श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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पचीसवाँ अध्याय 25/12-20 ] होकर (मायावादियोंपर कृपा करनेका) निवेदन करने लगे॥ 12 ॥ भक्तोंकी इच्छाको पूर्ण करनेके लिये महाप्रभुकी कृपा-अभिलाषा :- भक्त-दुःख देखि' प्रभु मनेते चिन्तिल। संन्यासीर मन फिराइते मन हइल ॥ 13 ॥ अनुवाद-भक्तोंके दुःखको देखकर महाप्रभुने मन-ही-मन मायावादी संन्यासियोंके मनको परिवर्तित करनेका निर्णय किया ॥ 13 ॥ महाराष्ट्र हेनकाले विप्र आसि' करिल निमन्त्रण। अनेक दैन्यादि करि' धरिया चरण ॥ 14 ॥ अनुवाद-उसी समय महाराष्ट्र महाप्रभुके श्रीचरण पकड़कर बड़ी दीनतापूर्वक उनको निमन्त्रण दिया ॥ 14 ॥ महाप्रभुके द्वारा निमन्त्रण स्वीकार :- तबे महाप्रभु ताँर निमन्त्रण मानिला। आर दिन मध्याह्न करि' ताँर घरे गेला ॥ 15 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने उन ब्राह्मणके निमन्त्रणको स्वीकार कर लिया और अगले दिन दोपहरका स्नान और अन्यान्य नित्यकृत्यादि करके उन ब्राह्मणके घरपर गये॥ 15 ॥ मायावादी संन्यासियोंका उद्धार-पहले आदिलीलाके सातवें अध्यायमें वर्णित :- ताँहा यैछे कैला प्रभु संन्यासी-निस्तार। पञ्चतत्त्वाख्याने ताहा करियाछि विस्तार ॥ 16 ॥ अनुवाद-वहाँपर जाकर महाप्रभुने जिस प्रकार उन संन्यासियोंका उद्धार किया, उसका मैंने पञ्चतत्त्वके प्रसङ्ग (आदिलीला सातवें अध्यायमें) पहले ही विस्तृत रूपसे वर्णन किया है ॥ 16 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला सातवें अध्यायमें पञ्चतत्त्वकी व्याख्याके प्रसङ्गमें यह लीला विस्तृत रूपसे वर्णित हुई है॥ 16॥ पुनरुक्ति भय :- ग्रन्थ बाड़े, पुनरुक्ति हय त' कथन। ताँहा ये ना लिखिलुँ, ताहा करिये लिखन ॥ 17 ॥ अनुवाद-पुनः उसका वर्णन करनेसे ग्रन्थका कलेवर बढ़ जायेगा। वहाँपर मैंने जिस प्रसङ्गका वर्णन नहीं किया, अब केवल उसीके विषयमें ही लिखूँगा ॥ 17 ॥ मायावादियोंकी कृपाप्राप्तिके दिनसे बहुतसे तार्किकोंका महाप्रभुके साथ तर्क करनेके लिये आना :- ये-दिवस प्रभु संन्यासीरे कृपा कैल। से-दिवस हैते ग्रामे कोलाहल हैल ॥ 18 ॥ लोकेर संघट्ट आइसे प्रभुरे देखिते। नाना शास्त्रे पण्डित आइसे शास्त्र विचारिते ॥ 19 ॥ अनुवाद-जिस दिन महाप्रभुने मायावादी संन्यासियोंपर कृपा की, उसी दिनसे सम्पूर्ण वाराणसीमें सर्वत्र इसकी चर्चा होने लगी। महाप्रभुके दर्शनके लिये लोगोंकी भीड़ आने लगी। अनेकानेक शास्त्रोंको जाननेवाले पण्डित भी महाप्रभुसे शास्त्रोंपर विचार करनेके लिये आने लगे॥ 18-19 ॥ शुद्धभक्तिसिद्धान्तपूर्ण अकाट्य-युक्तिके बलसे महाप्रभुके द्वारा सभीके कुतर्कका खण्डन :- सर्वशास्त्र खण्डि' प्रभु 'भक्ति' करे सार। सयुक्तिक वाक्ये मन फिराय सबार ॥ 20 ॥ अनुवाद-शास्त्रोंकी भुक्ति-मुक्ति आदिकी प्रधानता दिखानेवाले सभी विचारोंका खण्डन करके महाप्रभु 'भक्ति'को ही सभी शास्त्रोंके सारके रूपमें स्थापित करते। अत्यन्त सुन्दर युक्तियोंके द्वारा वे सभीके मनका परिवर्तन कर देते ॥ 20 ॥ । 479
[ 25/21-30 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सभीको महाप्रभुकी शिक्षाकी प्राप्ति और हरि-सङ्कीर्तन :- उपदेश लञा करे कृष्ण-सङ्कीर्त्तन। सर्वलोक हासे, गाय, करये नर्त्तन ॥ 21 ॥ अनुवाद—महाप्रभुसे श्रीकृष्णनामका उपदेश पाकर सभी श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तन करने लगे। नामके प्रभावसे और महाप्रभुकी कृपासे सभी हँसने, गाने और नृत्य करने लगे॥ 21 ॥ संन्यासियोंके द्वारा मायावाद छोड़कर श्रीकृष्णकी कथाका आलाप करते हुए इष्टगोष्ठी :- प्रभुरे प्रणत हैल संन्यासीर गण। आत्ममध्ये गोष्ठी करे छाड़ि' अध्ययन ॥ 22 ॥ अनुवाद—सभी मायावादी संन्यासी महाप्रभुके शरणागत हो गये। आगे अनुभाष्य देखें ॥ 22 ॥ अनुभाष्य—संन्यासी अपने-अपने वेदान्त-पठनको परित्याग करके अपनी गोष्ठीमें मिलकर महाप्रभुके द्वारा प्रदर्शित भक्तिपथके सम्बन्धमें आलाप करनेमें प्रवृत्त हुए॥ 22 ॥ प्रकाशानन्द सरस्वतीके किसी एक शिष्यके द्वारा सभामें चर्चा करते हुए महाप्रभुको 'नारायण' मानकर उनके द्वारा की गयी वेदान्तकी चिद्-विलास व्याख्याकी स्तुति और शङ्करके मायावादकी व्याख्याकी निन्दा :- प्रकाशानन्देर शिष्य एक ताँहार समान। सभामध्ये कहे प्रभुर करिया सम्मान ॥ 23 ॥ “श्रीकृष्णचैतन्य हय 'साक्षात् नारायण' । 'व्याससूत्रेर्' अर्थ करेन अति मनोरम ॥ 24 ॥ उपनिषदेर करेन मुख्यार्थ व्याख्यान। शुनिय़ा पण्डित-लोकेर जुड़ाय़ मन-काण ॥ 25 ॥ सूत्र-उपनिषदेर मुख्यार्थ छाड़िय़ा। आचार्य 'कल्पना' करे आग्रह करिया ॥ 26 ॥ आचार्य-कल्पित अर्थ ये पण्डित शुने। मुखे 'हय' 'हय' करे, हृदय ना माने ॥ 27 ॥ अनुवाद—प्रकाशानन्द सरस्वतीके एक शिष्य जो ज्ञानमें उन्हींके ही समान थे, वे सभामें महाप्रभुका सम्मान करते हुए कहने लगे, — “श्रीकृष्णचैतन्य 'साक्षात् श्रीमन्नारायण' हैं और वे 'व्याससूत्रका' (वेदान्त-सूत्रका) अत्यन्त सुन्दर और हृदयग्राही अर्थ करते हैं। वे उपनिषदोंके मुख्य अर्थकी व्याख्या करते हैं, जिसे सुनकर पण्डितोंके भी मन और कान तृप्त हो जाते हैं। व्याससूत्र और उपनिषदोंके मुख्य अर्थको छोड़कर श्रीशङ्कराचार्यका आग्रह उनके अपने कल्पित-मतकी स्थापनाके लिये ही था। श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा कल्पित अर्थोंको जो पण्डित श्रवण करते हैं, वे श्रीशङ्कराचार्यका सम्मान करनेके लिये मुखसे 'हाँ' 'हाँ' तो कहते हैं, किन्तु उनका हृदय उन्हें स्वीकार नहीं करता ॥ 23-27 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आचार्य'—शङ्कराचार्य ॥ 26 ॥ ज्ञानमार्गमें फल्गु-वैराग्यसे मायापर विजय असम्भव :- श्रीकृष्णचैतन्य-वाक्य दृढ़ सत्य मानि। कलिक़ाले संन्यासे 'संसार' नाहि जिनि ॥ 28 ॥ महाप्रभुकी 'हरेर्नाम' श्लोकके अर्थकी व्याख्याकी प्रशंसा :- हरेर्नाम-श्लोकेर येइ करिला व्याख्यान। सेइ सत्य सुखदार्थ परम प्रमाण ॥ 29 ॥ भक्ति ही मुक्तिदात्री और नामाभास ही मुक्तिप्रद :- भक्ति बिना मुक्ति नहे, भागवते कय। कलिक़ाले नामाभासे सुखे मुक्ति हय ॥ 30 ॥ अनुवाद—मैं श्रीकृष्णचैतन्यके वचनोंको परम सत्य मानता हूँ। कलिकालमें केवल संन्यासके द्वारा संसारसे उद्धार प्राप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने हरेर्नाम-श्लोककी जो व्याख्या की है, वही सत्य और परम प्रमाण है जिसे सुनकर सुख प्राप्त होता है। श्रीमद्भागवतमें कहा गया है कि भक्तिके बिना केवल ज्ञानसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं हो सकती। कलियुगमें तो नामाभाससे ही अनायास मुक्तिकी प्राप्ति हो जाती है॥ 28-30 ॥ 480 |
पचीसवाँ अध्याय 25/31-36 ] श्रीमद्भागवत (10/14/4) में :- श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये। तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम् ॥ 31 ॥ अनुवाद-हे विभो ! आपमें भक्ति ही कल्याणका पथ है, उसे परित्याग करके जो सब व्यक्ति केवल ज्ञान प्राप्तिके लिये अर्थात् 'मैं ब्रह्म' हूँ, इसको ही स्थिर रूपमें जाननेके लिये अनेक प्रकारके कष्ट स्वीकार करते हैं, खाली भूसीको पीसनेवालोंको जिस प्रकार चावल नहीं मिलते, उसी प्रकार, उन्हें अन्तमें क्लेशमात्र ही प्राप्त होता है ॥ 31 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/22 संख्या देखें ॥ 31 ॥ श्रीमद्भागवत (10/2/32) में :- येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय- स्तभावादविशुद्धबुद्धयः । आरुह्य कृच्छ्रं पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ 32 ॥ अनुवाद-हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया हूँ', ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित होते हैं ॥ 32 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/30 संख्या देखें ॥ 32 ॥ ब्रह्म-शब्दका वास्तविक अर्थ :- 'ब्रह्म'-शब्दे कहे 'षडैश्वर्यपूर्ण भगवान्'। ताँरे 'निर्विशेष' स्थापि, 'पूर्णता' हय हान ॥ 33 ॥ अनुवाद-'ब्रह्म'-शब्दका मुख्य अर्थ षडैश्वर्यपूर्ण स्वयं भगवान् होता है। उनको 'निर्विशेष' कहनेसे उनकी 'पूर्णता'में हानि होती है अर्थात् यह उनकी अपूर्ण व्याख्या है ॥ 33 ॥ अनुभाष्य-भगवान्को 'निर्विशेष' कहकर स्थापित करनेसे उनके अप्राकृत सविशेषरूपके अभावसे उनकी पूर्णशक्तिमत्तामें हानि होती है। निर्विशेष होना-एक शक्तिका अपूर्ण परिचय मात्र है ॥ 33 ॥ श्रुति और पुराणमें अवरोह-पथसे अप्राकृत-चिद्विलासका दर्शन, तर्कमूलक आरोहपथसे मायातीत चिद्विलासको मायिक जड़विलास समझना ही पाखण्ड या महाअपराध :- श्रुति-पुराण कहे,-कृष्णेर चिच्छक्ति-विलास। ताहा नाहि मानि' पण्डित करे उपहास ॥ 34 ॥ चिदानन्द कृष्णविग्रहे 'मायिक' करि' मानि। एइ बड़ 'पाप',-सत्य चैतन्येर वाणी ॥ 35 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 34-35 ॥ अनुभाष्य-सभी वेदशास्त्र और पुराण श्रीकृष्णके चिच्छक्ति-विलासको परमनित्य कहकर स्थापित करते हैं। अपने भोगमय जड़ीय-पाण्डित्यके अभिमानवशतः पण्डिताभिमानी ज्ञानी लोग 'चिच्छक्तिके विलास नहीं हो सकते और वह मायाशक्तिमें-से ही एक हैं',-ऐसे असत् ज्ञानसे भ्रान्त होकर श्रीकृष्णका उपहास करते हैं। निर्विशेषवादी सच्चिदानन्द श्रीकृष्णविग्रहको माया- कल्पित और मायासे निर्मित ईश्वरविग्रह मानकर भगवान्के नित्य सविशेषत्वको नहीं समझ पाते। उनकी दाम्भिकता (घमण्ड) अथवा नास्तिकता ही बहुत बड़ा अपराध है। श्रीमन्महाप्रभुके वचनानुसार सविशेष सच्चिदानन्द श्रीकृष्ण विग्रह-नित्य-सत्य-चिद्-विलासमय है, यही वास्तविक सत्य है ॥ 34-35 ॥ निर्विशेष-रूपकी अपेक्षा चिद्विलासमय रूपका श्रेष्ठत्व :- श्रीमद्भागवत (3/9/3) में- नातः परं परम यद्भवतः स्वरूप- मानन्दमात्रमविकल्पमविद्धवर्चः। पश्यामि विश्वसृजमेकमविश्वमात्मन् भूतेन्द्रियात्मकमदस्त उपाश्रितोऽस्मि ॥ 36 ॥ । 481
[ 25/36-38 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला निर्विशेषवादियोंका 'मायाधीश' भगवद्-विग्रहको 'मायिक' समझनेके कारण उनकी नरकमें गति :- श्रीमद्भागवत (3/9/4) में- तद्वा इदं भुवनमङ्गल मङ्गलाय ध्याने स्म नो दर्शितं त उपासकानाम्। तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम तुभ्यं योऽनादृतो नरकभाग्भिरसत्प्रसङ्गैः ॥ 37 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 36-37 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे परम, आपके इस आनन्दमात्र, अद्वयज्ञान और मायातीत तेजःस्वरूप, -जिस स्वरूपको मैं अब देख रहा हूँ, इससे श्रेष्ठ स्वरूप और कोई नहीं है। हे आत्मन्, विश्वसृजनकारी होनेपर भी विश्वसे पृथक् भूतेन्द्रियोंके कारणस्वरूप आपका यह जो रूप देख रहा हूँ, मैं इसके ही शरणागत हो रहा हूँ। हे भुवनमङ्गल, हमारे मङ्गलके लिये हमारी उपासनाके योग्य आपका यह स्वरूप, -जिसे आपने ध्यानमें दिखलाया है, उसी भगवद्-स्वरूपको-हम नमस्कार करते हैं और उसीकी सेवा करते हैं। असत् प्रसङ्गसे दूषित नरकगामी व्यक्ति इस नित्यमूर्तिका आदर नहीं करते॥ 36-37 ॥ अनुभाष्य-गर्भोदकशायीकी नाभिसे ब्रह्माके उत्पन्न होनेपर भी उन पुरुषको नहीं जान पानेके कारण, वे जलमें प्रविष्ट होकर तपस्याके द्वारा भगवान्का स्तव करते-करते निम्नलिखित दो श्लोकोंमें उनके निर्विशेष रूपकी अपेक्षा सविशेष चिद्विलाससमय सच्चिदानन्द विग्रहके श्रेष्ठ होनेका वर्णन कर रहे हैं,- हे परम (परमेश), अविद्धवर्चः (अविद्धं प्रकृत्या अनाक्रान्तं वर्चः तेजः यस्य तत् मायातीत-स्वरूपत्वात् अनावृत-प्रकाशम् अतः) अविकल्पं (न विद्यते विचित्रः कल्पः सृष्टिः यत्र तम् अद्वयज्ञानम्) आनन्दमात्रम् (आनन्दं निर्विशेषचिद्रूपं ब्रह्म मात्रा अंशः यस्य तं) यत् भवतः (तव) स्वरूपं (पूर्णभगवद्रूपं) तत् अतः (रूपात्) परं (भिन्नं) न पश्यामि। हे आत्मन् (परमात्मन्), विश्वसृजं (विश्वसृष्टि-कर्त्तारम्) एकम् (अद्वितीयम्) अविश्वं (नश्वरात् विश्वस्मात् अन्यत् भिन्नम् अक्षयत्वात्) भूतेन्द्रियात्मकं (भूतानाम् इन्द्रियाणां च आत्मकं कारणम्) ते (तव) अदः (अप्राकृतं) रूपम् उपाश्रितः अस्मि (शरणं यामि)। हे भुवनमङ्गल (जीवैककल्याणनिलय,) तत् वै (तदेव इदं रूपम्) उपासकानां नः (अस्माकं) मङ्गलाय ध्याने ते (त्वया) दर्शितं स्म। असत्प्रसङ्गैः (श्रौतमार्ग विरोधि-निर्विशेष-ब्रह्म-विचारपर- कुतर्कनिष्ठैः अज्ञानकल्पितवाक्यैः) नरकभाग्भिः (नरकगामिभिः केश्चित् नास्तिकैः) यः (पुरुषः त्वं) न आदृतः (नैव स्वीकृतः), तस्मै भगवते तुभ्यं नमः अनुविधेम (वयम् अनुवृत्त्या नमस्करवाम)। श्लोक-भावानुवाद-हे परमेश! देश, काल आदिके आवरणसे रहित आपका प्रकाशमय, अद्वयज्ञान, आनन्दमात्र निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप जो आपका अंश है, उसे मैं आपके पूर्ण भगवद्रूपसे भिन्न नहीं देख रहा हूँ। हे आत्मन्! इसलिये विश्वकी सृष्टि करनेवाले, अद्वितीय, अतः विश्वसे भिन्न एवं जीवों और उनकी इन्द्रियोंके कारणस्वरूप आपके इस अप्राकृत सविशेष रूपका ही मैं आश्रय लेता हूँ। हे भुवनमङ्गल! हम आपके इस रूपके उपासक हैं। आपने हमारे कल्याणके लिये ही ध्यानयोगमें उस रूपको दिखलाया है। श्रौतमार्ग-विरोधी निर्विशेष ब्रह्म-विचारपरक कुतार्किक व्यक्ति आपके इस स्वरूपको सच्चिदानन्दमय विग्रह न मानकर मायामय कहकर अनादर करते हैं और नरकमें पतित होते हैं। मैं षडैश्वर्ययुक्त आपको पुनः-पुनः नमस्कार करता हूँ॥ 37 ॥ अप्राकृत श्रीकृष्णकी नराकृतिको देखकर ही पाखण्डियोंकी प्राकृत मर्त्यबुद्धि :- श्रीमद्भगवद्गीता (9/11)में- अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तः सर्वभूतमहेश्वरम् ॥ 38 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 38 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मैं जब मनुष्यके आकारमें प्रकाशित होता हूँ, तब मूढ़लोग मेरी अवज्ञा करते हैं अर्थात् वे मेरी नित्य चिन्मयदेहको मायाश्रित मानकर 482 ।
अवज्ञा करते हैं। क्योंकि, वे सभी प्राणियोंके महेश्वर- स्वरूप श्रीकृष्णमूर्तिके सर्वोत्तम चिन्मय स्वभावको नहीं जानते हैं॥ 38 ॥ बार-बार गिराता हूँ (मैं उनके भीषण अपराधोंका उस प्रकार फल प्रदान करता हूँ-यह अर्थ है।)॥39॥ अनुभाष्य- सर्वभूतमहेश्वरं (सर्वप्राणिनामधीश्वरं मम) परं भावम् (अप्राकृत-रसविग्रह-तत्त्वम्) अजानन्तः मूढाः (अक्षजज्ञानमुग्धाः) मानुषीं (भक्तेच्छावशात् भक्ताह्लादन-निमित्तात् मनुष्याकारां) तनुं (शुद्धसत्त्वमयीमपि) आश्रितं (धृतं) माम् (अवतीर्णम्) अवजानन्ति (अवमन्यन्ते) । श्लोक-भावानुवाद-सब प्राणियोंके अधीश्वर मेरे परम भाव अर्थात् अप्राकृत रसविग्रह-तत्त्वको प्राकृत-इन्द्रियोंके ज्ञानसे मुग्ध मूढ़ लोग नहीं जानते हैं। भक्तोंकी इच्छाके वशीभूत होकर उनको आनन्द प्रदान करनेके लिये मनुष्यरूपमें (शुद्धसत्त्वमय) शरीर धारण करके अवतीर्ण होनेपर वे मेरी अवज्ञा करते हैं॥ 38 ॥ गुरुकी अवज्ञा अथवा गुरुसे विरोधके कारण तर्कपन्थामें श्रौतपन्थाके शक्ति-परिणामको अस्वीकार करनेके कारण विवर्त्तवाद :- सूत्रेर परिणामवाद, ताहा ना मानिया। 'विवर्त्तवाद' स्थापे, 'व्यास भ्रान्त' बलिया ॥ 40 ॥ विवर्त्तवादके आश्रयमें लक्षणा-वृत्तिसे वेदान्त-उपनिषद्के कल्पित अर्थके द्वारा असुर-पाखण्ड-मोहन :- एइ त' कल्पित अर्थ मने नाहि भाय। शास्त्र छाड़ि' कुकल्पना पाषण्डे बुझाय ॥ 41 ॥ परमार्थ भगवत्-कृपाको छोड़कर बाँझ वितण्डका आश्रय :- परमार्थ-विचार गेल, करि मात्र 'वाद'। काँहा मुक्ति पाब, काँहा कृष्णेर प्रसाद ॥ 42 ॥ पाषण्डियोंकी गति :- श्रीमद्भगवद्गीता (16/19)में- तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ 39 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 39 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरी श्रीमूर्तिके विद्वेषी क्रूर नराधमोंको मैं इस संसारमें आसुरी आदि योनियोंमें बार-बार डालता हूँ॥ 39 ॥ अनुभाष्य- [मां] द्विषतः (द्वेषपरायणान्) क्रूरान् (हिंस्रान्) अशुभान् (निषिद्धाचाररतान्) नराधमान् तान् (जनान्) एव संसारेषु (जन्ममृत्युमार्गेषु) आसुरीषु योनिषु (हिंसालोभसमन्वितासु तिर्यक्-पक्षादि-योनिषु) अजस्रं (पुनः पुनः) अहं क्षिपामि (तेषां भीषणापराधानां तादृशमेव फलं ददामीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-मुझसे द्वेष करनेवाले, क्रूर, निषिद्ध-आचारमें रत नराधमोंको मैं इस जन्म-मृत्युरूपी संसारमें हिंसा-लोभ स्वभाववाली पक्षी-पशु आदि योनियोंमें अनुवाद-वेदान्तसूत्रके शक्ति-परिणामवादको स्वीकार नहीं करके श्रीशङ्कराचार्यने व्यासदेवको भ्रान्त कहकर विवर्त्तवादकी स्थापना की। शास्त्रोंके सहज अर्थोंको छोड़कर उन्होंने अपने विचारोंके द्वारा शास्त्रोंके कल्पित अर्थ किये जो विचारशील व्यक्तियोंको आकर्षित नहीं करते। उन्होंने ऐसा केवल पाखण्डियोंको आकर्षित करनेके लिये किया। कैसे परमार्थ लाभ होगा, निरपेक्ष रूपसे इसका विचार नहीं करके केवल अपने सम्प्रदायके मतको स्थापित करनेके लिये उन्होंने वाद-विवाद करके दूसरोंके मतोंका ही खण्डन करनेकी चेष्टा की। मायावादी और पाखण्डी लोगोंको कैसे मुक्ति और श्रीकृष्णकी कृपा प्राप्त हो, इस बातपर उन्होंने विचार नहीं किया ॥ 40-42 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 7/121-126 संख्या देखें ॥ 40 ॥ शाङ्करभाष्य-मेघके द्वारा वेदान्तरूपी सूर्यको ढकना :- व्याससूत्रे अर्थ आचार्य करियाछे आच्छादन। एइ हय सत्य श्रीकृष्णचैतन्य-वचन ॥ 43 ॥ । 483
