श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
178 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/103-112 ] देख रहे थे। इसे केवल श्रीनित्यानन्द प्रभु ही देख पा रहे थे, अन्य कोई भी नहीं॥ 103 ॥ महाप्रभुके नृत्यकी ही श्रीनित्यानन्दके अनुपम नृत्यके साथ एकमात्र तुलना :- नित्यानन्देर नृत्य, —येन ताँहार नर्त्तने। उपमा दिवार नाहि ए-तिन भुवने ॥ 104 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके नृत्यके समान ही श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्यकी उपमा देनेके लिये त्रिभुवनमें कुछ भी नहीं है ॥ 104 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीनित्यानन्दप्रभुके नृत्यके माधुर्यका दर्शन :- नृत्येर माधुरी केबा वर्णिवारे पारे। महाप्रभु आइसे सेइ नृत्य देखिबारे ॥ 105 ॥ अनुवाद—जिसे देखनेके लिये स्वयं महाप्रभु आते हैं, ऐसे श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्यकी माधुरीका कौन वर्णन कर सकता है ॥ 105 ॥ नृत्यके कारण विश्राम करनेके बाद श्रीनिताइका अपने भक्तों सहित श्रीराघवके घरमें रात्रि-भोजन :- नृत्य करि' प्रभु यबे विश्राम करिला। भोजनेर लागि' पण्डित निवेदन कैला ॥ 106 ॥ अनुवाद—नृत्य करनेके पश्चात् जब श्रीनित्यानन्द प्रभुने विश्राम कर लिया, तब श्रीराघव पण्डितने आकर उन्हें भोजन करनेके लिये निवेदन किया ॥ 106 ॥ श्रीनिताइके दायीं ओर महाप्रभुके भोजन करनेके लिये आसन :- भोजने बसिला प्रभु निजगण लञा। महाप्रभुर आसन डाहिने पातिया ॥ 107 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु अपने गणोंके साथ भोजन करनेके लिये बैठे और उन्होंने अपनी दायीं ओर महाप्रभुके लिये आसन बिछाया ॥ 107 ॥ महाप्रभुको उसपर बैठे देखकर श्रीराघवको हर्ष :- महाप्रभु आसि' सेइ आसने बसिल। देखि' राघवरे मने आनन्द बाड़िल ॥ 108 ॥ अनुवाद—महाप्रभु आकर उस आसनपर बैठ गये। यह देखकर श्रीराघव पण्डितके मनमें आनन्द बढ़ने लगा ॥ 108 ॥ सर्वप्रथम दोनों प्रभु, बादमें भक्तोंके द्वारा प्रसाद-सेवन :- दुइभाइ-आगे प्रसाद आनिया धरिला। सकल वैष्णवे पिछे परिवेशान कैला ॥ 109 ॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितने दोनों भाइयोंके सामने प्रसाद लाकर सजाया और बादमें उन्होंने समस्त वैष्णवोंको भी प्रसाद परोसा ॥ 109 ॥ श्रीराघवके घरमें प्रसादकी विचित्रताका वर्णन :- नानाप्रकार पिठा, पायस, दिव्य शाल्य-अन्न। अमृत निन्दये ऐछे विविध व्यञ्जन ॥ 110 ॥ अनुवाद—उस प्रसादमें अनेक प्रकारके पीठा-पाना, खीर, दिव्य शाल्य-चावलादि अनेक प्रकारके व्यञ्जन अमृतके स्वादको भी पराभूत करनेवाले थे ॥ 110 ॥ श्रीराघवके घरमें प्रस्तुत नैवेद्यादि-महाप्रभुको नित्यप्रिय :- राघव-ठाकुरेर प्रसाद अमृतेर सार। महाप्रभु याहा खाइते आइसे बार बार ॥ 111 ॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितके द्वारा निवेदित प्रसाद अमृतका सार स्वरूप होता था। उसे खानेके लिये महाप्रभु बारम्बार उनके घरपर आते थे ॥ 111 ॥ महाप्रभुके उद्देश्यसे प्रतिदिन पृथक् भोग और महाप्रभुके द्वारा उसको ग्रहण करना :- पाक करि' राघव यबे भोग लागाय। महाप्रभुर लागि' भोग पृथक् बाड़य ॥ 112 ॥ अनुवाद—रसोई बनानेके बाद जब श्रीराघव पण्डित भोग लगाते, तो वे महाप्रभुके लिये अलगसे भोग लगाते थे ॥ 112 ॥
[ 6/113-121 छठा अध्याय 179 प्रतिदिन महाप्रभु करेन भोजन। मध्ये मध्ये प्रभु ताँरे देन दरशन ॥ 113 ॥ अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन श्रीराघव पण्डितके घरपर भोजन करते और बीच-बीचमें उनको अपने दर्शन देते॥ 113 ॥ श्रीराघवके द्वारा दोनों प्रभुओंके भोजनका सम्पादन :— दुइ भाइरे राघव आनि’ परिवेशे। यत्न करि’ खाओयाय, ना रहे अवशेषे ॥ 114 ॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डित दोनों भाइयोंको (महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको) बुलाकर परोसते और बहुत प्रीतिसे उन्हें खिलाते। इसलिये दोनों भाई सब कुछ खा लेते और कुछ भी अवशेष नहीं बचता॥ 114 ॥ दोनों प्रभुओंके द्वारा सम्पूर्णरूपसे बहुत प्रकारके विचित्र प्रसादका सेवन :— कत उपहार आने, हेन नाहि जानि। राघवेर घरे रान्धे राधा-ठाकुराणी ॥ 115 ॥ अनुवाद—वे कितने प्रकारके व्यञ्जन-पकवानादि लेकर आते उसे कोई भी नहीं जान सकता। वास्तवमें श्रीराघव पण्डितके घरपर स्वयं श्रीराधा-ठाकुराणी ही भोजन पकाती थीं॥ 115 ॥ श्रीराघवके घरमें स्वयं श्रीराधिकाका श्रीकृष्णके उद्देश्यसे अमृतको भी निन्दित करनेवाले भोजन बनाना :— दुर्वासार ठाञि तैं हो पाञाछेन वर। अमृत हइते पाक ताँर अधिक मधुर ॥ 116 ॥ अनुवाद—श्रीराधा-ठाकुराणीको दुर्वासा ऋषिसे वरदान मिला था कि उनके द्वारा बनायी गयी भोजन सामग्री अमृतसे भी अधिक मधुर होगी॥ 116 ॥ दोनों प्रभुओंको उनके भोजनको खानेमें आनन्द :— सुगन्धि सुन्दर प्रसाद—माधुर्येर सार। दुइ भाइ ताहा खाञा सन्तोष अपार ॥ 117 ॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितके द्वारा परोसा गया सुगन्धित सुन्दर प्रसाद माधुर्यका सार था, दोनों भाई उसे खाकर अत्यन्त सन्तुष्ट होते ॥ 117 ॥ सभी भक्तोंका बैठना, श्रीरघुनाथको भोजनके लिये अनुरोध, श्रीरघुनाथके द्वारा बादमें बैठना स्वीकार :— भोजने बसिते रघुनाथे कहे सर्वजन। पण्डित कहे,—“इँह पाछे करिबे भोजन ॥” 118 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने श्रीरघुनाथको भी बैठकर भोजन करनेके लिये कहा। किन्तु श्रीराघव पण्डितने उनसे कहा,—“यह बादमें भोजन करेगा॥” 118 ॥ भक्तोंका गले तक भरकर भोजन और आचमन :— भक्तगण आकण्ठ भरिया करिल भोजन। ‘हरि’ ध्वनि करि’ उठि’ कैला आचमन ॥ 119 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने गले तक भरकर भोजन किया तथा ‘हरि’ ध्वनि करते हुए उठकर आचमन किया॥ 119 ॥ आचमनके बाद दोनों प्रभुओंको माला तथा चन्दन पहनाना :— भोजन करि’ दुइ भाइ कैला आचमन। राघव आनि’ पराइला माल्य-चन्दन ॥ 120 ॥ अनुवाद—दोनों भाइयोंने भी भोजन करके आचमन किया। श्रीराघव पण्डितने लाकर उन दोनोंको माला पहनायी और चन्दन लगाया॥ 120 ॥ दोनों प्रभुओंके द्वारा ताम्बूल-खाना; सभीको अवशेषकी प्राप्ति :— बिड़ा खाओयाइला, कैला चरण-वन्दन। भक्तगणे दिला बिड़ा, माल्य-चन्दन ॥ 121 ॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितने दोनों भाइयोंको ताम्बूल खिलाया और उनके चरणोंकी वन्दना की। उन्होंने उपस्थित भक्तोंको भी ताम्बूल तथा माला-चन्दन आदि प्रदान किया॥ 121 ॥ अनुभाष्य—‘बिड़ा’,—सजाया हुआ ताम्बूल, पानका बीड़ा॥ 121 ॥
180 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/122-133 ] स्नेहकृपामय श्रीराघवके द्वारा श्रीरघुनाथको दोनों प्रभुओंका उच्छिष्ट-पात्र प्रदान :- राघवेर कृपा रघुनाथेर उपरे। दुइ भाइएर अवशिष्ट पात्र दिला ताँरे॥ 122॥ महाप्रभुके उच्छिष्टके सेवनसे ही श्रीरघुनाथका गृहत्याग-सामर्थ्य :- कहिला,—“चैतन्य-प्रभु करियाछेन भोजन। ताँर शेष पाइले, तोमार खण्डिबे बन्धन॥” 123॥ अनुवाद—स्नेहकृपामय श्रीराघव पण्डितने श्रीरघुनाथको दोनों भाइयोंका उच्छिष्ट पात्र देकर कहा,—“श्रीचैतन्य महाप्रभुने भोजन किया है, उनका उच्छिष्ट पानेसे तुम्हारा संसारका बन्धन कट जायेगा॥” 122-123॥ भगवान्के अवस्थान और स्वभावका निर्णय :- भक्त-चित्ते भक्त-गृहे सदा अवस्थान। कभु गुप्त, कभु व्यक्त, स्वतन्त्र भगवान्॥ 124॥ अनुवाद—भगवान् भक्तके चित्तमें अथवा भक्तके घरमें सदा वास करते हैं। कभी यह गुप्तरूपसे और कभी व्यक्तरूपसे होता है, क्योंकि भगवान् स्वतन्त्र हैं॥ 124॥ महाप्रभुके विभु होनेमें संशय करनेवालोंका विनाश :- सर्वत्र 'व्यापक' प्रभुर सदा सर्वत्र वास। इहाते संशय यार, सेइ याय नाश॥ 125॥ अनुवाद—सर्वत्र व्यापक महाप्रभुका सदा सभी स्थानोंपर वास होता है। इसमें जिसे संशय होता है, उसका सर्वनाश हो जाता है॥ 125॥ अगले दिन प्रातः स्नानके बाद वृक्षके नीचे बैठे श्रीनिताइके निकट श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीचैतन्यचरणकी प्राप्तिके लिये निवेदन :- प्राते नित्यानन्द गङ्गास्नान करिया। सेइ वृक्षमूले बसिला निजगण लञा॥ 126॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु प्रातःकालमें गङ्गास्नान करके अपने गणोंके साथ उसी वृक्षके नीचे बैठ गये॥ 126॥ रघुनाथ आसि' कैला चरण-वन्दन। राघवपण्डित-द्वारा कैला निवेदन॥ 127॥ “अधम पामर मुइ हीन जीवाधम! मोर इच्छा हय—पाङ चैतन्यचरण॥ 128॥ वामन हञा चान्द धरिबारे चाय। अनेक यत्न कैनु, ताते कभु सिद्ध नय॥ 129॥ यतबार पलाइ आमि गृहादि छाड़िया। पिता, माता—दुइ मोरे राखये बान्धिया॥ 130॥ श्रीनित्यानन्द (गुरु)-कृपाके बिना श्रीचैतन्यपद- प्राप्ति असम्भव, उनकी कृपासे अयोग्यमें भी उनकी प्राप्तिकी योग्यता :- तोमार कृपा बिना केह 'चैतन्य' ना पाय। तुमि कृपा कैले ताँरे अधमेह पाय॥ 131॥ श्रीनित्यानन्द (गुरु)के चरणोंमें श्रीचैतन्यचरण प्राप्त करनेके लिये कृपा-भिक्षाकी कर्त्तव्यता :- अयोग्य मुइ निवेदन करिते करि भय। मोरे 'चैतन्य' देह' गोसाञि हञा सदय॥ 132॥ मोर माथे पद धरि' करह प्रसाद। 'निर्विघ्ने चैतन्य पाङ'—कर आशीर्वाद॥” 133॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथने आकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंकी वन्दना की और उन्होंने श्रीराघव पण्डितके माध्यमसे श्रीनित्यानन्द प्रभुको निवेदन किया,—“मैं अधम, पापी, निराश्रय और अधम जीव हूँ। मेरी इच्छा होती है कि मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त करूँ। बौने व्यक्तिकी चन्द्रको पकड़नेकी इच्छा करने जैसे मैंने भी अनेक प्रयत्न किये, किन्तु उसमें कभी भी सफल नहीं हो पाया। मैंने जितनी बार भी घर आदि छोड़कर भागनेका प्रयास किया, मेरे माता-पिता—दोनोंने मुझे पकड़कर बाँधकर रख दिया। आपकी कृपाके बिना किसीको भी श्रीचैतन्य महाप्रभुकी
[ 6/127-143 छठा अध्याय 181 प्राप्ति नहीं होती। किन्तु यदि आप कृपा करें तो अधम व्यक्तिको भी महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त हो जाता है। मैं अयोग्य हूँ, इसलिये आपसे निवेदन करनेमें भी भय करता हूँ कि हे गोसाईं! आप मेरे प्रति विशेषरूपसे दयावान् होकर मुझे श्रीचैतन्यदेवके चरणकमलोंमें आश्रय प्रदान कीजिये। मेरे सिरपर अपने चरणकमल रखकर मुझपर कृपा कीजिये कि मैं निर्विघ्न रूपसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त करूँ॥” 127-133॥ श्रीरघुनाथकी श्रीचैतन्यचरण प्राप्त करनेकी व्याकुलताको देखकर उन्हें कृपाशीर्वाद प्रदान करनेके लिये श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा शुद्धभक्तोंके निकट आवेदन :- शुनि' हासि कहे प्रभु सब भक्तगणे। “इँहार विषयसुख—इन्द्रसुख-समे॥ 134॥ चैतन्य-कृपाते से नाहि भाय मने। सबे आशीर्वाद कर—पाउक चैतन्य-चरणे॥ 135॥ श्रीकृष्ण-चरणकमलोंकी गन्धकी महिमा और आकर्षण-शक्ति :- कृष्णपादपद्म-गन्ध येइ जन पाय। ब्रह्मलोक-आदि सुख ताँरे नाहि भाय॥” 136॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथके निवेदनको सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभु मुस्कुराये और उन्होंने सभी भक्तोंसे कहा,—“रघुनाथदासके पास इन्द्रके समान सांसारिक विषय सुख हैं, किन्तु श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपासे वे सब सुख इसके मनको नहीं भाते। इसलिये आप सभी इसे आशीर्वाद दीजिये कि इसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त हो। जिन्हें श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सुगन्धकी प्राप्ति होती है, उन्हें ब्रह्मलोकादिके सुख भी नहीं भाते॥” 134-136॥ श्रीमद्भागवत (5/14/43) में— यो दुस्त्यजान् दारसुतान् सुहृद्राज्यं हृदिस्पृशः। जहौ युवैव मलवदुत्तमःश्लोकलालसः॥ 137॥ अनुवाद—भरत महाराजने उत्तमःश्लोक श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी लालसासे युवावस्थामें ही हृदयग्राहिणी पत्नी, पुत्र, सुहृत् और राज्यादिका मलकी भाँति परित्याग किया था;—यही जातभाव व्यक्तिकी विरक्तिका लक्षण है॥ 137॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 23/24 संख्या देखें॥ 137॥ श्रीरघुनाथके सिरपर चरण रखकर श्रीनित्यानन्दप्रभुके द्वारा उनकी महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्तिका वर्णन :- तबे रघुनाथे प्रभु निकटे बोलाइला। ताँर माथे पद धरि' कहिते लागिला॥ 138॥ “तुमि कराइला एइ पुलिन-भोजन। तोमाय कृपा करि' गौर कैला आगमन॥ 139॥ कृपा करि' कैला चिड़ा-दुग्ध भोजन। नृत्य देखि' रात्र्ये कैला प्रसाद-भक्षण॥ 140॥ श्रीरघुनाथके प्रति कृपापूर्वक श्रीगौरका आविर्भाव और भोजनके फलसे श्रीरघुनाथका विघ्न-नाश :- तोमा उद्धारिते गौर आइला आपने। छुटिल तोमार यत विघ्नादि-बन्धने॥ 141॥ श्रीनित्यानन्द प्रभुकी भविष्यवाणी :- स्वरूपेर स्थाने तोमा करिबे समर्पणे। 'अन्तरङ्ग' भृत्य बलि' राखिबे चरणे॥ 142॥ निर्विघ्न श्रीचैतन्यचरण प्राप्तिका आशीर्वाद प्रदान :- निश्चिन्त हञा याह आपन-भवन। अचिरे निर्विघ्ने पाबे चैतन्य-चरण॥” 143॥ अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीरघुनाथदासको अपने निकट बुलाया और उनके सिरपर अपने चरणकमल रखकर उनसे कहने लगे,—“तुमने जो यह पुलिन-भोजन करवाया, श्रीगौरसुन्दर यहाँ तुम्हारे ऊपर कृपा प्रदर्शित करनेके लिये आये थे। श्रीगौरसुन्दरने तुमपर कृपा करके दूध-चिड़वेका भोजन भी किया। रात्रिके समयमें भक्तोंके नृत्यको देखकर उन्होंने प्रसाद भी ग्रहण किया। श्रीगौरसुन्दर स्वयं तुम्हारा उद्धार
182 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/138-152 ] करनेके लिये आये थे, अब समझ लो कि तुम्हारी जो भी विघ्न-बाधाएँ थीं, वे सब दूर हो गयी हैं। महाप्रभु तुम्हें स्वरूप दामोदरको समर्पित कर देंगे और तुम्हें अपना अन्तरङ्ग सेवक कहकर अपने चरणकमलोंमें स्थान देंगे। तुम निश्चिन्त होकर अपने घर लौट जाओ। अतिशीघ्र निर्विघ्न ही तुम्हें श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंके आश्रयकी प्राप्ति होगी॥” 138-143॥ भक्तोंके द्वारा श्रीरघुनाथको आशीर्वाद दिलवाना; श्रीरघुनाथके द्वारा भक्तोंके चरणोंकी वन्दना :— सब भक्तद्वारे ताँरे आशीर्वाद कराइला। ताँ-सबार चरण रघुनाथ वन्दिला॥ 144॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने समस्त भक्तोंके द्वारा श्रीरघुनाथदासको आशीर्वाद दिलवाया और श्रीरघुनाथदासने भी समस्त भक्तोंके चरणोंकी वन्दना की॥ 144॥ श्रीराघवके साथ गुप्त स्थानपर परामर्श :— प्रभु-आज्ञा लञा वैष्णवेर आज्ञा लइला। राघव-सहिते निभृते युक्ति करिला॥ 145॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे आज्ञा लेनेके पश्चात् उपस्थित समस्त वैष्णवोंसे आज्ञा ली तथा उन्होंने श्रीराघव पण्डितके साथ एकान्तमें कुछ परामर्श किया॥ 145॥ प्रभुके भण्डारीके हाथमें प्रणामीके रूपमें धन-प्रदान :— युक्ति करि' शत मुद्रा, सोणा तोला-साते। निभृते दिला प्रभुर भाण्डारीर हाते॥ 146॥ इस बातको प्रभुके निकट गुप्त रखनेका अनुरोध :— ताँरे निषेधिला,—“प्रभुरे एबे ना कहिबा। निज-घरे याबेन यबे, तबे निवेदिबा॥” 147॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितसे परामर्श करनेके उपरान्त श्रीरघुनाथने श्रीनित्यानन्द प्रभुके भण्डारीको एकान्तमें एक सौ स्वर्णकी मुद्राएँ तथा सात तोला सोना दिया और उनसे कहा,—“आप अभी यह बात श्रीनित्यानन्द प्रभुको मत बतलाना। जब वे अपने वासस्थानपर पहुँच जायेंगे, तभी उन्हें इस विषयमें बतलाना॥” 146-147॥ श्रीराघवके द्वारा श्रीरघुनाथको अपने गृहमें स्थापित विग्रहोंके दर्शन कराके यथोचित सम्मान प्रदान :— तबे राघव पण्डित ताँरे घरे लञा गेला। ठाकुर दर्शन कराञा माला-चन्दन दिला॥ 148॥ वैष्णव-चरण-पूजाके योग्य आदर्शको दिखलाकर श्रीरघुनाथके द्वारा धनी विषयी लोगोंको शिक्षा-प्रदान :— अनेक 'प्रसाद' दिला पथे खाइबारे। तबे पुनः रघुनाथ कहे पण्डितेरे॥ 149॥ “प्रभुर सङ्गे यत महान्त, भृत्य, आश्रित जन। पूजिते चाहिये आमि सबार चरण॥ 150॥ बिश, पञ्चाश, दश, बार, पञ्चदश, द्वय। मुद्रा देह' विचारिया योग्य यत हय॥” 151॥ अनुवाद—तब श्रीराघव पण्डित श्रीरघुनाथदासको अपने घरमें ले गये और उन्हें अपने घरमें सेवित श्रीठाकुरजीके दर्शन करवाकर माला और चन्दन प्रदान किया। उन्होंने श्रीरघुनाथदासको मार्गमें खानेके लिये बहुत प्रसाद दिया। तब श्रीरघुनाथदासने पुनः श्रीराघव पण्डितसे कहा,—“श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ जितने भी महान् भक्त, उनके सेवक और आश्रित जन हैं, मैं उन सबके भी चरणोंकी पूजा करना चाहता हूँ। आप विचार करके उन सबके अधिकारके अनुसार बीस, पन्द्रह, बारह, दस अथवा पाँच—जितनी मुद्राएँ उचित समझें, वे उन्हें दे दीजिये॥” 148-151॥ सभीको अभिनन्दन पत्र और प्रणामी-प्रदान :— सब लेखा करिया राघव-पाश दिला। याँर नामे यत राघव चिठि लेखाइला॥ 152॥ अनुवाद—तब श्रीरघुनाथदासने कुल प्रणामीका लेखा-जोखा करके श्रीराघव पण्डितको प्रदान किया और उसके अनुसार श्रीराघव पण्डितने किस भक्तको
