वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
११-राजा सुप्रतीककृत भगवान्की स्तुति तथा श्रीविग्रहमें लीन होना
गीताप्रेस, गोरखपुर
युगलछबि
अध्याय १० ] राजा दुर्जयके चरित्र-वर्णनके प्रसङ्गमें मुनिवर गौरमुखके आश्रमकी शोभाका वर्णन ३३
पर्वतपर चले गये।
इधर राजा दुर्जय भी राज्यके प्रबन्धमें लग गया। यद्यपि उसका राज्य विशाल था; फिर भी वह हाथी, घोड़े एवं रथ आदिसे युक्त चतुरङ्गिणी सेना सजाकर राज्य बढ़ानेकी चिन्तामें पड़ गया। राजा दुर्जय परम मेधावी था। उसने सम्यक् प्रकारसे विचार करके हाथी, घोड़े एवं रथपर बैठकर युद्ध करनेवाले वीरों तथा पैदल सैनिकोंसे अपनी सेना तैयार की और सिद्ध पुरुषों एवं महात्माजनोंद्वारा सेवित उत्तर दिशाके लिये प्रस्थान कर दिया। राजा दुर्जयने क्रमशः इसी प्रकार सम्पूर्ण भारतपर विजय प्राप्त करके किम्पुरुष नामक वर्षको भी जीत लिया। तदनन्तर उसने परवर्ती हरिवर्षमें भी अपनी विजय-पताका फहरा दी। फिर रम्यक, रोमावृत, कुरु, भद्राश्व और इलावृत नामसे प्रसिद्ध वर्षोंपर भी उसका शासन स्थापित हो गया। यह सारा स्थान सुमेरुपर्वतका मध्यवर्ती भाग है।
इस प्रकार जब राजा दुर्जयने सम्पूर्ण जम्बूद्वीपपर अपना अधिकार जमा लिया, तब वह देवताओंके सहित इन्द्रको भी जीतनेके लिये आगे बढ़ा। सुमेरुपर्वतपर जाकर उसने वहाँ अनेक देवता, गन्धर्व, दानव, गुह्यक, किंनर और दैत्योंको भी परास्त किया। तबतक ब्रह्मापुत्र नारदजीने दुर्जयकी विजयके विषयमें देवराज इन्द्रको सूचना दे दी। देवराज उसी क्षण लोकपालोंको साथ लेकर उसका वध करनेके लिये चल पड़े। किंतु जल्दी ही राजा दुर्जयके शस्त्रोंके सामने उन्होंने घुटने टेक दिये। तदनन्तर देवराज इन्द्र सुमेरुपर्वतको छोड़कर मर्त्यलोकमें आ बसे और पूर्वदिशामें वे लोकपालोंके साथ रहने लगे। राजा दुर्जयके चरित्रका विस्तारपूर्वक वर्णन आगे किया जायगा।
जब देवताओंने अपनी हार मान ली तो राजा दुर्जय वापस लौटा और लौटते समय गन्धमादन-पर्वतकी तलहटीमें उसने अपनी सेनाओंकी छावनी डाली। जब उसने छावनीकी सारी व्यवस्था कर ली, तब उसके पास दो तपस्वी आ पहुँचे। आते ही उन तपस्वियोंने दुर्जयसे कहा—'राजन्! तुमने सम्पूर्ण लोकपालोंका अधिकार छीन लिया है। अब उनके बिना लोकयात्रा चलनी सम्भव नहीं दीखती है, अतएव तुम ऐसी व्यवस्था करो, जिससे इस संसारको उत्तम सुखकी प्राप्ति हो।'
इस प्रकार तपस्वियोंके कहनेपर धर्मज्ञ राजा दुर्जयने उनसे कहा—'आप दोनों कौन हैं?' उन शत्रुदमन तपस्वियोंने कहा—'हम दोनों असुर हैं। हमारे नाम विद्युत और सुविद्युत हैं। महाराज दुर्जय! हम चाहते हैं कि अब तुम्हारे द्वारा सत्पुरुषोंके समाजमें सुसंस्कृत धर्म बना रहे; अतएव तुम हम दोनोंको लोकपालोंके स्थानपर नियुक्त कर दो। हम उनके सभी कार्य सम्पादन कर सकते हैं।' उनके ऐसा कहनेपर राजा दुर्जयने स्वर्गमें लोकपालोंके स्थानपर विद्युत और सुविद्युतकी तुरंत नियुक्ति कर दी। वे दोनों तपस्वी वहाँसे तत्काल अन्तर्धान हो गये।
एक बार राजा दुर्जय मन्दराचलपर्वतपर गया। वहाँ उसने कुबेरके अत्यन्त मनोरम वनको देखा। वह वन इतना सुन्दर था, मानो दूसरा नन्दनवन ही हो। राजा दुर्जय प्रसन्नतापूर्वक उस रमणीय विपिनमें घूमने लगा। इतनेमें एक चम्पकवृक्षके नीचे उसे दो सुन्दरी कन्याएँ दीख पड़ीं। देखनेमें उनका रूप अत्यन्त सुन्दर एवं अद्भुत था। उन कन्याओंको देखकर राजा दुर्जयका मन बड़े आश्चर्यमें पड़ गया। वह सोचने लगा—'ये सुन्दर नेत्रोंवाली कन्याएँ कौन हैं?' यों विचार करते हुए राजा दुर्जयको एक क्षण भी नहीं बीता होगा कि उसने देखा कि उस वनमें
१२-पितरोंका परिचय, श्राद्धके समयका निरूपण तथा पितृगीत
| ३४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १० |
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दो तपस्वी भी विराजमान हैं। उन्हें देखकर दुर्जयके मनमें अपार हर्ष उमड़ आया। उसने तुरंत हाथीसे उतरकर उन तपस्वियोंको प्रणाम किया। तपस्वियोंने राजा दुर्जयको बैठनेके लिये कुशाओंद्वारा निर्मित एक सुन्दर आसन दिया। राजा दुर्जय उसपर बैठ गया। उसके बैठ जानेपर तपस्वियोंने उससे पूछा—‘तुम कौन हो, तुम्हारा कहाँसे आगमन हुआ है, किसके पुत्र हो और यहाँ किस लिये आये हो?’ इसपर राजा दुर्जयने हँसकर उन तपस्वियोंको अपना परिचय देते हुए कहा—‘महानुभावो! सुप्रतीक नामसे प्रसिद्ध एक राजा हैं। मैं उनका पुत्र दुर्जय हूँ और भूमण्डलके सभी राजाओंको जीतनेकी इच्छासे यहाँ आया हुआ हूँ। कभी-कभी आप कृपा कर मुझे स्मरण अवश्य करें। तपोधनो! आप दोनों कौन हैं? मुझपर कृपा कर यह बतला दें।’
दोनों तपस्वी बोले—‘राजन्! हमलोग हेतृ और प्रहेतृ नामके स्वायम्भुव मनुके पुत्र हैं। हम देवताओंको जीतकर सर्वथा नष्ट कर देनेके विचारसे सुमेरुपर्वतपर गये थे। उस समय हमारे पास बड़ी विशाल सेना थी, जिसमें हाथी, घोड़े एवं रथ भरे हुए थे। देवता भी सैकड़ों एवं हजारोंकी संख्यामें थे। उनके पास महान् सेना भी थी; किंतु असुरोंके प्रहारसे उनके सभी सैनिक अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे। यह स्थिति देखकर देवता—क्षीरसागरमें, जहाँ भगवान् श्रीहरि शयन करते हैं—पहुँचे और उनकी शरणमें गये। वहाँ देवगण भगवान्को प्रणाम कर अपनी आप-बीती बातें यों सुनाने लगे—‘भगवन्! आप हम सभी देवताओंके स्वामी हैं। पराक्रमी असुरोंने हमारी सारी सेनाको परास्त कर दिया है। भयके कारण हमारे नेत्र कातर हो रहे हैं। अतः आप हमारी रक्षा करनेकी कृपा करें। केशव! पहले भी आपने देवासुर-संग्राममें क्रूरकर्मा कालनेमि एवं सहस्रभुजसे हमारी रक्षा की है। देवेश्वर! इस समय भी हमारे सामने वैसी ही परिस्थिति आ गयी है। हेतृ और प्रहेतृ नामके दो दानव देवताओंके लिये कण्टक बने हुए हैं। इनके सैनिकों तथा शस्त्रास्त्रोंकी संख्या असीम है। देवेश्वर! आपका सम्पूर्ण जगत्पर शासन है, अतः उन दोनों असुरोंको मारकर हम सभीकी रक्षा करनेकी कृपा करें।’
‘‘इस प्रकार जब देवताओंने भगवान् नारायणसे प्रार्थना की, तब वे जगत्प्रभु श्रीहरि बोले—‘उन असुरोंका संहार करनेके लिये मैं अवश्य आऊँगा।’ भगवान् विष्णुके यह कहनेपर देवता मन-ही-मन भगवान् जनार्दनका स्मरण करते हुए सुमेरु-पर्वतपर गये। वहाँ उनके चिन्तन करते ही सुदर्शनचक्र एवं गदा धारण किये हुए भगवान् नारायण हमलोगोंकी सेनाका भेदन करते हुए उसमें प्रविष्ट हो गये। उन सर्वलोकेश्वरने अपने योगैश्वर्यका आश्रय लेकर उसी क्षण अपने एकसे—दस, सौ, फिर हजार, लाख तथा करोड़ों रूप बना लिये। उन देवेश्वरके आते ही सेनामें जो भी महान् पराक्रमी वीर हमारे बलके सहारे लड़ रहे थे, वे अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। राजन्! अधिक क्या, उसी समय उनके प्राण-पखेरू उड़ गये। इस प्रकार विश्वरूप धारण करनेवाले भगवान् नारायणने अपनी योगमायासे हमारी सम्पूर्ण चतुरङ्गिणी सेनाका—जो हाथी, घोड़े, रथ एवं पैदल वीरों एवं ध्वजाओंसे भरी हुई थी, संहार कर डाला। बस, केवल हम दो दानवोंको बचे देखकर वे सुदर्शनचक्रधारी श्रीहरि अन्तर्धान हो गये। शार्ङ्ग धनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीहरिका ऐसा अद्भुत कर्म देखकर हम दोनोंने भी उन प्रभुकी आराधना करनेके लिये उनकी शरण ग्रहण कर ली। राजन्! राजा सुप्रतीक हमारे
अध्याय ११ ] राजा दुर्जयका चरित्र तथा नैमिषारण्यकी प्रसिद्धिका प्रसङ्ग ३५
मित्र थे और तुम उनके पुत्र हो। ये दोनों कन्याएँ हमारी पुत्री हैं। मुझ हेतूकी कन्याका नाम सुकेशी और इस प्रहेतूकी कन्याका नाम मिश्रकेशी है। इन्हें तुम अपनी अर्द्धाङ्गिनीके रूपमें स्वीकार करो।''
हेतूके इस प्रकार कहनेपर राजा दुर्जयने उन दोनों मङ्गलमयी कन्याओंके साथ विधिपूर्वक विवाह कर लिया। सहसा ऐसी दिव्य कन्याओंको प्राप्तकर दुर्जयके हर्षकी सीमा न रही। वह सैनिकोंके साथ अपनी राजधानीमें लौट आया। बहुत समयके बाद राजा दुर्जयके दो पुत्र हुए। सुकेशीसे जो बालक उत्पन्न हुआ, उसका नाम प्रभव पड़ा और मिश्रकेशीके पुत्रका नाम सुदर्शन रखा गया। राजा दुर्जय महान् वैभवशाली तो था ही, उसे परमश्रेष्ठ दो पुत्रोंकी प्राप्ति भी हो गयी। कुछ समयके पश्चात् वह राजा शिकार खेलनेके लिये जंगलमें गया। वहाँ जाकर उसने भयंकर जंगली जानवरोंको पकड़कर बाँधना शुरू कर दिया। इस प्रकार वनमें विचरण करते हुए राजा दुर्जयको जंगलमें कुटी बनाकर रहनेवाले एक पुण्यात्मा मुनि दिखायी पड़े। वे महाभाग मुनि तपस्या कर रहे थे। उनका नाम गौरमुख था। वे ऋषियोंके परिवारोंकी रक्षा तथा पापियोंके उद्धार-कार्यमें लगे रहते थे। उनके आश्रममें विशिष्ट गुणोंसे युक्त एक पवित्र सरोवर था। वहाँ एक ऐसा उत्तम वृक्ष भी था, जिसकी सुगन्धसे सारे वनका वायुमण्डल सुगन्धित हो उठता था। वे मुनि अपने आश्रममें स्थित होकर ऐसे जान पड़ते थे, मानो कोई मेघ उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर आकाशसे पृथ्वीपर उतर आया हो। मुनिवर गौरमुखके देदीप्यमान मुखसे छिटकता हुआ प्रकाश आकाशको जगमगा देता था। वे पवित्र वस्त्रोंसे सुशोभित थे। उनके शिष्योंकी मण्डली उच्चस्वरसे सामवेदका गान कर रही थी। उनके आश्रममें मुनि-कन्याएँ तथा मुनि-पत्नियां भी अत्यन्त सात्त्विक वेष धारण किये हुए थीं। सुन्दर पुष्पोंसे लदे हुए अगणित वृक्ष उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे। इस प्रकार उस आश्रममें मुनिवर गौरमुखकी यज्ञशाला अद्भुत शोभाको प्राप्त हो रही थी।
[ अध्याय १० ]
राजा दुर्जयका चरित्र तथा नैमिषारण्यकी प्रसिद्धिका प्रसङ्ग
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि ! उस समय मुनिवर गौरमुखके परम उत्तम आश्रमको देखकर राजा दुर्जयने सोचा—'इस परम मनोहर आश्रममें चलूँ और इसमें रहनेवाले अनुपम ऋषियोंके दर्शन करूँ।' यह विचार करके राजा दुर्जय आश्रमके भीतर चले गये। मुनिवर गौरमुख धर्मके साक्षात् स्वरूप थे। आश्रममें राजा दुर्जयके आनेपर मुनिका हृदय आनन्दसे भर उठा। उन्होंने राजाका भलीभाँति सम्मान किया। स्वागत-सत्कारके पश्चात् परस्पर कुछ वार्तालाप प्रारम्भ हुआ। मुनिवरने कहा—'महाराज! मैं यथाशक्ति अनुयायियोंसहित आपको भोजन-पान कराऊँगा। आप हाथी, घोड़े आदि वाहनोंको मुक्त कर दें और यहाँ पधारें।'
ऐसा कहकर मुनिवर गौरमुख मौन हो गये। मुनिके प्रति श्रद्धा होनेसे राजा दुर्जयके मनमें भी आतिथ्य स्वीकार करनेकी बात जँच गयी। अतः अनुचरोंके साथ वे वहीं रह गये। उनके पास पाँच अक्षौहिणी सेना थी। राजा दुर्जय सोचने लगे—'ये तपस्वी ऋषि मुझे यहाँ क्या भोजन देंगे?' इधर राजाको भोजनके लिये निमन्त्रित करनेके पश्चात् विप्रवर गौरमुख भी बड़ी चिन्तामें पड़ गये। वे सोचने लगे—'मैं अब राजाको क्या
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खिलाऊँ ?' महर्षि गौरमुख निरन्तर भगवद्भावमें तल्लीन रहते थे। अतएव उनके मनमें चिन्ता उत्पन्न होनेपर उन्हें देवेश्वर जगत्प्रभु भगवान् नारायणकी याद आयी। मन-ही-मन उन्होंने भगवान् नारायणका स्मरण किया और गङ्गाके तटपर जाकर उन जगदीश्वर प्रभुकी स्तुति करने लगे।
पृथ्वीने पूछा—भगवन्! विप्रवर गौरमुखने भगवान् विष्णुकी किस प्रकार स्तुति की, इसको सुननेके लिये मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है।
भगवान् वराह बोले—पृथ्वि! गौरमुखने भगवान्की इस प्रकार प्रार्थना की—जो पीताम्बर धारण करते हैं, आदिरूप हैं तथा जलके रूपमें जो अभिव्यक्त होते हैं, उन सनातन भगवान् विष्णुको मेरा बारंबार नमस्कार है। जो घट-घट-वासी हैं, जलमें शयन करते हैं, पृथ्वी, तेज, वायु एवं आकाश आदि महाभूत जिनके स्वरूप हैं, उन भगवान् नारायणको मेरा बारंबार नमस्कार है। भगवन्! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके आराध्य और सबके हृदयमें स्थित हैं, अन्तर्यामी परमात्माके रूपमें विराजमान हैं। आप ही ॐकार तथा वषट्कार हैं। प्रभो! आपकी सत्ता सर्वत्र विद्यमान है। आप समस्त देवताओंके आदिकारण हैं, पर आपका आदि कोई नहीं है। भगवन्! भूः, भुवः, स्वः, जन, मह, तप और सत्य—ये सभी लोक आपमें स्थित हैं। अतः चराचर जगत् आपमें ही आश्रय पाता है। आपसे ही सम्पूर्ण प्राणिसमुदाय, चारों वेदों तथा सभी शास्त्रोंकी उत्पत्ति हुई है। यज्ञ भी आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। जनार्दन! पेड़-पौधे, वनौषधियाँ, पशु-पक्षी और सर्प—इन सबकी उत्पत्ति आपसे ही हुई है। देवेश्वर! यह दुर्जय नामका राजा मेरे यहाँ अतिथिरूपसे प्राप्त हुआ है। मैं इसका आतिथ्यसत्कार करना चाहता हूँ। भगवन्! आप देवताओंके भी आराध्य और जगत्के स्वामी हैं, मैं नितान्त निर्धन हूँ। फिर भी आपसे मेरी भक्ति और विनयपूर्ण प्रार्थना है कि आप मेरे यहाँ अन्न आदि भोज्य पदार्थोंका संचय कर दें। मैं अपने हाथसे जिस-जिस वस्तुका स्पर्श करूँ और आँखसे जिस-जिस पदार्थको देख लूँ, वह चाहे काठ अथवा तृण ही क्यों न हो, वह तत्काल चार प्रकारके सुपक्व अन्नके रूपमें परिणत हो जाय। परमेश्वर! आपको मेरा नमस्कार है। भगवन्! इसके अतिरिक्त यदि मैं किसी दूसरे पदार्थका भी मनमें चिन्तन करूँ तो वह सब-का-सब मेरे लिये सद्यः प्रस्तुत हो जाय।*
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! इस प्रकार जब मुनिवर गौरमुखने जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरिकी स्तुति की तो वे अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उन महाभाग केशवने अपना श्रेष्ठ रूप गौरमुखको
* नमोऽस्तु विष्णवे नित्यं नमस्ते पीतवाससे। नमस्ते चाद्यरूपाय नमस्ते जलरूपिणे ॥
नमस्ते सर्वसंस्थाय नमस्ते जलशायिने। नमस्ते क्षितिरूपाय नमस्ते तैजसात्मने ॥
नमस्ते वायुरूपाय नमस्ते व्योमरूपिणे। त्वं देवः सर्वभूतानां प्रभुस्त्वमसि हृच्छयः ॥
त्वमोंकारो वषट्कारः सर्वत्रैव च संस्थितः। त्वमादिः सर्वदेवानां तव चादिर्न विद्यते ॥
त्वं भूस्त्वं च भुवः स्वस्त्वं जनस्त्वं च महः स्मृतः। त्वं तपस्त्वं च सत्यं च त्वयि देव चराचरम् ॥
त्वत्तो भूतमिदं सर्वं विश्वं त्वत्तो ऋगादयः। त्वत्तः शास्त्राणि जातानि त्वत्तो यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ॥
त्वत्तो वृक्षा वीरुधश्च त्वतः सर्वा वनौषधिः। पशवः पक्षिणः सर्पास्त्वत्त एव जनार्दन ॥
ममापि देवदेवेश राजा दुर्जयसंज्ञितः। आगतोऽभ्यागतस्तस्य चातिथ्यं कर्तुमुत्सहे ॥
तस्य मे निर्धनस्याद्य देवदेव जगत्पते। भक्तिनम्रस्य देवेश कुरुष्वानादिसंचयम् ॥
यं यं स्पृशामि हस्तेन यं च पश्यामि चक्षुषा। काष्ठं वा तृणकन्दं वा तत्तदन्नं चतुर्विधम् ॥
तथा त्वन्यतमं वापि यद्ध्यायं मनसा मया। तत्सर्वं सिद्ध्यतां मह्यं नमस्ते परमेश्वर ॥
(अध्याय ११। ११—२१)
१३-श्राद्ध-कल्प
अध्याय ११ ] राजा दुर्जयका चरित्र तथा नैमिषारण्यकी प्रसिद्धिका प्रसङ्ग [ ३७
प्रत्यक्ष दिखलाया और कहा—‘विप्रवर! जो चाहो, वर माँग लो।’ यह सुनकर मुनिने ज्यों ही अपने नेत्र खोले, त्यों ही उनको भगवान् श्रीहरिके परम आश्चर्यमय रूपका दर्शन हुआ। उन्होंने देखा भगवान् जनार्दन अपने हाथोंमें गदा और शङ्ख लिये हुए हैं और उनका श्रीविग्रह पीताम्बरसे सुशोभित है। वे गरुडपर बैठे हुए हैं और तेजस्वी तो इतने हैं कि बारह सूर्योंका प्रकाश भी उनके सामने कुछ भी नहीं है। अधिक क्या, यदि आकाशमें एक हजार सूर्य एक साथ उदित हो जायें तो कदाचित् उनका वह प्रकाश उन विश्वरूप परमात्माके प्रकाशके सदृश हो जाय! अनेक रूपोंमें विभक्त सम्पूर्ण जगत् उन श्रीहरिके श्रीविग्रहमें एकाकार रूपमें स्थित था। देवि! भगवान् श्रीहरिके ऐसे अद्भुत रूपको देखते ही मुनिवर गौरमुखके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। मुनिने उनको सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहने लगे—‘भगवन्! अब मुझे आपसे किसी प्रकारके वरकी इच्छा शेष नहीं रह गयी है। मैं केवल यही चाहता हूँ कि इस समय राजा दुर्जयको जिस-किसी भी भाँति मेरे आश्रमपर अपने सैनिकों एवं वाहनोंके साथ भोजन प्राप्त हो जाय। कल तो वह अपने घर चला ही जायगा।’
