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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

॥ श्रीः ॥ काशी संस्कृत ग्रन्थमाला १७८ श्रीमद्योगीश्वरमहर्षियाज्ञवल्क्यप्रणीता याज्ञवल्क्यस्मृतिः विज्ञानेश्वरप्रणीत 'मिताक्षरा' व्याख्यया 'प्रकाश' हिन्दीव्याख्यया च विभूषिता हिन्दीव्याख्याकार डॉ० उमेशचन्द्र पाण्डेय एम० ए०, पी-एच० डी० साहित्यरत्न प्रस्तावना-लेखक श्री नारायण मिश्र, एम० ए० संस्कृत तथा पालिविभाग भारती महाविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी चौखम्भा संस्कृत संस्थान भारतीय सांस्कृतिक साहित्य के प्रकाशक तथा प्रचारक पोस्ट बाक्स नं० ११३९ के. ३७/११६, गोपाल मन्दिर लेन, ( गोलघर समीप मेदागिन ) वाराणसी-२२१००१ ( भारत )

प्रकाशक : चौखम्भा संस्कृत संस्थान, वाराणसी मुद्रक : श्रीगोकुल मुद्रणालय, वाराणसी संस्करण : पञ्चम, वि० सं० २०५० मूल्य : रु० २५०-०० © चौखम्भा संस्कृत संस्थान, वाराणसी इस ग्रन्थ के परिष्कृत तथा परिवर्धित मूल-पाठ एवं टीका, परिशिष्ट आदि के सर्वाधिकार प्रकाशक के अधीन हैं । फोन : ३३३४४५ ग्रन्थ प्राप्तिस्थान चौखम्भा संस्कृत भवन पोस्ट बाक्स नं० ११६० चौक, ( चित्रा सिनेमा के सामने ) वाराणसी-२२१००१ ( भारत ) फोन : ३२०४१४

THE KASHI SANSKRIT SERIES 178


YĀJÑAVALKYASMṚTI Of YOGĪSHWARA YĀJÑAVALKYA With the Mitākṣarā Commentary of VIJÑĀNESHWAR Edited with The ‘Prakash’ Hindī Commentary By Dr. UMESH CHANDRA PĀNDEY M. A., Ph. D., Śāhityaratna Preface by ŚRĪ NĀRĀYAṆA MIŚRA, M. A. Bhāratī Mahāvidyālaya B. H. U., Varanasi. CHAUKHAMBHA SANSKRIT SANSTHAN Publishers and Distributors of Oriental Cultural Literature Post Box No. 1139 K. 37/116, Gopal Mandir Lane ( Golghar Near Maidagin ) VARANASI-221 001 ( INDIA )

© Chaukhambha Sanskrit Sansthan, Varanasi Phone : 333445 Fifth Edition : 1994 Also can be had of CHAUKHAMBHA SANSKRIT BHAWAN Post Box No. 1160 Chowk (Opposite Chitra Cinema) VARANASI-221001 Phone : 320414

प्रस्तावना श्री नारायण मिश्र संस्कृत तथा पालि विभाग : भारती महाविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी श्रुति-स्मृती चक्षुषी द्वे द्विजानां न्याय-वर्त्मनि । मार्गे मुह्यन्ति तद्धीनाः प्रपतन्तिः पथश्च्युताः ॥ (बृहस्पति-स्मृति, संस्कार-काण्ड, श्लो० ११) इस अमर आत्मा को जन्म-जन्मान्तर तक अत्यन्त कठोर तपस्या करने के बाद मानव-शरीर में प्रवेश और उस शरीर के माध्यम से अपने को इस प्रपञ्च से विमुक्त करने का अवसर प्राप्त होता है। परन्तु खेद का विषय है कि मानव-शरीर में गर्भाशय से निःसरण के साथ-साथ ही इस (आत्मा) की कर्त्तव्य-बुद्धि विस्मृति के गर्त में विलीन हो जाती है। जिस उद्देश्य से यह आत्मा मानव-शरीर के अधिगम के लिए कठोर प्रयास करती रहती है उस उद्देश्य की पूर्त्ति आकाश-पुष्पायित सी हो जाती है। इसी कारण से जन्म लेते ही जीवात्मा को पुनः रोना ही पड़ता है। अपने कर्त्तव्य के विस्मरण के कारण जीवात्मा के विलाप का निम्न-लिखित पद्य में बहुत ही मार्मिक रूप में प्रतिपादन किया गया है- जातो मृतश्च कतिधा न कति स्तनानां पीतम्पयो न कलिताः कति मातरो न । उत्पत्य बन्ध-विधुतावधुना यतिष्ये इत्यस्य विप्लवमुपैति बहिर्मनीषा ॥ कर्म चक्र में इस प्रकार अनादि काल से परिभ्रमण-शील जीवात्मा की उपर्युक्त परिदेवना से आर्द्र हृदय वाले परमर्षियों ने अपने ज्ञान-दीप में प्रतिभासमान परम्परागत अखण्ड ज्ञान-राशि-स्वरूप वेद को जीवात्मा के कर्त्तव्य के परिज्ञान के लिए अभिव्यक्त किया। परन्तु वेद भी कुछ ही विवेकी पुरुषों के लिए उपयोगी सिद्ध हुआ न कि सर्व-साधारण के लिए। अतः करुणा-प्रवण मनु आदि महर्षियों ने अपने वैदिक-विज्ञान को सर्व-साधारणोपयोगी बनाने के लिए धर्मशास्त्र का निर्माण किया। इस धर्मशास्त्र में धर्म-शासक ऋषि के द्वारा प्रायेण वैदिक-ज्ञान की ही स्मृति होने के कारण इसे (धर्म-शास्त्र को) स्मृति-शब्द से भी अभिहित किया जाता है (धर्मशास्त्रन्तु वै स्मृतिः-मनु० २।१०) । यद्यपि स्मृति-ग्रन्थों में कुछ ऐसे भी तत्त्व हैं जो वर्त्तमान वेद में उपलब्ध नहीं होते तथाऽपि उन तत्त्वों के वैदिक-ज्ञान पर ही निर्भर होने का अनुमान किया जाता है।¹ यद्यपि धर्म के प्रतिष्ठित व्याख्याता जैमिनि ने यह भी माना है १. द्रष्टव्य—"श्रुति-स्मृति-विरोधे तु श्रुतिरेव गरीयसी।"— जाबाल-स्मृति "श्रुत्या सह विरोधे तु बाध्यते विषयं विना।"—भविष्य-पुराण —मनु. २।१३ की व्याख्या में कुल्लूकभट्ट द्वारा उद्धृत । २ या० भू०