[ 6/152-160 छठा अध्याय 183 कितनी प्रणामी प्रदान करनी चाहिये, इस विषयमें अपना विचार लिखवाया ॥152॥ एकशत मुद्रा आर सोणा तोला-द्वय। पण्डितेर आगे दिल करिया विनय ॥153॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने विनयपूर्वक श्रीराघव पण्डितके सामने एक सौ स्वर्ण मुद्राएँ और दो तोला सोना रख दिया ॥153॥ श्रीनिताइकी कृपा प्राप्त करके श्रीराघवको प्रणाम करनेके बाद श्रीरघुनाथका अपने घरपर आगमन :- ताँर पदधूलि लञा स्वगृहे आइला। नित्यानन्द-कृपा पाञा कृतार्थ मानिला ॥154॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदास श्रीराघव पण्डितके चरणकमलोंकी धूलिको लेकर अपने घरमें लौट आये। श्रीरघुनाथदास श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपाको प्राप्त करके स्वयंको कृतार्थ मानने लगे॥154॥ तबसे घरके बाहरी स्थानपर ही रहना :- सेइ हैते अभ्यन्तरे ना करेन गमन। बाहिरे दुर्गामण्डपे करेन शयन ॥155॥ अनुवाद—उस दिनसे वे अपने घरके भीतर अपने शयन-कक्षमें नहीं जाते थे। अपितु वे घरके बाहर दुर्गा-मण्डपमें ही सो जाते॥155॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अभ्यन्तर',—भीतरवाले कक्ष॥155॥ पहरा देनेवाले रक्षक :- ताँहा जागि' रहे सब रक्षकगण। पलाइते करेन नाना उपाय चिन्तन ॥156॥ अनुवाद—दुर्गा-मण्डपके बाहर रक्षा-कर्मचारी जागकर पहरा देते थे। श्रीरघुनाथदास अपने घरसे भागनेके अनेक उपायोंकी चिन्ता करते॥156॥ महाप्रभुके दर्शनोंके लिये वर्षाकालमें गौड़ीय-भक्तोंकी पुरी-यात्रा :- हेनकाले गौड़देशेर सब भक्तगण। प्रभुरे देखिते नीलाचले करिला गमन ॥157॥ अनुवाद—उस समय गौड़देशके सभी भक्त महाप्रभुके दर्शनोंके लिये नीलाचलकी ओर चल पड़े॥157॥ सबके समक्ष गौड़ीय भक्तोंके साथ जानेसे पकड़े जानेकी आशङ्कासे पुरी यात्राके लिये असमर्थता :- ताँ-सबार सङ्गे रघुनाथ याइते ना पारे। प्रसिद्ध प्रकट सङ्ग, तबहि धरा पड़े॥158॥ अनुवाद—उन सबके साथ तो श्रीरघुनाथदास जा नहीं सकते थे, क्योंकि गौड़ीय भक्तोंकी यात्रा इतनी प्रसिद्ध थी कि वे अनायास ही पकड़े जाते॥158॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गौरभक्त जब नीलाचल जाते, तब उनका सङ्ग सब लोगोंमें प्रसिद्ध और प्रकट हो जाता। उनके साथ जानेसे बादमें पिता पकड़कर ले आयेंगे, इसी भयसे वे उनके साथ नहीं जा सकते थे॥158॥ श्रीरघुनाथके महाप्रभुके साथ मिलनके वृत्तान्तका वर्णन; श्रीरघुनाथके सौभाग्यका दिन :- एइमत चिन्तिते दैवे एकदिने। बाहिरे देवीमण्डपे करियाछेन शयने ॥159॥ रात्रिके अन्तिम-भागमें गुरु श्रीयदुनन्दनके साथ साक्षात्कार :- दण्ड-चारि रात्रि यबे आछे अवशेष। यदुनन्दन-आचार्य तबे करिला प्रवेश ॥160॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथदास घरसे भागनेके उपायकी चिन्ता करते रहते। एक दिन जब वे अपने घरके बाहरमें बने दुर्गामण्डपमें सो रहे थे और रात्रि समाप्त होनेमें चार दण्ड समय रह गया था, उस समय दैवयोगसे श्रीयदुनन्दन आचार्यने उनके घरमें प्रवेश किया॥159-160॥
184 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/161-169 ] श्रीयदुनन्दनका परिचय :- वासुदेव-दत्तेर तैँह हय ‘अनुगृहीत’। रघुनाथेर 'गुरु' तैँह हय 'पुरोहित' ॥ 161 ॥ अद्वैत-आचार्येर तैँह 'शिष्य अन्तरङ्ग'। आचार्य-आज्ञाते माने चैतन्ये 'प्राणधन' ॥ 162 ॥ अनुवाद—श्रीयदुनन्दन आचार्य श्रीवासुदेव-दत्तके कृपापात्र थे और श्रीरघुनाथके गुरु एवं पुरोहित थे। वे श्रीअद्वैताचार्यके अन्तरङ्ग शिष्य थे और वे श्रीअद्वैताचार्यकी आज्ञानुसार श्रीचैतन्य महाप्रभुको अपना प्राणधन मानते थे॥ 161-162 ॥ अनुभाष्य—इस वचनसे भी जाना जाता है कि श्रीअद्वैताचार्यकी आज्ञाको नहीं माननेवाले उनके मतविरोधी पाखण्डियोंके द्वारा स्वयंको उनका अनुगत कहकर परिचय देनेपर भी वे शुद्धभक्तिके प्रतिकूल भावके वशीभूत होकर श्रीमन्महाप्रभुको जीवोंके नित्य उपास्य स्वयं भगवान् 'श्रीकृष्ण' नहीं मानते थे। श्रीयदुनन्दन श्रीमद् अद्वैतप्रभुके श्रीचैतन्यमें प्राण समर्पित करनेवाले अन्तरङ्ग शिष्य होनेके कारण विष्णु और वैष्णवोंमें सामान्य-जाति-बुद्धिके दोषसे कभी भी दूषित नहीं थे। श्रीवासुदेव-दत्त ठाकुरके ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न नहीं होनेपर भी यदुनन्दनाचार्य उन्हें अपने ऊपर कृपा करनेवाले 'गुरु' ही मानते थे॥ 161-162 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीयदुनन्दनको प्रणाम :- अङ्गने आसिया तैँहो यबे दाण्डाइला। रघुनाथ आसि' तबे दण्डवत् कैला ॥ 163 ॥ अनुवाद—जब श्रीयदुनन्दन आचार्य श्रीरघुनाथके घरके आङ्गनमें आकर खड़े हुए, तब श्रीरघुनाथने आकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया॥ 163 ॥ ताँर एक शिष्य ताँर ठाकुरेर सेवा करे। सेवा छाड़ियाछे, तारे साधिबार तरे ॥ 164 ॥ विग्रह-अर्चनका त्यागकर जानेवाले शिष्यको प्रातःकालीनकी आरती करनेके लिये अनुरोध करनेके लिये श्रीरघुनाथको साथमें लेना :- रघुनाथे कहे, — “तारे करह साधन। सेवा येन करे, आर नाहिक ब्राह्मण ॥” 165 ॥ अनुवाद—श्रीयदुनन्दन आचार्यके एक शिष्य उनके ठाकुरजीकी सेवा करते थे, किन्तु वे सेवाको छोड़कर चले गये। श्रीयदुनन्दनाचार्यने उन्हींको समझाने हेतु श्रीरघुनाथसे कहा, — “तुम उसे समझा-बुझाकर सेवा करनेके लिये ले आओ, क्योंकि मेरे पास ठाकुरजीकी सेवा करनेके लिये अन्य कोई ब्राह्मण नहीं है॥” 164-165 ॥ रात्रिके अन्तमें पहरा देनेवालोंकी गहरी नींद :- एत कहि' रघुनाथे लञा चलिला। रक्षक सब शेषरात्रे निद्राय पड़िला ॥ 166 ॥ अनुवाद—श्रीयदुनन्दनाचार्य यह कहकर श्रीरघुनाथदासको अपने साथ लेकर चल दिये। रात्रिका अन्तिम प्रहर होनेके कारण सभी प्रहरी गहरी नींदमें सोये हुए थे॥ 166 ॥ श्रीरघुनाथका गुरुके पीछे-पीछे जाना; दोनोंका आचार्यके घरकी ओर जाना :- आचार्येर घर इहार पूर्व दिशाते। कहिते शुनिते दुँहे चले सेइ पथे ॥ 167 ॥ अनुवाद—श्रीयदुनन्दनाचार्यका घर श्रीरघुनाथदासके घरकी पूर्व दिशामें था। वे दोनों परस्परमें वार्तालाप करते हुए आचार्यके घरकी ओर चल पड़े॥ 167 ॥ मार्गमें बुद्धिमान् श्रीरघुनाथके द्वारा इस सुयोगसे गुरुसे कृष्णभजनके उद्देश्यसे विदायीकी आज्ञा ग्रहण :- अर्द्धपथे रघुनाथ कहे गुरुर चरणे। “आमि सेइ विप्रे साधि' पाठाइमु तोमा-स्थाने ॥ 168 ॥ तुमि घरे याह सुखे—मोरे आज्ञा हय।” एइ छले आज्ञा मागि' करिला निश्चय ॥ 169 ॥
[ 6/168-178 छठा अध्याय 185 श्रीरघुनाथका भागनेका विचार :- “सेवक रक्षक आर কেহ नाहि सङ्गे। पलाइते आमार भाल एइत प्रसङ्गे॥” 170॥ अनुवाद-आधे रास्ते पहुँचनेपर श्रीरघुनाथदासने अपने गुरुदेवके चरणोंमें निवेदन किया,—“मैं उस ब्राह्मणको समझा-बुझाकर आपके घरपर भेज दूँगा। आप निश्चिन्त होकर अपने घर लौट जाइये और मुझे उस ब्राह्मणके पास जानेकी आज्ञा दीजिये।” इस छलसे आज्ञा माँगकर श्रीरघुनाथदासने निश्चय किया,—“आज मेरे साथ कोई भी सेवक और प्रहरी नहीं है, मेरे यहाँसे भाग जानेके लिये बहुत अच्छा अवसर है॥” 168-170॥ अति द्रुतगतिसे भागना :- एत चिन्ति' पूर्वमुखे करिला गमन। उलटिया चाहे पाछे, नाहि कोन जन॥ 171॥ अनुवाद-ऐसा विचार करके वे पूर्वकी ओर चल दिये। वे पीछे मुड़-मुड़कर देखते, किन्तु कोई भी उनके पीछे नहीं आ रहा था॥ 171॥ पकड़े जानेकी आशङ्कासे वन-वनमें कच्चे मार्गपर दौड़ना :- श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-चरण चिन्तिया। पथ छाड़ि' उपपथे यायेन धाञा॥ 172॥ अनुवाद-वे श्रीचैतन्य महाप्रभु तथा श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंका स्मरण करते हुए मुख्य मार्गको छोड़कर उपपथपर दौड़ पड़े॥ 172॥ एकान्तिक रूपसे श्रीचैतन्यचरणोंका ध्यान करते हुए सारे दिनमें बहुत दूरीको पार करना और सन्ध्याके समय गोपके घरमें दूध पीकर थकी हुई देहको कुछ विश्राम :- ग्रामे-ग्रामेर पथ छाड़ि' याय वने वने। कायमनोवाक्ये चिन्ते चैतन्य-चरणे॥ 173॥ अनुवाद-वे ग्रामोंसे होकर जानेवाले मार्गको छोड़कर वनोंसे होकर जा रहे थे। वे काय, मन तथा वाक्यसे श्रीचैतन्यदेवके चरणकमलोंका ही स्मरण कर रहे थे॥ 173॥ पञ्चदश-क्रोश-पथ चलि' गेला एकदिने। सन्ध्याकाले रहिला एक गोपेर बाखाने॥ 174॥ अनुवाद-उन्होंने पन्द्रह कोसका मार्ग एक दिनमें ही तय कर लिया और सन्ध्याके समय एक ग्वालेकी गोशालामें विश्राम किया॥ 174॥ अनुभाष्य—'बाखान',—गोशाला, गोष्ठ॥ 174॥ उपवासी देखि' गोप दुग्ध आनि' दिला। सेइ दुग्ध पान करि' पड़िया रहिला॥ 175॥ अनुवाद-उनको भूखा देखकर ग्वालेने उन्हें दूध लाकर दिया। श्रीरघुनाथदास दूधको पीकर रात्रिमें विश्राम करनेके लिये वहीं लेट गये॥ 175॥ अगले दिन प्रातःकाल श्रीरघुनाथको नहीं देखकर कोलाहल और उन्हें ढूँढ़नेके लिये पिताके द्वारा पुरी जा रहे यात्रियोंके पास पत्र और लोग भेजना :- एथा सेवक रक्षक ताँरे ना देखिया। ताँर गुरुपाशे वार्त्ता पुछिलेन गिया॥ 176॥ अनुवाद-इधर श्रीरघुनाथदासके सेवक और प्रहरी उनको घरमें नहीं देखकर उनके गुरु श्रीयदुनन्दनाचार्यके पास जाकर उनके विषयमें पूछने लगे॥ 176॥ तेँह कहे,—“आज्ञा मागि' गेला निज-घर।” 'पलाइल रघुनाथ'—उठिल कोलाहल॥ 177॥ अनुवाद-श्रीयदुनन्दनाचार्यने कहा,—“रघुनाथ मुझसे आज्ञा लेकर अपने घर चला गया है।” 'रघुनाथ घरसे भाग गया है'—सर्वत्र यह कोलाहल मच गया॥ 177॥ ताँर पिता कहे,—“गौड़ेर भक्तगण। प्रभुस्थाने नीलाचले करिला गमन॥ 178॥
