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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

32 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/167-169 ] ललितमाधव (1/52) में श्रीललिताके प्रति श्रीराधाकी उक्ति— कुलवरतनुधर्मग्राववृन्दानि भिन्दन् सुमुखि निशितदीर्घापाङ्कटङ्कच्छटाभिः। युगपदमयपूर्वः कः पुरो विश्वकर्मा मरकतमणिलक्षैर्गोष्ठकक्षां चिनोति॥ 167 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 167 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सुमुखि, हमारे सामने ये कौन अपूर्व विश्वकर्मा हैं?—जो अपनी दीर्घ अपाङ्गरूप तीक्ष्ण छेनीकी छटाके द्वारा ही कुलवधुओंके स्वधर्मरूपी (पातिव्रत्यरूपी) पाषाणोंके टुकड़े-टुकड़े करके असंख्य मरकत-मणि-तुल्य अपने श्यामसुन्दर वपुके द्वारा गोष्ठ-प्रकोष्ठकी एक ही साथ रचना कर रहे हैं? 167 ॥ अनुभाष्य— हे सुमुखि, पुरः (अग्रे) अयं अपूर्वः (अदृष्टाश्रुतः) विश्वकर्मा कः?—यः [युगपत्] निशितदीर्घापाङ्कटङ्कच्छटाभिः (निशितः शाणितः दीर्घापाङ्ग एव टङ्कः शिलादिविदारणास्त्रविशेषः, तस्य छटाभिः दीप्तिभिः) कुलवरतनुधर्मग्राववृन्दानि (कुलवरतनूनां कुलवधूनां धर्मान् पातिव्रत्यादिरूपान् एवं ग्राववृन्दानि पाषाणसमूहान्) भिन्दन्, मरकतमणिलक्षैः (मरकतमणीनां हिरण्मणीनां लक्षसंख्याभिः, मरकतमणितयाध्यवसितैः श्यामगौन्दर्यमय-पुरैरित्यर्थः) गोष्ठ-कक्षां (गोष्ठप्रदेशं) चिनोति (रचयति पूरयतीत्यर्थ, अनेन श्लोकेन श्रीकृष्णस्य वैदग्ध्य-सौन्दर्यादि गुणदर्शनेन राधायाश्चमत्कारः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इस श्लोकमें श्रीकृष्णके वैदग्धी-सौन्दर्यादि गुणोंके दर्शनसे श्रीराधाके हृदयमें चमत्कारका वर्णन है॥ 167 ॥ ललितमाधव (1/49) में श्रीराधाके प्रति श्रीललिताकी उक्ति— महेन्द्रमणिमण्डलीमदविडम्बिदेहद्युति- र्व्रजेन्द्रकुलचन्द्रमाः स्फुरति कोऽपि नव्यो युवा। सखि स्थिरकुलाङ्गना-निकर-नीवि-बन्धार्गल- च्छिदाकरणकौतुकी जयति यस्य वंशीध्वनिः ॥ 168 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 168 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, महा इन्द्रमणि-मण्डलीके गर्व-विनाशी देहकान्तियुक्त व्रजराजकुलके चन्द्रस्वरूप यह कौन नवीन युवक स्फूर्ति प्राप्त कर रहे हैं;—धैर्यशालिनी कुलाङ्गनाओंके नीविके बन्धनको ढीला करनेवाली कौतुकयुक्त इनकी वंशीकी ध्वनि जययुक्त हो रही है॥ 168 ॥ अनुभाष्य— हे सखि, यस्य स्थिरकुलाङ्गना-निकर-नीविबन्धार्गल- च्छिदाकरण-कौतुकी (स्थिरकुलाङ्गनानां साध्वीस्त्रीणां निकरस्य समूहस्य नीविबन्ध एव अर्गलः कपाटः विष्कम्भकः वा, तस्य छिदाकरणे बन्धनछेदने कौतुकं यस्याः सा) वंशीध्वनिः जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते), सः महेन्द्रमणिमण्डलीमदविडम्बिदेह-द्युतिः (महेन्द्रमणिमण्डलीनां मदं गर्वं विड़म्बयितुं शीलम् अस्याः तथाभूता देहस्य द्युतिः कान्तिः यस्यः सः) कः अपि नव्यः युवा व्रजेन्द्रकुलचन्द्रमाः (नन्दकुलशशधरः) स्फुरति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 168 ॥ वहाँ श्रीराधा जैसे :- विदग्धमाधव (1/32) में पौर्णमासीकी उक्ति— बलादक्षणोर्लक्ष्मीः कवलयति नव्यं कुवलयं मुखोल्लासः फुल्लं कमलवनमुल्लङ्घयति च। दशां कष्टामष्टापदमपि नयत्याङ्गिरुचि- र्विचित्रं राधायाः किमपि किल रूपं विलसति ॥ 169 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 169 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके नयनोंकी शोभा नवीन नीलकमलकी शोभाको बलपूर्वक ग्रास करती है, जिनका प्रफुल्लित मुखोल्लास कमलवनका उल्लङ्घन करता है, जिनकी अङ्गकान्ति सुन्दर जाम्बूनदको (सुवर्णको) कष्टदशामें पहुँचा देती है, ऐसी श्रीराधिकाका विचित्र रूप आश्चर्य्यरूपसे विलास अर्थात् स्फूर्त्ति प्राप्त कर रहा है॥ 169 ॥ अनुभाष्य— [श्रीराधायाः] अक्ष्णोः (नयनयोः) लक्ष्मीः (शोभा) नव्यं (नवप्रस्फुटितं) कुवलयम् (उत्पलं) बलात् कवलयति (ग्रसते), मुखोल्लासः (मुखशोभा) फुल्लं (विकसितं) कमलवनम् उल्लङ्घयति

[ 1/169-174 पहला अध्याय 33 ] (दूरीकरोति), आङ्गिकरुचिः (देहकान्तिः) अष्टापदं (सुवर्णम्) अपि कष्टां (क्लेशसमन्वितां) दशां नयति, [अतएव] राधायाः रूपं किल किमपि विचित्रं विलसति (स्फुरति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥169॥ विदग्धमाधव (5/20)में मधुमङ्गलके प्रति श्रीकृष्णकी उक्ति— विधुरेति दिवा विरूपतां शतपत्रं बत शर्वरीमुखे। इति केन सदाश्रियोज्ज्वलं तुलनामर्हति मत्प्रियाननम्॥170॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥170॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चन्द्रकी शोभा रात्रिमें सुन्दर होनेपर भी दिनके समय विरूपताको प्राप्त होती है, कमल दिनके समय सुन्दर होनेपर भी रात्रिमें मलिन (बन्द) हो जाता है, किन्तु हे सखे, मेरी प्रियतमा राधिकाका मुख दिन-रात सर्वदा शोभासे उज्ज्वल रहता है, इसलिये किसके साथ उसकी तुलना हो सकती है?170॥ अनुभाष्य— विधुः (चन्द्रः) दिवा (दिवसे), शतपत्रं (पद्मं) शर्वरीमुखे (सन्ध्यायां) बत विरूपतां (कान्तिराहित्यम्) एति (प्राप्नोति) इति सदा (दिवारात्रे सर्वदा) श्रिया (शोभया) उज्ज्वलं मत्प्रियाननं (श्रीराधिकामुखं) केन (उपमानेन सह) तुलनाम् अर्हति? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥170॥ विदग्धमाधव (2/51)में श्रीकृष्णकी स्वयंसे उक्ति— प्रमदरसतरङ्गस्मेरगण्डस्थलायाः स्मरधनुरनुबन्धिभ्रूलता-लास्यभाजः। मदकलचलभृङ्गीभ्रान्तिभङ्गीं दधानो हृदयमिदमदाङ्क्षीत् पक्ष्मलक्ष्याः कटाक्षः॥171॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥171॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके मन्द-मन्द हास्ययुक्त कपोल आनन्दकी तरङ्गोंसे युक्त हैं, जिनकी भ्रू-लता प्रमत्त-चञ्चला-भ्रमरीकी भ्रान्ति उत्पन्न करनेवाली भङ्गीको धारण करके कामदेवके धनुषकी भाँति नृत्य कर रही है, उनके नेत्रोंकी पलकोंसे निकले कटाक्षने मेरे हृदयको दंशन कर दिया है॥171॥ अनुभाष्य— प्रमदरसतरङ्गस्मेरगण्डस्थलायाः (प्रमदरसतरङ्गेण आनन्द- रसप्रवाहेण स्मेरगण्डस्थलं स्मेरं मन्दहासान्वितं गण्डस्थलं यस्याः तस्याः) स्मरधनुरनुबन्धिभ्रूलतालास्यभाजः (कामदेवकार्मुकसदृशा या भ्रूलता, तादृशाः लास्यं नर्तनं भजति या तस्याः) पक्ष्मलक्ष्याः (पक्ष्मले प्रशस्तपक्षान्विते अक्षिणी यस्याः तस्याः राधायाः) मदकलचलभृङ्गीभ्रान्तिभङ्गीं (मदेन यः कलः, तेन चला चञ्चला चपला या भृङ्गी तस्याः भ्रान्तिः भ्रमः यतः तादृशीं भङ्गीं) दधानः [राधायाः] कटाक्षः इदं [मम] हृदयं अदाङ्क्षीत् (दष्टवान्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥171॥ श्रीरूपसे ललितमाधवके नान्दी-पाठका अनुरोध :— राय कहे,—“तोमार कवित्व अमृतेर धार। द्वितीय नाटकेर कह नान्दी-व्यवहार॥”172॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“हे रूप! तुम्हारा कवित्व तो अमृतकी धाराके समान है। अब तुम अपने द्वितीय (ललितमाधव) नाटकका नान्दी श्लोक पढ़ो॥”172॥ अनुभाष्य—'द्वितीय नाटकेर',—ललितमाधव नाटकका; यहाँसे श्रीरामानन्द श्रीरूपके द्वारा रचित श्रीललितमाधवके विषयकी जिज्ञासा कर रहे हैं॥172॥ श्रीरायके माहात्म्यकी तुलनाके द्वारा श्रीरूपका अपना दैन्य ज्ञापन :— रूप कहे,—“काँहा तुमि सूर्योपम भास। मुञि कोन् क्षुद्र,—येन खद्योत-प्रकाश॥173॥ तोमार आगे धाष्टर्य एइ मुख-व्यादान।” एत बलि' नान्दी-श्लोक करिला व्याख्यान॥174॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने कहा,—“कहाँ तो आप सूर्यके समान प्रकाशमान और कहाँ मैं जुगनुके समान

34 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/173-179 ] अत्यन्त क्षुद्र हूँ। आपके समक्ष अपना मुख खोलना मेरी धृष्टता ही है।" यह कहकर उन्होंने ललितमाधवका नान्दी-श्लोक पढ़ा ॥ 173-174 ॥ मङ्गलाचरण-श्लोकमें असुरमर्दन सुरनन्दन मुकुन्दके यशका स्तव :- ललितमाधव (1/1)में- सुररिपुसुदृशामुरोजकोकान्मुखकमलानि च खेदयन्नखण्डः। चिरमखिलसुहृच्चकोरनन्दी दिशतु मुकुन्दयशःशशी मुदं वः ॥ 175 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सुररिपु (नरक आदि असुरों) की पत्नियोंके स्तनरूपी चक्रवाक और मुखरूपी कमलसमूहको खिन्न अर्थात् दुःखग्रस्त करके मुकुन्दका जो अखण्ड यशरूपी चन्द्र अपने अखिल सुहृद्रूपी चकोरोंका निरन्तर आनन्द विधान करता है, वह आपका सुख विधान करे ॥ 175 ॥ अनुभाष्य- सुररिपुसुदृशां (नरकाद्यसुराङ्गनानाम्) उरोजकोकान् (उरोजाः एव कोकाः चक्रवाकाः तान् स्तनरूपचक्रवाकान्) मुखकमलानि (मुखानि एव कमलानि) च खेदयन् अखिलसुहृच्चकोरनन्दी (अखिलाः सुहृदः एव चकोराः तान् नन्दयितुं शीलं यस्य सः) अखण्डः (परिपूर्णः) मुकुन्दयशःशशी (मुकुन्दस्य यशः एव शशी चन्द्रः) वः (युष्माकं) मुदं (सुखं) चिरं दिशतु (विदधातु)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ श्रीरायके द्वारा श्रीरूपको स्वाभीष्टदेवके वर्णन करनेका अनुरोध, श्रीरूपकी लज्जा :- 'द्वितीय नान्दी कह देखि ?' - राय पुछिला। सङ्कोच पाञा रूप पड़िते लागिला ॥ 176 ॥ अनुवाद - श्रीरायरामानन्दने पूछा,-'हे रूप! तुमने द्वितीय नान्दी-श्लोकमें क्या लिखा है, उसका पाठ करो।" श्रीरूप कुछ सङ्कोच करते हुए श्लोक पढ़ने लगे॥ 176 ॥ स्वाभीष्ट-देवता श्रीकृष्णचैतन्यके आशीर्वादकी याचना :- ललितमाधव (1/3)में सूत्रधारका अपने इष्टदेवको प्रणाम- निजप्रणयितां सुधामुदयमाप्नुवन् यः क्षितौ किरत्यलमुरीकृतद्विजकुलाधिराजस्थितिः । स लुञ्चित-तमस्ततिर्मम शचीसुताख्यः शशी वशीकृतजगन्मनाः किमपि शर्म विन्यस्यतु ॥ 177 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 177 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो पृथ्वीतलपर उदित होकर अपने प्रणयरसकी सुधाका विस्तार कर रहे हैं, उन द्विजकुलके अधिराजरूपमें अवस्थितिको अङ्गीकार करनेवाले, अन्धकारके [अज्ञान और छलके] समूहको दूर करनेवाले, जगत्वासियोंके मनको वशीभूत करनेवाले शचीनन्दनके नामसे प्रसिद्ध चन्द्र मेरा मङ्गल विधान करें ॥ 177 ॥ अनुभाष्य- यः क्षितौ (पृथिव्याम्) उदयं (प्राकट्यं) आप्नुवन् सन् निजप्रणयितां सुधां (स्वप्रेमामृतम्) अलम् (अतिशयेन) किरति (विस्तारयति), उरीकृतद्विजकुलाधिराजस्थितिः (उरीकृता अङ्गीकृता द्विजकुलस्य अधिराजः तस्य स्थितिः साम्राज्यमर्यादा येन सः) लुञ्चित-तमस्ततिः (लुञ्चिता ताड़िता तमस्ततिः अज्ञानकैतवपुञ्जः येन सः) वशीकृत-जगन्मनाः (वशीकृतानि जगतां मनांसि येन सः) शचीसुताख्यः (शचीनन्दन नामा) शशी (चन्द्रः) मम किमपि शर्म (कल्याणं) विन्यस्यतु (विदधातु)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 177 ॥ महाप्रभुके भीतरमें सन्तोष, बाहरमें रोषाभास :- शुनिया प्रभुर यदि अन्तरे उल्लास। बाहिरे कहेन किछु करि' रोषाभास ॥ 178 ॥ "काँहा तोमार कृष्णरसवाक्य-सुधासिन्धु। ता'र मध्ये मिथ्या केने स्तुति-क्षारबिन्दु ॥" 179 ॥ अनुवाद-इस श्लोकको श्रवण करके महाप्रभुके भीतरमें तो उल्लास होनेपर भी वे बाहरसे कुछ रोषाभास दिखाते हुए कहने लगे,- "कहाँ तो तुम्हारे

[ 1/178-184 पहला अध्याय 35

कृष्णरस-वाक्य अमृत-सिन्धुके समान हैं, तब क्यों तुमने उसमें मेरी मिथ्या स्तुतिरूपी (कटु) क्षार-बिन्दुको मिला दिया है?”178-179 ॥ श्रीरायके द्वारा श्लोककी प्रशंसा— राय कहे,—“रूपेर काव्य अमृतेर पूर। ता'र मध्ये एक बिन्दु दियाछे कर्पूर॥”180॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“रूपका काव्य अमृतका सार है, उसने तो उसमें एक बिन्दु कर्पूरको मिला दिया है॥”180॥ प्रभु कहे,—“राय, तोमार इहाते उल्लास। शुनितेइ लज्जा, लोके करे उपहास॥”181॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे राय ! इस कवित्वको सुनकर आपको तो उल्लास हो रहा है, किन्तु मुझे तो इसे सुनते ही लज्जा आ रही है, क्योंकि इसे सुनकर लोग उपहास करेंगे॥”181॥ राय कहे,—“लोकेर सुख इहार श्रवणे। अभीष्टदेवेर स्मृति मङ्गलाचरणे॥”182॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“लोग उपहास नहीं करेंगे, अपितु अभीष्टदेवकी स्मृति करवानेवाले इस मङ्गलाचरणको सुनकर लोग प्रसन्न ही होंगे॥”182॥ श्रीरायके द्वारा ललितमाधवके विविध अङ्गों और परिचयकी जिज्ञासा, श्रीरूपके द्वारा नाटकमें लिखित श्लोकका पाठ करके उत्तर देना :— राय कहे,—“कोन् अङ्गे पात्रेर प्रवेश?” तबे रूप-गोसाञि कहे ताहार विशेष॥ 183 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने श्रीरूपसे पूछा,—“प्रस्तावनाके किस अङ्गमें पात्रका प्रवेश है?” तब श्रीरूप गोस्वामी उस विषयका वर्णन करने लगे॥ 183 ॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला 1/134 वीं संख्या और उसका अनुभाष्य देखें। किस अङ्गमें पात्रका प्रवेश है,—'उद्घात्यक', 'कथोद्घात', 'प्रयोगातिशय', 'प्रवर्त्तक' और 'अवलगित'—ये पाँच प्रकारकी प्रस्तावना हैं; एवं भारती-वृत्तिकी 'प्ररोचना', 'वीथी' और 'प्रहसना'—ये तीन प्रकारके अङ्ग हैं। श्रीरामानन्द श्रीरूपसे जिज्ञासा कर रहे हैं,—तुमने स्वरचित नाटकमें उक्त पाँच प्रकारकी प्रस्तावनाओंमें-से किस प्रकारकी प्रस्तावनामें भारती-वृत्तिके किस अङ्गको स्वीकार करके अभिनेता रूपी पात्रको रङ्गमञ्चमें प्रवेश करवाया है?183॥ ललितमाधव (1/11)में नटीके प्रति सूत्रधारकी उक्ति— “नटता किरातराजं निहत्य रङ्गस्थले कलानिधिना। समये तेन विधेयं गुणवति ताराकरग्रहणम्॥ 184 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 184 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नृत्य करते-करते रङ्गमञ्चपर किरातराज (कंसका) वध करके कलानिधिके (कृष्णचन्द्रके) द्वारा 'पूर्णमनोरथ'-नामक गुणयुक्त समयमें ताराका (श्रीराधाका) पाणिग्रहण-कार्य विधेय हो रहा है॥ 184 ॥ अनुभाष्य— नटता (अभिनयं कुर्वता) तेन कलानिधिना (तन्नाम्ना नटेन) रङ्गस्थले (अभिनय-क्षेत्रे) किरातराजं (किरातदेशाधिपं) निहत्य गुणवति (अनुकूल-नक्षत्राधिष्ठिते) समये ताराकरग्रहणं (तन्नाम्न्याः कन्यायाः पाणिग्रहणं) विधेयम्; पक्षान्तरे,—रङ्गस्थले (रङ्गक्षेत्रे) तेन [चतुःषष्ठि-] कलानिधिना (श्रीकृष्णेन) किरातराजं (कंसं) निहत्य (हत्वा) गुणवति (दशमाङ्गाख्ये पूर्णमनोरथनाम्नि) समये ताराकरग्रहणं (श्रीराधिकायाः पाणिग्रहणं) विधेयम्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। पक्षान्तरमें-रङ्गमञ्चपर चौंसठ कलाओंके निधिस्वरूप (श्रीकृष्णचन्द्र) के द्वारा किरातराजका (कंसका) वध करनेके पश्चात् [नाटक-ग्रन्थके अन्तमें] 'पूर्णमनोरथ' नामक दशम-अङ्क समयमें तारा अर्थात् श्रीराधिकाका पाणिग्रहण कार्य विधेय हो रहा है॥ 184 ॥

36 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/185-188 ] 'उद्घात्यक' नाम एइ 'आमुख'-'वीथी' अङ्ग। तोमार आगे कहि,-इहा धार्ष्ट्येर तरङ्ग॥" 185 ॥ अनुवाद—'उद्घात्यक'-नामक आमुख अर्थात् प्रस्तावनामें भारती-वृत्तिके वीथी नामक अङ्गको स्वीकार करके पात्र रङ्गस्थलमें प्रविष्ट हुआ है। हे श्रीरामानन्द राय! आपके समक्ष ये सब बातें करना मेरी धृष्टताकी तरङ्ग ही है॥ 185 ॥ अनुभाष्य—इस श्लोकमें आमुख अर्थात् प्रस्तावनाका नाम 'उद्घात्यक' एवं भारती वृत्तिके अङ्गका नाम 'वीथी' कहा गया। साहित्यदर्पणके छठे अध्यायकी 520 (253-254) संख्यामें— “वीथ्यामेको भवेद्दङ्कः कश्चिदेकोऽत्र कल्प्यते। आकाशभाषितैरुक्तैश्चित्रां प्रत्युक्तिमाश्रितः॥ सूचयेद्बूरि शृङ्गारं किञ्चिदन्यान् रसानपि। मुखनिर्वहणे सन्धौ अर्थप्रकृतयोऽखिलाः॥” अर्थात् “वीथीमें केवल मात्र एक ही अङ्क है; इस अङ्कमें कोई एक नायक कल्पनापूर्वक आकाशवाणीके द्वारा विचित्र उक्ति-प्रत्युक्तिका आश्रय करके प्रचुररूपमें शृङ्गाररसकी और किञ्चित् रूपमें अन्यान्य रस-समूहकी भी सूचना करता है; एवं उसकी मुखबन्ध और सन्धिमें समस्त अर्थप्रकृति अथवा बीज ही प्रयोज्य है।” इस स्थानपर चन्द्रके साथ 'नटता'-शब्दके युक्त होनेसे अर्थ अस्फुट होता है, इसलिये कृष्णके साथ युक्त होनेसे परिस्फुट अर्थका बोध होनेके कारण 'उद्घात्यक' नामक प्रस्तावना हुई एवं कृष्णसम्बन्धी अर्थ मानकर ही पौर्णमासी भी रङ्गस्थलमें प्रविष्ट हुई। श्रीरूप श्रीराम-रायको कह रहे हैं,—आपके जैसे रसशास्त्र-पारदर्शी पण्डित व्यक्तिके सम्मुख मेरी एक-एक उक्ति-मानो धृष्टतारूपी समुद्रकी अर्थात् प्रगल्भता-सागरकी एक-एक लहरके समान है॥ 185 ॥ साहित्यदर्पणमें दृश्य-श्रव्यके निरूपणमें (6/289)[34]— पदानि त्वगताथानि तदर्थगतये नराः। योजयन्ति पदैरन्यैः स उद्घात्यक उच्यते ॥ 186 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 186 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मनुष्यगण अस्फुट (अनिश्चित) अर्थवाले पदोंके अर्थको समझनेके लिये जब उसे अन्य पदोंके साथ जोड़ते हैं, तो उसे 'उद्घात्यक' कहते हैं॥ 186 ॥ अनुभाष्य— नराः (आलङ्कारिकाः) तु अगताथानि (अप्राप्तार्थानि अबोधिताथानि) पदानि तदर्थगतये (तेषाम् अबोधिताथांनां पदानां गतये अवबोधाय) अन्यैः पदैः यं योजयन्ति, सः 'उद्घात्यकः' उच्यते (कथ्यते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 186 ॥ राय कहे,—“कह आगे अङ्गेर विशेष।” श्रीरूप कहेन किछु संक्षेप-उद्देश ॥ 187 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“अब तुम विदग्धमाधव नाटकके समान ललितमाधव नाटकके भी विशेष अङ्गोंका वर्णन करो।” उनके विषयमें श्रीरूप गोस्वामी कुछ संक्षेपमें बतलाने लगे॥ 187 ॥ अनुभाष्य—'अङ्गेर विशेष',—पूर्ववर्ती (अन्त्यलीला 1/156 संख्यामें वर्णित) पूर्ववत् यथाक्रमसे वृन्दावन, मुरलीनिःस्वन (वंशी-स्वर), कृष्ण और राधिकाका वर्णन॥ 187 ॥ वहाँ वृन्दावन जैसे :— ललितमाधव (1/23)में गार्गीके प्रति पौर्णमासीकी उक्ति— हरिमुद्दिशते रजोभरः पुरतः सङ्गमयत्यमुं तमः। व्रजवामदृशां न पद्धतिः, प्रकटा सर्वदृशः श्रुतेरपि ॥ 188 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 188 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गायके खुरोंसे उड़ती धूलि हरिके [आने] की सूचना दे रही है; सामने उपस्थित तमः (अन्धकार) गोपियोंके साथ उन्हें मिलवा रहा है; इसलिये गोपवधुओंकी पद्धति सर्वज्ञ श्रुतियोंके लिये भी अगोचर हो गयी है॥ 188 ॥

[ 1/188–190 पहला अध्याय 37 अनुभाष्य— रजोभरः (रजसां गोक्षुरोत्थधूलीनां भरः पुञ्जः समूहः) हरिम् उद्दिशते (सूचयति), तमः (अन्धकारः) पुरतः अमुं (कृष्णं) सङ्गमयति (संयोजयति, अतः) व्रजवामदृशां (व्रजाङ्गनानां) पद्धतिः (रीतिः) सर्वदृशः (सर्वज्ञायाः) श्रुतेः (वेदस्य) अपि प्रकटा च न (गोचरा न स्यात्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। त्रिगुण-विषयक वेदोंमें गुणातीत कृष्णका निर्देश और मिलनकी कथा अव्यक्त है। रजोगुणके द्वारा इस माया जगत्में फेंक दिये जानेके कारण कृष्णविमुख बद्धजीवोंका कृष्णके विषयमें कोई ज्ञान नहीं होता और तमोगुणके द्वारा आवरणके कारण उनका कृष्णसे मिलनका अभाव होता है। किन्तु अप्राकृत वृन्दावनमें गैयाओंके खुरोंसे उठी धूलिके द्वारा नित्यमुक्ता गोपियोंके निकट कृष्णका आगमन सूचित होता है एवं तमः अथवा अन्धकारके द्वारा नित्यमुक्ता गोपियोंका कृष्णसे सङ्गम सम्पादित होता है। इसलिये शुद्धसत्त्व गोपियाँ और शुद्धसत्त्व श्रीवृन्दावन, दोनों ही त्रिगुणात्मक वेदोंके अगोचर हैं,—यही श्लोकका अर्थ है ॥ 188 ॥ वहाँ मुरलीका भ्रमण जैसे :- ललितमाधव (1/24)में पौर्णमासीके प्रति गार्गीकी उक्ति— हियमवगृह्य गृहेभ्यः कर्षति राधां वनाय या निपुणा। सा जयति निसृष्टार्था वरवंशजकाकली दूती ॥ 189 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 189 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—निपुणा, विशेष कार्य-प्राप्त, श्रेष्ठवंशमें उत्पन्न-वंशीकी मधुर-ध्वनिरूपी दूती जो श्रीराधाकी लज्जा दूर करवाकर उन्हें उनके गृहसे वनकी ओर आकर्षित करती है, वह जययुक्त हो ॥ 189 ॥ अनुभाष्य— या हियं (लज्जाम्) अवगृह्य (विहत्य, हत्वा इत्यर्थः) गृहेभ्यः वनाय (वनगमन-निमित्ताय इत्यर्थः) राधां कर्षति सा निपुणा (दक्षा) निसृष्टार्था (विन्यस्त-कर्मभारा) वरवंशजकाकली (वंशीध्वनिरूपा) दूती जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। निसृष्टार्था,—(उःनीः दूतीभेद प्रकरणमें 7/57 श्लोक)— “विन्यस्तकार्यभारा स्याद्द्वयोरेकतरेण या। युक्त्योभौ घटयेदेषा निसृष्टार्था निगद्यते।” [अर्थात् “नायक अथवा नायिकाके द्वारा किसी विशेष कार्यका भार प्राप्त होनेपर युक्ति और विचारके द्वारा दोनोंका मिलन करवानेवाली दूतीको निसृष्टार्था-दूती कहते हैं।”] ॥ 189 ॥ वहाँ श्रीकृष्ण जैसे :- ललितमाधव (2/11)में श्रीकृष्णके दर्शनसे सखीके प्रति श्रीराधाकी उक्ति— सहचरि निरातङ्कः कोऽयं युवा मुदिरद्युति- र्व्रजभुवि कुतः प्राप्तो माद्यन्मतङ्गजविभ्रमः। अहह चटुलैरुत्सर्पद्भिर्दृगञ्चलतस्करै- र्मम धृतिधनं चेतःकोषाद्विलुण्ठयतीह यः ॥ 190 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 190 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सहचरि, नवमेघ-कान्तियुक्त, मदमत्त हाथीकी भाँति लीलाकारी, आशङ्का-रहित यह युवक कौन है? यह कहाँसे [व्रजभूमिमें] आया है? आहा, यह चञ्चल गतिके द्वारा और चोरकी भाँति दृष्टिके द्वारा मेरे हृदयके भण्डारसे चित्तके धैर्यरूपी धनको लूट रहा है ॥ 190 ॥ अनुभाष्य— हे सहचरि, अहह इह (वृन्दाविपिने) यः युवा चटुलैः (चपलैः) उत्सर्पद्भिः (सर्वादिक्षु भ्रमद्भिः) दृगञ्चलतस्करैः (नयनकटाक्षचौरैः) मम चेतःकोषात् (हृद्-भाण्डारतः) धृतिधनं (धैर्यरूप-धनं) विलुण्ठयति, मुदिरद्युतिः (मुदिरस्य मेघस्य द्युतिरिव द्युतिः यस्य सः नवमेघरुचिः) माद्यन्मतङ्गजविभ्रमः (माद्यन् यः मतङ्गजः तद्वत् विभ्रमः विलासः यस्य सः महामत्तगजवच्चञ्चलः) निरातङ्कः (निःशङ्कः) अयं युवा कः? कुतः [च] व्रजभुवि प्राप्तः (समायातः)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 190 ॥

38 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/191-197 ] वहाँ श्रीराधा जैसे :- ललितमाधव (2/10)में श्रीराधाके दर्शनसे श्रीकृष्णकी उक्ति- विहारसुरदीर्घिका मम मनःकरीन्द्रस्य या विलोचन-चकोरयोः शरदमन्दचन्द्रप्रभा। उरोऽम्बरतटस्य चाभरणचारुतारावली मयोन्नतमनोरथैरियमलम्भि सा राधिका॥ 191 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 191 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो राधिका-मेरे मनरूपी हस्तिके लिये विहारगङ्गा स्वरूपा है, मेरे चक्षुरूपी चकोरके लिये शारदीय पूर्णचन्द्रकी अतिशय प्रभास्वरूपा है एवं मेरे वक्षःस्थलरूपी आकाशके आभूषण-स्वरूप सुन्दर तारावलीकी भाँति है, आज मैंने उस राधिकाको उन्नत मनोरथके साथ [बहुत दिनोंकी अभिलाषाके बाद] प्राप्त किया॥ 191 ॥ अनुभाष्य- या (राधा) मम मनःकरीन्द्रस्य (हृदय-मातङ्गस्य) विहार- सुरदीर्घिका (स्वर्गङ्गा), या विलोचनचकोरयोः (विलोचने नयने एव चकोरौ तयोः) शरदमन्दचन्द्रप्रभा (शरदि अमन्दः पूर्णः यः चन्द्रः तस्य प्रभा), या उरोऽम्बरतटस्य (उरः वक्षः एव अम्बरं आकाशं तस्य तटे क्षेत्रे) च आभरणचारुतारावली (आभूषणेषु अलङ्कारेषु चारुतारावली सुन्दरनक्षत्रमण्डली) च, सा इयं राधिका मया (कृष्णेन) उन्नतमनोरथैः (बहुदिन-मनोवाञ्छितैः हेतुभूतैः) साम्प्रतम् अलम्भि (प्राप्तवती)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 191 ॥ श्रीरायके द्वारा सहस्त्र मुखोंसे श्रीरूपके कवित्वकी सतत-प्रशंसा :- एत शुनि' राय कहे प्रभुर चरणे। रूपेर कवित्व प्रशिंसे' सहस्र-वदने॥ 192 ॥ “कवित्व ना हय एइ अमृतेर धार। नाटक-लक्षण सब, सिद्धान्तेर सार ॥ 193 ॥ प्रेम-परिपाटी एइ अद्भुत वर्णन। शुनि' चित्त-कर्णेर हय आनन्द-घूर्णन ॥ 194 ॥ अनुवाद-यह सुननेके बाद श्रीरायरामानन्द महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन करते हुए श्रीरूपके कवित्वकी मानो सैंकड़ों मुखोंसे प्रशंसा करते हुए कहने लगे,-“रूपका कवित्व कवित्व नहीं, अपितु अमृतकी धारा है। नाटकके समस्त लक्षण सिद्धान्तके सार स्वरूप हैं। प्रेमकी परिपाटीका ऐसा अद्भुत वर्णन है, जिसे सुनकर मन और कर्ण आनन्दसे घूमने लगते हैं॥ 192-194 ॥ (प्राचीनकृत श्लोक)- किं काव्येन कवेस्तस्य किं काण्डेन धनुष्मतः। परस्य हृदये लग्नः न घूर्णयति यच्छिरः ॥ 195 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 195 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अन्योंके हृदयको बींधकर यदि उसके सिरको ही चञ्चल नहीं कर पाये अर्थात् उसके सिरको ही नहीं घुमा पाये, तब कविके काव्यसे और धनुर्धारीके बाणसे क्या प्रयोजन ?195 ॥ प्रथम अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य- तस्य कवेः काव्येन (रसात्मक-वाक्येन) किम्? धनुष्मतः (धनुर्धरेण) काण्डेन (बाणेन) किं (प्रयोजनम्)?-यत् काव्यं काण्डञ्च परस्य हृदये लग्नं सत्, तस्य शिरः न घूर्णयति? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 195 ॥ श्रीरूपके प्रति महाप्रभुकी कृपाका अनुमान :- तोमार शक्ति बिना जीवेर नहे एइ वाणी। तुमि शक्ति दिया कहाओ,-हेन अनुमानि ॥”196 ॥ अनुवाद-आपकी कृपाके बिना ऐसा कवित्व किसी भी जीवके द्वारा सम्भव नहीं है। मेरा ऐसा अनुमान है कि आप ही शक्ति प्रदान करके रूपके द्वारा यह सब कुछ कहलवा रहे हैं॥”196 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपके कवित्वकी प्रशंसा :- प्रभु कहे,-“प्रयागे आमा-सने हइल मिलन। इहार गुणे इहाते आमार तुष्ट हैल मन ॥ 197 ॥

[ 1/197–204 पहला अध्याय 39 अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“प्रयागमें रूपकी मुझसे भेंट हुई थी। इसके गुणोंके कारण मेरा मन इसके प्रति सन्तुष्ट हो गया था॥197॥ मधुर प्रसङ्ग इहार काव्य सालङ्कार। ऐछे कवित्व बिना नहे रसेर प्रचार॥198॥ अनुवाद—रूपके काव्यका प्रसङ्ग अत्यन्त मधुर है और यह समस्त प्रकारके अलङ्कारोंसे विभूषित है। ऐसे कवित्वके बिना रसका प्रचार नहीं हो सकता॥198॥ स्वयं महाप्रभुके द्वारा परमस्नेह-कृपाभाजन श्रीरूपके प्रति भक्तोंकी कृपाकी याचना :– सबे कृपा करि' इँहारे देह' एइ वर। व्रजलीला-प्रेमरस येन वर्णे निरन्तर॥199॥ अनुवाद—[महाप्रभुने अपने सभी भक्तोंसे कहा—] आप सभी कृपा करके इसे यही वर प्रदान करें कि यह निरन्तर व्रजलीला-प्रेमरसका ही वर्णन करे॥199॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनकी प्रशंसा और वैराग्ययुक्त प्रेमभक्ति-सिद्धान्तरस-पाण्डित्यके विषयमें उन्हें श्रीरायके समान मानना :– इँहार ये ज्येष्ठभ्राता, नाम—‘सनातन’। पृथिवीते विज्ञवर नाहि ताँर सम॥200॥ अनुवाद—इसके ज्येष्ठ भ्राता जिनका नाम 'सनातन' है, जगत्में उनके समान सुशिक्षित विद्वान अन्य कोई नहीं है॥200॥ तोमार यैछे विषयत्याग, तैछे ताँर रीति। दैन्य-वैराग्य-पाण्डित्ये ताँहातेइ स्थिति॥201॥ अनुवाद—जिस प्रकारसे आपने विषयोंका त्याग किया है, उन्होंने भी वैसा ही किया है। दैन्य, वैराग्य और पाण्डित्यकी उनमें ही स्थिति है॥201॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुने श्रीरामानन्द रायसे कहा,— तुम समस्त विषय परित्याग करके जिस प्रकारसे एकान्तिक कृष्णसेवा कर रहे हो, सनातन-गोस्वामी भी ठीक तुम्हारी ही भाँति कृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंको छोड़कर प्रतिक्षण उसी प्रकार 'तृणादपि सुनीच' अर्थात् निष्किञ्चन भावसे युक्त और कृष्णसे भिन्न भोगोंका वर्जन अर्थात् कृष्णसे भिन्न विषयोंके बन्धनसे मुक्त होकर, कृष्णसेवारूपी विषय ग्रहण करके पराभक्तिकी विद्यामें पारङ्गत हैं। निष्कपट दैन्य, वैराग्य और पाण्डित्यके आदर्श विग्रह सनातन शुद्ध अर्थात् युक्त-वैराग्य और प्रेमभक्तिसिद्धान्त-रस-पाण्डित्य आदिमें ठीक तुम्हारी ही भाँति कुशल और पारदर्शी हैं॥201॥ श्रीरूप-सनातनमें शक्ति सञ्चार करके व्रजमें भेजनेका वर्णन :– एइ दुइ भाइये आमि पाठाइलूँ वृन्दावने। शक्ति दिया भक्तिशास्त्र करिते प्रवर्त्तने॥”202॥ अनुवाद—मैंने इन दोनों भाइयोंको शक्ति प्रदान करके भक्ति शास्त्रका प्रवर्त्तन करनेके लिये वृन्दावन भेजा था॥”202॥ श्रीरायके द्वारा महाप्रभुको प्रयोजक-कर्त्ता मानकर उनकी स्तुति :– राय कहे,—“ईश्वर तुमि ये चाह करिते। काठेर पुतली तुमि पार नाचाइते॥203॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“आप ईश्वर हैं जो चाहे कर सकते हैं। आप तो काठकी पुतली तकको भी नचा सकते हैं॥203॥ श्रीरायके कीर्तनमें और श्रीरूपके लिखनेमें एक ही प्रेम-भक्तिरसका प्रचार :– मोर मुखे ये-सब रस करिला प्रचारणे। सेइ रस देखि एइ इहार लिखने॥204॥ अनुवाद—आपने मेरे मुखसे जिस रसको प्रकाशित कराया था, वही रस मैं इसकी (रूपकी) लेखनीमें देख रहा हूँ॥204॥

40 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/205-213 ] महाप्रभु अपनी इच्छाके द्वारा चालित भक्तके द्वारा अप्राकृत व्रजरसके माहात्म्यका प्रचार करनेवाले :- भक्ते कृपा-हेतु प्रकाशिते चाह व्रज-रस। यारे कराओ, सेइ करिबे जगत् तोमार वश॥"205॥ अनुवाद-भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही आप व्रज-रसको प्रकाशित करवाना चाहते हैं। आप जिसके द्वारा करवायेंगे, वही करेगा, क्योंकि समस्त जगत् ही आपके वशमें है॥"205॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको आलिङ्गन, श्रीरूपके द्वारा भक्तोंके चरणोंकी वन्दना :- तबे महाप्रभु कैला रूपे आलिङ्गन। ताँरे कराइला सबार चरण-वन्दन॥206॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीरूपका आलिङ्गन किया और उन्होंने श्रीरूपसे सभी भक्तोंके चरणोंकी वन्दना करवायी॥206॥ श्रीनित्यानन्द-अद्वैतादि सभीके द्वारा श्रीरूपको आलिङ्गन :- अद्वैत-नित्यानन्दादि सब भक्तगण। कृपा करि' रूपे सबे कैला आलिङ्गन॥207॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द आदि सभी भक्तोंने श्रीरूपको आलिङ्गन करके उनके ऊपर कृपाका वर्षण किया॥207॥ श्रीरूपके प्रति महाप्रभुकी कृपा और श्रीरूपके कृष्णाकर्षक गुण-दर्शनसे सभीको विस्मय :- प्रभु-कृपा रूपे, आर रूपेर सद्गुण। देखि' चमत्कार हैल सबाकार मन॥208॥ अनुवाद-महाप्रभुकी श्रीरूपके प्रति कृपा तथा श्रीरूपके सद्गुण-इन्हें देखकर सभी भक्तोंके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ॥208॥ श्रीरूपका ठाकुर-श्रीहरिदासके द्वारा आलिङ्गन :- तबे महाप्रभु सब भक्त लञा गेला। हरिदास-ठाकुर रूपे आलिङ्गन कैला॥209॥ अनुवाद-तब महाप्रभु अपने समस्त भक्तोंको अपने साथ लेकर चले गये। श्रीहरिदास ठाकुरने भी श्रीरूपको आलिङ्गन किया॥209॥ श्रीहरिदासके द्वारा श्रीरूपके सौभाग्यकी प्रशंसा :- हरिदास कहे,-"तोमार भाग्येरे नाहि सीमा। ये-सब वर्णिला, इहार के जाने महिमा?"210॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,-"तुम्हारे सौभाग्यकी सीमा नहीं है। तुमने जो सब वर्णन किया है, उसकी महिमाको कौन जान सकता है?"210॥ श्रीरूपके द्वारा दैन्यज्ञापन, स्वयंको यन्त्री-महाप्रभुका यन्त्र मानना :- श्रीरूप कहेन,-"आमि किछुइ ना जानि। येइ महाप्रभु कहान, सेइ कहि वाणी॥"211॥ अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीने कहा,-"मैं कुछ भी नहीं जानता हूँ। महाप्रभु मुझसे जो कहलवाते हैं, मैं वही कहता हूँ॥"211॥ भःरःसिः (1/1/2) में- हृदि यस्य प्रेरणया प्रवर्त्तितोऽहं वराकरूपोऽपि। तस्य हरेः पदकमलं वन्दे चैतन्यदेवस्य॥212॥ अनुवाद-हृदयमें जिनकी प्रेरणाके द्वारा सामान्य कङ्गालरूपी मैं भक्तिग्रन्थकी रचनामें प्रवृत्त हुआ हूँ, उन श्रीचैतन्यदेव हरिके चरणकमलोंकी मैं वन्दना करता हूँ॥212॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 19/134 संख्या देखें॥212॥ श्रीरूप और श्रीहरिदासका कृष्णकथा-आलाप :- एइमत दुइजन कृष्णकथारङ्गे। सुखे काल गोङाय रूप हरिदास-सङ्गे॥213॥

