वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
वैराग्यशतक
लड़का ससल चढ़कर पड़ गया और मुर्छा सा हो गया । आवाज़ देने पर जब बह खासिको न आया ; खोने जाकर देखा और उसे मरा हुआ पाया । ( पृष्ठ ६५ )
झपार में पहलें रोना पिटना आरंभ कर दें; तो न जाने कब तक भूखी मरूँगी, हसीलिये पहले खीर खा लें और बचे सो बकि पर घर दूँ । ( पृष्ठ ६६ )
Popular Press—Calcutta.
तस्व
बात
जि
वाहिये। किसी ही पुण्यात्मा को ऐसी स्त्री मिलती है, जो उसे दिलसे चाहती हो। स्त्री का स्वभाव है कि, वह देखती किसी को है, बात किसी से करती है और चाहती किसी को है।
स्त्री की प्रीति-परीक्षा ।
एक सेठ का पुत्र, सत्संगके लिये, नित्य किसी महात्मा के पास जाया करता था। माँ-बापको उसका महात्मा के पास जाना पसन्द न था। उन्हें भय था कि, हमारा पुत्र वैरागियों की संगतिमें कहीं वैरागी न हो जाय, इसलिये उन्होंने शीघ्र ही उसकी शादी कर दी। घर में वह आ गयी। फिर भी लड़के का महात्माके पास जाना कम न हुआ। तब सेठ-सेठानीने बहुसे कहा कि, तू इसकी ऐसी सेवा कर, जो यह महात्माके पास जाना छोड़ दे। बहुने अपनी सेवा-टहल और नाज़-नखरों से पति को वशमें कर लिया। लड़के का मन महात्माकी संगतिसे हटने लगा। पहले वह रोज जाता था, आगे दूसरे-तीसरे दिन जाने लगा। एक दिन स्त्रीने कहा—“आप जब रातको चले जाते हैं, मैं अकेली पड़ी रहती हूँ। रात में स्त्रीका अकेला रहना अच्छा नहीं; इसके सिवा, रातको मुझे डर भी लगता है। यह बात सुन कर, लड़केने महात्माके पास जाना कृतई छोड़ दिया।
५
एक दिन महात्मा कहीं जा रहे थे। राहमें वही लड़का उन्हें मिल गया। उन्होंने उससे न आनेको वजह पूछी। लड़केने कहा—“महाराज ! मेरी खी बड़ी ही पतिव्रता है। वह मुझे हर तरह सुखी रखती है। मेरे बिना वह क्षण-भर भी अकेली नहीं रह सकती। मेरे लिये वह प्राण देती हैं। उसको सच्ची प्रीति देखकर, मैं उसके वशमें हो गया हूँ और इसीसे आपकी सेवामें नहीं आ सकता।”
महात्माने कहा—“भैया ! सब अपने मतलबसे प्रीति करते हैं। तुम्हारी खी भी अपने सुखके लिये तुमसे प्रीति करती है, तुम्हारे सुखके लिये नहीं। अगर विश्वास न हो, तो आज-माइश कर लो।” लड़का इस बात पर राजी हो गया। महात्मा ने उसे श्वास रोकनेकी विधि समझा दी और कहा,—“एक दिन तुम अपनी खीसे कहना कि, आज हम खीर-पूरी खायेंगे। जब वह खीरपूरी बनाने लगे, तब तुम श्वास रोककर लम्बे पड़ जाना। जब वह संभस्केगी कि तुम मर गये, तब हमारी बातकी सवाईकी परीक्षा हो जायगी।”
त वा जि ही खर
एक दिन लड़केने घर पहुँचतेही खीसे कहा—“आज हमारा मन खीर-पूरी खाने पर है।” खीने कहा—“खामिन् ! अभी बनाती हूँ।” यह कह वह खीर-पूरी बनाने लगी। उधर लड़का साँस चढ़ाकर पड़ गया और मुर्दा हो गया। थोड़ी देर बाद जब खीर-पूरी बन गयी, खीने आवाज़ दी,—“आईये, खाना खा लीजिये।” जब वह न आया, तो खी स्वयम् आयी। देखा
( ६७ )
तो लड़का मरा पड़ा है। कहीं साँस नहीं है। स्त्री ने विचार किया, यह तो मर गया। अगर मैं अभी रोना-पीटना आरम्भ करती हूँ, तो न जाने कब तक भूखी मरूँगी, और खीर भी बिगड़ जायगी। इसलिये पहले खातूँ और जो बचे उसे डींकि पर रख दूँ। स्त्री ने अपने विचारानुसार पहले खूब खीर-पूरी खाई, और शेष रख दी। इसके बाद रोना और छाती-माथा कुटना शुरू किया। उसका रोना सुन, घरके लोग इकट्ठे हो गये और पूछा, "यह कैसे मर गया?" स्त्री ने कहा—"पेटमें दर्द बताते थे, शायद उसीसे मरे हैं।" लोगोंने कहा—"अब दैर करना व्यर्थ है। इसे शीघ्र शमशान पर ले चलो।" वे लोग उसे उठाने लगे, लेकिन उसके पैर दो खंभोंमें फँस जानेसे न निकले। तब लोगोंने कहा कि, इन खंभोंको काटकर पाँव निकालने चाहिये। यह सुनते ही स्त्री ने कहा—"ऐसा न करो ; खंभे कट जायँगे, तो फिर कौन बनवा देगा ? इसलिये खंभ न कटाकर, इनके पैर ही काट डालो ; क्योंकि पाँव आखिर जलाये ही जायेगे।" लोगोंने कहा "ठीक है।" ज्योंही उन्होंने पैर काटनेको कुल्हाड़ा उठाया कि, लड़का उठ बैठा और बोला—"मेरा दर्द मिट गया।" यह देख, लोग अपने-अपने ठिकाने चले गये। लड़का महात्म्याके पास गया और कहने लगा—"महात्मन् ! आपका कहना राई रत्नी सब है। अब मुझे ज़रा भी शक नहीं। निस्सन्देह स्त्री अपने ही लिये पतिको प्यार करती है। सबकी प्रीति भटी है। अब मैं गृहस्थाश्रममें न
( ६८ )
रहूंगा। बस, उसी दिनसे उसने अपनी स्त्रीको त्यागकर वैराग्य ले लिया।
स्त्री आफ़्तोंकी जड़ है।
स्त्री अनेक आपदाओं की मूल है। अनेक रूपवती स्त्रियाँ के कारण उनके पतियोंके प्राण नष्ट हुए हैं। नूरजहाँके कारण शेर अफ़ग़ानकी जान मारी गई। स्त्रीके पीछे सुन्द-उपसुन्द आपसमें लड़कर मर गये। स्त्रीके पीछे राजा नहुषको स्वर्ग से गिरना पड़ा। स्त्रीके कारण बालि मारा गया और रावण का सर्वनाश हुआ एवं शिशुपालका खिर काटा गया। स्त्री के पीछे ही भारतको भारत करने वाला महाभारत हुआ। स्त्री साँपसे भी भयङ्कर है। साँपके तो काटनेसे मनुष्य मरता है, पर स्त्रीकी रूप-चिन्तना-मात्रसे ही मनुष्य मर जाता है। विष खानेसे मनुष्य एक बार ही मरता है, पर स्त्री-विष के सम्बन्धसे मनुष्यको बारबार जन्म लेना और मरना पड़ता है; क्योंकि मरते समय पुरुष का मन अपनी स्त्रीमें ज़रूर जाता है। मरण-समय जिसकी वासना जिसमें रहती है, वह उसे अवश्य मिलता है। कहा है :—
वासना यत्र यस्य स्यात्संतं स्वप्नेषु परयति । स्वप्नवन्तरणो ह्येवं वासनातो वपुर्नृणाम् ॥
( ७२ )
( ३ )
कामिनि काली नागिनी, तीन लोक मंझारि । नाम-सनेही ऊवरा, विषिया खाये भारि ॥
( ४ )
नारी कहुँ कि नाहरी, नख-सिरखसों यह खाय । जल बूड़ा तो ऊवरे, भग बूड़ा बहि जाय ॥
( ५ )
एक कनक अरु कामिनी, तजिये भगिये दूर । हरि विच परें अन्तरा, यम देसी मुख धूर ॥
( ६ )
जहाँ काम तहाँ राम नहीं, राम तहाँ नहीं काम । दोऊ कजहुँ ना रहें, काम राम इक ठाम ॥
( ७ )
अविनाशी विच धार तिन, कुल कंचन अरु नार । जो कोई इन ते बचै, सोई उतरे पार ॥
( १ )
स्त्रीको घूर कर न देखना चाहिये और देख कर उसके पीछे न लगना चाहिये ; क्योंकि स्त्रीको देखने-मात्रसे ही जहर चढ़ जाता है और मन और ही तरहका ही जाता है ।
( ७२ )
( २ )
