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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 24/70-79 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य-आदिलीला 2/11 संख्या देखें ॥ 70 ॥ श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान् और त्रिकालसत्य वस्तु :- सेइ अद्वयतत्त्व कृष्ण-स्वयं भगवान्। तिनकाले सत्य तिँहो-शास्त्र-प्रमाण ॥ 71 ॥ अनुवाद-वे अद्वय-तत्त्व श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान-इन तीनों कालोंमें सत्य हैं, इस विषयमें शास्त्र ही प्रमाण है ॥ 71 ॥ सृष्टिसे पहले और बादमें श्रीकृष्णका नित्य अधिष्ठान :- श्रीमद्भागवत (2/9/32)में- अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत् सदसत्परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत् सोऽस्म्यहम् ॥ 72 ॥ अनुवाद-इस जगत्की सृष्टिके पूर्व केवल मैं ही था। सत्, असत् और अनिर्वचनीय निर्विशेष ब्रह्म तक कुछ भी मुझसे पृथक् रूपसे नहीं था। सृष्टि होनेके बाद इस सम्पूर्ण-स्वरूपमें मैं ही हूँ और सृष्टिकी प्रलय होनेके बाद भी एकमात्र मैं ही अवशिष्ट रहूँगा ॥ 72 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/53 संख्या देखें ॥ 72 ॥ आत्मा-शब्दका अर्थ विभु श्रीकृष्ण :- 'आत्मा'-शब्दे कहे कृष्ण बृहत्त्वस्वरूप। सर्वव्यापक, सर्वसाक्षी, परमस्वरूप ॥ 73 ॥ अनुवाद-'आत्मा'-शब्दसे श्रीकृष्णका बृहत्-स्वरूप कहा गया है। वे सर्वव्यापक, सबके साक्षी और परम स्वरूपसे युक्त हैं ॥ 73 ॥ श्रीमद्भागवत (11/2/45) श्लोककी व्याख्यामें श्रीधरस्वामि-उद्धृत तन्त्र-वचन :- आततत्वाच्च मातृत्वादात्मा हि परमो हरिः ॥ 74 ॥ अनुवाद-सर्वव्यापक और सबकी सृष्टि करनेवाले होनेके कारण हरि ही परमात्मा हैं ॥ 74 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 24/68 संख्या देखें ॥ 74 ॥ तीन प्रकारके अभिधेयमें श्रीकृष्णकी तीन प्रकारकी प्रतीति-ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् :- सेइ कृष्णप्राप्ति-हेतु त्रिविध 'साधन'। ज्ञान, योग, भक्ति,-तिनेर पृथक् लक्षण ॥ 75 ॥ तिन साधने भगवान् तिन स्वरूपे भासे। ब्रह्म, परमात्मा, भगवान्-त्रिविध-प्रकाशे ॥ 76 ॥ अनुवाद-ज्ञान, योग और भक्ति-ये तीन प्रकारके 'साधन' उन श्रीकृष्णकी प्राप्तिके कारण स्वरूप हैं और तीनोंके अलग-अलग लक्षण हैं। भगवान् इन तीन प्रकारके साधनोंके अनुरूप ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्-इन तीन रूपोंमें प्रकाशित होते हैं ॥ 75-76 ॥ श्रीमद्भागवत (1/2/11)में- वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ 77 ॥ अनुवाद-तत्त्वको जाननेवाले विज्ञगण अद्वयज्ञानको तत्त्व कहते हैं। उसी अद्वयज्ञानकी प्रथम प्रतीति ब्रह्म, द्वितीय प्रतीति परमात्मा और तृतीय प्रतीति भगवान् हैं ॥ 77 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/11 संख्या देखें ॥ 77 ॥ 'ब्रह्म-आत्मा'-शब्दे यदि कृष्णेरे कहय। 'रूढ़ि-वृत्त्ये' निर्विशेष अन्तर्यामी कय ॥ 78 ॥ अनुवाद-यद्यपि 'ब्रह्म' और 'आत्मा'-शब्द श्रीकृष्णको ही सूचित करते हैं, तथापि रूढ़िवृत्तिसे (प्रत्यक्षरूपसे) इन शब्दोंका अर्थ क्रमशः निर्विशेष ब्रह्म और अन्तर्यामी (परमात्मा) सूचित होता है ॥ 78 ॥ ज्ञानमार्गमें चिन्मात्र ब्रह्म, योगमार्गमें सचिन्मय परमात्म-प्रतीति :- ज्ञानमार्गे-निर्विशेष-ब्रह्म प्रकाशे। योगमार्गे-अन्तर्यामि-स्वरूपेते भासे ॥ 79 ॥ अनुवाद-अद्वयज्ञान श्रीकृष्ण ज्ञानमार्गके साधकोंके 420 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/79-84 ]

लिये निर्विशेष-ब्रह्मके रूपमें और योगमार्गके साधकोंके समक्ष अन्तर्यामी-परमात्माके स्वरूपमें ही प्रकाशित होते हैं॥ 79॥

दो प्रकारकी भक्ति (रागमयी और वैधी)के द्वारा दो प्रकारके भगवद्-स्वरूप (स्वयं श्रीकृष्ण और उनके प्रकाश)की प्राप्ति :- रागभक्ति, विधिभक्ति हय दुइरूप। 'स्वयं-भगवत्ता', 'प्रकाश'-दुइत' स्वरूप ॥ 80 ॥

रागानुगा-भक्तिकी सिद्धि होनेपर व्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन, वैधीभक्तिकी सिद्धि होनेपर वैकुण्ठमें श्रीनारायणका दास्य :- रागभक्त्ये व्रजे स्वयं-भगवाने पाय। विधिभक्त्ये पार्षददेहे वैकुण्ठके याय ॥ 81 ॥

अनुवाद - भक्ति दो प्रकारकी होती है-रागभक्ति और वैधीभक्ति। रागभक्तिके द्वारा साधक 'स्वयं-भगवान्' और वैधीभक्तिके द्वारा साधक 'भगवद्-प्रकाश' - इन दो स्वरूपोंको प्राप्त करते हैं। रागभक्तिके पालनसे साधकको व्रजमें स्वयं-भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है। वैधीभक्तिके पालनसे साधक पार्षद-देह प्राप्त करके वैकुण्ठमें जाता है॥ 80-81॥

श्रीमद्भागवत (10/9/21) में- नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः। ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥ 82 ॥

अनुवाद-यशोदानन्दन भगवान् श्रीकृष्ण भक्तिमान् देहधारियोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, आत्मभूत ज्ञानियोंके लिये वैसे नहीं हैं॥ 82 ॥

अनुभाष्य-मध्यलीला 8/227 संख्या देखें ॥ 82 ॥

श्रीमद्भागवत (3/15/25)में- यच्च व्रजन्त्यनिमिषामृषभानुवृत्त्या दूरे-यमा ह्युपरि नः स्पृहणीयशीलाः। भर्तुर्मिथः सुयशसः कथनानुराग- वैक्लव्यवाष्पकलया पुलकीकृताङ्गाः ॥ 83 ॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 83 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य-परस्पर श्रीकृष्णकथाके वर्णनमें जिनके अनुरागसे विवश होकर अश्रु बहते हैं और अङ्ग पुलकित हो जाते हैं, वे देवादिदेव (देवोंके भी आदि देव) श्रीकृष्णका अनुसरण करते हुए यम-नियमादिको दूर फेंककर स्पृहाशील होकर हमारे (सत्यलोकके) ऊपर स्थित वैकुण्ठमें गमन करते हैं॥ 83 ॥

अनुभाष्य-व्यास-सखा श्रीमैत्रेय ऋषि श्रीविदुरको दितिके गर्भसे भयभीत देवताओंके निकट ब्रह्माके द्वारा दितिके गर्भमें स्थित दो असुरोंके पूर्व-वृत्तान्तको बतलाते हुए चतुःसनादिके वैकुण्ठ-गमनके उपाख्यानके वर्णनके प्रसङ्गमें वैकुण्ठके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं,-

अनिमिषां (कालानधीनानां देवानाम्) ऋषभानुवृत्त्या (ऋषभस्य श्रेष्ठस्य श्रीहरेः अनुवृत्त्या अनुसरणेन) दूरे-यमाः (दूरे यमः येषां ते, यद्वा, दूरीकृतयमनियमाः) स्पृहणीयशीलाः (स्पृहणीयं कारुण्यादि शीलं येषां ते) भर्तुः (हरेः) सुयशसः (सुमङ्गल- लीलागुणस्य) मिथः (परस्परं) कथानुरागवैक्लव्यवाष्पकलया (कथने वर्णने यः अनुरागः, तेन वैक्लव्य वैवश्यः तेन वाष्पकला अश्रुबिन्दुः तया सह) पुलकीकृताङ्गाः (पुलकीकृतं रोमाञ्चितम् अङ्गं येषां ते तथाभूताः) च नः (अस्माकम्) उपरि (उपरिस्थितं) यत् च [वैकुण्ठं] व्रजन्ति (गच्छन्ति) [तत् विकुण्ठमुपेत्य मुनयः परां मुदमापुरिति परेणान्वयः]।

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [इस श्लोकका अगले श्लोकके तीसरे और चौथे चरणके साथ अन्वय करें।]॥ 83 ॥

तीन प्रकारके उपासक :- सेइ उपासक हय त्रिविध प्रकार। अकाम, मोक्षकाम, सर्वकाम आर ॥ 84 ॥

अनुवाद-वे उपासक (साधक) भी तीन प्रकारके होते हैं-अकाम (सभी प्रकारकी स्वसुख कामनाओंसे रहित), मोक्षकाम (मोक्षकी कामनासे युक्त) और सर्वकाम (सब प्रकारकी कामनाओंसे युक्त) ॥ 84 ॥

