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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

५/२०४-२१३ ] “हेन निताइ बिने भाइ, राधाकृष्ण पाइते नाइ, दृढ़ करि' धर निताईर पाय।” अर्थात् “श्रीनित्यानन्द प्रभुके श्रीचरणकमलोंका आश्रय ग्रहण किये बिना श्रीराधाकृष्णकी प्राप्ति नहीं हो सकती। अतः हे भाइयों! श्रीनित्यानन्द प्रभुके श्रीचरणोंको दृढ़तापूर्वक पकड़ लो अर्थात् दृढ़ विश्वासपूर्वक उनका आश्रय ग्रहण करो॥” २०४॥ ग्रन्थकारकी दैन्योक्ति- जगाइ माधाइ हैते मुञि से पापिष्ठ। पुरीषेर कीट हैते मुञि से लघिष्ठ॥ २०५॥ मोर नाम सुने येइ, तार पुण्य क्षय। मोर नाम लय येइ, तार पाप हय॥ २०६॥ एमन निर्घृण-मोरे केबा कृपा करे। एक नित्यानन्द बिनु जगत् भितरे॥ २०७॥ अपने प्रति श्रीनित्यानन्दकी कृपाका वर्णन :- प्रेमे मत्त नित्यानन्द कृपा-अवतार। उत्तम, अधम, किछु ना करे विचार॥ २०८॥ ये आगे पड़ये, तारे करये निस्तार। अतएव निस्तारिला मो-हेन दुराचार॥ २०९॥ मो-पापिष्ठे आनिलैन श्रीवृन्दावन। मो-हेन अधमे दिला श्रीरूप-चरण॥ २१०॥ अनुवाद-मैं जगाइ और माधाइसे भी अधिक पापी और मलके कीड़ेसे भी तुच्छ हूँ। जो मेरा नाम सुनता है, उसके पुण्य क्षय हो जाते हैं। जो मेरा नाम लेता है, उसे पाप लगता है। ऐसे घृणित व्यक्तिपर इस जगत्में एक श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिरिक्त और कौन कृपा कर सकता है? प्रेममें मत्त श्रीनित्यानन्द कृपाके अवतार हैं। वे उत्तम और अधमका कुछ भी विचार नहीं करते। जो भी उनके आगे गिर जाता है, वे उसका उद्धार करते हैं। इसलिये उन्होंने मेरे जैसे दुराचारीका भी उद्धार किया हैं। मैं पापी और पतित हूँ, तो भी उन्होंने मुझे श्रीवृन्दावनमें लाकर श्रीरूपगोस्वामीके चरणोंका आश्रय प्रदान किया॥ २०५-२१०॥ श्रीनित्यानन्द-कृपासे श्रीमदनमोहन-सेवाप्राप्ति :- श्रीमदनगोपाल-श्रीगोविन्द-दरशन। कहिबार योग्य नहे एअब कथन॥ २११॥ वृन्दावन-पुरन्दर श्रीमदनगोपाल। रासविलासी साक्षात् व्रजेन्द्रकुमार॥ २१२॥ श्रीराधा-ललिता-सङ्गे रास-विलास। मन्मथ-मन्मथरूपे याँहार प्रकाश॥ २१३॥ पाँचवाँ अध्याय | ३२३

[ ५/२११-२१९ अनुवाद-मैंने जो श्रीमदनगोपाल और श्रीगोविन्दके दर्शन किये, उस विषयको मैं कहने योग्य नहीं हूँ। श्रीमदनगोपाल वृन्दावनके मुख्य विग्रह हैं और वे रासविलासी साक्षात् व्रजेन्द्रकुमार हैं। वे श्रीराधा-ललिताके साथ रास विलास करते हैं और वे मन्मथ-मन्मथ अर्थात् कामदेवके मनको भी मथनेवाले रूपमें प्रकाशित होते हैं॥२११-२१३॥ श्रीमद्भागवत (१०/३२/२)- तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः। पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथः॥२१४॥ अनुवाद-उसी समय उन रोदनकारी व्रजदेवियोंके बीचमें शूरवंशके शिरोमणि श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उनका मुखकमल मन्द-मन्द मुस्कानसे खिला हुआ था, वे गलेमें वनमाला और शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए थे। उनका वह रूप-सौन्दर्य सबके मनको मथ डालनेवाले साक्षात् कामदेवके मनको भी मथनेवाला था॥२१४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीरासलीलामें गोपियोंके विच्छेद-विलापके बाद सहसा पीताम्बर, वनमाला और मुखकमलपर मन्द मुस्कान धारण किये हुए, साक्षात् मदनमोहन उनके बीचमें आविर्भूत हुए॥२१४॥ अनुभाष्य-रासक्रीड़ाके समय श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेके कारण श्रीकृष्णके दर्शनकी अभिलाषी गोपियोंके अधीर होकर रोनेपर उनके सामने गोविन्ददेव आविर्भूत हुए- तासां (दुःखपरिखिन्नानां गोपीनां मध्ये) स्मयमानमुखाम्बुजः (स्मयमानं मुखाम्बुजं यस्य सः) पीताम्बरधरः (पीतवसनधारी) स्रग्वी (माल्यवान्) साक्षात् मन्मथमन्मथः (कामदेव-मोहनमूर्तिः) शौरिः (कृष्ण) आविर्भूत्। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२१४॥ स्वमाधुर्ये लोकेर मन करे आकर्षण। दुइ पाशे राधा ललिता करेन सेवन॥२१५॥ नित्यानन्द-दया मोरे ताँरे देखाइल। श्रीराधा-मदनमोहन प्रभु करि' दिल॥२१६॥ अनुवाद-अपने दोनों ओर स्थित राधा और ललिताके द्वारा सेवित, वे अपने माधुर्यसे सभीके मनको आकर्षित करते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी दयाने मुझे उनका दर्शन करवाया और श्रीराधा-मदनमोहनको मेरे प्रभु रूपमें प्रदान किया॥२१५-२१६॥ श्रीनित्यानन्द-कृपासे श्रीगोविन्द-सेवा-लाभ :- मो-अधमे दिल श्रीगोविन्द-दरशन। करिबार कथा नहे अकथ्य-कथन॥२१७॥ कल्पवृक्षतले सखीसेवित श्रीराधागोविन्द :- वृन्दावने योगपीठे कल्पतरु-वने। रत्नमण्डप, ताहे रत्नसिंहासने॥२१८॥ श्रीगोविन्द बसियाछेन व्रजेन्द्रनन्दन। माधुर्य प्रकाशि' करेन जगत् मोहन॥२१९॥ ३२४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

वाम-पार्श्वे श्रीराधिका सखीगण-सङ्गे। रासादिक-लीला प्रभु करे कत रङ्गे ॥ २२० ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने इस अधमको श्रीगोविन्दके दर्शन कराये। इसे शब्दोंके द्वारा वर्णन करना अत्यन्त कठिन है और इसे प्रकाशित करना भी उचित नहीं है। वृन्दावनमें स्थित योगपीठमें कल्पवृक्षोंके वनमें एक रत्नमण्डप है। उस मण्डपमें रत्नसिंहासनपर ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीगोविन्द विराजमान होकर अपने माधुर्यको प्रकाशित करते हुए सारे जगत्को मोहित कर रहे हैं। उनके बाईं ओर श्रीराधिका अपनी सखियोंके साथ स्थित हैं। उनके साथ श्रीगोविन्द रासलीला और अनेक प्रकारकी लीलाओंका आस्वादन करते हैं॥ २१७-२२० ॥ ब्रह्माके उपास्य और अष्टादशाक्षर-मन्त्रके अभिधेय-देवता :- याँर ध्यान निज-लोके करे पद्मासन। अष्टादशाक्षर-मन्त्रे करे उपासन ॥ २२१ ॥ अनुवाद—ब्रह्मा अपने लोकमें कमल-आसनपर बैठकर सदा जिनका ध्यान करते हैं और अष्टादशाक्षर-मन्त्रके द्वारा जिनकी उपासना करते हैं॥ २२१ ॥ अनुभाष्य—पद्मासन ब्रह्मा अपने ब्रह्मलोकके निवासियोंके साथ अभिधेय-विग्रह श्रीगोविन्दमूर्तिका ध्यान करते हैं। चौदह भुवनोंके निवासियोंके ध्येय वे श्रीगोविन्द अष्टादशाक्षर-मन्त्रके द्वारा अर्चित होते हैं॥ २२१ ॥ चौद्दभुवने याँर सबे करे ध्यान। वैकुण्ठादि-पुरे याँर लीलागुण-गान ॥ २२२ ॥ याँर माधुरीते करे लक्ष्मी आकर्षण। रूपगोसाञि करियाछेन से-रूप वर्णन ॥ २२३ ॥ अनुवाद—चौदह भुवनोंमें सभी लोग जिनका ध्यान करते हैं, वैकुण्ठवासी भी जिनका गुण-गान करते हैं और जिनकी माधुरी लक्ष्मीको भी आकर्षित करती है, उनकी उस रूप-माधुरीका श्रीरूप गोस्वामीने वर्णन किया है॥ २२२-२२३ ॥ अनुभाष्य—आदिलीला, ४/१४७ में—“कृष्ण-माधुर्यरे एक स्वाभाविक बल। कृष्ण-आदि नरनारी करये चञ्चल॥” श्रीरूप गोस्वामीने लघुभागवतामृत (संख्या ३५१-३५२)में श्रीकृष्ण-माधुर्यके उत्कर्षके विषयमें पद्मपुराणके एक उपाख्यानका वर्णन किया है— “श्रीकृष्णका माधुर्य देखकर लक्ष्मीदेवीको उसमें लोभ हो गया और इसलिये तपस्या करते देखकर श्रीकृष्णने उनसे पूछा—‘तुम तपस्या क्यों कर रही हो?’ लक्ष्मीजीने कहा—‘मैं गोपीरूपसे वृन्दावनमें आपके साथ विहार करना चाहती हूँ।’ श्रीकृष्णने कहा—‘यह तो अत्यन्त दुर्लभ है।’ लक्ष्मीजी पुनः बोलीं—‘प्रभो! मैं स्वर्णरेखाके रूपमें आपके वक्षस्थलपर रहना चाहती हूँ।’ तब श्रीकृष्ण बोले—‘ऐसा ही हो।’ तबसे लक्ष्मीजी श्रीकृष्णके वक्षस्थलपर स्वर्णरेखाके रूपमें रह रही हैं।” श्रीमद्भागवत (१०/१६/३६) में नागपत्नियाँ श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए कह रही पाँचवाँ अध्याय | ३२५

