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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

प्रकाशप्रकरणम् ६१ शंका-हम संसारी मनुष्यों को दिन-रात सुख-दुःखादि से युक्त आत्मा का ही तो अनुभव होता रहता है। तब हम उसे (आत्मा को) नित्य दृशिरूप (अनुभवरूप) कैसे समझें ? समा०-शरीर के जिस प्रदेश (भाग) पर रवि का ताप होता है, वही ताप (तापाश्रयप्रदेशविशिष्ट ताप) जैसे आत्मा (दृशि) का विषय होता है, उसी प्रकार व्यवहार में भी हमें बुद्धि में होने वाले (सत्त्वस्थ = अन्तःकरणस्थ ) सुख-दुःखरूप ताप का ही (स्वाश्रयान्तःकरण सहित ताप का ही) भान होता है। अर्थात् बुद्धिविशिष्ट ताप ही दृशि (आत्मा) का विषय होता है। यानी 'ताप' दृग्रूप (दृशिरूप) आत्मा से सम्बद्ध (समवेत) नहीं है, वह तो अन्तःकरण (बुद्धि) से सम्बद्ध है। निष्कर्ष यह हुआ कि 'ताप' आत्मा का धर्म नहीं है, वह तो अन्तःकरण का धर्म है, यह अनुभव में आता है। अतः आत्मा नित्य है और चैतन्य (ज्ञान, अनुभव) रूप ही है। अथवा - शरीर में होनेवाला रवि का ताप, देह के जिस प्रदेश में स्थित रहता है, उससे (उस ताप से) विशिष्ट वह सम्पूर्ण देह ही समझा जाता है और वह 'तप्तोऽहम्' = मैं सन्तप्त हूँ कहता रहता है। एवंच व्यवहार में वह ताप, लौकिक आत्मा (दृशि) का विषय है, यह समझा जाता है। उसी प्रकार विषयसम्पर्कजनित सुख-दुःखादि ताप, अन्तःकरण में (सत्त्व में) वस्तुतः स्थित है, इसलिये सुख-दुःखादितापविशिष्ट वह अन्तःकरण, उस साक्षी (दृशि) का विषय होता है। तथाच 'सुखी अहम्' = मैं सुखी हूँ इस अभिमान का अध्यास (भ्रम) अपने साक्षी (दृशि) आत्मा में मनुष्य को होता रहता है, क्योंकि अन्तःकरण को ही मनुष्य 'आत्मा' समझता है, अर्थात् आत्मा में सुखी-दुःखी होने का जो अभिमान है, वह अन्तःकरणाध्यासनिबन्धन है। किन्तु जो विवेकी पुरुष है, उसे कभी भी सुखी या दुःखी के रूप में आत्मा की प्रतीति नहीं हुआ करती । किन्तु लौकिक पुरुष देह के ताप का आत्मा में अध्यास करता है, इसलिये वह अपने आत्मा को ही तप्त समझा करता है ॥ १० ॥ प्रतिषिद्धेदर्मशो ज्ञः खमिवैकरसोऽद्वयः । नित्यमुक्तः सदा शुद्धः सोऽहं ब्रह्मास्मि केवलः ॥११॥ प्रतिषिद्ध इति - जहां 'इदम्' अंश का बाध हो गया है और जो 'चेतन' स्वरूप है, आकाश के समान सदा एकरस है, अद्वितीय है, नित्यमुक्त है तथा सर्वदा शुद्धस्वरूप है, ऐसा जो एक मात्र ब्रह्म है, वही 'मैं' हूँ ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'इदम्' अंश का बाध हो जाने से सुख-दुःखादि से युक्त जो अन्तःकरण उसके साथ इस (आत्मा) का सम्बन्ध नहीं है, यह स्पष्ट हो जाता है। इसका स्वरूप, दृश्यमान जड़ जगत् से नितान्त पृथक् है ॥ ११ ॥ विज्ञातुर्नैव विज्ञाता परोऽन्यः संभवत्यतः । विज्ञाताऽहं परो मुक्तः सर्वभूतेषु सर्वदा ॥१२॥ विज्ञातुरिति-समस्त जगत् के विज्ञाता का अन्य कोई और विज्ञाता मानना संभव नहीं है। इस कारण सम्पूर्ण भूतों में सर्वदा विद्यमान 'मैं' ही मुक्तस्वरूप परम विज्ञाता हूँ ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी जब कि सर्वविज्ञातुरूप आत्मा के सिवाय अन्य दूसरा व्यापक विज्ञाता है ही नहीं, अतः समस्त स्थावर- जङ्गमात्मक जगत् में व्याप्त होकर रहने वाला तथा उसके (ज्ञेय के) धर्म से रहित होने से सर्वदा मुक्त ऐसा परम विज्ञाता मैं ही हूँ । समस्त देहों में विज्ञाता का जो भेद स्फुरित होता है, वह अप्रामाणिक है। अतः उस विज्ञाता के अद्वयत्व तथा ब्रह्मत्व में शंका नहीं करनी चाहिये ॥ १२ ॥ यो वेद्धालुप्तदृष्टित्वमात्मनोऽकर्तृतां यथा । ब्रह्मवित्त्वं तथा मुक्त्वा स आत्मज्ञो न चेतरः ॥१३॥ य इति - जो व्यक्ति अपनी ब्रह्मज्ञता के अभिमान का त्याग कर आत्मा के अलुप्त चैतन्य [दृष्टित्व] तथा अकर्तृत्व को समझता है, वही व्यक्ति आत्मज्ञानी है, अन्य नहीं ॥ १३ ॥

६२ उपदेशसाहस्री

हृदयस्पर्शिनी

शंका—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादि श्रुति के उपदेश के अनुसार समस्त शरीरों में अद्वय आत्मा का ज्ञान रखने पर भी 'ब्रह्मविदेव चाहम्' मैं ब्रह्मवित् हूँ, इस प्रकार अपने ब्रह्मवित् (ब्रह्मज्ञ) होने का अभिमान उसे रहता ही है, अतः उसमें सविशेषता है, ऐसा कहना ही पड़ेगा। इससे उसमें निर्विशेषता सिद्ध नहीं हो पायेगी। समा०—जो व्यक्ति सम्पूर्ण अभिमान अर्थात् 'मैं ब्रह्मज्ञानी हूँ'—इस अभिमान का भी त्याग कर श्रुति-प्रतिपादित निर्विशेष आत्मा का साक्षात्कार करता है अर्थात् अलुप्त चिन्मात्रता के कारण आत्मा के द्रष्टृत्व तथा अकर्तृत्व को जानता है, वही व्यक्ति आत्मज्ञानी (आत्मवित्, ब्रह्मवित्) कहलाने योग्य है। और जिसमें अभिमान का लेशमात्र भी हो वह ब्रह्मज्ञानी कहलाने योग्य नहीं है। क्योंकि अपने को ब्रह्मज्ञ समझने का जो अभिमान है, वह भी अज्ञानजनित ही है। 'ब्रह्म' वास्तव में ज्ञेय वस्तु नहीं है, तब उसके ज्ञान का अभिमान कैसे ? ॥ १३ ॥

ज्ञातैवाहमविज्ञेयः शुद्धो मुक्तः सदेत्यपि । विवेकी प्रत्ययो बुद्धेर्दृश्यत्वान्नाशवान्यतः ॥ १४॥

ज्ञातैवेति—'मैं' ज्ञाता ही हूँ, ज्ञेय नहीं हूँ तथा 'शुद्ध', 'मुक्त' और 'सत्' स्वरूप हूँ—यह जो बुद्धि का विवेकी प्रत्यय है, वह भी दृश्य होने के कारण विनाशी है। अतः ज्ञानी में आत्मज्ञता के अभिमान के लिये अवकाश ही नहीं है ॥ १४॥

हृदयस्पर्शिनी

शंका—अशेष (सम्पूर्ण) विशेष का त्याग करने पर भी आत्मा में ब्रह्मात्मज्ञान के विद्यमान रहने से ब्रह्मवित्त्व के अभिमान का त्याग करना कैसे संभव हो सकता है ? अतः आत्मा को अत्यन्त निर्विशेष कैसे कह सकते हैं ? समा०—'ज्ञातैवाहम्' मैं ज्ञाता ही हूँ, ज्ञेय नहीं हूँ—इस प्रकार का जो विवेकी प्रत्यय है (विवेकवान् प्रत्यय यानी विविक्त आत्मनिष्ठ प्रत्यय) है, वह अन्तःकरणवृत्तिरूप (बुद्धिबोधेद्ध) है, इसलिए वह दृश्य है, और दृश्य होने से वह साक्षिभास्य है, अतः नाशवान् होने से उस वृत्ति का भी नाश हो जाता है। इस कारण ब्रह्मवित् में अभिमान का लेश भी नहीं पाया जाता। जिस प्रकार मृत्तिका से मलिन हुए जल में प्रक्षिप्त कतकरेणु (निर्मली बीज) उस जल की सम्पूर्ण मलिनता को नीचे बैठाकर स्वयं भी बैठ जाता है, उसी प्रकार यह बोधवृत्ति भी अन्तःकरण की होने के कारण अज्ञानजनित ही है, अतः अज्ञान का नाश करने के पश्चात् वह (वृत्ति) स्वयं भी नष्ट हो जाती है। अर्थात् पर प्रत्यगात्मा में प्रक्षिप्त वह विवेकबुद्धिवृत्ति, प्रत्यगात्मगत सकल विशेषरूप मलों का उन्मूलन कर अन्त में स्वयं भी उन्मूलित हो जाती है, प्रत्यगात्मा को समस्त विशेषों से रहित अनाविल कर देती है। तात्पर्य यह है कि उक्त विवेक (प्रत्यय) साक्षी का विषय है, विनाशी है, परिणामशीला बुद्धि का धर्म है, आत्मा का नहीं। इससे स्पष्ट होता है कि यह प्रत्यगात्मा, निर्विशेष ब्रह्म ही है ॥ १४ ॥

अलुप्ता त्वात्मनो दृष्टिनोत्पाद्या कारकैरतः । दृष्ट्या चान्यथा दृष्ट्या जन्यतास्याः प्रकल्पिता ॥ १५॥

अलुप्तेति—आत्मा की चिन्मयी दृष्टि का कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह कर्ता आदि कारकों द्वारा उत्पन्न नहीं की जाती। अन्यदृश्य बुद्धि-वृत्ति के द्वारा उस आत्मा की उत्पत्ति [जन्यता] की कल्पना हुआ करती है ॥ १५ ॥

हृदयस्पर्शिनी

शंका—प्रकृत बुद्धिप्रत्यय के समान आत्मचैतन्यप्रतिभास भी विनाशी है—'आत्मचैतन्यप्रतिभासोऽपि नाशवान्, आत्मप्रकाशत्वात्, या (जन्यत्वात्), प्रकृतबुद्धिप्रत्ययवत्'। इस अनुमान से यह कह सकते हैं कि 'ज्ञान' (दृष्टि) को आत्मा का स्वरूप भले ही मान लिया गया हो तथापि वह नश्वर है, क्योंकि वह (ज्ञान) जन्य है, अतः उसमें जन्यत्व प्रतीति होने से उसे नश्वर ही समझना होगा। समा०—उक्त अनुमान में हेतु के सोपाधिक होने से वह अनुमान ठीक नहीं है। वहां 'कारकाधीनात्म-लाभत्व' उपाधि है। जो साध्य का 'व्यापक' होकर साधन का 'अव्यापक' रहे उसे 'उपाधि' कहते हैं। आत्मस्वरूप जो ज्ञान (दृष्टि) है, उसकी जन्यता तो एक अन्यबुद्धिवृत्ति रूप उपाधि से, जो स्वरूपज्ञान (दृष्टि) के विशेष आकार वाली

प्रकाशप्रकरणम् | ६३

है, उससे कल्पित (आरोपित) है। वह बुद्धिवृत्ति दृश्य कोटि में है। जैसे घट की उत्पत्ति होने से घटाकाश की उत्पत्ति कही जाती है। अतः उक्त 'कारकाधीनात्मलाभत्व' साधन (हेतु) का अव्यापक होने से हेतु की 'उपाधि' है, अर्थात् वह साधन का व्यापक नहीं है। 'जन्यत्व' हेतु भी असिद्ध है। अन्तःकरणदृष्टि (ज्ञान) में आत्मदृष्टि (ज्ञान) का आभास (भ्रम) होता है। उन दोनों का विवेक न होने से आत्मदृष्टि में ही समस्त व्यवहार होता रहता है। वस्तुतः स्वात्मदर्शी के लिये कोई व्यवहार नहीं है एवं च जैसे घट-पट आदि जन्य पदार्थों की सत्ता कारकों के अधीन है, वैसे आत्मचैतन्य, कारकों के अधीन नहीं है। इस कारण वह स्वयं सिद्ध और नित्य है। जैसे घट की उत्पत्ति से घटाकाश की उत्पत्ति मान ली जाती है, उसी प्रकार बुद्धिवृत्तिरूप उपाधि के कारण आत्मचैतन्य भी उत्पन्न हुआ-सा जान पड़ता है ॥ १५ ॥ देहात्मबुद्ध्यपेक्षत्वादात्मनः कर्तृता मृषा । नैव किंचित्करोमीति सत्या बुद्धिः प्रमाणजा ॥१६॥ देहात्मेति—आत्मा की कर्तृता [कर्तृत्व] देहात्मबुद्धि [देहात्मज्ञान] की अपेक्षा रखती है अर्थात् देहात्म- बुद्धि पर निर्भर है। अतः वह मिथ्या है, इसलिये 'मैं कुछ भी नहीं करता' यह प्रमाणजन्य ज्ञान ही सत्य है ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसके पूर्व श्लोक में यह बताया था कि चित्प्रकाश आत्मा में अव्यभिचरित तथा नित्य होने से 'यो वेद्धालु- प्तदृष्टित्वम्'—(१३) श्लोक के द्वारा उसे (चित्प्रकाश) नित्यदृष्टि (नित्यज्ञान) रूप बताया है। आगे चलकर उसी श्लोक में 'अकर्तृ तां यथा' भी कहा गया था, अतः अब उसी 'निर्विकारत्व' को 'देहात्मबुद्धि' और 'कर्तृत्वं कारकापेक्षम्' इन दो श्लोकों के द्वारा बता रहे हैं। 'देहात्मबुद्धि' यह मिथ्या बुद्धि है, और उसी कारण आत्मा में जो कर्तृत्व आदि की प्रतीति होती रहती है, वह भी मिथ्या है। 'नैव किञ्चित् करोमि' = मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ, इस प्रकार की 'आत्मा' में जो अकर्तृत्वबुद्धि है, वह उपनिषत्प्रमाण¹ से उत्पन्न होती है, अतः वह सप्रमाण है, इस कारण वही सत्य है, और प्रमाणरहित देहात्मबुद्धि की बाधक है। एवं च आत्मा में होनेवाला कर्तृत्वादिप्रतिभास मिथ्या (अज्ञानमूलक होने से मिथ्या) है और अकर्ता, अभोक्ता आत्मा का ज्ञान, प्रमाणजनित होने से बलवान् है। अतः ब्रह्मात्मज्ञानी के लिए कोई व्यवहार नहीं है ॥ १६ ॥ कर्तृत्वं कारकापेक्षमकर्तृत्वं स्वभावतः । कर्ता भोक्तेति विज्ञानं मृषैवेति सुनिश्चितम् ॥१७॥ कर्तृत्वमिति—कर्तृत्व तो कारकों की अपेक्षा रखता है, किन्तु आत्मा का अकर्तृत्व स्वाभाविक है। अतः 'मैं कर्ता हूँ, भोक्ता हूँ—यह विज्ञान मिथ्या ही है, यही सुनिश्चित सिद्धान्त है ॥ १७॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त श्लोक के द्वारा भी पूर्वोक्त अर्थ को ही (आत्मा में कर्तृत्वबुद्धि पारमार्थिक नहीं है) बता रहे हैं। वस्तुतः असंग, निरवयव आत्मा में कारकों का संसर्ग (संबंध) अनुपपन्न ही है। क्योंकि उसमें अकर्तृत्व तो स्वाभाविक है, इस कारण उसे कर्ता, भोक्ता आदि समझना मिथ्या ही है, वास्तविक (सत्य) नहीं है। 'आत्मा' तो नित्य निर्मल ही है ॥ १७ ॥ एवं शास्त्रानुमानाभ्यां स्वरूपेऽवगते सति । नियोज्योऽहमिति ह्येषा सत्या बुद्धिः कथं भवेत् ॥१८॥ एवमिति—इस प्रकार शास्त्र² और अनुमान³ प्रमाण द्वारा आत्मस्वरूप का बोध हो जाने पर 'मैं नियोज्य [कर्मविधायक वाक्य के द्वारा प्रवृत्त किये जाने योग्य] हूँ'—ऐसी बुद्धि सत्य कैसे हो सकती है ? ॥ १८ ॥ १. 'निष्कलं निष्क्रयं शान्तम्'—( श्वेता. उ. ६।१९ ) २. 'विज्ञातार्यस्तु विज्ञाता स त्वमित्युच्यते यतः'—(श्वेता. उ. १२।८ ) ३. 'यत्स्थस्तापो रवेर्देहे'—( श्वेता. उ. १२।१० )

६४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनो शङ्का—पूर्वोक्त पद्धति के अनुसार वेदान्त वाक्यों से आपाततः ज्ञान होने पर भी साक्षात्कार के निमित्त प्रसंख्यान विधि को क्यों न माना जाय ? समा०—'तत् त्वम्' पदार्थ का परिशोधन किये हुए व्यक्ति को वेदान्त वाक्य से ही 'अहं ब्रह्मास्मि'—मैं ब्रह्म हूँ—यह ज्ञान निरपवादरूप से (अबाधित) हो जाता है, क्योंकि पदार्थ—परिशोधन होने पर 'नियोज्योऽहम्' मैं नियोज्य हूँ, यह बुद्धि नहीं रह पाती, उसका तो उन्मूलन ही हो जाता है। अतः प्रसंख्यानविधि के लिये कोई अवकाश नहीं है। हाँ, पदार्थपरिशोधन के पूर्व 'मैं नियोज्य हूँ'—यह बुद्धि होती रहती है, किन्तु वह कल्पित है, अतएव पदार्थ- शोधन के पश्चात् उस कल्पित बुद्धि का बाध हो जाता है ॥ १८ ॥ यथा सर्वान्तरं व्योम व्योम्नोऽप्यभ्यन्तरो* ह्यहम् । निर्विकारोऽचलः शुद्धोऽजरो मुक्तः सदाद्वयः ॥१९॥ यथेति—जिस प्रकार आकाश सर्वत्र सबमें व्याप्त [ओतप्रोत] है, उसी प्रकार 'मैं' आकाश के भी अन्तर्गत तथा निर्विकार, अचल, अजर, शुद्ध, मुक्त, नित्य और अद्वयस्वरूप हूँ ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनो 'ब्रह्मवित्' में निर्विकारता होने से उसे 'मैं नियोज्य हूँ'—ऐसी बुद्धि (यह ज्ञान) होती ही नहीं ॥ १९ ॥ ॥ इति द्वादशम्प्रकाशप्रकरणं समाप्तम् ॥

  • प्याभ्य—पाठान्तरम्

पद्यभाग १३: अचक्षुष्ट्वप्रकरणम्

अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् अचक्षुष्ट्वान्न दृष्टिर्मे तथाऽश्रोत्रस्य का श्रुतिः । अवाक्त्वात्न तु वक्तिः स्यादामनस्त्वान्मतिः कुतः ॥१॥ अचक्षुष्ट्वादिति— चक्षुर्विहीन [नेत्रहीन] होने से मेरी कोई दृष्टि नहीं है, उसी तरह मैं श्रोत्रहीन हूँ, अतः मुझमें श्रवण शक्ति भी कैसे हो सकती है ? तथा वाक् (वाणी) रहित होने के कारण मुझमें वचन शक्ति भी नहीं है, और मनोहीन (अमना) होने के कारण मुझमें मननशक्ति भी कैसे हो सकती है ? ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी लोगों को पदार्थ के स्वरूप का ठीक-ठीक परिचय न होने से ही वाक्य के अर्थ का ज्ञान नहीं हो पाता, किन्तु पदार्थ का परिचय होते ही वाक्य के ठीक-ठीक अर्थ का ज्ञान हो जाता है। अतः प्रसंख्यानविधि अनर्थक और अनुपपन्न है, यह पहले कह चुके हैं। पूर्व प्रकरण के अन्त में 'निर्विकारो ऽ चलः शुद्धः' के द्वारा आत्मा का शुद्धत्व और अचलत्व जो बताया गया था, उसी को और अधिक स्पष्ट करने के लिये इस नवीन प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है। इस प्रकरण में आत्मा को सर्वकरणशून्य बताया गया है। चक्षुरिन्द्रिय के माध्यम से बाहर की ओर प्रसृत (फैली हुई) और रूपादि विषयों से उपरञ्जित (रूपादि विषयाकार हुई) 'जानामि' जानता हूँ—यह क्रिया ही 'दृष्टि' शब्द से यहाँ विवक्षित है। इस प्रकार की वह दृष्टि मुझमें नहीं है अर्थात् वह मेरा विकार यानी मेरा धर्म नहीं है। क्योंकि 'अचक्षुष्ट्वात्' अर्थात् चक्षु तो देह (शरीर) देश के आश्रित है, अतः वह भौतिक कारण है। वह मेरे आश्रित नहीं है, यह अन्वय-व्यतिरेक से निश्चित है, अतः हेतु के असिद्ध होने की (हेत्वसिद्धि की) शंका नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार श्रुति (श्रोत्र) आदि के विषय में समझ लेना चाहिये। तथाच तत्तदिन्द्रियद्वारक बुद्धिवृत्तिरूप दृष्टि आदि क्रिया से हीन होने के कारण आत्मा की अचलता और शुद्धता१ स्पष्ट हो जाती है। अर्थात् उसके (आत्मा के) निश्चल होने से ही उसकी शुद्धता समझनी चाहिये ॥ १ ॥ अप्राणस्य न कर्मास्ति बुद्धयभावे न वेदिता। विद्याविद्ये ततो न स्तश्चिन्मात्रज्योतिषो मम ॥२॥ अप्राणस्येति— मैं प्राणरहित हूँ, अतः मेरा कोई कर्म नहीं है, तथा बुद्धि का अभाव होने के कारण मुझमें ज्ञातृत्व भी नहीं है, अतएव मुझ चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप में ज्ञान और अज्ञान भी नहीं हैं ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी कर्तृत्व, ज्ञातृत्व आदि विकारों के हेतुभूत प्राण, बुद्धि के अभाव से (न रहने के कारण) भी मैं शुद्ध हूँ। मैं तो चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप अर्थात् सदा प्रकाशमान चिदेकरस हूँ। मुझमें न विद्या न अविद्या अर्थात् ज्ञान और उसका अभाव या ज्ञान और क्रिया नहीं है, क्योंकि वे दोनों बुद्धि की ही विशेष अवस्थारूप हैं। आत्मा में बुद्धि के न होने से उसकी शुद्धता सिद्ध हो जाती है। एवंच आत्मा में कर्तृत्व, ज्ञातृत्व न होने से उसकी निश्चलता और निश्चलता होने से शुद्धता है। उससे बुद्धि का संबंध न होने से उसमें ज्ञातृत्व नहीं है। उसमें ज्ञातृत्व न होने से उसकी चिन्मात्रता स्पष्ट है, उस चिन्मात्र आत्मा से विद्या-अविद्या का कोई संबन्ध न होने से भी उसकी शुद्धता स्पष्ट है ॥ २ ॥ नित्यमुक्तस्य शुद्धस्य कूटस्थस्याविचालिनः । अमृतस्याऽक्षरस्यैवमशरीरस्य सर्वदा ॥३॥ १. (बृह. उ. ३।८।८) ९

६६ उपदेशसाहस्री नित्येति—इसी प्रकार मुझ नित्यमुक्त, शुद्ध, कूटस्थ, अविचल, अमृतस्वरूप, अविनाशी और अशरीरी में [विद्या, अविद्या नहीं है, इस प्रकार पूर्व श्लोक से सम्बन्ध है ] ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वप्रतिपादित धर्मों का आत्मा में अभाव होने से उसकी शुद्धता बताई गई थी, एवं च उसकी शुद्धता में ‘अशरीरत्व’ को ही हेतु कहना होगा। इसी अभिप्राय से आत्मा के चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप को अनेक विशेषणों से स्पष्ट कर रहे हैं। इन सब विशेषणों से विशिष्ट आत्मा में विद्या-अविद्या नहीं है, ऐसा अन्वय पूर्व श्लोक के साथ लगाना चाहिये। आत्मा की नित्यता में ‘शुद्धत्व’ हेतु है, उसकी कूटस्थता में ‘अविचालित्त्व’ हेतु है, उसके अमृतत्व में ‘अक्षरत्व’ हेतु है। इस प्रकार विशेषणों को लगाना चाहिये। उक्त तीनों में ‘अशरीरत्व’ हेतु है। क्योंकि शरीर का संबंध हुए बिना उसमें अशुद्धि, चलनक्रिया, क्षरणक्रिया की उपपत्ति नहीं हो सकती। आत्मा तो सर्वदा ही अशरीर होने से वह सर्वदा शुद्ध है ॥ ३ ॥ जिघत्सा वा पिपासा वा शोकमोहौ जरामृतो । न विद्यन्तेऽशरीरत्वाद् व्योमवद्व्यापिनो मम ॥४॥ जिघत्सेति—उक्त विशेषणों के द्वारा प्रतिपादित आत्मा में क्षुत् [भूख], पिपासा [प्यास], शोक, मोह, जरा, मृत्यु भी नहीं है, क्योंकि मैं अशरीर [ शरीर रहित ] तथा आकाश के समान व्यापक हूँ ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा के साथ छह ऊर्मियों (षडूमियों) का सम्बन्ध न रहने से भी उसकी शुद्धता सिद्ध होती है। खादितुमिच्छा = जिघत्सा = खाने की इच्छा, पातुमिच्छा = पिपासा = पीने की इच्छा। 'अशरीरत्वात्' यह उपलक्षण है (सूचक है), अर्थात् अशरीरत्वात् कहने से अप्राणत्वात्, अमनस्त्वात् को भी समझना चाहिये। कहा भी है— 'प्राणस्य क्षुत्पिपासे द्वे मनसः शोकमोहकौ। जरामृत्यू शरीरस्य षडूर्मीरहितः शिवः॥' इति। क्षुत् और पिपासा 'प्राण' के धर्म हैं, शोक और मोह 'मन' के धर्म हैं, जरा और मृत्यु 'शरीर' के धर्म हैं, इन छह विकारों (ऊर्मियों) से रहित 'शिव' है ॥ ४ ॥ अस्पर्शत्वान्न मे स्पृष्टिर्नाजिह्वत्वादरसज्ञता । नित्यविज्ञानरूपस्य ज्ञानाज्ञाने न मे सदा ॥५॥ अस्पर्शत्वादिति—मैं स्पर्शशून्य हूँ इस कारण मुझमें 'स्पर्शगुण' नहीं है, रसनाहीन हूँ, इसलिये मुझमें रसज्ञता नहीं है, तथा नित्य विज्ञानस्वरूप होने के कारण मुझमें सर्वदा ही ज्ञान और अज्ञान का अभाव है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी स्पर्श-रसनसम्बन्धप्रतिषेध, अनुक्त सकल इन्द्रियवृत्तियों के प्रतिषेध का उपलक्षण है। एवंच आविर्भाव- तिरोभाव रहित होने से उसकी विशुद्ध चिद्रूपता कही गई है। एवंच अनिषिद्ध इन्द्रियनिषेध द्वारा उनसे (उन इन्द्रियों से) प्राप्त दृष्टादि विकार का आत्मा में निषेध किया गया है। वह (आत्मा) नित्य विज्ञानरूप होने से उसमें विद्या-अविद्या भी नहीं हैं ॥ ५ ॥ या तु स्यान्मानसी वृत्तिश्चाक्षुषका रूपरञ्जना । नित्यमेवात्मनो दृष्ट्या नित्यया दृश्यते हि सा ॥६॥ यात्विति—चक्षुरिन्द्रिय के द्वारा निर्गत होने वाली रूपविषयिणी जो मानसी वृत्ति है, वह सर्वदा ही आत्मा के नित्य चैतन्य से प्रकाशित होती है ॥ ६ ॥

अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् ६७ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में दृष्टि आदि नहीं होते हैं, यह पहले बताया गया है, उसी में उपपत्ति दे रहे हैं—इन्द्रिय का विषय के साथ सम्बन्ध होने पर अन्तःकरण, विषय के आकार में परिणत हो जाता है। अन्तःकरण के इस परिणाम को ही ‘वृत्ति’ कहते हैं। चक्षुरादि इन्द्रियों से होने वाले समस्त ज्ञान, तत्तदाकार में परिणत हुई अन्तःकरण की वृत्ति से ही होते हैं। वह वृत्ति, आत्मरूप नित्य चैतन्यप्रकाशलक्षण दृष्टि से नित्य ही प्रकाशित होती रहती है। इसका सभी को अनुभव है। अन्तःकरण की दृष्टि, आत्मचैतन्य की दृश्य है ॥ ६ ॥ तथाऽन्येन्द्रिययुक्ता या वृत्तयो विषयाञ्जनाः । स्मृती रागादिरूपा च केवलाऽन्तर्मनस्यपि ॥७॥ तथेति—इसी प्रकार जो अन्यान्य इन्द्रियों से युक्त विषयाकार वृत्तियाँ हैं, तथा जो [इन्द्रियसम्बन्धरहित] केवल मन के भीतर होनेवाली स्मरणात्मिका, रागात्मिका आदि वृत्तियाँ हैं [ वे भी आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित होती हैं ॥७॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व प्रतिपादन के अनुसार यह अनुमान प्रयोग कर सकते हैं कि 'न दृष्ट्यादयः चिदात्मीयाः, तद्दृश्यत्वात्, यो येन दृश्यते न स तदीयः, यथा रूपादिः ।' इससे यह सिद्ध होता है कि आत्मा दृष्टि आदि विकारों से रहित होने के कारण उसमें शुद्धता है, इसी अभिप्राय से नेत्रद्वारक वृत्ति में कहे गये न्याय का अतिदेश अन्य वृत्तियों में कर रहे हैं। विषयाञ्जना वृत्ति का अर्थ है विषयोपाधिका अर्थात् विषयाकारा वृत्ति। जो स्मृति, राग आदि वृत्ति, चक्षुरादि बाह्येन्द्रियों की अपेक्षा किये बिना ही शरीरान्तर्वर्ती चित्त में हुआ करती है, वह भी पूर्वोक्त आत्मदृष्टि के द्वारा देखी जाती है, अर्थात् प्रकाशित होती है ॥ ७॥ मानस्यस्तद्वदन्यस्य दृश्यन्ते स्वप्नवृत्तयः । द्रष्टुर्दृष्टिस्ततो नित्या शुद्धाऽनन्ता च केवला ॥८॥ मानस्य इति—उसी तरह मन की परिणाम रूप जो स्वप्नवृत्तियाँ हैं, वे भी सबसे भिन्न आत्मा की ही दृश्य हैं, इस कारण द्रष्टा की दृष्टि नित्य, शुद्ध, अनन्त और अन्यसंसर्गरहित [केवल] है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी अभिप्राय यह है कि स्वप्नावस्था में विद्यमान मनःपरिणामरूप जो विषयाकार वृत्तियाँ हैं, वे सब, अपने से भिन्न द्रष्टा की ही दृश्य जिस प्रकार मानी जाती हैं, उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में सभी वृत्तियाँ (दृष्टियाँ) उनसे भिन्न द्रष्टा की दृश्य होती हैं, क्योंकि स्वाप्निक दृश्य एवं जागरित दृश्य दोनों में समान दृश्यता है। समस्त वृत्तियाँ (दृष्टियाँ) कूटस्थदृष्टिभास्य हैं। इससे निष्कर्ष यह निकला कि द्रष्टा की दृष्टि (ज्ञान) नित्य, शुद्ध, अनन्त और संसर्ग- शून्य है। इन्द्रिय का विषय (वस्तु) के साथ संसर्ग होनेपर अन्तःकरण, विषय के आकार में परिणत हो जाता है। अन्तःकरण के इस परिणाम को ही ‘वृत्ति’ कहते हैं। इन्द्रियों से होनेवाले सभी ज्ञान उन-उन आकारों में परिणत हुई अन्तःकरण की वृत्ति से ही होते हैं ॥ ८ ॥ अनित्या साऽविशुद्धेति गृह्यतेऽत्राविवेकतः । सुखी दुःखी तथा चाहं दृश्ययोपाधिभूतया ॥९॥ अनित्येति—उपाधिरूप जो दृश्यदृष्टि है, उसके साथ आत्मदृष्टि का अविवेक रहने से लोग उसे अनित्य और अशुद्ध समझते हैं, उस कारण 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ' ऐसा समझते हैं ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—यदि आत्मदृष्टि ही कूटस्थ है तो उसे अन्यथा (अनित्य, अशुद्ध) क्यों समझा जाता है ?

६८ उपदेशसाहस्री समा०—वृत्तिमत् (वृत्तिविशिष्ट) अन्तःकरण के साथ अविवेक के होने से वैसा (अन्यथा) समझते हैं । अर्थात् उपाधिभूत दृश्यदृष्टि के साथ विवेक न होने के कारण (विवेकाऽग्रह होने से) व्यवहार दशा में उस नित्य शुद्ध आत्मदृष्टि को ही अविशुद्ध अनित्य समझते रहते हैं और अपने को सुखी-दुःखी मानते हैं ॥ ९ ॥ मूढया मूढ इत्येवं शुद्धया शुद्ध इत्यपि । मन्यते सर्वलोकोऽयं येन संसारमृच्छति ॥१०॥ मूढयेति—मूढ़ वृत्ति के साथ आत्मदृष्टि का अविवेक होने से 'मैं मूढ़ हूँ'—ऐसा संपूर्ण संसार समझता है । और शुद्ध वृत्ति का संसर्ग होने पर 'मैं शुद्ध हूँ'—ऐसा समझने लगता है। उस कारण उसे संसार की प्राप्ति होती है अर्थात् मिथ्या- भिमान [अविवेकनिबन्धन] ही संसारप्राप्ति है ॥ १० ॥ अचक्षुष्कादिशास्त्रोक्तं सबाह्याभ्यन्तरं त्वजम् । नित्यमुक्तमिहात्मानं मुमुक्षुश्चेत्सदा स्मरेत् ॥११॥ अचक्षुष्कादीति—यदि मोक्ष की इच्छा हो तो उसे “अचक्षुष्कम् अश्रोत्रम् अवाक् अगमनः” इत्यादि श्रुति के द्वारा बताये गये बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा एवं नित्यमुक्त आत्मा का स्मरण [मनन] करना चाहिये । अभिप्राय यह है कि संसारनिवृत्ति (मोक्ष) की यदि किसी को इच्छा हो तो उसे श्रुतिप्रतिपादित आचार्योपदिष्ट आत्मस्वरूप का अनवरत [निरन्तर] अनुसन्धान करते रहना चाहिये । इस प्रकार मोक्ष का उपाय [साधन] बताते हुए मुमुक्षु को इस पद्य के द्वारा शिक्षा दी गई है ॥ ११ ॥ अचक्षुष्कादिशास्त्राच्च नेन्द्रियाणि सदा मम । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र इति चाथर्वणं* वचः ॥१२॥ अचक्षुष्कादीति—अचक्षुष्कादि शास्त्र [बृहदारण्यक श्रुति] की प्रामाणिकता सुनिश्चित होने से सर्वदा ही मेरे इन्द्रियाँ नहीं हैं और उसी प्रकार 'आत्मा प्राणहीन, मनो-हीन, एवं शुद्ध है” ऐसा अथर्ववेदीय मुण्डकोपनिषद् का भी वाक्य है ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में आत्मा की जो चक्षुरादिशून्यता बताई गई थी, उसी में अचक्षुष्कादि शास्त्ररूप बृहदारण्यक१ श्रुति को प्रमाण रूप में उपस्थित किया गया है । उसी प्रकार मुण्डकोपनिषद्२ में भी कहा गया है । एवंच आत्मा का प्राण से या मन से सम्बन्ध नहीं है ॥ १२ ॥ शब्दादीनामभावश्च श्रूयते मम काठके । अप्राणो ह्यमना यस्मादविकारी सदा ह्यहम् ॥१३॥ शब्दादीनामिति—मुझमें शब्दादि का अभाव सुना जाता है, तथा मैं प्राणहीन और मनो-हीन भी हूँ, अतः मैं सर्वदा ही अविकारी हूँ ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की निर्विशेषता में श्रुति का प्रमाण दे रहे हैं— “अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥” (कठ उ० १।३।१५) यह उपर्युक्त प्रमाण अचक्षुष्कादि का भी उपलक्षण है । एवंच प्राणादिकों के साथ सम्बन्ध न रहने से तथा अविकारी होने से मुमुक्षुत्व सिद्ध हो जाता है ॥ १३ ॥ १. ( 'अचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनः'—बृ. उ. ३।८।८ ) २. ( मुं. उ. २।१।२ )

  • णेर्व०—पाठान्तरम् ।

अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् ६९ विक्षेपो नास्ति तस्मान्मे न समाधिस्ततो मम । विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद्विकारिणः ॥१४॥ विक्षेप इति—मुझमें विकार न होने से ही मुझमें विक्षेप भी नहीं है और विक्षेप न होने से समाधि भी नहीं है। विक्षेप और समाधि तो विकारी मन के ही हो सकते हैं ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की अविकारिता का जब निश्चय हो जाता है, तब विक्षेप भी नहीं होता। विक्षेप की निवृत्ति होनेपर समाधि भी नहीं होती अर्थात् विक्षेप के अभाव में समाधि का भी अभाव रहता है। विक्षेप और समाधि दोनों विकारवान् मन में ही हुआ करते हैं। अविकारी में उन दोनों का अभाव रहता है ॥ १४ ॥ अमनस्कस्य शुद्धस्य कथं तत्स्याद्द्वयं मम । अमनस्त्वाविकारित्वे विदेहव्यापिनो मम ॥१५॥ अमनस्कस्येति—मैं मनःशून्य और शुद्ध हूँ, मुझे वे दोनों [समाधि और विक्षेप] कैसे हो सकते हैं? मुझमें मनःशून्यता और शुद्धता तो मेरे देहहीन और व्यापक होने के कारण है ॥ १५ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा यदि मन की तरह विकारी होता या मन के साथ उसका यदि तादात्म्य रहता तो उसमें (आत्मा में) विक्षेप-समाधि का संभव हो सकता था। किन्तु दोनों न होने से विक्षेप, समाधि दोनों नहीं हो पाते। आत्मा विदेह होने से उसमें अमनस्कत्व और व्यापित्व (व्यापकता) होने से अविकारित्व है ॥ १५ ॥ इत्येतद्यावदज्ञानं[तं] तावत्कार्यं ममाभवत् । नित्यमुक्तस्य शुद्धस्य बुद्धस्य च सदा मम ॥१६॥ इतीति—नित्यशुद्ध, नित्यमुक्त और सर्वदा बोधस्वरूप होने पर भी जब तक मुझे अपने स्वरूप का अज्ञान था तब तक ही मेरे लिये समाधि आदि कर्त्तव्यकार्य थे ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि मैं नित्य, मुक्त, बुद्ध, शुद्ध हूँ तथापि जबतक मुझे अपने नित्यत्व, शुद्धत्व-मुक्तत्वादि का अज्ञान था, तबतक मेरी समाधि आदि में कर्तव्यबुद्धि थी, किन्तु अब नित्यत्व शुद्धत्व, मुक्तत्व का ज्ञान होने पर उसकी मुझे कोई आवश्यकता नहीं है। अर्थात् अब उसमें मेरी कर्तव्यबुद्धि नहीं रही है ॥ १६ ॥ समाधिर्वाऽसमाधिर्वा कार्यं चान्यत्कुतो भवेत् । मां हि ध्यात्वा च बुद्ध्वा च मन्यन्ते कृतकृत्यताम् ॥१७॥ समाधिर्वेति—अब आत्मबोध हो जाने पर मेरे लिये समाधि, असमाधि अथवा अन्य कोई कर्त्तव्य कैसे हो सकता है ? मेरा ध्यान करके और मुझे जानकर तो मोक्ष की इच्छा रखने वाले लोग अपने को कृतकृत्य मानते हैं ॥ १७॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मस्वरूप का परिज्ञान होने पर किसी हेतु के न रहने के कारण समाधि आदि साधनों का अभ्यास करना अथवा न करना कर्तव्य नहीं रह जाता। ध्यान के द्वारा प्रत्यगात्मा का साक्षात्कार हो जाने पर कृतकृत्यता की सिद्धि हो जाने से कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। क्योंकि प्रत्यगेकरस मुझ ब्रह्म का ध्यान कर, विचार कर, जान कर, साक्षात्कार कर मुमुक्षु लोग कृतकृत्यता का अनुभव करते हैं। तथाच भगवती श्रुति भी कह रही है— 'एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य । न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्'१ । इति। १. बृ. उ. ४।४।२३

७० उपदेशसाहस्री 'यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते१' ॥ ब्रह्मवेत्ता की यह महिमा नित्य है, जो कर्म से न तो बढ़ती है और न घटती ही है। जो पुरुष केवल आत्मा में क्रीड़ा करता है, आत्मा में तृप्त रहता है और आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, उसके लिये कोई कर्तव्य शेष रहता ही नहीं । एवं च अज्ञान के अभाव में उसके लिये अब कुछ भी कर्तव्य नहीं है ॥ १७ ॥ अहं ब्रह्मास्मि सर्वोऽस्मि शुद्धो बुद्धोऽस्म्यतः सदा । अजः सर्वत एवाहंमजरश्चाक्षयोऽमृतः ॥१८॥ अहम् इति—मैं ब्रह्म हूँ, मैं सर्वरूप हूँ, इस कारण मैं सदा ही शुद्ध [निर्विकार] और बोध [ज्ञान] स्वरूप हूँ । मैं सब ओर से अजन्मा तथा अजर, अक्षय और अमर हूँ ॥ १८ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि आत्मज्ञानी के लिये समाधि आदि कुछ भी कर्तव्य नहीं है, तथापि आत्मा में ब्रह्मत्व सम्पादन कर प्रपञ्च का विलय करना तो अभी अवशिष्ट है ही—यह शंका हो सकती है। अर्थात् परम आत्मा के ध्यान आदि से जो कृतकृत्यता होती है, वह आत्मा के ध्यान आदि से कैसे होगी ? उक्त शंका का समाधान ग्रन्थकार ने यह दिया है कि आत्मा की ब्रह्मरूपता तो नित्य सिद्ध है, अर्थात् जो आत्मा है वही परमात्मा है, ब्रह्म और आत्मा ये दो नहीं हैं, यानी अभिन्न हैं। और प्रपञ्च तो केवल अज्ञान का विलास मात्र है। अज्ञान की निवृत्ति होने के समय में ही वह प्रपञ्च, अधिष्ठान (ब्रह्म) के रूप में विलीन रहता है। अतः उस आत्मज्ञानी के लिये कुछ अनुष्ठेय (कर्तव्य) नहीं रहता । वह (मैं) सदा ही ब्रह्मरूप, सर्वरूप, शुद्ध, बुद्ध होने से बन्धहीन है। और वह (मैं) सब प्रकार से अज एवं अक्षय रहने से जन्म और क्षय के हेतु से रहित है ॥ १८ ॥ मदन्यः सर्वभूतेषु बोद्धा कश्चिन्न विद्यते । कर्माध्यक्षश्च साक्षी च चेता नित्योऽगुणोऽद्वयः ॥१९॥ मदन्य इति—अखिल प्राणियों में मेरे अतिरिक्त कोई अन्य बोद्धा नहीं है, तथा मैं ही समस्त कर्मों का द्रष्टा, साक्षी, प्रकाशक [चेता], नित्य, निर्गुण और अद्वय हूँ ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न चेतन (चैतन्य) भासता है, ऐसी स्थिति में आत्मा को 'अहं ब्रह्मास्मि' = मैं ब्रह्म हूँ—इस प्रकार पूर्णता का अनुभव कैसे हो सकता है ? अर्थात् आत्मा को ब्रह्मरूप कैसे समझ सकते हैं ? इसके उत्तर में आचार्यचरण श्वेताश्वतरोपनिषद् की एक श्रुति का अर्थ पद्य के द्वारा बता रहे हैं। श्वेताश्वतरोपनिषद् की श्रुति इस प्रकार है— “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च२” ॥ उपर्युक्त श्रुति ने यह बताया है कि एक ही चेतन (चैतन्य) समस्त प्राणियों का अन्तरात्मा है अर्थात् सर्वभूतान्तरात्मा है। भिन्न-भिन्न चेतन नहीं है। चेतन में जो भिन्नता भासित होती है, वह उपाधि की भिन्नता से भासित होती है; जैसे आकाश एक है तथापि घट-मठादि उपाधियों की भिन्नता से उसमें (आकाश में) भी भिन्नता भासित होने लगती है; किन्तु उपाधि के हट जाने पर उस निरुपाधिक की स्वाभाविक एकता का ज्ञान होने लगता है। अतः मेरे (चेतन के) अतिरिक्त अन्य कहीं कोई नहीं है। कर्म के कर्ता के रूप में जो लोग मुझे समझते हैं, वह उनका भ्रम है। क्योंकि मैं कर्म का कर्ता नहीं हूँ, अपितु समस्त कर्मों का द्रष्टामात्र हूँ। चेता अर्थात् विशेषतः विज्ञाता हूँ, साक्षीमात्र हूँ। अतः आत्मा में पूर्णता (ब्रह्मरूपता) का अनुभव, आत्मज्ञानी को होता रहता है ॥ १९ ॥ १. भ. गी. ३।१७ २. श्वे. उ. ६।११

अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् ७१ न सच्चाऽहं न चासच्च नोभयं केवलः शिवः। न मे सन्ध्या न रात्रिर्वा नाहर्वा सर्वदा दृशेः ॥२०॥ न सदिति—न मैं 'सत्' हूँ अर्थात् व्यक्तभूत [पृथ्वी, जल और तेज] स्वरूप हूँ, और न 'असत्' [वायु और आकाश—दो अव्यक्तभूत] स्वरूप हूँ, तथा न 'सदसत्' [पञ्चभूतात्मक शरीर] उभयस्वरूप हूँ। मैं तो केवल [निर्विशेष], शिव-स्वरूप [त्रिगुणातीत] हूँ। न मेरे लिये सन्ध्या है, न रात्रि है और न दिन है, क्योंकि मैं नित्यसाक्षी स्वरूप हूँ ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी 'अहं ब्रह्मास्मि' के द्वारा प्रतिपादित आत्मा की ब्रह्मरूपता तो उचित है, क्योंकि वह (आत्मा) निर्विशेष (समस्त विशेषताओं से रहित) होने से किसी भी क्रिया में वह शेष (अंग, साधन) नहीं हो सकता—इसी अभिप्राय को पूर्वार्ध के द्वारा बताया है। इस पद्य के पूर्व अठारहवें पद्य में 'सर्वोऽस्मि' कहा था, उसे किसी अनुपपत्ति के उपस्थित होने पर सामानाधिकरण्य के अभिप्राय से समझना चाहिये। प्रत्यक्ष के योग्य मूर्त पृथिव्यप्तेजोरूप तीन भूतों को 'सत्' कहते हैं। और 'त्यत्' शब्द से निर्दिष्ट अमूर्त वाय्वाकाशात्मक दो भूतों को 'असत्' कहते हैं। तथा मूर्ताऽमूर्तात्मक भूतपञ्चक अर्थात् पञ्चभूतों के परिणामस्वरूप शरीरसंस्थान को उभय (सदसद्रूप) कहते हैं। 'तत्सर्वं नाहम्' = वह सब मैं नहीं हूँ, ऐसा कहने पर 'नेति नेति' से मुझपर आरोपित का ही निषेध होने से मेरे अतिरिक्त और मुझमें भी अन्य की सत्ता न रहने के कारण 'मैं ही यह सब कुछ हूँ'—यह उचित ही कहा गया है। 'केवल' का अर्थ सर्वविशेषशून्य और 'शिव' का अर्थ निस्त्रैगुण्य होता है। मुझमें सन्ध्या आदि कालविशेष का भी सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि मैं अलुप्तप्रकाशरूप हूँ। अथवा 'सन्ध्यादि' शब्दों से क्रमशः स्वप्न, सुषुप्ति, जागरण अवस्थाओं को समझना चाहिए। मैं तो सदैव एक-सा प्रकाशमान हूँ। अतः स्वरूपावरण-विक्षेपरूप अवस्थाएँ मुझसे कैसे सम्बन्धित हो सकती हैं ? एवञ्च सर्वविशेषशून्यता के कारण परिशुद्ध रहनेवाले मुझ आत्मा में ब्रह्मरूपता उपपन्न होती है ॥ २० ॥ सर्वमूर्तिवियुक्तं यद्यथा खं सूक्ष्ममद्वयम् । तेनाप्यस्मि विना भूतं ब्रह्मैवाहं तथाऽद्वयम् ॥२१॥ सर्वैति—जैसे आकाश सर्वविध आकारों से रहित, सूक्ष्म और अद्वितीय है, वैसे ही मैं भी अद्वय ब्रह्मरूप हूँ, और उस आकाश के विना भी विद्यमान रहता हूँ ॥ २१ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसके पूर्व पद्य में बताया था कि चिदेकतान (सर्वदा एकरूपेण प्रकाशमान) निर्विशेष आत्मा, ब्रह्मरूप होने से (वह) पूर्ण है। इसी बात को दृष्टान्त के द्वारा हृदयंगम करा रहे हैं। जैसे आकाश, सभी परिच्छिन्न आकार वाले आकाशों से विलक्षण है, इस कारण वह (आकाश) सूक्ष्म लक्षित होता है, वैसे ही यह ब्रह्म, परिपूर्ण, अत्यन्त सूक्ष्म तथा द्वैताभावोपलक्षित माना जाता है। एवञ्च ब्रह्म के अद्वितीय रहने से और आत्मा का उससे भेद न होने से (अनन्यता रहने से) 'ब्रह्मैवाऽस्मि'—यह अनुभव होता है। उक्त युक्ति से आत्मा की पूर्णता सिद्ध होने पर भी पुनः एक शङ्का उत्पन्न होती है कि ब्रह्म और आकाश दोनों में एक दृष्टान्त है और एक दाष्ट्रान्त है, अर्थात् दोनों में दृष्टान्त- दाष्ट्रान्तिकभाव (उपमानोपमेयभाव) है, उस कारण ब्रह्म से भिन्न आकाश की सत्ता सिद्ध होने से दोनों में भेद ही सिद्ध होता है, तब ब्रह्म को अद्वितीय कैसे कह सकते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर आचार्यचरण इस प्रकार दे रहे हैं— 'तेनाप्यस्मि विनाभूतम्' मैं (आत्मा-ब्रह्म) उसके (आकाश के) बिना भी विद्यमान रहता हूँ। यद्यपि 'आकाश' सबसे सूक्ष्म है, व्यापक है, कल्पान्त तक स्थायी है, इसलिए व्यावहारिक दृष्टि से उसे (आकाश को) नित्य कहते हैं, तथापि कल्पान्त में आकाश की स्थिति नहीं रहती, इस कारण उसकी नित्यता वास्तविक नहीं है। वास्तविक नित्य तो ब्रह्म ही है, क्योंकि वह सृष्टि के आदि में और कल्पान्त (प्रलय) में भी अर्थात् दोनों ही समय समान रूप से वर्तमान रहता है। अतः उसके अद्वैत भाव में कोई क्षति नहीं है। उपर्युक्त पद्य में 'सूक्ष्ममद्वयम्' और 'तथाऽद्वयम्'—इस प्रकार 'अद्वय' पद की पुनरावृत्ति की शंका का निरसन इस प्रकार होगा कि प्रथम 'अद्वय' पद का सम्बन्ध 'आकाश' के साथ और द्वितीय 'अद्वय' पद का सम्बन्ध 'ब्रह्म' के साथ समझना चाहिये ॥ २१ ॥

७२ उपदेशसाहस्री ममात्माऽस्य त आत्मेति भेदो व्योम्नो यथा भवेत् । एकस्य सुषिरभेदेन तथा मम विकल्पितः ॥२२॥ ममेति—जिस प्रकार छिद्रभेद से एक ही आकाश का भेद समझा जाता है उसी प्रकार 'मेरा आत्मा और स्वयं आत्मा' इस प्रकार भेद की कल्पना मुझमें की जाती है । अर्थात् ब्रह्म [आत्मा] तो पूर्ण ही है तथापि औपाधिक भेद की कल्पना उसमें की जाती है ॥ २२ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'मेरा आत्मा ब्रह्मरूप है, मैं स्वयं ब्रह्मरूप हूँ'—इस प्रकार जो यह आत्माऽत्मीयभाव के रूप में भेदप्रतिभास होता रहता है, ऐसी स्थिति में अद्वितीय ब्रह्मत्व कैसे माना जाय ? उक्त आशंका का समाधान यह है कि 'मैं' तो एक ही हूँ, किन्तु अन्तःकरण आदि उपाधिकृत भेद का मुझपर आरोप किया जाता है । जैसे आकाश स्वयं एक ही है किन्तु छिद्रभेद से अंशांशिभावरूप भेद का आरोप उस एक आकाश में करते हैं, उसी तरह मेरे विषय में समझो । अतः मेरी वास्तविक एकता में कोई विरोध नहीं है ॥ २२ ॥ भेदोऽभेदस्तथा चैको नाना चेति विकल्पितः । ज्ञेयं ज्ञाता गतिर्गन्ता मध्येकस्मिन्कुतो भवेत् ॥२३॥ भेदोऽभेद इति—मुझ एक में ही भेद-अभेद तथा एक-अनेक की कल्पना की जाती है । वस्तुतः एकाकी रहने वाले मुझ आत्मा में ज्ञेय, ज्ञाता और फल, फलभोक्ता की कल्पना कैसे की जा सकती है ? ॥ २३ ॥ हृदयस्पर्शिनी अविद्या दशा में भेदव्यवहार के रहने पर भी अब आत्मज्ञान के होने पर वह भेदव्यवहार भी नहीं होता । वस्तुतः 'मैं' तो एक ही हूँ, किन्तु आत्मज्ञान होने के पूर्व अर्थात् अज्ञान दशा में मेरे विषय में यह बुद्धि, भेद-अभेद तथा एक और अनेक का व्यवहार किया करती थी, किन्तु विचार (आत्मजिज्ञासा) करने पर मुझ अकेले (एकाकी) में ही ये सब व्यवहार किस प्रकार हो सकते हैं ? अर्थात् 'मैं' ही ज्ञेय और मैं ही ज्ञाता और मैं ही फल (गति) तथा मैं ही फल पानेवाला भोक्ता (गन्ता) कैसे हो सकता हूँ । परंतु यह सब विचार करने पर (आत्मज्ञान होने पर) समझ में आता है; विचार के पूर्व नहीं ॥ २३ ॥ न मे हेयं न चादेयमविकारी यतो ह्यहम् । सदा मुक्तस्तथा शुद्धः सदा बुद्धोऽगुणोऽद्वयः ॥२४॥ न म इति—मेरे लिये न कुछ त्याज्य है और न कुछ ग्राह्य है, क्योंकि मैं [आत्मा ] विकाररहित हूँ, नित्य मुक्त, शुद्ध तथा नित्य ज्ञानरूप [बोधरूप], निर्गुण और अद्वितीय हूँ ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा को जो निर्विशेष कहा, वह अभी समझ में नहीं आ रहा है, क्योंकि 'संसारित्व' को त्याज्य (हेय) कहा है और 'ब्रह्मत्व' को उपादेय (ग्राह्य) बताया है । ऐसी स्थिति में उसे (आत्मा को) निर्विशेष कैसे कह सकते हैं ? मेरी सर्वविशेषशून्यता (निर्विशेषता) इस प्रकार है कि मैं अविकारी हूँ। उस अविकारिता को 'अविकारी यतो ह्यहम्' में जो 'ही' शब्द है, उससे सूचित किया गया है । क्योंकि 'अविकार्योऽयमुच्यते' १ ऐसी स्मृति है । अविकारी रहने का फल यह है कि 'मैं' सदैव बन्धसंसर्गशून्य (मुक्त) हूँ, उसी तरह तद्धेतुभूत अविद्यासम्बन्ध से रहित हूँ अर्थात् शुद्ध हूँ । शुद्ध रहने में कारण यह है कि मैं सदैव बुद्ध हूँ। किन्तु बोध (ज्ञान) को नैयायिकों की तरह मेरा गुण न समझना । क्योंकि मैं तो अगुण अर्थात् निर्गुण (गुणरहित) हूँ, अतः बोध (ज्ञान) रूप हूँ । बोधरूप कहने से यह न समझना कि कुछ मेरे लिये बोध्य (ज्ञेय) है, क्योंकि मैं तो अद्वय हूँ अर्थात् मेरे अतिरिक्त कोई अन्य है ही नहीं, ऐसी स्थिति में कौन ज्ञेय होगा ? कोई नहीं, क्योंकि सर्वत्र मैं ही मैं हूँ ॥ २४ ॥ १. भ. गी. २।२५

अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् ७३ इत्येवं सर्वदाऽऽत्मानं विद्यात्सर्वं समाहितः । विदित्वा मां स्वदेहस्थमृषिर्मुक्तो ध्रुवो भवेत् ॥२५॥ इतीति—इस प्रकार सर्वदा समाहित चित्त से सबको आत्मस्वरूप समझे और अपने देह में स्थित मुझको जानकर वह सर्वदर्शी ऋषि निश्चय ही मोक्ष को प्राप्त हो जाय ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार शास्त्र और आचार्य के द्वारा नित्य-मुक्तत्वादिलक्षण आत्मा का ज्ञान कराया गया। अतः उक्त- लक्षण अद्वितीय आत्मा के श्रवण-मनन-निदिध्यासन से युक्त होकर मुमुक्षु व्यक्ति सर्वदा 'अहं ब्रह्मास्मि'=मैं ब्रह्म हूँ ऐसा समझे। अपने को ब्रह्म समझनेवाला वह सर्वदर्शी ऋषि निश्चित ही मुक्त हो जाता है ॥ २५ ॥ कृतकृत्यश्च सिद्धश्च योगी ब्राह्मण एव च। य* एवं वेद तत्त्वार्थमन्यथा ह्यात्महा भवेत् ॥२६॥ कृतकृत्य इति—जो मनुष्य इस वास्तविक सत्य को समझता है, वही कृतकृत्य, सिद्ध, योगी और वास्तविक ब्राह्मण है, अन्यथा मनुष्य आत्मघाती ही होगा ॥ २६ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'स ब्राह्मणः' इस श्रुति१ से यह स्पष्ट है कि वही मुख्य (वास्तविक) ब्राह्मण है, जो उक्त सत्य को समझता है अर्थात् अपने स्वरूप (आत्मस्वरूप) को यानी 'मैं ब्रह्म हूँ' समझता है। इस प्रकार की आत्मनिष्ठा जिसमें नहीं होती उसे आत्महा अर्थात् आत्मघाती कहा गया है। श्रीमद्भागवत में कहा है— 'नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् । मयाऽनुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा२ ॥ यह मनुष्य शरीर समस्त शुभफलों की प्राप्ति का मूल है, यह सत्कर्मियों के लिये सुलभ, और दुष्कर्मियों के लिए अत्यन्त दुर्लभ है। इस संसारसागर से पार जाने के लिए यह एक सुदृढ़ नौका है। शरणग्रहणमात्र से ही गुरुदेव इसके केवट बनकर पतवार का संचालन करने लगते हैं। और स्मरणमात्र से ही मैं अनुकूल वायु के रूप में इसे लक्ष्य की ओर बढ़ाने लगता हूँ। इतनी सुविधा होनेपर भी जो इस शरीर के द्वारा संसारसागर से पार नहीं हो जाता, वह तो अपने हाथों अपने आत्मा का हनन—अधःपतन कर रहा है। यह समझना चाहिये ॥ २६ ॥ वेदार्थो निश्चितो ह्येष समासेन मयोदितः । संन्यासिभ्यः प्रवक्तव्यः शान्तेभ्यः शिष्टबुद्धिना ॥२७॥ वेदार्थ इति—मैंने वेद का यह निश्चित अर्थ संक्षेप से बताया। शास्त्र और आचार्य के द्वारा जिसकी बुद्धि सुशिक्षित है ऐसा शिष्टबुद्धि पुरुष, शम-दमादिसाधनसम्पन्न संन्यासियों के प्रति उपर्युक्त वेदार्थ का उपदेश करे ॥ २७ ॥ हृदयस्पर्शिनी ग्रन्थकार अपने ग्रन्थोक्त प्रकरण की उक्तियों की प्रामाणिकता तथा प्रतिपत्तिसौकर्य को सूचित कर रहे हैं— जो कुछ मैंने कहा है, वह वेदार्थ है। अतः उसकी प्रामाणिकता में कोई सन्देह ही नहीं है। और उस वेदार्थ का ज्ञान प्राप्त करने में अब कोई कठिनाई भी नहीं है, क्योंकि मैंने उसे संक्षेप से बता दिया है। अतः आचार्य से उपदिष्ट एवं शास्त्रपरिशीलन से परिपक्व बुद्धिसम्पन्न पुरुष, शमादिसाधनसम्पन्न संन्यासियों के प्रति उस वेदार्थ का उपदेश किया करे। संन्यासाश्रम प्राप्त किये संन्यासीमात्र को नहीं ॥ २७ ॥ ॥ इति त्रयोदशमचक्षुष्ट्वप्रकरणं समाप्तम् ॥ १. (बृ. उ. ३।८।१०) २. (श्रीमद्भागवत—११।२०।१७)

  • यदेवं—पाठान्तरम् । १०

पद्यभाग १४: स्वप्नस्मृतिप्रकरणम्

स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् स्वप्नस्मृत्योर्घटादेर्हि रूपाभासः प्रदृश्यते । पुरा नूनं तदाकारा धीर्दृष्टेत्यनुमीयते ॥ १ ॥ स्वप्नस्मृत्योरिति—स्वप्नकाल और स्मृतिकाल में घट-पटादि पदार्थों का केवल रूपाभास देखा जाता है, इससे यह अनुमान किया जाता है कि पहले अवश्य ही घटपटाकार वृत्ति का अनुभव किया होगा ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसके पूर्व के प्रकरण में यह बताया गया था कि अन्तःकरण के साथ आत्मा का विवेक न होने के कारण संसार की प्रतीति हुआ करती है, स्वतः नहीं। किन्तु जिज्ञासा यह उत्पन्न होती है कि संसार तो प्रत्यक्ष है और अन्तः- करण परोक्ष है। अतः अन्तःकरण (बुद्धि) के अविवेक के कारण संसार की प्रतीति हो नहीं सकती। इस जिज्ञासा के समाधानार्थ इस प्रकरण में अन्तःकरण की परोक्षता का निरसन कर उसकी प्रत्यक्षता को बताते हुए पूर्वोक्त सिद्धान्त को युक्तिपुरःसर पुष्ट कर रहे हैं। पहिले जो बताया कि संसार की प्रतीति स्वतः नहीं होती, वह तो अन्तःकरण- विषयक अविवेक रहने के कारण आत्मा में संसारित्व की प्रतीति होती है, किन्तु शास्त्र पर अटल विश्वास रखनेवाला अतएव उसे प्रमाण माननेवाला और तदनुसार साधना करने के कारण जिसका अज्ञान और तज्जन्य कार्य निवृत्त हो गया है, ऐसा भाग्यशाली व्यक्ति अपने (आत्मा) को निश्चित रूप से ब्रह्मरूप ही समझने लगता है। क्योंकि स्वप्न में और स्मरणकाल में घट-पटादि विषयों के रूपाभास (आकारावभास) का अनुभव किया जाता है, अतः यह मानना पड़ेगा कि पहले कभी जाग्रदवस्था में अनुभव अवस्था में भी अवश्य ही घट-पटाकारा अन्तःकरणवृत्ति का साक्षात् अनुभव किया होगा। 'स्वप्न और स्मृति दृष्टार्थविषयक होती है', यह नियम है। और स्वप्न तथा स्मृति में बाह्य पदार्थ तो होता नहीं, ऐसी स्थिति में यही स्वीकार करना होगा कि स्वप्न और स्मृतिकाल में उपलभ्यमान विषय (पदार्थ) अन्य कुछ न होकर अर्थाकार हुई वृत्ति से विशिष्ट अन्तःकरण ही है। इससे यह कल्पना की जाती है कि जाग्रत् अवस्था में तथा पूर्वानुभवावस्था में भी अर्थाकारवृत्तिमत् अन्तःकरण ही अपरोक्षरूपेण (प्रत्यक्षतया) अनुभूत हो चुका है। तस्मात् सभी अवस्थाओं में वृत्तिमदन्तःकरण अपरोक्ष है, और उसमें प्रतिफलित चिदाभास है। परन्तु उन दोनों की भिन्नता को न समझ पाने से (अविवेक से) आत्मा में संसारित्व का अवभास (प्रत्यक्ष) होना उचित ही है। एवंच बुद्धि (अन्तःकरण) परोक्ष होने से और संसारप्रतिभास अपरोक्ष होने से बुद्धयविवेकनिबन्धन संसार की प्रतीति आत्मा में नहीं है, इस शंका का समाधान हो जाता है, और बुद्धि की अपरोक्षता सिद्ध हो जाती है ॥ १ ॥ भिक्षामटन्यथा स्वप्ने दृष्टो देहो न स स्वयम् । जाग्रद्दृश्यात्तथा देहाद्दृष्टृत्वादन्य एव सः ॥ २ ॥ भिक्षामिति—जैसे स्वप्नावस्था में भिक्षाटन करते हुए दीखने वाला देह स्वयं स्वप्नद्रष्टा नहीं होता, वैसे ही जाग्रदवस्था में दिखाई देनेवाले देह से भी द्रष्टा होने के कारण वह भिन्न ही है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार अन्तःकरण की अपरोक्षता स्पष्ट की गई, उससे यह ज्ञात हुआ कि अन्तःकरणादिसमूह से आत्मा विविक्त (भिन्न) है। इसी को दृष्टान्त देकर बताते हैं—सोये हुए संन्यासी ने स्वप्न में भिक्षार्थ भटकनेवाले जिस देह को देखा, वह देह तो स्वयं द्रष्टा (देखनेवाला) हो नहीं सकता। जैसे देह को आत्मा समझता हुआ भी वह देहरूप (देहात्मक) नहीं होता, वैसे ही जाग्रद् दृश्य देह से भी वह आत्मा पृथक् ही है, क्योंकि वह तो उसका द्रष्टा है। 'देह' शब्द से इन्द्रिय, और अन्तःकरण को भी समझना चाहिये, क्योंकि 'देह' शब्द उपलक्षण है। अनुमान प्रयोग इस प्रकार होगा—'विमतो देहादिः न आत्मा, दृश्यत्वात्, स्वप्नदृश्यदेहादिवत् ।' ॥ २ ॥

स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ७५ मूषासिक्तं यथा ताम्रं तन्निभं जायते तथा । रूपादीन् व्याप्नुवच्चित्तं तन्निभं दृश्यते ध्रुवम् ॥३॥ मूषेति—जैसे ताम्र [ताँबा] साँचे में डालने पर तदाकार हो जाता है, वैसे ही रूपादि को व्याप्त करने वाला चित्त निश्चय ही तद्रूप [तदाकार] होता है ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी सभी अवस्थाओं में बुद्धि ही अर्थ (पदार्थ-वस्तु) के आकारवाली दिखाई देती है, जैसे आग में तपाकर द्रवीभूत किये ताँबे को मूषा (अन्तःसुषिरा मृत्प्रतिमा) अर्थात् साँचे में डालनेपर तत्समानाकार हो जाता है, वैसे ही यह चित्त (बुद्धि) भी रूप आदि विषयों को व्याप्त कर तदाकार (तद्रूपाकार) हो जाता है ॥ ३ ॥ व्यञ्जको वा यथाऽऽलोको व्यङ्ग्यस्याकारतामियात् । सर्वार्थव्यञ्जकत्वाद्धीरर्थाकारा प्रदृश्यते ॥४॥ व्यञ्जको वेति—अथवा जैसे पदार्थ को व्यक्त करने वाला प्रकाश अपने प्रकाश्य के आकार का हो जाता है, वैसे ही सम्पूर्ण वस्तुओं को अभिव्यक्त करनेवाली होने के कारण बुद्धि भी तत्तद् वस्तु के आकारवाली होती देखी जाती है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी साँचे (मूषा) में डाला हुआ तरल ताम्र, कठोर साँचे के अभिघात से शीतल होनेपर उसका साँचे के आकार में परिणत होना तो समझ में आता है, किन्तु चित्त तो अमूर्त है, वह तत्तद् वस्तुओं में व्याप्त होनेपर भी उसका वस्तु के आकार में परिणत होना कैसे संभव हो सकता है ? इस शंका के समाधानार्थ दूसरा दृष्टान्त देते हैं। जैसे अयःपिण्ड (लोहे के गोले) का अभिव्यञ्जक अग्नि तदाकार (गोले के आकार) में परिणत हो जाता है अथवा प्रकाश घट आदि के आकार का हो जाता है, वैसे ही घट-पटादि को प्रकाशित करनेवाली बुद्धि भी घट-पट के आकार वाली हो जाती है ॥ ४ ॥ धीरेवार्थस्वरूपा हि पुंसा दृष्टा पुराऽपि च । न चेत्स्वप्ने कथं पश्येत्स्मरतो वाऽऽकृतिः कुतः ॥५॥ धीरेवेति—स्वप्न और स्मृति के पूर्व भी पुरुष ने वस्तु के आकार में ही बुद्धि को देखा है, अन्यथा स्वप्न में वह संकल्पमय पदार्थों को कैसे देख पाता ? और उन पदार्थों की स्मृति होते ही उन पदार्थों की सृष्टि [ रचना ] कैसे होती ? ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अन्वय के द्वारा बुद्धि की प्रत्यक्षता प्रथम श्लोक में बताई थी । विषयाकार हुई बुद्धि का ही जाग्रदवस्था में अनुभव किया था, उसी कारण स्वप्न और स्मृति में वह बुद्धि, अर्थ के आकार में उपस्थित होती है। इसी अभिप्राय को प्रस्तुत पद्य से व्यतिरेक के द्वारा स्पष्ट कर रहे हैं—जाग्रदवस्था में बुद्धि को यदि अर्थाकार न देखा होता तो स्वप्न में या स्मृति में वह कैसे दिखाई देती ? क्योंकि स्वप्न और स्मृति में बुद्धि के व्यतिरिक्त अन्य कोई पदार्थ नहीं रहता, और जो न देखा हो, उसका कभी स्फुरण नहीं होता । अर्थात् पूर्वानुभव के समय अर्थाकारा बुद्धि का अनुभव न हुआ होता तो स्मरण के समय स्मृति का कोई आकार ही न बन पाता, क्योंकि उस समय बुद्धि के अतिरिक्त आकार प्रदान करनेवाला कोई पदार्थ नहीं है। कदाचित् वह बुद्धि में आरूढ़ भी हो तथापि उसके अनुभूत न रहने के कारण उसमें आकारप्रदत्व नहीं रहता । तस्मात् जाग्रदवस्था और पूर्वकालिक अनुभव में विषयाकार हुई बुद्धि की प्रत्यक्षता सिद्ध है ॥ ५ ॥

७६ उपदेशसाहस्री व्यञ्जकत्वं तदेवाश्या रूपाद्याकारदृश्यता । द्रष्टृत्वं च दृशेस्तद्द्व्याप्तिः स्याद्धिय उद्भवे ॥६॥ व्यञ्जकत्वमिति-रूप आदि के आकार में परिणत हुई बुद्धि, दर्शन के योग्य हो पाती है। उस योग्य बन पाना ही उसका [बुद्धि का] विषय-प्रकाशकत्व है, अर्थात् विषय को प्रकाशित करना है। उसी प्रकार साक्षी आत्मा के द्वारा उस उदित हुई बुद्धि को व्याप्त करना ही उसका [आत्मा का] द्रष्टृत्व है ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी चतुर्थ श्लोक में कहा था कि अभिव्यंजक होने से आलोक के समान बुद्धि भी अर्थाकार होती है। किन्तु वह उचित प्रतीत नहीं हो रहा है। अर्थाकारता का ग्रहण किये बिना भी आलोक स्वच्छ स्वभाव का होने से उसमें तो व्यंजकता संभव हो सकती है, किन्तु बुद्धि में वैसी व्यंजकता कैसे संभव हो सकती है ? इस शंका का समाधान यह होगा कि इस बुद्धि की रूपादि आकार से जो दृश्यता अर्थात् दर्शनयोग्यता है, वही तो उस बुद्धि की विषयव्यंजकता है। विषय का अवभास होना ही चैतन्य है। और बुद्धि के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी विषय स्वतंत्ररूप से स्फुरित नहीं होता। एवंच बुद्धि को यदि विषयाकार न मानें तो चैतन्य की विषयरूप से स्फूर्ति नहीं हो सकती। अतः विषय की अभिव्यक्ति के लिये उसका विषयाकार होना ही बुद्धि का व्यंजकत्व है। जैसे रूपादि के आकार में अवभासमान होना ही बुद्धि का रूपादिव्यंजकत्व है, वैसे ही धर्माधर्मवशात् बुद्धि की उत्पत्ति होने पर तद्व्याप्ति अर्थात् बुद्धि के आकार में स्फुरण होना ही आत्मा का द्रष्टृत्व है, वह परिणाम नहीं है। यद्यपि बुद्धि का विषय में व्याप्त होना परिणाम के बिना नहीं हो सकता, क्योंकि विषयदेश में वह बुद्धि पहले से ही अविद्यमान है। तथापि बुद्धिवृत्ति में चैतन्य आत्मा के व्याप्त होनेपर उसमें परिणाम की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि चिदात्मा में ही उसके प्रकाश से प्रकाशित हुई बुद्धि ही सर्वदा विद्यमान रहती है। अभिप्राय यह है कि चेतन के द्वारा बुद्धि को दृश्य मानने पर द्रष्टा चेतन में परिणामित्व की शंका करना उचित नहीं है। जैसे विषयाकार में बुद्धि के दृश्यत्व को ही व्यंजकत्व कहते हैं, वैसे ही धर्माधर्मवशात् बुद्धि- वृत्तियों के उत्पन्न होनेपर चिदात्मा के सन्निधिमात्र से व्याप्ति अर्थात् उसका साक्षित्व, दृशि आत्मा का द्रष्टृत्व समझना चाहिए, उसमें परिणामित्व नहीं है। निष्कर्ष यह है कि जब पानी उद्यान की क्यारियों में जाता है, तो उन क्यारियों के आकार का ही हो जाता है। वैसे ही यह अन्तःकरण (बुद्धि) की वृत्ति, इन्द्रिय के माध्यम से जब विषयदेश में जाती है और विषय को व्याप्त कर लेती है, तब वह विषय के आकार में ही परिणत हो जाती है। विषयाकार में परिणत हुई बुद्धि को कूटस्थ आत्मचैतन्य प्रकाशित करता है, बुद्धि परिच्छिन्न है। वह विषयदेश में विद्यमान नहीं होती, इसलिए विषय को व्याप्त करने से वह विषयाकार हो जाती है, किन्तु आत्मा विभु और निर्विकार है। वह बुद्धि और विषयदेश में समानरूप से विद्यमान है। अतः उसमें कोई परिणाम नहीं होता। विषय का स्फुरण बुद्धि के परिणाम के अधीन है, किन्तु विषयज्ञान का स्फुरण आत्मचैतन्य से ही होता हैं। विषयज्ञान ही विषयाकारा बुद्धि है। अतः वह आत्मा की दृश्य है और आत्मा उसका साक्षी यानी द्रष्टा है ॥ ६ ॥ चिन्मात्रज्योतिषा सर्वाः सर्वदेहेषु बुद्धयः । - मया यस्मात्प्रकाश्यन्ते सर्वस्यात्मा ततो ह्यहम् ॥७॥ चिन्मात्रेति -- क्योंकि समस्त देहों (शरीरों) में समस्त बुद्धियाँ चिन्मात्र-ज्योतिःस्वरूप मेरे ही द्वारा प्रकाशित होती हैं, अतः मैं सभी का आत्मा (स्वरूप) हूँ ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी बुद्धि और उसकी वृत्तियों का साक्षी होने से चिदात्मा में परिणाम न होनेपर भी ब्रह्मरूपता के कारण उसे एक समझना उचित नहीं है। क्योंकि प्रत्येक शरीर में तत्तद् बुद्धियों के तत्तत् साक्षी भी रहेंगे। अतः चिदात्मा को एक कहना ठीक नहीं है - इस शङ्का का समाधान इस प्रकार करते हैं कि शंकाकार के कथन में कोई प्रमाण नहीं है। जैसे एक शरीर में बुद्धि का जो अवभास है, वह अविकृत चिद्व्याप्तिमात्र है। वैसे ही सर्वशरीरगत बुद्धियों का अव- भास भी है। एवंच भास्यबुद्धि का भेद रहने पर भी, उनमें अवभासत्वधर्म (रूप) है, वह एक ही है, उसका भेद नहीं

स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ७७ है। उसका भेद किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं हो पा रहा है। भेद भी साक्ष्य है, अतः उसमें साक्षी के धर्म का अभाव है, इन कारण साक्षी आत्मा में भेद की शंका करने का कोई अवकाश ही नहीं है ॥ ७ ॥ करणं कर्म कर्ता च क्रिया स्वप्ने फलं च धीः । जाग्रत्येवं यतो दृष्टा द्रष्टा तस्मात्ततोऽन्यथा ॥८॥ करणमिति—जिस प्रकार स्वप्नावस्था में करण, कर्म, कर्ता और फल ये सब बुद्धिमात्र ही हैं, उसी प्रकार ये सब जाग्रदवस्था में भी हैं। क्योंकि ये सब दृष्ट हैं। अतः इन सबसे द्रष्टा पृथक् (भिन्न) है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनो यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यद्यपि सर्वत्र चैतन्य एक है तथापि बुद्धि आदि दृश्य पदार्थ तो अनेक हैं, ऐसी स्थिति में अद्वय ब्रह्मात्मता की सिद्धि कैसे हो सकती है? इसका समाधान यह है कि क्रिया-कारक फलात्मक सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च, अनादि, अनिर्वाच्य अविद्याविजृंभितमात्र है अर्थात् अविद्याविलासबुद्धिमात्र है। उस कारण चैतन्य (चेतन) की अद्वय ब्रह्मता के साथ कोई विरोध नहीं है। जैसे स्वप्न में बुद्धि ही क्रिया-कारक-फल का रूप धारण कर लेती है, क्योंकि उस समय बाह्य पदार्थ का अभाव निश्चित है, उसी प्रकार जाग्रदवस्था में जबकि बुद्धि ही क्रिया-कारक-फल के रूप में देखी गई है और उसी के द्वारा बाह्य पदार्थ की सत्ता का ज्ञान हुआ है। उसी कारण सुषुप्ति में भी तदाकारविशेष का स्फुरण कदाचित् हो सकता है। इसलिए आत्मा में विषयों के साथ ही बुद्धि, अध्यस्त होने के कारण और उस बुद्धि का आदि तथा अन्त होने के कारण उसे मिथ्या कहा जाता है। इस विवेचन से यह प्रतीत होता है कि द्रष्टा आत्मा, उस मिथ्या बुद्धि से अन्यादृश ही है, अर्थात् सत्य अखण्डैकरस है, वह बुद्धि का साक्षी है, क्रिया-कारक-फल से वह विलक्षण है। इस रीति से साक्षी में ब्रह्मता सिद्ध होती है ॥ ८ ॥ बुद्ध्यादीनामनात्मत्वं हेयोपादेयरूपतः । हानोपादानकर्ताऽऽत्मा न त्याज्यो न च गृह्यते ॥९॥ बुद्ध्यादीनामिति—हेय (त्याज्य) और उपादेय (ग्राह्य) होने के कारण बुद्धि आदि पदार्थ अनात्मरूप हैं, किन्तु इनका त्याग और स्वीकार (ग्रहण) करने वाला आत्मा है, क्योंकि वह बुद्धि आदि पदार्थों का अधिष्ठान है। न तो उसे त्यागा जाता है और न उसे ग्रहण ही किया जाता है ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में बुद्धि आदि पदार्थों के साक्षी आत्मा को अन्यादृश बताया था, उसे ही इस पद्य के द्वारा स्पष्ट कर रहे हैं। वस्त्र की तरह आगमापायी होने से बुद्धि आदि, अनात्मस्वरूप धर्म है। अनात्म पदार्थ की तरह चिदात्मा में आगमापायित्व की आशंका नहीं कर सकते, क्योंकि बुद्धि आदि अनात्म पदार्थों के हान (लय) और उपादान (विक्षेप) का कर्ता वही चिदात्मा है। अनात्म पदार्थों का अधिष्ठान होनेमात्र से उसे कर्ता कहा जाता है। न वह किसी के द्वारा त्याज्य यानी विलयन करनेयोग्य है और न ग्रहण किया जाता है, क्योंकि वह तो सर्वाधिष्ठान है, उसका कोई अन्य अधिष्ठान नहीं है ॥ ९ ॥ सबाह्याभ्यन्तरे शुद्धे प्रज्ञानैकरसे घने । बाह्यमाभ्यन्तरं चान्यत्कथं हेयं प्रकल्प्यते ॥१०॥ सबाह्येति—जो आत्मा बाहर भी है और भीतर भी है अर्थात् सर्वत्र व्याप्त है, जो शुद्ध है, एकमात्र ज्ञान- रूप है और निरवकाश है, ऐसे उस आत्मा में बाह्य या आभ्यन्तर किसी अन्य हेय या ग्राह्य की कल्पना कैसे की जा सकती है? ॥ १० ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा स्वरूपतः अहेय-अनुपादेय है तथापि तत्संबंधित्वेन प्राप्त होने वाले बाह्य वस्त्र-आभरणादि पदार्थ, और आभ्यन्तर पाप आदि मलों की हेयता तथा आभ्यन्तर योग-ध्यान-धारणा आदि की उपादेयता तो बनी ही

७८ उपदेशसाहस्री रहेगी, ऐसी स्थिति में आत्मा की विशुद्धि कैसी समझी जाय ? इसका समाधान यह है कि बाह्य और आभ्यन्तर अर्थात् बाहर-भीतर सर्वत्र एकमात्र आत्मा ही है, उससे पृथक् कोई नहीं है। क्योंकि वह शुद्ध केवल है, इससे यह सिद्ध हुआ कि उसके अतिरिक्त बाहर कोई नहीं है, अर्थात् वाह्याभाव सिद्ध हुआ । तथा वह प्रज्ञानैकरस है, इससे भीतर भी उसके अतिरिक्त कोई नहीं है, यह सिद्ध होता है। उसकी एकरसता को ही 'घने' कह कर स्पष्ट किया है। अर्थात् सैन्धवघन के समान वह विज्ञानघन है । 'हेयम्' यह उपलक्षण है अर्थात् उपादेय का भी उपलक्षक है। अतः ऐसे आत्मा में किसी हेय या उपादेय की कल्पना कैसे कर सकते हैं ? सत्तास्फूर्ति से अनालिङ्गित किसी भी बाह्य या आभ्यन्तर का उल्लेख करना संभव ही नहीं । वे दोनों तो आत्मरूप ही हैं। उससे भिन्न बाहर या भीतर कुछ है ही नहीं, जो वास्तव में उपादेय अथवा हेय बन सके । अतः आत्मा की विशुद्धि मानने में किसी प्रकार का कोई संकोच किया ही नहीं जा सकता ॥ १०॥ य आत्मा नेति नेतीति परापोहेन शेषतः। स चेद्ब्रह्मविदात्मेष्टो यतेतातः परं कथम् ॥११॥ य आत्मेति—'यह स्थूल या सूक्ष्म देह, आत्मा नहीं है'—इस रीति से अनात्म वर्ग के निषेध द्वारा जिस आत्मा को अवशिष्ट रखा जाता है, यदि ब्रह्मज्ञानी को वही आत्मा अभीष्ट हो तो वह उसकी प्राप्ति के निमित्त प्रयत्न क्यों करेगा ? ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी वस्तुस्वभाव के अनुसार आत्मसम्बन्धी न कोई हेय है और न कोई उपादेय है, यह बता चुके । अब विद्वदनुभव से भी यह बात समझ में आती है। क्योंकि ब्रह्मज्ञानी को तो अपना स्वरूप ही अभीष्ट है, तब जिसे स्व- स्वरूप की प्राप्ति हो चुकी, वह कृतकृत्य हो जाता है, वह क्योंकर पुनः यत्न करेगा ? ॥ ११ ॥ अशनायाद्यतिक्रान्तं ब्रह्मैवास्मि निरन्तरम् । कार्यवान् स्यां कथं चाहं विमृशेदेवमञ्जसा ॥१२॥ अशनायेति—मैं क्षुधा¹-पिपासा (भूख-प्यास) से रहित हूँ। मैं सदा-सर्वदा ब्रह्मरूप हो हूँ। अतः मैं क्रियावान् कैसे हो सकता हूँ, इस प्रकार उचित विचार करना चाहिये ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह ब्रह्म (आत्मतत्त्व) कूटस्थ निर्विशेष है, स्वानुभवगम्य है। अतः आत्मज्ञानी स्वयं ही उसका निश्चय करे। अर्थात् वह आत्मतत्त्व परानुभवगम्य नहीं है। शास्त्र और आचार्योपदेश के अनुसार आत्मज्ञानी स्वयं उसका विवेक करे। 'मैं² षडूर्मिवर्जित ब्रह्म ही हूँ' यह निश्चय करे। यह निश्चय होनेपर कार्यवत्त्व वचन तो अनुभवविरुद्ध हो जाता है। अतः अनुभव विरुद्ध को कैसे स्वीकार किया जा सकेगा ? ॥ १२ ॥ पारगस्तु यथा[दा] नद्यास्तत्स्थः पारं धियासति । आत्मज्ञश्चेत्तथा[दा] कार्यं कर्तुमन्यदिहेच्छति ॥१३॥ पारग इति—यदि कोई व्यक्ति आत्मवित् है तो उसकी अन्य किसी कार्य करने की इच्छा करना वैसा ही है जैसे नदी के पार पहुँचा हुआ व्यक्ति उस तट पर खड़ा होकर भी पार जाने की इच्छा करे । अभिप्राय यह है कि आत्म- ज्ञान हो जाने पर व्यक्ति कृतकार्य हो जाता है, तदनन्तर उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वोक्त रीति से विमर्श करने पर भी विविदिषावाक्यसिद्ध वेदानुवचनादि को सत्त्वशुद्धि का हेतु माना गया है, अतः ज्ञानोत्पत्ति में हेतुभूत व्यापार का परित्याग करना कैसे संभव हो सकता है ? इस आशंका का समाधान यह १. (बृ. उ. ३।५।१) २. (बृ. उ. १।३।४)

होगा कि जैसे नदी के परतीर पर प्राप्त होकर और उसी परतीर पर स्थित होकर भी वहीं आने की इच्छा करना जैसे संभव नहीं हो सकता, ठीक वैसे ही आत्मज्ञ पुरुष भी आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने के कारण कृतकृत्य हो जाता है, उसके लिए कोई कार्य शेष नहीं रहता; क्योंकि उसने श्रेय प्राप्त कर लिया है ॥ १३ ॥ आत्मज्ञस्यापि यस्य स्याद्धानानोपादानता यदि । न मोक्षार्हः स विज्ञेयो वान्तोऽसौ ब्रह्मणा ध्रुवम् ॥१४॥ आत्मज्ञस्येति—यदि आत्मज्ञान हो जाने पर भी त्याग और ग्रहण की बुद्धि रहती है तो उसे मोक्ष का पात्र नहीं समझना चाहिये । निश्चय ही ब्रह्म ने उसका वमन कर दिया है ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे वान्त पदार्थ का ग्रहण नहीं किया जाता, उसी प्रकार ब्रह्म भी उसका परित्याग कर देता है, वह उसे स्वीकार नहीं करता । अर्थात् वह व्यक्ति ब्रह्म में लीन होकर मोक्षानन्द को नहीं पा सकता । अभिप्राय यह है कि ऐसे व्यक्तियों को ब्रह्म का साक्षात्कार (अपरोक्ष ज्ञान) नहीं होता । जिसे ब्रह्म का सुदृढ़ अपरोक्ष ज्ञान (साक्षात्कार) हो जाता है, वे ही पूर्णकाम-आप्तकाम, कृतकृत्य हो जाते हैं, उनके लिए पुनः कुछ भी प्राप्तव्य शेष नहीं है ॥ १४ ॥ सादित्यं हि जगत्प्राणस्तस्मान्नाहर्निशैव वा । प्राणज्ञस्यापि न स्यातां कुतो ब्रह्मविदोऽद्वये ॥१५॥ सादित्यमिति—आदित्य (सूर्य) के सहित समस्त विश्व, प्राणरूप है (हिरण्यगर्भरूप) है। अतः प्राणो- पासक की दृष्टि में भी न दिन होता है और न रात्रि होती है । तब ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में अर्थात् उसकी अद्वयदृष्टि में विश्वप्रपञ्च की सत्ता कैसे रह सकती है ? ॥ १५ ॥ हृदयस्पर्शिनी “अनागतां तु ये पूर्वामनक्षत्रां तु पश्चिमाम् । सन्ध्यां नोपासते विप्रास्ते कथं ब्राह्मणाः स्मृताः” ॥ उक्त स्मृतिवचन के अनुरोध से ब्रह्मवित् विप्र को भी सन्ध्यावन्दनादि कार्य करना आवश्यक प्रतीत होता है, इस आशंका का समाधान कैमुतिकन्याय से आचार्यपाद ने किया है—जबकि सूर्य (आदित्य) सहित यह सम्पूर्ण जगत्, प्राण (हिरण्यगर्भ) रूप है, तब 'प्राणोऽहमस्मि'—मैं प्राण हूँ, इस प्रकार प्राणात्म-भावापन्न (प्राणज्ञ) उपासक के लिये दिन और रात कैसे होंगे ? क्योंकि उसकी आत्मा तो उदयास्तभावरहित सूर्यरूप है। प्राण, सूत्रात्मा, और हिरण्यगर्भ—ये पर्यायी शब्द हैं। जो व्यक्ति 'मैं प्राण हूँ'—ऐसी उपासना करता है, उसकी दृष्टि में संपूर्ण जगत् प्राण- स्वरूप हो जाता है। भगवती श्रुति ने प्राण और सूर्य में अभेद बताया है। अतः उदयास्तभावरहित सूर्यरूप हो जाने के कारण उसकी दृष्टि में सतत दिन ही रहता है। भगवती श्रुति कहती है—'न१ ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृत् दिवा हैवास्मै भवति'। एवं च भेददर्शी प्राणवित् (प्राणज्ञ) की दृष्टि में भी यदि दिन और रात नहीं होते हैं, तब ब्रह्मवित् (मुख्य ब्रह्मभूत) के सर्वद्वैताभासरहित अद्वयस्वरूप में दिन-रात कैसे हो सकेंगे ? अर्थात् प्राणोपासक जैसे भेददर्शी को दिन-रात का अवभास नहीं हो पाता तो अभेददर्शी ब्रह्मवित् को दिन-रात रूपी कालभेद का ज्ञान कैसे होगा ? भेदज्ञान होने का कोई कारण ही नहीं है। अतः कालभेद के दर्शन न होने से ही तन्निमित्त सन्ध्या- वन्दनादि कर्तव्यों का भी अभाव ब्रह्मवित् के लिये समझना चाहिये ॥ १५ ॥ न स्मरेदात्मनो* ह्यात्मा विस्मरेद्वाऽप्यलुप्तचित् । मनोऽपि स्मरतीत्येतज्ज्ञानमज्ञानहेतुजम्† ॥१६॥ न स्मरतीति—जिसकी चिन्मयी दृष्टि कभी लुप्त नहीं होती, वह कभी आत्मा का न स्मरण करता है और न उसे भूलता है। मन ही आत्मा का स्मरण करता है—यह ज्ञान भी अज्ञान के कारण ही है ॥ १६ ॥ १. (छां. उ. ३।११।३)

  • स्मरत्या०—पाठान्तरम् । † तद्ज्ञान०—पाठान्तरम् ।

८० उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी ब्रह्मज्ञानी की बाह्य क्रिया न रहने पर भी 'संध्यं१ समाधावात्मन्याचरेत्' इस श्रुति के अनुरोध से आत्म- विषयक विस्मृति का परित्याग कर मोक्षार्थ आत्मविषयक स्मृति करनी ही चाहिये—ऐसा यदि कोई कहे तो वह उचित न होगा। क्योंकि अलुप्तचित् (सदैव चिन्मयी दृष्टि) होने के कारण उसे उस (आत्मा) के स्मरण की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। भूले हुए को स्मरण की आवश्यकता होती है। अतः अशक्य होने से स्वयं को ही स्वयं का स्मरण नहीं हो सकता। यदि यह कहें कि तत्त्वज्ञान होने के पश्चात् आविर्भाव-तिरोभावादि विकारों की शान्ति के लिये मन ही आत्मा का स्मरण करे, तो यह कहना भी उचित नहीं होगा। क्योंकि मन तो अचेतन (जड़) है, अतः वह स्मरण कैसे कर सकेगा? उसमें स्मर्तृत्व अनुपपन्न है। किन्तु 'मनः स्मरति'—मन स्मरण कर रहा है, यह व्यवहार तो होता है। तथापि इस पर उत्तर यह होगा कि 'मनः स्मरति'—यह ज्ञान भी अज्ञान के कारण होता है अर्थात् अज्ञानात्मक हेतु से होता है। वह ज्ञान अविवेकविलसित है। एवं च 'संध्यं समाधौ'—यह विधि, मन को आत्मा से भिन्न देखने वाले असम्यग्ब्रह्मवित् के लिये है, वह सम्यग्ब्रह्मवित् के लिये नहीं है ॥ १६ ॥ ज्ञातुर्ज्ञेयः परो ह्यात्मा सोऽविद्याकल्पितः स्मृतः । अपोढे विद्यया तस्मिन् रज्ज्वां सर्प इवाद्वयः ॥१७॥ ज्ञातुरिति—यदि परमात्मा को ज्ञाता का ज्ञेय कहा जाय तो उसे अविद्याकल्पित कहना होगा। क्योंकि जो भी ज्ञेय है, वह दृश्य होने से जड़ और अविद्याजन्य माना जाता है। रज्जु में अध्यस्त (आरोपित, कल्पित) सर्प के समान, विद्या के द्वारा अविद्या की निवृत्ति होने पर आत्मा अद्वयरूप ही सिद्ध है ॥ १७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि आत्मा अलुप्तचिद्रूप होने से अपने को (आत्मा को) स्मरण नहीं करता तथापि परमात्मा को तो स्मरण कर ही सकता है—ऐसा यदि कोई कहे तो वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि यदि परमात्मा को ज्ञाता का ज्ञेय (विषय) कहें तो उसे अविद्याकल्पित कहना होगा। जो स्व-अज्ञान से कल्पित होता है, उसे विद्वान् लोग निश्चित स्मरण करते हैं, जानते हैं। रज्जु-सर्प की तरह ज्ञान का विषय, अविद्याकल्पित होने से उसे आत्मा ही नहीं कह सकते। तथाच आत्मज्ञानरूप विद्या के द्वारा उस आत्मा के परत्व, ज्ञेयत्व आदि का बाध होने पर ज्ञातृ-ज्ञेय विभाग के न रह जाने से अद्वय आत्मा ही शेष रह जाता है। जैसे रज्जुविद्या (ज्ञान) से सर्प का बाध होने पर रज्जु ही अवशेष रहती है, उसी तरह अद्वय आत्मा ही शेष रह जाता है ॥ १७ ॥ कर्तृकर्मफलाभावात्सबाह्याभ्यन्तरं ह्यजम् । ममाहं वेति यो भावस्तस्मिन्कस्य कुतो भवेत् ॥१८॥ कर्तृकर्मफलाभावादिति—कर्ता, कर्म और फल के न रहने से 'मैं' बाहर और भीतर के सहित अजन्मा आत्मा ही हूँ। अतः मुझमें ममता किंवा अहन्ता की प्रतीति किसी को कैसे हो सकती है ? ॥ १८ ॥ हृदयस्पर्शिनी वस्तुतः प्रत्यगात्मा अद्वितीय है, तथापि उसमें 'मम, अहं' इत्यादि संसार का प्रतिभास होता रहता है, उसकी निवृत्ति के लिये कुछ कर्तव्य करना होगा, इस शंका की निवृत्ति के लिये 'कर्तृकर्म-फलाभावात्' को आचार्य- चरण कह रहे हैं— ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व तक ही समस्त उपायों का अनुष्ठान कर्तव्य रहता है। ज्ञानोत्पत्ति के अनन्तर ज्ञानी को किसी भी उपाय के अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं रहती। क्योंकि प्रत्यगात्मा ही 'कर्ता' है, वह 'कर्म' है, और वही 'फल' है। कर्ता, कर्म, फल की भिन्नता जैसे लोक-व्यवहार में प्रतीत होती है, वैसे प्रत्यगात्मा में ज्ञानी को नहीं । १. (आरुणिक उ. २)

  • वेति, वेत्ति० इति पाठौ ।