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[ 24/85-89 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीमद्भागवत (2/3/10)में— अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥ 85॥ अनुवाद—पहले कोई 'अकाम' अर्थात् सर्वकामनाओंसे रहित हो अथवा 'सर्वकाम' अर्थात् सब प्रकारकी कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्षकी कामना करनेवाला ही क्यों न हो, उदार-बुद्धि होने मात्रसे ही मनुष्य तीव्र शुद्धभक्तियोगसे परमपुरुष श्रीकृष्णका भजन करेंगे॥ 85॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/36 संख्या देखें ॥ 85 ॥ 'उदारधी' शब्दका अर्थ :— बुद्धिमान्—अर्थे—यदि विचारज्ञ हय। निज-काम लागिह तबे कृष्णेरे भजय ॥ 86 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 86 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस श्लोकमें यदि कोई उदारधी अर्थात् बुद्धिमान् अर्थात् विचारवान् हो, तो वह कामना-वासनाके रहनेपर भी श्रीकृष्णका ही भजन करेगा ॥ 86 ॥ सब प्रकारके साधन ही भक्ति-सापेक्ष, भक्ति ही केवल निरपेक्ष :— भक्ति बिना कोन साधन दिते नारे फल। सब फल देय भक्ति स्वतन्त्र प्रबल ॥ 87 ॥ अनुवाद—भक्तिके बिना कोई भी साधन फल प्रदान नहीं कर सकता, किन्तु भक्ति अन्यान्य साधनोंकी अपेक्षासे रहित स्वतन्त्र और बहुत अधिक बलशाली है॥ 87 ॥ भक्तिके आश्रयके बिना अन्य साधन, सभी निष्फल :— अजागलस्तन-न्याय अन्य साधन। अतएव हरि भजे बुद्धिमान् जन ॥ 88 ॥ अनुवाद—जिस प्रकार बकरेके गलेके पास लटकते स्तन (मांसके पिण्ड) दूध देनेमें असमर्थ होते हैं, उसी प्रकार भक्तिके अतिरिक्त अन्य समस्त साधन भी किसी फलको प्रदान करनेमें समर्थ नहीं हैं। इसलिये बुद्धिमान व्यक्ति भगवान् श्रीहरिका ही भजन करते हैं ॥ 88 ॥ अनुभाष्य—भक्तिके अतिरिक्त अन्य प्रकारके साधन पूर्णतया निष्फल हैं, वे कभी भी फल प्रदान नहीं कर सकते। क्योंकि बकरेके गलेमें लटके हुए स्तन जिस प्रकार दूध नहीं दे सकते, केवलमात्र अनभिज्ञ लोगोंके झूठे भ्रमका ही विषय होते हैं, उसी प्रकार भक्तिके अतिरिक्त ज्ञान और कर्मके साधनका कोई फल नहीं होता॥ 88 ॥ भोगकामी और मोक्षकामीके भेदसे चार प्रकारके अनर्थयुक्त सुकृतिवान् लोग; वैसा होनेपर भी ये चार प्रकारकी कामनाएँ निष्काम भक्तिका कारण नहीं :— श्रीमद्भगवद्गीता (7/16)में— चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ 89 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 89 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे अर्जुन! आर्त्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी—ये चार प्रकारके लोग भक्ति- उन्मुखी सुकृतिवान् होनेपर, उन-उन कामनाओंका परित्याग करके मेरा भजन करते हैं ॥ 89 ॥ अनुभाष्य— हे अर्जुन, हे भरतर्षभ, सुकृतिनः (वर्णाश्रमाचारलक्षण-धर्मपराः) जनाः मां भजन्ते; ते च चतुर्विधाः—आर्त्तः (क्लिष्टः आपद्ग्रस्तः— गजेन्द्रादिः), जिज्ञासुः (आत्मस्वरूपज्ञानेच्छुः—शौनकादिः), अर्थार्थी (सुखसम्पदिच्छुः ध्रुवादि,—एते सकामाः), ज्ञानी (लब्ध-बोधः— शुकादिः, अयं तु निष्कामः) च। श्लोक-भावानुवाद—हे अर्जुन, हे भरतर्षभ, सुकृतिवान् अर्थात् वर्णाश्रम-धर्मपरायण लोग मेरा भजन करते हैं; वे चार प्रकारके होते हैं—आर्त्ति (दुःखी या विपदाग्रस्त—गजेन्द्रादि), जिज्ञासु (आत्मस्वरूपको जाननेके इच्छुक—शौनकादि), अर्थार्थी (सुख-सम्पत्तिके इच्छुक— ध्रुवादि) और ज्ञानी (ज्ञान-प्राप्त—शुकदेवादि, ये निष्काम होते हैं) ॥ 89 ॥ 422 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/90-95 ] आर्त्त और अर्थार्थी-भोगकामी; जिज्ञासु और ज्ञानी-मुक्तिकामी :- आर्त्त, अर्थार्थी, - दुइ सकाम-भितरे गणि। जिज्ञासु, ज्ञानी, - दुइ मोक्षक़ामी मानि ॥ 90 ॥ अनुवाद-मैं आर्त्त और अर्थार्थी-इन दोनोंको सकाम भक्त तथा जिज्ञासु और ज्ञानी-इन दोनोंको मोक्षकी कामना करनेवाला मानता हूँ ॥ 90 ॥ चार प्रकारकी कामनाओंको छोड़नेसे ही शुद्धभक्तिको प्राप्त करनेकी योग्यता :- एइ चारि सुकृति हय महाभाग्यवान्। तत्तत्कामादि छाड़ि' हय शुद्धभक्तिमान् ॥ 91 ॥ अनुवाद-ये चारों प्रकारके सुकृतिशाली व्यक्ति महाभाग्यशाली होते हैं। सुकृतिके प्रभावसे वे धीरे-धीरे अपनी-अपनी कामनाओंको छोड़कर शुद्धभक्त बन जाते हैं ॥ 91 ॥ चार प्रकारकी कामनाएँ ही दुःसङ्ग, साधुगुरु-श्रीकृष्णकी कृपासे दुःसङ्गका दूर होना :- साधुसङ्ग-कृपा किंवा कृष्णेर कृपाय। कामादि 'दुःसङ्ग' छाड़ि' शुद्धभक्ति पाय ॥ 92 ॥ अनुवाद-साधुसङ्ग-कृपा अथवा श्रीकृष्णकी कृपासे वे कामनाओंरूपी 'दुःसङ्ग'को छोड़कर शुद्धभक्ति प्राप्त करते हैं॥ 92 ॥ सत्सङ्गका प्रभाव :- श्रीमद्भागवत (1/10/11)में- सत्सङ्गान्मुक्त-दुःसङ्गो हातुं नोत्सहते बुधः। कीर्त्यमानं यशो यस्य सकृदाकर्ण्य रोचनम् ॥ 93 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 93 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सत्सङ्ग करते हुए दुःसङ्गका परित्याग करके पण्डित-व्यक्ति भगवान्के कीर्तन करने योग्य और रुचिकर यशको एकबार सुनकर उन्हें कभी भी परित्याग नहीं कर सकते ॥ 93 ॥ अनुभाष्य-धर्मराज युधिष्ठिरका राज्य-अभिषेक करनेके बाद कुछ मास हस्तिनापुरमें रहनेके बाद श्रीकृष्ण द्वारका जानेकी अभिलाषा करके कुरु-पाण्डव कुलके स्त्री-पुरुष सभीका यथाविधि यथायोग्य अभिवादन करके उनसे विदायी लेकर रथपर चढ़े, शौनकादि ऋषियोंको श्रीसूत हस्तिनापुरवासियोंके श्रीकृष्ण-विरहमें अधीर होनेके प्रसङ्गमें साधुसङ्गके माधुर्यके विषयमें बतला रहे हैं,- सत्सङ्गात् (कृष्णभक्तसङ्गात् हेतोः) मुक्तदुःसङ्गः (मुक्तः ज्ञानकर्म्मान्याभिलाषविषयः पुत्रादिविषयो वा दुःसङ्गो येन सः) बुधः (सुधीः) कीर्त्यमानम् (उच्चार्यमाणं) यस्य (श्रीकृष्णस्य) रोचनं (रुचिकरं) यशं सकृत् आकर्ण्य (श्रुत्वा) हातुं (सत्सङ्गं त्यक्तुं) न उत्सहते, [तस्य विरहं पार्थाः कथं सहेरन्निति परेणान्वयः]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [अगले श्लोकके प्रथम और द्वितीय चरणके साथ इसका अन्वय करें।] ॥ 93 ॥ दुःसङ्गका अर्थ :- 'दुःसङ्ग' कहिये-'कैतव', 'आत्मवञ्चना'। कृष्ण, कृष्णभक्ति बिना अन्य कामना ॥ 94 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण और श्रीकृष्ण भक्तिके अतिरिक्त अन्य कामनाओंको हृदयमें रखना ही कैतव' (कपटता) तथा 'आत्मवञ्चना' (अपनेको ही ठगना) है। इसीको 'दुःसङ्ग' कहते हैं॥ 94 ॥ अनुभाष्य-छल-कपटके द्वारा अपनी वञ्चना करना ही 'दुःसङ्ग' है। श्रीकृष्णकाम और श्रीकृष्णभक्तिकी कामनाके अतिरिक्त अन्य समस्त कामनाएँ ही 'दुःसङ्ग' हैं॥ 94 ॥ श्रीमद्भागवत (1/1/2)में- धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्। श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किंवा परैरीश्वरः सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ 95 ॥ । 423

[ 24/95-101 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अनुवाद—यह श्रीमद्भागवत ग्रन्थ सर्वप्रथम महामुनि श्रीनारायणके द्वारा चतुःश्लोकी (अर्थात् चार श्लोकों)के रूपमें निर्मित है। इसमें निर्मत्सर अर्थात् सब जीवोंके प्रति दयालु व्यक्तियोंके लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तक कैतवसे शून्य अर्थात् छलरहित परमधर्मकी व्याख्या हुई है। यह धर्म जीवके त्रितापका नाश करनेवाला, शिवद अर्थात् मङ्गल प्रदान करनेवाला और वास्तव-वस्तुके तत्त्व-ज्ञानको प्रदान करनेवाला है। इसको श्रवण करनेके इच्छुक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार ईश्वरको अपने हृदयमें अवरुद्ध करनेमें समर्थ होते हैं। इसलिये श्रीमद्भागवतके अतिरिक्त अन्य किसी शास्त्रकी क्या आवश्यकता है ? ॥ 95 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/91 संख्या देखें ॥ 95 ॥ 'प्र'-शब्दे—मोक्षवाञ्छा कैतवप्रधान। एइ श्लोके श्रीधरस्वामी करियाछेन व्याख्यान ॥ 96 ॥ अनुवाद—उपरोक्त श्लोकके 'प्र'-शब्दसे समझना चाहिये कि मोक्षकी कामना ही प्रधान कैतव (कपटता) है। इस श्लोककी टीकामें श्रीधरस्वामीने ऐसी व्याख्या की है ॥ 96 ॥ सकाम-भक्ते 'अज्ञ' जानि' दयालु भगवान्। स्व-चरण दिया करे इच्छार पिधान ॥ 97 ॥ अनुवाद—सकाम भक्तको 'अज्ञ' (मूर्ख) जानकर दयालु भगवान् उसे अपने श्रीचरणका आश्रय प्रदान करके उसकी अनुचित कामनाओंको आच्छादित कर देते हैं ॥ 97 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'इच्छार पिधान'—इच्छाका आच्छादन (परिपूरण) ॥ 97 ॥ श्रीमद्भागवत (5/19/26)में— सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां नैवार्थदो यत् पुनरर्थिता यतः। स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता- मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम् ॥ 98 ॥

अनुवाद—श्रीकृष्ण प्रार्थना किये जानेपर मनुष्योंकी प्रार्थनाको पूर्ण करते हैं, यह बात सत्य है। किन्तु जिस अर्थसे (भोगकी वस्तुसे) बार-बार भोगके लिये प्रार्थना उदित होती है, श्रीकृष्ण उस अर्थको नहीं देते। अन्यकामी होकर जो एकमात्र उनके पादपल्लवको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं करनेपर भी उनका भजन करते हैं, श्रीकृष्ण उन्हें स्वयं ही अन्य-कामनाओंको शान्त कर देनेवाले अपने चरणकमलोंको दिया करते हैं ॥ 98 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/40 संख्या देखें ॥ 98 ॥ शुद्धभक्तके सङ्ग, सेवा और श्रीकृष्णकृपासे ही अनर्थ-निवृत्ति और सिद्धिकी प्राप्ति :— साधुसङ्ग, कृष्णकृपा, भक्तिर स्वभाव। ए तिने सब छाड़ाय, करे कृष्णे 'भाव' ॥ 99 ॥ अनुवाद—साधुसङ्ग, श्रीकृष्ण-कृपा और श्रीकृष्ण- भक्तिका स्वभाव ही ऐसा है कि ये तीनों अन्य सब वस्तुओंको छुड़ाकर धीरे-धीरे श्रीकृष्णके प्रति भावको उत्पन्न करा देते हैं ॥ 99 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अकाम, सर्वकाम, और मोक्षकाम,—ये तीन प्रकारके व्यक्ति उन-उन कामनाओंके दोषोंको छोड़कर श्रीकृष्णकी शुद्धभक्ति करते हैं ॥ 99 ॥ अनुभाष्य—'एइ तिने'—श्रीकृष्णभक्तोंका सङ्ग, श्रीकृष्णकृपा और श्रीकृष्णभक्ति। ये श्रीकृष्णके अभक्तोंका सङ्ग, मायाके द्वारा प्रदान किये गये समस्त सौभाग्य और अन्याभिलाष, कर्म, ज्ञान और योग-प्रवृत्ति आदि सबकुछ छुड़ाकर श्रीकृष्णके प्रति 'भाव' उत्पन्न करते हैं ॥ 99 ॥ बादकी सभी व्याख्याओंमें यही जानने योग्य :— आगे यत यत अर्थ व्याख्यान करिब। कृष्णगुणास्वादेर एइ हेतु जानिब ॥ 100 ॥ श्लोकव्याख्या लागि' एइ करिलुँ आभास। एबे करि श्लोकेर मूलार्थ प्रकाश ॥ 101 ॥

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चौबीसवाँ अध्याय 24/100-109 ] अनुवाद—आगे मैं (आत्मारामश्च) श्लोकके शब्दोंकी क्रमशः व्याख्या करूँगा, हे सनातन, तुम उन्हें श्रीकृष्णके गुणोंका आस्वादन करनेका कारण समझना। मैंने अब तक उसकी भूमिका बनायी है, अब मैं उसके मुख्य अर्थको प्रकाशित कर रहा हूँ॥ 100-101 ॥ ज्ञानियोंके दो प्रकारके विभेद :- ज्ञानमार्गे उपासक—दुइत' प्रकार। केवल ब्रह्मोपासक, मोक्षाकाङ्क्षी आर॥ 102 ॥ (1) केवल-ब्रह्मज्ञानी तीन प्रकारके :- केवल ब्रह्मोपासक तिन भेद हय। साधक, ब्रह्ममय, आर प्राप्त-ब्रह्मलय ॥ 103 ॥ भक्ति-आश्रित ज्ञानके साधनसे ही साधकका ब्रह्मभूत होना :- भक्ति बिना केवल ज्ञाने 'मुक्ति' नाहि हय। भक्ति साधन करे येइ 'प्राप्त-ब्रह्मलय' ॥ 104 ॥ वास्तव-वस्तुके आनुगत्यमें अथवा भक्तिफलसे ही 'ब्राह्मणत्व' और सेवाके संयोगसे ही 'वैष्णवत्व' :- भक्तिर स्वभाव, —ब्रह्म हैते करे आकर्षण। दिव्य देह दिया कराय कृष्णेर भजन ॥ 105 ॥ वैष्णव होनेपर ही श्रीकृष्णसेवाका अनुष्ठान :- भक्तदेह पाइले हय गुणेर स्मरण। गुणाकृष्ट हञा करे निर्मल भजन ॥ 106 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 102-106 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानमार्गके उपासक केवल- ब्रह्मोपासक और मोक्ष-आकाङ्क्षीके भेदसे दो प्रकारके हैं। कैवल्य-वासनासे ब्रह्मकी उपासना करनेवाले 'केवल-ब्रह्मोपासक' होते हैं। उनकी तीन अवस्थाएँ— साधक, (नित्यसिद्ध) ब्रह्ममय और ब्रह्मलय-प्राप्त (अर्थात् ब्रह्मभूत) हैं। भक्तिके बिना ज्ञान मुक्ति नहीं दे सकता। जो व्यक्ति ब्रह्मलयप्राप्त (अर्थात् ब्रह्मभूत हो गया है), वही भक्तिसाधन कर सकता है। भक्तिसाधनके उपस्थित होनेपर भक्तिका स्वभाव उपस्थित होता है। उस स्वभावके प्रभावसे भक्ति (उन्हें) ब्रह्मसे आकर्षण करके दिव्य देह देकर श्रीकृष्णभजन कराती है। भक्तको अप्राकृत देह प्राप्त होनेपर श्रीकृष्णके सभी गुणोंका स्मरण होता है और भक्त उन गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर निर्मल भजन करता है॥ 102-106 ॥ मुक्तगणोंकी भी अप्राकृत सिद्धदेहमें भगवत्-सेवा :- श्रीमद्भागवत (10/87/21) श्लोकमें श्रीधर-उद्धृत सर्वज्ञ भाष्यकार व्याख्या और नृसिंहतापनी (2/5/16)में— मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते॥ 107 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मुक्तगण भी लीलासे आकर्षित होकर विग्रह स्थापित करके भगवान्का भजन करते हैं॥ 107 ॥ ब्रह्ममय शुक और चतुःसनादि भी श्रीकृष्णके प्रति आकृष्ट होकर श्रीकृष्ण भजनमें रत :- जन्म हैते शुक-सनकादि 'ब्रह्ममय'। कृष्णगुणाकृष्ट हञा कृष्णेरे भजय ॥ 108 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीशुकदेव गोस्वामी और सनकादि चार कुमार जन्मसे ही 'ब्रह्ममय' थे, किन्तु बादमें श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर उन्होंने श्रीकृष्णका भजन किया ॥ 108 ॥ चतुःसनादि श्रीकृष्णचरणकी गन्धसे आकृष्ट होकर शुद्धभक्तिमें रत :- सनकाद्येर श्रीकृष्णकृपाय सौरभे हरे मन। गुणाकृष्ट हञा करे निर्मल भजन ॥ 109 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीसनकादिके मनको श्रीकृष्णके श्रीचरणोंमें समर्पित तुलसी आदिकी सुगन्धने हरण कर लिया था। इस प्रकार उन्होंने श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर उनका शुद्ध भजन किया था ॥ 109 ॥ । 425

[ 24/110-115 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीमद्भागवत (3/15/43)में— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ 110 ॥ अनुवाद-उन कमल-नेत्र-भगवान्के पदकमलकी पराग-मिश्रित तुलसीकी मधुरगन्धयुक्त वायुने सनकादि चार कुमारोंकी नासिकाके छिद्रके माध्यमसे अन्दर जाकर निर्विशेष-ब्रह्मपरायण उनके चित्त और देहमें क्षोभ उत्पन्न कर दिया था ॥ 110 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 17/142 संख्या देखें ॥ 110 ॥ व्यासदेवकी कृपासे उनके शिष्य शुक श्रीकृष्णलीलाके प्रति आकृष्ट होकर शुद्धभक्तिमें रत :- व्यासकृपाय शुकदेवेर लीलादि-स्मरण। कृष्णगुणाकृष्ट हञा करेन भजन ॥ 111 ॥ अनुवाद-श्रीव्यासदेवकी कृपासे श्रीशुकदेवको श्रीकृष्णकी लीलादिका स्मरण हुआ था। श्रीशुकदेवने भी श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर उनका भजन किया था॥ 111 ॥ श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर श्रौतपन्थी शुकका व्यासदेवसे भागवत-अध्ययन :- श्रीमद्भागवत (1/7/11)में— हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः। अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥ 112 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 112 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मति हरिके गुणोंसे आकृष्ट होनेपर वैष्णवप्रिय भगवान् शुकदेवने इस महद्-आख्यानका (महापुराण श्रीमद्भागवतका) अध्ययन किया था॥ 112 ॥ अनुभाष्य-‘निवृत्तिमें पूर्णरत, सर्वत्र-उपेक्षाशील, आत्माराम ब्रह्मज्ञानी श्रीशुकदेवने किस कारण इस श्रीमद्भागवतका अध्ययन किया था?’—शौनकके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूत उसके कारणका वर्णन कर रहे हैं,— नित्यं विष्णुजनप्रियः (विष्णुजनाः प्रियाः यस्य सः) भगवान् बादरायणिः (वैयासकिः श्रीशुकः) हरेः गुणाक्षिप्तमतिः (गुणेन आक्षिप्ता मतिः यस्य सः हरिगुणानुवादाकृष्टचित्तः सन्) महदाख्यानम् (इदं श्रीभागवतं महापुराणम्) अध्यगात् (अधीतवान्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 112 ॥ श्रौतपन्थी ब्रह्मज्ञानी नव-योगेन्द्रोंका श्रीकृष्णगुणके श्रवणसे श्रीकृष्णभजन :- नव-योगीश्वर जन्म हैते ‘साधक’-ज्ञानी। विधि-शिव-नारद-मुखे कृष्णगुण शुनि’ ॥ 113 ॥ गुणाकृष्ट हञा करे कृष्णेर भजन। एकादश-स्कन्धे ताँर भक्ति-विवरण ॥ 114 ॥ अनुवाद-(ऋषभदेवके नौ योगी पुत्र) नव-योगीश्वर (नवयोगेन्द्र) जन्मसे ही ‘साधक’ ब्रह्मज्ञानी थे। किन्तु ब्रह्मा, शिव, नारदके मुखसे श्रीकृष्णके गुणोंके विषयमें श्रवण करके वे श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकर्षित हुए और तब उन्होंने श्रीकृष्णका भजन किया। श्रीमद्भागवतके एकादश स्कन्धमें उनकी भक्तिका विवरण प्राप्त होता है॥ 113-114 ॥ शास्त्र-प्रमाण :- भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/20)में उद्धृत महोपनिषद्-वाक्य— अक्लेशां कमलभुवः प्रविश्य गोष्ठीं कुर्वन्तः श्रुतिशिरसां श्रुतिं श्रुतज्ञाः। उत्तुङ्गं यदुपुरसङ्गमाय रङ्गं योगीन्द्राः पुलकभृतो नवाप्यवापुः ॥ 115 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 115 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वेदोंमें कुशल नवयोगेन्द्र जहाँ क्लेशका कोई स्थान नहीं है, ऐसी ब्रह्माजीकी सभामें प्रविष्ट हुए। वहाँ ब्रह्माजीसे उपनिषदोंके वास्तविक अर्थोंका (श्रीकृष्णकी महिमाका) श्रवण करके वे पुलकित देहसे यदुपुरी द्वारकामें जानेके इच्छुक हुए। 426

इस प्रकार अन्तमें उन्हें अति उच्च 'रङ्गक्षेत्र' प्राप्त हुआ था॥ 115॥ अनुभाष्य- श्रुतज्ञाः (वेदकुशलाः) नवयोगीन्द्राः (जायन्तेयाः) कमलभुवः (पद्मयोनेः) अक्लेशां (क्लेशवर्जितां) गोष्ठीं (सभां) प्रविश्य, श्रुतिशिरसाम् (उपनिषदां) श्रुतिं (श्रवणं) कुर्वन्तः अपि यदुपुरसङ्गमाय (द्वारकां गन्तुमित्यर्थः) पुलकभृतः (रोमाञ्चितदेहाः सन्तः) उत्तुङ्गम् (अत्युच्चं) रङ्गं (रङ्गक्षेत्रम्) अवापुः (प्राप्तवन्तः) । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 115॥ (2) मोक्षाकाङ्क्षीके तीन प्रकारके भेद :- मोक्षाकाङ्क्षी ज्ञानी हय तिनप्रकार। मुमुक्षु, जीवन्मुक्त, प्राप्तस्वरूप आर॥ 116॥ अनुवाद-मोक्षकी (ब्रह्ममें लीन होनेकी) आकाङ्क्षा करनेवाले ज्ञानी तीन प्रकारके होते हैं-(1) मुमुक्षु (मुक्तिकामी), (2) जीवन्मुक्त (प्राकृत देह रहते हुए भी मुक्त) और (3) प्राप्त-स्वरूप (जिन्हें अपने नित्य स्वरूपकी प्राप्ति हो गयी है) ॥ 116 ॥ (क) मुक्तिकामी विषयी व्यक्तियोंका भक्तिके आश्रयमें श्रीकृष्णभजन :- 'मुमुक्षु' अनेक जगते संसारी जन। 'मुक्ति' लागि' भक्त्ये करे कृष्णेर भजन॥ 117 ॥ अनुवाद-जगत्में अनेक संसारी व्यक्ति 'मुक्तिकामी' हैं। 'मुक्ति'के लिये वे भक्तिके द्वारा श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 117॥ श्रीमद्भागवत (1/2/26)में- मुमुक्षवो घोररूपान हित्वा भूतपतीनथ। नारायण-कलाः शान्ता भजन्ति ह्यनसूयवः ॥ 118 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 118॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मुक्तिकामी व्यक्ति घोररूपी भूतपतियोंका परित्यागकर, किन्तु उनके प्रति असूया-रहित (ईर्ष्या-द्वेष-रहित) होकर श्रीनारायणकी सभी कलाओंका भजन करते हैं॥ 118॥


