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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ
  • निर्वाण प्रकरण * ५१६

जैसे वर्षाकाल में मेघ घने होते हैं और जब शरत्काल आता है तब अदृश्य हो जाते हैं, वैसे ही जब बोधरूपी शरत्काल आता है, तब अनात्म में आत्म-अभिमानरूपी मेघ नष्ट हो जाता है और परम स्वच्छता प्रकट होती है। हे राम! जितना जगत् पिण्डरूप होकर भासित होता है, जब आत्मा का साक्षात्कार होगा, तब उसमें पिण्ड-बुद्धि जाती रहेगी और सब जगत् आकाशरूप हो जायगा। जैसे शरत्-काल में मेघों की बहुलता जाती रहती है और सब आकाशरूप हो जाता है। हे राम! यह भ्रान्ति तब तक है, जब तक जीव स्वरूप में सुषुप्ति सा है। जब जागेगा तब सब जगत् आकाश सा शून्य हो जायगा, जैसे स्वप्न में जागने पर स्वप्नजगत् आकाशरूप हो जाता है। हे राम! यह विकार, क्षोभ और नानात्व प्रमाद से दिखते हैं। जब आत्मबोध होता है, तब सब क्षोभ और विकार मिट जाते हैं। सब प्रपञ्च एक हो जाने से द्वैतभाव मिट जाता है। जैसे प्रज्वलित अग्नि में घृत, ईंधन या मिष्ठान्न जो कुछ डालिये, वह एकरूप हो जाता है, वैसे ही जब बोध होता है, तब सब जगत् एकरूप हो जाता है। जैसे नाना प्रकार के भूषण अग्नि में डालिये तो सब सुवर्ण ही हो जाता है और भूषण की संज्ञा नहीं रहती, वैसे ही मन को जब आत्मबोध में डाल दिया, तब जगत्संज्ञा नहीं रहती, केवल परमात्मतत्त्व हो जाता है।

हे राम! इन्द्रियाँ और जगत् तब तक हैं, जब तक जीव स्वरूप में अनजान सोया पड़ा है। जब जागेगा, तब संसार की सत्यता मिट जायगी और इच्छा भी कोई न रहेगी। जैसे किसी पुरुष को स्वप्न आता है, और जब उस स्वप्न से वह जागता है, तब स्वप्न के स्मरण की इच्छा नहीं करता कि वह मुझको याद आवे या उसमें मिले हुए सुख-दुःख या मनुष्य मुझे मिलें; क्योंकि उसको सत्यता नहीं जान पड़ती तो इच्छा कैसे करे, वैसे ही जब तक जीव स्वरूप में अनजान सोया पड़ा है, तब तक संसार के पदार्थों को मिथ्या नहीं जानता, उनकी इच्छा करता है। जब तुम स्वरूप ज्ञान में जागोगे, तब सब पदार्थ नीरस हो जावेंगे और जब ज्ञान से जगत् को मिथ्या स्वप्नवत्

५२० ✵ योगवाशिष्ठ ✵

जानोगे, तब उसकी चाह भी न करोगे। हे राम! जीवन्मुक्त की सब चेष्टाएँ देखी जाती हैं, परन्तु वह जगत् को सत्य नहीं मानता; क्योंकि उसको आत्मानुभव हुआ है। जैसे सूर्य की किरणों में जल देख पड़ता है, पर जिसने सूर्य की किरणों को जान लिया है, उसको जल नहीं प्रतीत होता, किरणें ही दीखती हैं; पर जिसने किरणें नहीं जानीं, उसको जल का भ्रम होता है। दृष्टि दोनों की तुल्य है, परन्तु ज्ञानवान् के निश्चय में जगत् जल के समान नहीं और अज्ञानी को जगत् जल सा दृढ़ जान पड़ता है। हे राम! मनरूपी दीपक प्रज्वलित है; उसमें ज्ञानरूपी जल डालिये तो बुझ जायेगा। जब मन का निर्वाण होगा, तब उस पद को प्राप्त होंगे, जहाँ जगत् और अहंकार का अभाव है। वह न शून्य है, न अशून्य; न केवल है न अकेवल। उसका उदय, अस्त भी नहीं है। हे राम! जो पुरुष ऐसे पद को प्राप्त हुआ है, वह कृतकृत्य होकर रागद्वेष से रहित परम शान्तपद को प्राप्त होता है। उसका अहंकार मिट जाता है। वह केवल निर्वाच्य पद को प्राप्त होता है, जहाँ कोई उत्थान नहीं। हे राम! आत्मा से जगत् के पदार्थ कोई नहीं हैं, मन के संकल्प से भासित होते हैं। जैसे खम्भे में चितेरा कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ इस खम्भे में हैं, सो वे उसके निश्चय में हैं, खम्भे में पुतलियों का अभाव है; वैसे ही मन के निश्चय में जगत् है; आत्मा में कुछ नहीं बना। जिस पुरुष का मन सूक्ष्म हो गया है; उसको जगत् स्वप्न जान पड़ता है। जब उसने इसे स्वप्न जाना, तब वह इच्छा और त्याग किसका करे?

हे राम! जगत् की तब तक प्रतीति है, जब तक स्वरूप का साक्षात्कार नहीं हुआ। जब आत्मानुभव होगा, तब जगत् रस से युक्त कभी न भासित होगा। जैसे धूप छाया इकट्ठी नहीं होतीं, वैसे ही ज्ञान और जगत् इकट्ठे नहीं होते। आत्मज्ञान होने पर जगत् का अभाव हो जाता है। जैसे पूर्वकाल वर्तमानकाल में नहीं होता, वैसे ही आत्मा में जगत् नहीं होता। हे राम! यह जगत् भ्रम से भासित होता है और विचार करने से इसका अभाव हो जाता है। द्रष्टा-दर्शन-दृश्य की जो

⚙️ निर्वाण प्रकरण ५२१

त्रिपुटी भासित होती है, वह भी मिथ्या है। जैसे निद्रादोष से स्वप्न में ये तीनों भासित होते हैं और जागे मे इनका अभाव हो जाता है, वैसे ही अज्ञान से ये भासित होते हैं और ज्ञान से इस त्रिपुटी का अभाव हो जाता है। हे राम! जैसे मनोराज्य से मन में जगत् स्थित होता है, वैसे ही ये पर्वत, नदियाँ, देश, काल, जगत् भी जानो। इससे इस जगत्-भ्रम को त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित होओ। यह जगत् भ्रम से उदय हुआ है, विचार से नष्ट हो जावेगा और तुमको परम शान्ति प्राप्त होगी। हे राम! जिसका मन उपशम को प्राप्त हुआ है, वह पुरुष मौनी है। वह निरोध पद को प्राप्त हुआ है और संसार-समुद्र मे तरकर कर्मों के अन्त को पहुँच गया है। उसको पहाड़, नदियाँ आदि से युक्त सम्पूर्ण जगत् लीन हो जाता है। अज्ञान के नष्ट होने मे विद्यमान जगत् भी नष्ट हो जाता है; क्योंकि ज्ञानी शान्ति मे तृप्त है। वह ज्ञानवान् निरावरण होकर स्थित होता है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सर्वशान्त्युपदेशो नाम शताधिकैकसप्ततितमसर्गः ॥ १७१ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! जिस क्रम से बोधस्वरूप आत्मा जगत्-रूप होकर दिखता है, वह क्रमभेद की निवृत्त के लिए फिर मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जितना जगत् देख पड़ता है, उसका चित्त में निश्चय होता है। यह जगत् ज्ञानवान् को और अज्ञानी को भी चित्त से भासित होता है, परन्तु इतना भेद है कि अज्ञानी जगत् को सत् मानता है और ज्ञानवान् शास्त्रयुक्ति से देखकर पूर्वापर अर्थ के विचार से भ्रान्तिमात्र जानता है। यह जगत् जिस अविद्या से है, वह अविद्या भी कुछ वस्तु नहीं। जैसे सूर्य की किरणों में जल भासित होता है सो कुछ है नहीं, वैसे ही अविद्या कुछ वस्तु नहीं है। जितना स्थावर जङ्गम जगत् है, सो कल्प के अन्त में नष्ट हो जाता है। जैसे समुद्र मे एक बूँद निकालिये तो वह नष्ट हो जाती है, क्योंकि विभागरूप है, वैसे ही माया, अविद्या, सत्, असत् आदिक सब सम्बन्धों का अभाव हो जाता है; क्योंकि सब शब्द जगत् में हैं। जब जगत् लीन हुआ,

५२२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

मेघ शब्द कहाँ रहे ? और वास्तव में न कुछ उपजा है; न लीन होता है—एक ही चिदाकाश है। जो तुम कहो कि देह उपजती है; तो तुम देह और तत्त्व को स्वप्नवत् जानो। जो तुम कहो कि जगत् प्रलय में लीन होता है, इसमें कुछ है, तो नाश उरमी का होता है, जो असत्य है। जो तुम कहो कि जगत् असत्य है तो फिर क्यों भासता है, तो उपजी वस्तु भी सत् नहीं होती। जो तुम कहो कि महाप्रलय में चिदाकाश ही रहता है और वही जगद्रूप होकर दीखता है तो जगत् कुछ भिन्न वस्तु नहीं हुआ—बोधमात्र ही इस प्रकार होकर भासित होता है। जैसे बीज और वृक्ष में कुछ भेद नहीं, वैसे ही जिसमें जगत् भासित होता है, उसी का वह रूप है; कुछ उपजा नहीं। जब उपजा नहीं तो विकार और भेद कैसे हो? इसमें बोधमात्र ही अपने आपमें स्थित है। आत्मसत्ता कारण-कार्य से रहित परम शान्तरूप अपने आपमें स्थित है। वही जगद्रूप होकर दिखती है। देश, काल, पदार्थ भी सब महाप्रलयरूप हैं। जब महाप्रलय होता है, तब ब्रह्मा पर्यन्त सब पदार्थ नष्ट हो जाते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी का नाम भी नहीं रहता। अर्थ भी नहीं रहता। तब केवल बोधमात्र और बोध से भी रहित शेष रहता है, जो परम शान्तरूप है। उसमें वाणी और मन की गति नहीं—वह केवल अवेत्यचिन्मात्र सत्ता ही है। उसी को तत्त्ववेत्ता अनुभव कहते हैं, और कोई उसे नहीं जान सकता।

हे राम ! जो पुरुष अविद्यारूपी निद्रा से जागा है वह निराभास होता है; अर्थात् चित्त से चैत्य का सम्बन्ध टूट जाता है। उसको परम प्रकाशरूप आत्मपद प्राप्त होता है। उसकी स्वभाव में स्थिति होती है और परमस्वभाव प्रकृति का अभाव हो जाता है। हे राम ! परस्वभाव में भिन्न-भिन्न जो कुछ जगत् भासित होता था, सो सब एकरूप हो जाता है। जैसे स्वप्न में सब पदार्थ भिन्न-भिन्न दीखते हैं और जागे में सब एकरूप हो जाते हैं, अपना रूप ही भासित होता है, वैसे ही जब आत्मा का अनुभव होता है, तब जगत् अपना रूप ही प्रतीत होता है। हे राम ! एकरूप सब भासित होता है, जब और कुछ नहीं बना।

  • निर्वाण प्रकरण * ५२३

जैसे सुवर्ण के भूषण अग्नि में डालिये तो अनेक भूषणों का एक पिंड हो जाता है और एक ही आकार दिखता है, वैसे ही जब बोध का अनुभव होता है, तब सब एकरूप हो जाता है। हे राम! भूषणों के होते भी सुवर्ण ही था, इसी से सब एकरूप हो गया, वैसे ही जब बोध का अनुभव होता है, तब सब एकरूप ही भासित होता है। इससे जगत् के होते भी जगत् आत्मरूप है। जगत् है नहीं और हुए की तरह भिन्न-भिन्न जान पड़ता—जैसे मोमजल में तरङ्ग नहीं है और भासित होते हैं, तो भी जलरूप हैं—असम्यकदृष्टि में भिन्न-भिन्न लगते हैं।

हे राम! ज्ञानी को जीवन्मुक्ति और विदेह मुक्ति दोनों तुल्य हैं। जैसे भूषण के होते भी स्वर्ण है और भूषण के अभाव में भी स्वर्ण है, वैसे ही ज्ञानवान् को देह के होते भी ब्रह्म है और देह के अभाव में भी ब्रह्म है। जो अज्ञानी है, उसको नाना प्रकार का जगत् फुरता है। अज्ञानी वही है जिसको मन का सम्बन्ध है। हे राम! यह जगत् भिन्न-भिन्न फुरता है। जैसे काष्ठ के स्तम्भ में चितेरा पुतलियों की कल्पना करता है, वे और को नहीं दिखतीं, उसी के मन में होती हैं, वैसे ही भिन्न-भिन्न पदार्थरूपी पुतलियाँ अज्ञानी के मन में फुरती हैं और ज्ञानवान् को नहीं भासित होतीं। जब काष्ठरूप आधार होता है, तब चितेरा पुतलियों की कल्पना करता है, पर आश्चर्य देखो कि मनरूपी ऐसा चितेरा है कि आकाश में पदार्थरूपी पुतलियों की कल्पना करता है और वे बिना खोदी ही भासित होती हैं। हे राम! और दूसरा कुछ नहीं बना। जैसे किसी पुरुष ने कागज पर पुतली लिखी हो तो वह कागजरूप है और कुछ नहीं बनी, वैसे ही यह जगत् भी उसी ब्रह्म का स्वरूप है। हे राम! जब तुमको आत्मपद का अनुभव होगा, तब जितने जगत् के शब्द-अर्थ हैं, वे सब उसी में भासित होंगे। जैसे जिसने स्वर्ण को जाना, उसको भूषण के शब्द-अर्थ स्वर्ण ही भासित होते हैं, वैसे ही जब आत्मपद को जानोगे, तब तुमको जगत् के शब्द-अर्थ आत्मा ही में देख पड़ेंगे। हे राम! ये जीव महासूक्ष्मरूप हैं और इनमें अपनी-अपनी सृष्टि है। जब तक स्फुरण

५२४ ❖ योगवाशिष्ठ ❖

है, तब तक सृष्टि है । जब सृष्टि का फुरना अपनी ओर आना है, तब सब सृष्टि एक आत्मरूप हो जाती है । आकाश, काल, दिशा, पदार्थ सब आत्मा है । आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । वह अपने आपमें स्थित है, जो अद्वैत चिन्मात्रपद है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादनं नाम शताधिकद्विसप्ततितमसर्गः ॥ १७२ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! सब तत्त्ववेत्ताओं में श्रेष्ठ द्रष्टा और दृश्य का सम्बन्ध कैसे हुआ ? काल में कालत्व, आकाश में शून्यता और वायु में स्पन्दन कैसे हुआ है ? जड़ में जड़ता, भूतों में भूतता, संकल्प में स्पन्दन, सृष्टि में सृष्टित्व, मूर्ति में मूर्तित्व, भिन्न में भिन्नता और दृश्य में दृश्यता किससे हुई है, यह मुझसे कहिये, क्योंकि अर्ध-प्रबुद्ध का बोध के निमित्त कहना योग्य है । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ब्रह्म, विष्णु, रुद्र, ईश्वर आदिक सब प्रलयकाल में जिसमें लीन होते हैं, उसका नाम महाप्रलय है । हे राम ! ऐसा जो अनन्त आकाश है वह सम, शुद्ध, आदि-अन्त-मध्य से भी रहित, चैतन्यघन और अद्वैत है; जहाँ एक और दो शब्द भी नहीं है, जिसमें आकाश भी पहाड़ के समान स्थूल है, और ऐसा सूक्ष्म है कि 'है', 'नहीं', दोनों शब्दों से रहित अपने आपमें स्थित है । जैसे पाषाण का शिलाकोष होता है, वैसे ही वह चित्त के स्फुरण में रहित है । ऐसे अकारण परमात्मतत्त्व में सृष्टि का उपजना कैसे कहिये ? जैसे आकाश अपने आपमें स्थित है, वैसे ही ब्रह्म अपने आपमें स्थित है । हे राम ! एक निमेष के फुरने में जो वृत्ति अनेक योजन पर्यन्त जाती है, उसके मध्य जो अनुभव करनेवाली सत्ता है, उसमें तुम स्थित होकर देखो कि जगत् और उसकी उत्पत्ति कहाँ है ?

हे राम ! उत्पत्ति समवायकारण और निमित्तकारण से होती है, पर आत्मा निराकार, अद्वैत और सन्मात्र है—न समवायकारण है और न निमित्तकारण । आत्मा अच्युत है अर्थात् स्वरूप से कभी नहीं गिरता । तब वह समवायकारण कैसे हो ? वह निमित्तकारण भी नहीं; क्योंकि

निर्वाण प्रकरण

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निराकार है। इससे आत्मा में जगत् कुछ नहीं है, भ्रान्तिमात्र और अविद्या से भासित है। जो वस्तु हो नहीं और प्रत्यक्ष दिखे उसे अविद्याकृत जानिये। हे राम! ब्रह्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। जल में जो तरङ्ग और आवर्त उठते हैं, वे जलरूप हैं, जल से भिन्न कुछ नहीं जब तुम अपने आपमें स्थित होगे, तब जगत् का शब्द-अर्थ भिन्न न भासित होगा; क्योंकि कुछ दूसरी वस्तु नहीं है। हे राम! ब्रह्म अमूर्त है; उसमें यह मूर्ति कैसे उत्पन्न हो? यह भ्रान्तिमात्र है। जो वस्तु कारण से उपजी हो, वह सत् होती है और जो कारण बिना देख पड़े उसे भ्रममात्र जानिये। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा दिखता है तो उसका कोई कारण नहीं इससे मिथ्याभ्रम से भासित होता है, वैसे ही यह जगत् मिथ्या है, विचार किये से नहीं रहता। हे राम! आकाश काल आदि जो पदार्थ हैं वे सब शून्य हैं। आत्मा में न उदय हुए हैं और न अस्त होते हैं—ज्यों का त्यों आत्मा ही स्थित है।

इति श्री० नि० निर्वाणवर्णनं नामशताधिकत्रिषष्टितमसर्गः ॥ १६३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे आकाश अपनी शून्यत्ता में स्थित है, वैसे ही ब्रह्मरूपी आकाश अपने आपमें स्थित है। फिर वह कैसे किसी का कारण हो? कारण और कार्य तब होता है, जब द्वैत और आरम्भ, परिणाम होता है; पर आत्मा तो अद्वैत, अच्युत और निर्गुण है। उसमें आरम्भ कैसे हो? हे राम! जो कुछ जगत् तुमको भासित होता है, वह सब काठ की तरह मौन है, अर्थात् वहाँ मन का फुरना शून्य है। हे राम! जो कुछ द्वैत भासित होता है, वह भ्रममात्र है, जो कुछ हुआ होता तो ज्ञानी को भी प्रत्यक्ष होता पर ज्ञानकाल में नहीं भासित होता, इससे भ्रममात्र है। हे राम! पृथ्वी, जल आदि जो पदार्थ हैं, उनका फुरना स्वप्न की तरह है। जैसे स्वप्न में जो चेष्टा होती है, वह पास बैठे को नहीं दिखती, क्योंकि है ही नहीं, वैसे ही सृष्टि अकारण संकल्पमात्र है। हे राम! जैसे मिथ्या, खरगोश के सींगों का कारण कोई नहीं वैसे ही जगत् का कारण कोई नहीं। जो कुछ हो तो उसका कारण भी हो; पर जब कुछ है ही नहीं तो किसका

१२६ || ॐ योगवाशिष्ठ ॐ ||

कारण कौन हो ? राम ने पूछा, हे भगवन् ! जैसे वट के बीज में वृक्ष का भाव या अस्तित्व होता है, पर काल पाकर बीज से वृक्ष निकल आता है, वैसे ही इस जगत् का कारण परमाणु क्यों न हो ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सूक्ष्म से स्थूल संकल्पमात्र होता है । मैं भी कहता हूँ कि सूक्ष्म में स्थूल होता है परन्तु संकल्पमात्र होता है—कुछ सत्य नहीं होता । जो कहिये कि सत्य होता है तो नहीं हो सकता । जैसे राई के कणके से सुमेरु पर्वत का होना सम्भव नहीं, वैसे ही सूक्ष्म परमाणु से जगत् का उत्पन्न होना असम्भव है ।

हे राम ! सूक्ष्म परमाणु का कार्य भी जगत् तब कहा जाय, जब सूक्ष्म अणु भी आत्मा में पाया जाय । आत्मा तो अद्वैत है और उसमें द्वैत-अद्वैत या एक और दो कहने का अभाव है । आत्मा में जानना भी नहीं—केवल आत्मतत्त्वमात्र है । वह आधार-आधेय से रहित है । बीज भी तब परिणाम को प्राप्त होता है, जब उसको जल देते हैं और रक्षा करने का स्थान होता है । पर आत्मा आधार-आधेय से रहित केवल अपने भाव में स्थित और अद्वैत सत्तामात्र है । जैसे बन्ध्या के पुत्र का कारण कोई नहीं, वैसे ही जगत् का कारण कोई नहीं है । जब बन्ध्या का पुत्र ही नहीं तो उसका कारण कौन हो ? वैसे ही जगत् जब है ही नहीं तो ब्रह्म इसका कारण कैसे हो ? जिसको तुम दृश्य कहते हो वह द्रष्टा ही दृश्यरूप होकर स्थित हुआ है । हे राम ! जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होकर स्थित है, वैसे ही ब्रह्म ही जगत् आकार होकर दृष्टि में आता है । दृश्य भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं । जैसे समुद्र ही तरङ्ग और आवर्त्तरूप होकर भासता है, वैसे ही अनन्तशक्ति होकर परमात्मसत्ता ही स्थित है । हे राम ! मैं और तुम आदि जगत् के पदार्थ सब स्फुरण मात्र हैं । जैसे संकल्पनगर होता है, जो मन से रचा है, वैसे ही यह जगत् आत्मा में कुछ बना नहीं, केवल ब्रह्म अपने आपमें स्थित है, हमको तो सदा वही भासता है । हे राम ! आत्मा में यह जगत् न उदय होता है और न अस्त, सदा ज्यों का त्यों निर्मल शान्तपद है ।

सं० नि० तत्त्वज्ञानातिपादनं नामाशीतितमः सर्गः ॥९४॥

✵ निर्वाण प्रकरण ✵ ५२७

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जगत् का भाव-अभाव, जड़-चैतन्य, स्थावर-जङ्गम, सूक्ष्म-स्थूल, शुभ-अशुभ कुछ हुआ नहीं तो मैं तुमसे क्या कहूँ कि यह कार्य है और इसका यह कारण है? यह हुआ ही नहीं तो फिर कारण-कार्य कैसे हो? जो सब देश, सब काल और सब वस्तु हो वह कारण-कार्य कैसे हो? आत्मा केवल अपने आपमें स्थित है और जो है और नहीं की नाईं स्थित हुआ है, उसमें संवेदन है और उसके फुरने से जगत् भासता है। वह फुरना चैतन्यमात्र का विवर्त है और उस विवर्त से जगत्भ्रम हुआ है। जब वही फुरना उलटकर अपनी ओर आता है, तब जगत् भ्रम मिट जाता है और जब फुरता है तब ध्यान, ध्याता और ध्येयरूप होकर स्थित होता है। इसी का नाम जगत् है, और इसी में बन्धन और मुक्ति है। आत्मा में न बन्धन और न मोक्ष है। हे राम! जब तरङ्ग घन होकर बहता है, तब एक नदी होकर चलता है, वैसे ही जब वासना दृढ़ होती है, तब जगतरूप होकर स्थित होता और भासित होता है। जब ऐसी वासना दृढ़ हुई, तब रागद्वेष संकल्प में बन्धनवान् होता है और जब वासना क्षय होती है तब जगत् का अभाव होकर स्वच्छ आत्मा दिखता है। जैसे शरदकाल का आकाश स्वच्छ होता है-उससे भी निर्मल दिखता है। हे राम! जीव जो निकल जाता है सो मरता नहीं। मुआ तब कहा जाय, जब अत्यन्त अभाव को प्राप्त हो और न जाना जाय। इससे यह मरना नहीं, क्योंकि फिर जगत् भासता है। यह मरना सुषुप्ति की नाईं हुआ-जैसे सुषुप्ति से जागने पर जगत् भासता है और वही चेष्टा करने लगता है और जैसे स्वप्न और जाग्रत् होता है, वैसे ही मृत्यु और जन्म भी है।

यदि मरने का शोक उपजे तो जीने का सुख भी मानिये और जो जीने का हर्ष उपजे तो उसमें मरने का शोक मानिये-दोनों अवस्था शरीर की मम रची हैं। जब यह अवस्था शरीर की जानोगे तब तुम्हारा हृदय शीतल हो जायगा। जब संवेदन फुरने का अत्यन्त अभाव हो, तब परम शान्ति होती है। ध्यान, ध्याता और ध्येय तीनों

५२८ = * योगवाशिष्ठ *

का अभाव हो जाता है और अज्ञान भी नहीं रहता। जब ऐसा अभाव होता है, तब पीछे स्वच्छ निर्मल पद रहता है। हे राम! अब भी निर्मलपद है, परन्तु भ्रम से पदार्थसत्ता भासती है। जैसे निद्रा-दोष में केवल अनुभव में पदार्थसत्ता होकर भासती है और जागे में कहता है कि केवल भ्रममात्र ही था, वैसे ही इस जगत को भ्रममात्र जानो परमार्थ स्वरूप के प्रमाद में यह जगत दीखता है और स्वरूप में जागने में इसका अभाव हो जाता है। हे राम! जैसे स्वप्न में जीव अनहोना ही राज्य देखता है, वैसे ही तुम इस जगत को जानो। इसका फुरना ही इसके बन्धन का कारण है। जैसे कुसवारी कीड़ा आप ही स्थान बना-कर आप ही फँस मरता है और जैसे मद्यपान करनेवाला मद्यपान करके और का और बकता है और उससे बँधता है, वैसे ही जीव अपने संकल्प ही में बँधता है और जब संकल्प मिटता है, तब परमानन्द को प्राप्त होकर परम स्वच्छ शान्ति उदय होती है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमशान्तिनिर्वाणवर्णनं नाम शताधिकपञ्चमस्सर्गः ॥ १०५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जहाँ आकाश होता है, वहाँ शून्यत्ता भी होती है। जहाँ अवकाश होता है, वहाँ आकाश भी होता है और जहाँ आकाश है, वहाँ पदार्थ भी होते हैं। वैसे ही जहाँ चैतन्यसत्ता है, वहाँ सृष्टि भी भासती है। पर बनी कुछ नहीं, और सदा रहती है। जैसे सूर्य की किरणों में जल कदापि नहीं उत्पन्न हुआ और जलाभास सदा रहता है, क्योंकि उर्मी का विवर्त है, वैसे ही सृष्टि आत्मा का विवर्त है—जहाँ चैतन्यसत्ता है, वहाँ सृष्टि भी है। इसी पर मैं एक इतिहास तुमसे कहता हूँ, जिसके सुनने और समझने से जग-मृत्यु से रहित होगा। वह इतिहास परमसुन्दर और चित्त को मोहनेवाला आश्चर्यरूप है और मेरा देखा हुआ है। हे राम! एक काल में मेरा चित्त जगत से उपरत हुआ तो मैंने विचार किया कि किसी एकान्त स्थान में जाकर समाधान करूँ; क्योंकि जगत मोहरूप व्यवहार से दृढ़ हुआ है। जितना कुछ जानने योग्य है, उसको मैं जानता हूँ, परन्तु व्यवहार

निर्वाण प्रकरण ❇ ५२६

करके भी शान्तरूप होऊँ। तब ऐसा मैंने विचार किया कि निर्विकल्प समाधि करके परमशान्ति पाऊँ, और जो आदि, अन्त और मध्य से रहित परमानन्दस्वरूप अविनाशी पद है, उसमें विश्राम करूँ। हे राम! तब भी मैं ज्ञानवृत्तिमान् और परमात्मस्वरूप ही था, परन्तु चित्त की वृत्ति जब जगतभाव में उपगत हुई तो व्यवहार से भी एकान्त समाधि की इच्छा की कि जहाँ कोई क्षोभ न हो, वहाँ स्थित होऊँ। यों विचार कर मैं आकाश में उड़ा और एक देवता के पर्वत पर जा बैठा तो वहाँ बहुत प्रकार के इन्द्रियों के विषय देखे। अङ्गना गान करती हैं, सिर पर चमर होते हैं, और मन्द-मन्द पवन चलता है। पर वह भी मुझको आपातरमणीय अस्थिर लगे, क्योंकि वे किमी काल में किमी को सुखदायक नहीं—समाधिवाले के ये शत्रु हैं। उनको नीरस जानकर मैं फिर उड़ा और एक पर्वत की कन्दरा में, जो बहुत सुन्दर थी और जहाँ एक सुन्दर वन था, उसमें सुन्दर पवन चलता था, पहुँचा। ऐसे स्थान को मैंने देखा तो वह भी मुझको शत्रुवत् लगा, क्योंकि पक्षियों के शब्द होते थे और पवन का स्पर्श होता था व और भी अनेक विघ्न थे। उनको देखकर मैं आगे चला तो नागों के देश और सुन्दर नाग-कन्या देखीं, इन्द्रियों के बहुत सुन्दर विषय भी देखे, पर वे भी मुझको सर्पवत् लगे। जैसे सर्प का स्पर्श करने में अनर्थ होता है, वैसे ही मुझको विषय लगे। हे राम! जितने इन्द्रियों के विषय हैं, वे सब अनर्थ का कारण हैं। उनमें प्रीति मूढ़ और अज्ञानी करते हैं। फिर मैं समुद्र के किनारे गया और उसके पास जो पुष्प के स्थान थे, उनमें विचरा और कन्दरा और वन को देखता हुआ पर्वत, पाताल और दसों दिशा देखता फिरा। परन्तु मुझको कोई एकान्त स्थान पसन्द न आया। तब मैं फिर आकाश को उड़ा और पवन, मेघों, देवगणों, विद्याधरों और सिद्धों के स्थान लाँघता गया। आगे देखा कि कई ब्रह्माण्ड भूतों के उड़ते थे। उनमें मैंने अपूर्वभूत और नाना प्रकार के स्थान देखे।

फिर गरुड़ के स्थान लाँघे तो कहीं सूर्य का प्रकाश होता था और कहीं सूर्य का प्रकाश ही न था। फिर मैं चन्द्रमा के मण्डल को लाँघ

५३० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

गया और अग्नि के स्थान लाँघकर महाआकाश में गया, जहाँ इन्द्रियों की रोकना भी न था, क्यों इन्द्रियों के विषय कोई दृष्टि में न आते थे। केवल एक आकाश ही आकाश दिखता था और वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी मागों का अभाव था। हे राम! निदान में उस स्थान में गया, जहाँ भूत स्वप्न में भी न दिखते थे और सिद्धों की भी गति न थी। वहाँ मैंने संकल्प की एक कुटी रची और उसके साथ फूल और पत्तों से पूर्ण कल्पवृक्ष रचे और उसके एक ओर मैंने छिद्र रक्खा। मेरा तो सूक्ष्म संकल्प था, इसलिए सब प्रत्यक्ष प्रकट हुआ। उस कुटी को रचकर उसमें मैंने प्रवेश किया और संकल्प किया कि एक वर्ष पर्यन्त में समाधि में रहूँगा और उसके उपरान्त समाधि से उतरूँगा। ऐसे विचारकर मैंने पद्मासन बाँधा और समाधि म स्थित होकर परमशान्ति में एक वर्ष पर्यन्त स्थित हुआ, जहाँ कोई क्षोभ न था। जब वर्ष व्यतीत हुआ, तब वह भावी समाधि के उतरने की थी इसलिए वह संकल्प हुआ। जैसे पृथ्वी में बोया हुआ बीज काल पाकर अंकुर उगता है, वैसे ही वह संकल्प मन में उगा। प्रथम जैसे सूखा वृक्ष वसन्तऋतु में हरा हो आता है, वैसे ही प्राण फुरे। फिर जैसे वसन्तऋतु में फूल खिलते हैं, वैसे ही ज्ञान-इन्द्रियां खिलकर विकसित हुईं और फिर स्पन्दन जो अहंकाररूपी पिशाच है, वह फुरा कि मैं वशिष्ठ हूँ। फिर उसकी इच्छारूपी स्त्री फुरी। हे राम! वह वर्ष मुझको ऐसे व्यतीत हुआ, जैसे पलक का खोलना होता है। काल भी बहुत प्रकार से व्यतीत होता है। किसी को थोड़ा ही बहुत हो जाता है और किसी को बहुत थोड़ा हो जाता है। जब सुख होता है, तब बहुत काल भी थोड़ा लगता है और जब दुःख होता है, तब थोड़ा काल भी बहुत हो जाता है। हे राम! इस समाधि का जो मैंने वर्णन किया, यह शक्ति सब जीवों में है, परन्तु सिद्ध नहीं होती, क्योंकि नानाप्रकार की वासना से अन्तःकरण मलिन रहता है। जब अन्तःकरण शुद्ध हो, तब जैसा संकल्प करे वैसा ही सिद्ध होता है। पर मलिन अन्तःकरणवाले का संकल्प सिद्ध नहीं होता।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे आकाशकुटीवशिष्ठसमाधि वर्णनं नाम षट्शताधिकसप्ततितमस्सर्गः ॥ १७६ ॥

❋ निर्वाण प्रकरण ❋ ५३१

राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम तो निर्वाणस्वरूप हो, तुमको अहं- काररूपी पिशाच कैसे हुआ—यह मेरा संशय दूर कीजिये ! वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी जब तक शरीर का सम्बन्ध है, तब तक अहंकार दूर नहीं होता । जैसे जहाँ आधार होता है, वहाँ आधेय भी होता है और जहाँ आधेय होता है वहाँ आधार भी होता है, वैसे ही जहाँ देह होती है, वहाँ अहंकार भी होता है, और जहाँ अहंकार होता है, वहाँ देह भी होती है । हे राम ! अहंकार बिना शरीर नहीं रहता, पर उस अहंकार को अज्ञानरूपी बालक ने कल्पना की है । पर ज्ञानी का अहंकार नष्ट हो जाता है । हे राम ! यह अहंकार अविद्या ने उपजाया है । जो वास्तव में मिथ्या हो और भामित हो, वह अविद्या है । और जब अविद्या ही मिथ्या है, तो उसका कार्य अहंकार कैसे सत् हो ? यह केवल मिथ्या भ्रम से उदय हुआ है । जैसे भ्रम से वृक्ष में वैताल भामता है, वैसे ही भ्रम से अहंकाररूपी वैताल उदय हुआ है और इसका कारण अविचार सिद्ध है । विचार करने से इसका अभाव हो जाता है । जहाँ विचार होता है, वहाँ अविद्या नहीं रहती । जैसे जहाँ दीपक होता है, वहाँ अन्धकार नहीं रहता, क्योंकि दीपक के जलाने से अन्धकार का अभाव हो जाता है, वैसे ही विचार के उदय होने पर अविद्या का अभाव हो जाता है । जो वस्तु विचार करने से न रहे, उसे मिथ्या जानिये और जो आप ही मिथ्या है तो उसका कार्य कैसे सत्य हो ? इससे अहंकार को मिथ्या जानो ।

हे राम ! जैसे आकाश के वृक्ष का कारण कोई नहीं, वैसे ही अहंकार- का कारण कोई नहीं । मन सहित जाँ बाः इन्द्रियाँ हैं, शुद्ध आत्मा उनका विषय नहीं; क्योंकि वे साकार और दृश्य हैं । साकार का कारण निराकार आत्मा कैसे हो ? जो आकार हैं वे सब मिथ्या हैं; जो बीज होता है, उसमे अंकुर उत्पन्न होता है, तब जाना जाता है कि बीज से अंकुर उत्पन्न है; परन्तु बीज ही न हो तो उसका कार्य अंकुर कैसे उत्पन्न हो ? वैसे जगत् का कारण संवेदन ही न हो तो जगत् कैसे हो । जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा हो तो उसका कारण भी

५३२ 💥 योगवाशिष्ठ 💥

मानिये और जब दूसरा चन्द्रमा ही नहीं तो उसका कारण कैसे मानिये ?

हे राम ! ब्रह्म आकाश, अद्वैत, शुद्ध, फुरने से रहित, अच्युत और अविनाशी है, वह कारण कार्य कैसे हो ? हे राम ! पृथ्वी आदिक तत्त्व अविद्यमान हैं, पर भ्रम से भासते हैं। केवल शुद्ध आत्मा अपने रूप में स्थित है। जो तुम कहो कि अविद्यमान हैं, तो भासते क्यों हैं, तो उसका उत्तर यह है कि जैसे स्वप्न में अनहोती सृष्टि भासती है, वैसे ही यह जगत् भी अनहोता भासता है। जैसे भ्रम में आकाश में वृक्ष अनहोते भासते हैं तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं और संकल्पनगर रच लीजे तो चेष्टा भी होती है, परन्तु इसका स्वरूप संकल्पमात्र है, वास्तव में अर्थाकार कुछ नहीं होता और अपने काल में सत्य भासता है, पर जब संकल्प का लय होता है तब उसका भी अभाव हो जाता है—इससे आकाश वृक्ष की नाईं हुआ है। जैसे आकाश के वृक्ष भावना से भासते हैं, वैसे ही यह जगत् संकल्पमात्र है। स्वरूप में कुछ नहीं है, जो विचार करके देखिये तो इसका अभाव हो जाता है। हे राम ! शुद्ध आत्मतत्त्व अपने आपमें स्थित है, वही जगत् का आकार हो दिखता है—दूसरी वस्तु कुछ नहीं। जैसे स्वप्न में जितने पदार्थ दिखते हैं, वे सब अनुभवरूप हैं, वैसे ही जगत् भी ब्रह्मरूप है। हे राम ! हमको सदा वही भासता है तो अहंकार कहाँ हो ? न में अहंकार हूँ और न मेरा अहंकार है। केवल आकाश में अहंकार कहाँ हो ? हे राम ! न में हूँ और न मुझ में कुछ फुरना है; अथवा सब आत्मसत्ता में ही हूँ तो भी अहंकार न हुआ। हे राम ! हमारा अहंकार ऐसा है, जैसे अग्नि की मूर्ति लिखी होती तो उससे कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता दृश्यमात्र होती है, वैसे ही ज्ञानी का अहंकार देखने भर को है। उसे कर्तृत्व या भोक्तृत्व नहीं होता और वे अपने स्वभाव में स्थित हैं। सब ज्ञानवानों का एक ही निश्चय है कि ब्रह्म ही है और अहंकार का अभाव है। अहंकार न आगे था, न अब है और न फिर होगा—भ्रम से अहंकार शब्द जाना जाता है।

हे राम ! जब ऐसे जानोगे, तब अहंकार नष्ट हो जायगा। जैसे शरदकाल में मेघ देखने भर को वर्षा से रहित होता है, वैसे ही ज्ञानी का

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

५३३

अहंकार देखने भर को होता है। और की बुद्धि में भासता है, परन्तु ज्ञानी के निश्चय में असंभव है; क्योंकि उसका अहंप्रत्यय आत्मा में रहता है और परिच्छिन्न अहंकार का अभाव हो जाता है जब अहंकार नष्ट होता है, तब अविद्या का भी नाश हो जाता है और यही अज्ञान का नाश है—ये तीनों पर्याय हैं। हे राम! अपने स्वभाव में स्थित रहो और प्रकृत आचार करो; हृदय से शिलाकोषवत् हो रहो और बाहर इन्द्रियों की सब क्रियाएँ हों; अपने निश्चय को गुप्त रखो और सब इन्द्रियों को इस प्रकार धारण करो, जैसे आकाश सबको धारण कर रहा है; अन्तर में शिला के जठरवत् रहो । तब देखने भर को तुम में भी अहंकार दृष्ट होगा । जैसे अग्नि की मूर्ति लिखी दृष्टि में आती है, वैसे ही तुम में अहंकार दृष्ट होगा, परन्तु अर्थाकार न होगा । केवल ब्रह्मसत्ता ही भासेगी, और कुछ न भासेगा ।

इति श्रीयो० नि० विदितवेदाहंकारव० नामश० सप्तसप्ततिमस्सर्गः ॥७७॥

राम ने पूछा, हे भगवन्! बड़ा आश्चर्य है कि तुमने अहंकार के त्याग से परम सत्य की प्राप्ति का उपदेश किया है । यह परम दशा है और राग-द्वेष मल से रहित, निर्मल, उत्तम, अविनाशी और आदि-अन्त से रहित है । यह दशा तुमने परमविभुता के लिए कही है । हे भगवन्! सर्वदा, सब प्रकार सब वस्तुएँ वही ब्रह्मसत्ता है और समरूपसत्ता के अनुभव से परम निर्मल है तो शिलाख्यान किस निमित्त कहा है सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम! वह तो सबम, सर्वदा और सबसे रहित है, पर उसके बोध के लिए मैंने तुम से शिलाख्यान का दृष्टान्त कहा है । हे राम! ऐसा स्थान कोई नहीं, जहाँ सृष्टि न हो । सब स्थानों में सृष्टि है, पर आदि से कुछ नहीं बना और सर्वदा सृष्टि बसती है—शिला के कोष में भी अनेक सृष्टि है । जैसे आकाश में शून्यत्ता है, वैसे ही शिलाकोष में भी सृष्टि है । श्रीराम ने पूछा, हे भगवन्! जो सबमें सृष्टि बसती है तो आकाशरूप क्यों न हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे राम! यही मैं भी तुमसे कहता हूँ कि जो कुछ सृष्टि है वह सब आकाशरूप है। स्वरूप में सृष्टि उपजी ही नहीं, सर्वदा आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित

५३४ | * योगवाशिष्ठ *


है। और आकाश की बात क्या कहनी है। शिलाकोष में सृष्टि बसती है और आकाशरूप है, अर्थात् कुछ हुई नहीं। हे राम! पृथ्वी में ऐसा अणु कोई नहीं, जिसमें सृष्टि न हो। अणु-अणु में सृष्टि है और सब ओर से बसती है, परन्तु परमार्थ से कुछ नहीं बना, केवल आत्मरूप है और सब सृष्टि शब्दमात्र है। जैसे यह सृष्टि भासती है, वैसे ही वह भी है। जो यह शब्दमात्र है तो वह भी शब्दमात्र है और जो यह सत्य भासती है तो वह भी सत्य भासती है।

हे रामजी! ऐसा कोई जल का कण नहीं, जिसमें सृष्टि न हो। सभी में सृष्टि है और यह आश्चर्य देखो कि इसके बिना कुछ नहीं। ऐसा कोई अग्नि और वायु का कण नहीं, जिसमें सृष्टि न हो। सबमें सृष्टि है और वह आकाशरूप है, कुछ बना नहीं—ब्रह्मसत्ता अपने आपमें सदा ज्यों की त्यों स्थित है। हे राम! आकाश में ऐसा अणु कोई नहीं, जिसमें सृष्टि न हो, परन्तु कुछ उपजी नहीं। ऐसा ब्रह्म अणु कोई नहीं, जहाँ सृष्टि न हो, परन्तु स्वरूप में कुछ हुई नहीं—ब्रह्मसत्ता अपने आपमें सदा स्थित है। हे राम! ऐसा अणु कोई नहीं, जिसमें ब्रह्मसत्ता नहीं, और ऐसा कोई चित्अणु नहीं, जिसमें सृष्टि नहीं। पर जैसे किसी ने अग्नि कही और किसी ने उष्णता कही तो उसमें भेद कोई नहीं, वैसे ही कोई ब्रह्म कहते हैं और कोई जगत कहते हैं। शब्द दो हैं, परन्तु वस्तु एक ही है। जगत ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही जगत है, कुछ भेद नहीं। जैसे बहते जल का शब्द होता है, पर उससे कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता, वैसे ही जगत मुझको कुछ पदार्थ नहीं भासित होता है, क्योंकि दूसरी कोई वस्तु बनी नहीं। मैं, तुम और यह जगत्, सुमेरु आदि पर्वत, देवता, किन्नर, दैत्य, नाग इत्यादि सब जगत निर्वाणस्वरूप हैं—आत्म-तत्त्व में कुछ नहीं बना। ये बोलते-चालते जो जीव भासते हैं, उसे स्वप्न की नाईं जानो। जैसे कोई पुरुष सोया हो और स्वप्न में उसे नाना प्रकार के युद्ध होते या यन्त्र बजते और चेष्टा होती दिखाई दें, पर जो उसके निकट जाग्रत पुरुष बैठा हो, उसको कुछ नहीं भासित

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५३५

होता, क्योंकि वना कुछ नहीं और उसको सब कुछ भासता है, वैसे ही ज्ञानी के हृदय में जगत् शून्य है और अज्ञानी को भ्रम से नाना प्रकार का दिखता है। इससे हे राम! इस जगत् को स्वप्नवत् जानकर प्राकृत आचार करो और हृदय में शिला की नाईं हो कि कुछ न फुरे। ब्रह्म और जगत् में रञ्च भी भेद नहीं। ब्रह्म ही जगत् और जगत् ही ब्रह्म है। जगत् का स्पष्ट अर्थ ब्रह्म से भिन्न नहीं।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादनं नाम शताधिकाष्टसप्ततितमसर्गः ॥ १७८ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने आकाशकोष में कुटी बनाकर एक वर्ष की समाधि लगाई तो उसके अनन्तर जो वृत्तान्त हुआ सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब मैं समाधि मे जगा, तब आकाश में एक परम मनोहर वीणा की तान के सदृश अङ्गना का शब्द सुना। तब मैंने विचार किया कि मैं तो बहुत ऊँचे पर आया हूँ, जहाँ सिद्धों की भी गति नहीं और सिद्धों से भी तीन लाख योजन ऊँचा आया हूँ। यह शब्द कहाँ से आया ? ऐसे विचारकर मैं देखने लगा तो दशों दिशाओं में आकाश ही दीखा, परन्तु सृष्टि का कर्त्ता कोई न देख पड़े। तब मैंने विचार किया कि सृष्टि आकाश में होती है, इससे मैं आकाश ही हो जाऊँ और इस शब्द को जान पाऊँ कि किसका शब्द है। बल्कि आकाश को भी त्यागकर चिदाकाश हो जाऊँ, जहाँ भूताकाश भी कुटी सा भासता है, तब इसका भी अन्त भासेगा और जान लूँगा कि यह किसका शब्द होता है। ऐसे विचारकर मैंने निश्चय किया कि यह शरीर यहाँ रहे और नेत्र मूँदे रहें। तब पद्मासन लगाकर मैंने बाहर की इन्द्रियों को रोका और जो इन्द्रियों की वृत्ति शब्द आदि को ग्रहण करती थी, उसको भी रोक लिया। निदान भीतर-बाहर की सब वृत्तियों के साथ अहंवृत्ति त्यागकर मैं आकाशरूप हो गया। जैसे इस ब्रह्माण्ड में आकाश का अन्त नहीं मिलता, वैसे ही मैं इसको त्यागकर चिदाकाशरूप हो गया, जिसका संकल्प ही रूप है। उसको भी त्यागकर मैं बुद्धि-आकाश में आया। फिर उसको भी त्यागकर

५३६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

चिदाकाश में आया और उस शब्द को सुनने के संकल्प में चिदाकाश- रूप हो गया । जैसे समुद्र में मिली जल की बूँद समुद्ररूप हो जाती है, वैसे ही मैं चिदाकाश हो गया, जो निराकार और निराधार है; सबको धारण कर रहा है और परमानन्दस्वरूप, शान्त और अनन्त है और जिसमें सब ब्रह्माण्ड प्रतिबिम्बित होते हैं । जब मैं आत्मा के आदर्श में स्थित हुआ, तब मुझको अनन्त सृष्टियाँ अपने आपमें भासित होने लगीं ।

जैसे सूर्य की किरणों में त्रसरेणु होते हैं, वैसे ही ब्रह्म में सृष्टियाँ हैं । परन्तु जीव जीव की अपनी-अपनी सृष्टि है । एक की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता । जैसे कई एक मनुष्य सोये हों और अपनी-अपनी स्वप्नसृष्टि को देखें तो उसमें अपना आकाश और काल देखते हैं, एक की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता, परन्तु ज्ञानी सब सृष्टियाँ अपने में देखता है, वैसे ही मुझको सब सृष्टियाँ चिदाकाश में भासित हुईं । पर जीवों को अपनी-अपनी सृष्टि भासती थी । हे राम ! एक सृष्टि ऐसी भासी कि उसमें कोई आवरण न था, जैसे पृथ्वी के चौफेरे समुद्र होते हैं—कहीं-कहीं एक ही भूत का आवरण था । कहीं ऐसी सृष्टि दृष्टि में आई जिस पर पाँचों तत्त्वों का आवरण था । प्रथम पृथ्वी का, दूसरा जल का, तीसरा अग्नि का, चतुर्थ वायु का और पञ्चम आकाश का । कहीं ऐसी सृष्टियाँ देखीं जिन पर चार ही तत्त्वों का आवरण था । कहीं ऐसी सृष्टि देखी जिस पर षट् आवरण थे । कहीं दश आवरण नजर आये, कहीं ऐसी सृष्टि दृष्टिगत हुई जिस पर षोडश आवरण थे और कहीं ऐसी देख पड़ी जिन पर चौंतीस आवरण थे । कहीं तत्त्वों के छत्तीस आवरण संयुक्त सृष्टियाँ भी देखीं । हे राम ! इस प्रकार मैंने चिदा- काश में अनन्त सृष्टियाँ देखीं, परन्तु सब आकाशरूप थीं; आत्मा में कुछ भिन्न वस्तु न थी । मन के फुरने से मुझको सृष्टि देख पड़ी, क्योंकि मन संकल्पमात्र ही था—कुछ बना नहीं । जैसे दीवार पर चित्र लिखे हों, वैसे ही आत्मारूपी दीवार पर चित्ररूप सृष्टि दीखी कि अपने-अपने व्यवहार में सब मग्न हैं ।

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

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हे राम ! ऐसी अनन्त सृष्टियाँ देखीं. पर एक की सृष्टि को दूसरा न जानता था; सब अपनी-अपनी सृष्टि को जानते थे । जैसे अनेक मनुष्य एकही काल में शयन करते हैं और अपनी-अपनी स्वप्न सृष्टि देखते हैं, तो भी दूसरी सृष्टि को वे नहीं जानते। हे राम ! कुछ ऐसी सृष्टियाँ देखीं, जहाँ न सूर्य का प्रकाश था न चन्द्रमा का। न अग्नि का प्रकाश था । पर उनकी चेष्टा होती थी । कहीं ऐसा सृष्टि देखी, जहाँ सूर्य और चन्द्रमा हैं और कहीं ऐसी देखी कि उसको काल का ज्ञान भी नहीं और न वहाँ कोई दिन है, न रात्रि है, सदा एक समान रहती हैं। कहीं महाशून्यरूप तम ही दिखा, कहीं ऐसा दिखा कि देवता ही रहते हैं। कहीं मनुष्य ही रहते हैं। कहीं तिर्यक् पशुपक्षी कीट-पतंग ही रहते हैं। कहीं दैत्य ही देखे। कहीं जल ही देखा, और कोई तत्त्व न देख पड़ा । कहीं ऐसी सृष्टि नजर आई, जहाँ शास्त्र का विचार ही नहीं। कहीं शास्त्र-पुराण विपर्यरूप थे और कहीं समान थे। कहीं प्रलय होता देखा, और कहीं उत्पत्ति होती देखी । हे राम ! इसी प्रकार अनन्त सृष्टियाँ मैंने देखीं, परन्तु जब स्वरूप की ओर देखता, तब केवल ब्रह्मरूप ही दिखता और कुछ बना न दिखता। और जब संकल्प करके देखता, तब अनन्त सृष्टि दिखती । कहीं ऐसी सृष्टि दिखती, जहाँ बालक, वृद्ध, यौवन अवस्था की मर्यादा ही नहीं—जैसे जन्मे वैसे ही रहे—कहीं ऐसी सृष्टि है कि चन्द्रमा और सूर्य का प्रकाश नहीं, अग्नि के प्रकाश से उनकी चेष्टा होती है। कहीं ऐसा दिखा कि ऊपर को चले जावें; कहीं नीचे को चले जावें । कहीं ऐसे प्राणी देखे; जो शास्त्र की मर्यादा मे चेष्टा करते हैं । कहीं कृमि ही बसते हैं, और कोई नहीं । हे राम चैतन्यरूपी वन में मैंने अनन्त सृष्टिरूपी वृक्ष देखे, परन्तु दूसरा कुछ बना न देख पड़ा, सब चैतन्य का आभास ही नजर आया । जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है और बना कुछ नहीं, वैसे ही सृष्टि बनी कुछ नहीं । जैसे आकाश में नीलापन और दूसरा चन्द्रमा भासता है, वैसे ही अन-होती सृष्टि दिखती है । जैसे मरुस्थल में जल और गन्धर्वनगर की सृष्टि दिखती है, वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टि भासित होती है।

५३८ * योगवाशिष्ठ *

हे राम ! ब्रह्मरूपी आकाश में चित्तरूपी गन्धर्व ने सृष्टि रची है, पर स्वरूप से भिन्न कुछ उपजा नहीं—सब अकारण है । जो समवायकारण बिना सृष्टि भासित हो, उसे भ्रममात्र जानिये । जैसे स्वप्न की सृष्टि बिना कारण होती है और अर्थाकार मानती है तो भी अजात जात है अर्थात उपजे बिना उपजी भासित है, वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टि आभास मात्र है । हे राम ! आभास में भी अधिष्ठानसत्ता होती है, जिसके आश्रय से आभास फुरता है । सच्चिदानन्द ब्रह्म सबका अधिष्ठान है । सब आत्मसत्ता में ही स्थित हैं—ब्रह्मसत्ता से भिन्न कुछ नहीं । चेतना में ही नानात्व भासता है, परन्तु नानात्व हुआ कुछ नहीं; आत्मा ही सर्वदा अपने आप में स्थित है । जैसे क्षीरसमुद्र में वायु से नाना प्रकार के तरङ्ग उठते दीखते, तो भी क्षीर से भिन्न नहीं—ऐसा क्षीरसमुद्र का तरङ्ग कोई नहीं, जिसमें घृत न हो, वैसे ही जो कुछ पदार्थ हैं, उन सबमें ब्रह्मसत्ता प्रविष्ट है । जैसे दूध को मथने से घृत निकलता है, वैसे ही विचार करने से जगत् ब्रह्मस्वरूप भासता है—कुछ भिन्न नहीं दिखता, क्योंकि कारण द्वारा कुछ नहीं उपजा, परमार्थ से केवल आत्मसत्ता अपने आप में स्थित है । स्फुरणरूपी भ्रम से कुछ हुआ दृष्टिगत होता है और जब स्फुरणरूपी भ्रम निवृत्त होता है, तब ब्रह्म ही दिखता है; इससे अविद्यारूप स्फुरण को त्यागकर अपने निर्विकल्पस्वरूप में स्थित होओ । तब जगद्भ्रम निवृत्त हो जायगा ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगज्जालसमुद्भवोनाम शताधिकनवतमतितमसर्गः ॥ १७६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार मैंने सृष्टि देखी, तब फिर विचार हुआ कि वह शब्द करनेवाला कौन था, उसको देखूँ । तब मैं देखने लगा तो देखते-देखते वीणा का सा शब्द सुना । परन्तु उसको न देखा । तब फिर देखा तो शब्द का अर्थ भासित होने लगा । फिर देखा तो एक स्त्री दीख पड़ी, जिसका शरीर सुवर्णसदृश था; बहुत सुन्दर वस्त्र पहिने हुए थी और सब अङ्ग भूषणों से भूषित थे; मानो लक्ष्मी या भवानी थी । जब मैंने उसको देखा, तब वह मेरे निकट आई