वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( ३८ )
महाराजा भर्तृहरि भूपालोंमें आदर्श भूपाल हो गये हैं। उन्होंने जो किया है वह शायद ही कोई भूपाल उनके बाद कर सका हो । जब तक सूर्य्य चन्द्रमा रहेगे, जब तक यह दुनिया रहेगी, तब तक महाराजका प्रातःस्मरणीय पुण्यश्लोक नाम लोगोंकी ज़बान पर रहेगा ।
हमने महाराजा भर्तृहरि और महाराजा विक्रमादित्यके सम्बन्धमें जो कुछ लिखा है, वह एक थियेट्रिकल कम्पनीके तमाशे और एक पुरानी पुस्तकके आधार पर लिखा है, जो हमने, कोई २५ साल पहले, एक पलटनकी लाइब्रेरीमें अज़ारेज़ो और हिन्दीमें देखी थी। इमें जो याद था वही लिखा है। इस समय न तो हमारे पास वह पुस्तक ही है और न हमें उसका नाम ही याद है।
A high-contrast, black and white photograph. On the right side, a person's hand is visible, holding a thin, light-colored object (possibly a needle or thread) between the thumb and index finger. The hand is positioned against a dark, textured background. The left side of the image is a bright, white area, which appears to be a page or a surface. There are several small, dark specks scattered across the white area, particularly near the top and bottom edges. The overall composition is minimalist and focuses on the interaction between the hand and the object.
भारतभूमि
शैप के मुख में मेंडक है, मौन में कमर नहीं है ; तथापि मेंडक मछली को खाया चाहता है ; बस यही हालत सनारी मोहाण्यों की है । वे हर नव्य मौत के मुख में रहते हुए भी, मेंडक की तरह विषकों को भोगने की चेष्टा करते हैं ।
॥ श्रीः ॥
भर्तृ हरिकृत
वैराग्य शतक
दिकालाद्यनवच्छिन्नाजन्तचिन्मात्रमूर्तये ।
स्वातुभूयैकमानाय नमः शान्ताय तेजसे ॥१॥
जो दशों दिशाओं और तीनों कालोंमें परिपूर्ण है, जो अनन्त है, जो चैतन्य-स्वरूप है, जो अपने ही अनुभवसे जाना जा सकता है, जो शान्त और तेजोमय है, ऐसे ब्रह्म रूप परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१॥
जो परमेश्वर पूरब पच्छिम प्रभृति दशों दिशाओं एवं भूत, भविष्यत् और वर्तमान काल,—इनसे संकुचित नहीं है ; यानी जो सब दिशाओं और तीनों कालोंमें मौजूद रहता है, किसी दिशा और किसी कालको केंद्रमें नहीं है, जो तीनों लोक
( २ )
और चौदहों भुवनोंमें व्याप रहा है, जो पहले भी था, अब भी है और आगे आनेवाले समयमें भी रहेगा, इसलिये वह अनन्त है, उसका विनाश नहीं है, वह चैतन्य स्वरूप है, वह केवल अपने ही अनुभवसे जाना जा सकता है, वह परम शान्त और तेजोरूप है, उसीको मैं वन्दना करता हूँ ।
1. To One unlimited by time or space, to the Boundless, to Him who is all consciousness, to one who is know-able only by self-contemplation and to the Supreme Peace and Light I bow down in prayer.
बोद्धारो मत्सरधन्ताः प्रभवः स्मयद्भूषिताः ।
अबोयोपहताश्चान्ये जीर्णर्मिगे सुभाषितम् ॥२॥
जो विद्वान् हैं, वे ईर्षासे भरे हुए हैं ; जो धनवान् हैं, उनके आपने धनका गर्व है ; इनके सिवा जो और लोग हैं, वे अज्ञानी हैं ; इसलिये विद्वत्तापूर्ण विचार, सुन्दर-सुन्दर सारगर्भित निबन्ध या उत्तम काव्य शरीरमें ही नाश हो जाते हैं ॥२॥
खुलासा ।
जो विद्वान् हैं, पण्डित हैं, जिन्हें अच्छे-बुरेका ज्ञान या तमीज है, वे तो अपनी विद्वत्ताके अभिमानसे मतवाले हो रहे हैं, वे दूसरोंके उत्तम-से-उत्तम कामोंमें छिद्रान्वेषण करने या नुकताचीनी करनेमें ही अपना पाण्डित्य समझते हैं ; अतः ऐसोंसे कुछ कहनेमें ठामको ज़रा भी सम्भावना नहीं ।
( ३ )
दूसरे प्रकारके लोग जो धनी हैं, वे अपने धनके गर्वसे भुले हुए हैं। उन्हें धन-भदके कारण कुछ सूझता ही नहीं, उन्हें किसीसे बातें करना या किसीको सुनना ही पसन्द नहीं ; अतः उनसे भी कुछ लाभ नहीं। अब रहे तीसरे प्रकारके लोग ; वे नितान्त मूर्ख या अज्ञानी हैं ; उन गँवारोंमें अच्छे-बुरेकी तमीज नहीं, अतः उनसे कुछ कहने या अपनी कृति दिखाने सुनानेको दिल नहीं चाहता ; इसलिये हमारे मुँहसे निकल सकनेवाले उत्तमोत्तम विचार, निबन्ध, काव्य या सुभाषित संसारके सामने न आकर, हमारे शरीरमें ही नष्ट हुए जाते हैं, हमारा परिश्रम व्यर्थ जाता है और संसार हमारे कामके देखने और लाभान्वित होनेसे वञ्चित रहता है !
और भी स्पष्ट ।
संसारमें धमण्डियोंकी संख्या बहुत है। कितने हो अपनी विद्याके गर्वसे चूर हो रहे हैं और कितने हो लक्ष्मीके नशे से मतवाले हो रहे हैं। यदि कोई विद्वान् या कारीगर विद्या-गर्वियोंके पास जाता है, तो अब्बल तो वे धुरन्धर विद्वान् बेचारेको पास ही नहीं फटकने देते और यदि कोई श्रीचरणों में पहुँच गया, तो वे उसके कामके उत्तम अंशों पर ध्यान न देकर, बुरे अंशोंको देखते हैं और उसमें तरह-तरहके दोष निकालकर उसके दिलको चोट पहुँचाते हैं ; इसलिये ऐसे विद्या-गर्वियोंके पास जाना और अपने कामकी कुरददानी
( ४ )
की आज्ञा करना भूल है। अब रहे धन-गन्वों ; धनसे मतवालों की तो बात ही न पूछिये। प्रथम तो उन तक पहुँचना ही कठिन काम है। यदि पहुँच भी गये, तो उन्हें अवकाश ही नहीं मिलता। सैकड़ों बार उनकी देहलकी धूल चाटने पर कदा-चित् ही कभी नम्बर आवे-तो-आवे। फिर ; वहाँ पराई बुराई करनेवालों या जुगलझोरोंकी तूती बोलती है, अतः वहाँ भी सफलता नहीं होती। इन दोनों प्रकारके लोगोंके सिवा, जो तीसरे प्रकारके लोग हैं, वे तो निरं मूर्ख—अज्ञानी या कोरे बाबाजी हैं। उनको किसी प्रकारका ज्ञान ही नहीं, वे सुभाषित और कुभाषित, सुशिक्षा और कुशिक्षा, काव्य और अलङ्कार को समझते ही नहीं। ऐसी दशामें क्रूरदान या गुणप्राहक के अभावसे खामुखाह मनमें विरक्ति या वेदना होती है। मन दुःखी होकर कहता है—“हाय ! रसिक और समझदारोंके दिल-साफ नहीं हैं, उनके चित्त मत्सरतासे कलुषित हो रहे हैं। धनवानोंको धनके नशेके मारे कुछ सूझता ही नहीं, वे किसीसे बात ही नहीं करते। अज्ञानियोंकी समझमें कुछ आ नहीं सकता। अब हम अपना पाण्डित्य या कायीगरी कित्ते दिखावे ?
शिक्षा—जो तुम्हारी तरफ मुखातिब हों, तुम्हारी बातों पर काम द, तुम्हारी बातोंको ध्यानसे सुनें, उन्हींको अपनी बातें सुनाओ। जो तुम्हारी बातें सुनना न चाहें, उनके गले मत पड़ें। ऐसा करनेसे आपकी आत्म-प्रतिष्ठामें बड़ा लगेगा—आपका अपमान होगा।
( ५ )
कुरडलिया ।
परिडत मत्सरता भरे, भूष भरे अभिमान । और जीव या जगतके, मूरख महाअजान ॥ मूरख महा अजान, देखके संकट सहिये । द्वन्द्व प्रबन्ध कवित्त, कान्यरस कासों कहिये ॥ वृद्ध भई मनभैंहि, मधुर बाणी गुणमण्डित । अपने मनको मार, मौन घर बैठत परिडत ॥२॥
2 The learned are full of jealousy; the wealthy are intoxicated with vanity; while others are in the hold of ignorance. Hence there is no other resource for one's literary talents save that of their being suffocated within one's own self.
न संसारोत्पन्नं चरितमनुपर्यामि कुशलं । विपाकः पुण्यानां जनयति भयं मे विमृशतः ॥ महद्भिः पुण्यो वैश्चिपरिगृहीताश्च विषया । महान्तो जायन्ते व्यसनमिव दातुं विषयिणाम् ॥३॥
मुझे संसारी कामोंमें जरा सुख नहीं दीखता। मेरी रायमें तो पुण्यफल भी भयदायक ही हैं। इसके सिवा, बहुतसे अच्छे-अच्छे पुण्यकर्म करनेसे जो विषय-सुखके सामान प्राप्त किये और चिरकाल
( ६ )
तक भोगे गये हैं, वे भी विषय-सुख चाहनेवालेको, अन्त समयमें, दुःखोंके ही कारण होते हैं ॥३॥
खुलासा ।
इस जीवनमें सुखका लेश भी नहीं है। जिनके पास अक्षय लक्ष्मी, धन-दौलत, गाड़ी-घोड़े, मोटर, नौकर-चाकर, रथ-पालकी प्रभृति सभी सुखके सामान मौजूद हैं, राजा भी जिनकी बातको टाल नहीं सकता, जिनके इशारोंसे ही लोगों का भला या बुरा हो सकता है, ऐसे सर्वसुख-सम्पन्न लोग भी, चाहे ऊपरसे सुखी दीखते हों, पर वास्तवमें सुखी नहीं हैं; भीतर-ही-भीतर उन्हें भी घुन खाये जाता है; किसी न किसी दुःखसे वे जर्जरित हुए जाते हैं। इस मौकेकी दो कहानियाँ हमें याद आई हैं। हम उन्हें दृष्टान्तके तौर पर यहाँ लिखते हैं :—
एक महात्मा अपने शिष्यके साथ किसी नगरमें गये। वहाँ उन्होंने देखा कि, एक साहूकार इन्द्रभवन जैसे मकानमें बैठता है, सैकड़ों सेवक आज़ापालनको तैयार खड़े हैं, जोड़ी-गाड़ी द्वारपर खड़ी हैं, हाथी झूम रहे हैं, सामने सोने चाँदी और हीरे पत्तोंके ढेर लग रहे हैं। महात्माको देखकर सेठने अपने एक कर्मचारीको उनको भोजन करानेकी आज्ञा दी। जब गुरु चेले भोजन करने बैठे, तब चेला बोला—“गुरु-जी ! आप कहते थे, संसारमें कोई भी सुखी नहीं है। देखिये,
( ० )
यह सेठ कैसा सुखी है ! इसे किस बातका अभाव है ? लक्ष्मी इसकी दासी हो रही है ।” गुस्से कहा—“जरा सन्न करो । हम पता लगाकर कुछ कह सकेंगे ।” महात्माने जब भोजन कर लिया, तब सेठसे कहा—“सेठजी ! परमात्माने आपको सभी सुख दिये हैं ।” सेठने रोकर कहा—“महाराज ! मेरे समान इस जगत्में कोई दुःखी नहीं है । सुखे परमात्माने धनैश्वर्य सब कुछ दिया है, पर पुत्र एक भी नहीं । पुत्र बिना, ये सुख बिना नमकके पदार्थकी तरह अलौने और बेखाद है । मेरा दिल रात-दिन जला करता है, कभी सुखकी नींद नहीं आती । मैं इसी सोचमें जला जाता हूँ कि, पुत्र बिना इस सम्यत्तिको कौन भोगेगा ?” सेठकी बातें सुनकर चेलेने कहा—“हाँ गुरुजी, आपकी बात राई-रत्ती सच है । संसारमें कोई भी सुखी नहीं । कोई किसी दुःख-से-दुःखी है तो कोई किसी दुःख से ।
और भी :—
किसी नगरमें एक साहूकार था । उसके यहाँ धन-दौलत की कमी न थी । उसका धन-भाण्डार कुबेरके समान अक्षय था । जिसके पास अनुल धन है, उसे किस पदार्थका अभाव है ? वह साहूकार सब तरहसे इन्द्रके समान स्वर्ग-सुख भोग रहा था । इसी बीचमें दैवयोगसे उसकी ही बीमार हो गयी । हर तरहकी उत्तम चिकित्सा होने पर भी उसके बचने की आशा न रही । सेठ रोने लगा । खीने कहा—“आप क्यों
( ८ )
रोते हैं? आप धनी हैं, आपके सैकड़ों विवाह हो सकते हैं। मेरे मरते ही आपकी दूसरी शादी फौर्न हो जायगी। दुःख मुझे है कि, मैंने जगत्में आकर कुछ भी सुख न देखा।” सेठ ने कहा—“अगर तुम मर गयीं, तो मैं हरगिज़ दूसरी शादी न करूँगा।” सेठानीने कहा—“क्यों बातें बनाते हो? मेरे चल बसते ही, आप ये सब बातें भूल जायँगे।” सेठने जोशमें आकर मोहसे अपनी लिंगेन्द्रिय काटकर फँक दी। दैवयोग से सेठानी उसी समयसे चढ़ी होने लगी और चन्द्र रोज़में हृष्ट-पुष्ट हो गयी। शरीर सुखी होने पर उसे पुष्ट्यकी दरकार होने लगी। सेठको निकम्मा देखकर उसने नौकर चाकरोंसे कुकर्म करना आरम्भ कर दिया। सेठ यह हाल देखकर दिन-रात कुट्टने और जलने लगा। इसी बीचमें एक दिन गुरु नानक, भाई मरदानके साथ, उस नगरीमें पहुँचे। भाई मरदानने उस सेठका सुबैश्वर्य देखकर कहा—“गुरुजी! आप कहा करते हैं कि, इस जगत्में सुखी कोई भी नहीं है। कहिये इस सेठको क्या दुःख है?” गुरु नानकने कहा—“मरदान! यह सेठ ऊपरसे सुखी दीखता है, पर भीतरसे किसी-न-किसी दुःखसे अवश्य दुःखी होगा। चलो, हम इससे पुछवा देते हैं।” गुरुजीने सेठसे बात-चीतको, तो सेठने कहा—“महाराज! सबमुत्र हो मुझे कोई दुःख न था; पर अब इस दुःखसे जल-जलकर स्नाक हुआ जाता हूँ।” यह सुन गुरुजी ने कहा—“मरदान! इस गृहस्थाश्रममें कोई भी सुखी नहीं।”
( ६ )
संसारी लोग धनवानोंको सुखी समझते हैं, पर धन अनर्थों का मूल है। धन बड़े-बड़े अनर्थोंसे जमा होता है और जमा होनेपर भी दुःखोंका ही कारण होता है। इसके कमामें कष्ट और इसके रखनेमें कष्ट। मतलब यह कि, इसमें सब तरह दुःख-ही-दुःख हैं। धन-लोभसे चोर मार डालते हैं। अगर मार भी नहीं डालते, तो धन हर ले जाते हैं, तब धनोको महा कष्ट होता है। धनीके पुत्र-पौत्र या अन्य रिश्तेदार धनीकी मरण-कामना करते रहते हैं। धनीको हज़ारों तरहकी चिन्तायें घेरते रहती हैं। फलों आदमीमें रूकम डूब जायगी ; अमुक दिसावरमें घाटा होनेका भय है इत्यादि चिन्ताओंमें वह जला करता है।
अनेक लोग राजाओंको सुखी समझते हैं ; पर राजाओं को ज़रा भी सुख नहीं। राज्य महा अनर्थोंका कारण है। राजाको सदा यह भय लगा रहता है कि, कहीं गुनीम चढ़ न आवे। चोरोंका भय रहता है कि, कहीं वे राजलक्ष्मीको हर न ले जावें। अपने सगे-सम्बन्धियोंका भय लगा रहता है कि, वे कहीं राज्य-लोभसे घोखेंमें मार न डालें। क्योंकि अनेक पुत्रों या भाइयोंने राज्य-लोभसे राजा-बादशाहोंको मार डाला है। दुर्घोषनने राज्य हड़पनेके लिये भीमको विष दिया था ; पाँचों पाण्डवोंको लाक्षाभवनमें जीते ही जलाना चाहा था ; कैकेयीने अपने पुत्रको राज्य दिलानेकी गरज़से रामचन्द्रजीको वनवासकी आज्ञा दी थी। राज्यके लिये ही सुधीवने बालिको मरवा डाला था। राज्यके लिये
( १० )
कंसने अपनी सगी बहन देवकीके नवजात पुत्रोंकी हत्या करवा डाली थी। औरदुःखेबने अपने भाइयोंको जानसे मरवा डाला और पूज्यपाद पिताको कैद कर दिया। इससे स्पष्ट है कि, राजाको भी सुख नहीं। राजा लोग भयके मारे कभी एक पलंग पर नहीं सोते। मखमली पलंग होने पर भी उन्हें सुख की नींद नहीं आती।
जिसके अतुल धन-सम्पत्ति है, वह खीके व्यक्ति-चारिणी होने या पुत्रके अभाव अथवा पुत्रके सुपुत्र न होनेसे दुःखी है। जो राजराजेश्वर है, वह राज्यके सदा बने रहनेकी चिन्ता से दुःखी है। जिसके खी-पुत्र प्रभूति हैं, वह उनके मरण हो जाने या वियोगसे दुःखी है। कोई जवानीके चले जाने और बुढ़ापेके आ जानेसे दुःखी है। कोई मौतका ख्याल करके दुःखी है। सारांश यह कि, संसारमें कोई भी सुखी नहीं। इस जीवनमें सुखका नाम भी नहीं।
संसारी सुख अनित्य हैं।
सांसारिक सुख-भोग असार, अनित्य और नाशमान् हैं। ये सदा ख़िर रहने वाले नहीं; आज जो लक्ष्मीका लाल है, वह कल दर-दरका भिखारी देखा जाता है; तो आज जवान-पट्टा है, मिर्जा अकड़बेगकी तरह अकड़ता हुआ चलता है, वही कल बुढ़ापेके मारे लकड़ी टेक-टेककर चलता है। जिसे पहले सब लोग खूबसूरत कहते थे और मुहन्तसे पास थिताते
( ११ )
ये, अब उसके पास खड़ा होना भी नहीं चाहते। मतलब यह है कि, यौवन, जीवन, मन, धन, शरीर-छाया और प्रभुता ये सब अनित्य और वञ्छल हैं; अतः दुःखके कारण हैं। काया में मरण, लाभमें हानि, जीतमें हार, सुन्दरतामें असुन्दरता, भोगमें रोग, संयोगमें वियोग और सुखमें दुःख—ये सब दुःख के कारण हैं। अगर बिना मृत्युका जीवन, बिना रङ्गकी खुशी, बिना बुढ़ापे की जवानी, बिना दुःखका सुख, बिना वियोगका संयोग और सदा-सर्वदा रहने वाला धन होता, तो मनुष्यको इस जीवनमें अवश्य सुख होता।
विषय-भोगोंमें सुख नहीं है। ये असार हैं; केलेके पत्ते या प्याज़के छिलकोंकी तरह सारहीन हैं। फिर भी, मोहवश मनुष्य विषयोंमें फँसा रहता है। पर एक-न-एक दिन मनुष्य को इन विषय-भोगोंसे अलग होना ही पड़ता है। अलग होने के समय विषय-भोगीको बड़ा दुःख होता है। इससे विषय परिणाममें दुःखदायी ही हैं।
इसके सिवा, तरह-तरहके पुण्य सञ्चय करने, यज्ञ-याग आदि करने अथवा दान करनेसे मनुष्यको स्वर्ग मिलता है। वहाँ वह अमृत पीता और अप्सराओंको भोगता है, कल्प-वृक्षसे मनवाञ्छित पदार्थ पाता है, पर पुण्य-कर्मके नाश हो जाने या उनके फल भोग चुकने पर वह स्वर्गसे नीचे गिरा दिया जाता है; उसे फिर इसी मृत्युलोकमें आना होता है। उस समय वह स्वर्ग-सुखोंकी याद कर-करके मन-ही-मन
( १२ )
सोता और दुःखी होता है। इसीसे मुझे वे पुण्य-फल भी भया- वह मालूम होते हैं। परिणाममें वे भी दुःखोंके ही कारण होते हैं। तात्पर्य यह कि, संसार मिथ्या और सारहीन है। इसके सुख-भोग अनित्य, चञ्चल और सदा न रहने वाले हैं। इसीसे दुःखके कारण हैं। मृत्युलोक और स्वर्गलोकमें कहीं भी प्राणीको सुख नहीं है।
शिक्षा—अगर मनुष्य दुःखोंसे दूर रहना चाहे, सदा सुख भोगना चाहे, तो उसे अनित्य और नाशमान् पदार्थोंसे अलग रहना चाहिये। उनमें मोह न रखना चाहिये। स्त्री, पुत्र, धन, यौवन और स्वाभिन्न प्रवृत्ति अनित्य हैं। ये आज हैं और सम्भव है कि, कल न रहे। स्त्री-पुत्र प्रवृत्ति नानेदार हमारे सदाके सङ्गी नहीं। आज ये और हम सरायके मुसाफिरों की तरह मिल गये हैं, पर उम्मीद नहीं कि, फिर कभी मिलें। आज इनसे संयोग हुआ है, तो कल इनसे वियोग अवश्य होगा। ये तो क्या—जिस कायाको हम सबसे ज़ियादा चाहते हैं, मलते हैं, घोते हैं, सजाते हैं, वह भी तो एक दिन हमसे अलग हो जायगी। एक क्षणमें जीवका जन्म होता है, दूसरे क्षण ही नाश हो जाता है। जो अज्ञानी ऐसे नाशमान् पदार्थोंसे राग करते हैं, उन्हें दुःखोंके गहरे खड्डमें गिरना ही होता है। इसलिये बुद्धिमान्को लोक-परलोककी असारता और संयोग-वियोगका विचार करके अनित्य पदार्थोंसे प्रेम न करना चाहिये। उसे सदा नित्य अविनाशी आत्मा या परमात्मासे प्रेम करना चाहिये। शरीर नाश हो जाता है ; स्त्री-पुत्र धन आदि नाश हो जाते हैं, पर परमात्माका कभी, किसी कालमें भी, नाश नहीं होता। यह जगत् मिथ्या नाशमान्, जड़ और दुःखमय है ; पर यह आत्मा—ब्रह्म—चेतन, नित्य और सुखमय है। इस देह रूपी देवमन्दिरमें आत्मा ही देवता है। यही आत्मा संसारके सभी प्राणियों
A high-contrast black and white photograph showing a hand holding the right edge of a blank, perforated page from a book. The page is mostly white with some faint, illegible markings or smudges. The hand is visible on the right side, with fingers gripping the edge of the page. The background is dark and out of focus.
वैराग्यशतक ॥ ३ ॥
धन के लिये मैंने ब्रह्मनेक उपाय किये, जमीन खोदी, समुद्र में गोते लगाये, धातुएं कुर्की, रात-रात भर श्रमदान में सन्न जपे,—पर हाय ! मुझे एक कानी कौड़ी भी न मिली !
( १३ )
में वर्त्तमान है। इसी आत्माका चिन्तन करो, तो सदा सच्चा सुख भोग करोगे ; पर आत्मचिन्तन करना सहज काम नहीं है। इसके लिये मनको वशमें करना होगा, उसे विषयोंसे हटाना होगा, उसे बुद्धिसे अलगकर एकाग्र करना होगा। जब चित्त एकाग्र होगा, तभी सफलता हो सकेगी।
I do not see a good end of the deeds done in this world, and when I consider deeply even acts of benevolence which might have lost their their usefulness after they have given the results, fill me with fear. The objects of pleasure which have been acquired by the accomplishment of meritorious deeds and after long sustained efforts, do only give anxiety and torture to the pleasure-seeking mortals when they have to part with them in the flag-end.
उत्सर्वात् निश्चिंशंकया चित्तिर्लं ध्याता गिरिधांतवो
निस्तीर्णाः सरितांपतिर्नृपतयो यत्नेन सतोपिताः ॥
मन्वाराधनत्वरणं मनसा नीताः रमशाने निशाः
प्रातः काण्वराटकोऽपि न मया तुष्येऽधुना मुञ्चभाम् ॥४॥
धन मिलनेकी उम्मीदसे, मैंने जमीनके पैदे तक खोद डाले ; अनेक प्रकारकी पार्वतीय धातुएँ झूँक डालीं ; मातियोंके लिये समुद्र की भी थाह ले आया ; राजाओंका राजी रखनेमें भी कोई बात उठा न रखी ; मन्त्रसिद्धिके लिये रात-रात भर रमशानमें एकाग्रचित्तसे बैठठा हुआ जप करता रहा ; पर अफ़सोसकी बात है, कि इतनी आफ़तें उठाने पर भी एक कानी कौड़ी न मिली। इसलिये हे तुष्ये ! अब तो तू मेरा पीछा छोड़ ॥४॥
( १४ )
यह जान-सुनकर, कि ज़मानमें धन है, मैंने ज़मीनको पैंहे तक खोद डाला, पर कुछ भी न मिला। रसायन सिद्ध करने या सोना-चाँदी बनानेके लिये, मैंने अनेक तरहकी धातुयें फूँक डालीं, पर रसायन न बनी। फिर मैंने यह जानकर, कि समुद्र रत्नोंको खान है—उसमें मोतियोंको इफ़्तरात है; मैं समुद्रमें भी घुसा और उसकी शाह ले आया, मगर कुछ हाथ न आया। फिर यह सोचकर, कि राजाओंकी सेवा करनेसे धन हाथ आता है; मैंने उनके सन्तुष्ट करनेकी भी भर-पूर चेष्टायें कीं; उन्हें सब तरह खुश किया, पर फिर भी धन हाथ न आया। शेषमें, मैंने मन्त्रसिद्धि करनी चाही, इसलिये मैं रात-रातभर अकेला मरघटमें मुर्दाके पास बैठकर मन्त्र जपता रहा, कि वशीकरण मन्त्र सिद्ध हो जाय और राजाओंको वश करके धन प्राप्त करूँ; पर यहाँ भी मुझे निराशाका ही सामना करना पड़ा। सारी चेष्टायें करनेपर भी एक फूटो कौड़ी न मिली! इसलिये हे तृष्णा! अब मैं निराश हो गया हूँ। मुझे सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार दीखता है। अब तो तू दया करके मेरा पीछा छोड़ दे !
इसका यही मतलब है कि, भाग्यके विरुद्ध चेष्टा करना बुथा है। जितना धन भाग्यमें लिखा है, उतना तो बिना कोशिश किये, बिना किसीको खुशामद किये, बिना देश-विदेश डोले, घर बैठे ही मिल जायगा। भाग्यके लिखेसे अधिक हज़ारों चेष्टायें करने पर भी न मिलेगा। सिकन्दर
( १५ )
अमृतके लिये अँधेरी दुनियामें गया ; पर अमृतके कुण्डके पास पहुँच जाने पर भी, वह अमृतको खव न सका ; क्योंकि उसके भाग्यमें अमृत न था। मूर्ख मनुष्य भाग्यपर सन्तोष नहीं करता ; धनके लिये मारा-मारा फिरता है। जब कुछ भी हाथ नहीं लगता, तब रोता और कलपता है। किसी कविने ठीक ही कहा है :—
कवित ।
जो कुछ विधाता तेरे लिख्यो ललाट-पाट,
ताही पर आपना आप अमल करले ।
सोनेका सुमेर भावे देख वार पर भीष्म,
घटै वंदै नहिं यह निश्चय जिय धारले ।
देवीदास कहै जोई होनहार सोई हवै है,
मनमें विचार रैन दिन अनुसर ले ।
वापी कूप सरिता भरे हैं सात सागर पै,
तू तो तेरे वासन-समान पानी भर ले ।
शिक्षा—हे मनुष्य ! यदि तू सुख-शान्तिसे जीवन यापन करना चाहता है, तो तृष्णा-विद्याचीके फन्देसे निकल कर भाग्य पर सन्तोष कर। सन्तोष के सिवा सुख-शान्ति लाभ करनेका और उपाय नहीं है। यदि सन्तोष न करेगा, तो तृष्णाके सारे भटक-भटक कर दारो उग्र बाँहों रँवा देगा, और अन्तमें कुछ हाथ भी न खींचेगा।