[ ५/२२३-२२६ हैं—'लक्ष्मीजी यद्यपि परमा सुन्दरी हैं, तो भी उन्होंने सब कामनाएँ त्यागकर आपके पदधूलीकी अभिलाषासे व्रत धारणकर बहुत समय तक तपस्या की थी॥'२२३॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (१/२/२३९)— स्मेरां भङ्गीत्रय-परिचितां साचिविस्तीर्णदृष्टिं वंशीन्यस्ताधरकिशलयामुज्ज्वलां चन्द्रकेण। गोविन्दाख्यां हरितनुमितः केशीतीर्थोपकण्ठे मा प्रेक्षिष्ठास्तव यदि सखे बन्धुसङ्गेऽस्ति रङ्गः॥२२४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२२४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखे! यदि बन्धु-बान्धवोंका सङ्ग करनेके लिये तुम्हारा लोभ है, तो केशीघाटके निकट मन्द-मुस्कानयुक्त, त्रिभङ्ग मुद्रामें खड़े, बायीं ओर नेत्र-कटाक्ष करते, अधरकमलपर वंशीको धारण किये, किशलय (कोमल पत्तों) और मयूरपुच्छके द्वारा अत्यन्त शोभायमान श्रीगोविन्दकी श्रीमूर्तिके दर्शन नहीं करना। [तात्पर्य यह है कि श्रीगोविन्दकी श्रीमूर्तिका दर्शन करनेपर अन्यत्र वैराग्य उपस्थित होगा]॥२२४॥ अनुभाष्य—हे सखे! यदि तव बन्धुसङ्गे (पुत्रकलत्रादि-विषयिणां सङ्गे) रङ्ग (कौतूहलम्) अस्ति (विद्यते), तदा इतः (अस्मिन्) केशीतीर्थोपकण्ठे (यामुनतटस्थ-केशीतीर्थे) स्मेरां (स्मितान्वितां) भङ्गीत्रयपरिचितां (ग्रीवाकटिजानुभङ्गित्रयेण युक्तां) साचिविस्तीर्णदृष्टिं (तिर्यक्प्रशस्तावलोकनां) वंशीन्यस्ताधरकिशलयां (वंश्यां वेणौ न्यस्तः दत्तः अधर एव किशलयः नवपल्लवः यया तां) चन्द्रकेण (मयूरपिच्छेन) उज्ज्वलां (परमशोभामयीं) गोविन्दाख्यां हरितनुं (नन्दसूनुमूर्तिं) मा प्रेक्षिष्ठाः (अवलोकय, इति निषेधव्याजेन परमसौन्दर्याधारविग्रहम् अवश्यमेव द्रष्टव्यमभिप्रेतम्। तन्माधुर्ये अनुभूयमाने सर्वमेव तुच्छं मंस्यसे, तस्मादेनामेव पश्येत्यभिप्रायः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है। यहाँ दर्शनका निषेध करनेका तात्पर्य है कि समस्त सौन्दर्यके आधार श्रीगोविन्दका अवश्य ही दर्शन करो। उस माधुरीको अनुभव करनेके बाद जगत्की सभी वस्तुएँ स्वतः ही तुच्छ लगेंगी, यही उस दर्शनका अभिप्राय है॥२२४॥ अप्राकृत श्रीविग्रहमें प्राकृत शिलाकाष्ठधातु-बुद्धि महापराध :— साक्षात् व्रजेन्द्रसुत, इत्थे नाहि आन। येबा अज्ञे करे ताँरे प्रतिमा-हेन ज्ञान॥२२५॥ सेइ अपराधे तार नाहिक निस्तार। घोर नरकेते पड़े, कि बलिब आर॥२२६॥ अनुवाद—निःसन्देह ये साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन हैं। जो मूर्ख है, वही उनको प्रतिमा मानता है। इस अपराधके कारण उसका उद्धार नहीं हो पाता है। और क्या कहूँ, वह अपराधी घोर नरकमें जाकर गिरता है॥२२५-२२६॥ अनुभाष्य—श्रीभक्तिसन्दर्भमें (२८६ संख्यामें)— “परमोपासकश्च साक्षात् परमेश्वरत्वेनैव तां पश्यन्ति। भेदस्फूर्तेर्भक्तिविच्छेदकत्वात् तथैव ह्युचितम्॥” ३२६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

अर्थात् “परमोपासकगण श्रीमूर्तिको साक्षात् परमेश्वर मानकर ही उसका दर्शन करते हैं। भगवान्‌के साथ भगवान्‌की श्रीमूर्तिका भेदज्ञान होनेपर भक्तिका विच्छेद होता है, इस कारण श्रीमूर्त्तिमें साक्षात् भगवद्बुद्धि करना ही कर्त्तव्य है। भक्तिसे विच्युत होनेपर जीव अभक्त होकर अपराध करने लगता है।” “अर्च्ये विष्णौ शिलाधी-र्गुरुषु नरमतिर्वैष्णवे जातिबुद्धि- र्विष्णोर्वा वैष्णवानां कलिमलमथने पादतीर्थेऽम्बुबुद्धिः। श्रीविष्णोर्नाम्नि मन्त्रे सकलकलुषहे शब्दसामान्यबुद्धि- र्विष्णो-सर्वेश्वरेशे तदितरसमधीर्यस्य वा नारकी सः॥” अर्थात् “जो व्यक्ति श्रीमूर्त्तिमें शिला बुद्धि, वैष्णव और गुरुदेवमें मरणशील मानव बुद्धि, वैष्णवोंमें जाति बुद्धि, विष्णु और वैष्णवोंके चरण धौतजलमें जल बुद्धि तथा सर्वपापनाशक विष्णुनाम और मन्त्रमें सामान्य शब्द बुद्धि एवं सर्वेश्वर विष्णुमें अन्य देवताओंके साथ समान बुद्धि रखता है, वह नारकीय है।” पद्मपुराणके इस श्लोकके अनुसार श्रीविष्णुविग्रहको जड़-द्रव्योंसे बनी वस्तु अथवा 'प्रतीक' माननेवाले जीवको 'नारकी' कहा जाता है। निर्विशेषवादी लोग प्राकृतदृष्टियुक्त रहकर प्रेमनेत्रोंसे श्रीमूर्तिके दर्शनसे वञ्चित हो जाते हैं। इसलिये वैष्णव-विचारसे वे लोग 'अपराधी मायावादी' कहलाते हैं। श्रीमद्भागवत (१०/८४/१३)में “यस्यात्मबुद्धिः” श्लोकमें “भौम इज्यधीः” आदि भावविशिष्ट व्यक्ति अर्थात् जन्मभूमिमें ही उपास्य बुद्धि रखनेवालेको अनभिज्ञतावशतः भगवत्-सेवाधिकार प्राप्त नहीं होता॥२२५-२२६॥ हेन ये गोविन्द प्रभु, पाइनु याँहा हैते। ताँहार चरण-कृपा के पारे वर्णिते॥२२७॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंकी कृपाका कौन वर्णन कर सकता है, जिनके द्वारा मैंने ऐसे प्रभु श्रीगोविन्दको प्राप्त किया?॥२२७॥ श्रीनित्यानन्द-गौरके आश्रयमें श्रीराधागोविन्द-भजन ही वैष्णवता :— वृन्दावने वैसे यत वैष्णवमण्डल। कृष्णनाम-परायण, परम मङ्गल॥२२८॥ याँर प्राणधन-नित्यानन्द श्रीचैतन्य। राधाकृष्ण-भक्ति बिने नाहि जाने अन्य॥२२९॥ अनुवाद—वृन्दावनमें जितने वैष्णव वास करते हैं, वे सभी परम मङ्गलमय, श्रीकृष्णनाम-परायण हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीचैतन्य महाप्रभु उनके प्राणधन स्वरूप हैं। वे लोग श्रीराधाकृष्णकी भक्तिके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानते हैं॥२२८-२२९॥ अनुभाष्य—श्रीवृन्दावनवासी सभी वैष्णव ही परममङ्गलमय, श्रीकृष्णनाम परायण और भक्तिके अङ्गोंमें कीर्त्तनाख्या भक्तिके आश्रित हैं। श्रीगौर-नित्यानन्द उनके प्राणधन हैं। श्रीराधाकृष्णकी नित्यसेवाके अतिरिक्त वे लोग अन्य किसी काल्पनिक भक्तिको नहीं जानते हैं। आजकल प्राचीन शुद्धभक्तोंकी भजन-प्रणालीको त्यागकर कुछ लोगोंने नये पन्थोंकी

[ ५/२२८-२३२ कल्पना की है। किसीका कहना है—“श्रीगौराङ्ग राधाकृष्ण हों या ना हों, उनका गौर नाम ही हमें अच्छा लगता है, राधाकृष्ण नाममें हमारी वैसी रुचि नहीं है। हमारे लिये ‘नदीया-नागरी’ भावमें मधुर (सम्भोग)-रससे गौरकी उपासना ही ‘गौर-भक्ति’ है। नागरीभावसे गौरकी उपासना ना करनेपर श्रीगौराङ्गके स्वतन्त्र अवतारकी सार्थकता क्या है?” पूर्वकालमें ऐसे कुमत नहीं थे, परन्तु कलिके वृद्धिके साथ-साथ वैष्णवोंके कुछ गुटोंमें इस प्रकारके प्रबल भावोंको देखकर शुद्धभक्तोंके हृदयमें दुःख होता है। दुस्तर मायाके हाथोंकी कठपुतली होकर वे लोग श्रीगौराङ्गको श्रीराधाकृष्णकी अपेक्षा और भी कुछ बड़ा मानते हैं, अर्थात् ‘राधा एवं कृष्ण’ दोनोंका मिलित-तनु होनेके कारण श्रीगौराङ्ग अकेले श्रीकृष्णकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं। अथवा कुछ लोग प्राकृत स्मार्त्त और पञ्चोपासक-समाजके विचारोंको ग्रहणकर श्रीगौर, श्रीगौरधाम, श्रीगौरशक्ति और श्रीगौरभक्तिके विरोधी होकर अपने प्राकृत ज्ञानके बलसे श्रीराधाकृष्ण-भजनकी कल्पना करते हैं। ये दोनों सम्प्रदाय ही षड्गोस्वामियोंके विशुद्धमतके विरोधी हैं, इसलिये वे भगवद्भक्तिविहीन, इन्द्रियपरायण, नास्तिक और कलिके दास हैं। सर्वदर्शी, सर्वज्ञ श्रीकविराज गोस्वामीने यह देख लिया था कि भविष्यमें ऐसे हरिविमुख दाम्भिक लोग अपनेको श्रीगौरसुन्दरका अत्यन्त प्रिय कहकर अपना परिचय देंगे और वास्तव श्रीगौर-वस्तुको विस्मृत होकर श्रीराधाकृष्णकी भक्तिको छोड़ देंगे। दुर्भागे जीवोंके साथ छल करनेके लिये वे अपनी कुवासनासे उत्पन्न निज-कल्पित श्रीगौराङ्गका बहुत आदर करेंगे। अधिक कहनेका प्रयोजन नहीं है, श्रीगान्धर्विका-गिरिधरके चरणयुगल ही वास्तवमें श्रीगौराङ्ग-पदाश्रितजनोंके एकमात्र आराध्य हैं॥ २२८-२२९॥ श्रीनित्यानन्द-कृपासे वैष्णव चरणकमलोंकी प्राप्ति :- से वैष्णवेर पदरेणु, तार पदछाया। अधमेरे दिल प्रभु-नित्यानन्द-दया॥ २३०॥ ‘ताँहा सर्व लभ्य हय’—प्रभुर वचन। सेइ सूत्र—एइ तार कैल विवरण॥ २३१॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुकी दयासे उन शुद्धवैष्णवोंकी चरणधूलि और चरणाश्रय इस अधमको प्राप्त हुए। श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा था कि ‘वहाँपर सब कुछ प्राप्त होगा’। इस सूत्रका मैंने यहाँपर विस्तृत रूपसे वर्णन किया है॥ २३०-२३१॥ श्रीनित्यानन्द-कृपासे सर्वाभीष्ट पूर्ण :- से सब पाइनु आमि वृन्दावन आय। सेइ सब लभ्य एइ प्रभुर कृपाय॥ २३२॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावन आकर मैंने यह सब पाया है। यह सब श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपासे ही सम्भव हुआ है॥ २३२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘आय’—आकर॥ २३२॥ इति अमृतप्रवाहभाष्ये पञ्चम परिच्छेद। पाँचवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। ३२८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

