त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
नवमोऽध्यायः । ११७ ममार्थमखिलं त्यक्त्वा यत्त्यक्तुं नैव शक्यते । तथाऽऽत्मानं समालक्ष्य परं श्रेयः समाप्नुहि ॥ १६ ॥ इत्युक्तः प्रियया हेमचूड उत्थाय वै द्रुतम् । ययावश्वं समारुह्य तत्क्षणे नगराद्बहिः ॥ १७ ॥ उद्यानं नन्दनसमं प्रविश्य क्षणमात्रतः । वनान्तसौधमुन्नम्रं स्फाटिकं प्रविवेश ह ॥ १८ ॥ विसृज्यानुचरान् सर्वान् द्वारपालानशासयत् । न कोऽप्यत्र प्रविशतु मय्येकान्तविचारणे ॥ १९ ॥ राजामात्याश्च गुरवो राजा वाऽप्यत्र सङ्गतः । अप्रवेश्या एव यावदहमाज्ञां दिशामि वः ॥ २० ॥ इत्युक्त्वाऽऽरुह्य सौधाग्र्यं नवमीं भूमिमाविशत् । तत्र वातायने चित्रे सर्वलोकावलोकने ॥ २१ ॥ इसी प्रकार 'अपने' कहे जानेवाले सभी पदार्थोंको त्यागने पर फिर जिसका त्याग न किया जा सके उसीको आत्मा जानकर आप परम कल्याणको प्राप्त करें" ॥ १६ ॥ प्रियाके इस प्रकार कहनेपर हेमचूड तत्काल उठा और घोड़ेपर चढ़कर उसी समय नगरसे बाहर चला गया ॥ १७ ॥ एक क्षणमें ही वह नन्दनवनके समान अपने उद्यानमें पहुँचा और उसके भीतर स्फटिकके बने हुए एक ऊँचे मन्दिरमें प्रविष्ट हो गया ॥ १८ ॥ अपने सभी सेवकोंको उसने बाहर छोड़ दिया और द्वारपालोंको आज्ञा दी की यहाँ एकान्त में विचार करते समय कोई भी भीतर न आये ॥ १६ ॥ चाहे राजमन्त्री, गुरुजन अथवा स्वयं महाराज भी यहाँ आवें तो भी जबतक मैं तुम्हें आज्ञा न दूँ तबतक उन्हें भी प्रवेश नहीं करना चाहिये ॥ २० ॥ ऐसा कह वह महलके ऊपर चढ़कर नवीं मंजिलपर पहुँच गया । वहाँके झरोखे में जहाँसे सब ओरका दृश्य दिखायी देता था,
११८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे आसने मृदूतूलाढ्ये विवेशान्यत्रिवर्जितः । मनः समाधाय दृढं विचारमकरोत्तदा ॥ २२ ॥ नूनमेते जनाः सर्वे कथमेवं विमोहिताः । न कोऽप्यत्र विजानाति स्वात्मानं लेशतोऽपि च ॥ २३ ॥ सर्वोऽपि स्वात्मनो हेतोः करोति विविधाः क्रियाः । केचित् पठन्ति शास्त्राणि साम्नायानि च नित्यशः ॥ २४ ॥ केचिद्धनान्यर्जयन्ति केचिच्छासति चावनिम् । अन्ये युध्यन्ति रिपुभिरन्ये भोगैकलम्पटाः ॥ २५ ॥ कुर्वन्त्येतत् स्वार्थमेते स्वस्वात्मा कतमो भवेत् । नैनं जानाति कोऽप्यत्र कुत एवमयं भ्रमः ॥ २६ ॥ अहो यथावदात्मानमविदित्वाैव वै कृतम् । व्यर्थं स्वप्ने कृतमिव तदद्य विमृशामि तम् ॥ २७ ॥ कोमल रुईसे भरे गद्दे पर बैठ गया और मनको अच्छी तरह एकाग्रकर विचार करने लगा । उस समय वहाँ और कोई नहीं था ॥ २१-२२ ॥ 'सचमुच ये सब लोग ऐसा क्यों मोहमें पड़े हैं ? यहाँ कोई अपने आत्मस्वरूपको लेशमात्र भी तो नहीं जानता ! ॥ २३ ॥ सब लोग अपने सुखके लिये ही तरह-तरहके कर्म कर रहे हैं । कोई नित्यप्रति शास्त्राध्ययन करते हैं और कोई वेदपाठमें लगे हुए हैं ॥ २४ ॥ कोई धनोपार्जन करते हैं, कोई पृथ्वीका शासन कर रहे हैं, कोई शत्रुओंके साथ युद्ध करनेमें संलग्न हैं और कोई भोग भोगनेमें मस्त हैं ॥ २५ ॥ ये सब कार्य अपने ही लिये समझकर किये जाते हैं, किन्तु यह कोई नहीं जानता कि अपना आत्मा कौन है । ऐसा भ्रम कैसे हो गया ॥ २६ ॥ अहो ! इस आत्मतत्त्वको यथावत् बिना जाने तो ये सभी कर्म स्वप्नमें किये कर्मोंके समान व्यर्थ ही हैं। इसलिये अब मैं उस आत्मा- का ही विचार करता हूँ ॥ २७ ॥
नवमोऽध्यायः । ११६ गृहधान्यराज्यधनयोषित्पश्वादिकञ्च न । न मे स्वरूपं भवति त्वनहन्ताश्रयत्वतः ॥ २८ ॥ मदर्थभूतताहेतोर्देहोऽहं स्यां हि सर्वथा । नूनं क्षत्रियदायादो गौराङ्गोऽहं न संशयः ॥ २९ ॥ अहन्तया समाक्रान्तास्तथैतेऽपि जनाः परे । इति निश्चित्य दध्यौ तं देहं राजकुमारकः ॥ ३० ॥ अथ देहस्य चात्मत्वं प्रतिषेद्धुं प्रचक्रमे । अहो कथं देह एष ममतायाः समाश्रयः ॥ ३१ ॥ रुधिरास्थ्यादिसंघातः प्रतिक्षणविकारवान् । मम रूपं भवेन्नूनं छिन्नमेतत्तु लक्ष्यते ॥ ३२ ॥ काष्ठलोष्ठसमत्वेन स्वप्नादौ चान्यथा स्थितः । नाहं देहोऽन्य एव स्यां प्राणोऽप्येष तथाविधः ॥ ३३ ॥ गृह, अन्न, राज्य, धन, स्त्री और पशु आदि तो मेरे स्वरूप हो नहीं सकते, क्योंकि ये अहन्ता ( मैं-पन ) के आश्रय नहीं हैं । [ अर्थात् इन्हें 'मैं' नहीं कह सकते, ये 'मेरे' हैं ] ॥ २८ ॥ 'मैं' शब्दका अर्थ होनेके कारण मैं सर्वथा देह ही हो सकता हूँ । इसमें सन्देह नहीं मैं क्षत्रिय कुलमें जन्म लेनेवाला गौरवर्ण देह- ही हूँ ॥ २९ ॥ इसी प्रकार ये और सब लोग भी देहमें अहंबुद्धिसे सम्पन्न हैं । ऐसा निश्चय कर वह राजकुमार देहका ही आत्मबुद्धिसे चिन्तन करने लगा ॥ ३० ॥ अब तो उसने देहकी आत्मताका निषेध करना आरम्भ कर दिया । [ वह सोचने लगा- ] अहो ! यह देह मेरा वास्तविक स्वरूप कैसे हो सकता है ? यह तो ममताका आश्रय है, रक्त और अस्थि आदिका संघात है, प्रतिक्षण परिवर्तित होनेवाला है तथा काष्ठ और पाषाणके समान छिन्न-भिन्न होता भी देखा जाता है । इसके सिवा स्वप्न आदि अन्य अवस्थाओंमें इसकी स्थिति अन्य प्रकारकी ही रहती है । इसलिये मैं देह नहीं हो सकता । साथ ही यह प्राण भी ऐसा ही है ॥ ३१-३३ ॥
१२० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मनो बुद्धिश्च नाहं स्यां यत एतन्ममेरितम् । अतो देहादिबुद्ध्यन्तस्तदन्य एव न संशयः ॥ ३४ ॥ अहं कदाचिन्नास्मीति भासनाभावहेतुतः । सर्वदाऽहं भासमानः स्थित एव न संशयः ॥ ३५ ॥ भासमानस्य तु मम केन भानमिति स्फुटम् । न हि जानामि तत् कस्मादेतन्न विदितं मया ॥ ३६ ॥ घटादिकं चक्षुराद्यैर्भासते भुवि नान्यतः । प्राणस्त्वचा विभात्येव मनो ज्ञानेन चेहितम् ॥ ३७ ॥ एवं बुद्धिः केन च मे भासनं नात्रिदं त्विदम् । अथैषां भासनादेव नात्मा भासेत मे यदि ॥ ३८ ॥ तर्हि नो विमृशाम्येतांस्ततो मे भासनं भवेत् । इति निश्चित्य मनसा जहौ मानसगोचरम् ॥ ३९ ॥ इसी प्रकार मन और बुद्धि भी 'मैं' नहीं हो सकते, क्योंकि ये 'मेरे' कहे जाते हैं। इसलिये निःसन्देह देहसे लेकर बुद्धिपर्यन्त जो कुछ है 'मैं' उससे भिन्न ही हूँ ॥ ३४ ॥ 'मैं नहीं हूँ' ऐसा कभी नहीं भासता। इसलिये मैं सर्वदा भास- मान रूपसे ही स्थित हूँ—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३५ ॥ किन्तु मैं जो भासमान हूं उसका भान किससे होता है—यह मैं स्पष्ट नहीं जानता। तो यह बात मुझे क्यों विदित नहीं होती ? ॥ ३६ ॥ संसारमें घट आदि पदार्थ नेत्रादि इन्द्रियोंसे भासते हैं, किसी अन्य से नहीं। प्राण त्वचाके द्वारा स्पर्श होनेसे जाना जाता है तथा मन अपने ज्ञानात्मक कर्मसे अनुमित होता है ॥ ३७ ॥ इसी प्रकार बुद्धिकी भी पहचान [ अपने निश्चयात्मक कर्म से ] होती है। किन्तु मेरा भान कैसे होता है—यह मैं क्यों नहीं जानता ? यदि इन सबके भानके कारण ही मुझे आत्माका भान न होता हो, तो मैं इन सबका संकल्प ही छोड़ देता हूँ। तब सम्भव है, मुझे आत्माका भान हो जाय।' ऐसा निश्चय कर उसने मनसे होनेवाले सभी संक- ल्पोंको त्याग दिया ॥ ३८-३६ ॥
नवमोऽध्यायः। १२१ अथाऽपश्यदन्धकारं गाढं तत्क्षणमात्रतः। इदं ममाऽऽत्मनो रूपमिति निश्चितमानसः॥ ४० ॥ प्रहर्षमतुलं लेभे चाऽथ भूयो व्यचिन्तयत्। नूनं पुनः प्रपश्यामीत्येवं चित्तं रुरोध वै॥ ४१ ॥ चञ्चलं हठयोगेन निरुद्धं समवैक्षत। तेजःपुञ्जमनाद्यन्तं भास्वरं क्षणमात्रतः॥ ४२ ॥ प्रबुद्धश्चिन्तयामास किमेतदिति विस्मितः। अहो पश्यामि विविधं किमात्मानं कथन्त्विदम्॥ ४३ ॥ भूयः पश्यामि चेत्येवं रुरोध स्वमनस्तदा। विलीनं निद्रया चित्तं बभौ चिरतरं दृढम्॥ ४४ ॥ तत्राऽपश्यत् स्वप्नजालं विचित्रानेकदर्शनम्। अथ प्रबुद्धोऽत्यन्तं वै चिन्तां प्राप महत्तराम्॥ ४५ ॥ किमहं निद्रयाऽऽच्छन्नः स्वप्नान् समवलोकयम्। तमस्तेजश्चापि दृष्टमहो स्वप्नात्मको भवेत्॥ ४६ ॥ तब एक क्षणमें ही उसने गाढ़ अन्धकार देखा। और यह समझकर कि यही आत्माका स्वरूप है उसे अपार आनन्द हुआ। फिर यह सोचकर कि अभी और कुछ देखना चाहिये उसने अपने चञ्चल चित्तका हठयोगके द्वारा निरोध किया। चित्त निरुद्ध होनेपर उसने एक क्षणमें ही बड़ा प्रकाशपूर्ण अनादि-अनन्त तेजःपुञ्ज देखा॥ ४०-४२॥ उससे उत्थान होनेपर वह आश्चर्यचकित होकर सोचने लगा— यह क्या था? अहो! मैं अपने आत्माको इस प्रकार अनेक रूपमें क्यों देख रहा हूँ॥ ४३॥ अच्छा, मैं फिर देखूँ—यह सोचकर उसने फिर मनका निरोध किया। इस समय उसका चित्त बहुत देरतक गहरी निद्रामें लीन हो गया॥ ४४॥ उस अवस्थामें उसने स्वप्नजालमें पड़कर अनेकों विचित्र दृश्य देखे। उससे जगनेपर वह पुनः बड़ी भारी गम्भीर चिन्तामें पड़ गया॥ ४५॥ 'क्या मैंने निद्रामें पड़कर ये स्वप्न ही देखे थे? तब तो मैंने जो अन्धकार और प्रकाश देखे थे वे भी स्वप्न ही होने चाहिये॥ ४६॥