186 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/178–186 ] सेइ-सङ्गे रघुनाथ गेल पलाञा। दश जन याह, तारे आनह धरिया ॥”179 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथके पिताने सेवकों तथा प्रहरियोंसे कहा,—“गौड़ीय भक्त महाप्रभुके पास नीलाचल गये हैं। उनके साथ रघुनाथ भी यहाँसे भाग गया है। दस लोग जाओ और उसे पकड़कर ले आओ॥”178-179 ॥ शिवानन्दे पत्री दिल विनय करिया। ‘आमार पुत्रेरे तुमि दिबा बाहुड़िया॥’180 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासके पिताने श्रीशिवानन्द सेनके नाम विनती करते हुए एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा,—‘आप मेरे पुत्रको अवश्य ही लौटाकर भेज देना॥’180 ॥ अनुभाष्य—‘बाहुड़िया’,—लौटाकर; श्रीशिवानन्द सेन गौड़देशसे यात्रियोंको लेकर नीलाचल जाते थे, इसलिये उनके साथ रघुनाथके होनेका अनुमान करके, रघुनाथको लौटाकर भेजनेके लिये उनके पास एक अनुरोध पत्रके साथ दस लोगोंको भी भेजा॥ 180 ॥ झाँकरा पर्यन्त गेल सेइ दश जने। झाँकराते पाइल गिया वैष्णवेर गणे॥ 181 ॥ अनुवाद—वे दस लोग जब झाँकरा नामक स्थानपर पहुँचे, तब उन्हें वैष्णवोंकी मण्डली मिल गयी॥ 181 ॥ भेजे गये लोगोंके द्वारा श्रीशिवानन्दको पत्र देना और श्रीरघुनाथके विषयमें जिज्ञासा :— पत्री दिया शिवानन्दे वार्त्ता पुछिल। शिवानन्द कहे,—“ताँह एथा ना आइल॥”182 ॥ अनुवाद—उन लोगोंने श्रीशिवानन्द सेनको पत्र पकड़ाकर उनसे श्रीरघुनाथदासके विषयमें पूछा। श्रीशिवानन्द सेनने कहा,—“रघुनाथ हमारे पास तो नहीं आया है॥”182 ॥ श्रीशिवानन्दके द्वारा अपनी अनभिज्ञता बताना, श्रीरघुनाथको नहीं देखकर पत्र लानेवालोंका घर लौटना :— बाहुड़िया सेइ दश जन आइल घर। ताँर माता-पिता हइल चिन्तित अन्तर ॥ 183 ॥ अनुवाद—वे दस लोग लौटकर घर आ गये। श्रीरघुनाथदासके माता-पिता भीतरसे बहुत चिन्तित हो गये॥ 183 ॥ महाप्रभुके प्रेममें अपनेको भुलाकर श्रीरघुनाथका महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्तिके लिये पुरी जानेके मार्गपर सुतीव्र शारीरिक कष्टको सहन करना :— एथा रघुनाथ-दास प्रभाते उठिया। पूर्वमुख छाड़िया दक्षिण-मुख हञा ॥ 184 ॥ अनुवाद—इधर श्रीरघुनाथदास प्रातःकाल उठकर पूर्व दिशाकी ओर नहीं चलकर दक्षिण-दिशाकी ओर चल दिये॥ 184 ॥ छत्रभोग पार हञा छाड़िया सराण। कुग्राम-कुग्राम दिया करिल प्रयाण ॥ 185 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ छत्रभोगको पार करनेके पश्चात् प्रशस्त मार्गको छोड़कर सामान्य सामान्य गाँवोंसे होते हुए चलने लगे॥ 185 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सामान्य सामान्य गाँवोंसे होकर गये॥ 185 ॥ अनुभाष्य—‘सराण’,—प्रशस्त मार्ग। ‘छत्रभोग’,—वर्तमान समयमें यह स्थान 24 परगणा जिलेके मथुरापुरके अन्तर्गत गङ्गाके ‘छाड़-खाड़ि’के नामसे परिचित और ‘जयनगर-मजिलपुर’-नामक प्रसिद्ध दो गाँवोंके निकट अवस्थित है। पहले इस स्थानपर गङ्गा प्रवाहित होती थी। जो छत्रभोगको काँसाइ-नदी मानते हैं, उनका मत-भ्रान्त है॥ 185 ॥ भक्षण नाहि, समस्त दिवस गमन। क्षुधा नाहि बाधे, चैतन्यचरण-प्राप्त्ये मन॥ 186 ॥
[ 6/186-193 छठा अध्याय 187 अनुवाद—श्रीरघुनाथदास खानेकी चिन्ता नहीं करके सारा दिन चलते रहते। भूख उनको कोई बाधा नहीं दे रही थी, क्योंकि श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति करनेकी कामनामें ही उनका मन डूबा हुआ था॥ 186॥ कभु चर्वण, कभु रन्थन, कभु दुग्धपान। यबे येइ मिले, ताहे राखे निज-प्राण॥ 187॥ अनुवाद—वे कभी चना आदि कुछ चबानेके लिये मिलता तो उसे चबा लेते, कभी कोई पकी हुई खानेकी वस्तु मिलती तो उसे खा लेते और कभी दूध मिलनेपर उसे पी लेते। इस प्रकार जब जो भी मिल जाता, वे उससे ही अपने प्राणोंकी रक्षा करते॥ 187॥ बारह दिनोंमें पुरीमें आगमन, मार्गमें केवल तीन दिन अन्न-ग्रहण :- बार-दिने चलि' गेला श्रीपुरुषोत्तम। पथे तिनदिन मात्र करिला भोजन ॥ 188 ॥ अनुवाद—इस प्रकार वे बारह दिन चलकर श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र पहुँच गये। मार्गमें उन्होंने केवल तीन दिन ही भोजन किया॥ 188॥ श्रीस्वरूपादिके साथ बैठे महाप्रभुके निकट आकर श्रीरघुनाथका दण्डवत् प्रणाम, श्रीमुकुन्दके द्वारा उनका परिचय देना :- स्वरूपादि-सह गोसाञि आछेन बसिया। हेनकाले रघुनाथ मिलिल आसिया ॥ 189 ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर आदि भक्तोंके साथ बैठे हुए थे, उस समय श्रीरघुनाथदास आकर उनसे मिले॥ 189 ॥ अङ्गनेते दूरे रहि' करेन प्रणिपात। मुकुन्द-दत्त कहे,—"एइ आइल रघुनाथ ॥" 190 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने आङ्गनमें दूरसे ही प्रणाम किया। तब श्रीमुकुन्द दत्तने कहा,—'रघुनाथ आया है॥' 190॥ महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना, महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- प्रभु कहेन,—'आइस', तँहो धरिला चरण। उठि' प्रभु कृपाय ताँरे कैला आलिङ्गन ॥ 191 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—'आओ, आओ।' ऐसा सुनकर श्रीरघुनाथदासने आकर महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़ लिया। महाप्रभुने उठकर कृपा करते हुए श्रीरघुनाथको आलिङ्गन किया॥ 191॥ श्रीस्वरूपादि भक्तोंको प्रणाम, सभीके द्वारा आलिङ्गन :- स्वरूपादि सब भक्तेर चरण वन्जिला। प्रभु-कृपा देखि' सबे आलिङ्गन कैला ॥ 192 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथने श्रीस्वरूप आदि समस्त भक्तोंके चरणकमलोंकी वन्दना की। श्रीरघुनाथके प्रति महाप्रभुकी कृपाको देखकर सभी भक्तों ने भी श्रीरघुनाथको आलिङ्गन किया॥ 192॥ नित्यसिद्ध श्रीरघुनाथके गृह-त्यागके उपलक्षमें अनर्थयुक्त भक्तिसाधकोंको शिक्षा-प्रदान; महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकृपाके माहात्म्यका वर्णन :- प्रभु कहे,—"कृष्णकृपा बलिष्ठ सबा हैते। तोमारे काड़िल विषय-विष्ठा-गर्त हैते ॥" 193 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"कृष्णकृपा सबसे अधिक बलशाली है, उसने ही तुम्हारा विषय-विष्ठारूपी गड्ढेसे उद्धार किया है॥" 193॥ अनुभाष्य—प्राचीन कर्मफल आदिकी अपेक्षा श्रीकृष्णकृपा—अधिकतर सामर्थ्यसे युक्त है। श्रीकृष्णकी इस कृपाने ही तुम्हारा विषयरूपी मलके गड्ढेसे उद्धार किया है। विषयके प्रति अनुरागी होनेपर जीव अपने बलसे उसे त्याग नहीं कर सकता; विशेषतः शुद्धकृष्णदास जीवके लिये विषय—मलरूपी गड्ढेके समान हैं। महाप्रभुने श्रील रघुनाथको निर्विषयी जानकर भी दुःखी विषयी
188 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/193-198 ] लोगोंको शिक्षा देनेके लिये ही श्रीरघुनाथदासको उपलक्ष्य करके ऐसा कहा ॥ 193 ॥ श्रीरघुनाथकी एकान्तिकी श्रीगौरकृष्णनिष्ठा :- रघुनाथ कहे मने, — ‘कृष्ण नाहि जानि। तव कृपा काड़िल आमा,—एइ आमि मानि॥’ 194 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथने मन-ही-मन कहा, —“मैं श्रीकृष्णको नहीं जानता हूँ। मैं तो यही मानता हूँ कि आपकी कृपाने ही मेरा उद्धार किया है॥” 194 ॥ महाप्रभुके द्वारा हिरण्य और गोवर्धनका चरित्र-वर्णन :- प्रभु कहेन,—“तोमार पिता-ज्येठा दुइ जने। चक्रवर्त्ती-सम्बन्धे आमि 'आजा' करि' माने ॥ 195 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“मैं तुम्हारे पिता और ताऊको श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्तीके सम्बन्धसे अपना 'नाना' ही मानता हूँ॥ 195 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नीलाम्बर चक्रवर्त्तीके सम्बन्धसे मैं उन्हें 'आजा' अर्थात् नाना मानता हूँ॥ 195 ॥ अनुभाष्य-श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्ती रघुनाथके पिता और उनके बड़े भाईको अपनेसे आयुमें छोटा सम्भ्रान्त कायस्थ जानकर 'भाई' कहकर पुकारते थे और दोनों भाई भी श्रीनीलाम्बरको आयुमें बड़े ब्राह्मण जानकर 'बड़े भाई' कहकर सम्बोधित करते थे, श्रीमन्महाप्रभु नानाके भाई होनेके सम्बन्धसे उन्हें भी अपने 'रहस्य अर्थात् परिहासका पात्र' समझते थे। इस सम्बोधनसे अनेक लोगोंको ऐसा भ्रम हो सकता है कि श्रीरघुनाथ महाप्रभुकी अपेक्षा आयुमें बहुत बड़े थे, किन्तु वास्तवमें ऐसा नहीं है ॥ 195 ॥ चक्रवर्त्तीर दुँहे हय भ्रातृरूप दास। अतएव तारे आमि करि परिहास ॥ 196 ॥ अनुवाद-तुम्हारे पिता और ताऊ-दोनों श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्तीके छोटे भाईरूपी दास हैं। इसलिये मैं उनके विषयमें परिहास कर रहा हूँ॥ 196 ॥ विषयरूपी विषका सेवन-आत्मसंहारक अर्थात् जीवके स्वरूप अथवा चिद्बल-प्राप्तिका भीषण विघ्नस्वरूप :- तोमार बाप-ज्येठा-विषयविष्ठा-गर्त्तेर कीड़ा। सुख करि' माने विषय-विषेर महापीड़ा ॥ 197 ॥ अनुवाद-तुम्हारे पिता और ताऊ-दोनों विषयरूपी मलके गड्ढेके कीड़े हैं। वे विषयरूपी विषकी महापीड़ाको भी सुख मानते हैं॥ 197 ॥ अनुभाष्य- 'विषय' अपने भोक्ता विषयीको महाक्लेश प्रदान करता है, तथापि विषयोंमें आविष्ट चित्तवाले सांसारिक लोग उन महाक्लेश प्रदान करनेवाले विषयोंको सुख मानते हैं। जड़ेन्द्रियोंके भोगके विषय-त्याग-योग्य मलके गड्ढेके समान है। विषयोंमें अभिनिविष्ट जीव-घृणित मलके कीटके समान है अर्थात् पारमार्थिक दृष्टिमें जड़भोक्ता प्राकृत विषयी - मलके गड्ढेके कीड़ेके समान है एवं उस कीड़ेके रूपमें महानन्दसे नितान्त-घृणित विषयरूपी मलके आस्वादनमें प्रमत्त है ॥ 197 ॥ भोक्ताके अभिमानमें अथवा देहात्मबुद्धिके कारण अन्याभिलाष, कर्म और ज्ञान-मिश्र, होनेपर भी अप्रतिकूल विष्णु-वैष्णवोंके आनुगत्यका आभास अथवा लौकिकी श्रद्धा शुद्धभक्ति नहीं, कनिष्ठ-अधिकार मात्र :- यद्यपि ब्रह्मण्य करे ब्राह्मणेर सहाय। 'शुद्धवैष्णव' नहे, 'वैष्णवेर प्राय' ॥ 198 ॥ अनुवाद-यद्यपि तुम्हारे पिता और ताऊ-दोनों ब्राह्मणोंकी सहायता करते हैं, तथापि वे 'शुद्धवैष्णव' नहीं, अपितु 'वैष्णव-प्राय' हैं ॥ 198 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैष्णवोंकी भाँति वेशभूषा और देवसेवा आदिके रहनेपर भी शुद्ध वैष्णव नहीं हो सकते, क्योंकि जब तक 'अन्याभिलाषिता-शून्य' आदि शुद्धभक्तिके लक्षण नहीं हों, तब तक दीक्षादि प्राप्त होनेपर भी 'वैष्णवप्राय' ही रहते हैं ॥ 198 ॥ अनुभाष्य-हिरण्य और गोवर्धन-दोनों भाई ही ब्राह्मणोंका सम्मान करनेवाले, उनके पालक, पोषक
[ 6/198-205 छठा अध्याय 189 और सहायता करनेवाले थे। इसलिये सांसारिक लौकिक-विचारमें श्रेष्ठ और 'सज्जन' कहलाकर आदरणीय और साधारण लोक-समाजमें 'वैष्णव'के रूपमें परिचित होनेपर भी पारमार्थिक शुद्धभक्तोंके विचारसे वे 'शुद्धवैष्णव' नहीं थे; परन्तु शुद्धवैष्णवगण उन्हें 'वैष्णवप्राय' अथवा 'वैष्णवाभास' अर्थात् 'कनिष्ठ' अथवा 'अबोध' (विद्वेषी नहीं) समझते थे॥198॥ श्रीकृष्णप्रीतिकी इच्छाको छोड़कर इन्द्रिय-ज्ञानसे भोग अथवा त्यागरूपी विषयोंके अनुशीलनके फलसे सामान्य श्रद्धा-बीजकी भी स्तब्धता और संसार-वृद्धि :- तथापि विषयेर स्वभाव-हय महा-अन्ध। सेइ कर्म कराय, याते हय भवबन्ध ॥ 199॥ अनुवाद-तथापि विषयका स्वभाव ही ऐसा है कि वह विषयी व्यक्तिको सम्पूर्ण रूपसे अन्धा बना देता है और उससे वही कार्य करवाता है, जिससे भवबन्धन होता है॥ 199॥ अनुभाष्य-विषयी भोगी शुद्धभक्तिका परित्याग करके कर्मी, ज्ञानी अथवा अन्याभिलाषी होनेके कारण अपने-अपने द्वारा अनुष्ठित कर्म-ज्ञान आदिके अनुष्ठानके द्वारा ही अनजानेमें विषयोंमें जड़ीभूत बन जाते हैं॥ 199॥ नित्यसिद्ध श्रीरघुनाथका विषयभोग नहीं रहनेके कारण, अनर्थयुक्त साधकको ही महाप्रभुका उपदेश :- हेन 'विषय' हैते कृष्ण उद्धारिला तोमा। कहन ना याय कृष्णकृपार महिमा ॥ ” 200 ॥ अनुवाद-ऐसे विषयसे श्रीकृष्णने तुम्हारा उद्धार किया है। श्रीकृष्णकी कृपाकी महिमाका वर्णन नहीं किया जा सकता॥” 200॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको श्रीदामोदरस्वरूपके हाथोंमें समर्पित करना :- रघुनाथेर क्षीणता-मालिन्य देखिया। स्वरूपेरे कहेन प्रभु कृपार्द्रचित्त हञा ॥ 201 ॥ “एइ रघुनाथे आमि सँपिनु तोमारे। पुत्र-भृत्य-रूपे तुमि कर अङ्गीकारे ॥ 202 ॥ वैद्य-रघुनाथ, भट्ट-रघुनाथ और स्वरूपानुग दास-रघुनाथ :- तिन 'रघुनाथ'-नाम हय मोर स्थाने। 'स्वरूपेर रघु'—आजि हैते इहार नामे ॥ ” 203 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने देखा कि श्रीरघुनाथदासके द्वारा बारह दिन यात्रा और उपवास करनेसे उसका शरीर क्षीण और मलिन हो गया है, तो उनका हृदय कृपासे द्रवीभूत हो गया और उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरसे कहा,-“मैं इस रघुनाथको तुम्हें सौंपता हूँ, तुम इसे अपने पुत्र अथवा दासके रूपमें स्वीकार करो। मेरे तीन भक्तोंका नाम 'रघुनाथ' है। आजसे इसका नाम 'स्वरूपका रघु' है॥” 201-203॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'तिन रघुनाथ', - वैद्य-रघुनाथ (आदिलीला 11/22 संख्या देखें), भट्ट-रघुनाथ और दास-रघुनाथ ॥ 203 ॥ एत कहि' रघुनाथेर हस्त धरिला। स्वरूपेर हस्ते ताँरे समर्पण कैला ॥ 204 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने यह कहकर श्रीरघुनाथदासका हाथ पकड़कर उन्हें श्रीस्वरूप दामोदरके हाथोंमें समर्पित कर दिया॥ 204॥ महाप्रभुके आदेशसे श्रीस्वरूपका श्रीरघुनाथको अङ्गीकार करना :- स्वरूप कहे,-'महाप्रभुर ये आज्ञा हैल।' एत कहि' रघुनाथे पुनः आलिङ्गिल ॥ 205 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीरघुनाथदासको अङ्गीकार करते हुए कहा,-“महाप्रभुकी जैसी आज्ञा है, मुझे स्वीकार है।” यह कहकर उन्होंने पुनः श्रीरघुनाथको आलिङ्गन किया॥ 205॥
190 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/206-214 ] महाप्रभुका अनुपम-भक्तवात्सल्य; श्रीगोविन्दको श्रीरघुनाथके प्रति आदर और सेवा करनेकी आज्ञा देना :- चैतन्येर भक्तवात्सल्य कहिते ना पारि। गोविन्देरे कहे रघुनाथे दया करि' ॥ 206 ॥ “पथे इँह करियाछे बहुत लङ्घन। कतदिन कर इहार भाल सन्तर्पण ॥”207 ॥ अनुवाद—मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके भक्तवात्सल्यका वर्णन नहीं कर सकता, उन्होंने श्रीरघुनाथके प्रति दयावान होकर श्रीगोविन्दसे कहा,—“रघुनाथने मार्गमें बहुत दिनों तक उपवास आदि किया है। तुम कुछ दिनों तक इसकी भली-भाँति सेवा करो कि यह पुनः पूर्ण स्वस्थ हो जाय॥”206-207 ॥ अनुभाष्य—'लङ्घन',—उपवास आदि; 'सन्तर्पण',— सेवा ॥ 207 ॥ श्रीरघुनाथको समुद्रस्नान करके श्रीजगन्नाथके दर्शनके बाद प्रसादका सम्मान करनेका आदेश :- रघुनाथे कहे,—“याञा, कर सिन्धुस्नान। जगन्नाथ देखि' आसि' करह भोजन ॥”208 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरघुनाथको कहा,—“जाकर समुद्रमें स्नान करो। फिर भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करके आकर भोजन करो॥”208 ॥ भक्तोंके साथ श्रीरघुनाथका मिलन :- एत बलि' प्रभु मध्याह्न करिते उठिला। रघुनाथदास सब भक्तेरे मिलिला ॥ 209 ॥ श्रीरघुनाथको महाप्रभुकी कृपा प्राप्त करते देख भक्तोंके द्वारा उनके सौभाग्यकी प्रशंसा :- रघुनाथे प्रभुर कृपा देखि' भक्तगण। विस्मित हञा करे ताँर भाग्य-प्रशंसन ॥ 210 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु मध्याह्न-कृत्य करनेके लिये उठे और श्रीरघुनाथदास सभी भक्तोंसे मिले। श्रीरघुनाथदासके प्रति महाप्रभुकी कृपाको देखकर सभी भक्त विस्मित हो गये और वे उनके सौभाग्यकी प्रशंसा करने लगे ॥ 209-210 ॥ समुद्रस्नानके बाद श्रीजगन्नाथके दर्शन करके श्रीरघुनाथको श्रीगोविन्दकी कृपासे महाप्रभुके भुक्त-अवशेषकी प्राप्ति :- रघुनाथ समुद्रे याञा स्नान करिला। जगन्नाथ देखि' गोविन्द-पाश आइला ॥ 211 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासने समुद्रमें जाकर स्नान किया और श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करके श्रीगोविन्दके पास आये ॥ 211 ॥ प्रभुर अवशिष्ट पात्र गोविन्द ताँरे दिला। आनन्दित हञा महाप्रसाद पाइला ॥ 212 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने श्रीरघुनाथ दासको महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रसाद दिया और श्रीरघुनाथ दासने आनन्दित होकर महाप्रसाद पाया ॥ 212 ॥ पाँच दिन श्रीस्वरूपके निकट रहकर महाप्रभुके प्रसादकी प्राप्ति :- एइमत रहे तैँह स्वरूप-चरणे। गोविन्द प्रसाद ताँरे देन पञ्च दिने ॥ 213 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ दास श्रीस्वरूप दामोदरके श्रीचरणाश्रयमें रहने लगे। श्रीगोविन्दने पाँच दिनों तक प्रतिदिन उन्हें महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रसाद दिया ॥ 213 ॥ अगले दिनसे श्रीरघुनाथके द्वारा रात्रिमें सिंहद्वारपर प्रसादके प्रार्थीके रूपमें प्रतीक्षा :- आर दिन हैते 'पुष्प-अञ्जलि' देखिया। सिंहद्वारे खाड़ा रहे आहार लागिया ॥ 214 ॥ अनुवाद—अगले अर्थात् छठे दिनसे श्रीरघुनाथ दास रात्रिमें भगवान् श्रीजगन्नाथदेवकी पुष्पाञ्जलि-सेवाके दर्शन करके भोजनकी भिक्षाके लिये सिंहद्वारपर खड़े रहने लगे ॥ 214 ॥ अनुभाष्य—'पुष्प-अञ्जलि',—रात्रिकालमें श्रीजगन्नाथकी पुष्पाञ्जलि-सेवा ॥ 214 ॥
[ 6/215–223 छठा अध्याय 191
घर जानेके लिये उद्यत श्रीजगन्नाथदेवके गृहस्थ सेवकोंके द्वारा रात्रिमें पूजाके अन्तमें द्वारपर खड़े प्रसादके प्रार्थी वैष्णवोंको प्रसाद-दान करनेकी रीति :— जगन्नाथेर सेवक यत—‘विषयीर गण’। सेवा सारि' रात्र्ये करे गृहेते गमन ॥ 215 ॥ सिंहद्वारे अन्नार्थी वैष्णवे देखिया। पसारिर ठाञि अन्न देन कृपा त' करिया ॥ 216 ॥ अनुवाद—भगवान् श्रीजगन्नाथदेवके सेवक जो कि विषयी अर्थात् गृहस्थ हैं, वे अपनी सेवा समाप्त करके रात्रिके समय अपने घर जाते हैं। तब सिंहद्वारपर भोजनकी भिक्षाके लिये खड़े वैष्णवोंको देखकर वे कृपा करके दुकानदारसे मूल्य देकर वैष्णवोंको भोजन दिलवा देते हैं॥ 215–216 ॥
पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निष्किञ्चन विरक्त भक्तोंके व्यवहारका वर्णन :— एइमत सर्वकाल आछे व्यवहार। निष्किञ्चन भक्त खाड़ा हय सिंहद्वार ॥ 217 ॥ सर्वदिन करेन वैष्णव नाम-सङ्कीर्त्तन। स्वच्छन्दे करेन जगन्नाथ-दरशन ॥ 218 ॥ केह छत्रे याञा खाय, येबा किछु पाय। केह रात्रे भिक्षा लागि' सिंहद्वारे रय ॥ 219 ॥ अनुवाद—सदासे यही प्रथा चली आ रही है कि निष्किञ्चन भक्त सिंहद्वारपर खड़े हो जाते हैं। वैष्णवगण सारा दिन नाम-सङ्कीर्तन करते हैं और अपनी इच्छाके अनुरूप भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करते हैं। कुछ वैष्णव छत्रमें जाकर जो कुछ मिलता है, उसे खा लेते हैं। और कुछ वैष्णव भिक्षाके लिये रात्रिके समय सिंहद्वारपर खड़े हो जाते हैं॥ 217–219 ॥
महाप्रभुके भक्तोंका व्यवहार; श्रीकृष्णकी प्रीतिके उद्देश्यसे अपने भोगका त्याग अथवा अखिल चेष्टा :— महाप्रभुर भक्तगणेर वैराग्य प्रधान। याहा देखि' प्रीत हन गौर-भगवान् ॥ 220 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके भक्तोंमें वैराग्य प्रधान है, जिसे देखकर भगवान् श्रीगौरसुन्दर बहुत प्रसन्न होते हैं॥ 220 ॥ अनुभाष्य—अभक्त विषयी और शुद्धभक्त—दोनों ही भली प्रकारसे निरपेक्षरूपमें देखनेपर समझ सकते हैं कि महाप्रभुके भक्त—सांसारिक-भोग-तात्पर्य-परायण नहीं हैं अर्थात् इन्द्रियतर्पण और सुखभोगादिको त्याग करके श्रीकृष्णकी सेवाके लिये श्रीकृष्णसे अतिरिक्त समस्त विषयोंके प्रति उदासीन हैं। उनकी विषय त्यागकर अहैतुकी और अप्रतिहता [निरन्तर तैल-धारावत्] अलौकिकी श्रीकृष्णसेवा—साधारण लोगोंकी दृष्टिकी समझके परे है, भगवान् श्रीगौरसुन्दर श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यान्य विषयोंसे विरक्त व्यक्तिके शुद्धभजनकी चतुरताको देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं॥ 220 ॥
महाप्रभुको श्रीगोविन्दके द्वारा श्रीरघुनाथके सिंहद्वारपर प्रसादके लिये प्रतीक्षा करनेका संवाद देना :— प्रभुरे गोविन्द कहे,—“रघुनाथ 'प्रसाद' ना लय। रात्र्ये सिंहद्वारे खाड़ा हञा मागि' खाय ॥” 221 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने महाप्रभुसे कहा,—“रघुनाथदास अब यहाँ प्रसाद नहीं लेते। वे रात्रिमें सिंहद्वारपर खड़े होकर भिक्षा माँगकर खाते हैं॥” 221 ॥
श्रीरघुनाथको गृहत्यागी या 'वैरागी'की संज्ञा; उनके वैराग्यसे महाप्रभुको सन्तोष :— शुनि' तुष्ट हञा प्रभु कहिते लागिल। “भाल कैल, वैरागीर धर्म आचरिल ॥ 222 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दकी बात सुनकर महाप्रभु सन्तुष्ट होकर कहने लगे,—“रघुनाथने अच्छा ही किया कि वह वैरागी व्यक्तिके धर्मका आचरण कर रहा है॥ 222 ॥
महाप्रभुके द्वारा वैरागी या गृहत्यागी व्यक्तिके वैध और अवैध आचरण या धर्मका वर्णन :— वैरागी करिबे सदा नाम-सङ्कीर्त्तन। मागिया खाञा करे जीवन-रक्षण ॥ 223 ॥
192 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/223-229 ] अनुवाद—वैरागी व्यक्तिको सदा नाम-सङ्कीर्तन करना चाहिये। और जीवनकी रक्षाके लिये उसे माँगकर कुछ खा लेना चाहिये॥ 223 ॥ वैरागी हञा येबा करे परापेक्षा। कार्यसिद्धि नहे, कृष्ण करेन उपेक्षा ॥ 224 ॥ अनुवाद—वैरागी होकर भी जो दूसरोंकी अपेक्षा रखता है, तो उसके भजनकी सिद्धि नहीं होती और श्रीकृष्ण भी उसकी उपेक्षा कर देते हैं॥ 224 ॥ वैरागी हञा करे जिह्वार लालस। परमार्थ याय, आर हय रसेर वश ॥ 225 ॥ अनुवाद—वैरागी होकर जो जिह्वाके स्वादकी लालसा करता है उसका परमार्थ छूट जाता है और वह स्वादिष्ट भोजनके रसके वशीभूत हो जाता है॥ 225 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'रस',—तीखा, मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा और कषाय-रस॥ 225 ॥ वैरागीर कृत्य—सदा नाम-सङ्कीर्त्तन। शाक-पत्र-फल-मूले उदर-भरण ॥ 226 ॥ अनुवाद—वैरागी व्यक्तिका कर्त्तव्य सदा नाम-सङ्कीर्तन करना ही है। और उसे सहज ही प्राप्त शाक, पत्र, फल, मूल आदि ग्रहणकर उदरपूर्ति करनी चाहिये ॥ 226 ॥ अनुभाष्य—हःभःविः—बीसवें विलासके अन्तमें— “कृतान्येतानि तु प्रायो गृहिणां धनिनां सताम्। लिखितानि न तु त्यक्तपरिग्रह महात्मनाम्॥ प्रभाते चार्द्धरात्रे च मध्याह्ने दिवसक्षये। कीर्त्तयन्ति हरिं ये वै ते तरन्ति भवार्णवम्॥ एवमेकान्तिनां प्रायः कीर्त्तनं स्मरणं प्रभोः। कुर्वतां परमप्रीत्या कृत्यमन्यन्न रोचते॥” हरिभक्तिविलासमें लिखित अनुष्ठानावली गृहस्थ धनी वैष्णवप्राय व्यक्तियोंके लिये है, सर्वपरित्यागी विरक्त एकान्तिक-नामाश्रित शुद्धवैष्णवोंके लिये नहीं है। प्रातःकालमें, मध्यरात्रिमें, मध्याह्नमें और सन्ध्यामें अर्थात् अष्टकालमें ही जो हरिका कीर्तन करता है, वही भवसागरसे पार होता है। एकान्तिक शुद्धभक्त परम प्रीतिके सहित प्रभुका कीर्तन और स्मरणादि किया करते हैं, उनका कीर्तनादिके अतिरिक्त अन्य कोई अनुष्ठान नहीं है। श्रीजीव गोस्वामी प्रभुके द्वारा रचित भक्तिसन्दर्भ (283 संख्यामें)— “यद्यपि श्रीभागवतमते पञ्चरात्रादिवदर्चनमार्गस्यावश्यकत्वं नास्ति, तद्विनापि शरणापत्त्यादीनामेकतरेणापि पुरुषार्थसिद्धेरभिहितत्वात्, ...।” [अर्थात् “यद्यपि श्रीमद्भागवतके मतानुसार अर्चनके बिना भी शरणागति आदिके जिस किसी एक अङ्गके भी द्वारा ही पुरुषार्थ-सिद्धि होती है, ऐसा होनेसे श्रीमद्भागवतके मतानुसार पञ्चरात्रादिकी भाँति अर्चन- मार्गकी आवश्यकता नहीं है, तथापि ...।] ॥ 226 ॥ जिह्वार लालसे येइ इति-उति धाय। शिश्नोदर-परायण कृष्ण नाहि पाय ॥ ”227 ॥ अनुवाद—जो जिह्वाके रसास्वादनकी लालसासे इधर-उधर भागता रहता है, ऐसा व्यक्ति जननेन्द्रियों और उदरके परायण होकर भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त नहीं कर सकता॥ ”227 ॥ गृहत्यागी साधकोंके मङ्गलके लिये स्वयंको वैसा मानकर श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीस्वरूपसे अपने कर्त्तव्यकी जिज्ञासा :— आर दिन रघुनाथ स्वरूप-चरणे। आपनार कृत्य लागि' कैला निवेदने ॥ 228 ॥ “कि लागि' छाड़ाइला घर, ना जानि उद्देश। कि मोर कर्त्तव्य, प्रभु करुन उपदेश ॥ ”229 ॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीरघुनाथदासने श्रीस्वरूप दामोदरके श्रीचरणोंमें अपना कर्त्तव्य जाननेके लिये निवेदन करते हुए कहा,—“मैंने किसलिये घर छोड़ा है, मैं इसका उद्देश्य नहीं जानता हूँ। मेरा क्या कर्त्तव्य
[ 6/228–238 छठा अध्याय 193 है? कृपया इस विषयमें मुझे उपदेश प्रदान करें?" 228-229 ॥ स्वयं मौन रहकर श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीस्वरूप और श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुके साथ वार्तालाप :- प्रभुर आगे कथामात्र ना कहे रघुनाथ। स्वरूप-गोविन्दद्वारा कहाय निज-बात्॥ 230 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ दास महाप्रभुके आगे कोई भी बात नहीं करते थे। वे श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्दके द्वारा ही महाप्रभुसे अपने हृदयकी बात कहलवाते थे॥ 230 ॥ एकदिन श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुसे श्रीरघुनाथके कर्त्तव्यकी जिज्ञासा :- प्रभुर आगे स्वरूप निवेदिला आर दिने। “रघुनाथ निवेदय प्रभुर चरणे ॥ 231 ॥ कि मोर कर्त्तव्य, मुञि ना जानि उद्देश। आपनि श्रीमुखे मोरे करुन उपदेश ॥" 232 ॥ अनुवाद-अगले दिन श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे निवेदन करते हुए कहा, - “रघुनाथ आपके चरणकमलोंमें निवेदन कर रहा है 'मेरा क्या कर्त्तव्य है, मेरे जीवनका क्या उद्देश्य है, मैं इस विषयमें कुछ नहीं जानता। इसलिये आप (महाप्रभु) स्वयं मुझे अपने श्रीमुखसे इस विषयमें उपदेश प्रदान करें।'” 231-232 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको श्रीस्वरूपको अपने शिक्षागुरुके रूपमें वरण करनेका आदेश :- हासि' महाप्रभु रघुनाथेरे कहिल। “तोमार उपदेष्टा करि' स्वरूपेरे दिल ॥ 233 ॥ माध्व-गौड़ीयोंके नित्यप्रभु या गुरु श्रीदामोदरस्वरूप ही समस्त साध्य-साधन-तत्त्वके आचार्य :- 'साध्य'-'साधन'-तत्त्व शिख इँहार स्थाने। आमि यत नाहि जानि, इँहो तत जाने ॥ 234 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने मुस्कुराते हुए श्रीरघुनाथ दाससे कहा, - “मैंने स्वरूप दामोदरको तुम्हारा उपदेष्टा नियुक्त किया है। तुम इन्हींसे ही साध्य तथा साधन तत्त्वको सीखो। मैं स्वयं उतना नहीं जानता हूँ, जितना ये जानते हैं॥ 233-234 ॥ तथापि आमार आज्ञाय यदि श्रद्धा हय। आमार एइ वाक्ये तुमि करिह निश्चय ॥ 235 ॥ महाप्रभुके द्वारा रागानुगा-भक्तके आचारका वर्णन :- ग्राम्यकथा ना शुनिबे, ग्राम्यवार्त्ता ना कहिबे। भाल ना खाइबे, आर भाल ना परिबे ॥ 236 ॥ अमानी मानद हञा कृष्णनाम सदा लबे। व्रजे राधाकृष्ण-सेवा मानसे करिबे ॥ 237 ॥ अनुवाद-तथापि यदि तुम्हारी मेरी आज्ञाके प्रति श्रद्धा है तो तुम मेरे इन वचनोंको अवश्य ही पालन करना। तुम कभी भी सांसारिक बातें मत सुनना और न ही सांसारिक बातें कहना। अच्छा (स्वादिष्ट वस्तुएँ) मत खाना तथा न ही अच्छा (सुन्दर वस्त्र) पहनना। तुम दूसरेसे सम्मानकी आशा मत रखना और सबको यथायोग्य सम्मान देते हुए सदा कृष्णनामका उच्चारण करना एवं मनके द्वारा व्रजमें राधाकृष्णकी सेवा करना॥ 235-237 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-स्त्री और पुरुष विवाहित होकर सन्तानादि उत्पन्न करके जिस संसारकी नींव डालते हैं, उस संसारके सम्बन्धमें जितनी बातें हैं, वे सब कुछ 'ग्राम्य' कथा-वार्त्ता है; वह कभी भी वैरागी अथवा वैष्णवोंके लिये सुनने अथवा बोलने योग्य नहीं है। अच्छा खाना, अच्छा पहनना, - यह भी वैरागीके लिये उचित नहीं है; अन्योंके प्रति सम्मान और स्वयं अमानी होकर सदैव कृष्णनाम करना एवं मनसे व्रजमें श्रीराधाकृष्णकी सेवा करना, - यही वैरागीका कर्त्तव्य है॥ 237 ॥ एइ त' संक्षेपे आमि कैलुँ उपदेश। स्वरूपेर ठाञि इहार पाबे सविशेष ॥ 238 ॥ अनुवाद-मैंने संक्षेपमें तुम्हें यह उपदेश प्रदान
194 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/238-246 ] किया है। स्वरूप दामोदर तुम्हें इसे विस्तारसे समझा देंगे॥ 238॥ पद्यावलीमें उद्धृत श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्रोक्त शिक्षाष्टकका तीसरा श्लोक- तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्त्तनीयः सदा हरिः ॥ "239॥ अनुवाद-जो अपनेको तृणसे भी छोटा मानते हैं, जो वृक्षके समान सहनशील हैं, अपने लिये मानशून्य हैं और दूसरोंको सम्मान प्रदान करते हैं, वे ही सदा हरिकीर्त्तन करनेके अधिकारी हैं॥ "239॥ अनुभाष्य-आदिलीला 17/31 संख्या देखें॥ 239॥ श्रीरघुनाथके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना, महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- एत शुनि' रघुनाथ वन्दिला चरण। महाप्रभु कैला ताँरे कृपा-आलिङ्गन ॥ 240 ॥ अनुवाद-यह उपदेश सुनकर श्रीरघुनाथ दासने महाप्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना की और महाप्रभुने उन्हें कृपापूर्वक आलिङ्गन प्रदान किया॥ 240॥ श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीदामोदरस्वरूपके आनुगत्यमें श्रीगौरकृष्णकी अन्तरङ्ग-सेवा :- पुनः समर्पिला ताँरे स्वरूपेर स्थाने। 'अन्तरङ्ग सेवा' करे स्वरूपेर सने॥ 241 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने पुनः श्रीरघुनाथ दासको श्रीस्वरूप दामोदरके हाथोंमें समर्पित किया। इस प्रकार श्रीरघुनाथ दासने श्रीस्वरूप दामोदरके आनुगत्यमें अन्तरङ्ग सेवा की॥ 241 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'अन्तरङ्ग सेवा करे',-मन-ही- मनमें अपनी स्वरूप-देहमें जो व्रजसेवा है, वही 'अन्तरङ्ग' सेवा है। श्रीस्वरूप गोस्वामी-ललिता देवी हैं; उनके गणोंके मध्य प्रवेश करके श्रीदासगोस्वामी अपनी अन्तरङ्ग व्रज-सेवा करते थे॥ 241 ॥ प्रतिवर्षकी भाँति रथयात्रासे पहले गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें आगमन :- हेनकाले आइला सब गौड़ेर भक्तगण। पूर्ववत् प्रभु सबाय करिला मिलन ॥ 242 ॥ अनुवाद-उसी समय गौड़देशके समस्त भक्त वहाँ आये और पहलेकी ही भाँति महाप्रभुने सभीसे भेंट की॥ 242॥ भक्तोंके साथ गुण्डिचा-मार्जन और बगीचेमें महोत्सव :- सबा लञा कैला प्रभु गुण्डिचा-मार्जन। सबा लञा कैला प्रभु वन्य-भोजन ॥ 243 ॥ अनुवाद-सभी भक्तोंको साथ लेकर महाप्रभुने श्रीगुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया और उसके पश्चात् बगीचेमें सबके साथ बैठकर भोजन किया॥ 243॥ अपने भक्तों सहित महाप्रभुका रथके आगे नृत्य; श्रीरघुनाथको विस्मय :- रथयात्राय सबा लञा करिला नर्त्तन। देखि' रघुनाथेर चमत्कार हैल मन ॥ 244 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने समस्त भक्तोंके साथ रथयात्राके समय नृत्य किया। महाप्रभुके नृत्यको देखकर श्रीरघुनाथ दास आश्चर्यचकित हो गये॥ 244॥ श्रीरघुनाथके द्वारा भक्तोंके चरणोंकी वन्दना, श्रीअद्वैतकी कृपाकी प्राप्ति :- रघुनाथ-दास यबे सबारे मिलिला। अद्वैत-आचार्य ताँरे बहु कृपा कैला ॥ 245 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ दास जब गौड़देशसे आये सब भक्तोंसे मिले तो श्रीअद्वैताचार्यने उनपर बहुत कृपा की॥ 245॥ श्रीशिवानन्दके द्वारा श्रीरघुनाथसे श्रीगोवर्धनदासके द्वारा उन्हें ढूँढ़नेकी चेष्टाका वर्णन :- शिवानन्द-सेन ताँरे कहेन विवरण। “तोमा लैते तोमार पिता पाठाइल दश जन ॥ 246 ॥
[ 6/246-256 छठा अध्याय 195 तोमारे पाठाइते पत्री पाठाइल मोरे। साथ ही रहते हैं और उनकी तो बहुत ख्याति है, उन्हें झाँकरा हइते तोमा ना पाञा गेल घरे॥"247॥ कौन नहीं जानता?251॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने श्रीरघुनाथ दाससे स्वरूपेर स्थाने तारे करियाछेन समर्पण। कहा,—"तुम्हारे पिताने तुम्हें घर लौटाकर ले जानेके प्रभुर भक्तगणेर तेंहो हय प्राणसम॥252॥ लिये दस लोगोंको भेजा था। उनके द्वारा तुम्हारे पिताने तुम्हें घर भेजनेके लिये मेरे पास एक पत्र भी लिखा अनुवाद—महाप्रभुने उनको श्रीस्वरूप दामोदरके था। वे लोग तुम्हारे नहीं मिलनेके कारण झाँकरासे हाथोंमें समर्पित किया है। वे महाप्रभुके भक्तोंके घरको लौट गये॥"246-247॥ प्राण-स्वरूप हैं॥252॥ चातुर्मास्यके अन्तमें भक्तोंके द्वारा पुरीसे गौड़में लौटना :— रात्रि-दिन करे तेंहो नाम-सङ्कीर्त्तन। चारि मास रहि' भक्तगण गौड़े गेला। क्षणमात्र नाहि छाड़े प्रभुर चरण॥253॥ शुनि' रघुनाथेर पिता मनुष्य पाठाइला॥248॥ अनुवाद—वे रात-दिन नाम-सङ्कीर्तन करते हैं। वे श्रीशिवानन्दसे श्रीगोवर्धनदासके द्वारा लोग भेजकर एक क्षणके लिये भी महाप्रभुके आनुगत्यको नहीं श्रीरघुनाथके विषयमें जिज्ञासा :— छोड़ते॥253॥ से मनुष्य शिवानन्द-सेनेरे पुछिल। “महाप्रभुर स्थाने एक 'वैष्णव' देखिल॥249॥ परम वैराग्य ताँर, नाहि भक्ष्य-परिधान। गोवर्धनरे पुत्र तेंहो, नाम—'रघुनाथ'। यैछे तैछे आहार करि' राखये पराण॥254॥ नीलाचले परिचय आछे तोमार साथ??"250॥ अनुवाद—वे तो परम वैरागी हैं। वे खाने-पहननेकी अनुवाद—चार मास तक श्रीजगन्नाथ पुरीमें रहनेके भी चिन्ता नहीं करते। वे जिस किसी प्रकारसे कुछ पश्चात् भक्त गौड़देशमें लौट गये। उनके लौट आनेकी खाकर अपने प्राणोंकी रक्षा करते हैं॥254॥ बातको सुनकर श्रीरघुनाथ दासके पिताने एक व्यक्तिको श्रीशिवानन्द सेनके पास भेजा। उस व्यक्तिने आकर दशदण्ड रात्रि गेले 'पुष्पाञ्जलि' देखिया। श्रीशिवानन्द सेनसे पूछा,—“क्या आपने महाप्रभुके सिंहद्वारे खाड़ा हय आहार लागिया॥255॥ वासस्थानपर एक वैरागीको देखा? वे श्रीगोवर्धन मजुमदारके पुत्र श्रीरघुनाथ दास हैं। क्या नीलाचलमें आपकी उनके अनुवाद—रात्रिके दस दण्ड (चार घण्टे) बीत साथ भेंट हुई?”248-250॥ जानेपर वे भगवान् श्रीजगन्नाथकी पुष्पाञ्जलिके दर्शन करके भोजनकी भिक्षाके लिये सिंहद्वारपर खड़े हो जाते श्रीशिवानन्दके द्वारा श्रीरघुनाथके तात्कालिक वैराग्य हैं॥255॥ और वैष्णवी-प्रतिष्ठाकी प्रशंसा :— शिवानन्द कहे,—“तेंहो हय प्रभुर स्थाने। केह यदि देय, तबे करये भक्षण। परम विख्यात तेंहो, केबा नाहि जाने??251॥ कभु उपवास, कभु करये चर्वण॥”256॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने कहा,—“वे महाप्रभुके अनुवाद—यदि कोई उन्हें कुछ दे देता है, तब वे उसे खा लेते हैं। अन्यथा कभी-कभी उपवास करते हैं और कभी कुछ चने आदि चबा लेते हैं॥”256॥
196 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/257-263 ] [बायाँ स्तम्भ] श्रीगोवर्धनदासके पास जाकर उस व्यक्तिके द्वारा श्रीरघुनाथके वैराग्यसे युक्त भजनके संवादका ज्ञापन :- एत शुनि' सेइ मनुष्य गोवर्धन-स्थाने। कहिल गिया सब रघुनाथ-विवरणे॥ 257॥ अनुवाद—यह सुनकर वह व्यक्ति श्रीगोवर्धन मजुमदारके पास लौट गया और उनको श्रीरघुनाथ दासके विषयमें सब कुछ बतलाया॥ 257॥ श्रीरघुनाथका कृष्णभजनके उद्देश्यसे भोगोंके त्यागके विषयमें श्रवण करके कृष्ण-भोग्य भक्तको अपना भोग्य-पुत्र मानकर पत्नी सहित गोवर्धनदासका दुःख :- शुनि' ताँर माता पिता दुःखित हइल। पुत्र-ठाञि द्रव्य-मनुष्य पाठाइल॥ 258॥ श्रीरघुनाथको देनेके लिये श्रीशिवानन्दके निकट मुद्रा, सेवक और रसोइयेको भेजना :- चारिशत मुद्रा, दुइ भृत्य, एक ब्राह्मण। शिवानन्देर ठाञि पाठाइल ततक्षण॥ 259॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासके ऐसे वैराग्यके विषयमें सुनकर उनके माता-पिता बहुत दुःखी हुए। इसलिये उन्होंने अपने पुत्रके पास खाने-पहननेकी वस्तुएँ और सेवक भेजनेकी व्यवस्था की। उन्होंने उसी समय चार सौ मुद्राओंके साथ दो सेवक और एक ब्राह्मणको श्रीशिवानन्द सेनके पास भेजा॥ 258-259॥ श्रीशिवानन्दका साथमें ले जानेका आश्वासन :- शिवानन्द कहे,—“तुमि याइते नारिबा। आमि याइ यबे, आमार सङ्गे याइबा॥ 260॥ एबे घर याह, यबे आमि सब चलिमु। तबे तोमा-सबाकारे सङ्गे लञा यामु॥”261॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने उन लोगोंसे कहा,—“आप सब अपने आपसे जगन्नाथपुरी नहीं जा पाओगे। जब मैं जाऊँगा, तब मेरे साथ ही जाना। अभी आप लोग अपने घर लौट जाओ। जब हम सब लोग चलेंगे, तब आप सबको मैं अपने साथ ले जाऊँगा॥”260-261॥ [दायाँ स्तम्भ] श्रीकविकर्णपूरके द्वारा स्वरचित नाटकमें श्रीरघुनाथके माहात्म्यका वर्णन :- एइ त' प्रस्तावे श्रीकविकर्णपूर। रघुनाथ-महिमा ग्रन्थे लिखिला प्रचुर॥ 262॥ 262। अनुवाद—इसी प्रसङ्गमें श्रीकविकर्णपूरने स्वरचित चैतन्यचन्द्रोदय नाटकमें श्रीरघुनाथ दासकी प्रचुर महिमाका वर्णन किया है॥ 262॥ अनुभाष्य—'ग्रन्थे',—श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटकमें॥ 262॥ श्रीयदुनन्दनाचार्य और श्रीरघुनाथके गुण :- श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (10/3-4)में साथी यात्रियोंके प्रति श्रीशिवानन्दकी उक्ति— आचार्यो यदुनन्दनः सुमधुरः श्रीवासुदेवप्रिय- स्तच्छिष्यो रघुनाथ इत्यधिगुणः प्राणाधिको मादृशाम्। श्रीचैतन्यकृपातिरेकसततस्निग्धः स्वरूपप्रियो वैराग्यैकनिधिर्न कस्य विदितो नीलाचले तिष्ठताम्॥ 263॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 263॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(काञ्चनपल्ली-निवासी) श्रीवासुदेव-दत्तके प्रियपात्र [शिष्य नहीं] अति सुमधुर-मूर्ति श्रीयदुनन्दनाचार्य हैं, उनके शिष्य [कृपापात्र, दीक्षा शिष्य नहीं] ही श्रीरघुनाथ दास हैं। उनके गुणोंके कारण वे-हम सबको ही प्राणोंसे अधिक प्रिय हैं एवं वे श्रीचैतन्यकी अतिशय कृपाके द्वारा सदा स्निग्ध हैं, वे श्रीस्वरूप गोस्वामीके प्रिय और वैराग्य-राज्यकी एकमात्र निधि हैं। नीलाचलमें जो वास करते हैं, उनमेंसे उन्हें कौन नहीं जानता?263॥ अनुभाष्य— श्रीवासुदेवप्रियः (वासुदेव-दत्तठाकुरस्य प्रियः कृपापात्रं; न तु शिष्यः) सुमधुरः यदुनन्दनः आचार्यः; तच्छिष्यः (तस्य यदुनन्दनस्य शिष्यः इति कृपापात्रं, न तु तेनैव दीक्षितः इत्यर्थः) अधिगुणः (गुणैरधिकः सर्वाधिकगुणान्वितः) मादृशां (गौरप्राणानां) प्राणाधिकः (प्राणतोऽप्यधिकः प्रियः) श्रीचैतन्यकृपातिरेक-सततस्निग्धः (गौरकृपातिशयेन नित्यप्रेमवान्) स्वरूपप्रियः (दामोदर-स्वरूपानुगः) वैराग्यैकनिधिः (वैराग्यस्य एकनिधिः मुख्याश्रयः सिन्धुर्वा)
[ 6/263-270 छठा अध्याय 197 रघुनाथः (श्रीदासगोस्वामी) नीलाचले (पुरुषोत्तमक्षेत्रे) तिष्ठतां (निवसतां मध्ये) कस्य न विदितः ? [सर्वेषामेव परिचितोऽस्तीति भावः] । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 263 ॥ श्रीरघुनाथका अतुलनीय सौभाग्य :- यः सर्वलोकैकमनोभिरुच्या सौभाग्यभूः काचिदकृष्टपच्या। यस्यां समारोपणतुल्यकालं तत्प्रेमशाखी फलवानतुल्यः ॥ 264 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 264 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो समस्त लोगोंकी मनोभिरुचिके (चित्तरञ्जनके) द्वारा कोई एक (अनिर्वचनीय) अकृष्टपच्या (स्वतःप्रकटित) सौभाग्यकी भूमि (आधार-स्वरूपा) बने थे, जिनमें बीज बोनेके समय ही (श्रीचैतन्यका) अतुल्य (अनुपम) प्रेम-शाखी (वृक्ष) फलवान् हुआ था ॥ 264 ॥ अनुभाष्य- यः (दासगोस्वामी) सर्वलोकैकमनोभिरुच्या (सर्वेषां भक्तानां लोकानाम् एका प्रधाना या मनसः अभिरुचिः प्रीतिः तया) काचित् (अनिर्वचनीया) अकृष्टपच्या (कर्षणव्यतिरेकेण पक्वा, अर्थात् साधनेन सिद्धिलाभात् पूर्वमेव साधनव्यतिरेकेण वा सिद्धा) सौभाग्यभूः (सौभाग्यभूमिः), यस्यां (भूमौ) समारोपण- तुल्यकालं (बीजवपनसमकालमेव) अतुल्यः (अनुपमः) तत्प्रेमशाखी (तत् तस्य श्रीचैतन्यस्य प्रेमा, स एव शाखी वृक्षः) फलवान् [अभवत् इति शेषः] । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 264 ॥ शिवानन्द यैछे सेइ मनुष्ये कहिला। कर्णपूर सेइरूपे श्लोक वर्णिला ॥ 265 ॥ अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनने श्रीरघुनाथ दासके विषयमें जैसा उनके पिताके द्वारा भेजे गये व्यक्तिसे कहा, श्रीकविकर्णपूरने उपरोक्त श्लोकोंमें उसी बातका ही वर्णन किया है ॥ 265 ॥ गोवर्धनके द्वारा भेजे गये धन, सेवक और ब्राह्मणका वर्षाकालमें श्रीशिवानन्दके साथ पुरीमें जाना :- वर्षान्तरे शिवानन्द चले नीलाचले। रघुनाथेर सेवक, विप्र ताँर सङ्गे चले ॥ 266 ॥ अनुवाद-अगले वर्ष जब श्रीशिवानन्द सेन नीलाचलके लिये चले, तब श्रीरघुनाथ दासके पिताके द्वारा भेजे गये सेवक और एक ब्राह्मण भी श्रीशिवानन्द सेनके साथ चल दिये ॥ 266 ॥ सेइ विप्र-भृत्य, चारि-शत मुद्रा लञा। नीलाचले रघुनाथे मिलिला आसिया ॥ 267 ॥ अनुवाद-वह ब्राह्मण और सेवक चार सौ मुद्राएँ लेकर श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये थे और वहाँ वे श्रीरघुनाथ दाससे मिले ॥ 267 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा उन सबको अस्वीकार करना :- रघुनाथ-दास अङ्गीकार ना करिल। द्रव्य लञा दुइजन ताँहाइ रहिल ॥ 268 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ दासने उस धन और उन सेवकों एवं ब्राह्मणको स्वीकार नहीं किया। तब एक सेवक और ब्राह्मण, ये दो व्यक्ति उन मुद्राओंको लेकर वहींपर रह गये ॥ 268 ॥ प्रतिमास श्रीरघुनाथका महाप्रभुको दो बार निमन्त्रण :- तबे रघुनाथ करि' अनेक यतन। मासे दुइदिन कैला प्रभुर निमन्त्रण ॥ 269 ॥ अनुवाद-तब श्रीरघुनाथने यत्नपूर्वक बड़े सम्मानके साथ महाप्रभुको एक मासमें दो दिन भोजनके लिये निमन्त्रण करना प्रारम्भ किया ॥ 269 ॥ उसके लिये ही श्रीरघुनाथके द्वारा गोवर्धनके द्वारा भेजे धनको लेना :- दुइ निमन्त्रणे लागे कौड़ि अष्टपण। ब्राह्मण-भृत्य-ठाञि करेन एतेक ग्रहण ॥ 270 ॥ अनुवाद-दो बार निमन्त्रणमें आठ आने खर्च होते