५/२३१-२३५ ] अनुभाष्य-वृन्दावनमें वैष्णवोंके आदेशसे श्रीचैतन्यचरितामृत लिखनेका मूल सूत्र-श्रीनित्यानन्द प्रभुका कृपा-आदेश है। आदिलीला ५/१९६ द्रष्टव्य है॥ २३१॥ आपणार कथा लिखि निर्लज्ज हइया। नित्यानन्द-गुणे लेखाय उन्मत्त करिया॥ २३३॥ नित्यानन्द-प्रभुर गुण-महिमा अपार। ‘सहस्रवदने’ शेष नाहि पाय याँर॥ २३४॥ अनुवाद-मैंने निर्लज्ज होकर अपनी बातें लिखीं हैं। वास्तवमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके गुणोंने ही उन्मत्त करके मुझसे यह लिखवाया है। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी गुण-महिमा अपार है। स्वयं शेष भी अपने हजारों मुखोंसे उनका वर्णन नहीं कर पाते हैं॥ २३३-२३४॥ अनुभाष्य-मध्यलीला २१/१०,१२ संख्या और भागवत २/७/४१ एवं १०/१४/७ श्लोक द्रष्टव्य हैं॥ २३४॥ इति अनुभाष्ये पञ्चम परिच्छेद। पाँचवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ २३५॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे श्रीनित्यानन्द-तत्त्वनिरूपणं नाम पञ्चम-परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ २३५॥ श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डमें श्रीनित्यानन्द-तत्त्व निरूपण नामक पाँचवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। पाँचवाँ अध्याय | ३२९

'चैतन्येर दास मुञि, चैतन्येर दास। चैतन्येर दास मुञि, ताँर दासेर दास॥' एत बलि' नाचे, गाय, हुङ्कार गम्भीर।

छठा अध्याय छठे अध्यायका कथासार-श्रीमद्-अद्वैताचार्य प्रभुका स्वरूप और महिमा दो श्लोकोंके विचारके द्वारा निरूपित हुए हैं। मायाकी दो वृत्तियाँ हैं-निमित्त और उपादान। प्रकृतिमें लक्षित निमित्त-कारणरूप पुरुषावतारका नाम 'महाविष्णु' है। उपादानरूप प्रधानतत्त्वमें महाविष्णुका द्वितीय स्वरूप ही 'श्रीअद्वैत' है। वे श्रीअद्वैत जगत्‌की सृष्टि आदि कार्योंके कर्त्ताविशेष हैं और उन्होंने भक्तभावको स्वीकार करके जगत्‌में भक्तिकी शिक्षा दी है। उन्हें श्रीचैतन्य महाप्रभुका दास कहनेसे उनकी महिमाकी ही वृद्धि होती है, क्योंकि अन्तर्भुक्त दास्यभावके अतिरिक्त किसी भी रसमें श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन नहीं किया जा सकता। (अमृतप्रवाह भाष्य) अद्वैताचार्यकी कृपासे तत्स्वरूपनिरूपणमें सामर्थ्य :- वन्दे तं श्रीमदद्वैताचार्यमद्भुतचेष्टितम्। यस्य प्रसादादज्ञोऽपि तत्स्वरूपं निरूपयेत् ॥ १॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनकी कृपासे मूर्ख व्यक्ति भी उनके स्वरूपका निरूपण कर सकता है, उन अद्भुत चेष्टायुक्त श्रीमद्-अद्वैताचार्यकी मैं वन्दना करता हूँ॥१॥ अनुभाष्य-यस्य (अद्वैतप्रभोः) प्रसादात् (अनुकम्पया) अज्ञः अपि तत्स्वरूपं (वस्तुतत्त्वं) निरूपयेत् (निरूपयितुं शक्नुयात्) तम् अद्भुतचेष्टितं (अद्भुतानि चेष्टितानि यस्य तं) श्रीमदद्वैताचार्यम् [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृताणुकणिका-उपासनाके द्वारा उन्होंने श्रीकृष्णचन्द्रको अवतीर्ण कराया, यही श्रीमद्-अद्वैताचार्यकी अद्भुत चेष्टा है॥१॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥२॥ अनुवाद-श्रीचैतन्यमहाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभु और श्रीमन्महाप्रभुके समस्त भक्तगण जययुक्त हों॥२॥ पञ्चश्लोके कहिल श्रीनित्यानन्द-तत्त्व। श्लोकद्वये कहि अद्वैताचार्येर महत्त्व ॥३॥ अनुवाद-पूर्व अध्यायमें पाँच श्लोकोंके द्वारा श्रीनित्यानन्द प्रभुका तत्त्व कहा गया था। अब दो श्लोकोंके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यकी महिमा कही जा रही है॥३॥ मङ्गलाचरणके चौदह श्लोकोंमें बारहवें और तेरहवें श्लोकोंकी व्याख्या :- श्रीस्वरूप गोस्वामी कड़चा- महाविष्णुर्जगत्कर्त्ता मायया यः सृजत्यदः। तस्यावतार एवायमद्वैताचार्य ईश्वरः ॥ ४॥

[ ६/४-१० अद्वैतं हरिणाद्वैतादाचार्यं भक्तिशंसनात्। भक्तावतारमीशं तमद्वैताचार्यमाश्रये ॥५॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४-५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो महाविष्णु, मायाके द्वारा इस जगत्की सृष्टि करते हैं, वे जगत्-कर्त्ता हैं; ईश्वर श्रीअद्वैताचार्य उनके ही अवतार हैं। हरिसे अभिन्न तत्त्व होनेके कारण उनका नाम 'अद्वैत' और भक्ति-शिक्षक होनेके कारण वे 'आचार्य' कहलाते हैं, उन भक्तावतार श्रीअद्वैताचार्य ईश्वरको मैं आश्रय करता हूँ॥४-५॥ अनुभाष्य-यः जगत्कर्त्ता महाविष्णुः (निमित्तकारणमाश्रयः) मायया अदः (विश्वं) सृजति, तस्य अवतारः एव अयम् ईश्वरः (उपादानकारणाश्रयः) अद्वैताचार्यः। हरिणा (विष्णुतत्त्वेन सह) अद्वैतात् (भेदरहित्यात् हेतोः) 'अद्वैतं', भक्तिशंसनात् (भजनोपदेष्टृत्वात् हेतोः) 'आचार्यं', भक्तावतारम् ईशं तम् अद्वैताचार्यम् आश्रये (प्रपद्ये)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है। महाविष्णु निमित्त-कारणके आश्रय हैं और श्रीअद्वैताचार्य उपादान-कारणके आश्रय हैं॥४-५॥ श्रीअद्वैतका तत्त्व और महिमा :- अद्वैत-आचार्य गोसाञि साक्षात् ईश्वर। याँहार महिमा नहे जीवेर गोचर॥६॥ महाविष्णुके अवतार :- महाविष्णु सृष्टि करेन जगदादि कार्य। ताँर अवतार साक्षात् अद्वैत आचार्य॥७॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य गोसाईं साक्षात् ईश्वर हैं, इसलिये उनकी महिमा जीवबुद्धिसे अगोचर है। महाविष्णु जगत्की सृष्टि आदि कार्य करते हैं। श्रीअद्वैताचार्य उनके साक्षात् अवतार हैं॥६-७॥ कारणार्णवशायीके अभिन्नांश :- ये पुरुष सृष्टि-स्थिति करेन मायाय। अनन्त ब्रह्माण्ड सृष्टि करेन लीलाय॥८॥ इच्छाय अनन्त मूर्ति करेन प्रकाश। एक एक मूर्त्तये करेन ब्रह्माण्डे प्रवेश॥९॥ से पुरुषेर अंश-अद्वैत, नाहि किछु भेद। शरीर-विशेष ताँर,-नाहिक विच्छेद॥१०॥ अनुवाद-जो पुरुष (महाविष्णु) अपनी बहिरङ्गा शक्तिके द्वारा जगत्की सृष्टि और पालन करते हैं तथा अपनी लीलामें असंख्य ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करते हैं, जो अपनी इच्छासे अपनी अनन्त मूर्तियोंको प्रकाश करके उनके द्वारा एक-एक ब्रह्माण्डमें प्रवेश करते हैं, श्रीअद्वैताचार्य उन पुरुषके अंश हैं और उनसे अभिन्न हैं। वास्तवमें वे उनसे भिन्न नहीं हैं, वे केवल उनका ही विग्रह-विशेष हैं॥८-१०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-एक ही माया उपादान-अंशसे 'प्रधान' और निमित्तांशसे 'माया' है। ३३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/८-१२ ] महाविष्णु मायाकी इन दो वृत्तियोंमें दो रूपोंसे विराजमान हैं। महाविष्णु एक स्वरूपसे प्रकृतिमें स्थित होकर जगत्के निमित्त कारण हैं, वही विष्णुरूप है। दूसरे स्वरूपसे वे प्रधानमें स्थित होकर रुद्ररूपमें 'श्रीअद्वैत' हैं। इसलिये उन पुरुषसे श्रीअद्वैतका कुछ भी भेद नहीं है, केवल शरीरका भेद है॥१०॥ जगत्-उपादान प्रधानके अधिष्ठातृदेवता :- सहाय करेन ताँर लइया 'प्रधान'। कोटि ब्रह्माण्ड करेन इच्छाय निर्माण॥११॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य प्रधानको लेकर सृष्टिकार्यमें महाविष्णुकी सहायता करते हैं। वे अपनी इच्छासे उपादान रूपमें 'प्रधान'के द्वारा कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचनामें सहायता करते हैं॥११॥ मङ्गलमय श्रीअद्वैत :- जगत्-मङ्गल अद्वैत, मङ्गल-गुणधाम। मङ्गल-चरित्र सदा, 'मङ्गल' याँर नाम॥१२॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य जगत्के मङ्गलस्वरूप हैं, क्योंकि वे सभी मङ्गलमय गुणोंके आधार हैं। उनका चरित्र अथवा लीला भी सदा सबके लिये मङ्गलमय है और उनका नाम भी 'मङ्गल' है अथवा उनका नाम ग्रहण करनेसे जीवका सब प्रकारसे मङ्गल होता है॥१२॥ अनुभाष्य-श्रीअद्वैताचार्य महाविष्णु हैं और वे आचार्य हैं। विष्णुके सभी कार्य मङ्गलमय होते हैं। उनकी लीलाएँ मङ्गलमय हैं और उनमें माङ्गल्यका दर्शन करनेपर जीवका मङ्गल होता है। वे सभी मङ्गलके मूल हैं। उनका सेवोनमुख आचरण जगत्में सबके मङ्गलका विधान करता है। कुछ लोग कहते हैं कि श्रीअद्वैत प्रभुका दूसरा नाम 'मङ्गल' था। जगत्के जञ्जालमें फंसे लोग इस शुद्ध, नित्य, पूर्ण और मुक्त (सेवारूप) मङ्गलको ना समझकर आत्मवृत्ति 'भक्ति' से दूर हो जाते हैं। चिन्मयगुणशाली श्रीअद्वैताचार्यने कभी भी सकाम कर्मानुष्ठान अथवा निर्विशेष-मुक्तिलाभादि अमङ्गलका उपदेश नहीं किया। उनको अद्वय-विष्णुतत्त्व ना समझकर, भक्तिहीन और केवलाद्वैतवादि-ज्ञानसे जिन सभी मायामोहित असुरस्वभाव जीवोंने उनके अनुगमन करनेका दिखावामात्र किया था, अपनी मायाके द्वारा उनके स्वार्थ-पोषणरूपी छलके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यने उन अभक्तोंको जो दण्ड विधान किया, वह भी उनका मङ्गलाचरण ही था। विष्णुवस्तु अन्वय और व्यतिरेकभाव (अर्थात् पक्षपात और दण्ड), दोनोंके द्वारा जीवोंके मङ्गलका ही विधान करते हैं। अमङ्गलको मङ्गलके रूपमें प्रतिष्ठित करके विष्णुमायाके उपादानके मूल श्रीअद्वैताचार्यको नहीं जाना जा सकता। वे नैमित्तिक अवताररूपमें प्रकृतिमें उपादान-शक्तिका सञ्चार करते हैं। वे कोई अमङ्गलमय प्राकृत वस्तु नहीं हैं और वे अमङ्गलमय प्राकृत गुणोंके आश्रय नहीं हैं। उनके चरित्रका अनुकरण करनेसे ही जीवोंके मङ्गलका उदय होता है। उनका नाम श्रवण और कीर्तन करनेसे जीवोंके सब अमङ्गल विनष्ट हो जाते हैं। विष्णु-वस्तुमें किसी प्रकार अकल्याणकारी, खण्डित, निर्विशेष-धर्मका आरोप नहीं करना चाहिये। उनकी जो छठा अध्याय ३३३

[ ६/१२-१५ वास्तविक सत्ता है, उस विषयमें अप्राकृत ज्ञान लाभ करनेपर ही जीवका परम मङ्गल होता है॥१२॥ असंख्य वैभव लेकर पुरुषके द्वारा सृष्टि :- कोटि अंश, कोटि शक्ति, कोटि अवतार। एत लञा सुजे पुरुष सकल संसार ॥१३॥ अनुवाद-आदिपुरुष महाविष्णु करोड़ों अंशों, करोड़ों शक्तियों और करोड़ों अवतारोंको लेकर इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं॥१३॥ मायाके दो रूप :- माया यैछे दुइ अंश—'निमित्त', 'उपादान'। 'माया'—निमित्त-हेतु, उपादान—'प्रधान' ॥ १४॥ दो मूर्तियोंसे कारणोदशायीके द्वारा सृष्टि :- पुरुष ईश्वर ऐछे द्विमूर्त्ति हइया। विश्व-सृष्टि करे 'निमित्त', 'उपादान' लञा ॥ १५॥ अनुवाद-मायाके जैसे दो अंश 'निमित्त' और 'उपादान' हैं, जिसमें गुणमयी माया 'निमित्त' है और 'प्रधान' उपादान। वैसे ही पुरुष अर्थात् महाविष्णु 'निमित्त' और ईश्वर अर्थात् श्रीअद्वैत 'उपादान'-दो रूप धारण करते हैं॥१४-१५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस प्रकार प्रकृतिमें 'निमित्त' और 'उपादान'-दो भाग होते हैं, उसी प्रकार पुरुष, 'महाविष्णु' रूपमें निमित्त और 'अद्वैत' रूपमें उपादान-ये दो मूर्तियाँ होकर विश्वकी सृष्टि करते हैं॥१५॥ अनुभाष्य-मध्य, २०/२७१ पयार द्रष्टव्य है। इस जगत्के मूलकारणके निर्णय करनेमें दो प्रकारकी विचार प्रणालियाँ दिखायी देती हैं। एक प्रकारका मत यह है—'सच्चिदानन्द-वस्तुसे गौणरूपमें इस जगत्की सृष्टि हुई है और मुख्यरूपमें परिकर-सहित गोलोक-वैकुण्ठादिका प्रकाश हुआ है।' दूसरा मत यह है-'असत्, अचित् और निरानन्द जगत्का मूल दुर्ज्ञेय, अव्यक्त और वस्तु-अभाव है।' प्रथम मत वेदोंके चरमफल वेदान्तमें व्यक्त है; और सांख्यादि स्मृतियोंने वस्तुवादके विरोधके उद्देश्यसे उसके विपरीत दूसरे मतको प्रकाश किया है। इस जगत्में अधिकांश ही अचित्की प्रतीति होती है। प्राणियोंमें जो चिदाभास-धर्म है, वह गुणमाया-रचित विश्वके साथ संलग्न है और उस प्रकार चेतनधर्म भी प्रकृतिके गुणोंसे उत्पन्न हुआ है-इस विचारसे उपादान-कारणके विषयमें कोई-कोई वेदान्त-मतके साथ भेद स्थापित करते हैं। सर्वकारण-कारण मूल वस्तु अर्थात् भगवान् ही शक्तिमान्-तत्त्व हैं और शक्ति भी शक्तिमान्में अवस्थित है। यह जगत् जिस प्रकारकी शक्तिसे प्रकट हुआ है, उससे भिन्न शक्तिसमूह भी उस बृहद्-पालक वस्तुमें नित्य अवस्थित है। जो लोग जगत्के विषयोंकी सेवामें आबद्ध हैं, वे जागतिक शक्तिकी उपलब्धि करके उसे ही केवल शक्तिमान् कहकर भगवान् मान लेते हैं। वे ऐसा अपसिद्धान्त करते हैं—एकमात्र शक्तिसे ही शक्तिमान्की उत्पत्ति होती है और खण्ड-शक्तिमान् वस्तुओंको प्राकृत ज्ञानसे अखण्ड-शक्तिमान् (भगवान्) मानकर उसे प्रकृतिसे ३३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/१४-१५ ]

उत्पन्न हुआ कहते हैं। जागतिक इन्द्रियज्ञानसे जो सत्-असत् (कार्य-कारण) ज्ञेयरूपमें निर्दिष्ट हुआ है, उसीको 'मूल' मानकर विचार करनेपर यह कहा जा सकता है कि अचित्से ही चेतन वस्तु उत्पन्न होती है, किन्तु वास्तविक सत्य यह है कि सृष्टि करनेवाली शक्ति वास्तव-वस्तुमें ही अधिष्ठित है। जो वस्तु देश-काल-पात्रकी सृष्टि करती है, उस वस्तुको मूल-कारणरूपमें निर्देश ना करके बहु-विचित्रतावाली असंख्य वस्तुओंको पहले ग्रहण करके, तब उनमेंसे अपने अनुमानके अनुसार एककी ओर अग्रसर होनेकी पद्धतिको 'अधिरोह-वाद' कहते हैं। 'अवरोह-विचार'से वस्तु (भगवान्) ही सर्वकारण-कारण है और उनमें अनन्तशक्ति विद्यमान होनेके कारण वे सविशेष-तत्त्व हैं। उनका निर्विशेषत्व भी असंख्य सविशेष-विचारोंमेंसे एक है। अचित्-वस्तुकी धारणा लेकर उसके कार्यज्ञानसे उसके कारणका अनुसन्धान करनेपर मादकद्रव्यके सङ्गसे जनित बुद्धिके समान बुद्धि उत्पन्न होती है। 'जड़ प्रकृति ही जगत्का मूल कारण है'-ऐसी धारणा सत्य नहीं है। वास्तवमें यह जगत् अनन्तशक्तिमान् परमेश्वरकी ईक्षण-शक्तिसे ही अव्यक्त और अचित्-शक्तिकी परिणति है। प्रकृति सर्वशक्तिमान्से शक्ति प्राप्त करके जीवकी जड़ेन्द्रियोंके अनुभव योग्य काल-देशकी सीमाओंमें बद्ध जगत्की रचना करती है। बद्धजीवको भगवान्की अनुभूति उनकी जगत्-निर्माणकी शक्तिके द्वारा ही होती है-ऐसी विचार-भ्रान्ति भगवान्का उनकी शक्तियोंके साथ सम्बन्धको ना जाननेके कारण होती है। जब तक भगवद्विमुख जीवके हृदयमें सत्यका प्रकाश नहीं होता है, तब तक वह इस जगत्में विचरण करते हुए सत्यवस्तुको नहीं समझ पाता। श्रील बलदेव विद्याभूषण गोविन्दभाष्यमें (ब्रः सूः, द्वितीय अध्याय, द्वितीय पाद)— “सांख्याचार्यः कपिलस्तत्त्वानि सञ्चग्राह, - सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः। प्रकृतेर्महान्, महतोऽहङ्कारः, अहङ्कारात् पञ्चतन्मात्राणि, उभयमिन्द्रियं, स्थूलभूतानि, पुरुष इति पञ्चविंशतिर्गण इति। साम्येनावस्थितानि पुरुषसत्त्वादीनि प्रकृतिः। तानि च सुखदुःखमोहात्मकानि क्रमाद्बोध्यानि,—तत्कार्ये जगति सुखादिरूपत्वदर्शनात्। तथाहि तरुणी रत्या पत्युः सुखदेति सात्त्विकी भवति, मानेन दुःखदेति राजसी, विरहेण मोहदेति तामसी चेत्येवं सर्वे भावा द्रष्टव्याः। उभयमिन्द्रियमिति दश बाह्येन्द्रियाण्येकस्त्वरिन्द्रियं मन इत्येकादशेत्यर्थः। नित्या विभ्वी च प्रकृतिः। मूले मूलाभावादमूलं मूलम्। न परिच्छिन्नं सर्वोपादानम्। “सर्वत्र कार्यदर्शनात् विभुत्वम्” इति सूत्रेभ्यः। महदहङ्कार-पञ्चतन्मात्राणि सप्त प्रकृतिविकृतयः। अहमादेः प्रकृतयः, प्रधानादेस्तु विकृतय इति। एकादशेन्द्रियाणि पञ्चभूतानि चेति षोड़श विकृतय एव। पुरुषस्तु निष्परिणामत्वान्न कस्यापि प्रकृतिर्न च विकृतिरिति। सा खलु प्रकृतिर्नित्यविकारा स्वयमचेतनाऽप्यनेकचेतन-भोगापवर्ग-हेतुरत्यन्तातीन्द्रियापि तत्कार्येणानुमीयते। एकैव विषमगुणा सती परिणामशक्त्या महदादिविचित्ररचनं जगत् प्रसूते इति जगन्निमित्तोपादानभूता सेति। पुरुषस्तु निष्क्रियो निर्गुणो विभुचित् प्रतिकायं भिन्नः सङ्घातपरार्थानुमेयश्च सः। विकारक्रिययोर्विरहात् कर्तृत्वभोक्तृत्वयोर्विरहः। एवं स्थिते प्रकृति-पुरुषयोस्तत्त्वे सन्निधिमात्रात् तयोर्मिंथोधर्मविनिमयः—प्रकृतौ चैतन्यं पुरुषे तु कर्तृत्व-भोक्तृत्वयोरध्यासो भवति। इत्थमविवेकात् भोगः, विवेकात् तु अपवर्गः। प्रकृत्यौदासीन्यवपुरित्येवमादीनर्थान् सोपपत्तिकैः सूत्रैर्निबबन्ध। अस्यां प्रक्रियायां प्रत्यक्षानुमानागमान् प्रमाणानि मेने। त्रिविधं प्रमाणं, तत्सिद्धौ सर्वसिद्धेर्नाधिक्यसिद्धिरिति। तत्र प्रत्यक्षागमसिद्धेष्वर्थेषु नातीव विसंवादः। यत्तु “परिणामात्”, “समन्वयात्”, “शक्तितश्च” इत्यादि सूत्रैः प्रधानं जगत्कारणमनुमितं, तन्नििरस्यं भवति,—तेनैव सर्वतन्मत-निरासात्। तत्र प्रधानं जगन्निमित्तोपादानं भवेत् न वेति संशये, प्रधानमेव तथा जगतः सात्त्विकादिरूपत्वात् प्रधानस्यैव सत्त्वादिंरूपस्य तदुपादानत्वेनानुमानात्। घटादिकार्यस्योपादानं खलु तत्-सजातीयं मृदाद्येव दृष्टम्। फलति वृक्षश्चलति जलमितिवत् जड़स्यापि तस्य कर्तृत्वञ्च। तस्मात् प्रधानमेव जगदुपादानं जगत्कर्तृ चेत्येवं प्राप्ते, (ब्रः सूः द्वितीय अध्याय, द्वितीय पाद)—

छठा अध्याय | ३३५

[ ६/१४-१५ “रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम्”॥ १॥ अनुमीयते जगद्धेतुतयेत्यनुमानं जडं प्रधानम्। तन्न जगदुपादानं, न च तन्निमित्तम्। कुतः?—रचनेति। विचित्रजगद्रचनायाश्चेतनानधिष्ठितेन जड़ेन तेनासिद्धेरित्यर्थः। न खलु चेतनानधिष्ठितैरिष्टकादिभिः प्रासादादिरचना सिद्धा लोके। च-शब्देनान्वयानुपपत्ति समुच्चिता। न हि बाह्य घटादयः सुखादिरूपतयान्विताः। सुखादीनामान्तरत्वात् घटादीनां सुखादिहेतुत्वात् तद्रूपत्वाप्रतीतेश्च॥ १॥ “प्रवृत्तेश्च”॥ २॥ जड़स्य चेतनाधिष्ठितत्वे सतीति शेषः। यस्मिन्नधिष्ठातरि सति जड़ं प्रवर्त्तते, तस्यैव सा प्रवृत्तिरिति निश्चितं रथसूतादौ। ईत्थञ्च फलतीत्यादिकं प्रत्युक्तम्। तत्रापि चेतनाधिष्ठितत्वात् तच्चान्तर्यामिब्राह्मणात्। एतत् परत्र स्फुटीभावि। चोऽवधारणे। अहं करोमीति चेतनस्यैव प्रवृत्तिदर्शनात् जड़स्य कर्तृत्वं नेति वा। ननु प्रकृति-पुरुषयोः सन्निधिमात्रेण मिथो धर्माध्यासात् जगद्-रचनोपपत्तिरिति चेदुच्यते, —अध्यासहेतुः सन्निधिः किं तयोः सद्भावः किंवा प्रकृतिपुरुषगतः कश्चिद्विकार इति? नाद्यः—मुक्तानामप्यध्यासप्रसङ्गात् अन्त्योऽपि न, -तावत् प्रकृति-गतो विकारः अध्यास-कार्यतयाभिमतस्य तस्याध्यासहेतुत्वायोगात्; न च पुरुषगतः, अस्वीकारात्॥ २॥ ननु पयो यथा दधिभावेन स्वतः परिणमते, यथा चाम्बु वारिदमुक्तमेकरसमपि तालचूतादिषु मधुराम्लादि- विचित्र-रसरूपेण, तथा प्रधानमपि पुरुषकर्मवैचित्र्यात् तनुभुवनादिरूपेणेति चेत् तत्राह, — “पयोऽम्बुवच्चेत् तत्रापि”॥ ३॥ तयोः पयोऽम्बुनोरपि चेतनाधिष्ठितयोरेव प्रवृत्तिः, न तु स्वतः रथादिदृष्टान्तेन तथानुमानात्। तयोस्तदधिष्ठितत्वं चान्तर्यामिब्राह्मणात् सिद्धम्॥ ३॥ “व्यतिरेकानवस्थितेश्चानपेक्षत्वात्”॥ ४॥ अप्यर्थे च-कारः। सृष्टेः प्राक् प्रधानव्यतिरेकेण हेत्वन्तरानवस्थितेरनपेक्षत्वान्न केवलस्य प्रधानस्य स्वपरिणामकर्त्तृत्वम्। प्रधानव्यतिरिक्तस्तत्प्रवर्त्तकस्तन्निवर्त्तको वा हेतुरादिसर्गात् पूर्वं नावतिष्ठते इति यत् स्वीकृतं, तस्यापि पुनरपेक्षणात्, —चैतन्यसन्निधेर्हेत्वन्तरस्याङ्गीकारादिति यावत्; तथा च केवलजड़ककर्तृत्ववादभङ्गः। किञ्च, व्यतिरिक्तहेत्वभावात् सन्निधिसत्त्वाच्च प्रलयेऽपि कार्योदयप्रसङ्गः। न च तदादृष्टोद्बोधाभावात् कार्याभावस्तदुद्बोधस्यापि तदैवापाद्यमानत्वात्॥ ४॥ ननु लतातृणपल्लवादि विनैव हेत्वन्तरं स्वभावादेव क्षीराकारेण परिणमते, तथा प्रधानमपि महदाद्याकारेणेति चेत्तत्राह— “अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत्”॥ ५॥ अवधृतौ च-शब्दः। नैतच्चतुरस्रम्। कुतः?— अन्यत्राभावात्। वलीबर्द्दादिभक्षिते तृणादिके क्षीराकारपरिणामाभावादित्यर्थः। यदि स्वभावादेव तृणादि क्षीरात्मना परिणमते, तर्हि चत्वरादिपतितेऽपि तथा स्यान्न चैवमस्त्यतो न स्वभावमात्रं हेतुः; किन्तु व्यक्तिविशेषसम्बन्धात् सर्वेशसङ्कल्प एव तथेति॥ ५॥ प्रधानस्य जाड्यात् स्वतःप्रवृत्तिर्न समस्तीत्यापादितम्। अथ त्वन्मुखोल्लासाय ताञ्चेदभ्युपगच्छामस्तथापि न किञ्चित्तवाभीष्टं सिद्ध्येदित्याह— “अभ्युपगमेष्वर्थाभावात्”॥ ६॥ चतुर्षु नेत्यनुवर्त्तते। पुरुषो मां भुक्त्वा मह्दोषाननुभूय मदौदसीन्यलक्षणं मोक्षं प्राप्स्यतीति तद्भोगापवर्गार्थं प्रधानप्रवृत्तिं मन्यते। प्रधानप्रवृत्ति परार्था, स्वतोऽप्यभोक्तृत्वादुष्ट्र मन्यते। अकर्त्तुरपि फलोपभोगोऽत्रादवदिति। सैषा प्रवृत्तिर्न युक्ता मन्तम्। कुतः?—तस्याः स्वीकारे फलाभावात्। पुरुषस्य प्रकृतिदर्शनरूपो भोगस्तदौदासीन्यरूपो मोक्षश्च प्रवृत्तेः फलम्। तत्र भोगस्तावन्न सम्भवति, प्रवृत्तेः प्राक् चैतन्यमात्रस्य निर्विकारस्याकर्त्तुः पुरुषस्य तद्दर्शनरूपविकारायोगात्। न चापवर्गः, प्रागपि प्रवृत्तेस्तस्य सिद्धत्वेन तद्वैयर्थ्यात्। सन्निधिमात्रस्य भोगहेतुत्वे तु मुक्तानामपि तदापत्तिः, तस्य नित्यत्वात्॥ ६॥ ३३६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/१४-१५ ] ननु यथा गतिशक्तिरहितस्य दृक्शक्तिसहितस्य पङ्गुपुरुषस्य सन्निधानाद् गतिशक्तिमान् दृक्शक्तिरहितोऽप्यन्धः प्रवर्त्तते, यथा चायस्कान्ताश्मनः सन्निधानाज्जड़मप्ययश्चलति, एवं चिन्मात्रस्य पुंसः सन्निधानादचेतनापि प्रकृतिस्तच्छायाया चेतनेव तदर्थे सर्गे प्रवर्त्ततेति चेत्तत्राह- “पुरुषाश्मवदिति चेत्तथापि” ॥ ७ ॥ तथापि तेनापि प्रकारेण जड़स्य स्वतः प्रवृत्त्तिर्न सिद्ध्यति। पङ्गोर्गतिवैकल्येऽपि वर्त्मदर्शन-तदुपदेशा- दयोऽन्धस्य दृक्शक्तिविरहेऽपि तदुपदेश-ग्रहादयो विशेषाः सन्ति। अयस्कान्तमणेश्चायःसामीप्यादयः। पुरुषस्य तु नित्यनिष्क्रियस्य निर्धर्म्मकस्य न कोऽपि विकारः। सन्निधिमात्रेण तस्मिन् स्वीकृते तस्य नित्यत्वान्नित्यं सर्गो मोक्षाभावश्च प्रसज्येत। किञ्च, पंग्वन्धावुभौ चेतनौ अयस्कान्तायसी च द्वे जड़े इति दृष्टान्तवैषम्यं विस्फुटम् ॥ ७ ॥ यत्तु गुणानामुत्कर्षापकर्षवशेऩाङ्गाभावाद्भिन्नसृष्टिरिति मन्यते, तन्नि॒रस्यति- “अङ्गित्त्वानुपपत्तेश्च” ॥ ८ ॥ सत्त्वादीनां साम्येनावस्थितिः प्रधानावस्था। तस्यां च निरपेक्षस्वरूपाणां तेषां कस्यचिदेकस्याङ्गित्त्वं नोपपद्यते, इतरयोस्तत्समत्वेन गुणीभावासम्भवात्। तथा च गुणानामङ्गाङ्गिभावासिद्धिः। न चेश्वरः कालो तत्कृत, अस्वीकारात्। यथाह कपिलः- ईश्वरासिद्धेः मुक्तबद्धयोरन्यतराभावात्र तत्सिद्धिरिति। दिक्कालाकाशादिभ्य इति च। न च पुरुषस्तत्कृत् तस्य तत्रौदासीन्यात्। तथाच गुणवैषम्यहेतुकः सर्गो नेति। किञ्चैवं हेत्वभावात् प्रतिसर्गेऽपि ते वैषम्यं भजेरन्। आदिसर्गे तु न भजेरन्निति ॥ ८ ॥ ननु कार्यानुरोधेन गुणा विचित्रस्वभावा भवन्तीत्यनुमेयम्, तेन नोक्तदोषावकाश इति चेत्तत्राह- “अन्यथानुमितौ च ज्ञ-शक्तिवियोगात्” ॥ ९॥ विचित्रशक्तिकतया गुणानामनुमानेऽपि न दोषात्रिस्तारः। कुतः ?-ज्ञेति। ज्ञातृत्वविरहादित्यर्थः। इदमहमेवञ्च सृजामीति विमर्शाभावादिति यावत्। ज्ञानशून्याज्जड़ात्र सृष्टिदृष्टिकादेर्निवर्त्तते चेतनाधिष्ठानादिति।” श्रील बलदेव विद्याभूषणके गोविन्द-भाष्यमें (ब्रः सूः, द्वितीय अध्याय, द्वितीय पाद)—सांख्याचार्य कपिलने इस प्रकार तत्त्वोंका संग्रह किया है। उनके मतमें-“सत्त्व, रजः और तमः, इन तीन गुणोंकी साम्यावस्था ही प्रकृति है। प्रकृतिसे महत्तत्त्व, उससे अहङ्कार, अहङ्कारसे पञ्चतन्मात्राएँ, उनसे ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ एवं पञ्चमहाभूत तथा पुरुष-ये कुल पच्चीस तत्त्व हैं। साम्यरूपमें अवस्थित सत्त्वादि तीन गुण ही प्रकृति हैं। इन तीन गुणोंको क्रमशः सुख-दुःख-मोहात्मक समझना चाहिये, क्योंकि प्रकृतिके द्वारा रचित जगत्में सुखादि भाव ही दिखायी देते हैं। उदाहरण स्वरूप-सुन्दर युवती रतिके द्वारा पतिके लिये सुखप्रद है-यहाँ सात्त्विक भावका प्रकाश है; वही युवती बादमें क्रोधादि प्रकाश करनेपर दुःखदायिनी होती है-यहाँ राजसिक भावका प्रकाश है, और यदि वह युवती पतिका त्याग कर दे, तो वह उसके मोहका कारण होती है-यहाँ तामसिक भावका प्रकाश है। 'उभय इन्द्रियाँ' अर्थात् दस बाह्येन्द्रियाँ और एक अन्तरेन्द्रिय मन, कुल ये ग्यारह इन्द्रियाँ हैं। प्रकृति नित्य और विभुत्वशालिनी है। प्रारम्भमें मूलके (चेतनके) अभावयुक्त होनेके कारण मूल (प्रधान) अमूल अर्थात् कारणान्तर-रहित है। यह प्रधान व्यापक और सबका उपादान है-‘सर्वत्र कार्यदर्शनात् विभुत्वम्’ आदि सूत्रसे यह उपलब्धि होती है। महत्तत्त्व, अहङ्कारतत्त्व और पाँच तन्मात्राएँ-ये प्रकृतिके सात विकार हैं और अहङ्कारादिकी प्रकृति भी प्रधानका विकार है; ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँच महाभूत,-ये सोलह विकार हैं। पुरुषको परिणामहीन कहा गया है, इसलिये वह किसीकी भी प्रकृति और विकार भी नहीं है। यह प्रकृति ही नित्य छठा अध्याय | ३३७

[ ६/१४-१५ विकारको प्राप्त होती है और यह स्वयं अचेतन होकर भी अनेक चेतन जीवोंके भोगका और मोक्षका कारण है एवं प्रकृति इन्द्रियातीत होनेपर भी इसके कार्यसे इसके विषयमें अनुमान किया जा सकता है। प्रकृति स्वयं एक होनेपर भी तीन गुणोंमें असमानता होनेपर परिणामशक्तिके द्वारा महत्तत्त्वादि विचित्र रचनामय जगत्की सृष्टि करती है। इस प्रकार प्रकृति ही जगत्का निमित्त और उपादान रूपिणी है। पुरुष निष्क्रिय, निर्गुण है और प्रभु है। वह चित्-स्वरूप है, प्रत्येक देहमें वह भिन्न रूपसे अवस्थित है और प्रधानके सञ्चालनसे उसके विषयमें अनुमान लगाया जा सकता है तथा विकार और क्रियाके अभावमें वह कर्त्ता और भोक्ताके भावसे रहित है। प्रकृति और पुरुषका तत्त्व इस प्रकार है कि दोनोंके सान्निध्यमात्रसे परस्परके धर्मका विनिमय (आदान-प्रदान) होता है—प्रकृतिमें चैतन्यका और पुरुषमें कर्त्ता-भोक्ताके भावका आरोपण हो जाता है। इस प्रकार विवेकके अभावसे ही पुरुषके द्वारा भोग और विवेकसे ही उसका मोक्ष होता है। प्रकृतिके प्रति पुरुषके उदासीनतामय धर्मादि विषयसमूह सोपपत्तिक सूत्रोंके द्वारा निबद्ध किये गये हैं। इस प्रक्रियामें सांख्यकार, —'प्रत्यक्ष', 'अनुमान' और 'आगम', इन तीन प्रमाणोंको मानते हैं और इनके द्वारा जो सिद्ध होता है, वही प्रमाण है। (उपमानादि उन्हींके अन्तर्गत हैं, ये अतिरिक्त प्रमाण नहीं हैं।) 'प्रत्यक्षसिद्ध' और 'आगमसिद्ध' अर्थोंके विषयमें अधिक नहीं कहना है। परन्तु 'परिणामात्', 'समन्वयात्', 'शक्तितः' आदि सूत्रोंके द्वारा जो प्रधानको जगत्का कारण 'अनुमान' किया गया है, उसका खण्डन करना ही हमारा प्रयोजन है। क्योंकि उक्त मतके खण्डनसे सांख्यके सम्पूर्ण मतका ही खण्डन हो जायेगा। इस विषयमें यह संशय है कि 'प्रधान' जगत्का निमित्त और उपादान है अथवा नहीं। पूर्वपक्षने प्रधानका निमित्तत्व और उपादानत्व, दोनों ही स्वीकार किये हैं। पूर्वपक्षका कहना है कि उन्होंने जगत्के उपादानरूपसे ही सत्त्वादिरूप प्रधानका अनुमान किया है। उपादान-कार्यके सजातीय ही होता है, जैसे घड़ेके कार्यमें (निर्माणमें) उपादानरूपसे मिट्टी आदिको ही समजातीय देखा गया है। जड़ वृक्षसे फलकी उत्पत्ति और उसी प्रकार जलको चलते देखकर जड़ अथवा अचेतन प्रधानका भी जगत्कर्त्तृत्व स्थिर होता है। 'प्रधान ही जगत्का उपादान और निमित्त कारण है'—पूर्वपक्षके इस सिद्धान्तके खण्डनके लिये पहले सूत्रकी अवतारणा कर रहे हैं— (प्रथम सूत्र)—"प्रधान अचेतन है, इसलिये जड़-प्रधान जगत्का उपादान और निमित्त कारण नहीं है, क्योंकि इस जगत्की विचित्र रचना देखकर चेतनके आश्रयके बिना जड़-प्रधानके द्वारा परिदृश्यमान जगत्की रचना सिद्ध नहीं होती अथवा ऐसा अनुमान करना भी सङ्गत नहीं है। इस जगत्में चेतनके आश्रयके बिना ईंटों आदिके द्वारा कभी भी भवनका निर्माण सिद्ध नहीं होता है। सूत्रमें उक्त 'च'-शब्दके द्वारा अन्वयकी असङ्गति उचित है। बाह्य घटादि पदार्थसमूहका कभी भी सुखादि स्वरूपसे अन्वय नहीं हो सकता अर्थात् वे सुखादिका अनुभव नहीं कर सकते, क्योंकि सुखादि सभी विषय आन्तरिक धर्म हैं, इसलिये बाह्यवस्तुसे उसका अन्वय सम्भव नहीं है। विशेषतः घटादि पदार्थ उक्त सुखादिके कारण नहीं हैं और सुखादि रूपमें भी उनकी प्रतीति नहीं है॥"१॥ ३३८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/१४-१५ ]

(द्वितीय सूत्र)—“प्रवृत्ति देखकर भी प्रधानको जगत्का कारण मानना सङ्गत नहीं है। चेतनके द्वारा अधिष्ठित जड़में ही प्रवृत्ति दिखायी देती है। जिसका अधिष्ठान होनेपर ही जड़की प्रवृत्ति होती है, उसकी ही यह प्रवृत्ति है—यह निश्चित है। रथ और सारथी इसके उत्तम दृष्टान्त हैं। इसी प्रकार ‘वृक्षके द्वारा फलकी उत्पत्ति होती है’ आदि उदाहरणोंमें प्रधानका कारणता-सम्बन्धीय दृष्टान्त उक्त हुआ है। इस स्थानपर भी चेतनका आश्रय स्वीकृत हुआ है, क्योंकि अन्तर्यामी ब्राह्मणमें उसका उल्लेख हुआ है। इस भाष्यमें इसका बादमें विस्तारसे वर्णन होगा। सूत्रोक्त च-शब्द अवधारणमें है। ‘मैं करता हूँ’ इस दृष्टान्तमें भी चेतनकी ही प्रवृत्ति दिखायी देती है, इसलिये जड़का कर्त्तृत्व सङ्गत नहीं है। यदि कहें—प्रकृति और पुरुषकी परस्पर सन्निधिमात्रसे परस्परके धर्मके विनिमयके कारण ही जगत्की रचना हुई है? उत्तर—यह भी नहीं कह सकते। अच्छा, जो सन्निधि परस्परके धर्मके विनिमयका कारण है, वह सन्निधि क्या प्रकृति और पुरुष, दोनोंका ही सद्भाव है अथवा प्रकृति-पुरुषगत कोई विकार? उत्तर—वह दोनोंका सद्भाव तो नहीं ही है, क्योंकि ऐसा स्वीकार करनेसे सभी मुक्त-पुरुषोंके साथ भी प्रकृतिके धर्मका विनिमय मानना होगा। यह सन्निधि—प्रकृतिगत विकार भी नहीं है, क्योंकि विनिमयको ‘कार्यरूप’में स्वीकार करनेपर इस प्रकृतिगत विकारकी विनिमयके ‘कारणरूप’में होनेकी सम्भावना नहीं है (कार्य और कारण एक नहीं हो सकते)। इसी प्रकार, यह पुरुषगत विकार भी नहीं है, क्योंकि पुरुषगत विकार भी अस्वीकार्य है। इसलिये ‘प्रधान’ जगत्का कारण नहीं हो सकता॥ २॥ यदि कहें—दूध जिस प्रकार अपने आप दहीमें परिणत हो जाता है और एक ही मेघसे निकला जल जिस प्रकार एकरस होनेपर भी ताल और आमादि फलोंमें मीठे और खट्टे विभिन्न रसोंमें परिणत हो जाता है, उसी प्रकार एक ही प्रधान, पुरुषके कर्म-वैचित्र्यके अनुसार देह-जगदादिरूपमें परिणत होता है। इसके उत्तरमें कह रहे हैं— (तृतीय सूत्र)—दूध और जलादि अचेतन वस्तुओंकी भी चेतनके द्वारा अधिष्ठित होनेपर ही कार्यमें प्रवृत्ति होती है, अपनेसे ही प्रवृत्तन नहीं हो सकता; क्योंकि रथादि दृष्टान्तसे ऐसा ही अनुमान होता है। अन्तर्यामी ब्राह्मणसे इन दोनों (दूध और जल) जड़ वस्तुओंका चेतन-अधिष्ठतभाव सिद्ध होता है॥ ३॥ (चतुर्थ सूत्र)—प्रधानके अतिरिक्त अन्य किसी कारणकी अनुपस्थिति परित्यक्त होनेसे (अर्थात् अन्य कोई कारण भी उपस्थित हो सकता है) केवलमात्र प्रधानका ही कर्त्तृत्व असङ्गत हुआ है। ‘अपि’-शब्दका अर्थ च-कार अर्थात् समुच्चय है। सृष्टिके पूर्व प्रधानके अतिरिक्त अन्य किसी कारणकी अनुपस्थितिका त्याग हुआ है, ऐसा कहनेसे केवल प्रधानका ही अपने परिणामका कर्त्ता होना निरस्त हुआ है। प्रधानके अतिरिक्त उसका प्रवर्त्तक अथवा निवर्त्तक, अन्य कोई भी कारण ही आदि-सृष्टिसे पूर्व नहीं था,—इस प्रकारका मत उपेक्षित हुआ है; क्योंकि उस समय चेतनकी सन्निधिके कारणको ‘अन्य कारण’ के रूपमें स्वीकार किया गया है। इसलिये केवल जड़कर्त्तृत्ववादका खण्डन हुआ है। विशेषतः इस प्रकार पूर्वपक्षसे प्रलयमें

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[ ६/१४-१५ भी कार्योत्पत्तिका प्रसङ्ग होता है; क्योंकि प्रधानके अतिरिक्त अन्य कारणका अभाव और प्रधानकी सन्निधि रहनेके कारण सृष्टिकालकी भाँति प्रलयकालमें भी कार्य-उत्पत्तिका प्रसङ्ग है। अदृष्टके ज्ञानके अभावके कारण प्रलयकालमें कार्यका अभाव भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उस समय उस अदृष्टका ज्ञान भी आकर उपस्थित हो सकता है॥४॥ यदि कहें कि तृण-पल्लवादि जिस प्रकार गायादि (पशु) के द्वारा खाये जानेपर अपने-आप दूधके रूपमें परिवर्तित हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रधान भी महत्तत्त्वादि रूपमें परिणत होता है, तो उसके उत्तरमें कह रहे हैं— (पञ्चम सूत्र)—इस उदाहरणके अतिरिक्त अन्यत्र ऐसा दूधके रूपमें परिवर्तन नहीं भी देखा जाता है, इसलिये प्रधानका भी तृणादिके समान स्वभावतः (स्वतः) परिणाम कहना सङ्गत नहीं है। यहाँ च-शब्दका प्रयोग निश्चयके रूपमें है, इस प्रकार पूर्वपक्ष असङ्गत है; क्योंकि अन्यत्र यह नहीं देखा जाता; जैसे बैलादिके द्वारा खाये जानेपर तृणादिका दूध-रूपमें परिणाम नहीं देखा जाता, वैसे यह परिवर्तन स्वाभाविक नहीं है। और भी यदि स्वभावतः ही तृणादि दूधमें परिवर्तित होते हैं, तो आङ्गनमें पड़े तृणादिका दूधमें परिवर्तन नहीं देखा जाता है। जब ऐसा दिखलायी नहीं देता, तब केवल स्वभावको ही परिणामका कारण नहीं कह सकते। ‘तृणादि विशेष प्राणियोंके सम्बन्धसे दूधमें परिवर्तित हो जायँ', ऐसा सर्वेश्वरका सङ्कल्प ही उसका कारण है॥५॥ जड़ होनेके कारण प्रधानका सम्पूर्णरूपसे स्वतः प्रवर्त्तन नहीं है, —यह सिद्ध हुआ है। यदि तुम्हारे सन्तोषके लिये उसे स्वीकार कर भी लें, तो भी उससे तुम्हारा कोई अभीष्ट सिद्ध नहीं होगा। इसलिये आगे कह रहे हैं— (षष्ठम सूत्र)—प्रधानकी स्वाभाविकी प्रवृत्ति स्वीकार करनेमें भी कोई सार्थकता नहीं है। चार सूत्रोंमें 'ना'-अर्थ ही पूर्व सूत्रोंके अनुरूप होगा। 'पुरुष मुझे भोगकर मेरे दोषोंको अनुभवकर मुझसे उदासीनता रूप मोक्ष लाभ करेंगे'—इस प्रकार भोग-मोक्षार्थक कहकर प्रधानकी प्रवृत्ति प्रतीत होती है। ऊँट जिस प्रकार केवल दूसरोंके लिये ही कुङ्कुमका भार ढोता है, स्वयं उसका भोग नहीं करता है, प्रधानकी भी प्रवृत्ति उस प्रकार केवल दूसरोंके लिये ही है। और पुरुष भी अकर्त्ता होकर भी भोक्ता प्रतीत होता है। अन्नका कर्त्ता अर्थात् उसको उत्पन्न करनेवाला ना होकर भी अन्न-भोक्ता जिस प्रकार अन्नका भोग करता है, पुरुषका भी उसी प्रकार फलका उपभोग होता है। पूर्वपक्षकी इस प्रधान-प्रवृत्तिको स्वीकार करना युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि इसे स्वीकार करनेपर भी कोई फल दिखायी नहीं देता। पुरुषका प्रकृतिका दर्शनरूप 'भोग' और प्रकृतिके प्रति उदासीनतारूप 'मोक्ष' ही प्रवृत्तिका फल है। प्रधानके द्वारा भोग सम्भव नहीं है, क्योंकि चिन्मात्र, निर्विकार और अकर्त्ता होकर भी पुरुषका प्रकृति-दर्शनरूप सङ्गसे विकारयोगके कारण वह पुरुषका ही भोग है, प्रधानका नहीं। प्रधानका अपवर्ग (मोक्ष) भी सम्भव नहीं है, क्योंकि प्रवृत्तिकी उत्पत्तिसे पूर्व भी अपवर्ग सिद्ध रहनेपर उसकी व्यर्थता प्रकाशित हो रही है। सन्निधिमात्रको ही भोगका कारण कहनेपर, सन्निधिकी नित्यताके कारण मुक्त लोगोंके द्वारा भी भोग लक्षित होते हैं॥६॥ ३४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

६/१४-१५ ] यदि कहें कि चलनेमें असमर्थ, परन्तु नेत्रोंवाले पङ्गु पुरुषके सङ्गमें अन्धा, परन्तु पैरोंवाला पुरुष भी चलनेके लिये प्रवृत्त होता है और जिस प्रकार चुम्बक-पत्थरके सङ्गमें जड़ लोहा भी चलता है, उस प्रकार चिन्मात्र-पुरुषके सङ्गमें प्रकृति अचेतन होकर भी उसकी छायाके प्रभावसे चेतन वस्तुके समान पुरुषके भोगके लिये सृष्टि आदिमें प्रवृत्त होती है, उसके उत्तरमें कह रहे हैं- (सप्तम सूत्र)—इस उदाहरणमें पुरुष चुम्बकके समान होनेपर भी जड़-प्रधानकी स्वतःप्रवृत्ति नहीं है। इस प्रकार होनेपर भी जड़वस्तुकी स्वतःप्रवृत्ति सिद्ध नहीं होती। पङ्गु व्यक्तिमें चलनेका सामर्थ्य नहीं होनेपर भी मार्ग-प्रदर्शन और निर्देश देनेकी योग्यता एवं अन्धे व्यक्तिमें देखनेका सामर्थ्य नहीं होनेपर भी पङ्गु व्यक्तिके द्वारा दिये निर्देशोंको ग्रहण करनेकी योग्यता विद्यमान है और लोहेका चुम्बकके निकट जाना भी सम्भव हुआ है। किन्तु नित्य निष्क्रिय, निर्धर्मक पुरुषमें कोई भी विकार नहीं होता। सन्निधिमात्रको ही विकार स्वीकार करनेपर, सन्निधिकी नित्यताके कारण नित्य सृष्टिका और मोक्षके अभावका प्रसङ्ग होगा। विशेषतः पङ्गु और अन्धा, दोनों ही चेतन हैं तथा चुम्बक और लोहा, दोनों ही जड़ हैं, इस कारण इन दो दृष्टान्तोंमें विषमता दिखायी देती है॥७॥ अब गुणोंके उत्कर्ष तथा अपकर्षवशतः अङ्ग-अङ्गीभावके कारण जो विश्वकी सृष्टि हुई है, ऐसे विचारका खण्डन कर रहे हैं- (आठवाँ सूत्र)—जब गुणोंका अङ्गत्व ही अप्रमाणित हो रहा है, तब इस प्रकारका पक्ष सङ्गत नहीं हो सकता। सत्त्वादि गुणोंकी साम्याभावसे अवस्थितिका नाम ही 'प्रधानावस्था' है। इस अवस्थामें गुणोंका निरपेक्षस्वरूप होनेके कारण एक गुण दूसरेका अङ्गी है, ऐसा प्रमाणित नहीं होता। क्योंकि तीन गुणोंसे एक को अङ्गी माननेसे, अन्य दो गुणोंकी उसके साथ समता होनेके कारण गुणि-भावकी असम्भावना है। गुणोंका परस्परमें अङ्ग-अङ्गीभाव कभी भी सिद्ध नहीं होता। ईश्वरको अथवा कालको भी उक्त अङ्ग-अङ्गीभावका कर्त्ता नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसे कोई भी स्वीकार नहीं करता। कपिलने ही कहा है—'मुक्त और बद्ध, इन दोनोंमेंसे एकके अभावके कारण अर्थात् प्रमाणके अभावके कारण ईश्वरसिद्धि नहीं होती।' दिशाएँ और काल आकाशादिसे ही उत्पन्न होते हैं,—पुरुष उनके कर्त्ता नहीं हैं, क्योंकि वे कर्तृत्व-विषयमें सम्पूर्ण उदासीन हैं। गुण-वैषम्य भी सृष्टिका कारण नहीं है, क्योंकि कारणके इस प्रकार अभाव होनेपर प्रति सृष्टिमें ही वे गुणसमूह विषमताको प्राप्त करनेपर भी आदिसृष्टिमें वैषम्य प्राप्त नहीं कर सकते॥८॥ यदि कहें कि कार्यके अनुरोधसे गुणोंमें यह विचित्र-स्वभाव है, इस प्रकार अनुमान करनेपर उसमें पूर्वोक्त दोषोंकी सम्भावना नहीं होगी, तो इसके उत्तरमें कह रहे हैं,- (नवम सूत्र)—इस प्रकारके अनुमानमें भी जड़की स्वतःप्रवृत्ति नहीं है अर्थात् गुणोंको उस प्रकार विचित्रशक्तियुक्त अनुमान करनेसे भी दोषका निस्तार नहीं होता है। क्योंकि गुण तो अचेतन हैं अर्थात् उनमें 'यह मैं हूँ और मैं इस प्रकार सृष्टि कर रहा हूँ', इस प्रकारके विचारका ही अभाव देखा जाता है। ज्ञानशून्य जड़पदार्थोंसे कभी भी सृष्टि सम्भव नहीं है। ईंट, लकड़ी आदि अचेतन वस्तुएँ जिस प्रकार चेतनके अधिष्ठानके बिना कार्य नहीं कर छठा अध्याय | ३४१

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सकतीं, उसी प्रकार अचेतन गुण भी चेतन-परमेश्वरकी शक्तिके अधिष्ठानके बिना कोई भी कार्य नहीं कर सकते। (द्वितीय अध्याय, प्रथम पाद) - “स्मृतिः खलु कर्मकाण्डोदितान्यग्निहोत्रादि-कर्माणि यथावत् स्वीकुर्वता 'ऋषिं प्रसूतं कपिलम्' इत्यादिश्रुताप्तभावेन परमर्षिणा कपिलेन मोक्षेप्सूना ज्ञानकाण्डार्थोपबृंहणाय प्रणीता। “अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थ”, “न दृष्टार्थात्सिद्धिनिर्वृत्तिदर्शनात्" इत्यादिभिस्तत्र ह्यचेतनं प्रधानमेव स्वतन्त्रं जगत्कारणामित्यादि निरूप्यते- “विमुक्तमोक्षर्थम्”, “स्वार्थं वा प्रधानस्य”, “अचेतनत्वेऽपि क्षीरवच्चेष्टितं प्रधानस्य”, इत्यादिभिः। स च ब्रह्मकारणतापरिग्रहे निर्विषया स्यात्, कृतस्नायास्तत्त्वप्रतिपत्तिमार्तविषयत्वात्। अतः परमाप्तकपिलस्मृत्यविरोधेन वेदान्ता व्याख्येयाः। न चैवं मन्वादिस्मृतीनां निर्विषयता- तासां धर्मप्रतिपादनद्वारा कर्मकाण्डोपबृंहणे सति सविषयत्वादित्येवं, प्राप्ते, ब्रूते- “स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात्” ॥ १ ॥ अवकाशस्याभावोऽनवकाशः निर्विषयतेत्यर्थः । समन्वयानानुराधेन वेदान्तेषु व्याख्यातेषु सांख्यस्मृतिनिर्विषयता-दोषापत्तिरतः श्रुतिविपरीतार्थया ते व्याख्येया इति चेन्न। कुतः ?- अन्येत्याद्येः। तथा सत्यन्यासां मन्वादिस्मृतीनां वेदान्तानुसारिणीनां ब्रह्मैर-कारणतापराणां निर्विषयता महान् दोष प्रसज्येत । तासु हि सर्वेश्वरो जगदुत्पत्त्यादिहेतुः प्रतिपाद्यते, न तु कापिलोक्तप्रकारान्तरत्वसङ्गतिः। तत्र श्रीमन्मनुः- “आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्। अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ ततः स्वयम्भुर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् । महाभूतादिवृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः ॥ योऽसावतीन्द्रियोऽग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः । सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एष स्वयमुद्बभौ ॥ सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः। अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥ तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम्। तस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः॥” इत्यादि। श्रीपराशरः - “विष्णोः सकाशादुद्भूतं जगतत्तै्रव च स्थितम्। स्थितिसंयम-कर्त्तासौ जगतोऽस्य जगच्च सः॥ यथोर्णनाभिहृदयादूर्णां सन्तत्य वक्त्ततः। तया विहृत्य भूयस्तां ग्रसत्येवं जनार्द्दनः ॥” इत्यादि। एवमन्येऽपि। न चासां स्मृतीनां कर्मकाण्डार्थोपबृंहणेन सावकाशता, ब्रह्मज्ञानोदयर्थिं चित्तशुद्धिमृद्दिश्य धर्मान् विदधतीनां तासां ज्ञानकाण्डार्थोपबृंहण एव वृत्तेः। चित्तशोधकता चैषां दृश्यते- “तमेतं वेदानुवचनेन” इत्यादौ-श्रुतौ। यत्तु तेषां वृष्टिपूत्रस्वर्गादि-फलकत्वं क्वापि क्वापि वीक्ष्यतेऽनुभाव्यते च, तदपि शास्त्रविश्रम्भोत्पादनेन तत्रैव च विश्रान्तं, “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति" इत्यादेः, “नारायणपरावरवेदाः” इत्यादेश्च। न च सांख्यस्मृत्या वेदान्तार्थोपबृंहणं शक्यं कर्तुं, श्रुतिविरुद्धार्थ-प्रतिपादनात्। श्रुतिसंवादार्थस्पष्टीकरणं ह्युपबृंहणम्। न च तस्यामिदमस्ति। तस्मात्-श्रुतिविरुद्धा सांख्यस्मृतिः स्वकपोल-कल्पितानापेति न तद्व्यर्थतादोषाद् विभीमः । न चाप्तत्वव्यपाश्रयकल्पनया तत्स्मृतिपक्षपातो युक्तः, तत्त्वेन व्याख्यातानां बहूनां स्मृतिषु विभिन्नाथार्सु पक्षपाते सति वास्तवार्थानवस्थितिप्रसङ्गात्। स्मृत्योर्विप्रतिपत्तौ सत्यां श्रुतिव्यापाश्रयादन्यो निर्णयहेतुर्न भवेदतः श्रुत्यनुसारिण्येवादरणीयेति । स्मृतिबलेनाक्षेप्सून् स्मृतिबलेनैव निराकरिष्याम इत्यन्यस्मृत्यनवकाशात् दोषोपन्यासः। यत्तुः “ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्ने ज्ञानैर्विभर्त्ति" इति श्वेताश्वतरश्रुतेराप्तत्वं तस्येति, तन्न; तस्या अन्यपरत्वात्, श्रुत्यर्थ-वैपरीत्यवक्तृतया तदभावाच्च। मनोराप्तत्वं तु तैत्तिरीयाः पठन्ति- "यद्वै किञ्चन मनुरवदत्तद्भेषजम्” इति। श्रीपराशरो हि पुलस्त्यवशिष्ठप्रसादादेव देवतापरमार्थधियं प्रापेति स्मर्यते। वेदविरुद्धस्मृतिप्रवर्त्तकः कपिलो ह्यग्निवंशजो जीवविशेष एव मायया विमोहितः, न तु कर्द्दमोद्भूतो वासुदेवः। “कपिलो वासुदेवाख्यः सांख्यं तत्त्वं जगाद ह। ब्रह्मादिभ्यश्च देवेभ्यो भृग्वादिभ्यस्तथैव च ॥ तथैवासुरये सर्वं वेदार्थैरुपबृंहितम्। सर्ववेदविरुद्धञ्च कपिलोऽन्यो जगाद ह॥ सांख्यमासुरयेऽन्यस्मै कुतर्कपरिवृंहितम्' इति स्मरणात्। तस्माद्वेदविरुद्धतयानाप्तायाः सांख्यस्मृतेर्व्यर्थता न दोषः ॥ १ ॥ “इतरेषाञ्चानुपलब्धेः” ॥ २॥ इतरेषाञ्च सांख्यस्मृत्युक्तानामर्थानां वेदेऽनुपलम्भात्तस्याः नाप्तत्वम्। ते च विभवश्विन्मात्राः पुरुषास्तेषां बद्धमोक्षौ प्रकृतिरेव करोति। तौ पुनः प्राकृतादेव। सर्वेश्वरः पुरुषविशेषो नास्ति। कालस्तत्त्वं न भवति। प्राणादयः पञ्च करणवृत्तिरूपा भवन्तीत्येवमादयस्तस्यामेव द्रष्टव्याः ॥ २ ॥

३४२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत