सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
अ० १५ ]
सूत्रस्थानम्
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चिकित्सा—स्थूलता उत्पन्न हो जाने पर शिलाजतु, गुग्गुलु, गोमूत्र, त्रिफला, लोहभस्म, रसोत, मधु, जौ, मूत्र, कोरदूषक (कोदो), श्यामक (सोवक) उद्गालक (वनकोद्गालक), गवेधुक आदि लुद्र धान्यों का, विरक्षण (मेद-नाशकर-रुक्ष) तथा छेदनीय (छोतों का शोधन करनेवाले) द्रव्यों का विधिपूर्वक उपयोग करना चाहिये। एवं व्यायाम तथा लेखन वस्तियों का१ उपयोग करना चाहिये ॥३२॥
तत्र पुनर्वातिलाहारसेविनोऽतिव्यायामव्यायाध्ययन-भयशोकध्यानरात्रिजागरणपिपासातुक्तुक्वायात्पाशनप्रभृति भिरुपशोषितो रसधातुः शरीरमननुकामन्नलपत्तवान्नप्रीणाति, तस्मादतिकार्यं भवति, सोऽतिक्रुशः क्षुत्पिपासाशोतो-ण्णावातवर्षभारादानेऽवसहिष्णुर्वातरोगप्रायोऽल्पप्राणश्च क्रियासु भवति, श्वासकासशोषण्णोद्वादिगनिन्सादगुल्मरक्तपित्तानामन्यतममासाद्य मरणमुपयाति, सर्व एव चास्य रोगा बलवन्तो भवन्त्यल्पप्राणत्वात्, अतस्तस्योत्पत्तिहेतुं परिहरेत्। उत्पन्ने तु पयस्याश्वगन्धाविदारिगन्धाश्रतावरी-बलातिबलानागबलानां मधुराणामन्यासां चौषधीनामुपयोगः क्षीरदधिघृतमांसशालिपष्टिकयवगोधूमानां च, दिवा-स्वप्नब्रह्मचर्यन्यायामबृंहणवस्तुपयोगश्चेति ॥३२॥
कार्यं—वातप्राय-अतिरुक्ष आहार के सेवन करने से, अतिव्यायाम से, अतिमैथुन से, पढ़ने से, मय से, शोक-चिन्ता से, रात में जागने से, प्यास-भूख से, कषाय रस से, या थोड़ा खाने आदि कारणों से रस धातु का उपशोषण हो जाता है। यह शुष्क रस धातु शरीर में फैलता हुआ-शरीर का पोषण नहीं करता। इसलिये शरीर में अतिकृशता रहती है। यह अतिकृशता पुरुष भूख-प्यास-शीत-गरमी-वर्षा भार उठाने में अस-हनशील, वातरोग-बहुल और क्रियाओं में अल्पशक्ति होता है। श्वासकास-शोषण-प्लीहा-उदर-अग्निसाद-मन्दता गुल्म, रक्तपित्त; इनमें से किसी एक रोगसे आक्रान्त होकर मृत्यु को प्राप्त होता है। अल्पशक्ति होने के कारण इस पुरुष के सम्पूर्ण रोग बल-वान होते हैं। इसलिये कृशता को उत्पन्न करनेवाले सब कारणों को छोड़ देना चाहिये।
कृशता उत्पन्न होने पर—विदारीकन्द, असगन्ध, पयस्या (क्षीरकाकोली), विदारी, शतावरी, खरेंटी, अतिबला, नागबला (गंगेरन) अन्य मधुर औषधियों का, दूध, घी मांसरस, शालि-
१ लेखन वस्तियाँ— “त्रिफलावाध-गोमूत्र-शौद्र शार-समन्वितः । उषकादि प्रतिवाया वस्तयो लेखनाः स्मृताः ॥ (२) गुरु चापतर्पणं श्रेष्ठं स्थूलानां कर्षणं प्रति । वातध्वान्यश्वपानानि ह्लेष्ममेदोहराणि च ॥ रुक्षोण्वस्तयस्तीक्ष्णा, रुक्षान्युद्वार्तनानि च । प्रजागरं व्यवयं च व्यायामं चित्तनानि च ॥ चरक० ॥
धान्य (हेमन्तधान्य), साठीधान्य, जौ और गोहूँ का; दिन में सोना, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, बृंहण वस्तियों१ का उपयोग करना चाहिये ॥३३॥
यः पुनरुभयसाधारणान्यासेवेत तस्यान्नरसः शरीर-मनुकामन् समान् धातूमुपचिनोति, समधातुत्वान्मध्य-शरीरो भवति सर्वक्रियासु समर्थः क्षुत्पिपासाशोतोष्णकात्-वर्षातपसहो बलवर्धश्च; स सततमनुपालयितव्य इति ॥३४॥
जो मनुष्य समान (न बहुत स्निग्ध, न रुक्ष), स्वस्थवृत्त में कहे साठी लाल चावल, अनार आदि पदार्थों का सेवन करता है, उस व्यक्ति का अन्नरस शरीर में फैलकर समान मात्रा में सब धातुओं को बढ़ाता है। धातुओं के समान होने से मध्य-शरीर रहता है। इसलिये सब क्रियाओं में सामर्थ्यवान्-भूख-प्यास शीत-उष्ण-वर्षा-धूप को सहन करनेवाला और बलवान् होता है। इस मध्यशरीर को सदा स्वस्थवृत्त के अनुपालन द्वारा रक्षा करनी चाहिये ॥३४॥
भवन्ति चात्र— अत्यन्तगहितावेतो सदा स्थूलकृशौ नरौ । श्रेष्ठो मध्यशरीरस्तु कृशः स्थूलात्तु पूजितः ॥३५॥
कहा भी है— ये स्थूल एवं कृश दोनों बहुत निन्दित हैं। मध्य शरीर श्रेष्ठ है। स्थूल से कृश व्यक्ति श्रेष्ठ हैं। (क्योंकि स्थूल पूर्व-संशो-धन-संशमन क्रिया को सहन नहीं कर सकता है, तथा रोग बलवान् रहता है) ॥३५॥
दोषः प्रकृपितो धातून् क्षययत्यात्मतेजसा । इन्द्रः स्वतेजसा बह्विरखागतमिवोदकम् ॥३६॥ कुपित दोष अपनी शक्ति के कारण (पित्त-कटु उष्ण गुण से, वायु शोषण गुण से, कफ-मार्ग निरोध से), धातुओं का हास करते हैं। जिस प्रकार प्रदीप्त अग्नि अपने तेज द्वारा थाली में रखले पानी का हास करती है ॥३६॥
वैलक्षण्याच्छरीराणामस्थायित्वात्तथैव च । दोषधातुमलातां तु परिमाणं न विद्यते ॥३७॥
१ बृंहण वस्तियाँ— बृंहणद्रव्यतः स्वाशस्तत्तुक्तकस्तेहसैन्धवो । युक्ताः खजप्रमथिता वस्तयो बृंहणा मताः ॥ (२) ह्रिता मांसरसाः तस्मै पयांसि च घृतानि च । स्तानानि वस्तयोऽभ्यंगाः तर्पणातर्पणारूच ये ॥ स्वप्नो हर्षः सुखशय्या मनसो निवृत्तिः शमः । नवाक्षानि नवं मञ्चं प्रास्थानूपोदका रसाः ॥ अचिन्तनाच्च कार्याणां ध्रुवं सन्तर्पणेन च । स्वप्नप्रसंशाच्च नरो बराह इव पृथ्यति ॥चरका॥
६२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १६ ]
वैलक्षण्यात्—विषहृशता के कारण (वातादि प्रकृति, रस रक्तादि की मिश्रता-छोटे-बड़े आकार के कारण), अस्थायित्वात् अस्थिरता के कारण (अस्थिरता दो प्रकार की है—नित्यग-आवस्थिक), पुरुषों के दोषधातु एवं मल का पलादि मान नहीं है। इनका तोल नहीं हो सकता। “तत्परं प्रमाणमभिज्ञेयम्”। चरक ॥ ३७ ॥
एषां समस्तं यच्चापि भिषगभिर्बध्दार्थते।
न तत् स्वास्थ्याहते शक्यं वक्तुमन्येन हेतुना ॥३३॥
वैद्यलोग दोष-धातु-मल की जो समता कहते हैं, वह समता-स्वास्थ्य के बिना किसी अन्य कारण द्वारा नहीं कही जा सकती। स्वास्थ्य से ही इनकी समता की परीक्षा होती है ॥३३॥
दोषादीनां त्वसमतामनुमानेन लक्ष्येत।
अप्रसन्नोन्दिश्यं वीक्ष्य पुरुषं कुशलो भिषक् ॥३६॥
दोष-धातु मल इनकी असमानता (क्षय, वृद्धि) को अनुमान द्वारा जानना चाहिये। पुरुष को अप्रसन्न इन्द्रियोवाला देखकर बुद्धिमान् वैद्य अनुमान द्वारा दोषों की असमानता का ज्ञान करे ॥३६॥
स्वस्थस्य रक्षणं कुर्यादस्वस्थस्य तु बुद्धिमान्।
क्षपयेद् बृंहयेच्छचापि दोषधातुमलान् भिषक्।
तावद्यानद्वारोगः स्यादेतत् साम्यस्य लक्षणम् ॥४०॥
स्वस्थ के दोष-धातु-मलों को सदा रक्षा करनी चाहिये। अस्वस्थ के बड़े दोष-धातु-मल का ह्रास करना चाहिये, ह्रास हुए दोष-धातु-मल को बढ़ाना चाहिये। यह कार्य तब तक वैद्य को करना चाहिये—जब तक कि रोग युक्त पुरुष नीरोग हो, यही दोषादि के साम्य लक्षण हैं ॥४०॥
समदोषः समागनिश्च समधातुमलक्रियः।
प्रसन्नान्मोन्दिश्यमानः स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥४१॥
स्वस्थ पुरुष का लक्षण—समान दोषवाला, समान (न मन्द, न तीक्ष्ण, न विषमगनि), अगनिवाला समान धातु, समान मलवाला, समान क्रियावाला, प्रसन्न आत्मा इन्द्रिय-मनवाला पुरुष स्वस्थ कहा जाता है।
वि० मन्तव्य—सम शब्द का अर्थ है—उचित परिमाण में सम या स्वाभाविक परिमाणवाला। क्रिया का अर्थ है शरीर के अन्त्र, हृदय, क्रुष्ण एवं यकृत आदि का व्यापार या काम।
इति सुश्रुतसंहितायां स्वस्थाने दोष-धातुमलक्षयवृद्धि-विज्ञानीयो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥
षोडशोऽध्यायः
अथातः कर्णव्यध्वन्यध्वन्यविधिर्मध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
अथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे ‘कर्णव्यध्वन्यध्वन्य विधि’ नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥
रक्षाभूषणनिमित्तं बालस्य कणौ विध्येते। तौ षष्ठे मासि सप्तमे वा शुक्ले पञ्चे प्रगस्तेषु तिथिकरणमुहूर्त-नक्षत्रेषु कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनं धात्र्यङ्के कुमारधराङ्के वा कुमारमुपवेश्य बालक्रीडनकैः प्रलोभ्याभिसान्त्वयन् भिषग्वा महस्तेनाकृष्य कर्णं दैवकृते छिद्र आदित्यकराव-भासिते शनैः शनैर्दक्षिणहस्तेनर्जु विध्येत, प्रतनुर्क सूच्या, बहलमारया, पूर्व दक्षिणं कुमारस्य, वामं कुमार्याः, ततः पिचुवर्ति प्रवेशयेत् ॥३॥
बालक के कानों को दो कारणों से बींधा जाता है। एक-रक्षा के कारण (वृद्धिरोग से रक्षा करने के उद्देश्य से१)), और दूसरा-आभूषण पहिनाने के उद्देश्य से। कान का बींधना—छठे या सातवें महीने में—शुक्लपक्ष में—प्रशस्त-तिथि प्रशस्त कर्ण एवं प्रशस्त मुहूर्त तथा नक्षत्रों में—मंगल—स्वस्तिवाचन करके, कुमार को परिचारिका की गोद में या कुमार को रखनेवाली की गोद में बिठाकर-खिलौने से प्रलोभित करके—पुचकारते हुए—वैद्य वामहस्त से कान को खींचकर-सूर्यकिरणों से प्रकाशित स्वाभाविक छिद्र में (जहाँ पर बसा कम होती है) दक्षिण हाथ से धीरे धीरे सीधा छेद करे। बींधते समय सूर्य को सीधा चलाना चाहिये। पतले कान को सूर्य से बींधना चाहिये—मोटे कान को आर से (जिससे कि चमारा सीते हैं) बींधे। कुमार का प्रथम दक्षिण कर्ण बींधना चाहिये, पीछे वाम, कुमारिका का प्रथम वाम, फिर दक्षिण कर्ण बींधना चाहिये। बींधने के पश्चात् कान में पिचुवर्ति (कपड़े की नरम बत्ती) लगा देनी चाहिये।
वि० मन्तव्य—रक्षाभूषण निमित्तं……अर्थात् बालग्रहों से रक्षा के लिये। दैवकृत छिद्र कान की पेपड़ी को तानने पर जहाँ से सूर्य की धूप का सा उजाला दिखाई पड़े-प्रतीत हो वह दैवकृत छिद्र
१ आत्र उत्तरने पर वा अण्डकोषों के विकारों (ब्रन्धन) में अब भी कान को बींधने को प्रथा है। इससे आराम होता है। आत्र स्वयं भी कहेंगे—
“व्यत्यासाद् वा शिरों विध्येत् आत्रवृद्धिनिवृत्तये”। सुश्रुत।
(२) कुमारतन्त्र में— कर्णव्यध्वे कृते बालो त-ग्रहैरभिभूयते। भूष्यतेऽस्य मुखं तस्मात् कार्यस्तत् कर्णव्योधः ॥ यद्यपि कर्णव्यध्वे ब्रणिनि काले रक्षोभयं भवति, तथाऽपि तदल्पकालं प्रतिकर्तव्यं च ॥ तेन चिरकालरसायै तदल्पं व्यजत एव। भानुमती।
अ० १६ ]
सूत्रस्थानम्
६३
माना जाता है और वहाँ वेध किया जाता है । इस प्रदेश में वेध होने पर रक्त नहीं निकलता अथवा बहुत थोड़ा निकलता है ।
शोणितबहुत्वेन वेदनया चान्यदेशविद्वमिति जानीयात्, निरुपद्रवतया तद्देशविद्वमिति ॥४॥
यदि रक्त अधिक आये एवं वेदना बहुत हो तो समझना चाहिये कि दैवकृत छिद्र में छेद नहीं हुआ । और यदि किसी प्रकार का उपद्रव न हो तो समझना चाहिये स्वाभाविक छेद में विधा है ॥४॥
तत्राज्ञेन यदक्षया विद्व्वासु सिरासु कालिकासर्परिकालोहितिकासूपद्रवा भवन्ति । तत्र, कालिकायां ज्वरो दाहः श्वयशुर्वेदना च भवति, सर्परिकायां वेदना ज्वरो ग्रन्थयश्च, लोहितिकायां मन्यास्तम्भापतानकशिरोग्रहकर्णशूलानि भवन्ति । तेषु यथास्वं प्रतिकुर्वीत ॥५॥
कर्णवेध कर्म में—अनजान वेधक द्वारा अथवा दैवयोग से—कालिका सर्परिका अथवा लोहितिका संज्ञक सिराओं में वेध हो जाता है तो उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं या हो सकते हैं, यथा—कालिका सिरा का वेध हो जाने पर ज्वर, दाह, शोथ और वेदना होती है, सर्परिका का वेध होने पर—वेदना, ज्वर तथा सिराग्रन्थियाँ होती हैं और लोहितिका का वेध होने पर—मन्यास्तम्भ, अपतानक, शिरोग्रह, तथा कर्णशूल आदि हो जाते हैं । इन उपद्रवों में यथोचित उपचार करे ।
सिराओं की उक्त संज्ञा सम्भवतः—कौमार भृत्य के अनुसार है । वर्त्तमान चरक सुश्रुत में अन्यत्र इनकी चर्चा नहीं है । केवल अष्टाङ्गहृदय उत्तर अ० १ में—कालिका, सर्परी तथा रक्ता नाम देकर चर्चा की गई है । इस अध्याय में कर्ण-वेध की विधि अधिक स्पष्ट है । पाठक देखें ॥५॥
क्लिष्टजिह्वाप्रस्तसूचीवृषाद्वा गाढतरवर्तिःवाद्योषसुदायाद्प्रशस्तवृषाद्वा यत्र संरम्भो वेदना वा भवति तत्र वर्त्तिसुपहृत्यासु सधुक्केरण्डमूलमञ्जिष्टायवतिलकत्कैर्मधुघृतप्रगढेरा लेपयेत्तावद्यावत् सुरुढ इति, सुरुढं चैन पुनर्विध्येत्, विधानं तु पूर्वोक्तमेव ॥६॥
क्लिष्ट ( अमनोज-खुरदरी ), जिह्वा ( टेड़ी ), अप्रशस्त ( गुणहीन ) सूई से बीघने के कारण या अधिक मोटी बत्ती से अथवा दोष प्रकोप से या दैवकृत छिद्र में न विधने से—जहाँ पर संज्ञन या वेदना हो तो बत्ती को निकालकर—मधुक ( मुलहडी ), एरण्डमूल, मजीठ, जो और तिल, इनके कल्क को मधु एवं घी में मिलाकर गाढ़ा लेप कर देना चाहिये । यह लेप तब तक बरतना चाहिये जब तक कि भली प्रकार भर न जाये । भली प्रकार रोहण होने पर फिर इसको बीघना चाहिये । बीघने की विधि पूर्व की भाँति है ॥६॥
तत्र सम्यग्विद्वमासतैलेन परिषेचयेत्, ज्यह्यात्स्यह्याव वर्त्तिसूलतरां दद्यात्, परिषेकं च तमेव ॥७॥
भली प्रकार से दैवकृत छिद्र में विधने पर—अपक्व तेल ( तिलों को पीसकर निकाला तेल ) द्वारा परिषेचन करना चाहिये । प्रत्येक तीसरे दिन बत्ती अधिक मोटी कर देनी चाहिये । बत्ती का आमतैल से परिषेक करते रहना चाहिये ॥७॥
अथ व्यपगतदोषोपद्रवे कर्णे वर्धनार्थं लघु वर्धनकं कुर्यात् ॥८॥
दोष एवं उपद्रवों के शान्त होने पर कानों के छिद्रों को लम्बा करने के लिये ( सौन्दर्य दृष्टि से ) 'लघुवर्धनक' ( दोष विशेष के कारण—अपामार्ग, नीम, कपास आदि लकड़ियों से या सीसक आदि धातुओं से बने—हल्के-छोटे छल्ले बालियाँ ) पहिनाने चाहिये । ( मार के कारण कान नीचे लटकने लगते हैं ) ॥८॥
एवं विवर्धितः कर्णद्विष्यते तु द्विधा नृणाम् । दोषतो वाऽभिधाताद्वा सन्धानं तस्य मे शृणु ॥९॥
इस प्रकार से बढ़ाए हुए पुरुषों के कान, वातादि दोषों से उत्पन्न रोगों से या गिरने आदि से चोट लगने पर—फटकर दो भाग हो जाते हैं । इनको जोड़ने की विधि मुझ से सुनो ॥९॥
तत्र समासेन पञ्चदशकर्णबन्धाकृतयः । तद्यथा—नेमिसन्धानक उत्पलमेघक वल्लूरक आसङ्गिमो गण्डकर्ण आहार्यो निर्वेधिमो व्यायोजिमः कपाटसन्धिकोऽर्धकपाटसन्धिकः संक्षिमो हीनकर्णो वल्लीकर्णो यष्टि-कर्णः काकोष्ठक इति । तेषु, पृथुलायतसमोभयपालिन्मिसन्धानकः, वृत्तायतसमोभयपालिन्तल्लूरकः, हस्तवृत्तसमोभयपालिन्वल्लूरकः, अभ्यन्तरदीर्घकपालिरासङ्गिमः, बाह्यदीर्घकपालिर्गण्डकर्णः, अपालिन्भयतोऽप्याहार्यः, पीठोपमपालिन्भयतः क्षीणपुत्रिकाश्रितो निर्वेधिमः, स्थूलाणुसमविषमपालिन्योयोजिमः, अभ्यन्तरदीर्घकपालिरितराल्पपालिः कपाटसन्धिकः, बाह्यदीर्घकपालिरितराल्पपालिर्धकपाटसन्धिकः । तत्र दशैते कर्णबन्धविकल्पाः साध्याः, तेषां स्वनामभिरैवाकृतयः प्रायेण व्याख्याताः । संक्षिमाद्यः पञ्चासाध्याः तत्र शुष्कशष्कुलिहस्तन्त्रपालिरितराल्पपालिः संक्षिप्तः, अन्विष्टानपालिः पर्यन्तयोः क्षीणमांसो हीनकर्णः, तनुविषमाल्पपालिर्वल्लीकर्णः प्रथितमांसस्तब्धसिराततसूदमपालियष्टि-कर्णः, निर्सांससंक्षिमात्राल्पशोणितपालिः काकोष्ठक इति । बद्धेष्वपि तु ओफ्दाहरागपाकपिडकासावयुक्ता न सिद्धिसुपथान्ति ॥१०॥
संक्षेप से कर्णबन्धाकृतियाँ पन्द्रह हैं । यथा—नेमिसन्धानक, उत्पलमेघक, वल्लूरक, आसंगिम, गण्डकर्ण, आहार्य, निर्वेधिम, व्यायोजिम, कपाटसन्धिक, अर्धकपाटसन्धिक, संक्षिम, हीनकर्ण,
६४
मुश्रुतसंहिता
[ अ० १४ ]
वल्लीकर्ण, यष्टिकर्ण और काकोष्ठक। इनमें—जो पालि (कर्णपालि)—पुथुल (विस्तीर्ण), आयात (दीर्घ), सम (तुल्य)—परस्पर होती हैं—वहाँ नेमिसन्धानक बन्ध बरतें। जिसकी दोनों पाली गोल, दीर्घ और समान हो—उसको उत्पल्लमेयक बंधवावें। जिसकी दोनों कर्णपालियाँ छोटी, गोल, एवं परस्पर समान हों वहाँ वल्लूरक बंध बरतें। जिसकी एक कर्णपाली अन्दर एवं लम्बी हो वहाँ आसंगिम बन्ध बरतें। जिनकी एक पाली बाहर एवं लम्बी हो वहाँ मण्डकर्ण बन्ध, दोनों पाली न हों (या अल्प हो) वहाँ आहार्य; जिसकी पालि मूल से ही लिंग्न हो—सपाट हो, कर्णपुत्रिका के ऊपर आश्रित हो, वहाँ निर्वेधिम; जिसकी एक पाली का भाग स्थूल हो, दूसरी छोटी हो, एक समान और दूसरी विषम हो, वहाँ ग्यायोजिम; जिसकी एक पाली अन्दर—लम्बी हो और दूसरी पाली अल्प हो, वहाँ कपाटसन्धिक बाँध। जिसकी पाली का बाहर का भाग लम्बा हो और दूसरा अल्प हो वहाँ अर्धकपाटसन्धिक बन्ध प्रयोग करना चाहिये। ये दस कर्णबन्ध के भेद साध्य हैं। प्रायः इनकी आकृतियाँ इनके अपने नामों से ही स्पष्ट हैं। संक्षिप्त आदि पाँच बन्धन असाध्य हैं। तथापि इनमें बाह्य पाली का अधिष्ठान (शष्कुली) शुष्क हो तथा दूसरी कर्णपाली छोटी हो तो संक्षिप्त बन्ध करना चाहिये। जिसमें पाली का अधिष्ठान न हो और मण्ड के बाह्य पार्श्व में मांस क्षीण हो तो हीनकर्ण बन्ध बरतना चाहिये। पतली, विषम अल्पपाली में वल्लीकर्ण; अथित मांस स्तम्भ सिरायुक्त सूक्ष्म पालि में यष्टिकर्ण बरतना चाहिये। मांस रहित, रक्त की कमीवाली संक्षिप्त पालि में काकोष्ठक बन्ध बरतना चाहिये। कर्णबन्धन में शोक, दाह, रोग, पाक, पिडिका एवं स्नायु होने से—चिकित्सा करने पर भी असाध्य रहते हैं ॥१०॥
संवन्ति चात्र—
यस्य पालिद्वयमपि कर्णस्य न भवेदिति।
कर्णपीठं समे मध्ये तस्य विद्ववा विवर्धयेत् ॥११॥ कहा भी है—
जिस पुरुष के कानों में दोनों पालि न हों उसके कर्णपीठ को मध्य में बाँधकर बढ़ाना चाहिये। (कर्णपुत्रिका—Tragus, Anti Tragus) ॥११॥
बाह्यायामिह दीर्घायां सन्धिराभ्यन्तरो भवेत्।
आभ्यन्तरायां दीर्घायां बाह्यसन्धिरुदाहृतः ॥१२॥
जिस पुरुष की वाम पाली लम्बी हो, उसकी आभ्यन्तर पाली में सन्धि करनी चाहिये। इस प्रकार प्रथम कपाटसन्धिक, दूसरा—अर्धकपाट-सन्धिक बन्धन होता है ॥१२॥
एकैव तु भवेत् पालिः स्थूला पृथ्वी स्थिरा च या ।
तां द्विधा पाटयित्वा तु छिन्त्वा चोपरि सन्धयेत् ॥१३॥
यदि एक ही मोटी, लम्बी और हृद पाली हो (दूसरी पाली न हो) तो इसको बीच से दो भाग करके दूसरी तरफ जोड़ देना चाहिये ॥१३॥
गण्डादुत्पाट्य मांसेन सानुबन्धेन जीवता ।
कर्णपालीमपालेस्तु कुयीन्तिलिख्यशास्त्रवित् ॥१४॥
गण्ड प्रदेश में संलग्न जीवित मांस को गण्ड प्रदेश से उखाड़कर—पाली रहित पुरुष में—शास्त्रवित् वैद्य कर्णपाली को बनाये (Rexo Plastic Operation) ॥१४॥
अतोऽन्यतमं बन्धं चिकीर्षुरमोपहरणीयोक्तोपसंभूतसंभारं विशेषतश्चात्रोपहरेत् सुरामण्डं क्षीरमुदकं धान्याम्लं कपालचूर्णं चेति । ततोऽङ्गनां पुरुषं वा प्रथितकेशान्तं लघु मुक्तबन्तमामैः सुपरिगृहीतं च कृत्वा, बधमुपधार्य, छेद्यभेद्यलेख्यव्यवधानैरुपपन्नेरुपपात्र, कर्णशोणितमवेदय दुष्टमदुष्टं चेति । तत्र वातदुष्टे धान्याम्लोष्णोदकाभ्यां पिप्तदुष्टे शीतोदकपयोभ्यां श्लेष्मदुष्टे सुरामण्डोष्णोदकाभ्यां प्रक्षाल्य कर्णौ, पुनरवल्लिख्यानुन्ततमहीनमविषं च कर्णसन्धि सन्निवेश्य, स्थितरक्तं संदध्यात् । ततो मधुघृतेनाभ्यञ्ज्य, पिचुप्रोतयोरन्यतरेणावगुण्ठ्य, सूत्रेणानवगाढमनतिगिथिलं च बद्ध्वा, कपालचूर्णनावकीर्थाचारिकमुपदिशेत्, द्विगणीयोक्तं च विधानेनोपचरेत् ॥१५॥
इन उपरोक्त बन्धनों में से किसी एक बन्धन को करने की इच्छा से 'अग्नीपहरणीय' अध्याय में वर्णित आवश्यक वस्तुसमूहों को, खासकर इस कार्य में सुरा, मण्ड दूध, पानी धान्याम्ल और कपालचूर्ण (घड़े के ठीकरे का या शिर की अस्थियों की मस्म—दोनों ही उपयुक्त हैं) को एकत्रित करना चाहिये। इसके अनन्तर स्त्री अथवा पुरुष—दोनों के बालों को पीछे बाँधकर, थोड़ा सा लघु हल्का भोजन कराके, विश्वस्त पुरुषों द्वारा पकड़वाकर बन्धन का निश्चय कर छेद्य, भेद्य, लेख्य, व्यधनकार्यों को करके—कान के दूषित या अदूषित रक्त की परीक्षा करके—कानों का फिर एक बार अवलेखन करके कर्णसन्धि को न ऊँचे, न नीचे और न विषम रखकर—रक्त निकलना बन्द होने पर जोड़ देना चाहिये। वात से दूषित रक्त में—धान्याम्ल एवं उष्णोदक से, पिप्त से दूषित रक्त में—शीतोदक एवं दूध से; कफ से दूषित रक्त में—सुरा-मण्ड एवं उष्णोदक से घोना चाहिये। सन्धि करने के अनन्तर मधु एवं घी लगाकर रुई या कपड़े—किसी एक से द्वापकर—घाई (पट्टी से) से—न तो बहुत कसकर न बहुत ढीला बाँध देना चाहिये। ऊपर से कपाल चूर्ण छिड़क देना चाहिये। इसके अनन्तर—आहार-विहार को समझा देना चाहिये। और द्विगणीय अध्याय में कहे गये आलेपादि बरतने चाहिये ॥१५॥
अ० १६ ] ६
सूत्रस्थानम्
६५
भवति चात्र—
विषद्वयं दिवास्वप्नं व्यायाममतिभोजनम् ।
व्यायाममग्निसंतापं वाक्यश्रमं च विवर्जयेत् ॥ १६ ॥
कहा भी है—
विषद्वय ( विषद्वय—रगड़ना हिलाना—डुलाना ), दिन में सोना, व्यायाम, अतिभोजन, मैथुन, आग का सेकना, बोलना, ये कार्य परित्याग कर देने चाहिये ॥ १६ ॥
न चासुद्धरक्तमतिप्रवृत्तरक्तं क्षीणरक्तं वा संदध्यात् । स हि वातदुष्टे रक्ते रुद्धोऽपि परिपुटनवान् , पित्तदुष्टे दाहपाकरागवेदनावान् , रल्लेखमदुष्टे स्तब्धः कण्डूमान् , अतिप्रवृत्तरक्ते श्यावशोफवान् , क्षीणोऽल्पमांसो न वृद्धि- मुपैति ॥ १७ ॥
असुद्धरक्त, अधिक रक्तस्त्राव होने पर, रक्त के न निकलने पर—सन्धान नहीं करना चाहिये । क्योंकि वात से दूषित रक्त की अवस्था में पड़ी बाँधने पर—परिपोट रोग होता है । पित्त से दूषित रक्त की अवस्था में—दाह, पाक, लालिमा एवं वेदना होती है । कफ से दूषित रक्त की अवस्था में—जड़ता एवं कण्डू होती है । रक्त के अधिक खतित होने पर सन्धान करने से क्रुण्णता और सूजन होती है । रक्त के क्षीण होने पर सन्धि करने से—अल्प मांस—पुनः वृद्धि को प्राप्ति नहीं होता ॥ १७ ॥
(आमतैलेन त्रिरात्रं परिषेचयेत् , त्रिरात्राच्च पिचुं परिवर्तयेत् ।) स यदा सुरुद्धो निरुपद्रवः सवर्णा भवति तदैतं शनैः शनैरभिवर्धयेत् । अतोऽन्यथा संरम्भदाहपाकरागवेदनावान् , पुनरिलक्षते वा ॥ १८ ॥
आमतैल द्वारा तीन दिन तक परिषेचन करना चाहिये । एवं प्रत्येक तीसरे दिन पिचुं बदलते रहना चाहिये । जिस समय व्रण भली प्रकार भर जाये, किसी प्रकार का उपद्रव न रहे, त्वचा के समान व्रण का रंग आ जाये, तब फिर इस कर्ण को धीरे २ बढ़ाना चाहिये । इसके विपरीत करने से दाह, पाक, लालिमा, वेदना होती है, अथवा फिर फट जाता है ॥ १८ ॥
अथास्याप्रदुष्टस्याभिवर्धनार्थसम्भ्यङ्गः । तद्यथा—गो- धामृतुदविकिरान्नपौदकवसामज्जानो पयः सपिस्तैलं गौर- सर्पपजं च यथालाम् संभूत्वाकीर्लकबलातिबलानन्तापा- मार्गाश्वगन्धाविदाशिगन्धाक्षीरशुक्लजलशूकमधुरवर्गपय- स्याप्रतिवापं तैलं वा पाचयित्वा स्वतनुगुप्तं निदध्यात् १९
१ कविराज हाराणचन्द्र जी इसको पद्य में लिखते हैं । यथा— “आमतैलपरिषेकं त्रिरात्रमत्रचारयेत् । ततस्तैलेन संसृष्टं व्यहादपनयेत् पिचुम् ॥” यह पाठ—“विषद्वयं दिवास्वप्नं—इस श्लोक के साथ दिया है।
अदूषित कान को बढ़ाने के लिये अभ्यङ्ग कहते हैं । यथा— गोधा, प्रतुद ( बटेर आदि ), विष्किर ( कुम्कुद आदि ), आनू ( वराह, महिषादि ), औदक ( रोहित-मत्स्यादि ), इनकी बसा एवं मज्जा को दूध, घी और श्वेत सरसों का तैल— इनमें से जितनी वस्तुयें मिल सकें उनको लेकर आक, श्वेत फूल का आक, बला, अतिबला, सारिवा, अपामार्ग, असगन्ध, शालपर्णी, क्षीरविदारी, जलशूक—शैवाल, रसविशेष विज्ञानोय अध्याय में कहे मधुरवर्ग, पयस्या ( क्षीरविदारी ), इनके निक्षेप से तैल पकाकर गुप्तस्थान में रख देना चाहिये ॥ १९ ॥
स्वेदितोन्मदिर्तं कर्णं स्नेहेनैतैन योजयेत् ।
अथासुपद्रवः सम्यग्वलवांश्च विवर्धते ॥ २० ॥
कान को प्रथम स्वेदन देकर फिर इस तैल के साथ मर्दन करना चाहिये । इस प्रकार करने से कान उपद्रव रहित होकर बढ़ता है, एवं बलवान् होता है ॥ २० ॥
यवाश्वगन्धायष्ट्याह्वितैस्तैलैश्चोद्भूतं हितम् ।
उद्बर्त्तन—जौ, असगन्ध, मुलहडी और तिल इनके द्वारा कान का उद्बर्त्तन, करना हितकारी है ।
शतावर्षश्वगन्धाभ्यां पयस्यैरष्टजीवनैः ॥ २१ ॥
तैलं विपक्वं सक्षीरसम्भ्यङ्गात् पालिवर्धनम् ।
शतावरी, असगन्ध, क्षीरकाकोली, एरण्ड, जीवक ( या काकोल्यादि द्रव्य ), इनके कल्क से (स्नेह का चतुर्थांश कल्क), केवल क्षीर में तैलपाक करना चाहिये । इस तैल के अभ्यंग से कर्णपालि बढ़ती है ॥ २१ ॥
ये तु कर्णा न वर्धन्ते स्वेदस्नेहोपपादिताः ॥ २२ ॥
तेषामपाङ्गदेशे तु कुर्यात् प्रच्छानमेव तु ।
बाह्यच्छेदं न कुर्यात् व्यापदः स्युस्ततो ध्रुवाः ॥ २३ ॥
इस उपरोक्त विधि से जो कान नहीं बढ़ते, उनके लिये अपांग देश में प्रच्छान करना चाहिये (अपांग देश कर्ण पुत्रिका का अधःप्रदेश) इस प्रदेश में थोड़ा-सा छेदन करना चाहिये । अधिक छेदन करने पर (सिरामर्म नामक दो मर्म हैं)—आन्ध्य, दृष्टि का नाश होता है । बाह्यच्छेद—कर्णबाह्य—लतिका का छेदन (त्वचामात्र) करने पर कर्णलतिका का फटना रोग उत्पन्न होते हैं ॥ २२-२३ ॥
वद्धमात्रं तु यः कर्णं सहसैवाभिवर्धयेत् ।
आमकोशी समाधमातः क्षिप्रमेव विमुच्यते ॥ २४ ॥
१ वात्स्यायन कामसूत्र में भी कर्णपालि एवं स्तन तथा लिंग को बढ़ाने के लिये प्रयोग दिये हैं । उनमें जलशूक का अर्थ ‘घोषा’ है । इसके शरीर पर बाल होते हैं । इनके उपयोग से शूकरोग भी होता है । देखिये माधवनिदान और मधुकोप टीका ।
तैलपाचन उसी क्रम से करना चाहिये—जिस क्रम से विधान—यथा—कल्क, स्नेह से चतुर्थांश क्षीर—चतुर्गुण तैल से (द्वान्तरानुवृत्ते क्षीरमेव चतुर्गुणम्, कल्कस्तु स्नेहपादिकः) ॥
६& सुश्रतसंहिता
जो मनुष्य बद्ध मात्र कान को ( जो कान अमी थोड़ा दी
जुड़ा है ) एकदम से--सहसा ही बद्ता है, वह भर प्रकार ख
सध्य म से रोहण न होने के कारण शीघ्र ही ध्रथग् हो जाता ई ॥
जातरोमा सुबरमौ च स्छष्टसन्धिः समः स्थिरः ।
सुरूढोऽवेधनो यश्च तं कण वधयेच्छनः ॥ २५ ॥
जिस कान पर बाल उन्न हो गवे हों, शोभन दिद्रबाछा
संलग्न सन्धि, तिम्नो्नत रहित, समान, इद् भटी प्रकार रोहण
हआ, वेदना रदित, जो कान ही; उसको धीरे २ बद़ाना
चाहिये ॥ २५॥ अमिताः कर्णबन्धास्तु विज्ञेयाः कुशकरिह ।
यो यथा सविशिष्टः स्यात्तं तथा वि नियोजयेत् ॥ २६।
कुशलो को ध्यान रखना चाहिये कि कणवबन्धन अरस्ख्य
ह । जो बन्धन जिस स्थान पर ठीक तरह से बेठे--उसको
उसी स्थान पर गाना चादिये ॥ २६ ॥
( कणेपाल्यामयाननुणां पुनवदयामि सुश्रुत ¦ ।
कणेपाल्यां प्रकुपिता वातपित्तकफाखयः ॥ १॥।
द्विधा वाऽप्यथ संसष्टाः करन्ति विविधा रुजः ।
विस्फोटः स्तन्धता ओफः पास्यां दोषे तु वातिके ॥२॥
दाहविस्फोटजननं जञोफः पाकश्च पेत्तिके ।
कण्डूः सश्वयथुः स्तम्भो गुरुसं च कणष्ठास्मकं ॥ ३ ॥
यथादोषं च संशोध्य कुयोत्तेषां चिकित्सितम् ।
स्वेदाभ्यङ्गपरीषेकेः प्रङेपासग्विमोक्षणेः ॥ ४॥
मद्टी क्रियां इंहणीयेयथास्वं भोजनस्तथा । `
य एवं वेत्ति दोषाणां चिकित्सां कतुमहंति ॥ ५॥
( हे सुश्रत ! मनुष्यों की कणपाङि के रोगों को फिरसे
चि० अ० २१ मेँ कर्हगा } ` वात, पित्त, कफ तीनों दोष, एवं
संसष्ट दोषों से तथा तीनों दोषों के मिलने से (सातप्रकार के)
नानां प्रकार के रोग उन्न होते ह । बातजन्य पाठिदोष मे--
विस्फोट जडता एवं सूजन होती दै 1 पित्तजन्य पालिदोष मे--
जलन, विस्फोट ओर सूजन होती हे 1 कफजन्य पाङ्दिष मँ--
कृण्ड , सूजन (८ आद्र ), स्तम्भ ओर भारीपन होतो है । दोघ
के अनुखार इनका संशोधन करके ` चिकित्सा करनी चादिये ||
` अतङध्वर नामलिङ्गवच्ये पाल्यामुपद्रवान्।
उत्पाटकश्चोत्युटकः श्यावः कण्डूयुतो शरखम् ॥ & ॥
~ - -अवमन्थः सकण्ड्को अ्रन्थिको जम्बुरस्तथा ।
. खावी च दाहवश्िव -खण्वेषां क मः च्याम् ॥ ७ ॥ `
इसके आगे पाटी के उपद्रवं का नाम एवं ठक्षण कहते ` ई--उत्पायक, उ्युटक--इनमे खाज बहत होती है, ओर इसका रङ्ग कालहा होता है । अवमन्थ मं खाज होती दै। ग्रन्थिक एवं जम्बूल--मे छाव ओर दाह । इनकी चिक्त्छा क्रम |
से कहते अ च । सिद्ध तठ को प्रयोग करना उत्तम है । ब्रंह्ण कायं म
इनकी छाठ, इनका लेप करना चाद्ये | ओर इनके कल्क
दूध मे पकाया तेर प्रयोग करना चाहिये । उस्पुरक रोग गे
शम्पाक, अमल्ताख, सहजन, पएतीक ( नाट करञ्ज ), गोषा ।
की मेद्, गोधा को वसा ( सांस स्नेह ) सुअर का पित्त,गाय ,
का पित्त ओर काली हरिणी का पित्त इनको धीम मिराकर् ठे ।
करना चाहिये ओर इने ही संस्कृत तेल प्रयोग करना चाहिये। .
. ^ --ड्खिस्वा तत्खवं घृष्ठां चूणखाधस्य जम्बु ।
| श्यामा ( निसो ), अनन्तमूल ओर चाल की-कणि्या;-ई
रोग मे-पाा, रसौतः शदद; कुस्थी आदि उष्णएवीयं आध, ।
सं बनायी उष्ण काजी, इनका च्य तथाः इनसे. रस्त ० प्रयोग करना चाहिये । कण्डयुक्त यदि बण हौ तो निम्ब ९4
४ [ २,
अपामा; सजेरसः पाटखालकुचतस्वचोौ |`
उत्पारके प्रखेपः स्यात्तेखमेभिश्च पाचयेत् ॥ ८ ॥
उम्पाकशिग्रपतीकान् गोधामेकोऽथ तद्रसम् ।
वाराहं गव्यसैणेयं पित्तं सर्पिश्च संसृजेत् ॥ < ॥
ठेपसुरपुटके दद्यात्तेखमेमिश्च साधितम् ।
उत्पारक रोग मै--अपामाग, राक, पाटला ओर बडहर
गोरं सुगन्धां सश्याभासनन्तां तण्डुरीयकम् । १०॥
रयाव प्ररेपनं ददयात्तेखमेभिश्च साधितम् |
पाठां रसाञ्जनं क्ष्रं तथा स्यादुष्णका ञ्जिकम ॥११॥
द्दयाल्खेपं सकण्डूके तैलमेभिश्च साधितम् । .
ब्रणमूतस्य देयं स्यादिदं तटं विजानता ॥ (२॥ ` |
मधुक्चीरकाकोीजीवकायेर्विपाचितम् । . -‡ |
गोधावराहसपीणां बसाः स्युः कृतच्रहणे ॥ ६३ ॥. ` ।
` प्रटेपनमिदं दद्यादवसिच्यावमन्थके । ॥
प्रपौण्डरीकं मधुकं समङ्गां धवमेव च ॥.१४॥
तेरमेभिश्च संपक्तं श्णु कण्डुमतः क्रियाम् ।
सहदेवा विङबदेवा अजाक्षीरं ससेन्धवम्। ~:
एतेरखेपनं दयात्तेखमेमिश्च साधितम् ॥ १५॥. ~
ˆ मन्थिके कुटिकां पब खावयेद्वपाव्यतु। .
“ ततः सैर्धवचूणं च धृष्टा खेपं प्रदापयेत् ॥ ९६ ॥ ~“
, : क्षीरेण प्रतिखा्यनं शद्धं संरोपयेत्ततः ॥ .१७॥
` --मधघुपणीं मधूकं, च सधुक मधुना सह । ४.
; छेषः खाविणि दातम्यस्तेर्मेभिश्च साधितम् ॥ .॥ .
. पद्वत्केः.समधुकेः-पिष्टेस्तेच घृतान्वितेः1 ।
. -जीवकायेः ससर्पिच्केदंद्यमानं प्र्पयेत्॥ १९.॥ ५ | {~ श्याव रोग. म--गौरी ( दल्दी ); सुगन्धा .( रसला |
टेप तथा इनसे साधित तेर का प्योग्-करना तरादियेः। कण्डं
ए श
प्रयोग करना चाहिये । सुच्हदी, क्षीरकाकोली, -जीवकगंण 8
अ० १६ ]
सूत्रस्थानम्
६७
सुअर और सर्प की बेरा देनी ( अन्य वृंहण वस्तुओं के साथ ) चाहिये । अवमन्थक रोग में प्रक्षालन करके निम्न प्रलेप लगाना चाहिये—प्रपौण्डरीक, मुलहड़ी, मंजोठ, धव, इनसे संस्कृत तैल या इनका लेप करना चाहिये । कण्डू की शान्ति के लिये क्रिया कहते हैं—सहदेवा (कोयल), विश्वदेवा (नागबला), बकरी का दूध, इनको सैन्धव के साथ मिलाकर लेप करना चाहिये और इनसे साधित तैल का प्रयोग करना चाहिये । प्रन्थिकरोग में—मांसगुटिका का प्रथम खण करके फिर इसको चौरकर-संथानसक धिसना चाहिये । पीछे से लेप करना चाहिये । जम्बूल रोग में—ग्रन्थि को दूध के साथ लोथ के चूर्ण से रगड़कर इन्हीं से प्रलेपन करना चाहिये । वेदना रहित होने पर जम्बूल पर प्रथम कहा मुलहड़ी द्वारा संस्कृत तैल का लेप करना चाहिये । खावीरोग में—मधुपर्णी (गिलोय), मधुक (महुवा) और मुलहड़ी, इनको शहद में मिलाकर लेप करना चाहिये और इनसे ही संस्कृत तैल लगाना चाहिये । दाहवान् व्रण पर—पञ्चवलकल (बट, गूलर, पिलखन, जामुन, पीपल), मुलहड़ी, इनको घी में मिलाकर लेप करना चाहिये । इसी प्रकार काकोल्यादि (जीवक आदि) गण की औषधियों को घी में मिलाकर प्रलेप देना उत्तम है ॥१-१६॥
त्रिश्लेषितायास्त्वथ नासिकाया,
बद्ध्यामि सन्धानविधि यथावत् ।
नासाप्रसाणं पृथिवीरुहाणां;
पत्रं गृहीत्वा त्ववलम्बि तस्य ॥ २७ ॥
येन प्रमाणेन हि गण्डपाश्वार्दुक्त्य बद्धत्वथ नासिकाग्रम् । विलिख्य चाशु प्रतिसन्दधीत तत् साधुवन्धैर्भिषगप्रमत्तः॥ सुसंहितं सम्यगतो यथावन्नाडिद्वयेनाभिसमीह्य बद्धवा । प्रोन्नम्य चैनामवचूर्णयेत्तु पतङ्गयष्टीमधुकाञ्जन्तश्च ॥ २८ ॥ संखाद्यसम्यक् पिचुना सितेन तैलेन सिञ्चैदसकृत्तिलानाम् । घृतं च पाय्यः सनरः सुजीर्णं स्निग्धो विरेच्यः सयथोपदेशम् । रुदं च सन्धानमुपागतं स्यात्तदधर्शेण च पुनर्निकृन्तेत् । हीनां पुनर्वर्धयितुं यतेत समां च कुर्यादतिवृद्धमांसम् ॥ २९ ॥
येन केन प्रकार से त्वचा और मांस से नासिका के अलग हो जाने पर इसके संधान की विधि को कहते हैं । वृक्षों के पत्रों को नासा के प्रमाण में काटकर इनके बराबर (इनको रखकर) गण्ड के पार्श्व से या (ललाट से त्वचामात्र को उखाड़कर एक पार्श्व में लगा रहे । इससे नासिका के अग्रभाग को बनाकर शीघ्रता से सूर्य आदि द्वारा सौकर—बिना आलस्य किये वैद्य उत्तम बन्धनों से बांध देवे । जिस समय पड़ी ठीक तरह बांधे उस समय श्वास-साग के लिये नासिका के छिन्नों को एण्ड-ताल आदि कोमलनालों से ऊंचा उठा देना चाहिये । बांधने
से पूर्व-लालचन्दन, मुलहड़ी, रसांजन इनके बारीक चूर्ण को बुरक देना चाहिये । इसके ऊपर श्वेत रूई का पिलु रखकर ऊपर से तिलों का तेल बार-बार लगाते रहना चाहिये । भोजन के भली प्रकार जीर्ण होने पर घी (पौष्टिक) देना चाहिये । स्निग्ध होने पर युक्तिपूर्वक विरेचन देना चाहिये । जिस समय भली प्रकार रोहण हो जाये और जुड़ जाये, उस समय इसके शेष आधे भाग को (जो कि पार्श्व में लगा था) फिर काट देना चाहिये । यदि नासिकाप्रमाण में कम रह जाये, तब इसको पुनः बढ़ाने का यत्न करना चाहिये, और यदि मांस अधिक बढ़ जाये तो इसको काटकर फिर समान करना चाहिये १ ।
वि० मन्तव्य—जैसे कर्णवेध किया जाता है वैसे ही “नासा-वेध” भी किया जाता है विशेषतः स्त्रियों का । इसमें भी कर्ण-वेध के समान उपद्रव हो जाते हैं और उनकी चिकित्सा भी वैसे ही की जाती है । अधिक क्या यह सब सर्वविदित विषय है।
नाडीयोगं विनोद्धस्य नासासन्धानवद्विधिम् ।
य एवमेव जानीयात् स राज्ञः कर्तुमर्हति ॥ ३२ ॥
ओष्ठ-सन्धानविधि (Hair Lip)—
ओष्ठ की सन्धानविधि नासा की सन्धानविधि के समान है, परन्तु इसमें एण्डनाल आदि नाड़ी का उपयोग नहीं होता । जो वैद्य इस प्रकार के कार्यों को करना जानता है, वह राजा की चिकित्सा करने योग्य है ।
वि० मन्तव्य—कुछ देशों में ओष्ठों में वेध किया जाता है और भूषण पहिना जाता है । इसकी विधि, उपद्रव, चिकित्सा सब कर्णवेध के समान है । कभी-कभी दस्यु (डाक्) शत्रु-नाक, कान के भूषणों को खींच लेते हैं तो नासा, कान फट जाते हैं और कभी बर्द्धन कर्म में फट जाते हैं तब उक्त बन्धन या संधान की आवश्यकता पड़ती है । कान में एक से अधिक भी वेध किये जाते हैं, विशेषतः—स्त्रियों के कानों में और नासा में भी दोनों और दो और नासा प्राचीर में तीसरा—तीन वेध किये जाते हैं और ओठों में—दोनों में वेध किये जाते हैं । और ओठों को बड़े करने के उपाय भी किये जाते हैं । अफ्रीका की वन्य जातियाँ (हबशी) अब भी ओठ में भूषण पहनती हैं । ये तीन-कान, नाक तथा ओठ का वेध रक्षा एवं भूषण के लिये किया जाता है । परन्तु अति प्राचीन काल में केवल “कर्णवेध” ही होता था, फिर नासावेधन तथा ओष्ठवेधन का प्रचार भी हो गया है । क्योंकि कर्णवेध के मुद्दत तथा संस्कारविधि का विधान ज्योतिःशास्त्र तथा कर्मकाण्ड में पाया जाता है । रक्षा के निमित्त बालकों का नासावेध किया जाता है और
१ संप्रह में कहा है—नुरस्त कट जानं पर भोग्यही विधि बरतं । यथा-निवेशिते यथान्यासं सवृत्तिज्ञेऽप्ययं विधिः ॥
६८
मुश्रतसंहिता
[ अ० १७ ]
उनके नाम—नरथू, नाथू, नथमल्ल तथा नरथासिंह आदि रख दिये जाते हैं ॥३२॥
इति श्रीमुश्रतसंहितायां सूत्रस्थाने कर्णव्यधवन्य- विधिर्नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६॥
सप्तदशोऽध्यायः
अथात आमपक्वैषणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
इसके आगे आमपक्वैषणीय (पच्यमान और पक्व) अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने मुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥
शोफसमुत्थाना ग्रन्थिविद्रध्यलजीप्रभृतयः प्रायेण व्याधयोऽभिहिता अनेकाकृतयः, तैर्विलक्षणः पृथुग्रंथितः समो विषमो वा त्वङ्मांसस्थायी दोषसंघातः शरीरैक- दोशोत्थितः शोफ इत्युच्यते ॥ ३ ॥
ग्रन्थि, विद्रधि, अलजी आदि कई (गलगण्ड, अर्बुद, रलीपद आदि २) व्याधियाँ इस ग्रन्थ में पृथक् पृथक् अध्यायों-प्रकरणों में कहीं गई हैं, जिनका समुत्थान-कारण शोफ होता है परन्तु उन सबसे पृथक् शरीर के किसी भी एक देश में उत्पन्न दोषसंघात (दोषसञ्चय), "शोफ"—ब्रण शोफ (फोड़ा) कहलाता है। वह विविध लक्षणोंवाला, कोई चौड़ा (चकलीदार) कोई ग्रंथित (गॉट का सा), कोई सम (गोल) तो कोई विषम (कोनोवाला) और केवल त्वचा एवं मांस में अभ्रित होता है। यह ब्रणशोफ या फोड़ा कहलाता है। ब्रणशोफ का अर्थ है 'ब्रणाय शोफः' अर्थात् ब्रण के लिये—घाव होने के लिये जो शोफ होता है वह ब्रणशोफ कहलाता है। पाठक विचार करें कि ग्रंथि आदि से इसमें क्रिया विलक्षणता—मेद है ॥३॥
स षड्विधो वातपित्तकफशोणितसन्निपातगन्तुनि- मित्तः। तस्य दोषरूपपञ्चजैनैलक्षणानि व्याख्यास्यामः। तत्र, वातशोफः कृष्णोऽरुणो वा परुषो मृदुरनवस्थिता- स्तोदादयश्चात्र वेदनाविशेषा भवन्ति। पित्तशोफः पीतो मृदुः सरको वा शोघ्रातुसार्थावादयश्चात्र वेदनाविशेषा भवन्ति, श्लेष्मश्चयशुः पाण्डुः कठिनः स्निग्धः शीतः स्निग्धो मन्दानुसारी कण्डवादयश्चात्र वेदनाविशेषा भवन्ति। सर्वैर्वावेदनः सन्निपातश्चयशुः। पित्तवच्छोणि- तजोऽतिकृष्णश्च, पित्तरक्तलक्षण आगन्तुलौहिताव- भासश्च ॥ ४ ॥
यह शोथ छै प्रकार का है। यथा—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, रक्तजन्य, सन्निपातजन्य और आगन्तुज। इस शोथ के दोषों को बतानेवाले लक्षणों को कहते हैं। यथा—वातजन्य
शोथ लाल वा काला, कठिन, कौमल अस्थिर एवं तोद (सुई के चुभने के समान वेदना), छेदन, भेदन आदि वेदनायें होती हैं। पित्तजन्य शोथ—पीला, कोमल, रक्तयुक्त, शीघ्र फैलनेवाला, ओष, चोष, दाह आदि वेदना (जलने के समान) होती है। कफजन्य शोथ—पाण्डु या सफेद, कठिन, शीत, स्निग्ध, धीरे धीरे फैलनेवाला, उसमें कण्डू, गुर्दव, सुप्ति आदि वेदनायें होती हैं। सन्निपातजन्य शोथ में—सब दोषों का रक्त मिश्रित होता है और सब प्रकार की वेदनायें होती हैं। रक्तजन्य शोथ में—पित्त के समान लक्षण होते हैं शौर रक्त अतिकाला रहता है। आगन्तुज शोथ में—पित्तजन्य, रक्तजन्य शोथ के लक्षण मिश्रित रहते हैं और रक्त की चमक रहती है। इसी से कहा है—“बाह्यस्त्वचो दूषयिताऽभिघातः काष्ठारमशस्त्राग्निविषाय- साद्यैः, आगन्तुहेतुः।” चरक ॥४॥
स यदा बाह्याभ्यन्तरैः क्रियाविशेषैर्न संभावितः प्रशमयितुं क्रियाविपर्ययाद्वृद्धुत्वाद्वा दोषाणां तदा पाका- भिमुखो भवति। तस्यामस्य पच्यमानस्य पक्षस्य च लक्षणमुच्यमानमुपधारय। तत्र, मन्दोऽमता त्वकसर्वा- ता शीतशोफता स्थैर्यं मन्दवेदनताऽल्पशोफता चामलक्षण- मुदिर्ध, सूचोभिरिव निस्तुद्यते, दृश्यत इव पिपीलिकाभिः, ताभिश्च संसर्प्यत इव, लिद्यत इव शस्त्रेण, भिद्यत इव, शक्तिभिः, ताक्यत इव दण्डेन, पीड्यत इव पाणिना, घट्यत इव चाङ्कुल्या, दह्यते पच्यत इव चामिक्षारा- भ्याम्, ओषचोषपरीदाहाश्च भवन्ति, वृश्चिकविद्र इव च स्थानासनशयनेषु न गान्तिमुपैति, आश्मातवस्तिरिवा- ततश्च शोफो भवति, त्वग्वैवर्ण्यं शोफाभिवृद्धिर्वैरदाह- पिपासा भक्तारुचिश्च पच्यमानलिङ्गं, वेदनोपशान्तिः पाण्डुताऽल्पशोफता बलोप्रादुर्भावस्त्वकपरिपुटनं निम्न- दशनमङ्कुल्याऽवपीडिते प्रत्युन्मननं, बस्ताविबोदकसं- चरणं पूरस्य प्रपीडयत्येकमन्तमन्ते चावपीडिते, मुहुर्मुहुः स्तोदः कण्डूरुन्तता व्याघ्रैरुपद्रवशान्तिर्भक्ताभिकाङ्क्षा च पक्वलिङ्गम्। कफजेषु तु रोगेषु गम्भीरगतिर्त्वादभि- घातजेषु वा केषुचिदसमस्तं पक्वलक्षणं दृष्ट्वा पक्वमप- क्वमिति मन्यमानो भिषग्नोहमुपैति, तत्र हि स्वरसर्वाणां शीतशोफता स्थैर्यमल्परुजताऽश्मवृच्छ घनता, न तत्र मोहमुपेयादिति ॥ ५ ॥
यह शोथ जब बाह्य (आलेपन आदि) आभ्यन्तर (क्वाप, पान, वमन, विरेचन आदि) उपचारों से शान्त नहीं होता तब अवतरण आदि क्रियाओं के विपर्यय से या दोषों की प्रबलता होने से पकने लगता है। इस आमशोथ के पच्यमान (पाका भिमुख) एवं पक्व (पक जाने) के लक्षण कहता है। यथा—आम शोथ के लक्षण—थोड़ी उष्णमा, त्वचा के समान वर्ण (रक्त)
अ० १७ ]
सूत्रस्थानम्
६९
सृजन में ठण्ड, कठिनाता, पीड़ा का थोड़ा होना, सूजन में कमी—ये आमशोथ के लक्षण हैं। पञ्चमान शोथ—सूर्य के जुमने के समान पीड़ा, चिउटियों के चलने के समान प्रतीति, शस्त्र द्वारा छेदन करने के समान, शक्ति से भेदन करने के समान, दण्ड से ताड़न करने की तरह, हाथों से पीड़न करने की तरह, अंगुलि द्वारा चलाने (हिलाने) के समान, अग्नि एवं क्षार से—जलाने या पकाने की भाँति अनुभव होता है, ओष (एक भाग में दाह), पाख में रक्खी अग्नि के समान दाह प्रतीति, चारों ओर सारे सृजन में दाह होता है बिच्छू के काटे हुए पुखुर की भाँति, न तो बैठने में, न उठने में, न चलने में, न लेटने में किसी भी प्रकार से शान्ति नहीं मिलती। भरे हुए मूत्राशय के समान फूला एवं झर्रियों (त्वचा के संकोच) रहित शोथ होता है। त्वचा का रङ्ग बदलना, शोफ का उत्तरोत्तर बदलना, खुर, दाह, प्यास, भोजन में अरुचि, ये पञ्चमान शोफ के लक्षण हैं। पुखुर शोथ के लक्षण—वेदना की शान्ति, पाण्डुता, सृजन का घटना, झर्रियों का आ जाना, त्वचा का विदीर्ण होना, अंगुलि से दबाने पर नीचे दब जाना (गड़ढा होना) और फिर ऊपर उठ जाना, बस्ति में पानी की भाँति गति करना—अर्थात्—एक पार्श्व में दबाने से—दूसरे पार्श्व में भर जाना (Thrill), बार-बार जुमने के समान पीड़ा, कण्डू, (पक्वशोथ में विदाह न रहने से पित्त के लक्षण नहीं होते), सृजन का उन्नत होना, उग्रद्वो की शान्ति, भोजन में रुचि होना—ये पक्व शोथ के लक्षण हैं।
कफजन्म योग में शोथ की गति के गम्भीर (गहरी) होने से, एवं अभिघातजन्म शोथों में समस्त पक्व लक्षणों को न देखकर यह शोथ पका है या नहीं इस प्रकार का संशय (मोह) कई बार उत्पन्न हो जाता है। इन अवस्थाओं में—यदि बाहर से शोथ का रङ्ग त्वचा के समान हो, शोफ में बाहर शीतलता हो (अन्दर उष्णता), स्थूलता, वेदना की कमी, शिला के समान कठोरता हो तो भी संशय नहीं करना चाहिये—(शोथ को पक्व समझना चाहिये) कहा भी है 'न मोहमुपेयात्-यत्तस्त् रक्तपाकमाचक्षते वृद्धाः'।
वि० मन्तव्य—अवस्था भेद से त्रण शोफ के तीन प्रकार हैं—१—आम-कच्चा फोड़ा, २—पञ्चमान—पकता फोड़ा, ३—पक्व—पका हुआ फोड़ा। इस सूत्र में इन तीनों अवस्थाओं के लक्षण कहे गये हैं। कफजन्म तथा अभिघातजन्म शोफ में गहरा नीचरी पाक होता है और ऊपर से पका प्रतीत नहीं होता, अतः सन्देह हो जाता है कि पका है अथवा कच्चा है, परन्तु कुशल चिकित्सक को सन्देह (शोका) नहीं होता। वह अपने अनुभव से जान लेता है और चौरा लगाकर पूय निकाल देता है और फिर शोधन रोपण आदि उपचार करता
रहता है। इनके अतिरिक्त अन्य त्रण शोफ ऊपर से पक जाते हैं और फूट भी जाते हैं। संक्षेपतः आमशोथ में वेदनायें मन्द, पञ्चमान में तीव्र होती हैं और पक्व में पुनः मन्द हो जाती हैं।
भवन्ति चात्र— आमं विपञ्चमानं च सम्यक् पक्वं च यो भिषक्। जानीयात् स भवेद्वैद्यः शेषास्तस्करवृत्तयः ॥ ६ ॥ वाताट्टे नास्ति रुजा न पाकः। पिताट्टे नास्ति कफाच्च पूयः ॥ तस्मात् समस्तान् परिपाककाले।
पचन्ति शोफांश्चैव एव दोषाः ॥ ७ ॥ जो वैद्य, आमशोथ, पञ्चमानशोथ और पक्वशोथ को भली प्रकार से पहिचानता है, वह वास्तव में "वैद्य" कहलाने योग्य है, शेष सब प्राण-धन के चुराने से चोर हैं। एक दोष के कारण उत्पन्न हुआ शोथ भी पकने के समय तीनों दोषों द्वारा पकता है—वात के बिना शोथ में पीड़ा नहीं होती-पित्त के बिना पाक नहीं होता, कफ के बिना पूय नहीं होती, इसलिये पकते समय शोफ को तीनों दोष एकत्रित होकर पकाते हैं। ६, ७।
काठान्तरेणाभ्युदितं तु पित्तं कृत्वा वशे वातकफौ प्रसह्य। पचत्यतः शोणितमेव पाको मतोऽपरेषां विदुषां द्वितीयः ॥ ८ ॥
शोथ के परिपाक के विषय में विद्वानों का एक और भी मत है। प्रकोप, प्रसार, स्थान, संश्रय-काल विधि से बड़े हुए पित्त को वश में करके तथा वात एवं कफ को घटाकर रक्त, शोथ को पकाता है, यह दूसरे विद्वानों का विचार है। घाणेकर जी का कहना है कि बढ़ा हुआ पित्त-बल से वात और कफ को विवश करके रक्त को पका देता है।
वि० मन्तव्य—घाणेकर जी वाला अर्थ ही ठीक है, कारण वात एवं कफ स्वभावतः पाक नहीं कर सकते केवल पित्त ही पाक कर सकता है और रक्त को पकाकर पूयरूप में परिणत कर देता है। इतना ही नहीं रक्त भी पित्त का समानधर्मा है अतः वही पकता भी है और तत्स्थानीय मांस वसा आदि सौम्य होने से पकते नहीं, अपितु गलते-सड़ते हैं भले ही पकते प्रतीत होते हों ॥ ८ ॥
तत्र आमच्छेदे मांससिरास्तायुसन्ध्यस्थिव्यापादनसति- मात्रं शोणिततिप्रवृत्तिवेदनाप्रादुर्भावोऽवदरणमनेकोपद्र- वदर्शनं क्षतविद्रधिर्वा भवति। स यदा भयमोहाभ्यां पकमप्यपकमिति सन्धमानश्चिरमुपेक्षते व्याधिं वैद्यस्तदा गम्भीरानुगतो द्वारमलभमानः पूयः स्वमाश्रयमवदयोरसङ्गं महान्तमवकाशं कृत्वा नाडीं जनयित्वा कृच्छ्रााधयो भव- त्यसाधयो वेति ॥ ९ ॥
७०
मुमृतसंहिता
[ अ० १७ ]
आमशोथ के छेदन करने पर—मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि, स्निग्ध की विकृति बहुत अधिक मात्रा में रक्त का खाव, वेदना का होना, फटना, अनेक प्रकार के उपद्रवों का होना, अथवा क्षतजन्य विद्रवि उत्पन्न हो जाती है। और जब कभी वैद्य मय या मोह के कारण पक्व शोथ को भी अपक्व समझकर देर तक उपेक्षा करता रहता है तब दूर तक घुसी पूय द्वार के न मिलने से अपने आश्रय को फाड़कर उत्सन्न (क्रोड़) या बड़े भारी अवकाश को उत्पन्न करके नाड़ीव्रण बना देती है। इस तरह कष्टसाध्य या असाध्य हो जाती है।
वि० मन्तव्य—यह चेतावनी उस व्रण के लिये है जिसमें आमता या पक्वता में सन्देह होता है, वस्तुतः पका होता है और गम्भीर होने से स्वतः नहीं फूटता तथा चौरा लगाना आवश्यक होता है ॥ ६ ॥
भवति चात्र—
यश्चित्तन्याममज्ज्ञानावश्व पक्वमुपेक्षते।
श्वपचाविष मन्तव्यौ तानन्निश्चितकारिणौ ॥ १० ॥
कहा भी है—
जो वैद्य अज्ञानवश आम शोथ का छेदन करता है, और जो पक्व शोथ की उपेक्षा करता है, इन दोनों असमीक्षकारी वैद्यों को चाण्डाल के समान समझना चाहिये, (क्योंकि समझकर ये काम नहीं करते)।
वि० मन्तव्य—आम को चौरना और पक्व (फोड़ा) को न चौरना बुरा है ॥ १० ॥
प्राक् शस्त्रकर्मणश्चोष्टं भोजयेदातुरं भिषक्।
मद्यपं पाययेन्मद्यं तीक्ष्णं यो वेदनाऽसहः ॥ ११ ॥
न मूर्च्छत्यन्नसंयोगान्मत्तः शस्त्रं न बुभ्यते।
तस्मादवर्यं भोक्तव्यं रोगेषूक्तेषु कर्मणि ॥ १२ ॥
प्राणो ह्याभ्यन्तरो नृणां बाह्यप्राणगुणान्वितः।
धारयत्यविरोधेन शरीरं पाञ्चभौतिकम् ॥ १३ ॥
शस्त्रकर्म से पूर्व रोगी को भोजन करा देना चाहिये, और जो पुरुष मद्य पीता हो वेदना को न सहनेवाला हो उसको तीक्ष्ण मद्य पिला देना चाहिये। इसका लाभ-अन्न के कारण रोगी मूर्च्छित नहीं होता, और मस्त होने से शस्त्र-पीड़ा का अनुभव नहीं करता। इसलिये कहे हुए रोगों में (मूढ़गर्भोदरा शौरमरी आदि को छोड़कर) अवश्य भोजन कराना चाहिये। मनुष्यों का आभ्यन्तर प्राण (बल-शक्ति)—बाह्य प्राण (अन्न) के गुणों के समान गुणवाला है। इसलिये बिना विरोध के इस पांचभौतिक शरीर को धारण करता है ॥ ११-१३ ॥
१ 'योऽवेदनासहः' इस पाठ में—'जो मनुष्य वेदना का सहन कर सके उसको मद्य पिलाये' यह अर्थ है।
अल्पो महान् वा क्रियया विना यः
समुच्छिन्नतः पाकमुपैति शोफः।
विशालमूलो विषमं विदग्धः
स कृच्छ्रतां यात्यवगाढदोषः ॥ १४ ॥
उत्पन्न हुआ अल्प या महान् जो शोथ बिना आलेष आदि क्रिया के पकता है, वह शोथ विशालमूलवाला, विषमपाकी, तथा आभ्यन्तर पूयवाला होता है, इसलिये कष्टसाध्य है। विषमपाकी सब अङ्गों में ठीक प्रकार से नहीं पकता।
वि० मन्तव्य—तात्पर्य यह कि विस्लापन आदि से व्रण शोथ नहीं शान्त होता और पाकामिमुख हो जाता है तब पांचन लेप आदि की व्यवस्था अवश्य करनी चाहिये। अन्यथा स्वतः पकने ने लिये छोड़ रखने से यदि पकता है तो कष्टसाध्य होता है। यही सू० १५ में स्पष्ट किया गया है ॥ १४ ॥
आलेषविज्ञावणगोधनैस्तु
सम्यक्प्रयुक्तैर्यदि नोपशम्येत।
पच्येत शीघ्रं सममल्पमूलः
स पिण्डितश्चोपरि चोन्नतः स्यात् ॥ १५ ॥
समान-अल्पमूलवाला शोथ आलेषन, रक्त मोक्षण, संशोधन आदि उपचारों के मली प्रकार से प्रयुक्त करने पर भी यदि शान्त नहीं होता अपितु पकता ही है, तब यह शोथ गोलकार होकर ऊपर को उठ आता है ॥ १५ ॥
कक्षं समासाद्य यथैव बहि-
वाग्भैरितः संदहति प्रसह्य।
तथैव पूयोऽप्यविनिःस्तुतो हि
मांसं सिराः स्नायु च खादतीह ॥ १६ ॥
जिस प्रकार कि व्रण-बहुल (घास के ढेरवाले) प्रदेश में लगी आग वायु के कारण प्रबल होकर—बलपूर्वक सम्पूर्ण ढेर को जला देती है। उसी प्रकार बाहर न निकली हुई पूय मांस, शिरा, स्नायुओं का भक्षण करती है।
वि० मन्तव्य—अतः पूय को निकालने का प्रयत्न करना चाहिये ॥ १६ ॥
आदौ विस्लापनं कुर्याद् द्वितीयमवसेचनम्।
तृतीयमुपनाहं तु चतुर्थं पाटनक्रियाम् ॥ १७ ॥
आभ्यन्तर प्राण—अन्नपानरस, बाह्यप्राण अन्न यह भी अर्थ है। "प्राणो वा अन्नम्" "शरीरमन्नादम्"। प्राणः शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः ॥ तैत्तिरीयोपनिषत्।
डल्हन ने आभ्यन्तर प्राण का अर्थ—अग्नि, सोम, वायु, सत्य राज तम, पंचैन्द्रिय और भूतारम्भा किया है। और बाह्यप्राण—आगनेय, सौम्य, वायव्य, पदार्थ, दिन, वायु, रात, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध किया है। इनमें बाह्यप्राण के अति गुणों से—कष्ट, अम्ल-लक्षण आदि से—अन्तरंग शरीर को धारण करती है।
अ० १८]
सूत्रस्थानम्
७१
पञ्चमं शोधनं कुर्यात् पञ्चं रोपणमिष्यते ।
एते क्रमाः त्रणशयोक्ताः सप्तमं वैकृतापहम् ॥१८॥
त्रणशोक की चिकित्सा इस सूत्रस्थान में कहते हैं :—
सब से प्रथम विम्लापन (अङ्गुली आदि से मर्दन) करना चाहिये दूसरा—जलोका आदि से अवसेचन (रक्तमोक्षण), तीसरा—उपनाह (पकाने के लिये बन्धन-पुलटिस आदि), चतुर्थ—पाटनक्रिया (शस्त्र से); पाँचवाँ—शोधन (पञ्चवल्क-लक्षाय से), छठा—रोपण (प्रलेप आदि) कार्य और सातवाँ कार्य—वैकृतापह (सवर्णकरना, रोमसंजनन आदि कार्य) करना—ये वरण के सात कार्य हैं। वैकृतापहम्—विकृति को दूर करना।
वि० मन्तव्य—पाटन दो प्रकार से किया जाता है—
१—शस्त्र से चीरना फाड़ना और २—दारुण लेप से दारुण करना-फोड़ना। विम्लापन से बैठ जाता है, यदि न बैठे तो अवसेचन से दब जाता है यदि न दबे तो उपनाह से पकाना चाहिये और पकने पर पाटन अथवा दारुण करे। तदनन्तर शोधन—त्रणशोधन करे—पूय निकलता रहे, फिर शोधन के साथ रोपण करे, समतल होने पर केवल रोपण करे। यदि त्रण-भूमि पर काला या श्वेत दाग पड़ जाय तो उसके नाश का उपाय करे। विशेष देखिये—चि० स्था० अ० १ ॥१७,१८॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने आमपकैषणीयो
नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥
अष्टादशोऽध्यायः
अथातो त्रणालेपनबन्धविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ॥११॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥११॥
इसके आगे त्रण के लिये आलेपन, त्रण के बाँधने की विधि को बताने के लिये 'त्रणालेपनबन्धविधि' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥११,२॥
आलेप आद्य उपक्रमः, एष सर्वशोकानां सामान्यः प्रधानतमश्च, तं च प्रतिरोगं वद्यामः, ततो बन्धः प्रधानं, तेन शुद्धिर्व्रणरोपणमस्थिसन्धिस्थैर्यं च ॥११॥
आलेप ही सबसे (बहिःपरिमार्जन या अन्तःपरिमार्जन) औषध द्रव्यों से श्रेष्ठ एवं समीपस्थ उपाय है। यही सब प्रकार के शोथों में सामान्य (तुल्य है) और सब उपायों में शीघ्र पीड़ा हर लेने से यही प्रधानतम है। इस आलेप की प्रत्येक
१ आगे त्रणशोक के उपक्रम साठ बताये हैं। इन साठों में ये सात मुख्य हैं और सदा कार्य में आते हैं—इसलिये इनको कहते हैं।
रोग के लिये सूत्रस्थान और चिकित्सास्थान में कहेंगे। आलेप के बाद बन्ध प्रधान है। इस बन्ध के द्वारा त्रण का शोधन, त्रण का रोपण, अस्थि की स्थिरता एवं सन्धि की दृढ़ता होती है ॥१३॥
तत्र प्रतिलोममालिम्पेतु। प्रतिलोमे हि सन्मगोषध-सवतिष्ठतेऽनुप्रविशति च रोमकूपान् स्वेदवाहिभिश्च सिरामुखैर्वीर्यं प्राप्नोति ॥१४॥
आलेप को लोमों के अभिमुख (प्रतिलोम) लगाना चाहिये, अनुलोम (लोमों के अनुकूल) नहीं करना चाहिये। क्योंकि—प्रतिलोम लगाने पर औषध भली प्रकार से स्थिति करती है और अन्दर प्रविष्ट होती है। रोमकूपों द्वारा, स्वेदवाहिनियों से तथा सिरामुखों द्वारा जाकर वीर्यवान् होती है ॥१४॥
त च शुभ्यमाणमुपेक्षेत, अन्यत्र पीडयितव्यात्, शुष्को ह्यार्थकौ रूकरश्च ॥१५॥
पीड़न द्रव्यों से जिस त्रण का पीड़न करना अभीष्ट हो, उसको छोड़कर अन्य सूखे हुए आलेप की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। क्योंकि—सूखा हुआ आलेप निरर्थक और दर्द करने वाला होता है ॥१५॥
स त्रिविधः—प्रलेपः, प्रदेहः आलेपश्च। प्रलेपप्रदेह-योरन्तरं—तत्र प्रलेपः शीतस्तनुरविशोषी विशोषी वा, प्रदेहस्तूष्णः शीतो वा बहलोऽबहुरविशोषी च, मध्यमोऽत्रालेपः। तत्र, रक्तपित्तप्रसादकदालेपः, प्रदेहो वातश्लेष्मप्रशमनः शोधनो रोपणः शोफवेदनापहश्च, तस्योपयोगः क्षताक्षतेषु, यस्तु क्षतेषूपयुज्यते स भूयः 'कल्क' इति संज्ञां लभते निरुद्गालेपनसंज्ञः, तेनात्रावसन्निरोधो मृदुतापूतिमांसापकर्षणमनन्तदोषता त्रणशुद्धिश्च भवति ॥
यह आलेप तीन प्रकार का होता है। यथा—प्रलेप, प्रदेह और आलेप। प्रलेप और प्रदेह में अन्तर (भेद)—प्रलेप—शीतल, पतला, अपीडितव्य त्रण में अविशोषि, पीडितव्य त्रण में विशोषि (सूखनेवाला), (चन्दन के समान जो लेप है, वह प्रलेप है)। प्रदेह—विषय की अपेक्षा से उष्ण (वात-कफ-बहुल त्रण में); शीत (पित्त-रक्त-प्रधान त्रण में), बहल (स्थूल); बहुत न सूखने वाला, (कल्क को पिण्डाकार करके त्रण के ऊपर लगाना—प्रदेह—प्रदेह है। आलेप—मध्यम (प्रलेप एवं प्रदेह के मिश्रित) लक्षणवाला है।
इनमें आलेप—रक्त-पित्त शोथ को शान्त करता है, प्रदेह—वात-कफ को शान्त करता है; जोड़नेवाला, शोषक, रोपक (भरनेवाला), शोफ एवं वेदना को मिटाता है। इस आलेप का उपयोग क्षत अक्षत शोथ में होता है। जो आलेप क्षतजन्य त्रणों में बरता जाता है, उसकी कल्क संज्ञा है। इसी को 'निरुद्गालेपन' कहते हैं। क्योंकि इस आलेप से क्षय का निरोध
७२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३२ ]
(रुकावट) होता है- कोमलता आती है, सड़ा मांस [दूर होता है (खींचता है), पूर्य बाहर आती है और व्रण का संशोधन होता है ॥६॥
अविदग्धेषु शोफेषु हितमालेपनं भवेत् ।
यथासर्वं दोषग्रसनं दाहकण्डूरुजापहम् ॥७॥
त्वक्प्रसादनमेवाग्र्यं मांसरक्तप्रसादनम् ।
दाहप्रग्रसनं श्रेष्ठं रुजाकण्डूविनाशनम् ॥८॥
समदेशेषु ये रोगा गुह्येष्वपि तथा नृणाम् ।
संशोधनाय तेषां हि कुर्यादालेपनं भिषक् ॥९॥
(षड्भागं पैत्तिके स्नेहं चतुर्भागं तु वातिके ।
अष्टभागं तु कफजे स्नेहमात्रां प्रदापयेत् ॥१०॥)
अविदग्ध शोथों में आलेप ही हितकारी है, (विदग्ध शोथों
में प्रदेह उपनाह उत्तम है)। इससे दाह (पित्त की), कण्डू (कफ की) रुजा-पीड़ा (वायु की) अपने अपने दोषों का शमन होता है। त्वचा का प्रसादन करने से सब से श्रेष्ठ (प्रधान) है, मांस-रक्त का प्रसादन करता है, दाह की शान्ति करने से श्रेष्ठ है, तोदकण्डू को नष्ट करता है—ये आलेप के कार्य हैं। पुरुषों के मर्मस्थानों में तथा गुह्य भागों में जो रोग (भगन्दर-अर्श आदि) हों—उनके संशोधन के लिये आलेप ही वैद्य को करना चाहिये। आलेप के अन्दर स्नेह की मात्रा—पैत्तिक आलेप में छठा भाग, वातिक में चौथा भाग, कफजन्य में आठवाँ भाग होती चाहिये।
वि० मन्तव्य—आलेपनों (मलहमों) में—राल आदि द्रव्यों का छठा, चौथा अथवा आठवाँ भाग स्नेह (घृत, तैल अथवा बसा) मिलाया जाता है। विधि भेद से आलेपन ४ प्रकार का होता है। १—स्नेह में अष्टमांश मोम डालकर अग्नि पर उष्ण किया जाता है, मोम पिघलने पर उतार लिया जाता है, शीतल होने पर जम जाता है। इस में छ गुने चौगुने अथवा आठगुने द्रव्यों का कण्डूछान चूर्ण मिला दिया जाता है। २—द्रव्यों के कण्डूछान चूर्ण को स्नेह में मिला, योड़ा २ जल डालकर घोटा, पीसा, फेंटा जाता है, माखन सा होने पर रख लिया जाता है। ३—कण्डूछान द्रव्यों को अथवा कूटे तिल अतसी आदि को स्नेह में डाल हलुवा बना लिया जाता है। अथम २ का नाम “मलहम” है और तीसरे का नाम “पुलटिस” और चौथा—द्रव्यों को पीसकर-कलक बनाकर लेप करना चाहिये ॥७-१०॥
तस्य प्रमाणं भविष्यार्द्धचर्मोत्सेधमुपदिशन्ति ॥११॥
इस आलेप का प्रमाण—भैंस का गीला चमड़ा जितना मोटा होता है, उतना ही आलेप करना चाहिये। चरक में—“त्रिभगमाङ्गुष्ठमात्रः स्यात् प्रलेपः कलकपेक्षितः” ॥११॥
च आलेपं रात्रौ म्रयुञ्जीत, सा भूच्छैत्यविहोतृष्णस्तदन्निर्गमाद्विकारप्रवृत्तिरिति ॥१२॥
आलेप को रात्रि में नहीं लगाना चाहिये। क्योंकि—शोफ में आलेप की शीतलता से ऊष्मा के अन्दर रुक जाने से—बाहर न आने के कारण किसी अन्य विकार की उत्पत्ति न हो जाये—इसलिये रात्रि में आलेप नहीं करना चाहिये। एक दूसरा कारण—“तमसा पिहितोद्गुष्मा रोमकूपैरनावृतः। लेपाद् विनैव निर्याति रात्रौ नालेपयेदतः” ॥१२॥
प्रदेहसाध्ये व्याधौ तु हितमालेपनं दिवा । पित्तरक्तभिघातोत्थे सविषे च विशेषतः ॥१३॥ न च पर्युषितं लेपं कदाचिद्वचारयेत् । उपर्युपरि लेपं च न कदाचित् प्रदापयेत् ॥१४॥ ऊष्माणं वेदनां दाहं घनत्वाज्जनयेत् स हि । न च तेनैव लेपेन प्रदेहं दापयेत् पुनः ।
शुष्कभावात्स निर्वीर्यो युक्तोऽपि स्यादपार्थकः ॥१५॥ प्रदेहसाध्ये व्याधि में दिन में आलेप करना उत्तम है। पित्तजन्य, रक्तजन्य, अभिघातजन्य, एवं विषजन्य शोथ में भी खासकर दिन में ही आलेप करना चाहिये, पर्युषित (बासे-एक दिन पुराने) आलेप को व्रण में नहीं लगाना चाहिये। एक किये आलेप के ऊपर दूसरा आलेप भी कभी नहीं करना चाहिये। क्योंकि इस प्रकार करने से—अधिक उष्णमा वेदना, दाह, उत्पन्न होता है। ऊपर ऊपर लेप करने से लेप मोटा-घन हो जाता है—इससे ये उपद्रव होते हैं। और एक बार लगाये आलेप को पुनः नहीं लगाना चाहिये। क्योंकि शुष्क होने से वह निर्वीर्य होता है और ठीक होने पर भी यह निरर्थक है ॥१३-१५॥
१ प्रदेहाः सर्व एवैते कर्तव्याः संप्रसादनाः । क्षणे क्षणे प्रयोक्तव्याः पूर्वमुद्भूय लेपनम् ॥ अधावनोद्भूते पूर्व प्रदेहा बहुशोऽधनाः । देयाः प्रदेहाः कफजे पर्याधानोद्भूते घनाः ॥ त्रिभगमाङ्गुष्ठमात्रः स्यात् प्रलेपः कलकपेक्षितः । नातिस्निग्धेन रुक्षश्च न पिण्डो न द्रवः समः ॥ न च पर्युषितं लेपं कदाचिद्वचारयेत् । न च तेनैव लेपेन पुनर्जातु प्रलेपयेत् ॥ क्लैदवीसर्पशूलानि सीणभावात् प्रवर्तयेत् । लेपो ह्युपरि पटुस्य कृतः स्वेदयति व्रणम् ॥ स्वेदजाः पिंडकास्तस्य कण्डूस्वेदोपजायते । उपर्युपरि लेपस्य लेपो यद्यवचार्यते ॥ तानेव दोषाज्जनयेत् पटुस्योपरि यान् कृतः । अतिस्निग्धोऽतिद्रवश्च लेपो यद्यवचार्यते ॥ त्वच्च न विलम्बते सम्यङ् न दोषं समयत्यपि । तन्वालिप्तं न कुर्वीत संशुष्को ह्यापुटायते ॥
अ० १८ ] १०
सूत्रस्थानम्
७३
अत ऊर्ध्वं व्रणबन्धनद्रव्याण्युपदेद्यामः, तद्यथा— क्षौमकार्पासाविकदुकुलकौशेयपत्रोर्णचौनपट्टचमोन्तर्वलक- लालावृशकललताविदलरञ्जुतुलफलसन्तानिकाळीहानीति; तेषां व्याधिं कालं चावेद्योपयोगः, प्रकरणतश्चेषामादेशः ॥
इसके आगे व्रणबन्धन द्रव्यों की व्याख्या कहते हैं। यथा- क्षौम ( सन से बनाया ), कार्पास ( रूई ), आविक ( मेढे के बालों से बुना ), दुकुल ( पट्ट बन्ध ), कौशेय ( कौशेय-कोशा- कार क्रम से बना-रेशम ), चौन पट्ट ( चौन देश में बना बन्ध ), चर्म ( हरिण आदि का ), अन्तर्वलकल ( भूजपत्र-गूल्सर आदि की छाल ), अलावृशकल—( तुम्भीफल का टुकड़ा ), लता, विदल ( बांस की खरपट आदि ), रञ्जु, तुलफल ( सिम्रल का फल आदि ), सन्तानिका, लौह ( स्वर्ण-सीसा आदि ) व्रण को बाँधने के द्रव्य हैं।
इन व्रणबन्धन द्रव्यों का उपयोग व्याधि और काल के अनुसार करना चाहिये, यथा—वात-कफ रोगों में घने व्रण- बन्धन द्रव्यों का, उष्णकाल में पतले व्रण द्रव्यों का उपयोग करना चाहिये। इसी प्रकार प्रकरणानुसार इनका आदेश करना चाहिये। यथा—सर्पदण्ड में अग्निबन्ध, रक्तस्त्राव में क्षीरसन्ता- निका का, भग्नसन्धि के लिये विदल लता आदि का, शिर के ब्रणों के लिये अलावृशकलों का उपयोग करना चाहिए। सन्ता- निका का अर्थ घाणेकर जी ने—दो तह या चार तह किया बन्ध—किया है। डल्हन ने 'क्षीरसंतानिका' भी अर्थ दिया है।
तत्र कोगदामस्वस्तिकानुवेलितमु(प)तोलीमण्डलस्थ- गिकायमकखट्वाचीनविवन्धवितानगोफणाः पञ्चचाङ्गी वेति चतुर्दशा बन्धविशेषाः। तेषां नामभिरैवाकृतयः प्रायेण व्याख्याताः ॥ १७ ॥
पट्टियाँ —चौदह प्रकार की पट्टियाँ ( बाँधने के प्रकार ) हैं। यथा—कोश, दाम, स्वस्तिक, अनुवेलित, उत्तौली, मण्डल, स्थगिका, यमक, खट्वा, चीनविवन्ध, वितान, गोफण और पञ्चाङ्गी—ये चौदह प्रकार की पट्टियाँ हैं। प्रायः इनकी आकृ- तियाँ इसके नामों से ही स्पष्ट हैं ॥ १७ ॥
न चौषधिरसो व्याधिं प्राप्नोत्यपि च शुष्यति।
तन्वा लिप्येत ये दोषाः तानेव जनयेद् भूशम् ॥
संशुष्कः पीडयेद् व्याधिं निःस्तेहो ह्यवचारितः।
चरक वि अ० २१ ॥ १८ ॥
१ लक्षण—
पुरयित्त्वौषधैर्बन्धः क्रियते कोशकाकृतिः।
कोशकाख्यः स विज्ञेयो वैद्यैर्बन्धेन वजिताम् ॥
दामाकृतिं चतुष्पादां दामाख्यं स्वस्तिकं पुनः।
स्वस्तिकाकृतिमासीव्य पश्चादावैष्ट्यं बध्यते ॥
तत्र कोशमङ्कुष्ठागुलिपर्वसु विद्ध्यात्, दाम सबाधेऽङ्के, सन्धिकूर्चकभूस्तनान्तरतलकर्णेषु स्वस्तिकम्, अनुवेलितं शाखासु, ग्रीवामेढयोः मु ( प्र ) तोली, वृत्तेऽङ्के मण्डलम्, अङ्गुष्ठाङ्गुलिमेढाभ्येषु स्थगिकां, यमलव्रणयोर्मकं, हनुगङ्ग- गण्डेषु खट्वाम्, अपाङ्गयोश्चीनं, पृष्ठेद्विरोः सु विवन्धं, मूर्धनि वितानं, चितुकनासोष्ठासवस्तिषु गोफणां, जत्रुण ऊर्ध्वं पञ्चचाङ्गीमिति, यो वा यस्मिन् शरीरप्रदेशे सुनि- विष्टो भवति तं तस्मिन् विद्ध्यात् ॥ १८ ॥
इनमें कोष वन्ध—अङ्गुष्ठ एवं अंगुलियों के पर्वों में बाँधना चाहिये। दाम—अङ्ग के समीपवाले प्रदेश में—जहाँ दूसरा बन्धन वन्ध न आ सके-अक्षकास्थि आदि में। स्वस्तिक बन्धन- सन्धि कूर्चक ( क्षिप्र सर्प के ऊपर दोनों ओर ), भू, स्तनों के बीच से हाथ-पाव के तलुवों में। अनुवेलित—टांगों बाँहों में ( शाखाओं में )। उत्तौली ग्रीवा एवं शिरन में। मण्डल—गोल अङ्गों में ( बाहु, पाश्वं, उदर, ऊढ आदि में )। स्थगिका- अंगुष्ठ-अंगुलि एवं शिरन के अग्रभाग में। यमक—संयुक्त ब्रणों में। खट्वा—हनु, शंख प्रदेश और गण्डस्थल में। चीन— नेत्रप्रान्तों में। गोफण—चितुक, नासिका, ओष्ठ, अंस और वक्षप्रदेश की संधि ( जत्रु ) के ऊपर बाँधनी चाहिए। अथवा जो बन्धन शरीर के जिस प्रदेश में ठीक बैठे वह बन्धन उस प्रदेश में बाँधना चाहिए ॥ १८ ॥
अनुवेलितं तु तद् विद्यात् मुत्तोलोलक्षणं श्रुणु।
बह्विघ्निमुट्टिकाकारो जालवद् बहुरन्ध्रकः ॥
मुत्तोलोबन्ध एष स्यात् संज्ञान्तरमतः श्रुणु।
गोतुण्डिकां चालनीं च तानेवाहुभिषवराः ॥
मण्डलं वैष्टनाकारं विद्ध्यात् मण्डलाख्यके।
भेषजादिभिरापूर्यं स्थगिका पट्टकेन च ॥
बध्यते मण्डलाकारो यमलव्रणयोस्तु सः।
खट्वा तु बहुभिर्वृत्ता—
चीनबन्धं विजानीयाच्चौराभिर्वहुभिर्वृत्तम्।
विवन्धो विवधो बन्धः स च पञ्चप्रन्थिकायुतः ॥
ज्ञेयो वितानसंज्ञस्तु वितानाकारसंयुतः।
पाषाणगुडकोत्क्षेपकारिणीं गोफणां विदुः ॥
तदाकृतिं सिषक् कुर्यात् फलस्य पञ्चकं विभिः।
पंचांगी तु वृत्तां कुर्यात् सन्ध्याताय चिकित्सकः ॥
लेखक का शल्यतन्त्र देखिये। गोफण को भाषा में गोफना कहते हैं—जिससे पक्षी उड़ाते हैं। दाम-बड़ी मोटी माला का नाम है। कोश—तलवार के कोश के समान, जिसे खोल कहते हैं। अनुवेलित—बेल के समान ऊपर को बल खाये—इसी प्रकार से सब का वर्णन नाम से स्पष्ट है।
७४
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १८ ]
यन्त्रणमूर्ध्वमधस्तिर्यकं च ॥ १६ ॥
मृदु, सर्म और गाढ़ भेद से बन्ध (गांठ) तीन प्रकार का है। यन्त्रण ब्रण की गांठ, ऊपर नीचे और तिरछे भेद से तीन प्रकार की है। ब्रण की आकृतियों के भिन्न भिन्न आकार होने पर भी यन्त्रण तीन ही प्रकार का है ॥ १६ ॥
तत्र घनां कवलिकां दन्वा वामहस्तपरिच्छेपमुजुमना-विद्वमसंकुचितं मृदु पटुं निवेश्य बधनीयात्। न च ब्रण-स्योपरि कुर्याद् ग्रन्थिमाबाधकरं च ॥ २० ॥
ब्रण के उपर घनी कवलिका (गद्दी, औषध और पट्टी के बीच में रखली वस्तु-केले का पत्ता आदि जो कि औषध की रक्षा के लिये एवं वायु संचार को रोकने के लिये रखली जाती है) रखकर वाम और कोमल पट्टी को घुमाते हुए सरल, सीधा (बिना उलझनों के) एवं मूर्तियों रहित (सिलवटों के बिना) दक्षिण हाथ से बाँधना चाहिये। ब्रण के ऊपर या ब्रण के चारों ओर—(वाम—दक्षिण—पार्श्व में, या पीछे की गई गांठ—सोते समय कष्ट देती है) पीड़ा करनेवाली गांठ नहीं देनी चाहिए ॥ २० ॥
न च विकेशिकौषधे अतिस्निग्धे-अतिरुद्धे विषमे वा कुर्वीत, यस्मादतिस्तेहात् क्लेदः, रौदयाच्छेदः, दुर्न्यासाद् ब्रणवत्सर्मावधर्षणमिति ॥ २१ ॥
औषधकल्क—जी एवं शहद को मिलाकर बल्ल या धागों से बनाई वर्त्ति को विकेशिका कहते हैं। यह विकेशिका—सड़े मांस युक्त ब्रणों में भरी जाती है। इस विकेशिका में औषध-कल्क अधिक नहीं होना चाहिये। न इसमें अधिक स्नेह न अधिक रुक्षता होनी चाहिये। और न इस विकेशिका को बुरी प्रकार (दबाकर या ढीला) रखना चाहिये। क्योंकि अतिस्नेह से क्लिन्नता, रुक्षता के कारण छेदन (विदीर्णता) और बुरी प्रकार से प्रविष्ट करने पर-ब्रणमुख का अवधर्षण होता है ॥ २१ ॥
तत्र ब्रणायतनविशेषाद् बन्धविशेषश्चि विधो भवति—गाढः, समः, शिथिल इति ॥ २२ ॥
पीडयन्तरुजो गाढः सोच्छ्वासः शिथिलः स्मृतः।
नैव गाढो न शिथिलः समो बन्धः प्रक्रीतितः ॥ २३ ॥
ब्रण के स्थानभेद से बन्ध भी तीन प्रकार के हैं। यथा—गाढ़, सर्म और शिथिल। जो बन्ध दवाते समय पीड़ा न करे उसका नाम गाढ़ है, जो बन्ध अन्तः श्वास के साथ हिले—तने-उसका नाम शिथिल और जो बन्धन न गाढ़ और न शिथिलसमान हो उसको 'सम' कहते हैं ॥ २२, २३ ॥
तत्र स्फिककुक्षिकक्षावडक्षणोरुशिरःसु समः, अक्षणोः वदनकर्णकण्ठमेदुमुष्कपृष्ठपाधोदरोःसु समः, अक्षणोः सन्धिष च शिथिल इति ॥ २४ ॥
ब्रण के स्थान भेद से बन्ध—
स्फिक, कुक्षि, कक्षा, वंक्षण, ऊरु एवं शिर इनमें गाढ़ बन्धन चाहिये। शाखा (हाथ-पाँव, मुख, कान, कण्ठ, शिरन, अण्डकोश, पीठ, पार्श्व, उदर और उर में सम बन्ध बाँधना चाहिये। आँखों में तथा सन्धियों में शिथिल बन्ध बाँधना चाहिये ॥ २४ ॥
तत्र पैत्तिकं गाढस्थाने समं बधनीयात्, समस्थाने शिथिलं, शिथिलस्थाने नैव, एवं शोणितदुष्टं च, श्लैष्मिकं शिथिलस्थाने समं, समस्थाने गाढं, गाढस्थाने गाढतरम्, एवं वातदुष्टं च ॥ २५ ॥
दोष विशेष से बन्ध—पैत्तिक ब्रणों में—जिन स्थानों में गाढ़ बन्धन (स्फिक आदि में) बाँधा जाता है वहाँ सम बन्ध बाँधना चाहिये और जिन स्थानों (कान-मुख आदि) में सम बन्ध बाँधना है, वहाँ शिथिल, शिथिलबन्ध के स्थानों में बन्ध बाँधना ही नहीं चाहिये। यही नियम रक्तदूषित ब्रणों में व्यवहार करना चाहिये। श्लैष्मिक ब्रणों में—शिथिल बन्धन के स्थान पर सम, सम के स्थान पर गाढ़ और गाढ़ के स्थान पर अधिक गाढ़ बन्धन बाँधना चाहिये। इसी प्रकार वातदूषित ब्रण बन्धन बाँधना चाहिये ॥ २५ ॥
तत्र पैत्तिकं शरदि ग्रीष्मे द्विरहो बधनीयात्, रक्तो पटुतमप्येवं, श्लैष्मिकं हेमन्तवसन्तयोऽव्यहात्, वातोपटु-तमप्येवम्। एवमभ्यूहा बन्धविपर्ययं च कुर्यात् ॥ २६ ॥
कालविशेष से बन्ध विशेष—पैत्तिक ब्रणों को—शरदऋतु में, और ग्रीष्म में—दिन में दो बार बाँधना चाहिये। रक्त-दूषित ब्रणों को भी इसी विधि से बाँधना चाहिए। श्लैष्मिक ब्रणों को—हेमन्त एवं वसन्त के तीसरे दिन बाँधना चाहिये। इसी प्रकार से रक्तदूषित ब्रणों को भी बाँधना चाहिये। इस प्रकार अपनी बुद्धि से विचार कर ब्रण के बन्धन-विपर्यय को तथा ब्रणमोक्षण को करना चाहिये। यथा—पित्तश्लेष्म ब्रणों को—प्रातःकाल ग्रीष्म एवं शरदऋतु में, हेमन्त में पैत्तिक ब्रणों को प्रतिदिन बाँधना चाहिये ॥ २६ ॥
तत्र, समशिथिलस्थानेषु गाढं बद्धे विकेशिकौषधं नैरर्थक्यं शोफवेदनाप्रादुर्भावश्च। गाढसमस्थानेषु शिथिलं बद्धे विकेशिकौषधपतनं पटुसंचाराद् ब्रणवत्सर्मावधर्षणमिति। गाढशिथिलस्थानेषु समं बद्धे गुणाभाव इति ॥ २७ ॥
यदि सम एवं शिथिल बन्ध के स्थान पर गाढ़ बन्ध बाँध जायगा तो विकेशिका की औषध निरर्थक हो जायेगी एवं शोफ तथा वेदना उत्पन्न हो जायेगी। गाढ़ एवं सम के स्थान पर शिथिल बन्ध बाँधने से विकेशिका की औषधि गिर जायेगी। पट्टी के हिलने से ब्रण का मुख रगड़ेगा। गाढ़ एवं शिथिल के स्थान पर सम बन्ध बाँधने से गुण नहीं होता ॥ २७ ॥
अ० १६]
सूत्रस्थानम्
७५
अविपरीतबन्धे वेदोपशान्तिरसूक्तप्रसादो मार्दवं च ॥२८॥ अविपरीत, ठीक प्रकार से, उचित रूप में बाँधने से वेदना की शान्ति, रक्त की स्वच्छता और कोमलता उत्पन्न होती है ॥२८॥ अवध्यमानो दंशमशकतृणकाष्ठोपलपशुगीतवातातप-
प्रभूतिभिर्विजैर्षैरभिहन्त्यते ब्रणः, विविधवेदोपदुत्तरश्च दुष्टतामुपैति, आलेपनादीनि चाशय विशोषमुपयान्ति ॥२९॥
वृण पर पट्टी को न बाँधने से—दंश ( दास-वनमक्षिका ), मशक ( मच्छर ), तिनकों, लकड़ी, पत्थर, धूल, शीत, धूप, वायु आदि से वृण दूषित हो जाता है, नाना प्रकार की वेदनायें ( रोग ) एवं उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं । वृण पर किये आलेप आदि सब सुख जाते हैं ॥२९॥
चूर्णितं मथितं भग्मं विशिष्टमतिपातितम् ।
अस्थिस्नायुसिराच्छिन्नन्मासु बन्धने रोहति ॥३०॥
सुखमेवं ब्रणी शोते सुखं गच्छति तिष्ठति ।
सुखं शय्यासनस्थस्य क्षिप्रं संरोहति ब्रणः ॥३१॥
चूर्णित ( बहुत खण्डों में भग्म ), मथित ( विलोड़ित ), भग्म ( काण्डभग्म ), विशिष्ट ( सन्धिन्युत ), अतिपातित ( स्थान से न्युत-लटकता हुआ ), अस्थिच्छिन्न, स्नायुच्छिन्न, सिराच्छिन्न वृण बन्धन द्वारा शीघ्र भरता है । बन्धन के कारण वृणी पुरुष सुख पूर्वक सोता है, सुखपूर्वक चलता-बैठता है । विस्तर पर लेटने में, आसन पर बैठने में सुख पहुँचता है, वृण जल्दी भरता है ॥ ३०, ३१ ॥
अबन्ध्याः—पित्तरक्ताभिघातविषनिमिक्ता यदा शोक-दाहपाकरागतोदवेदनाभिभूताः क्षाराग्निदग्धाः पाकात् प्रकृथितप्रशीर्णमांसाश्च भवन्ति ॥ ३२ ॥
निम्न अवस्थाओं में बन्धन नहीं बाँधना चाहिए । यथा—पित्तजन्य, रक्तजन्य, अभिघातजन्य और विषजन्य वृण जब शोके, दाहे, पाके, लालिमा, तोदे, वेदना से युक्त हों, क्षार या अग्नि से जलने के कारण पाक के कारण मांस गल गया हो—(लटक रहा हो) तब वृणों पर पट्टी नहीं बाँधनी चाहिए ॥३२॥
कुष्ठिनामग्निदग्धानां पिडकामधुमेहिनाम् ।
कर्णिकाश्चोन्दुरुविषे विषजुष्टाश्च ये ब्रणाः ॥ ३३ ॥
मांसपाके न बध्यन्ते गुदपाके च दारुणे ।
स्वजुद्धया चापि विभजेत् कृत्याकृत्याश्च बुद्धिमान् ॥ कुष्ठरोगियों के, अग्नि से दग्ध पुरुषों के, मधुमेही पुरुषों की प्रमेहपिडिकायें, मृषिकाविष में, कर्णिका ( दूषित मांसाङ्गुर ) में, विषयुक्त ब्रणों में, मांसपाक की अवस्था में, गुदपाक की भयानक अवस्था में वृणों पर पट्टी नहीं बाँधनी चाहिए । बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपनी बुद्धि से भी बन्ध्य या अबन्ध्य वृणों की परीक्षा करे ॥ ३३, ३४ ॥
देशं दोषं च विज्ञाय ब्रणं च ब्रणकोविदः ।
श्रुतूत्थं परिसंख्याय ततो बन्धानन्तिवैशयेत् ॥ ३५ ॥
ब्रण को जाननेवाला विद्वान् देश, दोष, ब्रण और शीत-उष्ण-साधारण-श्रुतुओं को जानकर बन्धनों को बाँधे ॥३५॥
ऊर्ध्वतिर्यगधस्ताच्च यन्त्रणा त्रिविधा स्मृता ।
यथा च बध्यते बन्धस्तथा वद्याम्यशेषतः ॥३६॥
घनां कवलिकां दन्वा मृदु चैवापि पट्टकम् ।
विकेशिकामोषधं च नातिस्निग्धं समाचरेत् ॥३७॥
प्रकलेदयत्यतिस्निग्धा तथा रूक्षा क्षिणोति च ।
युक्तस्नेहा रोपयति दुर्न्यस्ता वर्त्मं धर्षति ॥३८॥
विषमं च वर्णं कुर्यात् स्तम्भयेत् स्त्रावयेत्तथा ।
यथावृणं विदित्वा तु योगं वैद्यः प्रयोजयेत् ॥३९॥
उपसंहार—
यन्त्रणा तीन प्रकार की है । यथा—ऊर्ध्व, अधः और तिर्यक । जिस प्रकार से बन्ध बाँधा जाता है, उसकी विधि को सम्पूर्ण रूप से कहता हूँ । ब्रण के ऊपर घनी कवलिका को रखकर कोमल वस्त्र से पट्टी बाँधनी चाहिए । विकेशिका की ओषध को न तो बहुत स्निग्ध और न बहुत रूक्ष करना चाहिए । अतिस्निग्ध होने से ब्रण में किल्लता उत्पन्न करती है, और रूक्ष होने से ब्रण का हिंसन करती है । उचित स्नेहवाली बन्ती ब्रण को भरती है, खुरी प्रकार से प्रविष्ट की हुई ब्रण के सुख का धर्षण करती है । ब्रण को विषम बना देती है । स्त्राव को रोक देती है या स्त्राव को आरम्भ कर देती है । इसलिये वैद्य को चाहिए कि ब्रण को देखकर उपचार करे ॥ ३६-३९ ॥
पित्तजे रक्तजे वाऽपि सकृदेव परिक्षिपेत् ।
असंकृतं कफजे वापि वातजे च विचक्षणः ॥४०॥
तलेन प्रतिपीडयाथ स्त्रावयेदनुलोमतः ।
सर्वाश्च बन्धान् गृह्णन्तान् सन्धीश्च विनिवेशयेत् ॥
पित्तजन्य एवं रक्तजन्य ब्रणों में एक बार ही दबाकर दोष निकालना चाहिए । कफजन्य एवं वातजन्य वृणों में बार-बार दबाना आदि करना चाहिए । हाथों के तलुओं से ब्रण को नीचे दबाकर अनुलोम रूप में स्त्राव करना चाहिए । सब प्रकार के बन्ध इस प्रकार बाँधे कि उसके खिरे और जोड़ बाहर से दिखाई न दें ।
वि० मन्तव्य—२ श्लोकों का अर्थ है कि—पित्त ब्रणों पर तथा रक्तजन्य ब्रणों पर पट्टी का एक ही लपेट देना चाहिए, जिससे उसमें ऊष्मा की उत्पत्ति न हो । कफज एवं वातज ब्रणों पर कई लपेट देने चाहिए, जिससे उनका शमन हो । और 'अथ' अर्थात् यथासमय बन्धन खोलकर ब्रण को तल से दबाकर ( यदि उसमें पूरा सञ्चित हो तो ) सीधे मार्ग से पूंज का स्त्रावण करे और फिर बन्धन बाँध देवे । सन्धेपतः सभी बन्धनों में सन्धि बिठाते हुए बन्धन करे । पट्टी के अन्तिम छोर को पट्टी में ही फँसा देवे अर्थात् गाँठ न देवे ॥४०,४१॥
७६
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १२ ]
ओष्ठस्याप्येष सन्धाने यथोहिष्टो विधिः स्मृतः । बुद्धयोत्प्रेक्ष्याभियुक्तं तथा चास्थिषु जानता ॥४२॥ उत्तिष्ठतो निषण्णस्य शयनं चाधिगच्छतः ।
गच्छतो विविधैर्यौर्नैर्नास्य दुष्पति स व्रणः ॥४३॥
यह कही हुई विधि ओष्ठ के सन्धान में भी बरतनी चाहिए । विद्वान् वैद्य को चाहिए कि अपनी बुद्धि से विचार-कर अस्थि आदि जोड़ने के काल में भी उपर्युक्त विधि को काम में लाये । बन्धन बाँधने से-उठते बैठते लेटते समय, नाना प्रकार की सवारियों से जाने पर भी व्रण दृषित नहीं होता ॥४२,४३॥
ये च स्मृमससंस्था वै त्वगताश्च तथा व्रणाः ।
सन्ध्यस्थिकोष्ठप्राप्ताश्च सिरास्तायुगतास्ताथा ॥४४॥
तथाऽवगाढगम्भीराः सर्वतो विषमस्थिताः ।
नाते साधयितुं शक्या कृते बन्धाद्भवन्ति हि ॥४४॥
जो व्रण मांस में या त्वचा में आश्रित हो, सन्धि अस्थि कोष्ठ के व्रण, सिरा-स्तनायु के व्रण, गम्भीर व्रण, सम्पूर्ण रूप से (चारों ओर से) विषम व्रण-ये सब बिना योग्य बन्धन के अच्छे (स्वस्थ) नहीं हो सकते—इनमें बन्धन बाँधना आवश्यक है ॥ ४४,४५ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्रणालेपनबन्धनविधि- र्नामाध्यादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
एकोनविंशोऽध्यायः
अथातो वृणितोपासनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे वृणितोपासनीय (सेवनीय) अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिए कहा था ॥ १-२ ॥
व्रणितस्य प्रथममेवागारमन्विच्छेत्, तच्छागारं
प्रशस्तवास्त्वादिकं कार्यम् ॥३॥
व्रणी पुरुष के लिए सबसे प्रथम शय्या, आसन, घर आदि की व्यवस्था करनी चाहिए और यह घर प्रशस्त प्रदेश में होना चाहिए ॥ ३ ॥
प्रशस्तवास्तुनि गृहे शुचावातपवर्जिते ।
निवाते न च रोगाः स्युः अरीरागन्तुमानसाः ॥४॥
१ प्रशस्त प्रदेश—ऊँचो-नीची भूमि रहित, पूर्व या उत्तर की ओर ढलवान्, काली, या स्वर्णमृत्तिकावाला प्रदेश उत्तम है । विस्तार के लिये चरक-सूत्रस्थान में कूटागार विधि दी है । यथा—“अपहृतास्थि-शर्कराकपाले देवे प्रशस्तरूपसगन्धायाम् भूमौ गुणवति प्रशस्ते भूमिभागे कृष्णमृत्तिके स्वर्णमृत्तिके वा ।” वास्तुशास्त्र में—बिल्बो निर्भरश्च निर्गुण्डी पिण्डितः सप्तपर्णकः । सहकारश्च पद्मवृत्तः आरुढा या समस्थली । निष्कपाला निस्सला कृष्णवल्मीकवर्जिता”—इत्यादि ।
क्योंकि प्रशस्त प्रदेश में बने घर में, पवित्र-स्वच्छ एवं धूप तथा सीधी वायु की रक्षावट (घर में वायु आये-परन्तु सीधी जोर से नहीं आनी चाहिए )—वाले घर में शारीरिक एवं आगन्तु तथा मानसिक रोग नहीं होते ॥४॥
तस्मिन् शयनसमंसाधं स्वास्तीर्णं मनोज्ञं प्राकृजिरस्कं सशस्त्रं च कुर्वीत ॥५॥
इस घर में शय्या—पीड़ा रहित, असंकुचित (पर्याप्त लम्बी चौड़ी), शोभन गढ़े-चादरवाली, रमणीय, हिंसा-निवारण के लिए शस्त्र युक्त करनी चाहिये । शय्या का सिर पूर्व की ओर रखना चाहिये ॥५॥
मुखचेष्ठाप्रचारः स्यात् स्वास्तीर्णं शयने वृणी ।
प्राच्यां दिशि स्थिता देवास्तत्पूजार्थं च तच्छिरः ॥६॥
इस प्रकार शय्या पर सोने से लाम—ब्रह्म-रोगी पुरुष सुन्दर बिलौनेवाली शय्या पर सोकर अपनी चेष्टायेँ मली प्रकार से आराम से कर सकता है । पूर्व दिशा में देवता रहते हैं (सूर्य आदि) । उनकी पूजा के लिए रोगी का सिर पूर्व दिशा में रखा जाता है । “सूर्य आत्मा जगतस्तत्पुष्यश्च ॥” श्रुतिः, “आरोग्यं भास्करादिच्छेत्” ॥ ६ ॥
तस्मिन् सुहृद्भिरनुकूलैः प्रियंवदैरुपास्यमानो यथेष्ठमासीत ॥७॥
इस घर में अपने मन के अनुकूल, प्रिय बोलनेवाले मित्रों के साथ मिलकर यथेष्ठ समय तक निवास करे ॥ ७ ॥
सुहृदो विक्षिपन्त्याशु कथाभिन्नैर्गवेदनाः ।
आश्वासयन्तो बहुगः स्वानुकूलाः प्रियंवदाः ॥८॥
क्योंकि मित्र लोग नई नई बातें कहकर रोग की वेदना को भुला देते हैं । नाना प्रकार से सान्त्वना देते हुए, मन के अनुकूल प्रिय—कहनेवाले मित्र—वेदना को कम कर देते हैं ॥
न च दिवा निद्रावशगः स्यात् ॥९॥
दिवास्वप्नान्द वृणे कण्डुर्गुत्राणां गौरवं तथा ।
श्रयथुवदना रागः स्नावश्चैव भुशं भवेत् ॥१०॥
व्रणी पुरुष को कभी भी दिन में नहीं सोना चाहिए । क्योंकि—दिन में सोने से व्रण में कण्डु उत्पन्न हो जाती है, अङ्गों में भारीपन आ जाता है, व्रण में सूजन, लालिमा और बहुत स्नाव आरम्भ हो जाता है ॥ ९,१० ॥
उत्थानसवैशनपरिवर्तनचड्कमणोच्चैर्भाषणद्यास्वा- त्मचेष्ठास्वप्रभतो वृणं संरक्षेत् ॥११॥
स्थानासनं चड्कमणं दिवास्वप्नं तथैव च ।
वृणितो न निषेवेत् शक्तिमानपि मानवः ॥१२॥
व्रणी पुरुष को चाहिए कि अपनी चेष्टाओं में—उठने, बैठने, वाम-दक्षिण करवट बदलने में—चलने में—बहुत सावधानी बरते । उठना, बैठना, धूमना, दिन में सोना बलवान् भी व्रणी सेवन न करे ॥११,१२॥
अ० १६ ]
सूत्रस्थानम्
७७
उत्थानाद्योऽसन् स्थानं शय्या चातिनिषेविता ।
प्राप्नुयान्मास्तादङ्गरुजस्तस्माद्विजयेत् ॥१३॥
अधिक उठने से, अधिक बैठने से, अधिक सीधा खड़ा होने से, अधिक विस्तर पर पड़े रहने से अङ्गों में वायु प्रकुपित होती है, इससे दर्द बढ़ जाती है ॥१३॥
गम्यानां च स्त्रीणां संदर्शनसंभाषणसंस्पर्शनानि दूरत एव परिहरेत् ॥१४॥
गम्य ग्राम्यधर्म के योग्य स्त्रियों के दर्शन, इनके साथ बोल-चाल, इनके स्पर्श से-दूर से ही बचना चाहिये । (अगम्य स्त्रियों की बात ही नहीं) ॥१४॥
स्त्रीदर्शनादिभिः शुक्लं कदाचिच्छलितं स्रवेत् ।
ग्राम्यधर्मकृतान्दोषान् सोऽसंसर्गोऽप्यवाप्नुयात् ॥१५॥
क्योंकि कभी अकस्मात् स्त्रीदर्शन आदि से शुक्ल क्षतित हो जाय तो ग्राम्यधर्म के बिना भी, ग्राम्यधर्म द्वारा उत्पन्न विकार-इस शुक्लक्षव से उत्पन्न हो जाते हैं ॥१५॥
नवधान्यमाषतिलकलायकुल्लथनिष्पात्रहरितकशाका- मल्लवणकटुकगुडपिष्टविकृतिवल्लूरशुष्कशाकाजाविकान्- पौदकमांसवसाशीतोदककुशरापायसदधिदुग्धतकप्रभृ- तानि परिहरेत् ॥१६॥
निम्न आहार का परित्याग करना चाहिये-नये धान्य (एक साल जिन धान्यों पर नहीं बीता), उड़द, तिल, कलाय (मटर), कुल्लथी, निष्पात्र (राजशिम्ब), हरितक१ अम्ल, लवण, कटुरस, गुडपिष्टी-गुड से बने पदार्थ, वल्लूर (शुष्क मांस), शुष्क शाक, बकरी-भेड़ का मांस, आनूप मांस, औदक मांस, बसा, शीत पानी, कुशरा (तिल-तण्डुल-माष से बनी यवागू), पायस (खीर), दधि, दूध, तक प्रभृति (गुरु पदार्थों) का परित्याग करना चाहिये॥
तकान्तो नवधान्यादियोऽयं वर्ग उदाहृतः ।
दोषसजननो ह्येष विज्ञेयः पूयवर्धनः ॥१७॥
नवधान्य से लेकर तक तक जो पदार्थ कहे हैं, ये सब वृण में दोष उत्पन्न करनेवाले हैं । इनके सेवन से वृण में पूय बढ़ती है ॥१७॥
मद्यपक्ष मरैयारिष्टासवसीधुसुराविकारान् परिहरेत् ॥१८॥
व्रणी पुरुष यदि मद्यपी हो (या न भी हो) तो भी उस को मरैय (सुरा और आसव को एक पात्र में बन्द करके बनाने से) अरिष्ट (स्वाथ से बनाया), सीधु (सस्यक), सुरा (लोहित वर्ण)- मद्य के विकारों का परित्याग करना चाहिये । (कई आचार्यों
का मत है कि 'अम्लादि गुण युक्त सब प्रकार के मद्य का निषेध है' परन्तु अम्लादि से विपरीत-द्राक्षारसादि पिठाने चाहिये) ॥ मद्यमलं तथा रूक्षं तीक्ष्णगुणं च वीर्यतः॥
आशुकारि च तत् पीतं क्षिप्रं व्यापादयेद् व्रणम् ॥१९॥
मद्य-अम्लरस, रूक्ष, तीक्ष्णगुण, उष्णवीर्य, और शरीर में शीघ्र व्याप्त होने से क्षिप्रकारी है, इसलिये व्रण को बहुत जल्दी दूषित कर देता है । (मद्य के दस गुण ओज के गुणों से विपरीत हैं । इसलिये मद्य ओज का नाश करने से व्रण में अहितकर है)॥
वातातपरजोधूमावश्ययायतिसेवनातिभोजनातिष्ठभोजनश्रवणदर्शनेष्यांमर्षभयशोकध्यानरात्रिजागरणविषमाशनशयनोपवासवाग्ध्यायामस्थानचङ्क्रमणशीतवातविरुद्धाध्यशनाजीर्णमक्षिकावाबाधाः परिहरेत् ॥२०॥
बाह्य आहार-विहार-वात, धूप, धूल, धूवा, ओस, इनका अधिक सेवन, अतिभोजन, अनिष्ट भोजन, अनिष्ट वात का सुनना, अनिष्ट वस्तु का दर्शन, ईष्यां, क्रोध, मय, शोक, चिन्ता, रात्रि में जागना, विषमाशन, उपवास करना, विषम शयन, अनशन, वाणी का श्रम (जोर से बोलना), सीधा खड़ा होना, चलना, शीतवायु, विरुद्ध भोजन(दूध, मछली को साथ खाना), अजीर्ण, मक्खी आदि से बचना चाहिये । (विषमशयन-कम या अधिक खोना) ॥२०॥
व्रणिनः संप्रतप्तस्य कारणैरेवमादिभिः ।
क्षीणशोणितमांसस्य भुक्तं सम्यङ् न जीर्यति ॥२१॥
अजीर्णात् पवनादोनां विघ्नभो बलवान् भवेत् ।
ततः शोफरुजास्त्रावदाहपाकान्वाप्नुयात् ॥२२॥
उपर्युक्त एवं अन्य इसी प्रकार के कारणों से व्रणी पुरुष के दुःखी होने पर-मांस और रक्त क्षीण हो जाता है, जिससे कि खाया भोजन मली प्रकार से जीर्ण नहीं होता । अजीर्ण के होने से वात-पित्त कफ का स्थानान्तर में जाना होता है । इससे सूजन, पीड़ा, रक्तक्षव, विदाह और पाक उत्पन्न हो जाते हैं ॥२१, २२॥
सदा नीचनखरोग्णा शुचिना शुक्लवाससा शान्ति- मङ्गलदेवताब्राह्मणगुरुपरेण भवितव्यमिति । तत् कस्य हेतोः ? हिंसविहाराणि हि महाचीवीणि रक्ष्यासि पशु- पतिकुबेरकुमारानुचराणि मांसशोणितप्रियत्वात् क्षतज- निमित्तं व्रणिनमुपसर्पन्ति, सत्कारार्थं जिघासून्नि वा कदाचित् ॥२३॥
व्रणी पुरुष को सदा नख और बाल कटाकर पवित्र-साफ, श्वेत वस्त्र धारण करने चाहिये । मन की शान्ति, मङ्गल, देवता, ब्राह्मण और गुरु की आज्ञाव सेवा में सदा तत्पर रहना चाहिये। यह सब किसलिये ? क्योंकि हिंसा के लिये विहार (प्रवृत्ति)
१ हरितशाक--'कुठेर-शिषु-सुरस-सुमखासुरि-भूस्तृणाः । चुकाक-शुक्रिका चेति वर्ग हरितकं विदुः'॥
७६
सुश्रुतसंहिता
[अ० १६]
करनेवाले बड़े शक्तिशाली महेश; कुबेर और कार्तिकेय की आज्ञा का पालन करनेवाले राक्षस—मांस एवं रक्त की चाहना से रक्त के कारण व्रणी पुरुष के पास आते हैं। इनके आने का उद्देश्य-पूजा प्राप्त करना या गतायुष को मारने के लिये आना है। ॥२३॥
कहा भी है—
भवति चात्र—
तेषां सत्कारकामानां प्रयतेतान्तरात्मना ।
धूपबल्युपहारान्श्च भक्ष्यान्श्चोपहारयेत् ॥२४॥
इन पूजाभिलाषी अनुचरों के सत्कार के लिये अन्तरात्मा से प्रयत्न करना चाहिये। इनको धूप (नैवेद्य), बलि (पूजा), उपहार (पशुबलि) एवं उत्तम भक्ष्य देने चाहिये ॥२४॥
ते तु संतर्पिता आत्मवन्तं न हिंस्युः । तस्मात् सतत-मतन्द्रितो जनपरिवृतो नित्यं दीपोदकशस्त्रसम्पुष्पला-जायलङ्कृते वैश्वमनि संपनमङ्गलमनोऽनुकूलाः कथा शृण्वन्नासीत् ॥२५॥
ये अनुचर भली प्रकार से तृप्त होने पर जितेन्द्रिय पुरुष को नहीं मार सकते, इसलिये सदा सावधान (चौकश), मनुष्यों से घिरा, सदा दीप-पानी-शस्त्र-संग (सिर की माला), दाम-फूल-लाजा-वीणा-चन्दन आदि ऐश्वर्य से युक्त होकर मङ्गल, सुन्दर एवं अनुकूल (मन-पसन्द) कथाओं को सुनता हुआ समय बिताये ॥२५॥
संपदाद्यनुकूलाभिः कथाभिः प्रीतमानसः ।
आशावान् व्याधिभोक्षाय क्षिप्रं सुखमवाप्नुयात् ॥२६॥
उपर्युक्त ऐश्वर्य से युक्त होकर अनुकूल मन के प्रिय कथाओं को सुनते हुए, रोग की शान्ति में आशा रखने से (मैं अवश्य अच्छा हो जाऊँगा) शीघ्र स्वस्थ हो जाता है ॥२६॥
ऋग्यजुःसामाथर्ववेदाभिहितैरपरेआशीर्विधानैरुपा-
ध्याया भिषजश्च सन्ध्ययो रक्षां कुर्युः ॥२७॥
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद में कहे तथा अन्य आशीर्वादों द्वारा पुरोहित तथा वैद्य प्रातः सायं दोनों सन्ध्या-कालों में रोगी की रक्षा करें ॥२७॥
सर्षपारिष्टुपत्राभ्यां सर्पिषा लवणेन च ।
द्विरहः कारयेद् धूपं दशरात्रमतन्द्रितः ॥२८॥
सरसों, अरिष्टपत्र (निम्बपत्र), घी और सेन्धव नमक, इनके साथ दुस दिन तक बिना आलस्य किये-प्रातः सायं 'धूप' देना
१ पूजा के लिये आगे कहेंगे—
“अशुचि भिक्षुभ्यां क्षतं वा यदि वाऽक्षतम् ।
हित्यहिसाविहाराय सत्कारार्थमथापि वा ॥
विस्तार के लिये 'अमानुषोपसर्गं प्रतिषेधं' नामक अध्याय देखिये ।
चाहिये—(त्रण के सिवाय विस्तार कपड़े आदि पर भी धूप देना चाहिये—जैसा चरक० शारीर द अ० में कहा है ।) ॥२८॥
छत्रामतिच्छत्रां लाङ्ग (ङ्ग)लीं जटिलां ब्रह्मचारिणीं लक्ष्मीं गुहामतिगुहां वचामतिविषां शतवीर्यां सहस्रवीर्यां सिद्धार्थकांश्च शिरसा धारयेत् ॥२९॥
निम्न औषधियों को सिर पर धारण करना चाहिये । यथा छत्र, अतिच्छत्र (दोनों द्रोणपुष्पी-गोमा), लांगली (कलिहारी या कपिकच्छु-कौंच), जटिला (जटामांसी), ब्रह्मचारिणी (मुण्डतिका या लालचन्दन वा मण्डूकपर्णी), लक्ष्मी (लक्ष्मणा या शमी), गुहा (शालपर्णी), अतिगुहा (घृशिनपर्णी), शतवीर्या (शतावरी या दूर्वा) सहस्रवीर्या (श्वेत दूर्वा), और सिद्धार्थक (सरसों), इनको सिर पर धारण करना चाहिये ॥२९॥
व्यज्येत बालव्यजनेत्रैर्णं न च विघट्येत ।
न तु देव च कण्डूयेच्छयानः परिपालयेत् ॥ ० ॥
त्रण को चमर से वायु करते रहना चाहिये, दवाना, सूई आदि से वैधना तथा खुजाना नहीं चाहिये और त्रणरोगी सौते समय भी त्रण की रक्षा करता रहे अर्थात् त्रण पर कोई आश्रय न पहुँचे ॥३०॥
अनेन विधिना युक्तमादावेव निशाचराः ।
वन्तं केशरिणाऽऽक्रान्तं वर्जयन्ति मृगा इव ॥३१॥
इस उपर्युक्त विधि के सेवन करने से राक्षस लोग पहले से ही भाग जाते हैं, जिस प्रकार कि केशरी-सिंह से आक्रान्त वन में मृग नहीं घुसते, इसी प्रकार राक्षस भी त्रण के पास नहीं आते ॥३१॥
जीर्णशाल्योदनं स्निग्धमल्पमुण्डं द्रवोत्तरम् ।
मुञ्जानो जाङ्गलैर्मांसैः शोघ्रं त्रणमपोहति ॥३२॥
तण्डुलीयकजीवनतीसुनिषण्णकवास्तुकेः ।
बालमूळकवातांकपटोलेः कारवेत्तलकैः ॥३३॥
सदाडिमैः सामलकैर्घृतश्चष्टैः ससैन्धवैः ।
अन्यैरेवंगुणैर्वाऽपि मुद्गादादीनां रसेन वा ।
सक्तून् विलेपी कुलमाषाङ्गजलं चापि श्रुतं पिबेत् ॥३४॥
सेव्यविधि—स्निग्धं, अल्प उष्णं एवं द्रव-बहुल, पुराने शाली खावलों के भात को जांगल मांस के साथ
१ राक्षस शब्द या इसके पर्याय निशाचर आदि वर्तमान कालीन रोगोत्पादक कीटाणु-मच्छर आदि के लिये सङ्गत हैं। राक्षसों की भांति ये भी रात को अन्धेरे में, असावधानी में आक्रमण करते हैं, इनको मांस, रक्त पसन्द है। पवित्रता होने से भागते हैं।
२ द्रवोत्तर का अर्थ-भोजन के पोछे पानी पीने से भी है। क्योंकि—'क्षिप्रं जरां गच्छति, वातमनुलोमयति, अनुदीर्घाव्याजितम् दीरयति। अधिक पानी अर्थ करना ठीक नहीं। क्योंकि भोजन इसको हानिकारक कहा है—बूणे च मधुमेहे च पानीयं मन्दावबरेत् ।
३० ]
सूत्रस्थानम्
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खाने से व्रण शीघ्र भरता है। ( क्योंकि—मांस मांस से बढ़ता है )। तण्डुलीयक (चौलाई), जीवन्ती (डोढ़िका), सुनिषण्णक (चौपतिया), वास्तुक (बथुवा), बालमूलक (नर्ममूली), वात्ताक (बैंगन) पटोल (परबल), कारवेल्लक (करेला), इनको घी में भूनकर (तेल में नहीं) अनारदाना, आँवला और सैन्धानमक के साथ संस्कृत भात को—इसी प्रकार से अन्य इसी प्रकार के गुणवाले-मूज, मांसरस के साथ खाये, सूचू, विलेपी (लप्सी), कुल्माष (अर्द्धस्निग्ध गेहूँ या चने) और गरम करके ठण्डा किया जल पीना चाहिये ॥३२-३४॥
दिवा न निद्रावशगो निवातगृहगोचरः ।
व्रणी वैद्यवशे तिष्ठन् शीघ्रं व्रणमपोहति ॥३५॥
‘वात रहित घर में रहता हुआ रोगी दिन में कभी भी नहीं सोवे। वैद्य की आज्ञा का पालन करने से घाव शीघ्र भर जाता है ॥३५॥
व्रणे श्वयशुरायासात् स च रागश्च जागरात् ।
तौ च रुक् च दिवास्वापात्ताश्च मृत्युश्च मैथुनात् ॥३६॥
परिश्रम करने से व्रण में सूजन उत्पन्न होती है, रात में जागने से व्रण में सूजन एवं लालिमा आती है। दिन में सोने से व्रण में सूजन, लालिमा और वेदना हो जाती है। मैथुन से सूजन, लालिमा, वेदना और मृत्यु होती है ॥३६॥
एवंघृतसमाचारा व्रणी संपद्यते सुखी ।
आयुश्च दीर्घमान्नेति धन्वन्तरिवचो यथा ॥३७॥
इस प्रकार के आहार-विहार का पालन करने से व्रणी सुखी (स्वस्थ) होता है, दीर्घायुष्य को प्राप्त करता है—ऐसा धन्वन्तरि का वचन है ॥३७॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्रणितोपासनीयो
नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥१६॥
विंशतितमोऽध्यायः
अथातो हिताहितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे ‘हिताहितीय’ अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत से कहा था।
वि० मन्तव्य—‘हित’ शब्द का अर्थ—“दुष्पाञ्चरण पोषणयोः” धातु से हित शब्द की निष्पत्ति होती है अर्थात् जो आहार विहार धारण (जीवन) तथा पोषण (पालन) का हेतु
चरक में—लौहितशालयः शूकधान्यानाम् ; मुद्गाः शमीधान्यानाम् , सैन्धवं लवणानाम् , जीवन्तीशकं शाकानां पथ्यतमत्वे श्रेष्ठतमः ।
होता है वह “हित” कहलाता है और इसके विपरीत “अहित” ॥१,२॥
यद्व्यायोः पथ्यं तत् पित्तस्यापथ्यमित्यनेन हेतुना न किंचिद् द्रव्यमेकान्तेन हितमहितं वाऽस्तीति केचिद्वाचार्थां नृवते । तत्तु न सम्यक् ; इह खलु यस्माद् द्रव्याणि स्वभावतः संयोगतश्चैकान्तहितान्येकान्ताहितानि हिताहितानि च भवन्ति ॥३॥
कई आचार्यों का मत है कि—जो वस्तु वायु के लिये पथ्य है, वही वस्तु पित्त के लिये अपथ्य (अहितकारी) है। यथा—तैल, काज्जिक आदि। इसलिये कोई भी द्रव्य पूर्ण रूप में हितकारी या अहितकारी नहीं कहा जा सकता। यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि—इस सुश्रुत तन्त्र में—द्रव्य-स्वभाव से (प्रकृति से—जो कि अवस्थाओं में एक समान रहती है यथा—बहि की उष्ण, जल की द्रव), संयोग से (एक या दो-तीन द्रव्यों के साथ संयोग होने से) पूर्ण रूप से हितकारी या पूर्ण रूप में अहितकारी अथवा हित एवं अहित दोनों करनेवाले होते हैं।
वि० मन्तव्य—‘तत्तु न सम्यक्’ अर्थात् यह ठीक (युक्ति संगत) तो है परन्तु बहुत ठीक नहीं है। पथ्य शब्द का अर्थ—जो पथ्य—जीवन यात्रा के अनपेक्ष—अनुकूल हो। इसके विपरीत अपथ्य ॥३॥
तत्र, एकान्तहितानि जातिसास्यात् सलिलघृतदुग्धौ-दनप्रभृतीनि; एकान्ताहितानि तु दहनपचनमारणादिषु प्रवृत्तान्यनलक्षारविषादीनि, संयोगादपराणि विषतुल्यानि भवन्ति; हिताहितानि तु यद्व्यायोः पथ्यं तत् पित्तस्यापथ्यमिति ॥४॥
इनमें पूर्ण रूप में हितकारी द्रव्य—(जाति-जन्म से ही सात्त्व्य की दृष्टि से)—पानी, घी, दूध, चावल, जौ, गेहूँ आदि जन्म से ही हितकारी हैं। पूर्ण रूप में अहितकारी—अग्नि, क्षार एवं विष आदि वस्तुयें जलाने, पकाने या मारने के लिये व्यवहार में लायी जाती हैं। संयोग के कारण दूसरे द्रव्य विष के समान हो जाते हैं। हितकारी एवं अहितकारी द्रव्य—जो वायु के लिये पथ्य है, वही द्रव्य पित्त के लिये अहितकारी हैं। सात्त्व्य—निरन्तर उपयोग से जो आत्मा के अनुकूल हो जाये ॥
अतः सर्वे प्राणिनामयमाहाराथं वर्गं उपदिश्यते, तद्यथा—रक्तशालिषष्टिककङ्कुमकुन्दकपाण्डुकपीतकप्रभो - दककालकवासनपुष्पककदंमकरकुन्दाहृतमुगन्धककलमनी - वारकोद्रवोहालकशमाकगोधूमयव-वैणवैणहरिणकुंरुद्र - मुगमातुराक्षवदंष्ट्रिकरालककरकपोतलावतिचिरिकपिञ्ज - लवर्तीरवर्तिकामुद्गवन्तमुद्गमकुष्ठकलायमसूरभङ्गल्यच - णकहरेण्वाढकीसतीनाशिचलिवस्तुकुसुनिषण्णकजीवन्ती-
२०
सुश्रुतसंहिता
[ अ० २० ]
तण्डुलीयकमण्डूकपण्यः, गन्धं घृतं, सैन्धवं, दाडिमामल-कमित्येष वर्गः सर्वप्राणिनां सामान्यतः पथ्यतमः ॥१॥
सब प्राणियों के पथ्य आहार के लिये इस निम्नलिखित वर्ग का उपदेश करते हैं। यथा—लाल चावल, पछि (श्वेत साठी), कङ्कुक (कङ्कनी), सुकुन्द (काले साठी), पाण्डुक (पीले धान्य), पीतक, प्रमोदक, कालक, असनक, पुष्पक, कर्दमक, शकुनाहृत, सुगन्धक (देवशालि), कमल, नीवार, कोद्रव (कोदौ), उद्दालक (वनकोद्रव), श्यामाक (सांवक), गेहूँ, वैणव (वेणुव) और जो ये शूकधान्यों में उत्तम हैं। एण (काला-हरिण), हरिण, कुरङ्ग, मृगमातृका, श्वदंशु (कर्कटक), कराल कस्तूरीमृग), क्रकर (क्रकस पक्षी), कबूतर, बटेर, तीतर, कपि-ज्जल, वत्तीर, वत्तिका—इनका मांस जांगल मृग एवं जांगल पक्षियों में श्रेष्ठ है। मूङ्ग, वनमूङ्ग, मोठ, कलाय (मटर), मसूर, मङ्गल्य (पाण्डुवर्ण मसूर), चना, हरेणु (सतीन का भेद), आङ्की (अरहर), सतीन (वर्तुलक), चिल्ली (खेत का बथुवा), वास्तुक (बथुवा), सुनिषणक (चौपतिया), जीवन्ती, तण्डुली-यक (चौलाई), मण्डूकपर्णी—ये वेदल—दालों में तथा शाकों में श्रेष्ठ हैं। स्नेहों में गाय का घी उत्तम है। नमकों में सैन्धव, फलों में आँवला और अनार उत्तम हैं। यह वर्ग सामान्यरूप में सब प्राणियों के लिये हितकारी है ॥१॥
तथा ब्रह्मचर्य्यनिवातशयनोष्णोदकस्नाननिशास्वप्न-व्यायामाश्रैकान्ततः पथ्यतमाः ॥६॥
आहार को कहकर विहार को कहते हैं। यथा—ब्रह्मचर्य्य निवात शयन (वायु रहित स्थान में सोना), गरम पानी से स्नान, रात्रि में सोना और व्यायाम तथा उपस्थित वेगों को न रोकना—ये कार्य पूर्णरूप से हितकारी हैं ॥६॥
एकान्तहितान्येकान्तहितानि तु प्रागुपदिष्टानि, हितानि तु यद्वायोः पथ्यं तत् पित्तस्यापथ्यमिति ॥७॥
एकान्त हित (पानी आदि) और एकान्त अहित (अग्नि आदि) वस्तुओं को पहिले कह चुके हैं। हितकारी एवं अहित कारी जो वस्तुयें वायु के लिये हैं, वे ही पित्त के लिए अपथ्य हैं ॥७॥
संयोगतस्त्वपराणि विषतुल्यानि भवन्ति। तद्यथा-वल्लीफलकवककरीराम्लफललवणकुल्लथपिण्याकदधितैल-विरोहिपिष्टगुष्कगाकाजाविकमांसमद्यजाम्बवचिलिचिम-मत्स्यगोधावराहश्रै नैकध्यमरनीयात् पयसा ॥८॥
अन्य द्रव्य संयोग के कारण विष के समान अहितकारी हो जाते हैं। यथा—वल्लीफल (बेल पर लगानेवाला फल—कूम्भाण्ड आदि), कवक (छत्रक), करीर (वंशांकुर), अम्लफल (आम्रतक), लवण, कुल्लथी, पिण्याक (तिलपिष्ट), दही; तैल, आनूप मांस, औदक मांस, विरोहि (जड़ा हुआ धान्य), पिष्ट
(पीठी), शुष्कशाक, बकरी या भेड़ का मांस, मद्य, जामुन फल, चिलचिम मस्य (सकली) गोधा, वराह—इन वस्तुओं को एक समय में दूध के साथ नहीं खाना चाहिये ॥८॥
रोगं सात्स्यं च देशं च कालं देहं च बुद्धिमान् ॥
अवेक्ष्याग्न्यादिकान् भावान् रोगवृत्तेः प्रयोजयेत् ॥९॥
बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि रोग (उदर आदि), सात्स्य (जाति, आतुर, ओषध, अन्न, रस, देश, ऋतु, उदक), देश (आनूप आदि), काल (शीत-उष्णवर्षा) देह स्थूल, कृश और मध्य, अग्नि आदि पदार्थों का भी उपयोग करे। यथा—उदर रोग में तिलमात्र विषमक्षण, या कृष्णसर्प से दष्ट में हस्तु का मक्षण भी हितकारी है।
वि० मन्तव्य—सात्स्य—जो शरीर में उपकार के लिये शयन करे लीन-बिलीन हो जाय “सात्स्यं नाम तत् यद् आत्मनि उपशेते तत् सात्स्यम्—सात्स्याथो हि उपशयार्थः।” सात्स्य का नाम उपशय भी है और दोनों शब्दों का तात्पर्य एक ही है ॥९॥
अवस्थान्तरबाहुल्याद्वोगादीनां व्यवस्थितम् ॥
द्रव्यं नेच्छन्ति भिषज इच्छन्ति स्वस्थरक्षणं ॥१०॥
द्वयोरन्यतरादाने वदन्ति विषदुग्धयोः।
दुग्धस्वैकान्तहिततां विषमेकान्ततोऽहितम् ॥११॥
एवं युक्तरसेष्वेषु द्रव्येषु सलिलादिषु।
एकान्तहिततां विद्धि वत्स सुश्रुत नान्यथा ॥१२॥
वैद्य को रोग आदि की अवस्था भेद के कारण हित एवं अहित की व्यवस्था को नहीं चाहते। स्वस्थवृत्त में हित एवं अहित का विचार करते हैं, रोग में नहीं करते। दूध और विष इन दोनों के ग्रहण करने में एक को (विष को) एकान्त रूप में अधिकारी कहते हैं। हे सुश्रुत! इस प्रकार दूध की भांति प्रभाव संसिद्ध रसयुक्त सलिल आदि द्रव्यों को एकान्त रूप से हितकारी समझना चाहिये ॥१०—१२॥
अतोऽन्यान्यपि संयोगादहितानि वद्यामः—नवविरु-दधान्यैर्वैसामधुपयोगदुग्धमाषैर्वा ग्राम्यान्पौदकपिशितादीनि नाभ्यवहरेत्; न पयोमधुभ्यां रोहिणीशाकं जानुकशाकं वाशनीयात्, बलाकां वारुणीकुल्माषाभ्यां, काकमाचीं पिपल्लीमरिचाभ्यां, नाडीभङ्गशाककुक्कुटदधीनि च नैकध्यं; मधु चोष्णोदकानुपानं; पितेन चाममांसानि सुराकृशरापायसांश्च नैकध्यं; सौवोरेकेण सह तिलगङ्कुरीं मत्स्यैः सहैह्विकारान्; गुडेन काकमाचीं, मधुना मूलकं गुडेन वाराहं, मधुना च सह विरुद्धं; क्षीरेण मूलकम् आप्राजाम्बवश्चाविच्छूकरगोधाश्र; सर्वाश्च मत्स्यान् पयसा; विगपेण चिलिचिमं; कदलीफलं ताळफलं पयसा दध्ना तक्केष्ट वा; लकुचफलं पयसा दध्ना माष-सूपेन वा प्राक् पयसः पयसोऽन्ते वा ॥१३॥