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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 48 ।

सोलहवाँ अध्याय कथासार—महाप्रभुके द्वारा वृन्दावन जानेकी इच्छा करनेपर श्रीरामानन्द और श्रीसार्वभौम अनेक प्रकारकी बाधाएँ उत्पन्न करने लगे। क्रमशः गौड़ीय-भक्त तीसरे वर्ष नीलाचल आये। इस बार वैष्णवोंकी पत्नियाँ श्रीमन्महाप्रभुको अपने वासस्थानपर निमन्त्रण करनेके लिये उनकी प्रिय बहुत सी खाद्य-वस्तुओंको बङ्गालसे लायी थीं। उन सबके श्रीक्षेत्रमें पहुँचनेपर महाप्रभुने मालायें भेजकर उनका सम्मान किया। उस वर्ष भी गुण्डिचा मन्दिरमें सफाईका कार्य पहलेकी भाँति हुआ। चातुर्मास्यके सम्पूर्ण होनेपर भक्तगण बङ्गाल जाने लगे। महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको प्रत्येक वर्ष नीलाचलमें आनेसे मना किया। कुलीनग्रामवासियोंके प्रश्नानुसार उन्होंने पुनः वैष्णवके लक्षणके विषयमें बतलाया। इस वर्ष श्रीविद्यानिधिने नीलाचलमें रहकर 'ओड़नषष्ठी'का दर्शन किया। भक्तोंके विदा होनेपर महाप्रभुने वृन्दावन जानेकी दृढ़ता प्रकाशित की और विजया-दशमीके दिन प्रस्थान किया। राजा प्रतापरुद्रने महाप्रभुके जानेवाले मार्गमें अनेक प्रकारकी व्यवस्था की थी। चित्रोत्पला नदी पार होनेपर श्रीरामानन्द, मङ्गराज (मरदराज ?) और हरिचन्दन महाप्रभुको साथ लेकर चले। महाप्रभुने श्रीगदाधर पण्डितको नीलाचल लौट जानेका अनुरोध किया, परन्तु उन्होंने वह सुना नहीं। कटकसे महाप्रभुने श्रीपण्डित गोस्वामीको शपथ देकर श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें भेजा और भद्रकसे श्रीरामानन्दको विदायी दी। (उसके बाद) उड़ीसाकी सीमापर पहुँचकर महाप्रभु नौकाके द्वारा यवन अधिकारीकी सहायतासे पाणिहाटि तक गये। उसके बाद महाप्रभु श्रीराघव पण्डितके घरसे कुमारहट्ट होकर कुलिया-ग्राममें आये। महाप्रभुने वहाँ अनेक लोगोंके अपराधोंको दूर किया। वहाँसे रामकेलिमें जाकर श्रीरूप और श्रीसनातनको अङ्गीकार किया। रामकेलिसे लौटकर श्रीरघुनाथदासको शिक्षा देकर वापिस घरमें भेजा। पुनः नीलाचलमें आकर महाप्रभु अकेले वृन्दावन जानेका परामर्श करने लगे। —(अमृतप्रवाह भाष्य) गौड़देशमें जाकर लोगोंके उद्धारमें रत श्रीगौरसुन्दर :- गौड़ोद्यानं गौरमेघः सिञ्चन् स्वालोकनामृतैः। भवाग्निदग्धजनता-वीरुधः समजीवयत्॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गौड़देशरूपी उद्यानमें गौररूप मेघने अपनी दर्शनामृतरूपी वर्षाके द्वारा भवाग्निमें दग्ध जनतारूपी लताको जीवित किया था॥1॥ अनुभाष्य— गौरमेघः (श्रीगौरजलधरः) स्वालोकनामृतैः (निजदर्शनसुधाभिः) गौड़ोद्यानं (गौड़देशरूपम् उद्यानं) सिञ्चन् (वर्षन्) भवाग्निदग्धजनता- वीरुधः (संसारदाव-वह्निना दग्धाः याः जनताः लोकपुञ्जाः ता एव वीरुधः लताः ताः) समजीवयत् (जीवयामास)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥2॥ महाप्रभुकी वृन्दावन जानेकी इच्छा; राजाका विषाद :- प्रभुर हइल इच्छा याइते वृन्दावन। शुनिया प्रतापरुद्र हइला विमन॥3॥ अनुवाद—महाप्रभुकी वृन्दावन जानेकी इच्छा हुई है, इसे सुनकर राजा प्रतापरुद्रका मन उदास हो गया॥3॥ । 49

[ 16/4-14 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीभट्टाचार्य और श्रीरायको बुलाकर महाप्रभुको नहीं जाने देनेके लिये प्रार्थना :- सार्वभौम, रामानन्द, आनि' दुइ जन। दुँहाके कहेन राजा विनय-वचन ॥ 4 ॥ “नीलाद्रि छाड़ि' प्रभुर मन अन्यत्र याइते। तोमरा करह यत्न ताँहारे राखिते ॥ 5 ॥ ताँहा बिना एइ राज्य मोर नाहि भाय। गोसाञि राखिते करह नाना उपाय॥” 6 ॥ अनुवाद-राजाने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीरामानन्द राय, इन दोनोंको अपने पास बुलवाकर दीनतापूर्वक कहा,-“महाप्रभुका मन नीलाचलको छोड़कर कहीं और जानेका है। आप दोनों कृपया उन्हें यहींपर ही रखनेका प्रयास कीजिये। महाप्रभुके बिना यह राज्य मुझे नहीं सुहाता, इसलिये श्रीचैतन्य गोसाईंको यहींपर रखनेका सब प्रकारके उपाय कीजिये॥” 4-6 ॥ महाप्रभुका वृन्दावन जानेके लिये श्रीराय और श्रीभट्टाचार्यके साथ परामर्श :- रामानन्द, सार्वभौम, दुइजना-स्थाने। तबे युक्ति करे प्रभु, -'याब वृन्दावने' ॥ 7 ॥ अनुवाद-इसके बाद स्वयं महाप्रभुने श्रीरामानन्द और श्रीसार्वभौमके साथ परामर्श करते हुए कहा,-'मैं वृन्दावन जाऊँगा॥' 7 ॥ वियोगके भयसे दोनोंका महाप्रभुको वृन्दावनकी बात भुलाकर वहाँ जानेसे मना करना :- दुँहे कहे,-“रथयात्रा कर दरशन। कार्त्तिक आइले, तबे करिह गमन ॥” 8 ॥ कार्त्तिक आइले कहे, - “एबे महा-शीत। दोलयात्रा देखि' याओ-एइ भाल रीत।” 9 ॥ आजि-कालि करि' उठाय विविध उपाय। याइते सम्मति ना देय विच्छेदेर भय ॥ 10 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीरामानन्द राय, दोनोंने कहा, -“आप अभी यहीं रहकर रथ-यात्राका दर्शन कीजिये। कार्तिक मासके आनेपर ही वृन्दावन जाना।” जब कार्तिक मास आया, तब उन्होंने कहा,- “अभी तो बहुत अधिक सर्दी है, आप दोलयात्राके दर्शन करके जाना। यही अच्छा होगा।” आज-कल करके वे बहुत प्रकारके उपाय निकालते और वियोगके भयसे महाप्रभुको जानेकी सम्मति नहीं देते ॥ 8-10 ॥ भगवान् स्वतन्त्र होनेपर भी भक्तके वशीभूत :- यद्यपि स्वतन्त्र प्रभु, नहे निवारण। भक्त-इच्छा बिना प्रभु ना करे गमन ॥ 11 ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु स्वतन्त्र हैं, उन्हें कोई रोक नहीं सकता, तो भी भक्तकी इच्छाके बिना वे कभी नहीं जाते॥ 11 ॥ तीसरे वर्ष गौड़ीय भक्तोंकी महाप्रभुके दर्शन करनेकी इच्छा :- तृतीय वत्सरे सब गौड़ेर भक्तगण। नीलाचले चलिते सबार हैल मन ॥ 12 ॥ अनुवाद-तीसरे वर्ष भी गौड़देशके सभी भक्तोंका नीलाचल जानेका मन हुआ ॥ 12 ॥ सभीका श्रीअद्वैताचार्यके पास जाना और श्रीअद्वैतकी पुरी-यात्रा :- सबे मेलि' गेला अद्वैत-आचार्येर पाशे। प्रभु देखिते आचार्य चलिला उल्लासे ॥ 13 ॥ अनुवाद-सभी भक्त मिलकर श्रीअद्वैताचार्यके पास गये और श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके दर्शनके लिये उल्लसित होकर चल पड़े॥ 13 ॥ महाप्रभुके मना करनेपर भी महाप्रभु-प्रेमिक श्रीनिताइकी महाप्रभुके दर्शनके लिये पुरी-यात्रा :- यद्यपि प्रभुर आज्ञा गौड़ेते रहिते। नित्यानन्द-प्रभुके प्रेमभक्ति प्रकाशिते ॥ 14 ॥ 50 ।

सोलहवाँ अध्याय 16/14-23 ] तथापि चलिला महाप्रभुरे देखिते। नित्यानन्देर प्रेम-चेष्टा के पारे बुझिते ॥ 15 ॥ अनुवाद- यद्यपि महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको प्रेमभक्तिका प्रचार करनेके लिये बङ्गालमें रहनेकी ही आज्ञा दी थी, तथापि वे महाप्रभुके दर्शनोंके लिये चल पड़े। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी प्रेममयी चेष्टाओंको कौन समझ सकता है? ॥ 14-15 ॥ गौड़ीय-भक्तोंकी यात्रा :- आचार्यरत्न, विद्यानिधि, श्रीवास, रामाइ। वासुदेव, मुरारि, गोविन्दादि तीन भाइ ॥ 16 ॥ पाणिहाटीके श्रीराघव, कुलीनग्रामके श्रीसत्यराजादिका गमन :- राघव-पण्डित निज-झालि साजाञा। कुलीन-ग्रामवासी चले पट्टडोरी लञा ॥ 17 ॥ खण्डसे श्रीनरहरि आदिकी यात्रा :- खण्डवासी नरहरि, श्रीरघुनन्दन। सर्वभक्त चले, तार के करे गणन ॥ 18 ॥ अनुवाद- श्रीआचार्यरत्न, श्रीविद्यानिधि, श्रीवास, श्रीरामार्इ, श्रीवासुदेव, श्रीमुरारि, श्रीगोविन्दादि (श्रीगोविन्द, श्रीमाधव और श्रीवासुदेव) - ये तीनों भाई, श्रीराघव पण्डित महाप्रभुके लिये खानेकी बहुतसी वस्तुओंको झोलियोंमें भरकर और कुलीन-ग्रामवासी रेशमी रस्सियोंको लेकर चल दिये। खण्डवासी श्रीनरहरि और श्रीरघुनन्दन तथा अन्य सभी भक्त महाप्रभुके दर्शनके लिये चलने लगे। कौन उन सबकी गणना कर सकता है? ॥ 16-18 ॥ पथको जाननेवाले श्रीशिवानन्द-सेन सभीके संरक्षक और परिचालकके रूपमें :- शिवानन्द-सेन करे घाटि समाधान। सबारे पालन करि' सुखे लञा यान ॥ 19 ॥ सबार सर्वकार्य करेन, देन वासा-स्थान। शिवानन्द जाने उड़िया-पथेर सन्धान ॥ 20 ॥ अनुवाद- श्रीशिवानन्द सेनने मार्गके और नदी पार करनेके सब शुल्कका भुगतान किया। सभीकी सुख-सुविधाका ध्यान रखते हुए आनन्दसे उनको ले जा रहे थे। वे सभीके समस्त कार्योंको कर देते और उन्हें रहनेका स्थान प्रदान करते। वे उड़ीसाके मार्गके विषयमें सब कुछ जानते थे ॥ 19-20 ॥ अनुभाष्य - 'घाटी-समाधान' - धनकी कमीकी पूर्ति अथवा निर्दिष्ट पथ और नदीघाटको पार करनेके लिये यात्रियोंके द्वारा दिये जानेवाले शुल्कको चुकाना ॥ 19 ॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये वैष्णव-गृहिणियोंका गमन :- (1) श्रीअद्वैतपत्नीकी यात्रा :- से वत्सर प्रभु देखिते सब ठाकुराणी। चलिला आचार्य-सङ्गे अच्युत-जननी ॥ 21 ॥ अनुवाद- उस वर्ष महाप्रभुके दर्शनके लिये सभी भक्तोंकी पत्नियाँ भी उनके साथ आयीं। श्रीअद्वैताचार्यके साथ उनकी पत्नी सीतादेवी, अच्युतकी माता, भी चल पड़ीं ॥ 21 ॥ (2) श्रीवासकी पत्नी और (3) श्रीशिवानन्दकी पत्नीकी यात्रा :- श्रीवास-पण्डित-सङ्गे चलिला मालिनी। शिवानन्द-सङ्गे चले ताँहार गृहिणी ॥ 22 ॥ अनुवाद- श्रीवास पण्डितके साथ उनकी पत्नी श्रीमालिनी और श्रीशिवानन्द सेनके साथ उनकी पत्नी भी चलने लगीं ॥ 22 ॥ शिवानन्दके पुत्र श्रीचैतन्यदासकी यात्रा :- शिवानन्देर बालक, नाम-चैतन्यदास। तैँहो चलियाछे प्रभुरे देखिते उल्लास ॥ 23 ॥ अनुवाद- श्रीशिवानन्द सेनके पुत्र, जिनका नाम चैतन्यदास था, वे भी बड़े उल्लाससे महाप्रभुके दर्शनके लिये चल पड़े ॥ 23 ॥ । 51

[ 16/24-34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (4) श्रीचन्द्रशेखरकी पत्नीकी यात्रा :- आचार्यरत्न-सङ्गे चले ताँहार गृहिणी। ताँहार प्रेमेर कथा कहिते ना जानि ॥ 24 ॥ अनुवाद—श्रीआचार्यरत्न (श्रीचन्द्रशेखर)के साथ उनकी पत्नी भी चल रही थीं। महाप्रभुके प्रति श्रीचन्द्रशेखरके प्रेमकी महिमाका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 24 ॥ महाप्रभुकी सेवाके उद्देश्यसे साथमें उनको प्रिय लगनेवाली वस्तुओंको लेना :- सब ठाकुरानी महाप्रभुके भिक्षा दिते। प्रभुर नाना प्रिय द्रव्य निल घर हैते ॥ 25 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंकी पत्नियोंने महाप्रभुको खानेमें प्रिय लगनेवाली बहुतसी वस्तुओंको अपने घरसे ले लिया ॥ 25 ॥ श्रीशिवानन्दके द्वारा सभी कार्योंका सम्पादन :- शिवासेन-सेन करे सब समाधान। घाटियाल प्रबोधि' देन सबारे वासा-स्थान ॥ 26 ॥ भक्ष्य दिया करेन सबार सर्वत्र पालने। परम आनन्दे यान प्रभुर दरशने ॥ 27 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन मार्गका शुल्क लेनेवालोंको मधुर वचन बोलकर प्रसन्न करते और सभी भक्तोंके रहनेके स्थानकी व्यवस्था करते। पूरी यात्रामें सबको भोजन करवाते और उनका ध्यान रखते हुए वे परमानन्दसे महाप्रभुके दर्शनोंके लिये जा रहे थे॥ 26-27 ॥ अनुभाष्य—'घाटियाल'—मार्गदर्शक; ये यात्रियोंसे अन्यायपूर्वक अवैध रूपसे अधिक धन संग्रह करते थे; शिवानन्द उनसे वैध शुल्कसे अधिक धन न लेनेका अनुरोध करते ॥ 26 ॥ रेमुणामें सभीका श्रीगोपीनाथ-दर्शन, श्रीमाधवपुरीके अनुसरणमें श्रीअद्वैतका नृत्य-कीर्तन :- रेमुणाय आसिया कैल गोपीनाथ-दरशन। आचार्य करिल ताँहा कीर्त्तन, नर्त्तन ॥ 28 ॥ अनुवाद—रेमुणामें आकर सभीने श्रीक्षीरचोरा- गोपीनाथका दर्शन किया। श्रीअद्वैताचार्यने वहाँ कीर्तन और नृत्य किया ॥ 28 ॥ पूर्व परिचयके कारण सेवकोंके द्वारा श्रीनित्यानन्दका अभिनन्दन :- नित्यानन्देर परिचय सब लोक-सने। बहुत सम्मान आसि' कैल सेवकगणे ॥ 29 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुका वहाँके सभी लोगोंके साथ पहलेका परिचय था, श्रीगोपीनाथके सेवकोंने आकर उनका बहुत सम्मान किया ॥ 29 ॥ सभीका वहाँ रात्रि व्यतीत करना और खीर प्रसादका सम्मान करना :- सेइ रात्रि सब महान्त ताहारि रहिला। बार क्षीर आनि' आगे सेवक धरिला ॥ 30 ॥ क्षीर बाँटि' सबारे दिल प्रभु-नित्यानन्द। क्षीर-प्रसाद पाञा सबार बाड़िल आनन्द ॥ 31 ॥ अनुवाद—उस रात्रि सभी महान् भक्त वहीं मन्दिरमें ही रहे। श्रीगोपीनाथके सेवकोंने बारह खीरके कुल्हड़ लाकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके आगे रख दिये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस खीरको सभीमें बाँट दिया। खीर प्रसाद पाकर सभीका आनन्द बढ़ गया ॥ 30-31 ॥ श्रीनित्यानन्दके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरी, श्रीगोपालका और श्रीगोपीनाथके आगमनके वृत्तान्तका वर्णन :- माधवपुरीत कथा, गोपाल-स्थापन। ताँहारे गोपाल यैछे मागिल चन्दन ॥ 32 ॥ पिछली यात्रामें महाप्रभुके श्रीमुखसे सुनी कथाका वर्णन; भक्तोंको हर्ष :- ताँर लागि' गोपीनाथ क्षीर चुरि कैल। महाप्रभुर मुखे आगे ए कथा शुनिल ॥ 33 ॥ सेइ कथा सबार मध्ये कहे नित्यानन्द। शुनिया वैष्णव-मने बाड़िल आनन्द ॥ 34 ॥ 52 ।

सोलहवाँ अध्याय 16/32-41] अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी कथा, उनके द्वारा गोवर्धनमें श्रीगोपालकी स्थापना, श्रीगोपालके द्वारा उनसे चन्दन माँगना और उनके लिये श्रीगोपीनाथके द्वारा खीरकी चोरी करना—ये सब कथाएँ जो श्रीनित्यानन्द प्रभुने पहले महाप्रभुके मुखसे सुनी थीं, उन्होंने सभी भक्तोंको उन कथाओंका श्रवण कराया। इन कथाओंको सुनकर वैष्णवोंके मनमें आनन्द बहुत बढ़ गया ॥ 32-34 ॥ अनुभाष्य—'महाप्रभु मुखे'—महाप्रभुने पहले श्रीपाद ईश्वरीपुरीके मुखसे श्रवण किया था (मध्यलीला 4/18 संख्या); [संन्यास लेनेके बाद] शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके घरपर कुछ दिन रहनेके पश्चात् महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द, श्रीजगदानन्द, श्रीदामोदर पण्डित और श्रीमुकुन्दके साथ नीलाचल जानेके मार्गमें रेमुणा आकर उन्हें—श्रीमाधवेन्द्रपुरी, वृन्दावनके श्रीगिरिधारी-गोपाल और रेमुणाके श्रीक्षीरचोरा- गोपीनाथके उपाख्यानका वर्णन किया था। (मध्यलीला 4/19-190 संख्या देखें) ॥ 32-34 ॥ सभीका कटकमें आगमन, साक्षिगोपाल-दर्शन और श्रीनिताइके द्वारा साक्षिगोपालकी कहानीका वर्णन :- एइमत चलि' चलि' कटक आइला। साक्षिगोपाल देखि' सबे से दिन रहिला ॥ 35 ॥ साक्षिगोपालेर कथा कहे नित्यानन्द। शुनिया वैष्णव-मने बाड़िल आनन्द ॥ 36 ॥ अनुवाद—इस प्रकार चलते-चलते सभी भक्त कटक आ पहुँचे और वहाँ श्रीसाक्षी-गोपालके दर्शन करके वे उस दिन वहीं रहे। श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीसाक्षिगोपालकी कथा सुनायी, जिसे सुनकर वैष्णवोंके मनका आनन्द और बढ़ गया ॥ 35-36 ॥ अनुभाष्य—'साक्षिगोपालकी कथा'—मध्यलीला 5/8-138 संख्या देखें ॥ 36 ॥ महाप्रभुके दर्शनके लिये व्यग्र सभीका द्रुत-गतिसे पुरीमें आगमन :- प्रभुके मिलिते सबार उत्कण्ठा अन्तर। शीघ्र करि' आइला सबे श्रीनीलाचल ॥ 37 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंके हृदयमें महाप्रभुसे मिलनेकी उत्कण्ठा थी, इसलिये वे शीघ्रतासे श्रीनीलाचल पहुँच गये ॥ 37 ॥ गौड़ीय-भक्तोंके आठारनालामें आगमनके संवादको सुनकर भक्तोंकी अगवानीके लिये महाप्रभुके द्वारा श्रीगोविन्दके हाथसे मालायें भेजना :- आठारनालाके आइला गोसाञि शुनिया। दुइ माला पाठाइला गोविन्द-हस्त दिया ॥ 38 ॥ अनुवाद—जब श्रीचैतन्य गोसाईंने सुना कि भक्त आठारनाला आ पहुँचे हैं, तब उन्होंने श्रीगोविन्दके हाथसे दो मालायें भिजवायीं ॥ 38 ॥ अनुभाष्य—'आठारनाला'—श्रीपुरुषोत्तम-नगरकी एक सीमापर विशेष पुल ॥ 38 ॥ श्रीनिताइ और श्रीअद्वैतका माला ग्रहण करना :- दुइ माला गोविन्द दुइजने पराइल। अद्वैत, अवधूत-गोसाञि बड़ सुख पाइल ॥ 39 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने वे दो मालाएँ श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभुके गलेमें पहनायीं और वे दोनों बहुत प्रसन्न हुए ॥ 39 ॥ सभीका वहींसे चलते हुए नृत्य-कीर्तन-आरम्भ :- ताहानि आरम्भ कैल कृष्ण-सङ्कीर्त्तन। नाचिते नाचिते चलि' आइला दुइजन ॥ 40 ॥ अनुवाद—वहींसे ही सभीने श्रीकृष्ण-सङ्कीर्त्तन करना आरम्भ कर दिया। श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनों नाचते-नाचते हुए चलने लगे ॥ 40 ॥ श्रीस्वरूपादिके द्वारा महाप्रभुका फिरसे मालायें भेजना :- पुनः माला दिया स्वरूपादि निजगुणे। आगु बाड़ि' पाठाइल शचीर नन्दने ॥ 41 ॥ अनुवाद—श्रीशचीनन्दनने भक्तोंके स्वागतके लिये पुनः श्रीस्वरूपादि निजगणोंको मालायें देकर आगे भेजा ॥ 41 ॥ । 53

[ 16/42–50 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नरेन्द्र सरोवरपर मिलकर सभीको माला देना :— नरेन्द्र आसिया, ताँहा सबारे मिलिला। महाप्रभुर दत्त माला सबारे पराइला॥ 42॥ अनुवाद—वे नरेन्द्र सरोवरपर गौड़देशसे आनेवाले सभी भक्तोंसे मिले और उन्होंने उन सबको महाप्रभुके द्वारा भेजी मालायें पहनायीं॥ 42॥ स्वयं सिंहद्वारपर आकर सभी भक्तोंके साथ महाप्रभुका मिलन :— सिंहद्वार-निकटे आइला शुनि' गौरराय। आपने आसिया प्रभु मिलिला सबाय॥ 43॥ अनुवाद—'भक्तजन सिंहद्वारके निकट आ गये हैं'—ऐसा सुनकर श्रीगौरराय स्वयं आकर सभी भक्तोंसे मिले॥ 43॥ जगन्नाथ-दर्शनके बाद सभी भक्तोंके साथ वासस्थानपर आगमन :— सबा लञा कैल जगन्नाथ-दरशन। सबा लञा आइला पुनः आपन-भवन॥ 44॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभीको अपने साथ लेकर श्रीजगन्नाथके दर्शन किये। उसके बाद सभी भक्तोंको साथमें लेकर वे अपने वासस्थानपर आये॥ 44॥ सभीको श्रीवाणीनाथ और श्रीकाशीमिश्रके द्वारा लाया गया प्रसाद खिलाना :— वाणीनाथ, काशीमिश्र प्रसाद आनिल। स्वहस्ते सबारे प्रभु प्रसाद खाओयाइल॥ 45॥ अनुवाद—श्रीवाणीनाथ और श्रीकाशीमिश्र भगवान् श्रीजगन्नाथका प्रसाद लेकर आये और महाप्रभुने स्वयं अपने हाथोंसे सभीको प्रसाद परोसा॥ 45॥ सभीको पूर्ववर्षकी भाँति, निर्दिष्ट वास-स्थानादि देना :— पूर्व-वत्सरे याँर येइ वासा-स्थान। ताँहा सबा पाठाञा कराइल विश्राम॥ 46॥ अनुवाद—पिछले वर्ष जिस भक्तका जो वासस्थान था, इस वर्ष भी महाप्रभुने उसे वही स्थान दिया। तब महाप्रभुने सबको वहाँ विश्राम करनेके लिये भेज दिया॥ 46॥ भक्तोंका महाप्रभुके साथ पुरीमें चार मास रहना :— एइमत भक्तगण रहिला चारिमास। प्रभुर सहित करे कीर्त्तन-विलास॥ 47॥ अनुवाद—इस प्रकार सभी भक्तोंने चार मास तक वहीं रहकर महाप्रभुके साथ कीर्त्तनका आनन्द लिया॥ 47॥ रथयात्राके समय सभीके द्वारा गुण्डिचा-मार्जन :— पूर्ववत् रथयात्रा-काल यबे आइल। सबा लञा गुण्डिचा-मन्दिर प्रक्षालिल॥ 48॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति जब रथयात्राका समय आया, तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको अपने साथ लेकर गुण्डिचा-मन्दिरकी धुलाई की॥ 48॥ महाप्रभुके आदेशानुसार श्रीसत्यराजादिका श्रीजगन्नाथके लिये रेशमी रस्सियाँ देना :— कुलीनग्रामी पट्टडोरी जगन्नाथे दिल। पूर्ववत् रथ-अग्रे नर्त्तन करिल॥ 49॥ अनुवाद—कुलीनग्रामवासी भक्तोंने अपने साथ लायी हुई रेशमी रस्सियाँ श्रीजगन्नाथके लिये दीं। पहलेकी भाँति सभीने रथके आगे नृत्य किया॥ 49॥ रथके आगे नृत्यके बाद सभीका उपवनमें विश्राम :— बहु नृत्य करि' पुनः चलिल उद्याने। वापी-तीरे ताँहा याइ' करिल विश्रामे॥ 50॥ अनुवाद—बहुत नृत्य करनेके बाद सभी उद्यानमें चले गये। वहाँ सरोवरके तटपर पहुँचकर सबने विश्राम किया॥ 50॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'वापी'—कुआँ (?), जलाशय॥ 50॥ अनुभाष्य—'उद्याने'—जगन्नाथवल्लभ उद्यानमें; 'वापी-तीरे'—नरेन्द्र सरोवरके तटपर॥ 50॥ 54 ।

सोलहवाँ अध्याय 16/51-59 ] राढ़-देशके ब्राह्मण श्रीकृष्णदासके द्वारा महाप्रभुका अभिषेक और महाप्रभुको सुख :- राढ़ी एक विप्र, तेंहो-नित्यानन्द-दास। महा-भाग्यवान् तेंहो, नाम-कृष्णदास ॥ 51 ॥ घट भरि' प्रभुर तेंहो अभिषेक कैल। ताँर अभिषेके प्रभु महातृप्त हैल ॥ 52 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके आश्रित राढ़देशके एक महाभाग्यशाली ब्राह्मण जिनका नाम कृष्णदास था, उन्होंने एक घड़ेको भरकर वहीं महाप्रभुका अभिषेक किया। उनके अभिषेकसे महाप्रभु अत्यन्त सन्तुष्ट हुए॥ 51-52 ॥ सभीके द्वारा बलगण्डिमें लगे भोगके प्रसादका सम्मान :- बलगण्डि-भोगेरे बहु प्रसाद आइल। सबा सङ्गे महाप्रभु प्रसाद खाइल ॥ 53 ॥ अनुवाद—बलगण्डिमें श्रीजगन्नाथको लगे भोगका बहुत सा प्रसाद आया और महाप्रभुने सभी भक्तोंके साथ उस प्रसादको ग्रहण किया॥ 53 ॥ सभीके द्वारा हेरा-पञ्चमी-यात्राका दर्शन :- पूर्ववत् रथयात्रा कैल दरशन। हेरापञ्चमी-यात्रा देखे लञा भक्तगण ॥ 54 ॥ अनुवाद—पूर्व वर्षकी भाँति ही महाप्रभुने भक्तोंके साथ रथयात्राका दर्शन किया और हेरापञ्चमी-यात्राका भी दर्शन किया ॥ 54 ॥ आँधी-वर्षा में महाप्रभुका अकेले श्रीअद्वैतके घरमें भिक्षा-ग्रहण करना :- आचार्य गोसाञि प्रभुर कैल निमन्त्रण। तार मध्ये कैल यैछे झड़-वरिषण ॥ 55 ॥ चैतन्यभागवतमें उसका वर्णन :- विस्तारि' वर्णियाछेन दास-वृन्दावन ॥ ॥ श्रीवास प्रभुरे तबे कैल निमन्त्रण ॥ 56 ॥ श्रीमालिनीदेवीके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :- प्रभुर प्रिय-व्यञ्जन सब रान्धेन मालिनी। 'भक्त्ये दासी'-अभिमान, 'स्नेहेते जननी' ॥ 57 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुको प्रसाद पानेके लिये अपने वासस्थानपर निमन्त्रण किया और तब आँधी-वर्षा आयी। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने श्रीचैतन्य- भागवतमें इन घटनाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। तब एक दिन श्रीवास पण्डितने भी महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। श्रीवास पण्डितकी पत्नी श्रीमालिनी देवी भक्तिके कारण स्वयंमें महाप्रभुकी दासी होनेका अभिमान रखती थीं, परन्तु वात्सल्य-भावसे वे महाप्रभुमें माताकी भाँति स्नेह रखती थीं। उन्होंने महाप्रभुको प्रिय लगनेवाले सब व्यञ्जनोंको बनाया॥ 55-57 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चैः भाः अन्त्यखण्ड, नौवाँ अध्याय— एकदिन श्रीअद्वैतने महाप्रभुको निमन्त्रित करनेका मन बनाया,-'यदि अन्य कोई संन्यासी महाप्रभुके साथ न आये, तो महाप्रभुको अच्छी तरहसे खिलाऊँगा।' अन्यान्य सभी संन्यासी मध्याह्न-क्रियाके लिये बाहर निकले थे, परन्तु उस समय आँधी-वर्षाके आ जानेसे वे श्रीअद्वैतके स्थानपर पहुँच नहीं पाये। श्रीअद्वैतकी इच्छानुसार महाप्रभुने अकेले ही आकर श्रीअद्वैतके अन्न-व्यञ्जनोंका भोजन किया॥ 55-56 ॥ श्रीचन्द्रशेखरके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :- आचार्यरत्न-आदि यत मुख्य भक्तगण। मध्ये मध्ये प्रभुरे करेन निमन्त्रण ॥ 58 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखर (आचार्यरत्न) आदि सभी मुख्य-मुख्य भक्त बीच-बीचमें महाप्रभुको निमन्त्रण देते ॥ 58 ॥ चातुर्मास्यके अन्तमें श्रीनिताइके साथ एकान्तमें विचार :- चातुर्मास्य-अन्ते पुनः नित्यानन्दे लञा। किंवा युक्ति करे नित्य निभृते बसिया ॥ 59 ॥ । 55