[ 25/43-55 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीचैतन्य-मत ही 'सार'; अद्वैत-मत सम्पूर्णतः असार :- चैतन्य-गोसाञि येइ कहे, सेइ मत सार। आर यत मत, सेइ सब छारखार॥"44॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्यका वचन कि श्रीशङ्कराचार्यने व्यास-सूत्रोंके अर्थोंको आच्छादित किया है, सत्य ही है। श्रीचैतन्य गोसाईं जो कुछ कहते हैं, वही सभी मतोंका सार है। उसके अतिरिक्त अन्य जितने भी मत हैं, वे सब सारहीन हैं॥"43-44॥ श्रीगौरभक्त प्रकाशानन्दकी उक्ति; उद्धारके बाद उनके 'प्रबोधानन्द' नामकी प्राप्तिके प्रमाणका अभाव :- एत कहि' सेइ करे कृष्णसङ्कीर्त्तन। शुनि' प्रकाशानन्द किछु कहेन वचन॥45॥ अनुवाद—इतना कहकर प्रकाशानन्द सरस्वतीका वह शिष्य श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन करने लगा, जिसे सुनकर प्रकाशानन्द सरस्वती कहने लगे॥45॥ 'केवलाद्वैतवाद'को स्थापित करनेके उद्देश्यसे शङ्करका सात्वत शास्त्रोंके खण्डन करनेकी चेष्टासे 'प्रच्छन्न-नास्तिकता' अथवा भगवद्-अविश्वास :- “आचार्येर आग्रह—'अद्वैतवाद' स्थापिते। ताते सूत्रेर व्याख्या करे अन्य रीते॥46॥ 'भगवत्ता' मानिते 'अद्वैत' ना याय स्थापन। अतएव सब शास्त्र करये खण्डन॥47॥ कुतर्कपर आधारित मतवादका फल :- येइ ग्रन्थकर्त्ता चाहे स्व-मत स्थापिते। शास्त्रेर सहज अर्थ नहे ताँहा हैते॥48॥ छः प्रकारके दार्शनिकोंके विभिन्न मतवाद और वैदिक मत :- 'मीमांसक' कहे,—'ईश्वर हय कर्मेर अङ्ग।' 'सांख्य' कहे,—'जगतेर प्रकृति कारण॥'49॥ 'न्याय' कहे,—'परमाणु हैते विश्व हय।' 'मायावादी'—निर्विशेष-ब्रह्मे 'हेतु' कय॥50॥ 'पातञ्जल' कहे,—'ईश्वर हय स्वरूप-आख्यान।' वेदमते कहे ताँरे—'स्वयं भगवान्'॥51॥ श्रीव्यासके द्वारा ब्रह्मसूत्रमें सभी मतवादोंका खण्डन :- छयेर छय मत व्यास कैला आवर्त्तन। सेइ सब सूत्र लञा 'वेदान्त'-वर्णन॥52॥ 'वेदान्त'के मतानुसार ब्रह्म—चिद्विलास सविशेष अथवा सच्चिदानन्दमय विग्रह :- 'वेदान्त'-मते,—ब्रह्म 'साकार' निरूपण। 'निर्गुण'—व्यतिरेके, तिँहो हय त' 'सगुण'॥53॥ दूसरोंके मतका खण्डन करके अपने-अपने मतवादको स्थापित करनेकी चेष्टा :- परम कारण ईश्वरे केह नाहि माने। स्व-स्व-मत स्थापे परमतेर खण्डने॥54॥ अनिश्चयतापर आधारित मनोधर्मी तर्कपन्थी षड्दर्शनको छोड़कर श्रौतपन्थी महाजन अथवा शुद्धभक्त ही आश्रय ग्रहण करने योग्य :- ताते छय दर्शन हैते 'तत्त्व' नाहि जानि। 'महाजन' येइ कहे, सेइ 'सत्य' मानि॥55॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥46-55॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अन्य संन्यासियोंके भक्ति-सापेक्ष वचनोंको श्रवण करके प्रकाशानन्द सरस्वती कह रहे हैं,—“अद्वैतवाद-स्थापनमें अत्यन्त आग्रहके कारण श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा ब्रह्मसूत्रकी अन्य प्रकारकी व्याख्या की गयी है। भगवत्ता माननेपर 'अद्वैतवाद' नहीं रहता। इसलिये आचार्यने भगवद्-तत्त्वको प्रतिपादित करनेवाले अन्य सभी शास्त्रोंके खण्डनकी चेष्टा की है। अपने मतको स्थापित करनेके लिये शास्त्रोंके सहज अर्थका परित्याग करना ही 'मतवाद'का नियम है। देखो (1) जैमिनी आदि मीमांसकोंने वेदोंका मुख्य तात्पर्य जो भक्ति है, उसे त्याग करके ईश्वरको 'कर्मका अङ्ग' बना दिया है। (2) कपिलादि निरीश्वर सांख्यकारोंने वास्तविक वेदार्थका परित्याग करके प्रकृतिको जगत्का कारण कहकर निर्देश किया है। (3) गौतम और 484
पचीसवाँ अध्याय 25/46–60 ] कणादादिने न्याय और वैशेषिक-शास्त्रोंमें परमाणुको ही विश्वका कारण कहा है। (4) उसी प्रकार अष्टावक्रादि मायावादियोंने निर्विशेष-ब्रह्मको ही जगत्का कारण कहकर दिखलाया है। (5) पतञ्जलि आदि राजयोगियोंने अपने योगशास्त्रमें कहे गये कल्पनामय ईश्वरको 'स्वरूप-तत्त्व' कहकर स्थापित किया है। इन सभी मतवाद परायण आचार्योंने वेदसिद्ध स्वयं भगवान्को परित्याग करके उनके खण्डरूपमें (खण्ड-प्रतीतिमय) एक-एक 'मत'को स्थापित किया है। षड्दर्शनके छः मतोंकी उत्तमरूपसे आलोचना करके उनके मतोंका खण्डन करके श्रीव्यासदेवने भगवत्-प्रतिपादक सभी वेदसूत्रोंका अवलम्बन करके वेदान्तसूत्रकी रचना की है। वेदान्त-मतमें, ब्रह्म—सच्चिदानन्द-स्वरूप साकार हैं। निर्विशेषवादी ब्रह्मको 'निर्गुण' और विशेष-स्थानपर भगवान्को 'सगुण' (त्रिगुणमय) कहकर प्रतिपादित करते हैं। वास्तवमें तत्त्ववस्तु केवल निर्गुण अथवा त्रिगुणातीत नहीं है, परन्तु वे—अनन्तचिद्गुणोंके आधार 'सगुण' विग्रह हैं। मतवादियोंके मतानुसार परम-कारण ईश्वरको (विष्णुको) प्राप्त नहीं किया जा सकता अर्थात् कोई भी सर्वेश्वरेश्वर सर्वकारण-कारण विष्णुको नहीं मानता, (अपितु सभीने दूसरे-दूसरे मतोंका खण्डन करके अपने-अपने मतको स्थापित करनेका प्रयास किया है)। इसलिये महाजन जो कहते हैं, उसे ही 'सत्य' कहकर जानना होगा॥ 46–55॥ महाभारतके वनपर्व (313/117)में— तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नासावृषिर्यस्य मतं न भिन्नम्। धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः॥ 56॥ अनुवाद—तर्क सहजरूपमें ही प्रतिष्ठा-शून्य होता है, सभी श्रुतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं, जिसका मत भिन्न न हो, वह 'ऋषि' ही नहीं हो सकता; इसलिये धर्मतत्त्व गूढ़रूपसे ढका हुआ है अर्थात् शास्त्रादि पढ़कर धर्मतत्त्वको जानना कठिन है। इसलिये जिन्हें साधुओंने 'महाजन' कहकर निर्णय किया है, वे जिस मार्गको 'शास्त्र-मार्ग' कहते हैं, उसी मार्गपर ही अन्य सभी व्यक्तियोंका चलना उचित है॥ 56॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 17/186 संख्या देखें॥ 56॥ चैतन्यसिद्धान्त-वाणी ही अनुसरणके योग्य :— श्रीकृष्णचैतन्य-वाणी—अमृतेर धार। तिँहो ये कहये वस्तु, सेइ 'तत्त्व'-सार॥" 57॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी वाणी अमृतकी धाराके समान है। उन्होंने जिसे परमतत्त्व कहकर स्थापित किया है, वही सभी तत्त्वोंका सार है॥" 57॥ महाराष्ट्र [ब्राह्मणका शुभ संवाद] देनेके लिये जाना :— ए सब वृत्तान्त शुनि' महाराष्ट्र प्रभुरे कहिते सुखे करिला गमन॥ 58॥ अनुवाद—यह सब वृत्तान्त सुनकर महाराष्ट्र ब्राह्मण बड़े आनन्दित होकर महाप्रभुको यह शुभ-संवाद सुनानेके लिये गये॥ 58॥ काशीमें दैनिक नियमके अनुसार पञ्चनदमें स्नानके बाद महाप्रभुका श्रीबिन्दुमाधवके दर्शनके लिये जाना :— हेनकाले महाप्रभु पञ्चनदे स्नान करि'। देखिते चलियाछेन 'बिन्दुमाधव हरि'॥ 59॥ अनुवाद—उसी समय महाप्रभु पञ्चनदमें स्नान करनेके बाद 'बिन्दुमाधव हरि'के दर्शन करनेके लिये जा रहे थे॥ 59॥ महाराष्ट्र [ब्राह्मणकी बात] सुनकर महाप्रभुकी प्रसन्नता :— पथे सेइ विप्र सब वृत्तान्त कहिल। शुनि' महाप्रभु सुखे ईषत् हासिल॥ 60॥ । 485
[ 25/60-70 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-मार्गमें ही उन ब्राह्मणकी महाप्रभुसे भेंट हुई और उन्होंने महाप्रभुको प्रकाशानन्द सरस्वतीकी सभामें हुई सब बातें कह सुनायी। उसे सुनकर महाप्रभु प्रसन्न होकर मन्द-मन्द मुस्कुराने लगे॥60॥ श्रीबिन्दुमाधवके दर्शनसे महाप्रभुका आवेश और नृत्य :- माधव-सौन्दर्य देखि' आविष्ट हइला। अङ्गनेते आसि' प्रेमे नाचिते लागिला॥61॥ चारों भक्तोंका सङ्कीर्त्तन :- शेखर, परमानन्द, तपन, सनातन। चारिजन मिलि' करे नाम-सङ्कीर्त्तन॥62॥ नाम सङ्कीर्त्तन :- “हरि हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः। गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन॥”63॥ चारों ओरसे असंख्य लोगोंके द्वारा हरिध्वनि :- चौदिकेते लक्ष लोक बोले 'हरि' 'हरि'। उठिल मङ्गलध्वनि स्वर्ग-मर्त्य भरि'॥64॥ अनुवाद-महाप्रभु बिन्दुमाधवके सौन्दर्यको देखकर प्रेमाविष्ट हो गये और मन्दिरके आँगनमें आकर प्रेमावेशमें नृत्य करने लगे। श्रीचन्द्रशेखर, श्रीपरमानन्द कीर्त्तनीया, श्रीतपन मिश्र, और श्रीसनातन गोस्वामी-चारों मिलकर नाम-सङ्कीर्त्तन करने लगे, - "कृष्ण, यादव, माधव, गोपाल, गोविन्द, राम, मधुसूदनादि जिनके ये सब नाम हैं, उन हरिको मैं नमस्कार करता हूँ।" चारों ओरसे लाखों लोग 'हरि' 'हरि' बोलने लगे। उस मङ्गलध्वनिसे पूरा ब्रह्माण्ड भर गया॥61-64॥ शिष्योंके साथ प्रकाशानन्दका वहाँ आगमन :- निकटे हरिध्वनि शुनि' प्रकाशानन्द। देखिते कौतुके आइला लञा शिष्यवृन्द॥65॥ अनुवाद-निकटसे ही आ रही हरिध्वनिको सुनकर श्रीप्रकाशानन्द सरस्वती भी अपने शिष्योंको साथ लेकर उस स्थानपर कौतूहलवशतः आ पहुँचे॥65॥ महाप्रभुके नृत्य और प्रेम-माधुर्यके दर्शनसे उनका भी कीर्त्तन :- देखिया प्रभुर नृत्य, प्रेम, देहेर माधुरी। शिष्यगण-सङ्गे सेइ बोले 'हरि' 'हरि'॥66॥ अनुवाद-महाप्रभुके नृत्य, उनके प्रेम और उनकी देहकी माधुरीको देखकर श्रीप्रकाशानन्द सरस्वती भी अपने शिष्यों सहित 'हरि' 'हरि' बोलकर कीर्त्तन करने लगे॥66॥ भाव-दर्शनसे काशीवासियोंको विस्मय :- हर्ष, दैन्य, चापल्यादि 'सञ्चारी' विकार। देखि' काशीवासी लोकेर हैल चमत्कार॥67॥ अनुवाद-महाप्रभुमें हर्ष, दैन्य, चापल्यादि 'सञ्चारी' विकारोंको देखकर काशीवासी लोग आश्चर्यचकित हो गये॥67॥ लोगोंकी भीड़ और संन्यासियोंके दर्शनसे महाप्रभुके द्वारा अपने भाव-नृत्यका सम्वरण :- लोकसंघट्ट देखि' प्रभुर 'बाह्य' यबे हैल। संन्यासीर गण देखि' नृत्य सम्वरिल॥68॥ अनुवाद-लोगोंकी भीड़को देखकर जब महाप्रभुमें 'बाह्य' आवेश आया, तब वहाँ उपस्थित संन्यासियोंको देखकर उन्होंने नृत्य करना बन्द कर दिया॥68॥ महाप्रभु और प्रकाशानन्द, दोनोंके द्वारा परस्परकी वन्दना :- प्रकाशानन्देर प्रभु वन्दिला चरण। प्रकाशानन्द आसि' ताँर धरिल चरण॥69॥ अनुवाद-दैन्यताकी मूर्ति महाप्रभुने श्रीप्रकाशानन्दके चरणोंकी वन्दना की। परन्तु श्रीप्रकाशानन्दने आकर उनके चरणोंको पकड़ लिया॥69॥ महाप्रभुके द्वारा दैन्य-ज्ञापन :- प्रभु कहे, - "तुमि जगद्गुरु पूज्यतम। आमि तोमार ना हइ 'शिष्येर शिष्य' सम॥70॥ 486 ।