( २ ) कि यदि स्मृति में कहीं वेद-विरुद्ध विषय हो तो उसे प्रमाण नहीं मानना चाहिए ( 'विरोधे त्वनपेक्षम् ०" जै० सू० १।३।३॥ ) तथापि विचार करने पर यह प्रतीत होता है कि यदि वर्त्तमान वेद में अनुपलब्ध परन्तु अविरुद्ध स्मार्त्त-मत के मूल- भूत वैदिक-विधि का अनुमान हो सकता है तो क्या वर्त्तमान-वेद-विरुद्ध स्मार्त्तसिद्धान्तों से उनके मूल-भूत वेद का अनुमान नहीं किया जा सकता है ? वेदोक्तियों में आपन्न परस्पर विरोध तो विकल्प में ही पर्यवसन्न होता है न कि उससे वेद पर कुछ आक्षेप माना जाता है, जैसा मनु ने भी कहा है-- श्रुति-द्वैधं तु यत्र स्यात् तत्र धर्मावुभौ स्मृतौ । उभावपि हि तौ धर्मौ सम्यगुक्तौ मनीषिभिः ॥ ( मनु० २।१४ ) स्मृति ( धर्म-शास्त्र ) का प्रतिपाद्य विषय धर्म-शास्त्र के प्रतिपाद्य-विषय का संकेत आङ्गिरस स्मृति में इस प्रकार किया गया है— “यत्पूर्वमृषिभिः प्रोक्तन्धर्म-शास्त्रमनुत्तमम् । तत्प्रमाणन्तु सर्वेषाँल्लोक-धर्मानुवर्णनम् ॥” (आङ्गिरस-स्मृति १।८) इसका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण, १ क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र एवम् वर्ण-सङ्कर के आजीवन कर्त्तव्य का अनुविधान ही धर्मशास्त्र का लक्ष्य है । इसी से यह भी स्पष्ट है कि 'धर्म-शास्त्र' शब्द में प्रयुक्त 'धर्म' शब्द का अर्थ क्या है । विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में धर्म का विभाजन निम्न-लिखित रूप में किया है—"अत्र च धर्मशब्दः षड्विध-स्मार्त-धर्म-विषयः । तद्यथाः-वर्ण-धर्मः, आश्रम-धर्मः, वर्णाश्रम-धर्मः, गुण-धर्मः निमित्त-धर्मः, साधारण-धर्मश्चेति । ( मिताक्षरा—१।१ ) । ( १ ) वर्ण-धर्म का निर्देश भगवद्गीता में बहुत ही स्पष्ट रूप में किया गया है । श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार ब्राह्मण-वर्ण के धर्म ये हैं- शमो दमः तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्म-कर्म स्वभावजम् ॥ ( गीता-१८।४२) श्रीमद्भागवत ने ब्राह्मण-वर्ण के धर्म का परिगणन निम्नोक्त रूप में किया है— शमो दमः तपः शौचं सन्तोषः क्षान्तिरार्जवम् । १. “भगवन्सर्व-वर्णानां यथावदनुपूर्वशः । अन्तर-प्रभवाणां च धर्मान्नो वक्तुमर्हसि ॥”—मनु० सं १।२ “वर्णाः ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्राः ।......तेषाम् अन्तर-प्रभवाणां च सङ्कीर्ण-जातीनां चापि अनुलोभ-प्रतिलोमजानां च अम्बष्ठ-क्षत्तृ-कर्ण-प्रभृतीनां.........यथावत् यो धर्मो यस्य वर्णस्य येन प्रकारेणार्हतीत्यनेन आश्रम-धर्मादीनामपि प्रश्नः ।’ —मन्वर्थ-मुक्तावली १।२ “वर्णाश्रमेतराणां हि ब्रूहि धर्मानशेषतः” ! —या० स्मृ० १।२

( ३ ) ज्ञानं दयाऽच्युतात्मत्वं सत्यञ्च ब्रह्म-लक्षणम्¹ ॥ (श्रीमद्भागवत-७।११।२१) मनु का कथन निम्न-लिखित है— अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानम्प्रतिग्रहञ्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥ (मनु० १।८८) क्षत्रिय-धर्म का गीतोक्त स्वरूप निम्न-निर्दिष्ट है— शौर्यं तेजो धृतिः दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वर-भावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ (गीता-१८।४३) श्रीमद्भागवतोक्त क्षात्र-धर्म अधोलिखित हैं— शौर्यंॱवीर्यं धृतिस्तेजः त्यागश्चात्म-जयः क्षमा । ब्रह्मण्यता प्रसादश्च सत्यञ्च क्षत्र-लक्षणम् ॥ (श्रीमद्भागवत-७।११।२२) मनूक्त क्षत्रिय-धर्म का स्वरूप इस प्रकार है— प्रजानां रक्षणन्दानमिज्याध्ययनमेव च । विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियाणां समासतः ॥ (मनु० १।८९) वैश्य-धर्म का वर्णन गीता में इस प्रकार किया गया है— कृषि-गौरक्ष्य-वाणिज्यं वैश्य-कर्म स्वभावजम् ॥ (गीता-१८।४४ क ख) श्रीमद्भागवत में वैश्य-धर्म का विवरण निम्न-लिखित रूप में प्रस्तुत किया गया है— देव-गुर्वच्युते भक्तिस्त्रि-वर्ग-परिपोषणम् । आस्तिक्यमुद्यमो नित्यं नैपुण्यं वैश्य-लक्षणम् ॥ (श्रीमद्भागवत ७।११।२३) मनु-प्रतिपादित वैश्य-धर्म का स्वरूप निम्न-निर्दिष्ट है— पशूनां रक्षणन्दानमिज्याध्ययनमेव च। वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥ (मनु० १।९०) शूद्र-धर्म का वर्णन भी गीता में है— परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ (गीता-१८।४४ ग घ) तथा— शूद्रस्य सन्नतिः शौचं सेवाॱस्वामिन्यमायया । अमन्त्र-यज्ञो ह्यस्तेयं सत्यं गो-विप्र-रक्षणम् ॥ (श्रीमद्भागवत-७।११।२४)


१. श्रीमद्भागवत के सभी श्लोक श्रद्धेय डा० सिद्धेश्वर भट्टाचार्य जी के 'The Philosophy of the श्रीमद्भागवत' से उद्धृत किए गये हैं, एतदर्थ मैं उनका ऋणी हूँ। २ प्र० या०

श्लोक में किया गया है—

( ४ ) मनु ने शूद्र के धर्म का विवरण इस प्रकार किया है— एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् । एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ॥ (मनु० १।९१ ) वर्णसङ्कर के धर्म का संक्षिप्त रूप में सङ्कलन श्रीमद्भागवत के निम्नलिखित श्लोक में किया गया है— वृत्तिः सङ्करजातीनां तत्तत्कुल-कृता भवेत् । अ-चौराणामपापानामन्त्यजान्त्यावसायिनाम् ॥ (श्रीमद्भागवत ७।११।१७) याज्ञवल्क्य-स्मृति में वर्ण-धर्म का निरूपण इस प्रकार किया गया है— इज्याऽध्ययनदानानि वैश्यस्य क्षत्रियस्य च । प्रतिग्रहोऽधिको विप्रे याजनाध्यापने तथा ॥ प्रधानं क्षत्रिये कर्म प्रजानाम्परिपालनम् । कुसीद-कृषि-वाणिज्य-पाशुपाल्यं विशः स्मृतम् ॥ शूद्रस्य द्विज-शुश्रूषा तयाऽजीवन् वणिग्भवेत् । शिल्पैर्वा विविधैर्जीवेद्द्विजाति-हितमाचरन् ॥ (याज्ञ० स्मृ० १।११८-२०) (२) आश्रम-धर्म का सम्बन्ध सभी आश्रमों से है। द्विजाति की जीवनावधि को चार भागों में विभक्त किया जाता है। इन आश्रमों के यथाक्रम नाम हैं—ब्रह्म- चर्य, गार्हस्थ्य, वान-प्रस्थ, संन्यास । ब्रह्मचर्याश्रम में वेदाध्ययनादि धर्म माने गये हैं। ब्रह्मचर्याश्रम की अवधि का निरूपण मनु ने निम्न-लिखित पद्य में किया है— षट्त्रिंशदाब्दिकं चर्यं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् । तदार्धिकम्पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव वा ॥ (मनु० ३।१) तीन वेद के अध्ययन के लिए ३६ वर्ष अर्थात् प्रतिवेद के अध्ययन के लिए बारह-बारह वर्षों की अवधि अपेक्षित होती है। अथवा १८ वर्षों तक (प्रतिवेद के अध्ययन के लिए छः-छः वर्षों की अवधि ), किं वा नौ वर्षों ( १ वेद के लिए तीन वर्ष) तक अथवा वेदाध्ययनसमाप्ति-पर्यन्त ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना चाहिए । याज्ञवल्क्य ने कुछ विशेष बतलाया है— प्रतिवेदम्रह्मचर्यं द्वादशाब्दानि पञ्च वा । ग्रहणान्तिकमित्येके ................॥ (या० स्मृ० १।३६ ) ब्रह्म-चर्याश्रम के समापन के अनन्तर द्विजाति के कृत्य का वर्णन याज्ञवल्क्य में निम्नलिखित रूप में पाया जाता है— गुरवे तु वरन्दत्त्वा स्नायाद्वा तदनुज्ञया । वेदं व्रतानि वा पारं नीत्वा ह्युभयमेव वा ॥ अविप्लुत-ब्रह्म-चर्यो लक्षण्यां स्त्रियमुद्वहेत् ॥ (या० स्मृ० १।५१-५२ क ख )

( ५ ) इसी द्वितीय आश्रम को गृहस्थाश्रम कहा जाता है। इसे गृहस्थाश्रम कहने का कारण मनु के व्याख्याकार कुल्लूकभट्ट ने बतलाया है— “कृतदारपरिग्रहो गृहस्थः, गृहशब्दस्य दारवचनत्वात्” (मन्वर्थमुक्तावली-३।२) इस आश्रम का मुख्य धर्म है—पञ्च-महायज्ञ¹। इस प्रसङ्ग में मनु का निम्न- लिखित पद्य स्मरणीय है – वैवाहिकेऽग्नौ कुर्वीत गृह्यं कर्म यथा-विधि । पञ्च-यज्ञ-विधानञ्च पक्तिं चान्वाहिकीं गृही ॥ ( मनु० ३।६७ ) पञ्च-महा-यज्ञ तथा अन्यान्य गृहस्थ-धर्म के विषय में मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य- स्मृति आदि का अवलोकन करना चाहिए। गृहस्थ तथा गार्हस्थ्य का महत्त्व सभी आश्रमियों तथा आश्रमों से अधिक है, जैसा मनु ने कहा है— यथा वायुं समाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व-जन्तवः । तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व आश्रमाः ॥ यस्मात्त्रयोऽप्याश्रमिणो ज्ञानेनान्नेन चान्वहम् । गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ॥ ( मनु० ३।७७-७८ ) इत्यादि । इस आश्रम की अवधि ²आत्म-वार्धक्य-सम्प्राप्ति तथा पौत्रोत्पत्ति आदि मानी जाती है। यद्यपि साधारणतः यह प्रतीत होता है कि पूरी जीवनावधि को समान- समान चार भागों में विभक्त कर प्रथम-भाग को ब्रह्मचर्य में तथा द्वितीय-भाग को गार्हस्थ्य में पर्यवसन्न करना³ चाहिए, तथापि आयु की अवधि के दुर्ज्ञेय होने के कारण ब्रह्मचर्य की पूर्व-प्रतिपादित षट्त्रिंशद् वर्ष आदि एवं गृहस्थाश्रम की आत्म- वार्धक्य आदि अवधि ही शास्त्र-सिद्ध होती है। अत एव कुल्लूकभट्ट का भी कथन है— “आद्यमित्युक्तम्ब्रह्म-चर्य-कालोपलक्षणार्थम् , अनियत-परिमाणत्वादायुषः चतुर्थ- भागस्य दुर्ज्ञानत्वात् । ...........'गृहस्थस्तु यदा पश्येत् ( मनु० ६।२ ) इत्य- नियतत्वात् द्वितीयमायुषो भागमित्यपि गार्हस्थ्य-कालमेव ॥” ( मन्वर्थ-मुक्तावली-४।१ ) इस प्रसङ्ग में एक बात पर ध्यान देना चाहिए कि कुल्लूक-भट्ट आदि ने मनु के श्लोक ( ६।२ ) में 'अपत्यस्यैव चापत्यम्' पाठ मान कर आत्म-वार्धक्य तथा पौत्रो- १. गृहस्थधर्मत्वेऽपि पञ्चयज्ञानामप्रकृष्ट-धर्म-ख्यापनार्थम्पृथङ्निर्देशः । —मन्वर्थ-मुक्तावली ५।१६९ २. गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वली-पलितमात्मनः । अपत्यस्यैव चापत्यं तदाऽरण्यं समाश्रयेत् ॥ —मनु. ६।२ ३. चतुर्थमायुषो भागमुषित्वाऽऽद्यं गुरौ द्विजः । द्वितीयमायुषो भागं कृत-दारो गृहे वसेत् ॥ —मनु. ४।१

( ६ ) त्पत्ति में समुच्चय सा प्रस्तुत किया है परन्तु यह उचित नहीं, क्योंकि पौत्रोत्पत्ति अनिश्चित है, अतः विकल्प ही मानना चाहिए। मनु के 'अपत्यस्यैव चापत्यम्' में च के स्थान में 'वा' पढ़ना चाहिए, यही मत मिताक्षराकार का भी है— “अयं च वन-प्रवेशो जराजर्जर कलेवरस्य जात-पौत्रस्य वा। यथाऽऽह मनुः ( ६।२ )— गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वली-पलितमात्मनः। अपत्यस्यैव वाऽपत्यं तदाऽरण्यं समाश्रयेत् ॥” ( मिताक्षरा-३।४५ ) गृहस्थाश्रम के अनन्तर की अवस्था का नाम १वान-प्रस्थ है। वन-प्रवेश करने का प्रकार निम्नलिखित मनु तथा याज्ञवल्क्य के एकवाक्यत्व से स्पष्ट हो जाता है— सन्त्यज्य ग्राम्यमाहारं सर्वं चैव परिच्छदम् ॥ ( मनु० ६।३ क ख ) सुत-विन्यस्त-पत्नीकस्तया वानुगतो वनम् । वान-प्रस्थो २ब्रह्मचारी साग्निः सोपासनो व्रजेत् ॥ ( या० स्मृति० ३।४५ ) इस आश्रम के धर्म मिताक्षरा ( ३।४५ ) में उद्धृत वसिष्ठ-स्मृति में इस प्रकार वर्णित किए गये हैं— “वानप्रस्थो जटिलः चीराजिन-वासा न फाल-कृष्टमधितिष्ठेत् (कृष्ट-क्षेत्रस्योपरि न निवसेत्—मिताक्षरा ); अकृष्टं मूल-फलं सञ्चिन्वीत, ऊर्ध्व-रेताः दमाशयो दद्यादेव न प्रतिगृह्णीयात् ऊर्ध्वं पञ्चभ्यो मासेभ्यः श्रावाणकेन (वैदिकेन मार्गेण न लौकिके- नेत्यर्थः-मिताक्षरा ) अग्निमाधाय आहिताग्निः वृक्ष-मूलको दद्यात् देव-पितृ- मनुष्येभ्यः स गच्छेत् स्वर्गमानन्त्यम् ।” इस आश्रम के धर्म का विशद वर्णन तो मनुस्मृति आदि में देखना चाहिए। वान-प्रस्थ आश्रम की अवधि राग-क्षय है। इस विषय में मनु का कथन निम्न-निर्दिष्ट है— वनेषु च विहृत्यैवं तृतीयं भागमायुषः ॥ ( मनु० ६।३३ ) इसकी व्याख्या में कुल्लूक-भट्ट ने स्पष्ट किया है—“अनियतपरिमाणत्वा- दायुषस्तृतीयभागस्य दुर्विज्ञानात् तृतीयमायुषो भागमिति रागक्षयावधि वान-प्रस्थकालोपलक्षणार्थम् । अत एव शङ्खलिखितौ—वन-वासादूर्ध्वं शान्तस्य परिगतवयसः पारिव्राज्यम्—इत्याचख्यतुः ।” अतएव विज्ञानेश्वर ने भी कहा है :—“यावता कालेन तीव्र-तपः-शोषित-वपुषो विषय-कषाय-परिपाको १. वने प्रकर्षेण नियमेन च तिष्ठति चरति इति वन-प्रस्थः, वन-प्रस्थ एव वान-प्रस्थः । संज्ञायां दैर्घ्यम्-मिताक्षरा ३।४५ २. ब्रह्म-चारी = ऊर्ध्वरेताः, साग्निः = वैतानाग्नि-सहितः । —मिताक्षरा

( ७ ) भवति पुनश्च मदोद्भवाऽऽशङ्का नोद्भाव्यते तावत्कालं वन-वासं कृत्वा······" ( मिताक्षरा ३।५६-५७ ) इस तृतीय आश्रम के अनन्तर काल में— ‘चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा सङ्गान्परिव्रजेत् ।’ मनु० ६।३३ इस परिव्राजकाश्रम में केवल ब्राह्मण का अधिकार है। दूसरे मत के अनुसार सभी द्विजातियों का अधिकार माना जाता है (मिताक्षरा ३।५६-५७)। प्रव्रजन के बिना मोक्ष के अभाव को मानने वाले मिताक्षराकार (३।५५) द्वितीय मत को ही अच्छा समझते हैं—ऐसा प्रतीत होता है। इस आश्रम के धर्मों का दिग्दर्शन याज्ञवल्क्य के अधोलिखित पद्य में होता है— सर्व-भूत-हितः शान्तस्त्रिदण्डी सकमण्डलुः । एकारामः परिव्रज्य भिक्षार्थी ग्राममाश्रयेत् ॥ या० स्मृ० ३।५८ इस आश्रम-धर्म का सम्बन्ध केवल द्विजातियों से है। साथ ही सभी आश्रमों में व्युत्क्रम नहीं होता है; हाँ, उल्लङ्घन हो सकता¹ है। इस विषय में भागवत के विशिष्ट विचार का अवलोकन डा० सिद्धेश्वर भट्टाचार्यकृत ‘The Philosophy of the श्रीमद्भागवत’ (पृ० ३४) में करना चाहिए। श्रीमद्भाग- वत के विचार का मूल तो मनुस्मृति में ही है, जिसका अन्वेषण मनीषियों के लिए असाध्य नहीं है। (३) वर्णाश्रम-धर्म का अर्थ है वर्ण-विशेष के आश्रम-विशेष से सम्बद्ध धर्म। उदाहरणार्थ— ब्राह्मणो बैल्व-पालाशौ क्षत्रियो वाट-खादिरौ । पैलवौदुम्बरौ वैश्यो दण्डानर्हन्ति धर्मतः ॥ ( मनु० २।४५ ) आदि को लिया जा सकता है। (४) गुण-धर्म का अर्थ विज्ञानेश्वर के शब्दों में इस प्रकार किया गया है— “शास्त्रीयाभिषेकादिगुण-युक्तस्य राज्ञः प्रजा-परिपालनादिः” ( मिताक्षरा १।१ ) (५) निमित्त-धर्म का अर्थ प्रायश्चित्त होता है। (६) साधारण-धर्म का वर्णन मनु ने इस प्रकार किया है— धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय-निग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म-लक्षणम् ॥ ( मनु० ६।९२ )


१. ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत् , गृही भूत्वा वनी भवेत् , वनी भूत्वा प्रव्रजेत, यदि वेतरथा ब्रह्म-चर्यादेव प्रव्रजेत् गृहाद्वा वनाद्वा । जाबाल उपनिषत्-४; और भी देखिए—मन्वर्थ-मुक्तावली ६।३८; तथा मिताक्षरा ३।५६-५७ ।

( बृ० स्मृ० संस्कारकाण्ड, श्लो० ३१३ )

( ८ ) बृहस्पति ने मनु-सम्मत कुछ अन्य साधारण-धर्म का उल्लेख किया है :- चतुर्दशान्नमनो दद्याद् वाचं दद्याच्च सूनृताम् । एष साधारणो धर्मः चातुर्वर्ण्योऽब्रवीन्मनुः ॥ ( बृ० स्मृ० संस्कारकाण्ड, श्लो० ३१३ ) याज्ञवल्क्य के अनुसार साधारण-धर्म ये हैं- अ-हिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रिय-निग्रहः । दानं दमो दया क्षान्तिः सर्वेषान्धर्म-साधनम् ॥ ( या० स्मृ० १।१२२ ) बृहस्पति ने साधारण-धर्म का निर्देश निम्न-निर्दिष्ट पद्य में किया है- 'दया क्षमाऽनसूया च शौचानायासमङ्गलम् । अकार्पण्यमस्पृहत्वं सर्व-साधारणानि तु ॥' ( बृ०स्मृति० संस्कारकाण्ड, श्लो० ४८९) बृहस्पति ने इस श्लोक के प्रत्येक पद की व्याख्या भी की है, परन्तु उसका उपस्थापन संक्षिप्त भूमिका में उचित नहीं है। अतः जिज्ञासुओं को संस्कार- काण्ड के श्लोकों (४९० से ५०१ तक) को देखना चाहिए। यहाँ एक प्रश्न उठता है कि यदि स्मृति का लक्ष्य प्रवृत्त-कर्म का ही विवरण है तो इस का शास्त्रत्व ही लुप्त हो जाता है, क्योंकि कोई भी प्रबन्ध तभी शास्त्र कहलाने योग्य होता है यदि वह मनुष्य के सर्वोत्कृष्ट अभ्युदय ( = मोक्ष ) का प्रसाधक हो ( शास्त्रत्वं हित-शासनात् ) । प्रवृत्त-कर्म के अनुष्ठान से मोक्ष की अधिगति तो सम्भव ही नहीं है। अतः प्रवृत्त-कर्म का विधान करने-वाला धर्म-शास्त्र वस्तुतः शास्त्र नहीं है। इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि यद्यपि स्मृति में प्रवृत्त-कर्म का प्रतिपादन है तथाऽपि स्मृति का तात्पर्य प्रवृत्त-कर्म में नहीं है अपि तु प्रवृत्त-कर्म के द्वारा चित्त-शुद्धि कर निवृत्ति-मार्ग की अधिगति में ही। अत एव मनु ने कहा है- विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः । हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तन्निबोधत ॥ (मनु० २।१) यदि राग-द्वेष-हीन होकर मनुष्य किसी भी कर्म का अनुष्ठान करता है तो वह कर्म वस्तुतः प्रवृत्त नहीं है। यदि कथमपि उसे प्रवृत्त भी कहा जाय तब भी उससे निवृत्ति की अधिगति तो निर्बाध ही है। प्रवृत्त-कर्म का अनुष्ठान तो निवृत्त- कर्म की पूर्व-पीठिका है। अतः गीता का भी उपदेश है- न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ स्मृतिकार का भी प्रवृत्त-कर्म के अनुविधान में यही उद्देश्य है। याज्ञ- वल्क्य ने तो स्पष्ट रूप में कहा है-

( ६ ) इज्याचार-दमाहिंसा-दान-स्वाध्याय-कर्मणाम् । अयन्तु परमो धर्मो यद् योगेनात्म-दर्शनम् ॥ ( या० स्मृ० १।८ ) अतः उपर्युक्त आक्षेप निराधार है । धर्म-शास्त्र प्रवर्त्तक ऋषि याज्ञवल्क्यस्मृति में धर्म-शास्त्र-प्रवर्त्तक ऋषियों का नाम-निर्देश निम्न-लिखित श्लोकों में किया गया है— मन्वत्रि-विष्णु-हारीत-याज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः । यम!पस्तम्ब-संवर्ताः कात्यायन-बृहस्पती ॥ पराशर-व्यास-शङ्ख-लिखिता दक्ष-गौतमौ । शातातपो वशिष्ठश्च धर्म-शास्त्र-प्रवर्त्तकाः ॥ (या० स्मृति० १।४-५) इसकी व्याख्या में आदित्य-देव ने एक गौतम-सूत्र को उद्धृत किया है— अत्र ¹गौतमः—स्मृतिधर्म-शास्त्राणि, तेषामप्रणेतारः मनु-विष्णु-दक्षा-ङ्गिरोऽत्रि- बृहस्पत्युशन-आपस्तम्ब-गौतम-संवर्त-आत्रेय-कात्यायन-शङ्ख-लिखित-पराशर-व्यास- शातातप-प्रचेतो-याज्ञवल्क्यादयः ।' ( अपरार्कव्याख्या या० स्मृ० १।४-५ ) शङ्ख-लिखित के कथनानुसार धर्मशास्त्र-प्रणेताओं की सूची निम्न-लिखित है— "तथा च शङ्ख-लिखितौ—स्मृतिधर्म-शास्त्राणि; तेषामप्रणेतारः मनु-विष्णु- यम-दक्षाङ्गिरोऽत्रि-बृहस्पत्युशन-आपस्तम्ब-वसिष्ठ-कात्यायन-पराशर-व्यास-शङ्ख- खित-संवर्त-गौतम-शातातप-हारीत-याज्ञवल्क्य-प्राचेतसादयः" । ( वीरमित्रोदय या० स्मृ०.१।४-५; तथा वी० मि० परिभाषाप्रकाश पृ० १६ ) परन्तु बालम्भट्टी में 'शंखश्च' प्रतीक के अन्तर्गत जो उद्धरण है उसमें मनु, विष्णु, यम, दक्ष तथा अङ्गिरा का उल्लेख नहीं है । प्राचेतसादयः में प्रयुक्त 'आदि' शब्द से ग्राह्य ऋषियों का विवरण बालम्भट्टी में इस प्रकार है— “आदिना बुध देवल-सुमन्तु-जमदग्नि-विश्वामित्र-प्रजापति-पैठीनसि-पितामह- बौधायन-च्छागलेय-जाबाल-च्यवन-मरीचि-कश्यपाः² ॥” ( बालम्भट्टी पृ० ९ ) देवल का निर्देश इस प्रकार है— मनुर्यमो वशिष्ठोऽत्रिर्दत्तो विष्णुस्तथाऽङ्गिराः । उशना वाचस्पतिर्व्यास आपस्तम्बोऽथ गौतमः ॥ कात्यायनो नारदश्च याज्ञवल्क्यः पराशरः । सम्वर्तश्चैव शङ्खश्च हारीतो लिखितस्तथा³ ॥ (बालम्भट्टी पृ० ९) १. वर्त्तमान गौतम-धर्म-शास्त्र में यह अंश उपलब्ध नहीं है । २. कृत्य-रत्नाकर में 'सोम' का नाम इससे अधिक है। कृ० र० पृ० २९ ३. कृत्य-रत्नाकर (पृ. २९) में 'यमः' प्रतीक के अन्दर ये ही श्लोक अविकल रूप में दिये गए हैं ।

( १० ) मार्कण्डेय-स्मृति में मनु, गौतम, कश्यपादि, पराशर, वेद-व्यास, शङ्ख, लिखित तथा कात्यायन का निर्देश किया गया है । ( मा० स्मृ० स्मृति-सन्दर्भ भाग ६, पृ० ६३, कलकत्ता ) ‘चतुर्विंशतिमत’ में याज्ञवल्क्य-निर्दिष्ट २० ऋषियों में से कात्यायन तथा लिखित को छोड़कर अन्य १८ तथा गार्ग्य, नारद, बौधायन, वत्स, विश्वामित्र एवं शंख (शांखायन ?) का निर्देश है। ( म० म० काणे-‘Hisoty of Dharmashashta’ पृ० १३३ ) आपस्तम्बने १० धर्म-शास्त्राचार्यों का निर्देश किया है—एक (किसी ऋषि- विशेष के लिए निर्दिष्ट है), कण्व, काण्व, कुणिक, कुत्स, कौत्स, पुष्करसादि, वार्ष्यायणि, श्वेतकेतु तथा हारीत । बौधायन ने हारीत के साथ-साथ औपजङ्घनि, कात्य, काश्यप, गौतम, प्रजापति, मनु तथा मौद्गल्य का उल्लेख किया है । ( Introduction to the बृहस्पतिस्मृति, P. 88, Footnote-2 ) भारद्वाजस्मृति में भी दिग्दर्शन-क्रम में निम्नलिखित ऋषियों का उल्लेख किया गया है— भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च शाण्डिल्यो रोहितः क्रतुः । हरितो (हारीतो ?) गौतमो गर्गः शङ्खः कालातपोऽङ्गिराः ॥ मार्कण्डेयश्च माण्डव्यः कपिलो नारदः शुकः। जमदग्निर्याज्ञवल्क्यो विश्वामित्रः पराशरः ॥ एते वाऽन्येऽपि मुनयो धर्मज्ञा धर्म तत्पराः ॥ ( भा० स्मृ० १।३-५ ) पराशर-स्मृति का विवरण भी निम्न-लिखित है— श्रुता मे मानवा धर्माः वासिष्ठाः काश्यपास्तथा । गार्गीया गौतमीयाश्च तथा चौशनसाः स्मृताः ॥ अत्रेर्विष्णोश्च संवर्त्ताद्दक्षादाङ्गिरसस्तथा । शातातपाश्च हारीतात् याज्ञवल्क्यात्तथैव च ॥ आपस्तम्बकृता धर्माः शङ्खस्य लिखितस्य च । कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसान्मुनेः ॥ ( पराशरस्मृति-१।१२-१६।) गरुड़-पुराण ( ९३।४-६) में याज्ञवल्क्य के स्थान में अहम् (=गरुड) को रखकर अतिरिक्त ऋषियों का निर्देश याज्ञवल्क्यस्मृति के समान ही किया गया है । अग्निपुराण में तो याज्ञवल्क्य-स्मृति का ही (यत्र तत्र क्रम-परिवर्तन के साथ) रूपान्तर मिलता है— मनुर्विष्णुर्याज्ञवल्क्यो हारीतोऽत्रियंमोऽङ्गिराः । वसिष्ठ-दत्त-संवर्त्त-शातातप-पराशराः ॥ आपस्तम्बौशनो-व्यासाः कात्यायन-बृहस्पती । गोतमः शङ्ख-लिखितौ धर्ममेते यथाऽब्रुवन् ॥ ( अग्निपुराण-अ० १६२, श्लो० १-२)

( ११ ) वर्त्तमान संगृहीत बृहस्पति-स्मृति (बड़ौदा) में यथावसर मनु (पृ० १९, ३९, ८४ आदि), गौतम (पृ० २०८), कात्यायन (पृ० १०६), उशना (पृ० ३०१), बृहस्पति (पृ० ३०१, ५५० आदि), अङ्गिरा (पृ० ३७८), आपस्तम्ब (पृ० ३७८), गर्ग (पृ० २८३), जीव (पृ० २६२), देवेन्द्रगुरु (२८९), पञ्च- शिख (पृ० २३१), पराशर (२३३), पाराशर (पृ० ३२६), पितामह (पृ० ९१), प्रजापति (पृ० ३५८), भार्गव (पृ० २३३), वसिष्ठ (पृ० १०३), व्यास (पृ० ३२०), शंख-लिखित (पृ० २३३), शाकटायन (पृ० ३६३), शौनक (पृ० २२७), स्वयम्भू (पृ० ३०४ आदि) तथा भृगु (पृ० ६६) का निर्देश किया गया है। इन नामों में कुछ का पर्यायत्व भी सम्भावित है। जैसे-बृहस्पति, जीव, देवेन्द्र- गुरु शब्द प्रायशः एक ही व्यक्ति के लिए निर्दिष्ट हुए हैं। इसी प्रकार पितामह तथा प्रजापति शब्द समानार्थक प्रतीत होते हैं। परन्तु निर्णीत रूप में कुछ कहना कठिन है। पैठीनसि ने ३६ स्मृतिकारों का निर्देश किया है- तेषां मन्वङ्गिरो-व्यास-गौतमाऽप्युशनो-यमाः । वसिष्ठ-दक्ष-संवर्त्त-शातातप-पराशराः ॥ विष्ण्वापस्तम्ब-हारीताः शङ्खः कात्यायनो भृगुः । प्रचेता नारदो योगी बौधायन-पितामहौ ॥ सुमन्तुः कश्यपो बभ्रुः पैठीनो व्याघ्र एव च । सत्य-व्रतो भरद्वाजो गार्ग्यः कार्णाजिनिस्तथा ॥ जावालिर्जमदग्निश्च लौगाक्षिर्ब्रह्म-सम्भवः । इति धर्म-प्रणेतारः षट्त्रिंशदृषयस्तथा ॥ (स्मृति-चन्द्रिका पृ० १, वी० मि० परि० प्र० पृ० १५) ये छत्तीस ही स्मृतियाँ हैं या स्मृति-कार हैं ऐसी बात नहीं है। यह तो उप- लक्षण है। अतः स्मृतिचन्द्रिकाकार का कथन है:- "ननु चेयम् परिसंख्या ? मैवम् ; तथा सति वत्स-मरीचि-देबल-पारस्कर- क्रतु-ऋष्यशृङ्ग-शिखर-छागलेयात्रेयादीनां धर्म-शास्त्र-प्रणेतृत्वं न स्यात्”। (स्मृ० च० पृ० १) वीर-मित्रोदय में प्रयोग-पारिजात के कुछ श्लोक उद्धृत हुए हैं जिनमें ३६ स्मृतियों का वर्गीकरण स्मृतियों तथा उपस्मृतियों में हुआ है- मनुर्बृहस्पतिर्दक्षो गौतमोऽथ यमोऽङ्गिराः । योगीश्वरः प्रचेताश्च शातातप-पराशरौ ॥ संवर्त्तोशनसौ शङ्ख-लिखितावत्रिरेव च । विष्ण्वापस्तम्ब-हारीता धर्म-शास्त्र-प्रवर्त्तकाः ॥ एते ह्यष्टादश प्रोक्ताः मुनयो नियत-व्रताः । जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कन्दो लौगाक्षि-काश्यपौ ॥ व्यासः सनत्कुमारश्च सुमन्तुश्च पितामहः ।

( १२ ) व्याघ्रः कार्ष्णाजिनिश्चैव जातूकर्णः कपिञ्जलः ॥ बौधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च । पैठीनसिर्गोभिलश्च उपस्मृति-विधायकाः ॥ यद्यपि उपस्मृति-विधायकों की नामावली का उपसंहार यहीं प्रतीत होता है तथापि और भी २१ स्मृति-कारों का नाम-निर्देश तीन श्लोकों में किया गया है— वसिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः । बभ्रुः कार्ष्णाजिनिः सत्य-व्रतो गार्ग्यश्च देवलः ॥ जमदग्निर्भरद्वाजः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । आत्रेयः छागलेयश्च मरीचिर्वत्स एव च ॥ पारस्कर-ऋष्यशृङ्गौ वैजवापस्तथैव च । इत्यन्ये स्मृति-कर्त्तार एकविंशतिरीरिताः ॥ यद्यपि याज्ञवल्क्य-स्मृति (श्लोक० १।४-५) की व्याख्या में मित्र-मिश्र इन स्मृतियों को स्पष्टतः उपस्मृति नहीं कहते हैं तथापि 'परिभाषा-प्रकाश' (पृ० १८) में इन सभी श्लोकों के बाद "एते एवोपस्मृतिकर्त्तारो मदनरत्ने- प्युक्ताः" कह कर इन सब को उपस्मृति मानने के पक्ष में ही प्रतीत होते हैं। परन्तु 'जावालिनौचिकेताश्च' आदि में परिगणित सुमन्तु, पितामह तथा कार्ष्णा- जिनि का 'वसिष्ठो नारदश्चैव' आदि श्लोकों द्वारा परिगणित २१ स्मृति-कर्त्ताओं में पुनरुल्लेख है। अतः उपस्मृतिकारों की संख्या ३६ होनी चाहिए। एक ही स्थान में पुनरुक्ति का आधार समझ में नहीं आता ! किन्तु उपर्युक्त सूची भी पर्याप्त नहीं है, इसे केवल दिग्दर्शक समझना चाहिए, कारण इनके अतिरिक्त स्मृतिकारों का भी उल्लेख धर्मशास्त्र-निबन्धों में मिलता है। उदाहरणार्थ 'निर्णयसिन्धु' में लग-भग १२५ से भी अधिक स्मृति- कारों के वचन उद्धृत हैं। भविष्यपुराण में भी स्मृतियों की संख्या का निर्देश अस्पष्ट रूप में स्मृतियों के आनन्त्य का ही प्रतिपादक प्रतीत होता है। 'स्मृति-मुक्ताफल' में तो ८८००० ऋषियों को धर्मप्रवर्त्तक बतलाया गया है— अष्टाशीति-सहस्राणि मुनयो गृहमेधिनः । पुनरावर्त्तिनो बीज-भूताः धर्म-प्रवर्त्तकाः ॥ (स्मृति-मुक्ताफल, पृ० ८) इस विचित्र परिस्थिति में सभी स्मृतिकारों का नाम-निर्देश तो असम्भव- प्रायः ही है। डा० काणे ने स्मृति-परम्परा का यथासम्भव विशद् वर्णन अपने ग्रन्थ 'History of Dharma-Shastra' में किया है। इस ग्रन्थ से बहुत स्मृति- कारों का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। याज्ञवल्क्य-स्मृति ( क ) याज्ञवल्क्य परिचय याज्ञवल्क्य-स्मृति शब्द से साधारणतः यह प्रतीत होता है कि यह स्मृति याज्ञवल्क्य के द्वारा बनाई हुई है। महाभारत के शान्तिपर्व के ३१२वें अध्याय

( १३ ) में, शतपथब्राह्मण (१४।९।४।३३) तथा भागवत (१०।६।११-७४) में यह बतलाया गया है कि याज्ञवल्क्य वैशम्पायन के शिष्य थे । वैशम्पायन से उन्होंने विद्या- ग्रहण, विशेषतः यजुर्वेद का अध्ययन, किया था। परन्तु एक समय गुरु-शिष्य में मतभेद के कारण याज्ञवल्क्य ने अपने गुरु की विद्या को वान्त ( Vomitted ) कर दिया और पुनः भगवान् सूर्य की आराधना कर मध्याह्नकाल में सूर्य से यजुर्वेद का अध्ययन किया। इसी यजुर्वेद को 'शुक्ल यजुर्वेद' तथा मध्यन्दिन में सूर्य से अधिगत होने से 'माध्यन्दिन-संहिता' भी कहा जाता है। बृहदारण्यक उपनिषद् में विदेह जनक के गुरु के रूप में भी याज्ञवल्क्य का वर्णन विस्तृत रूप में पाया जाता है। बृहदारण्यक के तृतीय अध्याय में यह बतलाया गया है कि विदेह जनक ने अपने यज्ञ में सभी प्रदेशों के ब्रह्म-ज्ञानियों को आमन्त्रित किया था। सभी के उपस्थित होने पर जनक ने उन सब के समक्ष अपना विज्ञापन किया- “यो वो ब्रह्मिष्ठः स एताः गाः उदजताम्”। जनक के विज्ञापन को सुन कर सभी मौन हो गए थे। कुछ समय के पश्चात् याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्यों से उन गायों को ले जाने के लिए कहा। इस पर सभी क्रुद्ध हो गये और याज्ञवल्क्य के साथ उन सबों का क्रमशः शास्त्रार्थ ( ब्रह्म के विषय में ) हुआ। इस शास्त्रार्थ का स्वरूप वस्तुतः 'जल्प' ( विजिगीषुद्धयस्य कथा जल्पः ) था। जैसा कि जल्प के लक्षण से ही स्पष्ट है, इस कथा में उचित-अनुचित का विवेक नहीं सा रहता है। याज्ञवल्क्य भी इस अपकर्ष से रहित नहीं रह सके। उन्हें भी समय-समय पर त्रास-प्रदर्शन, शाप-दान आदि करना पड़ा। इन्हीं अपकर्षों के कारण विद्यारण्य स्वामी ने अपने जीवन्मुक्ति-विवेक ( पृ० २५७-२६२) में याज्ञवल्क्य के विषय में यह उपसंहार किया है— “तस्मात् किम्बहुना ? ब्रह्मविदां याज्ञवल्क्यादीनामस्त्येव मलिन-वासनाऽ- नुवृत्तिः ।” ( जी० मु० वि० पृ० २६२ ) ( ख ) प्रकृत स्मृति का कर्त्ता प्रकृत स्मृति के कर्त्ता उपर्युक्त याज्ञवल्क्य ही हैं या कोई अन्य व्यक्ति-यह प्रश्न कुछ जटिल सा है। प्राचीन परम्परा के अनुसार बृहदारण्यक के याज्ञवल्क्य ही इस स्मृति के प्रणेता माने जाते हैं। आदित्य देव ने लिखा है—“अस्याश्च संहितायाः याज्ञवल्क्यः प्रणेतेति व्याख्यातॄणां स्मृतिरेव प्रमाणम्” ( अपरार्क १।१)। याज्ञवल्क्य-स्मृति में भी एक श्लोक है जो स्पष्टतः इस स्मृति के कर्त्ता के रूप में बृहदारण्यक के याज्ञवल्क्य को ही प्रस्तुत करता है— ज्ञेयं चारण्यकमहं यदादित्यादवाप्तवान् । योग-शास्त्रञ्च मत्प्रोक्तं ज्ञेयं योगमभीप्सता ॥ (या० स्मृ० ३।११०) परन्तु मिताक्षराकार ने प्रथम श्लोक के अवतरण में लिखा है—“याज्ञवल्क्य- शिष्यः कश्चित्प्रश्नोत्तररूपं याज्ञवल्क्य-प्रणीतं धर्म-शास्त्रं कथयामास” । इस कथन १. अस्ति हि याज्ञवल्क्यस्य ......... भूयान् विद्यामदः । तैः सर्वैरपि विजिगीषु- कथायामप्रवृत्तत्वात् । — जीवन्मुक्तिविवेक पृ. २५७ ( आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थमाला )

( १४ )

के आधार पर प्रा० काणे इस स्मृति को याज्ञवल्क्य-प्रणीत नहीं मानते । उनकी दृष्टि में उपर्युक्त 'ज्ञेयं चारण्यकम्' आदि श्लोक भी रचयिता का कपट-प्रबन्ध मात्र सा प्रतीत होता है। प्रो० काणे ने अपने मत को इस प्रकार प्रस्तुत किया है :— This ( ज्ञेयं चारण्यकमहम् ) is simply put in to glorify the याज्ञवल्क्य- स्मृति as the work of a great and ancient Sage, Philosopher and Yogin. From the style and doctrines of the स्मृति it is impossible to believe that it was the work of the same hand that gave to the world the उपनिषद् containing the boldest philosophical speculation couched in the simplest yet the most effective language. Even orthodox Indian opinion was not prepared to admit the unity of authorship in the case of the स्मृति and the आरण्यक. ( History of Dharmas'āstra, P. 169, Vol. I ) यद्यपि मेरा दुराग्रह नहीं है कि प्राचीन-परम्परा ही सत्य है, तथाऽपि डा० काणे द्वारा उपस्थापित युक्तियों में कुछ प्रबलता नहीं दीख पड़ती है। यदि याज्ञवल्क्य से भिन्न किसी व्यक्ति की यह रचना है तो उस व्यक्ति का नाम इस स्मृति से सर्वथा विलुप्त क्यों हो गया—यह एक समस्या हो जाती है। किसी प्रबल कारण के अभाव में अपनी रचना को दूसरे महा-पुरुष के नाम से प्रसिद्ध कराने में लेखक की प्रवृत्ति को मनो-विज्ञान से समर्थन नहीं सा मिलता है। भाषा के आधार पर दोनों में भेद मानना भी उचित नहीं है, क्योंकि वास्तविक दृष्टि से भाषा का सम्बन्ध व्यक्ति से होता है न कि देश से । अवस्था-भेद के अनुसार एक व्यक्ति की भाषा तथा रीति में परिवर्तन के उदाहरण भी कम नहीं हैं। यदि विज्ञानेश्वर के कथनानुसार याज्ञवल्क्य के किसी शिष्य को ही इस स्मृति का प्रणेता मान लिया जाय तब भी श्रद्धेय प्रो० काणे द्वारा अभिप्रेत भाषा-तारतम्य, रीति-तारतम्य तथा वस्तु-तारतम्य का उचित समाधान प्रायशः असम्भव ही है । दूसरी बात यह भी है कि स्वयम् विज्ञानेश्वर भी इस विषय में व्यामुग्ध ( Confused ) से प्रतीत होते हैं कि इस स्मृति के प्रणेता कौन हैं। पहले तो उन्होंने मान लिया है कि याज्ञवल्क्य के किसी शिष्य ने इस स्मृति की रचना की थी, परन्तु ४-५ श्लोकों की व्याख्या मेंउन्हों ने दो बार “याज्ञवल्क्य-प्रणीतस्य” तथा “याज्ञवल्क्य- प्रणीतम्” कहा है। एवञ्च विज्ञानेश्वर के आधार पर कुछ निर्णय करना तो वाञ्छ- नीय नहीं होना चाहिये। इसके अतिरिक्त आचाराध्याय के द्वितीय श्लोक में— “मिथिलास्थः स योगीन्द्रः” कहा गया है जिससे भी प्राचीन-परम्परा का ही समर्थन होता है। सभी श्लोकों को प्रक्षिप्त या विक्षिप्त मान कर कुछ निर्णय कर लेना कहाँ तक न्याय्य है—यह विचारणीय है। अतः जब तक कुछ सङ्केतु न मिले तब तक केवल हेत्वाभास के आधार पर ही निगमन नहीं करना चाहिए प्रत्युत इस स्मृति के कर्त्ता के विषय में उपस्थित

( ग ) याज्ञवल्क्य स्मृति की श्लोक-संख्या

( १५ ) समस्या का उपसंहार सन्देह में ही करना उचित है। योगि-याज्ञवल्क्य आदि, प्राचीन की दृष्टि में, इस याज्ञवल्क्य से अभिन्न परन्तु नवीनों की दृष्टि में भिन्न, माने जाते हैं। ( ग ) याज्ञवल्क्य स्मृति की श्लोक-संख्या याज्ञवल्क्य-स्मृति की श्लोक-संख्या के विषय में विश्वरूपाचार्य, विज्ञानेश्वर तथा अपरादित्य का मत एक नहीं है। विश्वरूप के अनुसार याज्ञवल्क्य- स्मृति में १००३, विज्ञानेश्वर के मत में १००९ और अपरादित्य की व्याख्या में १००६ श्लोक पाये जाते हैं। व्याख्याओं में अनुपलब्ध परन्तु कुछ मूल पुस्तकों में उपलब्ध—"श्लोकानामपि विज्ञेयं सहस्रं चतुरुत्तरम्” के आधार पर तो मूल-श्लोकों की संख्या १००४ प्रतीत होती है । मित्र-मिश्र ने विज्ञानेश्वर का ही अनुसरण किया है । शूलपाणि ने अपनी व्याख्या में १०१० श्लोक माने हैं । व्याख्यात श्लोकों में विषमता के अतिरिक्त कुछ ऐसे भी श्लोक हैं जिनका सङ्केत केवल मूल पुस्तक में है, किसी भी व्याख्या में नहीं। उदाहरणार्थ, आचाराध्याय में और भी कुछ श्लोक अधिक उपलब्ध होते हैं—२३३ एवं २३४ श्लोकों के मध्य में अर्ध-श्लोक है—"अपहता इति तिलान् विकीर्य च समन्ततः ।” इसी प्रकार ३०८ तथा ३०९ श्लोकों के मध्य में एक श्लोक है— ग्रहाणामिदमातिथ्यं कुर्यात् संवत्सरादपि । आरोग्य-बल-सम्पन्नो जीवेस्स शरदः शतम् ॥ व्यवहाराध्याय के अन्त में भी मूल पुस्तक में निम्न-लिखित तीन श्लोक अधिक हैं— ( १ ) राजभिर्दत्त-दण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ( २ ) एवमुद्धृतदण्डानां विशुद्धिः पापकर्मिणाम् । स्व-धर्म-स्थापनाद्राजा प्रजाभ्यो धर्ममश्नुते ॥ ( ३ ) यत्र दण्ड-विधिर्नोक्तः सर्वैरेव महात्मभिः । देश-कालादि सञ्चिन्त्य तत्र दण्डो विधीयते ॥ इसी प्रकार प्रायश्चित्ताध्याय के अन्त में भी कुछ श्लोक पाये जाते हैं— ( १ ) विप्रेष्वपि विशेषेण धार्या वाजसनेयिकैः । इच्छद्भिः श्रेयसि फलमिह लोकै परत्र च ॥ ( २ ) यदवाप्तं मया देवाद्रादित्याद्वै सनातनम् । तद्वै सर्वमिदम्परोक्तं श्रुति-स्मृत्यभिसम्मतम् ॥ ( ३ ) निःश्रेयस-करं नृणां शास्त्रं देवर्षि-सेवितम् । ज्ञात्वा ये ह्यध्यवस्यन्ति तेऽन संयान्ति वै पुनः ॥ (ये तीन श्लोक मिताक्षरा के ३२७ तथा ३२८ श्लोकों के मध्य में पाये जाते हैं।)

( १६ ) ( ४ ) धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ॥ कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात् प्रजाम् ॥ ( यह श्लोक मिताक्षरा के ३३० तथा ३३१ के बीच में पाया जाता है । ) ( ५ ) निर्जित्य वादे देवान् वै ऋषीन् सर्वानुपस्थितान् । गा बोधेनाहतास्तस्मै नमो ब्राह्मण-हेतवे ॥ ( ६ ) अध्याय-त्रय-संक्षिप्तं सर्वेषां बुद्धि-वर्धनम् । अनुष्टुप्छन्दसा ह्येतत् याज्ञवल्क्येन भाषितम् ॥ ( ७ ) सर्व-पाप-हरं पुण्यं सुप्रसन्नं समञ्जसम् । श्लोकानामपि विज्ञेयं सहस्रं चतुरुत्तरम् ॥ ( ८ ) आदित्यस्य प्रसादेन प्राप्तवान् यो यजुर्गणम् । प्रणमेद्याज्ञवल्क्यं तं पिप्पलादगुरोरलम् ॥ ( ये श्लोक सर्वान्त में पाये जाते हैं । ) यद्यपि कुछ श्लोक तो स्पष्टतः अनावश्यक प्रतीत होते हैं तथापि मूल पुस्तक में उपलब्ध होने के कारण यहाँ उल्लिखित हुए हैं । श्लोक-संख्या में वैषम्य के अतिरिक्त पाठान्तर तो बहुत ही हैं ( विशेषतः बालकीडा मिताक्षरा तथा अपरार्क में ) । यद्यपि प्राचीन ( निर्णयसागर के ) मिताक्षरा-संस्करण में पाठान्तरों का कुछ निर्देश था तथापि प्रस्तुत संस्करण में उसका लोप ही कर दिया गया । इसका कारण प्रकाशक तथा हिन्दी-व्याख्याता ही जानते हैं । म० म० पी० वी० काणे ने कुछ पाठान्तरों का विवेचन भी प्रस्तुत किया है । जिज्ञासुओं को इसके लिए उनका ‘History of Dharma-Shastra’ देखना चाहिए । याज्ञवल्क्य स्मृति का विषय-विवरण सम्पूर्ण याज्ञवल्क्य स्मृति तीन अध्यायों से विभक्त है—आचाराध्याय, व्यवहाराध्याय तथा प्रायश्चित्ताध्याय । प्रथम आचाराध्याय में १३ प्रकरण हैं—( १ ) उपोद्घात-प्रकरण ( श्लो० १-९ ), ( २ ) ब्रह्मचारि-प्रकरण (श्लो० १०-५०), ( ३ ) विवाह-प्रकरण (श्लो० ५१-८९ ), ( ४ ) जाति-वर्ण-विवेक-प्रकरण ( श्लो० ९०-९६ ), ( ५ ) गृहस्थ- धर्म-प्रकरण ( श्लो० ९७-१२८ ), ( ६ ) स्नातक-व्रत-प्रकरण (श्लो० १२९-१६६), ( ७ ) भक्ष्याऽभक्ष्य-प्रकरण ( श्लो० १६७-१८१ ), ( ८ ) द्रव्य-शुद्धि-प्रकरण ( श्लो० १८२-१९७), ( ९ ) दान-धर्म-प्रकरण (श्लो० १९८-२१६), ( १० ) श्राद्ध- प्रकरण ( श्लो० २१७-२७० ), ( ११ ) गण-पति-कल्प-प्रकरण (श्लो० २७१-२९४), ( १२ ) ग्रह-शान्ति-प्रकरण ( श्लो० २९५-३०८ ), ( १३ ) राज-धर्म-प्रकरण ( श्लो० ३०९-३६८ ) ।