इस प्रकार मुनिवर गौरमुखके प्रार्थना करनेपर देवेश्वर श्रीहरि द्रवित हो गये और चिन्तन करनेमात्रसे सिद्धि प्रदान करनेवाला एक महान् कान्तिमान् ‘चिन्तामणि’रत्न उन्हें देकर वे अन्तर्धान हो गये। इधर गौरमुख भी अपने अनेक ऋषि-महर्षियोंसे सेवित पवित्र आश्रममें पधारे। वहाँ पहुँचकर मुनिने उस ‘चिन्तामणि’के सम्मुख विशाल प्रासाद एवं हिमालयके शिखर तथा महान् मेघके समान ऊँचे एवं चन्द्र-किरणोंके सदृश चमकसे युक्त सैकड़ों तलोंके महलका चिन्तन किया। फिर तो एककी कौन कहे, हजारों एवं करोड़ोंकी संख्यामें वैसे विशाल भवन तैयार हो गये। कारण, गौरमुखको भगवान् श्रीहरिसे वर मिल चुका था। महलोंके आस-पास चहारदीवारियाँ बन गयीं। उनके बगलमें सटे ही उपवन उन महलोंकी शोभा बढ़ाने लगे। उन उद्यानोंमें कोकिलें तथा अनेक प्रकारके पक्षी भी आ बसे। चम्पा, अशोक, जायफल और नागकेसर आदि अनेक प्रकारके बहुत-से वृक्ष उन उद्यानोंमें सब ओर दृष्टिगत होने लगे। हाथियोंके लिये हथसार तथा घोड़ोंके लिये घुड़सारका निर्माण हो गया। इन सबका संचय हो जानेपर गौरमुखने सब प्रकारके भोज्य पदार्थोंका चिन्तन किया। फिर उस मणिने भक्ष्य, भोज्य, लेह्य एवं चोष्य प्रभृति अनेक प्रकारके अन्न तथा परोसनेके लिये बहुत-से स्वर्ण-पात्र भी प्रस्तुत कर दिये। ऐसी सूचना मुनिवर गौरमुखको मिल गयी। तब उन्होंने परम तेजस्वी राजा दुर्जयसे कहा—‘महाराज! अब आप अपने सैनिकोंके साथ महलोंमें पधारें।’ मुनिकी आज्ञा पाकर राजा दुर्जयने उस परम विशाल गृहमें प्रवेश किया, जो पर्वतके समान ऊँचा जान पड़ता था। राजाके भीतर चले जानेपर अन्य सेवकगण भी यथाशीघ्र अपने-अपने गृहोंमें प्रविष्ट हो गये।
तदनन्तर जब सब-के-सब महलमें चले गये, तब फिर मुनिवर गौरमुखने उस दिव्य चिन्तामणिको हाथमें लेकर राजा दुर्जयसे कहा—‘राजन्! यदि अब आप स्नान-भोजन करना चाहते हों तो मैं दास-दासियोंको आपकी सेवामें भेज दूँ।’ इस प्रकार कहकर द्विजवर गौरमुखने राजाके देखते-देखते ही भगवान् विष्णुसे प्राप्त ‘चिन्तामणि’को एकान्त स्थानमें स्थापित किया। शुद्ध एवं प्रभापूर्ण उस चिन्तामणिके वहाँ रखते-न-रखते हजारों दिव्य रूपवाली स्त्रियाँ प्रकट हो गयीं। उन स्त्रियोंके
३८ संक्षिप्त श्रीवराहपुराण [ अध्याय ११
सभी अङ्ग बड़े सुन्दर, सुकुमार तथा अनुलेपनोंसे अलङ्कृत थे। उनके कपोल, केश और आँखें बड़ी सुन्दर थीं। वे सोनेके पात्रोंको लेकर चल पड़ीं। इसी प्रकार कार्य करनेमें कुशल अनेकों पुरुष भी एक साथ ही राजा दुर्जयकी सेवाके लिये अग्रसर हुए। अब तुरही आदि अनेक प्रकारके बाजे बजने लगे। जिस समय राजा दुर्जय स्नान करने लगे तो कुछ स्त्रियाँ इन्द्रके स्नानकालके समान ही उनके सामने भी नाचने और गाने लगीं। इस प्रकार दिव्य उपचारोंके साथ महाभाग दुर्जयका स्नानकार्य सम्पन्न हुआ।
अब राजा दुर्जय बड़े आश्चर्यमें पड़ गया। वह सोचने लगा—‘अहो! यह मुनिकी तपस्याका प्रभाव है अथवा इस चिन्तामणिका ?' फिर उसने स्नान किया, उत्तम वस्त्र पहने और भाँति-भाँतिके अन्नोंसे बने भोजनको ग्रहण किया। उस समय मुनिवर गौरमुखने जिस प्रकार राजा दुर्जयकी सेवा एवं सत्कार किया, वैसे ही वे राजाके सेवकोंकी सेवामें भी संलग्न रहे। राजा अपने सेवकों, सैनिकों और वाहनोंके साथ भोजनपर बैठा ही था कि इतनेमें भगवान् भास्कर अस्ताचलको पधारे। आकाश लाल हो गया। अब शरद् ऋतुके स्वच्छ चन्द्रमासे मण्डित रात्रि आयी। ऐसा जान पड़ता था, मानो सभी श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न रोहिणीनाथ उस रात्रिसे अनुराग कर रहे हों। उनके साथ ही हरित किरणोंसे युक्त शुक्र और बृहस्पति भी उदित हो गये। पर चन्द्रमाके साथ उनकी शोभा अधिक नहीं हो रही थी। क्योंकि प्राणियोंकी ऐसी धारणा है कि दूसरेके पक्षमें गया हुआ कोई भी व्यक्ति अपने भिन्न स्वभावके कारण शोभा नहीं पाता। चन्द्रमाकी चमकती हुई किरणें सबको प्रसन्न करनेमें पूर्ण समर्थ हैं; किंतु उनसे भी सभी प्रेम नहीं करते।
अब तक उन नरेशके सभी सेवक एवं वे स्वयं भी भोजन-वस्त्र और आभूषणोंसे सत्कृत हो चुके थे। अब उनके सोनेके लिये बहुत-से रत्नजटित पलंग भी भिन्न-भिन्न कक्षोंमें उपस्थित हो गये। उनपर सुन्दर गद्दे और चादरें भी बिछी थीं। अपने हाव-भावसे प्रसन्न करनेवाली मनोहारिणी दिव्य स्त्रियाँ भी वहाँ सपर्याके लिये तत्पर थीं। राजा दुर्जय उस महलमें गया। साथ ही अपने भृत्योंको भी जानेकी आज्ञा दी। जब सभी महलोंमें चले गये, तब वह प्रतापी राजा भी स्त्रियोंसे घिरा सुखपूर्वक शयन करनेवाले इन्द्रकी तरह सो गया।
इस प्रकार महात्मा गौरमुखके स्वागत-सत्कारसे प्रभावित, परम प्रसन्न राजा तथा उनके सभी सेवक सो गये। रात बीत जानेपर राजा दुर्जयने जगकर जब नेत्र खोले तो वे सुन्दर स्त्रियाँ, सभी बहुमूल्य महल तथा उत्तम-उत्तम पलंग सब-के-सब लुप्त हो गये थे। यह स्थिति देखकर दुर्जयको बड़ा आश्चर्य हुआ। मनमें चिन्ताके बादल उमड़ आये और दुःखकी लहरें उठने लगीं। यह मणि कैसे प्राप्त हो, इस प्रकारकी चिन्ताकी लहरियाँ उसके मनमें बार-बार उठने लगीं। अन्तमें उसने निश्चय किया कि इस गौरमुख ब्राह्मणकी यह मणि मैं हठपूर्वक छीन लूँ। फिर वहाँसे चलनेके लिये सबको आज्ञा दे दी। जब मुनिके आश्रमसे निकलकर वह थोड़ी दूर गया और उसके वाहन तथा सैनिक सभी बाहर चले आये, तब दुर्जयने विरोचन नामके अपने मन्त्रीको मुनिके पास भेजकर कहलवाया कि गौरमुखके पास जो मणि है, उसे वे मुझे दे दें। मन्त्रीने मुनिसे कहा—‘रत्नोंके रखनेका उचित पात्र राजा ही होता है, इसलिये यह मणि आप राजा दुर्जयको दे दें।' मन्त्रीके ऐसा कहनेपर गौरमुखने क्रोधमें आकर उससे कहा—'मन्त्री! तुम उस दुराचारी राजा दुर्जयसे स्वयं मेरी बात
अध्याय ११ ] राजा दुर्जयका चरित्र तथा नैमिषारण्यकी प्रसिद्धिका प्रसङ्ग [ ३९
कह दो। साथ ही मेरा यह भी संदेश कहना—‘अरे दुष्ट! तू अभी यहाँसे भाग जा, क्योंकि यह स्थान दुर्जय-जैसे दुष्टोंके रहने योग्य नहीं है।’
इस प्रकार द्विजवर गौरमुखके कहनेपर दुर्जयका मन्त्री विरोचन, जो दूतका काम कर रहा था, राजाके पास गया और ब्राह्मणकी कही हुई सारी बातें उसे अक्षरशः सुना दीं। गौरमुखके वचन सुनते ही दुर्जयकी क्रोधाग्नि भभक उठी। उसने उसी क्षण नील नामक मन्त्रीसे कहा—‘तुम अभी जाओ और चाहे जैसे भी हो उस ब्राह्मणसे मणि छीनकर शीघ्र यहाँ आ जाओ।’
इसपर नील बहुत-से सैनिकोंको साथ लेकर गौरमुखके आश्रमकी ओर चल पड़ा। फिर वह रथसे नीचे उतरकर जमीनपर आया। तदनन्तर अग्निशालामें पहुँचकर उसने मणिको रखे हुए देखा। परम दारुण क्रूर-बुद्धि नीलके पृथ्वीपर उतरते ही उस मणिसे भी अस्त्र-शस्त्र लिये हुए अपरिमित शक्तिशाली असंख्य शूर-वीर निकल पड़े, जो रथ, ध्वजा और घोड़ोंसे सुसज्जित थे तथा ढाल, तलवार, धनुष और तरकस लिये हुए थे। (भगवान् वराह कहते हैं—) परम भाग्यवति पृथ्वि! उनमें पंद्रह तो प्रमुख वीर सेनापति थे, जिनके नाम इस प्रकार हैं—सुप्रभ, दीप्ततेजा, सुरश्मि, शुभदर्शन, सुकान्ति, सुन्दर, सुन्द, प्रद्युम्न, सुमन, शुभ, सुशील, सुखद, शम्भु, सुदान्त और सोम। इन वीर पुरुषोंने विरोचनको बहुत-सी सेनाके साथ डटा देखा। तब ये सभी शूर-वीर अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर बड़ी सावधानीसे युद्ध करने लगे। उनके धनुष सुवर्णके समान देदीप्यमान थे। उनके पङ्कधारी बाण शुद्ध सोनेसे बने हुए थे। अब वे परम प्रसिद्ध तथा अत्यन्त भयंकर तलवारों एवं त्रिशूलोंसे प्रहार करने लगे। उस युद्धमें विरोचनके रथ, हाथी, घोड़े और पैदल लड़नेवाले सैनिकोंके आगे मणिसे प्रकट हुए वीरोंके रथ, हाथी, घोड़े एवं पदाति सैनिक डट गये और उनमें भयंकर द्वन्द्वयुद्ध छिड़ गया। छल-बल आदि अनेक प्रकारके युद्धोंके बावजूद विरोचनके सैनिक भयसे कम्पित हो उठे और वे भाग चले। घोर रक्तप्रवाहसे मार्ग बड़े भयंकर हो गये। दुर्जयके मन्त्री विरोचनकी तो जीवन-लीला ही समाप्त हो गयी। उसके बहुतसे अनुयायी भी सैनिकोंसहित यमराजके लोकको प्रस्थान कर गये।
मन्त्री विरोचनके मर जानेपर अब स्वयं राजा दुर्जय चतुरङ्गिणी सेना लेकर युद्धक्षेत्रमें आया और मणिसे प्रकट हुए शूर-वीरोंके साथ उसका युद्ध प्रारम्भ हो गया। इस युद्धमें राजा दुर्जयकी सैन्यशक्तिका भयंकर विनाश हुआ। इधर हेतु और प्रहेतुको खबर मिली कि मेरा जामाता दुर्जय संग्राममें लड़ रहा है तो वे दोनों असुर भी एक विशाल सेनाके साथ वहाँ आ गये। उस युद्धभूमिमें जो पंद्रह प्रमुख मायावी दैत्य आये थे, उनके नाम सुनो—प्रघस, विघस, संघ, अशनिप्रभ, विद्युतप्रभ, सुघोष, भयंकर, उन्मत्ताक्ष, अग्निदत्त, अग्नितेज, बाहु, शक्र, प्रतर्दन, विरोध और भीमकर्मा विप्रचित्ति। इनके पास भी उत्तम अस्त्र-शस्त्रोंका संग्रह था। प्रत्येक वीरके साथ एक-एक अक्षौहिणी सेना थी। ये सभी दुष्ट दुर्जयकी ओरसे युद्धभूमिमें डटकर मणिसे प्रकट हुए वीरोंके साथ लड़नेके लिये उद्यत हो गये। सुप्रभने तीन बाणोंसे विघसको बींध डाला और सुरश्मिने दस बाणोंसे प्रघसको। उस मोर्चेपर सुदर्शनके पाँच बाणोंसे अशनिप्रभके अङ्ग छिद गये। इसी प्रकार सुकान्तिने विद्युतप्रभको तथा सुन्दरने सुघोषको धराशायी कर डाला। सुन्दने अपने शीघ्रगामी पाँच बाणोंसे उन्मत्ताक्षपर प्रहार किया। साथ ही चमचमाते हुए
| ४० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १२ |
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बाणोंसे शत्रुके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। इस प्रकार सुमनका अग्निदत्तसे, सुवेदका अग्नितेजसे, सुनलका बाहु एवं शक्रसे तथा सुवेदका प्रतर्दनसे युद्ध छिड़ गया।
यों अपने अस्त्र-शस्त्रोंकी कुशलता दिखाते हुए सैनिक आपसमें युद्ध करने लगे, पर अन्तमें मणिसे प्रकट हुए योद्धाओंके हाथ सभी दैत्य मार डाले गये। अब मुनिवर गौरमुख भी हाथमें कुशा आदि लिये वनसे आश्रममें पहुँचे। दुर्जय अब भी बहुतसे सैनिकोंके साथ खड़ा था। यह देखकर गौरमुख आश्रमके दरवाजेपर रुक गये और मन-ही-मन विचार करने लगे—'अहो, इस मणिके कारण ही यह सब कुछ हुआ और हो रहा है। अरे! यह भयंकर संग्राम इस मणिके लिये ही आरम्भ हुआ है।'
इस प्रकार सोचते-सोचते मुनिवर गौरमुखने देवाधिदेव भगवान् श्रीहरिका स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही पीताम्बर धारण किये हुए भगवान् नारायण गरुडपर विराजमान हो मुनिके सामने प्रकट हो गये और बोले—'कहो ! मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ?' तब मुनिवर गौरमुखने हाथ जोड़कर पुरुषोत्तम भगवान् श्रीहरिसे कहा—'प्रभो ! आप इस पापी दुर्जयको इसकी सेनाके सहित मार डालें।' मुनिके ऐसा कहते ही अग्निके समान प्रज्वलित भगवान्के सुदर्शनचक्रने सेनासहित दुर्जयको भस्म कर डाला। यह सब कार्य एक निमेषके भीतर—पलक मारते सम्पन्न हो गया। फिर भगवान्ने गौरमुखसे कहा—'मुने! इस वनमें दानवोंका परिवार एक निमेषमें ही नष्ट हो गया है। अतः इस स्थानकी 'नैमिषारण्य-क्षेत्र' के नामसे प्रसिद्धि होगी। इस तीर्थमें ब्राह्मणोंका समुचित निवास होगा। इस वनके भीतर मैं यज्ञपुरुषके रूपमें निवास करूँगा। ये पंद्रह दिव्य पुरुष, जो मणिसे प्रकट हुए हैं, सत्ययुगमें याज्य नामसे विख्यात राजा होंगे।'
इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये और मुनिवर गौरमुख भी अपने आश्रममें आनन्दपूर्वक निवास करने लगे।
[ अध्याय ११ ]
राजा सुप्रतीककृत भगवान्की स्तुति तथा श्रीविग्रहमें लीन होना
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! जब राजा सुप्रतीकने इतने बली पुरुषोंके चक्रकी आगमें भस्म होनेकी बात सुनी तो उनके सर्वाङ्गमें चिन्ता व्याप्त हो गयी और वे सोचमें पड़ गये। फिर सहसा उनके अन्तःकरणमें आध्यात्मिक ज्ञानका उदय हो गया। उन्होंने सोचा—'चित्रकूट पर्वतपर भगवान् विष्णु, जो राघवेन्द्र 'श्रीराम' नामसे कहे जाते हैं, अत्यन्त विख्यात हैं। अब मैं वहीं चलूँ और भगवान्के नामोंका उच्चारण करते हुए उनकी स्तुति करूँ।' मनमें ऐसा निश्चय कर राजा सुप्रतीक परम पवित्र चित्रकूट पर्वतपर पहुँचे और भगवान्की इस प्रकार स्तुति करने लग गये।
राजा सुप्रतीक बोले—जो राम नरनाथ, अच्युत, कवि, पुराण, देवताओंके शत्रु असुरोंका नाश करनेवाले, प्रभव, महेश्वर, प्रपन्नार्तिहर एवं श्रीधर नामसे सुप्रसिद्ध हैं, उन मङ्गलमय भगवान् श्रीहरिको मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ। प्रभो! पृथ्वीमें (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध—इन) पाँच प्रकारसे, जलमें (शब्द, स्पर्श रूप, रस—इन) चार प्रकारसे, अग्निमें (शब्द, स्पर्श और रूप—इन) तीन प्रकारसे, वायुमें (शब्द एवं स्पर्श—इन) दो प्रकारसे तथा आकाशमें केवल शब्दरूपसे
अध्याय १२ ] राजा सुप्रतीककृत भगवान्की स्तुति तथा श्रीविग्रहमें लीन होना ४१
विराजनेवाले परम पुरुष एकमात्र आप ही हैं। सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि तथा यह सारा संसार आपका ही रूप है—आपसे ही यह विश्व प्रकट होता तथा आपमें ही लीन हो जाता है—ऐसा शास्त्रोंका कथन है। आपका आश्रय पाकर विश्व आनन्दका अनुभव करता है। इसीलिये तो समस्त संसारमें आपकी 'राम'नामसे प्रतिष्ठा हो रही है। भगवन्! यह संसार-समुद्र भयंकर दुःखरूपी तरङ्गोंसे व्याप्त है। इस भयंकर समुद्रमें इन्द्रियाँ ही घड़ियाल और नाक आदि क्रूर जल-जन्तु हैं। पर जिस मनुष्यने आपके नामस्मरणरूपी नौकाका आश्रय ले लिया है, वह इसमें नहीं डूबता। अतएव संतलोग तपोवनमें आपके राम-नामका स्मरण करते हैं। प्रभो! वेदोंके नष्ट होनेपर आपने मत्स्यावतार धारण किया। विभो! प्रलयके अवसरपर आप अत्यन्त प्रचण्ड अग्निका रूप धारण कर लेते हैं, जिससे सारी दिशाएँ भस्ममय रूपसे रञ्जित हो जाती हैं। माधव! समुद्र-मन्थनके समय युग-युगमें आप ही स्वयं कच्छपके रूपसे पधारे थे। भगवन्! आप जनार्दन नामसे विख्यात हैं। जब आपकी तुलना करनेवाला दूसरा कोई कहीं भी नहीं मिला तो आपसे अधिककी बात ही क्या है। महात्मन्! आपसे यह सम्पूर्ण संसार, वेद एवं समस्त दिशाएँ ओत-प्रोत हैं। आप आदिपुरुष एवं परमधाम हैं। फिर आपके अतिरिक्त मैं दूसरे किसकी शरणमें जाऊँ। सर्वप्रथम केवल आप ही विराजमान थे। इसके बाद महत्तत्त्व, अहंतत्त्वमय जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन-बुद्धि एवं सभी गुण—इनका भी क्रमशः आविर्भाव हुआ। आपसे ही इन सबकी उत्पत्ति हुई है। मेरी समझसे आप सनातन पुरुष हैं। यह अखिल विश्व आपसे भलीभाँति विरचित एवं विस्तृत है। सम्पूर्ण संसारपर शासन करनेवाले प्रभो! विश्व आपकी मूर्ति है।
आप हजार भुजाओंसे शोभा पाते हैं। ऐसे देवताओंके भी आराध्य आप प्रभुकी जय हो। परम उदार भगवन्! आपके 'राम'रूपको मेरा नमस्कार है।
राजा सुप्रतीकके स्तुति करनेपर प्रभु प्रसन्न हो गये। भगवान्ने अपने स्वरूपका इस प्रकार उन्हें दर्शन कराया और कहा—'सुप्रतीक! वर माँगो।' श्रीहरिकी अमृतमयी वाणी सुनकर एक बार राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ। फिर उन देवाधिदेव प्रभुको प्रणाम कर वे बोले—'भगवन्! आपका जो यह सर्वोत्तम विग्रह है, इसमें मुझे स्थान मिल जाय—आप मुझे यह वर देनेकी कृपा करें।' इस प्रकारकी बातें समाप्त होते ही महाराज सुप्रतीककी चित्तवृत्ति भगवान् गदाधरकी दिव्यमूर्तिमें लग गयी। ध्यानस्थ होकर वे भगवान्के नामोंका उच्चारण करने लगे। फिर उसी क्षण अपने अनेक उत्तम कर्मोंके प्रभावसे वे पाञ्चभौतिक शरीर छोड़कर श्रीहरिके विग्रहमें लीन हो गये।
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! तुम्हारे सामने मैंने इस समय जिसे प्रस्तुत किया है, वह यह वराहपुराण बहुत प्राचीन है। पूर्व सत्ययुगमें मैंने ब्रह्माजीको इसका उपदेश किया था। यह उसीका एक अंश है। कोई हजारों मुखोंसे भी इसे कहना चाहे तो नहीं कह सकता। कल्याणि! प्रसङ्ग छिड़ जानेपर पूर्णरूपसे जो कुछ स्मरणमें आ गया है, वही प्राचीन चरित्र तुम्हें सुनाया है। कुछ लोग इसकी समुद्रके बूँदोंसे उपमा देते हैं, पर यह ठीक नहीं है। स्वयम्भू ब्रह्माजी, सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र भगवान् नारायण तथा मैं—सभी समस्त चरित्रका वर्णन करनेमें असमर्थ हैं। अतः उन परम प्रभु परमात्माके आदिस্বরূপका तुम्हें सदा स्मरण करना चाहिये। समुद्रके रेतोंकी तथा पृथ्विके रजःकणोंकी तो गणना हो सकती है; किंतु परब्रह्म परमात्माकी
१५-महातपाका उपाख्यान
| ४२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १३ |
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कितनी लीलाएँ हैं—इसकी संख्या असम्भव है। शुचिस्मिते ! तुम्हें मैंने जो प्रसङ्ग सुनाया है, यह उन भगवान् नारायणके केवल एक अंशसे सम्बन्ध रखता है। यह लीला सत्ययुगमें हुई थी। अब तुम दूसरा कौन प्रसङ्ग सुनना चाहती हो, यह बतलाओ। [ अध्याय १२]
पितरोंका परिचय, श्राद्धके समयका निरूपण तथा पितृगीत
पृथ्वीने पूछा—प्रभो! मुनिवर गौरमुखने भगवान् श्रीहरिके अद्भुत कर्मको देखकर फिर क्या किया ?
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! भगवान् श्रीहरिने निमेषमात्रमें ही वह सब अद्भुत कर्म कर दिखाया था। उसे देखकर मुनिश्रेष्ठ गौरमुखने भी नैमिषारण्यक्षेत्रमें जाकर जगदीश्वर श्रीहरिकी आराधना आरम्भ कर दी। उस क्षेत्रमें प्रभास नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ है। वह परम दुर्लभ तीर्थ चन्द्रमासे सम्बन्धित है। तीर्थके विशेषज्ञोंका कथन है कि वहाँके स्वामी भगवान् श्रीहरि दैत्योंका संहार करनेवाले 'दैत्यसूदन' नामसे सदा विराजते हैं। मुनिकी चित्तवृत्ति उन प्रभुकी आराधनामें स्थिर हो गयी। अभी वे उन भगवान् नारायणकी उपासना कर ही रहे थे—इतनेमें परम योगी मार्कण्डेयजी वहाँ आ गये। उन्हें अतिथिके रूपमें प्राप्तकर गौरमुखने दूरसे ही बड़े हर्षके साथ भक्तिपूर्वक उनकी पाद्य एवं अर्घ्य आदिसे पूजा आरम्भ कर दी। उन प्रतापी मुनिको कुशके आसनपर विराजित कर गौरमुखने सविनय पूछा—'महाव्रती मुनिश्रेष्ठ ! मुझे पितरों एवं श्राद्धतत्त्वका उपदेश करें' गौरमुखके यों पूछनेपर महान् तपस्वी द्विजवर मार्कण्डेयजी बड़े मीठे स्वरमें उनसे कहने लगे।
मार्कण्डेयजी बोले—मुने! भगवान् नारायण समस्त देवताओंके आदि प्रवर्तक एवं गुरु हैं। उन्हींसे ब्रह्मा प्रकट हुए हैं और उन ब्रह्माजीने फिर सात मुनियोंकी सृष्टि की है। मुनियोंकी रचना करके ब्रह्माजीने उनसे कहा—'तुम मेरी उपासना करो।' सुनते हैं, उन लोगोंने स्वयं अपनी ही पूजा कर ली। अपने पुत्रोंद्वारा इस प्रकार कर्म-विकृति देखकर ब्रह्माजीने उन्हें शाप दे दिया—'तुमलोगोंने (ज्ञानाभिमानसे) मेरी जगह अपनी पूजा कर विपरीत आचरण किया है। अतः तुम्हारा ज्ञान नष्ट हो जायगा।'
इस प्रकार शाप-ग्रस्त हो जानेपर उन सभी ब्रह्मपुत्रोंने अपने वंशके प्रवर्तक पुत्रोंको उत्पन्न किया और फिर स्वयं स्वर्गलोक चले गये। उन ब्रह्मवादी मुनियोंके परलोकवासी होनेपर उनके पुत्रोंने विधिपूर्वक श्राद्ध करके उन्हें तृप्त किया। उन पितरोंकी 'वैमानिक' संज्ञा है। वे सभी ब्रह्माजीके मनसे प्रकट हुए हैं। पुत्र मन्त्रका उच्चारण करके पिण्डदान करता है—यह देखते हुए वे वहाँ निवास करते हैं।
गौरमुखने पूछा—ब्रह्मन् ! जितने पितर हैं और उनके श्राद्धका जो समय है, वह मैं जानना चाहता हूँ तथा उस लोकमें रहनेवाले पितरोंके गण कितने हैं, यह सब भी मुझे बतानेकी कृपा करें।
मार्कण्डेयजी कहने लगे—द्विजवर ! देवताओंके लिये सोम-रसकी वृद्धि करनेवाले कुछ स्वर्गनिवासी पितर मरीचि आदि नामोंसे विख्यात हैं। उन श्रेष्ठ पितरोंमें चारको मूर्त (मूर्तिमान्) और तीनको अमूर्त (बिना मूर्तिका) कहा गया है। इस प्रकार उनकी संख्या सात है। उनके रहनेवाले लोकको तथा उनके स्वभावको बताता हूँ, सुनो। सन्तानक नामक लोकोंमें 'भास्वर' नामक पितृगण निवास करते हैं, जो देवताओंके उपास्य हैं। ये सभी ब्रह्मवादी हैं। ब्रह्मलोकसे अलग होकर ये नित्य-
१६-प्रतिपदा तिथि एवं अग्निकी महिमाका वर्णन
अध्याय १३ ] पितरोंका परिचय, श्राद्धके समयका निरूपण तथा पितृगीत ४३
लोकोंमें निवास करते हैं। सौ युग व्यतीत हो जानेपर इनका पुनः प्रादुर्भाव होता है। उस समय अपनी पूर्वस्थितिका स्मरण होनेपर सर्वोत्तम योगका चिन्तन करके परम पवित्र योग-सम्बन्धी अनिवृत्ति-लक्षण मोक्षको वे प्राप्त कर लेंगे। ये सभी पितर श्राद्धमें योगियोंके योगद्वारा तृप्त किये जानेपर योगी पुरुषोंके हृदयोंमें पुनः योगकी वृद्धि करते हैं। क्योंकि भगवद्भक्तके भक्तियोगसे इन्हें बड़ा संतोष होता है। अतएव योगिवर! भगवान्को अपना सर्वस्व अर्पण करनेवाले योगी पुरुषको श्राद्धकी वस्तुएँ देनी चाहिये।
सोम-रस पीनेवाले सोमप पितरोंका यह प्रधान प्रथम सर्ग है। ये पितर उत्तम वर्णवाले ब्राह्मण हैं। इन सबका एक-एक शरीर है। ये स्वर्गलोकमें रहते हैं। भूलोकके निवासी इनकी पूजा करते हैं। कल्पपर्यन्तजीवी मरीचि आदि पितर ब्रह्माजीके पुत्र हैं। वे अपने परिवारोंके साथ मरुतोंकी उपासना करते हैं—मरुद्गण उनके उपास्य हैं। सनक आदि तपस्वी 'वैराज' नामक पितृगण उन मरुद्गणोंके भी पूज्य हैं। वैराजसंज्ञक पितरोंके गणकी संख्या सात कही जाती है। यह पितरोंकी संतानका परिचय हुआ।
भिन्न-भिन्न वर्णवाले सभी लोग उन पितरोंकी पूजा कर सकते हैं—यह नियम है। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य—इन तीनों वर्णोंसे अनुमति पाकर द्विजेतर भी उक्त सभी पितरोंकी पूजा कर सकता है। उसके पितर इन पितृगणोंसे भिन्न हैं। ब्रह्मन्! पितरोंमें भी मुक्त और चेतनक—दो प्रकारके पितर नहीं देखे जाते हैं। विशिष्ट शास्त्रोंको देखने, पुराणोंका अवलोकन करने तथा ऋषियोंके बनाये हुए शास्त्रोंका अध्ययन करनेसे अपने पूज्य पितरोंका परिचय प्राप्त कर लेना चाहिये।
सृष्टि रचनेके समय ही फिर ब्रह्माजीको स्मृति प्राप्त हुई। तब उन्हें पूर्व पुत्रोंका स्मरण हुआ। वे पुत्र तो ज्ञानके प्रभावसे परम पदको प्राप्त हो गये हैं—यह बात उन्हें विदित हो गयी। वसु आदिके कश्यप आदि, ब्राह्मणादि वर्णोंके वसु आदि और गन्धर्व-प्रभृति पितर हैं—यह बात साधारणरूपसे समझ लेनी चाहिये। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं है। मुनिवर! यह पितरोंकी सृष्टिका प्रसङ्ग है। प्रकरणवश तुम्हारे सामने इसका वर्णन कर दिया। वैसे यदि करोड़ वर्षोंतक इसे कहा जाय, तो भी इसके विस्तृत प्रसङ्गका अन्त नहीं दीखता।
द्विजवर! अब मैं श्राद्धके लिये उचित कालका विवेचन करता हूँ, सुनो। श्राद्धकर्ता जिस समय श्राद्धयोग्य पदार्थ या किसी विशिष्ट ब्राह्मणको घरमें आया जाने अथवा उत्तरायण या दक्षिणायनका आरम्भ, व्यतीपात योग हो, उस समय काम्य श्राद्धका अनुष्ठान करे। विषुव योगमें*, सूर्य और चन्द्रमाके ग्रहणके समय, सूर्यके राश्यन्तर-प्रवेशमें, नक्षत्र अथवा ग्रहोंद्वारा पीडित होनेपर, बुरे स्वप्न दीखने तथा घरमें नवीन अन्न आनेपर काम्य-श्राद्ध करना चाहिये। जो अमावास्या अनुराधा, विशाखा एवं स्वाती नक्षत्रसे युक्त हो, उसमें श्राद्ध करनेसे पितृगण आठ वर्षोंतक तृप्त रहते हैं। इसी प्रकार जो अमावास्या पुष्य, पुनर्वसु या आर्द्रा नक्षत्रसे युक्त हो, उसमें पूजित होनेसे पितृगण बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं। जो पुरुष देवताओं एवं पितृगणको तृप्त करना चाहते हैं, उनके लिये धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपद अथवा शतभिषासे युक्त अमावास्या अत्यन्त दुर्लभ है। ब्राह्मणश्रेष्ठ! जब
* वर्षके जिस अहोरात्रमें सूर्यके विषुवरेखापर चले जानेपर दिन-रातका मान बराबर हो जाता है, उस समय विषुव योगकी प्राप्ति या संक्रान्ति होती है।
१७-अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और उनके द्वारा भगवत्स्तुति
| ४४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १३ |
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अमावास्या इन उपर्युक्त नौ नक्षत्रोंसे युक्त होती है, उस समय किया हुआ श्राद्ध पितृगणको अक्षय तृप्तिकारक होता है। वैशाखमासके शुक्ल पक्षकी तृतीया, कार्तिकके शुक्ल पक्षकी नवमी, भाद्रपदके कृष्ण पक्षकी त्रयोदशी, माघमासकी अमावास्या, चन्द्रमा अथवा सूर्यके ग्रहणके समय तथा चारों अष्टकाओंमें* अथवा उत्तरायण या दक्षिणायनके आरम्भके समय जो मनुष्य एकाग्रचित्तसे पितरोंको तिलमिश्रित जल भी दान कर देता है, वह मानो सहस्र वर्षोंके लिये श्राद्ध कर देता है। यह परम रहस्य स्वयं पितृगणोंका बतलाया हुआ है। कदाचित् माघकी अमावास्याका यदि शतभिषा नक्षत्रसे योग हो जाय तो पितृगणकी तृप्तिके लिये यह परम उत्कृष्ट काल होता है। द्विजवर! अल्प पुण्यवान् पुरुषोंको ऐसा समय नहीं मिलता और यदि उस दिन धनिष्ठा नक्षत्रका योग हो जाय तो उस समय अपने कुलमें उत्पन्न पुरुषद्वारा दिये हुए अन्न एवं जलसे पितृगण दस हजार वर्षके लिये तृप्त हो जाते हैं तथा यदि माघी अमावास्याके साथ पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रका योग हो और उस अवसरपर पितरोंके लिये श्राद्ध किया जाय तो इस कर्मसे पितृगण अत्यन्त तृप्त होकर पूरे युगतक सुखपूर्वक शयन करते हैं। गङ्गा, शतद्रु, विपाशा, सरस्वती और नैमिषारण्यमें स्थित गोमती नदीमें स्नानकर पितरोंका आदरपूर्वक तर्पण करनेसे मनुष्य अपने समस्त पापोंको नष्ट कर देता है। पितृगण सर्वदा यह गान करते हैं कि वर्षाकालमें (भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशीके) मघानक्षत्रमें तृप्त होकर फिर माघकी अमावास्याको अपने पुत्र-पौत्रादिद्वारा दी गयी पुण्यतीर्थोंकी जलाञ्जलिसे हम कब तृप्त होंगे। विशुद्ध चित्त, शुद्ध धन, प्रशस्त काल, उपर्युक्त विधि, योग्य पात्र और परम भक्ति—ये सब मनुष्यको मनोवाञ्छित फल प्रदान करते हैं।
पितृगीत
विप्रवर! इस प्रसङ्गमें पितरोंद्वारा गाये हुए कुछ श्लोकोंका श्रवण करो। उन्हें सुनकर तुमको आदरपूर्वक वैसा ही आचरण करना चाहिये। पितृगण कहते हैं—कुलमें क्या कोई ऐसा बुद्धिमान् धन्य मनुष्य जन्म लेगा जो वित्तलोलुपताको छोड़कर हमारे निमित्त पिण्डदान करेगा। सम्पत्ति होनेपर जो हमारे उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको रत्न, वस्त्र, यान एवं सम्पूर्ण भोग-सामग्रियोंका दान करेगा अथवा केवल अन्न-वस्त्रमात्र वैभव होनेपर श्राद्धकालमें भक्तिविनम्र-चित्तसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भोजन ही करायेगा या अन्न देनेमें भी असमर्थ होनेपर ब्राह्मणश्रेष्ठोंको वन्य फल-मूल, जंगली शाक और थोड़ी-सी दक्षिणा ही देगा, यदि इसमें भी असमर्थ रहा तो किसी भी द्विजश्रेष्ठको प्रणाम करके एक मुट्ठी काला तिल ही देगा अथवा हमारे उद्देश्यसे पृथ्वीपर भक्ति एवं नम्रतापूर्वक सात-आठ तिलोंसे युक्त जलाञ्जलि ही देगा, यदि इसका भी अभाव होगा तो कहीं-न-कहींसे एक दिनका चारा लाकर प्रीति और श्रद्धापूर्वक हमारे उद्देश्यसे गौको खिलायेगा तथा इन सभी वस्तुओंका अभाव होनेपर वनमें जाकर अपने कक्षमूल (बगल)-को दिखाता हुआ सूर्य आदि दिक्पालोंसे उच्चस्वरसे यह कहेगा—
न मेऽस्ति वित्तं न धनं न चान्य-
च्छ्राद्धस्य योग्यं स्वपितॄन्नतोऽस्मि।
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ
भुजौ ततौ वर्त्मनि मारुतस्य॥
(१३।५८)
१. प्रत्येक मासकी सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी तिथियोंके समूहकी तथा पौष-माघ एवं फाल्गुनके कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथियोंकी 'अष्टका' संज्ञा है।
| अध्याय १४ ] | श्राद्ध-कल्प | ४५ |
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‘मेरे पास श्राद्धकर्मके योग्य न धन-सम्पत्ति है और न कोई अन्य सामग्री, अतः मैं अपने पितरोंको प्रणाम करता हूँ। वे मेरी भक्तिसे ही तृप्ति-लाभ करें। मैंने अपनी दोनों बाँहें आकाशमें उठा रखी हैं।’ | द्विजोत्तम! धनके होने अथवा न होनेकी अवस्थामें पितरोंने इस प्रकारकी विधियाँ बतलायी हैं। जो पुरुष इसके अनुसार आचरण करता है, उसके द्वारा श्राद्ध समुचित रूपसे ही सम्पन्न माना जाता है। [ अध्याय १३]
श्राद्ध-कल्प
मार्कण्डेयजी कहते हैं—विप्रवर! प्राचीन समयमें यह प्रसङ्ग ब्रह्माजीके पुत्र सनन्दनने, जो सनकजीके छोटे भाई एवं परम बुद्धिमान् हैं, मुझसे कहा था। अब ब्रह्माजीद्वारा बतलायी वह बात सुनो। त्रिणाचिकेत¹, त्रिमधु², त्रिसुपर्ण³, छहों वेदाङ्गोंके जाननेवाले, यज्ञानुष्ठानमें तत्पर, भानजे, दौहित्र, श्वशुर, जामाता, मामा, तपस्वी ब्राह्मण, पञ्चाग्नि तपनेवाले, शिष्य, सम्बन्धी तथा अपने माता एवं पिताके प्रेमी—इन ब्राह्मणोंको श्राद्धकर्ममें नियुक्त करना चाहिये। मित्रघाती, स्वभावसे ही विकृत नखवाला, काले दाँतवाला, कन्यागामी, आग लगानेवाला, सोमरस बेचनेवाला, जनसमाजमें निन्दित, चोर, चुगलखोर, ग्रामपुरोहित, वेतन लेकर पढ़ने तथा पढ़ानेवाला, पुनर्विवाहिता स्त्रीका पति, माता-पिताका परित्याग करनेवाला, हीन वर्णकी संतानका पालन-पोषण करनेवाला, शूद्रा स्त्रीका पति तथा मन्दिरमें पूजा करके जीविका चलानेवाला—ऐसे ब्राह्मण श्राद्धके अवसरपर निमन्त्रण देने योग्य नहीं हैं।
ब्राह्मणको निमन्त्रित करनेकी विधि
विचारशील पुरुषको चाहिये कि एक दिन पूर्व ही संयमी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे दे। पर श्राद्धके दिन कोई अनिमन्त्रित तपस्वी ब्राह्मण घरपर पधारें तो उन्हें भी भोजन कराना चाहिये। श्राद्धकर्ता घरपर आये हुए ब्राह्मणोंका चरण धोये, फिर अपना हाथ धोकर उन्हें आचमन कराये। तत्पश्चात् उन्हें आसनोंपर बैठाये एवं भोजन कराये।
ब्राह्मणोंकी संख्या आदि
पितरोंके निमित्त अयुग्म अर्थात् एक, तीन इत्यादि तथा देवताओंके निमित्त युग्म अर्थात् दो, चार—इस क्रमसे ब्राह्मण-भोजनकी व्यवस्था करे। अथवा देवताओं एवं पितरों—दोनोंके निमित्त एक-एक ब्राह्मणको भोजन करानेका भी विधान है। नानाका श्राद्ध वैश्वदेवके साथ होना चाहिये। पितृपक्ष और मातामहपक्ष—दोनोंके लिये एक ही वैश्वदेव-श्राद्ध करे। देवताओंके निमित्त ब्राह्मणोंको पूर्वमुख बैठाकर भोजन कराना चाहिये तथा पितृपक्ष एवं मातामहपक्षके ब्राह्मणोंको उत्तरमुख बिठाकर भोजन कराये। द्विजवर! कुछ आचार्य कहते हैं, पितृपक्ष और मातामह—इन दोनोंके श्राद्ध अलग-अलग होने चाहिये। अन्य कुछ महर्षियोंका कथन है—दोनोंका श्राद्ध एक साथ एक ही पाकमें होना समुचित है।
श्राद्धका प्रकार
बुद्धिमान् पुरुष श्राद्धमें आसनके लिये सर्वप्रथम कुशा दे। फिर देवताओंका आवाहन करे। तदनन्तर अर्घ्य आदिसे विधिपूर्वक उनकी पूजा करे।
१. द्वितीय कठके अन्तर्गत 'अयं वाव यः पवते' इत्यादि तीन अनुवाकोंको पढ़नेवाला या उसका अनुष्ठान करनेवाला।
२. 'मधुवाताः' इत्यादि ऋचाका अध्ययन और मधु-व्रतका आचरण करनेवाला।
३. 'ब्रह्म मेतु मां' इत्यादि तीन अनुवाकोंका अध्ययन और तत्सम्बन्धी व्रत करनेवाला।
१८-गौरीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग, द्वितीया तिथि एवं रुद्रद्वारा जलमें तपस्या, दक्षके यज्ञमें रुद्र और विष्णुका संघर्ष
| ४६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४ |
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ब्राह्मणोंकी आज्ञासे जल एवं यवसे देवताओंको अर्घ्य देना चाहिये। फिर श्राद्धविधिको जाननेवाला श्राद्धकर्ता विधिपूर्वक उत्तम चन्दन, धूप और दीप उन विश्वेदेव आदि देवताओंको अर्पण करे। पितरोंके निमित्त इन सभी उपचारोंका अपसव्य¹-भावसे निवेदन करे। फिर ब्राह्मणकी अनुमतिसे दो भाग किये हुए कुश पितरोंके लिये दे। विवेकी पुरुषको चाहिये, मन्त्रका उच्चारण करके पितरोंका आवाहन करे। अपसव्य होकर तिल और जलसे अर्घ्य देना उचित है।
श्राद्ध करते समय अतिथिके आ जानेपर कर्तव्यका विधान
मार्कण्डेयजी कहते हैं—द्विजवर! श्राद्ध करते समय यदि कोई भोजन करनेकी इच्छासे भूखा पथिक अतिथिरूपमें आ जाय तो ब्राह्मणोंसे आज्ञा लेकर उसे भी यथेच्छ भोजन कराना चाहिये। अनेक अज्ञातस्वरूप योगिगण मनुष्योंका उपकार करनेके लिये नाना रूप धारणकर इस धराधामपर विचरण करते रहते हैं। इसलिये विज्ञ पुरुष श्राद्धके समय आये हुए अतिथिका सत्कार अवश्य करे। विप्रवर! यदि उस समय वह अतिथि सम्मानित नहीं हुआ तो श्राद्ध करनेसे प्राप्त होनेवाले फलको नष्ट कर देता है।
श्राद्धके समय हवन करनेकी विधि
(मार्कण्डेयजी कहते हैं)—पुरुषप्रवर! श्राद्धके अवसरपर ब्राह्मणको भोजन करानेके पहले उनसे आज्ञा पाकर शाक और लवणहीन अन्नसे अग्निमें तीन बार हवन करना चाहिये। उनमें 'अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे पहली आहुति, 'सोमाय पितृमते स्वाहा'—इससे दूसरी एवं 'वैवस्वताय स्वाहा' कहकर तीसरी आहुति देनेका समुचित विधान है। तत्पश्चात् हवन करनेसे बचे हुए अन्नको थोड़ा-थोड़ा सभी ब्राह्मणोंके पात्रोंमें दे।
श्राद्धमें भोजन करानेका नियम
भोजनके लिये उपस्थित अन्न अत्यन्त मधुर, भोजनकर्ताकी इच्छाके अनुसार तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ हो। पात्रोंमें भोजन रखकर श्राद्धकर्ता अत्यन्त सुन्दर एवं मधुर वचन कहे—'महानुभावो! अब आप लोग अपनी इच्छाके अनुसार भोजन करें।' ब्राह्मणोंको भी तद्गतचित्त और मौन होकर प्रसन्नमुखसे सुखपूर्वक भोजन करना चाहिये। यजमानको क्रोध तथा उतावलेपनको छोड़कर भक्तिपूर्वक भोजन परोसते रहना चाहिये।
अभिश्रवण (वैदिक श्राद्धमन्त्रका पाठ)
श्राद्धमें ब्राह्मणोंके भोजन करते समय रक्षोघ्न मन्त्र²का पाठ करके भूमिपर तिल बिखेर दे तथा अपने पितृरूपमें उन द्विजश्रेष्ठोंका ही चिन्तन करे। साथ ही यह भी भावना करे—'इन ब्राह्मणोंके शरीरमें स्थित मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह आदि आज भोजनसे तृप्त हो जायँ।' भूमिपर पिण्ड देते समय प्रार्थना करे—'मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह इस पिण्डदानसे तृप्ति-लाभ करें। होमद्वारा सबल होकर मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह आज तृप्ति-लाभ करें।' सबके बाद फिर प्रार्थना करनी चाहिये—'मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह—ये महानुभाव मैंने भक्तिपूर्वक उनके लिये जो कुछ किया या कहा है—उससे तृप्त होनेकी कृपा करें। मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह और विश्वेदेव तृप्त हो जायँ एवं
१. यज्ञोपवीतको दायें कंधेपर रखना।
२. रक्षोघ्न मन्त्र—यज्ञेश्वरो यज्ञसमस्तनेता भोक्ताऽव्ययात्मा हरिरीश्वरोऽत्र।
तत्संनिधानादपयान्तु सद्यो रक्षांस्यशेषाण्यसुराश्च सर्वे॥ (अ० १४।३२)
अध्याय १४ ] श्राद्ध-कल्प [ ४७
समस्त राक्षसगण नष्ट हों। यहाँ सम्पूर्ण हव्य-कव्यके भोक्ता यज्ञेश्वर भगवान् श्रीहरि विराजमान हैं। अतः उनकी संनिधिके कारण समस्त राक्षस और असुरगण यहाँसे तुरंत भाग जायँ।'
अन्न आदिके विकिरणका नियम
जब निमन्त्रित ब्राह्मण भोजनसे तृप्त हो जायँ, तो भूमिपर थोड़ा-सा अन्न डाल देना चाहिये। आचमनके लिये उन्हें एक-एक बार शुद्ध जल देना आवश्यक है। तदनन्तर भलीभाँति तृप्त हुए ब्राह्मणोंसे आज्ञा लेकर भूमिपर सभी उपस्थित अन्नोंसे पिण्डदान करनेका विधान है।
पिण्डदानका नियम
श्राद्धकालमें भलीभाँति सावधान होकर तिलके साथ उन्हें पिण्ड अर्पण करे। पितृतीर्थसे तिलयुक्त जलाञ्जलि दे तथा मातामह आदिके लिये भी पितृतीर्थसे ही पिण्डदान करना चाहिये। फिर ब्राह्मणोंके उच्छिष्टके निकट ही दक्षिण दिशामें अग्रभाग करके बिछाये हुए कुशाओंपर पहले अपने पिताके लिये पुष्प और धूप आदिसे पूजित पिण्ड दान करे। फिर पितामह और प्रपितामहके लिये एक-एक पिण्ड अर्पण करना चाहिये। तदनन्तर ‘लेपभागभुजस्तृप्यन्ताम्’—ऐसा उच्चारण करते हुए लेपभागभोजी (पिण्डसे बचे अन्न पानेवाले) पितरोंके निमित्त कुशाके मूलसे अपने हाथमें लगे अन्नको गिरावे। विवेकी पुरुषको चाहिये कि इसी प्रकार गन्ध और मालादियुक्त पिण्डोंसे मातामह आदिका पूजन करके फिर द्विजश्रेष्ठोंको आचमन करावे। द्विजवर! पितरोंका चिन्तन करते हुए भक्तिके साथ पहले पिता प्रभृतिको पिण्ड देना आवश्यक है। फिर स्वस्ति-वाचन करनेवाले ब्राह्मणोंको अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा देनेके पश्चात् विश्वेदेवके निमित्त प्रार्थनाके मन्त्रोंका पाठ होना चाहिये। जो विश्वेदेव यहाँ पधारे हैं, वे प्रसन्न हो जायँ—यों श्राद्धकर्ता प्रार्थना करे। वहाँ उपस्थित ब्राह्मण उसका अनुमोदन कर दें। फिर आशीर्वादके लिये प्रार्थना करना समुचित है। महामते! पहले पितृपक्षके ब्राह्मणोंका विसर्जन करे। तत्पश्चात् देवपक्षके ब्राह्मण बिदा किये जायँ। विश्वेदेवगणके सहित मातामह आदिमें भी ब्राह्मण-भोजन, दान और विसर्जन आदिकी यही विधि बतलायी गयी है। पितृ और मातामह—दोनों ही पक्षोंके श्राद्धोंमें पाद-शौच आदि सभी कर्म पहले देवपक्षके ब्राह्मणोंका करे। परंतु बिदा पहले पितृपक्षीय अथवा मातृपक्षीय ब्राह्मणोंको ही करे। मातामह आदि तीन पितरोंके श्राद्धमें ज्ञानी ब्राह्मण प्रथम स्थान पानेका अधिकारी है। ब्राह्मणोंको प्रीतिवचन और सम्मानपूर्वक बिदा करे। उनके जानेके समय द्वारतक पीछे-पीछे जाय। जब वे आज्ञा दें, तब लौट आवे।
श्राद्धके अन्तमें बलिवैश्वदेवका विधान
श्राद्ध करनेके पश्चात् वैश्वदेव नामक नित्य-क्रिया करनी चाहिये। इस प्रकार सबका सत्कार करके अपने घरके बड़े लोगों तथा बन्धु-बान्धवों एवं सेवकोंसहित स्वयं भोजन करना चाहिये। विवेकी पुरुषका कर्तव्य है कि इसी प्रकार पिता, पितामह, प्रपितामह तथा मातामह, प्रमातामह एवं वृद्धप्रमातामहका श्राद्ध सम्पन्न करे। श्राद्धद्वारा अत्यन्त तृप्त होकर ये पितर सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण कर देते हैं। काला तिल, कुतप मुहूर्त* और दौहित्र—ये तीन श्राद्धमें परम पवित्र माने जाते हैं। चाँदीका दान तथा उसका दर्शन भी श्रेष्ठ है। श्राद्धकर्ताके लिये क्रोध करना, उतावलापना तथा उस दिन कहीं जाना मना है। ये तीनों बातें श्राद्धमें भोजन करनेवालेके लिये भी वर्ज्य हैं। द्विजवर! विधिपूर्वक श्राद्ध करनेवाले पुरुषोंसे विश्वेदेवगण, पितृगण, मातामह एवं कुटुम्बीजन सभी संतुष्ट रहते हैं। द्विजवर! पितृगणोंका आधार
१. दिनके ८वें मुहूर्तको 'कुतप' कहते हैं, यह प्रायः साढ़े बारह बजेके आस-पास आता है।
| ४८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १५ |
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चन्द्रमा है और चन्द्रमाका आधार योग है। अतः श्राद्धमें योगिजनको नियुक्त करना अति उत्तम है। विप्रवर! श्राद्धभोजी एक सहस्र ब्राह्मणोंके सम्मुख यदि एक भी योगी उपस्थित हो जाय तो वह यजमानके सहित उन सबका उद्धार कर देता है। सामान्यरूपसे सभी पुराणोंमें इस पितृक्रियाका वर्णन किया गया है। इस क्रमसे कर्मकाण्ड होना चाहिये।
यह जानकर भी मनुष्य संसारके बन्धनसे छूट जाता है। गौरमुख! श्रेष्ठ व्रतवाले बहुतसे ऋषि श्राद्धका आश्रय लेकर मुक्त हो चुके हैं। अतएव तुम भी इसके अनुष्ठानमें यथाशीघ्र तत्पर हो जाओ।
द्विजवर! तुमने भक्तिपूर्वक इस प्रसङ्गको पूछा है, अतः तुम्हारे सामने मैं इसका वर्णन कर चुका। जो पितृयज्ञ करके भगवान् श्रीहरिका ध्यान करता है, उससे बढ़कर कोई कार्य नहीं है और उस यज्ञसे बढ़कर दूसरा कोई पितृतन्त्र भी नहीं है—इसमें कोई संदेह नहीं। [अध्याय १४]
गौरमुखके द्वारा दस अवतारोंका स्तवन तथा उनका ब्रह्ममें लीन होना
पृथ्वीने पूछा—भगवन्! मुनिवर गौरमुखने मार्कण्डेयजीके मुखसे श्राद्धसम्बन्धी ऐसी विधि सुनकर फिर क्या किया?
भगवान् वराह बोले—वसुंधरे! मार्कण्डेयजीकी बुद्धि अपरिमित थी। उनके द्वारा इस प्रकार पितृकल्प सुनते ही मुनिवरकी कृपासे गौरमुखको सौ जन्मोंकी बातें याद आ गयीं।
पृथ्वीने पूछा—भगवन्! गौरमुख पूर्वजन्ममें कौन थे, उनका क्या नाम था, बातें याद आनेकी शक्ति उनमें कैसे आयी और उन महाभागने उन्हें जानकर फिर क्या किया?
भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! ये गौरमुख पूर्वके एक-दूसरे कल्पमें स्वयं भृगु मुनि थे। श्रीब्रह्माजीने अपने पुत्रोंको जो यह शाप दिया था कि पुत्रोंद्वारा ही उपदेश प्राप्त करके तुमलोग सद्गति प्राप्त करोगे। इसीलिये श्रीमार्कण्डेयजीने भी इन्हें ज्ञान प्रदान किया। मुनिवर मार्कण्डेयजी भी उन्हींके वंशमें उत्पन्न हुए थे। श्रेष्ठ अङ्गोंसे शोभा पानेवाली पृथ्वी! इस प्रकार उपदिष्ट होनेपर उन्हें सम्पूर्ण जन्मोंकी बातें याद हो आयीं। फिर पूर्वजन्मकी बातको स्मरण करके उन्होंने जो कुछ किया है, वह संक्षेपमें कहता हूँ, सुनो। उस समय गौरमुख पूर्व-कथनानुसार पितरोंके लिये बारह वर्षोंतक श्राद्ध करते रहे। तत्पश्चात् श्रीहरिकी आराधनाके लिये वे उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे। तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध जो प्रभासतीर्थ है, वहीं जाकर गौरमुखने दैत्यदलन परमप्रभुकी स्तुति आरम्भ कर दी।
दशावतारस्तोत्र
गौरमुख बोले—जो शत्रुओंका दर्प दूर करनेवाले, ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, सूर्य, चन्द्रमा, अश्विनीकुमाररूपमें प्रतिष्ठित, युगमें स्थित, परमपुराण, आदिपुरुष, सदा विराजमान तथा देवाधिदेव भगवान् नारायण नामसे विख्यात हैं, उन मङ्गलमय श्रीहरिकी अब मैं स्तुति करता हूँ। प्राचीन समयमें जब वेद नष्ट हो चुके थे, उस अवसरपर इस विशाल वसुंधराका भरण-पोषण करनेवाले जिन आदिपुरुषने पर्वतके समान विशाल मत्स्यका शरीर धारण किया था तथा जिनके पुच्छके अग्रभागसे चमचमाती हुई तेज-छटा विकीर्ण हो रही थी, उन शत्रुसूदन भगवान् श्रीहरिकी मैं स्तुति करता हूँ। समुद्र-मन्थनके निमित्त सबका हित करनेके विचारसे कच्छपका रूप धारणकर जिन्होंने महान् पर्वत मन्दराचलको आश्रय दिया था, वे दैत्योंके संहार करनेवाले पुराण-पुरुष देवेश्वर भगवान् श्रीहरि मेरी सभी प्रकार रक्षा करें। जिन महापुरुषने महावराहका रूप धारणकर रसातलमें प्रवेश किया और वहाँसे पृथ्वीको ले आये तथा देवताओं एवं सिद्धोंने
अध्याय १५ ] गौरमुखके द्वारा दस अवतारोंका स्तवन ४९
जिनकी 'यज्ञपुरुष' संज्ञा दी है, वे असुरसंहर्ता, सनातन श्रीहरि मेरी रक्षा करें। जो प्रत्येक युगमें भयंकर नृसिंहरूपसे विराजते हैं, जिनका मुख अत्यन्त भयावह है, कान्ति सुवर्णके समान है तथा जिनका दैत्योंका दलन करना स्वाभाविक गुण है, वे योगिराज जगत्के परम आश्रय भगवान् श्रीहरि हमारी रक्षा करें। जिनका कोई माप नहीं है, फिर भी बलिके यज्ञ नष्ट करनेके लिये जिन योगात्माने योगके बलसे दण्ड और मृगचर्मसे सुशोभित वामन-रूपसे बढ़ते हुए त्रिलोकीतक नाप ली, वे परम प्रभु हमारी रक्षा करें। जिन्होंने परमपराक्रमी परशुरामजीका रूप धारण करके इक्कीस बार सम्पूर्ण भूमण्डलपर विजय प्राप्त की और उसे कश्यपजीको सौंप दिया तथा जो सज्जनोंके रक्षक एवं असुरोंके संहारक हैं, वे हिरण्यगर्भ भगवान् श्रीहरि हमारी रक्षा करें। हिरण्यगर्भ जिनकी संज्ञा है, सर्वसाधारण जन जिन्हें देख नहीं सकते तथा जो राम आदि रूपोंसे चार प्रकारके शरीर धारण कर चुके हैं एवं अनेक प्रकारके रूपोंसे राक्षसोंका विनाश करते हैं, वे आदिपुरुष भगवान् श्रीहरि हमारी रक्षा करें। चाणूर और कंस नामधारी दानव दर्पसे भर गये थे। उनके भयसे देवताओंके हृदयमें आतङ्क छा गया था। अतः उन्हें निर्भय करनेके लिये जो प्रत्येक युग एवं कल्पमें वसुदेवके पुत्र श्रीकृष्णरूपसे विराजते हैं, वे प्रभु हमारी रक्षा करें। जो सनातन, ब्रह्ममय एवं महान् पुरुष होकर भी वर्णकी व्यवस्था करनेके लिये प्रत्येक युगमें कल्कि के नामसे विख्यात हैं, देवता, सिद्ध और दैत्योंकी आँखें जिनके रूपको देख नहीं सकतीं एवं जो विज्ञानमार्गका त्याग करके यम-नियम आदिके प्रवर्तक बुद्धरूपसे सुपूजित होते हैं और मत्स्य आदि अनेक रूपोंमें विचरते हैं, वे भगवान् श्रीहरि हमारी रक्षा करें। भगवन्! आप पुरुषोत्तम हैं तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं। आपको मेरा अनेकशः प्रणाम है। प्रभो! अब आप मुझे मुक्ति-पद प्रदान करनेकी कृपा कीजिये।*
इस प्रकार महर्षि गौरमुखके द्वारा भक्तिभावसे संस्तुत एवं नमस्कृत होते-होते चक्र एवं गदाधारी श्रीहरि स्वयं उनके सामने प्रत्यक्षरूपसे प्रकट हो गये। उस समय गौरमुखने देखा कि प्रभुके विग्रहसे दिव्य विज्ञान भी प्रकट हो रहा है। उसे पाकर मुनिकी अन्तरात्मा पूर्ण शान्त हो गयी। गौरमुखके शरीरसे विज्ञानात्मा निकली और श्रीहरिको पाकर उनके मुक्तिसंज्ञक सनातन श्रीविग्रहमें सदाके लिये शान्त हो गयी। [अध्याय १५]
* स्तोष्ये महेन्द्रं रिपुदर्पहं शिवं नारायणं ब्रह्मविदां वरिष्ठम्। आदित्यचन्द्राश्वियुगस्थमाद्यं पुरातनं दैत्यहरं सदा हरिम्॥
चकार मात्स्यं वपुरात्मनो यः पुरातनं वेदविनाशकाले। महामहीभृद्वपुरुग्रपुच्छच्छटाहवार्त्तिचः सुरशत्रुहाद्यः॥
तथाब्धिमन्थानकृते गिरीन्द्रं दधार यः कौर्मवपुः पुराणम्। हितेच्छयाप्तः पुरुषः पुराणः प्रपातु मां दैत्यहरः सुरेशः॥
महावराहः सततं पृथिव्यास्तलात्तलं प्राविशद् यो महात्मा। यज्ञाङ्गसंज्ञः सुरसिद्धसङ्घैः स पातु मां दैत्यहरः पुराणः॥
नृसिंहरूपी च बभूव योऽसौ युगे युगे योगिवरोऽथ भीमः। करालवक्त्रः कनकाग्रवर्चा वराशयोऽस्मानसुरान्तकोऽव्यात्॥
बलेर्मखध्वंसकृदप्रमेयो योगात्मको योगवपुःस्वरूपः। स दण्डकाष्ठाजिनलक्षणः क्षितिं योऽसौ महान् क्रान्तवान् नः पुनातु॥
त्रिःसप्तकृत्वो जगतीं जिगाय कृत्वा ददौ कश्यपाय प्रचण्डः। स जामदग्न्योऽभिजनस्य गोप्ता हिरण्यगर्भोऽसुरहा प्रपातु॥
चतुष्प्रकारं च वपुर्य आद्यं हैरण्यगर्भंप्रतिमानलक्ष्यम्। रामादिरूपैर्बहुरूपभेदं चकार सोऽस्मानसुरान्तकोऽव्यात्॥
चाणूरकंसासुरदर्पभीतैर्भीतामराणामभयाय वेदः। युगे युगे वासुदेवो बभूव कल्पे भवत्यद्भुतरूपकारी॥
युगे युगे कल्किनाम्ना महात्मा वर्णस्थितिं कर्तुमनेकरूपः। सनातनो ब्रह्ममयः पुरातनो गूढाशयोऽस्मानसुरान्तकोऽव्यात्॥
न यस्य रूपं सुरसिद्धदैत्याः पश्यन्ति विज्ञानगतिं विहाय। अतो यमेनापि समर्चयन्ति मत्स्यादिरूपाणि चराणि सोऽव्यात्॥
नमो नमस्ते पुरुषोत्तमाय पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते। नमो नमः कारणकारणाय नयस्व मां मुक्तिपदं नमस्ते॥
(अध्याय १५।९—२०)
१९-तृतीया तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें हिमालयकी पुत्रीरूपमें गौरीकी उत्पत्तिका वर्णन और भगवान् शंकरके साथ उनके विवाहकी कथा
५० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १७-१८
महातपाका उपाख्यान
पृथ्वीने पूछा— भगवान्! मणिसे जो प्रधान पुरुष निकले थे तथा जिन्हें भगवान् श्रीहरिने वर दिया था—‘तुम सभी त्रेतायुगमें राजा बनोगे’, उनकी उत्पत्ति कैसे हुई? उनके नाम क्या हुए तथा उन्होंने कौन-कौनसे काम किये? आप मुझे यह प्रसङ्ग बतानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह कहते हैं— प्राणियोंको प्रश्रय देनेवाली पृथ्वी देवि! मणिसे प्रकट जो सुप्रभ नामका प्रधान पुरुष था, वह त्रेतायुगमें एक महान् उदार राजा हुआ। उसके प्रादुर्भावका प्रसङ्ग सुनो। प्रथम सत्ययुगमें महाबाहु नामसे एक प्रसिद्ध राजा हो चुके हैं। वे ही पुनः त्रेतायुगमें राजा श्रुतकीर्ति हुए। उस समय त्रिलोकीमें महान् पराक्रमियोंमें उनकी गणना थी। मणिसे उत्पन्न हुआ सुप्रभ उन्हींके घर पुत्ररूपसे उत्पन्न हुआ। उस समय प्रजापाल नामसे जगत्में उसकी ख्याति हुई। एक दिनकी बात है—राजा प्रजापाल शिकारके लिये किसी ऐसे सघन वनमें गया, जहाँ बहुत-से हिंस्र जन्तु निवास करते थे। वहाँ उसे एक सुन्दर आश्रम दिखायी पड़ा, जहाँ परम धार्मिक महातपा ऋषि निवास करते थे। वे निराहार रहकर सदा परब्रह्म परमात्माका ध्यान करते थे। तप करना ही उनका मुख्य काम था। वहाँ जाकर राजाको आश्रममें प्रवेश करनेकी इच्छा हुई, अतः वह आश्रमके भीतर गया। जंगली वृक्षोंसे उस आश्रमके प्रवेश-मार्गकी बड़ी आकर्षक शोभा हो रही थी। सघन लताएँ गृहके रूपमें परिणत होकर ऐसी चमक रही थीं, मानो चन्द्रमा चाँदनी बिखेरता हो। वहाँ भ्रमरोंको बिना प्रयास ही परितृप्ति प्राप्त होती थी। लाल कमलकी पंखुड़ियोंके समान कोमल नखवाली वराङ्गनाएँ वहाँ यत्र-तत्र सुन्दर राग आलाप रही थीं, मानो इन्द्रकी अप्सराएँ स्वर्गलोक छोड़कर पृथ्वीपर आ गयी हों। वहीं पासमें ही अनेक प्रकारके मत्त पक्षी आनन्दमें भरकर चीं-चीं-चूँ-चूँ शब्द कर रहे थे तथा भौरें भी गूँज रहे थे। भाँति-भाँतिके प्रामाणिक (आकार-प्रकारवाले) कदम्ब, नीप, अर्जुन और साखू नामके वृक्ष शाखाओं तथा सामयिक सुन्दर फूलोंसे सम्पन्न होकर उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते थे। आश्रमके ऊपर बैठे हुए पक्षियोंकी मधुर ध्वनिसे उसकी शोभा अनुपम हो रही थी। वहाँ रहकर सुचारु रूपसे काम करनेवाले सज्जन पुरुष धैर्यपूर्वक अपने कार्यमें तत्पर थे। प्रायः सर्वत्र यज्ञकुण्डोंसे यज्ञके धुएँ उठ रहे थे। हवन करनेसे आगकी प्रचण्ड लपटें निकल रही थीं तथा गृहस्थ ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञ आरम्भ था। अतः ऐसा जान पड़ता था, मानो पापरूपी हाथीको शान्त करनेके विचारसे अत्यन्त तीखे दाँतवाले मतवाले सिंह ही यहाँ आ गये हों।
इस प्रकार सर्वत्र दृष्टि डालते हुए राजा प्रजापालने अनेक उपायोंका आश्रय लेकर उस उत्तम आश्रमके भीतर प्रवेश किया। वहाँ चले जानेपर सामने अत्यन्त तेजस्वी मुनिवर महातपा दिखायी पड़े। उस समय पुण्यात्माओं एवं ब्रह्मवेत्ताओंमें शिरोमणि वे ऋषि कुशाके आसनपर बैठे थे। उनका तेज ऐसा था, मानो अनन्त सूर्योंने एक रूप धारण कर लिया हो। महातपाका दर्शन पाकर प्रजापालको मृगकी बात ही भूल गयी। ऋषिके सत्सङ्गसे उसके विचार शुद्ध हो गये थे। धर्मके प्रति उसकी दृढ़ एवं अद्भुत आस्था हो गयी। ऐसे पवित्र अन्तःकरणवाले राजा प्रजापालको देखकर महातपामुनिने उसका आसन एवं पाद्य आदिसे आतिथ्य-सत्कार किया और उस नरेशने भी मुनिको प्रणाम किया। वसुधे! साथ ही मुनिसे
अध्याय १९ ] प्रतिपदा तिथि एवं अग्निकी महिमाका वर्णन ५१
उसने यह पवित्र प्रश्न किया—'भगवन्! दुःखरूपी संसार-सागरमें डूबते हुए मनुष्योंके मनमें यदि दुस्तर संसारके तरने (विजय पाने)-की इच्छा हो तो उन्हें जो कार्य करना उचित हो, वह आप मुझ शरणागतको बतानेकी कृपा करें।'
महातपाजी बोले—राजन्! संसाररूपी समुद्रमें डूबनेवाले मनुष्योंके लिये कर्तव्य यह है कि वे पूजा, होम, दान, ध्यान एवं अनेक यज्ञ आदि उपकरणरूपी दृढ़ नौकाका आश्रय लें। नाव बनानेमें कीलोंकी आवश्यकता होती है। ये उपर्युक्त पूजा आदि, जिनसे मोक्ष मिलना निर्विवाद है, कीलोंका काम देती हैं। देवसमाजसे बड़ी रस्सियोंकी आवश्यकता पूरी हो जाती है। अतः अब तुम प्राण आदिके सहयोगसे त्रिलोकेश्वररूपी नौका तैयार कर लो। भगवान् नारायण ही त्रिलोकेश्वर हैं। उनकी कृपासे नरकमें नहीं जाना पड़ता। राजन्! जो बड़भागीजन उन देवेश्वरको भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं, उनकी चिन्ताएँ शान्त हो जाती हैं और वे उनके उस परम पदको पा लेते हैं, जो कभी नष्ट नहीं होता।
राजा प्रजापालने पूछा—भगवन्! आप सम्पूर्ण धर्मोंको भलीभाँति जानते हैं। मोक्षकी इच्छा करनेवाले पुरुषको सनातन श्रीहरिकी विभूतियोंका किस प्रकार चिन्तन करना चाहिये? इसे बतानेकी कृपा करें।
मुनिवर महातपाने कहा—राजन्! तुम बड़े विज्ञ पुरुष हो। सम्पूर्ण योगियोंके स्वामी श्रीविष्णु स्त्रियों एवं पुरुषोंपर जिस प्रकार प्रसन्न होते हैं, उसे सुनो। पितरोंके सहित सभी देवता तथा ब्राह्मणके भीतर विचरनेवाले ब्रह्मा प्रभृति—ये सब-के-सब श्रीविष्णुसे ही उत्पन्न हुए हैं—ऐसी वेदकी श्रुति प्रसिद्ध है। अग्नि, अश्विनीकुमार, गौरी, गजानन, शेषनाग, कार्तिकेय, आदित्यगण, दुर्गासहित चौंसठ मातृकाएँ, दस दिशाएँ, कुबेर, वायु, यम, रुद्र, चन्द्रमा और पितृगण—इन सबकी उत्पत्तिमें जगत्प्रभु श्रीहरिकी ही प्रधानता है। हिरण्यगर्भ श्रीहरिके श्रीविग्रहमें इनका स्थान बना रहता है और वहींसे निकलकर ये चारों ओर पृथक्-पृथक् परिलक्षित होते हैं, पर अहंता (मैं हूँ)-का अभिमान उनका साथ नहीं छोड़ता। [ अध्याय १७-१८ ]
प्रतिपदा तिथि एवं अग्निकी महिमाका वर्णन
महातपा बोले—राजन्! प्रसङ्गवश भगवान् विष्णुकी विभूतिका वर्णन कर दिया। अब तिथियोंका माहात्म्य कहता हूँ, सुनो। जब ब्रह्माके क्रोधसे अग्निका प्राकट्य हुआ तो उन्होंने ब्रह्माजीसे कहा—'विभो! मेरे लिये तिथि निश्चय करनेकी कृपा कीजिये, जिसमें पूजित होकर सम्पूर्ण जगत्के समक्ष मैं प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकूँ।'
ब्रह्माजी बोले—परम श्रेष्ठ अग्निदेव! देवताओं, यक्षों और गन्धर्वोंके भी पूर्व तुम सर्वप्रथम प्रतिपदाको उत्पन्न हुए हो और तुम्हारे पश्चात् इन सबका यहाँ प्राकट्य हुआ है। अतः प्रतिपद् नामकी यह तिथि तुम्हारे लिये विहित होगी। इस तिथिमें प्रजापतिकी मूर्तिभूत हविष्यसे जो तुममें हवन करेंगे, उन्हें सम्पूर्ण देवताओं और पितरोंकी प्रसन्नता प्राप्त होगी। चार प्रकारके प्राणी—अण्डज, पिण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज तथा देवता, दानव, मानव, पशु एवं गन्धर्व—ये सभी तुममें हवन करनेपर तृप्त हो सकते हैं। तुम्हारे प्रति श्रद्धा रखनेवाला जो पुरुष प्रतिपदा तिथिके दिन उपवास करेगा अथवा केवल दूधके आहारपर ही रहेगा, उसके महान् फलका वर्णन सुनो—'छब्बीस चतुर्युगीतक वह स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक