श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
चौबीसवाँ अध्याय 24/27-37 ] [बायाँ स्तम्भ] और मुक्ति—इन तीन प्रकारकी होती हैं। पहली है भुक्ति जो अनन्त प्रकारकी है। सांसारिक भोगोंको ही भुक्ति कहते हैं। सिद्धि—ये अठारह प्रकारकी और मुक्ति—पाँच प्रकारकी होती है॥ 27-28॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'सिद्धि'—अणिमादि अठारह प्रकारकी सिद्धियाँ (भा: 11/15 अध्याय देखें)॥ 28॥ 'अहैतुकी'-शब्दका अर्थ :— एइ याँहा नाहि, सेइ भक्ति—'अहैतुकी'। याहा हैते वश हय श्रीकृष्ण कौतुकी॥ 29॥ अनुवाद—भुक्ति, सिद्धि और मुक्ति—इन तीनोंकी कामना जहाँपर नहीं है, उस भक्तिको 'अहैतुकी' कहते हैं, जिसके द्वारा लीलामय श्रीकृष्ण वशीभूत हो जाते हैं॥ 29॥ (7) 'भक्ति'-शब्दका अर्थ; दस प्रकारके भेद :— 'भक्ति'-शब्देर अर्थ हय दशविधाकार। एक—'साधन', 'प्रेमभक्ति'—नव प्रकार॥ 30॥ 'रति'-लक्षणा, 'प्रेम'-लक्षणा, इत्यादि प्रचार। भावरूपा, महाभाव-लक्षणरूपा आर॥ 31॥ अनुवाद—'भक्ति'-शब्दका अर्थ दस प्रकारका होता है। साधनभक्ति एक प्रकारकी और प्रेमभक्ति नौ प्रकारकी होती है। नौ प्रकारकी प्रेमभक्ति 'रति'-लक्षणासे आरम्भ करके 'प्रेम'-लक्षणा आदिसे बढ़ती हुई भावरूपा और महाभाव-लक्षणरूपा भक्ति तक बढ़ती है॥ 30-31॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमभक्ति—नव प्रकार'—रति, प्रेम, स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव—ये नौ प्रकारकी प्रेमभक्ति है॥ 30॥ अनुभाष्य—साधन भक्तिका एक प्रकारका लक्षण और प्रेम-भक्तिके नौ प्रकारके लक्षण हैं, जैसे रति (भावभक्ति)-लक्षणा, प्रेम-लक्षणा, स्नेह-लक्षणा, मान- लक्षणा, प्रणय-लक्षणा, राग-लक्षणा, अनुराग-लक्षणा, भाव-लक्षणा और महाभाव-लक्षणा॥ 30-31॥ [दायाँ स्तम्भ] शान्त और दास्यरसमें भक्तिकी सीमा :— शान्त-भक्तेर रति बाड़े 'प्रेम' पर्यन्त। दास्य-भक्तेर रति हय 'राग'दशा-अन्त॥ 32॥ सख्य और वात्सल्य-रसमें भक्तिकी सीमा :— सखागणेर रति हय 'अनुराग' पर्यन्त। पितृ-मातृ-स्नेह आदि 'अनुराग'-अन्त॥ 33॥ मधुररसमें भक्तिकी सीमा :— कान्तागणेर रति पाय 'महाभाव'-सीमा। 'भक्ति'-शब्दे कहिलूँ एइ अर्थेर महिमा॥ 34॥ अनुवाद—शान्तरसके भक्तोंकी रति 'प्रेम' तक ही बढ़ती है। दास्यरसके भक्तोंकी रति 'राग'-दशा तक बढ़ती है। सखाओंकी रति 'अनुराग' तक बढ़ती है। पिता-माताका स्नेहादि 'अनुराग'की अन्तिम सीमा तक बढ़ता है। व्रजगोपियोंकी रति 'महाभाव' तक बढ़ती है। ये कुछ 'भक्ति'-शब्दके महिमामय अर्थ हैं॥ 32-34॥ (8) 'इत्थम्भूतगुण' (इत्थम्भूत + गुण) शब्दके अर्थकी व्याख्या :— 'इत्थम्भूतगुणः'-शब्देर शुनह व्याख्यान। 'इत्थम्भूत'-शब्देर भिन्न अर्थ, 'गुण'-शब्देर आन॥ 35॥ 'इत्थम्भूत'-शब्दका अर्थ :— 'इत्थम्भूत'-शब्देर अर्थ—पूर्णानन्दमय। याँर आगे ब्रह्मानन्द तृणप्राय हय॥ 36॥ अनुवाद—अब 'इत्थम्भूतगुणः' शब्दकी व्याख्या श्रवण करो। इसमेंसे 'इत्थम्भूत'-शब्दके अर्थ 'गुण'-शब्दके अर्थसे भिन्न हैं। 'इत्थम्भूत'-शब्दका अर्थ पूर्णानन्दमय है, जिसके आगे ब्रह्मानन्द तृणकी भाँति प्रतीत होता है॥ 35-36॥ हरिभक्तिसुधोदय (14/36)में— त्वत्साक्षात्कारणाह्लादविशुद्धाब्धिस्थितस्य मे। सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यपि जगद्गुरो॥ 37॥ अनुवाद—हे जगद्गुरो! मैं आपके स्वरूपका साक्षात्कार । 413
[ 24/37-45 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
पाकर आनन्दरूप विशुद्धसमुद्रमें अवस्थान कर रहा हूँ और अन्य सभी सुख मुझे गोष्पदके समान लग रहे हैं। ब्रह्ममें लीन होनेपर जीवको जो सुख मिलता है, वह भी गोष्पदके समान है। गोष्पद अर्थात् गायके खुरसे जो गड़्ढा बनता है, उसमें जितना जल आ सकता है, वह समुद्रकी तुलनामें अत्यन्त क्षुद्र है॥ ३७॥ अनुभाष्य-आदिलीला 7/98 संख्या देखें॥ ३७॥ अपने रूपमाधुर्यके द्वारा सभीको बलपूर्वक वशमें करनेवाले :- सर्वार्कषक, सर्वाह्वादक, महारसायन। आपनार बले करे सर्वविस्मरण॥ ३८॥ अनुवाद-पूर्णानन्दमय भगवान् सभीको आकर्षित करनेवाले, सभीको आनन्दित करनेवाले, महारसायन अर्थात् समस्त चिन्मय रसोंके आश्रय हैं। वे अपने बलसे सबके अन्य सभी सुखोंको भुला देनेवाले हैं॥ ३८॥ श्रीकृष्णकृपाके प्रभावसे कैतव-नाश :- भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-सुख छाड़य यार गन्धे। अलौकिक शक्ति-गुणे श्रीकृष्णकृपाय बान्धे॥ ३९॥ शास्त्रयुक्ति नाहि इँहा सिद्धान्त-विचार। एड स्वभाव-गुणे, याते माधुर्येर सार॥ ४०॥ अनुवाद-शुद्धभक्तिकी गन्धमात्रके प्रभावसे भुक्ति, मुक्ति और सिद्धिके सुखोंकी वासना दूर हो जाती है। शुद्धभक्त श्रीकृष्णकी अलौकिक शक्ति, गुणों और कृपासे बँध जाते हैं। शुद्धभक्तको शास्त्रयुक्ति और सिद्धान्तके विचारकी अपेक्षा नहीं होती, क्योंकि श्रीकृष्णका स्वाभाविक गुण ही माधुर्यका सार है॥ ३९-४०॥ 'गुण' शब्दके अर्थ; श्रीकृष्णके अनन्तगुणोंका अतुलनीय अमोघ प्रभाव :- 'गुण'-शब्देर अर्थ-कृष्णेर गुण अनन्त। सच्चिद्रूप-गुण सर्व-पूर्णानन्द॥ ४१॥ ऐश्वर्य-माधुर्य-कारुण्ये स्वरूप-पूर्णता। भक्तवात्सल्य, आत्मा पर्यन्त वदान्यता॥ ४२॥ अनुवाद-'गुण'-शब्दका तात्पर्य श्रीकृष्णके अनन्त गुणोंसे है। श्रीकृष्णके गुण नित्य और चिन्मय हैं और सभी गुण पूर्णानन्द-स्वरूप हैं। श्रीकृष्णके ऐश्वर्य, माधुर्य, कारुण्यादि चिन्मय गुण स्वरूपतः पूर्ण हैं। श्रीकृष्णका भक्त-वात्सल्य ऐसा है कि वे स्वयं तकको भी भक्तको दान करनेवाले दयालु हैं॥ ४१-४२॥ एक-एक गुण एक-एक विशेष भक्तको वशीभूत करनेवाला :- अलौकिक रूप, रस, सौरभादि गुण। कारो मन कोन गुणे करे आकर्षण॥ ४३॥ चरणकमलोंकी सुगन्धसे चतुःसनको और लीला-माधुर्यसे शुकदेवको आकर्षित करना :- सनकादिर मन हरिल सौरभादि गुणे। शुकदेवेर मन हरिल लीला-श्रवणे॥ ४४॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण अपने अलौकिक रूप, रस, सुगन्धादि गुणोंसे भक्तोंके मनको आकर्षित करते हैं। वे भक्त भिन्न-भिन्न रसोंमें स्थित होते हैं, इसलिये श्रीकृष्ण सर्वाकर्षक हैं। श्रीकृष्णने अपने श्रीचरणोंमें अर्पित तुलसीकी सुगन्धसे चतुःसनके (सनक, सनन्दन, सनातन ओर सनत्के) मनका हरण किया था। अपनी लीलाका श्रवण कराके उन्होंने शुकदेव गोस्वामीके मनका हरण किया था॥ ४३-४४॥ श्रीमद्भागवत (3/15/43)में- तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः॥ ४५॥ अनुवाद-उन कमल-नेत्र-भगवान्के पदकमलोंकी पराग-मिश्रित तुलसीकी मधुरगन्धयुक्त वायुने सनकादि
414 ।
चौबीसवाँ अध्याय 24/45-49 ] चार कुमारोंकी नासिकाके छिद्रके माध्यमसे अन्दर जाकर निर्विशेष-ब्रह्मपरायण उनके चित्त और देहमें क्षोभ उत्पन्न कर दिया था॥45॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 17/142 संख्या देखें॥45॥ श्रीमद्भागवत (2/1/9)में— परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्ये उत्तमःश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान्॥ 46॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 46॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे राजर्षे! निर्गुण ब्रह्ममें प्रतिष्ठित होनेपर भी श्रीकृष्णलीलाके प्रति आकर्षित होकर मैंने श्रीमद्भागवतका पाठ किया था॥46॥ अनुभाष्य—'मुमूर्षु (मरणासन्न) व्यक्तिके लिये क्या करना उचित है?' परीक्षितके इस प्रश्नका आदर करते हुए श्रील शुकदेव श्रीहरिकीर्तन और हरिकथा कीर्तनमय श्रीमद्भागवतके माहात्म्यका वर्णन करके श्रीहरिके गुणोंके प्रभावका वर्णन कर रहे हैं— हे राजर्षे, नैर्गुण्ये (निर्गुणे ब्रह्मणि) परिनिष्ठितः (स्थितधीः) अपि [अहं वैयासकिः] उत्तमःश्लोकलीलया (कृष्णमाधुर्य्येण) गृहीतचेताः (आकृष्टचित्तः सन्) यत् आख्यानं (भागवताख्यम्) अधीतवान्, [तदहं तेऽभिधास्यामीति परेणान्वयः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें, [इसका अगले श्लोकके 'तदहं तेऽभिधास्यामि'के साथ अन्वय करें।]॥ 46॥ अङ्गमाधुर्यके द्वारा गोपियोंका और रूप-गुण-माधुर्यसे रुक्मिणीके मनका हरण :— श्रीअङ्ग-रूपे हरे गोपिकार मन। रूप-गुण-श्रवणे रुक्मण्यादिर आकर्षण॥ 47॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण अपने अङ्गोंके रूप-सौन्दर्यसे गोपियोंके मनको हरण करते हैं। श्रीकृष्णके रूप और गुणोंके विषयमें सुनकर रुक्मिणी आदि द्वारकाकी महिषियोंका मन उनके प्रति आकर्षित हो गया॥ 47॥ श्रीकृष्णके अङ्ग, मुख और हास्यके माधुर्यसे मुग्ध गोपियोंके द्वारा आत्मनिवेदन :— श्रीमद्भागवत (10/29/39)में— वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्री गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम्। दत्ताभयञ्च भुजदण्डयुगं विलोक्य वक्षः श्रियैकरमणंञ्च भवाम दास्यः॥ 48॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 48॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे कृष्ण! आपका अलकाओंसे आवृत मुख, कपोलोंपर कुण्डलोंकी शोभा, अमृतयुक्त अधरपर मन्द हास्यके साथमें देखना, अभय प्रदान करनेवाली दो भुजाएँ और एकमात्र श्रीके द्वारा शोभित वक्षको देखकर ही हम आपकी दासी बनी हैं॥ 48॥ अनुभाष्य—पूर्णिमाकी चाँदनीमें स्नान की हुई शारदीय रात्रिमें श्रीकृष्णकी वंशी-ध्वनिसे पूर्ण आकृष्ट होकर गोपवधुएँ मोहित होकर श्रीकृष्णके समीप उपस्थित हुई, श्रीकृष्णने उनके अनुरागको और भी अधिक वर्धित करनेके लिये उन्हें घर लौट जानेके लिये कहा, तब अपने प्राणोंको श्रीकृष्णमें समर्पित कर देनेवाली गोपियाँ दुःखित होकर रुद्धकण्ठसे गद्गद वचनोंसे श्रीकृष्णसे कह रही हैं,— [हे पुरुषभूषण,] तव अलकावृतमुखं (केशदामैः आवृतमुखं) कुण्डलश्रीमण्डस्थलाधरसुधं (कुण्डलयोः श्रीर्ययो ते गण्डस्थले यस्मिन् अधरे सुधा यस्मिन् तच्च मुखं) हसितावलोकं (हसितेन सह अवलोकं यस्मिन् तच्च मुखं) वीक्ष्य (दृष्ट्वा) दत्ताभयं (दत्तम् अभयं येन तत्) भुजदण्डयुगं (बाहुद्वयं) श्रियैकरमणं (श्रियाः लक्ष्मयाः एकं मुख्यं एव रमणं रतिजनकं तत्) वक्षः च विलोक्य वयं दास्यः एव भवाम। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 48॥ श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट रुक्मिणीका आत्मनिवेदन :— श्रीमद्भागवत (10/52/37)में— श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां ते निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम्। रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे॥ 49॥ । 415
[ 24/49-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥49॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे भुवनसुन्दर! तुम्हारे गुणसमूह श्रवण करनेवाले व्यक्तियोंके कानोंके छिद्रोंमें प्रविष्ट होकर उनके अङ्गोंके तापका नाश करते हैं। नेत्रधारी व्यक्तिको तुम्हारे रूपके दर्शनसे समस्त पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है। हे अच्युत, तुम्हारे उन्हीं समस्त गुणोंको श्रवण करके मेरा चित्त निर्लज्ज होकर आपमें प्रवेश कर रहा है॥49॥ अनुभाष्य-परीक्षितके प्रश्नके उत्तरमें श्रीशुक भगवान् श्रीकृष्ण और भीष्मक-कन्या महालक्ष्मी-स्वरूपिणी श्रीमती रुक्मिणीके परिणयके वृत्तान्तका वर्णन कर रहे हैं। लोगोंके मुखसे श्रीकृष्णके सद्गुणोंका श्रवण करके मन-ही-मनमें उन्हें अपने पतिरूपमें वरण करनेपर भी श्रीकृष्णद्वेषी ज्येष्ठ भ्राता रुक्मी चेदि-नरेश शिशुपालको उनका वर बनाना चाहता है, ऐसा सुनकर रुक्मिणीने निर्जनमें एक प्रेमपत्र लिखकर उसे एक विश्वसनीय ब्राह्मणको देकर तुरन्त श्रीकृष्णके पास भेजा। ब्राह्मणके द्वारकामें उपस्थित होनेपर श्रीकृष्णने उनका यथाविधि सत्कार किया। उसके बाद श्रीकृष्णसे अनुमति लेकर वे ब्राह्मण रुक्मिणीके उस प्रेमपत्रको पढ़ने लगे- हे अच्युत, हे भुवनसुन्दर, शृण्वतां (श्रोतृवर्गाणां) कर्णविवरैः (अन्तः प्रविश्य) अङ्गतपं हरतः ते (तव) गुणान्, दृशिमतां (चक्षुष्मतां) दृशां (चक्षुषाम्) अखिलार्थलाभं (सर्वसारार्थप्रदं) रूपं च श्रुत्वा मे (मम) चित्तम् अपत्रपं (अपगता त्रपा यस्मात् तत्, लज्जाविहीनं सत्) त्वयि आविशति (आसज्जते, अनुसन्धान-राहित्येन मग्नं भवति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥49॥ वंशीगानसे श्रीनारायणी लक्ष्मीको और वेणु और विग्रहके माधुर्यसे समस्त कान्ताओंको आकर्षित करना :- वंशी-गीते हरे कृष्ण लक्ष्म्यादिर मन। योग्यभावे जगतेर यत युवतीर गण॥50॥ अनुवाद-अपनी वंशीके गानसे श्रीकृष्ण लक्ष्मी आदिके मनको हरण करते हैं। श्रीकृष्ण न केवल गोपियों और लक्ष्मियोंके चित्तको हरण करते हैं, अपितु त्रिभुवनकी समस्त कान्ताओंको आकर्षित करते हैं॥50॥ श्रीमद्भागवत (10/16/36)में- कस्यान्नुभावोऽस्य न देव विद्महे तवाङ्घ्रिरेणुस्पर्शवाधिकारः। यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाऽचरत्तपो विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता॥51॥ अनुवाद-हे देव! जिनकी चरणरजको प्राप्त करनेकी वासनासे लक्ष्मीने बहुत समय तक समस्त प्रकारके विषय-भोगोंका परित्याग करके दृढ़व्रत धारण करके तपस्या की थी, उस चरणरजको इस कालिय-नागने किस सुकृतिके द्वारा लाभ करनेका अधिकार प्राप्त किया, उसे हम नहीं जानतीं॥51॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/146 संख्या देखें॥51॥ श्रीमद्भागवत (10/29/40)- का स्त्र्यङ्ग ते कलपदामृतवेणुगीत- सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत् त्रिलोक्याम्। त्रैलोक्यसौभगमिदञ्च निरीक्ष्य रूपं यद्गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन्॥52॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥52॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे कृष्ण! तुम्हारे अमृतमय वेणुगीतके द्वारा सम्मोहित होकर त्रिभुवनमें कौन-सी स्त्री आर्यचरितसे (धर्मसे) विचलित नहीं होती? त्रिभुवनके सौभाग्य-स्वरूप तुम्हारे इस रूपको देखकर समस्त गैयाएँ, पक्षी, वृक्ष और हिरण भी पुलक-धारण किया करते हैं॥52॥ अनुभाष्य-चाँदनीसे आप्लावित शारदीय-रात्रिमें श्रीकृष्णकी मुरलीकी ध्वनिसे आकृष्ट गोपियोंके मोहित होकर श्रीकृष्णके निकट उपस्थित होनेपर श्रीकृष्णने उनके अनुरागको और भी वर्धित करनेके अभिप्रायसे उन्हें अपने-अपने घर लौट जानेके लिये कहा, तब 416 ।
चौबीसवाँ अध्याय 24/52-57 ] श्रीकृष्णमें समर्पित चित्तवाली गोपियाँ दुःखित होकर रुद्धकण्ठसे गद्गद वाक्योंसे श्रीकृष्णसे कह रही हैं,— हे अङ्ग (कृष्ण), त्रिलोक्यां (त्रिभुवनमध्ये) का सा स्त्री (नारी गोपीत्यर्थः),—या ते (तव) कलपदामृतवेणुगीत-सम्मोहिता (कलानि मधुराणि पदानि यस्मिन् तत् च अमृतं तन्मयम् एव वेणुगीतं तेन, कलपदायतमूर्च्छितेनेति पाठे—कलानि पदानि यस्मिन् तत् आयतं दीर्घं मूर्च्छितं स्वरालापभेदः तेन सम्मोहिता आकृष्टहृदया सती) त्रैलोक्यसौभगं (त्रैलोक्यस्य ऊर्ध्वाधोमध्यवर्त्तमानस्र्य यावल्लोकस्य सौभगं मनोहरं तव सुन्दरम्) इदं रूपञ्च—यत् गोद्विज-द्रुममृगाः (सर्वे स्थावर-जङ्गमजीवाः) पुलकानि अविभ्रन् (अविभरुः), तत्—निरीक्ष्य (दृष्ट्वा) आर्य्यचरितात् (निज-निजविधिधर्मात्) न चलेत् (भ्रश्येत्)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। ‘कलपदामृत’—इस पाठके स्थानपर ‘कलपदायत’ पाठ भी देखा जाता है। हे प्रिय श्रीकृष्ण ! इन तीनों लोकोंमें ऐसी कौन-सी स्त्री है जो तुम्हारी कलपद और आयत अर्थात् मधुर वंशीध्वनिको सुनकर मोहित न हो जाय? इस अर्थमें कलपदायत। आयत अर्थात् दीर्घमूर्च्छना (स्वरालापका भेद) ॥ 52 ॥ वात्सल्यरसमें मातृगणको और सख्य-दास्यादि-रसमें पुरुषरूपी सखाओं और दासोंको आकर्षित करना :- गुरुतुल्य स्त्रीगणेरे वात्सल्ये आकर्षण। दास्य-सख्यादि-भावे पुरुषादि गण ॥ 53 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण मातृ-तुल्य स्त्रियोंको वात्सल्यके द्वारा आकर्षित करते हैं और दास्य-सख्यादि-भावसे पुरुषोंको आकर्षित करते हैं ॥ 53 ॥ शान्तरसमें धाममें स्थित समस्त स्थावर-जङ्गमको आकर्षित करना :- पक्षी, मृग, वृक्ष, लता, चेतनाचेतन। प्रेमे मत्त करि’ आकर्षये कृष्णगुण ॥ 54 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके गुण पक्षियों, हिरणों, वृक्षों, लताओं और चेतन-अचेतन सभी जीवोंको प्रेममें मत्त करके आकर्षित कर लेते हैं ॥ 54 ॥ (9) 'हरि'-शब्दके अर्थ; दो प्रकारका हरण— (क) गौण और (ख) मुख्य लक्षण :— ‘हरि:’-शब्दे नानार्थ, दुइ मुख्यतम। सर्व अमङ्गल हरे, प्रेम दिया हरे मन ॥ 55 ॥ अनुवाद—यद्यपि 'हरि'-शब्दके अनेक अर्थ हैं, तथापि उनमेंसे दो मुख्यतम हैं—(1) जो सभीके अमङ्गलका हरण करनेवाले हैं और (2) जो प्रेम-प्रदान करके मनका हरण करनेवाले हैं ॥ 55 ॥ (1) जीवके आवरण-रूपी अनर्थको हरनेका गुण— (क) समस्त प्रकारके तापोंका विनाश :— यैछे तैछे योहि कोहि करये स्मरण। चारिविध ताप तार करे संहरण ॥ 56 ॥ अनुवाद—जिस किसी प्रकारसे जो कोई भी श्रीहरिका स्मरण करता है, श्रीहरि उसके चार प्रकारके तापोंको सम्पूर्ण रूपसे हरण कर लेते हैं ॥ 56 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘चारिविध ताप’—चार प्रकारके पातकोंके (पापोंके) ताप—(1) पातक (पाप), (2) उरुपातक (बहुत बड़ा पाप), (3) महापातक (उरुपातकसे भी बड़ा पाप), (4) अतिपातक (सबसे बड़ा पाप) ॥ 56 ॥ श्रीकृष्णभक्ति—पाप, पापबीज और अविद्या, इन तीन प्रकारके क्लेशोंका अन्त करनेवाली :— श्रीमद्भागवत (11/14/19) में— यथाग्निः सुसमृद्धार्च्चिः करोत्येधांसि भस्मसात्। तथा मद्विषया भक्तिरुद्धवैनांसि कृत्स्नशः ॥ 57 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 57 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे उद्धव ! प्रज्ज्वलित अग्नि जैसे लकड़ीके ढेरको जलाकर भस्म बना देती है, वैसे ही मेरी भक्ति भी जीवोंके सब प्रकारके [प्रारब्ध- अप्रारब्ध] पापोंको सम्पूर्णरूपसे नष्ट कर देती है ॥ 57 ॥ अनुभाष्य—सब प्रकारके कल्याणके साधनोंमें श्रेष्ठ भक्तियोगके सम्बन्धमें और भी अधिक जाननेकी इच्छा । 417
[ 24/57–64 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करनेपर भगवान् श्रीउद्धवसे कह रहे हैं, - हे उद्धव, यथा सुसमृद्धाचिः (सुसमृद्धा अर्चिः यस्य सः) अग्निः एधांसि (काष्ठानि) भस्मसात् करोति (विनाशयति), तथा मद्विषया भक्तिः कृत्स्नशः (सर्वाणि) एनांसि (पापानि-प्रारब्धाप्रारब्धानि च विधुनोति)। श्लोक-भावानुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 57 ॥ (ख) अज्ञान और अविद्याका विनाश; तब श्रीकृष्णकी प्रसन्नताकी कामनासे श्रवण-कीर्तनादि शुद्ध-चित्तमें स्वयं प्रकाशित नित्यसिद्ध श्रीकृष्णप्रेमका उदय :- तबे करे भक्तिबाधक कर्म-अविद्या-नाश। श्रवणाद्येर फल 'प्रेमा' करये प्रकाश ॥ 58 ॥ अनुवाद - तब श्रीकृष्ण भक्तिमें बाधा देनेवाले कर्मों और अविद्याका नाश करते हैं तथा श्रवणादिके फल 'प्रेम' को प्रकाशित कर देते हैं ॥ 58 ॥ (2) अनावृत शुद्ध जीवके स्वरूपको प्रेमसे आकर्षण :- निज-गुणे तबे हरे देहेन्द्रिय मन। ऐछे कृपालु कृष्ण, ऐछे ताँर गुण ॥ 59 ॥ अनुवाद - तब श्रीकृष्ण अपने गुणोंके द्वारा भक्तके देह, इन्द्रियों और मनका हरण कर लेते हैं। श्रीकृष्ण ऐसे कृपामय हैं, ऐसे उनके अद्भुत गुण हैं ॥ 59 ॥ हरि अथवा हरिप्रेम चतुर्वर्ग-धिक्कारी और सभीके चित्तको हरण करनेवाला :- चारि पुरुषार्थ छाड़ाय, हरे सबार मन। 'हरि'-शब्देर एइ मुख्य कहिलुँ लक्षण ॥ 60 ॥ अनुवाद - श्रीकृष्ण धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी चारों पुरुषार्थोंको छुड़ाकर सबके मनका हरण करते हैं। इस प्रकार मैंने तुम्हें 'हरि'-शब्दके मुख्य लक्षणको बतलाया ॥ 60 ॥ अनुभाष्य - भगवान् श्रीहरि जीवोंके धर्म, अर्थ, काम और मोक्षात्मक चार पुरुषार्थोंको प्राप्त करनेकी पिपासाको छुड़ा देते हैं और सभीके मनका हरण करके अपने प्रेमके प्रति आकृष्ट करते हैं ॥ 60 ॥ (10) च-शब्द और (11) अपि-शब्दके अर्थ :- 'अपि' 'च', दुइ शब्द ताते 'अव्यय' हय। येइ अर्थ लागाइये, सेइ अर्थ हय ॥ 61 ॥ च-शब्दके सात और अपि-शब्दके सात अर्थ :- तथापि च-कारेरे कहे मुख्य अर्थ सात। अपि-शब्दे मुख्य अर्थ सात विख्यात ॥ 62 ॥ अनुवाद - 'च' और 'अपि'-इस श्लोकमें ये दो शब्द 'अव्यय' हैं। यद्यपि इन दोनोंके द्वारा श्लोकका जो जैसा अर्थ करना चाहता है, श्लोकका वैसा अर्थ हो जाता है। तथापि च-कार (शब्द) के सात मुख्य अर्थ हैं और 'अपि'-शब्दके भी सात प्रसिद्ध मुख्य अर्थ हैं ॥ 61-62 ॥ च-शब्दका प्रयोगस्थल; प्रमाण :- विश्वप्रकाशमें- चान्वाचये समाहारेऽन्योऽन्यार्थे च समुच्चये। यत्नान्तरे तथा पादपूरणेऽप्यवधारणे ॥ 63 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - अन्वाचयमें अर्थात् अनुगम्य-समूहके (पीछे चलनेवालेके) अर्थमें, समाहारमें (समूहमें), अन्य-अन्य अर्थमें, समुच्चयमें (सामूहिकमें), यत्नान्तरमें (दूसरे यत्नमें), पादपूर्णमें (श्लोकको पूर्ण करनेमें) और अवधारणमें अर्थात् निश्चयके अर्थमें 'च'-शब्दका प्रयोग होता है ॥ 63 ॥ अपि-शब्दका प्रयोगस्थल, प्रमाण :- विश्वप्रकाशमें- अपि सम्भावना-प्रश्न-शङ्का-गर्हा समुच्चये। तथा युक्तपदार्थेषु कामचारक्रियासु च ॥ 64 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 64 ॥ 418 ।
चौबीसवाँ अध्याय 24/64-70 ]
अमृतप्रवाह भाष्य—'अपि' शब्द सम्भावना, प्रश्न, शङ्का, गर्हा (निन्दा या दुर्वचन कहना), समुच्चय (सामूहिक), युक्त-पदार्थ (यथोचित प्रयोग), कामचार (उच्छृङ्खलता)-क्रियामें व्यवहार होता है॥64॥
यहाँ तक पदोंके अर्थ निर्णीत; अब उनके द्वारा श्लोकके अर्थोंका निर्णय :- एइ त' एकादश पदेर अर्थ-निर्णय। एबे श्लोकार्थ करि, यथा ये लागय॥65॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने इस श्लोकके ग्यारह पदोंके अर्थ बतलाये हैं। अब पदोंके यथायोग्य अर्थोंका प्रयोग करके मैं सम्पूर्ण श्लोकके अर्थका वर्णन करता हूँ॥65॥
सर्वप्रथम 'आत्माराम'-पदके अन्तर्गत 'आत्मा'-शब्दकी (1) 'ब्रह्म'-अर्थके द्वारा व्याख्या :- 'ब्रह्म'-शब्देर अर्थ-तत्त्व सर्व-बृहत्तम। स्वरूप-ऐश्वर्य करि' नाहि याँर सम॥66॥
अनुवाद—'ब्रह्म'-शब्दका अर्थ—जो 'सबसे बृहत्तम (बड़ा) तत्त्व' है। जिनके स्वरूप और ऐश्वर्यके समान किसी अन्यका स्वरूप और ऐश्वर्य नहीं है॥66॥
ब्रह्मकी संज्ञा; शास्त्र-प्रमाण :- विष्णुपुराण (1/12/57)में— बृहत्त्वाद्वृंहणत्वाच्च तद्ब्रह्म परमं विदुः। तस्मै नमस्ते सर्वात्मन् योगिचिन्ताविकारी यत्॥67॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥67॥
अमृतप्रवाह भाष्य—बृहत्त्व (सर्वव्यापकता) होनेके कारण, बृंहणत्व अर्थात् वृद्धिकारकत्व (सम्वर्धक और पोषक) होनेके कारण उस तत्त्वको 'परमब्रह्म' कहते हैं। हे सर्वात्मन्, योगिचिन्ताविकारी (विद्वानोंको मोहित करनेवाले) जो आप हैं, आपको प्रणाम है॥67॥
अनुभाष्य— [बुधाः] बृहत्त्वाद् (सर्वव्यापकत्वात्) बृंहणत्वाच्च (सम्वर्द्धकत्वात्, पोषकत्वात् वा) तत् परं ब्रह्म विदुः (जानन्ति); हे सर्वात्मन्, ते (तव) यत् योगिचिन्ताविकारी (सूरिजनमोहनं स्वरूपं) तस्मैः नमः।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥67॥
आत्मा-शब्दका सर्वव्यापक-तत्त्व ही ब्रह्मतत्त्व :- श्रीमद्भागवत (11/2/45) श्लोककी व्याख्यामें श्रीधरस्वामि-उद्धृत तन्त्र-वाक्य— आततत्वाच्च मातृत्वादात्मा हि परमो हरिः॥68॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥68॥
अमृतप्रवाह भाष्य—सर्वव्यापक और सबकी सृष्टि करनेवाले होनेके कारण हरि ही परमात्मा हैं॥68॥
अनुभाष्य— आततत्त्वात् (सर्वव्यापकत्वात्) मातृत्वात् (सर्वप्रसवितृत्वात्) च हरिः हिः परमः आत्मा।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥68॥
'ब्रह्म'-शब्दकी अभिधा-वृत्तिसे पूर्ण-प्रतीतिमय भगवान् :- सेइ 'ब्रह्म'-शब्दे कहे स्वयं भगवान्। अद्वितीय-ज्ञान, याँहा बिना नाहि आन॥69॥
अनुवाद—उस 'ब्रह्म'-शब्दका अर्थ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण है। उनके अतिरिक्त अद्वितीय-ज्ञान [अर्थात् सजातीय-विजातीय-स्वगत भेदरहित अद्वय-ज्ञान; आदिलीला 2/11की अमृताणुकणिका टीका देखें] अन्य किसीमें भी नहीं है॥69॥
शास्त्र-प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (1/2/11)में— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥70॥
अनुवाद—तत्त्वको जाननेवाले विज्ञगण अद्वयज्ञानको तत्त्व कहते हैं। उसी अद्वयज्ञानकी प्रथम प्रतीति ब्रह्म, द्वितीय प्रतीति परमात्मा और तृतीय प्रतीति भगवान् हैं॥70॥
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[ 24/70-79 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य-आदिलीला 2/11 संख्या देखें ॥ 70 ॥ श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान् और त्रिकालसत्य वस्तु :- सेइ अद्वयतत्त्व कृष्ण-स्वयं भगवान्। तिनकाले सत्य तिँहो-शास्त्र-प्रमाण ॥ 71 ॥ अनुवाद-वे अद्वय-तत्त्व श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान-इन तीनों कालोंमें सत्य हैं, इस विषयमें शास्त्र ही प्रमाण है ॥ 71 ॥ सृष्टिसे पहले और बादमें श्रीकृष्णका नित्य अधिष्ठान :- श्रीमद्भागवत (2/9/32)में- अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत् सदसत्परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत् सोऽस्म्यहम् ॥ 72 ॥ अनुवाद-इस जगत्की सृष्टिके पूर्व केवल मैं ही था। सत्, असत् और अनिर्वचनीय निर्विशेष ब्रह्म तक कुछ भी मुझसे पृथक् रूपसे नहीं था। सृष्टि होनेके बाद इस सम्पूर्ण-स्वरूपमें मैं ही हूँ और सृष्टिकी प्रलय होनेके बाद भी एकमात्र मैं ही अवशिष्ट रहूँगा ॥ 72 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/53 संख्या देखें ॥ 72 ॥ आत्मा-शब्दका अर्थ विभु श्रीकृष्ण :- 'आत्मा'-शब्दे कहे कृष्ण बृहत्त्वस्वरूप। सर्वव्यापक, सर्वसाक्षी, परमस्वरूप ॥ 73 ॥ अनुवाद-'आत्मा'-शब्दसे श्रीकृष्णका बृहत्-स्वरूप कहा गया है। वे सर्वव्यापक, सबके साक्षी और परम स्वरूपसे युक्त हैं ॥ 73 ॥ श्रीमद्भागवत (11/2/45) श्लोककी व्याख्यामें श्रीधरस्वामि-उद्धृत तन्त्र-वचन :- आततत्वाच्च मातृत्वादात्मा हि परमो हरिः ॥ 74 ॥ अनुवाद-सर्वव्यापक और सबकी सृष्टि करनेवाले होनेके कारण हरि ही परमात्मा हैं ॥ 74 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 24/68 संख्या देखें ॥ 74 ॥ तीन प्रकारके अभिधेयमें श्रीकृष्णकी तीन प्रकारकी प्रतीति-ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् :- सेइ कृष्णप्राप्ति-हेतु त्रिविध 'साधन'। ज्ञान, योग, भक्ति,-तिनेर पृथक् लक्षण ॥ 75 ॥ तिन साधने भगवान् तिन स्वरूपे भासे। ब्रह्म, परमात्मा, भगवान्-त्रिविध-प्रकाशे ॥ 76 ॥ अनुवाद-ज्ञान, योग और भक्ति-ये तीन प्रकारके 'साधन' उन श्रीकृष्णकी प्राप्तिके कारण स्वरूप हैं और तीनोंके अलग-अलग लक्षण हैं। भगवान् इन तीन प्रकारके साधनोंके अनुरूप ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्-इन तीन रूपोंमें प्रकाशित होते हैं ॥ 75-76 ॥ श्रीमद्भागवत (1/2/11)में- वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ 77 ॥ अनुवाद-तत्त्वको जाननेवाले विज्ञगण अद्वयज्ञानको तत्त्व कहते हैं। उसी अद्वयज्ञानकी प्रथम प्रतीति ब्रह्म, द्वितीय प्रतीति परमात्मा और तृतीय प्रतीति भगवान् हैं ॥ 77 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/11 संख्या देखें ॥ 77 ॥ 'ब्रह्म-आत्मा'-शब्दे यदि कृष्णेरे कहय। 'रूढ़ि-वृत्त्ये' निर्विशेष अन्तर्यामी कय ॥ 78 ॥ अनुवाद-यद्यपि 'ब्रह्म' और 'आत्मा'-शब्द श्रीकृष्णको ही सूचित करते हैं, तथापि रूढ़िवृत्तिसे (प्रत्यक्षरूपसे) इन शब्दोंका अर्थ क्रमशः निर्विशेष ब्रह्म और अन्तर्यामी (परमात्मा) सूचित होता है ॥ 78 ॥ ज्ञानमार्गमें चिन्मात्र ब्रह्म, योगमार्गमें सचिन्मय परमात्म-प्रतीति :- ज्ञानमार्गे-निर्विशेष-ब्रह्म प्रकाशे। योगमार्गे-अन्तर्यामि-स्वरूपेते भासे ॥ 79 ॥ अनुवाद-अद्वयज्ञान श्रीकृष्ण ज्ञानमार्गके साधकोंके 420 ।
चौबीसवाँ अध्याय 24/79-84 ]
लिये निर्विशेष-ब्रह्मके रूपमें और योगमार्गके साधकोंके समक्ष अन्तर्यामी-परमात्माके स्वरूपमें ही प्रकाशित होते हैं॥ 79॥
दो प्रकारकी भक्ति (रागमयी और वैधी)के द्वारा दो प्रकारके भगवद्-स्वरूप (स्वयं श्रीकृष्ण और उनके प्रकाश)की प्राप्ति :- रागभक्ति, विधिभक्ति हय दुइरूप। 'स्वयं-भगवत्ता', 'प्रकाश'-दुइत' स्वरूप ॥ 80 ॥
रागानुगा-भक्तिकी सिद्धि होनेपर व्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन, वैधीभक्तिकी सिद्धि होनेपर वैकुण्ठमें श्रीनारायणका दास्य :- रागभक्त्ये व्रजे स्वयं-भगवाने पाय। विधिभक्त्ये पार्षददेहे वैकुण्ठके याय ॥ 81 ॥
अनुवाद - भक्ति दो प्रकारकी होती है-रागभक्ति और वैधीभक्ति। रागभक्तिके द्वारा साधक 'स्वयं-भगवान्' और वैधीभक्तिके द्वारा साधक 'भगवद्-प्रकाश' - इन दो स्वरूपोंको प्राप्त करते हैं। रागभक्तिके पालनसे साधकको व्रजमें स्वयं-भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है। वैधीभक्तिके पालनसे साधक पार्षद-देह प्राप्त करके वैकुण्ठमें जाता है॥ 80-81॥
श्रीमद्भागवत (10/9/21) में- नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः। ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥ 82 ॥
अनुवाद-यशोदानन्दन भगवान् श्रीकृष्ण भक्तिमान् देहधारियोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, आत्मभूत ज्ञानियोंके लिये वैसे नहीं हैं॥ 82 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 8/227 संख्या देखें ॥ 82 ॥
श्रीमद्भागवत (3/15/25)में- यच्च व्रजन्त्यनिमिषामृषभानुवृत्त्या दूरे-यमा ह्युपरि नः स्पृहणीयशीलाः। भर्तुर्मिथः सुयशसः कथनानुराग- वैक्लव्यवाष्पकलया पुलकीकृताङ्गाः ॥ 83 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 83 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-परस्पर श्रीकृष्णकथाके वर्णनमें जिनके अनुरागसे विवश होकर अश्रु बहते हैं और अङ्ग पुलकित हो जाते हैं, वे देवादिदेव (देवोंके भी आदि देव) श्रीकृष्णका अनुसरण करते हुए यम-नियमादिको दूर फेंककर स्पृहाशील होकर हमारे (सत्यलोकके) ऊपर स्थित वैकुण्ठमें गमन करते हैं॥ 83 ॥
अनुभाष्य-व्यास-सखा श्रीमैत्रेय ऋषि श्रीविदुरको दितिके गर्भसे भयभीत देवताओंके निकट ब्रह्माके द्वारा दितिके गर्भमें स्थित दो असुरोंके पूर्व-वृत्तान्तको बतलाते हुए चतुःसनादिके वैकुण्ठ-गमनके उपाख्यानके वर्णनके प्रसङ्गमें वैकुण्ठके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं,-
अनिमिषां (कालानधीनानां देवानाम्) ऋषभानुवृत्त्या (ऋषभस्य श्रेष्ठस्य श्रीहरेः अनुवृत्त्या अनुसरणेन) दूरे-यमाः (दूरे यमः येषां ते, यद्वा, दूरीकृतयमनियमाः) स्पृहणीयशीलाः (स्पृहणीयं कारुण्यादि शीलं येषां ते) भर्तुः (हरेः) सुयशसः (सुमङ्गल- लीलागुणस्य) मिथः (परस्परं) कथानुरागवैक्लव्यवाष्पकलया (कथने वर्णने यः अनुरागः, तेन वैक्लव्य वैवश्यः तेन वाष्पकला अश्रुबिन्दुः तया सह) पुलकीकृताङ्गाः (पुलकीकृतं रोमाञ्चितम् अङ्गं येषां ते तथाभूताः) च नः (अस्माकम्) उपरि (उपरिस्थितं) यत् च [वैकुण्ठं] व्रजन्ति (गच्छन्ति) [तत् विकुण्ठमुपेत्य मुनयः परां मुदमापुरिति परेणान्वयः]।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [इस श्लोकका अगले श्लोकके तीसरे और चौथे चरणके साथ अन्वय करें।]॥ 83 ॥
तीन प्रकारके उपासक :- सेइ उपासक हय त्रिविध प्रकार। अकाम, मोक्षकाम, सर्वकाम आर ॥ 84 ॥
अनुवाद-वे उपासक (साधक) भी तीन प्रकारके होते हैं-अकाम (सभी प्रकारकी स्वसुख कामनाओंसे रहित), मोक्षकाम (मोक्षकी कामनासे युक्त) और सर्वकाम (सब प्रकारकी कामनाओंसे युक्त) ॥ 84 ॥
। 421
[ 24/85-89 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीमद्भागवत (2/3/10)में— अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥ 85॥ अनुवाद—पहले कोई 'अकाम' अर्थात् सर्वकामनाओंसे रहित हो अथवा 'सर्वकाम' अर्थात् सब प्रकारकी कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्षकी कामना करनेवाला ही क्यों न हो, उदार-बुद्धि होने मात्रसे ही मनुष्य तीव्र शुद्धभक्तियोगसे परमपुरुष श्रीकृष्णका भजन करेंगे॥ 85॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/36 संख्या देखें ॥ 85 ॥ 'उदारधी' शब्दका अर्थ :— बुद्धिमान्—अर्थे—यदि विचारज्ञ हय। निज-काम लागिह तबे कृष्णेरे भजय ॥ 86 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 86 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस श्लोकमें यदि कोई उदारधी अर्थात् बुद्धिमान् अर्थात् विचारवान् हो, तो वह कामना-वासनाके रहनेपर भी श्रीकृष्णका ही भजन करेगा ॥ 86 ॥ सब प्रकारके साधन ही भक्ति-सापेक्ष, भक्ति ही केवल निरपेक्ष :— भक्ति बिना कोन साधन दिते नारे फल। सब फल देय भक्ति स्वतन्त्र प्रबल ॥ 87 ॥ अनुवाद—भक्तिके बिना कोई भी साधन फल प्रदान नहीं कर सकता, किन्तु भक्ति अन्यान्य साधनोंकी अपेक्षासे रहित स्वतन्त्र और बहुत अधिक बलशाली है॥ 87 ॥ भक्तिके आश्रयके बिना अन्य साधन, सभी निष्फल :— अजागलस्तन-न्याय अन्य साधन। अतएव हरि भजे बुद्धिमान् जन ॥ 88 ॥ अनुवाद—जिस प्रकार बकरेके गलेके पास लटकते स्तन (मांसके पिण्ड) दूध देनेमें असमर्थ होते हैं, उसी प्रकार भक्तिके अतिरिक्त अन्य समस्त साधन भी किसी फलको प्रदान करनेमें समर्थ नहीं हैं। इसलिये बुद्धिमान व्यक्ति भगवान् श्रीहरिका ही भजन करते हैं ॥ 88 ॥ अनुभाष्य—भक्तिके अतिरिक्त अन्य प्रकारके साधन पूर्णतया निष्फल हैं, वे कभी भी फल प्रदान नहीं कर सकते। क्योंकि बकरेके गलेमें लटके हुए स्तन जिस प्रकार दूध नहीं दे सकते, केवलमात्र अनभिज्ञ लोगोंके झूठे भ्रमका ही विषय होते हैं, उसी प्रकार भक्तिके अतिरिक्त ज्ञान और कर्मके साधनका कोई फल नहीं होता॥ 88 ॥ भोगकामी और मोक्षकामीके भेदसे चार प्रकारके अनर्थयुक्त सुकृतिवान् लोग; वैसा होनेपर भी ये चार प्रकारकी कामनाएँ निष्काम भक्तिका कारण नहीं :— श्रीमद्भगवद्गीता (7/16)में— चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ 89 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 89 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे अर्जुन! आर्त्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी—ये चार प्रकारके लोग भक्ति- उन्मुखी सुकृतिवान् होनेपर, उन-उन कामनाओंका परित्याग करके मेरा भजन करते हैं ॥ 89 ॥ अनुभाष्य— हे अर्जुन, हे भरतर्षभ, सुकृतिनः (वर्णाश्रमाचारलक्षण-धर्मपराः) जनाः मां भजन्ते; ते च चतुर्विधाः—आर्त्तः (क्लिष्टः आपद्ग्रस्तः— गजेन्द्रादिः), जिज्ञासुः (आत्मस्वरूपज्ञानेच्छुः—शौनकादिः), अर्थार्थी (सुखसम्पदिच्छुः ध्रुवादि,—एते सकामाः), ज्ञानी (लब्ध-बोधः— शुकादिः, अयं तु निष्कामः) च। श्लोक-भावानुवाद—हे अर्जुन, हे भरतर्षभ, सुकृतिवान् अर्थात् वर्णाश्रम-धर्मपरायण लोग मेरा भजन करते हैं; वे चार प्रकारके होते हैं—आर्त्ति (दुःखी या विपदाग्रस्त—गजेन्द्रादि), जिज्ञासु (आत्मस्वरूपको जाननेके इच्छुक—शौनकादि), अर्थार्थी (सुख-सम्पत्तिके इच्छुक— ध्रुवादि) और ज्ञानी (ज्ञान-प्राप्त—शुकदेवादि, ये निष्काम होते हैं) ॥ 89 ॥ 422 ।
