्रीहरिदास ठाकुरका जन्म यवन-
कुलमें हुआ था, तथापि अपने भजनके द्वारा उन्होंने
ब्राह्मणताको प्राप्त किया था। परन्तु श्रीहरिदास ठाकुरने
स्वाभाविक दैन्यके कारण अपनेको अत्यन्त हीन
समझकर महाप्रभुसे आर्त्त-स्वरसे कहा कि यवनकुलमें
जन्मके कारण उनका नीलाचलमें प्रवेशका अधिकार
नहीं है। विशेषतः नीलाद्रिमें चारों वर्णोंके अतिरिक्त
श्रीजगन्नाथ मन्दिरकी चार दीवारीमें किसी औरको प्रवेश
करनेका अधिकार नहीं है। इसलिये महाप्रभु यदि
नीलाचलके श्रीमन्दिरके अन्दर वास करेंगे, तो फिर
श्रीहरिदास ठाकुरका वहाँ जानेका अधिकार नहीं होगा।
बादमें ऐसा जानकर कि नीलाद्रि (नील समुद्र)के निकट
बालूवाले स्थानपर रहनेमें उनके लिये कोई भी बाधा
नहीं है, ठाकुर हरिदास वहाँ रहे। आजकल वह स्थान
‘सिद्धबकुल मठ’के नामसे प्रसिद्ध है॥194॥
प्रभु कहे,—“कर तुमि दैन्य-सम्वरण।
तोमार दैन्येते मोर व्याकुल हय मन ॥196॥
हरिविमुख स्मार्त्त समाजको धिक्कार देकर ब्राह्मणगुरु
वैष्णवाचार्य हरिदास ठाकुरको पुरी ले जानेकी प्रतिज्ञा :—
तोमार लागि’ जगन्नाथे करिब निवेदन।
तोमा-लञा याब आमि श्रीपुरुषोत्तम ॥”197॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“अपनी दीनताका सम्वरण
करो। तुम्हारी दीनताको देखकर मेरा मन व्याकुल हो
रहा है। मैं तुम्हारे लिये श्रीजगन्नाथदेवसे निवेदन करूँगा
और तुम्हें अपने साथ नीलाचल ले जाऊँगा॥”196-197॥
महाप्रभुसे और कुछ दिन रहनेकी श्रीअद्वैतकी प्रार्थना :—
तबे त’ आचार्य कहे विनय करिञा।
“दिन दुइ-चारि रह कृपा त’ करिञा॥”198॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीअद्वैतकी इच्छा पूर्ति
और सभीको आनन्द :—
आचार्येर वाक्य प्रभु ना करे लङ्घन।
रहिला अद्वैत-गृहे, ना कैल गमन॥199॥
आनन्दित हैल आचार्य, शची, भक्त-सब।
प्रतिदिन करे आचार्य महामहोत्सव॥200॥
अनुवाद—तब श्रीअद्वैताचार्यने विनती करते हुए
महाप्रभुसे कहा,—“कृपा करके दो-चार दिन और यहाँ
रुक जाइये।” श्रीअद्वैताचार्यके वचनोंका महाप्रभु कभी
उल्लङ्घन नहीं करते, इसलिये वे गमन न करके
श्रीअद्वैताचार्यके घरमें रुक गये। इससे श्रीअद्वैताचार्य,
शचीमाता और सब भक्तोंको बहुत आनन्द हुआ।
श्रीअद्वैताचार्यने प्रतिदिन महा-महोत्सव किया॥198-200॥
दिनमें इष्ट-गोष्ठी और रातमें सङ्कीर्तन :—
दिने कृष्णरस-कथा भक्तगण-सङ्गे।
रात्रे महा-महोत्सव सङ्कीर्त्तन-रङ्गे॥201॥
अनुवाद—महाप्रभु भक्तोंके साथ दिनमें श्रीकृष्णरस-
कथाका आस्वादन करते और रातमें सङ्कीर्तन करके
महा-महोत्सव मनाते॥201॥
भक्तोंके साथ महाप्रभुको अपने द्वारा बनाया गया भोजन
करते देख माताको आनन्द :—
आनन्दित हञा शची करेन रन्धन।
सुखे भोजन करे प्रभु लञा भक्तगण॥202॥
अनुवाद—शचीमाता बड़े आनन्दसे रसोई बनातीं
। 107
[ 3/202-212 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
और महाप्रभु सभी भक्तोंके साथ सुखपूर्वक भोजन
करते॥202॥
महाप्रभुकी सेवासे श्रीअद्वैतका सबकुछ धन्य :-
आचार्येर श्रद्धा-भक्ति, गृह-सम्पद्-धने।
सकल सफल हैल प्रभुर आगमने॥203॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यकी श्रद्धा-भक्ति, उनका घर,
सम्पत्ति, धनादि सब कुछ महाप्रभुकी सेवामें प्रयोग
होनेसे सार्थक हो गये॥203॥
शचीमाताका सुख :-
शचीर आनन्द बाड़े देखि' पुत्रमुख।
भोजन कराञा पूर्ण कैल निजसुख॥204॥
अनुवाद-अपने पुत्र निमाइका मुख देखकर
शचीमाताका आनन्द बढ़ता जाता और उसे भोजन
कराके उन्होंने अपने अभिलाषित परम सुखको प्राप्त
किया॥204॥
श्रीअद्वैतके घरमें कुछ दिन तक अप्राकृत आनन्द :-
एइमत अद्वैत-गृहे भक्तगण मिले।
वञ्चिला कतकदिन महा-कुतूहले॥205॥
अनुवाद-इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यके घरमें महाप्रभुने
भक्तोंके साथ कुछेक दिन आनन्दपूर्वक बिताये॥205॥
महाप्रभुके द्वारा भक्तोंको विदायी देना :-
आर दिन प्रभु कहे सब भक्तगणे।
"निज-निज-गृहे सबे करह गमने॥206॥
महाप्रभु और भक्त-दोनोंका परस्पर
भविष्यमें मिलनके सुयोगका निर्देश :-
घरे गिया कर सबे कृष्णसङ्कीर्त्तन।
पुनरपि आमा-सङ्गे हइबे मिलन॥207॥
भक्तोंके द्वारा नीलाचल जाने और महाप्रभुके द्वारा
नवद्वीपमें आने पर मिलनकी सम्भावना :-
कभु वा तोमरा करिबे नीलाद्रि-गमन।
कभु वा आसिब आमि करिते गङ्गास्नान॥"208॥
अनुवाद-अगले दिन महाप्रभुने सभी भक्तोंसे
कहा,-"अब आप सब अपने-अपने घर जाइये। घर
जाकर आप सब श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन करते रहना। मेरे
साथ आपका पुनः मिलन होगा। कभी आप लोग
नीलाचलमें आयेंगे और कभी मैं गङ्गास्नान करने यहाँ
आऊँगा॥"206-208॥
पुरीके मार्गमें महाप्रभुके साथ श्रीनिताइ आदि चार भक्त;
महाप्रभुके द्वारा शचीमाताको सान्त्वना तथा उनकी
वन्दनाके बाद यात्रा :-
नित्यानन्द-गोसाञि, पण्डित जगदानन्द।
दामोदर पण्डित, आर दत्त मुकुन्द॥209॥
एइ चारिजन, आचार्य दिल प्रभु-सने।
जननी प्रबोध करि' वन्दिल चरणे॥210॥
ताँरे प्रदक्षिण करि' करिल गमन।
एथा आचार्येर घरे उठिल क्रन्दन॥211॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने श्रीनित्यानन्द प्रभु,
श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित और श्रीमुकुन्द
दत्त-इन चार भक्तोंको महाप्रभुके साथ भेजा। महाप्रभुने
शचीमाताको सान्त्वना देकर उनके श्रीचरणकमलोंकी
वन्दना की और उनकी परिक्रमा करके महाप्रभु
नीलाचलकी ओर चल दिये। उस समय श्रीअद्वैताचार्यके
घरमें सभी महाप्रभुके वियोगमें ज़ोर-ज़ोरसे रोने
लगे॥209-211॥
निरपेक्ष हञा प्रभु शीघ्र चलिला।
कान्दिते कान्दिते आचार्य पश्चात् चलिला॥212॥
अनुवाद-परन्तु महाप्रभु निरपेक्ष होकर अर्थात्
बिना विचलित हुए शीघ्रतासे वहाँसे चल दिये और
श्रीअद्वैताचार्य भी रोते-रोते उनके पीछे चलने लगे॥212॥
अनुभाष्य-'निरपेक्ष'-जड़ीय वस्तुकी अपेक्षा या
प्रभावसे मुक्त अपने स्वरूप भगवद्-दास्यमें स्थित रहना
निरपेक्ष होना है। बादमें श्रीकृष्णके अन्वेषण कार्यमें
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तीसरा अध्याय 3/212-218 ]
बाधा होगी, इस भयसे स्वजनोंके रोने आदिको सुनकर
भी महाप्रभु निष्ठुरकी भाँति नीलाचलकी ओर चल
दिये। यद्यपि उनके इस कार्यसे नास्तिक नीतिवादी लोग
उन्हें 'अत्यन्त निष्ठुर' कहेंगे, तथापि जगद्गुरुके रूपमें
उन्होंने जीवोंके लिये यह शिक्षा दी कि उनका जो
सर्वोत्तम परमधर्म श्रीकृष्णसेवा-चेष्टा है, वही एकमात्र
प्रयोजनीय कार्य है। असार नाशवान् भोगोंके फलस्वरूप
संसारमें ही आसक्ति और बन्धन होनेसे श्रीकृष्णसेवा
नहीं हो सकती। इसलिये जगत्की दृष्टिमें अत्यधिक
प्रशंसित सुनीति भी यदि श्रीकृष्णसेवाकी विरोधी हो, तो
यह पथ महाप्रभुके विचारोंके विरुद्ध है। “निरपेक्ष ना
हइले धर्म रक्षणे ना याय” (अर्थात् निरपेक्ष नहीं होनेसे
धर्मकी रक्षा नहीं हो सकती) - महाप्रभुके श्रीमुखसे
निकली यह वाणी विचारणीय है ॥ 212 ॥
श्रीअद्वैताचार्यको सान्त्वना देकर उनकी विदायी :-
कत दूर गिया प्रभु करि' जोड़-हात।
आचार्ये प्रबोधि' किछु कहे मिष्ट बात ॥ 213 ॥
“जननी प्रबोध, कर भक्त-समाधान।
तुमि व्यग्र हैले कारो ना रहिबे प्राण ॥” 214 ॥
एत बलि' प्रभु ताँरे करि' आलिङ्गन।
निवृत्त करिया कैल स्वच्छन्द गमन ॥ 215 ॥
अनुवाद - कुछ दूर जानेपर महाप्रभुने हाथ जोड़कर
श्रीअद्वैताचार्य प्रभुको सान्त्वना देते हुए कुछ मधुर
वचन कहे, - “आप घर लौटकर शचीमाता तथा भक्तोंको
सान्त्वना प्रदान करो। यदि आप ही इस प्रकार व्याकुल
हो जायेंगे, तो कोई भी प्राण धारण नहीं कर सकेगा।”
यह कहकर महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यका आलिङ्गनकर
उन्हें अपने पीछे आनेसे रोककर स्वच्छन्द रूपसे
नीलाचलके लिये गमन किया ॥ 213-215 ॥
छत्रभोगके मार्गसे महाप्रभुका पुरीगमन :-
गङ्गातीरे-तीरे प्रभु चारिजन-साथे।
नीलाद्रि चलिला प्रभु छत्रभोग-पथे ॥ 216 ॥
अनुवाद - महाप्रभु चारों भक्तोंके साथ गङ्गाके
किनारे-किनारे छत्रभोगके रास्तेसे होते हुए नीलाचलकी
ओर चले ॥ 216 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'छत्रभोग-पथे' - महाप्रभु छत्रभोगके
रास्ते गङ्गाके साथ-साथ आटिसार, पाणिहाटी, वराहनगरसे
होते हुए चलने लगे। उस समय गङ्गा कलिकाताके
दक्षिणसे कालीघाट होकर वारुइपुर आदि स्थानोंसे
होकर डायमण्ड-हारबार-सबडिवीजनसे 'मथुरापुर' नामक
थानेसे होकर सैकड़ों धाराओंके रूपमें समुद्रमें मिलती
थी। महाप्रभु उसी रास्तेसे ही मथुरापुर थानेके अन्तर्गत
'अम्बुलिङ्ग' स्थानसे छत्रभोगके रास्तेसे नीलाचल गये
थे॥ 216 ॥
तृतीय अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य - 'छत्रभोग' - चौबीस परगना जिलेमें
मगराहाट-स्टेशनसे पूर्व-दक्षिणकी ओर छह-सात कोस
दूर जयनगरके दो-तीन कोस दक्षिणमें यह गाँव
अवस्थित है। इस गाँवको कोई-कोई 'खाड़ि' कहते हैं।
यहाँपर 'बैजुर्कानाथ' नामक शिवलिङ्ग हैं। वहाँ चैत्रमासमें
शुक्ला प्रतिपदाके दिन 'नन्दा'- मेला होता है। अब
यहाँपर गङ्गा नहीं है। 'आटिसारा' - यह वारुइपुर स्टेशनके
निकट है, ऐसा सुना जाता है ॥ 216 ॥
चैतन्यभागवतमें विस्तृत रूपसे वर्णन :-
'चैतन्यमङ्गले' प्रभुर नीलाद्रि गमन ।
विस्तारि' वर्णियाछेन दास-वृन्दावन ॥ 217 ॥
अद्वैत-गृहे प्रभुर विलास शुने येइ जन ।
अचिरे मिलये ताँरे कृष्णप्रेम-धन ॥ 218 ॥
अनुवाद - श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने श्रीचैतन्य-
मङ्गल (श्रीचैतन्यभागवत) नामक ग्रन्थमें महाप्रभुके
श्रीजगन्नाथपुरी गमनकी लीलाका विस्तारपूर्वक वर्णन
किया है। श्रीअद्वैताचार्यके घरमें किये गये महाप्रभुके
लीला-विलासका यदि कोई श्रवण करता है, तो उसे
शीघ्र ही श्रीकृष्णप्रेम-धनकी प्राप्ति होती है। 217-218॥
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