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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 11/47-51 (36) होड़ कृष्णदास :- होड़ कृष्णदास-नित्यानन्दप्रभु-प्राण। श्रीनित्यानन्द-पद बिना नाहि जाने आन॥ 47॥ अनुवाद—होड़ कृष्णदास श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्राण थे। वे श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंके अतिरिक्त कुछ नहीं जानते थे॥ 47॥ अनुभाष्य—'होड़ कृष्णदास'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय— “बड़गाछि-निवासी सुकृति कृष्णदास। याँहार मन्दिरे नित्यानन्देर विलास॥ 748॥” “बड़गाछिमें निवास करनेवाले कृष्णदास बड़े सुकृतिवान् थे, क्योंकि श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनके घरमें विलास किया था।” बड़गाछिके माहात्म्यके लिये चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय और (नवनी होड़) पयार संख्या 50 का अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ 47॥ (37) नकड़ि, (38) मुकुन्द, (39) सूर्य, (40) माधव, (41) श्रीधर (गोपाल-12), (42) रामानन्द, (43) जगन्नाथ, (44) महीधर :- नकड़ि, मुकुन्द, सूर्य, माधव, श्रीधर। रामानन्द वसु, जगन्नाथ, महीधर॥ 48॥ (45) श्रीमन्त, (46) गोकुलदास, (47) हरिहरानन्द, (48) शिवाइ, (49) नन्दाइ, (50) परमानन्द :- श्रीमन्त, गोकुलदास, हरिहरानन्द। शिवाइ, नन्दाइ, अवधूत परमानन्द॥ 49॥ (51) वसन्त, (52) नवनी, (53) गोपाल, (54) सनातन, (55) विष्णाइ, (56) कृष्णानन्द, (57) सुलोचन :- वसन्त, नवनी होड़, गोपाल, सनातन। विष्णाइ हाजरा, कृष्णानन्द, सुलोचन॥ 50॥ अनुवाद—नकड़ि, मुकुन्द, सूर्य, माधव, श्रीधर, रामानन्द वसु, जगन्नाथ, महीधर, श्रीमन्त, गोकुलदास, हरिहरानन्द, शिवाइ, नन्दाइ, अवधूत परमानन्द, वसन्त, नवनी होड़, गोपाल, सनातन, विष्णाइ हाजरा, कृष्णानन्द और सुलोचन—ये सभी श्रीनित्यानन्द प्रभुके दास थे॥ 48-50॥ अनुभाष्य—'नवनी होड़'—बड़गाछि-निवासी हरि होड़के पुत्र राजा कृष्णदास होड़ थे। बड़गाछि (बहिरगाछि) के निकट शालिग्राममें राजा कृष्णदासके प्रयाससे श्रीनित्यानन्द प्रभुका विवाह हुआ (भक्तिरत्नाकर 12 तरङ्ग)। नवनी होड़ राजा कृष्णदासके पुत्र थे। इनकी वंशावली अब 'रुकुणपुर' में है। रुकुणपुर बहिरगाछिसे कुछ दूरीपर है। ये सब जन्मसे शौक्रदक्षिण राढ़ीय कायस्थ थे, परन्तु उनमें ब्राह्मण-संस्कार होनेके कारण सभी वर्णोंको दीक्षा प्रदान करते थे। पहले बड़गाछिमें गङ्गा प्रवाहित होती थी, अब वह 'काल्शिकी नहर' नामसे प्रसिद्ध है। 'कृष्णानन्द'—35 संख्या द्रष्टव्य है॥ 48-50॥ (58) कंसारि, (59) रामसेन, (60) रामचन्द्र, (61) गोविन्द, (62) श्रीरङ्ग, (63) मुकुन्द :- कंसारि सेन, रामसेन, रामचन्द्र कविराज। गोविन्द, श्रीरङ्ग, मुकुन्द, तिन कविराज॥ 51॥ अनुवाद—कंसारि सेन, रामसेन और रामचन्द्र कविराज श्रीनित्यानन्द प्रभुके दास थे। तीन कविराज—गोविन्द, श्रीरङ्ग और मुकुन्द भी श्रीनित्यानन्द प्रभुके किङ्कर थे॥ 51॥ अनुभाष्य—'कंसारि सेन'—गौरगणोद्देशदीपिका 194 और 200 श्लोक— 'रत्नावली' च कमला गुणचूडा सुकेशिनी॥ 194(ख)॥ 'कंसारिसेनः' सेनः श्रीजगन्नाथो महाशयः॥ 200(ख)॥ “ये व्रजकी 'रत्नावली' हैं।” 'सदाशिव कविराज'— (चैः चः आदिलीला, 11/38) का अनुभाष्य द्रष्टव्य है। 'रामचन्द्र कविराज'—खण्डवासी चिरञ्जीव और सुनन्दाके पुत्र एवं श्रीनिवासाचार्यके शिष्य तथा ठाकुर नरोत्तमके प्रियबन्धु हैं। नरोत्तम ठाकुरने प्रत्येक जन्ममें इनके सङ्गकी प्रार्थना की है। गोविन्द कविराज इनके छोटे भाई हैं। इनकी कृष्णभक्तिको देखकर श्रीजीवगोस्वामी प्रभुने वृन्दावनमें इन्हें 'कविराज' नाम प्रदान किया था। ये जन्मसे ही संसारसे विरक्त थे। ये श्रीनरोत्तम ठाकुर 118 | श्रीचैतन्यचरितामृत

11/51–56 ] और श्रीनिवासाचार्य प्रभुके प्रचार और भजनके प्रधान एवं प्रियतम सङ्गी थे। इन्होंने पहले श्रीखण्डमें और बादमें भागीरथीके तटपर ‘कुमारनगर’ में आकर वास किया (भक्तिरत्नाकर द्रष्टव्य है)। ‘गोविन्द कविराज’—खण्डवासी चिरञ्जीवके कनिष्ठ पुत्र एवं रामचन्द्र कविराजके भाई है। ये पहले शाक्त थे और बादमें श्रीनिवासाचार्य प्रभुके दीक्षित शिष्य हुए। इन्होंने पहले श्रीखण्ड में, बादमें कुमारनगर में, तत्पश्चात् पद्मानदीके दक्षिण तटपर ‘तेलिया बुधरि’ गाँवमें आकर वास किया। इनकी काव्य-प्रतिभाको देखकर श्रीजीव गोस्वामी प्रभुने इन्हें भी ‘कविराज’ नाम प्रदान किया था। ये ‘सङ्गीत-माधव’ नाटक और ‘गीतामृत’ आदि ग्रन्थोंके रचयिता हैं (भक्तिरत्नाकर नवम तरङ्ग द्रष्टव्य है)॥51॥ (64) पीताम्बर, (65) माधवाचार्य, (66) दामोदर, (67) शङ्कर, (68) मुकुन्द, (69) ज्ञानदास, (70) मनोहर :— पीताम्बर, माधवाचार्य, दास दामोदर। शङ्कर, मुकुन्द, ज्ञानदास, मनोहर ॥ 52 ॥ (71) गोपाल, (72) रामभद्र, (73) गौराङ्गदास, (74) नृसिंह-चैतन्य, (75) मीनकेतन :— नर्त्तक गोपाल, रामभद्र, गौराङ्गदास। नृसिंहचैतन्य, मीनकेतन रामदास ॥ 53 ॥ अनुवाद—पीताम्बर, माधवाचार्य, दामोदरदास, शङ्कर, मुकुन्द, ज्ञानदास, मनोहर, नर्त्तक गोपाल, रामभद्र, गौराङ्गदास, नृसिंह-चैतन्य और मीनकेतन रामदास, ये भी श्रीनित्यानन्द प्रभुके अन्य दास थे॥52-53॥ अनुभाष्य—‘मीनकेतन रामदास’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 68वाँ श्लोक)— “मीनकेतन-रामादिव्यूहः सङ्कर्षणोऽपरः॥68(ख)॥” “मीनकेतन रामदास (श्रीकृष्णके) आदिव्यूह-श्रीबलदेवके अन्य रूप सङ्कर्षण (अर्थात् श्रीनित्यानन्द प्रभुसे अभिन्न विग्रह) हैं॥”53॥ (76) श्रीठाकुर वृन्दावनदास :— वृन्दावनदास—नारायणीर नन्दन। ‘चैतन्य-मङ्गल’ येंहो करिल रचन ॥ 54 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके एक अन्य प्रमुख दास नारायणीदेवीके पुत्र श्रीवृन्दावनदास थे, जिन्होंने चैतन्य-मङ्गलकी रचना की थी॥54॥ अनुभाष्य—‘वृन्दावनदास’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 109वाँ श्लोक)— “वेदव्यासो य एवासीद्वासो वृन्दावनोऽधुना। सखा यः कुसुमापीडः कार्यतस्तं समाविशत्॥109॥” “श्रीवेदव्यास ही अब श्रीवृन्दावनदास ठाकुर हैं। व्रजके कुसुमापीड नामक सखा भी कार्यवशतः इनमें प्रविष्ट हुए हैं।” ये श्रीवास पण्डितकी भतीजी नारायणीदेवीके पुत्र और चैतन्यभागवतके लेखक हैं। भाष्यकार-कृत चैतन्यभागवतकी भूमिकामें ‘ठाकुरकी जीवनी’ शीर्षक प्रबन्ध द्रष्टव्य है॥54॥ इति अनुभाष्ये एकादश परिच्छेद। ग्यारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। व्यासदेवके द्वारा श्रीमद्भागवतमें श्रीकृष्णलीला और श्रीचैतन्यभागवतमें श्रीगौरलीलाका वर्णन :— भागवते कृष्णलीला वर्णिला वेदव्यास। चैतन्य-लीलाते व्यास—वृन्दावनदास ॥ 55 ॥ अनुवाद—जिस प्रकार वेदव्यासजीने भागवतमें श्रीकृष्णकी लीलाका वर्णन किया है, उसी प्रकार श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाके व्यास वृन्दावनदास हैं॥55॥ वीरभद्रगोसाई-शाखा—सर्वश्रेष्ठ :— सर्वशाखा-श्रेष्ठ वीरभद्र गोसाञि। ताँर उपशाखा यत, तार अन्त नाइ ॥ 56 ॥ अनुवाद—वीरभद्र गोसाईं श्रीनित्यानन्द प्रभुकी सर्वश्रेष्ठ शाखा हैं और उनकी अनन्त उपशाखाएँ हैं॥56॥ ग्यारहवाँ अध्याय | 119

[ 11/57-61 असंख्य श्रीनित्यानन्दगण :- अनन्त नित्यानन्दगण—के करु गणन। आत्मपवित्रता-हेतु लिखिलाङ कत जन॥ 57॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके असंख्य भक्त हैं, जिनकी गणना कौन कर सकता है? मैंने तो केवल स्वयंको पवित्र करनेके उद्देश्यसे कुछ भक्तोंका यहाँ उल्लेख किया है॥ 57॥ इन सबके श्रीकृष्णप्रेमदानसे जगत्का उद्धार :- एइ सर्वशाखा पूर्ण-पक्व प्रेमफले। यारे देखे, तारे दिया भासाइल सकले॥ 58॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके सभी परिकर पके हुए प्रेमफलसे पूर्ण थे। श्रीनित्यानन्दके भक्त जिसपर भी दृष्टिपात करते थे, उसे प्रेममें डुबो देते थे॥ 58॥ इन सबकी निरन्तर श्रीकृष्णप्रीति-चेष्टा :- अनर्गल प्रेम सबार, चेष्टा अनर्गल। प्रेम दिते, कृष्ण दिते सबे धरे महाबल॥ 59॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके भक्तोंमें प्रचुर प्रेम था और उसे वितरण करनेमें उन्हें कोई भी बाधा नहीं आती थी। उनमें इतना बल था कि वे किसीको भी श्रीकृष्णप्रेम और स्वयं श्रीकृष्णको भी प्रदान करनेमें सक्षम थे॥ 59॥ संक्षेपे कहिलाङ एइ नित्यानन्दगण। याँहार अवधि ना पाय 'सहस्रवदन' ॥ 60॥ अनुवाद—मैंने संक्षेपमें इन श्रीनित्यानन्द प्रभुके भक्तोंका वर्णन किया है, अनन्त-शेष भी अपने हजारों मुखोंसे वर्णन करके भी जिनका अन्त नहीं पाते हैं॥ 60॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 61॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे नित्यानन्द-स्कन्ध-शाखावर्णनं नाम एकादश-परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 61॥ श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डका श्रीनित्यानन्द-स्कन्धकी शाखाओंका वर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

बारहवाँ अध्याय

चित्र 5

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और यथावत पाठ प्रस्तुत है:

बारहवाँ अध्याय बारहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें श्रीअद्वैतप्रभुकी सभी शाखाओंका वर्णन करके उनमेंसे श्रीअच्युतानन्दके मतानुयायी वैष्णवोंको 'सारग्राही' और अन्य सभीको 'असार' कहकर निर्देश किया गया है। अन्तमें श्रीगदाधर पण्डित-गोस्वामीकी शाखाका वर्णन करके इस अध्यायको समाप्त किया है। इस अध्यायके मध्यमें श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र गोपाल मिश्र और श्रीअद्वैताचार्यके सेवक कमलाकान्त विश्वासके दो उपाख्यानोंका वर्णन हुआ है। छोटी आयुमें श्रीगोपालका गुण्डिचा-मन्दिर मार्जनके समय प्रेम-मूर्च्छाको प्राप्त होना और श्रीमन्महाप्रभुकी कृपासे उनकी मूर्च्छा भङ्ग होनेका प्रसङ्ग वर्णित है। आचार्यके सेवक कमलाकान्त विश्वासने राजा प्रतापरुद्रसे श्रीअद्वैतप्रभुके तीन सौ मुद्राओंके ऋणशोधनकी भिक्षाके लिये पत्र लिखा और महाप्रभुको यह पता लगनेपर उस पागल विश्वासको दण्ड प्रदान किया और श्रीअद्वैताचार्यके अनुरोधपर उसका शोधन किया। (अमृतप्रवाह भाष्य) सारग्राही और असारग्राही-भेदसे दो प्रकारके श्रीअद्वैतदास :— अद्वैताङ्घ्र्यब्जभृङ्गांस्तान् सारासारभृतोऽखिलान्। हित्वाऽसारान् सारभृतो नौमि चैतन्यजीवनान्॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीअद्वैतप्रभुके अनुगतजन दो प्रकारके हैं—'सारग्राही' और 'असारग्राही'। इन दोनोंमेंसे असारवाहियोंका परित्यागकर समस्त सारग्राही चैतन्यदासोंको मैं प्रणाम करता हूँ॥१॥ अनुभाष्य—सारासारभृतः (सारः अद्वैतानुगो गौरहरिजनः, असारः तदनुगाभिमानी गौरहरि-विमुखजनः, तौ विभ्रतीति तान्) अखिलान् (सर्वान्) अद्वैताङ्घ्र्यब्जभृङ्गान् (अद्वैतस्य अङ्घ्री एव अब्जे तयोः भृङ्गान् भ्रमरान् अद्वैतसेवकान्) [मत्वा] असारवान् (तदनुप्रयान् शुद्धभक्तिरहितान् मायावादिनः) हित्वा (त्यक्त्वा) चैतन्यजीवनान् (चैतन्य एव जीवनं येषां तान् गौरप्राणान्) सारभूतः (सारग्राहिणः भागवतान्) नौमि (नमस्करोमि)। श्लोक भावानुवाद—श्रीअद्वैताचार्य प्रभुके दो प्रकारके अनुगतजन हैं—श्रीअद्वैतानुग जो श्रीगौरहरिको समर्पित हैं, वे सारग्राही हैं और जो अपनेमें केवल श्रीअद्वैतानुग होनेका अभिमान करते हैं, परन्तु श्रीगौरहरिके विमुख हैं, वे असारग्राही है। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुके चरणकमलोंके समस्त भ्रमरोंमेंसे असारग्राहियोंको छोड़कर शेष जिनका जीवन ही चैतन्य महाप्रभु हैं, ऐसे गौरगतप्राण सारग्राही भक्तोंको मैं प्रणाम करता हूँ॥१॥ जय जय महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य। जय जय नित्यानन्द जयाद्वैत धन्य॥२॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो; धन्य श्रीअद्वैत प्रभुकी जय हो॥२॥ गौरभक्त सारग्राही श्रीअद्वैतदासोंकी वन्दना :— श्रीचैतन्यामरतरौर्द्वितीयस्कन्धरूपिणः। श्रीमदद्वैतचन्द्रस्य शाखारूपान् गणान्नुमः॥३॥ अनुवाद—अनुभाष्य भावानुवाद द्रष्टव्य है॥३॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्यामरतरोः (गौरामरवृक्षस्य) द्वितीय स्कन्धरूपिणः श्रीमदद्वैतचन्द्रस्य शाखारूपान् (वृक्षशाखातुल्यान्) गणान् (आश्रितजनान्) [वयं] नुमः (नमस्कुर्मः)। श्लोक भावानुवाद—श्रीचैतन्य कल्पवृक्षके दूसरे स्कन्धरूप श्रीमद्-अद्वैतचन्द्रकी शाखारूप उनके आश्रितजनोंको मैं प्रणाम करता हूँ॥३॥ वृक्षेर द्वितीय स्कन्ध—आचार्य गोसाञि। ताँर यत शाखा हइल, तार लेखा नाञि॥४॥

[ 12/4-17 श्रीगौर-कृपासे सारग्राही श्रीअद्वैतदासोंका ही विस्तार :- चैतन्य-मालीर कृपाजलेर सेचने। सेइ जले पुष्ट स्कन्ध बाड़े दिने दिने॥5॥ सेइ स्कन्धे यत प्रेमफल उपजिल। सेइ कृष्णप्रेमफले जगत् भरिल॥6॥ सेइ जले स्कन्धे करे शाखाते सञ्चार। फले-फुले बाड़े,-शाखा हइल विस्तार॥7॥ धान्यराशि मापे यैछे पात्‌ना सहिते। पश्चाते पात्‌ना उड़ाञा संस्कार करिते॥12॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥8-12॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पहले श्रीअद्वैतप्रभुके समस्त अनुगतजन एकमत थे, बादमें कुछ लोग दैववशतः पृथक् मतके हो गये। आचार्यके निजमतसे जो चले, वे शुद्ध-वैष्णव हैं और जिन्होंने दैववशतः आचार्यके बतलाये मतसे स्वतन्त्र किसी प्रकार अपने मतकी कल्पना की, वे असार हैं। जिस प्रकार धानको छिलके सहित ही तोला जाता है और साफ करते समय छिलकेको उड़ाकर केवल सार चावलको ही ग्रहण किया जाता है; उसी प्रकार असार व्यक्तियोंके नामोंसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है, तो भी सारग्राही वैष्णवोंसे असारवाहियोंको पृथक् रखनेके अभिप्रायसे उनकी एक साथ गणना की है। चावलसे रहित असार धानको 'पात्‌ना' कहते हैं॥8-12॥ अनुवाद-वृक्षके दूसरे स्कन्ध श्रीअद्वैताचार्य हैं। उनकी जितनी शाखाएँ हुई हैं, उनकी कोई गणना नहीं हो सकती। श्रीचैतन्य-महाप्रभु मालीके कृपारूपी जलके सिञ्चनसे पुष्ट होकर यह स्कन्ध दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। उस स्कन्धपर जितने प्रेमफल उत्पन्न हुए, सारा जगत् उन श्रीकृष्णप्रेमरूपी फलोंसे परिपूर्ण हो गया। स्कन्ध (श्रीअद्वैताचार्य) ने उस महाप्रभुके कृपारूपी जलका अपनी शाखाओंमें सञ्चार किया, जिससे उनपर फूल और फलोंके बढ़नेसे शाखाओंका बहुत विस्तार हुआ॥4-7॥ (1) अच्युतानन्द-शाखा :- अच्युतानन्द-बड़ शाखा, आचार्य-नन्दन। आजन्म सेविला तें'हो चैतन्य-चरण॥13॥ अच्युतके गुणोंका वर्णन :- “चैतन्य गोसाञिर गुरु-केशव भारती।” एइ पितार वाक्य शुनि' दुःख पाइल अति॥14॥ “जगद्गुरुते तुमि कर ऐछे उपदेश। तोमार एइ उपदेशे नष्ट हइल देश॥15॥ चौद्द भुवनेर गुरु-चैतन्य-गोसाञि। ताँर गुरु-अन्य, एइ कोन शास्त्रे नाइ॥”16॥ पञ्चम वर्षे बालक कहे सिद्धान्तेर सार। शुनिया पाइला आचार्य सन्तोष अपार॥17॥ श्रीअद्वैतदासोंके दो पृथक् मत :- प्रथमे त' आचार्येर एकमत गण। पाछे दुइमत हैल दैवेर कारण॥8॥ सारग्राहियोंकी श्रीअद्वैतके आनुगत्यमें गौरभक्ति, असारगणोंके द्वारा स्वतन्त्रभावमें गौरविरोध :- केह त' आचार्येर आज्ञाय, केह त' स्वतन्त्र। स्वमत कल्पना करे दैव-परतन्त्र॥9॥ आचार्यका अनुगत्य ही सार, अन्यथा असार :- आचार्येर मत येइ, सेइ मत सार। ताँर आज्ञा लङ्घि' चले, सेइ त' असार॥10॥ श्रीअद्वैत-दासाभिमानी अभक्तोंके उल्लेखका कारण और दृष्टान्त :- असारेर नामे इँहा नाहि प्रयोजन। भेद जानिवारे करि एकत्र गणन॥11॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र अच्युतानन्द एक बड़ी शाखा हैं, जिन्होंने सारा जीवन श्रीचैतन्य महाप्रभुके 124 | श्रीचैतन्यचरितामृत

चरणोंकी सेवा की है। अपने पिताके मुखसे यह वाक्य सुनकर कि केशव भारती श्रीचैतन्य महाप्रभुके गुरु हैं, उन्हें अपार दुःख हुआ। उन्होंने अपने पिताजीसे कहा कि जगद्गुरु (श्रीचैतन्य महाप्रभु) के विषयमें आप ऐसा उपदेश कर रहे हैं, (लोग उन्हें भगवान् नहीं मानकर साधारण जीव मान लेंगे) जिसके कारण सारे देशका विनाश हो जायेगा। चैतन्य महाप्रभु तो चौदह भुवनोंके गुरु हैं और किसी भी शास्त्रमें ऐसा वर्णन नहीं है कि कोई अन्य उनका गुरु है। अच्युतानन्द उस समय केवलमात्र पाँच वर्षके बालक थे। उनके मुखसे यह सिद्धान्त-सार सुनकर श्रीअद्वैताचार्यको परम आनन्द हुआ॥ 13-17॥ अनुभाष्य - 'अच्युतानन्द' - श्रीचैतन्यभागवतके अन्त्यखण्डके आठवें अध्यायमें लिखा है- “अद्वैतेर ज्येष्ठपुत्र श्रीअच्युतानन्द ॥ 60(क)॥” “अच्युतानन्द श्रीअद्वैतप्रभुके ज्येष्ठ पुत्र हैं।” संस्कृत भाषाके ग्रन्थ 'अद्वैतचरित' में लिखा है- “अच्युतः कृष्णमिश्रश्च गोपालदास एव च। रत्नत्रयमिदं प्रोक्तं सीतागर्भाब्धिसम्भवम्। आचार्यतनयेष्ठेते त्रयो गौरगणाः स्मृताः॥ चतुर्थो बलरामश्च स्वरूपः पञ्चमः स्मृतः। षष्ठस्तु जगदीशाख्य आचार्यतनया हि षट्॥” “अच्युत, कृष्णमिश्र और गोपाल-ये सीतादेवीके गर्भसमुद्रसे उत्पन्न तीन रत्न कहलाते हैं। श्रीअद्वैताचार्यके पुत्रोंमेंसे ये तीन गौरजन कहलाते हैं। चौथे पुत्र श्रीबलराम, पाँचवें पुत्र स्वरूप और छठे पुत्र जगदीश हैं- इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यके छह पुत्र हैं।” श्रीअद्वैतप्रभुके गौरभक्त तीनों पुत्रोंमें श्रीअच्युतानन्द ही ज्येष्ठ हैं। श्रीअद्वैतप्रभुका विवाह पन्द्रहवीं शक-शताब्दीके प्रारम्भमें ही हुआ था। श्रीमन्महाप्रभुने जिस वर्ष नीलाचलसे रामकेलि होते हुए वृन्दावन जानेका मन बनाया था, उसी वर्ष 1433-34 शकाब्दमें अच्युतानन्द केवल पाँच वर्षके थे। चैःभाः अन्त्यखण्डके चतुर्थ अध्यायमें “पञ्चवर्ष वयस मधुर दिगम्बर” के रूपमें उनका वर्णन है। इसलिये अच्युतानन्दका जन्म 1428 शकाब्दमें हुआ था। अच्युतानन्दके जन्मसे पहले महाप्रभुके जन्मके समय श्रीअद्वैतपत्नी सीतादेवी महाप्रभुके जन्मके उपरान्त (1407 शकाब्दमें) उन्हें देखनेके लिये आयी थीं, इसलिये इन 21 वर्षोंमें उनके और भी तीन पुत्र होनेकी असम्भावना नहीं है। 'श्रीनित्यानन्द-दायिनी' पत्रिकामें 1792 शकाब्दमें छपी प्राकृत सहजिया सखीभेखी-दलके लोकनाथदास नामक एक व्यक्तिने 'सीताद्वैतचरित' नामक एक बङ्गला कविता-ग्रन्थमें अच्युतानन्दको महाप्रभुके सहपाठीके रूपमें वर्णित किया है; यह बात चैतन्यभागवतके विरुद्ध है। महाप्रभु जिस वर्ष संन्यास ग्रहणकर शान्तिपुरमें श्रीअद्वैतके भवनमें आये, तब 1431 शकाब्द था, उस समय अच्युतानन्द तीन वर्षके बालक थे- (चैःभाः अन्त्यखण्ड प्रथम अध्याय)- “दिगम्बर शिशुरूप अद्वैत-तनय ॥213(क)॥ आसिया पड़िल गौरचन्द्र-पदतले। धूलार सहित प्रभु लइलेन कोले॥216॥ प्रभु बोले,- अच्युत, आचार्य मोर पिता। से-सम्बन्धे तोमाय आमाय (हइ) दुइ भ्राता ॥217॥” “श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र शिशुरूपमें दिगम्बर (वस्त्रहीन) वेशमें थे। वे आकर महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े। महाप्रभुने धूल-धूसरित उन शिशुको उठाकर अपनी गोदमें ले लिया और कहने लगे, अच्युत! (श्रीअद्वैत) आचार्य मेरे पिता हैं, इस सम्बन्धसे तुम और मैं-दोनों भाई हैं।” श्रीमन्महाप्रभुने श्रीनवद्वीपमें अपने महाप्रकाशसे पहले श्रीअद्वैताचार्यको लानेके लिये श्रीराम पण्डितको शान्तिपुर भेजा था। उस समय अच्युतानन्द भी पिता-माताके साथ आनन्द-क्रन्दनमें डूब गये थे। चैःभाः मध्यखण्ड छठा अध्याय- “अद्वैतेर तनय 'अच्युतानन्द'-नाम। परमबालक, सेहो कान्दे अविराम ॥41॥” और जब श्रीअद्वैताचार्य भक्तिके विरुद्ध ज्ञानकी व्याख्या कर रहे थे और महाप्रभुने उनपर प्रहार किया था, तब भी अच्युतानन्द वहाँ उपस्थित थे। ये सारी बारहवाँ अध्याय | 125

[ 12/13-18

घटनाएँ महाप्रभुके संन्यासके दो-तीन वर्ष पहले हुईं—ऐसा स्वीकार करना पड़ेगा। चैःभाः मध्यखण्ड उन्तीसवाँ अध्याय—

“अच्युत प्रणाम करे अद्वैत-तनय॥ 128(ख)॥”

श्रीअच्युत बाल्यकालसे ही श्रीमन्महाप्रभुके भक्त थे। इन्होंने पत्नी ग्रहणकर कभी संसार धर्मका पालन किया, ऐसी कोई भी बात नहीं सुनी जाती है। श्रीअद्वैत-शाखाके वर्णनमें इनका नाम शिष्योंमें अग्रणी है। श्रीयदुनन्दनदासके द्वारा रचित श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीकी ‘शाखा-निर्णयामृत’ ग्रन्थके अनुसार अच्युतानन्द श्रीगदाधर पण्डितके शिष्य और शाखा हैं—

“महारसामृतानन्दमच्युतानन्द-नामकम्। गदाधर-प्रियतमं श्रीमदद्वैतनन्दनम्॥”

“जिनका नाम अच्युतानन्द है, वे महारसामृतानन्द हैं। श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र श्रीगदाधर पण्डितके अति प्रिय शिष्य हैं।” (चैःचः आदिलीला, 10/150)—

“अच्युतानन्द—अद्वैत आचार्य-तनय। नीलाचले रहे प्रभुर चरण-आश्रय॥”

अच्युतानन्दने नीलाचलमें महाप्रभुका चरणाश्रय करके भजन किया था। श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीने अपना शेष जीवन महाप्रभुके निकट नीलाचलमें व्यतीत किया था, इसी कारणसे यह देखनेमें आता है कि अच्युतानन्दादि श्रीअद्वैतप्रभुके वास्तविक सेवक-मण्डलियोंमेंसे अनेकोंने ही श्रीगदाधरका चरणाश्रय किया था। अच्युतानन्दकी श्रीमन्महाप्रभुके प्रति अति बाल्यकालसे ही प्रबल भक्तिका प्रमाण देखा जाता है। (चैःचः मध्यलीला, 13/45)—

“शान्तिपुर-आचार्येर एक सम्प्रदाय। अच्युतानन्द नाचे ताँहा, आर सब गाय॥”

प्रत्येक वर्ष जगन्नाथ रथके सामने (महाप्रभुके) नृत्य-कीर्तनके समय भी हम महाप्रभुके प्रिय अच्युतानन्दका वर्णन सर्वत्र देखते हैं। उस समय बालककी आयु केवल 6 वर्षकी थी। श्रीकविकर्णपूर-प्रणीत गौरगणोद्देश-दीपिकामें अच्युतानन्दको ‘श्रीगदाधरके शिष्य एवं श्रीकृष्णचैतन्यके प्रिय’ के रूपमें कहा गया है—

“तस्य पुत्रोऽच्युतानन्दः कृष्णचैतन्यवल्लभः। श्रीमत्पण्डित-गोस्वामि-शिष्यः प्रिय इति श्रुतम्॥ 87॥ यः कार्त्तिकेयः प्रागासीदिति जल्‍पन्ति केचन। केचिदाहू रसविदोऽच्युतानाम्नी तु गोपिका। उभयन्तु समीचीनं द्वयोरेकत्र सङ्गतात्॥ 88॥”

“श्रीअच्युतानन्द श्रीकृष्णचैतन्यके अतिशय प्रिय, श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीके शिष्य तथा श्रीअद्वैताचार्यके प्रिय पुत्रके रूपमें प्रसिद्ध हैं। किसी-किसीका कहना है कि कार्त्तिकेय ही अच्युतानन्द हैं, परन्तु अन्यान्य किन्हीं रसविदोंका कहना है कि ब्रजकी अच्युता नामक गोपी ही अब अच्युतानन्द हैं। ये दोनों ही विचार ठीक हैं, क्योंकि कार्त्तिकेय और अच्युता नामक गोपी मिलकर ही श्रीअच्युतानन्द हुए हैं।”

श्रीनरहरिदासके द्वारा रचित ‘नरोत्तमविलास’ ग्रन्थमें खेतरि-महोत्सवके समय अच्युतानन्दके आगमन एवं योगदानकी कथा सविस्तार वर्णित है। जननी श्रीसीता और श्रीजाह्नवाके अनुरोधसे नितान्त असमर्थ होनेपर भी उन्होंने महोत्सवके समय योगदान दिया था। इन्हीं नरहरिदासके मतानुसार जीवनके अन्तिम समय उन्होंने शान्तिपुरके भवनमें वास किया था; परन्तु ऐसा जाना जाता है कि श्रीमहाप्रभुके प्रकटकालमें उन्होंने महाप्रभुके साथ और बादमें श्रीगदाधरके निकट पुरीमें वास किया था। विवाह न करनेके कारण उनकी कोई सन्तानादि नहीं थी॥ 13-17॥

(2) कृष्णमिश्र :- कृष्णमिश्र-नाम आर आचार्य-तनय। चैतन्य-गोसाञि कैसे याँहार हृदय॥18॥

अनुवाद— कृष्णमिश्र नामक श्रीअद्वैताचार्यके एक और पुत्र थे, जिनके हृदयमें सदा श्रीचैतन्य महाप्रभु निवास करते थे॥ 18॥

अनुभाष्य— 'कृष्णमिश्र'—संस्कृतभाषाके ग्रन्थ ‘अद्वैतचरित’ में—


126 | श्रीचैतन्यचरितामृत

“अच्युतः कृष्णमिश्रश्च गोपालदास एव च। रत्नत्रयमिदं प्रोक्तं सीतागर्भाब्धिसम्भवम्।” “श्रीअद्वैताचार्यके छह पुत्रोंमेंसे 'अच्युत, कृष्णमिश्र और गोपाल'-ये तीनों भाई श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके दास्यके रूपमें नियुक्त थे।” गौरगणोद्देशदीपिका श्लोक 88– “कार्तिकेयः कृष्णमिश्रस्तत् साम्यादिति केचन॥88॥” “कार्तिकेय और श्रीकृष्णमिश्रमें समानताके कारण कोई-कोई श्रीकृष्णमिश्रको भी कार्तिकेय कहते हैं।” कृष्णमिश्रके दो पुत्र थे—(1) रघुनाथ चक्रवर्त्ती, (2) दोलगोविन्द। इनमेंसे रघुनाथके वंशज शान्तिपुरके मदनगोपालके मोहल्ला, गणकर, मृजापुर और कुमारखालिमें वर्तमान है। दोलगोविन्दके तीन पुत्र थे—(1) चाँद, (2) कन्दर्प, (3) गोपीनाथ। कन्दर्पके वंशज मालदह, जिकावाड़ीमें हैं। गोपीनाथके तीन पुत्र— (1) श्रीवल्लभ, (2) प्राणवल्लभ और (3) केशव थे। श्रीवल्लभके वंशज मशियाडारा (महिषडेरा ?), दामुकदिया और चण्डीपुर आदि स्थानोंपर हैं। श्रीवल्लभके ज्येष्ठपुत्र गङ्गानारायणसे मशियाडाराकी वंश-धारा एवं कनिष्ठ पुत्र रामगोपालसे दामुकदिया, चण्डीपुर, शोलमारि आदि गाँवोंकी वंश-धारा है। प्राणवल्लभ और केशवके वंशज उथलीमें वास करते हैं। प्राणवल्लभके पुत्र रत्नेश्वर, उनके पुत्र कृष्णराम, उनके छोटे पुत्र लक्ष्मीनारायण, उनके पुत्र नवकिशोर, उनके द्वितीय पुत्र राममोहनके बड़े पुत्र 'जगबन्धु' और तृतीय पुत्र 'वीरचन्द्र' ने भिक्षुका श्रम स्वीकार करके काटोयामें श्रीमन्महाप्रभुके विग्रहकी स्थापना की। लोग इन्हें 'बड़ेप्रभु' और 'छोटेप्रभु' कहते थे। इन्होंने ही नवद्वीपधाम-परिक्रमाका प्रवर्त्तन किया था। कृष्णमिश्रकी पूर्ण वंशातालिकाके बारेमें वैष्णवमञ्जूषाके चतुर्थ संख्यामें “अद्वैत-वंश' द्रष्टव्य है॥18॥ (3) गोपालका बाल-चरित्र :– श्रीगोपाल-नामे आर आचार्येर सुत। ताँहार चरित्र, शुन, अत्यन्त अद्भुत॥19॥


12/18–26 ] गुण्डिचा-मन्दिरे महाप्रभुर सन्मुखे। कीर्त्तने नर्त्तन करे बड़ प्रेमसुखे॥20॥ नाना-भावोद्गम देहे अद्भुत नर्त्तन। दुइ गोसाञि 'हरि' बले आनन्दित मन॥21॥ नाचते नाचते गोपाल हइल मूर्च्छित। भूमेते पड़िल, देहे नाहिक सम्बित॥22॥ दुःखित हइला आचार्य पुत्र कोले लञा। रक्षा करे नृसिंहरे मन्त्र पड़िया॥23॥ नाना मन्त्र पड़ेन आचार्य, ना हय चेतन। आचार्येर दुःखे वैष्णव करेन क्रन्दन॥24॥ तबे महाप्रभु ताँर हृदे हस्त धरि'। “उठह, गोपाल-बल, बल 'हरि' 'हरि'॥”25॥ उठिल गोपाल प्रभुर स्पर्श-ध्वनि शुनि'। आनन्दित हञा सबे करे हरिध्वनि॥26॥ अनुवाद—श्रीगोपाल नामक एक और श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र थे। उनके अद्भुत चरित्रके विषयमें सुनो। वे एक बार महाप्रभुके सामने गुण्डिचा मन्दिरमें प्रेममें डूबकर बड़े आनन्दसे नृत्य कर रहे थे। उनके शरीरमें नाना प्रकारके भावोंका उद्गम हो रहा था और वे अद्भुत नृत्य कर रहे थे। श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु दोनों आनन्दित मनसे 'हरि' 'हरि' बोल रहे थे। नाचते-नाचते गोपाल मूर्च्छित हो गये और उनकी देहमें कोई चेतना नहीं रही। श्रीअद्वैताचार्य बहुत दुःखी हो गये और अपने पुत्रको उन्होंने अपनी गोदमें ले लिया। उसकी रक्षाके लिये उन्होंने नृसिंह-मन्त्र पढ़ा। उसके बाद उन्होंने अनेक मन्त्र पढ़े, परन्तु फिर भी गोपालकी चेतना लौटकर नहीं आयी। श्रीअद्वैताचार्यके दुःखको देखकर सभी वैष्णव क्रन्दन करने लगे। तब महाप्रभुने अपना हाथ गोपालके हृदयपर रखा और कहा—“गोपाल! उठो और 'हरि' 'हरि' बोलो।” महाप्रभुके स्पर्श और ध्वनिको सुनकर गोपाल उठकर बैठ गये। इसे देखकर


बारहवाँ अध्याय | 127

[ 12/19-31

सभीका मन आनन्दित हो गया और सभी 'हरि' 'हरि' ध्वनि करने लगे ॥ 19-26 ॥ अनुभाष्य—'गोपाल'—श्रीअद्वैताचार्यके तीन वैष्णव पुत्रोंमें अन्यतम हैं। चैःचः मध्यलीला, 12/143-149 संख्या द्रष्टव्य है। सम्बित् अर्थात् सम्विद् अथवा ज्ञान ॥ 19-26 ॥ आचार्येर आर पुत्र—श्रीबलराम। आर पुत्र—'स्वरूप'-शाखा, 'जगदीश' नाम ॥ 27 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यके अन्य पुत्र श्रीबलराम, स्वरूप और जगदीश हैं ॥ 27 ॥ अनुभाष्य—'बलराम, स्वरूप और जगदीश'—संस्कृतके ग्रन्थ 'अद्वैतचरित' में कहा गया है— “चतुर्थो बलरामश्च स्वरूपः पञ्चमः स्मृतः। षष्ठस्तु जगदीशाख्य आचार्यतनया हि षट्॥” “श्रीअद्वैताचार्यके छह पुत्र हैं, जिनमें बलराम चौथे, स्वरूप पाँचवें और जगदीश छठे पुत्र हैं।” ये तीनों गौर विमुख स्मार्त्त अथवा मायावादी हैं, अतः अवैष्णव हैं। बलरामकी तीन पत्नियोंके गर्भसे नौ पुत्रोंका जन्म हुआ। प्रथम पत्नीकी कनिष्ठ सन्तान मधुसूदनने 'गोसाईं भट्टाचार्य' नामसे विख्यात होकर स्मार्त्तधर्मको स्वीकार किया। इनके पुत्र राधारमणने 'गोस्वामी भट्टाचार्य' नाम ग्रहण करके गृहत्यागीके योग्य पदवी 'गोस्वामी' शब्दका अपमान किया। और इन्होंने स्मार्त्त रघुनन्दनके आनुगत्यमें श्रीअद्वैताचार्यकी 'कुश-पुत्तलिका' का दहन करके प्रेत या राक्षस श्राद्ध-कार्य करके श्रीहरिभक्तिविलासादिमें वर्णित विष्णु-भक्तिपरक श्राद्धकी विधिके विरुद्ध आचरण करके मूर्खता एवं महाअपराधका प्रदर्शन किया। उन्होंने शुद्धभक्त ना होते हुए भी कुछ नये ग्रन्थों और कुछ प्राचीन ग्रन्थोंकी टीकाओंकी रचना की—ये सब शुद्धभक्तोंके लिये आदरणीय नहीं है। बलरामकी वंशतालिका वैष्णवमञ्जूषा (चतुर्थ संख्या में) द्रष्टव्य है ॥ 27 ॥

(4) कमलाकान्त :— 'कमलाकान्त विश्वास'—नाम आचार्य-किङ्कर। आचार्य-व्यवहार सब—ताँहार गोचर ॥ 28 ॥ अनुवाद—कमलाकान्त विश्वास नामक एक श्रीअद्वैताचार्यके दास थे, जो उनके सभी सांसारिक कार्यकलापोंको देखते थे ॥ 28 ॥ अनुभाष्य—'कमलाकान्त विश्वास'—चैःचः आदिलीला, 10/119 संख्यामें वर्णित भक्तोंमें 'कमलाकान्त' ही कमलाकान्त विश्वास हैं। चैःचः आदिलीला, 10/149 संख्यामें वर्णित 'कमलानन्द' और मध्यलीला, 10/94 संख्यामें लिखित 'द्विज कमलाकान्त' सम्भवतः एक ही व्यक्ति हैं। कमलाकान्त-ब्राह्मण महाप्रभुके निजगण हैं और कमलाकान्त विश्वास श्रीअद्वैतप्रभुके सेवक हैं। चैःचः मध्यलीला, 10/94— “प्रभुर एक भक्त—'द्विज कमलाकान्त' नाम। ताँरे लञा नीलाचले करिला प्रयाण॥” “श्रीपरमानन्दपुरी नवद्वीपसे नीलाचल आते समय नवद्वीपवासी महाप्रभुके भक्त 'ब्राह्मण-कमलाकान्त' को अथवा कमलानन्दको साथ लेकर नीलाचल आये॥” 28 ॥

कमलाकान्तका चरित्र :— नीलाचले तेंहो एक पत्रिका लिखिया। प्रतापरुद्रेर स्थाने दिल पाठाइया ॥ 29 ॥ सेइ पत्रीर कथा आचार्य नाहि जाने। कोन पाके सेइ पत्री आइल प्रभुस्थाने ॥ 30 ॥ अनुवाद—उन्होंने नीलाचलमें एक पत्र लिखकर किसीके हाथों राजा प्रतापरुद्रके पास भिजवाया। उस पत्रके विषयमें श्रीअद्वैताचार्यको कुछ पता नहीं था। किसी कारणसे वह पत्र महाप्रभुके पास पहुँच गया ॥ 29-30 ॥

कमलाकान्तके पत्रमें पागल-मत :— से पत्रीते लेखा आछे—एइ त' लिखन। ईश्वरत्वे आचार्येरे करियाछे स्थापन ॥ 31 ॥

128 | श्रीचैतन्यचरितामृत

12/31-43 ] किन्तु ताँर दैवे किछु हइयाछे ऋण। ऋण शोधिबारे चाहि मुद्रा शत-तिन ॥ 32 ॥ पत्र पड़िया प्रभुर मने हैल दुःख। बाहिरे हासिया किछु बोले चाँदमुख ॥ 33 ॥ “आचार्येरे स्थापियाछे करिया ईश्वर। इथे दोष नाहि, आचार्य-दैवत ईश्वर ॥ 34 ॥ षडैश्वर्यशाली नारायणको जीव समझकर दरिद्रबुद्धि करना ही मायावाद अथवा पागल-मत :- ईश्वरेर दैन्य करि' करियाछे भिक्षा। अतएव दण्ड करि' कराइब शिक्षा ॥" 35 ॥ अनुवाद—उस पत्रमें उन्होंने यह लिखा कि श्रीअद्वैताचार्य स्वयं ईश्वर हैं, परन्तु दैववशतः उनपर कुछ ऋण हो गया है। ऋणके शोधनके लिये उन्हें तीन सौ मुद्राओंकी आवश्यकता है। पत्र पढ़कर महाप्रभुके मनमें दुःख हुआ, परन्तु बाहरसे हँसते हुए चन्द्रवदन महाप्रभुने कहा—“इसने आचार्यको ईश्वर कहा है, इसमें कोई भी दोष नहीं है, क्योंकि वे वास्तवमें ईश्वर हैं। परन्तु ईश्वरको दीन बनाकर इसने जो भिक्षा माँगी है, उसके लिये इसे मैं दण्ड देकर शिक्षा दूँगा ॥” 31-35 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'दैवत ईश्वर'—वास्तवमें ईश्वर ॥ 34 ॥ अनुभाष्य—'ईश्वरेर दैन्य करि'—ईश्वरको दीन बनाकर ॥ 35 ॥ पागलको दण्ड :- गोविन्देरे आज्ञा दिल,—“इँहा आजि हैते। बाउलिया 'विश्वासें' एथा ना दिबे आसिते ॥" 36 ॥ दण्ड शुनि' 'विश्वास' हइल परम दुःखित। शुनिया प्रभुर दण्ड आचार्य हर्षित ॥ 37 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने गोविन्दको आज्ञा दी—“आजसे इस पागल 'विश्वास' को यहाँपर आने मत देना।” दण्डको सुनकर 'विश्वास' बड़े दुःखी हो गये, परन्तु श्रीअद्वैताचार्य सुनकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ 36-37 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बाउलिया विश्वास'—कमलाकान्त विश्वासके सिद्धान्तको बाउलके (पागलके) जैसा कहकर उसको 'बाउलिया विश्वास' कहा है ॥ 36 ॥ अनुभाष्य—'विश्वासे'—अर्थात् कमलाकान्त विश्वासको ॥ 36 ॥ श्रीअद्वैतप्रभुके द्वारा उसको सान्त्वना-दान :- विश्वासेरे कहे,—“तुमि बड़ भाग्यवान्। तोमारे करिल दण्ड प्रभु भगवान् ॥ 38 ॥ पूर्वे महाप्रभु मोरे करेन सम्मान। दुःख पाइ' मने आमि कैलुँ अनुमान ॥ 39 ॥ मुक्ति-श्रेष्ठ करि' कैनु वशिष्ठ व्याख्यान। क्रु दण्ड पाञा हैल मोर परम आनन्द। ये दण्ड पाइल भाग्यवान् मुकुन्द ॥ 41 ॥ ये दण्ड पाइल श्रीशची भाग्यवती। से दण्डप्रसाद आर लोके पाबे कति ॥" 42 ॥ एत कहि आचार्य ताँरे करिया आश्वास। आनन्दित हइया आइल महाप्रभु-पाश ॥ 43 ॥ अनुवाद—कमलकान्त विश्वासको दुःखी देखकर श्रीअद्वैताचार्यने कहा—“तुम बड़े भाग्यशाली हो कि तुम्हें महाप्रभुने दण्ड प्रदान किया है, अर्थात् अपना माना है। पहले महाप्रभु मेरा सम्मान करते थे, जिससे मुझे बहुत दुःख होता था। तब मैंने मनमें विचार करके योग-वाशिष्ठकी व्याख्या करते हुए मुक्तिको भक्तिसे श्रेष्ठ बतलाना आरम्भ किया। इसे सुनकर महाप्रभुने क्रोधित होकर मुझपर शासन किया। उस दण्डको पाकर मुझे परम आनन्द हुआ। ऐसा ही दण्ड महाप्रभुने मुकुन्दको दिया था। शची माताको भी ऐसा दण्ड मिला बारहवाँ अध्याय | 129

[ 12/38-43 था, जिस दण्ड (कृपा) को पानेवाला उनसे अधिक भाग्यशाली जगत्में और कौन है?" यह कहकर श्रीअद्वैताचार्यने उसे आश्वासन दिया और वे आनन्दित होकर महाप्रभुके पास आये॥ 38-43 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—योगवाशिष्ठकी व्याख्या करते करते किसी छलसे श्रीअद्वैतप्रभुने भक्तिकी अपेक्षा मुक्तिको श्रेष्ठ बतलाया ॥ 40 ॥ अनुभाष्य—'वशिष्ठ' अर्थात् योगवाशिष्ठ रामायण। यह ग्रन्थ विष्णुभक्ति विरोधी मायावादका प्रतिपादक है, इसलिये शुद्धभक्तोंको इसे नहीं पढ़ना चाहिये। अद्वैतदण्डके लिये (चैःभाः मध्यखण्ड, उन्नीसवाँ अध्याय), मुकुन्ददण्डके लिये (चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय) और शचीमाताके दण्डके लिये (चैःभाः मध्यखण्ड, बाइसवाँ अध्याय) द्रष्टव्य है॥ 40-42 ॥ अमृताणुकणिका—'श्रीअद्वैत-दण्ड'—नवद्वीपमें महाप्रभु विश्वम्भरने जो क्रीड़ा की, उसे सभी लोग नहीं देख पाते थे। वे श्रीनित्यानन्द और श्रीगदाधरको साथ लेकर अपने भक्तोंके घर-घरमें विहार करने लगे। महाप्रभुको आनन्दमें मग्न देखकर भागवतगण भी परिपूर्ण आनन्दमें डूब गये। सभीने देखा कि सम्पूर्ण भुवन श्रीकृष्णसे परिपूर्ण हैं। निरन्तर भावावेशमें रहनेके कारण किसीको भी बाहरी दुनियाकी सुधबुध न रही। एक सङ्कीर्तनके अतिरिक्त उनके लिये और कोई कार्य नहीं रह गया था। सबसे अधिक मत्त थे—आचार्य गोसाईं। ऐसा कोई नहीं था जो उनके अगाध चरित्रको समझ सके। श्रीचैतन्यकी कृपासे केवल कोई-कोई ही उन्हें जान पाये थे कि अद्वैताचार्य श्रीचैतन्य महाप्रभुके महाभक्त हैं। बाह्य जगत्का बोध होनेपर विश्वम्भर सभी वैष्णवोंके प्रति, विशेष करके श्रीअद्वैतके प्रति महाभक्ति प्रदर्शित करते थे। इससे श्रीअद्वैताचार्यको बड़ा ही दुःख होता था। वे मन-ही-मन चिन्तन करने लगे,—"निरन्तर ये चोर (गौराङ्ग महाप्रभु) मुझे विडम्बनामें डालते रहते हैं। प्रभुताको छोड़कर वे मेरे चरण पकड़ते हैं। महाबली प्रभुके साथ शक्तिसे मैं निपट नहीं सकता हूँ, मुझे पकड़कर भी वे बलात् मेरे चरणोंकी धूल ले लेते हैं। बस, एक ही उपाय है, और वह है मेरा भक्तिबल। क्योंकि, भक्तिके बिना विश्वम्भरको पहचानना सम्भव नहीं है। मायाको जब मैं पूरी तरहसे मिटा पाऊँगा, तभी लोगोंको पता चलेगा कि मैं सचमुच ही 'अद्वैत-सिंह' हूँ। भृगुको जीतकर 'चोर' का साहस बढ़ गया है, अर्थात् भृगुकी लात खाकर भी उन्होंने क्रोधके स्थानपर दैन्य प्रकाश किया था। भृगु-जैसे मेरे सैकड़ों शिष्य हैं। प्रभुके शरीरमें ऐसा क्रोध उत्पन्न करूँगा कि प्रभु अपने ही हाथोंसे मुझे दण्ड प्रदान करेंगे। जिस भक्तिके प्रचारके लिये प्रभुका अवतार हुआ है, मैं उस भक्तिको स्वीकार नहीं करूँगा—बस, यही सार सिद्धान्त है। भक्तिको न माननेसे प्रभु क्रोधित होकर अपने आपको भूल जायेंगे और मेरे केश पकड़कर मुझे दण्ड प्रदान करेंगे।" ऐसा सोचकर अद्वैताचार्य प्रभुने हरिदासके साथ आनन्द-सहित महाप्रभुसे विदा ली। वे अपने घर शान्तिपुर आये और आकर सभीको 'ज्ञान' की प्रधानता-प्रकाश-पूर्वक वाशिष्ठ-शास्त्रकी व्याख्या करने लगे,—"बिना 'ज्ञान' के विष्णु-भक्तिमें कोई शक्ति है क्या? इसलिये ज्ञान ही सबका प्राणस्वरूप है, ज्ञानमें ही सर्वशक्ति है। इस ज्ञानको बिना समझे कोई-कोई व्यक्ति अपने घरमें ही निज धनको खोकर वन-वनमें ढूँढता रहते हैं। विष्णु-भक्ति दर्पण-स्वरूप होती है और नेत्र होते हैं—'ज्ञान'। बिना नेत्रोंके दर्पण किस कामका? सभी शास्त्रोंका मैंने आदिसे अन्त तक अध्ययन किया है और देखा है कि केवल 'ज्ञान' ही इन सबका एकमात्र अभिप्राय है।" उधर महाप्रभु विश्वम्भर बारम्बार हुँकार करने लगे और कहने लगे,—"मैं वही हूँ, मैं वही हूँ। नींदसे उठाकर मुझे नाड़ा यहाँ ले आया है, और अब यहाँ भक्तिको छिपाकर वह 'ज्ञान' की व्याख्या कर रहा है। देख लेना, इसी कारण आज मैं उसे प्रत्यक्षरूपसे दण्ड 130 | श्रीचैतन्यचरितामृत

प्रदान करूँगा। मैं देखना चाहता हूँ कि आज कैसे वह ज्ञानयोगको बचाये रखता है?” श्रीअद्वैताचार्यने जब यह जाना कि 'क्रोधित होकर महाप्रभु आ रहे हैं, तब वे और अधिक मत्त होकर ज्ञानयोगकी व्याख्या करने लगे। चैतन्य-भक्तकी लीला कौन समझ सकता है? क्रु साथ जाकर देखा कि श्रीअद्वैताचार्य ज्ञानचर्चाके आनन्दमें झूम रहे हैं। महाप्रभुको देखकर हरिदासने दण्डवत् प्रणाम किया, श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र अच्युतने भी प्रणाम किया। श्रीअद्वैताचार्यकी पत्नीने मन-ही-मन उन्हें नमस्कार किया और महाप्रभुको क्रोधित देखकर वे हृदयमें चिन्तित हो गयीं। कोटि-सूर्यकी भाँति महाप्रभुका तेज प्रकाशित हो रहा था। यह देखकर सभीके चित्तमें भय छा गया। महाप्रभु क्रोधित होकर बोले,—“अरे! अरे नाड़ा! बताओ ज्ञान और भक्तिमें कौन श्रेष्ठ है?” उत्तरमें श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“ज्ञान सब समय श्रेष्ठ है। जिनको ज्ञान नहीं है, उन्हें भक्तिसे क्या प्रयोजन?” 'ज्ञान श्रेष्ठ हैं',—श्रीअद्वैताचार्यके ये वचन सुनकर क्रोधके कारण शचीनन्दन बाहरी सुधबुध भूल गये। श्रीअद्वैताचार्य अपने चबूतरेपर बैठे हुए थे। महाप्रभुने उन्हें वहाँसे उठाया और आँगनमें ले आये। फिर आँगनमें नीचे गिराकर वे अपने हाथोंसे उन्हें मारने लगे। जगन्माता-स्वरूपिणी श्रीअद्वैताचार्यकी पतिव्रता गृहिणी सब तत्त्व जानते हुए भी व्याकुल हो गयीं और कहने लगीं,—“यह वृद्ध ब्राह्मण है, यह वृद्ध ब्राह्मण है, इनके प्राणोंकी रक्षा कीजिये। किसके सिखानेसे आप इनका इतना अपमान कर रहे हैं? इतने बूढ़े ब्राह्मणके साथ और क्या-क्या करेंगे?” पतिव्रता पत्नीकी बात सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभु हँसने लगे और हरिदास ठाकुर भयके कारण श्रीकृष्णका स्मरण करने लगे। क्रोधमें महाप्रभुने पतिव्रताकी बातको नहीं सुना। दम्भ प्रकाश करते हुए महाप्रभु श्रीअद्वैताचार्यके प्रति तर्जन-गर्जन करते रहे। महाप्रभुने कहा,—“अरे नाड़ा, मैं तो क्षीरसागरमें सो रहा था। तुमने मेरी निद्रा भङ्ग कर दी। तुमने भक्तिको प्रकाशित करनेके लिये मुझे यहाँ बुला लिया। अब भक्तिको छिपाकर ज्ञानकी व्याख्या कर रहे हो। यदि तुम्हारे मनमें भक्तिको छिपाये रखनेकी इच्छा थी, तो किस प्रयोजनके लिये तुमने मुझे प्रकाशित किया? तुम्हारे सङ्कल्पको मैं कभी व्यर्थ नहीं होने देता, परन्तु तुम मुझे सदैव विडम्बनामें डालते रहते हो।” इसके बाद श्रीअद्वैताचार्यको छोड़कर महाप्रभु द्वारमें आकर बैठ गये और हुँकार करते हुये निज तत्त्वको प्रकाश करने लगे। महाप्रभुने कहा,—“अरे अरे! जिसने कंसको मारा था, मैं वही हूँ। अरे ओ नाड़ा! तुम सब जानते हो, देख लो। अज, भव, शेष, रमा—ये सब मेरी सेवा करते हैं। मेरे सुदर्शन चक्रने शृगाल-वासुदेव (पौण्ड्र को मार गिराया था। मेरे सुदर्शन चक्रने सारे वाराणसी नगरको जला डाला था। मेरे बाणोंने महाबली रावणका संहार किया था। मेरे चक्रने बाणासुरकी भुजाओंको काटा था। मेरे चक्रने नरकासुरका वध किया था। बाँये हाथपर मैंने ही (गोवर्धन) पर्वतको धारण किया था। स्वर्गसे पारिजात भी मैं ही लाया था। मैंने ही बलिको छला था, फिर उसपर कृपा भी मैंने ही की थी। मैंने हिरण्यकशिपुको मारकर प्रह्लादको बचाया था।” इस प्रकारसे महाप्रभु अपना ऐश्वर्य प्रकाशित करते रहे और उसे सुनकर श्रीअद्वैताचार्य प्रेमसागरमें बहते रहे। दण्ड प्राप्त करके श्रीअद्वैताचार्य परम आनन्दित हुये और हाथोंसे ताली बजा-बजाकर विनीतभावसे नृत्य करने लगे। श्रीअद्वैताचार्य बोले,—“अपराधके अनुरूप ही मुझे दण्ड मिला है। हे प्रभु! इससे भृत्यके हृदयमें बल मिला है।” इतना कहकर श्रीअद्वैताचार्य आनन्दसे नृत्य करने लगे। श्रीअद्वैताचार्य सारे आङ्गनमें आनन्द-सहित नृत्य कर रहे थे और भौंवें नचा-नचाकर महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन कर रहे थे,—“मेरे प्रति आपकी वह स्तुति अब कहाँ गयी? कहाँ गये अब आपके वे सारे ढङ्ग? मैं दुर्वासा नहीं हूँ, जिसका आप तिरस्कार कर देंगे, जिनके अवशिष्ट अन्नका आप सारे शरीरमें लेपन कर लेंगे। मैं भृगुमुनि भी नहीं हूँ, जिनकी पदधूलिको

[ 12/38-43 वक्षपर धारण करके आप आनन्द-सहित 'श्रीवत्स' बन जायेंगे। मेरा नाम अद्वैत है—मैं आपका शुद्ध दास हूँ। मैं जन्म-जन्मान्तरसे आपकी जूठन (प्रसादी) पानेके लिये अभिलाषी हूँ। आपकी 'जूठन' के प्रभावसे मुझे आपकी मायाकी भी परवाह नहीं है। मुझे आप सजा तो दे चुके हैं, अब कृपया चरणोंकी छाया प्रदान कीजिये।” इतना कहकर श्रीअद्वैताचार्य भक्तिपूर्वक महाप्रभुके चरणकमलोंमें माथा लगाकर पड़ गये। सम्भ्रम-सहित उठकर महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यको अपनी गोदमें ले लिया और खूब रोये। श्रीअद्वैताचार्यकी भक्तिको देखकर श्रीनित्यानन्द रायने ऐसा रोदन किया, मानों नदी बह रही हो। हरिदास ठाकुर भूमिपर गिरकर रोने लगे, श्रीअद्वैताचार्यकी गृहिणी रो रही थी, जितने भी दास थे, वे सभी रो रहे थे। श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र अच्युतानन्द भी क्रन्दन कर रहे थे। इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यका भवन कृष्ण-प्रेममय हो गया। श्रीअद्वैताचार्यपर प्रहार करनेके बाद महाप्रभु बड़े लज्जित हुए। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक श्रीअद्वैताचार्यको वर प्रदान किया। महाप्रभुने कहा, — “आधे पलके लिये भी जो तुम्हारा आश्रय ग्रहण करेगा, वह चाहे पशु हो, कीट हो, पक्षी हो, पतङ्गा हो—चाहे कोई भी हो, यदि मेरे प्रति उसने सौ अपराध भी किये हों, तब भी मैं उसपर कृपा करूँगा।” महाभाग्यवान् श्रीअद्वैताचार्य ऐसा वर सुनकर क्रन्दन करने लगे और चरण पकड़कर विनयपूर्वक बोले, - “हे प्रभो! आपने जो कुछ कहा, वह कभी मिथ्या नहीं है। हे महाशय ! मेरी भी एक प्रतिज्ञा है, कृपया सुन लीजिये। यदि कोई आपको आदर न देकर मेरे प्रति भक्ति करेगा, तो उसकी वह भक्ति उसका संहार करने वाली होगी। जो आपके चरणकमलोंका भजन नहीं करता है, जो आपको नहीं मानता है, वह कभी मेरा भक्त नहीं हो सकता। हे प्रभु ! जो आपका भजन करता है, वह मेरा जीवन है। आपका उल्लङ्घन किया जाना मैं सहन नहीं कर सकता। भले ही मेरा पुत्र हो, अथवा मेरा किङ्कर हो, यदि वह वैष्णवोंके चरणोंमें अपराधी हो जाय, तो मैं उसका मुख भी देखना नहीं चाहता।” 'शचीमाताका दण्ड'—एक दिन महाप्रभु श्रीगौराङ्गसुन्दर विष्णुके सिंहासनपर बैठ गये। अपनी शिलामयी मूर्तियोंको अपनी गोदमें लेते हुए गौरचन्द्र आनन्दके साथ अपने स्वरूपको प्रकाशित करने लगे। महाप्रभु कहने लगे— “कलियुगमें मैं कृष्ण हूँ, मैं नारायण हूँ, मैंने रामके रूपमें सागरको बाँधा था। मैं क्षीरसागरमें सो रहा था। नाड़ाकी हुँकारने मेरी निद्रा भङ्ग कर दी। प्रेमभक्तिका वितरण करनेके लिये मेरा प्राकट्य हुआ है। अरे नाड़ा, 'माँग लो' ! 'माँग लो' ! श्रीनिवास, तुम भी माँग लो।” महान् प्रकाशको देखकर श्रीनित्यानन्दरायने उसी क्षण महाप्रभुके मस्तकपर छत्र धारण कर लिया। बायीं ओरसे श्रीगदाधरने ताम्बूल प्रदान किया और चारों ओर भक्तजन चामर-व्यजन करने लगे। महेश्वर गौराङ्ग महाप्रभु भक्तियोगका वितरण कर रहे थे। सभी लोग अपना-अपना मनचाहा वर महाप्रभुसे माँग रहे थे। किसीने कहा, — “मेरे पिता बहुत ही दुष्टमतिके हैं, यदि उनका चित्त अच्छा हो जाय, तो मेरी रक्षा हो जाय।” इसी प्रकार किसीने गुरुके लिये, किसीने शिष्यके लिये, किसीने पुत्रके लिये और किसीने पत्नीके लिये अपनी-अपनी रतिके अनुसार वर माँगा। महाप्रभु विश्वम्भर भक्तोंके वचनोंको सत्य करने वाले हैं। उन्होंने हँसकर सभीको प्रेम-भक्तिका वर प्रदान किया। श्रीनिवास महाशयने कहा- “प्रभो! हम सब चाहते हैं कि आइ (शचीमाता) को भी प्रेमभक्तिका वर मिल जाये।” महाप्रभु बोले, — “ऐसा मत कहना श्रीनिवास। उन्हें मैं प्रेमभक्तिका विलास प्रदान नहीं करूँगा। उन्होंने वैष्णवके चरणोंमें अपराध किया है; अतएव, उन्हें प्रेमभक्ति मिलनेमें बाधा है।” श्रीनिवासने और एक बार कहा, — “हे प्रभो! आपकी इस बातसे हमारा देह त्याग होगा। जिनके गर्भसे आप जैसे पुत्रका अवतार हुआ हो, क्या 132 | श्रीचैतन्यचरितामृत

12/38-45 ] उन्हें प्रेमयोगका अधिकार नहीं मिलेगा? जगत्की माता आइ सबकी जीवन-स्वरूप हैं। हे प्रभु! कृपया अपनी मायाको हटाइये और उन्हें भक्ति प्रदान कीजिये। हे प्रभु! आप जिनके पुत्र हैं, वे सबकी जननी हैं। पुत्रके प्रति माताका अपराध कैसा? यदि वैष्णवके प्रति कोई अपराध हुआ है, तो उसे खण्डित करके उनपर कृपा कीजिये।” महाप्रभुने कहा, -“मैं उपदेश कर सकता हूँ, परन्तु वैष्णवापराधका खण्डन नहीं कर सकता। जिस वैष्णवके प्रति जिसका अपराध होता है, केवल उसके द्वारा क्षमा किये जानेपर ही उसे अपराधसे मुक्ति मिलती है। अन्य कोई उपाय नहीं है। दुर्वासामें अम्बरीषके प्रति अपराध किया था। तुम जानते हो, उसका खण्डन (निवारण) कैसे हुआ? उनका अद्वैताचार्यके प्रति एक अपराध है। यदि अद्वैताचार्य उन्हें क्षमा कर देते हैं, तो उन्हें प्रेमभक्ति मिल जायेगी। यदि अद्वैताचार्यके चरणोंकी धूलि वे अपने सिरपर धारण कर लेती हैं, तो मेरी आज्ञासे उन्हें प्रेम भक्ति उपलब्ध हो जायेगी।” तब सब मिलकर एकसाथ श्रीअद्वैताचार्यके पास गये और उन्हें सब कुछ बताया। सुनकर श्रीअद्वैताचार्यने विष्णुका स्मरण किया और कहने लगे, - “तुम सब मेरा जीवन लेना चाहते हो। जिनके गर्भसे मेरे प्रभुका अवतार हुआ है, वे मेरी जननी हैं और मैं उनका पुत्र हूँ। मैं जिन आइकी चरण-धूलिका पात्र हूँ, उन आइका प्रभाव मैं तिल-मात्र भी नहीं जानता हूँ। जगन्माता आइ विष्णु-भक्तिस्वरूपिणी हैं। तुम लोग ऐसी बातें क्यों कर रहे हो? प्राकृत-शब्दके रूपमें भी जो 'आइ' बोलेगा, 'आइ' शब्दके प्रभावसे उसका दुःख नहीं रहेगा। गङ्गामें और आइमें कोई भेद नहीं है। देवकी-यशोदा और आइ एक ही तत्त्व है।” आइके तत्त्वके बारेमें कहते-कहते श्रीअद्वैताचार्य आविष्ट हो गये और बाह्य ज्ञान रहित होकर भूमिपर गिर पड़े। समय और सुयोग पाकर आइ बाहर आईं एवं श्रीअद्वैताचार्यकी चरण-धूलि अपने सिरपर धारण कर ली। आइ परम वैष्णवी हैं, मूर्तिमती भक्ति हैं। विश्वम्भरको गर्भमें धारण करनेमें जिनकी सेवा-शक्ति है। उन्होंने जब आचार्यकी चरण-धूलि ग्रहण की, तब वे विह्वल होकर गिर पड़ीं और उनका बाह्य ज्ञान लुप्त हो गया। वैष्णवमण्डली 'हरि-हरि' की ध्वनि करने लगी। सिंहासनके ऊपर विराजमान महाप्रभु हँसने लगे और प्रसन्न होकर जननीसे बोले, -“इस क्षणसे आपको विष्णुभक्ति मिल गयी, अद्वैताचार्यके प्रति अब आपका और कोई अपराध नहीं है।” महाप्रभुके श्रीमुखसे अनुग्रह-रूप वचनोंको सुनकर सभी 'जय-जय-हरि' की ध्वनि करने लगे। शिक्षागुरु भगवान्ने जननीको उपलक्ष्य करके सबको वैष्णवापराधके विषयमें सावधान रहनेके लिये कहा है। यदि शूलपाणि (महादेव) के समान (शक्ति सम्पन्न) भी कोई व्यक्ति वैष्णवकी निन्दा करता है, तो वह विनाशको प्राप्त होता है, यही शास्त्रोंका तात्पर्य है। इसे न मानते हुए जो व्यक्ति सज्जनकी निन्दा करता है, वह पापिष्ठ जन्म-जन्ममें दैवदोषके कारण मरता है। गौरसुन्दरकी जननीको भी जब वैष्णवोंके प्रति अपराधिनी माना गया है, तब दूसरोंका क्या कहना? ॥38-43 ॥ कमलाकान्तका दण्ड देखकर महाप्रभुके प्रति श्रीअद्वैतके वचन :- प्रभुरे कहेन, – “तोमार ना बुझि ए लीला। आमा हैते प्रसादपात्र करिला कमला ॥ 44 ॥ आमारेह कभु येइ ना हय प्रसाद। तोमार चरणे आमि कि कैनु अपराध ॥” 45 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुसे कहा- “मैं आपकी लीलाको समझ नहीं पा रहा हूँ। आपने मुझसे अधिक कृपा कमलाकान्तपर की है। आपने कभी मुझपर ऐसी कृपा नहीं की है। मैंने आपके चरणकमलोंमें ऐसा क्या अपराध किया है?॥” 44-45 ॥ बारहवाँ अध्याय | 133

[ 12/46-53 महाप्रभुकी हँसी और कृपा :- एत शुनि' महाप्रभु हासिते लागिला। बोलाइला कमलाकान्ते प्रसन्न हइला ॥ 46 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु हँसने लगे और प्रसन्न होकर कमलाकान्तको बुलाया ॥ 46 ॥ श्रीअद्वैतकी उक्ति :- आचार्य कहे,—“इहाके केने दिले दरशन। दुइ प्रकारेते करे मोरे विड़म्बन ॥" 47 ॥ अनुवाद—यह देखकर श्रीअद्वैताचार्यने कहा—“आपने इसे बुलाकर दर्शन क्यों दिये हैं? इसने मुझे दो प्रकारसे छला है ॥” 47 ॥ अनुभाष्य—(दो प्रकारकी छलना)—(1) यह मुखसे तो मुझे अप्राकृत नारायण भी कहता है और (2) कार्यकलापसे मुझे प्राकृत धनकी भिक्षा करनेवाला दरिद्र मानता है ॥ 47 ॥ शुनिया प्रभुर मन प्रसन्न हइल। दुँहार अन्तर-कथा दुँहे से जानिल ॥ 48 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुका मन प्रसन्न हो गया। वे दोनों ही एक दूसरेके मनके भावोंको समझते हैं ॥ 48 ॥ पागलके प्रति महाप्रभुकी उक्ति :- प्रभु कहे,—“बाउलिया, ऐछे केने कर। आचार्येर लज्जा-धर्म-हानि से आचर ॥ 49 ॥ महाप्रभुके द्वारा वैष्णव-आचार्यका कर्त्तव्य निर्णय :- प्रतिग्रह कभु ना करिबे राजधन। विषयीर अन्न खाइले दुष्ट हय मन ॥ 50 ॥ मन दुष्ट हइले नहे कृष्णेर स्मरण। कृष्णस्मृति बिना हय निष्फल जीवन ॥ 51 ॥ लोक लज्जा हय, धर्म-कीर्ति हय हानि। ऐछे कर्म ना करिह कभु इहा जानि' ॥" 52 ॥ एइ शिक्षा सबाकारे, सबे मने कैल। आचार्य-गोसाञि मने आनन्द पाइल ॥ 53 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कमलाकान्तसे कहा—“हे पागल ! तुम ऐसा क्यों करते हो? तुम्हारे ऐसे आचरणसे आचार्यकी लज्जा-धर्मकी हानि हुई है। कभी भी राजासे धनकी भिक्षा मत करना, क्योंकि विषयीके अन्नको खानेसे मन दूषित हो जाता है। मनके दूषित होनेसे श्रीकृष्णका स्मरण नहीं होता है और श्रीकृष्णके स्मरणके बिना जीवन निष्फल है। इससे न केवल लोक-समाजमें निन्दा होती है, अपितु धर्म और कीर्तिकी भी हानि होती है। इसलिये यह सब जानकर कभी भी ऐसा कर्म नहीं करना।” महाप्रभुकी यह शिक्षा सभीके लिये है और इस शिक्षाको सभीने अपने मनमें धारण कर लिया। यह देखकर श्रीअद्वैताचार्यके मनमें आनन्द हुआ ॥ 49-53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कमलाकान्तने श्रीअद्वैताचार्यको 'ईश्वर' कहकर स्थापित करके राजासे धनके लिये याचना की थी। उसके इस प्रकारके कार्यसे महाप्रभु अत्यन्त असन्तुष्ट हुए। श्रीअद्वैताचार्य 'ईश्वर' होनेपर भी उनकी जगत्के शिक्षक रूपमें मानवलीला प्रसिद्ध है। ऋणग्रस्त होकर राजासे धनकी याचना करना आचार्यके लिये बड़ा लज्जाजनक व्यवहार है। धनकी लालसा तो सब प्रकारसे परित्यज्य है और उसपर विदेशी राजासे ऋणके परिशोधनके लिये धनकी लालसाको प्रकट करनेसे धर्मकी हानि होती है। राजा तो स्वभावतः ही विषयी होते हैं। विषयीका अन्न खानेसे चित्त दूषित होता है; चित्तके दूषित होनेसे श्रीकृष्णकी स्मृतिके अभावमें जीवन निष्फल हो जाता है। सभी लोगोंके लिये ऐसा करना निषिद्ध है और विशेषतः धर्माचार्योंके लिये यह विशेष रूपसे निषिद्ध है। आचार्यका कर्त्तव्य केवल नामोपदेश करना है। किन्तु धन लेकर जो नामका उपदेश करते हैं, वे 'नामोपदेशक' पदके योग्य नहीं हैं, अपितु वे नामापराधी हैं। ऐसा कार्य 134 | श्रीचैतन्यचरितामृत

करनेसे लोक-लज्जा और उनके धर्म एवं कीर्त्तिकी हानि होती है॥ 49-53॥ अमृतानुकणिका-मनुसंहिता 4/91- “न राज्ञः प्रतिगृह्णन्ति प्रेत्य श्रेयोऽभिकाङ्क्षिणः।” “जो परलोककी मङ्गल कामना करते हैं, उन्हें राजधन स्वीकार नहीं करना चाहिये।” हरिभक्तिविलास (11/746) में भी ऐसी उक्ति देखी जाती है- “न राज्ञः प्रतिगृह्णीयान्न शूद्रात् पतितादपि। नान्यस्माद् याचकत्वञ्च निन्दिताद्वर्जयेद्बुधः॥” “राजा, शूद्र या पतित व्यक्तिसे कोई वस्तु स्वीकार नहीं करनी चाहिये एवं अन्य निन्दित व्यक्तिसे भी किसी वस्तुकी याचना नहीं करना चाहिये॥” 49-53॥ महाप्रभु और श्रीअद्वैतप्रभु-एक दूसरेके मर्मज्ञ :- आचार्येर अभिप्राय प्रभु मात्र बुझे। प्रभुर गम्भीर वाक्य आचार्य समुझे॥ 54॥ एइ त' प्रस्तावे आछे बहुल विचार। ग्रन्थ-बाहुल्येर भये नारि लिखिवार॥ 55॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके अभिप्रायको केवल महाप्रभु बूझ पाते हैं और महाप्रभुके वाक्यके गम्भीर अर्थको श्रीअद्वैताचार्य ही समझ सकते हैं। इस सम्बन्धमें अनेक विचार हैं, परन्तु ग्रन्थके विशाल होनेके भयसे मैं उन्हें यहाँ नहीं लिख रहा हूँ॥ 54-55॥ (5) यदुनन्दनाचार्य-शाखा :- श्रीयदुनन्दनाचार्य—अद्वैतेर शाखा। ताँर शाखा-उपशाखा-गणेर नाहि लेखा॥ 56॥ वासुदेव दत्तेर तेंहो कृपार भाजन। सर्वभावे आश्रियाछे चैतन्य-चरण॥ 57॥ अनुवाद-श्रीयदुनन्दनाचार्य श्रीअद्वैताचार्यकी शाखा हैं और उनकी शाखाओं और उपशाखाओंकी गणना इतनी है कि उन्हें लिखना सम्भव नहीं है। उन्होंने वासुदेव दत्तकी कृपा प्राप्त की और सब प्रकारसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण किया॥ 56-57॥ अनुभाष्य-'श्रीयदुनन्दनाचार्य'-ये श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके पाञ्चरात्रिकी-दीक्षागुरु हैं। चैःचः अन्त्यलीला, 6/160-169 संख्या द्रष्टव्य है। 'वासुदेव दत्त'-गौरगणोद्देशदीपिका श्लोक 140- “व्रजे स्थितौ गायकौ यौ मधुकण्ठ-मधुव्रतौ। मुकुन्द-वासुदेवौ तौ दत्तौ गौराङ्ग-गायकौ ॥ 140 ॥” “व्रजके मधुकण्ठ और मधुव्रत नामक गायक अब श्रीमुकुन्द दत्त और श्रीवासुदेव दत्त नामक श्रीगौराङ्गदेवके गायक हैं।” चैःचः आदिलीला, 10/41 द्रष्टव्य है॥ 57॥ (6) भागवताचार्य, (7) विष्णुदास, (8) चक्रपाणि, (9) अनन्त आचार्य :- भागवताचार्य, आर विष्णुदासाचार्य। चक्रपाणि आचार्य, आर अनन्त आचार्य॥ 58॥ अनुवाद-भागवाताचार्य, विष्णुदासाचार्य, चक्रपाणि आचार्य और अनन्त आचार्य, ये श्रीअद्वैताचार्यकी शाखाएँ हैं॥ 58॥ अनुभाष्य-'भागवताचार्य'-ये पहले श्रीअद्वैतप्रभुके गणोंमें और बादमें श्रीगदाधरके गणोंमें प्रविष्ट हुए। यदुनन्दनदासके द्वारा लिखित 'शाखा-निर्णयामृत' ग्रन्थके छठे श्लोकमें- “वन्दे भागवताचार्यं गौराङ्ग-प्रियपात्रकम्। येनाकारि महाग्रन्थो नाम्ना 'प्रेमतराङ्गिणी'॥” “मैं श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके प्रियपात्र श्रीभागवताचार्यको प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने 'प्रेमतराङ्गिणी' नामक महाग्रन्थकी रचना की है।” श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 195 और 203वाँ श्लोक- “कर्पूरमञ्जरी श्याममञ्जरी 'श्वेतमञ्जरी'। विलासमञ्जरी कामलेखा च मौनमञ्जरी ॥ 195 ॥ निर्मिता पुस्तिका येन कृष्णप्रेमतराङ्गिणी। 'श्रीमद्भागवताचार्यो' गौराङ्गात्यन्तवल्लभः ॥ 203 ॥” बारहवाँ अध्याय | 135

[ 12/58-64 “श्वेतमञ्जरी श्रीगौराङ्गके अत्यन्त प्रिय वही श्रीमद्भागवताचार्य हैं, जिन्होंने ‘कृष्णप्रेमातरङ्गिणी’ नामक ग्रन्थकी रचना की है।” चैःचः आदिलीला, 10/113 संख्या द्रष्टव्य है। ‘विष्णुदासाचार्य’—ये खेतरि-महोत्सवके समय अच्युतानन्द प्रभुके साथ गये थे (भक्तिरत्नाकर की दशम तरङ्ग द्रष्टव्य है)। ‘अनन्त आचार्य’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 165वाँ श्लोक— “अनन्ताचार्यगोस्वामी या सुदेवी पुरा व्रजे॥ 165 ॥” “व्रजकी सुदेवी अब श्रीअनन्ताचार्य गोस्वामी हैं।” ये श्रीअद्वैतप्रभुके गणोंमें रहनेपर भी, बादमें श्रीगदाधर-शाखामें प्रविष्ट हुए। चैःचः आदिलीला 8वाँ अध्याय संख्या 59-60 द्रष्टव्य है। शाखा-निर्णयामृत 11 श्लोक— “वन्देनन्ताद्भुतरसमनन्ताचार्यसंज्ञकम्। लीलानन्ताद्भुतमयं गौरप्रेम्णो हि भाजनम्॥” इनके शिष्य हरिदास पण्डित गोस्वामी वृन्दावनमें श्रीगोविन्ददेवजीकी सेवाके अध्यक्ष थे। उनके शिष्य श्रीराधाकृष्ण गोस्वामी ‘साधन-दीपिका’ ग्रन्थके रचयिता हैं (भक्तिरत्नाकर द्वितीय तरङ्ग) ॥ 58 ॥ (10) नन्दिनी, (11) कामदेव, (12) चैतन्यदास, (13) दुर्लभविश्वास, (14) वनमालिदास :- नन्दिनी, आर कामदेव, चैतन्यदास। दुर्लभविश्वास, आर वनमालिदास ॥ 59 ॥ अनुवाद—नन्दिनी, कामदेव, चैतन्यदास, दुर्लभ विश्वास और वनमाली दास श्रीअद्वैताचार्यकी अन्य शाखाएँ हैं ॥ 59 ॥ अनुभाष्य—‘नन्दिनी’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 89वाँ श्लोक— “नन्दिनी जङ्गली ज्ञेया जया च विजया क्रमात्॥ 89 ॥” “श्रीसीतादेवीकी परिचारिका और शिष्या जया अब नन्दिनी हुई हैं।” ये सम्भवतः श्रीसीतादेवीकी गर्भजात श्रीअद्वैताचार्यकी कन्या हैं (?) ॥ 59 ॥ (15) जगन्नाथ, (16) भवनाथ कर, (17) हृदयानन्द, (18) भोलानाथ :- जगन्नाथ कर, आर कर भवनाथ। हृदयानन्द सेन, आर दास भोलानाथ ॥ 60 ॥ (19) यादव, (20) विजय, (21) जनार्द्दन, (22) अनन्तदास, (23) कानुपण्डित, (24) नारायण :- यादवदास, विजयदास, जनार्द्दन। अनन्तदास, कानुपण्डित, दास नारायण ॥ 61 ॥ (25) श्रीवत्स, (26) हरिदास ब्रह्मचारी, (27) पुरुषोत्तम और (28) कृष्णदास ब्रह्मचारी :- श्रीवत्स पण्डित, ब्रह्मचारी हरिदास। पुरुषोत्तम ब्रह्मचारी, आर कृष्णदास ॥ 62 ॥ (29) पुरुषोत्तम पण्डित, (30) रघुनाथ, (31) वनमाली, (32) वैद्यनाथ :- पुरुषोत्तम पण्डित, आर रघुनाथ। वनमाली कविचन्द्र, आर वैद्यनाथ ॥ 63 ॥ (33) लोकनाथ, (34) मुरारि पण्डित, (35) हरिचरण, (36) माधव पण्डित :- लोकनाथ पण्डित, आर मुरारि पण्डित। श्रीहरिचरण, आर माधव पण्डित ॥ 64 ॥ अनुवाद—जगन्नाथ कर, भवनाथ कर, हृदयानन्द सेन और भोलानाथ दास, यादवदास, विजयदास, जनार्द्दन, अनन्तदास, कानुपण्डित, नारायण दास, श्रीवत्स पण्डित, हरिदास ब्रह्मचारी, पुरुषोत्तम ब्रह्मचारी, कृष्णदास, पुरुषोत्तम पण्डित, रघुनाथ, वनमाली कविचन्द्र, वैद्यनाथ, लोकनाथ पण्डित, मुरारि पण्डित, श्रीहरिचरण और माधव पण्डित श्रीअद्वैताचार्यकी अन्य शाखाएँ हैं ॥ 60-64 ॥ अनुभाष्य—‘हरिदास ब्रह्मचारी’ की गणना श्रीअद्वैताचार्य और श्रीगदाधर पण्डित, दोनोंके गणोंमें होती है। शाखानिर्णयामृतके नौवें श्लोकमें— “श्रीयुतं हरिदासाख्यं ब्रह्मचारिमहाशयम्। परमानन्द-सन्दोहं वन्दे भक्त्या मुदाकरम्॥” “श्रीहरिदास ब्रह्मचारी नामक महाशय परमानन्दके 136 | श्रीचैतन्यचरितामृत

12/62–72 ] भण्डार, जो भक्तोंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं, मैं उनकी वन्दना करता हूँ॥” 62 ॥ क्रु जलाभावे कृश शाखा शुकाइया मरे ॥ 69 ॥ (37) विजय, (38) श्रीराम पण्डित :- विजय पण्डित, आर पण्डित श्रीराम। असंख्य अद्वैत-शाखा कत लइब नाम ॥ 65 ॥ अनुवाद—विजय पण्डित और श्रीराम पण्डित भी श्रीअद्वैताचार्यकी शाखा हैं। श्रीअद्वैताचार्यकी असंख्य शाखाएँ हैं, मैं कितनोंका नाम उल्लेख करूँ ? ॥ 65 ॥ अनुभाष्य—‘श्रीराम पण्डित’—ये श्रीवास पण्डितके छोटे भाई हैं। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 90वाँ श्लोक— “पर्वताख्यो मुनिवरो य आसीन्नारदप्रियः। स रामपण्डितः श्रीमांस्तत् कनिष्ठसहोदरः ॥ 90 ॥” “श्रीनारदके अत्यन्त प्रिय श्रीपर्वत नामक श्रेष्ठ मुनि ही अब श्रीवास पण्डितके कनिष्ठ भ्राता श्रीमान् राम पण्डित हैं।” चैःचः मध्यलीला, 13/39 संख्या द्रष्टव्य है॥ 65 ॥ श्रीगौरकृपाके बलपर सारग्राही-अद्वैतदासोंकी वृद्धि :- मालि-दत्त जल अद्वैत-स्कन्ध योगाय। सेइ जले जीये शाखा, —फुल, फल हय ॥ 66 ॥ अनुवाद—मूल माली श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा दिया गया जल श्रीअद्वैत स्कन्धके माध्यमसे उसकी शाखाओं तक पहुँचा, जिसके कारण वे फूल और फलोंसे लद गयीं ॥ 66 ॥ दुर्भाग्यसे असार अद्वैतदासाभिमानियोंके द्वारा ही श्रीगौर-विरोध और श्रीगौरकृपाके अभावसे उनका ध्वंस :- इहार मध्ये मालि-पाछे कोन शाखागण। ना माने चैतन्य-माली दुर्देव कारण ॥ 67 ॥ सृजाइल, जीयाइल, ताँरे ना मानिला। कृतघ्न हइला, ताँरे स्कन्ध क्रु अनुवाद—पहले श्रीअद्वैताचार्यके सभी शिष्य महाप्रभुको मानते थे, परन्तु महाप्रभुके अप्रकट होनेके बाद श्रीअद्वैताचार्यके कोई-कोई शिष्य अपने दुर्भाग्यके कारण उनके मार्गसे भटक गये। महाप्रभुरूपी जिस स्कन्धने उनको जन्म दिया और उनका पालन-पोषण किया, श्रीअद्वैताचार्यकी कुछ शाखाएँ (शिष्य) उसको न मानकर कृतघ्न हो गयीं, इस कारण स्कन्ध (श्रीअद्वैताचार्य) उनपर क्रोधित हो गये। क्रोधित होकर स्कन्धने उनमें जलका सञ्चार बन्द कर दिया। जलके अभावसे क्षीण वे शाखाएँ सूखकर मर गयीं ॥ 67–69 ॥ श्रीगौरकृष्णभक्त-यमके गुरु, श्रीगौरकृष्णविमुख-यमके द्वारा दण्डयोग्य :- चैतन्य-रहित देह—शुष्ककाष्ठ-सम। जीवितेइ मृत सेइ, मैले दण्डे यम ॥ 70 ॥ केवल ए गण-प्रति नहे एइ दण्ड। चैतन्य-विमुख येइ सेइ त’ पाषण्ड ॥ 71 ॥ कि पण्डित, कि तपस्वी, किवा गृही, यति। चैतन्य-विमुख येइ, तार एइ गति ॥ 72 ॥ अनुवाद—चेतनारहित देह जैसे सूखी लकड़ीके समान है, वैसे ही श्रीकृष्णभक्तिरहित मनुष्य जीवित होते हुए भी मृतके समान है और मरनेके बाद उसे यमराजका दण्ड भोगना पड़ता है। ऐसा दण्ड केवल भटके हुए श्रीअद्वैताचार्यके गणोंके लिये ही नहीं है, अपितु यह श्रीचैतन्य महाप्रभुसे विमुख सभी जीवोंके लिये है, क्योंकि वे सभी पाखण्डी हैं। क्या पण्डित, क्या तपस्वी, क्या गृहस्थ और क्या संन्यासी, जो भी श्रीचैतन्य महाप्रभुसे विमुख हैं, उनकी यही गति है ॥ 70-72 ॥ अनुभाष्य—(भाः 6/3/29) में जैसा यमराजजीने अपने दूतोंसे कहा— बारहवाँ अध्याय | 137