[ 1/213-222 पहला अध्याय 41 अनुवाद—इस प्रकार दोनों कृष्णकथाके आनन्दमें निमग्न हो रहे थे। श्रीरूपने श्रीहरिदासके साथ सुखपूर्वक समयको व्यतीत किया ॥ 213 ॥ चातुर्मास्यके अन्तमें गौड़से आये भक्तोंका गौड़में लौटना :— चारि मास रहि' सब प्रभुर भक्तगण। गोसाञि विदाय दिला, गौड़े करिला गमन ॥ 214 ॥ अनुवाद—गौड़देशसे आये महाप्रभुके भक्त चार मास तक जगन्नाथपुरीमें रहे। तब महाप्रभुने उन्हें विदायी दी और वे सभी गौड़देशमें लौट गये ॥ 214 ॥ दोलयात्रा तक श्रीरूपका महाप्रभुके चरणकमलोंमें अवस्थान :— श्रीरूप प्रभुपदे नीलाद्रि रहिला। दोलयात्रा प्रभुसङ्गे आनन्दे देखिला ॥ 215 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुके चरणकमलोंमें नीलाद्रिमें (श्रीजगन्नाथ पुरीमें) ही रहे और उन्होंने आनन्दपूर्वक महाप्रभुके साथ दोलयात्राके दर्शन किये ॥ 215 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपमें शक्तिसञ्चार :— दोलयात्रा रहि' प्रभु रूपे आज्ञा दिला। अनेक प्रसाद करि' शक्ति सञ्चारिला ॥ 216 ॥ वृन्दावनमें जाकर श्रीसनातनको पुरी भेजनेकी आज्ञा :— “वृन्दावने याह' तुमि, रहिह वृन्दावने। एकबार इँहा पाठाइह सनातने ॥ 217 ॥ वृन्दावनमें चार प्रकारकी सेवाका कार्यभार प्रदान— (1) भक्तिरसशास्त्रकी रचना, (2) लुप्ततीर्थोंका उद्धार, (3) श्रीविग्रह और मन्दिरमें सेवाका संस्थापन और (4) अप्राकृत-भक्ति-रसप्रचार :— व्रजे याइ' रसशास्त्र करिह निरूपण। लुप्त-तीर्थ सब ताँहा करिह प्रचारण ॥ 218 ॥ कृष्णसेवा, रसभक्ति करिह प्रचार। आमिह देखिते ताहा याइमु एकबार ॥ "219 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने दोलयात्राके समाप्त हो जानेपर श्रीरूपपर अनेक प्रकारसे कृपा करके उनमें शक्तिका सञ्चार किया और उन्हें आज्ञा दी,—“तुम वृन्दावनमें जाओ और वृन्दावनमें ही रहना। सनातनको एकबार यहाँ जगन्नाथपुरीमें भेजना। व्रजमें जाकर रसशास्त्रोंका निरूपण करना। वहाँके समस्त लुप्त-तीर्थोंको प्रकाशित करना। कृष्णविग्रह-सेवा और रसभक्तिका प्रचार करना। मैं भी एकबार वृन्दावनका दर्शन करने जाऊँगा ॥ ”216-219 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुका पुनः वृन्दावन गमन नहीं सुना जाता ॥ 219 ॥ पहले अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। महाप्रभुका आलिङ्गन, श्रीरूपका प्रणाम :— एत बलि' प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन। रूप-गोसाञि शिरे धरे प्रभुर चरण ॥ 220 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने श्रीरूपका आलिङ्गन किया। श्रीरूप गोस्वामीने महाप्रभुके चरणकमलोंको अपने सिरपर धारण किया ॥ 220 ॥ गौड़देशसे होते हुए श्रीरूपका व्रजमें आगमन :— प्रभुर भक्तगण-पाशे विदाय लइया। पुनरपि गौड़पथे वृन्दावने आइला ॥ 221 ॥ अनुवाद—श्रीरूपने महाप्रभुके समस्त भक्तोंसे विदायी ली और पुनः गौड़देशसे होते हुए वृन्दावन आ गये ॥ 221 ॥ महाप्रभु-रूप-मिलन-संवादके श्रवणसे अचैतन्य जीवको श्रीचैतन्य-चरणकमलोंकी प्राप्ति :— एइ त' कहिलाङ पुनः रूपेर मिलन। इहा येइ सुने, पाय चैतन्यचरण ॥ 222 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने) महाप्रभुके साथ श्रीरूपके पुनः

42 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/222-223 ] मिलनका वर्णन किया। जो कोई भी इस प्रसङ्गका अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी श्रवण करता है, उसे श्रीचैतन्यदेवके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका प्राप्ति होती है॥ 222 ॥ वर्णन कर रहा है॥ 223 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 223 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे पुनः श्रीरूपसङ्गोत्सवो श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें पुनः श्रीरूपसङ्गोत्सव नाम प्रथमः परिच्छेदः। नामक पहले अध्यायका अनुवाद समाप्त।

दूसरा अध्याय


[बायाँ स्तम्भ]

**कथासार—**महाप्रभुका साक्षात्-दर्शन, आवेश और आविर्भाव जिस-जिस स्थानपर हुआ था, उसका विवरण बतलाते हुए ग्रन्थकारने नकुल ब्रह्मचारीकी कथा, नृसिंहानन्दकी महिमा तथा अन्यान्य भक्तोंकी कथाको लिखा है। भगवान्-आचार्यकी महाप्रभुके प्रति निष्ठा होनेपर भी श्रील स्वरूप-दामोदरने भगवान्के भाई गोपाल-भट्टाचार्यके मुखसे मायावादभाष्यको सुननेके लिये उन्हें निषेध किया। उसके बाद छोटे-हरिदासके द्वारा भगवान्-आचार्यकी आज्ञासे माधवी देवीके पास जाकर चावलकी भिक्षा करनेपर महाप्रभुने उन्हें वैरागीके स्त्रीसे वार्तालापके दोषके कारण (अपने वासस्थानके द्वारमें प्रवेश करनेके लिये) निषेध किया और वैष्णवोंके अनुरोध करनेपर भी उन्हें पुनः ग्रहण नहीं किया। एक वर्षके बाद छोटे-हरिदासने प्रयाग-त्रिवेणीमें डूबकर प्राण त्याग करनेके बाद अप्राकृत देहसे महाप्रभुको गान सुनाया। गौड़ीय वैष्णवोंके द्वारा आकर इस संवादको कहनेपर श्रीस्वरूपादि सभी इससे अवगत हुए। —(अमृतप्रवाह भाष्य)

छह रूपोंमें विलास करनेवाले आवरण (पार्षद) सहित श्रीकृष्णचैतन्य-महाप्रभुको और सेवारत प्रेष्ठ सखियोंसे परिवेष्टित श्रीराधाकृष्णको प्रणाम :— वन्देऽहं श्रीगुरोः श्रीयुत-पदकमलं श्रीगुरून् वैष्णवांश्च श्रीरूपं साग्रजातं सहगण-रघुनाथान्वितं तं सजीवम्। साद्वैतं सावधूतं परिजनसहितं कृष्णचैतन्य-देवं श्रीराधा-कृष्णपादान् सहगण-ललिता-श्रीविशाखान्वितांश्च॥1॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**मैं श्रीगुरुके चरणकमलों एवं समस्त गुरुओं, समस्त वैष्णवों, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन


[दायाँ स्तम्भ]

गोस्वामी, गणोंसहित श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामी, श्रीअद्वैतप्रभु, श्रीनित्यानन्दप्रभु एवं परिजन सहित श्रीकृष्णचैतन्यदेव, गणोंसहित श्रीललिता-विशाखा आदिसे युक्त श्रीराधाकृष्णकी वन्दना करता हूँ॥1॥ अनुभाष्य— अहं श्रीगुरोः (मन्त्रदीक्षागुरोः भजनशिक्षागुरोः वा) श्रीयुतपदकमलं (श्रीमच्चरणसरोजं) श्रीगुरून् (परम्परात्पर-प्रभृति-गुरुगणान् श्रीमदानन्दतीर्थ-श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी-प्रमुख गुरुवर्गान्) वैष्णवान् (चतुर्युगोद्भूतान् भागवतान्) च; साग्रजातं (अग्रेजेन श्रीमता गोस्वामिना सनातनेन सह वर्तमान), सहगणरघुनाथान्वितं (स्वभक्तैः सह रूपानुगेन श्रीरघुनाथेन दास-गोस्वामिना च सह सहितं) सजीवं (निजानुकम्पितेन रूपानुगेन श्रीजीवगोस्वामिना सह विद्यमानं) तं श्रीरूपं, साद्वैतं (अद्वैतप्रभुसहितं) सावधूतं (नित्यानन्दप्रभूसमन्वितं) परिजनसहितं (सावरण-पार्षदं) कृष्णचैतन्यदेवं (महाप्रभुं); सहगणललिता-श्रीविशाखान्वितान् (गणेन सखिमञ्जरीभिः सह वर्त्तमानाभ्यां ललिताविशाखाभ्याम् अन्वितान् युक्तान्) श्रीराधाकृष्णपादान् च वन्दे। **श्लोक-भावानुवाद—**मैं श्रीगुरु (मन्त्र-दीक्षागुरु और भजन-शिक्षागुरुओं) के चरणकमलों एवं समस्त गुरुओं (परम-परात्पर आदि गुरुवर्ग, श्रीमत् आनन्दतीर्थ- श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी प्रमुख गुरुओं), समस्त वैष्णवों (चतुर्युगोंमें प्रकटित भागवतों); अग्रज श्रीसनातन गोस्वामी सहित, निजभक्तोंसहित और श्रीरूपानुग श्रीरघुनाथदास गोस्वामी एवं निज-अनुकम्पा-पात्र रूपानुग श्रीजीव गोस्वामी सहित उन श्रीरूप गोस्वामी; श्रीअद्वैतप्रभु, श्रीनित्यानन्दप्रभु एवं परिजन (आवरण-पार्षद) सहित श्रीकृष्णचैतन्यदेव (महाप्रभु); गणोंसहित (सखी-मञ्जरी सहित) श्रीललिता- विशाखा आदिसे युक्त श्रीराधाकृष्णके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ॥1॥

जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥

44 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/2-10 ] अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौरभक्तोंकी जय हो ॥ २॥ तीन प्रकारसे महाप्रभुके द्वारा जीवोंका उद्धार :- सर्वलोक उद्धारिते गौर-अवतार। निस्तारेर हेतु तांर त्रिविध प्रकार॥ ३॥ अनुवाद—सभी लोगोंका उद्धार करनेके लिये ही श्रीगौर-अवतार हुआ है। उन्होंने उनका उद्धार तीन प्रकारसे किया॥ ३॥ (1) साक्षात्-दर्शन, (2) योग्य जीवमें आवेश और (3) आविर्भाव :- साक्षात्-दर्शन, आर योग्यभक्त-जीवे। ‘आवेश’ करये काँहा हञा ‘आविर्भावे’ ॥ 4 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहीं साक्षात्-दर्शन देकर जीवोंका उद्धार किया। कहीं योग्यभक्त-जीवमें ‘आवेश’रूपसे और कहीं ‘आविर्भाव’रूपसे जीवोंका उद्धार किया॥ 4॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने जीवोंको साक्षात् दर्शन देकर, किसी योग्यभक्त-जीवमें आविष्ट होकर और किसी भक्तजीवके समक्ष आविर्भूत होकर जीवोंका उद्धार किया ॥ 3-4 ॥ तीन प्रकारके प्राकट्यका वर्णन :- ‘साक्षात्-दर्शने’ प्राय सब निस्तारिला। नकुल-ब्रह्मचारीर देहे ‘आविष्ट’ हइला॥ 5 ॥ ईश्वरका स्वभाव :- प्रद्युम्न-नृसिंहानन्द आगे कैला ‘आविर्भाव’। ‘लोक निस्तारिब’,—एइ ईश्वर-स्वभाव॥ 6 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने प्रायः सभीका तो साक्षात्-दर्शन देकर ही उद्धार किया था। एक बार महाप्रभुने श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी देहमें ‘आविष्ट’ होकर उनके देहके विकारोंको देखनेके लिये आये गौड़भक्तोंका उद्धार किया था। महाप्रभु श्रीप्रद्युम्नके (श्रीनृसिंहानन्दके) समक्ष स्वयं आविर्भूत हुए और उन्होंने अनेक लोगोंका उद्धार किया। ईश्वरका स्वभाव ही जीवोंका उद्धार करना है॥ 5-6॥ अनुभाष्य—‘साक्षात् दर्शन’ प्रदान करके, नकुल- ब्रह्मचारीकी देहमें ‘आविष्ट’ होकर और प्रद्युम्न अथवा नृसिंहानन्द-ब्रह्मचारीके सम्मुख ‘आविर्भूत’ होकर महाप्रभुने लोगोंका उद्धार किया। (1) श्रीशचीके गृहमन्दिरमें, (2) श्रीनित्यानन्द प्रभुके नर्त्तनस्थलपर, (3) श्रीवास-अङ्गनमें कीर्त्तनस्थलपर एवं (4) श्रीराघवके भवनमें,—इन चार स्थानोंपर महाप्रभु नित्य ‘आविर्भाव’ प्रकटित करते थे (इसी अध्यायकी 34 संख्या देखें)॥ 5-6॥ तीन प्रकारके प्राकट्योंके फलका वर्णन; महाप्रभुके ‘साक्षात्-दर्शन’का फल :- साक्षात्-दर्शने सब जगत् तारिला। एकबार ये देखिला, से कृतार्थ हइला॥ 7 ॥ अनुवाद—साक्षात्-दर्शन देकर महाप्रभुने समस्त जगत्का उद्धार किया। एकबार भी जिसने उनका दर्शन किया, वह कृतार्थ हो गया॥ 7॥ गौड़-देशेर भक्तगण प्रत्यब्द आसिया। पुनः गौड़देशे याय प्रभुरे मिलिया॥ 8 ॥ अनुवाद—गौड़-देशके भक्तगण प्रत्येक वर्ष नीलाचल आते थे। महाप्रभुसे मिलकर वे पुनः गौड़देशमें लौट जाते थे॥ 8॥ आर नाना-देशेर लोक देखि’ जगन्नाथ। चैतन्य-चरण देखि’ हइल कृतार्थ॥ 9 ॥ अनुवाद—अन्य देशोंके लोग भी श्रीजगन्नाथके दर्शन करने आते थे और पुरीमें आकर श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणोंका दर्शन करके कृतार्थ हो जाते थे॥ 9॥ सप्तद्वीपेर लोक आर नवखण्डवासी। देव, गन्धर्व, किन्नर—मनुष्य-वेशे आसि’ ॥ 10 ॥

[ 2/10-17 दूसरा अध्याय 45

प्रभुरे देखिया याय ‘वैष्णव’ हञा। कृष्ण बलि’ नाचे सब प्रेमाविष्ट हञा ॥ 11 ॥

अनुवाद—सातों द्वीपोंके लोग, नौ खण्डोंके निवासी, देवता, गन्धर्व और किन्नर भी मनुष्यके वेशमें आकर महाप्रभुके दर्शन करके सब वैष्णव बन जाते थे। वे ‘कृष्ण’ नामका उच्चारण करके प्रेमाविष्ट होकर नृत्य करने लगते थे ॥ 10-11 ॥

अनुभाष्य—‘सप्तद्वीप’,—मध्यलीला 20/218 संख्याका अनुभाष्य और भागवतके पाँचवें स्कन्धके 16 और 20 अध्याय देखें।

‘नवखण्ड’,—सिद्धान्तशिरोमणिमें गोलाध्यायके भुवनकोशमें— “ऐन्द्रं कशेरुसकलं किल ताम्रपर्ण- मन्यद्गभस्तिमदतश्च कुमारिकाख्यम्। नागञ्च सौम्यमिह वारुणमन्त्यखण्डं गान्धर्व-संज्ञमिति भारतवर्षमध्ये॥”

  1. ऐन्द्र, (2) कशेरु, (3) ताम्रपर्ण, (4) गभस्तिमत्, (5) कुमारिका, (6) नाग, (7) सौम्य, (8) वारुण और (9) गान्धर्व—भारतवर्षमें ये नौ खण्ड हैं ॥ 10 ॥

महाप्रभुके आवेशका कारण, देश, काल और पात्रके वैशिष्ट्यका वर्णन :— एइमत दर्शने त्रिजगत् निस्तारि’। ये केह आसिते नारे अनेक संसारी ॥ 12 ॥ ता-सबा तारिते प्रभु सेइ सब देशे। योग्यभक्त-जीवदेहे करेन ‘आवेश’ ॥ 13 ॥

अनुवाद—इस प्रकार अपने दर्शनोंसे महाप्रभुने त्रिभुवनका उद्धार कर दिया। संसारमें फंसे अनेक लोग ऐसे भी थे जो महाप्रभुके दर्शनोंको प्राप्त नहीं कर सके। उन सबका भी उद्धार करनेके लिये महाप्रभु उन सब देशोंमें किसी योग्यभक्त-जीवकी देहमें अपना ‘आवेश’ प्रकट कर देते थे॥ 12-13 ॥

आवेशका फल :— सेइ जीवे निज भक्ति करेन प्रकाशे। ताहार दर्शने ‘वैष्णव’ हय सर्वदेशे ॥ 14 ॥

अनुवाद—महाप्रभु उस जीवमें अपनी भक्तिका प्रकाश कर देते और उस जीवके दर्शनसे समस्त देशवासी वैष्णव बन जाते थे॥ 14 ॥

एइमत आवेशे तारिल त्रिभुवन। गौड़े यैछे आवेश, करि’ दिग्दरशन ॥ 15 ॥

अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने आवेशके द्वारा त्रिभुवनका उद्धार किया। महाप्रभुने गौड़देशमें जिस प्रकारसे आवेश प्रकाशित किया, मैं (ग्रन्थकार) यहाँ उसका दिग्दर्शन करवा रहा हूँ॥ 15 ॥

‘आवेश’का दृष्टान्त—श्रीनकुल ब्रह्मचारीमें महाप्रभुका ‘आवेश’ और उनकी अवस्थाका वर्णन :— आम्बुया-मुलुके हय नकुल ब्रह्मचारी। परम-वैष्णव तेंहो बड़ अधिकारी ॥ 16 ॥

अनुवाद—गौड़देशमें श्रीनवद्वीपधामके निकट आम्बुया-मुलुकमें एक श्रीनकुल ब्रह्मचारी नामक परम वैष्णव रहते थे, जो कि भक्तिराज्यमें उत्तम अधिकारी थे॥ 16 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य— ‘आम्बुया-मुलुक’,—उस समय मुलुक विभाग करके एक-एक स्थानपर यवन-राजाओंकी तहसील-कचहरी थी; ‘अम्बिका’ (वर्धमान जिलेके कालना-नगरसे संलग्न एक विशेष पल्ली)-नामक स्थानपर एक मुलुक था। उसके अधिकारमें जो स्थान अब ‘प्यारीगञ्ज’के नामसे प्रसिद्ध है, वहीं श्रीनकुल ब्रह्मचारी रहते थे॥ 16 ॥

गौड़देशे लोक निस्तारिते मन हैल। नकुल-हृदये प्रभु ‘आवेश’ करिल ॥ 17 ॥

अनुवाद—जब महाप्रभुके मनमें गौड़देशके लोगोंका

46 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/17-27 ] उद्धार करनेकी इच्छा हुई, तब महाप्रभुने श्रीनकुल चैतन्येर आवेश हय नकुलेर देहे। ब्रह्मचारीके हृदयमें अपना ‘आवेश’ प्रकाशित किया॥ 17॥ शुनि' शिवानन्द आइला करिया सन्देहे ॥ 22 ॥ ग्रहग्रस्तप्राय नकुल प्रेमाविष्ट हञा। श्रीशिवानन्दका संशय और परीक्षा लेनेकी इच्छा :— हासे, कान्दे, नाचे गाय उन्मत्त हञा ॥ 18 ॥ परीक्षा करिते ताँर यबे इच्छा हैल। बाहिरे रहिया तबे विचार करिल ॥ 23 ॥ अश्रु, कम्प, स्तम्भ, स्वेद, सात्त्विक विकार। श्रीशिवानन्दका विचार और दूरमें अवस्थान :— निरन्तर प्रेमे नृत्य, सघन हुङ्कार ॥ 19 ॥ 'आपने बोलान मोरे, इहा यदि जानि। अनुवाद—भूतग्रस्त व्यक्तिका जिस प्रकार अपने आमार इष्ट-मन्त्र जानि' कहेन आपनि ॥ 24 ॥ शरीरपर नियन्त्रण नहीं रहता, उसी प्रकार महाप्रभुका तबे जानि, इँहाते हय चैतन्य-आवेशे।' 'आवेश' आनेसे श्रीनकुल ब्रह्मचारी प्रेमाविष्ट हो गये। एत चिन्ति' शिवानन्द रहिला दूरदेशे ॥ 25 ॥ वे उन्मत्त होकर कभी तो हँसने लगे, कभी रोने लगे तथा कभी नृत्य-गान करने लगे। उनकी देहमें अश्रु, अनुवाद—श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी देहमें श्रीचैतन्यदेवका कम्प, स्तम्भ और स्वेद (पसीना आना) आदि आवेश हुआ है, यह सुनकर श्रीशिवानन्द सेनको कुछ अष्ट-सात्त्विक विकार प्रकाशित होने लगे। वे प्रेममें सन्देह हुआ, इसलिये वे वहाँपर आये। जब उनके डूबकर निरन्तर नृत्य और ज़ोरसे हुङ्कार करने मनमें श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी परीक्षा करनेकी इच्छा हुई, लगे॥ 18-19॥ तब वे श्रीनकुल ब्रह्मचारीके घरसे बाहर रहकर विचार तैछे गौरकान्ति, तैछे सदा प्रेमावेश। करने लगे,—‘यदि नकुल ब्रह्मचारी यह जान जायँ कि ताहाते देखिते आइसे सर्व गौड़देश ॥ 20 ॥ मैं यहाँ हूँ और वे मुझे स्वयं ही भीतर बुलायें एवं मेरे इष्ट-मन्त्रको जानकर वे स्वयं उसे मुझे बतला दें, अनुवाद—महाप्रभुकी भाँति श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी तभी मैं मानूँगा कि उनमें श्रीचैतन्यदेवका आवेश हुआ अङ्गकान्ति भी गौरवर्णकी हो गयी और उनमें निरन्तर है।' ऐसा विचारकर श्रीशिवानन्द सेन कुछ दूरीपर ही प्रेमका आवेश होने लगा। गौड़देशमें सभी स्थानोंसे लोग खड़े रहे॥ 22-25॥ उनके दर्शन करनेके लिये आने लगे॥ 20॥ असंख्य लोकेर घटा,—केह आइसे याय। अनुभाष्य—'सर्वगौड़देश',—समस्त गौड़देशवासी लोकेर संघट्टे केह दर्शन ना पाय ॥ 26 ॥ (गौड़ीयगण)॥ 20॥ अनुवाद—वहाँ असंख्य लोगोंकी भीड़ थी—कोई ब्रह्मचारीका उपदेश :— आ रहा था, तो कोई जा रहा था। लोगोंकी भीड़के याँरे देखे ताँरे कहे, — 'कह कृष्णनाम'। कारण किसी-किसीको तो श्रीनकुल ब्रह्मचारीके दर्शन ताँहार दर्शने लोक हय प्रेमोद्दाम ॥ 21 ॥ भी प्राप्त नहीं हो रहे थे॥ 26॥ अनुवाद—श्रीनकुल ब्रह्मचारी जिसे भी देखते, श्रीशिवानन्दको अपने निकट बुलानेके उसीको कहते,—'कृष्णनाम बोलो'। उनके दर्शनसे ही लिये लोगोंको भेजना :— सभी लोग प्रेममें प्रमत्त हो उठते ॥ 21 ॥ ब्रह्मचारी कहे, — “शिवानन्द आछे दूरे। अनुभाष्य—'प्रेमोद्दाम',—प्रेममें प्रमत्त॥ 21॥ जन दुइ-चारि याह, बोलाह ताहारे ॥”27 ॥

[ 2/27-36 दूसरा अध्याय 47 अनुवाद—श्रीनकुल ब्रह्मचारीने कहा,–"शिवानन्द सेन कुछ दूरीपर हैं। दो-चार लोग जाकर उन्हें बुलाकर ले आओ ॥"27॥ चारिदिके धाय लोके 'शिवानन्द' बलि' । “शिवानन्द कोन्, तोमाय बोलाय ब्रह्मचारी ॥ "28॥ अनुवाद—लोग 'शिवानन्द' बोलते हुए चारों दिशाओंमें दौड़ पड़े और उनको पुकारते हुए कहने लगे,–"शिवानन्द कौन हैं? आपको श्रीनकुल ब्रह्मचारी बुला रहे हैं॥"28॥ श्रीशिवानन्दका शीघ्र आना :— शुनि' शिवानन्द सेन ताँहा शीघ्र आइल। नमस्कार करि' ताँर निकटे बसिल ॥ 29 ॥ अनुवाद—उन लोगोंकी पुकारको सुनकर श्रीशिवानन्द सेन शीघ्रतासे वहाँ आ गये और श्रीनकुल ब्रह्मचारीको नमस्कार करके उनके निकट बैठ गये ॥ 29 ॥ श्रीशिवानन्दके सन्देहका भङ्ग होना :— ब्रह्मचारी बोले,–“तुमि करिला संशय। एक मना हञा ताहा शुनह निश्चय ॥ 30॥ 'गौरगोपाल-मन्त्र' तोमार चारि अक्षर। अविश्वास छाड़, येइ करियाछ अन्तर ॥"31 ॥ अनुवाद—तब श्रीनकुल ब्रह्मचारीने श्रीशिवानन्दसे कहा,–“आपने मुझपर संशय किया। अब आप एकाग्रचित्त होकर उसका प्रमाण सुनो। आप चार अक्षरवाले 'गौरगोपाल-मन्त्र'का जप करते हैं। आपके हृदयमें जो अविश्वास है, अब उसे छोड़ो ॥"30-31॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'गौरगोपाल-मन्त्र',—गौरवादिगण 'गौराङ्ग'-नामसे चार-अक्षरवाले गौरमन्त्रको लक्ष्य करते हैं; केवल-कृष्णावादिगण इस 'गौरगोपालमन्त्र'-शब्दसे राधा-कृष्णके चार-अक्षरवाले मन्त्रको लक्ष्य करते हैं॥ 31 ॥ अनुभाष्य—'अन्तर'—मनमें ॥ 31 ॥ श्रीशिवानन्दका विश्वास :— तबे शिवानन्देर मने प्रतीति हइल। अनेक सम्मान करि' बहु भक्ति कैल ॥ 32 ॥ अनुवाद—तब श्रीशिवानन्द सेनके हृदयमें यह पूर्ण विश्वास हुआ कि श्रीनकुल ब्रह्मचारीमें महाप्रभुका आवेश हुआ है और उन्होंने सम्मानपूर्वक उनकी बहुत सेवा की ॥ 32 ॥ एइमत महाप्रभुर अचिन्त्य प्रभाव। एबे शुन प्रभुर यैछे हय 'आविर्भाव' ॥ 33 ॥ अनुवाद—इस प्रकारसे महाप्रभुके अचिन्त्य प्रभावको समझना चाहिये। महाप्रभुका 'आविर्भाव' जिस प्रकार होता है, अब उसके विषयमें श्रवण करो ॥ 33 ॥ प्रेमसे आकृष्ट महाप्रभुके 'नित्य-आविर्भाव'के चार स्थान :— शचीर मन्दिरे, आर नित्यानन्द-नर्त्तने। श्रीवास-कीर्त्तने आर राघव-भवने ॥ 34 ॥ एइ चारि ठाञि, प्रभुर सदा 'आविर्भाव' । प्रेमाविष्ट हय–प्रभुर सहज स्वभाव ॥ 35 ॥ अनुवाद—श्रीशचीमाताके घरके मन्दिरमें, श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्य करनेके स्थानमें, श्रीवास पण्डितके घरपर कीर्त्तनके समयमें और श्रीराघव पण्डितके भवनमें–इन चारों स्थानोंपर महाप्रभुका सदा 'आविर्भाव' होता है। भक्तोंके प्रेमसे आकृष्ट होकर महाप्रभुका आविर्भाव होता है—यह महाप्रभुका सहज-स्वभाव है ॥ 34-35 ॥ कभी-कभी 'आविर्भाव'का दृष्टान्त; प्रद्युम्न अथवा नृसिंह ब्रह्मचारीके वृत्तान्तका वर्णन :— नृसिंहानन्देर आगे आविर्भूत हञा। भोजन करिला, ताहा शुन मन दिया ॥ 36 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीनृसिंहानन्दके समक्ष आविर्भूत

48 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/36-45 ] होकर उनके द्वारा अर्पित भोजनको ग्रहण किया, इस प्रसङ्गको ध्यानपूर्वक श्रवण कीजिये॥ ३६॥ श्रीकान्त सेनकी कथा; महाप्रभुके दर्शनके लिये उनका अकेले श्रीक्षेत्रमें गमन :- शिवानन्देर भागिना श्रीकान्त-सेन नाम। प्रभुर कृपाते तेंहो बड़ भाग्यवान् ॥ ३७॥ एक वत्सर तेंहो प्रथम एकेश्वर। प्रभु देखिबारे आइला उत्कण्ठा अन्तर ॥ ३८ ॥ अनुवाद - श्रीशिवानन्द सेनके भाञ्जे जिनका नाम श्रीकान्त-सेन था, वे महाप्रभुकी कृपा प्राप्त करनेके कारण बड़े सौभाग्यशाली थे। एक वर्ष वे अकेले ही हृदयमें उत्कण्ठाके कारण महाप्रभुके दर्शनोंके लिये श्रीजगन्नाथपुरी गये ॥ ३७-३८ ॥ अनुभाष्य - 'एकेश्वर',—अकेले, सेवकके बिना ॥ ३८ ॥ उनके प्रति महाप्रभुकी कृपा और आदेश :- महाप्रभु तांरे देखि' बड़ कृपा कैला। मास-दुइ तेंहो प्रभुर निकटे रहिला ॥ ३९ ॥ अनुवाद-महाप्रभुने उनको देखकर उनपर बहुत कृपा की। श्रीकान्त-सेन दो मास तक महाप्रभुके पास श्रीजगन्नाथपुरीमें रहे ॥ ३९ ॥ गौड़ीय-भक्तोंको पुरी आनेके लिये निषेध-आज्ञा :- तबे प्रभु ताँरे आज्ञा कैला गौड़े याइते। भक्तगणे निषेधिला इहाँके आसिते ॥ ४० ॥ पौषमासमें स्वयं गौड़देशमें जानेका निर्णय :- “ए-वत्सर ताँहा आमि याइमु आपने। ताँहाइ मिलिमु सब अद्वैतादि सने ॥ ४१ ॥ शिवानन्दे कहिह,—आमि एइ पौषमासे। आचम्बिते अवश्य आमि याइब ताँर पाशे ॥ ४२ ॥ जगदानन्द हय ताँहा, तेंहो भिक्षा दिबे। सबारे कहिह,—ए वत्सर केह ना आसिबे ॥” ४३ ॥ अनुवाद-जब श्रीकान्त सेन गौड़देशमें लौटने लगे, तब महाप्रभुने उनके माध्यमसे गौड़देशके भक्तोंको उस वर्ष श्रीजगन्नाथपुरी आनेके लिये निषेध करते हुए कहा,—“इस वर्ष मैं स्वयं गौड़देश आऊँगा, मैं वहींपर ही श्रीअद्वैतादि सभी भक्तोंसे मिलूँगा। शिवानन्द सेनसे कहना कि मैं इस पौष-मासमें अवश्य अचानक ही उनके पास आऊँगा। जगदानन्द पण्डित वहींपर हैं, वे मेरे लिये भोजनकी व्यवस्था कर देंगे। तुम सभीसे कहना कि इस वर्ष यहाँ कोई भी नहीं आये॥” ४०-४३ ॥ अनुभाष्य - 'इँहाँके',—इस स्थानपर, श्रीपुरुषोत्तम-क्षेत्रमें। 'ताँहा',—गौड़देशमें ॥ ४०-४१ ॥ गौड़देशमें आकर श्रीकान्तके द्वारा महाप्रभुकी आज्ञाको बतलाना, भक्तोंका आनन्दपूर्वक गौड़में ही रहना :- श्रीकान्त आसिया गौड़े सन्देश कहिल। शुनि' भक्तगण-मने आनन्द हइल ॥ ४४ ॥ अनुवाद-श्रीकान्तने गौड़देशमें आकर सभी भक्तोंको महाप्रभुका सन्देश सुनाया। महाप्रभुके सन्देशको सुनकर भक्तोंके मनमें बहुत आनन्द हुआ ॥ ४४ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'सन्देश',—संवाद ॥ ४४ ॥ अनुभाष्य - 'सन्देश',—अगले पौषमासमें महाप्रभुके गौड़देशमें आगमनकी वार्त्ता ॥ ४४ ॥ श्रीशिवानन्द और श्रीजगदानन्दके द्वारा प्रतिदिन महाप्रभुकी प्रतीक्षा :- चलितेछिला आचार्य, रहिला स्थिर हञा। शिवानन्द, जगदानन्द रहे प्रत्याशा करिया ॥ ४५ ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य अन्य भक्तोंके साथ श्रीजगन्नाथ पुरी जानेके लिये तत्पर हो रहे थे, परन्तु वे महाप्रभुके सन्देशको सुनकर रुक गये। श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित भी प्रतिदिन महाप्रभुके आनेकी प्रतीक्षामें वहीं रह गये ॥ ४५ ॥ अनुभाष्य - 'आचार्य',—श्रीअद्वैत प्रभु ॥ ४५ ॥

[ 2/46-57 दूसरा अध्याय 49 पौषमासे आइल दुँहे सामग्री करिया। सन्ध्या-पर्यन्त रहे अपेक्षा करिया ॥ 46 ॥ अनुवाद—जब पौष मास आ गया, तब श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित, दोनों प्रतिदिन महाप्रभुके अभिवादन और सेवाके लिये सभी प्रकारकी सामग्री प्रस्तुत करके सन्ध्या तक उनकी प्रतीक्षा करते थे ॥ 46 ॥ महाप्रभुके नहीं आनेके कारण दोनोंका दुःख :- एइमत मास गेल, गोसाञि ना आइला। जगदानन्द, शिवानन्द दुःखित हइला ॥ 47 ॥ अनुवाद—इस प्रकार धीरे-धीरे पौष-मास समाप्त होनेको आया, किन्तु महाप्रभु नहीं आये। श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीशिवानन्द सेन बहुत दुःखी हुए ॥ 47 ॥ अनुभाष्य—'गोसाञि,'—महाप्रभु ॥ 47 ॥ श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीका आगमन तथा उनके दुःखके कारणकी जिज्ञासा :- आचम्बिते नृसिंहानन्द ताँहाइ आइला। दुँहे ताँरे मिलि' तबे स्थाने बसाइला ॥ 48 ॥ दुँहे दुःखी भावे देखि' कहे नृसिंहानन्द। “तोमा दुँहाकारे केने देखि निरानन्द ? ? ” 49 ॥ अनुवाद—अचानक ही श्रीनृसिंहानन्द (श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी) वहाँ आ गये। वे दोनों (श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित) उनसे मिले और उन्हें एक आसनपर बैठाया। उन दोनोंको दुःखी देखकर श्रीनृसिंहानन्दने पूछा, — “मैं आप दोनोंको दुःखी क्यों देख रहा हूँ?” 48-49 ॥ श्रीशिवानन्दके द्वारा सम्पूर्ण वृत्तान्त कहना :- तबे शिवानन्द ताँरे सकल कहिला। “आसिते आज्ञा दिया प्रभु केने ना आइला ॥” 50 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने उन्हें सारा वृत्तान्त सुनानेके पश्चात् कहा,—“आनेका सन्देश देकर भी महाप्रभु क्यों नहीं आये ?” 50 ॥ श्रीप्रद्युम्नके द्वारा आश्वासन तथा प्रबोध-दान :- शुनि' ब्रह्मचारी कहे, — “करह सन्तोषे। आमि त' आनिब ताँरे तृतीय दिवसे ॥” 51 ॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने कहा, — “आप थोड़ा शान्त रहिये। मैं महाप्रभुको आजसे तीसरे दिन ही यहाँ ले आऊँगा ॥” 51 ॥ श्रीशिवानन्द और श्रीजगदानन्द, दोनोंको विश्वास :- ताँहार प्रभाव-प्रेम जाने दुइजने। आनिबे प्रभुरे एबे निश्चय कैला मने ॥ 52 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीके प्रभाव एवं महाप्रभुके प्रति उनके प्रेमके विषयमें भली-भाँति जानते थे। इसलिये उनके मनमें यह विश्वास हो गया कि ये महाप्रभुको अवश्य ही यहाँ ले आयेंगे ॥ 52 ॥ 'नृसिंहानन्द'-नामकी प्राप्तिका कारण :- 'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' — ताँर निज-नाम। 'नृसिंहानन्द' - नाम ताँर कैला गौरधाम ॥ 53 ॥ अनुवाद—उनका वास्तविक नाम तो 'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' था। श्रीगौरसुन्दरने उनको 'नृसिंहानन्द' नाम प्रदान किया था ॥ 53 ॥ महाप्रभुको प्रकट करनेकी प्रद्युम्न ब्रह्मचारीकी प्रतिज्ञा और भोग पकानेका प्रयास :- दुइदिन ध्यान करि' शिवानन्देरे कहिल। “पाणिहाटि-ग्रामे आमि प्रभुरे आनिल ॥ 54 ॥ कालि मध्याह्ने तँहो आसिबेन तोमार घरे। पाक-सामग्री आनह, आमि भिक्षा दिमु ताँरे ॥ 55 ॥ तबे ताँरे एथा आमि आनिब सत्वर। निश्चय कहिलाङ, किछु सन्देह ना कर ॥ 56 ॥ ये चाहिये, ताहा कर हुआ तत्पर। अति त्वराय करिब पाक, शुन अतःपर ॥ 57 ॥

50 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/54-65 ] पाक-सामग्री आनह, आमि याहा चाइ।” ये मागिल, शिवानन्द आनि' दिला ताइ ॥ 58 ॥ अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने दो दिन तक ध्यान करनेके बाद श्रीशिवानन्द सेनसे कहा, —“मैं महाप्रभुको पाणिहाटि-ग्राम तक ले आया हूँ। कल दोपहर तक वे आपके घरपर आ जायेंगे। आप रसोई बनानेकी समस्त सामग्री लाकर मुझे दो, मैं स्वयं उन्हें भोजन बनाकर खिलाऊँगा। तभी मैं उन्हें यहाँ शीघ्रतासे ले आऊँगा। मेरी बातपर पूर्ण विश्वास रखो, मैं सत्य कह रहा हूँ, कुछ सन्देह मत करना। मैं जो कुछ भी चाहता हूँ, आप शीघ्रतासे उसे लाकर दे दो, क्योंकि मैं अभी भोजन बनाना प्रारम्भ करना चाहता हूँ। मुझे जो भी भोजनकी सामग्री चाहिये, आप उसे लेकर आइये।” श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने जो कुछ माँगा, श्रीशिवानन्द सेनने वह लाकर दे दिया ॥ 54-58 ॥ प्रद्युम्नका रसोई बनाना और महाप्रभु, श्रीजगन्नाथ एवं अपने इष्टदेव श्रीनृसिंह, प्रत्येकके लिये तीन अलग-अलग नैवेद्य-भोग सजाना :- प्रातःकाल हैते पाक करिला अपार। नाना सूप, व्यञ्जन, पिठा, क्षीर-उपहार ॥ 59 ॥ अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने प्रातःकालसे प्रारम्भकर बहुतसे पकवान जैसे अनेक प्रकारकी रसेदार सब्जियाँ, व्यञ्जन, पीठा-पाना और खीर तथा दूधसे अनेक मिठाइयाँ बनायीं ॥ 59 ॥ जगन्नाथेर भिन्न भोग पृथक् बाड़िल। चैतन्यप्रभुर लागि' आर भोग कैल ॥ 60 ॥ इष्टदेव नृसिंह लागि' पृथक् बाड़िल। तिनजने समर्पिया बाहिरे ध्यान कैल ॥ 61 ॥ अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने श्रीजगन्नाथदेव और महाप्रभुके प्रिय व्यञ्जनोंको पृथक्-पृथक् करके उन्हें भोग अर्पित किया। फिर अपने इष्टदेव श्रीनृसिंहदेवके लिये बनाये गये भोगको भी पृथक् सजाया। इस प्रकार उन्होंने तीन भाग करके भोग निवेदन किया। तब वे बाहर बैठकर ध्यान करने लगे ॥ 60-61 ॥ ब्रह्मचारीके ध्यानमें 'आविर्भूत' महाप्रभुके द्वारा तीनों नैवेद्योंको खाना :- देखे, शीघ्र आसि' बसिला चैतन्य-गोसाञि। तिन भोग खाइला, किछु अवशिष्ट नाइ ॥ 62 ॥ अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने ध्यानमें देखा कि महाप्रभु शीघ्रतासे आकर बैठ गये और तीनों भोग खा गये, उन्होंने कुछ भी नहीं छोड़ा ॥ 62 ॥ ऐसा देखकर प्रद्युम्नके हृदयमें आनन्द, बाहरमें दुःखका आभास :- आनन्दे विह्वल प्रद्युम्न, पड़े अश्रुधार। “हाहा किबा कर” बलि' करये फुत्कार ॥ 63 ॥ अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुको सम्पूर्ण भोग ग्रहण करते देखकर श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी आनन्दसे विह्वल हो रहे थे और उनके नेत्रोंसे अश्रुओंकी धारा प्रवाहित हो रही थी, तथापि वे बाहरसे दुःख प्रकट करते हुए कह रहे थे,—“हाय! हाय! [महाप्रभु!] आप यह क्या कर रहे हैं?” 63 ॥ महाप्रभुके प्रति प्रद्युम्नका आरोप; अपने इष्टदेव श्रीनृसिंहके प्रति निष्ठा :- “जगन्नाथे-तोमाय ऐक्य, खाओ ताँर भोग। नृसिंहेर भोग केने कर उपयोग ॥ 64 ॥ नृसिंहेर जानि हैल आजि उपवास। ठाकुर उपवासी रहे, जिये कैछे दास?? 65 ॥ अनुवाद—“हे महाप्रभु! आप और श्रीजगन्नाथ तो एक ही हैं, इसलिये आप यदि उनका भोग खा लेते हैं, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु आप श्रीनृसिंह भगवान्का भोग क्यों ग्रहण कर रहे हो? मैं देख रहा

[ 2/64-74 दूसरा अध्याय 51 हूँ कि आज तो श्रीनृसिंहदेवका उपवास हो गया। यदि ठाकुरजी ही उपवासी रहेंगे, तब फिर दास किस प्रकारसे जीवित रहेगा?” 64-65 ॥ भोजन देखि' यद्यपि ताँर हृदये उल्लास। नृसिंह लक्ष्य करि' बाह्ये किछु करे दुःखाभास ॥ 66 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीनृसिंहानन्दके हृदयमें महाप्रभुको समस्त भोग खाते देखकर उल्लास हो रहा था, किन्तु श्रीनृसिंहदेवको लक्ष्य करके वे बाहरसे कुछ दुःखको प्रकट कर रहे थे॥ 66 ॥ महाप्रभुके द्वारा तीनों पात्रोंके भोजनकी लीलाके द्वारा श्रीप्रद्युम्नको समस्त विष्णुतत्त्वोंके साथ अपने अभेद अथवा एक होनेका प्रदर्शन :- स्वयं भगवान् कृष्णचैतन्य-गोसाञि। जगन्नाथ-नृसिंह-सह किछु भेद नाइ ॥ 67 ॥ इहा जानिवारे प्रद्युम्नेर गूढ़ हैल मन। ताहा देखाइला प्रभु करिया भोजन ॥ 68 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य-गोसाईं स्वयं भगवान् हैं। इसलिये श्रीजगन्नाथदेव एवं श्रीनृसिंहदेवके साथ उनका कोई भेद नहीं है, इस बातको समझनेके लिये श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीके मनमें प्रबल इच्छा थी। महाप्रभुने इस तथ्यको समझानेके लिये सम्पूर्ण भोजनको ग्रहण किया॥ 67-68 ॥ भोजनके अन्तमें महाप्रभुका पाणिहाटी स्थित राघव-भवनमें नित्य-अवस्थान हेतु गमन :- भोजन करिया प्रभु गेला पाणिहाटि। सन्तोष पाइला देखि' व्यञ्जन-परिपाटी ॥ 69 ॥ अनुवाद—भोजन करनेके बाद महाप्रभु पाणिहाटी चले गये। पाणिहाटीमें महाप्रभु श्रीराघव पण्डितके घरमें बनायी गयी व्यञ्जनकी परिपाटीको देखकर बहुत सन्तुष्ट हुए॥ 69 ॥ श्रीशिवानन्दकी ब्रह्मचारीके दुःखी होनेके कारणकी जिज्ञासा और ब्रह्मचारीके द्वारा सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन :- शिवानन्द कहे,—“केने करह फुत्कार?” ब्रह्मचारी कहे,—“देख, प्रभुर व्यवहार ॥ 70 ॥ तिनजनार भोग तेंहो अकेला खाइला। जगन्नाथ-नृसिंह उपवासी हइला ॥” 71 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीसे कहा,—“आप किसलिये दुःख प्रकाश कर रहे हैं?” श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने उत्तर दिया,—“महाप्रभुके व्यवहारको तो देखो, वे तीन प्रभुओंके भोगको अकेले ही खा गये। इसलिये श्रीजगन्नाथदेव तथा श्रीनृसिंहदेव उपवासी रह गये॥” 70-71 ॥ श्रीशिवानन्दका सन्देह :- शुनि' शिवानन्देर चित्ते हइल संशय। किवा प्रेमावेशे कहे, किवा सत्य हय ॥ 72 ॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीशिवानन्द सेनके चित्तमें संशय हुआ कि श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी यह बात प्रेमके आवेशमें कह रहे हैं अथवा यह बात सत्य है॥ 72 ॥ श्रीशिवानन्दको श्रीनृसिंहके लिये भोगको लानेका आदेश :- तबे शिवानन्दे किछु कहे ब्रह्मचारी। “सामग्री आनह नृसिंहरे, पुनः पाक करि ॥” 73 ॥ अनुवाद—तब श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने श्रीशिवानन्द सेनसे कहा,—“आप श्रीनृसिंहदेवके लिये फिरसे भोग-सामग्री लाकर दीजिये, मैं पुनः रसोई बनाऊँगा॥” 73 ॥ श्रीनृसिंहको पुनः भोग समर्पण :- तबे शिवानन्द भोग-सामग्री आनिला। पाक करि' नृसिंहरे भोग लागाइला ॥ 74 ॥ अनुवाद—तब श्रीशिवानन्द सेन पुनः भोग-सामग्री लेकर आये तथा श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने पकवान बनाकर श्रीनृसिंहदेवको भोग लगाया॥ 74 ॥