भारतकोश
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वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

चतुर्थोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाशद्वयोपेतम् १५७ नायमाचरिष्यति । ( त्वरितं परिक्रम्यावलोक्य च । ) अये ! अयमसौ सर- सीसरोजविलोलनसुरभिशीतलमातरिश्वसंवाहितसान्द्रकिसलयो न्यग्रोधपा- दपः । उचिता विश्रामभूरियं समरव्यापारखिन्नस्य वीरजनस्य । अत्र स्थितश्चायाचिततालवृन्तेन हरिचन्दनच्छटाशीतलेनाप्रयत्नसुरभिणा दशा- परिणामयोग्येन सरसीसमीरेणामुना गतक्लमो भविष्यति महाराजः । लूनकेतुश्चायं रथोऽनिवारित एव प्रवेक्ष्यति छायामिति । (प्रवेशं रूपयित्वा ।) कः कोऽत्र भोः । ( समन्तादवलोक्य । ) कथं न कश्चिदत्र परिजनः । नूनं तथाविधस्य वृकोदरस्य दर्शनादेवंविधस्य च स्वामिनस्त्रासेन शिबिरसन्नि- अनार्यम् = अनुचितम् । सरसीसरोजविलोलसुरभिशीतलमातरिश्वसंवाहितसान्द्र- किसलयः = सरसीनां सरोजानाञ्च विलोलनेन सञ्चालनेन शीतलः सुरभिः सुग- न्धिश्च यो मातरिश्वा वायुः तेन संवाहितम् संचालितं किसलयं पल्लवः यस्मिन्,. सः, न्यग्रोधपादपः = वटवृक्षः अस्तीति शेषः । समरव्यापारखिन्नस्य = सङ्ग्राम- करणेन श्रान्तस्य, विश्रामभूः = श्रमनिवारणस्थानम्, इयम्, उचिता = योग्या । अयाचिततालवृन्तेन = स्वयं प्राप्तव्यजनेन, हरिचन्दनच्छटाशीतलेन = श्रीखण्डशीत- लेन, अप्रयत्नसुरभिणा = अनायासोत्तमगन्धवता, दशापरिणामयोग्येन = मूर्च्छानिवा- रणसमर्थेन, सरसीसमीरेण = सरोवरस्यवायुना, अमुना = उपस्थितेन, गतक्लमः = विरतग्लानिः श्रमरहितः । लूनकेतुः = छिन्नध्वजः, अनिवारितः अनवरुद्धः स्वयमेवे- त्यर्थः । प्रवेक्ष्यति = प्रवेशं करिष्यति । परिजनः । दुःशासन की तरह इन पर भी यह नीच नीचता कर जाय (शीघ्र ही घूमकर और देखकर) अहा ! यह एक वटवृक्ष (बड़ का पेड़) हैं । सरोवर के कमलों का प्रकम्पन करने के कारण शीतल और सुगन्ध पूर्ण वायु के झकोरों से इसकी घनी और सुकोमल पत्तियाँ मन्द-मन्द हिल रही हैं । समराङ्गण में युद्ध करते-करते श्रान्त वीरपुरुष के विश्राम करने योग्य यह सुन्दर भूमि है। यहाँ रहकर बिना किसी आयास के तालपत्रों के उपवीज ( पंखा ) द्वारा तथा हरिचन्दन के वृक्षों की शीतलता से और अप्रयत्नलभ्य सुगन्ध से तथा भाग्यवश सरोवरों के इस सुखकर वायु के सेवन से महाराज की खिन्नता दूर हो जायगी । (ऊपर की ओर देखकर) रथ की पताका भी कट कर गिर गई है अतः यह (रथ) बिना किसी अवरोध के छाया में चला जायगा । ( छाया में रथ ले जाने का अभिनय करता है ) कोई है ? [ महाराज के छत्र-चामर और पंखों को शीघ्र उपस्थित करो ] । (चारों ओर देखकर) क्यों क्या कारण है यहाँ कोई अनुचर नहीं है ? निश्चय भीम को उस भीषण वेश में देख और महाराज की भी यह दशा देखकर सभी नौकर-चाकर डर गये हैं और पड़ाव पर तम्बुओं

१५८ | वेणीसंहार नाटकं वेश्मैव प्रविष्टः । कष्टं भोः, कष्टम् । दत्त्वा द्रोणेन पार्थादभयमपि न संरक्षितः सिन्धुराजः क्रूरं दुःशासनेऽस्मिन्हरिण इव कृतं भीमसेनेन कर्म । दुःसाध्यामप्यरीणां लघुमिव समरे पूरयित्वा प्रतिज्ञां नाहं मन्ये सकामं कुरुकुलविमुखं दैवमेतावतापि ॥ २ ॥ ( राजानमवलोक्य । ) कथमद्यापि चेतनतां न लभते महाराजः ? भोः, अन्वयः- द्रोणेन, पार्थात्, अभयम् दत्त्वा, अपि, सिन्धुराजः, न संरक्षितः, भीमसेनेन, अरीणाम्, दुःसाध्याम्, अपि, लघुमिव, प्रतिज्ञाम्, समरे, पूरयित्वा, अस्मिन्, दुःशासने, हरिणे, इव, क्रूरम्, कर्म, कृतम्, एतावता, अपि, अहम्, कुरुकुल- विमुखम्, दैवम्, सकामम्, न मन्ये ॥ २ ॥ सिन्धुराजादीनां वधेऽपि कुरुकुलविपरीतभाग्यस्य सन्तोषो न जातोऽत एव दुर्योधनश्चैतन्यं न लभत इत्याह - दत्त्वेति । पार्थात् अभयं = भयाभावम, दत्त्वा, अपि, सिन्धुराजः, न संरक्षितः, भीमसेनेन, अरीणां = शत्रूणांः, दुःसाध्यां = दुःखेन सम्पादनीयाम्, 'कृत्यानामि'ति कर्तरि षष्ठी । प्रतिज्ञां = शोणितपानरूपाम्, पूरयित्वा = निष्पाद्य, हरिणे = मृगे, इव क्रूरं = निर्दयम्, कर्म, कृतम् एतावता = एकोनशतधृतराष्ट्रपुत्रादिवधेन, अपि अहं = सूतः, दैवं = भाग्यम् सकामं = पूर्णमनोर- थम्, न मन्ये = स्वीकरोमि । अतः परमपि किमपि भावीत्यर्थः । अत्रोपमालङ्कारः । स्रग्धरा छन्दः ॥ २ ॥ चेतनतां = चैतन्यम्, विगतमूर्च्छत्वमित्यर्थः । के भीतर प्रवेश कर गए हैं । बड़े कष्ट की बात है । द्रोणाचार्य ने अर्जुन से जयद्रथ की रक्षा के लिये अभयदान दिया था तथापि रक्षा नहीं किया । भीमसेन ने हरिण के सदृश दुश्शासन का वधरूप नीच कर्म किया । जिस प्रतिज्ञा की पूर्ति शत्रुओं के लिये असंभव बात थी उसकी बड़ी सरलता से पूर्ति कराके-मेरा जहाँ तक विचार है-कुरुवंश के विपरीत विधाता इतने पर भी सन्तुष्ट नहीं है अर्थात द्रोणाचार्य जैसे वीर जयद्रथ की रक्षा का भार लिए हुए थे और अर्जुन ने उसका वध कर ही डाला । दुश्शासन वीर था तो भी भीमसेन ने उसका इस प्रकार से वध किया जैसे कोई भोले-भाले हरिण का वध करे और वह चूँ तक न बोले । पाण्डवों की भीषण से भीषण प्रतिज्ञायें बड़ी सुगमता से पूरी होती दीख पड़ती हैं इससे तो यही विचार में आता है कि विधाता सर्वथा कौरववंश के प्रतिकूल है और इतना सब कुछ कराके भी तृप्त नहीं है भविष्य में न मालूम क्या करावेगा ॥ २ ॥ (राजा को देखकर) क्यों अब भी महाराज की मूर्च्छा दूर नहीं हो रही है ? बड़े

चतुर्थोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् १५६ कष्टम् ( निश्वस्य । ) मदकलितकरेणुभज्यमाने विपिन इव प्रकटैकशालशेषे । हतसकलकुमारके कुलेऽस्मिस्त्वमपि विधेरपलोकितः कटाक्षैः ॥ ३ ॥ ( आकाशे लक्ष्यं बद्ध्वा ) ननु भो हतविधे, भरतकुलविमुख, अक्षतस्य गदापाणेरना रूढस्य संशयम् । अन्वयः - मदकलितकरेणुभज्यमाने, प्रकटैकशालशेषे, विपिने, इव, हतसकल- कुमारके, अस्मिन्, कुले, त्वम्, अपि, विधेः, कटाक्षैः अवलोकितः ॥ ३ ॥ मदकलितकरेणुभज्यमाने = मदेन कलितः व्याप्तो यः करेणुः हस्ती तेन भज्य- माने संमृद्यमाने, प्रकटैकशालशेषे = प्रकटः एकशालः एकमात्रवृक्षः शेषः अवशिष्टः यत्र तस्मिन्, विपिने = वने, इव । कुरुकुले एक एव दुर्योधनोऽवशिष्टः सर्वे च भीमेन विनाशिता इति भावः । हतसकलकुमारके = व्यापादितसकलराजपुत्रे, अस्मिन् कुले त्वं = महाराजदुर्योधनः, विधेः = दैवस्य, कटाक्षैः = भ्रूभङ्गैः, अवलो- कितः, किं त्वमपि चेतनतां न लप्स्यस इति भावः । अत्र पूर्णोपमाऽलङ्कार पुष्पि- ताग्रा छन्दः ॥ ३ ॥ हतविधे हतभाग्य दुर्भाग्येत्यर्थः । अन्वयः - गदापाणेः, अक्षतस्य, संशयम्, अनारूढस्य, भीमसेनस्य, एषा, अपि, प्रतिज्ञा, त्वया, पूर्यते ॥ ४ ॥ दुर्योधनस्य मूर्च्छा विलोक्य तस्य मरणं सन्दिहान आह - अक्षतस्येति । गदा- पाणेः = गदाधारिणः, अक्षतस्य = प्रहारानभिहतस्य संशयं = प्रतिज्ञापूर्त्यर्थं प्रवृत्ते युद्धे गदायुद्धकुशलो दुर्योधनो मां हनिष्यति अथवा मम प्रतिज्ञा पूर्णा भविष्यती- दुःख की बात है ! ( आह भरकर ) मदोन्मत्त गजराज के द्वारा जङ्गल के ध्वस्त कर देने पर जिस प्रकार एक दो वृक्ष ही कहीं पर अवशिष्ट दिखलाई पड़े उसी प्रकार इस कुरुवंश के सम्पूर्ण राजकुमारों के नाश हो जाने पर एक मात्र अवशिष्ट आप [दुर्योधन] दुर्देव के नेत्रों से देखे जा रहे हैं । अर्थात् जिस प्रकार एक पागल हाथी विशाल और गम्भीर वन में घुस कर उसके सभी वृक्षों को तोड़ कर नष्ट कर डाले और बड़ी कठिनाई से एक दो वृक्ष बच जायें उसी प्रकार इस मतवाले भीम के द्वारा कुरुवंश के सभी राजकुमारों का संहार हो चुका और केवल आप [ दुर्योधन ] जीते हुए बच गये हैं दुर्देव की दृष्टि आप पर भी पड़ रही है कदाचित् आपको भी न समाप्त कर दे ॥ ३ ॥ ( आकाश की ओर देखकर ) ऐ भरतवंश के रुष्ट और क्रूर विधाता ? भीमसेन के हाथ में गदा है। इनको कोई क्षति भी नहीं हुई। इन्हें किसी प्रकार के

१६० वेणीसंहारं नाटकं एषापि भीमसेनस्य प्रतिज्ञा पूर्यते त्वया ॥ ४ ॥ दुर्योधनः — (शनैरुलब्धसंज्ञः ।) आः, शक्तिरस्ति दुरात्मनो वृकोदर- हतकस्य मयि जीवति दुर्योधने प्रतिज्ञां पूरयितुम् । वत्स दुःशासन, न भेतव्यं न भेतव्यम् । अयमहमागतोऽस्मि ननु । सूत, प्रापय रथं तमेवोद्देशं यत्र वत्सो मे दुःशासनः । सूतः —आयुष्मन्, अक्षमाः सम्प्रति वाहास्ते रथमुद्वोढुम् (अपवार्य ।) मनोरथं च । दुर्योधनः—( रथादवतीर्य सगर्वं साकूतंच ।) कृतं स्यन्दनगमनकाला- तिपातेन । सूतः —( सवैलक्ष्यं सकरुणं च ।) मर्षयतु-मर्षयतु देव । त्याकारकविपवम्, अनारूढस्य = अप्राप्तस्य, यदि अचेतनता न विनष्टा स्यात्तदा- स्वयमेव भीम स्यादिति भावः । एषा = दुर्योधनोरुभङ्गजन्यवधरूपा, प्रतिज्ञा = प्रतिश्रुतिः, त्वया = हतविधिना, पूर्यते = सम्पूर्णीक्रियते । अनुष्टुब्छन्दः ॥ उपलब्धसंज्ञ. = प्राप्तचैतन्यः । अनपगतदुःशासनवधो दुर्योधनेदुः शासनत्राणं चिकीर्षुराह् = काः शक्तिरिति । अक्षमा = असमर्था, वाहाः = अश्वाः, मनोरथं = दुःशासनत्राणरूपम् । स्यन्दनगमनकालातिपातेन = रथगमनकालयापनेन । संशयरूप दोले पर भी नहीं झूलना पड़ा तो भी इस भीमसेन की प्रतिज्ञा की पूर्ति करने जा रहे हो ॥ ४ ॥ दुर्योधन — (धीरे धीरे चैतन्य होकर) ओह ! वायुपुत्र दुष्ट अभागे भीमसेन की क्या शक्ति है जो मुझ दुर्योधन के जीवित रहते हुए अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ति करे । वत्स दुश्शासन ! भ्रत न हो [डरो न] यह लो, अब में आ ही गया !! सूत, मेरे रथ को उसी स्थान पर ले चलो जहाँ मेरा प्यारा दुश्शासन है । सूत — महाराज ! इस समय आपके घोड़े इस रथ को खींचने में असमर्थ हैं (छिपा- कर) और मनोरथ को अर्थात् आपकी इच्छापूर्ण करने में भी असमर्थ हैं ) दुर्योधन — (रथ से उतर कर अभिमान के साथ व्यङ्ग्यपूर्वक) समय बिताकर रथ पर चलने की कोई आवश्यकता नहीं । सूत — (लज्जित होकर कातर स्वर में) क्षमा कीजिए । क्षमा कीजिए । महाराज ?

चतुर्थोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् १६१ दुर्योधनः- धिक्सूत, किं रथेन । केवलमरातिविमर्दसंघट्टसञ्चारी दुर्योधनः खल्वहम् तद्गदामात्रसहायः समरभुवमवतरामि । सूतः - देव, एवमेतत् । दुर्योधनः- यद्येवं किमेवं भाषसे । पश्य- बालस्य मे प्रकृतिदुर्ललितस्य पापः पापं व्यवस्यति समक्षमुदायुधोऽसौ । अस्मिन्निवारयसि किं व्यवसायिनं मां धिक् सूत = हे सूत त्वां धिक् । अन्वय - प्रकृतिदुर्ललितस्य बालस्य, पापम्, मे समक्षम्, पापः, उदायुधः, असौ, व्यवस्यति, अस्मिन्, व्यवसायिनम्, माम्, किम् निवारयसि, ते क्रोधः, न, नापि, करुणा, न च, लज्जा, अस्ति ॥ ५ ॥ बालस्येति । प्रकृतिदुर्ललितस्य = स्वभावतः चपलस्य, बालस्य = अल्पवय- स्कस्य, पापं = मरणम्, मे = मम, समक्षम्, पापः = पापी, उदायुधः = उद्यतशस्त्रः, असौ = भीमः, व्यवस्यति, अस्मिन् = भीमविषये, व्यवसायिनम् = उद्योगिनम् भीमहननार्थमिति भावः । मां = दुर्योधनम्, निवारयसि = अवहणत्सि, किम्, ते दुर्योधन-सूत ! तुझे धिक्कार है ! रथ ने क्या ? शत्रुओं की ठसाठस भीड़ के भीतर मैं [ दुर्योधन ] अकेला भ्रमण करने वाला हूँ । केवल गदा हाथ में लेकर मैं रणक्षेत्र में उतरने जा रहा हूँ । सूत-महाराज, आप ऐसे ही हैं [ इसमें सन्देह ही क्या ? ] दुर्योधन-यदि यही बात है तो फिर इस प्रकार की बात-चीत क्यों कर रहे हो ? अर्थात् जब तुम्हें मेरे पराक्रम के विषय में ज्ञान है तो फिर क्यों कह रहे हो कि घोड़े रथ नहीं खींच सकते । देखो- यह नीच [ भीमसेन ] हाथ में शस्त्र लेकर शैशवकाल से मेरे, आँखों के सामने लालित इस बालक (दुःशासन) के वध की चेष्टा कर रहा है। इस पापी का प्रतिकार करते हुए मुझे क्यों निषेध कर रहे हो। क्या तुम्हें (शत्रु पर) क्रोध नहीं आता ? क्या [बालक पर] दया का सञ्चार भी नहीं होता ? अथवा क्या तुम्हें [अपने कार्य पर] लज्जा भी नहीं लगती ? तात्पर्य यह कि दुश्शासन मेरा छोटा भाई है, अभी बच्चा है, लड़कपन से दुलारा गया है अतः लड़कपन के कारण द्रौपदी के केश और वस्त्रों को इसने खींचा है । फिर भी उसका बदला चुकाने के लिए यह भीमसेन शस्त्र लेकर उद्यत है । मैं उसका प्रतिकार करने के लिए तय्यार हूँ । तुम रोक रहे हो इसमें ऐसे दुरात्मा शत्रु पर तुम्हारे क्रोध की ज्वाला नहीं भड़कती है और न तुम्हें लड़के पर दया आती है और ११ वे०

१६२ वेणीसंहारं नाटकं क्रोधो न नाम करुणा न च तेऽस्ति लज्जा ॥ ५ ॥ सूतः - (सकरुणं पादयोर्निपत्य ।) एतद्विज्ञापयामि । आयुष्मन्, सम्पूर्ण- प्रतिज्ञेन निवृत्तेन भवितव्यमिदानीं दुरात्मना वृकोदरहतकेन । अत एवं ब्रवीमि । दुर्योधनः- ( सहसा भूमौ पतन् ।) हा वत्स दुश्शासन, हा मदाज्ञा विरोधितपाण्डव, हा विक्रमैकरस, हा मत्सङ्‌गदुर्ललित, हा अरातिकुलराज- घटामृगेन्द्र, हा युवराज, क्वासि । प्रयच्छ मे प्रतिवचनम् । (इति निःश्वस्य मोहमुपगतः ।) सूतः- राजन्, समाश्वसिहि समाश्वसिहि । 'क्रोधो न, राजबन्धुवधकाले त्वयाऽवश्यं क्रोधः कार्यः । नापि, करुणा = दया, पर- विनाशकालेऽवश्यं दया कार्या । न च लज्जा अस्ति । मम समक्षं यच्छत्रुणा प्रतिज्ञा पूर्यते तदतीव लज्जाकरमिति भावः । वसन्ततिलका छन्दः ॥ ५ ॥ विज्ञापनमेवाह - आयुष्मन्निति । सम्पूर्णप्रतिज्ञेन = पीतदुःशासनशोणितेन अत- एव निवृत्तेन, दुरात्मना वृकोदरहतकेन = दुष्टभीमेन, भवितव्यम्, इदानीमित्यन्वयः । एवं = मपर्यतु आयुष्मन्निति, युद्धे न गन्तव्यमित्यर्थः । मदाज्ञाविरोधितपाण्डव = ममाज्ञया विरोधितः पाण्डवः येन तत्सम्बोधने ममाज्ञयैव द्रौपदीकेशाम्बराकर्षणं कृतं ततश्च तस्य पाण्डवेन विरोधो जात इति भावः । विक्रमैकरसः = विक्रमः एकरसः अद्वितीयगुणः यस्य तत्संबोधने 'शृङ्गारादौ विषे वीर्ये गुणे रागे द्रवे रसः' इत्यमरः । अरातिः = शत्रुः, घटा = समूहः, मृगेन्द्रः = सिंहः, मोहं = मूर्च्छाम्, उपगतः=प्राप्तः । ऐसे व्यसन के समय में मेरे घोड़े रथ खींचने में असमर्थ हैं। यह बात कहने में तुम्हें लज्जा भी नहीं आती ॥ ५ ॥ सूत-(करुणा के साथ चरणों पर गिरकर) विनम्र निवेदन है- 'महाराज ! इस समय तक दुरात्मा नीच भीमसेन अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण कर चुका होगा' इसीलिए मैं इस प्रकार कह रहा हूँ । दुर्योधन-(एकाएक पृथ्वी पर गिरता हुआ) हा प्रिय दुश्शासन ! हाय मेरी आज्ञा से पाण्डव-विरोधी !! हाय पराक्रमपरायण !!! हाय मेरी गोदी के खेलने वाले ! हाय शत्रुकुल रूपी हाथियों के झुण्ड के लिए सिंह ! हाय युवराज ! तुम कहाँ हो ? मुझे उत्तर दो । (ठंडी श्वास लेकर मूर्च्छित हो जाता है) सूत-महाराज ! धैर्य धारण कीजिए, धैर्य धारण कीजिए ।

चतुर्थोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् १६३ दुर्योधनः—( संज्ञां लब्ध्वा । निःश्वस्य ) युक्तो यथेष्टमुपभोगसुखेषु नैव त्वं लालितोऽपि हि मया न वृथाग्रजेन । अस्यास्तु वत्स तव हेतुरहं विपत्ते- र्यत्कारितोऽस्यविनयं न च रक्षितोऽसि ॥ ६ ॥ ( इति पतति । ) सूतः-आयुष्मन्, समाश्वसिहि समाश्वसिहि । दुर्योधनः-धिक् सूत, किमनुष्ठितं भवता । अन्वयः – ( हे ) वत्स, त्वम्, उपभोगसुखेषु, यथेष्टम्, नैव, युक्तः, वृथाग्रजेन, मया, त्वम् हि, न, लालितः, तव, अस्याः, विपत्तेः, हेतुः, अहम्, तु, अविनयम् यत् कारितः, असि, नच, रक्षितः, असि ॥ ६ ॥ दुर्योधनो विलपति – युक्तो यथेष्टमिति । उपभोगसुखेषु = उत्तमभोजनादिजन्य- सुखेषु, यथेष्टम् = इच्छानुरूपम्, नैव, युक्तः-सम्मिलितः, सर्वदा मदर्थमेव व्यापृतत्वात् । वृथाग्रजेन = व्यर्थज्येष्ठेन मया लालितः = विलासिनः, अस्याः = हृदयविदारण- रूपायाः, विपत्तेः = आपत्तेः, तु-तु शब्दः पूर्वव्यवच्छेदकः । अविनयं केशाम्बरा- कर्षणम्, कारित इत्यत्र प्रयोज्ये कर्मणि क्तप्रत्ययः । असि त्वमित्यस्यात्राप्यन्वयः । नच, रक्षितोऽसि भीमादिति शेषः । अविनये यदि नियोजितस्तदा तत्प्रयुक्तापत्तौ रक्षणीयोऽसि मयेति भावः । अत्र चतुर्थचरणे विशेषोक्तिरलङ्कारः । वसन्ततिलका छन्दः ॥ ६ ॥ दुर्योधन-( चैतन्य होकर आह भर कर ) हे वत्स ! मैंने तुम्हें इच्छा के अनुकूल भोजन-वस्त्रादिरूप उपभोगसामग्री के उपभोग में नहीं लगाया । तुम्हारा मैंने कभी प्यार भी नहीं किया । मैं व्यर्थ ही ज्येष्ठ भ्राता हुआ । तुम्हारी इस विपत्ति का कारण मैं ही हूँ क्योंकि मैने चापल्य की शिक्षा ,तो दी परन्तु तुम्हारी रक्षा न कर सका अर्थात् मेरी ही आज्ञा से द्रौपदी के वस्त्र और केश का आकर्षण तूने किया जिसके कारण यह विपत्ति तुम्हारे सिर पर घहराई है परन्तु इस विपत्ति से तुम्हारी रक्षा करने में मै समर्थ न हो सका ॥ ६ ॥ ( फिर गिर पड़ता है ।) सूत-महाराज ! धैर्य धारण कीजिए । धैर्य धारण कीजिए । दुर्योधन - सूत ! धिक्कार है । यह आपने क्या कर डाला ?

१६४ वेणीसंहारं नाटकं रक्षणीयेन सतत बालेनाज्ञानुवर्तिना । दुःशासनेन भ्रात्राहमुपहारेण रक्षितः ॥ ७ ॥ सूतः—महाराज, मर्मभेदिभिरिषुतोमरशक्तिप्रासवर्षैर्महारथानामपहत- चेतनत्वान्निश्चेतनः कृतो महाराज इत्यपहृतो मया रथः । दुर्योधनः—सूत, विरूपं कृतवानसि । तस्यैव पाण्डवपशोरनुजद्विषो मे क्षोभैर्गदाशनिकृतैर्न विबोधितोऽस्मि । अन्वयः — सततम् आज्ञानुवर्तिना, बालेन, रक्षणीयेन, भ्रात्रा, दुःशासनेन, उपहारेण, अहम्, रक्षितः ( त्वया ) ॥ ७ ॥ रक्षणीयेनेति । सततं = निरन्तरम्, आज्ञानुवर्तिना = आदेशानुसारिणा, बालेन = अल्पवयस्केन, अत एव, रक्षणीयेन = रक्षायोग्येन, भ्रात्रा = दुःशासनेन उपहारेण = बलिना, अहं = दुर्योधनः, रक्षितः, त्वयेति शेषः । मद्रक्षणार्थं दुःशासनो बलिरूपेण प्रदत्तः किं त्वया । यथा देवेभ्यः स्वरक्षार्थं बलिर्दीयते तथेति भावः । अत्र पदार्थगत- काव्यलिङ्गमलङ्कारः । अनुष्टुप् छन्दः ॥ ७ ॥ मर्मभेदिभिः = अन्तःकरणभेदकैः, इषुतोमरशक्तिप्रासवर्षैः = बाणशर्वलाशक्ति- नामकास्त्रविशेषकुन्तवर्षैः, महारथानां = दशसहस्रवीरयोधितॄणाम्, अपहतचेतनत्वात् = निश्चेतनत्वात्, महाराजः = भवान्, निश्चेतनः = मूर्च्छितः, कृतः, इति = ततः, रथः = स्यन्दनः, अपहृतः, मया । विरूपं = विपरीतम् । अन्वयः—पाण्डवपशोः मे, अनुजद्विषः तस्य एव, गदाशनिकृतैः, क्षोभैः, न विबोधितः, अस्मि ( अत एव ) ताम् एव, दौःशासनीम् रुधिरांशय्याम्, अहम्, न, अधिशयितः, आशु, वृकोदरः वा, न (अधिशयितः) ॥ ८ ॥ कथं विरूपं कृतमित्याह—तस्यैवेति । पाण्डवपशोः = पाण्डवः पशुरिव तस्य, मे = मम्, अनुजद्विप = कनिष्ठभ्रातृ- सर्वदा आज्ञा पालन करने में तत्पर कनिष्ठ भ्राता दुश्शासन की, जो निरा बालक था; रक्षा करनी चाहिए थी । उसे बलि देकर [ आपने ] मेरी रक्षा की है अर्थात् बच्चे की रक्षा चाहे जैसे होती करते परन्तु रक्षा न करके प्रत्युत उसका वध कराके मुझे बचाया है आपने यह काम अच्छा नहीं किया ॥ ७ ॥ सूत — राजाधिराज ! महारथियों के मर्मच्छेदी बाण, भाले, बर्छे और गदाओं के प्रहार से महाराज मूर्च्छित कर दिये गए अतः मैंने [ वहाँ से ] रथ हटा लिया । दुर्योधन — सूत ! प्रतिकूल [ अनुचित ] कार्य कर डाले हो । मेरे कनिष्ठ भ्राता के विघाती असभ्य पाण्डुपुत्र ( भीम ) के वज्रसदृश गदा के प्रहारों से

चतुर्थोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् १६५ तामेव नाधिशयितो रुधिरार्द्रशय्यां दौःशासनीं यदहमाशु वृकोदरो वा ॥ ८ ॥ (निःश्वस्य नभो विलोक्य ।) ननु भो हतविधे, कृपाविरहित, भरत- कुलविमुख, अपि नाम भवेन्मृत्युर्न च हन्ता वृकोदरः । सूतः — शान्तं पापं शान्तं पापम् । महाराज, किमिदम् । शत्रोः, तस्य = भीमस्य, एव, गदाशनिकृतैः गदा अशनिः वज्र इव तत्कृतैः, क्षोभैः= प्रहारैः, विबोधितः = प्राप्तचैतन्यः, अस्मि भवामीत्यर्थः । यदि तस्य गदाभिघातैः विगतमूर्च्छः स्याम् तदेति भावः । अत एव ताम् एव, दौःशासनी = दुःशासन- सम्बन्धिनीम्, रुधिरार्द्रशय्यां = शोणितक्लिन्नशयनीयम्, अहम्, न अधिशयितः, न सुतः, आशु = शीघ्रम्, वृकोदरः = भीमः, वा नाधिशयितः । यदि तस्य गदयोत्थितः तदा द्वन्द्वयुद्धे सति वृकोदरस्य घातमहं कुर्याम् अथवा मां भीमो हन्यादिति भावः । वसन्ततिलका छन्दः ॥ ८ ॥ अन्वयः—मृत्युः, अपि, भवेत्, वृकोदरः, न च, हन्ता, (भवेत्) घाति- ताशेषबन्धोः, ये राज्येन, किम्, वा जयेन, किम् ॥ ९ ॥ स्वयमेव मृत्युर्भवतु भीमो न हन्यादित्याह—अपि नामेति । अपि, नामेति सम्भावनायाम् । वृकोदरः च न हन्ता = हिंसकः । मृत्युर्भवतु न च वृकोदरो हन्ता भवतु इति भावः । अनिष्टश्रवणात् सूतः वचनसमाप्तिमन्य एवाह—शान्तं पापमिति । इत्थं न वाच्यमित्यर्थः । मेरी मूर्च्छा दूर न की गई क्योंकि दुःशासन के रक्त से पङ्किल [ कीचह से युक्त ] शय्या पर न तो मैंने शयन किया और न भीम को शीघ्र ही शयन कराया अर्थात् मुझे वहीं पर चेतनाविहीन होकर पड़े रहने देते, मुझपर भीम के गदाप्रहार पड़ने देते जिससे मुझ में चेतना का सञ्चार होता और मैं फिर युद्ध करके या तो जहाँ दुःशासन का शव है वहाँ मैं भी सर्वदा के लिए सो जाता अथवा भीम को ही शयन करा देता । मुझे रणक्षेत्र से दूर हटाकर महान् अनुचित तू ने किया ॥ ८ ॥ ( लम्बी श्वास लेकर और ऊपर देखकर ) अरे निर्दयी भरतवंश से रुष्ट विधाता ! यदि मेरी मृत्यु भी हो तो भीम घातक न हो [ यही प्रार्थना है ] सूत — अमङ्गल का नाश हो । महाराज ! यह क्या !

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१६६ वेणीसंहार नाटकं

दुर्योधनः-
घातिताशेषबन्धोर्मे किं राज्येन जयेन वा ॥ ९ ॥
(ततः प्रविशति शरप्रहारव्रणबद्धपट्टिकालङ्कृतकायः सुन्दरकः ।)
सुन्दरकः-अज्जा, अवि णाम इमस्सि उद्देसे सारहिदुइओ दिट्ठो
तुम्मेहिं महाराजदुज्जोहणो ण वोत्त (निरूप्य।) कहं ण कोवि मन्तेदि।
होदु। एदाण बद्धपरिअराण पुरीसाण समूहो दीसइ। एत्थ गदुअ पुच्छि-
स्सम्। (परिक्रम्य विलोक्य च।) कहं एदेवखु सामिणो गाढप्पहारहदस्स
घणसण्णाहजालदुब्भेज्जमुद्देहि कङ्कवत्तेहि हिअआदो सल्लाइं उद्धरन्ति।
ता ण क्खु एदे जाणन्ति। होदु। अण्णदो विचिणिइस्सम्। (अग्रतोऽव-
लोक्य, किञ्चित्परिक्रम्य।) इमे वखु अवरं प्पहददरा सङ्कदा वीरमणुस्सा
दीसन्ति। ता एत्थ गदुअ पुच्छिस्सम् (उपगम्य।) हंहा, जाणह तुम्हे
कस्सि उद्देसे कुरुणाहो वट्टइत्ति। कहं एदे वि म पेक्खिअ अहिअदरं
रोअन्दि। (दृष्ट्वा।) ता ण क्खु एदे वि जाणान्ति। हा अदिकरुण वखु
एत्थ वट्टइ। एसा बीलमादा समलविणिहद पुत्तं सुणिअ रत्तसुमणि-
वसणाए समगभूषणाए वहूए सह अणुमरदि। (सश्लाघम्।) साहु वीर-
मादे, साहु, अण्णस्सि वि जम्मन्तरे अणहदमुत्तआ हुविस्ससि। होदु।
अण्णदो पुच्छिस्सम्। (अन्यतो विलोक्य।) अअं अवरो बहुप्पहारजिह्-
दकाओ अंकिदव्रणवन्धो यव्व जाहसमूहो इमं सुण्णासणं तुलङ्गम उवा-
लहिअ रोइडि। णूण एदाणं एत्थ एत्थ सामी वावादितो ता ण क्खु
एदे वि जानन्दि। होदु। अण्णदो गदुअ पुच्छिस्सम। (सर्वतो विलोक्य।)
कहं सव्वो एव्व अवत्यागुरुवं व्यसणं अणुभवन्तो भाअधेअविसमसील-
दाए पज्जाउलो जणो। ता कं दाणीं एत्थ पुच्छिस्सम्। कं वा उवालहि-
घातिताशेषबन्धोः = हिंसितनिखिलवान्धवस्य, मे राज्येन किम्, वा = अथवा,
जयेन किम्, राज्यजययोः न किमपि प्रयोजनमित्याशयः। अनुष्टुब्छन्दः ॥ ९ ॥
शरप्रहारव्रणबद्धपट्टिकालङ्कृतकायः = शरप्रहारेण यद्व्रणम् तत्र बद्धा या
दुर्योधन-जब मेरे सभी परिवार की समाप्ति हो गई तो फिर राज्य और विजयलाभ में
क्या प्रयोजन ?॥ ९॥
(इसके अनन्तर बाणों के द्वारा छत अङ्गों पर पट्टी बाँधे हुए सुन्दरक का प्रवेश)।
सुन्दरक-हे भद्रपुरुषो ! क्या आप लोगों ने इस स्थान पर सारथि के साथ महाराज

चतुर्थोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् १६७ स्सम्। होदु। अअं एव्व एत्थ विचिणिइस्सम्। (परिक्रम्य) होदु। देव्वं दाणीं उवालहिस्सम्। हंहो देव्व, एआदसाणं अक्खोहिणीणं णाधो जेट्ठो भादुसदस्स भत्ता गङ्गामहणअङ्कराअसल्लकिर्वकिववम्मअस्सत्थामप्पमु- हस्स राअचक्कस्स सअलप्पुहवीमण्डलेक्कगाहो महाराअ दुज्जोहणो वि अण्णेसीअदि। अण्णेसीअन्तो वि ण जाणीअदि कस्सि उद्देसे वट्ट- इत्ति। (विचिन्त्य निःश्वस्य च।) अहवा किं एत्थ देव उवालम्हामि। जदो तस्स क्खु एदं णिब्भच्छिअविउरव्वणीअस्स अवधोरिदपिदामहहिदोवदे- सङ्कुरस्स सउणिप्पोच्छाहाणादिविरूढमूलस्स जगुगेहङ्कद्विविसाहिणो संभूदचिरआलसंवद्धवेरालवालस्स पञ्चालीकेसग्गहणकुसुमस्स फलं परि- णमदि। (अन्यतो विलोक्य) जहा एत्थ एसा विविहरदिणप्पहासंबलिसूर- किरणप्पसूदसकचावसहस्सपूरिददसदिसासुहो लूणकेदुवसो रहो दीसइ, ता अहं तक्केमि अवस्सं एदिणा महाराअदुज्जोहणस्स विस्सामुद्देसेण होदव्वम्। याव निरूपेमि। (उपगम्य दृष्ट्वा निःश्वस्य च।) कथं एआद हाण अक्खोहिणीणं णाअको भविअ महार.ओ दुज्जोहणो पइदपुरिसा विज असलाडणीए भूमीए उवविठ्ठो चिट्ठदि। अध वा तस्स क्खु एवं पञ्चालीकेसग्गहकुसुमस्स फलं परिणमदि। (आर्याः, अपि नामस्मि- न्नुद्देशे सारथिद्वितीयो दृष्टो युष्माभिर्महाराजदुर्योधनो न वेति। कथं न कोऽपि मन्यते। भवतु। एतेषां बद्धपरिकराणां पुरुषाणां समूहो दृश्यते अत्र गत्वा प्रक्ष्यामि। कयमेते खलु स्वामिनो गाढप्रहाराहतस्य घनसंन्नाहजालदुर्भेदमुखैः कङ्क- पट्टिका व्रणाच्छादनवस्त्रविशेषः तया अलङ्कृतः कायः शरीरं यस्य सः। उद्देशे = स्थाने, सारथिद्वितीयः = सूतसहितः, महाराजदुर्योधनः, युष्माभिः दृष्टो न वेति पृच्छति मन्दरकस्तत्रत्यजनम्। कोऽपि, कथं, न, मन्यते = कथयति। ततोऽन्यत्र गत्वा पृच्छति। एतेऽपि न जानन्तीत्याह-कयमेते खलु स्वामिन इति। गाढप्रहारहतस्य - गाढं भृशं यथा स्यात्तथा यः प्रहारः तेन हतस्य मूर्च्छितस्य, घन- सन्नाहजालदुर्भेदमुखैः = निविडकवचसमूह इव दुर्भेद्यं मुखम् अग्रं येषां तैः, दुर्योधन को देखा है अथवा नहीं ? (देखकर) क्यों क्या कारण है कोई उत्तर नहीं देता ? अच्छा ! यह कवचधारण किए हुए सैनिकों का समूह दृष्टिगोचर हो रहा है। यहाँ चलकर पूछता हूँ (इधर-उधर घूमकर और देखकर) अरे, ये तो अपने-अपने स्वामी के, जो प्रखर प्रहार से व्यथित हैं, हृदय से बाण को गाँसियों को कङ्कपत्र के द्वारा निकालने में तल्लीन हैं।

१६८ वेणीसंहारं नाटकं पत्रैर्हृदयाच्छल्यान्युद्धरन्ति । तन्न खल्वेते जानन्ति । भवतु । अन्यतो विचेष्यामि । इमे खल्वपरे प्रभूततराः सङ्गता वीरमनुष्या दृश्यन्ते । तदत्र गत्वा प्रक्ष्यामि । हंहो, जानीथ यूयं कस्मिन्नुद्देशे कुरुनाथो वर्तत इति । कथमेतेऽपि मां प्रेक्ष्या- धिकतरं रुदन्ति । तन्न खल्वेतेऽपि जानन्ति । हा, अतिकरुणं खल्वत्र वर्तते । एषा वीरमाता समरविनिहतं पुत्रकं श्रुत्वा रक्तांशुकनिवसनया समग्रभूषणया वध्वा सहानुम्रियते । साधु वीरमातः, साधु । अन्यस्मिन्नपि जन्मान्तरेऽनिहतपुत्रका भविष्यसि । भवतु । अन्यतः प्रक्ष्यामि । अयमपरो बहुप्रहारनिहतकायोऽकृतव्रण- कङ्कपत्रैः=शल्योद्धारकवस्तुविशेषैः, शल्यानि = शङ्कन्, उद्धरन्ति = निःसारयन्ति । विचेष्यामि = निश्चिनोमि । सङ्गताः = सम्मिलिताः, प्रभूततराः = अत्यधिकाः, अपरे= अन्ये, इमे, वीरमनुष्याः, दृश्यन्ते खलु इत्यन्वयः । कस्मिन् उद्देशे = स्थाने, कुरुनाथः = दुर्योधनः वर्तत इति जानीयेत्यन्वयः । प्रेक्ष्य = दृष्ट्वा, रुदन्तीति- यद्यत्र महाराजोऽभविष्यत्तदा मामकथयिष्यदत्र ते महाराजः, नचाकथयन् किन्तु अधिक- तरमेव रुदन्तीत्यनुमीयते नात्र महाराज इति भावः । वीरमाता = वीरस्य जननी, समरविनिहतं = सङ्ग्रामे व्यापादितम्, पुत्रकमिति अनुकम्पार्थे कप्रत्ययः । रक्तां- शुकनिवसनया = रक्तांशुकं रक्तवस्त्रं निवसनं परिधानं यस्याः तया, समग्रभूषणया = समग्रं सर्वाङ्गन्यासं भूषणम् अलङ्कारः यस्याः तया, वध्वा = पुत्रस्त्रिया, सह, अनु- म्रियते = पश्चात्प्राणत्यागं करोति, वीरमाता, अत्रैवान्वेति । अनिहतपुत्रका - जीव- दृढ कवचों के जाल के भीतर इस शल्योद्धारक (कङ्कपत्र) यन्त्र के मुख महान् प्रयत्न से प्रविष्ट किए जा रहे हैं। ये लोग क्या जानें ! [ अर्थात् ये लोग अपने कार्य में संलग्न हैं ये क्या जानें कि महाराज कहाँ है ] अच्छा [ चलूँ ] अन्य किसी स्थान में अन्वेषण करूँ । (सामने देखकर, थोड़ा इधर-उधर घूमकर) ये और भी बहुत से शूरवीर एकत्रित दिखलाई पड़ रहे हैं अतः वहाँ चलकर पूछूँगा। क्यों, क्या आप लोग जानते हैं ! कौरवों के अधिराज [ दुर्योधन ] किस स्थान पर हैं ? क्यों ? ये मुझे देखकर परिमाण में अधिक अश्रुपात कर रहे हैं, अतः ये भी नहीं जानते हैं (देखकर) हाय ! यहाँ तो महान् दुष्कर कार्य हो रहा है । यह वीरमाता युद्ध में अपने पुत्र की मृत्यु सुनकर अरुण वस्त्र धारण किये हुई तथा सम्पूर्ण अलङ्कारों से अलंकृत पुत्रवधू के साथ प्राण परित्याग कर रही है (श्लाघापूर्वक) धन्य ! वीरजननी धन्य !! दूसरे जन्म में तुम्हें पुत्र की मृत्यु न देखना पड़ेगा । अच्छा, अब यहाँ से दूसरे स्थान पर चलकर अन्वेषण करूँगा । (दूसरे स्थान में देखकर) यह एक अन्य शूरवीरों का दल, जिसके शरीर अनेक शस्त्रों के

चतुर्थोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् १६९ अद्य एव योधसमूह इमं शून्यासनं तुरङ्गममुपालभ्य रोदिति । नूनमेतेषामत्रैव स्वामी व्यापादितः तन्न खल्वेतेऽपि जानन्ति । भवतु । अन्यतो गत्वा प्रक्ष्यामि । कथं सर्व एवावस्थानुरूपं व्यसनमनुभवन्द्भागधेयविपमशीलतया पर्याकुलो जनः । तत्किमिदानीमत्र प्रक्ष्यामि । क वोपालप्स्ये ! भवतु, स्वयमेवात्र विचेष्यामि । भवतु । देवमिदानीमुपालप्स्ये । हंहो देव, एकादशानामक्षौहिणीनां नाथो ज्येष्ठो भ्रातृशतस्य भर्ता गाङ्गेयद्रोणाङ्गराजशल्यकृतवर्माश्वत्थामप्रमुखस्य राजचक्रस्य सकलपृथ्वीमण्डलेकनाथो महाराजदुर्योधनोऽप्यन्विष्यते । अन्विष्यमाणोऽपि न ज्ञायते कस्मिन्नुद्देशे वर्तत इति !! अथवा किमत्र दैवमुपालभे । यतस्तस्य खल्विदं निर्मत्सित त्युक्तम् । अकृतव्रणबन्धः = अकृतपट्टिकः । शून्यासनम् = शून्यम् आरोहरहितम् = आसनं पीठं यस्य तम्, तुरङ्गम = अश्वम् । अवस्यानुरूपं = दशायोग्यम्, व्यसनं = दुःखम् । भागधेयविपमशीलतया = विपरीतभाग्यतया, पर्याकुलः = समन्तादाकुलः । उपालप्स्ये = साक्षेपं कथयिष्यामि । अक्षौहिणीनां = संख्याविशेषविशिष्टसेनानाम् । नाथः, भ्रातृशतस्य ज्येष्ठः, निर्धारणेऽत्र षष्ठी । गाङ्गेयः = भीष्मः, अङ्गराजः = कर्णः । राजचक्रस्य = राजसमूहस्य भर्तेत्यन्वयः । अन्विष्यत इति य एतादृशः स स्वय- मेव विदितो भवेद् न चान्वेषणापेक्षा परन्तु अन्विष्यत इति महदाश्चर्यम् निखिल सेवकानां विनाशादन्विष्यमाणोऽपि न ज्ञायत इति गूढाभिप्रायः । निर्मत्सितविदुरवचनवोजस्य = निर्मत्सितं तिरस्कृतं विदुरवचनरूपं बीजं यस्य आघात से जर्जर हो रहे हैं, तथा व्रण बिना किसी उपचार ( अर्थात् औषध पट्टी के बिना ) यों ही पडे, हुए हैं, आसन-रहित अश्व को पकड़कर बिलख रहे हैं, निश्चय इन लोगों के स्वामी यहीं मारे गये हैं । अतः वे भी [ महाराज को ] नहीं जानते । अच्छा दूसरे स्थान पर चलकर पूछूं । [ चारों तरफ देखकर ] अरे यहाँ तो सभी लोग अपनी-अपनी दशा के अनुरूप विपत्ति का अनुभव करते हुए भाग्य के विपरीत होने के कारण [ विधाता के बाम होने के कारण ] व्याकुल हो रहे हैं । अतः यहाँ किससे पूछूँ ? और किसे दोषी ठहराऊ । अच्छा, स्वयं ही मैं [ महाराज को ] अन्वेषण करता हूँ । अच्छा अब मैं विधाता को ही दोषी मानता हूँ । अये विधातः ! एकादश ( ग्यारह ) अक्षौहिणी सेना के स्वामी, सौ भाइयों के बड़े भाई, भीष्म, जयद्रथ, द्रोण, कर्ण, शल्य, कृप, कृतवर्मा तथा अश्वत्थामा इत्यादि राजाधिराजों के स्वामी अखण्ड भूमण्डल के एकच्छत्र राजाधिराज दुर्योधन का भी अन्वेषण करना पड़ता है और अन्वेषण करने पर भी नहीं जाना जाता कि महाराज किस स्थान में हैं ? अथवा इसमें भाग्य को दोष क्यों दूँ । क्योंकि विदुर के वचनों की अव-

( उपसृत्य सूतं संज्ञया पृच्छति । ) सूतः—( दृष्ट्वा ) अये, कथं सङ्ग्रामात्सुन्दरकः प्राप्तः । सुन्दरकः—( उपगम्य ) जअदु जअदु महाराओ । ( जयतु जयतु महाराजः । ) दुर्योधनः—( विलोक्य । ) अये सुन्दरक, कच्चित्कुशलमङ्गराजस्य । सुन्दरकः—देव, कुशलं सरीरमेत्तकेण ( देव, कुशलं शरीरमात्रकेण । ) दुर्योधनः—किं किरीटिनास्य निहता धौरेया हतः सारथिर्भग्नो वा रथः ? सुन्दरकः—देव, ण भग्नो रहो । से मणोरहो । ( देव, न भग्नो रथः । अस्य मनोरथः । ) दुर्योधनः—किमविस्पष्टकथितैराकुलमपि पर्याकुलयसि मे हृदयम् ? तदलं संभ्रमेण । अशेषतो विस्पष्टं कथ्यताम् । सुन्दरकः—जं देवो आणवेदि । देवस्स मउडमणिप्पहावेण अवणीदा सञ्ज्ञया = संकेतेन । धौरेयाः = धुरीणा अश्वाः । मनोरथ इति—कर्णस्य यो मनोरथः, अर्जुनं हनिष्यामीति स भग्न इत्यर्थः । न हन्तुं तं शक्नोमीति मनसि सञ्जात इति भावः । अविस्पष्टकथितैः = अव्यक्तवचनैः, मे = मम, आकुलम्, अपि, हृदयम् = मनः, पर्याकुलयसि = समन्तात् व्याकुलं करोषि, किमित्यन्वयः । ( समीप जाकर सूत को संकेत करता है ) सूत—( देखकर ) अरे ! क्यों समराङ्गण से सुन्दरक आया है ! सुन्दरक—( समीप जाकर ) विजय, विजय, महाराज की । दुर्योधन—सुन्दरक ! अङ्गनरेश [ कर्ण ] का कुशल तो है । सुन्दरक—महाराज ! [ वे ] जीवित हैं यही कुशल समझिए । दुर्योधन—( व्याकुल होकर ) सुन्दरक ! क्या अर्जुन ने इनके घोड़ों को तथा सारथि को भी मार डाला ? और रथ को भी तोड़ डाला क्या ? सुन्दरक—महाराज ! केवल रथ ही नहीं भग्न किया किन्तु साथ-साथ इनका मनोरथ भी [ पुत्र भी ] । दुर्योधन—( क्रोधपूर्वक ) अरे ! क्यों इस प्रकार के अव्यक्त वचनों से मेरे व्याकुल मन को अधिक सन्तप्त कर रहा है ? सम्पूर्ण बातें स्पष्ट रूप से कहो न । सुन्दरक—अच्छा जो महाराज की आज्ञा । अहा ! महाराज के मुकुट में जड़े हुए

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:

१७२ वेणीसंहारं नाटकं मे रणप्पहारवेअणा (इति साटोपं परिक्रम्य ।) सुणादु देव । अत्थिदाणीं कुमालदुस्सासणवह- (इत्यर्धोक्ते मुखमाच्छाद्य शङ्कां नाटयति । यद्देव आज्ञाप- यति । देवस्य मुकुटमणिप्रभावेणापनीता मे रणप्रहारवेदना । शृणोतु देवः । अस्ती- दाणीं कुमारदुःशासनवध - ) सूतः -सुन्दरक, कथय । कथितमेव देवेन । दुर्योधनः -कथ्यताम् । श्रुतमस्माभिः । सुन्दरकः-(स्वगतम् ।) कथं दुस्सासणवहो सुदो देवेण । (प्रका- शम् ।) सुणादुदेवो । अज्ज दाव कुमालदुस्सासणवहामरिंसिदेण सामिणा अङ्गराएण किदचुडिलभिउडीभङ्कभोषणललाढवट्टेण अविण्णादसंधाणती- क्खमोक्खणिक्खित्तसरधारावरिसिणा अभिजुत्तो सो दुराआरा दुस्सास- णवेरिओ मज्झमपण्डवो । (कथं दुःशासनवधः श्रुतो देवेन । शृणोतु देवः । अद्य तावत्कुमारदुःशासनवधामर्षितेन स्वामिनाङ्गराजेन कृतकुटिलभ्रुकुटीभङ्गभीषणललाट- अपनीता = दूरीकृता, रणप्रहारवेदना = रणे यो प्रहारः तेन या वेदना दुःखम् । कुमारदुःशासनवधेति-अप्रियं भ्रातृवधं कथयितुमशक्नुवन् वाक्यसमाप्तिमकृत्वा एव विरराम सुन्दरकः । विज्ञातवृत्तान्तः सूतोऽवोचत् - सुन्दरकेति । कुमारदुःशासनवधामर्षितेन = कुमारदुःशासनस्य वधेन आमर्षितः क्रुद्धो यः तेन, अङ्गराजेन=कर्णेन, कृतकुटिलभ्रुकुटीभङ्गभीषणललाटपट्टेन = कुटिलः वक्री यो भ्रुकुटीभङ्गः क्रोधेन ललाटसङ्कोचकरणं तेन भीषणः ललाटपट्टः मस्तकस्थितोष्णीषः कृतः येन, अविज्ञातसन्धानतीक्ष्णमोक्षनिशितशरधारावर्षिणा = अविज्ञातो सन्धान- तीक्ष्णमोक्षौ येन स चासौ निशितशरधारावर्षी तेन, अभियुक्तः = अधिगृहीतः, रत्नों की महिमा से युद्ध के प्रहार की पीड़ा शान्त हो गई [गर्व के साथ आगे बढ़कर] सुनिए महाराज ! आज तो कुमार दुःशासन का वध........ (आधी बात कह कर मुख ढँक लेता है) सूत-सुन्दरक ! कहो । दुर्योधन ने तो कह दिया है । दुर्योधन-कहो । मैं सुन चुका हूँ । सुन्दरक-(मन ही मन) महाराज ने दुःशासन का वध नीचे सुन लिया ? (प्रकट रूप से) सुनिये राजाधिराज ! आज कुमार दुःशासन के वध से क्रुद्ध स्वामी अङ्गाधिपराज [कर्ण] ने अपनी कुटिल भौंहें चढ़ाकर ललाट प्रदेश को भयानक बना लिया ! उनके बाणों के

चतुर्थोऽङ्कः ] \qquad\qquad प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् \qquad\qquad १७३ पट्टेनविन्नांतसंधानतीक्ष्णमोक्षनिक्षिप्तशरधारावर्षिणाभियुक्तः स दुराचारो दुःशासन- वैरी मध्यमपाण्डवः ।) उभी-ततस्ततः । सुन्दरकः-तदो देव, उहअबलंमिलन्तदीप्पन्तक रितुरअपदादिसमुद्भूद- धूलिणिअरेण पल्लत्थगजघडासंघादेण अ वित्थन्तेण अन्धआरेण अन्धीकिदं उहअवलम् । ण हु गगणतलं अवलीअदि । (ततो देव, उभय वलमिलद्दीप्यमान- करितुरगपदातिसमुद्भूतधूलिनिकरेण पर्यस्तगजघटासंघातेन च विस्तीर्यमाणेनान्धका- रेणान्धीकृतमुभयवलम् । न खलु गगनतलं लक्ष्यते ।) उभी - ततस्ततः । सुन्दरकः-तदो देव, दूराकट्टिअधणुगुणाच्छोडनटङ्कारेण गम्भीरभी- सणेण जाणाअदि गज्जिदं पलअजलहरेण त्ति । (ततो देव, दूराकृष्टधनुर्गुणा- युद्धार्थं लक्ष्मोकृतः, दुराचारः = दुष्टः, मध्यमपाण्डवः = भीमः, कर्णो भीमेन सह युद्धार्थं सन्नद्ध इत्यर्थः । उभयवलमिलद्दीप्यमानकरितुरगपदातिसमुद्भूतधूलिनिकरेण = उभयसैन्ययोः मिलन्तो ये दीप्यमानहस्तिघोटकचरणगन्तारः तैः समुद्भूतः सञ्जातो यो धूलिनिकरः रजःसमूहः तेन, पर्यस्तगजघटासङ्घातेन = पर्यस्ता व्याप्ता या गजघटा हस्ति समूहः तस्याः सङ्घातेन, च विस्तीर्यमाणेने = विततेन, अन्धकारेण = तमसा, उभयवलं= कौरवपाण्डवसैन्यमन्धीकृतम्, गगनतलम् = आकाशमण्डलम् । दूराकृष्टधनुर्गुणाच्छोटनटङ्कारेण = दूरं यथा स्यात्तथा आकृष्टो यो धनुर्गुणः चाप- आदान और मोक्ष का पता नहीं चलता था । उन्होंने अगणित बाणों की झड़ी लगाते हुए उस दुष्ट मझले पाण्डव भीमसेन पर आक्रमण कर दिया । दोनों-तो फिर क्या हुआ ? सुन्दरक-तो फिर महाराज ! दोनों पक्षों की सेनाओं के हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकों के भिड़ जाने के कारण उठी हुई धूलराशि में और इधर-उधर फैले हुए हाथियों के झुण्ड से सर्वत्र विस्तृत अन्धकार से दोनों पक्ष की सेना अन्धी सी हो गई, पृथ्वी और आकाश का पता नहीं चलता था । दोनों-तो फिर ? सुन्दरक-जब धनुष की प्रत्यञ्चा [ डोरी ] पूरी तरह खींचकर छोड़ दी जाती थी तब उसकी गम्भीर ध्वनि के कारण त्रासजनक अन्धकार से विदित होता था कि प्रलयकालीन

१७४ वेणीसंहारं नाटकं -च्छोटनटङ्कारेण गम्भीरभीषणेन ज्ञायते गर्जितं प्रलयजलधरेणेति ।) दुर्योधनः—ततस्ततः । सुन्दरकः—तदो देव, दाहिणं वि ताणं अण्णोण्णसिंहणादगज्जिदपिसुणं विविहपरिमुक्कप्पहरणाहदकवअसंगलिदजलनविज्जच्छडाभासुरं गम्भीर- त्थणिअचापजलहर प्पसरन्तसरधारासहस्सवरिस जाद समरदुद्दिणं । (ततो देव, द्वयोरपि तयोरन्योन्यसिंहनादगर्जितपिशुनं विविधपरिमुक्तप्रहरणाहतकव- चसङ्गलितज्वलनविद्युच्छटाभासुरं गम्भीरस्तनितचापजलधरं प्रसरच्छरधारासहस्रवर्षि जातं समरदुर्दिनम् ) दुर्योधनः—ततस्ततः । सुन्दरकः—तदो देव, एदस्स अन्तरे जेट्ठस्स भादुणो परिभवसङ्किणा।


ज्या तस्याच्छोटनेन आस्फालनेन यः टङ्कारः धनुशब्दः तेन, गम्भीरभीषणेन = धीर- भयावहेन, प्रलयजलधरेण = प्रलयकालिकमेघेन, गर्जितं = स्तनितमिति ज्ञायते । तयोः—भीमकर्णयोः अन्योन्यसिंहनादगर्जितपिशुनं = परस्परं सिंहनाद इव गर्जितं तस्य पिशुनं सूचकम्, विविधपरिमुक्तप्रहरणाहतकवचसङ्गलितज्व- लनविद्युच्छटाभासुरं = विविधैः अनेकविधैः परिमुक्तप्रहरणैः त्यक्तशस्त्रैः आहतं यत् कवचं तस्मात् सङ्गलितः निःसृतो यो ज्वलनः अग्निः विद्युच्छटा इव तथा भासुरं प्रकाशमानम्, गम्भीरस्तनितचापजलधरं = गम्भीरं स्तनितं शब्दः स चासौ चापः स एव जलधरः मेघो यत्र, इदं सर्वसमरदुर्दिनस्य विशेषणम् । प्रसरच्छरधारामहत्व-


मेघ गर्जन कर रहे हैं अर्थात् अन्धकार प्रलय-काल के मेघों का भाँति और धनुष की टङ्कार उनकी गड़गड़ाहट के साथ गर्जन की भाँति प्रतीत होती थी । दुर्योधन—फिर क्या हुआ ? सुन्दरक—इसके अनन्तर महाराज ! उन दोनों [ कर्ण और भीमसेन ] का परस्पर हुङ्कारनाद मेघगर्जन का सूचक था । अनेक प्रकार के प्रक्षिप्त शस्त्रों से सन्ताड़ित कवच से निकले हुए स्फुलिङ्ग (चिनगारियाँ) बिजली के सदृश थे ! प्रचुर परिमाण में रक्त की विन्दुएँ जुगूनू के सदृश चमक रही थीं । निर्घोषकारी धनुरूपी मेघ से छूटते हुए वे असंख्य बाण जल की धारायें थीं जो अत्यन्त भयोत्पादक दिखलाई पड़ती थीं । वर्षा के दिन की तरह दोनों में युद्ध प्रारम्भ हो गया ! दुर्योधन—तो फिर क्या हुआ ? सुन्दरक—तो फिर महाराज इसी अवसर पर ज्येष्ठ भ्राता [ भीम के ] पराजय की

चतुर्थोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् १७५ धणं जएण वज्जणिग्घादणिग्घोसविसमरसिदधवअगठिदमहावाणरो तुर- ङ्गमसंवहणवापिदवासुदेवसंखचक्कअसिगदालच्छिदचउव्वबाहुदण्डो आपूरि- अवञ्चजण्णदेवअत्ताररसिदप्पडिरवभरिददसदिसामुहकुहरो धाविदो तं उद्देसं रहवरो । (ततो देव, एतस्मिन्नन्तरे ज्येष्ठस्य भ्रातुः परिभवशङ्किना धन- ञ्जयेन वज्रनिर्घातनिर्घोषविषमरसितध्वजाग्रस्थितमहावानरस्तुरङ्गमसंवाहनव्यापृत- वासुदेवशङ्खचक्रासिगदालाञ्छितचतुर्बाहुदण्ड आपूरितपाञ्चजन्यदेवदत्ताररसितप्रतिर- वभरितदशदिशामुखकुहरो धावितस्तमुद्देशं रथवरः । ) दुर्योधनः- ततस्ततः । वर्षि = प्रसरन्ती या शरधारा बाणप्रचारः तस्याः सहत्वं तदर्पणशीलम्, समर- दुर्दिनं = दुर्दिनमिव समरः सङ्ग्रामः, मेघाच्छन्नं हि दिनं दुर्दिनमुच्यते जातं, दुर्दित- मिव सङ्ग्रामोऽभूदिति भावः । ज्येष्ठस्य = अग्रजस्य, भ्रातुः=भीमस्य, परिभवशङ्किना=पराजयशङ्केन, धनञ्ज- येन = अर्जुनेन, वज्रनिर्घातेति - वज्रनिर्घातः अशनिशब्दः तद्वत् यो निर्घोषः शब्दः तद्वद् रसितं यत्र, ध्वजाग्रस्थितः महावानरः यत्र, अश्वसंवाहने व्यापृतो या वासुदेवः तस्य शंखचक्रखड्गादिभिः लाञ्छितः अङ्कितः दण्ड इव चत्वारो वाहव इति चतुर्बाहु- दण्ड म यत्र । यद्यपि कृष्णस्य चतुर्भुजरूपेणोत्पत्तौ सत्यामपि जन्मकाल तरमेव भुजद्वयस्य विलोप इति चतुर्बाहुदण्ड इति कथनमसङ्गतम् तथापि महाभारतसङ्ग्राम- काले कृष्ण. शत्रुत्रासार्थं चतुर्भुजो बभूव अत एवोक्तं गीतायां- तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते' इति । कथमन्धथा, चतुर्भुजत्वं रूपं तदा यदासीत् तदेव रूपं प्राप्नुहीत्यर्थकगीता वचनं सङ्गतं स्यात् पूर्वमपि चतुर्भुजत्वप्राप्तिकथनस्यायुक्तः, अत एवोक्तमत्र-चतुर्बाहुदण्डेति। पाञ्चजन्यं कृष्णस्य शंखः देवदत्तमर्जुनस्य । आशङ्का से अर्जुन [ अपने ] उत्तम रथ को उस स्थान तक [ जहाँ भीम और कर्ण का युद्ध हो रहा था ] दौड़ाया ! उसकी पताका पर वज्रपात के सदृश भीषण किलकार करते हुए वानरराज [ हनुमान् ] बैठे हुए थे । घोड़ों की शुश्रूषा में संलग्न भगवान् वासुदेव की शंख चक्र, करवाख और गदा से युक्त भुजायें उस रथ पर दण्डाकार थीं । उस रथ पर बजाये जाते हुए पाञ्चजन्य तथा देवदत्त [ श्रीकृष्णचन्द्र के शङ्ख तथा अर्जुन के शङ्ख का नाम ] नामक शङ्खों के तुमुल निनाद से सम्पूर्ण दिशाओं का मुखविवर गूंज रहा था । दुर्योधन-इसके अनन्तर क्या हुआ ?

१७६ वेणीसंहारं नाटकं सुन्दरकः—तदो भीमसेणधणञ्जएहिं अभिजुत्तं पिदरं पेक्खिअ ससंभमं विअलिअं अवधूणिअ अणसीसं आकण्णाकट्ठिदकठिणकोदण्डजीओ दाहिणहत्थुक्खित्तसरपुंखविघट्टणतुवराइदसारहीओ तं देसं उवगदो कुलालविस्ससेणो । (ततो भीमसेनधनञ्जयाभ्यामभियुक्तं पितरं प्रेक्ष्य ससम्भ्रमं विगलितमवधूय रत्नशीर्षकमाकर्णाकृष्टकठिनकोदण्डजीवो दक्षिणहस्तोक्षिप्तशरपुङ्ख- विघट्टनत्वरायितसारथिकस्तं देशमुपगतः कुमारवृषसेनः ।) दुर्योधनः—(सावष्टम्भम् ।) ततस्ततः । सुन्दरकः—तदो अ देव, तेण आअच्छन्तेण एव्व कुमालविससेणेण विदलिदासिलदासामलसिणिद्धपुङ्खेहिं कठिणकङ्कवत्तेहिं किसणवण्णेहि साणसिलणिसिदसामलसल्लबन्धेहि कुसुमिदो विअ तरू मुहुत्तएण सिली- मुहेहिं पच्छादिदो धणंजअस्स रहवरो । (ततश्च देव, तेनागच्छतैव कुमार- वृषसेनेन विदलितासिलताश्यामलस्निग्धपुङ्खैः कठिनकङ्कपत्रैः कृष्णवर्णैः शालशिला- विगलितं =यथास्थानमप्राप्तं, किञ्चित् पतितमित्यर्थः । रत्नशीर्षकं = मण्यादिनि- र्मतशिरःस्थम्, उष्णीषमिति । यावत् । आकर्णाकृष्टकठिनकोदण्डजीवः = कर्णपर्यन्तम् आकृष्टं कठोरचापस्य जीवो गुणः येन सः, दक्षिणहस्तोक्षिप्तशरपुङ्खविघट्टनत्वरायित- सारथिकः = दक्षिणहस्ते उत्क्षिप्तः स्थापितः शरपुङ्खः बाणमूलप्रदेशः येन सः, विघट्टने सञ्चालने त्वरायितः शीघ्रकारितायां नियुक्तः सारथिर्येन सः, बहुव्रीह्युत्तरं द्वयोः कर्मधारयः । कुमारवृषसेनः = कर्णपुत्रः, तं देशम् उपगत इत्यन्वयः । विदलितासिलताश्यामलस्निग्धपुङ्खैः = विद्लिता मर्दिता या असिलता खड्गः तद्वत् श्यामलाः स्निग्धाः पुङ्खाः शरमूलानि येषां तैः, शल्यबन्धैरित्यन्तस्य शिली- मुखैरित्यनेनान्वयः । कठिनकङ्कपत्रैः=कठिनं कठोरं कङ्कपत्रं कङ्कनामकपक्षि पक्षा येषु, सुन्दरक—इसके पश्चात् भीमसेन और अर्जुन से युद्ध करते हुए अपने पिता को देखकर राजकुमार वृषसेन व्याकुल होकर शीघ्रता के कारण गिरे हुए रत्नजटित उष्णीष [साफा या पगड़ी] को अवहेलना करते हुए, कान तक सारगर्भित धनुष की प्रत्यञ्चा [डोरी] को आकृष्ट करते हुए तथा दाहिने हाथ मे तरकश से निकाले गए बाणों के मूल में लगे हुए पुङ्ख से सारथि को शीघ्रता के लिए प्रेरित करते हुए उस प्रदेश तक पहुंच गए । दुर्योधन—(गर्व के साथ) फिर क्या हुआ ? सुन्दरक—पुनः इसके अनन्तर महाराज ! पहुँचते ही उस कुमार वृषसेन ने सञ्चूर्णित तलवार की तरह चमचमाते हुए नीलवर्ण के पुङ्ख से युक्त कठोर कङ्कपत्र सम्पन्न अतएव

चतुर्थोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाश-द्वयोपेतम् १७७ निशितश्यामशल्यबन्धैः कुसुमित इव तरुर्मुहूर्तेन शिलीमुखैः प्रच्छादितो धनञ्जयस्य रथवरः । उभौ—( सहर्षम् । ) ततस्ततः । सुन्दरकः—तदो देव, तीक्खविविखत्तणिसिदभल्लवाणवरिसिणा धणं- जएण ईसि विहसिअ भणिदम्—'अरे रे विससेण, पिदुणो वि दाव दे ण जुत्तं मह कुविदस्स अभिमुहं ठादुम् । किं उण भवदो बालस्स । ता गच्छ । अवरेहिं कुमारेहिं सह गदुअ आआधेहि ।' एव्वं वाअं णिसमिअ गुरुअणाधिक्खेवेण उद्दीविअकोवोवरत्तमुहमण्डलविअम्भिअभिउडिभङ्ग- भीसणेण चावधारिणा कुमालविससेणण सम्मभेदएहिं परुसविसमेहिं सुदिव्हकिदप्पणेहि णिव्भच्छिदो गण्डीवी वाणेहिं ण उण दुट्ठवअणेहि । ( ततो देव, तीक्ष्णविधिक्षिप्तनिशितभल्लबाणवर्षिणा धनञ्जयेनेषद्विहस्य भणितम्— 'अरे रे वृषसेन, पितुरपि, तावत्ते न युक्तं मम कुपितस्याभिमुखं स्थातुम् किं पुन- र्भवतो बालस्य । तद्गच्छ । अपरैः कुमारैः सह गत्वा युध्यस्व ।' एवं निशम्य गुरुजनाधिक्षेपेणोद्दीपितकोपोपरक्तमुखमण्डलविजृम्भितभ्रुकुटिभङ्गभीषणेन चापधारिणा कृष्णमुखैः = श्यामलाग्रभागैः, शाणशिलानिशितश्यामशल्यबन्धैः = शाणे कृत्तती- क्षणाग्रैरित्यर्थः । शिलीमुखैः = वाणैः, मुहूर्तेन, कुसुमितः = पुष्पितः तरुरिव धनञ्जयस्य, रथवरः, प्रच्छादित इत्यन्वयः । तीक्ष्णनिशितभल्लबाणवर्षिणा = तीक्ष्णं यथा स्यादेवं निशिता शाणादिना तेजिता भल्लाः कुन्ताः येन स चासौ बाणवर्षी तेन, धनञ्जयेन = अर्जुनेन, ईषद् = अल्पं, विहस्य, भणितम्— उक्तम्, किमुक्तमित्याह अरे रे इति । गुरुजनाधिक्षेपेण = पितृनिन्दया, उद्दीपितकोपोपरक्तमुखमण्डलविजृम्भितभ्रुकुटी- नील वर्ण के बाणों से जिनके फल सान पर चढ़ा देने के कारण चमक-दमक से पूर्ण थे, फूले हुए वृक्षको भ्रमरों की भाँति अर्जुनके प्रशस्त रथको क्षण भर में आच्छादित कर दिया। दोनों—[ दुर्योधन और सूत ]—[ प्रसन्नतापूर्वक ) उसके पश्चात् ? सुन्दरक—तो फिर, राजाधिराज ! वेग के साथ छोड़े गए तीक्ष्ण [ तेज ] भालों के सदृश बाणों की वृष्टि करते हुए अर्जुन ने ईषत् स्मित करके [ थोड़ा हँसकर ] कहा—'अरे ए वृषसेन, तुम्हारे पिता भी क्रुद्ध हो जाने पर मेरे समक्ष नहीं ठहर सकते फिर तुम तो बच्चे हो तुम्हारा कहना ही क्या ? अतः जाओ और किसी दूसरे बच्चों के साथ युद्ध करो'। इस प्रकार की बात को सुनकर गुरुजनों की निन्दा से जागे हुए क्रोध से तमतमाते १२ वे०