अनुभाष्य-कल्याण चाहनेवाले बुद्धिमान व्यक्ति अधोक्षज विष्णुकी अथवा उनके अवतारोंकी और सकाम अशान्त स्वभाववाले उपासक व्यक्ति विष्णुके अतिरिक्त अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, यही श्रीसूत गोस्वामी शौनकादि ऋषियोंको बतला रहे हैं,- [ननु अन्यानपि केचिद्भजन्तो दृश्यन्ते? सत्यं, मुमुक्षवस्तु अन्यान् न भजन्ति, किन्तु सकामा एवेत्याह]-अथ (अतएव) घोररूपान् (भीषणाकृतीन्) भूतपतीन् (पितृभूतप्रजेशादीन्) हित्वा (त्यक्त्वा) मुमुक्षवः (निःश्रेयसार्थिनः ज्ञानिनः) अनसूयवः (अहिंस्रव्रताः देवान्तरानिन्दकाः) शान्ताः (निष्कामाः सन्तः) नारायणकलाः (नारायणस्य अंशावतारान्) हि भजन्ति। श्लोक-भावानुवाद-[निश्चय ही कई लोग विष्णुके अतिरिक्त अन्योंका क्यों भजन करते दिखायी देते हैं? यह सत्य है, यद्यपि मुक्तिकामी अन्योंका भजन नहीं करते हैं, तथापि सकाम व्यक्ति ही ऐसा करते हैं, इसलिये कह रहे हैं-] आगे अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 118॥ साधुसङ्गसे मुक्तिकी कामना-त्याग :- सेइ सबेर साधुसङ्गे गुण स्फुराय। कृष्णभजन कराय, 'मुमुक्षा' छाड़ाय॥ 119॥ अनुवाद-वे सब मुक्तिकामी लोग यदि साधुसङ्ग (शुद्धभक्तोंका सङ्ग) करते हैं, तब वे श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर 'मुक्तिकी कामना' छोड़कर श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 119॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चतुःसन और शुकदेवकी ब्रह्ममयता और नवयोगेन्द्रोंका साधक होना दिखलाकर, 'मुमुक्षु', 'जीवन्मुक्त' और 'प्राप्त-स्वरूप'-इस प्रकारके तीन प्रकारके मोक्षाङ्काक्षी ज्ञानियोंकी बातका विचार करते हुए सर्वप्रथम मुक्तिकामियोंकी बात कह रहे हैं। उन मुक्तिकामियोंको साधुसङ्गमें जब भगवान्के गुणोंकी स्फूर्ति होती है, तब वे मुक्तिकी कामनाको छोड़कर श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 119॥


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[ 24/120-125 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सत्सङ्गके गुण और महिमा :— भक्तिरसामृतसिन्धु (3/2/27)में उद्धृत हरिभक्तिसुधोदय-वचन— अहो महात्मन् बहुदोषदुष्टोऽप्येकेन भात्येष भवो गुणेन। सत्सङ्गमाख्येन सुखावहेन कृताद्य नो येन कृशा मुमुक्षा॥120॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे महात्मन्! इस भवसंसारमें बहुत दोष रहनेपर भी साधुसङ्गरूपी एक महान् गुण है। उसी एक नित्यकल्याणप्रद गुणके द्वारा अब हमारी मुक्तिकी इच्छा दुर्बल हो गयी है॥120॥ अनुभाष्य— हे महात्मन्, अहो एष भवः (मानवजन्म) बहुदोषदुष्टः (अशेषदोषाकरभूतः) अपि सुखावहेन (अर्थदेन, नित्यकल्याण-प्रदेन) सत्सङ्गमाख्येन (साधुसङ्गनाम्ना) एकेन गुणेन भाति (दीप्यति), येन (गुणेन) अद्यः नः (अस्माकं) मुमुक्षा (मोक्षवाञ्छा) कृशा कृता (क्षयीभूता भवति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥ जिज्ञासु मुक्तिकामी शौनकादिका शुद्धभक्तके सङ्गसे मुक्तिकी कामनाका त्याग :— नारदेर सङ्गे शौनकादि मुनिगण। मुमुक्षा छाड़िया कैला कृष्णेर भजन॥121॥ कभी तो श्रीकृष्णदर्शनसे, कभी श्रीकृष्णकृपासे मुक्तिकी कामनाका त्याग और शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :— कृष्णेर दर्शने, कारो कृष्णेर कृपाय। मुमुक्षा छाड़िया गुणे भजे ताँर पाँय॥122॥ अनुवाद—श्रीनारदके सङ्गसे शौनकादि मुनियोंने मुक्तिकी वाञ्छाको त्याग करके श्रीकृष्णका भजन किया। किसीने श्रीकृष्णके दर्शन करके और किसीने श्रीकृष्णकी कृपासे मोक्षकी वाञ्छाको छोड़कर उनके गुणोंके प्रति आकर्षित होकर उनके श्रीचरणकमलोंका भजन किया॥121-122॥ शुद्ध श्रीकृष्णभक्ति प्राप्त करनेपर पहले आचरित ज्ञानके प्रयासमें खेद :— भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/34)— अस्मिन् सुखघनमूर्त्तौ परमात्मनि वृष्णिपत्तने स्फुरति। आत्मारामतया मे वृथा गतो बत चिरं कालः॥123॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥123॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस वृष्णिपत्तन द्वारकामें चित्सुख-घनमूर्ति श्रीकृष्णके स्फुरित होनेपर मेरे सुखका उदित हुआ है। हाय, आत्मारामताका आश्रय (निर्वेशेष-ब्रह्मका अनुशीलन) करते हुए मेरे अनेक दिन वृथा (बेकार) चले गये हैं॥123॥ अनुभाष्य— बत (खेदे) वृष्णिपत्तने (द्वारकानगर्यां) सुखघनमूर्त्तौ (चित्सुखघनविग्रहे) परमात्मनि अस्मिन् (श्रीकृष्णे) स्फुरति [सति] आत्मारामतया (निर्विशेषब्रह्मानुशीलनेन) चिरं मे (मम) कालः वृथा गतः (हतः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥123॥ (ख) दो प्रकारके जीवन्मुक्त :— ‘जीवन्मुक्त’ अनेक सेइ, दुइ भेद जानि। ‘भक्त्ये जीवन्मुक्त’, ‘ज्ञाने जीवन्मुक्त’ मानि॥124॥ भक्तिके फलसे जीवन्मुक्त अवरोहपन्थी भक्तको श्रीकृष्णसेवानन्दकी प्राप्ति, ज्ञानके फलसे आरोहपन्थी मुक्ताभिमानीकी अधोगति :— ‘भक्त्ये जीवन्मुक्त’ गुणाकृष्ट हञा कृष्ण भजे। ‘शुष्कज्ञाने जीवन्मुक्त’ अपराधे अधो मजे॥125॥ अनुवाद—‘जीवन्मुक्त’ (इसी जीवनमें मुक्त) अनेक हैं, उनमें दो श्रेणियाँ हैं। एक प्रकारके जीवन्मुक्त तो भक्तिका आश्रय करके जीवन्मुक्त होते हैं और दूसरी प्रकारके वे हैं जो केवल ज्ञानका आश्रय करके स्वयंको जीवन्मुक्त मानते हैं, किन्तु वास्तवमें मुक्त होते 428 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/124-130 ] नहीं हैं। जो भक्तिकी सहायतासे जीवन्मुक्त होते हैं, वे श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर उनका भजन करते हैं। और केवल शुष्कज्ञानसे स्वयंको जीवन्मुक्त माननेवाले अपराधके कारण अधोःपतित होते हैं॥124-125॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अपराधे अधो मजे'—शुष्कज्ञान- जनित जीवन्मुक्त (अभिमानी)-लोग अपराधवशतः अधःपतित होकर मजे अर्थात् नष्ट हो जाते हैं॥125॥ श्रीमद्भागवत (10/2/32)में— येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन- स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रे पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥126॥ अनुवाद—हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया हूँ', ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित होते हैं॥126॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/30 संख्या देखें॥126॥ श्रीमद्भगवद्गीता (18/54)में— ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥127॥ अनुवाद—गीतामें कहा गया है,—अभेद ब्रह्मवादरूपी ज्ञानचर्चाके द्वारा स्वयं प्रसन्नात्माका शोक और कामनारहित होनेपर तथा सभी जीवोंमें समभावयुक्त ब्रह्मता प्राप्त करनेके बाद उसे मेरी पराभक्ति प्राप्त होती है। तात्पर्य यह है कि पहले कर्ममिश्रा-भक्तिका उल्लेख हुआ था, उसकी अपेक्षा ज्ञानमिश्रा भक्ति श्रेष्ठ है॥127॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/65 संख्या देखें॥127॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/44)में उद्धृत बिल्वमङ्गल वाक्य :— अद्वैतवीथिपथिकैरुपस्याः स्वानन्दसिंहासनलब्ध दीक्षाः। शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवधूविटेन॥128॥ अनुवाद—अद्वैतमार्गके पथिकोंके द्वारा उपास्य और आत्मानन्द-सिंहासनसे दीक्षा प्राप्त करनेपर भी मैं किसी गोपवधू-लम्पट शठके द्वारा हठतापूर्वक दासीके रूपमें परिणत हो गया हूँ॥128॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 10/178 संख्या देखें॥128॥ (ग) स्वरूप-प्राप्त भक्तोंका चिदानन्ददेहसे श्रीकृष्णभजन :— भक्तिबले 'प्राप्तस्वरूप' दिव्यदेह पाय। कृष्णगुणाकृष्ट हञा भजे कृष्ण-पांय॥129॥ अनुवाद—'प्राप्तस्वरूप' (स्वरूपकी उपलब्धि करनेवाला) जीव भक्तिके बलसे दिव्यदेहको प्राप्त करता है और श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर श्रीकृष्णके चरणोंका भजन करता है॥129॥ दस प्रकारके लक्षणोंमेंसे निरोध और मुक्तिके लक्षण :— श्रीमद्भागवत (2/10/6)में— निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः। मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः॥130॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥130॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[श्रीहरिकी योगनिद्राके बाद] शक्तिगणोंके अर्थात् उपाधियोंके साथ आत्माके शयनको जीवका 'निरोध' कहा जाता है। अन्य प्रकारके रूपका (मायिक स्थूल-सूक्ष्म रूपका) परित्यागकर स्व-स्वरूपमें विशेषरूपसे अवस्थानका नाम 'मुक्ति' है॥130॥ अनुभाष्य—श्रीशुकदेव परीक्षितसे सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय,—महापुराणके इन दस लक्षणोंको दशम-पदार्थ | 429

[ 24/130-136 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आश्रयस्वरूप भगवान्‌के विशुद्धतत्त्वज्ञानके उद्देश्यसे वर्णन करते हुए इस श्लोकमें उसके अन्तर्गत निरोध और मुक्तिके स्वरूप अथवा लक्षण बतला रहे हैं, - [श्रीहरेः योगनिद्राम्] अनु (पश्चात्) अस्य आत्मनः (जीवस्य) शक्तिभिः (स्वोपाधिभिः) शयनं (लयः) निरोधः (इति स्मृतः); तथा अन्यथा रूपं (अविद्यया अध्यस्तं कर्तृत्वादि) हित्वा (त्यक्त्वा) स्वरूपेण (भगवद्दास्ये शुद्धजीवस्वरूपेण) व्यवस्थितिः (विशेषेण अवस्थानं स्वरूपसाक्षात्कार इत्यर्थ एव) 'मुक्तिः'। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 130 ॥ मायारूपी भोगवाञ्छामें श्रीकृष्ण-विमुखता, श्रीकृष्णसेवासे अथवा श्रीकृष्ण-उन्मुखतासे मायासे मुक्ति :- कृष्ण-बहिर्मुख-दोष माया हैते हय। कृष्णोन्मुखी भक्ति हैते माया-मुक्ति हय ॥ 131 ॥ अनुवाद-मायासे ही श्रीकृष्ण-बहिर्मुखतारूपी दोष उत्पन्न होता है और श्रीकृष्ण-उन्मुखी भक्तिसे ही मायासे मुक्ति होती है ॥ 131 ॥ श्रीमद्भागवत (11/2/37)में- भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यादीशा- दपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः। तन्माययातो बुध आभजेत्तं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा ॥ 132 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णसे इतर (अन्य) जो माया है, उसमें अभिनिविष्ट जीवमें 'भय' उपस्थित होता है और उन ईश्वरसे बहिर्मुख होनेके कारण मायाजनित विपरीत स्मृति होती है; इसी कारण पण्डित व्यक्ति गुरुको 'देवता' और 'आत्म'-स्वरूप मानकर अनन्य-भक्तिके साथ उन परमेश्वरका भजन करेंगे ॥ 132 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 20/119 संख्या देखें ॥ 132 ॥ श्रीमद्भगवद्गीता (7/14)में- दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ 133 ॥ अनुवाद-इस त्रिगुणमयी मेरी मायासे अत्यन्त कष्टसे पार हुआ जाता है; जो मेरे शरणागत होते हैं, वे ही केवल इस मायासे पार हो सकते हैं॥ 133 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 20/121 संख्या देखें ॥ 133 ॥ भक्तिबलसे ही मुक्ति और मुक्त होनेपर श्रीकृष्णभक्ति :- भक्ति बिना मुक्ति नाहि, भक्त्ये मुक्ति हय। तबे मुक्ति पाइले अवश्य कृष्ण भजय ॥ 134 ॥ अनुवाद-भक्तिके बिना मुक्ति नहीं हो सकती, भक्तिसे ही मुक्ति प्राप्त होती है। जो भक्तिके बलपर मुक्ति प्राप्त करते हैं, वे सदा ही श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 134 ॥ श्रीमद्भागवत (10/14/4)में- श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवल-बोधलब्धये। तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद्यथा स्थूलतुषावघातिनाम् ॥ 135 ॥ अनुवाद-हे विभो ! आपमें भक्ति ही कल्याणका पथ है, उसे परित्याग करके जो सब व्यक्ति केवल ज्ञान प्राप्तिके लिये अर्थात् 'मैं ब्रह्म' हूँ, इसीको ही स्थिर रूपमें जाननेके लिये अनेक प्रकारके कष्ट स्वीकार करते हैं, खाली भूसीको पीसनेवालोंको जिस प्रकार चावल नहीं मिलते, उसी प्रकार, उन्हें अन्तमें क्लेशमात्र ही प्राप्त होता है॥ 135 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/22 संख्या देखें ॥ 135 ॥ श्रीमद्भागवत (10/2/32)में- येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्य- स्तभावादविशुद्धबुद्धयः । आरुह्य कृच्छ्रे पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ 136 ॥ अनुवाद-हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया 430 ।

चौबीसवाँ अध्याय [24/136-141] हूँ, ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित होते हैं॥ 136 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/30 संख्या देखें ॥ 136 ॥ श्रीमद्भागवत (11/5/3) में- य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम्। न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद्भ्रष्टाः पतन्त्यधः ॥ 137 ॥ अनुवाद-इन चारों वर्णाश्रमियोंमेंसे जो अपने प्रभु भगवान् विष्णुका साक्षात् भजन नहीं करके, अपने-अपने वर्णाश्रमके अहङ्कारके कारण उनके भजनमें अवज्ञा करते हैं, वे अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर अधःपतित हो जाते हैं॥ 137 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/28 संख्या देखें ॥ 137 ॥ श्रीमद्भागवत (10/87/21) श्लोकमें श्रीधर-उद्धृत सर्वज्ञ भाष्यकार व्याख्या और नृसिंहतापनी (2/5/16)में- मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते ॥ 138 ॥ अनुवाद-मुक्तगण भी लीलासे आकर्षित होकर विग्रह स्थापित करके भगवान्का भजन करते हैं॥ 138 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 24/107 संख्या देखें ॥ 138 ॥ पूर्वोक्त छः प्रकारके आत्मारामोंका श्रीकृष्णभजन :- एइ छह आत्माराम कृष्णेरे भजय। पृथक् पृथक् च-कारे इहा 'अपि'र अर्थ कय ॥ 139 ॥ अनुवाद-आत्माराम शब्दके छः प्रकारके अर्थोंमें च-कारका ('तथा'का) अर्थ यहाँ 'अपि' ('भी') ही ग्रहण किया गया है। इसलिये 'ये छः प्रकारके आत्माराम श्रीकृष्णका भजन करते हैं'- इसका अर्थ होगा कि साधक-आत्माराम भी श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर श्रीकृष्णभजन करते हैं, ब्रह्ममय-आत्माराम भी भजन करते हैं, इसी प्रकार अन्य चारोंके लिये भी ऐसा ही जानना होगा ॥ 139 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'छय आत्माराम'-साधक, ब्रह्ममय और प्राप्त-ब्रह्मलय एवं मुमुक्षु, जीवन्मुक्त और प्राप्त-स्वरूप, -ये छय प्रकारके 'आत्माराम' हैं॥ 139 ॥ आत्माराम, मुनि और निर्ग्रन्थ व्यक्तियोंका श्रीकृष्णभजन :- “आत्मारामार्च अपि” करे कृष्णे अहैतुकी भक्ति। “मुनयः सन्तः” इति कृष्णमनने आसक्ति ॥ 140 ॥ अनुवाद-छः प्रकारके आत्माराम भी श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं। 'मुनयः सन्तः'का तात्पर्य यह है कि वे मुनि होकर श्रीकृष्ण-मननमें आसक्त होते हैं॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“ 'मुनयः सन्तः' इति श्रीकृष्णमनने आसक्ति' - आत्मारामगण 'मुनि' बनकर श्रीकृष्णमननमें आसक्त होते हैं ॥ 140 ॥ “निर्ग्रन्थाः”–अविद्याहीन, केह-विधिहीन। याँहा येइ युक्त, सेइ अर्थेर अधीन ॥ 141 ॥ अनुवाद- 'निर्ग्रन्थ'-शब्दके दो अर्थ हैं-अविद्याहीन और विधिहीन। इन दोनोंमेंसे जहाँ जो अर्थ उपयुक्त है, वही प्रयोग किया जाना चाहिये ॥ 141 ॥ अमृतानुकणा- 'एइ छह आत्माराम' - अर्थात् 'ब्रह्मसाधक', 'ब्रह्ममय' और 'प्राप्तब्रह्मलय'-ये तीन ब्रह्मोपासक (103 संख्या) और 'मुमुक्षु', 'जीवन्मुक्त' ('भक्तिसे ही जीवन्मुक्त', 'ज्ञानसे जीवन्मुक्त' नहीं-125 संख्या) और 'प्राप्तस्वरूप' (116 संख्या) - ये तीन प्रकारके मोक्षकी आकाङ्क्षा करनेवाले - इस प्रकार कुल छः प्रकारके आत्माराम हैं। उनके साथ पृथक् पृथक्-रूपमें 'च'-कारके योगसे 'अपि'का अर्थ व्यक्त हुआ है। जैसे, ब्रह्मसाधक-आत्माराम भी 'मुनि' (मननशील) होकर अर्थात् श्रीकृष्णमननमें आसक्त होकर अहैतुकी भक्ति तथा भुक्ति-मुक्ति-सिद्धिकी इच्छाओंसे शून्य होकर भक्ति । 431

[ 24/139-147 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करते हैं। इस प्रकारसे पृथक् पृथक् रूपसे कहे गये छः प्रकारके आत्मारामगणोंके क्षेत्रमें अर्थको समझना होगा। 'निर्ग्रन्थ अपि' (निर्ग्रन्थ होकर भी)—उनके विशेषणके रूपमें कहा गया है। निर्ग्रन्थ-शब्दके अर्थ अविद्या-ग्रन्थिहीन और विधिहीन हैं। यहाँपर विधिहीन कहनेसे रागमार्ग अन्तर्गत विधिहीनता नहीं है, क्योंकि पहले कहा गया है,—“निर्ग्रन्थ-शब्दे कहे,–(क) अविद्या- ग्रन्थिहीन। (ख) विधिनिषेध-वेदशास्त्र-ज्ञानादिविहीन॥” (16 संख्या)। ये दो अर्थ यहाँपर 'आत्माराम'—शब्दके अर्थके अनुसार युक्त होंगे॥ 139-141॥ अन्य एक प्रकारका अर्थ :— च-शब्दे करि यदि 'इतरेतर' अर्थ। आर एक अर्थ कहे परम समर्थ॥ 142 ॥ “आत्मारामाश्च आत्मारामाश्च” करि बार छय। पञ्च आत्माराम, छये च-कारे लुप्त हय ॥ 143 ॥ एक 'आत्माराम'-शब्दे अवशेष रहे। एक 'आत्माराम'-शब्दे छयजन कहे ॥ 144 ॥ अनुवाद—'च' शब्दका 'इतरेतर' समासके अनुसार अर्थ करनेसे आत्माराम श्लोकका अन्य एक परम उपयुक्त अर्थ निकलता है। यद्यपि छः प्रकारके आत्मारामोंके लिये 'आत्माराम'-शब्द छः बार दोहराना होगा, तथापि (संस्कृत व्याकरणके इस नियमके अनुसार) च-शब्दका 'इतरेतर' समासमें योग करनेपर पाँच आत्माराम लोप हो (समा) जाते हैं और अन्तमें एक 'आत्माराम'-शब्द ही रहता है। वही 'आत्माराम'-शब्द ही छहों आत्मारामोंको बतलाता है। (पय़ार 147 के बाद अमृतानुकणा टीका देखें) ॥ 143-144 ॥ दृष्टान्त—(विश्वप्रकाशमें और पाणिनिमें 1/2/64 और सिद्धान्त-कौमुदीमें अजन्त पुल्लिङ्ग-शब्दके प्रकरणमें) :— “स्वरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ।” उक्तार्थानामप्रयोगः। रामश्च रामश्च रामश्च रामा इतिवत् ॥ 145 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वरूपसे एक जैसे और एक विभक्तिमें जिनका अर्थ कहा जाता है, वहाँ एक स्वरूपको रखकर अन्य सब स्वरूपोंका प्रयोग नहीं होता है, जैसे,—‘रामश्च, रामश्च, रामश्च’,—इनके स्थानपर एक ‘रामाः’ शब्दका प्रयोग होता है ॥ 145 ॥ तबे ये च-कार, सेइ 'समुच्चय' कय। “आत्मारामाश्च मुनयश्च” कृष्णेरे भजय ॥ 146 ॥ अनुवाद—'च'-कारका 'समुच्चय'के (सभीको एकत्रित करके) अर्थमें प्रयोग करनेपर इस पदका अर्थ होगा— “आत्मारामाश्च मुनयश्च” अर्थात् सभी आत्मारामगण और सभी मुनिगण श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 146 ॥ सात प्रकारके अर्थ :— “निर्ग्रन्था अपि”र एइ अपि'—सम्भावने। एइ सात अर्थ प्रथमे करिलुँ व्याख्याने ॥ 147 ॥ अनुवाद—अमृतानुकणा देखें ॥ 147 ॥ अमृतानुकणा—'इतरेतर अर्थ'-योगसे 'च'-शब्दसे एक अन्य व्याख्या दी गई है। जहाँपर प्रत्येक पदकी प्रधानता रहनेपर सभी पदोंका अन्वय होता है, उस प्रकारके द्वन्द्व-समासको ही 'इतरेतर-योग' कहा जाता है। जिस स्थानपर ये सब पद एक ही विभक्ति और एक ही वचनवाले होते हैं—इतरेतर-योगसे तब उनका एक पद मात्र ही बाकी रहता है। जैसे, 'रामश्च रामश्च रामश्च'—ये तीन 'राम'-पदोंमेंसे दो पद लोप हो जानेपर अन्तमें समासबद्ध पद ‘रामाः’ होता है। उसी प्रकार ‘आत्मारामाश्च’, ‘आत्मारामाश्च’ इस रूपमें छः ‘आत्मारामाश्च’-पद 'इतरेतर'-समाससे युक्त होनेपर उनमेंसे पाँच ‘आत्मारामाश्च’-पद लुप्त हो जाते हैं और छठे ‘आत्मारामाश्च’-पदमें ‘च’-कार लुप्त होकर केवल ‘आत्मारामाः’-पद बाकी रहता है, उसके द्वारा उक्त छः प्रकारके आत्माराम ही सूचित होते हैं। यहाँपर 432 |

चौबीसवाँ अध्याय 24/142-150 ] 'आत्मारामश्च'-पदमॆं जो 'च'-कार है, उसका तृतीय पुरुष क्षीरोदशायीका ध्यान :- समुच्चय-अर्थमें व्यवहार होनेपर 'आत्मारामश्च मुनयश्च' श्रीमद्भागवत (2/2/8)में— अर्थात् पहले कहे गये छः प्रकारके आत्मारामगण और केचित् स्वदेहान्तर्हृदयावकाशे मुनिगण श्रीकृष्णभजन करते हैं—इस प्रकारसे अर्थ हुआ प्रादेशमात्रं पुरुषं वसन्तम्। है। 'निर्ग्रन्थ अपि'से 'अपि' सम्भावना-अर्थमें होकर चतुर्भुजं कञ्जरथाङ्गशङ्खगदाधरं आत्मारामगण, मुनिगण और सम्भावना-अर्थमें निर्ग्रन्थगण धारणया स्मरन्ति ॥ 150 ॥ अर्थात् अविद्याग्रन्थिहीन, शास्त्रविधिहीन, मूर्ख, नीच, म्लेच्छ, धन सञ्चय करनेवाले, निर्धन आदि (16, 17 अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 150 ॥ संख्या) श्रीकृष्णभजन करते हैं—इस रूपमें 'इतरेतर'-योगसे अमृतप्रवाह भाष्य—कोई-कोई योगी अपनी देहके प्रकाशित यह अर्थ और पहले कहे गये छः अर्थ भीतर स्थित हृदयमें अवस्थित प्रादेशमात्र (तर्जनी (139-141 संख्या), कुल मिलाकर यहाँ तक सात अङ्गुली और अङ्गुठेके विस्तार जितने परिमाणके) अर्थोंकी व्याख्या हुई है॥ 142-147 ॥ चतुर्भुज शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी पुरुषका धारणाके द्वारा स्मरण किया करते हैं,—यही 'सगर्भ' योगीका लक्षण परमात्मनिष्ठ दो प्रकारके आत्माराम :- है॥ 150 ॥ अन्तर्यामि-उपासके 'आत्माराम' कय। अनुभाष्य—श्रीशुकदेव गोस्वामी परीक्षितको स्थूल सेइ आत्माराम योगीर दुइ भेद हय ॥ 148 ॥ जगत्के विषय-भोगोंको निन्दनीय जानकर उनसे निवृत्त (1) सगर्भ-योगी और (2) निगर्भ-योगी, वैराज-धारणा-निष्ठ योगियोंकी बात बतलाकर उनसे दोनों ही तीन प्रकारके :- श्रेष्ठ व्यष्टि-अन्तर्यामी चिद्घनरूप-ध्यानकारी योगियोंकी सगर्भ, निगर्भ,—एइ हय दुइ भेद। बात बतला रहे हैं,— एक एक तिन भेदे छय विभेद ॥ 149 ॥ केचित् (विरलाः) स्वदेहान्तर्हृदयावकाशे (स्वदेहस्य निजशरीरस्य अनुवाद—अन्तर्यामी परमात्माके उपासकोंको भी अन्तः मध्ये यत् हृदयं तत्र यः अवकाशः तस्मिन्) वसन्तम् 'आत्माराम' कहते हैं। उन आत्माराम योगियोंके भी दो (अन्तर्यामितया कृतवासं) प्रादेशमात्रं (अङ्गुष्ठतर्जन्यौर्विस्तारः भेद हैं—सगर्भ और निगर्भ। पुनः इन दोनोंके तीन-तीन सः एव मात्रा प्रमाणं यस्य तस्मिन् प्रादेशप्रमाणहृदये ध्येयत्वात्, भेद हैं, इस प्रकार कुल मिलाकर उनके छः विभेद तावन्मात्रप्रदेशेऽप्यचिन्त्यशक्त्या पञ्चदशवर्षीयपुरुषाकारप्रमाणं) चतुर्भुजं हैं॥ 148-149 ॥ कञ्जरथाङ्ग-शङ्खगदाधरं (पद्मचक्रशङ्खगदाधारिणं) पुरुषं (क्षीरोदशायिनं अनुभाष्य—'सगर्भ योगी'—जो योगी उपास्य तृतीयं) धारणया स्मरन्ति। अन्तर्यामीको साकार मानकर उनके रूपका ध्यानादि श्लोक-भावानुवाद—कोई विरले [योगी] अपने करते हैं। 'निगर्भ-योगी'—जो योगी निराकार या शून्यका शरीरके भीतर हृदयमें वास करनेवाले प्रादेशमात्र ध्यानादि करते हैं। सगर्भ और निगर्भ योगियोंके छः परिमाणके (अङ्गुठेसे तर्जनीके विस्तार जितने होनेपर विभाग हैं—1) सगर्भ-योगारुरुक्षु (योगारुरुक्षु अर्थात् भी अचिन्त्य शक्तिके द्वारा पन्द्रह-वर्षीय पुरुषाकारमें) जिन्होंने योगमें आरूढ़ होना प्रारम्भ किया है), 2) पद्म-चक्र-शङ्ख-गदाधारी चतुर्भुजरूप अन्तर्यामी पुरुषका निगर्भ-योगारुरुक्षु, 3) सगर्भ-योगारूढ़, 4) निगर्भ-योगारूढ़, (तृतीय पुरुष क्षीरोदशायीका) धारणासे स्मरण करते 5) सगर्भ-प्राप्तसिद्धि, 6) निगर्भ-प्राप्तसिद्धि ॥ 149 ॥ हैं॥ 150 ॥ । 433

[ 24/151-156 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ध्यानयोगमिश्रा भक्तिमें सिद्धिकी प्राप्ति :— श्रीमद्भागवत (3/28/34)में— एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावो भक्त्या द्रवद्धृदय उत्पुलकः प्रमोदात्। औत्कण्ठ्यबाष्पकलया मुहूर्दह्यमान— स्तच्चापि चित्तबड़िशं शनकैर्वियुङ्क्ते॥ 151 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 151॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस प्रकार भगवान् श्रीहरिके प्रति भाव प्राप्त करके भक्तिके द्वारा हृदयके द्रवीभूत और आनन्दसे भर जानेके कारण पुलकादि उत्पन्न होते हैं, उत्कण्ठाके कारण आनन्द-अश्रुओंके द्वारा बार-बार वह आनन्दमें निमज्जित हुआ करता है; तब मछलीको पकड़नेवाले काँटेकी भाँति ध्यानयुक्त चित्तको (ध्येय वस्तुकी धारणासे) थोड़ा-थोड़ा करके बाहर कर देता है,—यही 'निगर्भ' योगीका उदाहरण है॥ 151॥ अनुभाष्य—शरणागत देवहूतिको भगवान् श्रीकपिलदेव निगर्भ योगीके लिये श्रीभगवान्‌की अप्राकृत श्रीमूर्तिके प्रत्येक अङ्ग-प्रत्यङ्गके ध्यानकी कर्त्तव्यताका उपदेश प्रदान करके ध्यानके फल मनके निग्रहकी बात बतला रहे हैं,— एवं (ध्यानपथेन) भगवति हरौ प्रतिलब्धभावः (प्रतिलब्धः भावः प्रेमा येन सः) भक्त्या (श्रद्धया) द्रवद्धृदयः (द्रवत् आर्द्रीभवत् हृदयं यस्य सः) प्रमोदात् (हर्षप्रकर्षात्) उत्पुलकः (उद्गतानि पुलकानि यस्य सः रोमाञ्चितदेहः) औत्कण्ठ्यबाष्पकलया (औत्कण्ठ्येन प्रवृत्तया अश्रुकलया) मुहुः (पुनः पुनः) अद्ह्यमानः (आनन्दसंप्लवे निमज्जमानः) च तत् अपि चित्तबड़िशं (दुर्ग्रहस्य भगवतः ग्रहणे बड़िशं मत्स्यवेधनम् इव उपायभूतं चित्तम् अपि) शनकैः (क्रमशः ध्येय-वस्तुनः) वियुङ्क्ते (तद्धारणे शिथिलप्रयत्नः भवति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 151 ॥ (क) आरुरुक्षु, (ख) आरूढ़ और (ग) प्राप्तसिद्धिके भेदसे तीन प्रकारके योगी :— 'योगारुरुक्षु', 'योगारूढ़', 'प्राप्तसिद्धि' आर। एइ तिन भेदे हय छय प्रकार॥ 152 ॥ अनुवाद—योगारुरुक्षु, योगारूढ़ और प्राप्तसिद्धि—ये तीन सगर्भ और निगर्भके भेदसे कुल मिलाकर छः प्रकारके होते हैं॥ 152॥ श्रीमद्भगवद्गीता (6/3-4)में— आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढ़स्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥ 153॥ यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते॥ 154॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 153-154॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिसकी योगमें आरोहण करनेकी इच्छा है, वह 'आरुरुक्षु' है; उस आरुरुक्षु मुनिका यम, नियम, आसन और प्राणायामरूप कर्म ही 'कारण' (साधन) है। योगारूढ़ व्यक्तिका ध्यान-धारणा-प्रत्याहाररूप श्रम ही 'कारण' है। इन्द्रियोंके उद्देश्यसे कर्ममें जब आसक्ति नहीं रहती, तब सभी सङ्कल्प परित्याग करके योगी 'समाधि'-युक्त अथवा 'योगारूढ़' होते हैं॥ 153-154॥ अनुभाष्य— योगं (ज्ञानयोगम्) आरुरुक्षोः (प्राप्तुमिच्छोः) मुनेः [तदारोहे] कर्म कारणं (साधनम्) उच्यते; योगोरूढ़स्य (ज्ञानयोगमारूढ़स्य तु) तस्य (ज्ञाननिष्ठस्य) एव शमः (ज्ञानपरिपाके समाधिश्चित्तविक्षेपकर्मोपरमः) कारणम् उच्यते। यदा हि इन्द्रियार्थेषु (इन्द्रियभोग्येषु शब्दादिषु तत् साधनेषु च) कर्मसु न अनुषज्जते (आसक्तिं न करोति), तदा सर्वसङ्कल्पसंन्यासी (सर्वान् भोगविषयान् कर्मविषयान् च आसक्तिमूलभूतान् सङ्कल्पान् संन्यसितुं शीलं यस्य सः) योगारूढ़ (मुक्तः) उच्यते। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 153-154॥ छः प्रकारके योगियोंका साधुसङ्गमें योगमार्गका त्याग और श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :— एइ छय योगी साधुसङ्गादि-हेतु पाञा। कृष्ण भजे कृष्णगुणे आकृष्ट हञा॥ 155 ॥ च-शब्दे 'अपि'र अर्थ इँहाओ कहय। 'मुनि', 'निर्ग्रन्थ'-शब्देर पूर्ववत् अर्थ हय॥ 156 ॥ 434 |

चौबीसवाँ अध्याय 24/157-160 ] यहाँ तक तेरह प्रकारके अर्थ :- 'उरुक्रमे' 'अहैतुकी' काँहा कोन अर्थ। एइ तेर अर्थ कहिलुँ परम समर्थ ॥ 157 ॥ अनुवाद—ये छः प्रकारके योगी साधुसङ्गके प्रभावसे श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर श्रीकृष्णका भजन करते हैं। यहाँ 'च'-शब्दसे 'अपि' अर्थ ही होता है और 'मुनि' और 'निर्ग्रन्थ' शब्दोंका अर्थ पहले जैसे होगा। 'अहैतुकी'-शब्द सदा 'उरुक्रम'के साथ ही प्रयोग होगा। इस प्रकार मैंने तुम्हें इस 'आत्मारामश्च' श्लोकके तेरह प्रकारके पृथक् पृथक् अर्थ बतलाये हैं॥ 155-157 ॥ एइ सब शान्त यबे भजे भगवान्। 'शान्त' भक्त करि' तबे कहि ताँर नाम ॥ 158 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 158 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'एइ सब शान्त यबे भजे'—ये सब योगी जब शान्तरसमें आरूढ़ होकर भजन करते हैं, [तब उन्हें 'शान्त' भक्त कहा जाता है।] ॥ 158 ॥ अनुभाष्य—ये तेरह,—(1) साधक, (2) ब्रह्ममय, (3) प्राप्तब्रह्मलय, (4) मुमुक्षु, (5) जीवन्मुक्त, (6) प्राप्तस्वरूप,—ये छः आत्माराम, और (7) निर्ग्रन्थमुनि, (8) सगर्भ-योगारुरुक्षु, (9) निगर्भ-योगारुरुक्षु, (10) सगर्भ-योगारूढ़, (11) निगर्भ-योगारूढ़, (12) सगर्भ-प्राप्तसिद्धि, (13) निगर्भ-प्राप्तसिद्धि ॥ 158 ॥ अमृताणुकणा—पहले आत्मा-शब्दसे 'ब्रह्म'-अर्थ लेनेपर ज्ञानमार्गके उपासकरूप आत्मारामगणोंके सम्बन्धमें सात प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या हुई है। अब आत्मा-शब्दसे 'अन्तर्यामी'-अर्थ लक्षित होनेपर योगमार्गमें जो अन्तर्यामी-उपासक हैं, उन योगियोंको यहाँपर 'आत्माराम' कहा जा रहा है। वे छः प्रकारके हैं-सगर्भ-योगारुरुक्षु सगर्भ-योगारूढ़, सगर्भ-प्राप्तसिद्धि, निगर्भ-योगारुरुक्षु, निगर्भ-योगारूढ़ और निगर्भ-प्राप्तिसिद्धि। यहाँपर भी पहलेके जैसे अर्थात् पहले जो तीन प्रकारके ब्रह्मोपासक और तीन प्रकारके मुक्तिकामी, कुल छः प्रकारके आत्मारामोंकी बात कही गयी है और उस स्थानपर जैसे 'च'-शब्दसे 'अपि'-अर्थ, 'मुनि'-शब्दसे मननशील और 'निर्ग्रन्थ'-शब्दसे अविद्या-ग्रन्थिहीन और विधिहीन अर्थ हुआ है (139-141 संख्या), यहाँपर भी उसी प्रकारसे 'उरुक्रमे' और 'अहैतुकी'-दो शब्दमें जोड़कर ऊपर लिखे छः प्रकारके आत्माराम-योगिगर्णोंके किस क्षेत्रमें कौनसा अर्थ प्रकाशित होगा। जैसे, सगर्भ- योगारुरुक्षु-रूप आत्माराम भी 'निर्ग्रन्थ' होनेपर भी मुनि अर्थात् मननशील होकर उरुक्रम श्रीकृष्णकी भक्ति करते हैं—इस रूपमें छः प्रकारके योगियोंके सम्बन्धमें भी पृथक् पृथक् रूपसे अर्थ समझने होंगे। इसलिये पहले सात प्रकारके और अब छः प्रकारके—कुल तेरह अर्थ व्यक्त हुए हैं। वे सब “शमो मन्निष्ठताबुद्धेः” (भागवत 11/19/36) इस सूत्रमें श्रीकृष्णमें ममतायुक्त-बुद्धिसम्पन्न ना होकर केवल श्रीकृष्णनिष्ठा मात्र प्राप्त करके 'शान्त'-रसाश्रित 'शान्तभक्त' नामसे कहलाते हैं॥ 155-158 ॥ 'आत्मारामः'-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दकी (3) 'मन' अर्थके द्वारा व्याख्या :- 'आत्मा' शब्दे 'मन' कह—मने येइ रमे। साधुसङ्गे सेइ भजे श्रीकृष्णचरणे ॥ 159 ॥ अनुवाद—'आत्मा' शब्दके अर्थ 'मन'को ग्रहण करनेपर आत्मारामका अर्थ होगा—जो मनमें रमण करता है। ऐसा व्यक्ति भी साधुसङ्गमें श्रीकृष्णके चरणोंका भजन करता है॥ 159 ॥ मनका निग्रह करनेवालेको परमपदकी प्राप्ति :- श्रीमद्भागवत (10/87/18)— उदरमुपासते य ऋषिवर्त्मसु कूर्पदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो डहरम्। तत उदगादनन्त तव धाम शिरः परमं पुनरहि यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ 160 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 160 ॥ । 435

[ 24/160-163 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य—(ऋषियोंके सम्प्रदाय मार्गमें) जो कर्मयोगमें उदर अर्थात् मणिपुरमें स्थित ब्रह्मकी उपासना करते हैं, वे 'शार्कराक्ष' ऋषि कहलाते हैं और वे कूर्पदृक् अर्थात् स्थूलदृष्टि हैं। और आरुणि ऋषिगण (उस सम्प्रदायके ऋषिगण) जहाँसे नाड़ियोंका विस्तार होता है उस हृदयाकाशमें (सूक्ष्म ब्रह्मकी) उपासना करते हैं। हे अनन्त, उससे उत्कृष्ट जो योगीगण शिरोगत (मूलाधार उदरसे आरम्भ करके हृदयके मध्यमेंसे होकर मस्तक और ब्रह्मरन्ध्र तक बढ़ते हुए) सहस्रदल-पद्मस्वरूप आपकी उपलब्धिके स्थान सुषुम्ना-नामक परमश्रेष्ठ ज्योतिर्मय धाममें पहुँच जाते हैं, वे पुनः मृत्युके मुख अर्थात् संसारमें पतित नहीं होते॥160॥ अनुभाष्य—जनलोकमें ब्रह्मसत्र-यज्ञमें श्रवणके इच्छुक ऋषियोंको चतुःसनमेंसे एक ब्रह्मर्षि सनन्दनने जिन श्रुतियोंके द्वारा इस भगवत्-स्तवका कीर्तन किया था, उसीका ही बादमें आदिनरऋषि श्रीनारायण नारदसे वर्णन कर रहे हैं,— ऋषिवर्त्मसु (ऋषीणां वर्त्मसु सम्प्रदायमार्गेषु) ये कूर्पदृशः (कूर्पं शर्करारजः विद्यते दृक्षु अक्षिषु येषां ते तथा रजःपिहितदृष्टयः शार्कराक्षाः स्थूलदृष्टयः) उदरम् (उदरावलम्बनं मणिपुरकस्थं ब्रह्म) उपासते (ध्यायन्ति); आरुणयः (आरुण्याख्याः ऋषयः) परिसरपद्धतिं (परितः सरन्ति प्रसर्पन्तीति परिसराः नाड्यः तासां पद्धतिं मार्गं प्रसरणस्थानं) हृदयं दहरम् (आकाशावलम्बनं सूक्ष्ममेव ब्रह्म उपासते); हे अनन्त, ततः (हृदयात्) तव परमं (श्रेष्ठं ज्योतिर्मयं) धाम (उपलब्धिस्थानं सुषुम्नाख्यं) शिरः (मूर्द्धानं प्रति) उद्गात् (उदसर्पन्, मूलाधारात् आरभ्य हृदयमध्यात् ब्रह्मरन्ध्रं प्रत्युद्गतमित्यर्थः),—यत् [तव धाम] समेत्य (प्राप्य) इह कृतान्तमुखे (कृतान्तस्य कालस्य मृत्योः मुखे संसारे) न पतन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥160॥ निगृहीत-चित्त मुनियोंके द्वारा श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर शुद्धभक्ति :— एहो कृष्णगुणाकृष्ट महामुनि हञा। अहैतुकी भक्ति करे निर्ग्रन्थ हञा॥161॥ अनुवाद—मनमें रमण करनेवाला ऐसा योगी भी श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर महामुनि (श्रीकृष्ण मननमें आसक्त) हो जाता है और वह भी निर्ग्रन्थ होकर श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करता है॥161॥ ‘आत्मारामः'-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दके (4) 'यत्न' अर्थके द्वारा व्याख्या :— ‘आत्मा'-शब्दे 'यत्न' कहे—यत्न करिया। “मुनयोऽपि” कृष्ण भजे निर्ग्रन्थ हञा॥162॥ अनुवाद—'आत्मा'-शब्दका अर्थ 'यत्न' भी है अर्थात् श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर मुनि भी निर्ग्रन्थ होकर श्रीकृष्णभजनके लिये दृढ़ प्रयास करते हैं॥162॥ नित्यसत्य वास्तव वस्तुके अनुसन्धानके लिये प्रयत्न करना कर्त्तव्य :— श्रीमद्भागवत (1/5/18)में— तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो न लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यधः। तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं कालेन सर्वत्र गभीर-रंहसा॥163॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥163॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो सत्यलोक अथवा ब्रह्मलोकादि ऊपरके लोकोंमें एवं सुतल और अतलादि निम्न लोकोंमें भ्रमण करनेपर भी प्राप्त नहीं होती, ऐसी दुर्लभ वस्तुके लिये सभी पण्डितलोग प्रयत्न करेंगे, क्योंकि चौदह भुवनोंके ऊपरी और निम्न लोकोंमें जो सुख हैं, वे सभी गम्भीर वेगसे युक्त कालके द्वारा दुःखकी भाँति अनायास ही प्राप्त होते हैं॥163॥ अनुभाष्य—जब श्रीव्यासदेव बहुत तपस्याका अनुष्ठान करके और समस्त शास्त्रोंका प्रणयन करनेपर भी आत्म-प्रसन्नताको प्राप्त करनेसे वञ्चित होकर सरस्वती नदीके तटपर मन-ही-मनमें अनेक प्रकारके कुतर्क और खेद कर रहे थे, तभी उनके अन्तर्यामी गुरुदेव श्रीनारद गोस्वामी उनके निकट आकर उपस्थित हुए। 436 |

चौबीसवाँ अध्याय 24/163-167 ] श्रीव्यासदेवने जब उनसे आत्म-प्रसन्नता न होनेका कारण पूछा, तब श्रीनारदने हरिभक्ति और हरिकथाके माहात्म्यको बतलाकर नित्य-तत्त्व श्रीकृष्णभक्तिके लिये प्रयत्न करनेके लिये कहा,– उपर्यधः (उपरि आब्रह्मलोकात् अधः स्थावरपर्यन्तं) भ्रमतां (विवक्षायां षष्ठी, भ्रमद्भिः जीवैः) यत् (सुखं) न लभ्यते (नैव प्राप्यते), कोविदः (विवेकशीलः) तस्यैव (तादृशस्य सुखस्य एव) हेतोः प्रयतेत (यत्नं कुर्यात्); गभीर-रंहसा (अनतिक्रम्यवेगेन) कालेन दुःखवत् (अप्रार्थितानि दुःखानि यथैवायान्ति देहिनां, तथैव) तं सुखं (विषयसुखं) अन्यतः (अन्यस्मात् प्राक्तनकर्मतः) सर्वत्र (सर्वयोनिषु) [प्रयत्नं बिनापि] लभ्यते (प्राप्यते)। श्लोक-भावानुवाद—ब्रह्मलोकसे स्थावर योनियों तक भ्रमण करते हुए जीवोंको जो सुख प्राप्त नहीं होता, विवेकी लोग वैसे सुखकी प्राप्तिके प्रयत्न करते हैं। जिसका अतिक्रम नहीं किया जा सकता, वह काल न चाहनेपर भी जैसे जीवोंको दुःख प्रदान करता है, वैसे ही विषयसुख पूर्व कर्मोंके फलस्वरूप सभी योनियोंमें बिना प्रयासके प्राप्त होते हैं ॥ 163 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/103)में उद्धृत नारदीयवाक्य :— सद्धर्मस्यावबोधाय येषां निर्बन्धिनी मतिः। अचिरादेव सर्वार्थः सिद्ध्यत्येषामभीप्सितः ॥ 164 ॥ अनुवाद—सद्धर्मको उदित करानेके लिये जिनकी दृढ़ा मति है, उनकी शीघ्र ही अभिलषित सर्वार्थ-सिद्धि होती है॥ 164 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 20/106 संख्या देखें ॥ 164 ॥ आग्रहपूर्वक यत्न अथवा उत्साह और निश्चयसे ही भक्तिकी सिद्धि :— च-शब्द अपि-अर्थे, 'अपि'—अवधारणे। यत्नाग्रह बिना भक्ति ना जन्माय प्रेमे ॥ 165 ॥ अनुवाद—अमृतानुकणा देखें ॥ 165 ॥ अमृतानुकणा—यहाँपर 'च'-शब्दसे अपि-अर्थ होकर 'मुनयश्च'–मुनयोऽपि अर्थात् मुनिगण भी 'आत्मारामः'– (आत्मा-शब्दसे यत्न-अर्थके कारण) यत्नपरायण होकर 'निर्ग्रन्थ अपि'—(अपि-शब्दके निश्चय अर्थमें) अविद्याग्रन्थिहीन होकर उरुक्रम श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं, क्योंकि भक्तिमें यत्न और आग्रहके बिना कभी भी सुदुर्लभ 'प्रेम' प्राप्त नहीं हो सकता ॥ 165 ॥ आसङ्ग ही आग्रहपूर्वक प्रयत्न :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/35)– साधनौघैरनासङ्गैरलभ्या सुचिरादपि। हरिणा चाश्वदेयेति द्विधा सा स्यात् सुदुर्लभा ॥ 166 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 166 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्ति दो प्रकारसे सुदुर्लभा है,–(1) आसङ्ग-शून्य (श्रीकृष्णप्रीतिवाञ्छा-रहित) होनेपर सैकड़ों साधनोंके द्वारा भी शीघ्र प्राप्त नहीं होती और (2) श्रीकृष्ण भी सहसा भक्ति नहीं देते ॥ 166 ॥ अनुभाष्य— अनासङ्गैः (सङ्गरहितैः) साधनौधैः (साधनपुञ्जैः) सुचिरात् (बहुकालेन) अपि [भक्तिः] अलभ्या (लब्धुमशक्या) हरिणा (भगवता) आशु (शीघ्रम्) अदेया (“मुक्तिं ददाति कर्हिचित् स्म न भक्तियोगम्” इति (भाः 5/6/18) वचनात् च—इति) सा सुदुर्लभा भक्तिः द्विधा स्यात् (प्रकारद्वयेनापि तस्याः दुर्लभत्वमित्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—सङ्गरहित होकर बहुकाल तक अनेक साधन करनेपर भी भक्ति प्राप्त नहीं होती और भगवान् भी शीघ्र भक्ति नहीं देते ('भगवान् मुक्ति तो दे देते हैं, किन्तु भक्तियोग सहज ही नहीं देते'-(भाः 5/6/18) वचनके अनुसार) वह सुदुर्लभा भक्ति दो प्रकारकी है (दो प्रकारकी होनेपर भी वह दुर्लभ है—यह अर्थ है।)।। 166 ।। निरन्तर योग ही आग्रहपूर्वक यत्न :— श्रीमद्भगवद्गीता (10/10)में– तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ 167 ॥ । 437

[ 24/167-171 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—नित्य भक्तियोगके द्वारा जो लोग प्रीतिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, मैं उनको शुद्धज्ञानजनित विमल-प्रेमयोग दान करता हूँ। वे लोग उस ज्ञानके द्वारा मेरे परमानन्द धामको प्राप्त करते हैं॥167॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/49 संख्या देखें ॥167॥ "आत्मारामः" - पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दके (5) 'धृति'- अर्थके द्वारा व्याख्या :- 'आत्मा'-शब्दे 'धृति' कहे-धैर्ये येइ रमे। धैर्यवन्त तबे हञा करय भजने॥ 168॥ अनुवाद - 'आत्मा' - शब्दका अर्थ 'धृति' स्वीकार करनेपर आत्मारामका अर्थ होगा- जो धैर्यशील होकर रमण करते हैं। वे धैर्यशील होकर श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 168 ॥ मुनि और निर्ग्रन्थ-इन दोनों शब्दोंके अर्थ; विष्णु-वैष्णवकी कृपासे दोनोंको भक्तिकी प्राप्ति :- 'मुनि'-शब्दे-पक्षी, भृङ्ग; 'निर्ग्रन्थे' - मूर्खजन। कृष्णकृपाय साधुकृपाय दाँहार भजन ॥ 169 ॥ अनुवाद - 'मुनि' - शब्दका अर्थ पक्षी और भ्रमर है। 'निर्ग्रन्थ'-शब्दका अर्थ मूर्ख-लोग है। ये दोनों अर्थात् पक्षी-भ्रमरादि और मूर्खजन भी श्रीकृष्णकी कृपा तथा साधुकी कृपासे श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 169 ॥ ब्रजके पक्षी भी श्रीकृष्णनिष्ठ मुनि :- श्रीमद्भागवत (10/21/14)में- प्रायो बताम्ब मुनयो विहगा वनेऽस्मिन् कृष्णेक्षितं तदुदितं कलवेणुगीतम्। आरुह्य ये द्रुमभुजान् रुचिरप्रवालान् शृण्वन्ति मीलितदृशो विगतान्यवाचः ॥ 170॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 170 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे माते! इस वनमें जो सब पक्षी सुन्दर-सुन्दर पल्लवोंसे सुशोभित वृक्षोंकी शाखाओं आदिपर बैठकर नेत्र बन्द करके और कलरव करना बन्द करके श्रीकृष्णके मुखसे निकले कल-वेणुगीतको श्रवण करते हैं, वे भी प्रायः मुनिकी भाँति ही हैं॥ 170 ॥ अनुभाष्य-व्रजमें शरत्कालके आनेपर श्रीकृष्णने वन-वनमें वंशीध्वनि करके परिभ्रमण करना आरम्भ किया, उनकी उस वंशीध्वनिको सुनकर गोपियाँ श्रीकृष्णके सङ्गके लिये कामातुर होकर गान कर रही हैं, - हे अम्ब, अस्मिन् वने ये विहगाः (पक्षिणः) ते प्रायः (प्रायेण) मुनयः एव, यतः ते (पक्षिणः) कृष्णेक्षितं (कृष्णदर्शनं पुष्पफलाद्यन्तरं बिना यथा भवति, तथा) रुचिरप्रवालान् (रुचिराः शोभनाः प्रवालाः येषां तान् विचित्रोपशाखायुक्तान्) द्रुमभुजान् (वृक्षाणां शाखाः) आरुह्य [केनापि सुखेन] मीलितदृशः (निमीलित-नयनाः) विगतान्यवाचः (त्यक्तान्यशब्दाः सन्तः) तदुदितं (तेनैव कृष्णेन प्रकटितं) कलवेणुगीतं (मधुरमुरलीनिनादं) शृण्वन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 170 ॥ ब्रजके भ्रमर भी श्रीकृष्णनिष्ठ मुनि :- श्रीमद्भागवत (10/15/7)में- एतेऽलिनस्तव यशोऽखिल-लोकतीर्थं गायन्त आदिपुरुषानुपथं भजन्ते। प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्या गूढं वनेऽपि न जहत्यनघात्मदेवम्॥ 171 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 171 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- हे अनघ (पापशून्य)! हे आदिपुरुष ! ये सब भँवरे समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाले आपके यशसमूहका गान करते-करते (आपके जानेके मार्गपर आपके पीछे जाकर) भजन कर रहे हैं; ये भँवरेका वेष धारण करनेवाले मुनिगण आत्मदेवतारूप आपको आपके गूढ़रूपमें होनेपर भी परित्याग नहीं कर रहे हैं॥ 171 ॥ अनुभाष्य-पौगण्ड-अवस्थामें पदार्पण करके भगवान् श्रीकृष्ण एक बार श्रीबलरामके साथ पुष्पोंसे भरे वनमें प्रवेश करके चारों ओरकी शोभा देखकर विहार 438

चौबीसवाँ अध्याय [ 24/171–173 ]

करनेके इच्छा करके बड़े भाई बलरामकी प्रशंसा करते हुए कह रहे हैं,— हे आदिपुरुष (सर्वेषां सत्त्वानां कारणभूत-सन्धिनी-शक्तिमद्विग्रह), एते अलिनः (भृङ्गाः) तव अखिललोकतीर्थ (सकललोकपावनं) यशः गायन्तः अनुपथं (पथि पथि) भजन्ते; हे अनघ (शुद्धसत्त्वाधीश विग्रह), अमी भवदीय मुख्याः (त्वदीयानां मुख्याः प्रधानाः) मुनिगणाः वने गूढम् (अज्ञातम्) अपि आत्मदैवं (सेश्वरं तां) प्रायः न जहति (न त्यजन्ति त्वयि मनुष्यवेषेण निगूढे सति मुनयोऽप्यलिवेषेण निगूढास्त्वां भजन्तीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें। यहाँ पाठान्तरमें,— (भाः 10/15/7) यह श्लोक लक्षित होता है— “नृत्यन्त्यमी शिखिन ईड्य मुदा हरिण्यः कुर्वन्ति गोप्य इव ते प्रियमीक्षणेन। सूक्तैश्च कोकिलगणाः गृहमागताय धन्या वनौकस इयान् हि सतां निसर्गः॥” इसका अर्थ है,— “हे स्तुत्यर्ह (पूजनीय), मयूरगण अपने घरमें आये आपको देखकर परमानन्दमें नृत्य कर रहे हैं, हिरणियाँ गोपियोंके समान दृष्टि निक्षेप करके और कोयलें मधुर शब्द करके प्रीति उत्पन्न कर रही हैं; वृन्दावनवासी ही धन्य हैं, क्योंकि इसी प्रकार ही अर्थात् अपनी-अपनी वस्तुको प्रदान करना ही साधुओंका स्वभाव है॥” 171 ॥

ब्रजके हंस-सारसादि पक्षी भी श्रीकृष्णनिष्ठ मुनि :— श्रीमद्भागवत (10/35/11) में— सरसि सारसहंसविहङ्गा- श्चारुगीतहतचेतस एत्य। हरिमुपासत ते यतचित्ता हन्त मीलितदृशो धृतमौनाः॥ 172॥

अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 172 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— जलाशयमें सारस, हंसादि पक्षीगण (श्रीकृष्णकी वंशीसे निकले) मधुर गीतसे आकृष्ट होकर आ जाते हैं और संयत चित्तसे नेत्र बन्द करके मौन धारण करते हुए हरिकी उपासना करते हैं॥ 172 ॥

अनुभाष्य— दिनके समय श्रीकृष्णके वनमें जानेपर विरह-सन्तप्त गोपियाँ परस्पर इस प्रकार गीतका गान करती थीं,— [यर्हि अधरे कृष्णः सन्धितवेणुर्भवति तर्हीति पूर्वेणान्वयः] सरसि (सरोवरे) ये सारसहंसविहङ्गाः चारुगीतहतचेतसः (चारुणा वेणुगीतेन हतानि आकृष्टानि चेतांसि येषां ते) एत्य (आगत्य) हन्त (विषादे) यतचित्ताः (संयतमनाः) धृतमौनाः (निःशब्दाः) मीलितदृशः (मुदितनेत्राः सन्तः) हरिम् उपासत (अभजन्त, तत्समीपे उपविविशुर्वा)। श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 172 ॥

शुद्धभक्तकी कृपासे अशुद्ध जातिकी भी शुद्धि :— श्रीमद्भागवत (2/4/18)— किरातहूनान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा आभीरकङ्का यवनाः खशादयः। येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ 173 ॥

अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 173 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— किरात, हूण, अन्ध्र, पुलिन्द, पुक्कश, आभीर, (शुष्म) कङ्क, यवन और खशादि तथा अन्य जो समस्त पापयोनि जातियाँ हैं, वे सब जातियाँ ही जिनके आश्रित-वैष्णवोंके आश्रयमें भली-भाँति शुद्ध हो जाती हैं, मैं ऐसे प्रभावसे युक्त विष्णुको नमस्कार करता हूँ॥ 173 ॥

अनुभाष्य— श्रीशुकके मुखसे हरिकथा सुनकर परीक्षितके द्वारा श्रीकृष्णमें ऐकान्तिक मतिसे युक्त होकर मायाधीश भगवान्‌की सृष्टि आदि लीलाके विषयमें जिज्ञासा करनेपर उसके उत्तरमें श्रीशुक सर्वप्रथम भगवान्‌को प्रणाम करके मङ्गलाचरण कर रहे हैं,— किरातहूनान्ध्रपुलिन्दपुक्कशाः आभीर-कङ्काः यवनाः खशादयः (पापयोनयः) अन्ये ये पापाः (स्व-स्व-प्राक्तन-कर्मतः पापजातयः) यदुपाश्रयाश्रयाः (यस्य भगवतः उपाश्रयाः आश्रिताः भागवत-वैष्णवाः तदाश्रयाः भक्ताश्रिताः सन्तः) शुध्यन्ति (पवित्री भवन्ति) तस्मै प्रभविष्णवे (प्रभावशालिने भगवत विष्णवे) नमः।


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