पचीसवाँ अध्याय 25/70-76 ] श्रेष्ठ हञा केने कर हीनेर वन्दन। यदि अपराधिनः भवन्ति, तदा जीवन्मुक्ताः अपि पुनः आमार सर्वनाश हय, तुमि ब्रह्म-सम ॥ 71 ॥ संसारवासनां (भोगवासनामूलम् अनर्थ) यान्ति (लभन्ते)। यद्यपि तोमार सब ब्रह्म-सम भासे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74 ॥ लोकशिक्षा लागि' ऐछे करिते ना आइसे ॥ "72 ॥ भगवान्के चरण-स्पर्शसे अपराध-मोचन :- श्रीमद्भागवत (10/34/9)— अनुवाद-महाप्रभुने स्वयंको एक भक्तके रूपमें स वै भगवतः श्रीमत्पादस्पर्शहताशुभः। प्रदर्शित करते हुए श्रीप्रकाशानन्द सरस्वतीसे कहा, - "आप भेजे सर्पवपुर्हित्वा रूपं विद्याधरार्चितम् ॥ "75 ॥ परम पूजनीय जगद्गुरु हैं और मैं आपके शिष्यके शिष्यके समान भी नहीं हूँ। आप श्रेष्ठ होकर क्यों मुझ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 75 ॥ जैसे अधमकी वन्दना कर रहे हैं? आपके द्वारा ऐसा अमृतप्रवाह भाष्य-उस साँपने श्रीकृष्णके चरणके करनेसे तो मेरी भक्तिकी हानि होनेसे मेरा सर्वनाश हो स्पर्शसे अशुभ-रहित होकर सर्प-शरीर परित्याग करके जायेगा, क्योंकि आप तो ब्रह्मके समान हैं। यद्यपि विद्याधरोंके द्वारा अर्चित पूर्वरूपको प्राप्त किया ॥ "75 ॥ आपको सभी ब्रह्मके समान प्रतीत होते हैं, तथापि आप लोक-शिक्षाके लिये ही सही, ऐसा मत कीजिये ॥" 70-72 ॥ अनुभाष्य-व्रजमें एक बार देवयात्रा अनुष्ठान-क्रियामें गोपराज श्रीनन्दने बन्धु-बान्धवों सहित सरस्वती नदीके महाप्रभुके चरणस्पर्शसे प्रकाशानन्दके द्वारा अपराधसे मुक्त तटपर उपस्थित होकर व्रत धारण करके स्वयं वनमें होनेके विषयमें बतलाना :- शयन किया था, उसी समय अङ्गिरस-ऋषियोंके उपहासके तँहो कहे, - "तोमार निन्दा पूर्वे ये करिल। फलसे उनके अभिशापसे सर्प-योनिको प्राप्त सुदर्शन-नामक तोमार चरण-स्पर्शे, सब क्षय गेल ॥ 73 ॥ गन्धर्वने श्रीनन्दपर आक्रमण किया, श्रीनन्दके कातर होकर पुकारनेसे श्रीकृष्णने आकर उस सर्पपर चरणके अनुवाद-श्रीप्रकाशानन्द सरस्वतीने कहा, - "मैंने पहले द्वारा प्रहार किया और इस प्रकार श्रीनन्दकी सर्पके द्वारा आपकी जो निन्दा की थी, आपके चरणोंका स्पर्श ग्रास बनाये जानेसे रक्षा की। श्रीकृष्णके चरणके करनेसे मेरा वह अपराध अब दूर हो गया है ॥ 73 ॥ स्पर्शके फलसे सर्पका जो अशुभ दूर हुआ था, उसका ही श्रीशुकदेव परीक्षितको वर्णन कर रहे हैं,- मुक्तगणोंकी भी भगवद्-अपराधके फलसे बन्धनदशा :- वासना-भाष्यमें उद्धृत परिशिष्ट-वचन- सः (सर्पः) वै भगवतः (कृष्णस्य) श्रीमत्पादस्पर्शहताशुभः जीवन्मुक्ता अपि पुनर्यान्ति संसारवासनाम्। (श्रीमन्तः पादस्य स्पर्शेन हतम् अशुभम्-अङ्गिरसां विरूपदर्शनात् यद्यचिन्त्यमहाशक्तौ भगवत्यपराधिनः ॥ 74 ॥ तान् उपहसनेन तेभ्यः शापरूपं यस्य तथाभूतः सन्) सर्पवपुः (सर्पयोनिमित्यर्थः) हित्वा (परित्यज्य) विद्याधरार्चितं (विद्याधरैषु अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74 ॥ अर्चितं पूजितं) रूपं भेजे (प्राप)। अमृतप्रवाह भाष्य-जीवन्मुक्त लोग भी यदि अचिन्त्य श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 75 ॥ महाशक्तिशाली भगवान्के प्रति अपराध करते हैं, तो वे पुनः संसार-वासनामें पतित हो जाते हैं ॥ 74 ॥ स्वयं भगवान् होनेपर भी लोकशिक्षाके लिये महाप्रभुका जगद्गुरु आचार्यके रूपमें स्वयंको दीन जीव मानना :- अनुभाष्य- प्रभु कहे, - "'विष्णु' 'विष्णु', आमि क्षुद्र जीव हीन। अचिन्त्यमहाशक्तौ (अप्राकृत-चिच्छक्तिमति) भगवति (अधोक्षजे) जीवे विष्णु मानि-एइ अपराध-चिह्न ॥ 76 ॥ । 487
[ 25/76-84 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पाषण्डियोंका कार्य अथवा परिचय :- जीवे 'विष्णु' बुद्धि करे—येइ ब्रह्म-रुद्र-सम। नारायणे माने, तारे 'पाषण्डीते' गणन॥ 77 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“ 'विष्णु', 'विष्णु'! मैं तो एक छोटा-सा तुच्छ जीव हूँ। जीवको विष्णु मानना अपराधका लक्षण है। साधारण जीवको 'विष्णु' माननेकी बात तो छोड़ो, जो ब्रह्मा-रुद्रको भी श्रीनारायणके समान मानता है, वह 'पाखण्डी' कहलाता है॥ 76-77॥ शास्त्र-प्रमाण :- वैष्णवतन्त्र-वाक्य और पाद्मोत्तर-खण्ड (23/12)में— यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः। समत्वेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद्ध्रुवम्॥ ”78॥ अनुवाद—जो ब्रह्मा-रुद्रादि देवताओंके साथ श्रीनारायणको 'समान' रूपमें देखते हैं, वे निश्चय ही 'पाखण्डी' हैं॥”78॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 18/116 संख्या देखें॥ 78॥ महाप्रभुमें प्रकाशानन्दका दृढ़ विश्वास और श्रद्धा :- प्रकाशानन्द कहे,—“तुमि साक्षात् भगवान्। तबु यदि कर ताँर 'दास'-अभिमान॥ 79 ॥ तबु पूज्य हओ तुमि आमा सबा हैते। सर्वनाश हय, एइ तोमार निन्दाते॥ 80 ॥ अनुवाद—श्रीप्रकाशानन्द सरस्वतीने कहा, —“आप साक्षात् भगवान् हैं, परन्तु आप स्वयंमें भगवान्का 'दास' होनेका अभिमान कर रहे हैं। वैसा होनेपर भी आप हम सबके पूजनीय हैं, इसलिये आपकी निन्दा करनेसे मेरी पारमार्थिक सम्पत्तिका सर्वनाश हुआ है॥ 79-80॥ श्रीमद्भागवत (6/14/5)में— मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥ 81 ॥ अनुवाद—हे महामुने, करोड़ों-करोड़ों मुक्तों और सिद्धोंमेंसे नारायण-परायण प्रशान्तात्मा पुरुष अत्यन्त दुर्लभ है॥ 81 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 19/150 संख्या देखें॥ 81 ॥ महत् अथवा वैष्णवकी निन्दासे सर्वनाश :- श्रीमद्भागवत (10/4/46)में— आयुः श्रियं यशो धर्मं लोकानाशिष एव च। हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रमः॥ 82 ॥ अनुवाद—मनुष्यके द्वारा महान् व्यक्तिका अनादर करनेसे उसकी आयु, श्री (सम्पत्ति), यश, धर्म, लोक-परलोक और आशीर्वाद—ये सब श्रेष्ठ वस्तुएँ नाश हो जाती हैं॥ 82 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 15/270 संख्या देखें॥ 82 ॥ श्रीमद्भागवत (7/5/32)में— नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः। महीयसां पादरजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत्॥ 83 ॥ अनुवाद—जब तक मनुष्योंकी मति निष्किञ्चन भगवद्भक्तोंकी पदधूलिके द्वारा अभिषिक्त नहीं होती, तब तक वह अनर्थनाशक श्रीकृष्णचरणकमलोंका स्पर्श नहीं कर पाती॥ 83 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/53 संख्या देखें॥ 83 ॥ अहङ्कारका त्याग करके श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें प्रणामके फलसे शुद्ध भक्तिकी प्राप्ति :- एबे तोमार पादाब्जे उपजिबे भक्ति। तथि लागि' करि तोमार चरणे प्रणति॥ ”84॥ अनुवाद—अब आपके चरणकमलोंमें मेरी भक्ति उदित हो, इसी कारण मैं आपके चरणोंमें प्रणाम कर रहा हूँ॥”84॥ 488 ।
पचीसवाँ अध्याय 25/85-95 ] सभीका वहाँपर बैठना और प्रकाशानन्दकी महाप्रभुके मुखसे शङ्करके मायावादकी समालोचना और ब्रह्मसूत्रके वास्तविक तात्पर्यके श्रवणकी इच्छा :— एत बलि' प्रभुरे लञा तथा बसिल। प्रभुरे प्रकाशानन्द पुछिते लागिल ॥ ८५ ॥ “मायावादे करिला यत दोषेर आख्यान। सबे एइ जानि' आचार्येर कल्पित व्याख्यान ॥ ८६ ॥ सूत्रेर करिला तुमि मुख्यार्थ-विवरण। ताहा शुनि' सबार हैल चमत्कार मन ॥ ८७ ॥ तुमि त' ईश्वर, तोमार आछे सर्वशक्ति। संक्षेपरूपे कह तुमि, शुनिते हय मति ॥”८८ ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीप्रकाशानन्द सरस्वती महाप्रभुको लेकर वहीं बिन्दुमाधव मन्दिरमें बैठ गये और वे महाप्रभुसे पूछने लगे,—“आपने मायावाद-भाष्यमें जो जो दोष दिखलाये हैं, उन्हें सुनकर हम सब यह समझ गये कि श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा की गयी व्याख्या उनकी मनोकल्पना है [उसे हम लोग मुखसे तो मानते थे, किन्तु हृदयसे स्वीकार नहीं कर पाते थे]। आपने सूत्रोंके मुख्य अर्थके द्वारा जो व्याख्या की है, वह अति आश्चर्यजनक है और हम उसे हृदयसे स्वीकार कर पा रहे हैं। आप तो ईश्वर हैं, सर्वशक्तिमान् हैं, इसलिये आप व्यास-सूत्रके वास्तविक अर्थ बतलानेमें समर्थ हैं। अब आप वेदान्तसूत्रोंका अर्थ संक्षेपमें बतलाइये, उसे सुननेकी हमारी अभिलाषा है॥”८५-८८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘संक्षेपरूपे कह'—प्रत्येक सूत्रका मुख्य-अर्थ, जो आपने कहा था, उसे मैंने सुना है। अब मैं वेदान्तके मुख्य तात्पर्यको संक्षेपमें सुननेकी इच्छा करता हूँ॥८८॥ श्रौतपन्थी महाप्रभुका दैन्यवशतः स्वयंको शिष्यरूपी दीन जीव मानकर व्यास-गुरु-पूजा :— प्रभु कहे,—“आमि 'जीव', अति तुच्छ-ज्ञान! व्याससूत्रेरे गम्भीर अर्थ, व्यास-भगवान् ॥ ८९ ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं एक साधारण 'जीव' हूँ, इसलिये मुझमें ज्ञान भी बहुत कम है। किन्तु व्याससूत्रका अर्थ तो बहुत गम्भीर है, क्योंकि व्यासदेव तो भगवान् हैं॥८९॥ जीवोंके हितके लिये व्यासदेव स्वयं सूत्रकार होनेपर भी भाष्यकार, उसीमें वास्तविक तात्पर्यके बोधको स्वीकार करना :— ताँर सूत्रेर अर्थ कोन जीव नाहि जाने। अतएव आपने सूत्रार्थ करियाछे व्याख्याने ॥ ९० ॥ येइ सूत्रकर्त्ता, से यदि करये व्याख्यान। तबे सूत्रेर मूल अर्थ लोकेर हय ज्ञान ॥ ९१ ॥ अनुवाद—श्रीव्यासदेवके द्वारा रचित सूत्रोंका अर्थ कोई भी जीव नहीं जान सकता है, इसलिये उन्होंने स्वयं ही सूत्रोंके अर्थकी व्याख्या की है। यदि सूत्रकी रचना करनेवाला स्वयं ही अपने द्वारा रचित सूत्रकी व्याख्या करे, तभी सूत्रके मुख्य अर्थको लोग जान सकते हैं॥९०-९१॥ वेदरूपी वृक्षका बीज—प्रणव, माता (अङ्कुर)—गायत्री, फल—चतुःश्लोकी भागवत :— प्रणवेर येइ अर्थ, गायत्रीते सेइ हय। सेइ अर्थ चतुःश्लोकीते विवरिया कय ॥ ९२ ॥ ब्रह्म-सम्प्रदायमें आम्नाय-परम्परामें भागवत-कीर्तन-वर्णन :— ब्रह्मारे ईश्वर चतुःश्लोकी ये कहिला। ब्रह्मा नारदे सेइ उपदेश कैला ॥ ९३ ॥ नारद सेइ अर्थ व्यासेरे कहिला। शुनि' वेदव्यास मने विचार करिला ॥ ९४ ॥ ब्रह्मसूत्रके भाष्यस्वरूप चतुःश्लोकीका विस्तार अथवा भागवतकी रचनाका सङ्कल्प :— 'एइ अर्थ—आमार सूत्रेर व्याख्यानुरूप। 'भागवत' करिब सूत्रेर भाष्यस्वरूप ॥' ९५ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥९२-९५॥ । 489
[ 25/92-99 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य—प्रणव ही सभी वेदोंका 'महावाक्य' है। उस प्रणवमें जो अर्थ है, वही गायत्रीमें है और वही अर्थ श्रीमद्भागवतमें चतुःश्लोकीके 'अहमेवासमेवाग्रे' इस श्लोकसे चौथे श्लोक तकमें विवृत हुआ है। भगवान्से ब्रह्मा, ब्रह्मासे नारद, नारदसे श्रीव्यास,—इस प्रकार सम्प्रदाय-परम्परासे सभी वेदोंका ज्ञान और उनका तात्पर्य श्रीमद्भागवतमें आया है। श्रीमद्भागवत ही 'ब्रह्म सूत्रका भाष्य'-स्वरूप है॥92-95॥ वेद और उपनिषदोंके सारका भली-भाँति उद्धार :- चारिवेद-उपनिषदे यत किछु हय। तार अर्थ लञा व्यास करिला सञ्चय॥96॥ अनुवाद—श्रीव्यासदेवने चारों वेदों और उपनिषदोंके समस्त तात्पर्यको संग्रह करके उसे सूत्ररूपमें वेदान्त-सूत्रमें दिया है॥96॥ सूत्रके मूल-स्वरूप श्रुति मन्त्रसमूह ही भागवतमें श्लोकोंके आकारमें निबद्ध :- येइ सूत्रे येइ ऋक्-विषय-वचन। भागवते सेइ ऋक् श्लोके निबन्धन॥97॥ अनुवाद—वेदान्तसूत्रमें वेदोंके मन्त्रोंका उद्देश्य वर्णित है। श्रीमद्भागवतमें वेदमन्त्रोंका वही उद्देश्य अठारह हजार श्लोकोंके रूपमें वर्णित हुआ है॥97॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ऋक्'—वेदमन्त्र; 'विषयवचन'- उद्देश्य। श्रीमद्भागवतमें वे ही 'ऋक्' श्लोकके रूपमें निबद्ध हुए हैं॥97॥ उपनिषदोंके मन्त्रोंके अर्थ ही भागवतके श्लोकोंमें व्यक्त :- अतएव ब्रह्मसूत्रेरे भाष्य—श्रीभागवत। भागवत-श्लोक, उपनिषत् कहे 'एक' मत॥98॥ अनुवाद—इसलिये ब्रह्मसूत्रके भाष्य श्रीमद्भागवतके श्लोकों और उपनिषदोंके मन्त्रोंका एक ही तात्पर्य है॥98॥ दृष्टान्त; सब कुछ ही विष्णुमय है, उसके अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है, भोक्ताकी बुद्धिका त्यागकर युक्त-वैराग्यके साथ सभी विषय विष्णुसे सम्बन्धित अथवा विष्णुके भोगके रूपमें सेव्य :- श्रीमद्भागवत (8/1/10)में- आत्मावास्यामिदं विश्वं यत् किञ्चिज्जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यचिद्धनम्॥99॥ अनुवाद—यह संसार और इसमें रहनेवाले सभी स्थावर-जङ्गम प्राणी ईश्वरकी सत्ता और चेतनाके द्वारा व्याप्त हैं। इसलिये ईश्वरके द्वारा प्रदत्त समस्त विषयोंका उपभोग करो, किन्तु किसी अन्यके धनकी आकाङ्क्षा न करो॥99॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो कुछ भी इस जगत्में देख रहे हो, वह सब कुछ ही अर्थात् यह विश्व ही आत्माके द्वारा व्याप्त है। हे जीवों, वे आत्मा ही तुम्हारे नियन्ता और पालन करनेवाले हैं, जो कुछ द्रव्य तुम्हें प्राप्त हुए हैं, उन्हें उनके द्वारा कृपापूर्वक दिये गये द्रव्य समझकर जगत्के समस्त द्रव्योंका भोग करो, अन्योंका धन हरण मत करना। तात्पर्य यह है कि जिस ब्रह्मसूत्रका ईशोपनिषदके “ईशावास्यमिदं जगत्”-मन्त्र अर्थात् श्रुतिमन्त्र उद्देश्य है, श्रीमद्भागवतमें वही ऋक् (मन्त्र) “आत्मावास्यमिदं” कहकर श्लोकके रूपमें निबद्ध हुआ है। इस प्रकार समस्त सूत्रोंके ही समस्त ऋक्-वचन भागवतके श्लोकोंमें निबद्ध हैं॥99॥ अनुभाष्य—परीक्षितके द्वारा स्वायम्भुव-मनुकी वंशावलीका श्रवण करके अन्यान्य मनुओंके विषय और मन्वन्तरावतारोंके क्रिया-कलापकी जिज्ञासा करने पर, श्रीशुक सर्वप्रथम मनुकी उक्ति बतला रहे हैं,— जगत्यां (लोके) यत् किञ्चित् जगत् (बद्धजीवभोग्यं मायाशक्ति- परिणतम् इन्द्रियसुखकरं, तत्) इदं विश्वं (सर्वम्) आत्मावास्यं (प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन अप्राकृतदर्शनेन आत्मना भगवता 490 ।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का सटीक पाठ्यान्तरण (transcription) दिया गया है:
पचीसवाँ अध्याय [ 25/99-104 ]
आवास्यं सत्ता-चैतन्याभ्यां व्याप्तं) तेन (हेतुना) त्यक्तेन (सेवाकामाय भगवदर्पणेन, यद्वा,) तेन (ईश्वरेण) त्यक्तेन (किञ्चित् त्यक्तं दत्तं यद्धनं तेनैव भगवत्त्यक्तोच्छिष्टत्वेनेत्यर्थः) भुञ्जीथाः (गृहाण, स्वीकुर्वित्यर्थः); कस्यचित् (जड़भोक्तृबुद्ध्या आसक्तस्य जनस्य सम्बन्धे) धनं (भगवदितर-माया-दर्शनार्थ प्राकृत-विषयभोगादिकं) मा गृधः (नैवाकाङ्क्षीः;-तथा च श्रुतिः “ईशावास्यमिदम्” इति यथा श्लोकमेव)। श्लोक-भावानुवाद—इस लोकमें बद्धजीवके भोगके लिये मायाशक्ति-परिणत इन्द्रियसुखकर वस्तुएँ (प्रेमाञ्जनसे युक्त भक्तिनेत्रोंके द्वारा जिनका अप्राकृत दर्शन होता है, उन) भगवान्की सत्ता और चैतन्यके द्वारा व्याप्त हैं, इसलिये वे भगवत्सेवा हेतु ही भगवान्के द्वारा प्रदान की गयी हैं, इस भावसे उन्हें स्वीकार करना चाहिये। जड़भोगबुद्धिसे अन्य किसीके प्राकृत विषयभोगोंकी आकाङ्क्षा मत करो (श्रुतिमें कहे गये मन्त्र “ईशावास्यमिदम्”के अनुरूप यह भागवतका श्लोक है)॥ 99॥ आदि चतुःश्लोकी-भागवतमें सम्बन्ध- अभिधेय-प्रयोजन निरूपित :- भागवतेर सम्बन्ध, अभिधेय, प्रयोजन। चतुःश्लोकीते प्रकट तार करियाछे लक्षण॥ 100॥ अनुवाद—श्रीमद्भागवतमें आलोचित सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन-तत्त्वके लक्षण चतुःश्लोकीमें ही व्यक्त किये गये हैं॥ 100॥ श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माको चतुःश्लोकीमें वर्णित तीन तत्त्वोंकी संक्षेपमें व्याख्या- विषयबोधरूपी भगवत्-स्वरूप-निर्धारण ही केवल चिन्मात्रमय ‘ज्ञान’, आश्रयकी चिद्-विलासानुभवरूपी भगवद्स्फूर्ति ही ‘विज्ञान’, रहस्य अथवा प्रेम ही ‘प्रयोजन’, तदङ्ग (उसका अङ्ग) साधनभक्ति ही ‘अभिधेय’ :- ‘आमि’-‘सम्बन्ध’-तत्त्व, आमार ज्ञान-विज्ञान। आमा पाइते साधन-भक्ति ‘अभिधेय’-नाम॥ 101॥ साधनेर फल-‘प्रेम’ मूल-प्रयोजन। सेइ प्रेमे पाय जीव आमार ‘सेवन’॥ 102॥
अनुवाद—श्रीकृष्णने कहा,-मैं ही सभी सम्बन्धोंका मूल केन्द्र हूँ और मेरा ज्ञान-विज्ञान ही ‘सम्बन्ध’-तत्त्व है। मुझे प्राप्त करनेके लिये जो साधन-भक्ति की जाती है, उसका नाम ‘अभिधेय’ है। साधनका फल ‘प्रेम’ है, वही मूल-प्रयोजन है और उसी प्रेमसे ही जीव मेरी ‘सेवा’को प्राप्त करता है॥ 101-102॥ छय श्लोकोंमेंसे चतुःश्लोकीके अतिरिक्त इस श्लोकमें सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनका वर्णन; ज्ञान और विज्ञान ही ‘सम्बन्ध’, रहस्य ही ‘प्रयोजन’, उसका अङ्ग ही ‘अभिधेय’ :- श्रीमद्भागवत (2/9/30)में- ज्ञानं मे परमगुह्यं यद्विज्ञान-समन्वितम्। सरहस्यं तदङ्गञ्च गृहाण गदितं मया॥ 103॥ अनुवाद—श्रीभगवान्ने ब्रह्माजीसे कहा,-“हे ब्रह्मन्! मेरे स्वरूपकी उपलब्धिरूप विज्ञान और रहस्यमयी प्रेमाभक्तिके साथ शब्द-शास्त्रोंका प्रतिपाद्य मेरा अत्यन्त गोपनीय ज्ञान तथा उस प्रेमाभक्तिके अङ्ग-साधनभक्तिको मैं बतला रहा हूँ, तुम इसे ग्रहण करो॥ 103॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/51 संख्या देखें॥ 103॥ अवरोह-पन्थामें भगवद्-कृपाके प्रभावसे तत्त्वकी स्फूर्ति :- एइ ‘तिन’ तत्त्व आमि कहिनु तोमारे। ‘जीव’ तुमि एइ तिन नारिबे जानिबारे॥ 104॥ अनुवाद—सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन-इन तीन तत्त्वोंके विषयमें मैं तुम्हें बतलाऊँगा। हे ब्रह्मा, तुम ‘जीव’ हो, अपने प्रयाससे तुम इन्हें नहीं जान सकते॥ 104॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘जीव’ तुमि’-हे ब्रह्मन्, तुम ‘जीव’ हो, मेरी कृपाके बिना तुम परम गुह्य ज्ञानको नहीं जान पाओगे॥ 104॥ अनुभाष्य—‘एइ तिन’-सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन॥ 104॥
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[ 25/105-113 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नामरूपगुणलीलामय भगवान् केवल 'निर्विशेष' नहीं :- यैछे आमार 'स्वरूप', यैछे आमार 'स्थिति'। यैछे आमार गुण, कर्म, षडैश्वर्य-शक्ति ॥ 105 ॥ आमार कृपाय एइ सब स्फुरुक तोमारे।' एत बलि' तिन तत्त्व कहिला ताँहारे ॥ 106 ॥ अनुवाद-जैसा मेरा 'स्वरूप' है, जैसी मेरी स्थिति है, जैसे मेरे गुण, कर्म और षडैश्वर्यमयी शक्ति है, मेरी कृपासे ये सब तुम्हारे हृदयमें स्फुरित हों।' यह कहकर भगवान् ब्रह्माको तीनों तत्त्वोंकी शिक्षा प्रदान करने लगे ॥ 105-106 ॥ छः श्लोकोंमें चतुःश्लोकीके अतिरिक्त इस श्लोकमें कृपारूपी आशीर्वाद-वर्षण :- श्रीमद्भागवत (2/9/31)- यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः। तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ॥ 107 ॥ अनुवाद-मेरा स्वरूप, मेरा लक्षण, मेरा रूप, मेरे गुण और मेरी लीलाएँ जिस प्रकार हैं, उन सबका तत्त्वविज्ञान मेरी कृपासे तुम्हें प्राप्त हो ॥ 107 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/52 संख्या देखें ॥ 107 ॥ चतुःश्लोकीकी व्याख्या आरम्भ; उसमेंसे प्रथम श्लोकमें सम्बन्ध-तत्त्व अहं-शब्दसे कहे गये स्वरूपशक्तिमान् नित्य-सत्य-सनातन-विग्रह श्रीकृष्णके 'ज्ञान'का लक्षण :- 'सृष्टिर पूर्वे षडैश्वर्यपूर्ण आमि त' हइये। 'प्रपञ्च', 'प्रकृति', 'पुरुष' आमातेइ लये ॥ 108 ॥ सृष्टि करि' तार मध्ये आमि त' बसिये। प्रपञ्च ये देख सब, सेह आमि हइये ॥ 109 ॥ प्रलये अवशिष्ट आमि 'पूर्ण' हइये। प्राकृत प्रपञ्च पाय आमातेइ लये ॥ '110 ॥ अनुवाद-श्रीभगवान्ने ब्रह्मासे कहा,-'सृष्टिसे पहले षडैश्वर्यपूर्ण केवल मैं ही था, प्रपञ्च, प्रकृति और जीव मुझमें ही लय थे। सृष्टि करनेके बाद मैं उसमें प्रवेश कर जाता हूँ। प्रपञ्चमें तुम जो कुछ भी देखते हो, वह सब मेरी ही शक्तिका विस्तार है। प्रलय होनेपर भी अन्तमें मैं 'पूर्ण' ही रहता हूँ और सृष्ट प्राकृत प्रपञ्च मुझमें ही लय हो जाता है॥'108-110॥ चतुःश्लोकीका प्रथम श्लोक :- श्रीमद्भागवत (2/9/32)में- अहमेवासमेवाग्रे नान्यत् यत् सदसत्परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ 111 ॥ अनुवाद-इस जगत्की सृष्टिके पूर्व केवल मैं ही था। सत्, असत् और अनिर्वचनीय निर्विशेष ब्रह्म तक कुछ भी मुझसे पृथक् रूपसे नहीं था। सृष्टि होनेके बाद इस सम्पूर्ण-स्वरूपमें मैं ही हूँ और सृष्टिकी प्रलय होनेके बाद भी एकमात्र मैं ही अवशिष्ट रहूँगा ॥ 111 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/53 संख्या देखें॥ 111 ॥ श्लोकका तात्पर्य-श्रीकृष्णका सच्चिदानन्द विग्रह होना :- “अहमेव”-श्लोके 'अहम्'-तिनबार। पूर्णैश्वर्ये-विग्रहेर स्थितिर निर्धार ॥ 112 ॥ अनुवाद-“अहमेव”-श्लोकमें 'अहम्' शब्द तीन बार आया है जो पूर्णैश्वर्य-विग्रहकी स्थितिको निर्धारित करता है॥ 112 ॥ अनुभाष्य-'अहमेव' श्लोकमें तीन बार 'अहम्' शब्द है। प्रथम चरणमें 'अहमेव'-पदमें, तृतीय-चरणमें 'पश्चादहं'-पदमें और चतुर्थ-चरणमें 'सोऽस्म्यहं'-पदमें 'अहं'-शब्द विद्यमान है; इसके द्वारा भगवान्का व्यक्तिगत विग्रह निर्धारित हुआ-वे केवल निर्विशेष नहीं हैं॥ 112 ॥ निराकारवादियोंका खण्डन :- ये 'विग्रह' नाहि माने, 'निराकार' माने। तारे तिरस्करिवारे करिला निर्धारणे ॥ 113 ॥ अनुवाद-जो 'विग्रह'को नहीं मानता, निराकारको ही मानता है, उसके भ्रमको दूर करनेके लिये ही भगवान्ने तीन बार 'अहम्' शब्दका प्रयोग किया है॥ 113 ॥ 492
पचीसवाँ अध्याय 25/113-117 ] अनुभाष्य—निर्विशेषवादी भगवान्के व्यक्तिगत सविशेष विग्रहको स्वीकार नहीं करते, इसलिये उनका विचार भ्रमपूर्ण और सब प्रकारसे त्याज्य है—इसी बातकी हृदयमें धारणा करानेके लिये तीन बार 'अहमेव' कहकर 'सम्बन्ध' स्थापित किया है॥ 113 ॥ चतुःश्लोकीके द्वितीय श्लोकमें 'अन्तरङ्ग-स्वरूप'के अतिरिक्त 'तटस्थ-जीव' और 'बहिरङ्गा गुण-माया'-शक्तिका लक्षण और उसकी प्रतीतिका विचार; जीवका भी गुण-मायातीत-स्वरूप, अथवा अन्तरङ्ग-दर्शनमें निरपेक्ष विशुद्ध स्वरूपानुभव अथवा-'विज्ञान'; जीव अथवा गुणमायाका दर्शन 'स्वरूप-दर्शन' नहीं :- एइ सब शब्दे हय—'ज्ञान'-'विज्ञान'-विवेक। माया-कार्य, माया हैते आमि—व्यतिरेक ॥ 114 ॥ अनुवाद—[चतुःश्लोकीके प्रथम और द्वितीय श्लोकके] शब्दोंसे भगवतत्त्वके 'ज्ञान' और 'विज्ञान'का (भगवद्-स्वरूपकी अनुभूतिका) विवेक (यथार्थ ज्ञान) प्राप्त होता है। मायाका कार्य—जगत् और माया, दोनों भगवान्की शक्ति हैं, तो भी भगवान् इन दोनोंसे भिन्न हैं॥ 114 ॥ सूर्य, आभास और तमः—एक ही वस्तुकी विभिन्न प्रतीतियोंका दृष्टान्त :- यैछे सूर्येर स्थाने भासये 'आभास'। सूर्य बिना स्वतः तार ना हय प्रकाश ॥ 115 ॥ 'ज्ञान' और 'विज्ञान'को लेकर ही सम्बन्ध-तत्त्व निरूपित :- मायातीत हैले हय आमार 'अनुभव'। एइ 'सम्बन्ध'-तत्त्व कहिलुँ शुन आर सब ॥ 116 ॥ अनुवाद—जैसे कभी सूर्यके स्थानपर उसका प्रतिबिम्ब दिखलायी पड़ता है, परन्तु उसका प्रकाश सूर्यसे स्वतन्त्र नहीं है। मायाके बन्धनसे मुक्त होनेपर ही मेरा अनुभव होता है, इसी सम्बन्ध-तत्त्वको मैंने प्रथम दो श्लोकोंमें कहा है। अब अन्य तत्त्वोंके (अभिधेय और प्रयोजन तत्त्वोंके) विषयमें सुनो ॥ 115-116 ॥ अनुभाष्य—'ज्ञान'-शास्त्रसे उत्पन्न, 'विज्ञान'-अनुभव। गुरु अथवा शास्त्रके अतिरिक्त अन्य कहींसे आनेवाला 'विवेक' बहुत बार मनोधर्म अथवा निर्विशेष-परायण होता है। अपनी अनुभूतिसे विवेकके उदित होनेपर भगवद्-विग्रहकी उपलब्धि होती है। भगवान्का अपना-विग्रह—माया और मायिक कार्यसे भिन्न है। विज्ञानके उदित नहीं होने तक जीवको यह बोध नहीं होता। जिस प्रकार सूर्यसे किरणें प्रकाशित होती हैं, किन्तु किरणें—सूर्यसे भिन्न हैं, पुनः सूर्यके बिना किरणोंका स्वतन्त्र प्रकाश भी सिद्ध नहीं होता, उसी प्रकार भगवान् और माया—इन दोनोंकी (विजातीय) विभिन्न प्रतीतिको जीव मायासे अतीत नहीं होनेपर अनुभव नहीं करता अर्थात् मायाबद्ध-बुद्धिसे भगवद्-विग्रहको समझा नहीं जा सकता ॥ 115-116 ॥ चतुःश्लोकीका द्वितीय श्लोक :- श्रीमद्भागवत (2/9/33)में— ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तमः ॥ 117 ॥ अनुवाद—पिछले श्लोकमें परमतत्त्वके स्वरूप-ज्ञानका निर्णय किया गया। किन्तु स्वरूपसे भिन्न तत्त्वका ज्ञान स्वरूपतत्त्वके ज्ञानको जब तक दृढ़ नहीं करता, तब तक वह विज्ञान नहीं होता। स्वरूपतत्त्वसे भिन्न तत्त्वका नाम 'माया' है। उसी मायातत्त्वका ज्ञान इस श्लोकमें वर्णन किया गया है। स्वरूपतत्त्व ही 'अर्थ' अर्थात् यथार्थ तत्त्व है। उस तत्त्वके बाहर जो प्रतीत होता है और उस स्वरूप-तत्त्वमें जिसकी प्रतीति नहीं है, उसीको ही आत्मतत्त्वके मायावैभव रूपमें जानना होगा। इस तत्त्वको समझना सहज नहीं है, इसलिये यहाँ दो प्रादेशिक उदाहरण दिये जा रहे हैं। स्वरूपतत्त्वको सूर्यके समान मानो। सूर्यसे भिन्न तत्त्व दो रूपोंमें प्रतीत होता है—एक रूप 'आभास' और दूसरा रूप 'तमः'। जब सूर्यकी प्रतिच्छवि जलसे किसी दूसरे स्थानमें पड़ती है, तब उसको 'आभास' कहा जाता है। सूर्यका प्रभाव । 493
[ 25/117-122 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला जिस स्थानमें दिखलायी नहीं देता, उसको 'तमः' अथवा 'अन्धकार' कहा जाता है। चित्-जगत् भगवत्स्वरूपकी किरणस्वरूप है। उसके समान ही दिखायी देनेवाला आभासरूप मायावैभव है; यही आभासका उदाहरण है। चित्-तत्त्वसे बहुत दूर अन्धकार जो मायावैभव है; वही दूसरा उदाहरण है। तात्पर्य यह है कि आत्मतत्त्व और मायातत्त्वका परस्पर दो प्रकारका सम्बन्ध है; पहला सम्बन्ध इस प्रकार है-आत्मस्वरूपके अतिरिक्त जो भी अन्य स्वरूप प्रकाशित होता है, वह 'माया' है और आत्मस्वरूपसे बहुत दूर अनात्म अज्ञान भी माया है॥ 117 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/54 संख्या देखें ॥ 117 ॥ चौथे श्लोकमें श्रौतपन्थामें देश-काल-पात्र-दशाके निरपेक्ष अभिधेय साधन-भक्तिकी आवश्यकताका विचार :- 'अभिधेय' साधनभक्तिर शुनह विचार। सर्व-जन-देश-काल-दशाते व्याप्ति यार ॥ 118 ॥ अनुवाद-अब 'अभिधेय' जो साधनभक्ति है, उसके विषयमें सुनो। इस साधनभक्तिका अनुष्ठान सभी व्यक्तियोंके द्वारा, सभी स्थानोंपर, सब समयमें और सभी अवस्थाओंमें किया जा सकता है॥118॥ अनुभाष्य-अभिधेय 'साधनभक्ति' सभी पात्र, देश, काल और अवस्थामें व्याप्त रहती है॥118॥ साधनभक्तिका अभिधेय-चतुर्वर्गसे अतीत :- 'धर्मादि' विषये यैछे ए 'चारि' विचार। साधन-भक्ति-एइ चारि विचाररे पार ॥ 119 ॥ अनुवाद-धर्मादिके (धर्म-अर्थ-काम-मोक्षके) विषयमें देश-काल-पात्र-अवस्था-इन चारोंका विचार होता है। साधनभक्तिके अनुष्ठानमें इनका कोई विचार नहीं होता अर्थात् साधनभक्ति इन सबसे अतीत है॥ 119 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गुरुसे शिक्षा प्राप्त करनेके लिये जिस प्रकार धर्मशास्त्रमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चार तत्त्वोंका विचार हुआ है, तत्त्वशास्त्रमें भी उसी प्रकार विचार करनेके लिये 'ज्ञान', 'विज्ञान', 'तदङ्ग' और 'तद्-रहस्य'का उपदेश किया गया है। किन्तु यहाँपर देखने योग्य यह है कि धर्मादि चार विषय सामान्य संसार-नीतिके अनुगत हैं, किन्तु इन तात्त्विक चारोंका (ज्ञान-विज्ञानादिका) विचार वैसा नहीं है। तात्त्विक चारोंमें प्राथमिक जो साधनभक्ति है, वह भी धर्मादि चार तत्त्वोंसे ऊपर अथवा श्रेष्ठ है॥ 119 ॥ सद्गुरुकी सेवा और परिप्रश्नके द्वारा दिव्य-ज्ञानकी प्राप्तिके साथ शुद्धभक्तिके तत्त्वको श्रवण करनेकी आवश्यकता :- सर्व-देश-काल-दशाय जनेर कर्त्तव्य। गुरु-पाशे सेइ भक्ति प्रष्टव्य, श्रोतव्य ॥ 120 ॥ अनुवाद-सभी देशोंमें, सब समय और सभी अवस्थाओंमें सभी व्यक्तियोंका कर्त्तव्य है कि वे गुरुसे भक्तिके विषयमें ही जिज्ञासा करें तथा उसीके विषयमें सुनें ॥ 120 ॥ चतुःश्लोकीका चतुर्थ श्लोक :- श्रीमद्भागवत (2/9/35) में- एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनात्मनः। अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ॥ 121 ॥ अनुवाद-आत्मतत्त्वके जिज्ञासु व्यक्ति मेरे स्वरूपतत्त्वका अन्वय-व्यतिरेक क्रमसे अथवा विधि- निषेधके द्वारा विचार करके जो वस्तु सर्वत्र और सर्वदा नित्य है, उस विषयमें ही परिप्रश्न करेंगे ॥ 121 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/56 संख्या देखें ॥ 121 ॥ तीसरे-श्लोकमें अभिधेयके अङ्गी 'रहस्य' अथवा प्रयोजनका वर्णन; भक्तके हृदयमें भक्तके प्रेमके वशीभूत भगवान् और भगवान्के हृदयमें भगवान्के प्रेमके वशीभूत भक्त-परस्पर- समाश्लिष्ट अथवा आलिङ्गन करता हुआ विग्रह; भक्त और भगवान्में अचिन्त्यभेदाभेद :- आमाते ये 'प्रीति', सेइ 'प्रेम'- 'प्रयोजन'। कार्यद्वारे कहि तार स्वरूप-लक्षण ॥ 122 ॥ 494 ।
पचीसवाँ अध्याय 25/122-126 ] पञ्चभूत यैछे भूतेर भितरे-बाहिरे। भक्तगणे स्फुरि आमि बाहिरे-अन्तरे ॥ 123 ॥ अनुवाद—मुझमें जो ‘प्रीति’ है, वही प्रेम है और वही जीवका चरम 'प्रयोजन' है। व्यवहारिक उदाहरणके द्वारा प्रेमके स्वरूप लक्षणका वर्णन करूँगा। पञ्चभूत (भूमि-जलादि) जैसे जीवोंके भीतर और बाहर व्याप्त हैं, उसी प्रकार मैं भी भक्तोंके हृदयमें तथा उनके सामने बाहर स्फुरित होता हूँ॥ 122-123 ॥ अनुभाष्य—जिस प्रकार प्राणियोंके भीतरमें और बाहरमें पञ्चभूत हैं, उसी प्रकार मैं भक्तोंके भीतरमें और बाहरमें स्फूर्तिके द्वारा प्राप्त होता हूँ। भक्त स्वयंको भगवान्की प्रीति-सेवाका उपकरण-विग्रह समझते हैं और भक्तिके अतिरिक्त अन्य वस्तुओंको भी भगवद्-प्रीतिसेवाका उपकरण मात्र ही समझते हैं॥ 123 ॥ चतुःश्लोकीका तृतीय श्लोक :— श्रीमद्भागवत (2/9/34)में— यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु। प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ 124 ॥ अनुवाद—जिस प्रकार समस्त महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) बृहद् और क्षुद्र (ब्रह्मासे एक चींटीतक) सभी जीवोंके भीतर प्रविष्ट (संलग्न) होकर भी अप्रविष्ट रूपमें (बाहर) स्वतन्त्र विद्यमान होते हैं, उसी प्रकार मैं भूतमय (भौतिक) जगत्में सभी जीवोंमें सत्त्वाश्रयरूप परमात्माके रूपमें प्रविष्ट होनेपर भी पृथक् भगवत् स्वरूपमें नित्य विराजमान होता हूँ और भक्तोंका एकमात्र प्रेमास्पद (प्रेमका विषय) हूँ। तात्पर्य यह है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, ये सभी महाभूत पाँच रूपोंमें होकर जैसे इस स्थूल-जगत्को प्रकाश करते हुए उसके उपकरण रूपमें उसके भीतर रहनेपर भी महाभूत अवस्थामें स्वतन्त्र हैं, इसी प्रकार चिन्मय परमेश्वर अपनी जड़शक्ति और जीवशक्तिके द्वारा जगत्की सृष्टि करके एकांशमें जगत्में सर्वव्यापी होकर रहनेपर भी युगपत् अर्थात् एक ही समयमें अपने चिद्धाममें पूर्ण चिन्मय-विग्रहरूपमें भी नित्य विराजमान रहते हैं। और चित्-विग्रहके किरण-परमाणुस्वरूप जीव शुद्ध-प्रेममार्गमें उनके विमल-प्रेमका आस्वादन करते हैं—यही रहस्य है॥ 124 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/55 संख्या देखें॥ 124 ॥ भगवान् भक्तके प्रेमपाशमें आबद्ध :— भक्त आमा बान्धियाछे हृदय-कमले। याँहा नेत्र पड़े ताँहा देखये आमारे ॥ 125 ॥ अनुवाद—भक्तोंने मुझे अपने हृदय-कमलमें बाँधकर रखा हुआ है और उनके नेत्र जहाँ भी पड़ते हैं, वे वहींपर मुझे ही देखते हैं॥ 125 ॥ श्रीमद्भागवत (11/2/55)में— विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः। प्रणयरसनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः ॥ 126 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 126 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उदासीन होकर भी पुकारे जानेपर सर्वपाप-विनाशक जिसके हृदयका परित्याग नहीं करते, प्रणयकी रस्सीके द्वारा उनके चरणकमल जिसके हृदयमें आबद्ध हैं, वही 'भागवत-प्रधान' है॥ 126 ॥ अनुभाष्य—विदेहराज निमिके द्वारा तीन प्रकारके भक्तों अथवा भागवतोंके लक्षण, आचरण और तारतम्यके विषयमें जिज्ञासा करनेपर, उसके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक हवि-ऋषिने कहा,— अवशाभिहितः (अवशेन कीर्त्तितः) अपि अघौघनाशः (अघौघम् अपराधपुञ्जं नाशयति यः सः) हरिः (एव) साक्षात् यस्य हृदयं न विसृजति (मुञ्चति), प्रणयरसनया (प्रेमरज्जुना) धृताङ्घ्रिपद्मः (धृतम् अन्तर्बद्धम् अङ्घ्रिपद्मं चरणकमलं येन सः) सः भागवतप्रधानः (इति) उक्तः भवति। । 495
[ 25/126-131 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 126 ॥ श्रीमद्भागवत (11/2/45)में— सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ 127 ॥ अनुवाद—जो उत्तम भागवत होते हैं, वे सभी प्राणियोंमें आत्माके भी आत्मरूप भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको ही देखते हैं और आत्माके आत्मस्वरूप श्रीकृष्णमें समस्त जीवोंको देख पाते हैं ॥ 127 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/274 संख्या देखें ॥ 127 ॥ चिन्मय आश्रयको सर्वत्र श्रीकृष्ण सम्बन्धि-चिन्मय-वस्तुका दर्शन :— श्रीमद्भागवत (10/30/4)में— गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्। पप्रच्छुराकाशवदन्तरं बहि- र्भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन् ॥ 128 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 128 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक साथ मिलकर गोपियाँ श्रीकृष्णके गुणोंका उच्च-स्वरसे गान करते-करते उन्मत्तकी भाँति श्रीकृष्णको एक वनसे अन्य वनमें ढूँढ़ने लगीं और आकाशकी भाँति बाहर और अन्तरमें स्थित उन परमपुरुष श्रीकृष्णके विषयमें वनस्पतियोंसे पूछने लगीं ॥ 128 ॥ अनुभाष्य—रासस्थलीसे श्रीकृष्णके अचानक श्रीराधाके साथ अन्तर्धान होनेपर श्रीकृष्णमें समर्पित चित्तवाली कृष्णमयी गोपियाँ श्रीकृष्णकी विविध चेष्टाओंका अनुकरण करते हुए विरहमें सन्तप्त होकर इधर-उधर श्रीकृष्णको ढूँढ़ने लगीं, श्रीशुकदेव परीक्षितसे उसका वर्णन रहे हैं,— संहताः (अन्योन्यं सम्मिलिताः सत्यः) उच्चैः गायन्त्यः वनाद् वनं (वनान्तरम्) अमुं (कृष्णम्) एव उन्मत्तकवत् विचिक्युः (अमृगयन्); आकाशवत् (महाभूतवत्) भूतेषु (प्राणिषु) बहिः अन्तरं (मध्ये) सन्तं (वर्त्तमानं) पुरुषं (प्रेमविवर्त्तवशात् सर्वत्र कृष्णस्फूर्त्तयः सत्यः) वनस्पतीन् (चेतन-मयान् दृष्ट्वा) पप्रच्छुः (जिज्ञासयामासुः) । श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 128 ॥ भागवतमें सर्वत्र सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन-तत्त्व वर्णित :— अतएव भागवते एइ 'तिन' कय। सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन-मय ॥ 129 ॥ अनुवाद—इसलिये भागवतमें सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन—इन तीन तत्त्वोंकी ही सर्वत्र आलोचना हुई है ॥ 129 ॥ सम्बन्ध-द्योतक श्लोकका दृष्टान्त :— श्रीमद्भागवत (1/2/11) में— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ 130 ॥ अनुवाद—तत्त्वको जाननेवाले विज्ञगण अद्वयज्ञानको तत्त्व कहते हैं। उसी अद्वयज्ञानकी प्रथम प्रतीति ब्रह्म, द्वितीय प्रतीति परमात्मा और तृतीय प्रतीति भगवान् हैं ॥ 130 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/11 संख्या देखें ॥ 130 ॥ भागवतमें सर्वत्र अभिधेय 'कृष्णभक्ति' वर्णित :— एइ—'सम्बन्ध', शुन 'अभिधेय'–भक्ति। भागवते प्रति-श्लोके व्यापे यार स्थिति ॥ 131 ॥ अनुवाद—यह जीवका भगवान्से 'सम्बन्ध' है, अब आप 'अभिधेय'-भक्तिके विषयमें सुनिये। भागवतका प्रत्येक श्लोक अभिधेय-भक्तिको ही बतलाता है ॥ 131 ॥ अनुभाष्य—यहाँपर पाठान्तरमें और भी दो श्लोक उद्धृत हुए हैं—(1) भाः (3/5/23)— “भगवानेक आसेदमग्र आत्मात्मनां विभुः। आत्मेच्छानुगतावात्मा नानामत्युपलक्षणः ॥” अर्थात् “सृष्टिसे पहले यह विश्व भगवान्के साथ एक था; जीवोंके अर्थ-स्वरूप और वैकुण्ठादि अनेक 496 ।
पचीसवाँ अध्याय 25/131-134 ] वैभवके उपलक्षणसे युक्त होकर उस समय सृष्टि आदिकी इच्छा उन्हींमें लीन थी और वही भगवान् ही अद्वयतत्त्वके रूपमें विराजित थे।” (2) भाः (1/3/28)— “एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयं। इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे॥” अर्थात् “राम-नृसिंहादि, पुरुषावतारके अंश या कला (अंशके अंश) हैं, किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। दैत्योंके द्वारा पीड़ित लोगोंकी प्रत्येक युगमें ये (अवतार) रक्षा करते हैं।” भागवतके प्रत्येक श्लोकमें ही अभिधेय साधन-भक्तिकी कथा है॥131॥ अभिधेय-द्योतक श्लोकका दृष्टान्त :— श्रीमद्भागवत (11/14/21) में— भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयात्मा प्रियः सताम्। भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात्॥132॥ अनुवाद—साधुओंका प्रिय मैं, अनन्य श्रद्धासे उत्पन्न भक्तिके द्वारा ही प्राप्त होता हूँ। भक्ति ही मुझमें निष्ठा रखनेवाले चण्डालका भी जन्मदोषसे उद्धार करती है॥132॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 20/138 संख्या देखें। यहाँ पाठान्तरमें और भी दो श्लोक अधिक उद्धृत हुए हैं, ऐसा देखा जाता है—(1) भाः 11/14/20— “न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता॥” अर्थात् “हे उद्धव! मेरे प्रति की गयी प्रबल भक्ति जिस प्रकार मुझे वशीभूत कर सकती है, अष्टाङ्ग-योग, अभेद-ब्रह्मवादरूप सांख्यज्ञान, ब्राह्मणोंका स्वशाखा- अध्ययनरूप स्वाध्याय, सब प्रकारकी तपस्या और त्यागरूप संन्यासादिके द्वारा मुझे वैसा वशीभूत नहीं किया जा सकता है।” (2) भाः 11/2/37— “भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यादीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः। तन्माययातो बुध आभजेत्तं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा॥” अर्थात् “श्रीकृष्णसे इतर (अन्य) जो माया है, उसमें अभिनिविष्ट जीवमें 'भय' उपस्थित होता है और उन ईश्वरसे बहिर्मुख होनेके कारण मायाजनित विपरीत स्मृति होती है; इसी कारण पण्डित व्यक्ति गुरुको 'देवता' और 'आत्म'-स्वरूप मानकर अनन्य-भक्तिके साथ उन परमेश्वरका भजन करेंगे॥”132॥ प्रयोजन श्रीकृष्णप्रेमके ‘बाह्य’ लक्षण :— एबे शुन, प्रेम, येइ—मूल 'प्रयोजन'। पुलकाश्रु-नृत्य-गीत—याहार लक्षण॥133॥ अनुवाद—अब आप प्रेमके विषयमें सुनिये, जो मूल 'प्रयोजन' है। पुलक-अश्रु-नृत्य एवं गीत जिसके लक्षण हैं॥133॥ प्रयोजन श्रीकृष्णप्रेम-द्योतक श्लोकका दृष्टान्त :— श्रीमद्भागवत (11/3/31) में— स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्। भक्त्या संजातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥134॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥134॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पापोंका हरण करनेवाले श्रीहरिको परस्पर स्मरण करते-करते और स्मरण कराते-कराते उन्होंने साधनभक्तिसे भली-भाँति उत्पन्न प्रेम-भक्तिके द्वारा उत्पुलकित देह धारण की॥134॥ अनुभाष्य—श्रीवसुदेवसे श्रीनारद भागवतधर्मके विषयमें बतलाते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्रके संवादका वर्णन कर रहे हैं। 'देहात्मबुद्धिवाला अज्ञानी व्यक्ति किस प्रकार सहज ही मायाको जय कर सकता है?'—निमिके इस प्रश्नके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक प्रबुद्ध-ऋषि बद्धजीवोंके गुरुपादाश्रय करके निरपराध कीर्त्तनाख्य-भक्तिका साधन करते-करते अनर्थ-निवृत्तिके बाद साध्य भावभक्ति प्राप्त करनेकी अवस्थाका वर्णन कर रहे हैं,— । 497
[ 25/134-138 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [एवं वर्त्तमानानां साधकानां] भक्त्या (साधन-भक्त्या) सञ्जातया (लब्धया प्रेमलक्षणाया भक्त्या) अघौघहरं (पापपुञ्जं हरति विनाशयति यः तं) हरिं स्मरन्तः मिथः (परस्परं) स्मारयन्तः (सङ्कीर्त्तयन्तः) च [ते भक्ताः] उत्पुलाकां (रोमाञ्चितं) तनुं बिभ्रति (धरन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 134 ॥ श्रीमद्भागवत (11/2/40)में— एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गायत्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ 135 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है, प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्त्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य करता है ॥ 135 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/94 संख्या देखें ॥ 135 ॥ अतएव ब्रह्मसूत्र और ब्रह्मसूत्र-भाष्य भागवत— एक ही अर्थके प्रतिपादक :- अतएव भागवत—सूत्रेर् ‘अर्थरूप’। निज-कृत सूत्रेर निज-‘भाष्य’-स्वरूप ॥ 136 ॥ अनुवाद—इसलिये भागवत वेदान्त-सूत्रका ‘अर्थ’- रूप है। श्रीव्यासदेवने वेदान्त-सूत्रकी रचना की और उसीके भाष्य-स्वरूप भागवतकी भी रचना की ॥ 136 ॥ श्रीमद्भागवत—(1) ब्रह्मसूत्रका भाष्य, (2) महाभारतके अर्थका तात्पर्य, (3) गायत्रीभाष्य और (4) वेदके अर्थका विस्तार :- गरुणपुराण-वाक्य— अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां भारतार्थ-विनिर्णयः। गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ वेदार्थपरिवृंहितः। ग्रन्थोऽष्टादशसाहस्रः श्रीमद्भागवताभिधः ॥ 137 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 137 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह श्रीमद्भागवत—ब्रह्मसूत्रका अर्थ, महाभारतका तात्पर्य-निर्णय, गायत्रीका भाष्यरूप और समस्त वेदोंके तात्पर्यके द्वारा सम्वर्द्धित है। यह श्रीमद्भागवत-ग्रन्थ अठारह हजार श्लोकोंवाला है ॥ 137 ॥ अनुभाष्य— अयं (भागवताभिधः ग्रन्थः) ब्रह्मसूत्राणां (उत्तर-मीमांसाख्य- वेदान्तसूत्राणाम्) अर्थः (भाष्यत्वेन अभिधेयरूपः) भारतार्थविनिर्णयः (महाभारतस्य अर्थानां निर्णयः यस्मिन् सः) असौ (महाग्रन्थः) गायत्रीभाष्यरूपः (वेदमातुः ब्रह्मगायत्र्याः तात्पर्यप्रकाशकः) वेदार्थ-परिवृंहितः (वेदार्थैः संवर्द्धितः) च अष्टादशसाहस्रः (अष्टादशसहस्रैः श्लोकैः परिनिर्मितः) श्रीमद्भागवताभिधः (श्रीमद्भागवत-नामा) ग्रन्थः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। पाठान्तरमें एक अधिक श्लोक उद्धृत हुआ है— “पुराणानां सामरूपः साक्षाद्भगवतोदितः। द्वादशस्कन्धयुक्तोऽयं शतविच्छेदसंयुतः॥” अर्थात् “श्रीमद्भागवत नामक यह ग्रन्थ साक्षात् भगवान्के द्वारा कहा गया है। यह ग्रन्थ पुराणोंके मध्य सामवेदके समान है। इस ग्रन्थमें बारह स्कन्ध हैं और तीन सौ पैंतीस अध्याय हैं॥”137 ॥ “भारतादि स्मृत्याैतिह्यार्थ-विनिर्णय” :- श्रीमद्भागवत (1/3/42) में— सर्व-वेदेतिहासानां सारं सारं समुद्धृतम् ॥ 138 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीवेदव्यासने समस्त वेदों और इतिहाससे सङ्कलित सारस्वरूप (श्रीमद्भागवतका अपने पुत्र श्रीशुकदेवको अध्ययन कराया) ॥ 138 ॥ अनुभाष्य— सर्ववेदेतिहासानां (सकल-निगमैतिह्यानां) समुद्धृतं (संगृहीतं, सङ्कलितः) सारं सारं (सर्वोत्कृष्टभागस्वरूपं, श्रीमद्भागवतं स्वसुतं ग्राहयामासेति पूर्वेणान्वयः)। 498