वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संसार का कारण सगुण ब्रह्म और लय का कारण यही ईश्वर है। सर्वकाम, सर्वज्ञ ईश्वर का यह सृष्टि व्यापार केवल उसका लीला-विलासमात्र है। नैयायिकों ने 'ईश्वर' को जगत् का केवल निमित्त कारण माना है, किन्तु वेदान्तियों ने 'ईश्वर' को जगत् का उपादान एवं निमित्तकारण दोनों ही माना है। उपादान कारण होने से एकता रहने पर भी दोनों (आत्मा-
ब्रह्म और जगत् में व्यावहारिक भेद जगत्) में भोक्तृ-भोग्य भाव का समुद्र-लहरियों के समान या मिट्टी-घड़े के समान व्यावहारिक भेद भी रहता है। एवं च ब्रह्म और जगत् में वस्तुतः अभेद रहने पर भी व्यावहारिक भेद रहता ही है। अतएव आचार्य शंकर कहते हैं— 'यद्यपि भेदाऽपगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥' एवञ्च जीव-ईश्वर की कल्पना व्यावहारिक होने से दोनों मायिक हैं। यह सब उपाधि का खेल है।
'अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य' को जीव कहते हैं। आचार्य शंकर के शब्दों में शरीर तथा इन्द्रियसम्मूह के अध्यक्ष और कर्मफलके भोक्ता आत्माको जीव कहते हैं।
वैशेषिकदर्शनकार ने चैतन्य को आत्मा का कादाचित्क गुण माना है किन्तु वेदान्त ने आत्मा को चैतन्यरूप ही माना है। क्योंकि उपाधि के सम्पर्क से परब्रह्म ही जीवभाव को प्राप्त होता है। आत्मा का ब्रह्म के साथ स्वाभाविक ऐक्य है। कुछ लोग आत्मा को अणु कहते हैं। किन्तु
चैतन्य के सम्बन्ध में वैशेषिक और वेदान्तियों का मतभेद आचार्य शंकर परब्रह्म के विभु होने से तद् व्यपदेश आत्मा का भी विभुपरिमाण मानते हैं। आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म होने से कहीं-कहीं उसे सूक्ष्म के अर्थ में अणु कहा गया है। यह आत्मचैतन्य जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं में तथा अन्नमय, मनोमय प्राणमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय इन पांच में उपलब्ध होता है। किन्तु शुद्ध निर्विशेष चैतन्य उक्त पांचों कोषों से परे है। यह शुद्ध निर्विशेष चैतन्य
आत्मचैतन्य और शुद्ध चैतन्य की स्थिति (शुद्धसत्ता) अपरिणामी रहता हुआ भी अनिर्वचनीय शक्ति के द्वारा अपने को अनेक रूपों में उद्भासित करता है। उसी को मायाशक्तिसम्पन्न सृष्टिकर्ता ईश्वर कहते हैं। यही सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ईश्वर सगुण ब्रह्म है। समस्त संसार का यही ईश्वर संहारकर्ता भी है। सगुण ब्रह्म की तीन अवस्थाएँ और उनसे परे निर्गुण ब्रह्म की अवस्था समझनी चाहिये।
चैतन्य की चार अवस्थाएं इस रीति से ब्रह्म चैतन्य की चार अवस्थाएं होती हैं:— (१) परब्रह्म (शुद्ध सत्-चित्स्वरूप), (२) ईश्वर,
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( ३ ) हिरण्यगर्भ और ( ४ ) वैश्वानर। आपाततः ये चार अवस्थाएँ क्रमिक-सी लगती हैं। तथापि ये एक साथ ही कही जा सकती हैं। क्योंकि शुद्धचैतन्य (शुद्धसत्ता) का कभी लोप नहीं होता।
शांकर का विशुद्ध अद्वैतवाद
आचार्य शंकर का विशुद्ध अद्वैतवाद' है। इनके अनुसार एक विषय का दूसरे विषय से भेद, ज्ञाता-ज्ञेय का भेद, जीव-ईश्वर का भेद—ये सब माया के खेल हैं। इनके मत से 'एक ही सत् तत्त्व' है और 'अनेकत्व' मिथ्या है। अतएव जीव-ब्रह्म की एकता को बार-बार बताया गया है।
प्रत्यक्ष दृश्यमान यह शरीर अन्यान्य भौतिक विषयों के समान माया की सृष्टि है, यह ज्ञात हो जाने पर आत्मा और ब्रह्म में कोई अन्तर नहीं, यह समझ में आ जाता है। 'तत्त्वमसि' वाक्य का अर्थ जब समझ में आ जाता है तब जीवात्मा और ब्रह्म में अभेद सम्बन्ध ज्ञात हो जाता है। अर्थात् जीवात्मा, ब्रह्म से अभिन्न है, यह ज्ञात हो जाता है। अतएव 'त्वम्' से जीव का अधिष्ठान शुद्ध-चैतन्य और 'तत्' से परोक्ष तत्त्व का अधिष्ठान भी शुद्ध-चैतन्य है। अतः दोनों में पूर्णतया अभिन्नता है, यही वेदान्त का सिद्धान्त है।
वेदान्त का सिद्धान्त
जैसे 'सोऽयं देवदत्तः' यहाँ पर तत्कालिक और एतत्कालिक दो विरुद्ध विशेषणों से रहित देवदत्त आदि मनुष्य एक ही है, उसी तरह 'तत्' अर्थात् परोक्षत्व, सर्वज्ञत्व आदि उपाधियों (विशेषणों) से विशिष्ट चैतन्य (ब्रह्म) और 'त्वम्' अर्थात् अल्पज्ञत्व, अपरोक्षत्व आदि उपाधियों (विशेषणों) से विशिष्ट चैतन्य (जीव) इन दोनों के विरुद्ध अंशों को त्याग कर उभयनिष्ठ शुद्धचैतन्य का अभेद (ऐक्य) है—यही 'तत्त्वमसि' महावाक्य का तात्पर्य समझना चाहिये। जीव और ब्रह्म आपाततः भिन्न प्रतीत होते हुए भी वस्तुतः अभिन्न हैं। इस तादात्म्य का ज्ञान कराने के लिये ही 'तत्त्वमसि' महावाक्य का उपदेश दिया जाता है।
'तत्त्वमसि' महावाक्य का तात्पर्य
असीम का ससीम के समान भान होने में हेतु
अनन्त (असीम) आत्मा सीमित जीवात्मा की तरह भासित होने का कारण, शरीर के साथ उसका सम्बन्ध है, जो अविद्या का कार्य है। दृश्यमान स्थूल शरीर के भीतर एक सूक्ष्म शरीर है, जो अन्तःकरण, प्राण और इन्द्रियों का समूह है। मृत्यु से स्थूल शरीर का नाश होता है, सूक्ष्म शरीर का नहीं। सूक्ष्म-शरीर आत्मा के साथ दूसरे स्थूल शरीर में चला जाता है। ये दोनों स्थूल-सूक्ष्म शरीर, माया के कार्य हैं। अनादि अविद्या के कारण आत्मा भ्रमवश अपने को ही स्थूल-सूक्ष्म शरीर समझ लेता है। इसी समझ को बन्धन कहते हैं। इस स्थिति में आत्मा अपने
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यथार्थ स्वरूप (वास्तविक स्वरूप) को भूल जाता है, और क्षणभंगुर सांसारिक विषयों के पीछे भागता फिरता है। उन विषयों की उपलब्धि होने पर अपने को सुखी और उपलब्धि न होने पर अपने को दुःखी समझता है। वह आत्मा अपने को शरीर या अन्तःकरण समझकर सोचता है कि 'मैं मोटा हूँ, मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ।' इस तरह आत्मा में अहंकार (मैं हूँ) उत्पन्न होता है। यह अहम् (मैं) अपने को शेष संसार से पृथक् समझता है। इसी कारण इस 'अहम्' को शुद्ध आत्मा नहीं समझना चाहिये। उस शुद्ध आत्मा का यह एक अविद्याकृत बन्धनमात्र है। शुद्ध आत्मा तो नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त माना जाता है। यही उसका स्वरूप है। ऐसे शुद्ध आत्मा की उत्पत्ति जहाँ कहीं सुनाई देती है, उसका तात्पर्य शरीरादि उपाधियों की उत्पत्तियों से है। नित्य आत्मा कभी उत्पन्न नहीं होता।
'आत्मस्वरूप के विषय में विभिन्न दार्शनिकों के विभिन्न मत हैं। निद्रित, मूच्छित, ग्रहाविष्ट पुरुषों में कुछ समय तक 'चैतन्याभाव' को देखकर प्रत्यक्ष अनुभव के पक्षपाती वैशेषिक ने 'चैतन्य' को आत्मा का कादाचित्क गुण माना है।
किन्तु वेदान्तदर्शन तो आत्मा को चैतन्यरूप ही मानता है। क्योंकि 'परब्रह्म' ही उपाधि के सम्पर्क से 'जीवभाव' को प्राप्त होता है। अतः 'आत्मा' और 'ब्रह्म' का स्वाभाविक ऐक्य होने के कारण नित्य-चैतन्य का अनंगीकार नहीं किया जा सकता। भेद तो केवल उपाधि से प्रतीत होता है। जैसे—'स्थूल शरीर', 'सूक्ष्म शरीर', और 'कारण शरीर', की व्यष्टि के अभिमानी जीव को 'विश्व', 'तैजस', और 'प्राज्ञ' कहा जाता है। और इन्हीं शरीरों की समष्टि के अभिमानी ईश्वर को 'वैश्वानर' (विराट्) 'सूत्रात्मा' (हिरण्यगर्भ), और 'ईश्वर' कहा जाता है। इसी स्थूल शरीर की समष्टि-व्यष्टि को 'अन्नमयकोष' और 'जाग्रत अवस्था' कहते हैं। सूक्ष्म-शरीर की समष्टि-व्यष्टि को 'मनोमय', 'प्राणमय' 'विज्ञानमयकोष', और 'स्वप्न अवस्था' कहते हैं। कारण शरीर की समष्टि-व्यष्टि को 'आनन्दमयकोष', और 'सुषुप्तिअवस्था' कहते हैं। वास्तव में 'व्यष्टि' तथा 'समष्टि' के अभिमानी पुरुष आपस में अभिन्न हैं। किन्तु 'आत्मा' इन तीनों से परे स्वतन्त्र सत्ता है। यह साक्षी आत्म-चैतन्य, 'अहङ्कार', 'विषय' तथा 'बुद्धि' को प्रकाशित करता है और इनके अभाव में स्वतः प्रकाशित होता है।
'जीव' और 'ईश्वर' के स्वरूप का निरूपण वेदान्तियों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से किया है। कुछ लोग 'जीव'-'ईश्वर' में सामान्य रूप से रहनेवाले चैतन्य
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| जीव और ईश्वर के स्वरूप पर वेदान्तियों के भिन्न-भिन्न मत<br><br>संक्षेप शारीरककार | ...को बिम्ब मानकर उसी का प्रतिबिम्ब भिन्न-भिन्न 'उपाधियों' में गिरने से उन बिम्ब-प्रतिबिम्बोंको भिन्न-भिन्न संज्ञाओं से कहते हैं । बिम्ब चैतन्य का वह 'प्रतिबिम्ब जो माया या अविद्या में गिरता है, उसे 'ईश्वर चैतन्य कहा है और जो प्रतिबिम्ब अन्तःकरण में गिरता है उसे 'जीव-चैतन्य' कहा है। इस मत में जीव और ईश्वर में वही अन्तर है जो 'घट तथा 'जलाशय के जल में गिरनेवाले सूर्य-प्रतिबिम्ब में है। अर्थात् 'अज्ञान में प्रतिबिम्बित चैतन्य को ईश्वर तथा बुद्धि में प्रतिबिम्ब चैतन्य को जीव कहा गया है। किन्तु अज्ञानरूप उपाधि से रहित 'बिम्बचैतन्य' शुद्ध है । यह संक्षेप शारीरककार का मत है । |
| विवरणकार प्रतिबिम्बवाद | किन्तु विवरणकार कहते हैं— 'स्वतन्त्रतादिगुणों' से विशिष्ट होने के कारण ईश्वर चैतन्य बिम्बस्थानापन्न है और 'परतन्त्रतादिगुणों से विशिष्ट होने के कारण अविद्या में चिदाभास 'जीव' है। अर्थात् ईश्वर बिम्बरूप है और जीव प्रतिबिम्बरूप है। इसी को प्रतिबिम्बवाद कहते हैं । |
| भामतीकार का अवच्छेदवाद | भामतीकार वाचस्पति मिश्र का अवच्छेदवाद है। उनका कहना है कि 'प्रतिबिम्बवाद' के स्वीकार करने में यह दोष है कि 'जीवों का नाश' ही मुक्ति का अर्थ होगा । क्योंकि 'ज्ञान' के द्वारा 'अविद्या' का विनाश होने पर दर्पण के नष्ट होने से प्रतिबिम्ब के विनाश के समान 'अविद्या'-प्रतिबिम्बित जीव' भी नष्ट हो जायेंगे । अतः 'जीव' की सत्ता के सुरक्षार्थ घटाकाश का दृष्टान्त प्रस्तुत करते हैं। जैसे आकाश एक और सर्वव्यापक है, किन्तु भिन्न-भिन्न उपाधियों के कारण घटाकाश ( घड़े के बीच का आकाश ) मठाकाश आदि अनेक रूपों में भासित होता है और व्यवहारसम्पादनार्थ उसके विभाग की कल्पना कर लेते हैं। उसी तरह 'ब्रह्म' एक और सर्वव्यापक है। वही ब्रह्म 'अविद्यारूप उपाधिभेद के कारण नाना जीवों और विषयों के रूप में प्रतीत होता है । वास्तव में विषय-विषय में तथा जीव-जीव में कोई भेद नहीं है । क्योंकि सर्वत्र मूलभूत एक ही शुद्ध चैतन्य की सत्ता स्थित है । नानात्व का केवल भ्रम हैं, क्योंकि उपाधिभूत माया के कारण उस अनन्त का सान्तरूप में आभास होता रहता है। प्रत्येक जीव सान्तरूप में प्रतीत होते हुए भी वास्तव में 'ब्रह्म' से अभिन्न है। अविद्या-रूप उपाधि को तोड़कर सान्तरूप को पा लेना ही मुक्ति ( मोक्ष ) हैं। इसी को अवच्छेदवाद कहते हैं । |
कुछ वेदान्ती आभासवाद मानते हैं । इस मत में एक आत्मा ही सत्य है । आत्मा से भिन्न कोई वस्तु सत्य नहीं है । अतः आत्मा न अन्तर्यामी है, न साक्षी और न जगत्कारण है । तथापि अज्ञानरूप उपाधि से युक्त हुआ आत्मा
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आभासवाद
अज्ञान के साथ तादात्म्य प्राप्त कर उसमें पड़े चिदाभास के कारण अन्तर्यामी, साक्षी, ईश्वर कहलाता है। इसे बुद्धि-उपहित तादात्म्य को प्राप्त कर बुद्धिगत 'स्वकीय चिदाभास' को न जानकर जीव कर्ता, भोक्ता, तथा प्रमाता कहा जाता है। इसे आभासवाद कहते हैं। इस मत के अनुसार 'जीव नाना' हैं और ईश्वर एक है।
कुछ वेदान्ती जीवैक्यवाद मानते हैं। इनका कहना है कि 'अज्ञानरूप उपाधि से रहित शुद्धचैतन्य ईश्वर है, और अज्ञानरूप उपाधि से उपहित ( युक्त ) चैतन्य' जीव है। 'जीव' ही अपने अज्ञान के अधीन होकर जगत् का उपादान तथा निमित्त कारण बनता है। देहभेद से जीवभेद ( नाना जीव ) की प्रतीति केवल भ्रम है। वास्तव में जीव एक ही है। इस एक ही आत्मा (जीव) की गुरूपदेश से तथा शास्त्रविहित श्रवण-मननादि उपायों से मुक्ति ( मोक्ष ) होती है। शुक-वामदेवादि की मुक्ति का वर्णन अर्थवाद मात्र है। इस जीवैक्यवाद को ही 'दृष्टिसृष्टिवाद' कहते हैं। उक्त प्रतिबिम्बवाद में भी कतिपय वेदान्तियों के प्रतिबिम्ब के सम्बन्ध में विभिन्न मत पाये जाते हैं। विद्यारण्य 'प्रतिबिम्ब' को मिथ्या मानते हैं। क्योंकि इनके मत से दर्पण में अनिर्वचनीय मुखाभास की उत्पत्ति होती है उसे न छाया कह सकते हैं और न स्वतन्त्र द्रव्य ही कह सकते हैं तथा तद्गत 'तूला अविद्या' उसका उपादान कारण है। अतः आभास का ही नामान्तर प्रतिबिम्ब है, दर्पणावच्छिन्न चैतन्य अधिष्ठान है किन्तु विवरणकार प्रकाशात्मयति का कहना है कि 'प्रतिबिम्ब' का बिम्ब के साथ अभेद होने से प्रतिबिम्ब का स्वरूप सत्य है। इनके मत में मुखावच्छिन्न चैतन्य अधिष्ठान है
( जीवैक्यवाद दृष्टि-सृष्टिवाद )
और तद्गत 'तूला अविद्या' प्रतिबिम्ब का उपादान कारण है। आभासवाद और प्रतिबिम्बवाद में भेद इतना ही है कि आभासवाद में प्रतिबिम्ब अनिर्वचनीय है और उसका अधिष्ठान दर्पणादि उपाधि है, और विवरणकार के प्रतिबिम्बवाद में दर्पणस्थत्व और विपरीतदेशाभिमुखत्वादि धर्म अनिर्वचनीय हैं और उनका अधिष्ठान मुखादिक बिम्ब हैं इसलिये दोनों पक्षों में अनिर्वचनीयों का परिणामी उपादानकारण 'अज्ञान' ही है। यद्यपि प्रतिबिम्बवादी दोनों हैं तथापि प्रतिबिम्ब के मिथ्यात्व सत्यत्व के भेदमात्र से विद्यारण्यस्वामी 'आभासवादी' कहलाते हैं और प्रकाशात्मयति विवरणकार 'प्रतिबिम्बवादी' कहलाते हैं। संक्षेपशारीरककार सर्वज्ञात्म मुनि भी प्रतिबिम्बवादी हैं। इनके मत में अज्ञान एक ही है नाना नहीं। जैसे अनेक अनित्य व्यक्तियों में एक नित्य जाति रहती है अर्थात् जो-जो व्यक्ति नष्ट होती जाती है, उस-उस व्यक्ति को छोड़कर जाति अन्य व्यक्तियों के आश्रित टिकी रहती है, वैसे ही अनेक व्यक्तियों में एक ही अज्ञान रहता है। अतः एक अज्ञान के पक्ष में एक जीव के ज्ञानी हो जाने पर सभी जीवों के ज्ञानी हो जाने की शंका नहीं की जा सकती।
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जो-जो व्यक्ति ज्ञानी होता जाता है, उस-उस को छोड़कर अन्य व्यक्तियों में अज्ञान बना रहता है। अर्थात् एक के ज्ञानी हो जाने पर सभी ज्ञानी नहीं होते।
कतिपय वेदान्तियों ने एक अज्ञान के होने पर भी उसके कार्य अनन्त माने हैं। उनका कहना है कि जैसे एक आकाश में पक्षी का भाव और अभाव दोनों रहते हैं, वैसे ही एक शुद्ध ब्रह्म में अज्ञान है और नहीं भी। अज्ञान एक होने पर भी वह सांश है। ज्ञान से उसका अंश नष्ट हो जाता है और अंशान्तर शेष रह जाता है। अतः बद्ध-मुक्त व्यवस्था बन जाती है। कुछ लोगों का मत है कि ईश्वर बद्धजीवों के प्रति मायाजाल फैलाता है और मुक्तपुरुषों के प्रति उसे समेट लेता है। माया का संकोच और विकास स्वाभाविक है। वस्तुतः एक ही अखण्ड वस्तु सत् है। बद्ध-मुक्त व्यवस्था अविद्या का विलासमात्र है। विवरणकार ईश्वर को ही बिम्ब मानते हैं। अतः इनके अनुसार अविद्यागत प्रतिबिम्ब जीव और बिम्बचैतन्य 'ईश्वर' है। इस मत में जीव की स्वतन्त्रता और सर्वज्ञता पर कोई आंच नहीं आने पाती। जो लोग ईश्वर को प्रतिबिम्ब मानते हैं, वे ईश्वर की सर्वज्ञता आदि की सुरक्षा नहीं कर पाते। क्योंकि उपाधि का प्रभाव सर्वदा प्रतिबिम्ब पर पड़ा करता है, बिम्ब पर नहीं। अतः ईश्वर को प्रतिबिम्ब मानने के पक्ष में उसे नित्य निर्दोष कैसे कहा जा सकेगा? अवच्छेदवादी वाचस्पति मिश्र के मत से मायावच्छिन्न चैतन्य ईश्वर और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य जीव है। वेदान्त-परिभाषाकार ने विवरणकार के प्रतिबिम्बवाद का ही आश्रय लिया है। क्योंकि जैसे जल में एक व्यापक रूप आकाश स्वतः रहता है और दूसरा महाकाश का प्रतिबिम्बरूप आकाश भी है, वैसे ही देहधारी प्राणियों में भी जीव और अन्तर्यामी रूप द्विगुणित चैतन्य की उपपत्ति हो सकती है। इस पक्ष में एक जीववाद को लेकर प्रतिकर्म की व्यवस्था जलसूर्यकादि दृष्टान्त से हो जाती है। एवम् इस मत में 'शब्द' से अपरोक्ष ज्ञान होता है। किन्तु वह होता है केवल अधिकारी को ही। अतएव 'दशमस्त्वमसि' आदि वाक्यों से ही भ्रान्त हुए दशम ने अपना प्रत्यक्ष (साक्षात्कार) किया। दुर्योधन ने द्रौपदी के अन्धे का पुत्र अन्धा' इस वाक्य से ही उसके या पाण्डवों के अभिमान का तत्काल ही साक्षात्कार किया था।
भामतीकार वाचस्पति मिश्र का कहना है कि 'गन्धरसस्पर्शादीनां कीदृशी प्रतिबिम्बता' के अनुसार नीरूप ब्रह्म का प्रतिबिम्बत होना संभव नहीं। अतः घटाकाश के दृष्टान्त से अवच्छेदवाद ही उचित है।
यद्यपि ग्रीवा-स्थित मुख और दर्पणगत मुख में भिन्नता दीखती है, जैसे बिम्बभूत मुख पूर्वाभिमुख हो तो दर्पणगत पश्चिमाभिमुख दीख पड़ता है। तथापि दर्पणगत मुख के लिये 'यह मेरा ही मुख है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है। अतः उसमें भेद-प्रत्यक्ष को भ्रम मानना उचित है। क्योंकि दर्पण में बिम्ब से
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अतिरिक्त मुख की उत्पत्ति का कोई साधन नहीं है। दर्पणादि उपाधि के अवयवों का वैसा परिणाम होना संभव नहीं। प्रथम तो प्रतिबिम्ब में दीखता हुआ निम्नोन्नत भाव दर्पण का स्पर्श करने से नहीं मालूम होता है, और बिम्ब की अपेक्षा उपाधि के तारतम्य के अनुसार छोटे या बड़े प्रतिबिम्ब दीख पड़ने से बिम्ब की मुहर भी प्रतिबिम्ब को नहीं कह सकते। मुहर की छाप में न्यूनाधिक परिणाम नहीं आ सकता। और बिम्ब से दर्पणादि उपाधि का मुहर की तरह अत्यन्त व्यवधानशून्य संयोग न होने पर भी प्रतिबिम्ब दीख पड़ता है। मुहर की छाप छिद्रशून्य संयोग के बिना नहीं हो सकती। किञ्च बिम्बसन्निधान के हटते ही प्रतिबिम्ब भी नहीं रह जाता। अतः प्रतिबिम्ब को बिम्ब से अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता। परन्तु शुक्तिरजत की तरह उसे मिथ्या भी नहीं कह सकते, क्योंकि प्रतीयमान वस्तु का मिथ्यात्व, बाध के पश्चात् ही सिद्ध होता है। शुक्तिरजत स्थल में तो 'यह रजत नहीं है' ऐसा बाध होता है। प्रकृत में 'यह मेरा मुख नहीं है' ऐसा बाध नहीं होता, किन्तु दर्पण में मेरा मुख नहीं है' इस प्रकार देशविशेष के संबन्ध का ही बाध होता है। अतः जीव और ब्रह्म के वास्तविक ऐक्य का होना असङ्गत नहीं है। अमूर्त आकाश का भी प्रतिबिम्ब दीखता है। अतः नीरूप होने पर भी आत्मा का प्रतिबिम्ब हो सकता है। ग्रीवास्थ मुख का दर्पण में दीख पड़ना स्वप्न में अपने शिरश्छेद के दीखने के तुल्य मायामय होने से असंभव नहीं है। जीव तथा ब्रह्म का ऐक्य होते हुए भी जैसे देवदत्त आदि द्रष्टा प्रतिबिम्बगत मलिनतादि दोषों के सद्भाव का अपने बिम्बभूत मुख में अनुभव नहीं करता, वैसे ही जीवगत भ्रम आदि दोषों का अनुभव या संसर्ग ब्रह्म में नहीं हो सकता। उपाधि का स्वभाव प्रतिबिम्ब में ही दोषों का संसर्ग कर सकता है, बिम्ब में नहीं। इस उपाधि के विनाश से शुद्ध (बिम्ब-प्रतिबिम्बभावरहित) ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है। इस प्रकार 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्य से सिद्ध जीव-ब्रह्मैक्य की सिद्धि हो जाती है। प्रतिबिम्बवाद का समर्थन 'रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' इत्यादि श्रुति तथा 'एकधा बहुधा चैव दृश्यते जल-चन्द्रवत्' इत्यादि स्मृति एवं 'अतएव चोपमा सूर्यकादिवत्' इत्यादि सूत्ररूप प्रमाणों से होता है। प्रतिबिम्बवाद के आगमप्रमाण द्वारा सिद्ध होने से 'नीरूप का प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता' इत्यादि प्रत्यक्षादि विरोध बाधित हो जाते हैं, क्योंकि श्रुत्यादिरूप आगमप्रमाण सबसे प्रबल माना जाता है। आकाशादि दृष्टान्त का तात्पर्य तो केवल ब्रह्म की असंगता का बोधन करने के लिये है। प्रतिबिम्बवाद का खण्डन करके अवच्छेदवाद के समर्थन में नहीं है। यद्यपि सोपाधिक भ्रमस्थल में उपाधिरूप दोष की निवृत्ति से ही भ्रम की निवृत्ति देखी गई है, अधिष्ठान के ज्ञान से नहीं। अतः जीव और ब्रह्म के भेद की
[प्रतिबिम्बवाद का उपपादन]
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निवृत्ति भी अधिष्ठानभूत ब्रह्म साक्षात्कार से मानना संगत न होगा। यह आशंका करना उचित नहीं है, क्योंकि प्रकृत में अहंकाररूप उपाधि, जिसके कारण कर्तृत्व आदि धर्मविशिष्ट जीव की कल्पना होती है वह अधिष्ठान तत्त्वसाक्षात्कार से ही निवृत्त होने योग्य है, क्योंकि अहंकार मूल-अविद्या का कार्य होने से निरुपाधिक भ्रम ही है। इसलिये अहंकारोपाधिक कर्तृत्व आदि सोपाधिकभ्रम की निवृत्ति अधिष्ठान तत्त्वस्वरूप ब्रह्म के साक्षात्कार से अवश्य हो सकती है।
वस्तुतः प्रतिबिम्बवाद और अवच्छेदवाद दोनों कल्पनामात्र है। आत्मा की वास्तविक असंगता घटाकाशादि दृष्टान्त से अधिक स्पष्ट हो जाती है। इसलिये अवच्छेदवाद की कल्पना की गई है। और अल्पज्ञत्व, सर्वज्ञत्व, सांसारिकत्व, मुक्तत्वादि व्यवस्था प्रतिबिम्ब पक्ष में सुगम होती है, इसलिये प्रतिबिम्बवाद की कल्पना की गई है।
जीव ब्रह्मैक्यज्ञान की प्राप्ति के लिये साधन चतुष्टय-सम्पन्न होना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि साधन-चतुष्टय-सम्पन्न हुआ व्यक्ति ही वेदान्त श्रवण का अधिकारी है। वह अधिकारी व्यक्ति जब किसी शान्त, दान्त अहेतुककृपाकारी,
| साधन चतुष्टय सम्पत्ति की आवश्यकता तथा अध्यारोप और अपवाद का निरूपण | ब्रह्मज्ञानी गुरु की शरण में जाता है और आत्मविषयक प्रश्न करता है, तब वे गुरु 'अध्यारोप और अपवाद' विधि से ब्रह्म का उपदेश करते हैं। निष्प्रपञ्च ब्रह्म में जगत् का आरोप करना अध्यारोप है। और आरोपित वस्तु का एक-एक करके निराकरण करना अपवाद है।<br>आत्मा पर प्रथमतः शरीर का आरोप कर दिया जाता |
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है। पश्चात् युक्तिपूर्वक आत्मा को अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय इन पंचकोशों से अतिरिक्त अर्थात् स्थूल-सूक्ष्म कारण शरीरों से पृथक् सिद्ध करता है। इस रीति से आत्मस्वरूप का ज्ञान गुरु कराता है। गुरु अपने शिष्य को 'तत् त्वमसि' आदि महावाक्यों के द्वारा बताता है कि तुम (जीव) वही (ब्रह्म) हो। इस वाक्य से सोपाधिक अर्थात् क्लेशकर्मादिकों से बद्ध जीव की निरुपाधिक अर्थात् शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव ब्रह्म के साथ एकता बताई जाती है। परन्तु यहाँ यह जिज्ञासा पैदा होती है कि ब्रह्म और जीव दोनों विरुद्धधर्मों के आधार हैं, अतः उनमें एकता कैसे हो सकती है। उसका समाधान वेदान्तिगण करते हैं कि अविद्या वृत्ति के द्वारा उक्त वाक्य का यथार्थ बोध नहीं हो सकता। अतः अगत्या तात्पर्य की अनुपपत्ति होने से लक्षणा करनी पड़ती है, जिससे यथार्थ बोध होता है।
लक्षणा भी तीन प्रकार की होती है—जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा, और जहदजहल्लक्षणा (भागत्यागलक्षणा)। उक्त वाक्य के 'तत्' और 'त्वम्' पद अपने अर्थ 'चैतन्य' का त्याग नहीं करते। अतः इस जहल्लक्षणा के द्वारा
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'अभेद' अर्थ सिद्ध नहीं हो सकता। अजहल्लक्षणा के द्वारा 'अभेद' अर्थ इसलिये सिद्ध नहीं हो सकता कि इस लक्षणा में मुख्यार्थ का त्याग नहीं किया जाता। अतः मुख्यार्थ का त्याग न करने पर 'अभेद' अर्थ सिद्ध नहीं होगा। इसलिये तीसरे प्रकार की लक्षणा यहाँ की जाती है। यहाँ 'तत्' का अर्थ परोक्षत्वविशिष्ट चैतन्य है, और 'त्वम्' का अर्थ अपरोक्षत्वविशिष्ट चैतन्य है। यहां चैतन्यांश में विरोध नहीं है। केवल परोक्षत्व और अपरोक्षत्व इन अंशों में ही परस्पर विरोध है। अतः इन विरुद्ध अंशों का परित्याग कर अखण्ड चैतन्यांश का परिग्रह कर लिया जाता है। इस कारण इस लक्षणा को जहद्-अजहद्-लक्षणा कहते हैं तथा एक ही भाग (अंश) के ग्रहण या त्याग करने के कारण भाववृत्ति या भाग-त्याग लक्षणा भी कहते हैं।
वार्तिककार सुरेश्वराचार्य के मत से तीन सम्बन्धों की सहायता से यह महावाक्य अखण्डार्थ का बोध कराता है। ( १ ) पदों का सामानाधिकरण्य, ( २ ) पदार्थों का विशेषण-विशेष्यभाव, ( ३ ) आत्मा और ब्रह्म का लक्ष्य-लक्षण भाव।
किन्तु वेदान्त परिभाषाकार धर्मराजाध्वरीन्द्र ने बिना लक्षणा के ही 'तत्त्व-मसि' महावाक्य से अखण्डार्थ का बोध माना है। उनका कहना है कि 'तत्त्व-मसि' महावाक्य में विशिष्टवाचक पदों को एकदेशपरत्व रहने पर भी लक्षणा की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि शक्तिवृत्ति से उपस्थित हुए विशिष्टों का जब अभेदान्वय ( अभेद ) नहीं बन सकेगा तो शक्तिवृत्ति से ही उपस्थित हुए विशेष्य भागों में अभेदान्वयबोध का स्वयं पर्यवसान होगा, जैसे—'घटोऽनित्यः'
[परिभाषाकार के मत में लक्षणा के बिना ही महावाक्यार्थ का बोध] इस स्थल में घटपद के वाच्य का एक देश जो घटत्व, वह अनित्य पदार्थ के साथ अन्वित होने के योग्य न होने पर भी अन्वय के योग्य जो घटव्यक्ति, उसके साथ 'अनित्यत्व' का अन्वय स्वयं हो जाता है। अतः लक्षणा की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं है। पदार्थ के एक देश की विशेषण रूप से स्वातन्त्र्येण उपस्थिति कराने के लिये लक्षणा की आवश्यकता होती है। जैसे 'घटो नित्यः' में केवल घट पद से शक्तिवृत्ति द्वारा स्वतन्त्र रूप से 'घटत्व' धर्म की उपस्थिति न होने से उसे उपस्थित कराने के लिए 'घट' पद की 'घटत्व' में लक्षणा करनी पड़ती है। एवं च 'तत्त्वमसि' महावाक्य में शक्ति-वृत्ति से स्वातन्त्र्येण उपस्थित हुए तत्त्व पदार्थों के अभेदान्वय बोधन में कोई अड़चन नहीं है।
'तत् त्वम्' पदार्थ का अभेदज्ञान होने पर, जीव-ब्रह्म की भेदबुद्धि से पैदा हुए सम्पूर्ण क्लेशों की निवृत्ति ही नहीं, अपितु 'आनन्दरूपमोक्ष' की प्राप्ति होती है। एवं च 'सत्, चित्, आनन्दरूप ब्रह्म' की अनुभूति होती है। मुक्तात्मा
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| महावाक्यार्थ के ज्ञान से मोक्ष-प्राप्ति तथा मुक्त की चर्या | पुरुष को किसी प्रकार की आकांक्षा न रहने पर भी वह लोक-कल्याणार्थ अनासक्त भाव से कर्म करता रहता है। क्योंकि आसक्तिपूर्वक किया हुआ कर्म ही 'बन्धन' का हेतु होता है। पूर्ण ज्ञानी एवं पूर्ण आनन्द को प्राप्त किया हुआ व्यक्ति आसक्ति से रहित हो जाता |
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है। उसे किसी वस्तु की इच्छा नहीं रहती। वह लाभ, हानि, हर्ष, विषाद से प्रभावित नहीं होता। किन्तु जिसे पूर्णज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई हो उसे आत्म-शुद्धि के लिये निष्काम कर्म का अनुष्ठान अत्यावश्यक है। अहङ्कार और स्वार्थ के बन्धन से मुक्त होने के लिये निष्काम कर्म करना आवश्यक है, न कि निष्क्रियता। जीव ब्रह्मैक्य साक्षात्कार के होने से मोक्ष हो जाने पर भी शरीर रह सकता है, क्योंकि वह प्रारब्धकर्मों का फल है। संसाररूप मिथ्या प्रपञ्च उसके सामने रहने पर भी वह उससे ठगा नहीं जाता। सांसारिक विषयों में उसे तृष्णा नहीं रहती। अतएव उसे कोई दुःख नहीं होता। वह अपने को शरीररूप नहीं समझता। वह संसार में रहते हुए भी उससे बाहर है। ऐसे व्यक्ति को जीवन्मुक्त कहते हैं। अर्थात् जीवित अवस्था में ही वह मुक्ति पा जाता है। स्वर्ग की तरह यह मुक्ति अज्ञात तथा भविष्य की कोई अलौकिक वस्तु नहीं है। शास्त्र में निष्ठा रखकर साधक को आगे बढ़ना पड़ता है, उसके विश्वास का फल उसे इसी जीवन में मिल जाता है।
ये कर्म भी तीन प्रकार के होते हैं ( १ ) सञ्चित ( पूर्वकाल के वे कर्म जो जमा हैं ) ( २ ) प्रारब्ध ( पूर्वकाल के वे कर्म जिनका फलभोग हो रहा है) ( ३ ) क्रियमाण या सञ्चीयमान ( वे नये कर्म जो इस जीवन में जमा हो रहे हैं )।
| तत्त्वज्ञान से सञ्चित-क्रियमाण कर्मों का विनाश किन्तु प्रारब्धकर्म का भोग से ही विनाश और विदेह मुक्ति | तत्त्वज्ञान से अनारब्ध फलक का सञ्चित तथा अनारब्धफलक क्रियमाणकर्म का विनाश हो जाता है और पुनर्जन्म के बन्धन से छुटकारा मिल जाता है परन्तु प्रारब्ध कर्म का निवारण नहीं किया जा सकता। उसका फलभोग करने के लिये यह शरीर ( जो प्रारब्ध का फल है ) विद्यमान रहता है। जब प्रारब्धफलभोग के द्वारा प्रारब्ध कर्म समाप्त हो जाता है तब शरीर का भी अन्त हो जाता है। जैसे कुलाल चक्र, दण्ड के हटा लेने पर भी कुछ देर तक |
|---|
घूमता रहता है और घूमते घूमते वेग शान्त होने पर अपने आप रुक जाता है, उसी तरह प्रारब्धकर्म का भोग के द्वारा विनाश हो जाने पर स्थूल और सूक्ष्म शरीर का अन्त हो जाता है तब विदेह मुक्ति कही जाती है।
वस्तुतः मुक्ति न तो उत्पन्न होती है और न पहले से अप्राप्त है। वह तो प्राप्त ही की प्राप्ति है। बन्धन की अवस्था में जो सत्त्व, अज्ञात रूप से विद्यमान
( ३८ )
रहता है, उसका साक्षात् अनुभव ही मुक्ति है। जैसे कण्ठस्थित मुक्ताहार को विस्मरणवश इधर उधर ढूँढ़ते फिरते हैं अन्त में अपनी ओर देखनेपर वह हार मिल जाता है उसी तरह मुमुक्षु को मोक्षप्राप्ति के लिए इधर उधर भटकने की आवश्यकता नहीं है, केवल अपने को समझने की आवश्यकता है। बन्धन अज्ञानकृत है। उस अज्ञान रूप आवरण को दूर कर देना ही मुक्ति है।
वेदान्त परिभाषा ग्रन्थ का स्वरूप परिचय
प्रस्तुत वेदान्तपरिभाषा नामक प्रकरण ग्रंथ में आठ परिच्छेद हैं। उनमें से छः परिच्छेदों में छः प्रमाणों का तथा सप्तम परिच्छेद में जीव-ब्रह्मैक्यरूप प्रमेय का और अष्टम परिच्छेद में सपरिकर मोक्ष का निरूपण किया गया है।
विवरण और भामती प्रस्थान में भेद
वेदान्त-शास्त्र में मुख्यतया विवरण प्रस्थान और भामती प्रस्थान प्रसिद्ध हैं। ये दोनों प्रस्थान व्याख्या उपव्याख्याओं से अच्छी तरह सुसमृद्ध हैं। दोनों का लक्ष्य अद्वैततत्त्व का निर्धारण करना ही है। तथापि उस अद्वैततत्त्व के निर्धारण में उपायभूत प्रसिद्ध व्यावहारिक प्रमेयों में कहीं-कहीं ऐकमत्य परिलक्षित नहीं होता है।
| विवरणकार के मत से | भामतीकार के मत से |
|---|---|
| १. ब्रह्म-विचार श्रवण विधि प्रयुक्त है। | ब्रह्म-विचार अध्ययन-विधि प्रयुक्त है। |
| २. कर्म, विचार्य है। | कर्म, विविदिषार्थ है। |
| ३. मन, इन्द्रिय नहीं है। | मन, इन्द्रिय है। |
| ४. श्रवण-मनन-निदिध्यासन में श्रवण विधेय और मनन-निदिध्यासन उसके अंग हैं। | श्रवण, विधेय नहीं है और श्रवण-मनन, निदिध्यासन के अङ्ग हैं। |
| ५. जीव, प्रतिबिम्बरूप है। | जीव, अन्तःकरणावच्छिन्न है। |
| ६. शुद्ध चैतन्य में अज्ञानाश्रयता है। | जीव में अज्ञानाश्रयता है। |
| ७. अज्ञान, एक है। | अज्ञान, अनेक है। |
| ८. शुद्ध ब्रह्म, वृत्ति का विषय है। | उपहित ब्रह्म, वृत्ति का विषय है। |
| ९. अध्ययन-विधि का प्रयोजन अक्षर-ग्रहण है। | अध्ययन-विधि का प्रयोजन अर्थ-ज्ञान है। |
| १०. भौतिक पदार्थ पञ्चीकृत हैं। | भूतों को त्रिवृत्कृत बताया है। |
| ११. सादृश्य, अध्यास के कारण नहीं है। | सादृश्य, अध्यास में कारण है। |
| १२. शब्द से अपरोक्ष ज्ञान होता है। | शब्द से अपरोक्ष ज्ञान नहीं होता है। |
| १३. स्वप्नप्रपञ्च अविद्या का परिणाम है। | स्वप्नप्रपञ्च, मन का परिणाम है। |
इसके अतिरिक्त और भी कितने ही स्थलों पर वैमत्य है। किन्तु इस वैमत्य से अद्वैत सिद्धान्त की कोई हानि नहीं है। सभी प्रस्थानों का उपेय तो एक ही है। उपाय मात्र भिन्न-भिन्न हैं। इसी अभिप्राय से वार्तिककार ने कहा है—
( ३६ )
"यया यया भवेत् पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि ।
सा सैव प्रक्रियेह स्यात् साध्वी सा चानवस्थिता ॥"
वेदान्तपरिभाषाकार की विवरणानुगामिता तथा क्वचित्-क्वचित् अननुगामिता
यह वेदान्त-परिभाषा नामक प्रकरणग्रन्थ विवरणप्रस्थान को आधार मानकर रचा गया है। कहीं-कहीं भामतीकार के मत को भी प्रदर्शित किया है किन्तु उधर ग्रन्थकार का झुकाव नहीं है। क्योंकि 'मन की अनिन्द्रियता', 'ज्ञान का प्रत्यक्षत्व' 'शाब्दापरोक्षत्व', 'जीवप्रतिबिम्बत्व', 'श्रवणविधेयत्व', आदि का विशेष रूप से समर्थन करना ही विवरणानुयायित्व को प्रकट कर रहा है। परन्तु कहीं-कहीं विवरणमत से वैमत्य भी दिखलाई पड़ता है।
| विवरणकार | परिभाषाकार |
|---|---|
| १. अनधिगतार्थविषयकबोध ही 'प्रमा' है। | अनधिगत-अबाधित अर्थविषयक ज्ञान ही 'प्रमा' है। |
| २. स्मृति, प्रमारूप नहीं है। | स्मृति, प्रमारूप है। |
| ३. अविद्याप्रतिबिम्बितचैतन्य ही 'जीव' है। | अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य 'जीव' है। |
| ४. अन्तःकरण दो प्रकार का है। | अन्तःकरण चार प्रकार का है। |
| ५. सादृश्य, अध्यास के होने में कारण नहीं है। | सादृश्य, अध्यास के कारण है। |
| ६. प्रातिभासिक अध्यासों की अवस्था, अज्ञान का कार्य है। | प्रातिभासिक अध्यास, तूलाज्ञान का कार्य है। |
| ७. स्फटिकगतलौहित्य, अनिर्वचनीय है। | स्फटिकगत लौहित्य सत्य है। |
| ८. व्याप्तिज्ञान, अनुमिति के प्रति कारण नहीं है। | व्याप्तिज्ञान, अनुमिति के प्रति कारण है। |
| ९. शाब्दबोध में तात्पर्यज्ञान हेतु नहीं है। | तात्पर्यज्ञान शाब्दबोध में हेतु है। |
| १०. अभावज्ञान की अप्रत्यक्षता। | अभावज्ञान की प्रत्यक्षता। |
इस ग्रन्थ की प्रमाण-प्रमेय प्रतिपादन की शैली अपने ढंग की अनोखी है। इस स्वल्पकाय ग्रन्थ में सभी आवश्यक विषयों को बताया गया है। उनमें भी कतिपय विशिष्ट विषय—जैसे 'मन का' अनिन्द्रियत्व। 'वह्निमान् पर्वतः' में पर्वतांश की प्रत्यक्षत्वव्यवस्था। ज्ञानगतप्रत्यक्ष और विषयगतप्रत्यक्ष के भिन्न-भिन्न प्रयोजक। शब्द से भी प्रत्यक्षज्ञान की उत्पत्ति। जातिशक्तिवाद। अर्थापत्ति तथा अनुपलब्धि का पृथक् प्रमाणत्व। स्वतः प्रामाण्यवाद। महावाक्य में लक्षणा का खण्डन। एक अविद्यापक्ष का स्वीकार आदि विशिष्ट विषयों का प्रतिपादन इस ग्रन्थ में किया गया है।
( ४० )
आचार्य शंकर के अद्वैत सिद्धान्तों को हृदयंगम करने में यह 'वेदान्त-परिभाषा' नामक प्रकरणग्रन्थ नितान्त उपकारक है। आचार्य शंकर के अद्वैत-सिद्धान्त से भारतीयजीवन अत्यधिक प्रभावित है। जड-चेतन पदार्थों को, मनुष्यों
| आचार्य शंकर के अद्वैतसिद्धान्त का समर्थन | तथा देवताओं को उस परमपुरुष का अंग माना गया है। उसी परमपुरुष को सत्-चित्-आनन्द-ब्रह्म बताया गया है। सत्-चित्-आनन्द-ब्रह्म ये सभी शब्द एकार्थक हैं। इस सत् से ही संसार की उत्पत्ति हुई है, उसी पर यह संसार आश्रित है तथा प्रलय होने पर इसी में विलीन हो जाता है। |
|---|
संसार का नानात्व असत्य है और उसकी एकता ही एकमात्र सत्य है। १ अर्थात् संसार में एक ही सत्ता है। आत्मा या ब्रह्म ही एकमात्र सत्ता है, वह अनन्त ज्ञान तथा अनन्त आनन्द है। उसके अन्तर्गत कोई दूसरी सत्ता नहीं है। ब्रह्म ही एकमात्र विशुद्ध सत्ता है। तथापि अविद्या के कारण उसमें अनेक की प्रतीति होती है। अर्थात् अविद्या के कारण ब्रह्म का सत्य स्वरूप न जानकर हम उसे नानारूप में देखते हैं। यदि अज्ञान न होता तो हमें ब्रह्म की अनेकरूपता का भ्रम न होता। माया; अविद्या, अज्ञान वास्तव में एक ही हैं। दृष्टिभेद से यह भिन्न सी लगती हैं। माया (अज्ञान) और ब्रह्म दो शब्दों का प्रयोग करने पर भी विशुद्ध अद्वैत के प्रतिपादन में कोई बाधा उपस्थित नहीं हो पाती। क्योंकि माया को उस परमेश्वर ब्रह्म की ही एक शक्ति कहा है। आचार्य शंकर ने अद्वैत को हृदयंगम कराने के लिये दो दृष्टियाँ बताई हैं—एक व्यावहारिक-दृष्टि और दूसरी पारमार्थिक-दृष्टि। पहिली दृष्टि साधारण मनुष्यों के लिये है जो संसार को सत्य मानते हैं; हमारा व्यावहारिक जीवन इसीपर निर्भर है। इस दृष्टि के अनुसार आचार्य शंकर ब्रह्म को सगुण या ईश्वर कहते हैं। दूसरी दृष्टि ज्ञानियों की है, जो संसार को मायिक और ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई सत्ता नहीं है, ऐसा समझते हैं। इस दृष्टि के अनुसार ब्रह्म निर्गुण है। इस दृष्टि के अनुसार आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं रह जाता। यह पारमार्थिक दृष्टि अविद्या के दूर होने पर ही संभव है। अविद्या का नाश वेदान्त के ज्ञान से ही होता है। इस अज्ञान के कारण ही यह जीव अपने को ब्रह्म से पृथक् समझता है। मिथ्याज्ञान (अज्ञान) के दूर होने पर उसके दुःखों का भी अन्त हो जाता है। जिस तरह ब्रह्म आनन्दमय है उसी तरह आत्मा भी आनन्दमय हो जाती है। इति शम्।
—गजाननशास्त्री मुसलगांवकर
१. 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म, नेह नानास्ति किञ्चन ।'
॥ श्रीः॥
विद्याभवन संस्कृत ग्रन्थमाला
१००
श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्रविरचिता
वेदान्तपरिभाषा
सविवरण 'प्रकाश' हिन्दीव्याख्योपेता
व्याख्याकार
वेदान्त-मीमांसा-साहित्याचार्य-
डॉ० श्रीगजानन शास्त्री मुसलगांवकर
एम. ए., पी-एच. डी.
अध्यक्ष—
मीमांसा-धर्मशास्त्रविभाग, प्राच्यविद्या-धर्मविज्ञान-संकाय,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
सम्पादक
श्री श्रीरामशास्त्री मुसलगाँवकर
चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-२२१००१
१९८३
विषय-विन्यास
प्रत्यक्ष-परिच्छेदः
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| मंगलाचरण | १ |
| ग्रन्थारम्भ-प्रतिज्ञा | ५ |
| मोक्ष ही परम पुरुषार्थ है और ग्रन्थ का प्रतिपाद्य विषय | ६ |
| प्रमाण और प्रमा का लक्षण—प्रमा के भेद और उसके सम्बन्ध में विचार | ६ |
| प्रमाण के भेद तथा प्रत्यक्ष प्रमाण का निरूपण | २० |
| प्रत्यक्ष प्रमा के सिद्धान्त पर शंका-समाधान | २४ |
| प्रत्यक्ष में अन्तःकरण की परिणामात्मक वृत्ति पर विचार | २६ |
| अन्तःकरण के सावयव होने का प्रतिपादन | २७ |
| कामादिक मनोधर्म हैं—इस पर शंका समाधान | ३० |
| मन के इन्द्रियत्व का खण्डन | ३१ |
| मन की अनिन्द्रियता पर शंका-समाधान | ३५ |
| ज्ञप्तिगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक कौन है | ३७ |
| वृत्ति के बहिर्निर्गमन का प्रकार | ३६ |
| प्रत्यक्षप्रमा में प्रत्यक्षलक्षण का समन्वय | ४१ |
| विचार का निष्कर्ष | ४२ |
| सुखादिकों के प्रत्यक्ष में चक्षुरादिसन्निकर्ष की अनपेक्षता | ४३ |
| स्मर्यमाण सुख में प्रत्यक्षलक्षण की अतिव्याप्ति और उसका निरास | ४४ |
| पूर्वोक्त समाधान में अरुचि होने से दूसरा समाधान | ४५ |
| धर्माधर्मविषयक शाब्द ज्ञान में पुनः अतिव्याप्ति और उसका निरसन | " |
| 'त्वं सुखी' इस ज्ञान पर पुनः शंका-समाधान | ४८ |
| वह्नि की अनुमिति में 'पर्वत' अंश का प्रत्यक्ष होता है | ५० |
| न्यायमत में लोक-प्रसिद्धि का अतिक्रमण | " |
| असन्निकृष्टपक्षक अनुमिति में ज्ञान सभी अंशों में परोक्ष होता है | ५२ |
| 'सुरभि चन्दनम्' इस ज्ञान में भी 'चन्दन खण्ड' का प्रत्यक्ष और 'सौरभ' अंश का प्रत्यक्ष होता है | " |
| प्रसङ्गप्राप्त जातिखण्डन | ५४ |
| समवायखण्डन | ( टीका ) ५७ |
( ४२ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| एक ही प्रमात्मक चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्व रूप—परस्पर विरुद्ध दो धर्मों के रहने में कोई विरोध नहीं है | ६१ |
| ज्ञप्तिगत प्रत्यक्ष का निष्कृष्ट लक्षण | ,, |
| विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक | ६२ |
| उस पर शंका-समाधान | ६३ |
| लक्षण में 'प्रमातृचैतन्य' क्यों नहीं कहा | ६५ |
| इसी पर अनेक शंकाएँ और समाधान | ६६ |
| विषयप्रत्यक्ष का निष्कृष्ट लक्षण | ७३ |
| वृत्ति के चार प्रकार | ७४ |
| सविकल्पक और निर्विकल्पक भेद से प्रत्यक्ष के दो प्रकार | ७६ |
| 'सोऽयम्' इत्याकारक शब्द ज्ञान में निर्विकल्पक प्रत्यक्षत्व का व्यवस्थापन | ७८ |
| वेदान्तवाक्यों की अखण्डार्थपरता | ८३ |
| जीवसाक्षी और ईश्वरसाक्षी के भेद से प्रत्यक्ष के पुनः दो भेद | ८५ |
| विशेषण और उपाधि के लक्षण | ,, |
| नैयायिक लोग उपाधि को ही 'परिचायक' कहते हैं | ,, |
| प्रत्येक जीवात्मा का साक्षिचैतन्य भिन्न-भिन्न होता है | ८७ |
| ईश्वरसाक्षिचैतन्य तथा माया की एकता और अनादिता | ८८ |
| ईश्वर का स्वरूप और वही ब्रह्मादि शब्दों से वाच्य है | ९२ |
| औपाधिक सादित्व होने पर की चैतन्य के स्वाभाविक अनादित्व बाध नहीं | ९४ |
| ज्ञप्तिगत प्रत्यक्ष का सामान्य लक्षण | ९६ |
| शुक्ति-रजत के प्रत्यक्ष पर विचार | ९७ |
| उस पर अन्यथाख्यातिवादी का शंका-समाधान | ९९ |
| अनिर्वचनीय रजत की उत्पत्ति | १०३ |
| तूलाविद्या और मूलाविद्या में अन्तर ( टीका | १०४ |
| परिणाम और विवर्त के लक्षण | १०७ |
| प्रातिभासिक रजत, अविद्या का परिणाम है और चैतन्य का विवर्त है | ,, |
| रजत का साक्षी में अध्यास तथा विविध आध्यासिक प्रत्यय | १०८ |
| रजतविषयक अविद्यावृत्ति के निष्प्रयोजनत्व की शंका समाधान | ११४ |
| रजतवृत्ति और इदंवृत्ति की भिन्नविषयता के स्वीकार करने पर गुरुमत के प्रवेश की आशंका | ११६ |
| प्रातिभासिक और व्यावहारिक पदार्थों में भेद | ११८ |
( ४३ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| स्वाप्नपदार्थ विचार | १२१ |
| स्वाप्नपदार्थों के शुद्धचैतन्य पर आरोप के अनौचित्य की आशंका | १२६ |
| कार्यविनाश की द्विविधता बताते हुए उसका समाधान | १३० |
| प्रातिभासिकसत्ता के स्वीकार करने पर निषेध की अनुपपत्ति और व्यधिकरणधर्मावच्छिन्न-प्रतियोगिताक-अभाव के स्वीकार करने पर उक्त अनुपपत्ति का निरास | १३४ |
| इसी प्रसंग पर कुछ शंका-समाधान | १३७ |
| उक्त प्रत्यक्ष के प्रकारान्तर से पुनः दो विभाग | १४२ |
| पाँच इन्द्रियाँ | १४३ |
अनुमान-परिच्छेदः
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| अनुमान-प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा तथा अनुमान का लक्षण | १४८ |
| असाधारण कारणत्वरूप का खण्डन | १५० |
| अनुमिति में व्याप्तिज्ञान की करणता पर शंका-समाधान | १५४ |
| उद्बुद्ध संस्कार से ही अनुमिति होती है | १५६ |
| अनुमिति में व्याप्तिस्मरण आदि की हेतुत्वेन कल्पना का खण्डन | १५८ |
| 'पर्वतो वह्निमान्' इत्याकारक अनुमित्यात्मक ज्ञान का खण्डन | १६० |
| व्याप्तिस्वरूप का उपपादन | १६१ |
| अनुमान की त्रिविधता का अनंगीकार | १६३ |
| अनुमान के दो भेद | १६६ |
| प्रकृत में अनुमान का उपयोग | १६८ |
| मिथ्यात्व का लक्षण | १६६ |
| मिथ्यात्व में अनुमान प्रमाण | १७२ |
| मिथ्यात्व के अनुमान पर शंका-समाधान | १७४ |
| पूर्वोक्त समाधान में अरुचि होने पर दूसरा समाधान | १७६ |
उपमान-परिच्छेदः
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| उपमान प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा तथा उपमान प्रमाण का लक्षण | १७६ |
| उपमान को स्वतन्त्र प्रमाण मानने की आवश्यकता | १८२ |
आगम-परिच्छेदः
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| आगमप्रमाण (शब्दप्रमाण) के निरूपण की प्रतिज्ञा तथा उसका लक्षण और प्रमाणभूत वाक्य का लक्षण तथा उसकी शाब्द बोध में कारणता | १८७ |
( ४४ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| आकांक्षा पदों के अर्थ और उनके लक्षणों का निरूपण | १६१ |
| इसी प्रसंग में बलाबलाधिकरण पर विचार | १६५ |
| आकांक्षा के लक्षण पर शंका-समाधान | १६८ |
| योग्यता का लक्षण और उस पर विचार | २०२ |
| आसत्ति का लक्षण और उस पर विचार | २०४ |
| पदार्थ के दो भेद | २०७ |
| पद की शक्ति पर विचार | २१० |
| लक्ष्यपदार्थ के निरूपण की प्रतिज्ञा और लक्षणा पर विचार | २२१ |
| शक्यपरंपरासम्बन्धरूप द्वितीय लक्षणा का प्रकार | २२३ |
| लक्षितलक्षणा में गौणी का अन्तर्भाव | २२४ |
| प्रकारान्तर से लक्षणा के तीन प्रकार तथा जहल्लक्षणा का स्वरूप और उदाहरण | २२५ |
| अजहल्लक्षणा का स्वरूप और उदाहरण | २२८ |
| जहदजहल्लक्षणा का स्वरूप और उदाहरण | २२८ |
| 'सोऽयं देवदत्तः' 'तत्त्वमसि' में अपना मत | २३० |
| विशिष्ट वाचक पद में केवल विशेषण की उपस्थिति लक्षणा से होती है | २३२ |
| तत्त्वमसि आदि वाक्यों में लक्षणा के बिना ही अखण्डार्थ की उपपत्ति | २३३ |
| लक्षणा के तीन प्रकार बताने का उपयोग | २३५ |
| लक्षणा में बीज | २३६ |
| लक्षणा वाक्य में भी होती है | २३८ |
| इस पर शंका-समाधान | २३६ |
| लौकिक वाक्य के समान वैदिक वाक्य में भी लक्षणा होती है | २४० |
| वाक्यैकवाक्यता | २४३ |
| आसत्ति में शाब्दबोध की हेतुता | २४४ |
| तात्पर्य-निरूपण | २४५ |
| अद्वैतियों का तात्पर्य लक्षण | २४७ |
| उस पर शंका समाधान | २४६ |
| तात्पर्यनिराकरणपरक विवरणवाक्य के आशय का उद्घाटन | २५४ |
| रत्नकार के मत से तात्पर्यनिरसनपरक विवरणग्रन्थ की उपपत्ति | २५५ |
| तात्पर्यज्ञान किससे होता है ? | २५६ |
| सिद्धार्थप्रतिपादक वाक्यों की भी प्रामाणिकता | २५८ |
| वेदप्रामाण्य की स्थापना के लिये नैयायिक तथा मीमांसकों के मतों का प्रतिपादन | २५६ |
( ४५ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| वेदप्रामाण्य पर ग्रन्थकार का मत और उस पर शंका-समाधान | २६० |
| अपने सिद्धान्त की स्पष्टता | २६५ |
| अर्थापत्ति-परिच्छेदः | |
| अर्थापत्ति-निरूपण की प्रतिज्ञा और उसका लक्षण | २६६ |
| एक ही अर्थापत्ति शब्द, प्रमा और प्रमाण का वाचक है | २६७ |
| अर्थापत्ति के दो भेद और दृष्टार्थापत्ति का उदाहरण | २६८ |
| श्रुतार्थापत्ति का लक्षण और उदाहरण | २६९ |
| श्रुतार्थापत्ति के अवान्तर भेद | २७० |
| उस पर शंका-समाधान | २७२ |
| अभिहितानुपपत्तिरूप श्रुतार्थापत्ति का लक्षण और उदाहरण | २७३ |
| व्यतिरेक-व्याप्ति से अर्थापत्ति की अचरितार्थता | २७४ |
| उस पर शंका-समाधान | २७६ |
| नैयायिकों के व्यतिरेकी अनुमान का अनावश्यकता | २७७ |
| अनुपलब्धि-परिच्छेदः | |
| अनुपलब्धि प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा और उसका लक्षण | २७८ |
| उस पर शंका-समाधान | २८२ |
| योग्यानुपलब्धि में योग्यता के स्वरूप में अनेक विकल्पपूर्वक प्रश्न | २८३ |
| उनका समाधान | २८५ |
| अनुपलब्धि को पृथक् प्रमाण मानने पर शंका-समाधान | २८८ |
| अभाव के चार प्रकार | ३०० |
| प्रध्वंसाभाव का निरूपण | ३०१ |
| उस पर शंका-समाधान | ३०३ |
| अत्यन्ताभाव का निरूपण | ३०५ |
| अन्योन्याभाव का निरूपण | ३०६ |
| अन्योन्याभाव के भेद | ३०९ |
| उस पर शंका-समाधान | ३१० |
| अभाव की चतुर्विधता पर पूर्वाचार्यों की सम्मति | ३१२ |
| स्वतः प्रामाण्यवाद | ३१४ |
| अप्रामाण्य की परतोग्राह्यता | ३२३ |
| विषय-परिच्छेदः | |
| प्रमाणों में प्रामाण्य के दो प्रकार | ३२६ |
| 'तत्' पदार्थ के निरूपण की प्रतिज्ञा और लक्षण के दो प्रकार तथा स्वरूपलक्षण की परिभाषा तथा उस पर शंका-समाधान | ३२७ |
( ४६ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| तटस्थ लक्षण की परिभाषा | ३२८ |
| कर्तृत्व की परिभाषा | ३२६ |
| ज्ञान, इच्छा, कृति—तीनों मिलकर एक लक्षण नहीं हैं | ३३० |
| ब्रह्म का लघु लक्षण | ३३२ |
| उस पर शंका-समाधान | ३३३ |
| जगत् के जन्मक्रम और सूक्ष्म भूतों के गुणों का निरूपण | ३३४ |
| शब्द केवल आकाश का गुण नहीं है | ३३६ |
| इन्द्रियादि सृष्टि का निरूपण | ३३७ |
| पञ्च कर्मेन्द्रियाँ और प्राणों की उत्पत्ति | ३३८ |
| स्थूल महाभूतों की उत्पत्ति और पंचीकरण का प्रकार | ३३६ |
| लिङ्ग ( सूक्ष्म ) शरीर की उत्पत्ति | ३४० |
| चतुर्विध स्थूल शरीरों की उत्पत्ति | ३४१ |
| ईश्वर में समस्तजगत्कर्तृत्व का निरूपण | ३४२ |
| शंका-समाधान के द्वारा निद्रित और मृत मनुष्य में अन्तर | ३४५ |
| प्राकृत प्रलय का निरूपण | ३४६ |
| नैमित्तिक प्रलय | ३४८ |
| प्राकृत प्रलय और नैमित्तिक प्रलय में प्रमाण | ३४८ |
| आत्यन्तिक प्रलय | ३४६ |
| प्रलय के क्रम का निरूपण | ३५० |
| ब्रह्म का तटस्थ लक्षण | ३५१ |
| ब्रह्म के जगत्कारणात्मक लक्षण पर शंका-समाधान | ३५२ |
| सृष्टिवाक्यों का तात्पर्य | ३५२ |
| उपासनादि वाक्यों का तात्पर्य-निरूपण | ३५४ |
| ईश्वर और जीव के स्वरूप का निरूपण | ३५५ |
| ( प्रतिबिम्बवाद ) 'अनेक जीववाद' पक्ष में दोष होने से अन्य मत-प्रदर्शन | ३५६ |
| एकजीववाद पक्ष पर कुछ आक्षेप और उनका निराकरण | ३५८ |
| सिद्धान्ती के द्वारा प्रदर्शित दृष्टान्त पर शंका-समाधान और 'तत्' पदार्थ के निरूपण की समाप्ति | ३५६ |
| 'त्वं' पदार्थ का निरूपण | ३६० |
| जीव की तीन अवस्थाओं का निरूपण | ३६० |
| अन्तःकरण वृत्ति के अङ्गीकार में मतभेद | ३६१ |