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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

४. अंग १६-२०: भक्ति-माहात्म्य, वैराग्य-निरूपण व समाधि-दशा

१६२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ मनहर छंद जैसे व्योम कुम्भ कै बाहिर अरु भीतरहू, कोऊ नर कुम्भ कौ हजार कोस लै गयौ । ज्यौ ही व्योम इहा त्यौही उहा पुनि है अखड, इहां न बिछौह न तौ उहा मिलाप है भयौ ॥ कुम्भ तौ नयौ पुरानौ होइ कै बिनशि जाइ, व्योम तौ न व्है पुरानौ न तौ कछु व्है नयौ । तैसे ही सुन्दर देह आवै रहै नाश होइ, आतमा अचल अविनाशी है अनामयौ ॥३७॥ देह कै सजौग ही तै शीत लगै घाम लगै, देह कै सजौग ही तै क्षुधा तृषा पौन कौं । देह कै सजौग ही तै कटुक मधुर स्वाद, देह कै सजौग कहै खाटौ खारौ लौन कौ ॥ देह कै सजौग कहै मुख तै अनेक बात, देह कै सजौग ही पकरि रहै मौन कौ । सुन्दर देह कै सग सुख मानै दुख मानै, देह कौ सजौग गयौ सुख दुख कौन कौं ॥३८। श्रापु की प्रशसा सुनि आपु ही खुशाल होइ, आपु ही की निंदा सुनि श्राप मुरझाइ है । श्रापु ही कौं सुख मानि आपु सुख पावत है, श्रापु ही कौं दुख मानि आपु दुख पाइ है ॥ (३७) अनामयो-निर्विकार ।

!। सांख्य ज्ञान को अंग ।। [ १६३ आपु ही की रक्षा करै आपु ही की घात करै, आपु ही हत्यारो होइ गंगा जाउ न्हाइ है । सुन्दर कहत ऐसे देह ही को आपु मानि, निज रूप भूलि कै करत हाइ हाइ है ॥३६॥ ॥ इति सांख्य ज्ञान को अंग सम्पूर्णं ॥

१६४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ बिचार को अंग ॥२६॥ 'मनहर छंद प्रथम श्रवन कर चित्त एकाग्रग्र धरि, गुरु सत आगम कहै सु उर धारिये । दुतीय मनन बारबार -ही बिचार देखै, जोई कछु सुनै ताहि फेरि कै सभारिये ॥ त्रितिय ताही प्रकार निदिध्यास नीकै करि, निहसग बिचरत आपुनपौ टारिये । सो साक्षातकार याही साधन करत होइ, सुन्दर कहत द्वैत बुद्धि कौ निवारिये ॥१॥ देखै तौ बिचार कर सुनै तौ बिचार कर, बोलै तौ बिचार कर करै तौ बिचार है । खाइ तौ विचार कर पीवै तौ बिचार कर, सोवै तौ बिचार कर तौ ही तौ ऊबार है ॥ बैठै तौ बिचार कर उठै तौ बिचार कर, चलै तौ बिचार कर सोई मत सार है । देइ तो बिचार कर लेइ तौ विचार कर, सुन्दर विचार कर याही निरधार है ॥२॥ (१) द्वैतबुद्धि-भेदभाव ।

॥ विचार को अंग ॥ [ १६५ एक ही बिचार कर सुख दुख सम जानै, एक ही विचार कर मल सब धोइ है। एक ही विचार कर ससार समुद्र तिरै, एक हो विचार कर पारगत होइ है ॥ एक ही बिचार कर बुद्धि नाना भाव तजै, एक ही बिचार कर दूसरी न कोइ है। एक ही बिचार कर सुन्दर सन्देह मिट, एक ही बिचार कर एक ब्रह्म जोड है ॥२०॥ इन्दव छंद रूप कौ नाश भयौ कछु देखिये, रूप तौ रूप ही माहिं समावै । रूप कै मद्धि अरूप अखंडित, सौ तौ कहू कछु जाइ न आवै ॥ बीच अज्ञान भयौ नव तत्त्व कौ, वेद पुरान सबै कोऊ गावै । सोऊ बिचार करै जब सुन्दर, सोधत ताहि 'कहू नहिं पावै ॥४॥ भूमि सु तौ नही गंध कौ छाडत, नीर सु तौ रसते नहि न्यारौ । तेज सु तौ मिलि रूप रह्यौ पुनि, वायु सपर्श सदा सु पियारी ॥

१६६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ व्योम रु शब्द जुदे नहिं होत सु, ऐसे ही अंत करन बिचारौ । ये नव तत्त्व मिले इन तत्त्वनि, सुन्दर भिन्न स्वरूप हमारौ ॥५॥ क्षीण रु पुष्ट शरीर कौ धर्म जु, शीत हू ऊष्ण जरा मृतु ठानै । भूख तृषा गुन प्रान कौ व्यापत, शोक रु मोह उभै मन आनै ॥ बुद्धि बिचार करै निशि बासरि, चित्त चितै सु अह्र अभिमानै । सर्व कौ प्रेरक सर्व कौ साक्षी हु, सुन्दर आपुकौ न्यारौ ही जानै ॥६॥ एक ही कूप कै नीर तै सीचत, ईख अफीम ही अब अनारा । होत ऊहै जल स्वाद अनेकनि, मिष्ट कटुक्क खटा अरु खारा ॥ त्यों ही उपाधि सजोग तें आतम, दीसत आइ मिल्यौ सु बिकारा । काढि लियें जु विचार बिवस्वत, सुन्दर शुद्ध स्वरूप है न्यारा ॥७॥

॥ बिचार को अंग ॥ [ १६७ रूप परा कौ न जानि परै कछु, ऊठत है जिहिं मूल तें छानी । नाभि विषै मिलि सप्त स्वर हु, पुरुष सजौग पश्यति बखानी ।। नाद सजौग हृदै पुनि कठ जु, मद्धिमा याही बिचारतै जानीं । अक्षर भेद लिये मुख द्वार मु, बोलत सुन्दर बैखरी बानीं ॥८॥ ज्यों कोऊ रोग भयौ नर कै घट, वैद कहै यह वायु विकारा । कोऊ कहै ग्रह आइ लगे सब, पुत्ति किये कछु होइ ऊबारा ।। कोऊ कहै इहिं चूक परी कछु, देवनि दोष कियौ निरधारा । तैसे ही सुन्दर तत्रन के मत, भिन्न ही भिन्न कहै जु विचारा ॥६॥ जे विषया तम पूरि रहे, तिनकौ रजनी महिं बादर छायौ । कोऊ मुमुक्षु किये गुरुदेव, तिन्है भय युक्त जु शब्द सुनायौ ॥

१६८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ बादर दूरि भये उनके पुनि, तारनि सौ रजु सर्प दिखायौ । सुन्दर सूर प्रकाशत हो भ्रम, दूरि भयौ रजु कौ रजु पायौ ॥१०॥ कर्म शुभाशुभ की रजनी पुनि, अर्ध तमोमय अर्ध उजारी । भक्ति सु तौ यह है अरुणोदय, अन्त निशा दिन संधि बिचारी ॥ ज्ञान सु भानु सदोदित बासुरि, वेद पुरान कहैं जु पुकारी । सुन्दर तीन प्रभाव बखानत; यौ निहचै समुझै विधि सारी ॥११॥ मनहर छंद देह ई कौ आपु मानि देह ई सौ होइ रह्यौ, जडता अज्ञान तम शूद्र सोई जानिये । इंद्रिनि के व्यौपारनि अत्यन्त निपुन बुद्धि, तमो रज दुहू करि वैश्य हू प्रमानिये ॥ अ्रतहकरन माहि अहकार बुद्धि जाकै, रजोगुन बर्धमान छत्री पहिचानिये । सत्त्वगुन बुद्धि एक आतमा बिचार जाकै, सुन्दर कहत वह ब्राह्मन बखानिये । १२॥

॥ विचार को अंग ॥ [ २६६ आतमा के विषै देह आइ करि नाश होइ, आतमा अखंड सदा एकई रहतु है । जैसे साप कचुको कौं लिय रहै कोऊ दिन, जीरन उतारि करि नूतन गहतु है । जैसे द्रुम हू के पत्र फूल फल आइ होत, तिनकै गये ते द्रुम और हू लहतु है । जैसे व्योम माहि अभ्र होइ कै बिलाइ जात, एसौ सौ बिचार कछु सुन्दर कहतु है ॥१३॥ खरी की डरी सौ अंक लिखिकै विचारियत, लिखिन लिखित वह डरी घसि जात है । लेखौ समुझ्यौ है जब समुझि परी है तब, जोई कछु सही भयौ सोई रहतु है । दारु ही सौं दारु मथि पावक प्रगट भयौ, वह दारु जारि पुनि पावक मैं समात है । तैसे ही सुन्दर बुद्धि ब्रह्म कौ बिचार कर, करत करत वह बुद्धि हू बिलात है ॥१४॥ आपु कौ समुझि देखि आपु ही सकल मांहि, आपु ही मैं सकल जगत देखियतु है । जैसे व्योम व्यापक अखंड परिपूरन है, बादर अनेक नाना रूप लेखियतु है ॥ (१३) अभ्र-बादल । द्रुम वृक्ष । कचुकी-कंचली ।

२०० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जैसै भूमि घट जल तरग पावक दीप, वायु मैं बघूरा जैसे विश्व रेखियतु है। ऐसै ही विचारत विचार हू विलीन होइ, सुन्दर ही सुन्दर रहत पेखियतु है ॥१५॥ देह कौ सजौंग पाइ जीव ऐसौ नाम भयौ, घट कै सजौग घटाकाश ज्यौं कहायौ है। ईश्वर हू सकल विराट मैं विराजमान, मठ कै सजौग मठाकाश नाम पायौ है ॥ महाकाश मांहि सब घट मठ देखियत, बाहिर भीतर एक गगन समायौ है। तैसे ही सुन्दर ब्रह्म ईश्वर अनेक जीव, त्रिविध उपाधि भेद ग्रन्थन मैं गायौ है ॥१६॥ देह दुख पावै किधौं इंद्री दुख पावै किधौं, प्रान दुख पावै जब लहै न अहार की। मन दुख पावै किधौ बुद्धि दुख पावै किधौं, चित्त दुख पावै किधौ दुख अहंकार की ॥ गुन दुख पावै किधौं भूत दुख पावै किधौं, प्रकृति दुख पावै कि पुरुष आधार की। सुन्दर पूछत कछु जानि न परत ताते, कौन दुख पावै गुरु कहौ या विचार की ॥१७॥

॥ विचार को अंग ॥ [ २०१ देह कौ तौ दुख नाहि देह पच भूतनि की, इंद्रीनि कौ दुख नाहि दुख नाहि प्रान की । मन हू कौ दुख नाहि बुद्धि हू कौ दुख नाहि, चित्त हू कौ दुख नाहि, नाहि अभिमान कौ ॥ गुननि कौ दुख नाहिं सून हू कौ दुख नाहि, प्रकृति कौ दुख नाहि दुख न पुमान की । सुन्दर विचार ऐसा सिष्य सां कहत गुरु, दुख एक देखियत बोध के अज्ञान की ॥१८८। पृथ्वी भाजन अंग कनक कटक पुनि, जल हू तरंग दोऊ देखिके वखानिये । कारन कारज ये तौ प्रगट ही स्थूल रूप, ताहि नै नजर मांहि देखि करि आनिये ॥ पावक पवन व्योम ये तौ नहि देखियत, दीपक बधूरा अभ्र प्रत्यक्ष प्रमानिये । आतमा अरूप अति सूक्ष्म तें सूक्ष्म है, सुन्दर कारन तातैं देह मैं न जानिये ॥१९॥ जैन मत उहै जिनराज कौं न भूलि जाइ, दान तप शील साची भावना तैं तरिये । मन वच काय शुद्ध सबमी दयालु रहै, दोप बुद्धि दूर करि दया उर धरिये ॥

२०२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जोध नाम तब जब मन कौ निरोध होई, वौध कौ बिचार शौव आतमा कौ करिये । सुन्दर कहत ऐसे जीवत ही मुक्त होइ, मूये तै मुकति कहै तिनकौ परिहरिये ॥२०॥ योगी जागै योग साधि भोगी जागै भोग रत, रोगी जागै दुख माहि रोग की उपाधि मैं । चोर जागै चोरी कौ पहरू जागै राखिवे कौ, निरधन जागै धन पाइबे की ब्याधि मैं ॥ दिवालो की राति जगै मन्त्रवादी मन्त्र जपि, क्यौ ही मेरौ मन्त्र फुरै देखौ मन्त्र साधि मै । बिबिध उपाइ करि जागत जगत सब, सोवै सुख सुन्दर सहज की समाधि मैं ॥२१॥ योगी तू कहावै तौ तू याही योग कौ बिचारि, आतमा कौ जोरि परमातमा ही जानिये । सन्यासी कहावै तौ तू देह कौ सन्यास करि, बाहिर भीतरि एक ब्रह्म पहिचानिये ॥ जगम कहावै तौ तू एक शिव ही कौ देखि, थावर जगम सब द्वैत भ्रम भानिये । जैनी तू कहावै तौ तू दोष बुद्धि दूर करि, सुन्दर कहत जिनराज उर आनिये ॥२२॥

॥ विचार को अंग ॥ [ २०३ जती तूं कहावै तो तू एक या जनन करि, याही जत नीकौ यह आतमा कों हेरिये । तपसी कहावै तौ तू एक याही तप गाढ़ि, याही तप नीकौ मन इन्द्रीन की घेरिये ॥ भक्त तूं कहावै तौ तू चित्त एक ठौर आनि, श्वासे श्वास सोहं जाप याही माला फेरिये । सं मी कहावै तो तूं एक या संयम करि, सुन्दर कहत देह आतमा निवेरिये । २३॥ ब्राह्मन कहावै तौ तूं ब्रह्म कौ विचार कर, सत्त रज तम तीनो ताग तोरि डारिये । पंडित कहावै तौ तू याही एक पाठ पढ़ि, अंत वेद मैं कह्यौ जू ताहि कौ विचारिये ॥ ज्यौतिषी कहावै तो तू ज्योति कौ प्रकाश कर, अंतहकरन अंधकार कौ निवारिये । आगमी कहावै तौ तू अगम ठौर कौ जानि, सुन्दर कहत याही अनुभव धारिये ॥२४॥ ब्राह्मन कहावं तौ तू आपुही कौं ब्रह्म जानि, अति ही पवित्र सुख सागर मैं न्हाइये । क्षत्री तू कहावै तौ तू प्रजा प्रतिपाल कर, शीश पर एक ज्ञान छत्र कौ फिराइये ॥

२०४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ वैश्य तू कहावै तौ तू एक ही व्यापार जानि, आतमा कौ लाभ सोई अनायास पाइये । शूद्र तू कहावै तौ तू शूद्र देह त्याग कर, सुन्दर कहत निज रूप मैं समाइये ॥५५॥ ब्रह्मचारी होइ तो तू वेद को बिचार देखि, ताहि कौ समुझि जोई कह्यौ वेद श्रत है। गृही तू कहावै तौ तू सुमति त्रिया कौ व्याहि, जाकै ज्ञान पुत्र होइ ऊही भाग्यवत है ॥ वानप्रस्थ होइ तौ तू काया वनवास करि, कर्म कद मूल खाहि फल हू अनन्त है। सन्यासी कहावै तौ तू तीनो लोक न्यास करि, सुन्दर परमहंस होइ या सिधत है । २६॥ रामानदी होइ तौ तू तुच्छानन्द त्याग करि, राम नाम भज रामानन्द ही कौ ध्याइये । निंबाद्वैती होइ तौ तू कामना कटुक त्याग, अमृत कौ पान कर अधिक अघाइये ॥ मध्वाचारी है तौ तू मधुर कौ बिचार, मधुर मधुर धुनि हृदै मधि गाइये । विष्णु स्वामी होइ तौ तू व्यापक बिष्णु कौ जान, सुन्दर बिष्णु कौ भजि बिष्णु मैं समाइये ॥२७॥

॥ विचार को अंग ॥ [ २०५ देह ओर देखिये तौ देह पच भूतन कौ, ब्रह्मा अरु कीट लग देह ही प्रधान है। प्रान ओर देखिये तौ प्रान सबही कौ एक, क्षुधा पुनि तृषा दोऊ व्यापत समाँन है॥ मन ओर देखिये तौ मन कौ स्वभाव एक, सकल्प विकल्प करि सदा ई अज्ञान है। आतमा बिचार किये आतमा ई दीसै एक, सुन्दर कहत कोऊ दूसरौ न आन है ॥२८॥ ॥ इति बिचार को अंग सम्पूर्ण ॥

२०६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ ब्रह्म निष्कलांक को अंग ॥२७॥ एक कोऊ दाता गाय ब्राह्मन कौ देत दान, एक कोऊ दयाहीन मारत निंशक है । एक कोऊ तपस्वी तपस्या मांहि सावधान, एक कोऊ कामी क्रीडै कामिनी कै अंक है ॥ एक कोऊ रूपवंत अधिक बिराजमान, एक कोऊ कोढी कोढ चूवत करक है । आरसी मैं प्रतिबिब सबही कौ देखियत, सुन्दर कहत ऐसैं ब्रह्म निष्कलंक है ॥१॥ रवि कै प्रकाश ते प्रकाश होत नेत्रनि कौ, सब कोऊ शुभाशुभ कर्म कौ करतु है । कोऊ यज्ञ दान जप तप यम नेम ब्रत, कोऊ इद्रिय बसि कर ध्याँन कौ धरतु है ॥ (२) परदारा-पराई स्त्री ।

॥ निष्कलक को अंग ॥ [ २०७ कोऊ परदारा पर धन कौं तकत जाइ, कोऊ हिंसा करके उदर कौ भरतु है। सुन्दर कहत ब्रह्म माखी रूप एकरस, वाही मैं उपज कर वाही मै मरतु है।२॥ जैसे जल जंतु जल ही मैं उतपन्न होहि, जल ही मै विचरत जल के आधार है। जल ही मैं क्रीडत विविध विवहार ह.त, काम क्रोध लोभ मोह जन मैं सहार है॥ जल कौ न लागै कछु जीवन के राग द्वेष, उनही के क्रिया कर्म उन ही की [लार है। तैसे ही सुन्दर यह ब्रह्म मै जगत सब, ब्रह्म कौ न लागै कछु जगत विकार है ॥३॥ स्वदेज जरायुज अंडज उदभिज पुनि, चारि खानि तिनकै चौरासी -लख जत है। जलचर थलचर व्योमचर भिन्न भिन्न, देह पचभूतन की उपजि खपत है॥

२०८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ शीत घाम पवन गगन मैं चलत आइ, गगन अलिप्त जा मैं मेघ हू अनत हैं। तैसै ही सुन्दर यह सृष्टि एक ब्रह्म माहिं, ब्रह्म नि कलंक सदा जानत महत है ॥४॥ ॥ इति ब्रह्म निष्कलंक को अंग सम्पूर्ण ॥ (४) महत-उच्च श्रेणी के ज्ञानी पुरुष। स्वेदज- ऊष्मा से पैदा होने वाले प्राणी। जरायुज-जेर से निकलने वाले प्राणी। अंडज-अंडे से निकलने वाले। उदभिज- जमीन मे से निकलने वाले।

॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २०६ अथ आतम अनुभव को अंग ॥२८॥ इन्दव छंद है दिल मैं दिलदार सही, आंखिया उलटो कर ताहि चितइये । आब मैं खाक मैं वाद मैं आतस, सुन्दर जानि मैं जानि जनइये ॥ नूर मैं नूर है तेज मैं तेज है, ज्योति मैं ज्योति मिलै मिल जइये । क्या कहिये कहतै न बनै कछु, जौ कहिये कहतै हि लजइये ॥१॥ जासौ कहू सब मैं वह एक सौं, तौ कहै कैसौ है आखि दिखइये । जौ कहू रूप न रेख तिसै कछु, तौ सब झूठ के मानि कहइये ॥ जौ कहू सुन्दर नैननि माझि, तौ नैनहू बैन गये पुनि कहइये । क्या कहिये कहते न बनै कछु, जौ कहिये कहते ही लजइये ॥२॥ (१) दिलदार-प्रियतम, परमेश्वर । आब पानी । खाक-पृथ्वी । वाद-वायु । आतस-अग्नि, तेज ।

२१० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ होत बिनोद जु तौ अभिअन्तरि, सो सुख आपु मैं आपु ही पइये । बाहिर कौ उमग्यौ पुनि आवत, कठ तै सुन्दर फेरि पठइये ॥ स्वाद निबेरै निबेर्यौ न जात, मनौ गुड गू गे हि ज्यौं नित खइये । क्या कहिये कहते न बनै कछु, ' जौ कहिये कहतैं ही लजइये ॥ ॥ व्योम सौ सौम्य अनत अखंडित, आदि न अंत सु मध्य कहा है । को परिमान करै परिपूरन, द्वैत अद्वैत कछू न जहा है ॥ कारन कारज भेद नही कछु, आपु मैं आपु ही आपु तहा है । सुन्दर दीसत सुन्दर माहि सु, सुन्दरता कहि कौन उहा है ॥४॥ (३) अभिअन्तर-भीतर । (४) व्योम-आकाश । सौम्य-व्यापक । कारज-कार्य ।

॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २११ प्रश्नोत्तर एक कि दोइ न एक न दोइ, उही कि इही न उही न इही है । शून्य कि थूल न शून्य न थूल, जही कि तही न जही न तही है ॥ मूल कि डाल न मूल न डाल, वही की मही न वही न मही है । जीव कि ब्रह्म न जीव न ब्रह्म, तौ है कि नही कछु है न नही है ॥५॥ एक कहू तौ अनेक सौ दीसत, एक अनेक नही कछु ऐसाँ । आदि कहू तिहि अंतहू आवत, आदि न अंत न मध्य सु कैसाँ ॥ गोपि कहू तौ अगौपि कहा यह, गोपि अगोपि न ऊभौँ न वैसाँ । जोइ कहू सोइ है नही सुन्दर, है तौ सही पर जैसी की तैसौ ॥६॥ मनहर छंद एक कै कहै जौ कोऊ एक ही प्रकाशत है, दोइ कै कहे जौ कोऊ दूसरौ ऊ देखिये । (६) गोपि-गुप्त, गोपनीय ।