वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्राक्कथन राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता की सुरक्षा एवं संरक्षा प्राचीन भारतीय-संस्कृति का सार्वकालिक सन्देश रहा है, और वैदिक वाङ्ग्मय इस भारतीय संस्कृति का वाहन रहा है। समस्त वैदिक वाङ्ग्मय राष्ट्रीयएकता अथवा विश्व-बन्धुत्व की भावना से आकण्ठ आप्लावित है, जिसका प्रभाव समय-समय पर अखिल-भारतीय-चिन्तन-पद्धति पर पड़ा, तथा जिसके कारण भारत में राष्ट्रीयएकता तथा धर्मनिरपेक्षता की भावना को बहुत बल मिला। भारत जैसे विशाल देश में विभिन्न जातियाँ, धर्म, वेश-भूषा तथा रीतिरिवाज होने के बाद भी राष्ट्रीयएकता स्थापित रहना इसी वैदिक-वाङ्मय की मूल संस्कृति के प्रभाव का परिणाम है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब मानव ने "सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत्" की भावना से जितना अधिक तादात्म्य स्थापित किया है, वह उतना ही सुखी, सुरक्षित तथा चिरायु हुआ है। आज की विषम परिस्थितियों में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को भारतीय समाज में जीवित रखने का प्रयास ही एक ज्वलन्त समस्या है। हमारा देश इस समय ऐसी भयावह स्थिति का सामना कर रहा है, जिसका समुचित एवं सार्थक समाधान यदि शीघ्र नहीं हो सका तो भारतीयसमाज को विघटित होने से बचा पाना बहुत ही कठिन हो जाएगा। कुछ बाह्य एवं आन्तरिक शक्तियों द्वारा अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए धार्मिक-संकीर्णता के आधार पर मनुष्य को बाँटने वाली राजनीति की जा रही है। मानवीय-कल्याण की भावनाओं को त्यागकर उच्च मूल्यों से विमुख होकर आज धर्म पर आधारित राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है। राष्ट्रीयएकता एवं धर्मनिरपेक्षता के विपरीत भारतीय समाज के विभिन्न वर्ण अपनी-अपनी व्यक्तिगत, धार्मिक, क्षेत्रीय एवं जातीय विचारधाराओं तथा मान्यताओं के आधार पर देश को बाँटने के प्रयास कर रहे हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों का सामना करने के लिए एक ऐसे शोधकार्य की परम आवश्यकता थी, जिससे राष्ट्रीयएकता और धर्म-निरपेक्षता की भावना को बढ़ावा मिले। इस सन्दर्भ में भारतीय संस्कृति के संवाहक तथा विविध-ज्ञान-विज्ञान के आदिस्रोत वैदिक वाङ्मय के गम्भीर-ज्ञान-सागर के असंख्य-सूक्त-रत्नों में से राष्ट्र- सम्बन्धित इस बहुमूल्य रत्न को भी खोजने की मेरी प्रबल इच्छा हुई, क्योंकि वेद असंख्य एवं अक्षय ज्ञान की निधि हैं, यह सर्वविदित है। इनमें आध्यात्मिक-ज्ञान के CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xii साथ-साथ, इस भौतिक-जगत् का भी कोई विषय इनसे अछूता नहीं है। अतः यदिहास्ति तदत्र कथन की सार्थकता पर पूर्ण आश्वस्त होकर, मैंने अपनी बृहत्सोधयोजना हेतु, “राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में वैदिकवाङ्मय का समीक्षात्मक अनुशीलन" को अपने शोध का शीर्षक बनाकर 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग' को स्वीकृति हेतु नयी दिल्ली भेज दिया, जो वहाँ से सहर्ष स्वीकृत होकर आ गया। मेरी यह प्रबल-जिज्ञासा थी कि उल्लिखित राष्ट्रीयसमस्या के समाधान में वैदिक वाङ्मय ने अपना कितना योगदान प्रदान किया हैं। अभी तक अनेक दृष्टियों से संस्कृत-साहित्य का मूल्याङ्कन किया जा चुका था, किन्तु राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में संस्कृत-वैदिक साहित्य का अनुशीलन नहीं किया गया था। वैदिकवाङ्मय विश्वविश्रुत हैं। भारतीय एवं पाश्चात्य सभी विद्वान् एक स्वर से इसका महत्त्व स्वीकार करते हैं। वेदों में ऐहिक एवं आमुष्मिक दोनों ही प्रकार का ज्ञान-विज्ञान पुष्कल मात्रा में विद्यमान है। प्राचीन भारतीयों का धर्म, दर्शन, आचार, रहन-सहन तथा परम्पराएँ आदि सब वैदिक-वाङ्मय में सुरक्षित हैं। अतः उक्त विषय की जानकारी के लिए वेदों का अध्ययन एवं अनुशीलन अत्यावश्यक था। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता किसी भी राष्ट्र का मूल आधार है। इसके बिना राष्ट्र का सर्वाङ्गीण विकास सम्भव ही नहीं है। वैदिकवाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के महत्त्वपूर्ण सूत्र विद्यमान हैं। राष्ट्रीय एकता के सन्दर्भ में वेदों का स्पष्ट निर्देश है कि हम सभी के लक्ष्य, कार्य व हृदय समान हों, हम सब मिलकर राष्ट्र के कल्याणकारी कार्यों में लगें— संगच्छध्वम्, संवदध्वम्, सं वो मनांसि जानताम्। देवाभागं यथापूर्वे, संजानाना उपासते॥ निस्सन्देह, परस्पर मिलकर राष्ट्रीय कार्यों को करते हुए ही लोककल्याण सम्भव है। पारस्परिक राग-द्वेष, इर्ष्या-कलह आदि से राष्ट्र विखण्डित होता है। अतः वेद हमें सावधान करता हुए कहता है कि हम भाई परस्पर द्वेष न करें, परस्पर मिलकर राष्ट्र के कार्यों में संलग्न होवें— मा भ्राता भ्रातरम् द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा। सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा, वाचं वदत भद्रया॥ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xiii ऋग्वेद में धर्म की विस्तृत व्याख्या करते हुए 'पारस्परिक-प्रेम' को 'राष्ट्रीयएकता' का मूल माना गया है। यही 'मानवधर्म' है— यथा, विश्वदानी सुमनसः स्याम्। (ऋग्वेद ६/५२/५) अर्थात् "हम मर्यादा सम्पन्न रहें, प्रसन्न रहें क्योंकि मन के प्रसाद से समस्त आपदाएँ शान्त होती हैं।" ऋग्वेद में अन्यत्र कहा गया है— पुमान् पुमांसं परिपातु विश्वतः अर्थात् "मानव मानव की रक्षा करे, यही मानवधर्म का मूल मन्त्र है।" अर्थात् धर्म की रक्षा करने में अपनी रक्षा है, और धर्म के हनन में अपना ही विनाश है। धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः (मनुस्मृति ८/१५) वैदिकवाङ्मय में 'विश्वधर्म' से लेकर 'व्यक्तिधर्म' तक, समष्टि से व्यष्टि तक, सभी धर्मों का निरूपण सन्निहित है। उदाहरणार्थ, यजुर्वेद का निम्नलिखित मन्त्र राष्ट्रधर्म का साङ्गोपाङ्ग वर्णन करता है— आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् आ राष्ट्रे राजन्यः शूरइषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्। दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरन्ध्रियोंषा जिष्णू रथेष्ठाः, सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम्। निकाने निकाने नः पर्जन्यो वर्षतु। फलवत्यो नः ओषधयः पचन्ताम्। योगक्षेमो नः कल्पताम्॥ (यजुर्वेद २२/२२) भाव यह है कि विश्वभावन-ब्राह्मण ब्रह्मतेज से सम्पन्न हों। राष्ट्र में क्षत्रियगण शूरवीर, धनुर्धर, लक्ष्यवेधी और महारथी हों। गायें दुधारू, बैल भारवहन में सक्षम, अश्व शीघ्रगामी, स्त्रियाँ शोभामयी, रथी विजयशील हों, और इस यजमान का युवा पुत्र निर्भय व वीर हो। आवश्यकतानुसार वर्षा हो, वनस्पतियाँ फलवती हों। हमारा योगक्षेम हो। यजुर्वेद के उक्त मन्त्र की व्याख्या से राष्ट्रधर्म का स्वरूप निर्दिष्ट होता है। अथर्ववेद में भी राष्ट्रोन्नति के उपाय बताये गये हैं, जो उपर्युक्त यजुर्वेद के मन्त्र के ही अधिपूरक हैं। पृथिवीसूक्त का वचन है कि बृहत्-सत्य, उग्र ऋतु अर्थात् (सत्यकर्म व CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xiv सत्यज्ञान), दीक्षा, तप एवं ब्रह्मयज्ञ पृथिवी को धारण करते हैं:- सत्यं बृहदृतमुग्रदीक्षा तपो ब्रह्मयज्ञः। पृथिवीं धारयन्ति। (अथर्ववेद १२/१/१) वेदों के अनुसार राष्ट्रभावना के मूल आधार हैं- एकदेश (भौगोलिक एकता), एक केन्द्रीय शासन (संघटनात्मक एकता), एक संस्कृति (भावनात्मक एकता), एकसभ्यता (ऐतिहासिक एकता) और एक भाषा (अभिव्यक्ति की एकता), इन सभी का सुविस्तृत वर्णन वेदों में किया गया है। उक्तानुसार राष्ट्र, राष्ट्रीयएकता तथा राष्ट्र की संरक्षा के सन्दर्भित सूत्र वैदिकवाङ्मय में यत्र तत्र सर्वत्र उपलब्ध हैं, जिनका निरूपण एवं प्रकाशन भारत देश की वर्तमानकालिक परिस्थितियों में विशेष महत्त्व रखता है। आज के इस कठिन समय में प्रस्तुत यह बृहत्शोधकार्य निश्चय ही राष्ट्र के लिए मार्गदर्शक एवं कल्याणकारी सिद्ध होगा। भारतीयों में परस्पर भ्रातृत्वभाव के प्रति निष्ठा बढ़ेगी तथा राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। आश्चर्य है कि इस परिप्रेक्ष्य में ज्ञान-विज्ञान के आदिस्रोत वैदिकवाङ्मय का अनुशीलन अभी तक नहीं किया गया था, जबकि धर्म, नीति, आचार, शिक्षा, दर्शन तथा राष्ट्रसंरक्षकादि के मूल्यवान एवं लाभदायक घटकतत्त्व पर्याप्त मात्रा में हमारे वैदिक साहित्य में विद्यमान हैं, जो सर्वथा सार्वकालिक तथा सार्वभौमिक हैं, कालातीत तथा देशातीत हैं। तपःपूत, वैदिकमन्त्रद्रष्टा ऋषियों-मुनियों ने अपनी अमरवाणी द्वारा राष्ट्र, राष्ट्रधर्म तथा राष्ट्रीयएकता के साथ-साथ राष्ट्रीय-सर्वाङ्गीण-विकास हेतु आवश्यक, उसकी सुरक्षा के जो तात्कालिक एवं सार्वकालिक सूक्त प्रदान किये हैं, उन सभी का इस 'बृहद्शोधग्रन्थ के परिशीलन नामक तृतीय खण्ड के सातों अध्यायों में सुविस्तृत विवेचन किया गया है। सागर इव अपार-ज्ञान के भण्डार, वैदिक वाङ्मय की यह अनुपमयेता ही है कि वैदिक ऋषियों की दिव्य-दृष्टि, सहस्राब्दियों पूर्व उद्भूत होते हुए भी आज भी, उनके निर्देश व सन्देश प्रत्येक देश, प्रत्येक समाज, प्रत्येक परिवार व प्रत्येक व्यक्ति के लिए यथापूर्व ग्राह्य एवं लाभप्रद हैं। प्राचीनतम् वेद आज भी अर्वाचीन है- "THOUGH THE VEDAS ARE THE OLDEST, BUT THEIR MESSAGE IS ALWAYS LATEST." CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xv अभीष्ट ग्रन्थ चार खण्डों तथा दश अध्यायों में विभक्त हैः- प्रथम खण्ड- परिप्रेक्ष्य (विषय प्रवेश) द्वितीय खण्ड- परिपार्श्व तृतीय खण्ड- परिशीलन चतुर्थ खण्ड- तुलनात्मक परिशीलन अन्तिम दशम अध्याय में उपसंहार दिया गया है। प्रस्तुत राष्ट्र-परक यह बृहत्ग्रन्थ, जो लगभग ३०० पृष्ठों में है, अत्यन्त संक्षेप में विषयानुक्रमानुसार निम्नवत् अवलोकनीय है :- १. परिप्रेक्ष्य नाम से ग्रन्थ के प्रथम खण्ड के प्रथम अध्याय में अभीष्ट शोध विषय का प्रारम्भ (प्रवेश) किया गया है, जिसमें राष्ट्र, राष्ट्र की संकल्पना व राष्ट्र का स्वरूप आदि को पाश्चात्य तथा भारतीय विशेषज्ञों के अनेक उद्धरणों द्वारा स्पष्ट किया गया है। वस्तुतः राष्ट्र के सुदृढ़ अस्तित्व का आधार राष्ट्रीयएकता ही होती हैं, और राष्ट्रीयएकता पर ही राष्ट्र की अखण्डता निर्भर करती है। इसीलिए नेहरू जी ने कहा था- मेरे जीवन का मुख्य कार्य भारत एकीकरण है। उनके कथन का तात्पर्य यह नहीं था कि भारत में एकता का अभाव है। हमारा स्वाधीनता-संग्राम एक ऐसा दृढ़ स्तम्भ था, जिसने राष्ट्रीयता (राष्ट्रीयएकता) के अङ्कुर को सींच-सींच कर बड़ा किया, तथा हमारे संविधान ने भी उसे बल प्रदान किया, कि- हम सब भारतवासी हैं, हम सब का एक ही संविधान है व एक ही राष्ट्रीय चिह्न है। २. परिपार्श्व नामक द्वितीय खण्ड तथा ग्रन्थ के द्वितीय अध्याय में वैदिकवाङ्मय का संक्षिस सर्वेक्षण किया गया है, जिसके अन्तर्गत 'वेद' का अर्थ, वेदों का महत्त्व, वेदों का कालनिरूपण एवं वेदों की शाखाएँ तथा ऋक्, यजुः, साम व अथर्ववेद- इन चारों संहिताओं तथा उनके ब्राह्मणों, आरण्यकों तथा उपनिषदों के साथ-साथ, गृह्यसूत्रों तथा धर्मसूत्रों का भी पूर्ण विवेचन तथा परिचय प्रदान किया गया है। ३. परिशीलन नाम का तृतीय खण्ड इस ग्रन्थ का सबसे बड़ा व सर्वप्रमुख अंश है। यही शोध विषय का मूलभाग है। वस्तुतः यह तृतीय खण्ड इस बृहत्ग्रन्थ का 'हृदय' है, केन्द्र बिन्दु है। यह तृतीय अध्याय से लेकर अष्टम अध्याय तक, अर्थात् छः अध्यायों में विस्तृत है। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद का समीक्षात्मक अनुशीलन तृतीय अध्याय में, यजुर्वेद का चतुर्थ अध्याय में, सामवेद का पञ्चम अध्याय में तथा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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xvi अथर्ववेद का षष्ठ अध्याय में किया गया है। इसी प्रकार, ब्राह्मणों, आरण्यकों तथा उपनिषदों का एवं गृह्यसूत्रों व धर्मसूत्रों का अनुशीलन क्रमशः सप्तम व अष्टम- इन दो अध्यायों में किया गया है। हमें गृह्यसूत्रों और धर्मसूत्रों के भी आधारतत्त्व वैदिक-ग्रन्थों से ही प्राप्त होते हैं। इन्हीं के अनुसार धर्मयुक्त समाज एवं समाज के सदस्यों का धर्मयुक्त आचरण ही राष्ट्र की उन्नति में सहायक होता है। धर्म की कसौटी पर खरा उतरने वाला राजा ही राष्ट्र की एकता व अखण्डता की रक्षा में सक्षम होता है, इसीलिए अथर्ववेद में लिखा है- त्वां विशो वृणुतां राज्यायत्वामिमाः प्रदिशः पञ्च देवीः। अर्थात् राजा का चयन प्रजा द्वारा किया जाए। ये पाँच दिव्य दिशाएँ भी तुम्हें (राजा को) स्वीकार करें। राष्ट्र के उत्कृष्ट पद पर तुम आसीन रहो। राजन्! सदैव राष्ट्र की रक्षा के प्रति सचेत रहो। इस प्रकार प्राचीन वाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के प्रति सम्पूर्ण दायित्व प्रजा का ही नहीं था, उसमें प्रथम भूमिका राज की ही होती थी। यथा अथर्ववेद में वर्णित है- ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति। (अथर्ववेद ११/५/१७) (ब्रह्मचर्य एवं तपस्या का पालन करने वाला राजा ही राष्ट्र की रक्षा कर सकता है)। ४. उल्लिखित तृतीय खण्ड के बाद इस ग्रन्थ के चतुर्थ एवं अन्तिम खण्ड के नवम अध्याय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में प्राचीन तथा अर्वाचीन विचारों का तुलनात्मक अनुशीलन किया गया है। यद्यपि भारत की अनेकता में एकता का होना विस्मयकारी है, तथापि भारत एक राष्ट्र है। इसका प्रतीक है हमारी तीनों सेनाएँ। जिनमें सभी प्रदेशों, जातियों के लोग मिलकर एक राष्ट्र की सुरक्षा में दिन-रात सीमा पर चौकन्ने रहते हैं। वे सब अपने को भारतीय ही मानते हैं, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन् ने भी व्यक्त किया है- हमारी राष्ट्रीयएकता व अखण्डता की नींवें खोखली नहीं हैं, बल्कि वटवृक्ष की तरह अन्दर मीलों तक गहराई तक फैली हुई हैं। वह वैदिक काल से ही उस ज़मीन की तह में समाई हुई हैं। यह एकता एक स्थायी-भावना है, जो पावन-भूमि पर जन्म लेते ही मानव के मन में समाहित हो जाती है। इसी राष्ट्रीयएकता व अखण्डता पर सम्पूर्ण राष्ट्र को गर्व
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xvii है— कि हमारा एक संविधान, एक राष्ट्रीय ध्वज तथा एक ही राष्ट्रीय सम्मान सदैव अक्षुण्ण रहेंगे। अन्तिम दशम अध्याय के उपसंहार में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता की संरक्षा के लिए वर्तमान, आतंकवादी-विध्वंसक प्रवृत्तियों को समाप्त करने के लिए महत्त्वपूर्ण उपाय व कतिपय सुझाव भी प्रस्तुत किये गये हैं। आज भारतीय लोकतन्त्र के लिए आतङ्कवाद एक गम्भीरतम चुनौती बना हुआ है। यह देश की राष्ट्रीयएकता व अखण्डता के लिए ‘बारूद के गोले' की तरह भयावह है। फिर भी यह आतङ्कवाद केवल कानून व व्यवस्था का प्रश्न नहीं है, यह एक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य है, एक मनोवैज्ञानिक पक्ष है, जो बल प्रयोग से नहीं सुलझ सकता है। बल प्रयोग भी विवेक व सद्भावना के साथ करना चाहिए। शासन द्वारा आतङ्कवादियों से बातचीत अवश्य की जानी चाहिए। शर्त केवल यह हो कि बातचीत संविधान के दायरे में हो, तथा बातचीत हेतु आगे आने वाले आतंकवादी भविष्य में अपने आपको देश की एकता व अखण्डता के लिए प्रतिबद्ध घोषित करें तथा आतंकवाद का रास्ता छोड़ने की घोषणा करें। उक्तानुसार, भारत के वर्तमान प्रजातान्त्रिक परिवेश में वैदिक ऋषियों द्वारा प्रदत्त वैदिक-वाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के संरक्षित सूत्रों, का समीक्षात्मक अध्ययन कर आगामी मानवता हेतु उनकी उपादेयता प्रमाणित करना ही मेरी इस शोधयोजना का लक्ष्य रहा है। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि मेरे शोधावधि में वैदिक वाङ्मय के ऐसे अनेक अनछुए एव उपयोगी प्रसङ्ग उभर कर सम्मुख आए हैं; जिनसे वर्तमान एवं आगामी भारतीय मानवता अपने हितों की रक्षा कर सकती है, तथा विश्वमानवता के मञ्च पर समादृत हो सकती है। मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि मेरी इस बृहत- शोधयोजना के अन्तर्गत प्रस्तुत शोधकार्य के माध्यम से न केवल बुद्धिजीवी-देशवासी प्रेरणा प्राप्त करके लाभान्वित होंगे; प्रत्युत् यह विशद् एवं बृहतशोधग्रन्थ राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को सुरक्षित रखने में भी महान् उपयोगी सिद्ध होगा। और, अब मैं सर्वप्रथम, अपने पितृ-तुल्य गुरु स्वर्गीय डॉ० हरिदत्त शास्त्री को अपनी भावाञ्जलि अर्पित करते हुए उन्हें हृदय से नमन करना चाहूँगी, जिनसे प्राप्त सुशिष्यत्व, शोधनिर्देशन, मार्गदर्शन तथा पितृ-तुल्य स्नेहिल आशीर्वादों के कारण ही मैं विगत पञ्चाशताधिक वर्षों से सुरभारती संस्कृत की सतत् सात्विक-अनेकविध- सेवाओं द्वारा आज इस गन्तव्य तक पहुँच सकी हूँ। मैंने न केवल अनेक छात्र- छात्राओं का निःस्वार्थ संस्कृत-शोधनिर्देशन करके उन्हें सुयोग्य बनाया, प्रत्युत् महाविद्यालयीय-सत्यनिष्ठ-प्राचार्यत्व के साथ ही साथ, विश्व-संस्कृत-परिषद् तथा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xviii अखिल भारतीय प्राच्य परिषद् पुणे, की आजीवन सदस्या के रूप में स्वदेश-भारत एवं विदेशों में भी आयोजित संस्कृत-सम्मेलनों में उपस्थित होकर अपने मौलिक संस्कृत शोधपत्रों को प्रस्तुत किया तथा परिषदीय-अध्यक्षों व श्रोतृसमूह से प्रशस्ति- पत्र प्राप्त किये। यह मेरे इन्हीं प्रातःस्मरणीय श्रद्धेय गुरु से प्राप्त प्रेरणाओं का ही प्रतिफल है। तत्पश्चात् मैं, अपने गुरुभाई, परम प्रिय अनुज, आजीवन-संस्कृत-सेवी डॉ० शिवबालक द्विवेदी, जो सम्प्रति स्नातकोत्तर महाविद्यालय, फरुखाबाद में प्राचार्य हैं, के प्रति भी अपना हार्दिक कृतज्ञताज्ञापन करती हूँ, जिन्होंने मेरे, यू०जी०सी० से स्वीकृत बृहत्शोधयोजना के कार्यान्वयन हेतु, नियमानुसार विज्ञापित किये गये साक्षात्कार के लिए 'संस्कृत विशेषज्ञ' के रूप में उपस्थित होकर सुयोग्य एवं संस्कृतनिष्ठ शोध-सहायकों की नियुक्ति करके, मेरे बृहत्शोधकार्यभार को सुकर बनाया। इसके अतिरिक्त भी अनेक बार संस्कृत अधिवेशनों में आमन्त्रित करके मुझे विनम्र सम्मान प्रदान किया है। अन्त में, मैं अपनी उन तीनों शोधसहायिकाओं- डॉ० विनोदिनी पाण्डेय, डॉ० सुषमा शर्मा तथा डॉ० लक्ष्मीदेवी शर्मा को उनके सुखी एवं सफल जीवन हेतु अपना शुभाशीर्वाद प्रदान करती हूँ, जिन्होंने ही मेरे इस बृहत्शोधकार्य के संस्कृत महायज्ञ में अपनी अपनी सश्रम कर्त्तव्यनिष्ठता की आहुतियाँ अर्पित की हैं। विशेषतः मेरी शिष्या, डॉ लक्ष्मीदेवी शर्मा द्वारा इस शोधग्रन्थ के प्रूफसंशोधन तथा संस्कृतसम्बन्धी अन्यानेक लेखनकार्य में कृतसाहाय्य के लिए मैं आभार व्यक्त करती हूँ। तत्पश्चात् मैं उन विद्वत्जनों व पाठक गणों को भी हार्दिक धन्यवाद देना अपना कर्त्तव्य समझती हूँ, जो मेरे इस अथक श्रमसाध्य बृहत्ग्रन्थ को साभिरुचि पढ़कर, मेरे श्रम को सार्थक बनाने में सहायक होंगे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरे इन ग्रन्थ द्वारा प्रस्तुत, राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता से सम्बन्धित, वैदिक वाङ्मय का अक्षुण्ण- बहुमूल्यज्ञान, जो सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक है, सभी देशभक्त राजनीतिज्ञों व केन्द्रस्थ नेताओं के लिए सर्वदा एवं सर्वथा हितकर सिद्ध होगा। इस बृहत्ग्रन्थ के प्रकाशन में सहायक दिल्ली निवासी स्व० के०एल० जोशी तथा उनके सुपुत्र सुप्रिय परिमल जोशी तथा 'परिमल पब्लिकेशन्स' से सम्बद्ध सभी आत्मीयजनों को मैं साधुवाद देती हूँ, जिनके नैष्ठिक योगदान से मेरा यह ग्रन्थ देश के सम्मुख उपस्थित हो सका है। बसन्त पञ्चमी, सन् २०११ अन्नपूर्णा मिश्रा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri विषयसूची प्रथम खण्ड - परिप्रेक्ष्य प्रथम अध्याय - विषय प्रवेश १ १. राष्ट्र की संकल्पना :- १ क. राष्ट्र का स्वरूप एवं प्रकृति। १ ख. राष्ट्र की विषय वस्तु एवं क्षेत्र। ४ ग. राष्ट्र के विषय में भारतीय एवं पाश्चात्य अवधारणाएँ। १० २. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता :- १४ क. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता के आधारतत्व। १४ ख. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता का प्रयोजन। २४ ग. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता की अवधारणा। २६ ३. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता विषय का उद्देश्य :- २८ क. विषय का उद्देश्य। २८ ख. विषय की मौलिकता और महत्त्व। ३१ ग. तत्त्वचिन्तन एवं सत्य के उद्घाटन की दिशा में योगदान। ३३ घ. विषय की प्रासंगिकता। ३४ द्वितीय खण्ड - परिपार्श्व द्वितीय अध्याय - वैदिक वाङ्मय का संक्षिप्त सर्वेक्षण ३७ १. वेद क्या है? ३७ अ. वेद एवं उपवेद। ३८ ब. वेदत्रयी। ३९ स. वेदाङ्ग। ४९ द. सूत्र साहित्य। ५१ २. वेदों का महत्त्व। ५४ ३. वेदों का कालनिरूपण। ७१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xx ४. वेदों की शाखाएँ। ८४ ५. संहिताएँ :- ९९ अ. ऋग्वेद ९९ ब. यजुर्वेद १३५ स. सामवेद १५१ द. अथर्ववेद १६२ तृतीय खण्ड – परिशीलन तृतीय अध्याय – ऋग्वेद में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन १८२ १. ऋग्वेद में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के आधार तत्त्व। १८२ २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वैदिक समाजदर्शन का अनुशीलन। १८८ ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डतां के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वैदिक राजदर्शन का अनुशीलन। १९४ ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वैदिक धर्मदर्शन का अनुशीलन। १९८ ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वैदिक आचारदर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन। २०२ ६. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को ऋग्वेद का प्रदेय। २०६ चतुर्थ अध्याय – यजुर्वेद में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन २०८ १. यजुर्वेद में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के आधार तत्त्व। २०८ २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद के समाजदर्शन का अनुशीलन। २१० ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद के राजदर्शन का अनुशीलन। २१५ ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद के धर्मदर्शन का अनुशीलन। २१९ ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद के आचारदर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन। २२० ६. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को यजुर्वेद का प्रदेय। २२६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xxi पञ्चम अध्याय - सामवेद में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन २२९ १. सामवेद में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के आधार तत्त्व। २२९ २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के समाजदर्शन का अनुशीलन। २३१ ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के राजदर्शन का अनुशीलन। २३६ ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के धर्मदर्शन का अनुशीलन। २३८ ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के आचारदर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन। २४१ ६. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को सामवेद का प्रदेय। २४५ षष्ठ अध्याय - अथर्ववेद में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन २४७ १. अथर्ववेद में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के आधार तत्त्व। २४७ २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अथर्ववेद के समाजदर्शन का अनुशीलन। २५१ ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अथर्ववेद के राजदर्शन का अनुशीलन। २५५ ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अथर्ववेद के धर्मदर्शन का अनुशीलन। २५८ ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अथर्ववेद के आचारदर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन। २६० ६. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को अथर्ववेद का प्रदेय। २६४ सप्तम अध्याय - ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का अनुशीलन :- २६७ १. ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के आधार तत्त्व। २६७ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
१. अध्याय १-२: वैदिक शिक्षा की दार्शनिक पृष्ठभूमि, लक्ष्य एवं आचार्य-शिष्य सम्बन्ध
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xxii २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् के समाजदर्शन का अनुशीलन। २७० ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् के राजदर्शन का अनुशीलन। २७४ ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् के धर्मदर्शन का अनुशीलन। २७५ ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् के आचारदर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन। २७६ ६. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् का प्रदेय। २७९ अष्टम अध्याय - गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन :- २८१ १. गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के आधार तत्त्व। २८१ २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र के समाजदर्शन का अनुशीलन। २८३ ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र के राजदर्शन का अनुशीलन। २८७ ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र के धर्मदर्शन का अनुशीलन। २८८ ५. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र के आचारदर्शन, शिक्षादर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन। २९० ६. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को गृह्यसूत्र एवं धर्मसूत्र का प्रदेय। २९२ चतुर्थ खण्ड - तुलनात्मक परिशीलन नवम अध्याय - राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में प्राचीन एवं अर्वाचीन विचारों का अनुशीलन :- २९५ १ प्राचीन वाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में विचार। २९५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xxiii २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में आधुनिक विचारधारा। २९७ ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में प्राचीन एवं आधुनिक विचारधारा की तुलना। ३०० ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के बाधक एवं साधक तत्त्व। ३०३ ५. वैदिक वाङ्मय में निरूपित राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का वर्तमान राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के लिए योगदान। ३०७ दशम अध्याय - उपसंहार ३११ सहायक ग्रन्थसूची ३१७ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम खण्ड – परिप्रेक्ष्य प्रथम अध्याय राष्ट्र की संकल्पना राष्ट्र का स्वरूप एवम् प्रकृति वैदिक काल में 'राष्ट्र' शब्द देश या राज्य के लिए प्रयुक्त किया जाता था।¹ ऋग्वेद में स्वराज्य का उल्लेख भी मिलता है। राष्ट्र शब्द की उत्पत्ति राज् धातु से ष्ट्रन प्रत्यय के योग से हुई है, जिसका सामान्य अर्थ है— राज्य, देश, साम्राज्य। राष्ट्र शब्द बहुत ही व्यापक अर्थ रखता है, इसमें निश्चित भू-भाग पर निवास करने वाली समस्त प्रजा की भावनाओं और विचारों की प्रतीक संस्कृति और सभ्यता सम्मिलित होती है। किसी देश की सभी इकाईयों की समष्टि ही राष्ट्र का वास्तविक स्वरूप है किन्तु राष्ट्र के स्वरूप को स्पष्ट करने हेतु कुछ व्यापक तथा अनिवार्य तत्त्व भी होते हैं, जिसमें धर्म, संस्कृति, भाषा, जनता, राजनैतिक विचार आदि प्रमुख हैं। राष्ट्र का प्राकृतिक स्वरूप भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है जितना सामाजिक। विश्व के प्राचीनतम साहित्यों में राष्ट्र या देश के प्रति सुन्दर उद्गारों की अभिव्यक्ति की झलक यत्र-तत्र स्पष्ट दिखाई पड़ती है। राष्ट्र शब्द एक सुनिर्दिष्ट अर्थ और भावना का प्रतीक है जिस प्रकार यजुर्वेद में राष्ट्र के कल्याण की कामना कितने सुन्दर शब्दों में की गयी है— आ राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्।² अर्थात् हमारे राष्ट्र में क्षत्रिय, वीर, धनुर्धारी, लक्ष्यवेधी और महारथी हो। अभिवर्धताम् पयसाभि राष्ट्रेण वर्धताम्।³ अथर्ववेद में भी 'राष्ट्र' के धन-धान्य, दुग्धादि से संवर्धन प्राप्ति की कामना की गयी है :— 'राष्ट्र' से सम्बन्धित शब्दों का प्रयोग वैदिक साहित्य में अत्यधिक किया गया
- ऋग्वेद मण्डल १०, सूक्त, २७३, ऋचा ५ और म० ४, सू० ४२, ऋ० १ तथा मं० ५, सू० ६६, ऋ० ६।
- यजुर्वेद - अध्याय २८/२२
- अथर्ववेद - अध्याय ६/७८/२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 2 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता है। जैसे साम्राज्य, स्वराज्य, राज्य, महाराज्य आदि। इन सबमें 'राष्ट्र' शब्द ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। 'राष्ट्र' शब्द से आशय उस भूखंड विशेष से है जहाँ के निवासी एक संस्कृति विशेष में आबद्ध होते हैं। एक सुसमृद्ध राष्ट्र के लिए उसका स्वरूप निश्चित होना आवश्यक है। कोई भी देश एक राष्ट्र तभी हो सकता है जब उसमें देशेतरवासियों को भी आत्मसात् करने की शक्ति हो। उनकी अपनी जनसंख्या, भू-भाग, प्रभुसत्ता, सभ्यता, संस्कृति, भाषा, साहित्य, स्वाधीनता और स्वतन्त्रता तथा राष्ट्रीय एकता आदि समस्त तत्त्व हों, जिसकी समस्त प्रजा अपने राष्ट्र के प्रति आस्थावान हो। वह चाहे किसी भी धर्म, जाति तथा प्रान्त का हो। प्रान्तीयता और धर्म संकुचित होते हुए भी राष्ट्र की उन्नति में बाधक नहीं होते हैं क्योंकि राष्ट्रीय एकता 'राष्ट्र' का महत्त्वपूर्ण आधारतत्त्व है, जो नागरिकों में प्रेम, सहयोग, धर्मनिष्ठा, कर्त्तव्यपरायणता, सहिष्णुता तथा बन्धुत्व आदि गुणों का विकास करता है तथा धर्म तथा प्रान्तीयता गौण हो जाती है। तब राष्ट्र ही सर्वोपरि होता है। इन गुणों के विकास से ही राष्ट्र स्वस्थ तथा शक्तिशाली होता है। राष्ट्र नागरिकों पर अनिवार्य रूप से कर लगाता है जिसे राष्ट्र की व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित कर सके। इस प्रकार 'राष्ट्र' प्रभुत्त्व-सम्पन्न स्वाधीन तथा स्वतन्त्र संगठन है जिसका स्वरूप आध्यात्मिक भावना तथा राष्ट्रीय एकता पर निर्भर रहता है, जो अमूर्त होता है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है। राष्ट्र का प्राकृतिक स्वरूप भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है जितना सामाजिक। राष्ट्र को सुसम्पन्न तथा गौरवपूर्ण होने के लिए उसकी प्राकृतिक-सम्पदाएँ भी अपनी पूर्णता को प्राप्त होनी चाहिए, जिससे राष्ट्र निवासी अपना भरण-पोषण स्वयं कर सकें तथा अपने राष्ट्र पर बोझ न बनने पाएँ। जिस प्रकार पर्वतराज हिमालय हमारे राष्ट्र की प्राकृतिक सम्पदा है, जिस पर सैकड़ों ऋषि-मुनि निरन्तर साधना करते रहते हैं और उस पर उगने वाली असंख्य जड़ी-बूटियाँ भयानक से भयानक रोगों को दूर करने में सक्षम हैं। जो उत्तर दिशा में मुकुट के समान देदीप्यमान है। महाकवि कालिदास ने हिमालय का वर्णन कितने सुन्दर शब्दों में किया है- अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः। पूर्वापरौ तोय निधीवगाह्य- स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥१ १. महाकवि कालिदास CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 3 ब्रह्मपुत्र, गंगा, यमुना, सिन्धु आदि महानदियाँ इसी हिमालय से निकलती हैं जो भारत-भू को हरा-भरा तथा उपजाऊ बनाती हैं। इसकी प्राकृतिक शोभा अनुपम है जिसका वर्णन करते हुए सैकड़ों महाकवियों ने प्रकृति-परक रचनाएँ लिखी हैं। स्वराष्ट्र भारत का मौसम भी सर्वानुकूल है। यहाँ पर वर्ष भर में छः ऋतुएँ आती हैं। जिनका क्रम बहुत ही सुन्दर है तथा प्राणियों के स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यन्त उपयुक्त है। सर्वप्रमुख वसन्त ऋतु है जिसमें चित्र-विचित्र रंगों वाले सुगन्धित पुष्प खिल जाते हैं, कोयल पंचम स्वर में गाने लगती है। यह वसन्त ऋतु अन्य किसी देश में नहीं होती। इस वसन्त ऋतु में समस्त विशेषताओं को एकत्र देखकर ही भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में वसन्त को अपना स्वरूप बताया है— बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥१ इसी प्रकार महाकवि कालिदास ने अपने ऋतु संहार में वसन्त ऋतु का कितना सटीक वर्णन किया है जिसका एक अनुपम उदाहरण यह है— द्रुमा सपुष्पाः सलिलं सपद्मम् स्त्रियः सकामाः पवनः सुगन्धिः। सुखा प्रदोषा दिवसाश्च रम्याः सर्वप्रिये चारुतरं बसन्ते॥२ अर्थात् वसन्त ऋतु में वृक्ष पुष्पों से युक्त हो जाते हैं, जल में कमल खिल जाते हैं, स्त्रियाँ कामभाव से युक्त हो जाती हैं तथा पवन सुगन्धित हो जाता है। सन्ध्या काल सुखदायक तथा दिन रमणीय हो जाते हैं। इस प्रकार प्रिय वसन्त ऋतु में सब कुछ चारुतर हो जाता है। यहाँ का साहित्य, दर्शन, ज्योतिष, आयुर्वेदादि संसार के प्राचीनतम साहित्य, दर्शन तथा विज्ञान है जो पाठक के हृदय में ऐसी भावनाओं को उद्वेलित करता है जो राष्ट्रीय एकता तथा विश्व-बन्धुत्व की भावना से ओत-प्रोत हो। अधोलिखित उदाहरण भारत की विश्व बन्धुत्व की भावना का सार्थक उदाहरण है— विश्वबन्धुत्वमुद्घोषयत्पावनं विश्ववन्द्यैश्चरित्रैर्जगत्पावयत्। १. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १०/३५ २. महाकवि कालिदास का ऋतुसंहार। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 4 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता विश्वमेकं कुटुम्बं समालोकयद् भूतले भाति मेऽनारतं भारतम्॥१ अर्थात् पवित्र विश्वबन्धुत्व-भावना की उद्घोषणा करने वाला, विश्ववन्द्य चरित्रों से जगत् को पवित्र करने वाला और सम्पूर्ण विश्व को एक कुटुम्ब के रूप में देखने वाला मेरा भारत भूतल पर सदा प्रोद्भासित रहता है। इस प्रकार भारत में जनसंख्या, भौगोलिकता, प्रभुसत्ता, सभ्यता, संस्कृति, भाषा, साहित्य, स्वाधीनता और स्वतन्त्रता आदि समस्त तत्त्व हैं जो किसी भी राष्ट्र की आन्तरिक शक्ति होते हैं और यही आन्तरिक शक्ति राष्ट्रीय एकता का आधार है जो राष्ट्र का प्राणतत्त्व होती है। अतः राष्ट्र के प्रति विशिष्ट आत्मीयता व गौरव की भावना से युक्त व्यक्तियों का समुदाय ही राष्ट्र कहलाता है जिसका सार्थक उदाहरण है- भारत। राष्ट्र की विषयवस्तु एवं क्षेत्र राष्ट्र की रचना के लिए जनसमूह अर्थात् जनसंख्या का होना अति-आवश्यक है। जनसमूह के पश्चात् उसमें एकता, सहायता और सहयोग की भावना राष्ट्र का प्राणतत्त्व है क्योंकि एक राष्ट्र के संगठन के लिए सदस्यों में एकता, सहायता तथा सहयोग की भावना अति आवश्यक है, उसके अभाव में राष्ट्र का संगठन ही असम्भव है। रेम्जेम्यूर ने राष्ट्र के स्वरूप को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया है— "अस्थायी तौर पर हम कह सकते है कि राष्ट्र वह जन-समुदाय है जिसके सदस्य अपने को स्वाभाविक रूप से एकता के कुछ ऐसे सूत्रों में बँधा हुआ अनुभव करते हैं जो इतने दृढ़ और वास्तविक होते हैं कि उनके कारण वे प्रसन्नतापूर्वक साथ-साथ रह सकते हैं, पृथक् हो जाने पर दुःखी होते हैं और ऐसे लोगों की अधीनता सहन नहीं कर सकते जो उन बन्धनों के अन्तर्गत नहीं है।''२ उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि राष्ट्र के संगठन हेतु किन्हीं निश्चित तत्त्वों की आवश्यकता नहीं। समान जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति, भूभाग की अपेक्षा उनमें साथ-साथ रहने की इच्छा तथा एकता की भावना होना अति आवश्यक है। अतः 'राष्ट्र' एक कल्पना है जिस कल्पना का आधार होता है— मानवीय एकता। 'राष्ट्र' वह भावना है जो एकत्व की ओर प्रेरित करती है। राष्ट्र के लिए जनसंख्या, भू-भाग, सरकार, प्रभुसत्ता आवश्यक नहीं, उसके लिए आवश्यक है मिट्टी से प्यार। १. भातिमे भारतम् – शुक्ल, रमाकान्त। २. आधुनिक राजनीतिक विचारधाराएँ, लेखक सत्यनारायण दुबे, पृ० ३३१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 5 "जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।''१ आध्यात्मिक संगठन ही राष्ट्र का स्वरूप राष्ट्रीय भावनाओं का सम्बन्ध मुख्यतः मनोवैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक तथ्यों से है। राष्ट्रीयता की भावना को जगाने वाले मूल तत्त्व आवश्यक रूप से अमूर्त होते हैं। गिलक्राइस्ट ने भी राष्ट्र के प्राणतत्व राष्ट्रीयता को एक भाव ही माना है। गिलक्राइस्ट के अनुसार— "राष्ट्रीयता एक भावना है, जिसकी उत्पत्ति उन लोगों में होती है, जो साधारणतः एक जाति के होते हैं, जो एक भू-भाग पर रहते हैं, जिनकी एक भाषा, एक धर्म, एक साहित्य, एक-सी परम्पराएँ एवं समान हित होते हैं तथा जिनके एक से राजनीतिक समुदाय तथा राजनीतिक एकता के समान आदर्श तथा आंकाक्षाएँ होती हैं, जिन पर राष्ट्रीयता आधारित होती है। यह सब राष्ट्रीयता के आधार हैं, स्वयं राष्ट्रीयता नहीं। राष्ट्र भावनात्मक शक्ति पर निर्भर राष्ट्र की शक्ति आन्तरिक रूप से भावनात्मक होती है जिसका सम्बन्ध नैतिकता से है। इस प्रकार राष्ट्र की मूल शक्ति नैतिकता ही है। राष्ट्र जब सदस्यों से कोई कार्य करवाना चाहता है तब वह ऐसे वातावरण का निर्माण करता है जिससे लोगों के मन में स्वतः ही उस कार्य को करने की भावना उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार वह प्रार्थना करता है परन्तु आज्ञा नहीं देता। अतः राष्ट्र की शक्ति प्रजा की स्वैच्छिक नैतिक शक्ति है। राष्ट्र निर्माणक तत्त्व अनिश्चित राष्ट्र को निर्मित करने के लिए कोई निश्चित तत्त्व नहीं है क्योंकि उनमें सदैव समयानुसार परिवर्तन होता रहता है। जिस प्रकार राज्य के चार निर्माणक तत्त्व निश्चित है— जनसंख्या, भू-भाग, सरकार और प्रभुसत्ता। जहाँ ये चारों संयुक्त हो जाते हैं वहीं राज्य का निर्माण हो जाता है। वैसे राष्ट्र के कोई निश्चित निर्माणक तत्त्व नहीं है। इस प्रकार राष्ट्र के मूलतः कोई निश्चित तत्त्व नहीं है क्योंकि राष्ट्र का स्वरूप अमूर्त होता है जिसकी संरचना को अनुभव के आधार पर समझा जा सकता है, देखा नहीं जा सकता। राष्ट्र के निर्माणक तत्त्व राष्ट्र के निर्माणक तत्त्व मुख्यतः अनिश्चित है, तत्त्वों की अनिश्चितता होते हुए भी राष्ट्र के निर्माण हेतु अधोलिखित तत्त्वों की आवश्यकता पड़ती है। १. राष्ट्रकवि मैथिलीशरणगुप्त की कविता से उद्धृत। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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6 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता १. जनसंख्या २. भौगोलिकता ३. भाषा ४. धर्म ५. शासन व्यवस्था ६. सभ्यता और संस्कृति ७. साहित्य ८. राष्ट्रीय एकता और कल्याणकारी भावना ९. स्वाधीनता और स्वतन्त्रता १. जनसंख्या जनसंख्या राष्ट्र का मुख्य तत्त्व है। जब तक राष्ट्र में पर्याप्त जनसंख्या नहीं होगी तब तक राष्ट्र को संगठित नहीं किया जा सकता क्योंकि राष्ट्र का प्राणतत्त्व है— राष्ट्रीय भावना, जो कि लोगों के परस्पर मिलजुल कर एक साथ रहने से तथा विचारों के आदान-प्रदान, प्रेम सहयोग की भावना, सभ्यता और संस्कृति आदि के द्वारा पल्लवित तथा पुष्पित होती है। यह तभी सम्भव है जब जनसंख्या का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता, शान्तिमय जीवन तथा जीओ तथा जीने दो की भावना से ओत-प्रोत हो। अतः राष्ट्र की उन्नति हेतु यह भी आवश्यक है। राष्ट्र की जनसंख्या न तो इतनी कम हो कि शासन-व्यवस्था सुचारू रूप से कार्य न कर सके और न ही इतनी अधिक कि राष्ट्र पर बोझ बन जाये अर्थात् उसे पराश्रयी होना पड़े। २. भौगोलिकता राष्ट्र की आध्यात्मिकता की भावना को दृढ़ता प्रदान करने में भौगोलिकता का अपना विशेष महत्त्व है क्योंकि भौगोलिकता ही मनुष्य को एकत्व की शिक्षा प्रदान करती है। एक भू-भाग पर बसा हुआ जन-समूह स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय एकता के दृढ़-बन्धन में बँध जाता है क्योंकि उसकी समान जाति, भाषा, धर्म, परम्परा, सभ्यता, संस्कृति, साहित्य, आचार-विचार तथा भाव आदि समान होने के कारण उनसे प्रेरित होकर ही वह दूसरे के दुःख में अपना दुःख तथा दूसरों के सुख में अपना सुख समझता है। यही प्रेम, परस्पर सहयोग की भावना ही उसे राष्ट्रीयता से जोड़ती है जो निश्चित भू-भाग पर रहने के लिए बाध्य करती है तथा राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता रूपी निधि को सुरक्षा प्रदान करती है।
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar