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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

( १६ ) मनु-स्मृति याज्ञवल्क्य-स्मृति (१) वेदः स्मृतिः सदाचारः (१) श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधम्प्राहुः सम्यक्संकल्पजः कामो साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् । धर्ममूलमिदं स्मृतम् ॥ २।१२॥ १।७॥ (२) निषेकादिश्मशानान्तो (२) निषेकाद्याः श्मशानान्ताः मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः ॥ तेषां वै मन्त्रतः क्रियाः ॥ २।१६। १।१०॥ (३) गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत (३) गर्भाऽष्टमेऽष्टमे वाब्दे ब्राह्मणस्योपनायनम् ॥ ब्राह्मणस्योपनायनम् ॥ २।३६॥ १।१४॥ (४) आषोडशाद्ब्राह्मणस्य (४) आ-षोडशादाद्वाविंशात् सावित्री नातिवर्तते । चतुर्विंशाच्च वत्सरात् ॥ आद्वाविंशात् क्षत्रबन्धोः ब्रह्म-क्षत्र-विशां काल आचतुर्विंशतेर्विशः ॥ औपनायनिकः परः॥ अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते अत ऊर्ध्वं पतन्त्येते यथाकालमसंस्कृताः । सर्वधर्म-बहिष्कृताः । सावित्री-पतिताः व्रात्याः सावित्री-पतिताः व्रात्याः भवन्त्यार्य-विगर्हिताः ॥ व्रात्यस्तोमादृते क्रतोः ॥ २।३८-३९॥ १।३७-३८ ॥ (५) न स्कन्दते न व्यथते (५) अस्कन्नमन्यथक्तञ्चैव न विनश्यति कर्हिचित् । प्रायश्चित्तैरदूषितम् ॥ वरिष्ठमग्नि-होत्रेभ्यो अग्नेः सकाशाद्द्विप्राग्नौ ब्राह्मणस्य मुखे हुतम् । हुतं श्रेष्ठमिहोच्यते ॥ ७।८४॥ १।३१६॥ (६) अलब्धञ्चैव लिप्सेत (६) अलब्धमीहेद्धर्मेण लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः । लब्धं यत्नेन पालयेत् । रक्षितं वर्धयेच्चैव पालितं वर्धयेन्नीत्या वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत ॥ वृद्धम्पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ अलब्धमिच्छेद्दण्डेन १।३१७॥ लब्धं रक्षेद्देवेक्षया । रक्षितं वर्धयेद्वृद्ध्या वृद्धयंच पात्रेषु निक्षिपेत् ॥७।९९,१०१

( ३० ) याज्ञवल्क्य-स्मृति में किये गये मनु-स्मृति के संक्षेप के कुछ निदर्शन निम्न- लिखित हैं—


म० स्मृ०

(१) प्राङ्नाभिवर्धनात् पुंसो जातकर्म विधीयते । मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरण्य-मधु-सर्पिषाम् ॥ नामधेयं दशम्यान्तु द्वादश्यां वास्य कारयेत् । पुण्ये तिथौ मुहूर्त्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते ॥ चतुर्थे मासि कर्तव्यम् शिशोर्निष्क्रमणं गृहात् । षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यथेष्टं मङ्गलं शुभे ॥ चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः । प्रथमेऽब्दे तृतीये वा कर्त्तव्यं श्रुति-चोदनात् ॥ २।२९-३०, ३४-३५ ॥

(२) हीन-जाति-स्त्रियं मोहात् उद्वहन्तो द्विजातयः । कुलान्येव नयन्त्याशु स-सन्तानानि शूद्रताम् ॥ शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् ॥ जनयित्वा सुतं तस्यां ब्राह्मण्यादेव हीयते ॥ ३।१५, १७॥

(३) सुवासिनीः कुमारीश्च रोगिणी गर्भिणीः स्त्रियः । अतिथिभ्योऽग्र एवैतान् भोजयेदविचारयन् ॥ भुक्तवत्स्वथ विप्रेषु स्वेषु भृत्येषु चैव हि । भुञ्जीयातां ततः पश्चात् अवशिष्टन्तु दम्पती ॥ ३।११४, ११५॥


या० स्मृति०

(१) ......एते जातकर्म च ॥ अहन्येकादशे नाम चतुर्थे मासि निष्क्रमः । षष्ठेऽन्न-प्राशनं मासि चूडा कार्या यथाकुलम् ॥ १।११-१२।।

(२) यदुच्यते द्विजातीनां शूद्रादारोपसंग्रहः । नैतन्मम मतं यस्मात् तत्रायं जायते स्वयम् ॥ १।५६॥

(३) बालः स्ववासिनी-वृद्ध- गर्भिण्यातुर-कन्यकाः । सम्भोज्यातिथि-भृत्यांश्च दम्पत्योः शेष-भोजनम् ॥ १।१०५॥

( २१ ) स्थल-विशेष में याज्ञवल्क्य में मनु के मत का कुछ परिष्कार भी किया गया है। उसके कुछ दृष्टान्त अधो-लिखित हैं—

<table> <thead> <tr> <th>म० स्मृ०</th> <th>या० स्मृ०</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>(१) गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत<br>ब्राह्मणस्योपनयनम् ।२।३६</td> <td>(१) गर्भाष्टमेऽष्टमे वाऽब्दे<br>ब्राह्मणस्योपनयनम् ।१।१४॥</td> </tr> <tr> <td>(२) एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्यात्<br>८।७७।।</td> <td>(२) उभयानुमतः साक्षी<br>भवत्येकोऽपि धर्मवित् । २।७२॥</td> </tr> <tr> <td>(३) अकामतः कृतम्पापं<br>वेदाभ्यासेन शुध्यति ।<br>कामतस्तु कृतं मोहात्<br>प्रायश्चित्तैः पृथग्विधैः ॥ ११।४६॥</td> <td>(३) प्रायश्चित्तैरपेत्येनो<br>यदज्ञानकृतम्भवत् ।<br>कामतो व्यवहार्यस्तु<br>वचनादिह जायते ॥ ३।२२६॥</td> </tr> <tr> <td>(४) रेतः-सेकः स्वयोनीषु<br>कुमारीष्वन्त्यजासु च ।<br>सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु<br>गुरुतल्पसमं विदुः ॥ ११।५८॥</td> <td>(४) सखि-भार्या-कुमारीषु<br>स्वयोनिष्वन्त्यजासु च ।<br>सगोत्रासु सुत-स्त्रीषु<br>गुरुतल्प-समं स्मृतम् ॥<br>पितुः स्वसारं मातुश्च<br>मातुलानीं स्नुषामपि ।<br>मातुः सपत्नीं भगिनीम्<br>आचार्यतनयां तथा ॥<br>आचार्य-पत्नीं स्व-सुतां<br>गच्छंस्तु गुरु-तल्पगः ॥<br>३।२३१-३३॥</td> </tr> </tbody> </table> कुछ स्थान में मनु से साधारण वैमत्य भी है। उदाहरण के लिए 'ब्रह्म-हत्या- सम' तथा 'सुरा-पान-सम' कार्यों में मनु तथा याज्ञवल्क्य के परस्पर विभिन्न कथन को देखें— <table> <thead> <tr> <th>म० स्मृ०</th> <th>या० स्मृ०</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>(१) अनृतं च समुत्कर्षे<br>राज-गामि च पैशुनम् ।<br>गुरोश्चालीक-निर्बन्धः<br>समानि ब्रह्म-हत्यया ॥ ११।५५॥</td> <td>(१) निषिद्ध-भक्षणं जैह्मयम्<br>उत्कर्षे च वचोऽनृतम् ।<br>रजस्वला-मुखास्वादः<br>सुरापान-समानि तु ॥ ३।२२९॥</td> </tr> <tr> <td>(२) ब्रह्मोञ्झता वेद-निन्दा<br>कौट-साक्ष्यं सुहृद्वधः ।<br>गर्हितानाद्ययोर्जग्धिः<br>सुरापान-समानि षट् ॥ ११।५६</td> <td>(२) गुरूणामप्यधिक्षेपो<br>वेदनिन्दा सुहृद्वधः ।<br>ब्रह्म-हत्या समं ज्ञेयम्<br>अधीतस्य च नाशनम् ॥ ३।२२८॥</td> </tr> </tbody> </table>

( २२ ) इतनी समता या साधारण-विषमता के अतिरिक्त दोनों में असाधारण विषमता भी द्यूत-समाह्वय-प्रायश्चित्त आदि में स्पष्ट उपलब्ध है। परन्तु देश-काल के अनुसार ही याज्ञवल्क्य-स्मृति में यह परिवर्त्तन हुआ है—यही प्रतीत होता है। अतः परमार्थतः याज्ञवल्क्य-स्मृति को मनुस्मृति का विप्रतीप कहना उचित नहीं है। मनुस्मृति से अतिरिक्त अन्यान्य प्राचीन धर्मशास्त्र के मत का भी यथोचित सन्निवेश याज्ञवल्क्य-स्मृति में हुआ है, परन्तु विस्तर-भय से यहाँ उनके उदाहरण नहीं दिये जाते हैं। बहुत से उदाहरण तो याज्ञवल्क्य-स्मृति की व्याख्याओं के अवलोकन से भी स्पष्ट हो जाते हैं, दोनों की तुलना करने पर तो कुछ कहना ही नहीं है। विषय-विन्यास की दृष्टि से भी याज्ञवल्क्य-स्मृति बहुत ही प्रशस्त है। संक्षेप में अधिक अर्थ की अभिव्यक्ति इसकी विशेषता है। जहाँ मनुस्मृति में २७०० श्लोक हैं वहीं या० स्मृ० में केवल १००९ (मिताक्षरा-कार के अनुसार) श्लोक हैं। मनुस्मृति का विषय-विन्यास स्फुट होने पर भी बहुधा सङ्कीर्ण हो गया है जब कि या० स्मृ० में सङ्कीर्णता का सर्वथा अभाव ही दृष्टि-गोचर होता है। मनुस्मृति में वर्णन के प्रसङ्ग में निदर्शन आदि का पुट अधिक है जो या० स्मृ० में प्रायशः नहीं मिलता है। सृष्टि-प्रक्रिया आदि कुछ विषयों की तो या० स्मृ० में कोई चर्चा ही नहीं है जब कि म० स्मृ० में पूरा प्रथम अध्याय सृष्टि-प्रकार के वर्णन में ही पर्यवसन्न हुआ है। मनुस्मृति में पुनरुक्ति भी बहुत है। कुछ निदर्शन निम्न-लिखित हैं :— १ वेदोऽखिलो धर्म-मूलं स्मृति-शीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनाम् आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥ २।६ ॥ वेदःस्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधम्प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ २।१२॥ तथा, अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः । रक्षितं वर्धयेच्चैव वृद्धम्पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ ७।९९ ॥ अलब्धमिच्छेद्दण्डेन लब्धं रक्षेद्यवेक्षया । रक्षितन्वर्षयेद्वृद्ध्या वृद्धम्पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ ७।१०१ ॥ अतः विषय में मन्वर्थानुगामिनी तथा प्रतिपादन में संक्षिप्त किन्तु युक्त्यनु- सारिणी तथा देश-काल-पात्र को ध्यान में रखकर निर्णय करने वाली या० स्मृ० का सभी स्मृतियों में विशिष्ट स्थान है। याज्ञवल्क्य-स्मृति के व्याख्याकार विश्वरूप-(७५०—१००० ई०) याज्ञवल्क्य-स्मृति के व्याख्याकारों में सर्व-प्रसिद्ध तथा सर्व-प्रथम उपलब्ध व्याख्याकार विश्वरूपाचार्य हैं। इनकी व्याख्या का नाम 'बालक्रीडा' है जिसका

( २३ ) प्रकाशन महामहोपाध्याय गणपति शास्त्री के द्वारा 'त्रिवेन्द्रम संस्कृत ग्रन्थमाला' से हुआ है। यह व्याख्या दो भागों में प्रकाशित हुई है। व्याख्या की भाषा अत्यन्त मनोहर है। याज्ञवल्क्य के अभिप्राय को, विशेषतः आचार तथा प्रायश्चित्त अध्यायों में, विश्वरूप ने विश्वरूप बना दिया है। इसीलिए मिताक्षराकार ने प्रारम्भ में ही इनका ससम्मान निर्देश किया है— "याज्ञवल्क्य-मुनि-भाषितम्मुहुः विश्वरूप-विकटोक्तिविस्तृतम्” ॥ (मिताक्षरा० आचार० श्लो० २) याज्ञवल्क्य के समर्थन के लिए (यत्र तत्र अपने विमत के समर्थन के लिए भी) विश्वरूप ने वेदों से तथा अनेक स्मृतियों एवम् गृह्य-सूत्रों से उद्धरण प्रस्तुत किये हैं। स्थान-स्थान पर मिताक्षराकार का मत भी इनसे भिन्न है। यद्यपि इन्होंने 'अन्ये' 'अपरे', 'यत्त' आदि शब्दों से अपने से प्राचीनतर व्याख्याकारों का भी निर्देश किया है तथापि किसी का नाम स्पष्ट रूप में निर्दिष्ट नहीं हुआ है। विश्वरूप की प्रवृत्ति मीमांसा की ओर अधिक है। अनेकशः जैमिनि के सूत्रों का इन्होंने उद्धरण किया है। इनका समय महामहोपाध्याय काणे के अनुसार ७५० ई० से लेकर १००० ई० तक माना गया है। विज्ञानेश्वर (१०७०—१११५) विज्ञानेश्वर की ऋजु-मिताक्षरा समस्त धर्म-साहित्य में अद्वितीय है। महामहो- पाध्याय काणे का कथन है— Its position is analogous to that of the महाभाष्य of पतञ्जलि in grammar or to that of the काव्य-प्रकाश of मम्मट in poetics. (History of Dharma. P. 287) आङ्ग्लशासन काल में तो मिताक्षरा का बड़ा ही महत्त्व था। इसी के आधार पर न्यायालय में दायभाग आदि का निर्णय किया जाता था। यदि यह कहा जाय कि मिताक्षरा के कारण याज्ञवल्क्य-स्मृति का भी महत्त्व कुछ अधिक हो गया तो अत्युक्ति न होगी। याज्ञवल्क्य के अभिप्राय को परिष्कृत करने के लिए इन्होंने अनेक स्मृतियों, पुराणों तथा वैदिक-ग्रन्थों से उद्धरण प्रस्तुत किए हैं। स्मृतिकारों का निर्देश तो विश्वरूप की तुलना में चतुर्गुण है—ऐसा कहा जा सकता है। ये मीमांसा के बड़े ही प्रकृष्ट पण्डित प्रतीत होते हैं। वस्तुतः धर्म- शास्त्र के मर्म को जानने के लिए मीमांसा का विशद ज्ञान अनिवार्य है। इन्होंने 'यथाकामी भवेद्रापि' (या० स्मृ० १।८१) श्लोक की व्याख्या में विधि का विमर्श बहुत ही तार्किक युक्ति से मीमांसा शास्त्र के अनुसार प्रस्तुत किया है। इसी प्रकार १।८६, २।११४, २।१२६ आदि श्लोकों की व्याख्या में भी उनके मीमांसा-शास्त्रीय वैदुष्य का उत्कर्ष देखा जा सकता है। इनका जन्म भारद्वाज गोत्र में हुआ था। इन्होंने अपने पिता का नाम पद्मनाभ भट्टोपाध्याय बतलाया है। गुरु के विषय में इनका निर्देश है— उत्तमोपपदस्येयं शिष्यस्य कृतिरात्मनः।

इस श्लोक के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि इनके गुरु का नाम

( २४ ) इस श्लोक के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि इनके गुरु का नाम उत्तमात्मा अथवा आत्मोत्तम रहा होगा । इन्होंने अपनी मिताक्षरा में विक्रमादित्य देव को अपने आश्रयदाता के रूप में निर्दिष्ट किया है । विक्रमादित्य देव का वर्णन 'विक्रमाङ्कदेव-चरित' महाकाव्य में महाकवि बिल्हणद्वारा विशद रूप में वर्णित है । "विक्रमाङ्क-देव-चरित" के सम्पादक म० म० पं० रामावतार पाण्डेयजीने अपनी भूमिका में चालुक्यवंशीय विक्रमादित्य का समय १०७६ से १११४ ई० के बीच माना है । अतः विज्ञानेश्वर का भी समय वही होना चाहिए । अपरादित्य ( द्वादश शतक-पूर्वार्ध ) या० स्मृ० पर तीसरी व्याख्या अपरार्क है । यह व्याख्या मिताक्षरा से विस्तृत तथा धर्म-शास्त्र के सिद्धान्तों का आकर है । आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली, पूना से १९०३-४ में दो भागों में यह प्रकाशित हुई है । इस व्याख्या में पुराणों से बहुत ही उद्धरण किये गए हैं । पुराणों से अतिरिक्त गौतम आदि धर्म-शास्त्रों से भी बहुत प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं। इनका जन्म-समय १११५ से ११३० ई० के मध्य में माना जाता है । इनके पिता का नाम अनन्त देव तथा पितामह का नागार्जुन था । ये जीमूतवाहन के वंश में उत्पन्न हुए हैं, जैसा या० स्मृ० की व्याख्या के अन्त में इनके लेख से स्पष्ट होता है—'इति श्री- विद्याधरवंशप्रभवश्रीशिलाहार नरेन्द्र-जीमूतवाहनान्वयप्रसूत श्रीमदपरादित्य देव............' । एक दूसरे अपरादित्य देव भी हुए हैं जिनका जन्म समय ११८४-११८७ है परन्तु डा० काणे के कथनानुसार या० स्मृ० के व्याख्याता प्रथम अपरादित्य देव ही है। कहीं-कहीं इनका नाम केवल आदित्यदेव भी पाया जाता है। भासर्वज्ञ के न्यायसार पर भी इनकी एक बृहद्व्याख्या—न्यायमुक्ता- वली है, जो १९६१ ई० में मद्रास से प्रकाशित हुई है । इनके विषय में विशेष विवरण के लिए डा० काणे का History of Dharmaśāstra ( PP. 328-334 ) देखना चाहिए । शूलपाणि ( १३७५-१४६० ई० ) शूलपाणि बङ्गाल के धर्म-शास्त्रीय-निबन्ध-कारों में प्रमुख माने जाते हैं । इन्होंने या० स्मृति की टीका लिखी । इस टीका का नाम 'दीप-कलिका' है । यह व्याख्या अत्यन्त-संक्षिप्त होने पर भी प्रामाणिक है । यही कारण है कि वीर- मित्रोदय तथा अष्टाविंशति-तत्त्व आदि प्रामाणिक निबन्धों में इनके मत का उल्लेख है । ये साहुदियाल वंश के बङ्गीय ब्राह्मण थे । प्रो० काणे के निर्देशानुसार, बल्लालसेन के राज्य-काल से राढीय ब्राह्मणवर्ग के निम्न-तर वर्गीय ब्राह्मण ही साहुदियाल कहलाते हैं । रुद्रधर के द्वारा 'गौड़ीय' शब्द से निर्दिष्ट होने के कारण इनका बङ्गीयत्व माना जाता है। इनका समय प्रो० काणे तथा जगन्नाथ रघुनाथ घारपुरे के अनुसार १४ शतक के अन्त तथा १५ शतक के मध्य के बीच माना जाता है ।

( २५ ) मित्र-मिश्र ( १८०० ई० ) मित्र-मिश्र के नाम से प्रसिद्ध 'वीरमित्रोदय' व्याख्या विशाल-काय तथा प्रमेय बहुल है। मित्र मिश्र का समय १८वीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जा सकता है, क्योंकि आनन्द चम्पू में इन्होंने इसके निर्माण-काल का उल्लेख किया है— 'मीनारोहिणि-रोहिणी-सहचरे कृत्वाऽन्तिके रेवतीं याते चण्ड-मरीचि-मालिनि तुलां वारे च वाचस्पतेः। शाके खाङ्गतर्तुभू ( १६९० ) परिमिते ह्यानन्दकन्दाभिधां चम्पूमपूरितवान् सित-स्मर-तिथौ श्रीमिश्र-मिश्रः कृती ॥' अतः इनका समय यदि १८ शतक का मध्य-भाग माना जाय तो कुछ अनुपपत्ति नहीं दीखती है। इनकी व्याख्या में अनेक स्मृति तथा पुराणों का उद्धरण तथा विवेचन मिलता है, जिनसे इनके विद्या-वैभव का पता चलता है। परन्तु यह विषय ध्यान देने योग्य है कि यह व्याख्या इनकी अपनी लिखी हुई नहीं है अपितु किसी सदानन्द नाम के विद्वान् ने मित्र मिश्र के अनुरोध से इसका संग्रथन किया था और मित्र मिश्र के नाम से ही इसे प्रख्यापित किया। इसके समर्थन में वी० मि० (या० स्मृ० व्याख्या) में उल्लिखित निम्ननिर्दिष्ट श्लोक है— उत्तंसस्तीरभुक्तेः अखिल-बुध-गुरुः श्रीसदानन्दधीमान् श्रीभाजो मित्रमिश्राज्जगदुपकृतये बिभ्रदादेशदीपम्। ज्ञानानान्द्यैन्य-दोषपहमकलि-भयं याज्ञवल्क्योक्तिकोशात् दृष्ट्वा स्मृत्यर्थसारं समचिनुत यशो धर्म-लक्ष्मी-विहारम् ॥ ( या० स्मृ० व्या० आ० अ० मङ्गल श्लो० १६ ) जो कुछ भी हो, वीर-मित्रोदय व्याख्या के महत्त्व का अपलाप तो कथमपि नहीं किया जा सकता। धर्म-शास्त्र-कानन में परिभ्रमण करने की इच्छा रखने वाले सज्जन के लिए तो यह व्याख्या विशेषतः उपयोगी है। प्रस्तुत-संस्करण प्रस्तुत संस्करण में आधुनिक युग के नियोग को ध्यान में रखकर मूल स्मृति का हिन्दी-अनुवाद समन्वित कर दिया गया है, जिससे संस्कृत के प्रगाढ़ ज्ञान से रहित जिज्ञासुजन का भी अभिलाष पूर्ण हो सके। साथ ही विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा, जिसका महत्त्व प्राच्य तथा पाश्चात्त्य-दोनों ही दृष्टियों से अनुपम है, का समावेश कर दिया गया है जिससे प्राचीन तथा नवीन का सह-स्रोत प्रवाहित होता रहे।

( २६ ) आशा है विद्वज्जन इस नवीन संस्करण का यथोचित स्वागत कर चौखम्बा प्रकाशन के अध्यक्ष को प्रोत्साहित करेंगे जिससे ये इसी तरह संस्कृत तथा संस्कृतज्ञ की सेवा में सोत्साह तत्पर रह सकें। मति-मान्द्यादनुचिताः सम्भवन्ति पदे पदे ॥ तथापि ते नहि पदं लभन्ते महतां हृदि ॥ १ ॥ तुच्छोऽप्यवस्थातुमर्हः प्रकाशः सवितुर्मुखे ॥ अन्धं तमो महदपि न कदाचिदपीत्यलम् ॥ २ ॥ —श्री नारायणमिश्रः

भूमिका स्मृति साहित्य भारतीय धर्मशास्त्र में वैदिक धर्मसूत्रों के उपरान्त स्मृतियाँ आती हैं। स्मृति शब्द का प्रयोग श्रुति से विपर्यास प्रदर्शित करने के लिए किया गया है। श्रुति तथा स्मृति द्वारा विहित आचार को धर्म बताया गया है (श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः, वसिष्ठधर्मसूत्र, १. ४. ६) श्रुति से वेद का अर्थ लिया जाता है और स्मृति शब्द का प्रयोग श्रुति अर्थात् ईश्वरप्रकाशित एवं ऋषिदृष्ट वाङ्मय से भिन्न साहित्य के लिए हुआ है। उपयुक्त अर्थ में धर्मसूत्र भी स्मृति ग्रन्थ हैं। ("श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः", मनु० २. १०)। श्रुति श्रवण, मनन और अध्यापन का विषय है; स्मृति स्मरण का विषय है और परम्परागत धार्मिक साहित्य है। संकीर्ण अर्थ में स्मृति और धर्मशास्त्र में कोई भेद नहीं है। वैदिक साहित्य में हम सूत्रों के अन्तर्गत श्रौतसूत्र या श्रुति पर आधारित सूत्रों का विभाजन पाते हैं। "श्रौतसूत्रों के साथ ही साथ हम दूसरे प्रकार के कल्पसूत्र भी पाते हैं, जिन्हें गृह्यसूत्र कहा गया है। ये गृहस्थजीवन की उन क्रियाओं का वर्णन करते हैं जो जन्म, जन्म के पूर्व, विवाह, मृत्यु और मृत्यु के बाद के अवसरों पर की जाती हैं। इन रचनाओं की उत्पत्ति उनके नाम से ही पर्याप्त रूप में प्रकट हो जाती है, कारण गृह्यसूत्र के अतिरिक्त उनका नाम स्मार्त- सूत्र या स्मृति पर आधारित सूत्र भी है। स्मृति का अर्थ वह है जो याद किया जाने योग्य हो। इस प्रकार हम स्मृति का श्रुति अर्थात् श्रवण के विषय से स्पष्ट रूप से भेद कर सकते हैं, कारण, स्मृति सीधे स्मरण शक्ति पर छाप डालती है और इसके लिए किसी विशेष शिक्षा या साधन की आवश्यकता नहीं पड़ती।"१ इसी विद्वान् ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि मेगस्थनीज के अनुसार भारतीय लोग विधि का व्यवहार "स्मृति द्वारा ही" "अथो नोमिस" किया करते थे।२ संकुचित अर्थ में स्मृति से धर्मशास्त्र की उन रचनाओं का तात्पर्य है जो प्रायः श्लोकों में हैं और उन्हीं विषयों का विवेचन करती हैं जिनका प्रतिपादन धर्मसूत्रों में किया गया है। इन स्मृतियों में अग्रणी हैं-मनु और याज्ञवल्क्य की स्मृतियाँ। मनुस्मृति सबसे प्राचीन है और ईसा से कई सौ वर्ष पहले रची गई थी। अन्य स्मृतियाँ ४०० से १००० ई० के बीच की हैं। स्मृतिकारों की संख्या विस्तृत है। १. भारतीयसाहित्य, अनु० उमेशचन्द्र पाण्डेय, पृ० ११। २. वही, पृ० १४

( २८ ) स्मृतियाँ प्रायः पद्य में हैं और भाषा की दृष्टि से स्मृतियाँ धर्मसूत्रों के बाद की रचनाएँ हैं। स्मृतियों की भाषा लौकिक है। विषयवस्तु की दृष्टि से स्मृतियाँ धर्मसूत्रों से अधिक व्यवस्थित और सुगठित हैं। मुख्य स्मृतिकार १८ हैं—मनु, बृहस्पति, दक्ष, गौतम, यम, अंगिरा, योगीश्वर, प्रचेता, शातातप, पराशर, संवर्त, उशनस्, शंख, लिखित, अत्रि, विष्णु, आपस्तम्ब, हारीत । इनके अतिरिक्त उपस्मृतियों के भी लेखकों के नाम इस प्रकार गिनाये गये हैं— नारदः पुलहो गार्ग्यः पुलस्त्यः शौनकः क्रतुः । बौधायनो जातुकर्ण्यो विश्वामित्रः पितामहः ॥ जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कन्दो लौगाक्षिकश्यपौ । व्यासः सनत्कुमारश्च शान्तनुर्जनकस्तथा ॥ व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातुकण्यः कपिञ्जलः । बौधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च । पैठीनसिर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः ॥ वीरमित्रोदय, परिभाषा प्रकरण के अनुसार स्मृतिकारों की संख्या २१ है और वे हैं— वसिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः । विष्णुः कार्ष्णाजिनिः सत्यव्रतो गार्ग्यश्च देवलः ॥ जमदग्निर्भरद्वाजः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । आत्रेयश्च गवेयश्च मरीचिर्वत्स एव च ॥ पारस्करश्च्यवङ्गो वैजवापस्तथैव च । इत्येते स्मृतिकर्तार एकविंशतिरीरिताः ॥ स्वयं स्मृतिकारों ने दूसरे स्मृतिकारों का उल्लेख किया है और उनकी संख्या का अपने ज्ञान के अनुसार निर्देश किया है। मनु ने ६ के, याज्ञवल्क्य ने २० के, पराशर ने १९ के नाम गिनायें हैं। स्मृतियों की संख्या के विषय में भिन्न प्रकार की सूचनाएँ मिलती हैं। जैसा कि प्रो० काणे ने निष्कर्ष निकाला है—'यदि बाद में आनेवाले निबन्धों, यथा निर्णयसिन्धु, नीलकण्ठ, एवं वीरमित्रोदय की मयूख सूचियों को देखा जाय तो स्मृतियों की संख्या १०० हो जायगी।' यहाँ उल्लेखनीय है कि जो स्मृतियाँ उपलब्ध हैं उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है। अनेक स्मृतियों की केवल व्याख्याएँ उपलब्ध हैं। साथ ही स्वरूप तथा शैली की दृष्टि से भी ये स्मृतियाँ भिन्न हैं। याज्ञवल्क्यस्मृति स्मृति साहित्य में मनुस्मृति के बाद दूसरी महत्वपूर्ण स्मृति है याज्ञवल्क्य- स्मृति। कुछ दृष्टि से तो याज्ञवल्क्यस्मृति का मनुस्मृति की अपेक्षा भी अधिक १. धर्मशास्त्र का इतिहास, भाग १, अनु० काश्यप, पृ० ४१ ।

( २६ ) व्यावहारिक महत्त्व है। याज्ञवल्क्यस्मृति मनुस्मृति के बाद की रचना है यह बात विषयवस्तु के कारण तो स्पष्ट है ही और भी अनेक विशिष्ट तथ्यों के कारण भी स्पष्ट है। इसमें विषयवस्तु का विधिवत् विभाजन किया गया है। गणेश और ग्रहों की पूजा भी इस स्मृति की विशेषता है। दान से संबद्ध कर्मों का ताम्रपत्र पर लेख और मठों के संगठन का वर्णन भी इस स्मृति में पाया जाता है, ये बातें मनु में नहीं उपलब्ध होतीं। इसमें बौद्धमत का खण्डन किया गया है। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्यस्मृति की तुलनात्मक विशेषताओं के विषय में वेबर ने निम्न- लिखित विचार व्यक्त किये हैं: 'जो विषय दोनों में पाये जाते हैं उनमें भी हम याज्ञवल्क्य में अधिक सूक्ष्मता और स्पष्टता पाते हैं, और विशिष्ट उदाहरणों में, जहां दोनों में ठोस अन्तर दिखाई पड़ता है, याज्ञवल्क्य का दृष्टिकोण स्पष्टतः बाद के समय का है।' १ मनु ने व्यवहार के जितने प्रमाण गिनाये हैं उनकी अपेक्षा याज्ञवल्क्यस्मृति में लिखित ताम्रपत्र अधिक गिनाया गया है। मनु ने दिव्यों के अन्तर्गत अग्नि और जल के दो दिव्यों का वर्णन किया है जब कि याज्ञवल्क्य ने पांच दिव्यों का वर्णन किया है। दार्शनिक विषयों के विवेचन में याज्ञवल्क्य और मनुस्मृति में समानता है, किन्तु भ्रूणविज्ञान याज्ञवल्क्यस्मृति में नवीन विषय है, जिसे कीथ ने किसी आयुर्वेदिक ग्रन्थ से लिया हुआ माना है। याज्ञवल्क्यस्मृति मनुस्मृति की अपेक्षा छोटी है। मनुस्मृति में २७०० श्लोक हैं, जबकि याज्ञवल्क्यस्मृति में लगभग एक हजार श्लोक हैं। शैली की दृष्टि से याज्ञवल्क्यस्मृति संक्षिप्त है और प्रवाहमय है। प्रो० काणे ने यह संभावना व्यक्त की है कि याज्ञवल्क्यस्मृति के रचयिता के सामने रचना करते समय मनुस्मृति रही होगी, कारण अनेक स्थलों पर दोनों स्मृतियों में समान शब्द पाये जाते हैं। किन्तु जैसा कि ऊपर निर्देश किया जा चुका है याज्ञवल्क्य एक मौलिक विचारक और धर्मशास्त्रकार हैं। वे पहले के आचार्यों का पिष्टपेषण मात्र नहीं करते, अपितु देशकाल के परिवर्तनों के साथ परिवर्तित मान्यताओं को प्रस्थापित करते हैं और अपने पूर्ववर्ती मनु से कई स्थलों पर सहमत नहीं होते। भाषा की दृष्टि से याज्ञवल्क्यस्मृति पाणिनि के नियमों का पालन करती है। एकाध शब्द अपवाद भी मिल जाते हैं। पूर्ववर्ती साहित्य से सम्बन्ध— याज्ञवल्क्यस्मृति में वेद, वेदांगों, आरण्यकों, उपनिषदों, पुराणों, इतिहास, नाराशंसी के साथ-साथ स्वयं याज्ञवल्क्यप्रणीत बृहदारण्यक और योगशास्त्र का उल्लेख है। आरम्भ में उन्नीस धर्मशास्त्रकारों के नाम गिनाये गये हैं। पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ १. भारतीय साहित्य, अनु० उमेशचन्द्र पाण्डेय, पृ० २७८ ।

( ३० ) मन्वत्रिविष्णुहारीत याज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः । यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती ॥ पराशरव्यासशङ्खलिखिता दक्षगौतमौ । शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः ॥ १. ३-५॥ आन्वीक्षिकी अर्थात् दर्शनशास्त्र एवं दण्डनीति का उल्लेख भी हुआ है— श्वरन्ध्रगोप्ताऽऽन्वीक्षिक्यां दण्डनीत्यां तथैव च। विनीतस्त्वथ वार्तायां त्रय्यां चैव नराधिपः ॥ १. ३११॥ सूत्रों, स्मृतियों, धर्मशास्त्रों का नामतः उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु सामा- न्यतः इनकी चर्चा याज्ञवल्क्यस्मृति में मिलती है। याज्ञवल्क्यस्मृति में शुक्लयजुर्वेद की वाजसनेयी-संहिता के अनेक मन्त्रों का उल्लेख है और विवेचित विषयों की दृष्टि से पारस्करगृह्यसूत्र से भी इसका संबन्ध है। पो० काणे के अनुसार "स्मृति के कुछ अंश बृहदारण्यकोपनिषद् के केवल अन्वय मात्र हैं।" इस प्रकार याज्ञवल्क्यस्मृति का संबन्ध याज्ञवल्क्य के नाम से ख्यात रचनाओं के साथ तथा शुक्ल यजुर्वेद की परम्परा के साथ भी दिखाई पड़ता है। गरुडपुराण और अग्निपुराण में याज्ञवल्क्यस्मृति के समान बहुत सी बातें उपलब्ध होती हैं। शंखलिखितधर्मसूत्र में भी याज्ञवल्क्य का उल्लेख है। विद्वानों का विचार है कि याज्ञवल्क्यस्मृति का मुख्य स्मृतिभाग ७०० ई० से अपरिवर्तित चला आ रहा है।¹ याज्ञवल्क्यस्मृति का समय— याज्ञवल्क्यस्मृति के समय के विषय में वेबेर का मत है : "इस रचना के लिए प्राचीनतम सीमा दूसरी शताब्दी ई० के आसपास की मानी जा सकती है, कारण, इसमें मुद्रा के अर्थ में नानक शब्द का प्रयोग है और जैसा कि विल्सन ने अनुमान किया है यह शब्द कनेर्कि के सिक्कों से लिया गया है, जिसने ४० ई० में शासन किया था। दूसरी ओर इस समय की निचली सीमा छठीं या सातवीं शताब्दी रखी जा सकती है, कारण, विल्सन के अनुसार इस स्मृति के अंशों को भारत के अनेक भागों में शिलालेखों में उद्धृत किया गया है।² याकोबी ने याज्ञवल्क्यस्मृति का समय बारह ग्रहों की संख्या के आधार पर चतुर्थ शताब्दी ई० के बाद माना है।³ प्रो० काणे ने याज्ञवल्क्यस्मृति के समय के विषय में जो निष्कर्ष निकाले हैं उनके अनुसार इस स्मृति के समय की निचली सीमा नवीं शताब्दी के बाद की नहीं हो सकती। कारण— २. काणे, वही, पृ० ५१ । १. भारतीय साहित्य, अनु० उमेशचन्द्र पाण्डेय, पृ० २७८ । ३. वही, पृ० २७८, टिप्पणी २ ।

१ टीकाकार विश्वरूप नवीं शताब्दी के हैं। २. विश्वरूप ने अपने पहले के कई भाष्यकारों का उल्लेख किया है, जिन्होंने याज्ञवल्क्यस्मृति पर टीकायें लिखी हैं। ३. शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र के भाष्य में याज्ञवल्क्यस्मृति ३. २२६ का निर्देश किया है। अतः 'याज्ञवल्क्यस्मृति को हम ई० पू० पहली शताब्दी तथा ईसा के बाद की तीसरी शताब्दी के बीच कहीं रख सकते हैं।'१ वर्णित विषय— याज्ञवल्क्यस्मृति का आरम्भ मुनियों के प्रश्न से होता है। योगीश्वर याज्ञवल्क्य मिथिला को सुशोभित कर रहे थे। मुनियों ने उनकी पूजा की और कहा कि आप वर्णों, आश्रमों और दूसरे (अनुलोम, प्रतिलोम, संकर जातियों) का धर्म हमें पूरी तरह से समझाइये। योगीश्वरं याज्ञवल्क्यं संपूज्य मुनयोऽब्रुवन् । वर्णाश्रमेतराणां नो ब्रूहि धर्मानशेषतः ॥ १।१॥ और तब याज्ञवल्क्य उस देश में किये जाने वाले धर्म का प्रतिपादन करते हैं, जिस देश में काले मृग स्वच्छन्द विचरण करते हैं। यस्मिन् देशे मृगः कृष्णस्तस्मिन्धर्मान्निबोधत ॥ इस उपक्रम के बाद याज्ञवल्क्यस्मृति आरम्भ होती है, और बीच-बीच में पृच्छालु मुनिगण शंका करते हैं जिनका समाधान याज्ञवल्क्य करते चलते हैं। यह स्मृति लगभग समान विस्तार के तीन अध्यायों में विभक्त है। संक्षेप में इस स्मृति में वर्णित विषयों को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है— आचाराध्याय—चौदह विद्याएं, एवं धर्म के उपादान। संस्कार-जन्म से विवाह तक। उपनयन और उसका समय। ब्रह्मचारी के कर्त्तव्य एवं निषिद्ध कर्म। विवाह, विवाह की योग्यता, सपिण्ड संबन्ध का नियम। अन्तर्जातीय विवाह, आठ प्रकार के विवाह। क्षेत्रज पुत्र और पुनर्विवाह। गृहस्थ के कर्त्तव्य। पंच महायज्ञ, अतिथि सत्कार, मधुपर्क। चारों वर्णों के कर्त्तव्य। आचार के दस सिद्धान्त, गृहस्थ की जीवनवृत्ति। स्नातक के कर्त्तव्य। अनध्याय, भक्ष्याभक्ष्य का नियम, पवित्रीकरण के नियम। दान के नियम, पात्र एवं वस्तुएँ। श्राद्ध के नियम, इसका समय, श्राद्ध में बुलाने जाने योग्य ब्राह्मण, श्राद्ध की विधि एवं दक्षिणा। ग्रह शान्ति। राजधर्म और दण्ड। व्यवहाराध्याय—न्याय करने वाले व्यक्ति, न्याय करने वाली परिषद् के सदस्य। जमानत, ब्याज की दर, ऋण, बन्धक के प्रकार। साक्षी की पात्रता, शपथ, लेखप्रमाण। दिव्य। धन का विभाजन, स्त्री का भाग, पुत्रों के प्रकार और १. काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, अनु० आचार्य काश्यप, पृ० ५३।

( ३२ ) उनमें विभाजन के नियम, स्त्रीधन, स्वामी और भृत्य के विवाद, दास्य के नियम । मजदूरी । जुआ, मानहानि और व्यभिचार आदि जैसे अपराधों का दण्ड । प्रायश्चित्ताध्याय-अशौच के नियम, मृत के संस्कार, तर्पण । जन्मविषयक अपवित्रता । विपत्ति में आचार और जीविका निर्वाह । वानप्रस्थ के नियम, यति के नियम । गर्भ में शिशु का विचार और मानव शरीर रचना, आत्मा का जन्म क्यों ? योगी की अमरता का रहस्य । आत्मज्ञान के साधन । रोगव्याधियाँ, नरक, महापातक, उपपातक और इनके प्रायश्चित्त । दस 'यम एवं नियम । सान्तपन, महासान्तपन, तप्तकृच्छू, पराक, चान्द्रायण, एवं अन्य व्रत । टीकाकार और संस्करण— याज्ञवल्क्यस्मृति पर मुख्य चार टीकाकारों की टीकाएं हैं, वे हैं : विश्वरूप, विज्ञानेश्वर, अपरार्क और शूलपाणि । विश्वरूप की बालकीडा नाम की टीका गणपतिशास्त्री ने त्रिवेन्द्रम संस्कृत ग्रन्थमाला में प्रकाशित की है । मिताक्षरा में इस टीका का उल्लेख है । विश्वरूप का समय ७५० ई० तथा १००० ई० के बीच का है । विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है । इसके विषय में म० म० काणे ने ठीक ही कहा है : "यह ग्रन्थ उतना ही प्रभाव- शाली माना जाता रहा है जितना व्याकरण में पतंजलि का महाभाष्य एवं साहित्यशास्त्र में मम्मट का काव्यप्रकाश । विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में अपने पूर्व के लगभग दो सहस्र वर्षों से चले आये हुए मतों का सारतत्त्व ग्रहण किया और ऐसा रूप खड़ा किया जिसके प्रकाश में अन्य मतों और सिद्धान्तों का विकास हुआ ।'१ इस टीका की रचना का समय १०७०-११०० ई० का माना जाता है । याज्ञवल्क्यस्मृति पर तीसरी प्रमुख टीका अपरादित्य की है । यह आनन्दाश्रम प्रेस पूना से प्रकाशित है और अपरार्क-धर्मशास्त्र-निबन्ध नाम से अभिहित है । मिताक्षरा की अपेक्षा यह बड़ी है और इसमें अन्य धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों से बहुत अधिक उद्धरण लिए गये हैं और पुराणों के अंश भी उद्धृत किये गये हैं । अपरार्क की तिथि ११००-१२०० ई० के बीच होने का अनुमान किया जाता है । बंगाल के धर्मशास्त्रकार शूलपाणि की टीका है दीपकलिका, जो छोटे आकार की है । इसमें मिताक्षरा और विश्वरूप के मतों का उल्लेख है । शूलपाणि का समय चौदहवीं शताब्दी के अन्तिम पाद से आरम्भ कर पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के बीच माना जा सकता है । याज्ञवल्क्यस्मृति के अनेक संस्करण हुए हैं । प्रमुख हैं : निर्णयसागर संस्करण, त्रिवेन्द्रम संस्करण और आनन्दाश्रम संस्करण । इन संस्करणों में श्लोकों की संख्या में कुछ भिन्नता है । याज्ञवल्क्य याज्ञवल्क्यस्मृति का संबन्ध याज्ञवल्क्य ऋषि से है । वैदिक ऋषियों की परम्परा में याज्ञवल्क्य का महत्वपूर्ण स्थान है, जिसके अनुसार याज्ञवल्क्य १. काणे, वही, पृ० ७२ ।

( ३३ ) मुख्यतः शुक्लयजुर्वेद और शतपथब्राह्मण के द्रष्टा हैं। शतपथब्राह्मण में भी याज्ञवल्क्य के विषय में अनेक आख्यान आये हैं और इनमें याज्ञवल्क्य के विचारों को मान्यता दी गयी है। ११।३।१।२ में वे जनक को अग्निहोत्र यज्ञ समझाते हैं और स्वयं जनक से गूढ़ यज्ञिय क्रिया का ज्ञान प्राप्त करते हैं। ११।६।३ में. याज्ञवल्क्य और शाकल्य के शास्त्रार्थविवाद का वर्णन है, जिसमें देवताओं की संख्या के विषय में विचार किया गया है और अन्त में याज्ञवल्क्य के एकेश्वर- वाद के सिद्धान्त को स्वीकारा गया है। परन्तु याज्ञवल्क्य अपने प्रतिद्वन्द्वी शाकल्य को उनकी हठधर्मिता के कारण शीघ्र मृत्यु प्राप्त करने का शाप देते हैं। याज्ञवल्क्य को अनेक यज्ञों का उद्घोषक माना गया है। शतपथब्राह्मण के अतिरिक्त याज्ञवल्क्य का नाम किसी अन्य वैदिक ग्रन्थ में नहीं आता। शांखायन आरण्यक में दो स्थलों पर याज्ञवल्क्य का उल्लेख है किन्तु उन अंशों को विद्वानों ने शतपथब्राह्मण से उद्धृत माना है।१ याज्ञवल्क्य शुक्ल यजुर्वेद, शतपथब्राह्मण तथा बृहदारण्यकोपनिषद् के प्रणेता या उद्घोषक थे इस विषय में प्रायः सन्देह व्यक्त किया गया है। शुक्ल यजुर्वेद की संहिता वाजसनेयी-संहिता कहलाती है और यह नाम याज्ञवल्क्य की उपाधि वाजसनेय के आधार पर पड़ा है। यदि याज्ञवल्क्य इस संहिता के उद्घोषक न भी हों तो भी उन्हें संकलनकर्ता मानने में कोई आपत्ति नहीं। इसी प्रकार शतपथब्राह्मण का भी प्रचुर अंश सीधे याज्ञवल्क्यरचित है और शेष अंश को आधिकारिक रूप देने के लिए उनका नाम संबद्ध कर दिया गया है, ऐसी संभावना की जाती है। अतः जैसा कि जे० डाउसन ने कहा है : "यह मानने में कोई आपत्ति नहीं है कि शतपथब्राह्मण की रचना उनके अधीक्षण में या उनके शिष्यों द्वारा की गयी थी।"२ शतपथब्राह्मण से संबद्ध बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य एक यज्ञक्रिया के आचार्य की अपेक्षा दार्शनिक के रूप में दिखायी पड़ते हैं। इस उपनिषद् में याज्ञवल्कीय काण्ड नाम का अंश विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसमें याज्ञवल्क्य की प्रशस्ति है और उनके आत्मविषयक दार्शनिक विचारों का संग्रह है। इस उपनिषद् में याज्ञवल्क्य का जिस प्रकार उल्लेख किया गया है उससे स्पष्ट है कि यह अकेले याज्ञवल्क्य की रचना न होकर उनके शिष्यों और अनुयायियों द्वारा भी रचित है। विण्टरनित्स का इस विषय में यह मत है कि स्वयं बृहदारण्यकोपनिषद् में अन्य आचार्यों का भी उल्लेख है। इसके अतिरिक्त याज्ञिक और तत्त्वचिन्तनविषयक इतने विभिन्न मतों को याज्ञवल्क्य से संबद्ध किया गया है कि उन्हें इन सबका उद्घोषक स्वीकारना कठिन प्रतीत होता है।३

१. मैकडानल एवं कीथ, वैदिक इण्डेक्स, भाग २, पृ० १८९ । २. ए क्लासिकल डिक्शनरी आफ हिन्दू माइथोलोजी, पृ० ३७२ । ३. हिस्ट्री आफ इण्डियन लिटरेचर, भाग १, पृ० २४६, टिप्पणी ।

( ३४ ) बृहदारण्यकोपनिषद् ६।५।३ में उन्होंने मैत्रेयी को आत्मा के विषय में तथा अमरता के बारे में जो व्याख्यान दिये हैं वे भारतीय दर्शन में उत्कृष्ट कोटि के चिन्तन के परिचायक हैं। इस उपनिषद् के तीसरे और चौथे अध्यायों के प्रायः सभी ब्राह्मणों में याज्ञवल्क्य किसी न किसी आचार्य से दार्शनिक विवेचन करते हुए दिखाई पड़ते हैं, जैसे जनक, अश्वल, आर्तभाग, भुज्यु, कोहल, गार्गी, आरुणि या शाकल्य से । महाभारत में याज्ञवल्क्य युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर उपस्थित दिखाये गये हैं, यह कुछ विचित्र प्रतीत होता है। याज्ञवल्क्य-रचित एक योगशास्त्र का भी उल्लेख कूर्मपुराण १।२५-२७ में मिलता है और विण्टरनिट्स का विचार है कि यह याज्ञवल्क्यगीता का निर्देश करता है जिसमें योग की व्याख्या की गयी है ।१ प्रश्न उठता है : क्या वैदिक परम्परा के ऋषि याज्ञवल्क्य ही प्रस्तुत याज्ञ- वल्क्यस्मृति के प्रणेता हैं ? प्रश्न सकारण है। वैदिक ग्रन्थों की भाषाशैली से स्मृति की भाषा और शैली नितान्त भिन्न है और इनमें समय की दृष्टि से सामीप्य नहीं है, और शायद इसी तथ्य को दृष्टिगत करके मिताक्षरा टीका के लेखक विज्ञानेश्वर ने स्पष्ट संकेत किया है कि याज्ञवल्क्य के किसी शिष्य ने धर्मशास्त्र को संक्षिप्त करके वर्तमान रूप प्रदान किया है। परन्तु स्वयं याज्ञवल्क्य- स्मृति ( ३. ११० ) में इस बात की घोषणा की गई है कि इस स्मृति के प्रणेता आरण्यक अर्थात् बृहदारण्यकोपनिषद् के रचयिता हैं और उन्हें सूर्य ने ज्ञान प्रदान किया, तथा वे योगी थे- ज्ञेयं चारण्यकमहं यदादित्यादवाप्तवान् । योगशास्त्रं च मत्प्रोक्तं ज्ञेयं योगमभीप्सता ॥ याज्ञवल्क्य के साथ इस स्मृति का संबन्ध संभवतः इसे महत्ता प्रदान करने के लिए जोड़ा गया है । किन्तु एक बात निर्विवाद है और वह यह कि शुक्ल यजुर्वेद की परम्परा से इस स्मृति का संबन्ध है, इस तथ्य पर यहाँ हमने याज्ञवल्क्यस्मृति का परिचय देते समय प्रकाश डाला है । बृहदारण्यकोपनिषद् ६।३।१५ में याज्ञवल्क्य को उद्दालक आरुणि का शिष्य बताया गया है और राजा जनक के साथ इनके संबन्धों के कारण इन्हें विदेह का निवासी कहते हैं, किन्तु मैकडानल और कीथ के मत में यह सन्देहास्पद है- ‘Despite the legend of Janaka’s patronage of him, his association with Uddalaka, the Ku'ru Pancala renders this doubtful.’ -वैदिक इण्डेक्स, भाग २, पृ० १८९ । शतपथब्राह्मण के अन्त में ( १४।९।४।२९ आदि ) आचार्यों की जो सूची दी गयी है उसमें याज्ञवल्क्य ४५ वें स्थान पर आते हैं और उसमें भी उनके गुरु का १. विण्टरनिट्स, वही, भाग १, पृ० ५७४, टिप्पणी ।

( ३५ ) नाम उद्दालक आरुणि है। जहाँ तक याज्ञवल्क्य के समय का प्रश्न है वे परवर्ती संहिताओं और ब्राह्मणों के काल के ऋषि हैं। किसी भी स्थिति में वे पाणिनि के पहले के हैं। याज्ञवल्क्यविषयक ब्राह्मणीय आख्यानों का विवेचन प्रस्तुत लेखक ने अपने शोधग्रन्थ ‘द लेजेण्ड्स इन द शतपथब्राह्मण’ में किया है । योगियाज्ञवल्क्य एवं बृहद् याज्ञवल्क्य नाम की याज्ञवल्क्य की रचनाओं के विषय में डा० काणे ने अपने धर्मशास्त्र के इतिहास में डेकन कालेज संग्रहालय की पाण्डुलिपियों का हवाला दिया है, जिनमें प्रथम में १२ अध्याय और ४९५ श्लोक हैं तथा दूसरे में १२ अध्याय और ९३० श्लोक हैं। वृद्धयाज्ञवल्क्य नाम की स्मृति का भी उल्लेख मिलता है। इससे विश्वरूप ने अपनी टीका में उद्धरण लिए हैं। मिताक्षरा में भी इसका उल्लेख आया है। —उमेशचन्द्र पाण्डेय ४ प्र० या०

( १ ) उपोद्घातप्रकरण

विषयानुक्रम ( टीका में विवेचित महत्त्वपूर्ण विषयों का भी निर्देश इस विषयानुक्रम में किया गया है ) १. आचाराध्याय ( १ ) उपोद्घातप्रकरण मुनियों की जिज्ञासा - १ छः प्रकार का स्मार्त धर्म - २ धर्म के चौदह स्थान - ३ धर्मशास्त्रकार ऋषि - ” धर्म के कारक हेतु - ४ धर्म के ज्ञापक हेतु - ” देश आदि कारक हेतुओं का अपवाद - ५ हेतुविषयक सन्देह का निर्णय - ” ( २ ) ब्रह्मचारिप्रकरण वर्ण - ५ गर्भाधान आदि संस्कार - ६ संस्कार करने का फल - ७ स्त्रियों के संस्कार - ” उपनयन का समय - ” गुरु के धर्म - ” शौच के नियम - ८ प्राजापत्य आदि तीर्थ - ९ आचमन की विधि - ” प्राणायाम - १० सावित्रीजप की विधि - ” अग्निकार्य - ११ अभिवादन की विधि - ” अध्यापन के योग्य व्यक्ति - ” दण्ड इत्यादि का धारण - १२ भिक्षाचरण की विधि - ” भोजन का नियम - १३ ब्रह्मचारी के लिए निषिद्ध कर्म - १३ गुरु, आचार्य आदि के लक्षण - १४ उपाध्याय, ऋत्विक् के लक्षण - ” ब्रह्मचर्य की अवधि - ” उपनयन की समयसीमा - १५ द्विजत्व का कारण - ” वेदाध्ययन का फल - १६ काम्यब्रह्मयज्ञाध्ययन का फल - ” पञ्चमहायज्ञ का फल - १७ नैष्ठिक ब्रह्मचारी के धर्म - १८ ( ३ ) विवाहप्रकरण गुरुदक्षिणा के पूर्व का स्नान - १८ कन्या के लक्षण - २० सपिण्ड का विचार - २१ कन्यावरण का नियम - २२ कन्यादान में वर के नियम - ” द्विजातियों के लिए शूद्रा से विवाह का निषेध - २३ अनुलोमविवाह - ” आठ प्रकार के विवाह - २४ सवर्णा से विवाह में विशेषता - २५ कन्यादान देने वाले - ” कन्याहरण का दण्ड - २६ कन्या के दोष का गोपन - ” नियोग की विधि - २७ व्यभिचारिणी के लिए दण्ड - २८ स्त्रियों की पवित्रता - ” दूसरे विवाह के हेतु - २९

ऋतुकाल का समय ,, ( ६ ) स्नातकधर्मप्रकरण

( ३७ ) पतिव्रता की प्रशंसा ३० जीवनवृत्ति का चुनाव ५४ अधिवेत्ता के लिए दण्ड ,, श्रौतकर्म ५५ स्त्री के धर्म ,, यज्ञ के लिए हीनभिक्षा का निषेध ५६ शास्त्रानुसार दारसंग्रह का फल ३१ आर्थिक अवस्था का विचार ,, ऋतुकाल का समय ,, ( ६ ) स्नातकधर्मप्रकरण स्त्रीगमन के लिए निषिद्ध दिन ,, स्नातक के व्रत ५७ ऋतुकाल के अतिरिक्त स्त्रीगमन ३२ स्नातक का राजादि धन लेना ५८ स्त्रियों का आदर ३५ शारीरिक पवित्रता ५९ स्त्रियों के कर्तव्य ,, स्नातक के औपचारिक कर्म ६० प्रोषितपतिका का कर्तव्य ३६ दान लेने में दोष ६३ पतिहीना का कर्तव्य ३८ उपाकर्म का समय ,, अनेक पत्नियों में सहधर्मिणी ,, उत्सर्जन का समय ६४ पत्नी की मृत्यु पर दूसरा विवाह ३९ अनध्याय के अवसर ,, ( ४ ) वर्णजातिविवेकप्रकरण औपचारिक कर्तव्य ६७ सजातिपुत्र ,, धर्माचरण का आधार ६९ अनुलोमविवाह से उत्पन्न पुत्र ४० विवाद के परित्याग का फल ,, प्रतिलोमविवाह से उत्पन्न पुत्र ४१ स्नान का नियम ७० जाति के उत्कर्ष का नियम ४३ दूसरे की वस्तु के उपयोग का निषेध ,, ( ५ ) गृहस्थधर्मप्रकरण अभोज्य अन्न ,, स्मार्त और श्रौतकर्म की अग्नि ४४ अन्नग्रहण के नियम का अपवाद ७२ गृहस्थ के धर्म ,, ( ७ ) भक्ष्याभक्ष्यप्रकरण योगक्षेम के लिए राजाश्रय ४५ निषिद्ध अन्न ७२ वेद आदि का जप ४६ कतिपय बासी खाद्य वस्तुएँ ७३ पञ्चमहायज्ञ ,, अपेय दूध ७४ भोजन कराने का क्रम ४७ मांसभक्षण के लिए निषिद्ध पक्षी ७५ अतिथियों को भोजन कराने में प्याज आदि का निषेध ७७ वर्ण का विचार ४८ मांसभक्षण का अवसर ७८ वेदपाठी का सत्कार ४९ यज्ञ के अतिरिक्त पशुवध का फल ७९ मधुपर्क के पात्र ,, मांस न खाने का फल ,, सायंकालीन कर्तव्य ५१ ( ८ ) द्रव्यशुद्धिप्रकरण धर्म, अर्थ, काम का संतुलन ,, सोने के पात्रों की शुद्धि ८० मान्य व्यक्ति ५२ यज्ञिय पात्रों की शुद्धि ८१ मार्ग देने योग्य व्यक्ति ,, लेपयुक्त पात्रों की शुद्धि ,, द्विजातियों के कर्तव्य ,, वस्त्रों की सफाई ८२ शूद्र के कर्तव्य ५३ पृथ्वी की शुद्धि ८४ साधारण धर्म ५४ अन्न की शुद्धि ,,

( ३८ ) [बायाँ स्तम्भ] जल और मांस की शुद्धि का विचार ८७ पशुओं के मुख की शुद्धि-अशुद्धि ८८ मुख की शुद्धि ८९ आचमन के अवसर " ( ९ ) दानप्रकरण • ब्राह्मणों का महत्त्व ९० दान की वस्तुएँ ९१ दान के पात्र ९२ गोदान और उसका फल " उभयतोमुखी गोदान ९३ गोदान के तुल्य कर्म ९४ दान की अन्य वस्तुएँ " दान न लेने की प्रशंसा ९६ अयाचित वस्तु को स्वीकार करना " दाता के चरित्र का विचार ९७ वृत्तिनिर्वाह के लिए नियमापवाद " ( १० ) श्राद्धप्रकरण श्राद्ध का अर्थ ९७ पार्वणश्राद्ध का स्वरूप " श्राद्ध के ब्राह्मण ९८ श्राद्ध में वर्जित ब्राह्मण ९९ पार्वणश्राद्ध का प्रयोग १०१ अग्नौकरण १०६ ब्राह्मण भोजन की विधि १०८ पिण्डदान १०९ अक्षय्योदकदान ११० स्वधावाचन " ब्राह्मणप्रार्थना और विसर्जन १११ वृद्धिश्राद्ध ११२ एकोद्दिष्ट कर्म ११३ सपिण्डीकरण ११४ एकोद्दिष्ट का समय १२१ भोज्यवस्तुओं का विशिष्ट फल " श्राद्ध की तिथि के अनुसार फल १२३ नक्षत्र के अनुसार श्राद्ध का फल १२४ श्राद्ध के देवता १२५ [दायाँ स्तम्भ] ( ११ ) गणपतिकल्पप्रकरण विघ्न के कारक हेतु १२६ विघ्न के ज्ञापक हेतु १२७ विघ्न के प्रत्यक्ष लक्षण " विघ्न की शान्ति के लिए कर्म १२८ स्नपन की विधि " उपस्थान के मन्त्र १३२ ग्रहपूजा १३३ महागणपति की पूजा का फल १३४ ( १२ ) ग्रहशान्तिप्रकरण ग्रहयज्ञ १३४ नव ग्रहों के नाम १३५ ग्रहों की मूर्तियों की धातुएँ " ग्रहपूजा की विधि १३६ ग्रहपूजा के मन्त्र " ग्रहपूजा की समिधाएँ " नवग्रहों के भोजन १३७ ग्रहपूजा की दक्षिणा १३८ दुष्टग्रहों की पूजा " ( १३ ) राजधर्मप्रकरण • अभिषिक्त राजा का धर्म १३९ राजा का मन्त्री १४१ राजा का पुरोहित " राजा द्वारा ब्राह्मणों का सत्कार १४२ राजा का लक्ष्य " भूमिदान का लेख्यकरण १४३ लेख्यकरण की विधि " राजा का निवासस्थान १४४ विभागीय अध्यक्षों की नियुक्ति १४५ युद्ध में अपहृत धन का दान " युद्ध में वीरगति " युद्ध में अवध्य व्यक्ति १४६ राजा का दैनिक कार्यक्रम " राजा का विशेष व्यक्तियों से विशेष व्यवहार १४९ प्रजापालन का फल " पीडित प्रजा की रक्षा १५०