सुन्दरों सोनेकी ही क्यों न हो और उसमें मनभावन सुगंध भी क्यों न आती हो, यदि वह अपनी जननी भी हो, तोभी उसके पास न बैठे।
( ३ )
स्त्री काली नागिन है। केवल ईश्वरका नाम अपने वाले उससे बचे; विषय-भोगियोंको तो वह एकदमसे खागई—कोई न छोड़ा।
( ४ )
इसे मैं नारी कहूँ या नाहरी—सिंहनी कहूँ? क्योंकि यह नख-सिखसे खा जाती है। जलमें डूबा बच जाता है; पर स्त्रीमें डूबा नहीं बचता।
( ५ )
• एक सुवर्ण और दूसरी स्त्री इनसे बच कर रहा। यह भगवान् के और जीवके बीचमें खाई बताते हैं, जिससे यमराज मुँहमें धूल डालता है।
( ६ )
जहाँ स्त्री है वहाँ राम नहीं है और जहाँ राम है वहाँ स्त्री नहीं। स्त्री और राम दोनों एक जगह नहीं रह सकते।
( ७ )
अविनाशी भगवान् और जीवके बीचमें तीन खाहूँयाँ हैं:— (१) कुल, (२) कंचन, और (३) कामिनी। जो इन तीनों से बचता है, वही पार होकर भगवान् तक पहुँच जाता है।
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वैराग्यशतक ॥ ४ ॥
गोस्वामी तुलसीदासजी नदी पार कर छतराल पहुँचे, द्वार बन्द पाकर सर्प को रस्सी समझ डले पकड़ ऊपर चढ़ गये। जब स्त्री के सामने पहुँचे—स्त्री कहने लगी:—“आप का जितना प्रेम मुझ में है, उतना उस जगदीश में हो, तो आप का भला हो जाय।
( ७३ )
क्या स्त्रीमें आनन्द है ?
—*—
स्त्रीमें कुछ भी आनन्द नहीं है। स्त्री हर तरह दुःखोंकी ध्वान और मनकी अशान्तिकी मूल है। स्त्रीसे मैथुन करनेमें पुरुषको जो आनन्द आता है, वह उसका अपना आनन्द है; स्त्रीका नहीं। कुत्ता सूखी हड्डी खवाता है; पर सूखी हड्डीमें धून नहीं होता। कुत्तेका अपना धून निकलता है और उसे उसीका स्वाद आता है, पर वह अज्ञानी उस आनन्दको हड्डी में समझता है। विषयी पुरुष भी कुत्तेकी तरह ही है। विषय जड़ है। विषयोंमें आनन्द कहाँ? आनन्द आत्मामें है। जब पुरुषका वीर्य मैथुनके अन्तमें स्खलित होता है, तब क्षण-भरके लिये मनकी वृत्ति स्थिर हो जाती है। उस स्थिर वृत्तिमें चेतन आत्माका अक्स पड़ता है। बस, उसीसे पुरुषको आनन्द आता है। पर अज्ञानसे, कुत्तेकी तरह, वह उस आनन्दको स्त्रीमें समझता है। तात्पर्य यह निकला कि, स्त्रीमें कुछ भी आनन्द नहीं, आनन्द आत्मामें है।
स्त्री-त्यागी ही परिणत है।
मनुष्यों और पशुओंमें क्या भेद है? मनुष्य खाते, सोते, डरते और स्त्री-भोग करते हैं और पशु भी यही चारों काम करते हैं। पर इन दोनोंमें अन्तर यही है कि, मनुष्यको धर्म-
( ७४ )
ज्ञान है और पशु को नहीं। यदि मनुष्य पशुओंकी तरह अज्ञानी हो, तो वह भी पशु ही है। कहा है—
अधीत्य वेदशास्त्राणि, संसारे रागिणश्च ये ।
तेभ्यः परो न मूर्खोऽस्ति, सर्वां श्वाश्वसूकरैः ॥
जो पुरुष वेद-शास्त्रोंको पढ़कर भी संसार से या स्त्री-पुत्र आदिकी प्रीति रखते हैं, उनसे बढ़कर मूर्ख कौन है? क्योंकि स्त्री-पुत्र प्रभृतिमें तो कुत्ते, घोड़े और सूअर भी प्रेम रखते हैं। शुक्रदेवजाने भी “भागवत”में कहा है :—
मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य, वेदशास्त्राण्यधीत्य च ।
वध्यते यदि संसारे, का विमुच्येत मानवः ?
दुर्लभ मनुष्य-बोला पाकर और वेद-शास्त्र पढ़कर भी यदि मनुष्य संसारमें फँसा रहे, तो फिर संसार-बन्धनसे छुट्टेगा कौन ?
कबीरदासजी कहते हैं :—
काम क्रोध मद लोभकी, जब लग घटमें खानि ।
कहा मूर्ख कहा पंडिता, दोनों एक समान ॥
जब तक मनमें काम, क्रोध, मद और लोभ है, तब तक पण्डित और मूर्ख दोनों समान हैं। जिसमें काम, क्रोध, मद और लोभ नहीं, वही पण्डित है और जिसमें ये हैं वह मूर्ख या अज्ञानी है।
( ७५ )
शङ्कराचार्यकृत “प्रश्नोत्तरमाला”में लिखा है :—
शून्यमहाशून्यतमोऽस्ति का वा ?
मनेजवागैर्व्यथितो न यस्तु ।
प्राज्ञोऽति धीरश्च शमोऽस्ति को वा ?
प्राप्ता न मोहं ललनाकटाक्षैः ॥
संसारमें सबसे बड़ा शूरवीर कौन है ? जो काम-बाणों से पीड़ित नहीं है । प्राज्ञ, धीर और समदर्शी कौन है ? जिसे स्त्रीके कटाक्षोंसे मोह नहीं होता ।
महात्मा तुलसीदासजीको स्त्रीसे विरक्ति ।
एक बार महात्मा तुलसीदासजी की स्त्री अपने पीहर चढ़ी गई ; महात्माजीको आधी रातके समय स्त्री-प्रसंगकी इच्छा हुई । आपकी ससुराल और आपके गाँवके बीचमें नदी पड़ती थी । आप फौरन ही घर छोड़ ससुरालको चल दिये । भयङ्कर रातमें प्रबल वेगसे बहती हुई नदीको पार कर आप ससुराल पहुँच गये । लेकिन जब घरके द्वार पर पहुँचे तो पौलीका द्वार बन्द पाया । अब आप मकानमें चढ़ने की तरकीब सोचने लगे । इतनेमें आपको एक रस्सी सी नज़र आई, आप उसे पकड़ कर चढ़ गये और अपनी स्त्रीके कमरे में जा पहुँचे । स्त्री आपको देखते ही चौकन्नीसी हो गयी ।
( ७६ )
आपने कहा—“प्यारी ! मैं तेरे लिये इस समय महा कष्ट भोग कर आया हूँ । मेरी अभिलाषा पूर्ण कर ।”
स्त्री आपको देखते ही पल्लगसे नीचे बैठ गई और बोली—“हे मेरे पतिदेव ! देखिये तो रात कैसी भयावनी हो रही है । बादलोंकी गड़गड़ाहट और बिजलीकी कड़कसे मनुष्य का हृदय काँप उठता है । उधर नदी चढ़ रही है । आपने अपने शरीरकी परवा न कर मुझे दर्शन दिये; इसलिये मैं आप की अनुग्रहीत हूँ । परन्तु स्वामिन् ! यह तो बताइये, आप मकानमें आये कैसे, क्योंकि द्वार बन्द है ?” आपने कहा—“एक रस्ती लटक रही थी, उसीके सहारे मैं चढ़ आया ।” स्त्रीने जाकर देखा, तो वह रस्ती नहीं, बरन् एक लम्बा-चौड़ा काल-सर्प था । देखते ही स्त्रीके सिरमें चक्कर आगया । उसके मुँहसे इतना ही निकला—“स्वामिन् ! जितना प्रेम आपका मुझमें है, यदि इतना ही हरिमें होता, तो आपका निश्चय ही बड़ा उपकार होता ।
“जितना प्रेम हरामसे, उतना हरिसे होय ।
चला जाय वैकुण्ठके, पलान पकड़े काय ।”
कहते हैं, तुलसीदासजी तत्क्षण उसे गुरु कह कर बनको चले गये ।
पुरुष आठ पहर-चौंसठ घड़ी स्त्रीकी सेवा करता है, उसे हर तरह प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करता है, उसकी आज्ञा-पालनके लिये तैयार रहता है, आप नाना प्रकारके कष्ट
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बीच महलसे राजाको ले गया। सब देखते-के-देखते रह गये। वही बलवान काल तुम्हारी घातमें तुम्हारे सिरपर मँडरा रहा है। आप भी उससे किसी तरह बच नहीं सकते।
यह दुनिया नापायेदार है, मनुष्य-शरीरका कोई ठिकाना नहीं; फिर भी मनुष्यके अभिमानकी सीमा नहीं। थोड़ी सी विषय-सम्पत्ति पर वह इतना इतरा उठता है, कि ईश्वरको भी माल नहीं समझता। उस्ताद जौकने ठीक ही कहा है—
मौत ने कर दिया नाचार, वगनी इन्हीं।
है वह खुदबी, कि खुदाका भी न क़ायल होता ॥
मनुष्य के घमण्डका कुछ ठिकाना है—किसीको कुछ नहीं समझता। मौत ने इसे लाचार कर रक्खा है, नहीं तो यह ईश्वरको भी कुछ न समझता।
शिक्षा—अगर अपना भला चाहते हो, तो अभिमान को त्यागो; यह बड़ा भारी शत्रु है। जिन्होंने इसकी संगति की, उन्हींका नाश हुआ। अभिमान से ही उस लंकाविपत्ति रावणका नाश हुआ, जिसने त्रिलोकीको अपने अधीन कर रक्खा था और जो देवताओंसे सेवा और हवा-पानीसे टहल कराता था। अभिमानसे ही सप्यहके मार्त्तण्डकी भाँति तपते हुए देहलीके सुगल बादशाह औरज्जनेवकी सस्तनतकी जड़ हिल गई, सुगलिया खान्दानसे बादशाहत विदा हो ही गई। अभिमान ने ही उस जर्मन कैसरको रव्से रङ्ग बना दिया, जिसने छोड़ेसे देशका राजा होकर भी, सारी पृथ्वी को चार साल तक अपनी उँगली पर नचाया। भाइयो, इन दृष्टान्तोंको ध्यानमें रखकर, अपने प्रबल शत्रु-अभिमानका नाश करो।
( ६२ )
छप्पय ।
छिनहूँ छाँड़ी नाहि, भोग भुगती वह भूयनि ।
कुलटासी यह भूमि, लाभ मानत महीप मनि ।
ताहू के इक अंग के, सु अंगहि को पावत ।
राखत हैं करि कष्ट, दिवस निशि चहूँ दिशि धावत ।
अपनी ओरकी होत यह, यातें पचि-पचि रचि रहे ।
पछितैवौ तजि जग-विषयसों, जड़ उरुटे सुख गनि रहे ॥२५॥
25. Why should kings feel so much pride in the ownership of the earth, which has successively been owned by hundreds of kings without the break of even a second. It is a pity that petty kings who possess even a very small portion of it, foolishly find pleasure in the possession of their estates while really they ought to grieve over it as their power is not going to endure for ever.
मृत्पिण्डो जलरेखया वलपितः सर्वोऽप्ययं नान्धु-
रणीकृत्य स एव संयुगशतै राज्ञां गणैर्भुज्यते ।
तद्वदुद्वदतेऽथवा न किमपि क्षुद्रा ददिता भृशं
विश्विकान्पुरुषाधमान्धनकर्णं वाञ्छन्ति तेष्योऽपि ये ॥२६॥
भृगति=राजा लोग । महीप=राजा । कुतश्च=अभिचारिणी ओ । दिवस निशि=रात-दिन । चहूँ दिशि=चारों दिशाओंमें । धावत=दौड़ते हैं । पछितैवौ तजि=पछताना छोड़कर । जड़=मूर्ख । छल गनि रहे=छल मान रहे हैं ।
( ६३ )
अब्वल तो यह पृथ्वी स्वयं ही बड़ी नहीं है।१ मिट्टीका सा लौदा है, जो चारों ओरसे पानीसे घिरा हुआ है। दूसरे ; सैकड़ों-हज़ारों राजाओंने आपसमें अनेक लड़ाइयाँ लड़-लड़कर, इसके भागों पर अपना-अपना कब्जा कर रखाहै। ऐसे खुद और संकीर्ण-हृदय-राजाओंका जो दानी सम्भूते हैं और उनके मुँहकी ओर ताकते हैं कि वे कुछ देंगे, ऐसे नीच लोगोंका धिक्कार है ! ऐसे तुच्छ और दरिद्रियोंसे धनपानेकी आशा करना व्यर्थ है ॥२६॥
अब्वल तो पृथ्वी कोई चीज़ ही नहीं है। फिर, यह ज़रासा मिट्टीका लौदा है, जो चारों ओरसे सीमा-बद्ध है, चारों ओर इसके खुद है। फिर ; इस खुद पृथ्वीको भी अनेक राजाओं ने आपसमें खुद कर-करके अपने-अपने अधिकारमें कर रक्खा है। ज़रासी चीज़के हज़ारों टुकड़े हो गये हैं। इन टुकड़ोंके मालिकोंको जो लोग बड़े आदमी और दानी सम्भूते हैं और उनसे कुछ पानेकी आशा करते हैं, उनको बारम्बार धिक्कार है ! क्योंकि उन नामके भूपतियोंके पास रक्खा ही क्या है ? वे स्वयं द्रिद्र हैं। जब वे स्वयं द्रिद्र और सुहताज हैं, तब वे किसकी आशा पूरी कर सकते हैं ? इसलिये, ऐसे खुदोंका मुँह ताकना नीचोंका काम है। मुँह उसका ताकना चाहिये, जो किसी लायक हो। मनुष्यको जो माँगना हो, सर्वशक्तिमान् भगवान् से माँगना चाहिये ; वही सबकी इच्छा पूरी कर सकता है। खुद धनियोंकी खुशामदमें समय गँवाना, वृथा जन्म खोना
( ६४ )
है। वे आप-दीन हैं। उनकी इच्छायेँ क्या पूरी हो गई हैं ? अमीर-गरीब सभी ज़रूरतें रखते हैं। इसलिये दोनों ही दीन हैं। अमीरोंकी ज़रूरतें गरीबोंसे ज़ियादा हैं, इसलिये वे दीनातिदीन हैं। ऐसे दीनोंसे भी जो माँगते हैं, वे बड़े ही निर्बद्ध हैं। अगर माँगना हो है, तो बादशाहों-के-बादशाहसे माँगो। महात्मा कबीरदास कहते हैं—
कबिरा जग की कहा कहूँ, जो भल बूढ़े दास । पारवन्ध पति छँडि के, करै मनुष्य की आस ॥ रामहिं थोरा जानि के, दुनिया आगे दीन । जीवन को राजा कहै, माया के आधीन ॥ राम धनी सिर पर खड़ा, कहा कमी तोहि दास । स्मृष्टि सिद्धि सेवा करें, मुक्ति न छँड़े पास ॥ दास दुखी तो हरि दुखी, यदि चन्त तिहुँकाल । पलक एक में परगटे, पल में करे निहाल ॥ जाकी गँठी राम है, ताके हैं सब सिद्धि । कर जोरे ठाढ़ी सबैं, अष्ट सिद्धि नव निद्धि ॥
कबीरदास कहते हैं कि, मैं जगत्के विषयमें क्या कहूँ ? वे लोग बुढ़ी तरह झूब रहे हैं, जो परमब्रह्म परमात्माको छोड़कर शुद्ध मनुष्योंकी आशा करते हैं।
लोग रामको तो कम समझते हैं और दुनियाँके आगे
( ६५ )
दीनता करते हैं तथा मायाके वश होकर जीवोंको राजा कहते हैं।
हे दास ! राम जैसा मालिक तेरे सिर पर खड़ा है, फिर तुझे क्या अभाव है ? उसकी कृपासे ऋद्धि-सिद्धि तेरो सेवा करेंगी और मुक्ति तेरे पीछे फिरेगी।
अगर सेवक दुःखी रहता है, तो परमात्मा भी तीनों कालों में दुःखी रहता है। वह दासको कष्टमें देखकर, क्षणभरमें प्रकट होता और उसे निहाल कर देता है।
जिसकी गाँठमें राम है, उसके पास सब सिद्धियाँ हैं। उसके आगे अष्ट सिद्धि और नौ निधि हाथ जोड़े खड़ी रहती हैं।
गोस्वामी तुलसीदासजीने भी कहा है :—
गरल सुषा, रिपु करें मितार्ई ; गोपद सिन्धु, अनल सितलार्ई ।
गरुड सुमेरु रेणु-सम ताही, राम कृपा करिचितर्वाहि जाही ।।
भगवान् जिसकी ओर कृपासे देखते हैं, उसके लिये जूहर अमृत हो जाता है, शत्रु मित्र हो जाते हैं, समन्दरमें गौके स्वरण डूबें उतना जल हो जाता है, आग शीतल हो जाती है, और भारी सुमेरु-पर्वत रेणुके समान हो जाता है।
बहुतसे मूर्ख इन धनमत्तोंसे यहाँतक कह बैठते हैं— “हुजूर ! हम बड़े सङ्कटमें हैं, हमारी नाव मंझधारमें है, उसे पार लगाइये।” यह बड़ी भद्दी भूलकी बात है। नावका पार लगाना, मनुष्यके हाथ नहीं; डूबती हुई नावको वह सर्व-
( २६ )
शक्तिमान् ही पार लगा सकता है ; अतः बुद्धिमान् लोग उसी के भरोसे रहते हैं, वे तुल्य मनुष्योंके ऐहसान सिरपर नहीं लेते ।
उस्ताद जौकने क्या खूब कहा है :—
अहसाने नाखुदा के, उठाये मेरी बला ।
किरती खुदा पै छोड़ दूँ, लंगरको तोड़ दूँ ॥
माँकीके अहसान मेरी बला उठाये, मैं तो अपनी नाबको ईश्वरका नाम लेकर छोड़ दूँ गा और उसका लङ्गर तोड़ दूँ गा ।
छप्पय ।
इक मृत्तिकाको पिण्ड, रहत जलमौहि निरन्तर ।
सोज सब ही नाहिं, तनकसौ, ताहूँ में डर ।
करत हजारन अंग, भूप तब भोग करत चित ।
मिटत आपनी प्यास, दान को होत कहा चित ? ।
ऐसे दरिद्र दुखसों भरे, तिनहूँ सों जो चहत धन ।
धिङ्कार जन्म वा अश्वसको, सदा सर्वदा लीन मन ।।२६॥
26. In the first place this earth, which is surrounded on all sides by a line of water, is not large enough itself. Secondly, it is divided and owned by multitudes of kings after fighting hundreds
दुःखिका = सिही । पिण्ड = गोला । निरन्तर = सदा । तनकसो = छोटांसा । हजारन अंग = हजारों भाग या कड़े । अश्वस = नीच ।