श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
The Hindu Philosophy of Life, Ethics and Religion ॐ तत्सत् । श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गीताकी बहिरंगपरीक्षा, मूल संस्कृत श्लोक, भाषा-अनुवाद, अर्थ- निर्णायक टिप्पणियाँ, पूर्वी और पश्चिमी मतोंकी तुलना, इत्यादिसहित । लेखक लो. बाल गंगाधर तिलक अनुवाद श्रीमान् माधवरावजी सप्रे 70833 बीसवाँ संस्करण तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥
- गीता ३.१९ शके १९०४ : सन् १९८२ मूल्य ७५ रुपये
प्रकाशक : दी. ज. टिळक शै. श्री. टिळक ५६८ नारायण पेठ लो. टिळक-मंदिर ( गायकवाड सदन ) पूना ४११०३० 70833 181.41 दिनांक 25-11-83 Til नई दिल्ली केन्द्रीय पुरातत्त्व पुस्तकालय प्रकाशकाने सर्वाधिकार प्रका श का धी न हैं। मुद्रक : सुभाष परशुराम बर्वे, परशुराम प्रोसेस, ३४।८ एरंडवन पुणे ४११००४
। अथ समर्पणम् । श्रीगीतार्थः क गंभीरः व्याख्यातः कविभिः पुरा । आचार्यैर्यश्च बहुधा क मेऽल्पांधिषया मतिः ॥ तथापि चापलादस्मि वक्तुं तं पुनरुद्यतः । शास्त्रार्थान् संमुखीकृत्य प्रयत्नान् नव्यैः सहोचितैः ॥ तमार्याः श्रोतुमर्हन्ति कार्याकार्य-दिदृक्षवः । एवं विज्ञाप्य सुजनान् कालिदासाक्षरैः प्रियैः ॥ बालो गंगाधरश्चाऽहं तिलकान्वयजो द्विजः । महाराष्ट्रे पुण्यपुरे वसन् शांडिल्यगोत्रभृत् ॥ शाके मुन्यग्निवसुभू-संमिते शालिवाहने । अनुसृत्य सतां मार्गं स्मरंश्चापि वचो* हरेः ॥ समर्पये ग्रंथमिमं श्रीशाय जनतात्मने । अनेन प्रीयतां देवो भगवान् पुरुषः परः ॥ * यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौंतेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ — गीता ९.२७
गीतारहस्यके भिन्न भिन्न संस्करण मराठी— पहला संस्करण जून १९१५ दूसरा ˮ सितंबर १९१५ तीसरा ˮ १९१८ चौथा ˮ १९२३ पाँचवाँ ˮ (दो भागोंमें पहला संस्करण) १९२४–१९२६ छठा ˮ १९५० सातवाँ ˮ १९५६ आठवाँ ˮ १९६३ नवाँ ˮ १९६८ दसवाँ ˮ १९७१ ग्यारहवाँ ˮ १९७६ बारहवाँ ˮ १९७९ तेरहवाँ ˮ १९८० चौदहवाँ ˮ १९८२ हिन्दी— पहला ˮ १९१७ दूसरा संस्करण १९१८ तीसरा ˮ १९१९ चौथा ˮ १९२४ पाँचवाँ ˮ १९२५ (दो भागोंमें पहला संस्करण) १९२६ छठा ˮ १९२८ सातवाँ ˮ १९३३ आठवाँ ˮ १९४८ नवाँ ˮ १९५० दसवाँ ˮ १९५५ ग्यारहवाँ ˮ १९५९ बारहवाँ ˮ १९६२ तेरहवाँ ˮ १९६५ चौदहवाँ ˮ १९६९ पंद्रहवाँ ˮ १९७३ सोलहवाँ ˮ १९७५ सत्रहवाँ ˮ १९७६ अठारहवाँ ˮ १९७८ उन्नीसवाँ ˮ १९८० बीसवाँ ˮ १९८२ गुजराती— पहला ˮ १९१७ दूसरा ˮ १९३४ तीसरा ˮ १९५६ चौथा ˮ १९७३
लो. तिलकजीके अंग्रेजी ग्रंथ ५ कानडी — पहला संस्करण १९१९ दूसरा ,, १९५६ तीसरा ,, १९७१ तेलगू — पहला ,, १९१९ बंगला — पहला ,, १९२४ तमील — पहला ,, ( दो भागोंमें अपूर्ण ) १९२४ अंग्रेजी — पहला ,, ( दो भागोंमें ) १९३६ दूसरा ,, १९६५ तीसरा ,, १९७१ लो. तिलकजीके अंग्रेजी ग्रंथ (१) The Orion पहला संस्करण १८९३ वेदकालका निर्णय दूसरा ,, १९१६ तीसरा ,, १९२५ चौथा ,, १९५५ पांचवाँ ,, १९७२ (२) The Arctic Home in the Vedas पहला ,, १९०३ ( आर्योंका मूल निवासस्थान ) दूसरा ,, १९२५ तीसरा ,, १९५६ चौथा ,, १९७१ (३) Vedic Chronology & Vedanga Jyotish ( वेदोंका कालनिर्णय और वेदांग ज्योतिष ) पहला संस्करण १९२५
भारतीय आध्यात्मिकताका सुमधुर फल " प्रत्यक्ष अनुभवसे यह स्पष्ट दिखाई देता है, कि श्रीमद्भगवद्गीता वर्तमान युगमेंभी उतनीही नव्यतापूर्ण एवं स्फूर्तिदात्री है, जितनीकी महाभारतमें समाविष्ट होते समय थी। गीताके संदेशका प्रभाव केवल दार्शनिक अथवा विद्वच्चर्चाका विषय नहीं है, अपितु आचार- विचारोंके क्षेत्रमेंभी वह सदैव जीता-जागता प्रतीत होता है। एक राष्ट्र तथा संस्कृतिका पुनरुज्जीवन, गीताका उपदेश, करता रहा है। संसारके अत्युच्च शास्त्रविषयक ग्रंथोंमें गीताका अविरोधसे समावेश हुआ है। गीता-ग्रंथ- पर स्वर्गीय लोकमान्य तिलकजीकी यह व्याख्या निरी मल्लीनाथी व्याख्या नहीं है, वह एक स्वतंत्र प्रबंध है और उसमें नैतिक सत्यका उचित निरूपणभी है। अपनी सूक्ष्म और व्यापक विचारप्रणाली तथा प्रभावोत्पादक बाबू अरविंद घोष लेखनशैलीके कारण मराठी भाषाकी पहला श्रेणीका यह पहला प्रचंड गद्य-ग्रंथ अभिजात वाङ्मयमें समाविष्ट हुआ है। इस एकही ग्रंथसे सिद्ध होता है, कि यदि तिलकजी चाहते, तो मराठी साहित्य और नीतिशास्त्रके इतिहासमें एक अनोखा स्थान पा सकते। किंतु विधाताने उनकी महत्ताके लिये वाङ्मय-क्षेत्र नहीं रखा था, इसलिये केवल मनोरंजनार्थ उन्होंने अनुसंधानका महान् कार्य किया। यह घटना अर्थपूर्ण है, कि उनकी कीर्ति अजरामर करनेवाले उनके अनुसंधान-ग्रंथ, उनके जीवितकार्योंसे विवशतापूर्वक लिये गये विश्रांति-कालमें निर्मित हुए हैं। स्वर्गीय तिलकजीकी प्रतिभाके ये गौण आविष्कारभी इस हेतुसे संबद्ध हैं, कि इस राष्ट्रका महान् भवितव्य उसके उज्ज्वल गतेतिहासके योग्य हो। गीतारहस्यका विषय जो गीता-ग्रंथ है, वह भारतीय आध्यात्मिकताका परिपक्व सुमधुर फल है। मानवी श्रम, जीवन और कर्मकी महिमाका उपदेश अपनी अधिकारवाणीसे देकर, सच्चे अध्यात्मका सनातन संदेश गीता दे रही है, जो कि आधुनिक कालके ध्येयवादके लिये आवश्यक है।"
- बाबू अरविंद घोष
दिव्य 'टीका'-मौक्तिक "अपनी बाल्यावस्थामेंही मुझे ऐसे शास्त्रीय ग्रंथकी आवश्यकता प्रतीत हुई, कि जो जीवितावस्थाके मोह तथा कसौटीके समय मेरा अचूक मार्गदर्शन करे । मैंने कहीं पढ़ा था, कि केवल सात सौ श्लोकोंमें गीताने सारे शास्त्रोंका और उपनिषदोंका सार - गागरमें सागर - भर दिया है । मेरे मनका निश्चय हुआ । गीता-पठनके उद्देश्यसे मैंने संस्कृतका अध्ययन किया । गीता मेरा बाइबल या कुराणही नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष माताही है । अपनी लौकिक मातासे तो कई दिनोंसे मैं बिछुड़ा हूँ; किंतु तभीसे गीतामैयाने मेरे जीवनमें माताका स्थान ग्रहण कर लिया है । आपत्कालमें वही मेरा सहारा है । स्वर्गीय लोकमान्य तिलकजी अपने अभ्यास एवं महात्मा गांधी विद्वत्ताके ज्ञानसागरसे, 'गीताप्रसाद'के बलपरही, यह दिव्य 'टीका'-मौक्तिक पा सके । बुद्धिसे खोज निकालनेके व्यापक सत्यका भंडारही उन्हें गीतामें प्राप्त हुआ । गीतापर तिलकजीकी यह टीकाही उनका शाश्वत स्मारक है । स्वतंत्रताके युद्धमें विजयश्री प्राप्त होनेपरभी वह सदाके लिये बनाही रहेगा । भविष्यमेंभी, तिलकजीका विशुद्ध चारित्र्य और गीतापर उनकी महान् टीका, इन दोनों बातोंसे उनकी स्मृति चिरप्रेरक होगी । उनके जीवन-कालमें अथवा सांप्रतभी ऐसा कोई व्यक्ति मिलना असंभव है, जिसका उनसे अधिक व्यापक और गहरा शास्त्रज्ञान हो । गीतापर उनकी जो अधिकारयुक्त टीका है, उससे अधिक अच्छे और मौलिक ग्रंथकी निर्मिति न अभीतक हुई है और न निकट भविष्यमें उसके होनेकीभी संभावना है । गीता और वेदसे उत्पन्न समस्याओंका तिलकजीने जिस शास्त्रीय रीतिसे निराकरण किया है, आजतक उससे अधिक शोध-कार्य किसीनेभी नहीं किया है । अथाह विद्वत्ता, असीम स्वार्थत्याग और आजन्म देशसेवाके कारण जनताजनार्दनके हृन्मंदिरमें तिलकजीने अद्वितीय स्थान पा लिया है ।" – महात्मा गांधी (वाराणसी-कानपुरके अभिभाषण)
प्रकाशकोंका निवेदन हमारे पितामह स्वर्गीय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक महोदय प्रणीत श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ग्रंथका उन्नीसवाँ संस्करण प्रकाशित करनेका सुअवसर आज प्राप्त हुआ है। इसके तीन संस्करण लोकमान्यजीके जीवन- कालमेंही प्रसिद्ध हो चुके थे। चतुर्थ संस्करणमें इस ग्रंथका थोड़ेमें इतिहास दिया था। यहाँभी उसको दुहराना हम उचित मानते हैं। यह सर्वत्र सुविदितही है, कि यह गीतारहस्य ग्रंथ लो. तिलक महोदयने ब्रह्मदेश (बर्मा) के मंडाले नगरके कारागृह-वासके समय लिखा था। हमारे पासकी इस ग्रंथकी पेन्सिलसे लिखी हुई मूल चार हस्तलिखित बहियोंसे ज्ञात होता है कि मंडालेमें दि. २ नवंबर सन् १९१० को इस ग्रंथके लेखनका आरंभ करके, लगभग ९०० पृष्ठोंके इस संपूर्ण ग्रंथका लेखन दि. ३० मार्च १९११ के रोज, अर्थात् केवल पांच महीनोंमें, उन्होंने पूर्ण कर दिया। सोमवार दि. ८ जून १९१४ के रोज लोकमान्य महोदयकी मंडालेके कारागृहसे मुक्तता हुई। वहाँसे पूना लौट आनेपर कई सप्ताहोंतक राह देखनेपरभी, मंडालेके कारागृहके अधिकारीको सौंपे गये गीतारहस्यके हस्त- लिखितोंको जल्द लौटा देनेका सरकारका इरादा दीख नहीं पड़ा। ज्यों-ज्यों दिन बीतते गये, त्यों-त्यों सरकारके हेतुके बारेमें लोग अधिकाधिक साशंक होते गये और कोई कोई तो आखिर स्पष्ट कहने लगे, “कि सरकारका लक्षण कुछ ठीक नहीं लगता; मालूम होता है, बहियाँ न देनेका विचार है।” ऐसे शब्द जब किसीके मुँहसे लोकमान्यजी सुनते थे, तब वे कहा करते थे, कि “डरनेका कोई कारण नहीं। यद्यपि बहियाँ सरकारके पास हैं, तोभी ग्रंथका एक-एक शब्द मेरे मस्तिष्कमें है। विश्रामके समय ‘सिंहगढ़’ किलेपर जाकर अपने बंगलेमें बैठकर मैं फिरसे ग्रंथ यथा- पूर्व लिख डालूँगा।” आत्मविश्वासकी यह तेजस्वी भाषा ढलती उम्रवाले अर्थात् ६० वर्षके वयोवृद्ध गृहस्थकी है, और ग्रंथभी मामूली नहीं, बल्कि गहन तत्त्वज्ञान- विषयक पूरे ९०० पृष्ठोंका है। इन बातोंपर ध्यान देनेसे लोकमान्य महोदयके प्रवृत्तिप्रधान प्रयत्नवादकी यथार्थ कल्पना त्वरित की जा सकती है। सौभाग्यसे तदनंतर जल्दीही सरकारसे सभी बहियाँ सुरक्षित प्राप्त हुई, और लोकमान्यके जीवन-कालमेंही इस ग्रंथके तीन हिंदी संस्करण प्रकाशित हुए। ऊपर यह उल्लेख किया गया है, कि गीतारहस्यका मूल हस्तलिखित चार बहियोंमें है। उन बहियोंके संबंधमें अधिक जानकारी इस प्रकार है:-
प्रकाशकोंका निवेदन ९ बही विषय पृष्ठ लेखन-काल १ रहस्य. प्र. १ से ८ १ से ४१३ २ नवंबर १९१० से ८ दिसंबर १९१० २ रहस्य. प्र. ९ से १३ १ से ४०२ { १३ दिसंबर १९१० से १५ जनवरी १९११ ३ रहस्य. प्र. १४ से १५ १ से १४७ बहिरंगपरीक्षण १५१-२४४ १५ जनवरी १९११ से ४०१-४१२ ३० जनवरी १९११ मुखपृष्ठ, समर्पण २४५-२४७ श्लोकोंका अनुवाद ( अध्याय १-३ ) २४९-३९९ १-३४० ४ श्लोकोंका अनुवाद ३४४-३७४ १० मार्च १९११ से ( अध्याय ४ से १८ ) ३८५-४०७ ३० मार्च १९११ ३४१-३४३ प्रस्तावना ३७५-३८४ ग्रंथकी अनुक्रमणिका, समर्पण और प्रस्तावनाभी लोकमान्य महोदयने कारा- गृहमेंही लिखी थी, और स्थान-स्थानपर ऐसी सूचनाएँ लिखकर, कि किस विषयके बाद कौन विषय हो, ग्रंथ परिपूर्ण कर रखा था । इससे ज्ञात होता है, कि उनको यह विश्वास नहीं था, कि अपने जीते जी कारागृहसे मुक्तता होगी या नहीं, और उनकी यह अत्युत्कट इच्छा थी, कि यदि मुक्तता न हो, तोभी अपना परिश्रम- पूर्वक संपादन किया हुआ ज्ञान और उसमे सूझे हुए विचार व्यर्थ न जायें, बल्कि उनका लाभ अगली पीढ़ीको मिले । पहली दो बहियोंके आरंभमें उन बहियोंमें वर्णित विषयोंकी अनुक्रमणिका है । ग्रंथका मुखपृष्ठ और समर्पण तीसरी बहीके २४५ से २४७ पृष्ठोंमें है और प्रस्तावना चौथी बहीके ३४१ से ३४३ और ३७५ से ३८४ पृष्ठोंमें है । कारागृहसे मुक्तता होनेपर प्रस्तावनामें कुछ सुधार किया गया है और वह प्रकाशन-कालमें सहायक व्यक्तियोंके निर्देशतकही सीमित है । यह विषय प्रथम संस्करणकी प्रस्तावनाके अंतिम परिच्छेदके पहलेके परिच्छेदमें है । अंतिम परिच्छेद तो कारागृहमेंही लिखा हुआ था । इनमेंसे पहली बहीके पहले आठ प्रकरणोंको 'पूर्वार्ध' संज्ञा दी गई है ( यह प्रथम बहीके प्रथम पृष्ठके चित्रसे ज्ञात होगा ), दूसरीको उत्तरार्ध भाग पहला और तीसरीको उत्तरार्ध भाग दूसरा, इस प्रकार संज्ञाएँ दी गई हैं । इससे ज्ञात होता है, कि ग्रंथके दो भाग करनेका उनका विचार था । इनमेंसे पहली बहीके आठ प्रकरणोंका हस्तलिखित केवल एक महीनेमेंही लिखकर तैयार हुआ था और यही
१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रकरण अत्यंत महत्त्वके हैं। इससे लोकमान्य महोदयकी इस विषयकी ओतप्रोत तैयारीका और उनके लेखनके अस्खलित प्रवाहका यथार्थ ज्ञान पाठकोंको सहजही होगा। बहीके पृष्ठ फाड़ देनेकी अथवा नये जोड़नेकी, कारागृहके नियमानुसार, उनको आज्ञा न थी, किंतु पुनर्विचारसे सूझी बातोंके नये पृष्ठ बीच-बीचमें जोड़नेकी सुविधा उनको मिली थी। यह जानकारी दूसरी और तीसरी बहीके आवरणके अंदरके बाजूमें लिखी है। पहली तीन बहियाँ केवल एक-एक महीनेमें लिखी गई हैं और अंतिम बही सिर्फ़ एक पखवाडेमें लिखी गई है। मुख्य विषय दाहिने हाथके पृष्ठोंपर लिखके उनके पीछेके कोरे पृष्ठोंपर अगले पृष्ठोंमें समावेश करनेके लिये नयी बातें लिखी हुई हैं। आशा है, कि मूल हस्तलिखित प्रतिसंबंधी जिज्ञासा उक्त जानकारीसे पूर्ण होगी। इस ग्रंथका जन्म होनेके पहलेभी प्रस्तुत विषयके संबंधमें उनका व्यासंग जारी था, इसका उत्तम प्रमाण उनके अन्य दो ग्रंथ हैं। ‘मासानां मार्गशीर्षोऽहं’ (गीता १०-३५, गीतार. पृष्ठ ७७४) इस श्लोकका अर्थ निश्चित करते समय, उन्होंने वेदोंके महोदधिमें डुबकी लगा कर, ‘ओरायन’ रुपी रत्न जनताको दे दिया और वेदोदधिका पर्यटन करत करते आर्योंके मूल वसतिस्थानका पता लगाया है। काला- नुक्रमसे गीतारहस्य यद्यपि अंतिम ग्रंथ है, तोभी उक्त दो ग्रंथोंका पूर्व वृत्तान्त ध्यानमे रखनेसे, महत्त्वकी दृष्टिसे गीतारहस्यकोही आद्यस्थान देना पड़ता है। गीताविषयक व्यासंगसेही ये ग्रंथ निर्माण हुए हैं। ‘ओरायन’ ग्रंथकी प्रस्तावनामें लोकमान्य महाशयने गीताके अभ्यासका उल्लेख किया है। ‘ओरायन’ और ‘आर्योंका मूल वसतिस्थान’ ये दोनों अंग्रेजी ग्रंथ यथावकाश प्रकाशित हुए और जगत्भरमें विख्यात हो गये। परंतु गीतारहस्य लिखनेका मुहूर्त लोकमान्यके तीसरे दीर्घ कारावाससे प्राप्त हुआ। गीतारहस्यके पहलेके दोनों ग्रंथोंका लेखनभी कारागृहमेंही हुआ है। सार्वजनिक कार्य-प्रवृत्तियोंकी उपाधिसे मुक्त होकर ग्रंथलेखनके लिये आवश्यक स्वस्थता कारागृहमें मिल सकी; परंतु प्रत्यक्ष ग्रंथलेखनका आरंभ करनेके पूर्व उनको जिन बड़ी भारी मुसीबतोंका सामना करना पड़ा, उन्हें उनकेही शब्दोंमें इस जगह कहना उचित है- “ग्रंथके संबंधमें तीन बार तीन हुक्म आये...कुछ दिनके बाद मेरे पास सब पुस्तकें रखनेकी मनाही की गयी और सिर्फ़ चार पुस्तकेंही एक समय रखनेका हुक्म हुआ। उसपर बर्मा सरकारसे अर्ज करनेपर, ग्रंथ लेखनके लिये आवश्यक सब पुस्तकें मेरे पास रखनेकी आज्ञा हुई। जब मै वहाँसे लौटा, तब पुस्तकोंकी संख्या ३५० से ४०० तक पहुँची थी। ग्रंथलेखनके लिये जो काग़ज़ देते थे, वेभी छूटे न दे कर, जिल्ददार किताब, भीतरके पृष्ठ गिनके और उनपर दोनों ओर क्रमांक लिखकर, देते थे और लिखनेको स्याही न देके सिर्फ़ नोकदार पेन्सिलें देते थे” (लोकमान्य तिलक महाशयके कारागारसे छूटनेके बादकी पहली मुलाक़ात – ‘केसरी’ दि. ३० जून १९१४)।
प्रकाशकोंका निवेदन ११ इस प्रकार वाचकवृन्द कल्पना कर सकते हैं, कि तिलक महोदयको ग्रंथलेखनमें कैसी-कैसी मुसीबतोंका सामना करना पड़ा होगा, परंतु उनकी चिंता न करके सन् १९१० के जाड़ेंमें उन्होंने हस्तलिखित प्रति तैयार कर दी । ग्रंथके हस्तलिखितके तैयार होनेका समाचार उन्होंने सन् १९११ के आरंभके एक पत्रमें दिया था और वह पत्र सन् १९११ के मार्च महीनेके 'मराठा' पत्रके एक अंकमें समग्र प्रसिद्ध हुआ है । गीतारहस्यमें किया गया विवेचन लोगोंको अधिक सुगम हो, इसलिये तिलक महोदयने सन् १९१४ के गणेशोत्सवमें चार व्याख्यान दिये, और बादमें ग्रंथ छापनेके कामका आरंभ होकर १९१५ के जून महीनेमें उसका पूर्णावतार हुआ । इसके आगेका इतिहास सबको सुविदितही है । सन् १९५६ ईसवीमें, लोकमान्य तिलकजीकी जन्मशताब्दीके उपलक्ष्यमें, इस मौलिक ग्रंथके नये संस्करणको प्रकाशित करते समय, यह निश्चय किया गया, कि इस ग्रंथका वेष्टनभी नया हो । इच्छा थी, कि वेष्टनपर स्वर्गीय लोकमान्य तिलक महोदयका तथा उनकी कल्पनाके अनुसार कुरुक्षेत्रकी रणभूमिका चित्र रहे । हमारे चित्रकार-मित्र श्रीमान् दलालजीने हमारी मूल कल्पनाकी अपेक्षाभी इतनी अधिक सफलतापूर्वक ये दोनों चित्र चित्रित किये हैं, कि उनकी अलग प्रशंसा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं रही । चित्रकारसे मोहक एवं अत्युत्तम चित्र खिंचवाये जानेपरभी छपाईका कार्यभी उतनीही लगनसे करना पड़ता है । शिवराज फाईन आर्ट लिथो वर्क्स ( नागपुर ) ने वेष्टनछपाईका वह कार्य सुचारू रूपसे पूर्ण कर दिया है । सोलहवां संस्करणको संशोधित तथा दोषरहित बनानेके लिये श्री. भगवान नारायण कानडेजीने अत्यधिक परिश्रम किये थे । उन्नीसवां संस्करणके सभी ग्रंथ बीक चुके है और इस मौलिक तथा शास्त्रीय ग्रंथके लिये सतत माँग हो रही है । इसलिये यह उन्नीसवाँ संस्करण तुरन्त प्रकाशित किया है । परशुराम प्रोसेसके श्री. सुभाष बर्वेजीने यह ग्रंथ तुरन्त छपवा दिया इसलिये आपको धन्यवाद प्रदान करना हम अपना कर्तव्य मानते है । काग़ज़का मूल्य अधिकाधिक बढ़ रहा है और छपाईकी दरोंमेंभी वृद्धि होती रही है अतः इस ग्रंथका मूल्य बढ़ा देना अपरिहार्य-सा हो गया है । इस प्रकार ग्रंथकी सजावटमें अनेकोंने परिश्रम उठाये हैं । पाठकोंके हाथमें आज यह ग्रंथ हम दे रहे हैं । आशा है, पाठक इसका सहर्ष और सानन्द स्वीकार करेंगे । पूना, दी. ज. टिळक दि. १।५।१९८२ शै. श्री. टिळक
अनुवादककी भूमिका भूमिका लिखकर महात्मा तिलकके ग्रंथका परिचय कराना, मानो सूर्यको दीपकसे दिखलानेका प्रयत्न करना है। यह ग्रंथ स्वयं प्रकाशमान् होनेके कारण अपना परिचय आपही दे देता है। परंतु भूमिका लिखनेकी प्रणाली-सी पड़ गई है। ग्रंथको पातेही पत्र उलट-पलटकर पाठक भूमिका खोजने लगते हैं। इसलिये उक्त प्रणालीकी रक्षा करने और पाठकोंकी मनस्तुष्टि करनेके लिये इस शीर्षकके नीचे दो शब्द लिखना आवश्यक हो गया है। संतोषकी बात है, कि श्रीसमर्थ रामदासस्वामीकी अशेष कृपासे, तथा सद्गुरु श्रीरामदासानुदास महाराजके (हनुमानगढ़, वर्धा निवासी श्रीधर विष्णु परांजपे) प्रत्यक्ष अनुग्रहसे, जब मेरे हृदयमें अध्यात्म-विषयकी जिज्ञासा उत्पन्न हुई है, तभीसे इस विषयके अध्ययनके महत्त्वपूर्ण अवसर अनायास मिलते जाते हैं। यह उसी कृपा और अनुग्रहका फल था, कि मैं संवत् १९७० में श्रीसमर्थके दासबोधका हिंदी अनुवाद कर सका। अब उसी कृपा और अनुग्रहके प्रभावसे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलककृत श्रीमद्भगवद्गीतारहस्यके अनुवाद करनेका अनुपम अवसर हाथ लग गया हैं। जब मुझे यह काम सौंपा गया, तब ग्रंथकारने अपनी यह इच्छा प्रकट की, कि मूल ग्रंथमें प्रतिपादित सब भाव ज्यों-के-त्यों हिंदीमें पूर्णतया व्यक्त किये जायें; ग्रंथमें प्रतिपादित सिद्धान्तोंपर जो आक्षेप होंगे, उनके उत्तरदाता मूल लेखकही हैं। इसलिये मैंने अपने लिये दो कर्तव्य निश्चित किये :- (१) यथा- मति मूल भावोंकी पूरी पूरी रक्षा की जावे, और (२) अनुवादकी भाषा यथाशक्ति शुद्ध, सरल, सरस और सुबोध हो। अपनी अल्पबुद्धि और सामर्थ्यके अनुसार इन दोनों कर्तव्योंके पालन करनेमें मैंने कोई बात उठा नहीं रखी है; और मेरा आंतरिक विश्वास है, कि मूल ग्रंथके भाव यत्किंचित्भी अन्यथा नहीं हो पाये हैं। परंतु संभव है, कि विषयकी कठिनता और भावोंकी संभी- रताके कारण मेरी भाषाशैली कहीं कहीं क्लिष्ट अथवा दुर्बोध-सी हो गई हो; और यहभी संभव है, कि ढूंढनेवालोंको इसमें 'मराठीपनकी बू' भी मिलजाय। परंतु इसके लिये क्या किया जाय ? लाचारी है। मूल ग्रंथ मराठीमें है, मैं स्वयं महाराष्ट्रका हूँ, मराठीही मेरी मातृभाषा है, महाराष्ट्र देशके केंद्रस्थल पूनामेंही यह अनुवाद छापा गया है। और मैं हिंदीका कोई 'धुरंधर' लेखकभी नहीं हूँ। ऐसी अवस्थामें, यदि इस ग्रंथमें उक्त दोष न मिलें, तो बहुत आश्चर्य होगा। यद्यपि मराठी 'रहस्य' को हिंदी पोशाक पहनाकर सर्वांगसुंदर रूपसे हिंदी पाठकोंके उत्सुक हृदयोंमें प्रवेश करानेका यत्न किया गया है; और ऐसे महत्त्वपूर्ण
अनुवादककी भूमिका १३ विषयको समझानेके लिये उन सब साधनोंकी सहायता ली गई है, कि जो हिंदी साहित्य-संसारमें प्रचलित है; फिरभी स्मरण रहे, कि यह केवल अनुवादही है - इसमें वह तेज नहीं आ सकता, कि जो मूलग्रंथमें है। गीताके संस्कृत श्लोकोंके मराठी अनुवादके विषयमें स्वयं महात्मा तिलकने उपोद्घातमें (पृष्ठ ६००) यह लिखा है :- " स्मरण रहे, कि अनुवाद आखिर अनुवादही है। हमने अपने अनुवादमें गीताके सरल, खुले और प्रधान अर्थको ले आनेका प्रयत्न किया है सही ; परंतु संस्कृत शब्दोंमें और विशेषतः भगवानकी प्रेमयुक्त, रसीली, व्यापक और क्षण- क्षणमे नई रुचि उत्पन्न करानेवाली वाणीमें लक्षणासे अनेक व्यंग्यार्थ उत्पन्न करनेकी जो सामर्थ्य है, उसे जराभी न घटा-बढ़ाकर, दूसरे शब्दोंमें ज्यों-का-त्यों झलक देना असंभव है...!" ठीक यही बात महात्मा तिलकके ग्रंथके हिंदी अनुवादके विषयमें कही जा सकती है। एक तो विषय तात्त्विक, दूसरे गंभीर, और फिर महात्मा तिलककी वह ओजस्विनी, व्यापक एवं विकट भाषा कि जिसके मर्मको ठीक ठीक समझ लेना कोई साधारण बात नहीं है। इन दुहरी-तिहरी कठिनाइयोंके कारण यदि वाक्यरचना कहीं कठिन हो गई हो, दुरूह हो गई हो, या अशुद्धभी हो गई हो, तो उसके लिये सहृदय पाठक मुझे क्षमा करें। ऐसे ग्रंथके अनुवादमें किन किन कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है और अपनी स्वतंत्रताका त्यागकर पराधीनताके किन किन नियमोंमें बंध जाना होता है, इसका अभव वे सहानुभूतिशील पाठक और लेखकही कर सकते हैं, कि जिन्होंने इस ओर कभी ध्यान दिया हो। राष्ट्रभाषा हिंदीको इस बातका अभिमान है, कि वह महात्मा तिलकके गीता- रहस्यसंबंधी विचारोंको अनुवाद-रूपमें उस समय पाठकोंको भेंट कर सकी है, जब कि और किसीभी भाषाका अनुवाद प्रकाशित नहीं हुआ; - यद्यपि दो-एक अनुवाद तैयार थे। इससे, आशा है, कि हिंदीप्रेमी अवश्य प्रसन्न होंगे। अनुवादका श्रीगणेश जुलाई १९१५ में हुआ था और दिसंबरमें उसकी पूर्ति हुई। जनवरी १९१६ से छपाईका आरंभ हुआ, जो जून सन् १९१६ में समाप्त हो गया। इस प्रकार एक वर्षमें यह ग्रंथ तैयार हो पाया। यदि मित्रमंडलीने मेरी पूर्ण सहायता न की होती, तो मैं, इतने समयमें, इस कामको कभी पूरा न कर सकता। इनमें वैद्य विश्वनाथराव लुखे और श्रीयुत मौलिप्रसादजीका नाम उल्लेख करने- योग्य है। कविवर बा. मैथिलीशरण गुप्तने कुछ मराठी पद्योंका हिंदी रूपांतर करनेमें अच्छी महायता दी है, इसलिये वे धन्यवादके भागी हैं। श्रीयुत पं. लल्लीप्रसाद पांडेयने जो सहायता की है, वह अवर्णनीय एवं अत्यंत प्रशंसाके योग्य है। लेख लिखनेमें, हस्तलिखित प्रतिको दुहरानेमें और प्रूफका संशोधन करनेमें आपने दिन-रात कठिन परिश्रम किया है। अधिक क्या कहा जाय, घर छोड़कर महीनोंतक आपको इस कामके लिये पूनामें रहना पड़ा है। इस सहायता और उपकारका बदला केवल
१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र धन्यवाद दे देनेसेही नहीं हो जाता; हृदय जानता है; कि मैं आपका कैसा ऋणी हूँ । हिं. चि. ज. के संपादक श्रीयुत भास्कर रामचंद्र भालेरावने तथा औरभी अनेक मित्रोंने समय-समयपर यथाशक्ति सहायता की है । अतः इन सब महाशयोंको मैं आंतरिक धन्यवाद देता हूँ । एक वर्षसे अधिक समयतक इस ग्रंथके साथ मेरा अहोरात्र सहवास रहा है । सोते-जागते इसी ग्रंथके विचारोंकी मधुर कल्पनाएँ नजरोंमें झूलती रही हैं । इन विचारोंसे मुझे मानसिक तथा आत्मिक अपार लाभ हुआ है । अतः जगदीश्वरसे यही विनय है, कि इस ग्रंथके पढ़नेवालोंकोभी इससे लाभान्वित होनेका मंगलमय आशीर्वाद दीजिये । श्रीरामदासी मठ, रायपुर (सी. पी.) देवशयनी ११, मंगलवार, माधवराव सप्रे संवत् १९७३ वि.
प्रस्तावना सन्तों की उच्छिष्ट उक्ति है मेरी बानी । जानूँ उसका भेद भला क्या मैं अज्ञानी ॥* श्रीमद्भगवद्गीतापर अनेक संस्कृत भाष्य, टीकाएँ अथवा देशी भाषाओंमें अनुवाद या सर्वमान्य विस्तृत निरूपण हैं, फिरभी यह ग्रंथ क्यों प्रकाशित किया गया ? यद्यपि इसका कारण ग्रंथके आरंभमेंही बतलाया गया है, तथापि कुछ बातें ऐसी हैं, कि जिनका ग्रंथके प्रतिपाद्य विषयके विवेचनमें उल्लेख न हो सकता था, अतः उन बातोंको प्रकट करनेके लिये प्रस्तावनाको छोड़ और दूसरा स्थान नहीं है । इनमें सबसे पहली बात स्वयं ग्रंथकारके विषयमें है । कोई तैतालीस वर्ष हुए जब हमारा भगवद्गीतासे प्रथम परिचय हुआ था । सन् १८७२ ईसवीमें हमारे पूज्य पिताजी अंतिम रोगसे आक्रान्त हो शय्यापर पड़े हुए थे, उस समय उन्हें 'भाषा- विवृत्ति' नामक भगवद्गीताकी मराठी टीका सुनानेका काम हमें मिला था । तब, अर्थात् अपनी आयुके सोलहवें वर्षमें गीताका भावार्थ पूर्णतया समझमें न आ सकता था । फिरभी छोटी अवस्थामें मनपर जो संस्कार होते हैं, वे दृढ़ हो जाते हैं, इस कारण उस उमय भगवद्गीताके संबंधमें जो चाह उत्पन्न हो गई थी, वह स्थिर बनी रही और आगे जब संस्कृत और अंग्रेजीका अधिक अभ्यास हो गया, तब हमने गीताके संस्कृत भाष्य, अन्यान्य टीकाएँ और अनेक पंडितोंके मराठी तथा अंग्रेजीमें लिखे हुए विवेचनभी समय-समयपर पढ़े । परंतु तब मनमें शंका उत्पन्न हुई, कि जो गीता अपने स्वजनोंके साथ युद्ध करनेको बड़ा भारी कुकर्म समझकर खिन्न होने- वाले अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लिये बतलाई गई है, उस गीतामें ब्रह्मज्ञानसे या भक्तिसे मोक्ष-प्राप्तिकी विधिका - निरे मोक्ष-मार्गका - विवेचन क्यों किया गया है ? यह शंका इसलिये औरभी दृढ़ होती गई, कि गीताकी किसीभी टीकामें इस विषयका योग्य उत्तर ढूँढ़े न मिला । कौन जानता है, कि हमारे समानही और लोगोंकोभी यही शंका हुई न होगी ! परंतु टीकाओंपरही निर्भर रहनेसे, टीका- कारोंका दिया हुआ उत्तर समाधानकारक न भी जँचे, तोभी उसको छोड़ और दूसरा उत्तर सूझताही नहीं है । इसीलिये जब हमने गीताकी समस्त टीकाओं और भाष्योंको लपेटकर एक ओर धर दिया और केवल गीताकेही स्वतंत्र विचार- पूर्वक अनेक पारायण किये, तब टीकाकारोंके चंगुलसे छूटे, और यह बोध हुआ, कि मूल गीता निवृत्ति-प्रधान नहीं है, वह तो कर्म-प्रधान है, और अधिक क्या कहें ! गीतामें अकेला 'योग' शब्दही 'कर्मयोग'के अर्थमें प्रयुक्त हुआ है । महा-
- साधु तुकारामके एक 'अभंग'का भाव ।
१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भारत, वेदान्तसूत्र, उपनिषद् और वेदान्तशास्त्रविषयक अन्यान्य संस्कृत तथा अंग्रेजी भाषाके ग्रंथोंके अध्ययनसेभी वही मत दृढ़ होता गया; और चार-पाँच स्थानोंपर इसी विषयपर व्याख्यान इस इच्छासे दिये, कि सर्वसाधारणमें उस विषयके संबंधमें उक्त मत प्रकट कर देनेसे, अधिक चर्चा होगी, एवं सत्य तत्त्वका निर्णय करनेमें औरभी सुविधा हो जायगी । इनमेंसे पहला व्याख्यान नागपुरमें जनवरी सन् १९०२ में हुआ और दूसरा सन् १९०४ ईसवीके अगस्त महीनेमें करवीर एवं संकेश्वर मठके जगद्गुरु श्रीशंकराचार्यकी उपस्थितिमें उन्हींकी आज्ञासे, संकेश्वर मठमें हुआ था, और उस समय नागपुरवाले व्याख्यानका विवरणभी समाचारपत्रोंमें प्रकाशित हुआ है । इसके अतिरिक्त जब जब समय मिल गया, तब तब इसी विचारसे, कुछ विद्वान् मित्रोंके साथ समय-समयपर वाद-विवादभी किया । इन्हीं मित्रोंमें स्वर्गीय श्रीपतिबाबा भिंगारकर थे । इनके सहवाससे भागवत संप्रदायके कुछ प्राकृत ग्रंथ देखनेमें आये, और गीतारहस्यमें वर्णित कुछ बातें तो आपके और हमारे वाद-विवादमेंही पहले निश्चित हो चुकी थीं । यह बड़े दुःखकी बात है, कि आप इस ग्रंथको देख न पाये । अस्तु; इस प्रकार यह मत निश्चित हो गया, कि गीताका प्रतिपाद्य विषय प्रवृत्ति- प्रधान है; और इसको लिखकर ग्रंथरूपमें प्रकाशित करनेका विचार कियेभी अनेक वर्ष बीत गये । वर्तमान समयमें पाये जानेवाले भाष्यों, टीकाओं या अनुवादोंमें जो गीता-तात्पर्य स्वीकृत नहीं हुआ है, केवल उसेही यदि पुस्तकरूपसे प्रकाशित कर देते, और इसका कारण न बतलाते, कि प्राचीन टीकाकारोंका निश्चित किया हुआ तात्पर्य हमें ग्राह्य क्यों नहीं है, तो बहुत संभव था, कि लोग कुछका कुछ समझने लग जाते - उनको भ्रम हो जाता; और समस्त टीकाकारोंके मतोंका संग्रह करके उनकी सकारण अपूर्णता दिखला देना, एवं अन्य धर्मों या तत्त्वज्ञानोंके साथ गीता-धर्मकी तुलना करना कोई ऐसा साधारण काम न था, जो शीघ्रतापूर्वक चटपट हो जाय। अतएव यद्यपि हमारे मित्र श्रीयुत दाजीसाहेब खरे और दादासाहेब खापर्डेने कुछ पहलेही यह प्रकाशित कर दिया था, कि हम गीतापर एक नवीन ग्रंथ शीघ्रही प्रसिद्ध करनेवाले हैं; तथापि ग्रंथ लिखनेका काम इस समझसे टलता गया, कि हमारे पास जो सामग्री है वह अभी, अपूर्ण है; जब सन् १९०८ ईसवीमें सजा देकर हम मंडाले भेज दिये गये, तब तो इस ग्रंथके लिखे जानेकी आशा बहुत कुछ घटही गई थी । किंतु कुछ समय बाद ग्रंथ लिखनेके लिये आवश्यक पुस्तकें आदि सामग्री पूनासे मँगा लेनेकी अनुमति जब सरकारकी मेहरबानीसे मिल गई, तब सन् १९१०-११ के कुछ कालमें (संवत् १९६७, कार्तिक शुक्ल १ से चैत्र कृष्ण ३० के भीतर) इस ग्रंथकी पांडु- लिपि (मसविदा) मंडालेके जेलखानेमें पहले पहल लिखी गई । और फिर समयानुसार जैसे जैसे विचार सूझते गये, वैसे वैसे उसमें काट-छांट होती गई; उस समय समग्र पुस्तकें वहाँ न होनेके कारण कई स्थानोंमें जो अपूर्णता रह गई थी, उसे वहाँसे छुटकारा हो जानेपर पूर्ण तो कर लिया गया है; परंतु अभीभी यह नही कहा
प्रस्तावना १७ जा सकता, कि यह ग्रंथ सर्वांशमें पूर्ण हो गया। क्योंकि मोक्ष और नीति-धर्मके तत्त्व गहन तो हैंही; साथही उनके संबंधमें अनेक प्राचीन और अर्वाचीन पंडितोंने इतना विस्तृत विवेचन किया है, कि व्यर्थ फैलावसे बचकर यह निर्णय करना कई बार कठिन हो जाता है, कि उसमेंसे इस छोटे-से ग्रंथमें किन किन बातोंका समावेश किया जावे ? परंतु अब हमारी स्थिति महाराष्ट्रके कविकी इस उक्तिके अनुसार हो गई है:- यम-सेना की विमल ध्वजा अब 'जरा' दृष्टिमें आती है। करती हुई युद्ध रोगोंसे देह हारती जाती है ॥* और हमारे सांसारिक साथीभी पहलेही चल बसे हैं। अतएव अब इस ग्रंथको यह समझकर प्रसिद्ध कर दिया है, कि हमें जो बातें मालूम हो गई है और जिन विचारोंको हमने सोचा है, वे सब लोगोंकोभी ज्ञात हों जाएँ; फिर कोई-न-कोई 'समानधर्मा' अभी या आगे उत्पन्न होकर उन्हें पूर्ण करही लेगा। आरंभमेंही यह कह देना आवश्यक है, कि यद्यपि हमें यह मत मान्य नहीं है, कि सांसारिक कर्मोंको गौण अथवा त्याज्य मानकर, ब्रह्मज्ञान और भक्ति प्रभृति निरे निवृत्ति-प्रधान मोक्ष-मार्गकाही निरूपण गीतामें है; तथापि हम यहभी नहीं कहते, कि मोक्ष-प्राप्ति-मार्गका विवेचन भगवद्गीतामें बिलकुलही नहीं है। हमनेभी इस ग्रंथमें स्पष्ट दिखला दिया है, कि गीताशास्त्रके अनुसार इस जगत्में प्रत्येक मनुष्यका पहला कर्तव्य यही है, कि वह परमेश्वरके शुद्ध स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करके उसके द्वारा अपनी बुद्धिको, जितनी हो सके उतनी, निर्मल और पवित्र कर ले, परंतु यह गीताका मुख्य विषय नहीं है। युद्धके आरंभमें अर्जुन इस कर्तव्य- मोहमें फँसा था, कि, कि युद्ध करना क्षत्रियका धर्म भलेही हो, परंतु विपरीत पक्षमें कुलक्षय आदि घोर पातक होनेसे जो युद्ध मोक्ष-प्राप्तिरूप आत्म-कल्याणका नाशकर डालेगा, उस युद्धको करना चाहिये अथवा नहीं। अतएव हमारा यह अभिप्राय है, कि उस मोहको दूर करनेके लिये शुद्ध वेदान्तशास्त्रके आधारपर कर्म-अकर्मका और साथही साथ मोक्षके उपायोंकाभी पूर्ण विवेचन कर, इस प्रकार निश्चय किया गया है, कि एक तो कर्म कभी छूटतेही नहीं है; और दूसरे, उनको छोड़नाभी नहीं चाहिये; एवं गीतामें उस युक्तिका, अर्थात् ज्ञानमूलक और भक्ति-प्रधान- कर्मयोगकाही प्रतिपादन किया गया है, कि जिससे कर्म करनेपर कोईभी पाप नहीं लगता तथा अंतमें उसीसे मोक्षभी मिल जाता है। कर्म-अकर्मके या धर्म-अधर्मके इस विवेचनकोही वर्तमानकालीन निरे आधिभौतिक पंडित नीतिशास्त्र कहते हैं। सामान्य पद्धतिके अनुसार गीताके श्लोकोंके क्रमसे टीका लिखकरभी यह दिखलाया जा सकता था, कि यह विवेचन गीतामें किस प्रकार किया गया है; परंतु वेदान्त,
- महाराष्ट्र-कविवर्य मोरोपंतकी 'केका'का भाव। गी. र. २ *
१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मीमांसा, सांख्य, कर्मविपाक अथवा भक्ति प्रभृति शास्त्रोंके जिन अनेक वादों अथवा प्रमेयोंके आधारपर गीतामें कर्मयोगका प्रतिपादन किया गया है, और जिनका उल्लेख कभी कभी बहुतही संक्षिप्त रीतिसे पाया जाता है, उन शास्त्रीय सिद्धान्तोंका पहलेसेही ज्ञान हुए बिना गीताके विवेचनका पूर्ण रहस्य सहसा ध्यानमें नहीं जमता । इसीलिये गीतामें जो जो विषय अथवा सिद्धान्त आये हैं, उनके शास्त्रीय रीतिसे प्रकरणोंमें विभाग करके उनकी प्रमुख प्रमुख युक्तियोंसहित गीतारहस्यमें उनका पहले संक्षेपमे निरूपण किया गया है; और फिर उसीमें वर्तमान युगकी आलोचना- त्मक पद्धतिके अनुसार गीताके प्रमुख सिद्धान्तोंकी तुलना अन्यान्य धर्मोंके और तत्त्वज्ञानोंके साथ प्रसंगानुसार संक्षेपमें कर दिखलाई गई है। इस रीतिसे इस पुस्तकके पूर्वार्धमें जो गीतारहस्य नामक निबंध है, वह कर्मयोगविषयक एक छोटासा किंतु स्वतंत्र ग्रंथही कहा जा सकता है । जो हो; इस प्रकारके सामान्य निरूपणमें गीताके प्रत्येक श्लोकका पूर्ण विचार हो नहीं सकता था । अतएव अंतमें गीताके प्रत्येक श्लोकका अनुवाद दे दिया है; और उसीके साथ स्थान-स्थानपर यथेष्ट टिप्पणियाँभी इसलिये जोड़ दीं गई हैं, कि जिसमें पूर्वापर संदर्भ पाठकोंकी समझमें भली भाँति आ जाय, अथवा पुराने टीकाकारोंने अपने संप्रदायकी सिद्धिके लिये गीताके कुछ श्लोकोंकी जो खींचातानी की है, उसे पाठक समझ जायें ( गीता ३.१७-१९; ६. ३; १८. २ ); या वे सिद्धान्त सहजही ज्ञात हो जाय कि जो गीतारहस्यमें बतलाये गये हैं, और यहभी ज्ञात हो जाय, कि उनमेंसे कौनकौनसे सिद्धान्त गीताकी संवादात्मक प्रणालीके अनुसार कहाँ कहाँ किस प्रकार आये हैं ? इसमें संदेह नहीं, कि ऐसा करनेसे कुछ विचारोंकी द्विरुक्ति अवश्य हो गई है; परंतु गीतारहस्यका विवेचन गीताके अनुवादसे इसलिये पृथक् रखना पड़ा है, कि गीता-ग्रंथके तात्पर्यके विषयमें साधारण पाठकोंमें जो भ्रम फैल गया है, वह भ्रम अन्य रीतिसे पूर्णतया दूर नहीं हो सकता था; और इस पद्धतिसे पूर्व इतिहास और आधारसहित यह दिखलानेमें सुविधा हो गई है, कि वेदान्त, मीमांसा और भक्ति प्रभृतिविषयक गीताके सिद्धान्त भारत, सांख्यशास्त्र, वेदान्त-सूत्र, उपनिषद् और मीमांसा आदि मूल ग्रंथोंसे कैसे और कहाँ आये हैं ? इससे यहभी स्पष्टतया बतलाना सुगम हो गया है, कि संन्यास-मार्ग और कर्मयोग-मार्गमें क्या भेद हैं, तथा अन्यान्य धर्ममतों और तत्त्वज्ञानोंके साथ गीताकी तुलना करके व्यावहारिक कर्म-दृष्टिसे गीताके महत्त्वका योग्य निरूपण करना सरल हो गया है। यदि गीतापर अनेक प्रकारकी टीकाएँ न लिखी गई होतीं और अनेकोंने अनेक प्रकारसे गीताके तात्पर्या- र्थोंका प्रतिपादन न किया होता, तो हमें अपने ग्रंथके सिद्धान्तके लिये पोषक और आधारभूत मूल संस्कृत वचनोंके अवतरण स्थान-स्थानपर देनेकी कोई आवश्यकताही न थी । किंतु वर्तमान समय दूसरा है; और लोगोंके मनमें यह शंका हो सकती थी, कि हमने जो गीतार्थ अथवा सिद्धान्त बतलाया है, वह ठीक है या नहीं ? इसीलिये
प्रस्तावना १९ हमने सर्वत्र स्थलनिर्देश कर बतला दिया है, कि हमारे कथनके लिये प्रमाण क्या है, और मुख्य मुख्य स्थानोंपर तो मूल संस्कृत वचनोंकोही अनुवादसहित उद्धृत कर दिया है। इसके व्यतिरिक्त इन संस्कृत वचनोंको उद्धृत करनेका औरभी एक प्रयोजन है, वह यह, कि इनमेंसे अनेक वचन साधारण तथा वेदान्त-ग्रंथोंसे प्रमाणार्थ लिये जाते हैं; अतः पाठकोंको यहाँ उनका सहजही ज्ञान हो जायगा और उन सिद्धान्तोंको भली भांति समझभी सकेंगे। किंतु यह कब संभव है, कि वे सभी पाठक संस्कृतज्ञ हों ? इसलिये समस्त ग्रंथकी रचना इस ढंगसे की गई है, कि यदि संस्कृत न जाननेवाले पाठक संस्कृत श्लोकोंको छोड़कर केवल ग्रंथही पढ़ते चले जायें, तोभी अर्थमें कहीं भी गडबड न हो। इस कारण संस्कृत श्लोकोंका शब्दशः अनुवाद न लिखकर अनेक स्थलोंपर उनका केवल सारांश देकरही निर्वाह कर लेना पड़ा है। परंतु मूल श्लोक सदैव ऊपर रखा गया है। इसलिये इस प्रणालीसे भ्रम होनेकी कुछभी आशंका नहीं है। कहा जाता है, कि कोहनूर हीरा जब भारतवर्षसे विलायत पहुँचाया गया, तब वहाँ फिर उसके नये पहलू बनानेपर वह औरभी तेजस्वी हो गया। हीरेके लिये उप- युक्त होनेवाला यह न्याय सत्यरूपी रत्नोंके लियेभी प्रयुक्त हो सकता है। गीतामें प्रतिपादित धर्म, सत्य और अभय है सही; परंतु वह जिस समय और जिस स्वरूपमें बतलाया गया था, उस देश-काल आदि परिस्थितिमें अब बहुत अंतर हो गया है; इस कारण अब उसका तेज पहलेकी भाँति कितनोंहीकी दृष्टिमें नहीं समाता है। किसी कर्मको भला-बुरा माननेके पहले, जिस समय यह सामान्य प्रश्नही महत्त्वका समझा जाता था, कि “ कर्म करना चाहिये अथवा न करना चाहिये ”, उस समय गीता बतलाई गई है, इस कारण उसका बहुत-सा अंश अब कुछ लोगोंको अना- वश्यक प्रतीत होता है; और, उसपरभी निवृत्ति-मार्गीय टीकाकारोंकी लीपा-पोतीने तो गीताके कर्मयोगके विवेचनको आजकल बहुतेरोंके लिये दुर्बोध कर डाला है। इसके अतिरिक्त कुछ नये विद्वानोंकी यह समझ हो गई है, कि अर्वाचीन कालमें आधिभौतिक ज्ञानकी पश्चिमी देशोंमें जो बाढ़ हुई है, उस बाढ़के कारण अध्यात्म शास्त्रके आधारपर किये गये कर्मयोगके प्राचीन विवेचन वर्तमान-कालके लिये पूर्णतया उपयुक्त नहीं हो सकते; किंतु यह समझ ठीक नहीं। इस समझकी पोल खोलनेके लिये गीतारहस्यके विवेचनमें गीताके सिद्धान्तोंकी जोड़केही पश्चिमी पंडितोंके सिद्धान्तभी हमने स्थान-स्थानपर संक्षेपमें दिये हैं। वस्तुतः गीताका धर्म- अधर्म विवेचन इस तुलनासे कुछ अधिक सुदृढ नहीं हो जाता; तथापि अर्वाचीन कालकी आधिभौतिक शास्त्रोंकी अश्रुतपूर्व-वृद्धिसे जिनकी दृष्टिमें चकाचौंध लग गई है, अथवा जिन्हें आजकलकी एकदेशीय शिक्षापद्धतिके कारण आधिभौतिक अर्थात् बाह्य-दृष्टिसेही नीतिशास्त्रका विचार करनेकी आदत पड़ गई है, उन्हें इस तुलनासे इतना तो स्पष्ट ज्ञान हो जायगा, कि मोक्ष-धर्म और नीति, ये दोनों विषय
२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आधिभौतिक ज्ञानके परे है; और वे यहभी जान जाएँगे, कि इसीसे प्राचीन-कालमें हमारे शास्त्रकारोंने इस विषयमें जो सिद्धान्त स्थिर किये हैं, उनके आगे मानवी ज्ञानकी गति अबतक नहीं पहुँच पाई है; यही नहीं, किंतु पश्चिमी देशोंमेंभी अध्यात्म-दृष्टिसे इन प्रश्नोंका विचार अभीतक हो रहा है, और इन आध्यात्मिक ग्रंथकारोंके विचार गीताशास्त्रके सिद्धान्तोंसे कुछ अधिक भिन्न नहीं हैं। गीता- रहस्यके भिन्न भिन्न प्रकरणोंमें जो तुलनात्मक विवेचन है, उससे यह बात स्पष्ट हो जायगी। परंतु यह विषय अत्यंत व्यापक है, इस कारण पश्चिमी पंडितोंके मतोंका जो सारांश विभिन्न स्थलोंपर हमने दे दिया है, उसके संबंधमें यहाँ इतना बतला देना आवश्यक है, कि गीतार्थको प्रतिपादन करनाही हमारा मुख्य काम है, अतएव गीताके सिद्धान्तोंको प्रमाण मानकर पश्चिमी मतोंका अनुवाद हमने केवल यही दिखलानेके लिये किया है कि इन सिद्धान्तोंसे पश्चिमी नीतिशास्त्रज्ञों अथवा पंडितोंके सिद्धान्तोंका यहाँ तक मेल है; और यह काम हमने इस ढंगसे किया है, कि जिससे सामान्य पाठकोंको उनका अर्थ समझनेमें कोई कठिनाई न हो। अब यह निर्विवाद है, कि इन दोनोंके बीच जो सूक्ष्म भेद हैं-और वे हैं भी बहुतही, अथवा इन सिद्धान्तोंके जो पूर्ण उपपादन या विस्तार हैं, उन्हें जाननेके लिये मूल पश्चिमी ग्रंथही देखने चाहिये। पश्चिमी विद्वान् कहते हैं, कि कर्म-अकर्मविवेक अथवा नीतिशास्त्रपर पहला नियमबद्ध ग्रंथ यूनानी तत्त्ववेत्ता अरिस्टाटलने लिखा है। परंतु हमारा मत है, कि अरिस्टाटलसेभी पहले, उनकी अपेक्षा अधिक व्यापक और तात्त्विक-दृष्टिसे, इन प्रश्नोंका विचार महाभारत एवं गीतामें हो चुका था, तथा अध्यात्म-दृष्टिसे गीतामें जिस नीतितत्त्वका प्रतिपादन किया गया है, उससे भिन्न कोई और नीतितत्त्व अबतक नहीं निकला है। "संन्यासियोंके समान रहकर तत्त्वज्ञानके विचारमें शांतिसे आयु बिताना अच्छा है, अथवा अनेक प्रकारकी राजकीय उथल-पुथल करना भला है"-इस विषयका जो स्पष्टीकरण अरिस्टाटलने किया है, वह गीतामें है; और साक्रेटीज़के इस मतकाभी गीतामें एक प्रकारसे समा- वेश हो गया है, कि "मनुष्य जो कुछ पाप करता है, वह अज्ञानसेही करता है।" क्योंकि गीताका तो यही सिद्धान्त है, कि ब्रह्मज्ञानसे बुद्धिकेसम हो जानेपर, फिर मनुष्यसे कोईभी पाप हो नहीं सकता। एपिक्यूरियन और स्टोइक पंथोंके यूनानी पंडितोंका यह कथनभी गीताको ग्राह्य है, कि पूर्ण अवस्थामें पहुँचे हुए परम ज्ञानी पुरुषका व्यवहारही नीति-दृष्टिसे सबके लिये आदर्शके समान प्रमाण है; और इन पंथवालोंने परम ज्ञानी पुरुषका जो वर्णन किया है, वह गीताके स्थितप्रज्ञके वर्णनके समानही है। इसी प्रकार मिल, स्पेन्सर, और कांट प्रभृति आधिभौतिकवादियोंका यह जो कथन है, कि नीतिकी पराकाष्ठा अथवा कसौटी यही है, कि प्रत्येक मनुष्यको सारी मानव-जातिके हितार्थ उद्योग करना चाहिये, उसकाभी गीतामें वर्णित स्थित- प्रज्ञके 'सर्वभूतहिते रतः' इस बाह्य लक्षणमें समावेश हो गया है, एवं, कांट और