१२२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे स्वप्नस्तु मानसोल्लासस्तदेतं वर्जये कथम् । भूयो निगृह्य पश्यामीत्येवं निश्चित्य वै दृढम् ॥ ४७ ॥ रुरोध चित्तं तु हठात्तदेतदभवत् स्थिरम् । तदानन्दसमुद्रान्तर्निमग्न इव सोऽभवत् ॥ ४८ ॥ पुनश्चित्तप्रचलनात् प्रबुद्धोऽभवदञ्जसा । किमेष मेऽभवत् स्वप्नश्चाऽथ वा चित्तविभ्रमः ॥ ४९ ॥ आहोस्वित् सत्य एष स्यादविचिन्त्यं विभाति मे । नाऽन्वभूवं किञ्चिदपि सुखमाप्तं कथं मया ॥ ५० ॥ अहोऽस्य सुखलेशस्य तुल्यं नास्त्यत्र किञ्चन । अहं सुषुप्तवन्मूढः कथमेतत् सुखं स्थितम् ॥ ५१ ॥ नात्र हेतुं कञ्चिदपि लक्षये तत् कथं भवेत् । आत्मावगमनायाऽहं प्रवृत्तोऽप्यद्य नाऽविदम् ॥ ५२ ॥ स्वप्न तो मनका ही पसारा होता है। तो फिर मैं इसे कैसे निवृत्त करूँ। अच्छा, एक बार फिर मनका निरोध करके देखूँ।' ऐसा दृढ़ निश्चय कर उसने हठपूर्वक चित्तका निरोध किया। इस बार वह स्थिर हो गया। और वह मानो आनन्दके समुद्रमें डूब गया ॥४७-४८॥ फिर चित्तमें गति होनेसे वह स्वभावसे ही जाग्रत् हो गया [और सोचने लगा]—इस बार भी मुझे स्वप्न ही हुआ था या यह मेरे चित्तका भ्रम था। अथवा सत्य ही था। मुझे तो यह बड़ा विचित्र-सा जान पड़ता है। मैंने किसी वस्तुका तो अनुभव किया नहीं, फिर मुझे सुख कैसे मालूम हुआ ॥ ४९-५० ॥ अहो ! इस सुखके तो लेशमात्रके समान कोई वस्तु नहीं है। मैं तो गहरी नींदमें पड़े हुएके समान अचेत था। फिर यह सुख कैसे हुआ ? ॥ ५१ ॥ इसका मुझे कोई हेतु तो दिखायी नहीं देता। फिर यह हुआ कैसे ? मैं तो आत्माका स्वरूप जाननेके लिये प्रवृत्त हुआ था, सो अभी तक उसे तो जान नहीं सका ॥ ५२ ॥
नवमोऽध्यायः । १२३ आत्मानमन्यचान्यच्च पश्यामि किमिदं भवेत् । प्रकाशो वाऽन्धकारो वा सुखं वाऽन्यदथापि वा ॥ ५३ ॥ आत्मा भवेन्मम तथा क्रमिकैतत्स्वरूपकः । नाऽन्तमेम्यत्र भूयस्तां पृच्छामि विदुषीं प्रियाम् ॥ ५४ ॥ इति निश्चित्य द्वारेशमाहूयाज्ञां समाविशत् । स्वसन्निधानमानेतुं हेमलेखां नृपात्मजः ॥ ५५ ॥ अथ प्राप्ता मुहूर्तेन द्वारिकस्य निदेशतः । आरुरोह महासौधं मेरुमिन्दुप्रभेव सा ॥ ५६ ॥ अथाऽपश्यद्राजसुतं प्रियं शान्तात्ममानसम् । निश्चलं निर्विकारञ्च संहृतेन्द्रियमण्डलम् ॥ ५७ ॥ समीपमुपसृत्याशु तद्विस्तरमुपारुहत् । एकासनोपविष्टायां तस्यां स निमिषार्द्धतः ॥ ५८ ॥ उस आत्माको मैं अन्य-अन्य रूपसे ही देख रहा हूँ। वह वास्तवमें हे क्या ! वह प्रकाश है, अन्धकार है, सुख है, अथवा कुछ और ही है ? ॥ ५३ ॥ अथवा मेरा आत्मा क्रमशः इन सभी स्वरूपोंवाला है ? इस विषयमें मैं तो कोई निर्णय कर नहीं पाता । अतः अपनी उस विदुषी प्रियासे ही पूछूँ ॥ ५४ ॥ ऐसा विचारकर उस राजकुमारने द्वारपालको बुलाया और हेम- लेखाको अपने पास लानेके लिये उसे आज्ञा दी ॥ ५५ ॥ द्वारपालके प्रार्थना करने पर एक मुहूर्त्तमें ही हेमलेखा आ गयी और चन्द्रमाकी ज्योत्स्ना जैसे सुमेरुपर्वतपर चढ़े वैसे ही उस विशाल मन्दिर पर चढ़ गयी ॥ ५६ ॥ वहाँ उसने अपने प्रियतम राजकुमारको देखा कि उसके शरीर और मन शान्त हैं, प्राण निश्चल हैं, कामादि विकार निवृत्त हो गये हैं तथा इन्द्रियवर्ग संयत हैं ॥ ५७ ॥ हेमचूडके समीप पहुँचकर वह उसीके विस्तरपर बैठ गयी।
१२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे उन्मील्य नयने पार्श्वे समालोकयदास्थिताम् । आलोकिता प्रियं शीघ्रं प्रणयात् परिषस्वजे ॥ ५९ ॥ ततः प्राहऽमृतस्यन्दि सुन्दरं वचनं प्रिया । नाथ किं भवताऽऽहूता कच्चित्ते नीरुजं तनौ ॥ ६० ॥ वदाऽऽहूतौ कारणं मे यदर्थमहमागता । एवं प्रियानुयुक्तः स बभाषे स्वात्मनः प्रियाम् ॥ ६१ ॥ प्रिये त्वयाऽनुशिष्टोऽहं विविक्तेऽत्र समास्थितः । विचारपरमः स्वात्मरूपलक्षणहेतवे ॥ ६२ ॥ तत्परेणापि चित्तन्तु लक्षितं तत् पृथक् किमु । आत्मनः सर्वदा प्राप्तेर्भासमानत्वतोऽपि च ॥ ६३ ॥ असम्यग् भासनञ्चान्यभासनस्य निमित्ततः । इति मत्वा निरुध्यान्यभासनं सुव्यवस्थितः ॥ ६४ ॥ उसके एक ही आसनपर बैठ जानेपर राजकुमारने आधे निमेषमें ही नेत्र खोल दिये और उसे अपने बगलमें बैठे देखा ॥ ५८-५९ पू० ॥ हेमचूडकी दृष्टि पड़ते ही उसने तुरन्त बड़े प्रेमसे उसका आलिं- गन किया और फिर अमृतकी वर्षा-सी करनेवाले सुन्दर वचन बोली ॥ ५९ उ०-६० पू० ॥ "नाथ ! आपने मुझे कैसे बुलाया ! आपका शरीर तो स्वस्थ है न ? मुझे बुलानेका कारण बताइये, जिस निमित्तसे कि मैं यहाँ आयी हूँ" ॥ ६० उ० ६१ पू० ॥ अपनी प्रियाके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वह उससे बोला, "प्रिये ! तुम्हारा उपदेश सुनकर मैं यहाँ एकान्तमें अपने स्वरू- पका साक्षात्कार करनेके लिये विचारमें तन्मय होकर बैठा था ॥ ६१ उ०-६२ ॥ यद्यपि मेरा चित्त केवल आत्मचिन्तनमें ही निरत था और आत्मा नित्य प्राप्त एवं प्रकाशस्वरूप भी है, फिर भी मुझे पृथक्-पृथक् दृश्य क्यों दिखायी दिये ॥ ६३ ॥ फिर यह सोचकर कि यह असम्यक् प्रतीति अन्य पदार्थोंकी प्रतीतिके कारण हुई है, मैं अन्य सभी प्रतीतियोंका निरोध करके स्थित हो गया ॥ ६४ ॥
नवमोऽध्यायः । १२५ अपश्यमन्धकारञ्च प्रकाशमन्यदेव च। क्वचित् सुखं महत् प्राप्तं किमेतद्वद मे प्रिये ॥ ६५ ॥ इदमेवात्मनो रूपमथवाऽन्यद्भवेत् क्वचित् । सम्यग् विविच्य कथय यथा तमभिलक्षये ॥ ६६ ॥ इत्युक्ता साऽब्रवीद्धेमलेखा ज्ञातपरावरा । शृणु प्रिय प्रवक्ष्यामि समाहितधियाऽखिलम् ॥ ६७ ॥ यस्त्वया बाह्यसंरोधे व्यवसायः समेधितः । स शुभः सम्मतः सर्वैः सुमुख्यश्चात्मवेदिभिः ॥ ६८ ॥ विना तेन न तत् प्राप्तं केनापि कुत्रचित् क्वचित् । न तत् कारणतामेति तत्प्राप्तौ प्राप्तभावतः ॥ ६९ ॥ तब मैंने अन्धकार, प्रकाश और अन्य दृश्य देखे तथा कभी मुझे बड़ा भारी सुख भी प्राप्त हुआ । प्रिये ! बताओ, यह सब क्या था ? ॥ ६५ ॥ आत्माका स्वरूप क्या यही है, अथवा कुछ और है ? इसका अच्छी तरह विवेचन करके निरूपण करो, जिससे मैं उसे अनुभव कर सकूँ ॥ ६६ ॥ इस प्रकार कहे जानेपर परमात्मतत्त्वको जाननेवाली हेमलेखाने कहा । "प्रियतम ! मैं सब रहस्य बतलाती हूँ, आप एकाग्रचित्त होकर सुनें ॥ ६७ ॥ आपने जो बाह्य वृत्तियोंको निरोधका प्रयत्न किया यह तो बहुत अच्छा है और सभी आत्मज्ञानी इसे मुख्य साधन मानते हैं ॥ ६८ ॥ उसके बिना तो किसीको कहीं भी कभी उस आत्मज्ञानकी प्राप्ति नहीं हुई । परन्तु वह [ आत्मज्ञानकी ही प्राप्तिका कारण है ] आत्माकी प्राप्तिका कारण नहीं, क्योंकि वह तो प्राप्त ही है१ ॥ ६९ ॥ १. जीवको अज्ञानवश आत्माकी अप्राप्तिका भ्रम हो रहा है। अतः किसी भी साधनसे केवल अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है । स्वयं आत्मा तो प्राप्त ही है । यदि साधनके द्वारा आत्माकी प्राप्ति मानी जायगी तो वह घटादिके समान जड, परिच्छिन्न और अनात्मा सिद्ध होगा । अतः साधनका उपयोग अज्ञान की निवृत्तिमें ही है, आत्माकी प्राप्तिमें नहीं ।
१२६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अप्राप्तावात्मता न स्यादात्मत्वेनासता कुतः । अप्राप्यः सर्वथैवात्मा प्राप्तिस्तस्य न विद्यते ॥ ७० ॥ अप्राप्तस्य भवेत् प्राप्तिरात्मत्वान्नाप्तिरस्त्यतः । तन्निरोधोऽपि नाप्त्यर्थस्त्वत्र पश्य निदर्शनम् ॥ ७१ ॥ अन्धकारसमाच्छन्नं किञ्चित्तस्य निरोधतः । दीपाद्यैराप्यते प्राप्तमिव लोके यथा तथा ॥ ७२ ॥ यथा कश्चिद् भ्रान्तचित्तः कश्चिद्विस्मृतनिष्ककः । अन्यचिन्तानिरोधेन समाहिततया पुनः ॥ ७३ ॥ आसादयति तन्निष्कं नष्टं प्राप्तं यथा तथा । न निरोधोऽत्र हेतुः स्यान्निष्काप्तौ तु यथा तथा ॥ ७४ ॥ आत्मलाभेन हेतुः स्यान्निरोधो बाह्यवस्तुनः । त्वया न लक्षितः स्वात्मा तत्र व्युत्पत्तिवर्जनात् ॥ ७५ ॥ यदि वह अप्राप्त हो तो आत्मा नहीं हो सकता और आत्मा है तो उसकी प्राप्ति कहाँसे होगी ? इसलिये आत्मा सर्वथा प्राप्त न होने वाला ही है, उसकी प्राप्ति नहीं हुआ करती ॥ ७० ॥ प्राप्ति सर्वदा अप्राप्तकी ही होती है, अतः आत्मा होनेके कारण इसकी प्राप्ति नहीं होती । मनका निरोध भी आत्माकी प्राप्तिका कारण नहीं है; इसके लिये इस दृष्टान्त पर दृष्टि दो ॥ ७१ ॥ जिस प्रकार लोकमें अन्धकारसे आच्छादित कोई वस्तु दीपका- दिके द्वारा अन्धकारका निरोध होनेपर प्राप्त-सी कही जाती है, उसी प्रकार यहां समझना चाहिये ॥ ७२ ॥ जिस प्रकार कोई भ्रान्तचित्त पुरुष कहीं सोना रखकर भूल जाय और फिर अन्य सब चिन्ताओंको छोड़कर चित्तको समाहित करनेपर उसे वह मिल जाय तो वह खोकर पाया हुआ माना जाता है, उसी प्रकार यहां समझो । जिस तरह अन्य चिन्तनोंका त्याग सुवर्णकी प्राप्तिमें हेतु नहीं उसी तरह आत्मप्राप्तिमें भी मनका निरोध कारण नहीं है। आपको आत्माके स्वरूपका परिचय नहीं है, इसीसे आप उसका अनुभव नहीं कर सके ॥ ७३-७५ ॥
नवमोऽध्यायः । १२७ यथा प्रकाशे व्युत्पन्नो रात्रौ राजसभां गतः । पश्यन् सभ्यांश्च दीपांश्च न जानाति प्रकाशकम् ॥ ७६ ॥ शृणु प्रिय निरोधान्ते ह्यन्धकारो विलोकितः । अन्धकारावलोकादौ शेषभावस्तव स्थितः ॥ ७७ ॥ तं भावं भावय सदा परमानन्ददायकम् । अत्र सर्वे महामोहग्रहग्रस्ताः पराग्दृशः ॥ ७८ ॥ अन्विष्यान्विष्य विहता न तां प्रापुश्च भावनाम् । सन्ति लोके शास्त्रविदः कुशलाश्च सुतार्किकाः ॥ ७९ ॥ अविदित्वा भावममुं शोचन्त्येव दिवानिशम् । शब्दार्थशिल्पमात्रेण न हि तत् पदमाप्यते ॥ ८० ॥ जिस प्रकार पुरुष रात्रिके समय राजसभामें जाय और प्रकाशसे उसका परिचय न हो, तो वह वहाँ सभासद् और दीपकोंको देखते हुए भी प्रकाश करनेवालेको नहीं जान पाता ॥ ७६ ॥ प्रिय ! सुनो आपने चित्तनिरोधके पश्चात् अन्धकार देखा; किन्तु उस अन्धकारावलोकनसे पूर्व [ निर्विकल्प अवस्थामें सम्पूर्ण विषयोंका अभाव हो जानेपर ] तो शेषरूपसे आप ही रह गये थे¹ ॥ ७७ ॥ उस परमानन्ददायक शेषभावका ही आप सर्वदा चिन्तन कीजिये । सब बहिर्मुख लोग इसी स्थानमें महामोहसे ग्रस्त हो जाते हैं । वे खोज-खोजकर थक जाते हैं, तो भी इस भावको प्राप्त नहीं कर पाते ॥ ७८-७९ पू० ॥ लोकमें ऐसे अनेकों शास्त्रज्ञ और कुशल तार्किक हैं जो इस भावको न जाननेके कारण रात-दिन शोक ही करते रहते हैं । शब्दोंका अर्थ कर लेनेकी कलासे ही उस पदकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ ७९ उ०-८० ॥ १. निरोधकालमें दृश्यका सर्वथा अभाव हो जानेपर जो ज्ञानमात्र शेष रहता है वही आत्माका शेषभाव है। उसका किसी प्रकार निषेध नहीं हो सकता, क्योंकि वह स्वयंप्रकाश होनेसे सर्वदा प्रकाशमान है। सभी सन्धियोंमें उसका स्वयं ही अनुभव होता रहता है।
१२८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यावदन्वेषणं कुर्याद्विचारं वाऽपि पण्डितः। तावन्न प्राप्यते तद्वै यतो न ग्राह्यमेव तत् ॥ ८१ ॥ गत्वा दूरं न तत् प्राप्यं स्थित्वा प्राप्तं हि सर्वदा । न तद्विचार्य विज्ञेयमविचाराद्विभासते ॥ ८२ ॥ धावन् स्वमूर्द्धच्छायेव न प्राप्यं क्रियया क्वचित् । यथा हि निर्मलादर्शे प्रतिबिम्बसहस्रकम् ॥ ८३ ॥ पश्यन् बालोऽपि नाऽऽदर्शं पश्यत्येवं जनः खलु । पश्यन् स्वात्ममहादर्शे प्रतिबिम्बं हि जागतम् ॥ ८४ ॥ स्वात्मानं न विजानाति तद्व्युत्पत्तिविवर्जनात् । यथाऽपरिचिताकाशः पश्यन्नाकाशसंश्रितम् ॥ ८५ ॥ जगन्नावेत्ति चाकाशं तथा स्वात्मस्वरूपकम् । जबतक कोई पण्डित आत्माकी खोज अथवा उसके विचारमें लगा रहता है तबतक वह मिल नहीं सकता, क्योंकि वह ग्राह्य तो है ही नहीं ॥ ८१ ॥ वह दूर चलकर जानेसे नहीं मिलता, वह तो सर्वदा स्थिर रहनेसे ही मिलता है। विचार करनेसे उसका ज्ञान नहीं होता, उसकी अनुभूति तो विचारकी निवृत्ति होनेसे ही होती है¹। जिस प्रकार अपने मस्तककी छाया दौड़कर नहीं पकड़ी जा सकती उसी प्रकार किसी क्रियाके द्वारा वह कभी प्राप्त नहीं होता ॥ ८२-८३ पू० ॥ जैसे एक बच्चा भी निर्मल दर्पणमें हजारों प्रतिबिम्ब देख लेता है किन्तु दर्पणको नहीं देख पाता, उसी प्रकार लोग इस आत्मरूप महान् दर्पणमें जगत्रूप प्रतिबिम्बको देखते हुए भी परिचय न होनेके कारण अपने आत्माको नहीं देख पाते ॥ ८३ उ०-८५ पू० ॥ जैसे आकाशसे अपरिचित पुरुष आकाशमें स्थित सम्पूर्ण जगत्को देखते हुए भी आकाशको नहीं जान पाता उसी प्रकार जीव अपने स्वरूपको नहीं जान पाता ॥ ८५ उ०-८६ पू० ॥ १. क्योंकि चलनेसे इन्द्रियोंका प्रसार होता है और उसकी प्राप्ति होती है इन्द्रियोंके संकोचसे। इसी प्रकार विचार करनेसे अन्तःकरण की वृत्तियाँ फैलती हैं और उसकी उपलब्धि होती है वृत्तियोंका निरोध होने पर।
नवमोऽध्यायः । १२५ नाथ सूक्ष्मदृशा पश्य ज्ञानज्ञेयात्मकं जगत् ।; ८६ ॥ तत्र ज्ञानं स्वतःसिद्धं तदभावे न किञ्चन । प्रमाणानां प्रमाणं तदप्रमाणं स्वतो भवेत् ॥ ८७ ॥ यतः प्रमाणानपेक्षमादिसिद्धमतस्तु तत् । सिद्धसाधकभावेन न तत्सिद्धिः कदाचन ॥ ८८ ॥ तत्र विप्रतिपन्नस्य न प्रश्नो नापि चोत्तरम् । अनपह्नवनीयं तन्महादर्शतलं भवेत् ॥ ८९ ॥ तत्र सर्वं भासते वै दर्पणप्रतिबिम्बवत् । देशेन वापि कालेन परिच्छित्तिर्न विद्यते ॥ ९० ॥ तदन्तर्भासमानत्वात् कथं ताभ्यां परिच्छिदिः । परिच्छेदस्य भानन्तु गगने वस्तुभिर्यथा ॥ ९१ ॥ नाथ ! इस ज्ञान और ज्ञेयस्वरूप जगत्को आप सूक्ष्मदृष्टिसे देखिये । इसमें जो ज्ञान ( अनुभव ) है वह स्वतः सिद्ध है; वह न हो तो कुछ भी नहीं रह सकता ॥ ८६ उ०-८७ पू० ॥ वह सम्पूर्ण प्रमाणोंका प्रमाण है, किन्तु स्वयं किसी प्रमाणका विषय नहीं है। क्योंकि अपनी सिद्धिके लिये उसे प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है, इसलिये वह सबसे पहले सिद्ध ( विद्यमान ) है। वह किसी सिद्धिका साधक है—इस रूपसे भी उसकी कभी सिद्धि नहीं हो सकती¹ ॥ ८७ उ०-८८ ॥ जिसे उस ज्ञानकी सत्तामें सन्देह है उसका तो कोई प्रश्न भी नहीं हो सकता और न उसे उत्तर ही दिया जा सकता है। एक महान् दर्पणके समान उसका किसी भी प्रकार निषेध नहीं किया जा सकता ॥ ८९ ॥ दर्पणमें प्रतिबिम्बकी तरह उसीमें सब कुछ भास रहा है। किसी भी देश या कालसे उसका परिच्छेद नहीं हो सकता ॥ ९० ॥ क्योंकि ये ( देश और काल ) भी तो उसीमें भास रहे हैं, फिर इनसे उसका परिच्छेद कैसे हो सकता है। इनके द्वारा उसके १. क्योंकि न तो उससे भिन्न किसीकी सत्ता है, जिसकी वह सिद्धि करे। और न वह किसीका कर्ता या करण ही है, जो किसीकी सिद्धिका साधक या साधन बने।
१३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे राजपुत्र सूक्ष्मदृशा तल्लक्षय निजं वपुः । यत्र सामान्यचैतन्ये जगदेतद्विराजते ॥ ९२ ॥ तत्समावेशसंसिद्ध्या सर्वकर्तृत्वमाप्नुयात् । तस्योपलब्धिं वक्ष्यामि यतः प्राप्नोति तत् पदम् ॥ ९३ ॥ निद्राजाग्रन्मध्यभागे संविद्भेदान्तरे तथा । मध्ये संविद्विद्येयोश्च सूक्ष्मबुद्ध्याऽभिलक्षय ॥ ९४ ॥ एतत् पदं निजं रूपं यत् प्राप्य न विमुह्यसि । एतदज्ञानमात्रेण प्रवृत्तं जगदीदृशम् ॥ ९५ ॥ नात्र रूपं रसो वापि न गन्धस्पर्शशब्दकम् । न दुःखं न सुखं वा तु न ग्राह्यं ग्राहकञ्च न ॥ ९६ ॥ परिच्छेदका भान तो ऐसा ही है जैसे [ घटादि ] वस्तुओंके द्वारा आकाशमें परिच्छेदकी प्रतीति होना ॥ ६१ ॥ राजकुमार ! आप सूक्ष्म दृष्टिसे उस अपने स्वरूपका विचार कीजिये । उस सर्वसामान्य चैतन्य ( ज्ञान ) पर ही यह सारा जगत् खड़ा हुआ है ॥ ६२ ॥ उसके साथ अपने अभेदकी अनुभूति दृढ़ हो जानेपर जीव सर्व- कर्त्तृत्व ( परमेश्वरके साथ तन्मयत्व ) प्राप्त कर लेता है। मैं आपको उसकी उपलब्धिके स्थान बतलाती हूँ, जिनसे कि उस पदकी प्राप्ति हो सकती है ॥ ६३ ॥ निद्रा और जाग्रत् अवस्थाओंके मध्यमें, चित्तके एक विषयको छोड़कर दूसरे विषयपर जानेके बीचकी स्थितिमें और दो प्रकारकी बुद्धिवृत्तियोंके बीचमें आप सूक्ष्म बुद्धिसे उसका अनुभव कीजिये ॥६४॥ यह पद ही अपना वास्तविक स्वरूप है, जिसे पा लेनेपर जीव मोहमें नहीं पड़ता। इसके अज्ञान-मात्रसे ही यह सारा जगत्का पसारा फैला हुआ है ॥ ६५ ॥ इस आत्मस्वरूपमें न रूप है, न रस है और न गंध, स्पर्श या शब्द हैं । इसमें दुःख-सुख तथा ग्राह्य ( विषय ) और ग्राहक ( इन्द्रियाँ ) भी नहीं हैं ॥ ६६ ॥
नवमोऽध्यायः । १३१ सर्वाश्रयं सर्वरूपमपि सर्वविवर्जितम् । एष सर्वेश्वरो धाता विष्णुरीशः सदाशिवः ॥ ९७ ॥ पश्येषदन्तः संरुध्य स्वात्मानं स्वात्मना सता । त्यक्त्वा बहिः प्रसरतामन्तः प्रसरणोद्यतः ॥ ९८ ॥ त्यक्त्वा पश्यामीति भावमन्धवन्निश्चलात्मना । दर्शनादर्शने त्यक्त्वा योऽसि सोऽसि द्रुतं भज ॥ ९९ ॥ इत्युक्तः प्रियया हेमचूड आलक्ष्य तत् पदम् । चिरं विश्रान्तिमालभ्य वहिर्विस्मरणं ययौ ॥ १०० ॥ इति श्रीज्ञानखण्डे हेमचूडविश्रान्तिर्नवमोऽध्यायः । यह सबका आश्रय और सर्वरूप होनेपर भी सबसे रहित है । यही सबका स्वामी तथा ब्रह्मा, विष्णु और महादेव भी है ॥ ९७ ॥ अपने अन्तःकरणको थोड़ा रोककर सत्स्वरूप आत्माके द्वारा ही अपने आत्माका साक्षात्कार कीजिये । चित्तके बाह्य प्रसारको त्यागकर उसे भीतरकी ओर ले जानेका उद्योग कीजिये ॥ ९८ ॥ ‘मैं देखता हूँ’ इस भावको भी त्यागकर बिलकुल अन्धेके समान निश्चलचित्त होकर देखने और न देखनेके संकल्पको भी छोड़कर आप जो कुछ हैं तुरन्त उसी रूपसे स्थित हो जाइये१ ॥ ९९ ॥ प्रियतमा हेमलताके इस प्रकार कहनेपर हेमचूडने उस आत्मपदका अनुभव किया और चिरकालतक (निर्विकल्प समाधिमें) विश्रान्तिकी उपलब्धि करते हुए उसे बाह्य विषयोंका विस्मरण हो गया ॥ १०० ॥ नवम अध्याय समाप्त । १. ‘देखने’ अर्थात् जाग्रत् और स्वप्नावस्थाओंके तथा ‘न देखने’—सुषुप्ताव- स्थाके विकल्पोंको छोड़कर इन तीनोंका साक्षी, तीनोंसे विलक्षण और तीनोंमें अनुगत जो सामान्य चैतन्य रूप तुरीय है वही आप हैं, अतः उस आत्मस्वरूपसे ही स्थित हो जाइये ।
दशमोऽध्यायः अथाऽपश्यद्धेमलेखा प्रियं प्राप्तपरस्थितिम् । न चालयत्परपदात्ततः सोपि मुहूर्तः ॥ १ ॥ प्रबुद्ध उन्मील्य नेत्रे सोऽपश्यत्सप्रियं जगत् । भूयस्तत्पदविश्रान्तिमीहमानोऽतिवेगतः ॥ २ ॥ नेत्रे निमीलयद्यावद्ब्रवीत्तावदेव सा । प्रियं हस्ते समादाय सुधासुन्दरभाषिणी ॥ ३ ॥ नाथ किं ते व्यवसितं ब्रूहि नेत्रनिमीलनात् । उन्मीलनाद्वा किं स्यात्ते लाभालाभौ समीरय ॥ ४ ॥ उन्मील्य न प्राप्यते किं निमील्य प्राप्यते च किम् । तन्मे ब्रूहि प्रियतम श्रोतुमिच्छामि ते स्थितिम् ॥ ५ ॥ दशम अध्याय ॥ १० ॥ सभी तत्त्वज्ञ हो गये अब हेमलेखाने देखा कि उसके पतिको परमात्मामें स्थिति प्राप्त हो गयी है। तब उसने भी कुछ देर उसे उस परमपदसे विचलित नहीं किया ॥ १ ॥ फिर उसने सावधान होकर नेत्र खोले और अपनी प्रियाके सहित इस संसारको देखा। किन्तु ज्योंही वह पुनः नेत्र मूँदकर बड़ी तेजीसे उसी पदमें विश्रान्त होनेकी चेष्टा करने लगा, हेमलेखाने उसका हाथ पकड़कर अमृतके समान मधुर भाषण करते हुए उससे कहा ॥ २-३ ॥ “नाथ ! बतलाइये, आपका क्या विचार है ? कहिये न, इस प्रकार नेत्र मूँदने या खोलनेसे आपको क्या लाभ या हानि होती है ॥ ४ ॥ प्रियतम ! मैं आपकी स्थितिके विषयमें सुनना चाहती हूँ। नेत्र खोलनेसे आपको क्या नहीं मिलता और मूँद लेनेसे क्या मिल जाता है—यह मुझे बतलाइये” ॥ ५ ॥
दशमोऽध्यायः । १३३ एवं पृष्टस्तया प्राह मदमत्त इवालसः । अनिच्छन्नपि वक्तुं तामालस्यभरमन्थरः ॥ ६ ॥ प्रिये विश्रान्तिमत्यन्तं प्राप्तवानस्मि वै चिरात् । न बाह्ये दुःखभूयिष्ठे विश्रमोऽस्ति क्वचिन्मम ॥ ७ ॥ अलं ऋजीषरोमन्थप्रायव्यवहृतैर्बहिः । दौर्भाग्यान्धो नाद्य यावदविदं स्वात्मसत्सुखम् ॥ ८ ॥ यथा कश्चिदटन्भिक्षां निधानं स्वं न वेद वै । तथाहं स्वसुखाम्भोधिमविदित्वा पुनः पुनः ॥ ९ ॥ सुखं वैषयिकं श्रेष्ठं दुःखसंघाभिसंप्लुतम् । विद्युद्विलयनं मत्वा स्थिरं तत्परतावशात् ॥ १० ॥ दुःखैरभिहतो नूनं विश्रान्तिं न तु लब्धवान् । अहो जना दुःखसुखविवेकज्ञानवर्जिताः ॥ ११ ॥ हेमचूडका चित्त इस समय आलस्यके भारसे कुछ मन्दगति हो रहा था। अतः हेमलताके इस प्रकार प्रश्न करनेपर उसने बोलनेकी इच्छा न होने पर भी मदमत्तके समान आलस्यपूर्वक उससे कहा-॥६॥ "प्रिये ! मुझे आज बहुत काल पश्चात् बड़ी शान्ति प्राप्त हुई है। अब इस दुःखबहुल बाह्य प्रपञ्चमें मुझे कहीं विश्राम नहीं मिल सकता ॥ ७॥ ये बाह्य व्यवहार तो गन्नेकी छूँछ चूसनेके समान नीरस हैं, इनकी मुझे आवश्यकता नहीं है। मैं तो दुर्भाग्यवश अन्धा हो रहा था, इसीसे अबतक आत्मस्थितिके इस सच्चे सुखकी अनुभूति नहीं कर सका ॥ ८॥ जिस प्रकार कोई पुरुष अपने घरके खजानेको न जाने और भिक्षा माँगता फिरे, उसी प्रकार मैं इस आत्मानन्दरूप समुद्रको न जानकर बार-बार दुःखसमूहसे भरे वैषयिक सुखको ही, जो बिजलीके समान लीन हो जानेवाला है, श्रेष्ठ और स्थिर समझता रहा। और उसीके पीछे लगे रहनेके कारण दुःखोंसे दबा रहकर आजतक विश्राम नहीं पा सका ॥ ९-११ पू० ॥ अहो ! सबलोग दुःख-सुखके विवेकज्ञानसे रहित होनेके कारण,
१३४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सुखार्थिनो दुःखसंघं सञ्चिन्वन्ति मुधा सदा । तदलं दुःखभोगेन स्वयत्नासादितेन वै ॥ १२ ॥ प्रिये कृपां मयि कुरु प्रार्थयामि कृताञ्जलिः । विश्रान्तिमभिवाञ्छामि चिरं स्वस्मिन्सुखात्मनि ॥ १३ ॥ अहो दैवहता भासि ज्ञात्वापि त्वमिदं पदम् । तद्विश्रान्तिं परित्यज्य मुधा दुःखाय चेष्टसे ॥ १४ ॥ इत्युक्ता सा प्रियं प्राह स्मयित्वेपन्मनीषिणी । नाथ ते तन्न विदितं पदं परमपावनम् ॥ १५ ॥ यत्र स्थिता न मुह्यन्ति पण्डिताः पावनाशयाः । तत्पदं दूरतस्तेस्ति भूस्थस्येव नभस्तलम् ॥ १६ ॥ त्वया किञ्चित्सुविदितं भवेदविदितोपमम् । निमील्योन्मील्य वा नेत्रे तत्पदं न समीक्ष्यते ॥ १७ ॥ सुखकी लालसा रहनेपर भी, व्यर्थ ही सर्वदा दुःखराशिका ही संग्रह करते रहते हैं। अतः अपने ही प्रयत्नसे प्राप्त किये हुए दुःखभोगकी अब मुझे आवश्यकता नहीं है ॥ ११ उ०-१२ ॥ प्रिये ! मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ, तुम मुझपर कृपा करो। अब तो मैं अपने इस आनन्दस्वरूप आत्मामें ही चिरकालतक विश्रान्त रहना चाहता हूँ ॥ १३ ॥ अहो ! मुझे तुम बड़ी अभागिनी जान पड़ती हो, जो इस पदको जानकर भी तुम इसकी विश्रान्तिको छोड़कर व्यर्थ ही दुःख भोगनेके लिये व्यवहारमें लगी रहती हो” ॥ १४ ॥ इस प्रकार कहे जानेपर वह विवेकवती बाला कुछ मुसकराकर अपने प्रियतमसे बोली, “नाथ ! अभी आपको उस परम पवित्र पदका पता नहीं लगा है ॥ १५ ॥ पवित्र हृदय पण्डितजन जिसमें स्थित होकर कभी मोहग्रस्त नहीं होते वह पद तो अभी आपके लिये वैसे ही दूर है जैसे पृथ्वीपरके मनुष्यके लिये आकाश ॥ १६ ॥ आपने जो कुछ ठीक-ठीक समझा है वह तो न समझनेके समान ही है। वह पद आँखोंको मूँदने या खोलनेसे नहीं देखा जाता ॥ १७ ॥
दशमोऽध्यायः । १३५ अकृत्वा वापि कृत्वा वा न तल्लभ्येत कर्हिचित् । अगत्वा चापि वा गत्वा न तदासादयेत्पदम् ॥ १८ ॥ निमील्य कृत्वा गत्वा वा प्राप्तं पूर्णं कथं भवेत् । यवाष्टकमितेनैव पक्ष्मणोन्मीलितेन तु ॥ १९ ॥ अन्तर्हितं यदि तदा ननु पूर्णं भवेत्पदम् । अहो ते मोहमाहात्म्यमाश्चर्यं किमहं ब्रुवे ॥ २० ॥ यस्मिन्ब्रह्माण्डकोटीनां कोटयः कोणसंस्थिताः । पक्ष्मणोऽङ्गुलिमानस्योन्मीलनात्तत्तिरोहितम् ॥ २१ ॥ शृणु राजकुमारैतत्तत्त्वसारं वदामि यत् । यावद् ग्रन्थिविभेदो न न तावत्सुखमृच्छति ॥ २२ ॥ ग्रन्थयः कोटिशः सन्ति मोहरज्जुविवर्त्तिताः । तत्र स्वरूपासंविन्निर्मोहरज्जुरुदीरिता ॥ २३ ॥ यत्र ता ग्रन्थयः सन्ति विपरीतग्रहात्मकाः । तत्राद्या देहमुख्येषु भवेदात्मत्वनिश्चयः ॥ २४ ॥ इसी प्रकार कुछ करने या न करनेसे भी वह कभी नहीं मिलता तथा कहीं जाने या न जानेसे भी उस पदकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १८ ॥ जो वस्तु आँख मूँदने, करने या जानेसे मिलती है वह भला, पूर्ण कैसे हो सकती है ? यदि आठ जौके बराबर आकारवाले पलकोंके खोलनेसे ही वह पद लुप्त हो जाता है तो वह अच्छा पूर्ण पद हुआ ? अहो ! आपके मोहकी बड़ी विलक्षण महिमा है । इस आश्चर्यके विषयमें मैं क्या कहूँ ॥ १९-२० ॥ जिसके एक कोनेमें करोड़ों ब्रह्माण्ड पड़े हुए हैं वह परमपद एक अंगुलि बराबर पलकके खोलनेसे ही लुप्त हो जाता है ! ॥ २१ ॥ राजकुमार ! सुनिये, मैं जो तत्त्वका सार है वह आपको बताती हूँ, क्योंकि जबतक ग्रन्थि ( गाँठ ) नहीं खुलती तबतक आनन्द प्राप्त नहीं होता ॥ २२ ॥ इस अज्ञानरूप रज्जुमें करोड़ों ग्रन्थियाँ भासित हो रही हैं, और आत्मस्वरूपको न पहचानना यही अज्ञान-रज्जु कही गयी है ॥ २३ ॥ उसमें जो विपरीतग्रहणरूप ग्रन्थियाँ हैं उनमें सबसे पहली है देहादिमें आत्मबुद्धि करना ॥ २४ ॥
१३६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यद्वशादेष संसार आततो दुष्प्रतिक्रियः । तथा जगत्यनात्मत्वबुद्धिर्भानसमाश्रये ॥ २५ ॥ एवं जीवेशभेदादिनिश्चया ग्रन्थयो मताः । एतच्चिरात्समुद्भूतं भूयः संवर्धितं च वै ॥ २६ ॥ ग्रन्थिरूपसमापन्नं पुरुषः पाशितस्ततः । तद्ग्रन्थिविस्रंसनतो बन्धान्मुक्तिः समीरिता ॥ २७ ॥ यत्त्वं निमील्य नेत्रे स्वे पदमासादयस्यलम् । तत्पदं निजरूपं ते शुद्धसंविदनुत्तरम् ॥ २८ ॥ तदेवाखिलसंसारचित्रादर्शतलं महत् । कदा क्व केन रूपेण नास्ति तन्मे निरूपय ॥ २९ ॥ यदा यद्रूपतो यस्मिन्नेति ब्रूयाः स्वसंविदम् । तर्हि तत्कालदेशादेर्वन्ध्यापुत्रत्वमेव हि ॥ ३० ॥ जिसके कारण इस संसारका विस्तार हुआ है, जिससे छुटकारा पाना बड़ा ही कठिन है। तथा [ दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान ] केवल भानके आश्रय खड़े हुए इस संसारमें अनात्मबुद्धि होना [ दूसरी ग्रन्थि है ] ॥ २५ ॥ इसी प्रकार जीव और ईश्वरमें भेद-निश्चय करना आदि अन्य ग्रन्थियाँ मानी गयी हैं। यह स्वरूपका अज्ञान अनादिकालसे उत्पन्न और बार-बार उलझकर ग्रन्थिरूप हो गया है। उसीसे यह पुरुष बँधा हुआ है। उस ग्रन्थिके कट जानेसे ही जीवकी बन्धनसे मुक्ति कही जाती है ॥ २६-२७ ॥ अपने नेत्रोंको मूँदकर आपने जो पूर्णपद प्राप्त किया है वह तो आपका अपना ही स्वरूप है और वह सम्पूर्ण अनात्मवर्गका निषेध करनेपर बचनेवाली शुद्ध संवित् ही है ॥ २८ ॥ वही इस सम्पूर्ण संसार-चित्रको प्रतिबिम्बित करनेवाला महान् दर्पण है। मुझे बताइये तो, वह कब, कहाँ और किस रूपमें नहीं है? ॥ २९ ॥ आप जिस काल, जिस रूप और जिस देशमें उस आत्मसंवित्का अभाव बतलायेंगे तब वे देश और कालादि तो वन्ध्यापुत्रके समान अलीक सिद्ध होंगे ॥ ३० ॥