विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
चला जाता था, किन्तु कर्णके बाणसे अर्जुनका रथ कई अंगुलमात्र हटकर रह जाता था। इसपर सारथी रूपमें बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्ण हर बार कहा करते, धन्य हो कर्ण ! भगवान्का यह वचन अर्जुनके लिए असह्य हो उठा। उन्होंने सोचा कि मेरे बाणसे कर्णका रथ इतनी दूर चला जानेपर भी श्रीकृष्णने मुझे एक बार भी शाबासी नहीं दी, किन्तु उनके बाणसे मेरा रथ कुछ अंगुल खिसकनेपर ही यह हर बार उसकी प्रशंसा करते हैं। अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनका यह भाव समझ गये। उन्होंने हनुमानजीसे ध्वजा छोड़कर हट जानेके लिए इशारा किया। हनुमानजीके हटते ही कर्णके बाणसे अर्जुनका रथ बहुत दूर जा गिरा। अर्जुनने व्याकुल होकर भगवान्से इसका कारण पूछा। भगवान्ने कहा,-हनुमानजीके पराक्रमसे तुम्हारा रथ स्थिर रहता है, इस समय वह ध्वजाके ऊपरसे हट गये हैं। कुशल थी कि मैं बैठा हुआ था; नहीं तो तुम्हारा रथ न-जानें कहाँ जाकर गिरता। भगवान्की बात सुनकर अर्जुनका अभिमान दूर हो गया। स्कन्दपुराणमें लिखा है कि एक बार विष्णु भगवान्ने हनुमानजीको बुलाने- के लिए गरुड़से कहा। हनुमानने गरुड़से कहा,-आप चलें, मैं थोड़ी देरके बाद यहाँसे चलूँगा। गरुड़ने साथ ही चलनेके लिए कहा। हनुमानने कहा,- पीछे चलनेपर भी मैं आपसे पहले वहाँ पहुँच जाऊँगा। गरुड़को यह बात बहुत बुरी लगी, क्योंकि उन्हें अपनी तीव्र गतिका बड़ा गर्व था। वह शीघ्र पहुँचनेके लिए बड़ी तेजीसे चले। उन्होंने भगवान्के पास पहुँचकर देखा :-हनुमानजी विराजमान हैं। यह देखकर वह बहुत लज्जित हुए। ३-'करनलिपि'-हनुमानजीने सूर्य भगवान्से विद्याध्ययन किया था। इन्होंने वेदों और शास्त्रोंपर भाष्य, पिंगलकी टीका तथा वेदांगोंपर भी कई ग्रंथ लिखे थे। हनुमन्नाटक, हनुमत् ज्योतिष आदि कई ग्रंथ आज भी संस्कृत साहित्यमें उपलब्ध हैं।—चित्रकाव्यके आदि आविष्कारक भी यही थे। ४-'सम्पाति'-यह गीधराज जटायुका छोटा भाई था। एक दिन दोनों भाई होड़ लगाकर सूर्यको छूनेके लिए आकाशमें उड़े। जटायु बुद्धिमान् था, इसलिए वह सूर्यमण्डलके समीप जाकर उनका तेज न सह सकनेके कारण लौट आया—; परन्तु अभिमानी सम्पाति आगे ही बढ़ता गया। परिणाम यह
हुआ कि सूर्यकी उत्तप्त किरणोंसे उसके पर जल गये और वह माल्यवान पर्वत- पर आ गिरा। उसी समय सुग्रीवकी आज्ञासे बानर और रीछ महारानी सीता- जीकी खोजमें निकले थे। सम्पातिने जानकीजीका पता बतलाया। हनुमानजी- की कृपासे उसे नये पंख, नवीन नेत्र प्राप्त हो गये और साथ ही उसका शरीर भी दिव्य हो गया। ( २९ ) जयति निर्भरानंद-संदोह कपिकेसरी, केसरी-सुवन भुवनैकभर्त्ता। दिव्य भूम्यंजना-मंजुलाकर-मने, भक्त-संताप-चिंतापहर्त्ता ॥१॥ जयति धर्मार्थ-कामापवर्गद विभो, ब्रह्मलोकादि-वैभव-विरागी। वचन-मानस-कर्म सत्य-धर्मव्रती, जानकीनाथ-चरनानुरागी ॥२॥ जयति बिहगेस-बलबुद्धि-वेगाति- मद-मथन, मनमथ-मथन, ऊर्ध्वरेता। महानाटक-निपुन, कोटि-कविकुल- तिलक, गान गुन-गर्व-गंधर्वजेता ॥३॥ जयति मंदोदरी-केस-कर्षण, विद्यमान दसकंठ भट-मुकुट मानी। भूमिजा दुःख-संजात-रोषांतकृत जातना जंतु कृत जातुधानी ॥४॥ जयति रामायन-श्रवन-संजात-रोमांच, लोचन सजल, सिथिल बानी। रामपदपद्म-मकरंद-मधुकर, पाहि, दास तुलसी सरन, सूल पानी ॥५॥
५४ विनय-पत्रिका शब्दार्थ—संदोह = समूह । मंजुलाकरमने = (मंजुल+आकर-मने) खानसे निकली हुई मनोहर मणि। कामापवर्गद = (काम + अपवर्ग+द) काम और मोक्षके दाता। कर्षण = खींचनेवाले। विद्यमान = मौजूदगीमें। भूमिजा = जानकीजी। रोषांतकृत = (रोष+ अन्तकृत) क्रोधके कारण प्रलय करनेवाले (अन्तकृत) यम। जातुधानी = राक्षसी। मकरंद = पुष्परस, मधु। मधुकर = भ्रमर। पाहि = त्राहि या रक्षा करो। भावार्थ—तुम्हारी जय हो ! तुम अतिशयानन्दके समूह, बानरोंमें साक्षात् सिंह, केशरीके पुत्र और संसारके एकमात्र स्वामी हो। तुम अंजनीरूपी दिव्य पृथिवीकी खानसे निकली हुई मनोहर मणि हो और भक्तोंके सन्तापों और चिन्ताओंको हरनेवाले हो ॥१॥ हे विभो ! तुम्हारी जय हो ! तुम धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके देनेवाले हो और तुम्हें ब्रह्मलोक आदिके वैभवसे भी विराग है। तुमने मन, वचन और कर्मसे सत्यको ही अपना धर्मव्रत बना रखा है। तुम श्रीरामजीके चरणोंमें अनुराग रखनेवाले हो ॥२॥ जय हो ! तुम गरुड़के बल, बुद्धि और वेगके बड़े भारी गर्वको हरनेवाले तथा कामदेवका नाश करनेवाले ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी हो। तुम महानाटकके निपुण रचयिता और अभिनेता हो, करोड़ों महाकवियोंके कुल-तिलक हो और गान-विद्याके गुणका गर्व करनेवाले गन्धर्वोंको जीतनेवाले हो ॥३॥ जय हो ! तुम वीरोंके सिरमौर महा अभिमानी रावणकी उपस्थितिमें उसकी स्त्री मन्दोदरीका केश पकड़कर खींचनेवाले हो। तुमने जगज्जननी जानकीजीके दुःखसे उत्पन्न क्रोधके वश हो राक्षसियोंकी ऐसी यातना की थी, जैसी यमराज तमाम प्राणियोंकी किया करता है ॥४॥ तुम्हारी जय हो ! रामायण सुननेसे तुम्हारा शरीर पुलकित हो जाता है, नेत्र सजल हो जाते हैं और कंठ गद्गद हो जाता है। हे श्रीरामजीके चरण-कमलोंके रसके भ्रमररूप हनुमानजी ! त्राहि, त्राहि ! हे त्रिशूलधारी रुद्ररूप हनुमानजी ! तुलसी- दास तुम्हारी शरण है। विशेष १—'ऊर्ध्वरेता'—ऋग्वेदमें दो तरहके ब्रह्मचारियोंका उल्लेख है; ऊर्ध्व- रेतस् और अमोघवीर्य। जिस ब्रह्मचारीका वीर्य नीचेकी ओर न आकर ऊर्ध्व- गामी हो जाता है, उसे ऊर्ध्वरेता कहते हैं। यह साधना सर्वश्रेष्ठ और दुर्लभ है। अमोघवीर्य उसे कहते हैं जिस ब्रह्मचारीका वीर्य कभी भी निष्फल न
विनय-पत्रिका ५५ जाय । अर्थात् उससे गर्भाधान अवश्य हो जाय। हनुमानजी सर्वोच्च कोटिके अखंड ब्रह्मचारी माने जाते हैं। २—'महानाटक'—हनुमानजीने एक बृहद्नाटकमें राम-चरित वर्णन किया था। कोई अधिकारी न मिलनेके कारण उन्होंने उसे समुद्रमें डाल दिया। दामोदर मिश्रने उसके रहे-सहे अंशका संकलन करके वर्त्तमान हनुमन्नाटक निर्माण किया। ३—'मन्दोदरी-केस-कर्षण'—हनुमानजीके आदर्श-चरितके वर्णनमें यह प्रसंग यानी एक स्त्रीका केश पकड़कर खींचना खटकता है। पर वास्तवमें यहाँ खटकनेकी कोई बात नहीं है। क्योंकि वह प्रभुकी आज्ञासे रावणका यज्ञ भंग करने गये थे और उसीपर रावणका परास्त होना निर्भर था। जब उन्होंने यज्ञ भंग करनेकी और कोई सूरत न देखी, तो यह काम करनेके लिए उन्हें विवश होना पड़ा। उन्होंने सोचा कि रावण अपनी स्त्रीका अपमान कदापि न देख सकेगा और यज्ञ छोड़कर अवश्य उठ खड़ा होगा। वही हुआ भी। विवश होनेपर अनन्य भक्तके लिए अनुचित और उचितका विचार छोड़कर प्रभुकी आज्ञा-पालन करना स्वाभाविक है। इसके सिवा कहींपर यह उल्लेख पाया जाता है कि हनुमानजीने जिस मन्दोदरीका केस कर्षण किया था, वह मायाकी बनी हुई कल्पित मन्दोदरी थी। राग सारङ्ग ( ३० ) जाके गति है हनुमान की। ताकी पैज पूजि आई, यह रेखा कुलिस पषान की ॥१॥ अघटित-घटन, सुघट-विघटन; ऐसी विरुदावलि नहिं आन की। सुमिरत संकट-सोच विमोचन, मूरति मोद निधान की ॥२॥ तापर सानुकूल गिरिजा, हर, लषन, राम अरु जानकी। तुलसी कपि की कृपा विलोकनि, खानि सकल कल्यान की ॥३॥ शब्दार्थ—गति = भरोसा, सहारा। पैज = प्रतिज्ञा। रेखा = लकीर, लीक। अघटित =
५६ विनय-पत्रिका असम्भव । सुघट = सम्भव । विघटन = बिगाड़ देनेवाले । विरुदावलि = गुणावली । आनकी = दूसरेकी । चितवन = विलोकनि । भावार्थ—जिसे केवल हनुमानजीका ही सहारा है, जिसकी प्रतिज्ञा सदासे पूरी होती आयी है; यह सिद्धान्त वज्र या पत्थरके ऊपरकी लकीरके समान अमिट है ॥१॥ हनुमानजी अघटित या असम्भव घटनाको सम्भव और सम्भवको असम्भव करनेवाले हैं; ऐसी गुणावली दूसरे किसीकी नहीं है। आनन्द-निधान श्रीहनुमानजीकी मूर्तिका स्मरण करते ही तमाम संकट और शोक नष्ट हो जाते हैं ॥२॥ हे तुलसीदास ! हनुमान्जीकी कृपापूर्ण चितवन सब प्रकारके कल्याणोंकी खानि है; क्योंकि (जिसपर इनकी कृपा-दृष्टि रहती है) उसपर पार्वती, शिव, लक्ष्मण, राम और जानकीकी कृपा रहती है ॥३॥ राग गौरी ( ३१ ) ताकिहै तमकि ताकी ओर को । जाको है सब भाँति भरोसो कपि केसरी-किसोर को ॥१॥ जन-रंजन अरिगन-गंजन मुख-भंजन खल बरजोर को । वेद-पुरान-प्रगट पुरुषारथ सकल-सुभट-सिरमोर को ॥२॥ उथपे-थपन, थपे उथपन पन, बिबुध वृन्द बंदिछोर को । जलधि लाँघि दहि लंक प्रबल बल दलन निसाचर घोर को ॥३॥ जाको बाल-विनोद समुझि जिय डरत दिवाकर भोर को । जाकी चिबुक-चोट चूरन किय रद-मद कुलिस कठोर को ॥४॥ लोकपाल अनुकूल विलोकिवो चहत विलोचन-कोर को । सदा अभय, जय, मुद-मंगलमय जो सेवक रनरोर को ॥५॥ भगत-काम तरु नाम राम परिपूरन चंद चकोर को । तुलसी फल चारों करतल जस गावत गई बहोर को ॥६॥ शब्दार्थ—ताकिहै = देखेगा । तमकि = क्रुद्ध होकर । जनरंजन = भक्तोंको प्रसन्न करने- वाला । अरिगन = शत्रुओं । गंजन = नाश करनेवाला । बरजोर = बलवान । को = कौन ।
विनय-पत्रिका ५७ उथपे = उखड़े हुए। रद = दाँत। विलोचन-कोर = हनुमानजी। रनरोर = युद्धक्षेत्रमें शोर करनेवाले रणबाँकुरे। गयी-बहोर = गयी हुई वस्तुको फिरसे दिलानेवाले। भावार्थ—जिसे सब प्रकारसे केशरी-कुमार हनुमानजीका ही भरोसा है, उसकी ओर क्रुद्ध होकर कौन देखेगा ? ॥१॥ भक्तोंको प्रसन्न करने, शत्रुओंका संहार करने तथा दुष्टोंका मुँह तोड़ने योग्य बलवान् और कौन है ? इनका पुरुषार्थ वेदों और पुराणोंमें प्रकट है। सब शूरवीरोंमें शिरोमणि इनके समान और कौन है ? ॥२॥ इनके सिवा उखड़े हुए (सुग्रीव, विभीषण-सरीखे) लोगोंको राज्यसिंहासनपर स्थापित करनेवाला, सिंहासनपर स्थित (बालि, रावण आदि) महा बलवान् राजाओंको राज्यच्युत करनेवाला, प्रणपूर्वक बन्दी देवताओंको छुड़ानेवाला कौन है ? समुद्र लाँघकर लंकाको जलानेवाला तथा बड़े बलवान् एवं भयानक राक्षसोंका नाश करनेवाला कौन है ? ॥३॥ जिनके बाल-विनोदका मन ही मन स्मरण करके अब भी प्रातःकालीन सूर्य डरा करते हैं और जिनकी ठुड्डीकी चोटने कठोर वज्रके दाँतोंका घमण्ड चूर कर दिया था ऐसा और कौन है ? ॥४॥ लोकपाल भी उन हनुमानजीकी कृपादृष्टि चाहा करते हैं। रणमें हल्ला करनेवाले हनुमानजीका जो सेवक है, वह सदा निर्भय रहता तथा आनन्द मंगलमय विजय-लाभ करता है ॥५॥ पूर्णचन्द्रवत् श्रीरामजीकी मुखच्छविको चकोरकी भाँति निहारनेवाले हनुमानजीका नाम भक्तोंके लिए कल्पवृक्षके समान है। हे तुलसीदास ! गयी हुई वस्तुको फिरसे दिला देनेवाले श्रीहनुमानजीका जो यश गाता है, उसकी हथेलीपर चारों फल (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) धरे रहते हैं ॥६॥ विशेष १—'विलोचन कोर'—यह हनुमानजीके लिए कहा गया है। इसका शाब्दिक अनुवाद कोरदार आँखोंवाले किया जा सकता है। पर इसमें रसका वह परिपाक कहाँ जो 'विलोचन कोर' में है ? साहित्य-रसज्ञ ही कविके इस प्रयोगका ठीक-ठीक रसास्वादन कर सकते हैं। २—'डरत दिवाकर' और 'रद-मद कुलिस' को २५ पदके विशेष विवरणमें देखिये।
५८ विनय-पत्रिका राग-बिलावल ( ३२ ) ऐसी तोहि न बूझिये हनुमान हठीले । साहेब कहूँ न राम से, तोसे न उसीले ॥१॥ तेरे देखत सिंह के सिसु मेढक लीले । जानत हौं कलि तेरेऊ मन गुनगन कीले ॥२॥ हाँक सुनत दसकन्ध के भये बन्धन ढीले । सो बल गयो किधौं भये अब गरब गहीले ॥३॥ सेवक को परदा फटे तू समरथ सीले । अधिक आपुते आपुनो सुनि मान सहीले ॥४॥ साँसति तुलसीदास की सुनि सुजस तुही ले । तिहूँकाल तिनको भलौ जे राम रँगीले ॥५॥ शब्दार्थ—उसीले = बसीला, सेगा; जिसके द्वारा राजाके पास किसीकी पहुँच होती है, वह उसका वसीला कहलाता है। कीले = कील दिया, बाँध दिया। बंधन = अङ्गोंके जोड़। सीले = सी दो, टाँके लगा दो। साँसति = कष्ट। कथा-प्रसंग—जब गोस्वामीजी चिरकालतक अंजनी-ललाका भजन करते रह गये, किन्तु उनपर श्रीरामजीकी कृपा न हुई, तब उन्होंने खिन्न होकर ऊपरके पदकी रचना की थी। भावार्थ—हे हठीले हनुमान ! तुझे ऐसा नहीं चाहिये । रामजीके समान कहीं स्वामी नहीं हैं और तेरे समान वसीला नहीं है ॥१॥ तेरे देखते-देखते मुझ सिंह-शावकको कलियुगरूपी मेढक निगले जा रहा है। मैं जानता हूँ कि कलिने तेरे मन और गुणोंको भी कील दिया है ॥२॥ तेरी हुंकार सुनते ही रावणके बन्धन ढीले पड़ गये थे; कह नहीं सकता कि अब तुझमें वह बल रहा ही नहीं अथवा तू गर्वीला हो गया ॥३॥ सेवकका पर्दा फटनेपर तू उसे सी लेनेमें समर्थ है; अर्थात् सेवककी पोल खुलती देखकर तू उसकी रक्षा कर सकता है; क्योंकि तू अपनेसे अधिक अपने सेवककी सुनता और उसका मान सहनेवाला है ॥४॥ तुलसीदासका कष्ट सुनकर उसे दूर करनेका यश तू ही ले। क्योंकि जो रामके रँगीले हैं, उनका तो तीनों कालमें कल्याण ही है अर्थात् अब
मैं रामके रंगमें रँग गया हूँ, इसलिए मेरा भला तो कभी-न-कभी अवश्य ही होगा—हाँ, यश लेना हो तो तू ले ले ॥५॥ विशेष सुना जाता है कि एक बार उस समयके बादशाहने गुसाईंजीसे कुछ करामात दिखानेके लिए कहा। गुसाईंजीने उत्तर दिया कि मैं राम-नामके सिवा और कोई करामात नहीं जानता। बादशाहने समझा कि यह गुस्ताखी कर रहा है। अतः उसने इन्हें जेलमें बन्द कर दिया। उसी समय गोस्वामीजीने यह पद बनाया था। किन्तु हम इससे सहमत नहीं हैं। इस सम्बन्धमें हम अपनी राय ऊपर कथा-प्रसंगमें व्यक्त कर चुके हैं। ( ३३ ) समरथ सुअन समीर के, रघुवीर-पियारे। मोपर कीबी तोहि जो करि लेहि मिया रे ॥१॥ तेरी महिमा ते चलैं चिंचिनी-चिंया रे। अँधियारो मेरी बार क्यों, त्रिभुवन उजियारे ॥२॥ केहि करनी जन जानि कै सनमान किया रे। केहि अघ औगुन आपने करि डारि दिया रे ॥३॥ खाई खाँची माँगि मैं तेरो नाम लिया रे। तेरे बल, बलि आजु लौं जग जागि जिया रे ॥४॥ जो तोसों होतौ फिरौ मेरो हेतु हिया रे। तौ क्यों वदन देखावती कहि वचन इया रे ॥५॥ तोसों ज्ञान-निधान को सरबग्य बिया रे। हौं समुझत सांई-द्रोह की गति छार छिया रे ॥६॥ तेरे स्वामी राम से, स्वामिनी सिया रे। तहँ तुलसी के कौन को काको तकिया रे ॥७॥ शब्दार्थ—मिया = मैया। चिंचिनी = इमली। चिंया = बीज। खाँची = बाजारों या देहातोंमें किसी व्यक्ति-विशेष, साधु-अभ्यागत अथवा मन्दिरके पुजारीके भोजनके लिए
६० विनय-पत्रिका घरघरसे थोड़ा-थोड़ा अन्नादि देनेका जो प्रबन्ध किया जाता है उसे खोंची कहते हैं, इया = यार अथवा दोस्त। बिया = दूसरा। छार = राख। छिया = छिः छिः, छीलालेदर, नरक। भावार्थ—हे सामर्थ्यवान पवनकुमार ! हे रघुनाथजीके प्यारे ! तुम्हें मुझपर जो कुछ करना हो सो भैया कर लो ॥१॥ तुम्हारी महिमासे इमलीके चिये भी सिक्केकी जगह चल जाते हैं। फिर मेरे ही लिए हे तीनों लोकके उजागर, तुमने इतना अन्धेर क्यों कर रखा है ॥२॥ पहले तुमने मेरी किस करनीसे अपना भक्त जानकर मेरा सम्मान किया था, और अब किस पाप और अवगुणसे मुझे अपने हाथसे छोड़ दिया ? ॥३॥ मैंने तो तुम्हारा ही नाम लेकर खोंचीका अन्न माँगा और खाया । तुम्हारी बलैया लेता हूँ, मैं तो तुम्हारे ही बलपर आजतक संसारमें उजागर होकर जीवित रहा हूँ ॥४॥ यदि तुमसे विमुख होनेका कारण मेरा हृदय होता, तो फिर मैं यह वचन कहकर तुम्हें अपना मुँह कैसे दिखाता ? ॥५॥ तुम्हारे समान महाज्ञानी और सर्वज्ञ दूसरा कौन है, मैं जानता हूँ कि स्वामीके 'साथ शत्रुता करनेका परिणाम बर्बाद होना है ॥६॥ तुम्हारे स्वामी रामजी और स्वामिनी जानकीजी सरीखी हैं। वहाँ (उनके दरबारमें) तुलसीदासको तुम्हारे सिवा किसका और किस बातका सहारा है ॥७॥ विशेष १—'भिया'—यह बनारसी और मिर्जापुरी बोलीका ठेठ शब्द है। २—'खोंची'—का अर्थ शब्दार्थमें लिखा गया है। कई टीकाकारोंने इसका अर्थ 'भीख' लिखा है। पर वास्तवमें यह शब्द उक्त अर्थसे कुछ भिन्न है। ( ३४ ) अति आरत, अति स्वारथी, अति दीन-दुखारी। इनको बिलगु न मानिये, बोलहिं न बिचारी ॥१॥ लोक-रीति देखी सुनी, ब्याकुल नर-नारी। अति बरषे अनबरषे हूँ, देहिं दैवहिं गारी ॥२॥ नाकहिं आये नाथ सों, साँसति भय भारी। कहि आयो कीबी छमा, निज ओर निहारी ॥३॥
समै साँकरे सुमिरिये, समरथ हितकारी। सो सब विधि ऊबर करै, अपराध बिसारी ॥४॥ विगरी सेवक की सदा, साहबहिं सुधारी। तुलसी पर तेरी कृपा, निरुपाधि निनारी ॥५॥
शब्दार्थ - बिलगु = बुरा। नाकहिं = नाकोंदम। निहारी = देखकर। साँकरे = कष्टकर। ऊबर करै = उबारता या उद्धार करता है। निरुपाधि = उपाधि-रहित, विघ्न-बाधा-रहित। निनारी = स्पष्ट।
भावार्थ - अत्यन्त आर्त, अत्यन्त स्वार्थी, अति दीन और अति दुखिया, इनकी बातोंपर बुरा नहीं मानना चाहिए; क्योंकि ये सोच-विचारकर नहीं बोलते ॥१॥ लोककी यह रीति देखने और सुननेमें आयी है कि व्याकुल स्त्री-पुरुष अधिक वर्षा होनेपर और बिलकुल ही वर्षा न होनेपर दैवको गालियाँ देते हैं ॥२॥ हे नाथ, विशेष कष्ट और भयसे नाकोंदम आ जानेपर ही मैंने तुम्हें इतनी (खरी- खोटी) सुनायी है। अब तुम अपनी दयालुताकी ओर देखकर मुझे क्षमाकर दो ॥३॥ कष्टकर समयमें लोग अपने हितू और सामर्थ्यवान्का स्मरण किया करते हैं, और वह हितू सब अपराधोंको भूलकर उसकी सब प्रकारसे रक्षा करता है ॥४॥ सेवककी बिगड़ी हुई बातोंको सदैव स्वामीको ही सुधारना पड़ता है। फिर तुलसीदासपर तो तुम्हारी कृपा स्पष्ट है, उसमें किसी तरहकी विघ्न-बाधा नहीं है, यह स्पष्ट है ॥५॥
( ३५ ) कटु कहिये गाढ़े परे, सुनि समुझि सुसाँईं। करहिं अनभलेउ को भलो, अपनी भलाई ॥१॥ समरथ सुभ जो पाइये, पीर पीर-पराई। ताहि तकैं सब ज्यों नदी, वारिधि न बुलाई ॥२॥ अपने अपने को भलौ; चहैं लोग-लुगाई। भावै जो जेहि तेहि भजै, सुभ-असुभ सगाई ॥३॥ बाँह बोलिदै थापिये, जो निज बरिआई। बिन सेवा सों पालिये, सेवक की नाईं ॥४॥
६२ विनय-पत्रिका चूक चपलता मेरियै, तू बड़ो बड़ाई । होत आदरे ढीठ है, अति नीच निचाई ॥५॥ बंदिछोर विरुदावली, निगमागम गाई । नीको तुलसी दासको, तोरियै निकाई ॥६॥ शब्दार्थ—सुभ = मंगलरूप । पीर पराई = दूसरोंकी व्यथा । लोग = पुरुष । लुगाई = स्त्री (राजस्थानका शब्द है) । सगाई = सम्बन्ध । बोलिदै = बल या सहारा देकर । बरिआई = जबर्दस्ती । भावार्थ—अच्छा स्वामी सुन और समझ कर ही क्लेशके समय कठोर वचन कहा जाता है, और अच्छे स्वामी अपने स्वभावानुसार बुरे सेवकका भी भला कर देते हैं ॥१॥ यदि समर्थ, मंगलरूप और दूसरोंकी व्यथा दूर करनेमें बहादुर स्वामी मिल जाते हैं, तो उन्हें सब लोग वैसे ही देखते हैं जैसे नदी बिना बुलाये ही समुद्रकी ओर दौड़ती है (अर्थात् जैसे नदियाँ समुद्रसे मिलनेकी स्वाभाविक ही इच्छा करती हैं, वैसे ही सबलोग अच्छे स्वामीका सेवक होनेके इच्छुक होते हैं) ॥२॥ जितने स्त्री-पुरुष हैं, सब अपनी-अपनी भलाई चाहते हैं । जिसे जो अच्छा लगता है, शुभ और अशुभके सम्बन्धसे वह उसीको भजता है । तात्पर्य यह कि जो जैसी शुभ-अशुभ कामना करता है, वैसे ही देवताकी वह पूजा करता है ॥३॥ जब तुमने जबर्दस्ती अपनी भुजाओंका सहारा देकर मुझे रख लिया है, तो सेवा न करनेपर भी तुम्हें सेवकहीकी तरह उसका पालन करना चाहिये ॥४॥ भूल-चूक और चंचलता सब मेरी ही है, —तुम तो बड़े और बड़ाईके योग्य हो । आदर करनेसे नीच लोग नीचता करनेमें ढीठ हो जाते हैं ॥४॥ हे बन्दियोंको छुड़ानेवाले हनुमान्जी ! वेद और शास्त्रने तुम्हारी गुण-गाथा गायी है । तुलसी दासको केवल तुम्हारी ही अच्छाई भली है । यानी तुम दयालु हो, अतः तुलसी दासका कल्याण हो जायगा । राग गौरी ( ३६ ) मंगल-मूरति मारुत-नंदन । सकल-अमंगल-मूल-निकंदन ॥१॥ पवनतनय संतन हित-कारी । हृदय विराजत अवध-विहारी ॥२॥
विनय-पत्रिका ६३ मातु-पिता, गुरु, गनपति, सारद । सिवा-समेत संभु, सुक, नारद ॥३॥ चरन बंदि बिनवौं सब काहू । देहु रामपद-नेह-निबाहू ॥४॥ बंदौं राम-लखन-वैदेही । जे तुलसी के परम सनेही ॥५॥ शब्दार्थ—निकंदन = उखाड़नेवाला। सिवा = पार्वती। सुक = शुकदेवजी। निबाहू = निर्वाह। भावार्थ—हे पवनकुमार ! तुम मंगलमूर्त्ति हो और सब संकटोंको जड़से उखाड़ देनेवाले हो ॥१॥ हे हनुमानजी ! तुम साधु पुरुषोंका हित करनेवाले हो । तुम्हारे हृदयमें रामचन्द्रजी सदा निवास करते हैं ॥२॥ माता, पिता, गुरु, गणेश, सरस्वती, पार्वतीके सहित शिव, शुकदेव तथा नारदके ॥३॥ चरणोंकी वन्दना करके सब लोगोंसे मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि रामजीके चरणोंमें मेरा जो प्रेम है, उसका निर्वाह हो जाय ॥४॥ मैं राम, लक्ष्मण और जानकीजीकी वन्दना करता हूँ, क्योंकि ये तुलसीदासके परम स्नेही हैं ॥५॥ विशेष १—गुसाईंजीने इस पदमें हनुमानजी, माता-पिता, गुरु, गणेश, शारदा, शिवपार्वती, शुकदेव, नारदादिके चरणोंकी वन्दना करके रामपद-प्रेम माँगा है । अन्तमें उन्होंने राम-लक्ष्मण-सीताकी भी वन्दना कर सूचित किया है कि अब आगेके पदोंमें केवल लक्ष्मण, जानकी और रामकी बन्दना की जायगी । लक्ष्मण-स्तुति दण्डक ( ३७ ) लाल लाड़िले लखन, हित हौ जनके । सुमिरे संकटहारी, सकल सुमंगलकारी, पालक कृपालु अपने पनके ॥१॥
६४ विनय-पत्रिका धरनी-धरनहार भंजन-भुवनभार, अवतार साहसी सहसफन के। सत्यसंध, सत्यव्रत, परम धरमरत, निरमल करम बचन अरु मनके ॥२॥ रूप के निधान, धनु-बान पानि, तून कटि, महाबीर विदित, जितैया बड़े रन के। सेवक-सुख-दायक, सबल, सब लायक, गायक जानकीनाथ गुनगनके ॥३॥ भावते भरत के, सुमित्रा-सीता के दुलारे, चातक चतुर राम स्याम घनके। बल्लभ उर्मिला के, सुलभ सनेह बस, धनी धन तुलसी से निरधन के ॥४॥ शब्दार्थ—लड़िले = दुलारे। सहसफन = शेषनाग। तून = तरकस। घन = बादल। बल्लभ = पति। भावार्थ—हे लाड़ले लखनलाल ! तुम राम-भक्तोंका हित करनेवाले हो। याद करनेपर संकट हर लेते हो और सब तरहसे कल्याण करते हो। तुम अपनी प्रतिज्ञाको पालनेवाले तथा कृपालु हो ॥१॥ तुम पृथिवीको धारण करनेवाले तथा चौदहो भुवनोंका भार दूर करनेवाले पराक्रमी शेषनागके अवतार हो। तुम अपने प्रण और व्रतको सत्य करनेवाले, धर्ममें अत्यन्त रत तथा निर्मल मन, वचन और कर्मवाले हो ॥२॥ तुम सुन्दरताके घर हो, हाथमें धनुष-बाण लिये रहते हो, कमरमें तरकस कसे रहते हो, विख्यात महायोद्धा हो और बड़े-बड़े युद्धोंमें विजय-लाभ करनेवाले हो॥ तुम सेवकोंको सुख देनेवाले, महा बलवान्, हर प्रकारसे योग्य तथा जानकीनाथके गुणोंका गान करनेवाले हो ॥३॥ तुम भरतजीके प्रिय, सुमित्रा और सीताजीके दुलारे तथा रामरूपी श्यामघनके चतुर चातक हो। तुम महारानी उर्मिलाके पति हो, प्रेमसे सहजमें मिलनेवाले हो और तुलसीदास-जैसे निर्धनको राम-पद-प्रेमरूपी धन देनेके लिए बड़े धनी हो ॥४॥
विनय-पत्रिका ६५ विशेष १—'धरनी-धरनहार—लक्ष्मणजी शेषावतार हैं। पुराणोंमें लिखा है कि यह पृथिवी वासुकिनागके फनपर स्थित है। इसीसे लक्ष्मणजीको 'धरनी-धरन- हार' कहा गया है। २—'रूपके निधान'—इनकी सुन्दरताके सम्बन्धमें लिखा है:— कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे। भरत रामहीकी अनुहारी। सहसा लखि न सकहि नर-नारी ॥ लखन सत्रुसूदन इक रूपा। नख सिखतें सब अंग अनूपा। मनभावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहँ त्रिभुवन कोउ नाहीं ॥ —रामचरितमानस ! राग घनाश्री ( ३८ ) जयति लछमनानंत भगवंत भूधर, भुजग- राज भुवनेस, भूभारहारी। प्रलय-पावक-महाज्वालमाला-वमन, समन-संताप लीलावतारि ॥१॥ जयति दासरथि, समर-समरथ, सुमित्रा- सुवन, सत्रुसूदन, राम-भरत बंधो। चारु-चंपक-वरन वसन-भूषन-धरन, दिव्यतर, भव्य, लावन्य-सिन्धो ॥२॥ जयति गाधेय-गौतम-जनक-सुख-जनक, विस्व-कंटक-कुटिल-कोटि-हंता। वचन-चय-चातुरी-परसुधर-गरब-हर, सर्वदा राम भद्रानुगंता ॥३॥ जयति सीतेस-सेवा सरस, विषय रस- निरस, निरुपाधि धुरधर्मधारी। ५
६६ विनय-पत्रिका विपुलबलमूल सार्दूल विक्रम जलद- नाद-मर्दन, महाबीर भारी ॥४॥ जयति संग्राम-सागर-भयंकर-तरन, रामहित-करन वरबाहु-सेतू। उर्मिला-रवन, कल्याण-मंगल-भवन, दास तुलसी-दोष-दवन-हेतू ॥५॥ शब्दार्थ— ज्वालमाला = लपटें । वमन = उगलना । दासरथि = दशरथके पुत्र । गाधेय = गाधिके पुत्र विश्वामित्र । जनक = उत्पन्न करनेवाले । कंटक = काँटा । कुटिल = दुष्ट । चय = समूह । परसुधर = परशुराम । भद्र = कल्याणरूप । अनुगंता = पीछे-पीछे चलनेवाले । सरस = रत । निरस = उदासीन । सार्दूल = सिंह । तरन = पार करनेवाले । भावार्थ—जय हो ! हे लक्ष्मणजी, आप अनन्त, ऐश्वर्यवान् , पृथिवीको धारण करनेवाले शेषनाग, समस्त संसारके स्वामी, पृथिवीका भार उतारनेवाले, प्रलयकालकी अग्निकी विकराल लपटें उगलनेवाले तथा लीलापूर्वक अवतार लेकर संसारके दुःखोंका नाश करनेवाले हैं ॥१॥ हे दशरथके पुत्र लक्ष्मणजी ! आपकी जय हो । आप युद्धमें समर्थ, सुमित्राके पुत्र, शत्रुघ्न, राम और भरतके भाई हैं । हे सौन्दर्यके समुद्र लक्ष्मणजी ! आपके सुन्दर शरीरका रंग चम्पा-पुष्पके समान है; आप अत्यन्त दिव्य वस्त्र और आभूषण धारण किये रहते हैं ॥२॥ आपकी जय हो ! आप विश्वामित्र, गौतम, महाराज जनकको आनन्द देनेवाले, संसारके कंटकस्वरूप करोड़ों कुटिलोंका हनन करनेवाले, चातुरीपूर्ण बातोंसे ही परशुरामजीका गर्व हरनेवाले तथा सर्वदा कल्याणरूप रामजीके पीछे-पीछे चलने- वाले हैं ॥३॥ जय हो ! आप रामचन्द्रजीकी सेवामें रत तथा विषय-रससे उदा- सीन रहनेवाले, उपाधि-रहित या कामना-रहित धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले, अपार बलके मूल स्थान, सिंहवत् पराक्रमवाले, मेघनादका मर्दन करनेवाले तथा बहुत बड़े महावीर हैं ॥४॥ जय हो ! आप भयंकर युद्धरूपी समुद्रको पार करने- वाले, रामजीकी भलाई करनेके लिए आपकी श्रेष्ठ भुजाएँ पुलस्वरूप हैं। हे उर्मिलानाथ ! आप कल्याण और मंगलके घर हैं तथा तुलसीदासके दोषोंको नाश करनेके मुख्य कारण हैं। ॥५॥
विनय-पत्रिका ६७ विशेष १—'गाधेय गौतम···जनक'—लक्ष्मणजीने सुबाहु आदि राक्षसोंको मार- कर विश्वामित्रको, रामचन्द्र द्वारा अहल्याको शापमुक्त कराकर गौतमको तथा जनकपुरमें धनुष-यज्ञके समय निराश महाराज जनकको साहस देकर आनन्द प्रदान किया था। २—सीतेस सेवा···निरस'—लक्ष्मणजी भगवान् रामचन्द्रकी सेवामें इस प्रकार तल्लीन रहते थे कि उन्होंने संसारमें और किसीको कुछ समझा ही नहीं। उन्होंने वनवासके समय १४ वर्षतक अखंड ब्रह्मचर्य निभाया था। विषय- वासनाओंसे वह किस प्रकार उदासीन रहते थे, उनमें कितनी अपूर्व निष्ठा थी, इसका मुख्य प्रमाण नीचेकी कथा है— मेघनादको वर था कि जो आदमी बारह वर्ष अन्न, नींद और स्त्री-प्रसंग त्याग किये रहेगा, वही उसका वध कर सकेगा। उसने इस वरदानकी बात अपनी स्त्री सुलोचनासे कही थी। अतः जब उसकी कटी हुई भुजा सुलोचनाके सामने आकर गिरी, तब उसने विलापके साथ कहा, यह क्या हो गया ? उस समय मेघनादकी भुजाने लिख दिया कि मेरा वध लक्ष्मणजीने किया है। वह अगणित वर्षतक ब्रह्मचर्यका पालन कर चुके हैं। उनकी महिमाका वर्णन करना शेष और शारदाके लिए भी असम्भव है। भरत-स्तुति ( ३९ ) जयति भूमिजारमन-पदकंज-मकरंद-रस-रसिक-मधुकर भरत भूरिभागी भुवन-भूषन-भानु-बंस-भूषन, भूमेपालमनि रामचन्द्रानुरागी ॥१॥ जयति विबुधेस-धनदादि दुर्लभ महाराज-सम्राज-सुख-प्रद-विरागी। खङ्ग-धाराव्रती-प्रथम रेखा प्रगट सुद्धमति-जुवति पति-प्रेमपागी ॥२॥ जयति निरुपाधि भक्तिभाव-जंत्रित-हृदय,बंधु-हित चित्रकूटाद्रि-चारी पादुका नृप-सचिव-पुहुमि-पालक परम धरम-धुर-धीर बरवीर भारी३
६८ विनय-पत्रिका जयति संजीवनी-समय-संकट हनूमान धनुवान-महिमा बखानी । बाहुबल विपुल परमिति पराक्रम अतुल, गूढ़ गति जानकी-जान जानी जयति-रन-अजिर गंधर्व-गन-गर्वहर फिर किये राम गुनगाथ-गाता । मांडवी-चित्त-चातक-नवांबुद-वरन, सरन तुलसीदास अभय-दाता ॥५॥ शब्दार्थ—भूरि = बहुत । विबुधेश = इन्द्र । धनदादि = कुबेर इत्यादि । महाराज सम्राज = महासाम्राज्य । प्रेमगामी = तल्लीन । जंत्रित = वशीभूत । चित्रकूटद्रि (चित्रकूट+ अद्रि) = चित्रकूट पर्वत । पादुका = खड़ाऊँ । पुहुमि = पृथिवी । परमिति = प्रमाण जानकी- जान = रामचन्द्र । रन-अजिर = रणांगण, युद्धभूमि । गाता = गानेवाला, गायक । मांडवी = भरतजीकी अर्द्धाङ्गिनी । नवांबुद (नव+अम्बुद) = नवीन मेघ । भावार्थ—श्रीरामजीके चरणारविन्दोंका मकरन्द पान करनेके रसिक भ्रमर तथा अत्यन्त भाग्यशाली भरतलालकी जय हो ! आप संसारके भूषणस्वरूप सूर्य- वंशके आभूषण हैं, और राजाओंमें शिरोमणि रामचन्द्रजीके प्रेमी हैं ॥१॥ आपकी जय हो ! आपने ऐसे सुखप्रद महासाम्राज्यको छोड़ दिया, जो इन्द्र और कुबेर आदिके लिए भी अत्यन्त दुर्लभ है। आप तलवारकी धारके समान व्रतो महात्मा ओं- में सर्वश्रेष्ठ समझे जाते हैं, और आपकी शुद्ध बुद्धि-रूपी युवती स्त्री रामरूपी पतिके प्रेममें तल्लीन है ॥२॥ आपकी जय हो ! आप निष्काम भक्तिभावके वशी- भूत हृदयसे प्रिय भाई रामचन्द्रके लिए चित्रकूट पर्वतपर पैदल गये, रामजीके पादुका-रूपी राजाके मंत्री बनकर पृथिवीका पालन करते रहे तथा परमधर्मके धुरीको धारण करनेवाले एवं बड़े भारी वीर हैं ॥३॥ जय हो ! संजीवनी बूटी लाते समय संकट आनेपर हनुमान्जीने आपके धनुषबाणकी महिमाका बखान किया था, आपके बाहुबलकी अधिकता और अतुलित पराक्रमका यही प्रधान प्रमाण है। आपकी गूढ़गति केवल जानकी-वल्लभ रामजी जानते हैं ॥४॥ आप युद्ध-स्थानमें गन्धर्वोंका गर्व हरनेवाले तथा फिरसे उन्हें भी रामजीकी गुणावलीके गायक बनानेवाले हैं। आप महारानी मांडवीके चित्त-चातकके लिए नवीन मेघवर्ण हैं और शरणागत तुलसीदासको अभयदान देनेवाले हैं। आपकी जय हो ! विशेष १—'पादुका नृप सचिव'—भरतजी प्रतिदिन श्रीरामजीकी पादुकाका
विनय-पत्रिका ६९ पूजन करते थे और जबतक रामजी वनवास समाप्त करके अयोध्यापुरीमें नहीं आये तबतक उस पादुकासे आज्ञा लेकर मन्त्रीकी भाँति राज्यकार्य करते रहे। २—'संजीवनी-समय-संकट'—हनुमान्जी मूर्च्छित लक्ष्मणजीके लिए संजीवनी बूटी लेकर आकाश मार्गसे लौट रहे थे। भरतजीने उन्हें देखकर यह अनुमान किया कि कोई मायावी राक्षस जा रहा है। इसलिए उन्होंने हनुमान्- जीपर एक बाण चला दिया। बाण लगते ही वह 'हा राम ! हा राम !' कहते हुए जमीनपर गिर पड़े। राम शब्द सुनते ही भरतजीको बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने सोचा कि यह तो राक्षस नहीं, कोई रामभक्त है। अतः तुरन्त ही उन्होंने दौड़कर हनुमान्जीको उठाकर हृदयसे लगा लिया। उसी समय हनुमान्जीने उनके बाणकी महिमा कही थी। ३—'गूढ़गति...जानी'—इस विषयमें जनकजीने महारानी सुनयनासे कहा है :— भरत महामहिमा सुनु रानी। जानहिं राम न सकहिं बखानी ॥ (रामचरितमानस) ४—'गन्धर्व गन गर्वहर'—एक बार गन्धर्वोंने भरतजीके ननिहाल केकय देशपर जिसे आजकल कश्मोर कहते हैं—आक्रमण किया था। भरतजीने जाकर उन्हें हराया और उन गन्धर्वोंको—जो कि रामचन्द्रजीके विमुख थे—रामगुण- गायक बना दिया। शत्रुघ्न-स्तुति राग धनाश्री ( ४० ) जयति जय सत्रु-करि-केसरी सत्रुहन, सत्रुतम-तुहिनहर किरनकेतू। देव-महिदेव-महि-धेनु-सेवक सुजन-सिद्ध-मुनि-सकल-कल्यान-हेतू ॥१॥ जयति सर्वांग सुन्दर सुमित्रा-सुवन, भुवन विख्यात-भरतानुगामी। वर्म चर्म्मासि-धनु-बान-तूनीर-धर सत्रु-संकट-समन यत्प्रनामी ॥२॥
७० विनय-पत्रिका जयति लवनाम्बुनिधि-कुंभ-संभव महादनुज-दुर्जन दवन, दुरितहारी । लक्ष्मणानुज, भरत-राम-सीता-चरन-रेनु-भूषित-भाल-तिलकधारी॥३॥ जयति श्रुतिकीर्त्ति-वल्लभ सुदुर्लभ सुलभ नमत नर्मद भुक्ति मुक्तिदाता दास तुलसी चरन-सरन सीदत विभो पाहि दीनार्त्त-संताप-हाता॥४॥ शब्दार्थ—करि = हाथी। किरन-केतू = किरणोंकी ध्वजा यानी सूर्य। महिदेव = ब्राह्मण। वर्म = कवच। चर्मासि = (चर्म+असि) ढाल और तलवार। लवनाम्बुनिधि = (लवण+ अम्बुनिधि) लवणासुररूपी समुद्र। कुंभ संभव = अगस्त्य। दुरित = पाप। श्रुतिकीर्त्ति = शत्रुघ्न- जीकी स्त्री। नर्मद = सुखदाता। सीदत = दुःख पा रहा है। भावार्थ—शत्रुरूपी हाथियोंका नाश करनेके लिए सिंहवत् शत्रुघ्नजीकी जय हो, जय हो ! आप शत्रुरूपी अन्धकार और पालेका हरण करनेके लिए साक्षात् सूर्य हैं। आप देवता, ब्राह्मण, पृथिवी, गऊ, भक्त, संत, सिद्ध और मुनियोंका कल्याण करनेवाले हैं। ॥१॥ आपका अंग-प्रत्यंग सुन्दर है; आप सुमित्राके पुत्र हैं और भरतजीकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले हैं यह बात जगत् विख्यात है। जय हो ! आप कवच, ढाल, तलवार, धनुष, बाण और तरकस धारण करनेवाले तथा शत्रुओं द्वारा आये हुए संकटका नाश करके उनसे प्रणाम करानेवाले या उन्हें अपने पैरोंपर गिरानेवाले हैं ॥२॥ आप लवणासुररूपी समुद्रको पान कर जानेवाले अगस्त्यके समान हैं। आप बड़े-बड़े राक्षसों और दुष्टोंका संहार करनेवाले तथा पापोंका हरण करनेवाले हैं। आपकी जय हो ! आप लक्ष्मण- जीके छोटे भाई तथा भरत, राम और सीताकी चरण-रजका तिलक अपने सुन्दर मस्तकपर धारण करनेवाले हैं ॥३॥ हे श्रुतिकीर्ति-वल्लभ ! आपकी जय हो । आप ईश्वर-विमुखोंके लिए दुर्लभ और भक्तोंके लिए सुलभ हैं, प्रणाम करते ही सुख देनेवाले तथा भोगैश्वर्य और मुक्ति देनेवाले हैं। हे विभो ! तुलसीदास आपके चरणोंकी शरणमें आनेपर दुःख पा रहा है। हे दीनों और आर्त्तोंका दुःख दूर करनेवाले शत्रुघ्नजी मेरी रक्षा कीजिये ॥४॥ विशेष १—लवणासुर मथुराका राजा था। इसके अत्याचारोंसे गो-ब्राह्मण तथा संत-महात्मा तंग आ गये थे। शत्रुघ्नने उसका वध करनेके लिए रामचन्द्रजीसे
विनय-पत्रिका ७१ आज्ञा माँगी, आज्ञा पाते ही उन्होंने मथुरामें जाकर उसका वध करके प्रजाकी दुश्चिन्ता दूर कर दी। २—‘यत्प्रणामी' श्री वियोगीहरिने इसका अर्थ किया है ‘उस शत्रुघ्नजीको मैं प्रणाम करता हूँ।' किन्तु इसका शाब्दिक अर्थ है ‘जिसमें प्रणाम करनेकी क्षमता हो'। जैसे नाम और नामी हैं, वैसे ही प्रणाम और प्रणामी है। श्रीसीता-स्तुति राग-केदारा (४१) कबहुँक अंब, अवसर पाइ। मेरिऔ सुधि द्याइबी, कछु करुन-कथा चलाइ ॥ १ ॥ दीन, सब अँगहीन, छीन, मलीन, अघी अघाइ। नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ ॥ २ ॥ बूझिहैं ‘सो है कौन', कहिबी नाम दसा जनाइ। सुनत राम कृपालु के मेरी बिगरिऔ बनि जाइ ॥ ३ ॥ जानकी जगजननि जन की किये बचन सहाइँ। तरै तुलसीदास भव तव नाथ-गुन-गन गाइ ॥ ४ ॥ शब्दार्थ—अंब = माता। द्याइबी = दिलाना। अघी = पापी। अघाइ = परिपूर्ण। विगरिऔ = बिगड़ी हुई बात भी। जन = दास। तव = तुम्हारे। भावार्थ—हे माता, कभी अवसर मिलनेपर कुछ कारुणिक बात चलाकर प्रभुजीको मेरी भी याद दिलाना ॥१॥ कहना, एक दीन, सर्व साधनोंसे रहित, कृश, मलिन और पूरा पापी मनुष्य अपनेको आपकी दासी (तुलसी) का दास (तुलसीदास) कहलाकर आपका नाम लेकर यानी आपका भक्त बननेका ढोंग रचकर पेट भरता है ॥२॥ किन्तु यदि प्रभुजी पूछें कि वह कौन है, तब तुम मेरा नाम और (ऊपर कहे अनुसार) मेरी दशा उन्हें बताना। कृपालु प्रभुजीके इतना सुन लेनेसे ही मेरी बिगड़ी हुई बात भी बन जायगी ॥३॥ हे जगज्जननी