[ 16/59-67 শ্রীশ্রীচৈতন্যচরিতামৃত মধ্যলীলা

अनुवाद-चातुर्मास्यके अन्तमें महाप्रभु पुनः श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ प्रतिदिन एकान्तमें कुछ परामर्श करते। वे क्या परामर्श करते थे, इसे कोई नहीं जान सका॥ 59 ॥ श्रीअद्वैताचार्यका रहस्यपूर्ण पहेलीका पाठ :- आचार्य-गोसाञि प्रभुके कहे ठारे-ठोरे। आचार्य तर्ज्जा पड़े, केह बुझिते ना पारे ॥ 60 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुको सङ्केतसे कुछ- कुछ कहा और कुछ पद्य पढ़े, जिन्हें कोई नहीं समझ पाया था॥ 60 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'तर्ज्जा'-पय़ार आदि छन्दमय बातें, जिन्हें दूसरे लोग आसानीसे नहीं समझ सकते॥ 60 ॥ महाप्रभुके द्वारा पहेलीमें कहे गये विचारको स्वीकार करनेसे श्रीअद्वैतको आनन्द :- ताँर मुख देखि' हासे शचीर नन्दन। अङ्गीकार जानि' आचार्य करेन नर्त्तन ॥ 61 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके मुखको देखकर महाप्रभु हँसने लगे। इसीसे वे समझ गये कि महाप्रभुने मेरी बातको स्वीकार कर लिया है और वे नृत्य करने लगे॥ 61 ॥ श्रीगौर और श्रीअद्वैतका परस्परमें संलापादि-दूसरोंकी समझसे परे; महाप्रभुके द्वारा श्रीअद्वैतको विदायी देना :- किवा प्रार्थना, किवा आज्ञा-केह ना बुझिल। आलिङ्गन करि' प्रभु ताँरे विदाय दिल ॥ 62 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने क्या प्रार्थना की थी और महाप्रभुने उन्हें क्या आज्ञा दी थी-इसे कोई भी नहीं समझ पाया। महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यको आलिङ्गन करके विदायी दी ॥ 62 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीअद्वैताचार्यने पयारोंके द्वारा क्या प्रार्थना की और श्रीशचीनन्दनके हँसनेका भी क्या अर्थ हुआ,-उसे और कोई भी नहीं समझ पाया॥ 62 ॥ श्रीनिताइको प्रतिवर्ष पुरीमें नहीं आकर गौड़देशमें नाम-प्रेम-प्रचार करनेका आदेश :- नित्यानन्दे कहे प्रभु, - "शुनह श्रीपाद। एइ आमि मागि, तुमि करह प्रसाद ॥ 63 ॥ प्रतिवर्ष नीलाचले तुमि ना आसिबा। गौड़े रहि' मोर इच्छा सफल करिबा ॥ 64 ॥ श्रीनिताइके द्वारा महाप्रभुका अत्यन्त कठिन कार्य करवाना :- ताँहा सिद्धि करे-हेन अन्ये ना देखिये। आमार 'दुष्कर' कर्म, तोमा हैते हुये ॥"65 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे कहा, - 'सुनिये, श्रीपाद! मैं आपसे कुछ माँगता हूँ, आप कृपा कीजिये। आप प्रत्येक वर्ष नीलाचल मत आना और गौड़देश (बङ्गाल)में रहकर मेरी इच्छाको पूर्ण करना। वहाँ मेरी अभिलाषाको जो पूर्ण कर सके, ऐसा मैं किसी अन्यको नहीं देखता हूँ। मेरा यह अत्यन्त कठिन कार्य केवल आपके द्वारा ही हो सकता है॥"63-65 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गौड़देशमें महाप्रभुकी अनुपस्थितिमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिरिक्त कोई भी चण्डाल तकको नाम-प्रेमदानरूपी महाप्रभुके उद्देश्यकी सिद्धि नहीं कर सकता ॥ 64-65 ॥ महाप्रभुके भक्त प्रभु-नित्यानन्द :- नित्यानन्द कहे, - "आमि 'देह', तुमि 'प्राण'। 'देह' 'प्राण' भिन्न নহে,-एइ त' प्रमाण ॥ 66 ॥ अचिन्त्यशक्त्ये कर तुमि ताहार घटन। ये कराह, सेइ करि, नाहिक नियम ॥"67 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, - "मैं देह हूँ और आप प्राण हैं। देह और प्राणमें कोई भेद नहीं है-यही तो प्रमाण है। आप जो चाहते हैं, वह आपकी अचिन्त्य शक्तिके द्वारा घटता है। आप मुझसे जो कराते हैं, मैं बिना किसी प्रतिबन्धके वही करता हूँ॥"66-67 ॥

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सोलहवाँ अध्याय 16/66-72 ] अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,-मैं 'देह' और आप 'प्राण' हो; ये दोनों वस्तुएँ कभी भी अलग नहीं हैं; तथापि आप-नीलाचलमें और मैं-गौड़में, इस प्रकार जो अलग रहते हैं, वह केवल आपकी अचिन्त्य शक्तिसे ही घटता है॥ 66-67 ॥ श्रीनिताइ और अन्यान्य सभी भक्तोंको विदायी देना :- ताँरे विदाय दिल प्रभु करि' आलिङ्गन। एइमत विदाय दिल सब भक्तगण ॥ 68 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको आलिङ्गन करके उन्हें विदायी दी। इस प्रकार उन्होंने सभी भक्तोंको भी विदायी दी॥ 68॥ श्रीसत्यराजादिकी पूर्व वर्षकी भाँति महाप्रभुसे अपने कर्त्तव्यके विषयमें जिज्ञासा :- कुलीनग्रामी पूर्ववत् कैल निवेदन । "प्रभु, आज्ञा कर, - कर्त्तव्य आमार साधन ॥" 69॥ अनुवाद-कुलीनग्रामवासियोंने पूर्व वर्षकी भाँति निवेदन करते हुए पूछा, - "हे प्रभो ! हमें आज्ञा दीजिये कि क्या साधन हमारा कर्त्तव्य है ? ॥"69॥ महाप्रभुका उत्तर :- प्रभु कहे, - "वैष्णव-सेवा, नाम-सङ्कीर्त्तन । दुइ कर, शीघ्र पाबे श्रीकृष्ण-चरण ॥"70॥ अनुवाद-महाप्रभुने उत्तर दिया, - "वैष्णव-सेवा और नाम-सङ्कीर्त्तन-इन दो कार्योंको करो, तुम्हें शीघ्र ही श्रीकृष्णके चरणोंकी प्राप्ति होगी ॥" 70 ॥ श्रीसत्यराजादिकी महाप्रभुसे 'वैष्णव'-लक्षणकी जिज्ञासा :- तेँहो कहे, - "के वैष्णव, कि ताँर लक्षण ?" तबे हासि' कहे प्रभु जानि' ताँर मन ॥ 71 ॥ महाप्रभुके द्वारा 'मध्यम-वैष्णव'के लक्षणका निर्देश :- "कृष्णनाम निरन्तर याँहार वदने। सेइ वैष्णव-श्रेष्ठ, भज ताँहार चरणे ॥"72॥ अनुवाद-श्रीसत्यराजादिने प्रश्न किया, - "वैष्णव कौन हैं और उनके लक्षण क्या हैं?" तब महाप्रभु उनके मनकी भावनाको जानकर हँसते हुए बोले, - "श्रीकृष्णनाम निरन्तर जिनके मुखमें विराजमान रहता है, वे वैष्णवोंमें श्रेष्ठ हैं, उनके चरणोंकी सेवा करो ॥" 71-72 ॥ अनुभाष्य-जिस वैष्णवके मुखसे निरन्तर श्रीकृष्णनाम उच्चारित होता है, उसे 'कोमल श्रद्धावाले एकबार श्रीकृष्णनामका उच्चारण करनेवाले कनिष्ठ वैष्णव'की अपेक्षा श्रेष्ठ अर्थात् 'मध्यम भागवत' जानना ; उसके चरणोंकी सेवा करना। श्रीरूप गोस्वामीने उपदेशामृतमें लिखा है- 'प्रणतिभिश्च भजन्तमीशम्' अर्थात् मध्यमाधिकारी भागवतको परस्पर 'प्रणाम'रूपी व्यवहार करनेके लिये उपदेश दिया है। निरन्तर, - 'अन्तर' अर्थात् बाधा जिसमें नहीं है। [श्रीकृष्णसेवाके अतिरिक्त] अन्याभिलाषाएँ, कर्म, ज्ञान और चेतन-वृत्तिके कार्यमें शिथिलता अर्थात् आलस्य-ये सभी अन्तर या बाधा हैं। जैसे श्रीरूप प्रभुने (भःरःसिः, पूर्व विः, प्रथम लहरीमें कहा है- “अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥" [अर्थात् "श्रीकृष्णको सुखी करनेकी स्पृहाके अतिरिक्त समस्त प्रकारकी अभिलाषाओंसे रहित, ज्ञानकर्मादिके द्वारा अनावृत्त, एकमात्र श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये ही कायिक, मानसिक और वाचिक समस्त चेष्टाओं और भावके द्वारा तैल-धारावत् अविच्छिन्न गतिसे जो श्रीकृष्णका अनुशीलन अर्थात् श्रीकृष्णकी सेवा की जाती है, उसे (उन समस्त चेष्टाओंको) उत्तमा भक्ति कहते हैं।”] अथवा, 'अन्तर'-शब्दका एक अर्थ 'देह' भी है। इन्द्रियतृप्तिमें लिप्त होना श्रीकृष्ण-भजनमें बाधा है। 'अन्तर'-शब्दका अन्य अर्थ 'द्रविण' अर्थात् 'धन' है। श्रीकृष्णसेवामें धनका सदुपयोग नहीं करके उसके संग्रहकी चेष्टा भी भजनमें बाधा है। 'अन्तर'-शब्दका एक अर्थ 'जनता' भी है। असत्सङ्ग अथवा दुःसङ्ग भी भजनमें बाधा है। 'अन्तर'-शब्दका अन्य अर्थ । 57

[ 16/72 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'लोभ' भी है। जिह्वाकी लालसाकी तृप्ति अथवा बहुत अधिक धन-संग्रह या अनेक मतोंको ग्रहण करनेकी लालसा भी भजनमें बाधा है। अन्तमें 'अन्तर'-शब्दका अर्थ पाखण्ड है। निम्नलिखित विचार अथवा कार्य पाखण्ड है—

  1. विष्णु-विग्रह जो साक्षात् भगवान् हैं, उनको शिला, काष्ठ, स्वर्ण, पीतल आदि धातुका मानना,
  2. गुरुको एक साधारण मनुष्य समझना,
  3. वैष्णवकी जातिका विचार अथवा उसे प्राकृत समझना,
  4. विष्णु-वैष्णवके चरणामृतको सामान्य जल समझना,
  5. विष्णुके नाम-मन्त्रको अथवा सद्गुरुके द्वारा दिये गये नामको 'सामान्य जागतिक शब्द' समझना,
  6. सर्वेश्वरेश्वर विष्णुको अथवा विष्णु-परतत्त्व स्वयंरूप श्रीकृष्णको उनकी निजशक्तिके अंश त्रिगुणोंके अधीन देवताओंके साथ समान मानना,
  7. अचित्के आश्रयमें अथवा अचित्से आत्मा अथवा चेतनकी उपलब्धिकी चेष्टा,
  8. अप्राकृत वास्तव वस्तुको प्राकृत, खण्ड, इन्द्रियोंके द्वारा माँपी जा सकनेवाली वस्तुके समान समझना
  9. द्वैतबुद्धिसे श्रीहरि, गुरु और वैष्णवोंमें परस्पर भेद मानना। ये सभी अपराधोंको उत्पन्न करनेवाले हैं। भक्तिसन्दर्भमें श्रीजीवप्रभुकी उक्ति (265 संख्यामें)— “नामैकं यस्य वाचि स्मरणपथगतम्” इत्यादौ देहद्रविणादि- निमित्तक-'पाषण्ड'-शब्देन च दश अपराधा लक्ष्यन्ते, पाषण्डमयत्वात् तेषाम्।” [अर्थात् “जो व्यक्ति श्रीनामको सुनकर भी देह- धनादिमें लिप्त रहता है, वह पाखण्डी है। पाखण्ड-शब्दसे दसों अपराध लक्षित होते हैं, क्योंकि ये सब अपराध पाखण्डमय हैं।”] (भाः 11/2/46)— “ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः॥” [अर्थात् “जो ईश्वरसे प्रेम, वैष्णवसे मैत्री, मूढ़ व्यक्तिपर कृपा और द्वेषीकी उपेक्षा करते हैं, वे मध्यम भक्त हैं।”] 'सनातन शिक्षामें' मध्यलीला 22वाँ अध्याय— “श्रद्धावान् जन हय भक्ति-अधिकारी। 'उत्तम', 'मध्यम', 'कनिष्ठ'—श्रद्धा-अनुसारि ॥ 64 ॥ शास्त्र-युक्ति नाहि जाने दृढ़, श्रद्धावान्। 'मध्यम-अधिकारी' सेइ महाभाग्यवान् ॥ 66 ॥ रति-प्रेम-तारतम्ये भक्त-तर-तम।” 68क। [अर्थात् “श्रद्धावान् व्यक्ति ही भक्तिके अधिकारी हैं और श्रद्धाके अनुसार ही वे उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ भक्त होते हैं। जो शास्त्रोंकी युक्तियोंको भली-भाँति नहीं जानता, किन्तु श्रीकृष्णमें दृढ़ श्रद्धावान् है, वह महाभाग्यवान् व्यक्ति मध्यम-अधिकारी है। रति और प्रेमके तारतम्यसे भक्तोंमें भी तारतम्य होता है।”] मध्यम-भागवत निरन्तर कीर्तन-यज्ञके द्वारा भगवान्की आराधना करता है। इसके द्वारा उसकी श्रीनाममें प्रीति वर्धित होती है और क्रमशः वह 'प्रेम'के स्तरपर पहुँच जाता है। वह अप्राकृत श्रीनाममें निरन्तर प्रीतियुक्त होकर अनुशीलन करते-करते स्वयंको 'अप्राकृत कृष्णदास'के रूपमें जान पाता है। और श्रीनाममें अपेक्षाकृत स्वल्प रुचिवाले भक्तको वह कभी-कभी नामके अप्राकृत स्वरूपके विषयमें समझाकर उसपर कृपा करता है। शुद्धभक्तोंमें और भगवान्में पूर्णतया प्रीतिरहित विद्वेषी व्यक्तियोंको ऐसा जानकर कि ये 'श्रीकृष्णके अप्राकृत-स्वरूपकी अनुभूतिसे रहित हैं और इनकी चेतन-वृत्ति मायासे आवृत है, इसलिये ये केवल-प्राकृत हैं', वह उनके सङ्गका त्याग करता है। मध्यम अधिकारी शुद्धभक्तिके उपादान अथवा उपकरण आदिको भी 'अप्राकृत' समझता है॥ 72 ॥ 58 ।

सोलहवाँ अध्याय 16/73-74 ] अगले वर्ष पुनः उनके द्वारा 'वैष्णव'-लक्षणकी जिज्ञासा करनेपर महाप्रभुका उत्तर :- वर्षान्तरे पुनः ताँरा ऐछे प्रश्न कैल। वैष्णवेर तारतम्य प्रभु शिखाइल ॥ 73 ॥ अनुवाद-एक वर्षके बाद पुनः कुलीनग्रामवासियोंने ऐसा ही प्रश्न किया। उसके उत्तरमें महाप्रभुने उन्हें पुनः वैष्णवोंका तारतम्य सिखलाया ॥ 73 ॥ महाप्रभुके द्वारा 'उत्तमाधिकारी या महाभागवत'के लक्षणका निर्देश :- याँहार दर्शने मुखे आइसे कृष्णनाम। ताँहारे जानिह तुमि 'वैष्णव-प्रधान' ॥ 74 ॥ अनुवाद-जिनके दर्शनमात्रसे मुखसे श्रीकृष्णनाम निकलने लगे, उन्हें तुम वैष्णवोंमें प्रधान समझना ॥ 74 ॥ अनुभाष्य-जिन वैष्णवको देखकर देखनेवालेके मुखमें श्रीकृष्णनाम स्वाभाविक रूपमें ही आ जाता है, उन्हें स्वरूपसिद्ध 'महाभागवत' जानना। वे सम्पूर्ण रूपसे विकसित और उद्दीप्त अथवा अनावृत चेतनवृत्तिसे युक्त रहते हैं। अथवा वे श्रीकृष्णकी केवल शुद्धप्रेम-सेवामें निमग्न रहनेके कारण सर्वदा जाग्रत अवस्थामें अर्थात् अपने स्वरूपमें अवस्थान करते हैं। वे भगवद् ज्ञान और विज्ञानसे युक्त होनेके कारण सर्वत्र श्रीकृष्णके दर्शन करते हैं और सभी जीवोंको श्रीकृष्णसे सम्बन्धित देखते हैं। उनके श्रीमुखसे निरन्तर शुद्ध श्रीकृष्णनामका भलीभाँति कीर्तन होता रहता है। वे स्वयं दिव्यनेत्रोंसे युक्त होनेके कारण श्रीकृष्ण-विस्मृति अथवा श्रीकृष्ण-विमुखता रूपी मोह-निद्रामें सोये हुए अन्य जीवोंके बन्द अज्ञानमय चक्षुओंको खोल देते हैं अर्थात् वे उन्हें जड़तासे मुक्त करवाकर दिव्यनेत्र प्रदान करके चेतनवृत्तिसे युक्त कर देते हैं। वे ऐसे चेतनवृत्तियुक्त जीवोंको सदैव श्रीकृष्ण और कार्ष्ण (श्रीकृष्णभक्तों)की सेवामें नियुक्त करनेमें समर्थ हैं। "ब्रह्माण्ड तारिते शक्ति धरे जने जने" [अर्थात् ऐसे एक-एक वैष्णव एक-एक ब्रह्माण्डका उद्धार करनेमें समर्थ हैं]। मध्यलीला 6/279 संख्या- “लोहाके यावत् स्पर्श' हेम नाहि करे। तावत् स्पर्शमणि केह चिन्ते ना पारे॥" [अर्थात् “जब तक अपने स्पर्शसे वह लोहेको सोना नहीं बनाती, तब तक स्पर्शमणिको कोई पहचान नहीं पाता।”] आदि वाक्य उत्तम भागवतके सम्बन्धमें ही कहे गये हैं। श्रीरूप गोस्वामीने 'उपदेशामृत'में कहा है- “शुश्रूषया भजनविज्ञमनन्यमन्य- निन्दादिशून्यहृदमीप्सितसङ्गलब्ध्या।” [अर्थात् “जो व्यक्ति श्रीमद्भागवत आदि वैष्णव स्मृतियोंके अनुसार भजनके तत्त्वको भलीप्रकार जानकर अनन्य रूपसे श्रीकृष्णका भजन करता है, श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी अभिनिवेश नहीं रहनेके कारण दूसरोंकी निन्दा आदिसे शून्य निर्मल-हृदयवाला है, ऐसे भजनविज्ञ अर्थात् मानससेवाके द्वारा अष्टकालीयलीला-स्मरण भजन परिपाटीमें अभिज्ञ महाभागवतको स्वजातीय अन्तःकरणवाले सुस्निग्धजनोंमें सर्वोत्तम सङ्ग जानकर प्रणिपात, परिप्रश्न और प्रीतिपूर्वक सेवाके द्वारा उनका आदर करना चाहिये।”] महाप्रभुके श्रीमुखसे कहे गये “तृणादपि सुनीच” श्लोकका सम्पूर्ण रूपसे आचरण करनेवाले और मध्यलीला 9/36-37 संख्याके अनुसार वे 'आश्रयजातीय कृष्ण' अथवा 'महाभागवत' हैं-वे ही शुद्ध हरिकीर्तन करनेवाले हैं। वे अन्य जीवोंके जड़ीय उच्च-नीच शरीरोंको नहीं देखते अथवा उनका हृदय अन्य व्यक्तियोंकी निन्दा आदिसे रहित है। इसलिये ऐसे व्यक्तिसे ही 'मध्यम-भागवत' सदैव श्रवणके इच्छुक होकर उनकी सब प्रकारसे सेवा करके उनको सन्तुष्ट करनेपर अन्तमें उनकी कृपाके प्रभावसे वह मध्यम अधिकारी ही 'उत्तम-अधिकारी' बननेका सौभाग्य प्राप्त करता है। भाः 11/2/45- । 59

[ 16/74-77 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला “सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः॥” [अर्थात् “जो सभी प्राणियोंमें अपनी और भगवान्‌की सत्ता तथा अपने और भगवान्‌में सभी प्राणियोंकी सत्ताको अनुभव करते हैं, वे उत्तम भागवत कहलाते हैं।”] 'सनातन-शिक्षामें' मध्य 22वें अध्यायमें— “श्रद्धावान् जन हय भक्ति-अधिकारी। 'उत्तम', 'मध्यम', 'कनिष्ठ'—श्रद्धा-अनुसारी॥ 64॥ शास्त्रयुक्तये सुनिपुण, दृढ़श्रद्धा याँर। 'उत्तम-अधिकारी' सेइ तारय संसार॥” 65॥ [अर्थात् “श्रद्धावान् व्यक्ति ही भक्तिके अधिकारी हैं और श्रद्धाके अनुसार ही वे उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ भक्त होते हैं। जो भक्त शास्त्र और शास्त्रोंकी युक्तियोंमें अत्यन्त निपुण होनेके कारण दृढ़ श्रद्धावान् होते हैं, वे 'उत्तम-अधिकारी' हैं और वे संसारके सभी प्राणियोंका उद्धार कर सकते हैं।”] 'भगवान्', 'भक्ति' और 'भक्त'—इन तीन वस्तुओंमें महाभागवतकी अप्राकृत असङ्कुचित प्रेममयी दृष्टि होती है। इसके अतिरिक्त वे और कुछ नहीं देखते हैं। “सबे कृष्ण भजे,—एइ मात्र जाने” अर्थात् “वे केवलमात्र इतना ही जानते हैं कि सभी श्रीकृष्णका भजन कर रहे हैं।” इसलिये वे श्रीकृष्णके द्वारा सम्पूर्ण रूपसे अङ्गीकार की गयी वस्तु हैं॥ 74॥ महाप्रभुके द्वारा तीन प्रकारके अधिकारके वैष्णवोंके लक्षणका निर्देश :— क्रम करि' कहे प्रभु 'वैष्णव'-लक्षण। 'वैष्णव', 'वैष्णवतर', आर 'वैष्णवतम'॥ 75॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने क्रमशः 'वैष्णव', 'वैष्णवतर' और 'वैष्णवतम'के लक्षण बतलाये॥ 75॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कुलीनग्रामवासी भक्तोंके पिछले वर्ष किये गये प्रश्नके उत्तरमें अर्थात् 'याँर मुखे एकबार शुनि कृष्णनाम' आदि सुनकर भी कुलीनग्रामवासियोंने जब इस बार पुनः वही प्रश्न किया, तब महाप्रभुने कहा,—जिसके मुखसे निरन्तर कृष्णनाम सुनो, उसे 'वैष्णवश्रेष्ठ' जानकर उसके चरणोंका निरन्तर भजन करो। अगले वर्ष जब कुलीनग्रामवासियोंने पुनः वही प्रश्न किया, तब महाप्रभुने उस बार उत्तर दिया,—जिनके दर्शन करने मात्रसे ही दर्शकके मुखमें श्रीकृष्णनाम सहज ही आ जाय, उनको तुम 'वैष्णव-प्रधान' जानना। इस प्रकार तीन वर्षोंमें तीन प्रकारके उत्तरोंका विचार करके देखनेपर महाप्रभुके वचनोंमें 'वैष्णव', 'वैष्णवतर', और 'वैष्णवतम'—इन तीन प्रकारके वैष्णवोंके लक्षण मिलते हैं। इन तीन प्रकारके वैष्णवोंकी सेवा ही गृहस्थ-वैष्णवोंका कर्त्तव्य है। महाप्रभुकी बातका तात्पर्य यह है कि,—जिन्होंने केवल वैष्णवी-दीक्षामात्र ग्रहण की है, किन्तु एकबार भी अपराधरहित होकर श्रीकृष्ण-नाम नहीं किया, उस वैष्णवकी सेवा करनेका कोई प्रयोजन नहीं है; केवल 'सुहृद्', 'अतिथि' जानकर ही उसका सम्मान करना आवश्यक है॥ 69-75॥ श्रीपुण्डरीकके अतिरिक्त अन्य सभीका गौड़देश लौटना :— एइमत सब वैष्णव गौड़े चलिला। विद्यानिधि से-वत्सर नीलाद्रि रहिला॥ 76॥ अनुवाद—इस प्रकार सभी वैष्णव गौड़देशमें लौट गये। परन्तु उस वर्ष श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि नीलाद्रि (जगन्नाथपुरी)में ही रह गये॥ 76॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विद्यानिधि'—श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि॥ 76॥ श्रीस्वरूपके साथ श्रीपुण्डरीकका सख्यभाव :— स्वरूप-सहित ताँर हय सख्य-प्रीति। दुइ-जनाय कृष्ण-कथाय एकत्रइ स्थिति॥ 77॥ अनुवाद—श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिकी श्रीस्वरूप दामोदरके साथ सखा जैसी प्रीति थी। श्रीकृष्णकथाकी चर्चामें दोनों एक ही स्तरपर स्थित थे॥ 77॥ 60 |

सोलहवाँ अध्याय 16/78-85 ] श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिको श्रीगदाधरको पुनः मन्त्र देना और 'ओड़न-पष्ठी'का दर्शन :- गदाधर-पण्डिते तेंहो पुनः मन्त्र दिल। ओड़न-पष्ठीर दिने यात्रा ये देखिल ॥ 78 ॥ श्रीपुण्डरीक और श्रीजगन्नाथके माँड़से युक्त वस्त्रोंके कारण घटित घटनाका वर्णन :- जगन्नाथ परे तथा 'माडुया' वसन। देखिया सघृण हैल विद्यानिधिर मन ॥ 79 ॥ सेइ रात्र्ये जगन्नाथ-बलाइ आसिया। दुइ-भाइ चड़ा'न ताँरे हासिया हासिया ॥ 80 ॥ अनुवाद—श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिने श्रीगदाधर पण्डितको पुनः मन्त्र प्रदान किया और उन्होंने ओड़न-पष्ठीके दिन महोत्सवका दर्शन किया। उस ओड़न षष्ठीके दिन श्रीजगन्नाथदेवने माँड़ लगे वस्त्र पहने थे, जिसे देखकर श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिके मनमें थोड़ीसी घृणाकी भावना आ गयी। उसी रात श्रीजगन्नाथ तथा श्रीबलदेव—दोनों भाई आकर हँसते-हँसते उन्हें थप्पड़ मारने लगे॥ 78-80 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ओड़नषष्ठी'—सर्दीके आनेपर पहली छठी तिथिको 'ओड़नषष्ठी' कहते हैं। उस दिन श्रीजगन्नाथदेवके अङ्गमें सर्दियोंके वस्त्र अर्पित किये जाते हैं। वे सर्दीके वस्त्र—'माडुया'-वस्त्र अर्थात् जुलाहेके द्वारा बनाये हुए माँड़से युक्त बिना धुले वस्त्र होते हैं। देवताको माँड़ लगे हुए वस्त्र देनेपर श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिने उस विषयमें थोड़ी सी 'खूँटिनाटि' अर्थात् दोष दिखलाकर उड़ीया-भक्तोंके प्रति थोड़ीसी घृणा प्रकाशित करनेके कारण उसका उपयुक्त फल प्राप्त किया था॥ 78 ॥ अनुभाष्य—चैतन्यभागवत अन्त्यखण्ड ग्यारहवाँ अध्याय देखें ॥ 78 ॥ चैतन्यभागवतमें विस्तारसे वर्णित :- गाल फुलिल, आचार्य अन्तरे उल्लास। विस्तारि' वर्णियाछेन वृन्दावन-दास ॥ 81 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिके गाल थप्पड़ खानेसे सूज गये थे, तथापि उनके हृदयमें बहुत आनन्द था। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने इस लीलाका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है॥ 81 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चैतन्यभागवतके अन्त्यखण्डमें दसवाँ और ग्यारहवाँ अध्याय देखें॥ 81 ॥ अनुभाष्य—'बलाइ'—श्रीबलराम; 'आचार्य'—आचार्यनिधि॥ 80-81 ॥ प्रत्येक वर्ष गौड़ीय भक्तोंका आगमन और दर्शनादि :- एइमत प्रत्यब्द आइसे गौड़ेर भक्तगण। प्रभु-सङ्गे रहि' करे यात्रा-दरशन ॥ 82 ॥ अनुवाद—इस प्रकार प्रत्येक वर्ष गौड़देशके भक्त आते थे और महाप्रभुके साथ रहकर विभिन्न उत्सवोंका दर्शन करते थे॥ 82 ॥ उनमेंसे ग्रन्थकारकी विशेष-विशेष घटनाओंके वर्णनकी प्रतिज्ञा :- तार मध्ये ये ये वर्षे आछये विशेष। विस्तारिया ताहा शेष करिब निःशेष ॥ 83 ॥ अनुवाद—उनमेंसे जिन-जिन वर्षोंमें कुछ विशेष उल्लेखनीय बातें है, उनका सबका मैं विस्तृत रूपमें आगे वर्णन करूँगा॥ 83 ॥ भक्तोंके साथ चार-वर्ष नीलाचल-लीला, दो-वर्ष दक्षिणमें आवागमन :- एइमत महाप्रभुर चारि वत्सर गेल। दक्षिण यात्रा आसिते दुइ वत्सर लागिल ॥ 84 ॥ वृन्दावन जानेके लिये महाप्रभुकी दो वर्षसे इच्छा, किन्तु श्रीरायकी चेष्टासे नहीं जा पाना :- आर दुइ वत्सर चाहे वृन्दावन याइते। रामानन्द-हठे प्रभु ना परे चलिते ॥ 85 ॥ अनुवाद—इस प्रकार करते हुए महाप्रभुके चार वर्ष व्यतीत हो गये। दक्षिण भारतकी यात्रामें उनके पहले । 61

[ 16/84-95 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दो वर्ष व्यतीत हो गये थे। उसके बाद दो वर्ष तक गौड़देश दिया याब ताँ-सबा देखिया। महाप्रभु वृन्दावन जाना चाहते थे, किन्तु वे श्रीरामानन्द तुमि दुँहे आज्ञा देह' परसन्न हञा॥” 91 ॥ रायके हठके कारण नहीं जा पाये ॥ 84-85 ॥ अनुवाद—गौड़देशमें मेरे दो आश्रय हैं—माता और अनुभाष्य—'हठ'—बलका प्रयोग; बलपूर्वक ॥ 85 ॥ जाह्नवी (गङ्गा)—ये दोनों दयामयी हैं। मैं गौड़देशसे होते पाँचवें वर्ष गौड़ीय-भक्तोंका रथयात्राके हुए जाऊँगा, जिससे उन दोनोंके दर्शन करते हुए दर्शनके बाद गौड़देशमें लौटना :- वृन्दावन चला जाऊँगा। अब आप दोनों मुझे प्रसन्नतापूर्वक पञ्चम वत्सरे गौड़ेर भक्तगण आइला। आज्ञा प्रदान कीजिये॥” 90-91 ॥ रथ देखि' ना रहिला, गौड़ेरे चलिला ॥ 86 ॥ श्रीभट्टाचार्य और श्रीरायकी सम्मति, किन्तु वर्षाके कारण अनुवाद—पाँचवे वर्ष गौड़देशके भक्तगण आये, विजया-दशमी तक रुकनेका अनुरोध :- किन्तु रथ-यात्राके दर्शनके बाद वे जगन्नाथ पुरीमें नहीं शुनिय़ा प्रभुर वाणी मने विचारय। रहे। वे सब गौड़देशमें लौट गये ॥ 86 ॥ प्रभु-सने अति हठ कभु भाल नय ॥ 92 ॥ श्रीभट्टाचार्य और श्रीरायसे महाप्रभुकी गौड़देशसे होकर दुँहे कहे,—“एबे वर्षा, चलिते नारिबा। वृन्दावन जानेके लिये सम्मतिकी प्रार्थना :- विजया-दशमी आइले, अवश्य चलिबा॥” 93 ॥ तबे प्रभु सार्वभौम-रामानन्द-स्थाने। अनुवाद—महाप्रभुके वचन सुनकर दोनों मन-ही-मनमें आलिङ्गन करि' कहे मधुर-वचने ॥ 87 ॥ विचार करने लगे कि महाप्रभुके साथ अधिक हठ “बहुत उत्कण्ठा मोर याइते वृन्दावन। करना कभी भी उचित नहीं है। उन दोनोंने कहा, — “अभी तोमार हठे दुइ वत्सर ना कैलुँ गमन ॥ 88 ॥ वर्षाका समय है, आपको यात्रामें बहुत कष्ट होगा। अवश्य चलिब, दुँहे करह सम्मति। विजया-दशमी आनेपर आप अवश्य ही जाना ॥” 92-93 ॥ तोमा-दुँहा बिना मोर नाहि अन्य गति ॥ 89 ॥ महाप्रभुके द्वारा वर्षाका समय व्यतीत करना और अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीसार्वभौम और विजया-दशमीके दिन वृन्दावनकी यात्रा :- श्रीरामानन्दको आलिङ्गन करके मधुर वचन कहे, — “मेरी आनन्दे महाप्रभु वर्षा कैल समाधान। वृन्दावन जानेकी बहुत उत्कण्ठा है, किन्तु आप विजया-दशमी-दिने करिल पयान ॥ 94 ॥ दोनोंकी हठके कारण मैं दो वर्ष तक नहीं गया। किन्तु अनुवाद—महाप्रभु उनकी बात सुनकर बहुत प्रसन्न अब मैं अवश्य ही जाऊँगा, इसलिये आप दोनों इसमें हुए। उन्होंने वर्षाकाल समाप्त होने तक प्रतीक्षा की अपनी सम्मति प्रदान करो। आप दोनोंके अतिरिक्त मेरी और विजया-दशमीके दिन वे वृन्दावनकी ओर चल अन्य कोई गति नहीं है ॥ 87-89 ॥ दिये ॥ 94 ॥ गौड़देशमें महाप्रभुकी दो पूज्य वस्तुएँ :- अनुभाष्य—'पयान'—प्रयाण; यात्रा ॥ 94 ॥ (1) शचीदेवी और (2) गङ्गादेवी— साथमें श्रीजगन्नाथके प्रसादादिको लेना :- गौड़-देशे हय मोर 'दुइ समाश्रय'। जगन्नाथेर प्रसाद प्रभु यत पाञाछिल। 'जननी' 'जाह्नवी', —एइ दुइ दयामय ॥ 90 ॥ कड़ार चन्दन, डोर, सब सङ्गे लैल ॥ 95 ॥ 62 ।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य रूप (Transcription) है:

सोलहवाँ अध्याय 16/95–104 ] अनुवाद—महाप्रभुको श्रीजगन्नाथका प्रसादी तांबेके वर्णका चन्दन, रस्सी आदि जो कुछ मिला, उन्होंने वह सब अपने साथ ले लिया॥95॥ अनुभाष्य—'कड़ार'—तांबेके वर्णका, प्रलेप (?); 'डोर'—रस्सी॥95॥ प्रभातमें यात्रा, पुरीवासी भक्तोंका महाप्रभुका अनुसरण :— जगन्नाथे आज्ञा मागि' प्रभाते चलिला। उड़िया-भक्तगण सङ्गे पाछे चलि' आइला॥96॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीजगन्नाथकी आज्ञा लेकर प्रभातमें ही चल पड़े। उड़ीसाके भक्त भी उनके साथ उनके पीछे चलने लगे॥96॥ पुरीवासी भक्तोंको लौटानेके बाद सङ्गी-भक्तोंके साथ भवानीपुर आना :— उड़िया-भक्तगणे प्रभु यत्ने निवारिला। निजगण-सङ्गे प्रभु 'भवानीपुर' आइला॥97॥ अनुवाद—महाप्रभुने बड़ी प्रीतिसे आग्रह करके उड़िया भक्तोंको आगे साथ चलनेसे रोका। तब वे अपने भक्तोंके साथ 'भवानीपुर' आ पहुँचे॥97॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'भवानीपुर'—जान्कादेइपुर अर्थात् जानकीदेवीपुरके आगे 'भवानीपुर'॥97॥ श्रीरायका पीछेसे आगमन, श्रीवाणीनाथका प्रसाद भिजवाना :— रामानन्द आइला पाछे दोलाय चड़िया। वाणीनाथ बहु प्रसाद दिल पाठाञा॥98॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द बादमें पालकीपर चढ़कर वहाँ आये और श्रीवाणीनाथने बहुतसा प्रसाद भिजवा दिया॥98॥ वहीँपर रात्रि बिताना, प्रातःकाल भुवनेश्वरमें आगमन :— प्रसाद भोजन करि' तथाय रहिला। प्रातःकाले चलि' प्रभु 'भुवनेश्वर' आइला॥99॥ अनुवाद—सभी प्रसाद पाकर रात्रिमें भवानीपुरमें ही रहे। प्रातःकाल चलकर महाप्रभु भुवनेश्वर आ गये॥99॥ वहाँसे कटकमें आकर श्रीसाक्षीगोपालका दर्शन :— 'कटके' आसिया कैल 'गोपाल' दरशन। स्वप्नेश्वर-विप्र कैल प्रभुर निमन्त्रण॥100॥ अनुवाद—कटकमें पहुँचकर महाप्रभुने श्रीसाक्षी- गोपालका दर्शन किया। वहाँपर स्वप्नेश्वर नामक एक ब्राह्मणने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया॥100॥ महाप्रभुके भक्तोंको श्रीरायका निमन्त्रण, उपवनमें महाप्रभुका स्थान :— रामानन्द-राय सब-गणे निमन्त्रिल। बाहिर उद्याने आसि' प्रभु वासा कैल॥101॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुके सभी भक्तोंको प्रसाद ग्रहण करनेके लिये निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने मन्दिरके बाहर स्थित उद्यानमें विश्राम करनेका मन बनाया॥101॥ वृक्षके नीचे महाप्रभुका विश्राम करते समय श्रीप्रतापरुद्रको श्रीरायके द्वारा संवाद भेजना :— भिक्षा करि' बकुलतले करिला विश्राम। प्रतापरुद्र-ठानि राय करिल पयान॥102॥ अनुवाद—प्रसाद पानेके बाद महाप्रभु बकुलवृक्षके नीचे विश्राम करने लगे, तभी श्रीरामानन्द महाराज प्रतापरुद्रसे मिलनेके लिये गये॥102॥ राजाका तुरन्त आगमन और महाप्रभुको प्रणाम एवं स्तुति :— शुनि' आनन्दित राजा अतिशीघ्र आइला। प्रभु देखि' दण्डवत् भूमेते पड़िला॥103॥ पुनः उठे, पुनः पड़े प्रणय-विह्वल। स्तुति करे, पुलकाङ्गे पड़े अश्रुजल॥104॥ अनुवाद—महाप्रभुके कटकमें आगमनके विषयमें । 63

[ 16/103-113 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सुनकर महाराज प्रतापरुद्रको बहुत आनन्द हुआ और बहुत शीघ्रतासे वे महाप्रभुके पास पहुँच गये। महाप्रभुको देखकर महाराज प्रतापरुद्रने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। प्रेममें विह्वल होकर राजा प्रतापरुद्र बार-बार उठते और फिर भूमिपर गिर जाते। और जब वे स्तुति करने लगे, तब उनके समस्त अङ्ग पुलकित हो रहे थे तथा उनके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित हो रहे थे॥ 103-104॥ जिससे उनका नाम ही "प्रतापरुद्र-संत्राता" अर्थात् 'राजा प्रतापरुद्रके उद्धारक' हो गया॥ 108 ॥ अनुभाष्य- 'याय' - जिससे, जिसके लिये ॥ 108 ॥ राजाके परिकरोंके द्वारा महाप्रभुकी वन्दना, महाप्रभुके द्वारा राजाको विदायी देना :- राज-पात्रगण कैल प्रभुर वन्दन। राजारे विदाय दिला शचीर नन्दन ॥ 109 ॥ राजाकी शुद्धभक्तिको देखकर महाप्रभुके द्वारा उनका आलिङ्गन :- ताँर भक्ति देखि' प्रभुर तुष्ट हैल मन। उठि' महाप्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन ॥ 105 ॥ पुनः स्तुति करि' राजा करये प्रणाम। प्रभु-कृपा-अश्रुते ताँर देह हैल स्नान ॥ 106 ॥ अनुवाद - राजाके कर्मचारियोंने भी महाप्रभुकी वन्दना की। तब श्रीशचीनन्दनने राजा और उनके कर्मचारियोंको विदायी दी ॥ 109 ॥ अपने राज्यमें राजाके द्वारा घोषणा-पत्रका प्रचार :- बाहिरे आसि' राजा आज्ञा-पत्र लेखाइल। निज-राज्ये यत 'विषयी', ताहारे पाठाइल ॥ 110 ॥ 'ग्रामे-ग्रामे' नूतन आवास करिबा। पाँच-सात गृह सब सामग्र्ये भरिबा ॥ 111 ॥ आपनि प्रभुके लञा ताँहा उत्तरिबा। रात्रि-दिवा वेत्रहस्ते सेवाय रहिबा ॥" 112 ॥ अनुवाद-उनकी भक्तिको देखकर महाप्रभु बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्होंने उठकर राजाका आलिङ्गन किया। राजा पुनः पुनः स्तुति करके महाप्रभुको प्रणाम करने लगे। इस प्रकार महाप्रभुकी कृपा प्राप्तकर राजाके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित होने लगे और उन अश्रुओंसे महाप्रभुकी देह भीग गयी ॥ 105-106 ॥ अनुभाष्य- 'स्नान'- भीग जाना ॥ 106 ॥ अनुवाद - उद्यानसे बाहर आकर राजाने आज्ञा-पत्र लिखवाये और अपने राज्यके सभी कर-संग्रह करनेवाले कर्मचारियोंके पास वे आज्ञा-पत्र भिजवाये। उस आदेश-पत्रमें उन कर्मचारियोंके लिये निर्देश थे कि वे प्रत्येक गाँवमें नये घर बनवायें और पाँच-सात घरोंमें खानेकी सब प्रकारकी सामग्रियाँ भरकर रखें। वे स्वयं महाप्रभुको उन नये घरोंमें ले जाँय तथा उनकी सुरक्षाके लिये रात-दिन हाथमें लाठी धारणकर उनकी सेवामें रहें ॥ 110-112 ॥ श्रीरायके द्वारा राजाको धैर्य प्रदान करना, महाप्रभुकी राजापर अप्राकृत कृपा :- सुस्थ करि, रामानन्द राजारे बसाइला। कायमनोवाक्ये प्रभु ताँरे कृपा कैला ॥ 107 ॥ अनुवाद- श्रीरामानन्दने राजाको धैर्य धारण करवाकर बैठा दिया। महाप्रभुने काय, मन और वचनसे राजापर कृपा की ॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'विषयी'- जो राजकर्मचारी गाँवसे कर संग्रह करता है ॥ 110 ॥ तभीसे महाप्रभुका नाम-'प्रतापरुद्र-संत्राता" :- ऐछे ताँहारे कृपा कैल गौरराय। "प्रतापरुद्र-संत्राता" नाम हैल याय ॥ 108 ॥ अनुवाद - श्रीगौररायने राजापर ऐसी कृपा की, दो महापात्रोंको आदेश :- दुइ महापात्र, – 'हरिचन्दन', 'मङ्गराज' (?)। ताँरे आज्ञा दिल राजा- "करिह सर्व काज ॥ 113 ॥ 64 ।

सोलहवाँ अध्याय 16/113-121 ] एक नव्य-नौका आनि' राखह नदीतीरे। याँहा स्नान करि' प्रभु यान नदी-पारे ॥ 114 ॥ राजाका प्रगाढ़ श्रीगौरप्रेम :- ताँहा स्तम्भ रोपण कर 'महातीर्थ' करि'। नित्य स्नान करिब ताँहा, ताँहा येन मरि ॥ 115 ॥ श्रीरामानन्दको महाप्रभुके निकट जानेका अनुरोध :- चतुद्वारि करह उत्तम नव्य वास। रामानन्द, याह तुमि महाप्रभु-पाश ॥" 116 ॥ अनुवाद— राजा प्रतापरुद्रने श्रीहरिचन्दन तथा श्रीमङ्गराज नामक अपने दो वरिष्ठ कर्मचारियोंको आज्ञा दी,—“मेरे इन (आदेश-पत्रके) आदेशोंका पालन करनेके लिये जो भी उचित हो, वह करना। नदीके तटपर एक नयी नौका तैयार रखना और महाप्रभु जहाँ स्नान करें अथवा नदीके दूसरी पार जाँय, उस स्थानको महातीर्थ जानकर वहाँ उसकी स्मृतिमें एक 'स्तम्भ' स्थापित कर देना। मैं नित्य वहीं स्नान करूँगा और मेरी इच्छा है कि मैं उसी स्थानपर ही प्राण त्याग करूँ। चतुर्द्वार नामक ग्राममें उत्तम नये घरोंका निर्माण करो। हे रामानन्द ! अब आप महाप्रभुके पास चले जाइये ॥ 113-116 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'चतुर्द्वार'—कटकसे महानदी पार करके चतुर्द्वार-ग्राममें जाया जा सकता है; उसीको ही साधारणतः 'चौदार' कहते हैं ॥ 116 ॥ अनुभाष्य— 'मङ्गराज'—'मरदराज' (?)। 'नव्यवास'—रहने योग्य नया घर ॥ 113-116 ॥ सन्ध्यामें स्त्रियोंके द्वारा महाप्रभुके गमनका दर्शन :- सन्ध्याते चलिबे प्रभु,—नृपति शुनिल। हस्ती-उपर ताम्बुगृहे स्त्रीगणे चड़ाइल ॥ 117 ॥ अनुवाद— जब राजा प्रतापरुद्रने सुना कि सन्ध्याके समय महाप्रभु चले जायेंगे, तब तुरन्त उन्होंने कुछ हाथियोंकी पीठके ऊपर तम्बू बँधवा दिये। फिर वे अपने महलकी स्त्रियोंको उन तम्बुओंमें बिठाकर उन्हें महाप्रभुके दर्शनोंके लिये ले गये ॥ 117 ॥ सन्ध्याके समय महाप्रभुकी कटकसे यात्रा :- प्रभुर चलिवार पथे रहे सारि हञा। सन्ध्याते चलिला प्रभु निजगण लञा ॥ 118 ॥ अनुवाद— महाप्रभुके जानेके मार्गपर वे पंक्ति बनाकर खड़ी हो गयीं। सन्ध्याके समय महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ वहाँसे चल पड़े ॥ 118 ॥ महानदीमें स्नान, रानियोंके द्वारा प्रणाम :- 'चित्रोत्पला-नदी' आसि' घाटे कैल स्नान। महिषीसकल देखे करये प्रणाम ॥ 119 ॥ अनुवाद— 'चित्रोत्पला-नदी' पहुँचकर महाप्रभुने घाटपर स्नान किया। सभी रानियों और महलकी स्त्रियोंने महाप्रभुके दर्शन किये और उन्हें प्रणाम किया ॥ 119 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'चित्रोत्पला-नदी'—कटकसे चलते हुए जिस स्थानपर महानदीकी एक शाखा-नदी आती है, उसे 'चित्रोत्पला-नदी' कहते हैं। उत्कलके पण्डितगण किसी तन्त्रमेंसे यह बात बतलाते हैं कि,—'कलौ चित्रोत्पला गङ्गा' अर्थात् कलियुगमें चित्रोत्पला ही गङ्गा है ॥ 119 ॥ महाप्रभुके दर्शनसे सभीमें भावावेश :- प्रभुर दर्शने सबे हैल प्रेममय। 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहे, नेत्रे अश्रु वरिषय ॥ 120 ॥ अनुवाद— महाप्रभुके दर्शनसे सभी रानियाँ और महलकी स्त्रियाँ प्रेममें विह्वल हो गयीं। वे सभी 'कृष्ण', 'कृष्ण' नामका कीर्तन करने लगीं और उनके नेत्रोंसे अश्रुओंकी वर्षा होने लगी ॥ 120 ॥ अद्भुत करुणा-विग्रह :- एमन कृपालु नाहि शुनि त्रिभुवने। कृष्णप्रेमा हय याँर दूर दर्शने ॥ 121 ॥ अनुवाद— महाप्रभु जैसा कृपालु त्रिभुवनमें कोई भी नहीं सुना जाता है। जिनके दूरसे दर्शन करने मात्रसे ही श्रीकृष्णप्रेम उदित हो जाता है ॥ 121 ॥ 65

[ 16/122-131 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नदीको पारकर चतुर्द्वारमें आकर प्रतिदिन पड़िछाओंके द्वारा भेजे गये जगन्नाथके प्रसादका सेवन :- नौकाते चढ़िया प्रभु हैल नदी पार। ज्योत्स्नावती रात्र्ये चलि' आइला चतुर्द्वार ॥ 122 ॥ रात्र्ये तथा रहि' प्राते स्नानकृत्य कैल। हेनकाले जगन्नाथेर महाप्रसाद आइल ॥ 123 ॥ राजार आज्ञाय पड़िछा पाठाय दिने-दिने। बहुत प्रसाद पाठाय दिया बहु-जने ॥ 124 ॥ स्वगण सहिते प्रभु प्रसाद अङ्गीकरि' । उठिया चलिला प्रभु बलि' 'हरि' 'हरि' ॥ 125 ॥ अनुवाद—तब नौकापर चढ़कर महाप्रभुने नदी पार की। चाँदनी रात्रिमें वे चलते हुए चतुर्द्वार नामक गाँवमें आ पहुँचे। रात्रिमें चतुर्द्वारमें रहकर महाप्रभुने प्रातःकाल स्नानकृत्य किया, उसी समय श्रीजगन्नाथका महाप्रसाद आ गया। राजाकी आज्ञासे पड़िछा प्रतिदिन श्रीजगन्नाथजीका इतना अधिक प्रसाद भेजता था कि उस प्रसादको बहुतसे लोग उठाकर लाते थे। अपने भक्तोंके साथ महाप्रभुने प्रसादको ग्रहण किया और 'हरि' 'हरि' बोलते हुए वे उठकर चल दिये ॥ 122-125 ॥ साथमें तीन राजकर्मचारियोंमें श्रीराय प्रमुख :- रामानन्द, मङ्गराज (?), श्रीहरिचन्दन। सङ्गे सेवा करि' चले एइ तिन जन ॥ 126 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय, श्रीमङ्गराज तथा श्रीहरिचन्दन—ये तीनों महाप्रभुकी सेवा करते हुए सदा उनके साथ चल रहे थे ॥ 126 ॥ महाप्रभुकी वृन्दावन-यात्राके प्रधान सङ्गी :- प्रभुसङ्गे पुरी-गोसाञि, स्वरूप-दामोदर। जगदानन्द, मुकुन्द, गोविन्द, काशीश्वर ॥ 127 ॥ हरिदास ठाकुर आर पण्डित-वक्रेश्वर। गोपीनाथाचार्य, आर पण्डित-दामोदर ॥ 128 ॥ रामाइ, नन्दाइ आर बहु भक्तगण। प्रधान कहिलुँ, सबार के करे गणन ॥ 129 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके साथ श्रीपरमानन्द पुरी गोसाईं, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीमुकुन्द, श्रीगोविन्द, श्रीकाशीश्वर, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीगोपीनाथाचार्य, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीरामाइ, श्रीनन्दाइ तथा अन्य और भी अनेक भक्त थे। मैंने प्रधान भक्तोंके नामोंका उल्लेख किया है। सभी भक्तोंकी कौन गणना कर सकता है? ॥ 127-129 ॥ आधे क्षणके लिये भी महाप्रभुके विच्छेदमें कातर श्रीगदाधरका अतुलनीय श्रीगौरप्रेम :- गदाधर-पण्डित तब सङ्गेते चलिला। 'क्षेत्र-संन्यास ना छाड़िह'—प्रभु निषेधिला ॥ 130 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित भी तब महाप्रभुके साथ चलने लगे, परन्तु 'क्षेत्र-संन्यासको मत छोड़ना'—ऐसा कहकर महाप्रभुने उन्हें साथ चलनेके लिये मना किया ॥ 130 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'क्षेत्र-संन्यास'—जो अपने पूर्व गृहका त्याग करके किसी विशेष (विष्णु) तीर्थमें अर्थात् पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें या नवद्वीप-धाममें या मथुरादि-मण्डलमें अकेले अथवा सपरिवार परमार्थ-बुद्धिके सहित वास करते हैं, उनके आश्रमको 'क्षेत्र-संन्यास' कहते हैं। यही आश्रम ही कलिकालका उपयुक्त 'वानप्रस्थ-धर्म' है। सार्वभौम-भट्टाचार्यका भी ऐसा ही 'क्षेत्र-संन्यास' कहा गया है ॥ 130 ॥ महाप्रभुके सङ्गके लोभसे धामवासरूपी क्षेत्रसंन्यासके त्यागमें भी पण्डित अविचलित :- पण्डित कहे,—"याँहा तुमि, सेइ नीलाचल। क्षेत्र-संन्यास मोर याउक रसातल ॥" 131 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितने कहा,—"आप जहाँपर हैं, वही नीलाचल है। मेरा ऐसा क्षेत्र-संन्यास रसातलमें चला जाय ॥" 131 ॥ 66

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सोलहवाँ अध्याय 16/132-138 ] महाप्रभु-सङ्गके लोभसे सेवा-परित्याग और सेवाकी प्रतिज्ञाके उल्लङ्घनमें भी पण्डित अविचलित :— प्रभु कहे,—“इँहा कर गोपीनाथ-सेवन।” पण्डित कहे,—“कोटि-सेवा त्वत्पाद-दर्शन॥” 132॥ अनुवाद— महाप्रभुने कहा,—“यहाँ नीलाचलमें रहकर श्रीगोपीनाथकी सेवा करो।” श्रीगदाधर पण्डितने कहा,—“आपके चरणोंके दर्शनमात्रसे ही श्रीगोपीनाथकी करोड़ गुणा अधिक सेवा हो जाती है॥” 132॥ अपने भावी-कलङ्ककी आशङ्काको दिखलाकर महाप्रभुका पुरीसे ही पण्डितको उनके पीछे अनुसरण करने हेतु निषेध :— प्रभु कहे,—“सेवा छाड़िबे, आमाय लागे दोष। इँहा रहिं सेवा कर,—आमार सन्तोष॥” 133॥ अनुवाद— महाप्रभुने कहा,—“यदि तुम सेवा छोड़ोगे, तो दोष मुझे लगेगा। इसलिये यहींपर रहकर सेवा करो, इसीमें मुझे सन्तुष्टि होगी॥” 133॥ श्रीगदाधरका अभिमान :— पण्डित कहे,—“सब दोष आमार उपर। तोमा-सङ्गे ना याइब, याइब एकेश्वर॥ 134॥ ‘आइ’के देखिते याइब, ना याइब तोमा लागि’। ‘प्रतिज्ञा’-‘सेवा’-त्याग-दोष, तार आमि भागी॥” 135॥ अनुवाद— श्रीगदाधर पण्डितने कहा,—“सारा दोष मुझपर लगेगा। मैं आपके साथ नहीं जाऊँगा, किन्तु मैं अकेला ही जाऊँगा। मैं ‘आइ’ (शचीमाताके) दर्शनोंके लिये जाऊँगा, आपसे मिलनेके लिये नहीं जाऊँगा। इसलिये ‘क्षेत्र-संन्यासकी प्रतिज्ञा’ तथा ‘श्रीगोपीनाथकी सेवा’को त्यागनेके दोषका मैं ही उत्तरदायी होऊँगा॥” 134-135॥ अमृतप्रवाह भाष्य— श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीने श्रीगोपीनाथकी सेवा प्राप्त करके उस सेवामें ही जीवन व्यतीत करनेकी प्रतिज्ञा की थी। महाप्रभुके साथ गौड़देशमें जानेपर उस ‘प्रतिज्ञा-भङ्ग-दोष’ और ‘सेवा-त्याग-दोष’—ये दो दोष होते हैं। अनुराग-मार्गमें इन सब दोषोंको महात्मागण स्वीकार करते हैं॥ 135॥ अनुभाष्य— ‘एकेश्वर’—आज भी चट्टग्राम-क्षेत्रमें ‘अकेले’के अर्थमें ‘एकेश्वर’ शब्दका अपभ्रंश ‘अश्वर’ प्रचलित है। जीवनमें सर्वार्थ सिद्धि प्रदान करनेवाले श्रीगोपीनाथके विग्रहकी सेवारूपी प्रतिज्ञाको विफल करके श्रीगदाधर पण्डित श्रीगौराङ्गका सङ्ग प्राप्त करनेके लिये भगवद्- सेवाको भी बिना प्रयासके ही आसानीसे छोड़ देनेके लिये तैयार हुए। श्रीगदाधरकी श्रीगौराङ्गप्रीतिको उनके ही समान मर्मी, अन्तरङ्ग बान्धवके अतिरिक्त और कोई नहीं समझ सकता॥ 134॥ पुरीसे कटक आकर महाप्रभुके द्वारा पण्डितको निकट बुलाना :— एत बलि’ पण्डित-गोसाञि पृथक् चलिला। कटक आसि’ प्रभु ताँरे सङ्गे आनाइला॥ 136॥ अनुवाद— यह कहकर श्रीगदाधर-पण्डित गोसाईं महाप्रभुसे अलग चलने लगे। कटकमें पहुँचकर महाप्रभुने उन्हें अपने पास आनेके लिये बुलवा भेजा॥ 136॥ श्रीगदाधरकी केवला-श्रीगौरप्रीति ऐश्वर्यसे मुग्ध व्यक्तियोंकी समझसे परे :— पण्डितेर गौराङ्गप्रेम बुझन ना याय। ‘प्रतिज्ञा’, ‘श्रीकृष्णसेवा’ छाड़िल तृणप्राय॥ 137॥ अनुवाद— श्रीगदाधर पण्डितके श्रीगौराङ्गप्रेमको समझा नहीं जा सकता, उन्होंने अपनी क्षेत्र-संन्यासकी ‘प्रतिज्ञा’ और ‘श्रीगोपीनाथसेवा’को तृणकी भाँति त्याग कर दिया था॥ 137॥ महाप्रभुके भीतर सन्तोष होनेपर भी बाहरसे कृत्रिम-कोप-उक्ति :— ताँहार चरित्रे प्रभु अन्तरे सन्तोष। ताँहार हाते धरि’ कहे करि’ प्रणय-रोष॥ 138॥ । 67