विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
८४ विनय-पत्रिका धर हैं ॥३॥ वह वासना-समूहरूपी कुमुदिनीको मुरझानेके लिए सूर्य हैं और काम-क्रोध-मदादिरूपी कमलवनके लिए पाला हैं। वह अत्यन्त मदोन्मत्त लोभरूपी गजेंद्रके लिए सिंह तथा भक्तोंके हितार्थ संसारका भार उतारनेवाले हैं ॥४॥ उनका नाम केशव है, वह क्लेशोंका नाश करनेवाले हैं, उनके चरण ब्रह्मा और शिवसे वंदित तथा गंगाजीके उद्गमस्थान हैं। वह सर्वदा आनन्द-समूह, मोह- विनाशक और घोर संसार-समुद्रको पार करनेके लिए जहाज-स्वरूप हैं ॥५॥ वह शोक और संदेहरूपी मेघ-समूहको तितर-बितर करनेके लिए वायुरूप तथा पाप- रूपी कठिन पर्वतको तोड़नेके लिए वज्ररूप हैं। उनका नाम संतोंके लिए काम- धेनुके समान मनवांछित फल देनेवाला, विश्रामप्रद और कलिकालके पापोंका नाश करनेमें अनुपम है ॥६॥ रामका नाम धर्मरूपी कल्पवृक्षका बगीचा है और प्रभुधाममें जानेवाले पथिकोंके लिए राह-खर्चके समान यही एक मूल आधार है। भक्ति, वैराग्य, विज्ञान, शम, दम, दान प्रभृति मुक्तिके अनेक साधन सब इस नामके ही अधीन हैं ॥७॥ अखंड कलिकालको देखकर जिसने बारम्बार श्रीराम- नामरूपी अमृतका पान किया, उसने तप कर लिया, यज्ञ कर लिया, सर्वस्व दान दे दिया और सब उत्तम कर्म कर डाला ॥८॥ बड़े-बड़े मलिन बुद्धिवाले चांडाल, खल, भील, यवन आदि नामके ही बलसे विष्णुलोकमें चले गये। अतः सारी आशाओं और भयको छोड़कर हे तुलसीदास, तू संसार-बंधनको काटनेके लिए तेज धारकी तलवारके समान भगवान्के नामका जप कर ॥९॥ विशेष १—'कोसलेंद्र' वियोगी हरिजीने इस चरणमें, छन्दोभङ्ग बतलाते हुए टिप्पणीमें 'जयति कुसलेन्द्र' कर देनेकी सम्मति प्रकट की है। हम भी उनकी इस सम्मतिका समर्थन करते हैं; किन्तु यथार्थतः विनय-पत्रिकाके समस्त पद गीत-काव्य हैं, अतः इनमें छन्दोभंग देखनेकी आवश्यकता नहीं। २—'वासना-वृन्द'—सारे कष्टोंकी जड़ है। २—'काम-धुक-धेनु' कलियुगमें राम-नामके प्रतापसे सब-कुछ प्राप्त हो सकता है। गोस्वामीजीने रामचरितमानसमें लिखा है:—
ब्रह्म राम तें नाम बड़, वर-दायक वर-दानि । रामचरित सत कोटि महँ, लिय महेस जिय जानि ॥ ✕ ✕ ✕ ✕ नाम कामतरु काल कराला । सुमिरत समन सकल जगजाला ॥ राम नाम कलि अभिमत दाता । हित परलोक लोक पितुमाता ॥ नहिं कलि करम न भगति विवेकू । राम-नाम अवलम्बन एकू ॥ अथवा कलियुग केवल नाम अधारा । जानि लेहि जो जाननि हारा । ४—'कर्मजालं'—यों तो कर्मके कई भेद हैं और उनका उल्लेख भी पीछे किया जा चुक है, किन्तु यहाँ कर्मसे अभिप्राय है वेद-विहित कर्म । ५—'जमन'—यवन । एक मुसलमानके मुखसे मरते समय 'हराम' शब्द निकला था । उसमें 'राम' शब्द आ जानेके कारण उसकी मुक्ति हो गयी ।
( ४७ ) ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन । हरन दुखदुंद गोचिन्द आनंदघन ॥१॥ अचरचर रूप हरि, सर्वगत, सर्वदा वसत, इति वासना धूप-दीजै । दीप निजबोध गत-कोह-मद मोह-तम, प्रौढ अभिमान चितवृत्ति छीजै ॥२॥ भाव अतिसय विसद प्रवर नैवैद्य सुभ श्रीरमन परम संतोषकारी । प्रेम तांबूल गत सूल संसय सकल, विपुल भव-वासना-बीजहारी ॥३॥ असुभ-सुभकर्म-घृतपूर्न दस बर्तिका, त्याग-पावक, सतोगुनप्रकासं । भक्ति-वैराग्य-विज्ञान दीपावली, अर्पि नीराजनं जग-निवासं ॥४॥
८६ विनय-पत्रिका विमल हृदि-भवन कृत सांति परजंक सुभ, सयन विश्राम श्रीराम राया। छमा-करुना प्रमुख तत्र परिचारिका, यत्र हरि तत्र नहिं भेद, माया ॥५॥ एहि आरती-निरत सनकादि, श्रुति, सेष, सिव, देवऋषि, अखिल मुनि तत्व-दरसी। करै सोइ तरै, परिहरै कामादि मल, वदति इति अमल-मति दास तुलसी ॥६॥ शब्दार्थ—गोविंद = इन्द्रियोंके स्वामी । वासना = इच्छा, सुगन्ध । छीजै = नष्ट कर दे । प्रवर = श्रेष्ठ । ताम्बूल = पान । वर्तिका = बत्ती । नीराजनं = आरती । परजंक = पलँग । प्रमुख = प्रधान । निरत = तत्पर । भावार्थ—हे मन ! रघुकुलमें वीर श्रीरामजीकी आरती इस प्रकार कर । वह दुःख-द्वन्द्वों (रागद्वेषादि) के नाशक, इन्द्रियोंके स्वामी और आनन्दघन हैं ॥१॥ जड़-चेतन सब रूप परमात्माका है, वह सर्वगत और एकरस हैं—इस वासना (सुगन्ध) की धूप दे। धूपके बाद दीप चाहिये। सो आत्मज्ञानरूपी दीपकसे क्रोध-मद-मोहरूपी अन्धकारको दूर करके अभिमानभरी चित्तकी वृत्ति- योंको नष्ट कर दे ॥२॥ पश्चात् तू मङ्गलमूर्ति लक्ष्मीपति भगवान्को परम सन्तोष- कारी अपने अत्यन्त निर्मल और श्रेष्ठ भावका नैवेद्य चढ़ा। फिर, दुःख और संशयोंसे रहित होकर अपार संसारके वासनारूपी बीजको नाश करनेवाले 'प्रेम'- का ताम्बूल अर्पण कर ॥३॥ उसके बाद शुभ और अशुभ-कर्मरूपी घीसे तर की हुई दस इन्द्रियरूपी बत्तियोंको त्यागरूपी आगसे जलाकर सतोगुण-रूपी प्रकाश कर । इस प्रकार भक्ति, वैराग्य और विज्ञानरूपी दीपावलीकी आरती अर्पित करके संसारमें निवास कर ॥४॥ आरती करनेके बाद अपने निर्मल हृदयरूपी गृहमें शान्तिरूपी कल्याणकारी पलँगके ऊपर महाराज रामचन्द्रजीको सुलाकर विश्राम करा। वहाँ क्षमा और करुणा सरीखो प्रमुख सेविकाओंको नियुक्त कर दे। जहाँ प्रभुजी रहते हैं, वहाँ न तो भेद-बुद्धि रहती है और न माया ही ॥५॥ सनक-सनन्दन-सनातन-सनत्कुमार, वेद, शेष, शिव, नारद और समस्त तत्त्वदर्शी मुनि इस आरतीमें तत्पर रहते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि जो कोई ऐसी आरती
विनय-पत्रिका ८७ करता है वही तर जाता है और कामादि पापोंसे मुक्त हो जाता है—ऐसा निर्मल बुद्धिवाले तत्त्ववेत्ताओंका कथन है॥६॥ विशेष १—इस पदमें रूपक अलंकार है । २—इस पदमें आरतीके छ अंग (धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, आरती और शयन) दिखलाये गये हैं । ३—'धूप'—धूपके ५, ६, ८, १२, १६ अंग हैं । प्रत्येकपर भिन्न-भिन्न अर्थ निकलता है । उदाहरणार्थ, पाँच अंगकी धूप लेनेपर यहाँ नियम (१ शौच, २ सन्तोष, ३ तप, ४ स्वाध्याय, ५ ईश्वर प्रणिधान) की धूपका बोध होगा । ४—'चितवृत्ति'—चित्तकी वृत्तियोंके निरोध अथवा समूल नाश कर डालनेका ही नाम योग है—'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' । ५—'दस वर्त्तिका'—महाकवि तुलसीदासजीने दस इन्द्रियोंको ही दस बत्ती कहा है । उन दस इन्द्रियोंमें श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और घ्राण ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा वाक् , पाणि, पाद, उपस्थ और गुद ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । ( ४८ ) हरति सब आरती आरती राम की । दहन दुख-दोष, निर्मूलिनी काम की ॥१॥ सुभग सौरभ धूप दीपवर मालिका । उड़त अघ-बिहँग सुनि ताल करतालिका ॥२॥ भक्त-हृदि-भवन, अज्ञान-तम-हारिनी । विमल विज्ञानमय तेज-विस्तारिनी ॥३॥ मोह-मद-कोह-कलि-कंजहिमजामिनी । मुक्ति की दूतिका, देह-दुति दामिनी ॥४॥ प्रनत-जन-कुमुद-वन-इन्दु-कर-जालिका । तुलसि अभिमान-महिषेसु बहु कालिका ॥५॥ शब्दार्थ—आरती = क्लेश । सुभग = सुन्दर । सौरभ = सुगन्ध । विस्तारिनी = फैलाने- वाली । जामिनी = रात । दूतिका = दूती । प्रनत = शरणमें आये हुए। महिषेस = महिषासुर ।
८८ विनय-पत्रिका भावार्थ—श्रीरामजीकी आरती सब क्लेशोंको हर लेती है। वह दुःख- दोषोंको जला डालती तथा कामनाओं या इच्छाओंको निर्मूल कर डालती है ॥१॥ वह सुन्दर सुगन्धयुक्त धूप श्रेष्ठ दीपकोंकी माला है। उस आरतीके समय हाथोंकी तालीका शब्द सुनकर पापरूपी पक्षी उड़ जाते हैं ॥२॥ वह भक्तोंके हृदय-मन्दिरसे अज्ञानान्धकारको दूर करनेवालो तथा (हृदयमें) निर्मल विज्ञान- मय प्रकाशको फैलानेवाली है ॥३॥ वह मोह, मद, क्रोध, कलिरूपी कमलोंको मुरझानेके लिए बर्फीली रात है, मुक्ति-रूपी नायिकासे मिलानेके लिए बिजलीके समान चमकदार शरीरवाली दूती है ॥४॥ वह शरणागत भक्त-रूपी कुमुदिनीके वनको विकसित करनेके लिए चन्द्रमाकी किरण-माला है। तुलसीदास कहते हैं कि वह अभिमानरूपी महिषासुरके लिए अगणित कालिका देवीके समान है ॥५॥ विशेष १—‘आरती आरती' में यमकालंकार है। जब एक ही शब्द भिन्न-भिन्न अर्थमें कई बार आता है, तो वहाँ यमकालंकार होता है। यथा :— मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ विदेह विदेह विसेखी ॥ यहाँ एक विदेह तो जनकजीके लिए आया है और दूसरा 'शरीरज्ञान-शून्य' के लिए। २—'देह-दुति दामिनी'—मुक्तिके पास पहुँचानेवाली दूतीके शरीरकी कान्ति बिजलीके समान कही गयी है। क्योंकि अज्ञान अन्धकारमय है और विज्ञान प्रकाशमय । मुक्ति ऐसी वस्तु नहीं, जो विज्ञानका प्रकाश हुए बिना प्राप्त हो सके । वेद-वाक्य है :— “ऋते ज्ञानान्न-मुक्तिः” अर्थात् ज्ञान हुए बिना मुक्ति नहीं होती। इसीसे ग्रंथकारने आरतीरूपी दूतीके शरीरको तीक्ष्ण प्रकाशपूर्ण कहा है। ३—'महिषेस बहु कालिका'— भगवती कालिकाने प्रमादी महिषासुर नामक दैत्यका वध करके संसारमें शान्ति स्थापित की थी। यह कथा देवी- भागवतमें विस्तारपूर्वक है।
विनय-पत्रिका ८९ हरिशंकरी पद ( ४९ ) देव— दनुज-वन-दहन, गुन-गहन, गोबिंद- नंदादि-आनंद-दाताऽविनासी। संभु, सिव, रुद्र, संकर, भयंकर, भीम, घोर, तेजायतन, क्रोध-रासी ॥१॥ अनंत, भगवंत, जगदंत-अंतक-त्रास- समन, श्रीरमन, भुवनाभिरामं। भूधराधीस जगदीस ईसान, विज्ञानघन, ज्ञान-कल्याण-धामं ॥२॥ वामनाव्यक्त, पावन, परावर विभो, प्रगट परमातमा, प्रकृति-स्वामी। चन्द्रसेखर, सूलपानि, हर, अनघ, अज, अमित, अविछिन्न, वृषभेस-गामी ॥३॥ नील जलदाभ तनु स्याम, बहुकाम छवि, राम राजीव लोचन कृपाला। कंबु-कर्पूर-वपु, धवल, निर्मल मौलि, जटा, सुर-तटिनि, सित सुमनमाला ॥४॥ वसन किंजल्कधर, चक्र-सारंग-दर- कंज-कौमोदकी अति विसाला। मार-करि मत्त मृगराज, त्रैनैन हर, नौमि अपहरन संसार-जाला ॥५॥ कृष्ण, करुनाभवन, दवन कालीय खल, विपुल कंसादि निर्वंसकारी। त्रिपुर-मद-भंगकर, मत्त गज-चर्मधर, अन्धकोरग-ग्रसन पन्नगारी ॥६॥
९० विनय-पत्रिका ब्रह्म, व्यापक, अकल, सकल-पर, परमहित, ग्यान, गोतीत गुन-वृत्ति-हर्त्ता। सिंधुसुत-गर्व-गिरि-बज्र, गौरीस, भव दच्छ-मख अखिल विध्वंसकत्र्ता ॥७॥ भक्ति प्रिय, भक्तजन-कामधुक धेनु, हरि, हरन दुर्घट विकट विपति भारी। सुखद, नर्मद, वरद, विरज, अनवद्यऽखिल, विपिन-आनंद-वीथिन-विहारी ॥८॥ रुचिर, हरिसंकरी नाम-मंत्रावली द्वन्द्वदुख हरनि, आनंदखानी। विष्णु-सिव-लोक-सोपान-सम सर्वदा वदति दास तुलसी विसद वानी ॥९॥ शब्दार्थ—अविनासी = जिसका कभी नाश न हो। जगदंत = संसारका अन्त करने- वाले। अंतक = काल। ईसान = ईशान कोणके स्वामी अर्थात् शिवजी। अनघ = पापरहित। किंजल्क = कमल-केसर। दर = शंख। कौमोदकी = गदा। कालीय = कालिय दैत्य। उरग = सर्प। वरद = वर देनेवाले। वीथिन = गलियों। विसद = शुद्ध या पवित्र। [ गुसाईंजीने इस पदका नाम 'हरिशंकरी पद' रखा है; क्योंकि उन्होंने इस पदके एक पक्षमें विष्णुकी और दूसरेमें शिवकी एक साथ स्तुति करके हरिहरमें अभेद सिद्ध किया है । ] आरम्भमें जो 'देव' शब्द है, उसे प्रत्येक पक्षका सम्बोधन समझना चाहिये। भावार्थ—हे देव ! आप दैत्यरूपी वनको जलानेवाले, सद्गुण-समूह, इन्द्रियोंके अधीश्वर तथा नन्द-उपनन्द आदिको आनन्द देनेवाले और अविनाशी हैं। हे देव ! आप शम्भु, शिव, रुद्र, शंकर आदि नामोंसे विख्यात हैं। आप बड़े ही भयंकर, महान् तेजस्वी तथा (खलोंके लिए) क्रोधकी राशि हैं ॥१॥ हे देव ! आपका अन्त नहीं है; आप छ प्रकारके ऐश्वर्योंसे युक्त हैं, संसारका अन्त करनेवाले, कालके भयको दूर करनेवाले, लक्ष्मीजीके स्वामी और विश्वब्रह्मांडको आनन्द देनेवाले हैं।
विनय-पत्रिका ९१ हे देव ! आप कैलाशगिरिके मालिक, जगत्के स्वामी, ईशान, विज्ञानघन और ज्ञान तथा कल्याणके स्थान हैं ॥२॥ हे देव ! आप वामनरूप, अव्यक्त, पवित्र, जड़-चैतन्यके स्वामी, साक्षात् परमात्मा और प्रकृतिके स्वामी हैं । हे देव ! आप चन्द्रमाको मस्तकपर और त्रिशूलको हाथमें धारण करनेवाले, सृष्टिके संहारकर्त्ता, निष्पाप, अजन्मा, सीमा-रहित, अखंड और नन्दीपर सवार होकर चलनेवाले हैं ॥३॥ हे देव ! आपके श्यामल शरीरकी आभा नीले मेघके समान है, शोभा अनेक कामदेव-सदृश है, आप राम हैं, कमलनेत्र हैं और कृपालु हैं । हे देव ! आपका उज्ज्वल शरीर शंख और कपूरके समान निर्मल है; आपके मस्तकपर जटा-जूट और गंगाजी हैं । आप सफेद फूलोंकी माला पहने हुए हैं ॥४॥ हे देव ! आप कमल-केसरके समान पीताम्बर तथा चक्र, धनुष, शंख और अत्यन्त विशाल गदा धारण किये हैं । हे देव ! आप कामदेवरूपी हाथीके लिए सिंह, तीन नेत्रवाले और संसारका कष्ट दूर करनेवाले हैं । अतः हे हर, मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥५॥ हे देव ! आप कृष्ण हैं अर्थात् अपने रूप-माधुर्यसे सबको आकर्षित करने- वाले हैं, करुणाके स्थान हैं, कालिय नागका नाश करनेवाले हैं तथा कंस आदि बहुत-से दुष्टोंका निर्वंश करनेवाले हैं । हे देव ! आप त्रिपुर दैत्यका घमण्ड तोड़नेवाले, मतवाले हाथीका चमड़ा धारण करनेवाले तथा अन्धकासुररूपी सर्पको निगलनेके लिए गरुड़ हैं ॥६॥ हे देव ! आप ब्रह्म, सबमें व्याप्त, कला-रहित, सबसे परे, हितैषी, साधारण ज्ञान और इन्द्रियोंसे न्यारे तथा मायिक वृत्तियोंको हरनेवाले हैं । हे देव ! आप जलन्धरके गर्वरूपी पर्वतको चूर्ण करनेके लिए वज्ररूपी, पार्वतीके पति, संसारकी उत्पत्तिके स्थान और दक्ष प्रजापतिके सम्पूर्ण यज्ञका विध्वंस करनेवाले हैं ॥७॥ हे देव ! आपको भक्ति बहुत प्रिय है, आप अपने भक्तोंकी इच्छा पूरी करने-
९२ विनय-पत्रिका के लिए कामधेनुके समान हैं, आप हरि हैं और दुर्घट, विकट तथा महान् विपत्तियोंको हरनेवाले हैं । हे देव आप सुखदाता, आनन्ददाता, इच्छित वरदाता, विरक्त, तमाम विकारों और दोषोंसे रहित एवं आनन्द-वन काशीकी गलियोंमें विहार करने- वाले हैं ॥८॥ हे देव ! इस मनोहर हरिशंकरीके नाम-मंत्रोंकी पंक्तियाँ राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे उत्पन्न दुःखको हरनेवाली तथा आनन्दकी खानि हैं । तुलसीदास शुद्ध वाणीसे कहता है कि ये विष्णु तथा शिवलोकमें जानेके लिए सदैव सीढ़ीके समान हैं ॥९॥ विशेष १—'वामन'—विष्णु भगवान्ने राजा बलिसे तीन पैर पृथिवी लेनेके लिए वामन (बौना) रूप धारण किया था । २—'कालिय' नामक एक भयंकर सर्प था जो कि यमुनामें रहता था । उसके विषकी ज्वालासे वहाँका पानी हमेशा खौला करता था । भगवान् श्रीकृष्णने उसे नाथकर अपने वशमें कर लिया, पीछे वह यमुनाको छोड़कर समुद्रमें चला गया । यह कथा श्रीमद्भागवतमें है । ३—'अन्धक'—नामक एक दैत्य था । वह बहुत ही उपद्रवी और बलवान् था । वह हिरण्याक्षका पुत्र था । उसने ब्रह्मासे यह वर प्राप्त किया था कि ज्ञान प्राप्त हुए बिना मेरी मृत्यु कदापि न हो । यह वर मिलनेके बाद उसने तीनों लोकोंको जीत लिया । देवता लोग उसके भयसे मन्दराचल पहाड़पर चले गये । वह दुष्ट वहाँ भी पहुँचकर उन्हें दुःख देने लगा । देवताओंने आर्त स्वरमें शिवजीको पुकारा । शिवजीने आकर उसे मार डाला । यह कथा शिव- पुराणमें है । ३—'सिंधु-सुत'—या जलन्धर बड़ा प्रतापी राजा था । इसने देवलोकको जीत लिया था । शिवजीने इसे मारना चाहा, पर उन्हें सफलता नहीं मिली, क्योंकि जलन्धरकी स्त्री वृन्दा पतिव्रता थी । जब विष्णुने बलपूर्वक वृन्दाका सतीत्त्व नष्ट किया, तब शिवजीने जलन्धरको परास्त किया । उस समय वृन्दाने विष्णुको शाप दिया कि किसी समय मेरा पति रावणका अवतार लेकर तुम्हारी स्त्रीका हरण करेगा ।
४—'दच्छमख'—दक्ष प्रजापतिकी एक कन्याका नाम सती था। उनका विवाह शिवजीके साथ हुआ था। एक बार ब्रह्माके यहाँ दक्ष पहुँचा। सब देवताओँने उठकर उसकी अभ्यर्थना की, पर शिवजी नहीं उठे। इससे दक्ष बहुत नाराज हुआ। इसका बदला लेनेके लिए उसने खूब धूमधामसे यज्ञ किया, और उसमें सब देवताओँको आमन्त्रित किया, पर शिवको नहीं पूछा। यज्ञका हाल सुनकर सती बिना बुलाये ही अपने पिताके घर चली गयीं। वहाँ उन्हें शिवजीका भाग दिखलाई नहीं पड़ा। इससे वह क्रुद्ध होकर अपने पिता- को कटु वाक्य कहने लगीं और योगाग्निमें जलकर भस्म हो गयीं। यह समाचार पाकर शिवजीने वीरभद्रको भेजा और उसने वहाँ जाकर शिवजीकी आज्ञासे दक्ष प्रजापतिका यज्ञ भंग कर दिया। पीछे शिवजीने प्रसन्न होकर यज्ञका पुनरुद्धार किया। यह कथा शिवपुराणमें विस्तारपूर्वक है। ५—विष्णु और शिवमें अभेदसम्बन्ध है। लिखा है:— सदैव देवो भगवान् महादेवे न संशयः। मन्यन्ते ये जगद् योनिं विभिन्नं विष्णुमीश्वरात्। —इति कौर्मे, १३ अध्यायः ६—'संभु सिव रुद्र संकर'—पर्यायवाची शब्द हैं, पर सबका भिन्न-भिन्न आशय है। ७—'भयंकर भीम घोर'—का आशय भी अलग-अलग है। यथा 'भयंकर' का अर्थ 'भयजनक', 'भीम' का अर्थ 'भयके हेतु', 'घोर' का अर्थ 'विष' अर्थात् 'हलाहल पान करके आश्चर्यजनक भीषण काम करनेवाले' इत्यादि।
( ५० )
देव— भानुकुल-कमल-रवि, कोटि कंदर्प छवि, काल-कलि-व्यालमिव वैनतेयं। प्रबल भुजदंड प्रचंड कोदंड-धर, तूनवर विसिख बलमप्रमेयं ॥ १ ॥
अरुन राजीव दल-नयन, सुषमा-अयन, स्याम तन-कांति वर वारिदाभं। तप्त कांचन-वस्त्र, सस्त्र-विद्या-निपुन, सिद्ध-सुर-सेव्य, पाथोजनाभं ॥२॥ अखिल लावन्य-गृह, विश्व-विग्रह, परम प्रौढ़, गुनगूढ़, महिमा उदारं। दुर्धर्ष, दुस्तर, दुर्ग, स्वर्ग-अपवर्ग-पति भग्न संसार-पादप-कुठारं ॥३॥ सापदस मुनिवधू-मुक्तकृत, विप्रहित, जग्य-रच्छन-दच्छ पच्छकर्ता। जनक-नृप-सदसि सिवचाप-भंजन, उग्र भार्गवागर्व-गरिमापहर्ता ॥४॥ गुरु-गिरा-गौरवामर-सुदुस्त्यज राज्य, त्यक्त श्री सहित सौमित्रि-भ्राता। संग जनकात्मजा, मनुजमनुसृत्य अज, दुष्ट-बध-निरत, त्रैलोक्यत्राता ॥५॥ दंडाकारन्य कृतपुन्य पावन चरन, हरन मारीच-मायाकुरंगं। बालि बलमत्त गजराज इव केसरी, सुहृद-सुग्रीव-दुख-रासि-भंगं ॥६॥ ऋच्छ, मर्कट विकट सुभट उद्भट समर, सैल-संकास रिपु त्रासकारी। बद्धपाथोधि सुर-निकर-मोचन, सकुल दलन दससीस-भुजवीस मारी ॥७॥ दुष्ट विबुधारि-संघात, अपहरन महि- भार, अवतार कारन अनूपं। अमल, अनवद्य, अद्वैत, निर्गुन, सगुन, ब्रह्म सुमिरामि नरभूप-रूपं ॥८॥
विनय-पत्रिका ९५ सेष-श्रुति-सारदा-संभु-नारद-सनक गनत गुन अंत नहिं तव चरित्रं । सोइ राम कामारि-प्रिय अवधपति सर्वदा दास तुलसी - त्रास - निधि - वहित्रं ॥९॥ शब्दार्थ—बैनतेय = गरुड़ । तून = तरकस । विसिख = बाण । पाथोजनाभं = जिसकी नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ हो अर्थात् विष्णु । अपवर्ग = मोक्ष । पादप = वृक्ष । कुठार = टाँगा, कुल्हाड़ा । सदसि = सभा । भार्गवागर्व = (भार्गव+आगर्व) परशुरामका गर्व । श्री = लक्ष्मी, सम्पत्ति । मनुजमनुसृत्य = (मनुजं+अनुसृत्य) मनुष्योंको अनुकरण करके । अज = अजन्मा । कुरंग = मृग । सुहृद = मित्र । उद्धट = श्रेष्ठ वीर । संकास = समान । अनवद्य = दोषरहित । वहित्रं = नौका । भावार्थ—हे देव ! आप सूर्य-कुलरूपी कमलके लिए सूर्य, करोड़ों कामदेव- के समान शोभावाले, कलिकालरूपी सर्पके लिए गरुड़, बलवान् हाथोंमें प्रचंड धनुष धारण करनेवाले, तरकसमें सुन्दर बाण धरे और अनुपम बलशाली हैं ॥१॥ आप लाल कमलके समान नेत्रवाले, सौन्दर्यके निधान, मेघकी सुन्दर आभाके सदृश कान्तिमय श्यामल शरीरवाले, तपे हुए सुवर्णके समान पीताम्बरधारी, शस्त्र-विद्यामें कुशल, सिद्धों और देवताओंके पूज्य तथा पाथोजनाभ हैं अर्थात् आपकी नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ है ॥२॥ आप सम्पूर्ण सुन्दरताके घर हैं, विश्व ब्रह्माण्ड आपका शरीर है, आप अत्यन्त चतुर, गूढ़ गुणवाले, अपार- महिम, निर्भीक, दुस्तर, दुर्गम, स्वर्गापवर्गके स्वामी, तथा संसार-वृक्षको काटनेके लिए कुठाररूप हैं ॥ ३ ॥ आपने गौतमकी स्त्रीको शापमुक्त किया है, आप ब्राह्मणोंका हित करनेवाले (ब्रह्मण्य), विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करनेमें सुदक्ष, स्वजनोंका पक्ष लेनेवाले, राजा जनककी सभामें शिव-धन्वाको खंड-खंड करने- वाले तथा उग्ररूप परशुरामजीकी महान् गर्व-गरिमाका हरण करनेवाले हैं ॥४॥ आपने गुरुजनों (पिता-माता) के वचनोंका गौरव रखनेके लिए ऐसे राज्य और धनको त्याग दिया जिसे देवता लोग भी कठिनाईसे भी नहीं त्याग सकते हैं; आप अजन्मा होनेपर भी अपने भाई लक्ष्मण और जानकीजीको साथ लेकर मनुष्योंकी तरह लीला करते हुए दुष्टोंका वध करनेमें तत्पर तथा तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले हैं ॥५॥ आपने अपने पवित्र चरणोंसे दंडक वनको पुण्यमय
९६ विनय-पत्रिका स्थान बना दिया, आप मृगरूपी मारीचकी माया हरनेवाले, बलवान् बालिरूपी मतवाले हाथीके लिए सिंहरूप और सुहृद सुग्रीवके दुःखोंको दूर करनेवाले हैं ॥६॥ आप विकट योद्धाओंमें श्रेष्ठवीर रीछ और बन्दरोंको साथ लेकर पर्वताकार शत्रुओंको संग्राममें भयभीत करनेवाले, समुद्रको बाँधनेवाले, देवताओंके समूहको मुक्त करनेवाले, तथा दस सिर और बीस विशाल भुजाओंवाले रावणको उसके कुल-सहित नष्ट करनेवाले हैं ॥७॥ आप देवताओंके दुष्ट शत्रु-समूहका नाश करके पृथिवीका भार उतारनेके लिए अवतार लेनेवाले और अनुपम कारणस्वरूप हैं। आप निर्मल, दोषरहित, अद्वैत, त्रिगुणोंसे रहित, सगुण तथा राजाके रूपमें साक्षात् ब्रह्म हैं। मैं आपका स्मरण करता हूँ ॥८॥ शेष, वेद, सरस्वती, शिवजी, नारद और सनकादि आपका गुणानुवाद गाते हैं, पर आपके चरित्रका अन्त नहीं होता। वही 'राम' जो कि शिवजीके प्रिय और अयोध्याके राजा हैं— तुलसीदासको भव-सागरसे उबारनेके लिए सर्वदा नौका-रूप हैं ॥९॥ विशेष १—'गुनगूढ़'—रामजीका गुन कितना गूढ़ है इसे शिवजीने जगज्जननी पार्वतीजीसे इस प्रकार कहा है— उमा रामगुन गूढ़, पण्डित मुनि पावहिं विरति । पावहिं मोह विमूढ़, जे हरि विमुख न धर्मरति ॥ —रामचरितमानस । २—'पाथोजनाभं'—सृष्टिकी उत्पत्तिके प्रकरणमें ऐसा उल्लेख है कि समुद्रमें शेषशायी भगवान् विष्णुकी नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ और उस कमलके ऊपर ब्रह्माजी पैदा होकर सृष्टिकी रचना करनेमें तत्पर हुए। इसीसे भगवान् विष्णु पाथोजनाभ कहे जाते हैं। ३—'दुर्ग'—वास्तवमें का अर्थ अर्थ है "जहाँ दुःखसे पहुँचा जा सके।" ४—'भार्गव'—परशुरामजी भृगुवंशके थे, इससे उन्हें भार्गव कहा जाता है।
विनय-पत्रिका ९७ ५—'दण्डकारन्य कृतपुन्य'—दण्डकारण्यको शाप था। अतः इस वनमें कोई नहीं जाता था। भगवान् रामचन्द्रने इसे पवित्र कर दिया। ६—'कारण'—जिससे कोई वस्तु उत्पन्न होती है, उसे उस वस्तुका कारण कहते हैं। सृष्टिकी उत्पत्ति ईश्वरसे हुई, अतः परमात्मा कारण-स्वरूप हैं और सृष्टि कार्यरूप। जैसे घटका कारण मिट्टी है और मिट्टीका कार्य घट है। ( ५१ ) देव— जानकीनाथ, रघुनाथ, रागादि-तम- तरनि तारुण्यतनु तेजधामं। सच्चिदानंद, आनंदकंदाकरं, विश्व-विश्राम, रामाभिरामं ॥ १ ॥ नीलनव-वारिधर-सुभग-सुभकांति, कटि पीत कौसेयवर वसनधारी। रत्न-हाटक-जटित-मुकुट-मंडित-मौलि, भानु-सत-सहस उद्योतकारी ॥ २ ॥ स्रवन कुण्डल, भाल तिलक, भ्रुरुचिर अति, अरुन अंभोज लोचन बिसालं। बक्र अवलोक त्रैलोक सोकापहं, मार-रिपु हृदय-मानस-मरालं ॥ ३ ॥ नासिका चारु, सुकपोल, द्विज बज्र दुति, अधर बिंबोपमा, मधुर हासं। कंठ दर, चिबुक वर, वचन गम्भीर तर, सत्य संकल्प, सुरत्रास-नासं ॥ ४ ॥ सुमन सुविचित्र नव तुलसिकादल-युतं मृदुल वनमाल उर भ्राजमानं। भ्रमत आमोदवस मत्त मधुकर-निकर, मधुरतर मुखर कुर्वंति गानं ॥ ५ ॥ ७
९८ विनय-पत्रिका सुभग श्रीवत्स, केयूर, कंकन, हार, किंकिनी-रटनि कटि-तट रसालं । वाम दिसि जनकजासीन-सिंहासनं कनक-मृदुवल्लिवत तरु तमालं ॥ ६ ॥ आजानु भुजदंड, कोदंड-मंडित वाम बाहु, दच्छिन पानि वानमेकं । अखिलमुनि-निकर, सुर, सिद्ध, गंधर्व वर नमत नर-नाग अवनिप अनेकं ॥ ७ ॥ अनघ, अविच्छिन्न, सर्वज्ञ, सर्वैस, खलु सर्वतोभद्र-दाताऽस्माकं । प्रनतजन-खेद-विच्छेद-विद्या-निपुन नौमि श्रीराम सौमित्रि साकं ॥ ८ ॥ युगल पदपद्म सुखसद्म पद्मालयं चिह्न कुलिसादि सोभाति भारी । हनुमंत-हृदि विमल कृत परम मंदिर, सदा दास तुलसी-सरन सोकहारी ॥ ९ ॥ शब्दार्थ—आनंदकंदाकरं = (आनंद+कंद+आकरं) आनन्दके मेघोंकी खानि । रामा- भिराम = लक्ष्मीको सुख देनेवाले । कौशेय = रेशमी । हाटक = सुवर्ण । वक्र = टेढ़ी, तिरछी । द्विज = दाँत । वज्र = हीरा । अधर = ओठ । मुखर = शब्दायमान । कुर्वंति = करते हैं । केयूर = अंगद, विजयठ । किंकिनी = करधनी । वल्लिवत = लताके समान । पानि = हाथ । अवनिप = राजा । खलु = निश्चयपूर्वक । विच्छेद = नाश । साकं = समेत । सद्म = घर । पद्मालय = लक्ष्मीका निवासस्थान । भावार्थ—हे देव ! आप जानकीनाथ, रघुनाथ, राग-द्वेषादि-रूपी अन्धकार- का नाश करनेके लिए मध्याह्नकालीन सूर्यके समान तेजके धाम हैं । आप सत्- चित्-आनन्दस्वरूप आनन्दके मेघोंकी खानि, संसारके विश्राम-स्थल तथा सुखदायी राम हैं ॥१॥ आप नवीन नीले मेघके समान सुन्दर कान्तिवाले, कमरमें श्रेष्ठ वस्त्र रेशमी पीताम्बर धारण करनेवाले हैं । आपके मस्तकपर सैकड़ों सूर्यके समान प्रकाश करनेवाला रत्नजटित सोनेका मुकुट सुशोभित हो रहा है ॥२॥ आपके
विनय-पत्रिका ९९ कानोंमें कुण्डल, ललाटपर तिलक है; आपकी भौंहें अत्यन्त सुन्दर हैं और लाल कमलके समान बड़े-बड़े अरुणारे नेत्र हैं। आपकी तिरछी चितवन तीनों लोकों- का शोक हरनेवाली है; आप शिवजीके हृदय-रूपी मानसरोवरमें विचरण करने- वाले हंसरूप हैं ॥३॥ आपकी नासिका और कपोल सुन्दर हैं, दाँत हीरेकी तरह शुभ्र और चमकीले हैं, अधरोंकी लालिमा पके हुए बिम्बाफलके समान हैं, मुस- कान मधुर है, कण्ठ शंखके समान है, चिबुक सुन्दर और वाणी अत्यन्त गम्भीर है। आप सत्य-संकल्प और देवताओंके भयका नाश करनेवाले हैं ॥४॥ आपके हृदयपर नवीन तुलसीदलसंयुक्त सुन्दर रंग-बिरंगे पुष्पोंकी कोमल वनमाला सुशोभित है और उस मालाकी सुगंधसे दीवाने भ्रमरोंका समूह आमोदवश अत्यन्त मधुर गुंजार करता हुआ घूम रहा है ॥५॥ आपके हृदयपर सुन्दर श्रीवत्सका चिह्न है, बाहुओंपर अंगद या विजयठ, हाथोंमें कंकण, गलेमें हार और कटि भागमें करधनी मधुर ध्वनि कर रही है। सिंहासनपर आपके वाम भागमें जानकी- जी बैठी हैं; ऐसा जान पड़ता है मानो तमाल वृक्षके समीप कोमल सुवर्ण-लता शोभित हो रही है ॥६॥ घुटनेतक लम्बे आपके हाथ हैं; आपके बायें हाथमें धनुष तथा दाहिने हाथमें एक बाण है। आपको सम्पूर्ण मुनि-वृन्द, देवता, सिद्ध, श्रेष्ठ गन्धर्व, मनुष्य, नाग और अनेक रजवाड़े प्रणाम करते हैं ॥७॥ आप निष्पाप, अविच्छिन्न, सर्वज्ञ, सबके स्वामी, हम लोगोंको निश्चयपूर्वक सब प्रकारका कल्याण देनेवाले तथा भक्तोंके प्रणाम करते ही उनके कष्टोंको दूर करनेकी विद्या- में निपुण हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी ! मैं आपको लक्ष्मणजीके सहित नमस्कार करता हूँ ॥८॥ आपके युगल चरणकमल सुखके घर तथा लक्ष्मीजीके निवास-स्थान हैं। बज्र आदि चिह्नोंके कारण आपके चरणोंकी शोभा ही निराली है। आपके जिन चरणोंने हनुमान्जीके हृदयको उत्तम मन्दिर बनाकर पवित्र किया है, यह तुलसी- दास सदैव उन शोकहारी चरणोंकी शरणमें हैं ॥९॥ विशेष १—'तारुण्यतनु' का अर्थ वियोगी हरिजी तथा अन्य कई टीकाकारोंने 'तरुण शरीरवाले' लिखा है; पर यह अर्थ ठीक नहीं। क्योंकि श्रीरामजी सदैव किशोरावस्थामें रहते हैं और शिवजी युवावस्थामें—ऐसा उल्लेख पाया जाता है। गोस्वामीजीने भी 'विनय' के ६२ वें पदमें लिखा है:—
३. श्री हनुमान जी की स्तुति व पद
१०० विनय-पत्रिका "बिसद किसोर, पीन, सुन्दर वपु, स्याम सुरुचि अधिकाई।" २—'वनमाल'—कमल, कुंद, पारिजात, मंदार और तुलसीकी पैरोंतक लटकती हुई मालाका नाम वनमाला है। ३—'चिह्न कुलिसादि'—भगवान्के दाहिने चरणमें २४ और वाम चरणमें २४, कुल ४८ चिह्न हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्रजीने इन चिह्नोंका वर्णन इस प्रकार किया हैः— स्वस्तिक ऊरध रेख कोन अठ श्रीहल-मूसल। अहि वाणाम्बर वज्र सु-रथ यव कंज अष्टदल ॥ कल्पवृक्ष ध्वज चक्र मुकुट अंकुश सिंहासन। छत्र चँवर यम-दंड माल यवकी नरको तन ॥ चौबीस चिह्न ये रामपद प्रथम सुलच्छन जानिये। 'हरिश्चंद' सोई वामपद जानि ध्यान उर आनिये ॥ सरयू गोपद महि जम्बू घट जय पताक दर। गदा अर्ध ससि तिल त्रिकोन षटकोन जीव वर ॥ शक्ति सुधा सर त्रिबलि मीन पूरन ससि वीना। वंशी धनु पुनि हंस तून चन्द्रिका नवीना ॥ श्रीराम-वाम पद चिह्न सुभ ए चौबिस शिव-उक्त सब। सोइ जनकनन्दिनी दक्ष पद भजु सब तजु 'हरिचंद' अब ॥
( ५२ )
देव— कोसलाधीस, जगदीस, जगदेक हित, अमित गुन विपुल विस्तार लीला। गायन्ति तव चरित सुपवित्र स्रुति-सेष-सुक- संभु-सनकादि मुनि मननसीला ॥ १ ॥ वारिचर-वपुष धरि भक्त-निस्तारपर, धरिनिकृत नाव महिमाति गुर्वी।
विनय-पत्रिका १०१ सकल यज्ञांसमय उग्र विग्रह क्रोड़, मर्दि दनुजेस उद्धरन उर्वी ॥२॥ कमठ अति विकट तनु कठिन पृष्ठोपरी, भ्रमत मंदर कंडु-सुख मुरारी। प्रगटकृत अमृत, गो, इंदिरा, इंदु, वृंदारकवृंद-आनंदकारी ॥३॥ मनुज-मुनि-सिद्ध-सुर-नाग-त्रासक, दुष्ट दनुज द्विज-धर्म मरजाद-हर्ता। अतुल मृगराज-वपुध्रित, विदरित अरि, भक्त प्रहलाद-अहलाद-कर्ता ॥४॥ छलन बलि कपट-वटुरूप वामन ब्रह्म, भुवन परजंत पद तीन करनं। चरन-नख-नीर त्रैलोक-पावन परम, विबुध-जननी दुसह-सोक हरनं ॥५॥ छत्रियाधीस-करि निकर-नर-केसरी, परसुधर विप्र-ससि-जलद रूपं। बीस भुजदंड दससीस खंडन चंड, वेग सायक नौमि राम भूपं ॥६॥ भूमिभर-भार-हर, प्रगट परमात्मा, ब्रह्म नर-रूपधर भक्त-हेतू। वृष्णि-कुल-कुमुद-राकेस राधारमन, कंस-वंसाटवी-धूमकेतू ॥७॥ प्रबल पाखंड महि-मंडलाकुल देखि, निंदकृत अखिल मख कर्म-जालं। सुद्ध वोधैक घन, ज्ञान-गुन-धाम, अज, बौद्ध अवतार वंदे कृपालं ॥८॥
१०२ विनय-पत्रिका कालकलिजनित मलमलिन मन सर्वनर मोह-निसि निविड़ जमनांधकारं । विष्णुजस पुत्र कलकी दिवाकर उदित दास तुलसी हरन विपति भारं ॥९॥ शब्दार्थ - गायंति = गाते हैं । वारिचर = मत्स्य । वपुष = शरीर । गुर्वी = श्रेष्ठ । क्रोड़ = शूकर । उर्वी = पृथिवी । कमठ = कच्छप । कंडु = खुजलाहट । इंदिरा = लक्ष्मी । वृंदारका- वृंद = देव-गण । मृगराज = नृसिंह । वटु = ब्रह्मचारी । ससि = शस्य, धान, धान्य । भूमि- भर = पृथिवीभर, समूची पृथ्वी । राकेस = चन्द्रमा । वंसाटवी = वंश-वन । धूमकेतू = अग्नि । कलकी = कल्कि । भावार्थ—हे देव ! हे कोशलपति ! हे जगदीश ! आप संसार के एकमात्र हितकारी हैं और अपने अमित गुणोंकी अपार लीलाका विस्तार करनेवाले हैं । आपके सुन्दर और पवित्र चरित्रको वेद, शेष, शुकदेव, शिव, सनकादि तथा मननशील मुनि गाते हैं ॥१॥ आपने अपने भक्तोंके उद्धारके लिए मत्स्यरूप धारण करके पृथिवीकी नौका बनायी; आपकी महिमा अपार है । आप समस्त यज्ञोंके अंशरूप हैं, और उग्र शरीरवाले शूकर रूपमें हिरण्याक्ष नामक दैत्यराजका मर्दन करके पृथिवीका उद्धार करनेवाले हैं ॥२॥ हे मुरारे ! आप अत्यन्त विक- राल कछुएगा शरीर धारण करके अपनी कठिन पीठपर घूमते हुए मन्दराचल पर्वतसे खुजलाहट का सुख प्राप्त करनेवाले तथा (समुद्रमंथन करके) अमृत, कामधेनु, लक्ष्मी और चन्द्रमाको उत्पन्न करके देवताओंको आनन्दित करनेवाले हैं ॥३॥ आप नृसिंहरूप धारण करके मनुष्य, मुनि, सिद्ध, देवता और नागोंको दुःख देनेवाले तथा ब्राह्मण-धर्मकी मर्यादा हरण करनेवाले महान् शत्रु दुष्ट दैत्य हिरण्यकशिपुको फाड़कर उसके पुत्र भक्त प्रह्लादको आह्लादित करनेवाले हैं ॥४॥ आपने बलिको छलनेके लिए वामन ब्रह्मचारीका कपटरूप धारण करके तीन पैरमें तीनों लोकोंको नाप लिया । नापते समय आपके चरण-नखसे तीनों लोकोंको परम पवित्र करनेवाला जल निकला जोकि गंगाके नामसे प्रसिद्ध हुआ । आपने छलसे बलिका राज्य ले लिया और उसे इन्द्रको देकर देवताओंकी माता अदितिका दुःसह शोक हर लिया॥५॥ आप क्षत्रिय राजारूपी हाथियोंके समूहको विदीर्ण करने- के लिए पुरुष-सिंहरूप तथा ब्राह्मणरूपी धान्यके लिए मेघरूप परशुरामका अवतार
विनय-पत्रिका १०३ धारण करनेवाले हैं। आप बीस भुजा और दस शिरवाले रावणको अपने प्रचंड और वेगवान बाणोंसे खंड-खंड करनेके लिए महाराज रामचन्द्रका अवतार धारण करनेवाले हैं; आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥६॥ समूची पृथिवीका भार उतारने तथा भक्तोंकी रक्षाके लिए आप परब्रह्म परमात्मा होकर भी नर-रूप धारण करने- वाले हैं। आप वृष्णि-कुल-कुमुदको विकसित करनेवाले चन्द्रमा-स्वरूप, राधा- रमण, तथा कंसके वंशरूपी वनको जलानेके लिए अग्निरूप हैं ॥७॥ पृथिवी मंडलको प्रबल पाखंडोंसे व्याकुल देखकर आपने यज्ञादि कर्मोंकी निन्दा की; ऐसे शुद्ध बोध-स्वरूप, विज्ञानघन, सकल-गुण-निधान, अजन्मा, कृपालु आपके बौद्धा- वतारकी मैं वन्दना करता हूँ ॥८॥ कलिकाल-जनित पापोंसे सब मनुष्योंके मन मलिन हो रहे हैं; आप इस महानिशाके म्लेच्छरूपी सघनान्धकारका नाश करनेके लिए उदय हुए सूर्यकी भाँति विष्णुयश नामक ब्राह्मणके यहाँ पुत्ररूपसे कल्कि अवतार धारण करनेवाले हैं। आप इस तुलसीदासको विपत्तियोंके भारको दूर कर दीजिये ॥९॥ विशेष १—इस पदमें दशावतारकी चर्चा है। भगवान्के मुख्य दसों अवतार ये हैं:—(१) मत्स्य, (२) वाराह, (३) कूर्म, (४) नृसिंह, (५) वामन, (६) परशुराम, (७) राम, (८) कृष्ण, (९) बुद्ध, (१०) कल्कि। इनमें प्रथम चार अवतार सत्ययुगमें, उसके बादके तीन अवतार (वामन, परशुराम और राम) त्रेतामें, उसके बादके दो अवतार (कृष्ण, बुद्ध) द्वापरके अन्तमें हुए हैं और अन्तिम कल्कि अवतार कलियुगके अन्तमें होगा। यह दशावतारी पद महाकवि जयदेवकृत ‘गीतगोविन्द’ नामक काव्य-ग्रंथकी एक अष्टपदीसे मिलता-जुलता है। उस अष्टपदीका प्रारम्भ इस प्रकार है:— "प्रलयपयोधि जले धृतवानसि वेदम्। विहित वहित्र चरित्रमखेदम् ॥ केशवधृत मीन शरीर, जय जगदीश हरे ॥१॥ क्षितिरति विपुलतरे तवतिष्ठति पृष्ठे । धरणि धरण किणचक्र गरिष्ठे ॥ केशवधृत कच्छप रूप, जय जगदीश हरे ॥२॥