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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

विनय-पत्रिका ४३५ धर्म) राखमें हवन या ऊसर जमीनपर वर्षा करनेके समान (निष्फल) है ॥३॥ जो (रामजी) आदिमें अन्तमें और मध्यमें अच्छे हैं, जो सभीका भला करते हैं, और जिनका यश लोक और वेदमें फैल-सा रहा है, उन सीतापति रामचन्द्रके समान शील-निधान स्वामी दूसरा कोई नहीं है। रे दुष्ट ! (ऐसे स्वामीको) तू भूला-सा बैठा है; कैसे तुझे चैन पड़ रही है ? ॥४॥ जो (रामजी) जीवोंके जीवन, प्राणोंके प्राण, परम हितकारी, अत्यन्त प्रिय और नीचोंको पवित्र करनेवाले हैं, उनका तू निरादर कर रहा है। हे तुलसी ! कोशलपति कृपालु श्रीरामजीने तेरे लिए चित्र-कूटमें जो लीला रची थी, उसका चित्त देकर स्मरण कर ॥५॥ विशेष १—'चित्रकूटको चरित्र'—एक बार चित्रकूटमें गुसाईंजीको दो घुड़सवार राजकुमार एक मृगका पीछा करते हुए दिखाई पड़े। उस समय गुसाईंजी कुछ ध्यानावस्थित थे। ध्यानमें विघ्न पड़नेकी आशंकासे उन्होंने नेत्र बन्द करके मस्तक झुका लिया। थोड़ी देरके बाद हनुमान्‌जीने दर्शन देकर उनसे पूछा कि 'राम ओर लक्ष्मणके दर्शन मिले या नहीं ? जो दो राजकुमार घोड़ेपर चढ़कर गये हैं, वह श्रीरामजी ओर लक्ष्मणजी थे।' गुसाईंजी पछताने लगे। बोले— 'लोचन रहे बैरी होय । जानि-बूझि अकाज कीनो गये भू में गोय ॥ अविगत जु तेरी गति न जानी रह्यो जागत सोय । सबै छबि की अवधि में हैं निकसि गे ढिग होय ॥ करमहीन मैं पाय हीरा दियो पलमें खोय । दास तुलसी राम बिछुरे कहौ कैसी होय ॥' इस पदमें उक्त प्रत्यक्ष दर्शनकी ओर ही गोसाईंजीका संकेत है। [ २६५ ] तन सुचि, मन रुचि, मुख कहौँ 'जन हौं सिय-पीको'। केहि अभाग जान्यो नहीं, जो न होइ नाथ सों नातो-नेहु न नीको ॥१॥

४३६ विनय-पत्रिका जल चाहत पावक लहौं, विष होत अमी को । कलि-कुचाल संतनि कही सोइ सही, मोहि कछु फहम न तरनि तमी को ॥२॥ जानि अंध अंजन कहै बन-बाघिनी-घी को । सुनि उपचार बिकार को सुविचार करौं जब, तब बुधि बल हरै हीको ॥३॥ प्रभु सों कहत सकुचात हौं, परौं जनि फिरि फीको । निकट बोलि, बलि, बरजिये, परिहरै ख्याल अब तुलसिदास जड़ जीको ॥४॥ शब्दार्थ—फहम = ज्ञान । तरनि = सूर्य, प्रकाश । तमी = रात्रि, अन्धकार । बरजिये = मना कर दीजिए । जीको = जीव का । भावार्थ—हे प्रभो ! मैं शरीरको पवित्र और मनमें रुचि रखता हूँ; मुखसे भी कहता हूँ कि 'मैं जानकी-वल्लभ श्रीरघुनाथजीका सेवक हूँ'; फिर भी जानता नहीं कि किस दुर्भाग्यसे नाथके साथ मेरा भली-भाँति स्नेह-सम्बन्ध नहीं हो रहा है ॥१॥ चाहता हूँ जल, पाता हूँ आग ! (शान्तिकी जगह त्रिताप मिलता है) । इसी प्रकार मेरे लिए अमृतका भी विष हो जाता है (अर्थात् अमृतरूपी सत्कर्म अभिमानरूपी विष पैदा करता है) । सन्तोंने जो कलिकालकी कुचालें कही हैं, वे सही हैं । मुझे प्रकाश और अन्धकारका कुछ भी ज्ञान नहीं है (अर्थात् मैं ज्ञान और अज्ञानको यथार्थ रूपसे नहीं पहचान सकता) ॥२॥ मुझे अन्धा जानकर (कलि) वनकी सिंहिनीके घीका अंजन लगानेको कहता है । जब मैं यह विकारयुक्त उपचार सुनकर उसपर सुन्दर विचार करता हूँ, तब वह मेरे हृदयके बुद्धिवलको हर लेता है (अज्ञान-वनमें वासनारूपी सिंहिनी रहती है । विषय ही उसका घी है । वह तो पासमें जाते ही खा जायगी, विषयोंमें फँसे हुए जीवको ज्ञानरूपी नेत्र कैसे मिल सकते हैं ?) ॥३॥ हे प्रभो ! मैं आपसे कहनेमें सकुचाता हूँ कि कहीं मैं फिर फीका न पड़ जाऊँ । इसीसे मैं बलैया लेता हूँ,

विनय-पत्रिका ४३७ पास बुलाकर (कलियुग)को मना कर दीजिये ताकि अब वह तुलसी जैसे जड़ जीवका ख्याल छोड़ दे ॥४॥ विशेष १—'तन सुचि' * 'नेह न नीको'—क्योंकि आपने तो गीतामें कहा है— अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ 'हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझमें अनन्यचित्त होकर नित्य-निरन्तर मुझको स्मरण करता है, उस निरन्तर मुझमें लगे हुए योगीके लिए मैं सुलभ हूँ।' [ २६६ ] ज्यों ज्यों निकट भयो चहौं कृपालु ! त्यों त्यों दूरि पर्यो हौं । तुम चहुँ जुग रस एक राम ! हौं हूँ रावरो, जदपि अघ अवगुननि भर्यो हौं ॥१॥ बीच पाइ एहि नीच बीच ही छरनि छल्यो हौं । हौं सुवरन कुबरन कियो, नृप तें भिखारि करि, सुमति तें कुमति कस्यो हौं ॥२॥ अगनित गिरि-कानन फिर्यो, बिनु आगि जर्यो हौं। चित्रकूट गये हौं लखि कलि की कुचालि सब, अब अपडरनि डर्यो हौं ॥३॥ माथ नाइ नाथ सो कहौं, हाथ जोरि खर्यो हौं । चीन्हो चोर जिय मारि है तुलसी सो कथा सुनि प्रभु सों गुदरि निबर्यो हौं ॥४॥ शब्दार्थ—छरनि = छलों। छल्यो = छला गया। कुवरन = बुरी धातु, लोहा आदि । खर्यो = खड़ा। गुदरि = विनती । भावार्थ—हे कृपालु ! ज्यों-ज्यों मैं आपके निकट होना चाहता हूँ त्यों-त्यों दूर पड़ता जाता हूँ। हे रामजी ! आप चारों युगमें एकरस रहते हैं और मैं भी आपका (अंश) हूँ, यद्यपि मैं पापों और अवगुणोंसे भरा हुआ हूँ ॥१॥ आपसे अलग होते ही इस कलियुगने बीचहीमें मौका पाकर छलोंसे छल लिया (ज्यों ही

४३८ विनय-पत्रिका मेरी जीव संज्ञा पड़ी और मैं भगवच्चरणारविन्दोंसे विमुख हुआ, त्यों ही कलियुग- ने मुझे अपने चंगुलमें फँसा लिया)। इसने मुझ सुवर्णको कुवर्ण कर दिया, राजासे भिखारी कर दिया और अच्छी बुद्धिसे बुरी बुद्धिवाला बना दिया ॥२॥ मैं बिना आगके ही जलता हुआ अगणित पर्वतों और वनोंमें घूमता फिरा, किन्तु चित्रकूटमें जानेपर मैंने इस कलियुगकी सब कुचालोंको देखा; अतः अब मैं अपने ही डरसे डर रहा हूँ ॥३॥ मैं हाथ जोड़कर खड़ा हूँ और सिर झुकाकर स्वामीसे कहता हूँ कि पहचाना हुआ चोर जीवको मार डालता है; इस बातको सुनकर तुलसी अपने स्वामीसे विनती कर चुका (अब आपकी जो इच्छा हो सो कीजिये) ॥४॥ विशेष १—'चीन्हों चोर''''''निबन्यो हों'—जब गुसाईं जी ने चित्रकूटमें ईश्वर- प्राप्तिके लिए बड़ी कड़ी साधना की, तब कलियुग बहुत क्रुद्ध हुआ। किन्तु हनुमान्जीकी कृपासे वह इनका एक बाल भी बाँका न कर सका। हाँ, यह अवश्य था कि गुसाईंजी उसीके डरसे सदा सशंक रहा करते थे। इसीसे उन्होंने भगवान्से यह बात कही है। २६७] पन करि हों हठि आजु तें रामद्वार पर्यो हों। 'तू मेरो' यह बिन कहे उठिहौं न जनम भरि, प्रभु की सौं करि निबन्यो हों ॥१॥ दै दै धक्का जमभट थके, टारे न टल्यो हों। उदर दुसह साँसति सही बहु बार जनमि जग, नरक निदरि निकस्यो हों ॥२॥ हों मचला लै छोड़िहौं, जेहि लागि अर्यो हों। तुम दयालु, बनि है दिये, बलि, बिलंब न कीजिये, जात गलानि गन्यो हों ॥३॥ प्रगट कहत जो सकुचिये, अपराध-भन्यो हों। तौ मनमें अपनाइये, तुलसीहि कृपा करि, कलि बिलोकि हहन्यो हों ॥४॥

विनय-पत्रिका ४३९ शब्दार्थ—जम-भट = यमराजके योद्धा, यमदूत । निदरि = निरादर । मचला = मचल गया हूँ । अन्यो = अड़ा । भावार्थ—हे रामजी ! आजसे मैं जबर्दस्ती करनेकी प्रतिज्ञा करके आपके द्वारपर पड़ा हूँ। प्रभुकी शपथ खाकर कह चुका हूँ कि जबतक आप यह न कहेंगे कि 'तू मेरा है', तबतक मैं न उठूँगा—चाहे मेरी जिन्दगी बीत जाय ॥१॥ (मैं ऐसा हठी हूँ कि) यमदूत धक्के दे-देकर थक गये, पर मैं हटानेसे न हटा (अर्थात् इतने अधिक पाप किये कि अनेक जन्म नरकमें ही बीते)। मैं संसारमें अनेक बार जन्म लेकर पेटका दुस्सह कष्ट सहनेके बाद नरकका निरादर करके वहाँसे निकला हूँ ॥२॥ जिस वस्तुके लिए मैं मचल गया हूँ, और अड़ा हुआ हूँ, उसे लेकर ही छोड़ूँगा । बलिहारी ! आप दयालु हैं, अतः देनेसे ही काम चलेगा, (जब वह वस्तु देनी ही है, तो) देर न कीजिये, क्योंकि मैं ग्लानिसे गला जा रहा हूँ ॥३॥ मैं अपराधोंसे भरा हुआ हूँ, उससे यदि आपको प्रकट रूपसे ('तू मेरा है') कहनेमें संकोच मालूम होता हो, तो आप कृपा करके तुलसीदासको अपने मनमें ही अपना लीजिये, क्योंकि मैं कलियुगको देखकर हहर गया हूँ ॥४॥ विशेष १—'पन करि······राम द्वार पर्यो हौं'—इसी प्रकार महात्मा सूरदास भी द्वारपर खड़े हैं— दीनन दुख हरन देव सन्तन हितकारी । अजामील गीध व्याध इनमें कहौ कौन साध पंछी हू पद पढ़ात गनिकासी तारी ॥ ध्रुवके सिर छत्र देत प्रहलादको उबारि लेत भक्त हेत बांध्यो सेतु लंकपुरी जारी । तंदुल देत रीझि जात सागपात सों अघात गिनत नाहिं जूठ फल खाटे-मीठे खारी ॥ गजको जब ग्राह ग्रस्यो दुसासनने चीर खिंच्यो सभा-बीच कृष्ण-कृष्ण द्रौपदी पुकारी । तुरतै हरि आइ गए बचनन आरूढ़ भये सूरदास द्वारे ठाढ़ो आँधरो भिखारी ॥ [ २६८ ] तुम अपनायो तब जानिहौं, जब मन फिरि परिहै । जेहि सुभाव बिषयनि लग्यो, तेहि सहज नाथ सों नेह छाँड़ि छल करिहै ॥१॥

४४० विनय-पत्रिका सुतकी प्रीति, प्रतीति मीतकी, नृप ज्यों उर डरिहै। अपनो सो स्वारथ स्वामी सों, चहुँ विधि चातक ज्यों एक टेक ते नहिं टरिहै ॥२॥ हरषिहै न अति आदरे, निदरे न जरि मरिहै। हानि लाभ दुख सुख सबै समचित हित अनहित, कलि-कुचालि परिहरिहै ॥३॥ प्रभु-गुन सुनि मन हरषिहै, नीर नयननि ढरिहै। तुलसीदास भयो रामको, विस्वास, प्रेम लखि आनंद उमगि उर भरिहैं ॥४॥ शब्दार्थ-परिहै = पड़ेगा। निदरे = निरादर होनेपर। नीर = जल। ढरिहै = गिरने लगेगा। उर = हृदय। भावार्थ-जब मेरा मन विषयोंकी ओरसे लौट पड़ेगा तथा जिस स्वभावसे विषयोंमें लगा हुआ है, उसी सहज स्वभावसे छल छोड़कर नाथसे स्नेह करेगा, तब मैं समझूँगा कि आपने मुझे अपना लिया ॥१॥ जब मेरा मन रामजीसे पुत्रकी तरह प्रेम करेगा, मित्रकी तरह उनपर विश्वास करेगा, राजाकी तरह उनसे अपने हृदयमें डरेगा तथा चारों ओरसे चातककी भाँति उन्हींसे अपने स्वार्थोंकी सिद्धि समझेगा और अपने एक टेकसे न टलेगा ॥२॥ जब वह अत्यन्त आदर पानेपर हर्षित न होगा, निरादर होनेपर जलकर न मरेगा, हानि-लाभ, दुःख-सुख, हित-अहित सबमें समचित्त रहेगा और कलियुगकी कुचालोंको छोड़ देगा ॥३॥ जब मेरा मन प्रभुके गुणोंको सुनकर हर्षित होने लगेगा तथा नेत्रोंसे प्रेमाश्रुकी धारा बहने लगेगी, तब तुलसीदासको विश्वास होगा कि वह श्रीराम- जीका हो गया और तभी उसका हृदय उस प्रेमको देखते ही आनन्दसे उमड़कर परिपूर्ण होगा ॥४॥ विशेष १-'तुम अपनायो......करिहै'—वास्तवमें ऐसा होनेपर ही ईश्वर-भक्ति पैदा होती है और परमात्म-दर्शन सुलभ होता है—भगवत्कृपा होती है। भगवान्ने गीतामें कहा भी है।—देखिये श्रीमद्भगवद्गीता, अ० ८

विनय-पत्रिका ४४१ २—'हानि लाभ······परिहरिहै'—वास्तवमें सुख-दुःखादिको समान माननेवाले जिस ज्ञानी पुरुषको उसकी पीड़ा नहीं होती, वही ब्रह्मकी स्थितिको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। यही बात भगवान्ने गीतामें कही है। (देखिये श्रीमद्भगवद्गीता २। १४. १५) [ २६१ ] राम कबहुँ प्रिय लागिहौ जैसे नीर मीन को ? सुख जीवन ज्यों जीवको, मनि ज्यों फनिको हित, ज्यों धन लोभ-लीन को ॥१॥ ज्यों सुभाय प्रिय लगति नागरी नागर नवीन को । त्यों मेरे मन लालसा करिये करुनाकर ! पावन प्रेम पीन को ॥२॥ मनसा को दाता कहैं श्रुति प्रभु प्रवीन को । तुलसिदास को भावतो, वलि जाउँ दयानिधि ! दीजै दान दीन को ॥३॥ शब्दार्थ—फनि = सर्प । नागरी = नायिका । नागर = नायक । नवीन = युवक । पीन = पुष्ट । भावतो = मनचाहा । भावार्थ—हे राम ! क्या आप कभी मुझे ऐसे प्रिय लगेंगे, जैसे मछलीको जल, जीवको सुखमय जीवन, सर्पको मणि, लोभमें लीन रहनेवाले (कंजूस) को धन प्यारा लगता है ? ॥१॥ अथवा जैसे स्वभावसे ही युवक नायकको नायिका प्रिय लगती है, वैसे ही हे करुणाकर ! मेरे मनमें (अपने प्रति) पवित्र और पुष्ट प्रेमकी लालसा उत्पन्न कीजिये ॥२॥ वेदोंका कथन है कि चतुर परमात्मा मनो- वाञ्छाके देनेवाले हैं। अतः हे दयानिधे ! मैं आपकी बलैया लेता हूँ, इस दीन तुलसीदासको उसका चाहा दान दीजिये (ऐसी कृपा कीजिये, जिसमें उसे आप अत्यन्त प्यारे लगें) ॥३॥ विशेष १—'प्रबीन'—यहाँपर प्रभुके लिए प्रबीन कहनेका यह भाव है कि

४४२ विनय-पत्रिका परमात्मा घट-घटकी बात जाननेवाले हैं, कहनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। यहाँ 'प्रवीन' शब्द बड़ा ही सार्थक प्रयुक्त हुआ है। २—इस पदमें गुसांईंजीने बड़े ही उच्चकोटिके प्रेमकी आकांक्षा प्रकट की है। उदाहरण भी खूब चुन-चुनकर दिये गये हैं। कविने पीछे भी एक पदमें ऐसी ही आकांक्षा प्रकट की है। वहाँपर रामचरितमानसका नीचे लिखा दोहा भी लिखा जा चुका है— 'कामिहि नारि पियारि जिमि, लोभीके उर दाम। तिमि रघुनाथ निरन्तर, प्रिय लागहु मोहि राम॥' कितनी ऊँची भावना है ! कैसी अनूठी सूझ है ! वाह ! इस टक्करका दोहा रामचरितमानसमें ढूँढ़नेसे नहीं मिल सकता। [ २७० ] कबहुँ कृपा करि रघुवीर ! मोहू चितैहौ। भलो-बुरो जन आपनो, जिय जानि दयानिधि ! अवगुन अमित बितैहौ ॥१॥ जनम जनम हौं मन जित्यो, अब मोहि जितैहौ। हौं सनाथ हैहौं सही तुम हू अनाथपति, जो लघुताहि न भितैहौ ॥२॥ बिनय करौं अपभयहु तें, तुम्ह परम हितै हौ। तुलसिदास कासों कहै, तुमही सब मेरे, प्रभु गुरु, मातु-पितै हौ ॥३॥ शब्दार्थ—भितैहौं = डरेंगे। अपभयहु = अकारण भयसे। भावार्थ—हे रघुबीर ! क्या आप कभी कृपा करके मेरी ओर भी देखेंगे ? हे दयानिधि ! क्या आप अपने मनमें मुझे भला-बुरा सेवक समझकर मेरे अपार दोषोंका अन्त कर देंगे ? ॥१॥ जन्म-जन्मसे (अनेक जन्मोंसे) यह मन मुझे जीतता आया है (मुझपर अपना अधिकार जमाता आया है); किन्तु अबकी बार क्या आप मुझे जितावेंगे (अर्थात् मैं अपने मनपर विजय पा सकूँगा ? यदि आप इतनी कृपा करेंगे, तो) मैं तो सनाथ हो ही जाऊँगा, आप भी सही-सही 'अनाथपति'

विनय-पत्रिका ४४३ हो जायँगे—हाँ, यदि आप मेरी क्षुद्रतासे न डरेंगे तो। (अर्थात् यदि आप मेरी तुच्छतासे न डरकर मुझे अपना लेंगे तो आपका 'अनाथपति' नाम सार्थक और सही हो जायगा) ॥२॥ (वैसे डरनेका कोई कारण नहीं है, क्योंकि) आप परम हितू हैं, इसीसे मैं अकारण भयसे आपसे विनती कर रहा हूँ। यह तुलसीदास और किससे कहने जाय ? क्योंकि मेरे तो प्रभु, गुरु, माता, पिता आदि सब कुछ केवल आप ही हैं ॥३॥ विशेष १—इस पदमें कविका अत्यन्त दीनता-पूर्ण और बड़ा ही कारुणिक कथन है। [ २७१ ] जैसो हौं तैसो राम रावरो जन, जनि परिहरिये । कृपासिंधु, कोसलधनी ! सरनागत-पालक, ढरनि आपनी ढरिये ॥ १ ॥ हौं तौ बिगरायल और को, बिगरो न बिगरिये । तुम सुधारि आये सदा सब की सब ही बिधि, अब मेरियो सुधरिये ॥२॥ जग हँसिहैं मेरे संग्रहे, कत इहि डर डरिये । कपि-केवट कीन्हे सखा जेहि सील, सरल चित, तेहि सुभाउ अनुसरिये ॥३॥ अपराधी तउ आपनो, तुलसी न बिसरिये । टूटियो बाँह गरे परै, फूटेहु विलोचन, पीर होत हित करिये ॥४॥ शब्दार्थ—ढरनि = बहाव, रीति । ढरिये = ढलिये, चलिये । भावार्थ—हे रामजी ! मैं जैसा हूँ, तैसा आपका हूँ, मुझ सेवकको न छोड़िये। हे कृपा-सागर कोशलनाथ ! आप शरणागतोंका पालन करनेवाले हैं, अतः आप अपनी ही ढारपर ढलिये (अर्थात् अपने बानेके अनुसार मुझ शरणा- गतका पालन कीजिये) ॥१॥ मैं तो औरों (माया, मोहादि या इन्द्रियादि) का बिगाड़ा हुआ हूँ, अतः अब आप इस बिगड़े हुएको न बिगाड़िये—नाराज न

४४४ विनय-पत्रिका होइये । (क्योंकि मेरा दोष नहीं है—दूसरोंने बिगाड़ा है)। आप सदासे सब लोगोंकी सब तरहसे सुधारते आये हैं, अतः अब मेरी भी (बिगड़ी हुई बातको) सुधारिये ॥२॥ मुझे अपनानेसे संसार हँसेगा, इस डरसे आप क्यों डर रहे हैं ? आपने जिस शील और सरल चित्तसे बन्दर और केवटको अपना मित्र बनाया था, उसी स्वभावका अनुसरण कीजिये ॥३॥ अपराधी होनेपर भी यह तुलसी आपका है, अतः इसे न भूल जाइये । देखिये न, टूटा हुआ हाथ भी गलेमें पड़ा रहता है (कोई उसे अलग नहीं कर देता), और फूटी हुई आँखमें पीड़ा होनेपर उसकी दवा की जाती है, (इसी प्रकार यद्यपि मैं किसी कामका नहीं हूँ, पर हूँ तो आपहीका ! अतः मुझे अपनेसे अलग न कर दीजिये) ॥४॥ विशेष १—'बिगरायल'—ज्ञानियोंने कहा है— कतिपयदिबसस्थायिनि मदकारिणि यौवने दुरात्मानः । विदधति तथाऽपराधं अन्यैव वृथा यथा भवति ॥ अर्थात् 'चन्द दिनके पाहुने किन्तु नशीले इस यौवनमें अज्ञानी लोग वह अपराध कर बैठते हैं जिससे जवानी ही क्या, उनका सम्पूर्ण जन्म ही व्यर्थ हो जाता है।' इसीसे गोस्वामीजी भी कह रहे हैं कि, 'मैं तो पहलेहीसे दूसरोंका बिगाड़ा हुआ हूँ', इसमें मेरा अपराध नहीं है। जब दूसरोंने, अर्थात् इन्द्रियोंने अथवा माया-मोहादिने मुझे ऐसा बिगाड़ दिया है कि मेरा सम्पूर्ण जन्म ही व्यर्थ हो जायगा, तो फिर आपके सुधारे बिना मेरा सुधार कैसे हो सकता है ? इसलिए इस बिगड़े हुए दासपर आप न बिगड़िये । [ २७२ ] तुम जनि मन मैलो करो, लोचन जनि फेरो । सुनहु राम ! बिनु रावरे लोकहु परलोकहु कोउ न कहूँ हित मेरो ॥१॥ अगुन-अलायक-आलसी जानि अधम अनेरो । स्वारथ के साथिन्ह तज्यो तिजराको-सो तोटक, औचट उलटि न हेरो ॥२॥

विनय-पत्रिका ४४५ भगति हीन, बेद-बाहिरो लखि कलिमल घेरो। देवनि हू देव ! परिहऱ्यो, अन्याव न तिनको, हौं अपराधी सब केरो ॥३॥ नाम की ओट पेट भरत हौं पै कहावत चेरो। जगत-बिदित बात है परी, समुझिये धौं अपने, लोक कि बेद बड़ेरो ॥४॥ है है जब-तब तुम्हहिं तें तुलसी को भलेरो। दिन-हू-दिन देव ! विगरि है, बलि जाउँ, बिलंब किये, अपनाइये सबेरो ॥५॥ शब्दार्थ—अगुन = गुणहीन। अनेरो = निकम्मा। तोटक = टोटका। सबेरो = शीघ्र। भावार्थ—हे नाथ ! आप अपने मनको मेरे लिए मैला न करें, और मेरी ओरसे निगाहें न फेरें। हे रामजी ! सुनिये, आपको छोड़कर न तो इस लोकमें ही और न परलोकमें ही कहीं कोई मेरा कल्याण करनेवाला है॥१॥ मुझे गुणहीन, नालायक, आलसी, नीच और निकम्मा जानकर मतलबके यारोंने तिजारीके टोटकेकी तरह छोड़ दिया और भूलसे भी उलटकर मेरी ओर न देखा ॥२॥ मुझे भक्ति-रहित और वेद-मार्गसे बाहर देखकर कलिके पापोंने घेर लिया। इससे हे देव ! मुझे देवताओंने भी त्याग दिया। किन्तु इसमें उनका कोई अन्याय नहीं है; क्योंकि मैं (स्वयं ही) सबका अपराधी हूँ ॥३॥ मैं आपके नामकी आड़में पेट भरता हूँ, फिर भी अपनेको आपका दास कहल- वाता हूँ। किन्तु अब तो यह बात संसारमें विदित हो गयी (कि मैं राम-भक्त हूँ)। अतः आप ही विचार कीजिये कि लोक बड़ा है या वेद ? (मेरी करनी तो वेद-विदित नहीं है, किन्तु संसार मुझे 'राम-दास' कहता है; अतः आप जो उचित समझें, स्वीकार करें) ॥४॥ तुलसीका भला तो जब कभी होगा, तब आपहीसे होगा। अतः मैं आपकी बलैया लेता हूँ, यदि आप देर करेंगे तो यह गरीब दिनपर दिन बिगड़ता ही जायगा, (इसीसे कहता हूँ कि जब आपको कभी- न-कभी मेरा कल्याण करना ही पड़ेगा, तो) शीघ्र मुझे अपना लीजिये ॥५॥ विशेष १—'तिजराको-सो तोटक'—तिजारीमें आधीरातके समय अनेक चीजोंमें

४४६ विनय-पत्रिका उतारा करके लोग चौराहेपर रख आते हैं । लौटते समय उस ओर देखा नहीं जाता । यदि कोई उस टोटकेकी ओर देख ले, तो उसे तिजारी ज्वर आने लगता है । २—'लोक कि बेद बड़ैरो'—'लोक बड़ा है या वेद, इसपर एक कहावत भी है— 'यद्यपि शुद्धम् लोकविरुद्धम् न करणीयम् न करणीयम् ।' अर्थात् 'यद्यपि कोई बात शुद्ध है यानी वेदविहित है, पर वह लोकके विरुद्ध है, तो वह करने योग्य नहीं है—नहीं है ।' इस कहावतसे भी लोककी श्रेष्ठता सिद्ध हो रही है । भगवान् रामचन्द्र भी इस बातके कायल हैं । तभी तो उन्होंने परम पवित्र और निष्कलंक जगज्जननी जानकीजीको घरसे निकाल कर, लोकका श्रेष्ठत्व सिद्ध किया था । जान पड़ता है कि गुसांईजीने उसी बातपर लक्ष्य रखकर 'लोक कि बेद बड़ैरो' लिखा है । [ २७३ ] तुम तजि हौं कासों कहौं, और को हितु मेरे ? दीनबंधु ! सेवक-सखा, आरत अनाथ पर सहज छोह केहि केरे ॥१॥ बहुत पतित भवनिधि तरे बिनु तरि, बिनु बेरे । कृपा-कोप-सति भायहू, धोखेहु-तिरछेहु, राम ! तिहारेहि हेरे ॥२॥ जो चितवनि सौंधी लगै, चितइये सवेरे । तुलसिदास अपनाइये, कीजै न ढील, अब जीवन-अवधि अति नेरे ॥३॥ शब्दार्थ—तरि = नौका । ( पाठान्तर 'तरिनि' ) । बेरे = बेड़ा । सौंधी = भली । नेरे = निकट । सवेरे = जल्द । भावार्थ—हे नाथ ! आपको छोड़कर मैं और किससे कहूँ? दूसरा कौन मेरा हितू है ? हे दीनबन्धो ! सेवकपर, सखापर, दुखियापर और अनाथपर सहज स्नेह और किसका है ? ॥१॥ बहुतसे पापी बिना नौका और बेड़ेके ही

विनय-पत्रिका ४४७ संसार-सागरसे पार हो गये । हे रामजी ! उनकी ओर अनुग्रहसे या क्रोधसे, सच्चे भावसे या धोखेसे अथवा तिरछी निगाहोंसे ही आपने देख दिया था (इसीसे वे तर गये थे) ॥२॥ इनमें जो चितवन आपको अच्छी लगे, उसी दृष्टिसे आप मेरी ओर जल्दी देखिये (चाहे कृपा-दृष्टिसे, चाहे कोप-दृष्टिसे, चाहे प्रेम- दृष्टिसे अथवा टेढ़ी-दृष्टिसे ही देखिये; किन्तु देखिये शीघ्र) । तुलसीदासको अपनाइये, इसमें ढिलाई न कीजिये; क्योंकि अब जीवनकी अवधि बहुत ही निकट है ॥३॥ विशेष १—‘कृपा-कोप••••••हेरे’—भगवान्‌ने कृपा-दृष्टिसे राजा नृग, अहिल्या आदिको देखा था; कोप-दृष्टिसे बालि, रावण आदिको देखा था; प्रेम-दृष्टिसे शबरी, निषाद, सुग्रीव, विभीषण आदिको देखा था; धोखेकी दृष्टिसे यवन आदिको तथा तिरछी निगाहोंसे पूतना आदिको देखा था; किन्तु सबके सब मुक्त हो गये थे । [ २७४ ] जाउँ कहाँ, ठौर है कहाँ देव ! दुखित-दीन को ? को कृपालु स्वामी-सारिखो, राखै सरनागत सब अंग बल-बिहीन को ॥१॥ गनिहि, गुनिहिं साहिब लहै, सेवा समीचीन को । अधन अगुन आलसिन को पालिबो फबि आयो रघुनायक नवीन को ॥२॥ मुख कै कहा कहौं, बिदित है जी की प्रभु प्रवीन को । तिहू काल, तिहु लोक में एक टेक रावरी तुलसी-से मन मलीन को ॥३॥ शब्दार्थ—गनिहि = धनीको । समीचीन = अच्छी । नवीन = नित्य नये । टेक = सहारा । भावार्थ—हे देव ! कहाँ जाऊँ ? मुझ दुःखित दीनके लिए कहाँ ठौर है ? आपके समान कृपालु स्वामी कौन है, जो सब तरहसे बलहीन (साधनोंसे रहित)

४४८ विनय-पत्रिका शरणागतको अपनी शरणमें रख ले ? ॥१॥ धनी, गुणी और अच्छी सेवा करने- वाले लोगोंको तो दूसरे स्वामी मिल जाते हैं; किन्तु निर्धन, गुणहीन और आलसियोंका पालन करना नित्य नवीन श्रीरघुनाथजीको ही फबता आया है ॥२॥ मुँहसे क्या कहूँ ? चतुर स्वामीको मेरे हृदयकी बात ज्ञात है। तुलसी- सरीखे मलिन मनवालेको तीनों काल और तीनों लोकमें केवल आपकीका सहारा है ॥३॥ विशेष १—'जाउँ कहाँ'—वास्तवमें जीवके लिए दूसरा अवलम्ब नहीं है। यजु- र्वेदके पुरुषसूक्तमें भी कहा गया है— तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति । नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ (३१।१८) अर्थात् 'उस परम पुरुषका साक्षात्कार करके ही मृत्युको लाँघ सकते हो, विश्राम पानेके लिए और कोई मार्ग या उपाय नहीं है'। २—'रघुनायक नवीन को'—कुछ टीकाकारोंने 'नवीनको' का अर्थ 'नया कौन है' किया है । [ २७५ ] द्वार द्वार दीनता कह्यो, काढ़ि रद, परि पाहूँ । हैं दयालु दुनी दस दिसा, दुख-दोष-दलन-छम, कियो न संभाषण काहूँ ॥१॥ तनु जन्यो कुटिल कीट ज्यों, तज्यो मातु पिता हूँ । काहे को रोष, दोष काहि धौं, मेरे ही अभाग मोसों सकुचत छुइ सब छाँहूँ ॥२॥ दुखित देखि संतन कह्यो, सोचै जनि मन माँहूँ । तोसे पसु-पाँवर-पातकी परिहरे न सरन गये, रघुबर ओर निबाहूँ ॥३॥

विनय-पत्रिका ४४९ तुलसी तिहारो भये भयो सुखी प्रीति-प्रतीति बिना हूँ। नाम की महिमा, सील नाथ को, मेरो भलो बिलोकि अब तें सकुचाहूँ, सिहाहूँ ॥४॥ शब्दार्थ—काढ़ि = निकालकर। रद = दाँत। कुटिल कीट = दुष्ट कीड़ा, दुष्ट जन्तु। पाँवर = नीच। पातकी = पापी। भावार्थ—हे स्वामी ! मैंने दाँत निकालकर द्वार-द्वारपर अपनी दीनता कही, और लोगोंके पैरोंपर भी गिरा। (यदि यह कहा जाय कि संसारमें कोई मेरी दरिद्रता दूर करनेवाला नहीं है, तो यह बात भी नहीं है) संसारमें ऐसे- ऐसे दयालु हैं जो दसो दिशाओंके दुःख और दोषोंका नाश करनेमें समर्थ हैं, किन्तु किसीने मुझसे बाततक नहीं की ॥१॥ माता-पिताने मुझे अपने शरीरसे इस प्रकार पैदा किया जैसे दुष्ट कीड़ा; अर्थात् मानो मैं दुष्ट कीड़ा था कि माता-पिताने अपने शरीरसे पैदा करके मुझे छोड़ दिया—स्वर्ग सिधार गये। (ऐसी दशामें) मैं किसलिए क्रोध करूँ, और किसे दोष दूँ ? यह सब मेरे ही दुर्भाग्यसे हुआ। सब लोग मेरी छायातकको छूनेमें सकुचाते हैं ॥२॥ मुझे दुःखित देखकर सन्तों ने कहा कि तू अपने मनमें सोच न कर। शरणमें जानेपर श्रीरामजीने तेरे जैसे नीच और पापी पशुओंतकका अपनी ओरसे निर्वाह किया है ॥३॥ प्रेम और विश्वास न रहनेपर भी यह तुलसीदास आपका (दास) होकर सुखी हो गया। हे नाथ ! आपके नामकी महिमा और शीलसे मेरा जो भला हुआ है, उसे देखकर मैं अभीसे संकुचित होता और सिहाता हूँ ॥४॥ विशेष १—‘तनु जन्यो······मातु-पिता हू’—इसका अर्थ करनेमें टीकाकारोंने खूब अटकल लगायी है। किसीने ‘त्वचा तजत’ पाठ माना है, तो किसीने ‘तनु तज्यो’ पाठ मानकर यह अर्थ किया है कि जैसे साँप अपना केंचुल छोड़ देता है। किन्तु हमने नागरी-प्रचारिणी-सभा, काशीकी प्रतिके अनुसार ‘तनु जन्यो’ पाठ शुद्ध माना है। वियोगी हरिजीने भी यही पाठ शुद्ध माना है; किन्तु आपने यह अर्थ किया है—‘जैसे दुष्ट कीड़ा अर्थात् साँप अपने ही शरीरसे २९

४५० विनय-पत्रिका जन्मे हुए (बच्चे) को त्याग देता है।' गीता प्रेसकी प्रतिमें भी 'साँप' की जगह 'सर्पिणी' के सिवा और अर्थ ज्योंका-त्यों है। पर यह अर्थ ठीक नहीं जँचता; क्योंकि सर्पिणी तो अपने बच्चोंको पैदा करके छोड़ नहीं देती बल्कि निगलने लगती है। हाँ, उसके वे बच्चे अवश्य बच जाते हैं, जिन्हें वह नहीं देख पाती। दूसरी बात यह कि यद्यपि उपमा एक ही अंशमें दी जाती है, फिर भी हृदय इस बातको स्वीकार नहीं करता कि गुसाईंजीने अपने माता-पिताओं साँपसे उपमा दी होगी। पं० रामनरेश त्रिपाठीने श्रीराम-चरित-मानसकी भूमिकामें 'कुटिल' शब्दको 'कुटीला' का अपभ्रंश माना है और इसका अर्थ किया है 'केकड़ा'। अर्थात् केकड़ेकी तरह पेट फाड़कर पैदा हुआ।' किन्तु इस अर्थमें भी 'मातु पिता हू' की संगति ठीक नहीं बैठती। मादा केकड़ेका पेट फाड़कर पैदा हुए; किन्तु पिताके लिए क्या कहा गया है? इस अर्थमें खींचा-तानी बहुत करनी पड़ती है। मेरी समझमें यदि 'कुटिल कीट' का अर्थ 'दुष्ट कीड़ा' किया जाय तो अधिक उत्तम हो। ऐसा अर्थ करनेमें किसी तरहकी खींचातानी नहीं करनी पड़ती और साधु अर्थ निकल आता है। इसका अन्वय इस प्रकार किया जायगा—'मातु तनु जन्यो ज्यों कुटिल कीट, पिता हू तज्यो' ऐसा अन्वय करनेपर सरल और साधु अर्थ निकल आता है। इससे ज्ञात होता है कि गोस्वामीजीके माता-पिता इनके बाल्यकालमें ही स्वर्गवासी हो गये थे जो कि सही भी है। [ २७६ ] कहा न कियो, कहाँ न गयो, सीस काहि न नायो ? राम रावरे बिन भये जन जनमि-जनमि जग दुख दस हू दिसि पायो ॥१॥ आस-बिबस खास दास है नीच प्रभुनि जनायो । हा हा करि दीनता कही द्वार-द्वार बार-बार, परी न छार, मुँह बायो ॥२॥ असन-बसन बिनु बावरो जहँ तहँ उठि धायो । महिमा-मान प्रिय प्रान ते तजि खोलि खलनि आगे, खिनु खिनु पेट खलायो ॥३॥

विनय-पत्रिका ४५१ नाथ ! हाथ कछु नाहिं लग्यो, लालच ललचायो । साँच कहौं, नाच कौन सो, जो न मोहिं लोभ लघु हौं निरलज्ज नचायो ॥४॥ श्रवन-नयन-मन मग लगे, सब थल पतितायो । मूड़ मारि, हिय हारि कै, हित हेरि हहरि अब चरन-सरन तकि आयो ॥५॥ दसरथके ! समरथ तुही, त्रिभुवन जसु गायो । तुलसी नमत अवलोकिये, बलि, बाँह बोल दै बिरुदावली बुलायो ॥६॥ शब्दार्थ—छार = राख । असन = भोजन । बसन = वस्त्र । खिनु = क्षण । पतितायो = विश्वास किया, पतियाना । हेरि = ढूँढ़कर । नमत = प्रणाम करता है । भावार्थ—मैंने क्या नहीं किया ? कहाँ नहीं गया ? और किसके आगे सिर नहीं झुकाया ? किन्तु हे रामजी ! जबतक मैं आपका दास नहीं हुआ, तबतक मैंने संसारकी दसों दिशाओंमें जन्म ले-लेकर दुःख ही पाया ॥१॥ आशावश (आपका) खास सेवक (ईश्वरका अंश) होनेपर भी मैंने क्षुद्र प्रभुओंको जनाया, हा-हा करके बार-बार द्वार-द्वार अपनी दीनता कही, किन्तु मेरा मुँह बाया ही रह गया, उसमें खाक भी न पड़ी (भोजनको कौन कहे) । अर्थात् मैं माँगता ही रह गया, पर किसीने कुछ नहीं दिया । भोजन और वस्त्रके बिना बावला होकर जहाँ-तहाँ दौड़ता फिरा, प्राणोंसे प्यारी मान-प्रतिष्ठाको त्यागकर दुष्टोंके आगे क्षण-क्षणपर खाली पेटको खोलकर दिखाया ॥३॥ किन्तु हे नाथ ! कुछ भी हाथ न लगा, लालच मुझे ललचाता ही रह गया । सच कहता हूँ, ऐसा कौनसा नाच है जो क्षुद्र लोभने मुझ निर्लज्जको न नचाया हो ? ॥४॥ कान, आँखें और मन ये सब अपने-अपने रास्तेपर लग गये । सब जगह विश्वास किया, सिर पटककर रह गया, अपना हितू ढूँढ़कर थक गया (कहीं कोई नहीं मिला) । अन्तमें हृदयमें हार मानकर अब आपके चरणोंकी शरण देखकर आया हूँ ॥५॥ हे दशरथके लाल ! सामर्थ्यवान् एक आप ही हैं, इसीसे तीनों लोकोंने आपका यश गाया है । तुलसीदास प्रणाम करता है, (इसकी ओर)

देखिये ! मैं आपकी बलैया लेता हूँ; आपकी विरदावलीने ही मुझे बाँह (सहारा) और बोल (वचन) देकर बुलाया है ॥६॥ विशेष १—'खलायो'—इसका शाब्दिक अर्थ है 'खलाया', 'पचकाया' । २—'श्रवन-नयन-मन'—ये इन्द्रियाँ बड़ी भयंकर हैं। भगवान् शुक कहते हैं:— जिह्वैकतोऽमुमपकर्षति कर्हि तर्षा- शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् । घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्ति- र्बह्व्यः सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति ॥ 'एक ओर जिह्वा खींचती है तो दूसरी ओर तृष्णा, इधर कामेन्द्रिय खींच ले जाना चाहती है तो कभी त्वचा और पेटका प्रश्न प्रबल हो उठता है। उससे बचता है तो कानोंके द्वारा खींचा हुआ दूर बह जाता है। वहाँसे चलने भी नहीं पाता कि सुगन्धकी डोरीसे दूसरी तरफ खिंच जाता है। इधरसे छुटकारा भी नहीं हुआ कि ये चपल आँखें दूसरी ही ओर ढकेल ले जाती हैं। जिस तरह एक घरवालेकी बहुतसी स्त्रियाँ हों और वे खींचा-तानीमें उसकी अच्छी तरह मरम्मत करती हैं, वही दशा इस मनुष्यकी है।' ये इन्द्रियाँ इस प्रकार अपनी-अपनी ओर खींचती हैं जैसे एक शरीरको बहुतसी 'सपत्न्य.' सौतें, जिनका वैर जगत्प्रसिद्ध है। गोस्वामीजी कहते हैं कि ये इन्द्रियाँ मुझे जहाँ- जहाँ खींचकर ले गयीं, हर जगह मैं उनपर विश्वास करके चला गया। ३—'सब थल पतितायो'—कुछ प्रतियोंमें 'सब थलपति तायो' पाठ है और कुछमें 'सब थल पतियायो' है। 'सब थलपति तायो' का अर्थ होगा 'सब स्थानोंके स्वामियोंको तपाकर देख लिया (किन्तु कोई भी ऐसा खरा न निकला जो मेरे काम आ सके) ।' किन्तु 'पतियायो' पाठका वही अर्थ है जो 'पतितायो' का। [ २७७ ] राम राय ! बिनु रावरे मेरे को हितु साँचो ? स्वामी-सहित सब सों कहौं, सुनि-गुनि बिसेषि कोउ रेख दूसरी खाँचो ॥१॥

विनय-पत्रिका ४५३ देह-जीव-जोग के सखा मृषा टाँचन टाँचो। किये बिचार सार कदली ज्यों, मनि कनक संग लघु लसत बीच बिच काँचो ॥२॥ 'विनय-पत्रिका' दीन की, बापु ! आपु ही बाँचो। हिये हेरि तुलसी लिखी, सो सुभाय सही करि बहुरि पूँछिये पाँचो ॥३॥ शब्दार्थ—विसेषि = विशेष, बड़ा। टाँचन = टाँचोंसे। टाँचो = टाँच दीजिये, डाट दीजिये। कनक = सुवर्ण। लसत = शोभा देता है। पाँचो = पंचोंसे। भावार्थ—हे महाराज रामचन्द्र ! आपके सिवा मेरा सच्चा हितकारी और कौन है ? मैं सुन-समझकर सब लोगोंसे, यहाँतक कि आपसे भी कहता हूँ कि यदि कोई आपसे भी बड़ा हो तो दूसरी लकीर खींच दीजिये (मेरी बात काट दीजिये) ॥१॥ शरीर और जीव-संयोगके जितने मित्र हैं, सब मिथ्यारूपी टाँकोंसे सिले हैं। विचार करनेपर मालूम होता है कि ये सखा केलेके सारकी तरह (निस्सार) हैं; अर्थात् जैसे ऊपरसे देखनेमें मालूम होता है कि केलेके तनेके भीतर गूदा है, किन्तु छीलनेपर छिलकेके सिवा और कुछ नहीं निकलता, वैसे ही ये सांसारिक सम्बन्धी भी हैं। ये उसी तरह चमकते जान पड़ते हैं जैसे मणि- सुवर्णके छोटे-छोटे बीच-बीचमें छोटासा काँच (जिनका कोई मूल्य नहीं है) ॥२॥ हे पिताजी ! इस दीनकी 'विनय-पत्रिका' आप ही पढ़िये, (दूसरेसे पढ़वाकर न सुनिये)। तुलसीने इसे अपने हृदयसे विचारकर लिखा है, इसपर पहले आप अपने स्वभावसे सही कर दीजिये, फिर पंचोंसे (दरबारियोंसे) पूछिये ॥३॥ विशेष १—'देह-जीव-जोग'—वास्तवमें यह शरीर मिथ्या है। और शरीर- जीवका सम्बन्ध भी मिथ्या है। बालिकी स्त्री ताराको समझाते हुए भगवान्‌ने इस शरीर और जीवके सम्बन्धमें कहा है— छिति जल-पावक-गगन-समीरा। पंच-रचित अति अधम सरीरा ॥ प्रगट सो तनु तव आगे सोवा। जीव नित्य तुम केहि लगि रोबा ॥ —रामचरित मानस

४५४ विनय-पत्रिका क्योंकि यह जीव निःसंग है, अविनाशी है। देखिये— ईस्वर-अंश जीव अविनासी । चेतन अमल सहज सुख-रासी ॥ गीतामें भी कहा है:— अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ अतः जब अविनाशी जीवका नाशवान् शरीरके साथ मेल होना ही मिथ्या है, तो फिर उसके साथ सम्बन्ध रखनेवाले कैसे मिथ्या न होंगे ? यहाँ दुर्लभ मनुष्य-शरीरकी उपमा सुवर्णसे दी गयी है, जीवकी उपमा मणिसे, और देह- जीव-जोगके सम्बन्धियोंकी उपमा काँचसे दी गयी है। खूब ! यहाँ मन-सहित बाह्येन्द्रियाँ, तथा स्त्री-पुत्र, सगे-सम्बन्धी आदि ही 'देह-जीव-जोगके सखा' हैं। २—'पाँचों'...पंचों; सब पञ्चोंका नाम गुसाईंजीने आगेके पदमें गिना दिया है। अर्थात् हनुमान्जी, शत्रुघ्नजी, भरतजी और लक्ष्मणजी । चार ये, और एक जगजननी जानकी-सहित स्वयं महाराज रामचन्द्रजी । [ २७८ ] पवन-सुवन ! रिपु-दवन ! भरतलाल ! लखन ! दीन की । निज निज अवसर सुधि किये, बलि जाउँ, दास-आस पूजि है खास खीन की ॥१॥ राज-द्वार भली सब कहैं साधु-समीचीन की । सुकृत-सुजस, साहिब-कृपा, स्वारथ-परमारथ, गति भये गति-विहीन की ॥२॥ समय सँभारि सुधारिवी तुलसी मलीन की । प्रीति-रीति समुझाइवी नतपाल कृपालुहि परमिति पराधीन की ॥३॥ शब्दार्थ—खीन = क्षीण, खिन्न । समीचीन = अच्छे, सच्चे । परमिति = सीमा । भावार्थ—हे पवनकुमार ! हे शत्रुघ्नजी ! हे भरतलाल ! हे लखनलाल ! मैं आप लोगोंकी बलैया लेता हूँ, यदि आप लोग अपने-अपने अवसरपर इस दीनकी सुध करेंगे, तो इस निहायत खिन्न दासकी आशा पूरी हो जायगी ॥१॥