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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

४२४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

है, जब सृष्टि उपजी न थी तब भी आत्मा ही था और मध्य भी वही है। परन्तु यह सम्यक्दर्शी को भासित होता है, असम्यक्दर्शी को आत्मसत्ता नहीं भासिते होती। हे राम ! विश्व आत्मा का परिणाम नहीं, चमत्कार है। जैसे सुवर्ण गलता है तो उसकी रैनीसंज्ञा होती है अथवा शलाका कहाती है। यद्यपि उसमें भूषण नहीं हुए तो भी उसका चमत्कार ऐसा ही होता है कि उससे भूषण उपजकर लीन हो जाता है। जैसे सूर्य की किरणें जल का आभास देती हैं, वैसे ही विश्व आत्मा का चमत्कार है। बना कुछ नहीं, आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है और उसका चमत्कार विश्व होकर स्थित हुआ है। हे राम ! जब तुमने ऐसे जाना कि केवल आत्मसत्ता है, तब वासना का क्षय हो जावेगा और चेष्टा स्वाभाविक होगी। जैसे वृक्ष के पत्ते पवन से हिलते हैं, वैसे ही शरीर की चेष्टा प्रारब्धवेग से होगी। हे राम ! देखने भर को तुम्हारे शरीर में क्रिया होगी और हृदय में शून्य भासित होगा। जैसे यन्त्र की पुतली संवेदन बिना तागे से चेष्टा करती है, वैसे ही शरीर की चेष्टा प्रारब्ध से स्वाभाविक होगी और तुमको उसका अभिमान न होगा। जैसे कोई पुरुष दूध के लिए अहीर के पास बर्तन ले जाय और उसको दूध दुहने में कुछ विलम्ब हो तो कहे कि बर्तन यहाँ रखा है, मैं घर से कोई काम शीघ्र ही कर आऊँ तो यद्यपि वह घर का काम करने लगता है, पर उसका मन दूध की ओर ही रहता है कि शीघ्र ही जाऊँ, ऐसा न हो कि वह दुहता हो, वैसे ही तुम्हारी क्रिया प्रारब्धवेग से होगी, पर मन आत्मतत्त्व में रहेगा और तुम अहंकार से रहित होगे। जबतक अहंकार उठता है, तबतक परिछिन्न अर्थात् तुच्छ जीव है, उसको शरीर मात्र का ज्ञान होता है। पर अन्तःकरण में प्रतिबिम्बित जो जीव है, उसको नखशिखपर्यन्त शरीर का ज्ञान होता है। इसी में आत्माभिमान होता है। ज्ञान नहीं होता, इससे जीव है। जो पहले तुमसे कहा है, वह विराट् ही ईश्वर है। वह सब शरीर और अन्तःकरण का ज्ञाता, सब लिंग शरीर का अभिमानी, सबको अपना रूप जानता है।

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४२५

हे राम ! यद्यपि वह विश्वरूप है, तो भी अहंकार से तुच्छ-सा हुआ है । जैसे घनघटा से भिन्न हुआ एक मेघ बादल कहाता है, और घट से अनन्त आकाश घटाकाश कहाता है, पर वह बादल भी मेघ है और घटाकाश भी महाकाश है, वैसे ही अहं के स्फुरण से जीव परिच्छिन्न हुआ है, सो फुरना दृश्य में हुआ है, और दृश्य फुरने में हुआ है । जैसे फूलों में गन्ध और तिलों में तेल है, वैसे ही फुरने में दृश्य है । हे राम ! आत्मा में बुद्धि आदिक स्फुरण है, अर्थात् जब 'मैं हूँ' ऐसे फुरता है, तब आगे दृश्य होता है और जब अहंकार होता है, तब आगे देह इन्द्रियादिक विश्व रचता है । इससे फुरने में दृश्य हुआ और फुरना दृश्य में हुआ । देह, इन्द्रियाँ, मन आदिक जो दृश्य हैं, उनमें जीव के अहंप्रत्यय से फुरना हुआ है; इसी कारण इसकी जीवसंज्ञा हुई है । जब फुरना या अहंभाव नष्ट हो जावे तब आत्मा का साक्षात्कार हो । यह जन्म, मरण, आना, जाना आदि विकारों से युक्त प्रपञ्च भासित होता है तो भी मिथ्या है; क्योंकि विचार करने से कुछ नहीं रहता । जैसे केले के खम्भे में कुछ सार नहीं; वैसे ही विचार करने से प्रपञ्च नहीं रहता । जैसे स्वप्न में मनुष्य अपना जन्म, मरण, आना, जाना देखता है, परन्तु वह सब मिथ्या है, वैसे ही जाग्रत् की सब क्रिया भी मिथ्या है ।

हे राम ! जो परावरदर्शी है, वह इन सब अवस्थाओं में निर्विकल्प है । वह जन्मता भी है । परन्तु नहीं जन्मता; और सब क्रिया करता भी है, परन्तु नहीं करता । वह सबको स्वप्नवत् समझता है; क्योंकि स्वरूप से कभी कुछ नहीं हुआ । हे राम ! ज्ञानी जाग्रत् में भी ऐसे ही देखता है । जब यह आत्मपद में जागता है, तब सब विकारों का अभाव हो जाता है, कोई विकार नहीं भासित होता । हे राम ! जो पुरुष इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह बँधा हुआ है; क्योंकि अभिलाषा ही दुःखदायक है । यद्यपि वह राजा हो, पर उसके हृदय में अभिलाषा है, इससे उसे दरिद्री जानो । जिस पुरुष का छादन, भोजन, शयन कष्ट से देखते हो, अर्थात् भोजन भिक्षा माँगकर अथवा किसी और यत्न से होता है, छादन भी साधारण सा पहिनता है और शयन करने

४२६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

का स्थान भी जैसा-तैसा है, पर ज्ञान से सम्पन्न है तो उसको चक्रवर्ती जानो। यथा—

दो०—सात गाँठ कोपीन की, साध न मानै शङ्क। राम अमल माता फिरै, गिनै इन्द्र को रङ्क॥

हे राम! उसको चक्रवर्ती से भी अधिक जानो। यदि वह आरम्भ किया करता भी दिखता है; पर संकल्प से रहित है तो कुछ नहीं करता। उसका करना, न करना दोनों बराबर हैं, क्योंकि वह निरभिमान है। वह शुभकर्मों के करने से स्वर्ग नहीं जाता और अशुभकर्म से नरक नहीं भोगता—उसको दोनों एक समान हैं।

हे राम! ज्ञानी और अज्ञानी दोनों की चेष्टा समान है; परन्तु अज्ञानी अहङ्कारसहित करता है इससे दुख पाता है। इससे तुम अहँकार का त्याग करो और अपना स्वरूप, जो चैत्य से रहित चैतन्य है, उसमें स्थित हो रहो, जिससे सब संशय मिट जावें। जितने जीव तुमको भासित होते हैं, वे सब संवित् अर्थात् ज्ञानरूप हैं, परन्तु बहिर्मुख फुरने के कारण भ्रम में पड़े हैं। जब जीव अन्तर्मुख हो तब केवल शान्तरूप हो। जहाँ गुणों और तत्त्वों का क्षोभ नहीं, वह शान्तपद कहाता है। हे राम! जैसे विराटरूप का मन चन्द्रमा है, वैसे ही सब जीवों का है, अर्थात् सब विराटरूप हैं, परन्तु प्रमाद से वास्तव स्वरूप नहीं भासित होता। हे राम! जैसे गुलाब की सुगन्ध सम्पूर्ण वृक्ष में व्याप्त है, परन्तु फूल ही में भासित होती है, वैसे ही चैतन्य सत्ता सब शरीर में व्याप्त है, परन्तु हृदय में ही भासित होती है। जो त्रिकोणरूप निर्मलचक्र है, वही अहंब्रह्म का उत्थान होता है। वहाँ से वृत्ति फलकर पञ्चइन्द्रियों के छिद्र से निकलकर विषय को ग्रहण करती है और जीव उन इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में राग-द्वेष मानता है। इससे हे राम! इतना कष्ट प्रमाद से है। जब बोध होता है, तब संसार का भ्रम मिट जाता है।

हे राम! वासनारूप जो संसार है, उसका बीज अहंभाव है और वह प्रत्यक्ष संसार में दिखता है। जब इसकी चिन्तना न हो और स्वरूप

निर्वाण प्रकरण४२७

में अहंप्रत्यय हो, तब संसार का भ्रम मिट जावे। अहंभाव के शान्त होने पर ज्ञानवान् यन्त्र की पुतली के समान चेष्टा करता है। हे राम! जो पदार्थ सत्य है, उसका कभी अभाव नहीं होता, और जो असत्य है, वह सत्य नहीं होता। यदि होने की भावना कीजिए तो भी नहीं होता। जैसे अग्नि को जानकर स्पर्श कीजिये तो भी जलाती है और बिना जाने स्पर्श करिये तो भी जलाती है, क्योंकि सत्य है, और जैसे जल की भावना से मृग मरुस्थल में दौड़ता है, परन्तु जल नहीं पाता, क्योंकि वह असत्य है, वैसे ही हे राम! अहंकार जो स्फुरता है वह असत्य है; भ्रम से सिद्ध है और विचार से नष्ट हो जावेगा। हे राम! यह अहंकाररूपी कलंक उठा है। यदि निरहंकार होकर देखो तो मुक्तरूप हो और यदि अहंकार-संयुक्त हो तो बन्धन है। इससे निरहंकार होकर परमनिर्वाण को प्राप्त होओ। यही हमारा सिद्धान्त है और परमभूमिका भी यही है। जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा शोभा पाता है, वैसे ही तुम ब्राह्मी लक्ष्मी से शोभा पाओगे। हे राम! ज्ञानवान् का चित्त सत्पद को प्राप्त होता है, इससे अहंकार नहीं रहता और उसके चित्त की चेष्टा फलदायक नहीं होती। जैसे भुना बीज नहीं उगता वैसे ही उसका जन्म नहीं होता। और अज्ञानी का चित्त जन्ममरण का कारण होता है। जैसे कच्चा बीज उगता है, वैसे ही अज्ञानी की चेष्टा जन्म का कारण होती है।

हे राम! जितने पदार्थ हैं, उन सबसे निराश हो रहो; जिससे हृदय में किसी की अभिलाषा न उठे, और न किसी का सद्भाव उठे, पाषाण की तरह तुम्हारा हृदय हो। हे राम! जिसका हृदय कोमल स्नेहसंयुक्त है, वह अज्ञानी है। जिसका हृदय पाषाण-समान स्नेह से रहित है, वह ज्ञानी है। इससे निर्मम और निरहंकार होकर स्थित रहो। ये भोग मिथ्या हैं—इनकी इच्छा में सुख नहीं। हे राम! जब संसार से उपरत और अन्तर्मुख आत्मपरायण होगे, तब अहंकार निवृत्त हो जावेगा और आत्मा ही भासित होगा। जैसे वसन्तऋतु आती है तो वृक्ष प्रफुल्लित होते हैं और पुरातन पत्ते गिरकर नूतन निकल आते हैं, वैसे ही

१२८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

जब तुम अन्तर्मुख होगे, तब अहंकार निवृत्त हो जावेगा, विभुता को प्राप्त होगे; अहंप्रत्यय जाता रहेगा और परमानिर्वाण पद पाओगे। इससे संवेदन अहंकार का त्याग करो और कोई यत्न न करो। तुमको यही हमारा उपदेश है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सुखेनयोगोपदेशो नाम शताधिकत्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जो वासनारूपी संसार है; उससे तुम मङ्की ऋषि के सदृश तर जाओ। रामजी ने पूछा, हे भगवन्! मङ्की ऋषि किस प्रकार तरे हैं सो कृपा करके कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! मङ्कीऋषि का वृत्तान्त सुनो। उसने महाउग्र तप किया था। एक समय मैं आकाश में अपने घर में था। तुम्हारे पितामह राजा अज ने मेरा आवाहन किया। तब मैं राजा अज के निमित्त आकाश से उतरा तो मार्ग में एक वन देखा जिसमें अनेक वन के समूह थे, जो भयानक और शून्य थे। वहाँ न कोई मनुष्य देख पड़ता था और न कोई पशु, केवल महाशून्य वन था—मानो एकान्त ब्रह्मस्थान हो—और कई योजन तक मरुस्थल ही देख पड़ता था। मध्याह्न का समय था और अतितीक्ष्ण धूप पड़ती थी, जाँघों तक तपी हुई रेत में मैंने प्रवेश किया और कई वृक्ष जले हुए वहाँ देख पड़े। हे राम! उस शून्य स्थल में एक अतिदुःखित विदेशी आता मुझको देख पड़ा। उसने यह वाक्य मुख से निकाला कि हाय हाय! मैंने महाकष्ट पाया है। जैसे किसी को दुष्टजन दुःख देते हैं और दया नहीं करते, वैसे ही मुझको धूप और यात्रा ने जलाया है और मैं अतिदुःख को प्राप्त हुआ हूँ। हे राम! ऐसे वचन कहता हुआ वह मेरे साथ चला जाता था। जब कुछ आगे गया तो एक धीवरों का गाँव देख पड़ा; जहाँ पाँच अथवा सात घर थे। उसको देखकर वह शीघ्र चलने लगा कि वहाँ मुझको शान्ति होगी और मैं जलपान करके छाया के नीचे बैठूँगा।

हे राम! उसको देखकर मुझे दया आई तो मैंने कहा कि हे मार्ग के मीत! तू कहाँ जाता है? जिनको सुखदायी जानकर तू दौड़ता है

⚙️ निर्वाण प्रकरण ४२६

वे दुःखदायक हैं। जैसे मरुस्थल को नदी जानकर मृग जलपान के निमित्त दौड़ता है कि शान्ति पाऊँ और अतिदुःख पाता है, वैसे ही जिस स्थान को तू सुखरूप जानता है, वह दुःखरूप है। हे अङ्ग! ये जो इस गाँव के वासी हैं, उनका संग कदापि न करना। इनका संग दुःखरूप है। जो पुरुष विचारपूर्वक चेष्टा करता है, उसको दुःख नहीं होता और जो बिना विचारे काम करता है, वह दुःख पाता है। ये नगरवासी आप जलते हैं तो तुझको कैसे सुख देंगे ? जैसे कोई पुरुष अग्निकुण्ड में जलता हो और उससे कहिये कि तू मेरी तपन शान्त कर तो कहनेवाला मूढ़ होता है, क्योंकि वह तो आप ही जलता है और की तपन कैसे शान्त करेगा, वैसे ही वे तो आप इन्द्रियों के विषय की तृष्णारूपी अग्नि में जलते हैं, तुझको कैसे शान्त करेंगे ? हे मार्ग के मीत ! पृथ्वी के छिद्र में सर्प होना, मरुस्थल का मृग होना और पाषाण की शिला में कीट होकर रहना अङ्गीकार कीजिये, परन्तु अज्ञानी का सङ्ग न कीजिये, जिनको इन्द्रियों के सुख की तृष्णा रहती है। इन्द्रियों के सुख आपातरमणीय हैं अर्थात् जब तक इन्द्रियों का विषय के साथ संयोग है, तब तक सुख है और जब वियोग होता है, तब दुःख होता है। विषयी जनों की प्रीति भी विषयतुल्य है। वह विचारवती बुद्धिरूपी कमलिनी का नाश करनेवाली वरफ है। इनकी संगति में वचनरूपी पवन से राख उड़ती है और पास बैठनेवाले को अन्धकार में डालती है। इससे इन ग्रामवासी अज्ञानियों का संग न करना। ये अज्ञानी विचारवती बुद्धिरूपी सूर्य को ढकनेवाले बादल हैं। जैसे वेलि पर अग्नि डालिये तो जलाती है, वैसे ही इनकी संगति वैराग्य को ग्रहण करनेवाली बुद्धि का नाश करनेवाली है—इससे इनका संग न करना। हे साधो! संग उसका कर, जिसके संग से तेरा ताप मिटे। इनके संग से शान्ति न पावेगा।

हे राम! इस प्रकार जब मैंने कहा, तब वह मेरे निकट आकर बोला, हे भगवन्! तुम कौन हो और तुम्हारा नाम क्या है ? तुम्हारे वचन सुनकर मुझे शान्ति मिली है। तुम शून्य दिखते हो; पर सब

४३० ☸ योगवाशिष्ठ ☸

गुणों से पूर्ण हो और तुम्हारा दिव्य प्रकाश मुझको भासित होता है। तुम आदिपुरुष विराट् हो और तुम सुन्दर देख पड़ते हो। हे भगवन्! जो सुन्दर होता है, उसको देखकर राग उपजता है और चित्त क्षोभ को भी प्राप्त होता है। तुम ऐसे सुन्दर हो कि तुम्हारे दर्शन से मुझको शान्ति मिलती जाती है। तुम दिव्य तेज को धारण किये देख पड़ते हो और ऐसे तेजवान् हो कि देखने नहीं देते—अर्थ यह है कि तुम्हारे समान किसी की सुन्दरता नहीं और तुम्हारा तेज हृदय में शान्ति उपजाता है। वह एक शीतल प्रकाश है। हे भगवन्! तुम धर्म से उन्मत्त से दिखते हो सो तुम कैसी शान्ति को लेकर एकान्त में स्थित हो? अपने स्वरूप प्रकाश को तुम दया करके दिखाते हो। पृथ्वी पर स्थित भी दिखते हो, परन्तु त्रिलोकी के ऊपर विराजमान भासित होते हो। एक ही दिखते हो, परन्तु सर्वात्मा हो। किंचन-अकिंचन और सब भावपदार्थों से शून्य दिखते हो, पर सब पदार्थ तुम्हारी सत्ता से प्रकाशित होते हैं। तुम सब पदार्थों के अधिष्ठान हो। तुम्हारे नेत्रों के खोलने से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और मूँदने से लय हो जाती है; इससे ईश्वर हो। तुम सकलङ्क दिखते हो, परन्तु निष्कलङ्क हो अर्थात् तुममें फुरना देख पड़ता है, परन्तु हृदय से शून्य हो। तुम किसी अमृत का पान करके आये हो और बड़े ऐश्वर्य से सम्पन्न दिखाते हो। इससे हे भगवन्! तुम कौन हो? यदि मुझसे पूछो कि तू कौन है तो मैं माण्डव्य ऋषि के कुल में हूँ और मेरा नाम मङ्गी है। मैं ब्राह्मण हूँ और तीर्थयात्रा के निमित्त निकला था। मैं सब दिशाओं में घूमा और अति भयानक स्थानों में जो तीर्थ हैं वहाँ भी गया। परन्तु मुझको शान्ति न हुई ऐसी शान्ति कहीं न पाई कि इन्द्रियों की जलन से रहित हो जाऊँ—अब मैं अपने घर को जा रहा हूँ। हे भगवन्! अब घर से भी मेरा चित्त विरक्त हुआ है। यह संसार ही मिथ्या है तो घर किसका है? संसार में सुख कहीं नहीं। यह प्राण ऐसे हैं जैसी बिजली की चमक होती है और वैसे ही यह संसार भी नष्ट होता दिखता है। शरीर उपजते भी हैं और मिट भी

  • निर्वाण प्रकरण * ४३१

जाते हैं—ये सृष्टि का भ्रम मात्र है, जैसे रात्रि आती है और फिर नहीं जान पड़ती कि कहाँ गई । हे भगवन् ! इस संसार को असार जान-कर मैं उदासीन हुआ हूँ, क्योंकि मैंने अनेक जन्म पाये हैं, जो नष्ट हो गये हैं। मैं इसी प्रकार घूमता फिरता हूँ। अब तुम्हारे शरणागत हूँ और जानता हूँ कि तुमसे मेरा कल्याण होगा । तुम कल्याणरूप देख पड़ते हो, इससे कृपा करके कहो कि कौन हो ?

हे राम ! इतना सुन मैंने कहा-हे मङ्गीऋषि ! मैं वशिष्ठ ब्राह्मण हूँ और मेरा घर आकाश में है । मुझको राजा अज ने स्मरण किया है, इसलिए मैं इस मार्ग से जाता हूँ । अब तुम संशय मत करो, ज्ञानमार्ग को पाओगे । हे राम ! जब मैंने ऐसे कहा, तब वह मेरे चरणों पर गिर पड़ा और उसके नेत्रों से जल बहने लगा । वह महाआनन्द को प्राप्त हुआ । तब मैंने कहा कि हे ऋषि ! तू संशय मत कर । मैं तुझको अकृत्रिम शान्ति देकर जाऊँगा । जो कुछ तू पूछा चाहता है सो पूछ । मैं तुझको उपदेश करूँगा । मैं जानता हूँ कि तू कल्याणकृत है, इसलिए जो कुछ मैं कहूँगा, वह तू धारण करेगा । तू कुछ प्रश्न कर; क्योंकि तेरे कषाय परिपक्व हुए हैं । तू मेरे वचनों का अधिकारी है, तुझको मैं उपदेश करूँगा । अब तू संसार-सागर के तट पर आ गया है । अब तुझे उससे निकालने भर की देर है; अर्थात् तू वैराग्य से पूर्ण है और संसार का तट वैराग्य ही है; इससे संशय मत कर ।

इति श्रीयोग० निर्वाण० शताधिकचतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४४ ॥

मङ्गी बोले, हे भगवन् ! अब मैं जानता हूँ कि मेरा कार्य सिद्ध हो गया । मुझको अज्ञान से मोह था, उसका नाश करने को तुम समर्थ देख पड़ते हो । मेरे हृदय का तम नष्ट करने को तुम सूर्य उदय हुए हो । हे भगवन् ! यह संसार असार है, पर लोगों की बुद्धि विषयों की ओर ही दौड़ती है, जहाँ दुःख ही होते हैं । जैसे जल नीचे स्थान को चला जाता है, वैसे ही हमारी बुद्धि नीचे स्थानों को दौड़ती है और वही चाहती है । हे भगवन् ! जितने भोग हैं, उनको मैंने भोगा है, परन्तु शान्ति न पाई, बल्कि उल्टी तृष्णा बढ़ती गई । जैसे तृषा लगे

४३२ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ

और खारा जल पान करिये तो तृषा नहीं मिटती, बल्कि बढ़ती ही जाती है, वैसे ही विषयों को भोगने से शान्ति नहीं प्राप्त होती—तृष्णा बढ़ती जाती है। हे मुनिराज ! देह जर्जर हो जाती है, दाँत गिर पड़ते हैं और अतिक्षोभ होता है, तो भी तृष्णा नहीं मिटती। अब मैं दुःख चाहता हूँ, सुख नहीं चाहता; क्योंकि संसार के जितने सुख हैं उनका परिणाम दुःख है। जो प्रथम दुःख हैं, उनका परिणाम सुख है, इसी से दुःख चाहता हूँ, संसार के सुख नहीं चाहता, हे भगवन् ! अपनी वासना ही दुःखदायक है। जैसे कुम्भारी (कीड़ा) घर बनाकर उसमें आप ही फँस मरती है, वैसे ही अपनी वासना से जीव आप ही बंधन को प्राप्त होता है। हे मुने ! वह कौन काल था; जब अज्ञानरूपी हाथी ने मुझको वश किया था और उसका नाश करनेवाला ज्ञानरूपी सिंह कब प्रकट होगा ? कर्मरूपी तृणों का नाशकर्त्ता विवेकरूपी वसन्त कब प्रकटेगा और वासनारूपी अँधेरी रात्रि का नाशकर्त्ता ज्ञानरूपी सूर्य कब उदय होगा ? हे भगवन् ! वैताल तब तक ही दिखता है, जब तक निशा है, जब सूर्य उदय होता है, तब निशा जाती रहती है और वैताल नहीं दिखता, वैसे ही अहंकाररूपी वैताल तब तक है, जब तक अज्ञानरूपी रात्रि दूर नहीं होती।

हे भगवन् ! जब सन्तजनों के उपदेश से आत्मज्ञानरूपी सूर्य प्रकट होता है, तब अहंकाररूपी वैताल वहाँ नहीं विचरता। सन्तजनों का संग और सत्शास्त्रों को देखना चाँदनी रात्रि के समान है। उनसे जब स्वरूप का साक्षात्कार हो, तब दिन हुआ जानिये। जब तक सन्तजनों का संग नहीं करता और सत्शास्त्रों को नहीं देखता, तबतक अँधेरी रात्रि है। हे भगवन् ! जो सत्शास्त्रों को भी सुने और फिर विषयों की ओर भी गिरे, उसे बड़ा अभागी जानिये। मैं वही हूँ। परन्तु अब मैं तुम्हारी शरण आया हूँ। मेरे हृदयरूपी आकाश में जो अज्ञानरूपी कुहरा है, वह तुम्हारे वचनरूपी शरत्काल से नष्ट हो जावेगा और हृदयाकाश निर्मल होगा। हे भगवन् ! मैंने त्रिदण्ड साधे हैं अर्थात् दीर्घ काल तक मन, शरीर और वाणी में तीन तप किये हैं, परन्तु आत्मप्रकाश नहीं

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

४३३

हुआ। अब तुम्हारे शरणागत होकर तरूँगा। इसलिए कृपा करके उपदेश करो, जिससे मेरे हृदय का तम दूर हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मङ्गिवैराग्ययोगो नाम शताधिकपञ्चचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४५ ॥

वशिष्ठजी ने कहा, हे तात ! संवेदन, भावना, वासना और कलना, ये अनर्थ के कारण हैं। जब इनका अभाव हो, तब कल्याण हो। शुद्ध चिन्मात्रपद प्रत्यक्ष चैतन्य अपने स्वरूप में स्थित है। जो अहंकार का उत्थान है, वही संवेदन है। भाव यह है कि पहले आप कुछ बना, फिर चेता, और अपना रूप चित्त में स्मरण हुआ, तब भ्रम मिट जाता है। और यदि जो कुछ बना उसकी भावना होती है कि मैं यह हूँ तो इससे संसार दृढ़ होता है। फिर वैसे ही वासना दृढ़ होती है और अपने शरीर के अनुसार नाना प्रकार की कलना होती है। फिर संसार के संकल्प-विकल्प उठते हैं। हे ब्राह्मण ! ये अनर्थ के कारण हैं। जब इनका अभाव हो, तब कल्याण हो। जितने शब्द और अर्थ हैं, उनका अधिष्ठान प्रत्यक्ष चैतन्य है। सब शब्द उसी के आश्रित हैं और सब वही है। जब तू ऐसे जानेगा, तब वासना का क्षय हो जायगा। जब अहंसंवेदन फुरता है, तब आगे संसार भासित होता है। जैसे जब बसन्त ऋतु आती है, तब बेलें प्रफुल्लित होती हैं, वैसे ही जब संवेदन फुरता है, तब आगे संसार सिद्ध होता है। और जब संसार हुआ, तब नाना प्रकार की वासना फुरती है और संसार नहीं मिटता। हे अङ्ग ! संसार जन्म-मरण का ही नाम है। जब यह संसरण मिटेगा, तब आत्मपद ही शेष रहेगा। वह तेरा अपना रूप है, इससे इस वासना को त्यागकर अपने आपमें स्थित हो रह—सब तेरा ही रूप है। जबतक वासना फुरती है, तबतक संसार दृढ़ रहता है। जैसे वृक्ष को जल दीजिए तो बढ़ता जाता है, वैसे ही वासनारूपी जल देने से संसाररूपी वृक्ष बढ़ता जाता है। इससे वासना का नाश करो कि यह संवेदन न उठे। जब वृक्ष जल से रहित होता है, तब आप ही सूख जाता है। हे पुत्र ! आत्मा में जगत् नहीं हुआ, केवल परमार्थसत्ता है। जैसे रस्सी में सर्प

४३४ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

कुछ वस्तु नहीं, रस्सी के अज्ञान से ही सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से संसार भासित होता है। जब तू आत्मपद को जानेगा, तब परमार्थसत्ता ही भासित होगी। जैसे बालक अपनी परछाहीं में भूत की कल्पना कर भय पाता है और जब विचारकर देखता है तब भूत कोई नहीं, सब भय दूर हो जाता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से संसार के रागद्वेष जीव को जलाते हैं। ज्ञानवान् को वासनासंयुक्त संसार का अभाव हो जाता है और केवल अद्वैत आत्मसत्ता ही भासित होती है। जैसे स्वप्न से जागकर स्वप्न के प्रपञ्च का वासनासंयुक्त अभाव हो जाता है, वैसे ही जब आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब वासनासंयुक्त संसार का अभाव हो जाता है; क्योंकि वह है ही नहीं। जैसे घटादिक में मृत्तिका से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही सब प्रपञ्च चिन्मात्रस्वरूप है, उससे भिन्न नहीं। जितने शब्द-अर्थ हैं, सब आत्मा ही हैं।

हे मित्र ! जो कुछ आत्मा से इतर भासित होता है, उसको भ्रममात्र जानो। जैसे आकाश में नीलिमा जो दिखती है, वह भ्रममात्र है, वैसे ही विश्व असम्यक्दृष्टि से दिखता है। सम्यक्दृष्टि से सब प्रपञ्च आत्म-स्वरूप हैं। द्रष्टा, दर्शन, दृश्य की त्रिपुटी भी बोधस्वरूप है। बोध ही त्रिपुटीरूप होकर स्थित है। जैसे स्वप्न में एक ही अनुभव त्रिपुटीरूप हो भासित होता है, वैसे ही यह जाग्रत की त्रिपुटी भी आत्मस्वरूप है। हे अङ्ग ! जितने स्थावर-जंगम पदार्थ हैं, सब आत्मस्वरूप हैं, जो परमात्मस्वरूप न हों तो भासित न हों। द्रष्टारूप से जो अनुभव करता है, वह एक अद्वैतरूप है—उसी स्वरूप के प्रमाद से भिन्न-भिन्न त्रिपुटी भासित होती है, तो भी कुछ उससे भिन्न नहीं है। जैसे स्वप्न में त्रिपुटी अपने अनुभव से भासित होती है, जो अनुभव न हो तो क्यों भासित हो, वैसे ही यह त्रिपुटी भी अनुभवरूप आत्मा से भासित होती है। इससे सब परमात्मस्वरूप है, कुछ भिन्न नहीं। और जब भिन्न नहीं तो है ही नहीं; क्योंकि सबकी एकता परमार्थस्वरूप में होती है। हे ऋषीश्वर ! सजातीय वस्तु मिल जाती है। जैसे जल में जल की बूंद डालिए तो मिल जाती है; क्योंकि एक रूप है, वैसे ही बोध से सब

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४३५

पदार्थों की एकता भासित होती है; क्योंकि द्वैतसत्ता कोई नहीं है। जैसे स्पन्दन और निःस्पन्द, दोनों पवन ही है और जल और तरङ्ग अभेदरूप है, वैसे ही विश्व परमार्थस्वरूप है। इससे ऐसे निश्चय करो कि सब ब्रह्मस्वरूप है अथवा अपने को उठा दो कि मैं नहीं—जब तू न होगा, तब विश्व कहाँ से होगा ?

हे मङ्गीऋषि ! प्रथम जो अहं होता है तो पीछे ममत्व भी होता है, इसलिए जो अहं ही न रहेगा तो ममत्व कहाँ रहेगा ? इस अहं का होना ही बन्धन है और इसके अभाव का नाम मुक्ति है। हे मित्र ! इस युक्ति में क्या यत्न करना है ? यह तो अपने अधीन है कि सोचे मैं नहीं हूँ। जब अहंकार को निवृत्त किया, तब शेष वही रहेगा, जो सब का परमार्थरूप है। उसी को ब्रह्म कहते हैं। हे मुनीश्वर ! जब अहंकार उत्पन्न होता है, तब नाना प्रकार की वासना होती है, और उन वासनाओं के अनुसार जीव अनेक जन्म पाता है, जो वर्णन नहीं किये जा सकते। जैसे पवन से तृण उड़ते और भटकते फिरते हैं, वैसे ही वासना से जीव नाना योनियों में भटकते फिरते हैं। जब पर्वत से कंकड़ गिरता है, तब चोटें खाता नीचे को चला जाता है, वैसे ही स्वरूप के प्रमाद से जीव जन्म-जन्मान्तर पाते चले जाते हैं और वासनानुसार घटीयन्त्र की नाईं कभी ऊपर और कभी नीचे जाते हैं, जैसे हाथ से ताड़ना किया गेंद कभी ऊपर और कभी नीचे को जाता है। हे अङ्ग ! इस संसार का बीज वासना है। जब वासना निवृत्त हो तब सबकी एकता हो जाती है। जबतक संसार की वासना दृढ़ है, तब तक एकता नहीं होती। जैसे दूध और जल मिलता है तो उनका संयोग हो जाता है, वैसे ही आत्मा और विश्व का संयोग नहीं, आत्मा केवल अद्वैत और सबका अपना रूप है। जैसे मृत्तिका ही घटादिकरूप भासित होती है, वैसे ही आत्मसत्ता ही जगतरूप होकर भासित होती है—इससे आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं।

हे साधो ! आत्मा और दृश्य का काष्ठ और लाख का जैसा अथवा घट और आकाश का जैसा संयोग नहीं है, क्योंकि आत्मा अद्वैत है

४३६ ✵ योगवाशिष्ठ ✵

और सब दृश्य बोधमात्र है। हे साधो ! जो जड़ है वह चैतन्य नहीं होता और चैतन्य जड़ नहीं होता। इससे न कोई जड़ है न चैतन्य। चैतन्य आत्मा ही भावना से जड़ दृश्य होकर भासित होता है और उसके बोध से एक अद्वैतरूप हो जाता है तो जानता है कि सब वही है, भिन्न कुछ नहीं। हे मित्र ! अज्ञान से नाना प्रकार का विश्व भासित होता है। जैसे मेघ की वर्षा से नाना प्रकार के बीज उग आते हैं, वैसे ही अहंरूपी बीज से संसाररूपी वृक्ष वासना द्वारा उगता है। जब अहंकाररूपी बीज नष्ट हो, तब संसाररूपी वृक्ष नष्ट हो जावेगा। हे अङ्ग! जैसे वानर चपलता करता है, वैसे ही आत्मतत्त्व से विमुख अहंकाररूपी वानर वासना से चपलता करता है। जैसे गेंद हाथ के प्रहार से नीचे और ऊपर उछलता है, वैसे ही जीव वासना से जन्मान्तरों में भटकता फिरता है। कभी स्वर्ग, कभी पाताल और कभी भूलोक में आता है। स्थिर कभी नहीं होता। इससे वासना को त्यागकर आत्मपद में स्थित हो रहो। हे तात ! यह संसार रात्रि की मंजिल है, देखते-देखते नष्ट हो जाती है। इसको देखकर इसमें प्रीति करना और इसे सत्य जानना ही अनर्थ है। इससे संसार को त्यागकर आत्मपद में स्थित हो रहो। चित्त की वृत्ति जो संसरण करती है, इसी का नाम संसार है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मङ्किऋषिबोधो नाम शताधिकषट्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे तात ! यह संसार का मार्ग गहन है और इसमें जीव भटकते हैं। यह चैतन्यवृत्ति जो संसरण करती है, यही संसार है। जब यह संसरण मिटे, तब स्वच्छ अपना स्वरूप देख पड़े। चेतनावृत्ति जो बहिर्मुख उठती है, इसी का नाम बन्धन है; और कोई बन्धन नहीं। हे साधो ! यह जगत् वासना से बँधा है। जैसे वसन्तऋतु में रस फैलता है वैसे ही वासना में जगत् फैलता है। बड़ा आश्चर्य है कि मिथ्या वासना से जीव भटकते फिरते हैं, दुःख भोगते हैं और बारम्बार जन्म लेते और मरते हैं। बड़ा आश्चर्य है कि विषयरूप वासना के वश हुए

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४३७

जीव अविद्यमान जगत् को भ्रम से सत्य जानते हैं। हे साधो! जो इस वासनारूप संसार से तर गये हैं, वे धन्य हैं। वे प्रत्यक्ष चन्द्रमा की तरह शान्त हैं। जैसे चन्द्रमा अमृतरूप, शीतल और प्रकाशमान है और सबको प्रसन्न करता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष भी। इससे तू धन्य है जो तुझे आत्मपद पाने की इच्छा हुई है। हे अङ्ग! यह संसार तृष्णा से जलता है। जिनकी चेष्टा तृष्णामंयुक्त है, उनको तू बिलाव जान। जैसे बिलाव तृष्णा से चूहे को पकड़ता है, वैसे ही वे भी तृष्णा से युक्त चेष्टा करते हैं। मनुष्य शरीर में यही विशेषता है कि वह किसी प्रकार आत्मपद को प्राप्त करे। जो नरदेह पाकर भी आत्मपद पाने की इच्छा न करे तो वह पशुसमान है। हे मित्र! मूढ़ जीव ऐसी चेष्टा करते हैं कि प्राणों के अन्त तक भी तृष्णा में फँसे रहते हैं।

हे अङ्ग! ब्रह्मलोक से काष्ठ तक जितने इन्द्रियों के विषय हैं, उनके भोगने से शान्ति नहीं होती; क्योंकि वे आपात रमणीय हैं—इनमें सुख कभी नहीं मिलता। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनकी शान्ति ऐसी है, जैसे चन्द्रमा में, और वे सूर्य की नाईं प्रकाशमान होते हैं, विषयों की तृष्णा कभी नहीं करते। जैसे कोई पुरुष अमृतपान करके तृप्त हुआ हो तो वह खली खाने की इच्छा नहीं करता, वैसे ही जिस पुरुष को आत्मानन्द प्राप्त हो जाता है, वह विषयों के भोगने की इच्छा नहीं करता। इससे इसी वासना का त्याग करो। वासना का बीज अहंकार है। उसको यह सोचकर निवृत्ति करो कि मैं नहीं हूँ; क्योंकि मेरा होना ही अनर्थ है। हे साधो; शुद्ध चिन्मात्र निरहंकार पद में जो तू अपने को परिच्छिन्न जानता है कि 'मैं ब्राह्मण हूँ' अथवा किसी प्रकृति से मिलकर अपने को मानता है कि 'मैं यह हूँ', यही अनर्थ है। हे ऋषि! नेत्रों को खोलने से संसार उत्पन्न होता है और नेत्रों को मूँदने से नष्ट हो जाता है। सो नेत्र अहंकार का उत्पन्न होना है; इसी से आगे विश्व सिद्ध होता है। इससे तेरा होना ही अनर्थ है। हे अङ्ग! जैसे रस्सी में सर्प भ्रम से उदय होता है, वैसे ही आत्मा में अहंकार का उदय हुआ है। इसी के अभाव से शान्ति से होती है। जब अहंकार होता

४३८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

है, तब आगे स्त्री, कुटुम्ब और धन होते हैं। वे ही बन्धन हैं। इनके चमत्कार ऐसे हैं, जैसे बिजली का प्रकाश क्षण में उदय होकर नष्ट हो जाता है। इससे इनमें न बँधना चाहिए।

हे अङ्ग ! जब तू कुछ बना, तब सब आपदा तुझे प्राप्त होंगी। और यदि तू अपना अभाव जानेगा तो पीछे परमशान्तरूप आत्मपद ही शेष रहेगा, जिसकी अपेक्षा चन्द्रमा भी अग्निसा जान पड़ता है। वह आत्मपद परमशून्य, सब पदार्थों की सत्ता और आकाशरूप है। हे मित्र ! मेरे इन वचनों को हृदय में धारण कर, जिससे तेरा मोह नष्ट हो जाय। यह विश्व हुआ नहीं। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा दिखता है, पर है नहीं वैसे ही विश्व है नहीं, आत्मा के प्रमाद से भासित होता है। हे ऋषि ! तू उसी को जान, जिसके अज्ञान से विश्व भासित होता है और जिसके ज्ञान से लय हो जाता है। हे मङ्गी ! जैसे आकाश शून्यमात्र है, पवन स्पन्दनमात्र है, और जल तरङ्गमात्र है, वैसे ही जगत् संवित्मात्र है। उस संवित् आकाश से जो भिन्न भासित होता है, उसे भ्रममात्र जानो। जैसे असम्यकदृष्टि से जल पहाड़रूप भासित होता है, वैसे ही असम्यकदृष्टि से जगत् भासित होता है और सम्यक् अवलोकन से परमार्थसत्ता ही भासित होती है। जिसके अज्ञान से विश्व भासित होता है उसी को ज्ञानवान् लोग ब्रह्म कहते हैं। उस ब्रह्म में अहंकार ही व्यवधान है। वह पर्दा ज्ञानवान् को नष्ट हो जाता है, इससे वह सबके अधिष्ठान एक परमार्थस्वरूप को देखता है। उसी में तू भी रह। जैसे आकाश अनेक घटों के संयोग से भिन्न-भिन्न भासित होता है और घटों को फोड़ डालिये तो सब एक ही हो जाता है; वैसे ही अहंकाररूपी घट फोड़िये तो सब पदार्थ एक हो जाते हैं।

हे अङ्ग ! सबकी परमार्थसत्ता एक ब्रह्मपद है। वह अजन्मा, अच्युत, आनन्द, शान्तरूप, निर्विकल्प, अद्वैत, सबका अधिष्ठान है। उस शिलासदृश आत्मसत्ता से भिन्न कुछ न स्फुरण हो, इसलिए निर्बोध-बोध हो जाओ। हे मङ्गी ऋषि ! ये दुःख के देनेवाले पदार्थ और ऐसे

✻ निर्वाण प्रकरण ✻ ४३६

शब्द अर्थ आकाश के फूल हैं; इससे शोक मत कर। कारण सब परमार्थसत्ता ही है। जैसे पुरुष निराकार है, पर उसकी अभावना से अङ्गों का संयोग होता है, वैसे ही विश्व भी इसकी भावना से होता है। जैसी संसार की भावना दृढ़ होती है, वैसा ही रूप आगे देख पड़ता है। जो विश्व उपादान से नहीं हुआ तो आरम्भ परिणाम से भी कुछ नहीं बना। हे मित्र! शुद्ध परमात्मा को पाना साध्य है, क्योंकि विश्व निरुपादान केवल शब्दमात्र है। आत्मा अद्वैत है, अतः इसका हेतु नहीं है। वह अचिन्त्य है, इसी से विश्व निरुपादान स्वप्नवत् है। जैसे स्वप्न की सृष्टि निरुपादान होती है, वैसे ही जाग्रत् सृष्टि भी है। जैसे मृत्तिका से घटकार्य बनता है, ऐसे भी आत्मा विश्व का उपादान नहीं है; क्योंकि मृत्तिका परिणाम से घटाकार होती है, पर आत्मा निर्विकार अच्युत है। जैसे भीत बिना चित्र हो सो है ही नहीं—इससे यह विश्व आकाश में चित्र है। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार का विश्व आधार भीत बिना चित्र होते हैं, वैसे ही यह विश्व भी आकाश में चित्र सा है। इसी से आत्मा अकर्ता है। और विश्व जो दिखता है सो निरुपादान है। तब इसका शोक और हर्ष क्यों करें? यह सब प्रपञ्च आत्मरूप है, प्रमाद के कारण यह नहीं जाना जाता।

हे साधो! संवेदन से जब अहंकार फुरता है, तब विश्व भासित होता है। जैसे स्वप्न में जो कुछ बनता है वह अपने स्वरूप से भिन्न देख पड़ता है और उसी में रागद्वेष होता है, पर जागने पर और कुछ नहीं, सब कल्पना ही थी, वैसे ही जब संवेदन उठ गया, तब सब विश्व आप अपना रूप हो जाता है। अहंकार होना ही विश्व है। जब अहंकार नष्ट हुआ, तब ये सब शब्द-अर्थ कि मैं दुःखी हूँ, मैं सुखी हूँ, यह नरक है, यह स्वर्ग है, परमार्थसत्ता ही में फुरते हैं। सबका अधिष्ठान आत्मा है, इससे सब आत्मस्वरूप है। आत्मा दृश्य से रहित द्रष्टा है, ज्ञेय से रहित ज्ञाता है, और निर्बोध बोध है, इच्छा से रहित इच्छा है, अद्वैत और नानात्व भी वही है, निराकार और आकार भी वही है, अकिञ्चन और किञ्चन भी वही है। वह अक्रिय है और सब क्रियाएँ भी करता है। आत्मवेत्ता

४४० ❋ योगवाशिष्ठ ❋

ऐसे आत्मज्ञान को पाकर विचरते हैं। उन्हें जगत् का किंचित् भी भान नहीं होता। जैसे सुवर्ण के भूषण या जल के तरङ्ग होते हैं, वैसे ही सब विश्व उसको आत्मस्वरूप भासित होता है। ऐसे जानकर वे सब चेष्टा करते हैं। जैसे काठ की पुतली में संवेदना नहीं उठती, वैसे ही उनको जगत् में सत्यता नहीं प्रतीत होती, क्योंकि वे निरहंकार हो जाते हैं। हे मङ्की ऋषि! जैसे सुवर्ण में भूषण बन जाते हैं, वैसे ही आत्मा में विश्व उपजा है। सो अहंकार से उपजा है। इससे इसके अभाव की भावना करो और निरहंकार होकर चेष्टा करो। जैसे पालने में बालक के अङ्ग स्वाभाविक हिलते हैं, वैसे ही ज्ञानी की निर्वेद चेष्टा होती है। हे ऋषि! जब तू इस मेरे उपदेश को हृदय में धारण करेगा, तब सुख से सहज में ही आत्मपद की प्राप्ति होगी और यह विश्व भी आत्मरूप ही भासित होगा। जो कुछ विश्व भासित होता है, वह सब आत्मरूप ही है। हे राम! जब मैंने इस प्रकार कहा, तब मङ्की ऋषि परमनिर्वाण-पद को प्राप्त हुआ और परमसमाधि में एक वर्ष स्थित रहा। शिला में जैसे घास-फूस कुछ नहीं उगता, वैसे ही उसके हृदय में कोई भावना या वासना नहीं उपजी। हे राम! जैसे मङ्की ऋषि स्वरूप को प्राप्त हुआ है, वैसे ही तुम भी स्थित होओ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मङ्किऋषिनिर्वाणप्राप्तिर्नाम शताधिकसप्तचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४७ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह विश्व आत्मा का चमत्कार है और सब चिन्मात्रस्वरूप है। हे राम! मेरा आशीर्वाद है कि तुम चिन्मात्र-स्वरूप को प्राप्त होओ। जो तुम्हारा अपना रूप है, उसको अपना रूप जानो, जिससे तुम्हारे सब दुःख नष्ट हो जावें। हे राम! तुम निर्वाणस्थ शान्त आत्मा बनो। यथालाभ में सन्तुष्ट रहो। सत्य होने पर भी असत् की तरह स्थित होओ। रागद्वेष का सङ्ग तुमको स्पर्श न करे। हे राम! यह सब जगत् एक आत्मा में ही स्थित है और वास्तव में उस एक आत्मा में कुछ भी स्थित नहीं। आदि-अन्त से रहित वह एक चिदाकाश अपने आपमें स्थित है। शरीरादिक के नाश में भी

❁ निर्वाण प्रकरण ❁

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अखण्डरूप है। यह जगत् उसी का चमत्कार है, जो उपज-उपजकर लय हो जाता है। हे राम! ध्याता, ध्यान ध्येय की त्रिपुटी भ्रान्तिमात्र है। वास्तव में द्रष्टा, दर्शन, दृश्य सब आत्मस्वरूप हैं; इससे भिन्न कुछ नहीं। वह ब्रह्मस्वरूप आत्मा सदा एकरस है, कभी क्षोभ को नहीं प्राप्त होता। चाहे अमावस का चन्द्रमा दिखाई पड़ जाय और प्रलयकाल के बिना प्रलयकाल की वायु चले तो भी आत्मा को क्षोभ नहीं होता—आत्मपद सदा ज्यों का त्यों है। हे राम! ऐसे आत्मा के प्रमाद से जीव दुःख पाते हैं। जब आत्मा को प्रमाद होता है, तब देह और इन्द्रियाँ अपने आपमें प्रत्यक्ष भासित होती हैं। पर जैसे बालू से तेल नहीं निकलता, आकाश में वन नहीं होता और चन्द्रमा के मण्डल में ताप नहीं होता, वैसे ही आत्मा में देह या इन्द्रियाँ कभी नहीं हैं।

हे राम! ये सब जीव आत्मरूप हैं, इससे इनको देह-इन्द्रियों का सम्बन्ध नहीं है; परन्तु इनको जो कर्मों में अभिमान होता है इसी से बन्धन में पड़ते हैं। हे राम! जैसे नाव पर बैठे हुए पुरुष को भ्रान्ति से नदीतट के वृक्ष चलने लगते हैं, वैसे ही मन के भ्रम से आत्मा में चित्त और देह इन्द्रियाँ जान पड़ती हैं। वास्तव में चित्त, देह और इन्द्रियाँ कुछ भिन्न वस्तु नहीं। ये भी आत्मस्वरूप ही हैं। तब निषेध किसका कीजिये? हे राम! मन और इन्द्रियादिक को अपनी सत्ता कुछ नहीं, वह भ्रान्ति से भासित होती हैं। जैसे पर्वत पर उज्ज्वल मेघ होता है और उसमें वस्त्रबुद्धि निष्फल होती है, वैसे ही ये देहादिक हैं। इनमें अहंबुद्धि निष्फल है। इससे हे राम! आत्मतत्त्व एक अखण्ड है, द्वैत कुछ नहीं। जब तुम ऐसे विचारोगे तो निरञ्जनरूप होगे। हे राम! ये सब शरीर चित्त के स्फुरण से स्थित हैं। जैसे चित्त के स्फुरण से शरीर है, वैसे ही जीव में चित्त और परमात्मा में जीव है। हे राम! इस प्रकार स्फुरण मात्र दृश्य हुआ तो द्वैत तो कुछ न हुआ। इस प्रकार विचारपूर्वक दृश्यभ्रम को त्यागकर स्वरूप में स्थित हो रहो। हे राम! ऐसी धारणा करके सुख से बिचरो और जो कुछ चेष्टा नीति से प्राप्त हो, उसको करो, परन्तु उसमें अपने कर्तृत्व का अभिमान न हो।

४४२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

जब अपना अहंभाव दूर होगा, तब स्पन्दन हो अथवा निःस्पन्द हो, समाधि में स्थित हो अथवा राज्य करो, तुमको दोनों तुल्य हो जावेंगे। जब अपनी अभिलाषा दूर होती है, तब जैसी चेष्टा प्राप्त हो, वैसा ही हो, यह स्फुरना भी न स्फुरने के समान है, और एक अद्वैत सत्ता ही भान होगी। जैसे सम्यक्दर्शी को तरङ्ग और मृगजल एक भासित होता है, वैसे ही तुमको भी एक ही भासित होगा। चाहे जीवन्मुक्त हो अथवा विदेहमुक्त हो, समाधिस्थ हो अथवा राज्य करो, तुमको दोनों तुल्य हैं। हे रघुकुल आकाश के चन्द्रमा रामचन्द्र ! जीव को अपनी अभिलाषा ही बन्धन में डालती है। जब अभिलाषा मिटती है, तब कर्म करो अथवा न करो, कुछ बन्धन नहीं; क्योंकि तब मनुष्य करने में भी आत्मा को अक्रिय देखता है और न करने में भी वैसे ही देखता है। उसकी द्वैत भावना निवृत्त हो जाती है, इससे उसे चित्त, देह, इन्द्रियादिक सब पदार्थ आत्मरूप ही भासित होते हैं। हे राम ! मैं जानता हूँ कि तुम्हारे हृदय का मोह निवृत्त हुआ है, अब तुम जागे हो। यदि कुछ तुमको संशय रहा हो तो फिर प्रश्न करो, जिसका मैं उत्तर दूँगा।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सुखेनयोगोपदेशो नाम शताधिकएकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४८ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! मुझको एक संशय है और उसको भी आप निवृत्त कीजिये। कोई कहते हैं कि बीज से अंकुर होता है और कोई कहते हैं कि अंकुर से बीज होता है। कोई कहते हैं कि जो कुछ करता है सो दैव ही करता है और कोई कहते हैं कि कर्म करते हैं, तब जीव जन्म पाते हैं। कर्म ही से सब कुछ होता है, और किसी के अधीन जीव नहीं है। कोई कहते हैं कि जब देह होती है, तब कर्म करते हैं और कोई कहते हैं कि कर्मों से देह होती है। कोई कहते हैं कि देह से कर्म होते हैं और कोई पुरुषप्रयत्न मानते हैं। सो यथार्थ जो कुछ हो वह कहिए। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! एक-एक के विषय में मैं तुमको क्या कहूँ। कर्म से दैव और घट से आकाश पर्यन्त जितने क्रिया, कर्म और द्रव्य हैं, ये सब विकल्पजाल भ्रान्तिमात्र हैं। केवल आत्मस्वरूप अपने

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४४३

आपमें स्थित है-द्वैत कुछ नहीं है। हे राम! जब संवेदन फुरता है, तब सब कुछ भासित होता है और निःसंवेदन होने पर कुछ नहीं। जैसे शीत, श्वेत आदिक बरफ के दूसरे नाम या पर्याय हैं, वैसे ही कर्म, पुरुष-प्रयत्न आदि सब आत्मा के पर्याय हैं। दैव पुरुष है और पुरुष दैव है। कर्म देह है और देह कर्म है। बीज अंकुर है और अंकुर बीज है। दैव कर्म है और कर्म दैव है और वही पुरुषप्रयत्न है। जो इनमें भेद मानते हैं। वे पढ़-पशु हैं। इन सबका बीज अहंकार है—जब अहंकार हुआ तब सब कुछ सिद्ध हुआ। जैसे बीज से वृक्ष, फल, फूल और डाली होते हैं, पर जो बीज ही न हो तो वृक्ष कैसे उपजे?

हे राम! इनका बीज संवेदन है। अहंकार, संकल्प और संवेदन तीनों पर्याय हैं अर्थात् एक ही हैं। जब फुरना हुआ तब कर्म, देह, दैव सब सिद्ध होते हैं और जब फुरना मिट गया तब कुछ नहीं भासित होता। इसी को ज्ञान-अग्नि से जलाओ, जिससे इसके फूल, फल, टहनी सब जल जावें। यह जो संवेदन फुरता है कि 'मैं हूँ,' यही संसार का बीज है। इसे ज्ञानरूपी अग्नि से जलाओ। जब अहंकार नष्ट होगा, तब कुछ द्वैत न भासित होगा। हे राम! यह जो प्रपञ्च भासित होता है, इसका बीज संवेदन है और संवेदन का बीज शुद्ध संवित्तत्त्व है। पर उसका बीज और कोई नहीं। हे राम! आदि जो स्पन्दन संवेदन या फुरना हुआ है, उसी का नाम दैव है, क्योंकि वह कर्म से पहले ही फुरता है। फिर जो आगे क्रिया होती है, वह कर्म है। इसी का नाम पुरुषप्रयत्न है। वह जो कर्म से आदि दैवरूप फुरा है, उसका क्या रूप है? इसी का जो पहिला कर्म है, उसी को दैव कहते हैं। इन सबका बीज संवेदन है। हे राम! वह स्वतः पुरुष चिन्मात्रपद एक ही था। जब उससे विकार-संयुक्त उत्थान हुआ, तब प्रपञ्च भासित होने लगा। फिर जब उत्थान का अभाव होगा, तब प्रपञ्च का भी अभाव हो जायगा। हे राम! जब जीव कुछ बनता है तब सब आपदाएँ उसको प्राप्त होती हैं। जैसे सुई वस्त्र में प्रवेश करती है तो उसके पीछे तागा भी चला जाता है—जो सुई प्रवेश न करे तो तागा कहाँ से जावे—वैसे ही जब अहंकार प्रवेश करता