चौबीसवाँ अध्याय 24/90-95 ] आर्त्त और अर्थार्थी-भोगकामी; जिज्ञासु और ज्ञानी-मुक्तिकामी :- आर्त्त, अर्थार्थी, - दुइ सकाम-भितरे गणि। जिज्ञासु, ज्ञानी, - दुइ मोक्षक़ामी मानि ॥ 90 ॥ अनुवाद-मैं आर्त्त और अर्थार्थी-इन दोनोंको सकाम भक्त तथा जिज्ञासु और ज्ञानी-इन दोनोंको मोक्षकी कामना करनेवाला मानता हूँ ॥ 90 ॥ चार प्रकारकी कामनाओंको छोड़नेसे ही शुद्धभक्तिको प्राप्त करनेकी योग्यता :- एइ चारि सुकृति हय महाभाग्यवान्। तत्तत्कामादि छाड़ि' हय शुद्धभक्तिमान् ॥ 91 ॥ अनुवाद-ये चारों प्रकारके सुकृतिशाली व्यक्ति महाभाग्यशाली होते हैं। सुकृतिके प्रभावसे वे धीरे-धीरे अपनी-अपनी कामनाओंको छोड़कर शुद्धभक्त बन जाते हैं ॥ 91 ॥ चार प्रकारकी कामनाएँ ही दुःसङ्ग, साधुगुरु-श्रीकृष्णकी कृपासे दुःसङ्गका दूर होना :- साधुसङ्ग-कृपा किंवा कृष्णेर कृपाय। कामादि 'दुःसङ्ग' छाड़ि' शुद्धभक्ति पाय ॥ 92 ॥ अनुवाद-साधुसङ्ग-कृपा अथवा श्रीकृष्णकी कृपासे वे कामनाओंरूपी 'दुःसङ्ग'को छोड़कर शुद्धभक्ति प्राप्त करते हैं॥ 92 ॥ सत्सङ्गका प्रभाव :- श्रीमद्भागवत (1/10/11)में- सत्सङ्गान्मुक्त-दुःसङ्गो हातुं नोत्सहते बुधः। कीर्त्यमानं यशो यस्य सकृदाकर्ण्य रोचनम् ॥ 93 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 93 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सत्सङ्ग करते हुए दुःसङ्गका परित्याग करके पण्डित-व्यक्ति भगवान्के कीर्तन करने योग्य और रुचिकर यशको एकबार सुनकर उन्हें कभी भी परित्याग नहीं कर सकते ॥ 93 ॥ अनुभाष्य-धर्मराज युधिष्ठिरका राज्य-अभिषेक करनेके बाद कुछ मास हस्तिनापुरमें रहनेके बाद श्रीकृष्ण द्वारका जानेकी अभिलाषा करके कुरु-पाण्डव कुलके स्त्री-पुरुष सभीका यथाविधि यथायोग्य अभिवादन करके उनसे विदायी लेकर रथपर चढ़े, शौनकादि ऋषियोंको श्रीसूत हस्तिनापुरवासियोंके श्रीकृष्ण-विरहमें अधीर होनेके प्रसङ्गमें साधुसङ्गके माधुर्यके विषयमें बतला रहे हैं,- सत्सङ्गात् (कृष्णभक्तसङ्गात् हेतोः) मुक्तदुःसङ्गः (मुक्तः ज्ञानकर्म्मान्याभिलाषविषयः पुत्रादिविषयो वा दुःसङ्गो येन सः) बुधः (सुधीः) कीर्त्यमानम् (उच्चार्यमाणं) यस्य (श्रीकृष्णस्य) रोचनं (रुचिकरं) यशं सकृत् आकर्ण्य (श्रुत्वा) हातुं (सत्सङ्गं त्यक्तुं) न उत्सहते, [तस्य विरहं पार्थाः कथं सहेरन्निति परेणान्वयः]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [अगले श्लोकके प्रथम और द्वितीय चरणके साथ इसका अन्वय करें।] ॥ 93 ॥ दुःसङ्गका अर्थ :- 'दुःसङ्ग' कहिये-'कैतव', 'आत्मवञ्चना'। कृष्ण, कृष्णभक्ति बिना अन्य कामना ॥ 94 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण और श्रीकृष्ण भक्तिके अतिरिक्त अन्य कामनाओंको हृदयमें रखना ही कैतव' (कपटता) तथा 'आत्मवञ्चना' (अपनेको ही ठगना) है। इसीको 'दुःसङ्ग' कहते हैं॥ 94 ॥ अनुभाष्य-छल-कपटके द्वारा अपनी वञ्चना करना ही 'दुःसङ्ग' है। श्रीकृष्णकाम और श्रीकृष्णभक्तिकी कामनाके अतिरिक्त अन्य समस्त कामनाएँ ही 'दुःसङ्ग' हैं॥ 94 ॥ श्रीमद्भागवत (1/1/2)में- धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्। श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किंवा परैरीश्वरः सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ 95 ॥ । 423
[ 24/95-101 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—यह श्रीमद्भागवत ग्रन्थ सर्वप्रथम महामुनि श्रीनारायणके द्वारा चतुःश्लोकी (अर्थात् चार श्लोकों)के रूपमें निर्मित है। इसमें निर्मत्सर अर्थात् सब जीवोंके प्रति दयालु व्यक्तियोंके लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तक कैतवसे शून्य अर्थात् छलरहित परमधर्मकी व्याख्या हुई है। यह धर्म जीवके त्रितापका नाश करनेवाला, शिवद अर्थात् मङ्गल प्रदान करनेवाला और वास्तव-वस्तुके तत्त्व-ज्ञानको प्रदान करनेवाला है। इसको श्रवण करनेके इच्छुक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार ईश्वरको अपने हृदयमें अवरुद्ध करनेमें समर्थ होते हैं। इसलिये श्रीमद्भागवतके अतिरिक्त अन्य किसी शास्त्रकी क्या आवश्यकता है ? ॥ 95 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/91 संख्या देखें ॥ 95 ॥ 'प्र'-शब्दे—मोक्षवाञ्छा कैतवप्रधान। एइ श्लोके श्रीधरस्वामी करियाछेन व्याख्यान ॥ 96 ॥ अनुवाद—उपरोक्त श्लोकके 'प्र'-शब्दसे समझना चाहिये कि मोक्षकी कामना ही प्रधान कैतव (कपटता) है। इस श्लोककी टीकामें श्रीधरस्वामीने ऐसी व्याख्या की है ॥ 96 ॥ सकाम-भक्ते 'अज्ञ' जानि' दयालु भगवान्। स्व-चरण दिया करे इच्छार पिधान ॥ 97 ॥ अनुवाद—सकाम भक्तको 'अज्ञ' (मूर्ख) जानकर दयालु भगवान् उसे अपने श्रीचरणका आश्रय प्रदान करके उसकी अनुचित कामनाओंको आच्छादित कर देते हैं ॥ 97 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'इच्छार पिधान'—इच्छाका आच्छादन (परिपूरण) ॥ 97 ॥ श्रीमद्भागवत (5/19/26)में— सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां नैवार्थदो यत् पुनरर्थिता यतः। स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता- मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम् ॥ 98 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण प्रार्थना किये जानेपर मनुष्योंकी प्रार्थनाको पूर्ण करते हैं, यह बात सत्य है। किन्तु जिस अर्थसे (भोगकी वस्तुसे) बार-बार भोगके लिये प्रार्थना उदित होती है, श्रीकृष्ण उस अर्थको नहीं देते। अन्यकामी होकर जो एकमात्र उनके पादपल्लवको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं करनेपर भी उनका भजन करते हैं, श्रीकृष्ण उन्हें स्वयं ही अन्य-कामनाओंको शान्त कर देनेवाले अपने चरणकमलोंको दिया करते हैं ॥ 98 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/40 संख्या देखें ॥ 98 ॥ शुद्धभक्तके सङ्ग, सेवा और श्रीकृष्णकृपासे ही अनर्थ-निवृत्ति और सिद्धिकी प्राप्ति :— साधुसङ्ग, कृष्णकृपा, भक्तिर स्वभाव। ए तिने सब छाड़ाय, करे कृष्णे 'भाव' ॥ 99 ॥ अनुवाद—साधुसङ्ग, श्रीकृष्ण-कृपा और श्रीकृष्ण- भक्तिका स्वभाव ही ऐसा है कि ये तीनों अन्य सब वस्तुओंको छुड़ाकर धीरे-धीरे श्रीकृष्णके प्रति भावको उत्पन्न करा देते हैं ॥ 99 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अकाम, सर्वकाम, और मोक्षकाम,—ये तीन प्रकारके व्यक्ति उन-उन कामनाओंके दोषोंको छोड़कर श्रीकृष्णकी शुद्धभक्ति करते हैं ॥ 99 ॥ अनुभाष्य—'एइ तिने'—श्रीकृष्णभक्तोंका सङ्ग, श्रीकृष्णकृपा और श्रीकृष्णभक्ति। ये श्रीकृष्णके अभक्तोंका सङ्ग, मायाके द्वारा प्रदान किये गये समस्त सौभाग्य और अन्याभिलाष, कर्म, ज्ञान और योग-प्रवृत्ति आदि सबकुछ छुड़ाकर श्रीकृष्णके प्रति 'भाव' उत्पन्न करते हैं ॥ 99 ॥ बादकी सभी व्याख्याओंमें यही जानने योग्य :— आगे यत यत अर्थ व्याख्यान करिब। कृष्णगुणास्वादेर एइ हेतु जानिब ॥ 100 ॥ श्लोकव्याख्या लागि' एइ करिलुँ आभास। एबे करि श्लोकेर मूलार्थ प्रकाश ॥ 101 ॥
424 ।
चौबीसवाँ अध्याय 24/100-109 ] अनुवाद—आगे मैं (आत्मारामश्च) श्लोकके शब्दोंकी क्रमशः व्याख्या करूँगा, हे सनातन, तुम उन्हें श्रीकृष्णके गुणोंका आस्वादन करनेका कारण समझना। मैंने अब तक उसकी भूमिका बनायी है, अब मैं उसके मुख्य अर्थको प्रकाशित कर रहा हूँ॥ 100-101 ॥ ज्ञानियोंके दो प्रकारके विभेद :- ज्ञानमार्गे उपासक—दुइत' प्रकार। केवल ब्रह्मोपासक, मोक्षाकाङ्क्षी आर॥ 102 ॥ (1) केवल-ब्रह्मज्ञानी तीन प्रकारके :- केवल ब्रह्मोपासक तिन भेद हय। साधक, ब्रह्ममय, आर प्राप्त-ब्रह्मलय ॥ 103 ॥ भक्ति-आश्रित ज्ञानके साधनसे ही साधकका ब्रह्मभूत होना :- भक्ति बिना केवल ज्ञाने 'मुक्ति' नाहि हय। भक्ति साधन करे येइ 'प्राप्त-ब्रह्मलय' ॥ 104 ॥ वास्तव-वस्तुके आनुगत्यमें अथवा भक्तिफलसे ही 'ब्राह्मणत्व' और सेवाके संयोगसे ही 'वैष्णवत्व' :- भक्तिर स्वभाव, —ब्रह्म हैते करे आकर्षण। दिव्य देह दिया कराय कृष्णेर भजन ॥ 105 ॥ वैष्णव होनेपर ही श्रीकृष्णसेवाका अनुष्ठान :- भक्तदेह पाइले हय गुणेर स्मरण। गुणाकृष्ट हञा करे निर्मल भजन ॥ 106 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 102-106 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानमार्गके उपासक केवल- ब्रह्मोपासक और मोक्ष-आकाङ्क्षीके भेदसे दो प्रकारके हैं। कैवल्य-वासनासे ब्रह्मकी उपासना करनेवाले 'केवल-ब्रह्मोपासक' होते हैं। उनकी तीन अवस्थाएँ— साधक, (नित्यसिद्ध) ब्रह्ममय और ब्रह्मलय-प्राप्त (अर्थात् ब्रह्मभूत) हैं। भक्तिके बिना ज्ञान मुक्ति नहीं दे सकता। जो व्यक्ति ब्रह्मलयप्राप्त (अर्थात् ब्रह्मभूत हो गया है), वही भक्तिसाधन कर सकता है। भक्तिसाधनके उपस्थित होनेपर भक्तिका स्वभाव उपस्थित होता है। उस स्वभावके प्रभावसे भक्ति (उन्हें) ब्रह्मसे आकर्षण करके दिव्य देह देकर श्रीकृष्णभजन कराती है। भक्तको अप्राकृत देह प्राप्त होनेपर श्रीकृष्णके सभी गुणोंका स्मरण होता है और भक्त उन गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर निर्मल भजन करता है॥ 102-106 ॥ मुक्तगणोंकी भी अप्राकृत सिद्धदेहमें भगवत्-सेवा :- श्रीमद्भागवत (10/87/21) श्लोकमें श्रीधर-उद्धृत सर्वज्ञ भाष्यकार व्याख्या और नृसिंहतापनी (2/5/16)में— मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते॥ 107 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मुक्तगण भी लीलासे आकर्षित होकर विग्रह स्थापित करके भगवान्का भजन करते हैं॥ 107 ॥ ब्रह्ममय शुक और चतुःसनादि भी श्रीकृष्णके प्रति आकृष्ट होकर श्रीकृष्ण भजनमें रत :- जन्म हैते शुक-सनकादि 'ब्रह्ममय'। कृष्णगुणाकृष्ट हञा कृष्णेरे भजय ॥ 108 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीशुकदेव गोस्वामी और सनकादि चार कुमार जन्मसे ही 'ब्रह्ममय' थे, किन्तु बादमें श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर उन्होंने श्रीकृष्णका भजन किया ॥ 108 ॥ चतुःसनादि श्रीकृष्णचरणकी गन्धसे आकृष्ट होकर शुद्धभक्तिमें रत :- सनकाद्येर श्रीकृष्णकृपाय सौरभे हरे मन। गुणाकृष्ट हञा करे निर्मल भजन ॥ 109 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीसनकादिके मनको श्रीकृष्णके श्रीचरणोंमें समर्पित तुलसी आदिकी सुगन्धने हरण कर लिया था। इस प्रकार उन्होंने श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर उनका शुद्ध भजन किया था ॥ 109 ॥ । 425
[ 24/110-115 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीमद्भागवत (3/15/43)में— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ 110 ॥ अनुवाद-उन कमल-नेत्र-भगवान्के पदकमलकी पराग-मिश्रित तुलसीकी मधुरगन्धयुक्त वायुने सनकादि चार कुमारोंकी नासिकाके छिद्रके माध्यमसे अन्दर जाकर निर्विशेष-ब्रह्मपरायण उनके चित्त और देहमें क्षोभ उत्पन्न कर दिया था ॥ 110 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 17/142 संख्या देखें ॥ 110 ॥ व्यासदेवकी कृपासे उनके शिष्य शुक श्रीकृष्णलीलाके प्रति आकृष्ट होकर शुद्धभक्तिमें रत :- व्यासकृपाय शुकदेवेर लीलादि-स्मरण। कृष्णगुणाकृष्ट हञा करेन भजन ॥ 111 ॥ अनुवाद-श्रीव्यासदेवकी कृपासे श्रीशुकदेवको श्रीकृष्णकी लीलादिका स्मरण हुआ था। श्रीशुकदेवने भी श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर उनका भजन किया था॥ 111 ॥ श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर श्रौतपन्थी शुकका व्यासदेवसे भागवत-अध्ययन :- श्रीमद्भागवत (1/7/11)में— हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः। अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥ 112 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 112 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मति हरिके गुणोंसे आकृष्ट होनेपर वैष्णवप्रिय भगवान् शुकदेवने इस महद्-आख्यानका (महापुराण श्रीमद्भागवतका) अध्ययन किया था॥ 112 ॥ अनुभाष्य-‘निवृत्तिमें पूर्णरत, सर्वत्र-उपेक्षाशील, आत्माराम ब्रह्मज्ञानी श्रीशुकदेवने किस कारण इस श्रीमद्भागवतका अध्ययन किया था?’—शौनकके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूत उसके कारणका वर्णन कर रहे हैं,— नित्यं विष्णुजनप्रियः (विष्णुजनाः प्रियाः यस्य सः) भगवान् बादरायणिः (वैयासकिः श्रीशुकः) हरेः गुणाक्षिप्तमतिः (गुणेन आक्षिप्ता मतिः यस्य सः हरिगुणानुवादाकृष्टचित्तः सन्) महदाख्यानम् (इदं श्रीभागवतं महापुराणम्) अध्यगात् (अधीतवान्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 112 ॥ श्रौतपन्थी ब्रह्मज्ञानी नव-योगेन्द्रोंका श्रीकृष्णगुणके श्रवणसे श्रीकृष्णभजन :- नव-योगीश्वर जन्म हैते ‘साधक’-ज्ञानी। विधि-शिव-नारद-मुखे कृष्णगुण शुनि’ ॥ 113 ॥ गुणाकृष्ट हञा करे कृष्णेर भजन। एकादश-स्कन्धे ताँर भक्ति-विवरण ॥ 114 ॥ अनुवाद-(ऋषभदेवके नौ योगी पुत्र) नव-योगीश्वर (नवयोगेन्द्र) जन्मसे ही ‘साधक’ ब्रह्मज्ञानी थे। किन्तु ब्रह्मा, शिव, नारदके मुखसे श्रीकृष्णके गुणोंके विषयमें श्रवण करके वे श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकर्षित हुए और तब उन्होंने श्रीकृष्णका भजन किया। श्रीमद्भागवतके एकादश स्कन्धमें उनकी भक्तिका विवरण प्राप्त होता है॥ 113-114 ॥ शास्त्र-प्रमाण :- भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/20)में उद्धृत महोपनिषद्-वाक्य— अक्लेशां कमलभुवः प्रविश्य गोष्ठीं कुर्वन्तः श्रुतिशिरसां श्रुतिं श्रुतज्ञाः। उत्तुङ्गं यदुपुरसङ्गमाय रङ्गं योगीन्द्राः पुलकभृतो नवाप्यवापुः ॥ 115 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 115 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वेदोंमें कुशल नवयोगेन्द्र जहाँ क्लेशका कोई स्थान नहीं है, ऐसी ब्रह्माजीकी सभामें प्रविष्ट हुए। वहाँ ब्रह्माजीसे उपनिषदोंके वास्तविक अर्थोंका (श्रीकृष्णकी महिमाका) श्रवण करके वे पुलकित देहसे यदुपुरी द्वारकामें जानेके इच्छुक हुए। 426
इस प्रकार अन्तमें उन्हें अति उच्च 'रङ्गक्षेत्र' प्राप्त हुआ था॥ 115॥ अनुभाष्य- श्रुतज्ञाः (वेदकुशलाः) नवयोगीन्द्राः (जायन्तेयाः) कमलभुवः (पद्मयोनेः) अक्लेशां (क्लेशवर्जितां) गोष्ठीं (सभां) प्रविश्य, श्रुतिशिरसाम् (उपनिषदां) श्रुतिं (श्रवणं) कुर्वन्तः अपि यदुपुरसङ्गमाय (द्वारकां गन्तुमित्यर्थः) पुलकभृतः (रोमाञ्चितदेहाः सन्तः) उत्तुङ्गम् (अत्युच्चं) रङ्गं (रङ्गक्षेत्रम्) अवापुः (प्राप्तवन्तः) । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 115॥ (2) मोक्षाकाङ्क्षीके तीन प्रकारके भेद :- मोक्षाकाङ्क्षी ज्ञानी हय तिनप्रकार। मुमुक्षु, जीवन्मुक्त, प्राप्तस्वरूप आर॥ 116॥ अनुवाद-मोक्षकी (ब्रह्ममें लीन होनेकी) आकाङ्क्षा करनेवाले ज्ञानी तीन प्रकारके होते हैं-(1) मुमुक्षु (मुक्तिकामी), (2) जीवन्मुक्त (प्राकृत देह रहते हुए भी मुक्त) और (3) प्राप्त-स्वरूप (जिन्हें अपने नित्य स्वरूपकी प्राप्ति हो गयी है) ॥ 116 ॥ (क) मुक्तिकामी विषयी व्यक्तियोंका भक्तिके आश्रयमें श्रीकृष्णभजन :- 'मुमुक्षु' अनेक जगते संसारी जन। 'मुक्ति' लागि' भक्त्ये करे कृष्णेर भजन॥ 117 ॥ अनुवाद-जगत्में अनेक संसारी व्यक्ति 'मुक्तिकामी' हैं। 'मुक्ति'के लिये वे भक्तिके द्वारा श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 117॥ श्रीमद्भागवत (1/2/26)में- मुमुक्षवो घोररूपान हित्वा भूतपतीनथ। नारायण-कलाः शान्ता भजन्ति ह्यनसूयवः ॥ 118 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 118॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मुक्तिकामी व्यक्ति घोररूपी भूतपतियोंका परित्यागकर, किन्तु उनके प्रति असूया-रहित (ईर्ष्या-द्वेष-रहित) होकर श्रीनारायणकी सभी कलाओंका भजन करते हैं॥ 118॥
अनुभाष्य-कल्याण चाहनेवाले बुद्धिमान व्यक्ति अधोक्षज विष्णुकी अथवा उनके अवतारोंकी और सकाम अशान्त स्वभाववाले उपासक व्यक्ति विष्णुके अतिरिक्त अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, यही श्रीसूत गोस्वामी शौनकादि ऋषियोंको बतला रहे हैं,- [ननु अन्यानपि केचिद्भजन्तो दृश्यन्ते? सत्यं, मुमुक्षवस्तु अन्यान् न भजन्ति, किन्तु सकामा एवेत्याह]-अथ (अतएव) घोररूपान् (भीषणाकृतीन्) भूतपतीन् (पितृभूतप्रजेशादीन्) हित्वा (त्यक्त्वा) मुमुक्षवः (निःश्रेयसार्थिनः ज्ञानिनः) अनसूयवः (अहिंस्रव्रताः देवान्तरानिन्दकाः) शान्ताः (निष्कामाः सन्तः) नारायणकलाः (नारायणस्य अंशावतारान्) हि भजन्ति। श्लोक-भावानुवाद-[निश्चय ही कई लोग विष्णुके अतिरिक्त अन्योंका क्यों भजन करते दिखायी देते हैं? यह सत्य है, यद्यपि मुक्तिकामी अन्योंका भजन नहीं करते हैं, तथापि सकाम व्यक्ति ही ऐसा करते हैं, इसलिये कह रहे हैं-] आगे अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 118॥ साधुसङ्गसे मुक्तिकी कामना-त्याग :- सेइ सबेर साधुसङ्गे गुण स्फुराय। कृष्णभजन कराय, 'मुमुक्षा' छाड़ाय॥ 119॥ अनुवाद-वे सब मुक्तिकामी लोग यदि साधुसङ्ग (शुद्धभक्तोंका सङ्ग) करते हैं, तब वे श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर 'मुक्तिकी कामना' छोड़कर श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 119॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चतुःसन और शुकदेवकी ब्रह्ममयता और नवयोगेन्द्रोंका साधक होना दिखलाकर, 'मुमुक्षु', 'जीवन्मुक्त' और 'प्राप्त-स्वरूप'-इस प्रकारके तीन प्रकारके मोक्षाङ्काक्षी ज्ञानियोंकी बातका विचार करते हुए सर्वप्रथम मुक्तिकामियोंकी बात कह रहे हैं। उन मुक्तिकामियोंको साधुसङ्गमें जब भगवान्के गुणोंकी स्फूर्ति होती है, तब वे मुक्तिकी कामनाको छोड़कर श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 119॥
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[ 24/120-125 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सत्सङ्गके गुण और महिमा :— भक्तिरसामृतसिन्धु (3/2/27)में उद्धृत हरिभक्तिसुधोदय-वचन— अहो महात्मन् बहुदोषदुष्टोऽप्येकेन भात्येष भवो गुणेन। सत्सङ्गमाख्येन सुखावहेन कृताद्य नो येन कृशा मुमुक्षा॥120॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे महात्मन्! इस भवसंसारमें बहुत दोष रहनेपर भी साधुसङ्गरूपी एक महान् गुण है। उसी एक नित्यकल्याणप्रद गुणके द्वारा अब हमारी मुक्तिकी इच्छा दुर्बल हो गयी है॥120॥ अनुभाष्य— हे महात्मन्, अहो एष भवः (मानवजन्म) बहुदोषदुष्टः (अशेषदोषाकरभूतः) अपि सुखावहेन (अर्थदेन, नित्यकल्याण-प्रदेन) सत्सङ्गमाख्येन (साधुसङ्गनाम्ना) एकेन गुणेन भाति (दीप्यति), येन (गुणेन) अद्यः नः (अस्माकं) मुमुक्षा (मोक्षवाञ्छा) कृशा कृता (क्षयीभूता भवति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥ जिज्ञासु मुक्तिकामी शौनकादिका शुद्धभक्तके सङ्गसे मुक्तिकी कामनाका त्याग :— नारदेर सङ्गे शौनकादि मुनिगण। मुमुक्षा छाड़िया कैला कृष्णेर भजन॥121॥ कभी तो श्रीकृष्णदर्शनसे, कभी श्रीकृष्णकृपासे मुक्तिकी कामनाका त्याग और शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :— कृष्णेर दर्शने, कारो कृष्णेर कृपाय। मुमुक्षा छाड़िया गुणे भजे ताँर पाँय॥122॥ अनुवाद—श्रीनारदके सङ्गसे शौनकादि मुनियोंने मुक्तिकी वाञ्छाको त्याग करके श्रीकृष्णका भजन किया। किसीने श्रीकृष्णके दर्शन करके और किसीने श्रीकृष्णकी कृपासे मोक्षकी वाञ्छाको छोड़कर उनके गुणोंके प्रति आकर्षित होकर उनके श्रीचरणकमलोंका भजन किया॥121-122॥ शुद्ध श्रीकृष्णभक्ति प्राप्त करनेपर पहले आचरित ज्ञानके प्रयासमें खेद :— भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/34)— अस्मिन् सुखघनमूर्त्तौ परमात्मनि वृष्णिपत्तने स्फुरति। आत्मारामतया मे वृथा गतो बत चिरं कालः॥123॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥123॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस वृष्णिपत्तन द्वारकामें चित्सुख-घनमूर्ति श्रीकृष्णके स्फुरित होनेपर मेरे सुखका उदित हुआ है। हाय, आत्मारामताका आश्रय (निर्वेशेष-ब्रह्मका अनुशीलन) करते हुए मेरे अनेक दिन वृथा (बेकार) चले गये हैं॥123॥ अनुभाष्य— बत (खेदे) वृष्णिपत्तने (द्वारकानगर्यां) सुखघनमूर्त्तौ (चित्सुखघनविग्रहे) परमात्मनि अस्मिन् (श्रीकृष्णे) स्फुरति [सति] आत्मारामतया (निर्विशेषब्रह्मानुशीलनेन) चिरं मे (मम) कालः वृथा गतः (हतः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥123॥ (ख) दो प्रकारके जीवन्मुक्त :— ‘जीवन्मुक्त’ अनेक सेइ, दुइ भेद जानि। ‘भक्त्ये जीवन्मुक्त’, ‘ज्ञाने जीवन्मुक्त’ मानि॥124॥ भक्तिके फलसे जीवन्मुक्त अवरोहपन्थी भक्तको श्रीकृष्णसेवानन्दकी प्राप्ति, ज्ञानके फलसे आरोहपन्थी मुक्ताभिमानीकी अधोगति :— ‘भक्त्ये जीवन्मुक्त’ गुणाकृष्ट हञा कृष्ण भजे। ‘शुष्कज्ञाने जीवन्मुक्त’ अपराधे अधो मजे॥125॥ अनुवाद—‘जीवन्मुक्त’ (इसी जीवनमें मुक्त) अनेक हैं, उनमें दो श्रेणियाँ हैं। एक प्रकारके जीवन्मुक्त तो भक्तिका आश्रय करके जीवन्मुक्त होते हैं और दूसरी प्रकारके वे हैं जो केवल ज्ञानका आश्रय करके स्वयंको जीवन्मुक्त मानते हैं, किन्तु वास्तवमें मुक्त होते 428 ।
चौबीसवाँ अध्याय 24/124-130 ] नहीं हैं। जो भक्तिकी सहायतासे जीवन्मुक्त होते हैं, वे श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर उनका भजन करते हैं। और केवल शुष्कज्ञानसे स्वयंको जीवन्मुक्त माननेवाले अपराधके कारण अधोःपतित होते हैं॥124-125॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अपराधे अधो मजे'—शुष्कज्ञान- जनित जीवन्मुक्त (अभिमानी)-लोग अपराधवशतः अधःपतित होकर मजे अर्थात् नष्ट हो जाते हैं॥125॥ श्रीमद्भागवत (10/2/32)में— येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन- स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रे पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥126॥ अनुवाद—हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया हूँ', ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित होते हैं॥126॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/30 संख्या देखें॥126॥ श्रीमद्भगवद्गीता (18/54)में— ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥127॥ अनुवाद—गीतामें कहा गया है,—अभेद ब्रह्मवादरूपी ज्ञानचर्चाके द्वारा स्वयं प्रसन्नात्माका शोक और कामनारहित होनेपर तथा सभी जीवोंमें समभावयुक्त ब्रह्मता प्राप्त करनेके बाद उसे मेरी पराभक्ति प्राप्त होती है। तात्पर्य यह है कि पहले कर्ममिश्रा-भक्तिका उल्लेख हुआ था, उसकी अपेक्षा ज्ञानमिश्रा भक्ति श्रेष्ठ है॥127॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/65 संख्या देखें॥127॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/44)में उद्धृत बिल्वमङ्गल वाक्य :— अद्वैतवीथिपथिकैरुपस्याः स्वानन्दसिंहासनलब्ध दीक्षाः। शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवधूविटेन॥128॥ अनुवाद—अद्वैतमार्गके पथिकोंके द्वारा उपास्य और आत्मानन्द-सिंहासनसे दीक्षा प्राप्त करनेपर भी मैं किसी गोपवधू-लम्पट शठके द्वारा हठतापूर्वक दासीके रूपमें परिणत हो गया हूँ॥128॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 10/178 संख्या देखें॥128॥ (ग) स्वरूप-प्राप्त भक्तोंका चिदानन्ददेहसे श्रीकृष्णभजन :— भक्तिबले 'प्राप्तस्वरूप' दिव्यदेह पाय। कृष्णगुणाकृष्ट हञा भजे कृष्ण-पांय॥129॥ अनुवाद—'प्राप्तस्वरूप' (स्वरूपकी उपलब्धि करनेवाला) जीव भक्तिके बलसे दिव्यदेहको प्राप्त करता है और श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर श्रीकृष्णके चरणोंका भजन करता है॥129॥ दस प्रकारके लक्षणोंमेंसे निरोध और मुक्तिके लक्षण :— श्रीमद्भागवत (2/10/6)में— निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः। मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः॥130॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥130॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[श्रीहरिकी योगनिद्राके बाद] शक्तिगणोंके अर्थात् उपाधियोंके साथ आत्माके शयनको जीवका 'निरोध' कहा जाता है। अन्य प्रकारके रूपका (मायिक स्थूल-सूक्ष्म रूपका) परित्यागकर स्व-स्वरूपमें विशेषरूपसे अवस्थानका नाम 'मुक्ति' है॥130॥ अनुभाष्य—श्रीशुकदेव परीक्षितसे सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय,—महापुराणके इन दस लक्षणोंको दशम-पदार्थ | 429
[ 24/130-136 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आश्रयस्वरूप भगवान्के विशुद्धतत्त्वज्ञानके उद्देश्यसे वर्णन करते हुए इस श्लोकमें उसके अन्तर्गत निरोध और मुक्तिके स्वरूप अथवा लक्षण बतला रहे हैं, - [श्रीहरेः योगनिद्राम्] अनु (पश्चात्) अस्य आत्मनः (जीवस्य) शक्तिभिः (स्वोपाधिभिः) शयनं (लयः) निरोधः (इति स्मृतः); तथा अन्यथा रूपं (अविद्यया अध्यस्तं कर्तृत्वादि) हित्वा (त्यक्त्वा) स्वरूपेण (भगवद्दास्ये शुद्धजीवस्वरूपेण) व्यवस्थितिः (विशेषेण अवस्थानं स्वरूपसाक्षात्कार इत्यर्थ एव) 'मुक्तिः'। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 130 ॥ मायारूपी भोगवाञ्छामें श्रीकृष्ण-विमुखता, श्रीकृष्णसेवासे अथवा श्रीकृष्ण-उन्मुखतासे मायासे मुक्ति :- कृष्ण-बहिर्मुख-दोष माया हैते हय। कृष्णोन्मुखी भक्ति हैते माया-मुक्ति हय ॥ 131 ॥ अनुवाद-मायासे ही श्रीकृष्ण-बहिर्मुखतारूपी दोष उत्पन्न होता है और श्रीकृष्ण-उन्मुखी भक्तिसे ही मायासे मुक्ति होती है ॥ 131 ॥ श्रीमद्भागवत (11/2/37)में- भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यादीशा- दपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः। तन्माययातो बुध आभजेत्तं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा ॥ 132 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णसे इतर (अन्य) जो माया है, उसमें अभिनिविष्ट जीवमें 'भय' उपस्थित होता है और उन ईश्वरसे बहिर्मुख होनेके कारण मायाजनित विपरीत स्मृति होती है; इसी कारण पण्डित व्यक्ति गुरुको 'देवता' और 'आत्म'-स्वरूप मानकर अनन्य-भक्तिके साथ उन परमेश्वरका भजन करेंगे ॥ 132 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 20/119 संख्या देखें ॥ 132 ॥ श्रीमद्भगवद्गीता (7/14)में- दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ 133 ॥ अनुवाद-इस त्रिगुणमयी मेरी मायासे अत्यन्त कष्टसे पार हुआ जाता है; जो मेरे शरणागत होते हैं, वे ही केवल इस मायासे पार हो सकते हैं॥ 133 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 20/121 संख्या देखें ॥ 133 ॥ भक्तिबलसे ही मुक्ति और मुक्त होनेपर श्रीकृष्णभक्ति :- भक्ति बिना मुक्ति नाहि, भक्त्ये मुक्ति हय। तबे मुक्ति पाइले अवश्य कृष्ण भजय ॥ 134 ॥ अनुवाद-भक्तिके बिना मुक्ति नहीं हो सकती, भक्तिसे ही मुक्ति प्राप्त होती है। जो भक्तिके बलपर मुक्ति प्राप्त करते हैं, वे सदा ही श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 134 ॥ श्रीमद्भागवत (10/14/4)में- श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवल-बोधलब्धये। तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद्यथा स्थूलतुषावघातिनाम् ॥ 135 ॥ अनुवाद-हे विभो ! आपमें भक्ति ही कल्याणका पथ है, उसे परित्याग करके जो सब व्यक्ति केवल ज्ञान प्राप्तिके लिये अर्थात् 'मैं ब्रह्म' हूँ, इसीको ही स्थिर रूपमें जाननेके लिये अनेक प्रकारके कष्ट स्वीकार करते हैं, खाली भूसीको पीसनेवालोंको जिस प्रकार चावल नहीं मिलते, उसी प्रकार, उन्हें अन्तमें क्लेशमात्र ही प्राप्त होता है॥ 135 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/22 संख्या देखें ॥ 135 ॥ श्रीमद्भागवत (10/2/32)में- येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्य- स्तभावादविशुद्धबुद्धयः । आरुह्य कृच्छ्रे पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ 136 ॥ अनुवाद-हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया 430 ।
चौबीसवाँ अध्याय [24/136-141] हूँ, ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित होते हैं॥ 136 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/30 संख्या देखें ॥ 136 ॥ श्रीमद्भागवत (11/5/3) में- य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम्। न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद्भ्रष्टाः पतन्त्यधः ॥ 137 ॥ अनुवाद-इन चारों वर्णाश्रमियोंमेंसे जो अपने प्रभु भगवान् विष्णुका साक्षात् भजन नहीं करके, अपने-अपने वर्णाश्रमके अहङ्कारके कारण उनके भजनमें अवज्ञा करते हैं, वे अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर अधःपतित हो जाते हैं॥ 137 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/28 संख्या देखें ॥ 137 ॥ श्रीमद्भागवत (10/87/21) श्लोकमें श्रीधर-उद्धृत सर्वज्ञ भाष्यकार व्याख्या और नृसिंहतापनी (2/5/16)में- मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते ॥ 138 ॥ अनुवाद-मुक्तगण भी लीलासे आकर्षित होकर विग्रह स्थापित करके भगवान्का भजन करते हैं॥ 138 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 24/107 संख्या देखें ॥ 138 ॥ पूर्वोक्त छः प्रकारके आत्मारामोंका श्रीकृष्णभजन :- एइ छह आत्माराम कृष्णेरे भजय। पृथक् पृथक् च-कारे इहा 'अपि'र अर्थ कय ॥ 139 ॥ अनुवाद-आत्माराम शब्दके छः प्रकारके अर्थोंमें च-कारका ('तथा'का) अर्थ यहाँ 'अपि' ('भी') ही ग्रहण किया गया है। इसलिये 'ये छः प्रकारके आत्माराम श्रीकृष्णका भजन करते हैं'- इसका अर्थ होगा कि साधक-आत्माराम भी श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर श्रीकृष्णभजन करते हैं, ब्रह्ममय-आत्माराम भी भजन करते हैं, इसी प्रकार अन्य चारोंके लिये भी ऐसा ही जानना होगा ॥ 139 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'छय आत्माराम'-साधक, ब्रह्ममय और प्राप्त-ब्रह्मलय एवं मुमुक्षु, जीवन्मुक्त और प्राप्त-स्वरूप, -ये छय प्रकारके 'आत्माराम' हैं॥ 139 ॥ आत्माराम, मुनि और निर्ग्रन्थ व्यक्तियोंका श्रीकृष्णभजन :- “आत्मारामार्च अपि” करे कृष्णे अहैतुकी भक्ति। “मुनयः सन्तः” इति कृष्णमनने आसक्ति ॥ 140 ॥ अनुवाद-छः प्रकारके आत्माराम भी श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं। 'मुनयः सन्तः'का तात्पर्य यह है कि वे मुनि होकर श्रीकृष्ण-मननमें आसक्त होते हैं॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“ 'मुनयः सन्तः' इति श्रीकृष्णमनने आसक्ति' - आत्मारामगण 'मुनि' बनकर श्रीकृष्णमननमें आसक्त होते हैं ॥ 140 ॥ “निर्ग्रन्थाः”–अविद्याहीन, केह-विधिहीन। याँहा येइ युक्त, सेइ अर्थेर अधीन ॥ 141 ॥ अनुवाद- 'निर्ग्रन्थ'-शब्दके दो अर्थ हैं-अविद्याहीन और विधिहीन। इन दोनोंमेंसे जहाँ जो अर्थ उपयुक्त है, वही प्रयोग किया जाना चाहिये ॥ 141 ॥ अमृतानुकणा- 'एइ छह आत्माराम' - अर्थात् 'ब्रह्मसाधक', 'ब्रह्ममय' और 'प्राप्तब्रह्मलय'-ये तीन ब्रह्मोपासक (103 संख्या) और 'मुमुक्षु', 'जीवन्मुक्त' ('भक्तिसे ही जीवन्मुक्त', 'ज्ञानसे जीवन्मुक्त' नहीं-125 संख्या) और 'प्राप्तस्वरूप' (116 संख्या) - ये तीन प्रकारके मोक्षकी आकाङ्क्षा करनेवाले - इस प्रकार कुल छः प्रकारके आत्माराम हैं। उनके साथ पृथक् पृथक्-रूपमें 'च'-कारके योगसे 'अपि'का अर्थ व्यक्त हुआ है। जैसे, ब्रह्मसाधक-आत्माराम भी 'मुनि' (मननशील) होकर अर्थात् श्रीकृष्णमननमें आसक्त होकर अहैतुकी भक्ति तथा भुक्ति-मुक्ति-सिद्धिकी इच्छाओंसे शून्य होकर भक्ति । 431
[ 24/139-147 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करते हैं। इस प्रकारसे पृथक् पृथक् रूपसे कहे गये छः प्रकारके आत्मारामगणोंके क्षेत्रमें अर्थको समझना होगा। 'निर्ग्रन्थ अपि' (निर्ग्रन्थ होकर भी)—उनके विशेषणके रूपमें कहा गया है। निर्ग्रन्थ-शब्दके अर्थ अविद्या-ग्रन्थिहीन और विधिहीन हैं। यहाँपर विधिहीन कहनेसे रागमार्ग अन्तर्गत विधिहीनता नहीं है, क्योंकि पहले कहा गया है,—“निर्ग्रन्थ-शब्दे कहे,–(क) अविद्या- ग्रन्थिहीन। (ख) विधिनिषेध-वेदशास्त्र-ज्ञानादिविहीन॥” (16 संख्या)। ये दो अर्थ यहाँपर 'आत्माराम'—शब्दके अर्थके अनुसार युक्त होंगे॥ 139-141॥ अन्य एक प्रकारका अर्थ :— च-शब्दे करि यदि 'इतरेतर' अर्थ। आर एक अर्थ कहे परम समर्थ॥ 142 ॥ “आत्मारामाश्च आत्मारामाश्च” करि बार छय। पञ्च आत्माराम, छये च-कारे लुप्त हय ॥ 143 ॥ एक 'आत्माराम'-शब्दे अवशेष रहे। एक 'आत्माराम'-शब्दे छयजन कहे ॥ 144 ॥ अनुवाद—'च' शब्दका 'इतरेतर' समासके अनुसार अर्थ करनेसे आत्माराम श्लोकका अन्य एक परम उपयुक्त अर्थ निकलता है। यद्यपि छः प्रकारके आत्मारामोंके लिये 'आत्माराम'-शब्द छः बार दोहराना होगा, तथापि (संस्कृत व्याकरणके इस नियमके अनुसार) च-शब्दका 'इतरेतर' समासमें योग करनेपर पाँच आत्माराम लोप हो (समा) जाते हैं और अन्तमें एक 'आत्माराम'-शब्द ही रहता है। वही 'आत्माराम'-शब्द ही छहों आत्मारामोंको बतलाता है। (पय़ार 147 के बाद अमृतानुकणा टीका देखें) ॥ 143-144 ॥ दृष्टान्त—(विश्वप्रकाशमें और पाणिनिमें 1/2/64 और सिद्धान्त-कौमुदीमें अजन्त पुल्लिङ्ग-शब्दके प्रकरणमें) :— “स्वरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ।” उक्तार्थानामप्रयोगः। रामश्च रामश्च रामश्च रामा इतिवत् ॥ 145 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वरूपसे एक जैसे और एक विभक्तिमें जिनका अर्थ कहा जाता है, वहाँ एक स्वरूपको रखकर अन्य सब स्वरूपोंका प्रयोग नहीं होता है, जैसे,—‘रामश्च, रामश्च, रामश्च’,—इनके स्थानपर एक ‘रामाः’ शब्दका प्रयोग होता है ॥ 145 ॥ तबे ये च-कार, सेइ 'समुच्चय' कय। “आत्मारामाश्च मुनयश्च” कृष्णेरे भजय ॥ 146 ॥ अनुवाद—'च'-कारका 'समुच्चय'के (सभीको एकत्रित करके) अर्थमें प्रयोग करनेपर इस पदका अर्थ होगा— “आत्मारामाश्च मुनयश्च” अर्थात् सभी आत्मारामगण और सभी मुनिगण श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 146 ॥ सात प्रकारके अर्थ :— “निर्ग्रन्था अपि”र एइ अपि'—सम्भावने। एइ सात अर्थ प्रथमे करिलुँ व्याख्याने ॥ 147 ॥ अनुवाद—अमृतानुकणा देखें ॥ 147 ॥ अमृतानुकणा—'इतरेतर अर्थ'-योगसे 'च'-शब्दसे एक अन्य व्याख्या दी गई है। जहाँपर प्रत्येक पदकी प्रधानता रहनेपर सभी पदोंका अन्वय होता है, उस प्रकारके द्वन्द्व-समासको ही 'इतरेतर-योग' कहा जाता है। जिस स्थानपर ये सब पद एक ही विभक्ति और एक ही वचनवाले होते हैं—इतरेतर-योगसे तब उनका एक पद मात्र ही बाकी रहता है। जैसे, 'रामश्च रामश्च रामश्च'—ये तीन 'राम'-पदोंमेंसे दो पद लोप हो जानेपर अन्तमें समासबद्ध पद ‘रामाः’ होता है। उसी प्रकार ‘आत्मारामाश्च’, ‘आत्मारामाश्च’ इस रूपमें छः ‘आत्मारामाश्च’-पद 'इतरेतर'-समाससे युक्त होनेपर उनमेंसे पाँच ‘आत्मारामाश्च’-पद लुप्त हो जाते हैं और छठे ‘आत्मारामाश्च’-पदमें ‘च’-कार लुप्त होकर केवल ‘आत्मारामाः’-पद बाकी रहता है, उसके द्वारा उक्त छः प्रकारके आत्माराम ही सूचित होते हैं। यहाँपर 432 |