योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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<div align="center">☸ योगवाशिष्ट ☸</div>रात्रि के क्षीण होने पर सूर्य उदय होता है वैसे ही मोह के निवृत्त होने पर आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होता है और जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है तब चित्त नष्ट हो जाता है। जैसे सूखा पत्ता अग्नि में जल जाता है वैसे ही ज्ञानवान् की चित्त उपाधि नष्ट हो जाती है।
हे राम! जो जीवन्मुक्त महात्मा और परावरदर्शी पुरुष है, जिसको सर्वत्र ब्रह्म ही दीखता है। उसका चित्त सत्यपद को प्राप्त होता है। वह चित्त सत्य कहाता है और उसमें वासना भी नहीं देख पड़ती। वह चैतन्य मन है और वह चित्त सत्यपद को प्राप्त हुआ होता है। यह जगत् ज्ञानवान् को लीलामात्र भासित होता है। वह हृदय से शान्तिरूप और नित्य तृप्त है। उसको सर्वदा आत्मज्योति भासित होती है। विवेक द्वारा उसके चित्त से जगत् की सत्ता निवृत्त हो गई है और उसने स्व-रूप में स्थिति पाई है। यह चित्तसत्ता कहाती है। फिर वह कर्म-चेष्टा करता भी देख पड़ता है और मोह को नहीं प्राप्त होता। जैसे भुना बीज नहीं उगता, वैसे ही ज्ञानी की चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती। पर जो अज्ञानी हैं उनकी वासना मोहसंयुक्त है। जैसे कच्चा बीज उगता है, वैसे ही अज्ञानी वासना से फिर फिर जन्म लेता है। पर जिस चित्त की आसक्ति निवृत्त हो गई है उसकी वासना जन्म का कारण नहीं होती। वह चित्तसत्ता कहाती है। हे राम! जिन पुरुषों ने पाने योग्य पद पाया है और ज्ञानाग्नि से चित्त दग्ध किया है वे फिर जन्म नहीं लेते। जो कुछ जगत् है, वही सब उनकी दृष्टि में ब्रह्मरूप है, जैसे वृक्ष और तरु नाममात्र को दो हैं पर वास्तव में एक ही हैं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् नाममात्र को दो हैं पर वास्तव में एक ही हैं। जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले जलरूप हैं वैसे ही ब्रह्म में जगत् ब्रह्मरूप है। चैतन्य आत्मारूपी मिरच में जगत्रूपी तीक्ष्णता है।
हे राम! ऐसे ब्रह्म तुम हो। जो तुम कहो कि मैं चित्त नहीं, तो यह कुछ माना जाता है, क्योंकि जो तुम कहो कि मैं जड़ हूँ तो तुम आकाशवत् हुए। तुम में फिर कलना का उल्लेख कैसे हो? जो चैतन्य हो तो शोक किसका करते हो और जो चिन्मय हो तो निरायास
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ <span style="float:right;">७</span>
आदि अन्त से रहित हुए। निदान सब तुम ही हो। अपने स्वरूप को स्मरण करो, तब शान्ति पाओगे। तुम सब भावों में स्थित हो और सबको उदय करनेवाले शान्तरूप, चैतन्य ब्रह्मरूप हो। हे रामजी ! ऐसी जो चैतन्यरूपी शिला है उसके उदय में वासनारूपी फुरना कहाँ हो ? वह तो महाघनरूप है। हे राम ! जो तुम हो वही ब्रह्म है, उसमें और तुम में कुछ भेद नहीं। वही ब्रह्म सत् और असतरूप होकर भासता है। उसके भीतर सब पदार्थ हैं, उसमें नानात्व और 'अहं' 'त्वं', 'अज्ञ', 'तज्ञ' की कुछ कलना नहीं। ऐसा जो सत्यरूप चिद्धन ब्रह्ममय आत्मा है, उसको नमस्कार है। हे राम ! तुम्हारी जय हो। तुम आदि और अन्त से रहित विशाल हो, शिला की तरह ठोस चिद्धनस्वरूप और आकाश की भाँति निर्मल हो। जैसे समुद्र में तरंगें हैं, वैसे ही तुम में जो जगत् है सो लीलामात्र है। तुम अपने घनस्वरूप में स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्रामदृढ़ीकरणं नाम द्वितीयसर्गः ॥ २ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे निष्पाप राम ! जिस चैतन्यरूपी समुद्र में जगतरूपी तरङ्ग उठते और लीन हो जाते हैं उस अनन्त आत्मभाव की भावना से मुक्त और भाव-अभाव से रहित तुम हो। ऐसा जो चिदात्म तुम्हारा स्वरूप है वही सब जगतरूप है; तब वासनादिक आवरण कहाँ हैं ? जीव और वासना सब आत्मा का किञ्चन है दूसरी वस्तु कुछ नहीं, तब और कथा और प्रसंग कैसे हो ? हे राम ! महासरल गम्भीर और प्रकाशरूप जो चैतन्य समुद्र है वह तुम्हारा रूप है और रामरूपी एक तरङ्ग उठ आया है। सो समुद्र तुम हो। ऐसा जो आत्मतत्त्व है वह जगतरूपी होकर व्यापारयुक्त भासित होता है। जैसे अग्नि से उष्णता, फूल से सुगन्ध, कज्जल से कालापन, बर्फ से सफेदी, गुड़ से मधुरता और सूर्य से प्रकाश भिन्न नहीं, वैसे ही ब्रह्म से अनुभव भिन्न नहीं। वह नित्य रूप है। अनुभव से अहं भिन्न नहीं, अहं जीव से भिन्न नहीं, जीव से मन भिन्न नहीं, मन से इन्द्रियाँ भिन्न नहीं, इन्द्रियों से देह भिन्न नहीं और देह से जगत् भिन्न नहीं। इस प्रकार महाचक्र जो प्रवृत्त
८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
हुआ है सो कुछ हुआ नहीं । न शीघ्र प्रवर्तन है न चिरकाल का प्रवर्त्ता है । न कोई न्यून है और न अधिक है । सर्वदा एक अखण्डसत्ता परमात्मात्त्व है । जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही ब्रह्मसत्ता अपने आप में स्थित है । वही सत्ता वज्रभूत और वही पूर्ण होकर स्थित है । द्वैतकल्पना कुछ नहीं । ऐसे जो पुरुष अपने स्वरूप में स्थित है, वह जीवन्मुक्त है । ऐसा जो ज्ञानवान् है वह मन, इन्द्रिय और शरीर की चेष्टा भी करता है, पर उसको कर्तव्य का लेप नहीं लगता ।
हे राम ! ज्ञानवान् को न कुछ त्यागने योग्य रहता है और न ग्रहण करने योग्य । यह सब पदार्थों से निर्लिप्त रहता है । जब तक इसको ग्रहण और त्याग की बुद्धि होती है तब तक यह संसार के सुख-दुःख का भागी होता है । जिसके लिए हेय ( त्यागने योग्य ) और उपादेश ( ग्रहण करने योग्य ) कुछ नहीं रहता, वह सुख-दुख का भागी नहीं होता । हे राम ! जो कुछ जगत् है, वह एक अद्वैत आत्मतत्त्व है, अन्य कुछ नहीं । जैसे घट मठ की उपाधि से आकाश नाना प्रकार का और समुद्र तरङ्गों से अनेक रूप भासित होता है पर नानात्वभाव को नहीं प्राप्त होता, वैसे ही आत्मा में नाना प्रकार का जगत् भासता है और नानात्व को नहीं प्राप्त होता । तुम ऐसे स्वरूप को जानकर उसमें स्थित हो, बाहर से अपने वर्णाश्रम का व्यवहार करो, पर हृदय से पत्थर की नाईं हर्ष-शोक से रहित स्थित हो । संवित्मात्र आत्मा को जो अपना रूप देखता है वही सम्यक्दर्शी है, उसका अज्ञान और मोह नष्ट हो जाता है । जैसे नदी का वेग मूलसहित तट के वृक्ष को काटता है वैसे ही आत्म-ज्ञान मोहसहित अज्ञान को काटता है । मित्रता, वैर, हर्ष, शोक, राग, द्वेष आदिक जो विकार हैं वे चित्त में रहते हैं, उसका तो चित्त नष्ट हो जाता है ।
हे राम ! ज्ञानी सोता भी देख पड़ता है, पर कदाचित् नहीं सोता । जिसका अनात्मा में अहंभाव निवृत्त हुआ है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह पुरुष चाहे इस लोक को मार डाले तो भी उसने किसी को नहीं मारा और न उसे कर्मबन्धन होता है । हे राम ! जो वस्तु न
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६
हो और न भासित हो उसको मायामात्र जानिये। ज्ञान से वह नष्ट हो जायगी। जैसे तेल के बिना दीपक शान्त हो जाता है वैसे ही ज्ञान से वासना का क्षय हो जाता है और चित्त अचित्त हो जाता है। जिसके लिए सुख-दुःख का ग्रहण-त्याग नहीं, वह जीवनमुक्त आत्मस्थित है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मैकप्रतिपादनं नाम तृतीयसर्गः ॥ ३ ॥
वशिष्टजी बोले, हे राम ! मन, बुद्धि, अहंकार और इन्द्रिय आदिक जो दृश्य पदार्थ हैं, वे सब वही अचिन्त्य चिन्मात्र है और जीव भी इससे अभिन्न है। जैसे सुवर्ण और भूषण में कुछ भेद नहीं, वैसे ही चिन्मात्र और जीवादिक अभिन्न हैं। जब तक चित्त अज्ञान में होता है तब तक जगत् (जन्म-मरण) का कारण होता है; पर जब ज्ञान अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब चित्तादिक का अभाव हो जाता है। अध्यात्म-विद्या जो वेदान्तशास्त्र है उसके अभ्यास से अज्ञान नष्ट हो जाता है। जैसे अग्नि के तेज से शीत का अभाव हो जाता है वैसे ही अध्यात्म-विद्या के विचार और अभ्यास से अज्ञान नष्ट हो जाता है। जब तक अज्ञान का कारण तृष्णा उपशम को नहीं प्राप्त होती तभी तक अज्ञान है। जब तृष्णा नष्ट हो तब जानिये कि अज्ञान का अभाव हुआ। हे राम ! तृष्णारूपी विशूचिका रोग नष्ट करने का मन्त्र अध्यात्मशास्त्र ही है। उसके अभ्यास से तृष्णा क्षीण हो जाती है। जैसे शरत्काल में कुहरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्म अभ्यास से चित्त शान्त हो जाता है; और जैसे शरत्काल में मेघ नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही विचार से मूर्खता नष्ट हो जाती है। जब चित्त अचित्तता को प्राप्त होता है तब वासना-भ्रम क्षीण हो जाता है। जैसे तागे से मोती पिरोये होते हैं और तागे के टूटने से मोती भिन्न भिन्न हो जाते हैं, वैसे ही अज्ञान के नष्ट होने पर मन आदिक सब नष्ट हो जाते हैं। जो पुरुष अध्यात्मशास्त्र के अर्थ को नहीं धारण करते और न प्रीति ही करते हैं वे पापी कीटादिक नीचयोनि को प्राप्त होंगे।
हे कमलनयन ! तुममें जो कुछ मूर्खता और चञ्चलता थी, वह
१० ❊ योगवाशिष्ठ ❊
नष्ट हो गई है और जैसे पवन के ठहरने से जल अचल होता है, वैसे ही तुम स्थिर और भाव-अभाव से रहित परम आकाश के समान निर्मल पद को प्राप्त हुए हो । हे राम ! मैं ऐसा मानता हूँ कि मेरे वचनों से तुमको बोध हुआ है और विस्तृत अज्ञानरूपी निद्रा से तुम जागे हो । साधारण जीव भी मेरी वाणी से जग जाते हैं । फिर तुम तो अति उदार-बुद्धि हो । तुम्हारे जागने में क्या आश्चर्य है ? हे राम ! जब गुरु दृढ़ होता है और शिष्य भी शुद्धपात्र होता है, तब गुरु के वचन उसके हृदय में प्रवेश करते हैं । सो मैं गुरु भी समर्थ हूँ, मुझको अपना स्वरूप सदा प्रत्यक्ष है और सतशास्त्र के अनुसार मैंने वचन कहे हैं । तुम्हारा हृदय भी शुद्ध है, उसमें वे प्रवेश कर गये हैं । जैसे तप्त पृथ्वी के खेत में जल प्रवेश कर जाता है, वैसे ही तुम्हारे हृदय में हमारे वचनों ने प्रवेश किया है । हे राघव ! हम महानुभाव रघुवंशकुल के बड़े गुरु के गुरु हैं; तुमको हमारे वचन ग्रहण करना आता है । अब खेद से रहित होकर अपने प्रकृत आचार को करो । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार मुनीश्वर ने कहा । तब सूर्य अस्त होने लगे और सब सभा परस्पर नमस्कार करके अपने अपने स्थान को गई । रात्रि व्यतीत होने पर सूर्य की किरणों के निकलते ही सब फिर आ बैठे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तभावाभाववर्णनं नाम चतुर्थःसर्गः ॥ ४ ॥
रामजी बोले, हे मुनीश्वर ! मैं परम स्वस्थ होकर अपने स्वरूप में स्थित हूँ और आपके वचनों की भावना से जगज्जाल के रहते भी मुझको शान्ति मिल गई है । आत्मानन्द से मैं तृप्त हुआ हूँ—जैसे बड़ी वर्षा से पृथ्वी तृप्त होती है—और प्रसन्नता को पाकर स्थित हूँ । सब ओर से केवल आत्मरूप मुझको भासता है और नानात्व का अभाव हुआ है । जैसे कुहरे से रहित दिशा और आकाश निर्मल भासता है वैसे ही सम्यकज्ञान से मुझको शुद्ध आत्मा भासता है और मोह निवृत्त हो गया है । मोहरूपी जङ्गल में जो तृष्णारूपी मृग और राग-
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ११
द्वेष आदिक धूल और कुहरा था सो सब निवृत्त हो गया है और ज्ञान-रूपी वर्षा से वह शान्त हो गया है। अब मैं आत्मानन्द को प्राप्त हुआ हूँ, जो आदि अन्त से रहित और अमृत है; बल्कि अमृत का स्वाद भी उसके आगे तुच्छ लगता है। ऐसे आनन्द से मैं अपने स्वभाव में प्राप्त हुआ हूँ। मैं राम अर्थात् सबमें रमनेवाला हूँ; मेरा मुझको नमस्कार है।
अब मैं सब सन्देह से रहित हूँ और सब संशय और विकार मेरे नष्ट हो गये हैं। जैसे प्रातःकाल होने से निशाचर और बैताल आदिक छिप जाते हैं, वैसे ही राग-द्वेषादिक विकारों का अभाव हुआ है और निर्मल विस्तीर्ण हिम की नाईं हृदयकमल में मैं स्थित हूँ। जैसे भँवरा फिरता फिरता कमल में आकर टिकता है, वैसे ही मैं आत्मरूपी सार में स्थित हूँ। अविद्यारूपी कलङ्क आत्मा को कहाँ था ? मैं तो निश्चय से निर्मल हूँ। जैसे सूर्य के उदय होने पर तम का अभाव हो जाता है वैसे ही मेरा संशय और अविद्या नष्ट हुई है। अब मुझे सर्वत्र आत्मा भासता है और कलना कोई नहीं है। भावित आकार अपने स्वरूप को प्राप्त हुआ। मैं पूर्व प्रकृति को देखकर हँसता हूँ कि क्या जानता था और क्या करता था। मैं तो नित्य शुद्ध, ज्यों का त्यों, आदि-अन्त से रहित हूँ। हे मुनीश्वर ! तुम्हारे वचनरूपी अमृत के समुद्र में मैंने स्नान किया है और उससे अजर अमर आनन्दपद को पाकर सूर्य से भी ऊँचे पद को प्राप्त हुआ हूँ। मैं वीतशोक होकर परम शुद्धता, समता, शीतलता और अद्वैत अनुभव को पा गया हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे राघवविश्रान्तिवर्णनं नाम पञ्चमसर्गः ॥ ५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे महाबाहो ! फिर भी मेरे परम श्रेष्ठ वचन सुनो; यह तुम्हारे हित की कामना से मैं कहता हूँ। अब तुम आत्मपद को प्राप्त हुए हो; परन्तु बोध की वृद्धि के निमित्त फिर सुनो। इसके सुनने से अल्पबुद्धि भी आनन्दपद को प्राप्त होता है। हे राम ! जिसको अनात्म में आत्माभिमान है और आत्मज्ञान नहीं हुआ, उसको इन्द्रियरूपी शत्रु दुःख देते हैं; जैसे निर्बल पुरुष को चोर दुःख देते हैं। पर जो
१२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
आत्मपद में स्थित हुआ है, उसको इन्द्रियाँ दुःख नहीं देतीं । जैसे दृढ़ राजा के शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, वैसे ही ज्ञानवान् के इन्द्रियगण मित्र होते हैं। जिन पुरुषों की देह में स्थिति-बुद्धि है और इन्द्रियों के विषय का सेवन करते हैं उनको बड़े दुःख प्राप्त होते हैं । हे राम ! आत्मा और शरीर का सम्बन्ध कुछ नहीं है । जैसे तम और प्रकाश परस्पर विलक्षण स्वभाव हैं, वैसे ही आत्मा और देह का परस्पर विलक्षण स्वभाव है ।
आत्मा सब विकारों से रहित, नित्यमुक्त, उदय-अस्त से रहित और सबसे निर्लिप्त है और सदा ज्यों का त्यों प्रकाशरूप भगवान् आत्मा सद्रूप है । उसका सम्बन्ध किससे हो ? देह जड़ और असत्य, अज्ञान-रूप, तुच्छ, विनाशी और अकृतज्ञ है । उसका उससे संयोग किस भाँति हो ? आत्मा चैतन्य, ज्ञान, सत् और प्रकाशरूप है । उसका देह के साथ कैसे संयोग हो ? अज्ञान से देह और आत्मा का संयोग भासता है । सम्यक्ज्ञान से संयोग का अभाव जान पड़ता है । हे राम ! ये मैंने निपुण वचन कहे हैं; बारम्बार इनका अभ्यास करने से संसारकृत मोह का अभाव हो जायगा । जब संसार का कारण मोह निवृत्त हुआ, तब फिर उसका सद्भाव न होगा । जब तक जीव अज्ञानरूपी निद्रा से दृढ़ होकर नहीं जागता, तब तक आवरण रहता है । जैसे निद्रा से जागने पर फिर निद्रा घेर लेती है, पर जब दृढ़ होके जागे तब फिर नहीं घेरती, वैसे ही दृढ़ अभ्यास से अज्ञान निवृत्त होने पर फिर आवरण न करेगा । इससे मोह और दुःख की निवृत्ति के अर्थ दृढ़ अभ्यास करो ।
हे राम ! आत्मा देह के गुण को अङ्गीकार नहीं करता । यदि देह के गुण अङ्गीकार करे तो आत्मा भी जड़ हो जाय । पर यह तो सदा ज्ञानरूप है और जो देह आत्मा का गुण परमार्थ से अङ्गीकार करे तो देह भी चेतन हो जाय । पर वह तो जडरूप है । उसको अपना ज्ञान कुछ नहीं । जब यथार्थ ज्ञान होता है, तब शरीर तुच्छ और जड़ भासित होता है । हे राम ! देह और आत्मा का कुछ सम्बन्ध नहीं । समवायसम्बन्ध भी नहीं । फिर इससे मिलकर वृथा दुःख को ग्रहण करने
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १३
से बढ़के और मूर्खता क्या है ? जब कुछ भी इसका समान लक्षण न हो, तब सम्बन्ध भी हो । पर जिसका कुछ भी समान लक्षण न हो, उसका सम्बन्ध कैसे हो ? आत्मा चैतन्य है, देह जड़ है, आत्मा सतरूप है, देह असतरूप है; आत्मा प्रकाशरूप है, देह तमरूप है; आत्मा निराकार है, देह साकार है; आत्मा सूक्ष्म है और देह स्थूल है । तो फिर आत्मा और देह का सम्बन्ध कैसे हो ? और जब इनका संयोग ही नहीं, तब दुःख किसको हो ? जैसे सूक्ष्म और स्थूल, दिन और रात्रि, ज्ञान और अज्ञान, धूप और छाया, सत् और असत् का सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही आत्मा और देह का संयोग नहीं होता । देह के सुख-दुःख से आत्मा को सुखी या दुःखी मानना मिथ्या भ्रम है । जरा-मरण, सुख-दुःख और भाव-अभाव आत्मा में रञ्चमात्र भी नहीं । यदि देह में अभिमान होता है तो जीव ऊँच-नीच जन्म पाता है । वास्तव में कुछ नहीं । केवल ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है और उसमें विकार कोई नहीं । जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब जल में होता है और जल के हिलने से प्रतिबिम्ब भी हिलता है, वैसे ही देह के सुख-दुःख से आत्मा में सुख-दुःखरूप विकार मूर्ख देखते हैं ।
आत्मा सदा निर्लेप है । जब यथाभूत सम्यक् आत्मज्ञान हो तब देह में स्थित होकर भी वह भ्रम को न प्राप्त हो । हे राम ! जब यथाभूत ज्ञान होता है, तब सत् को सत् और असत् को असत् जानता है । जैसे दीपक हाथ में होता है, तब सत्-असत् पदार्थ भासते हैं, वैसे ही ज्ञान से मनुष्य सत् असत् यथार्थ जानता है, और वैसे ही अज्ञान से मोह में भ्रमता है । जैसे वायु से पत्र भ्रमता है, वैसे ही मोहरूपी वायु से अज्ञानी जीव भ्रमता है और कदाचित् स्वस्थ नहीं होता । जैसे यन्त्र की पुतली तागे से चेष्टा करती है, वैसे ही अज्ञानी जीव प्राणरूपी तागे से चेष्टा करते हैं । और जैसे नट अनेक स्वाँग भरता है वैसे ही कर्म से जीव अनेक शरीर रखता है । जैसे काठ की पुतली तृण, काष्ठ, फूल आदि को लेती, छोड़ती और नृत्य करती है, वैसे ही ये प्राणी भी चेष्टा करते हुए शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध को ग्रहण करते हैं । जैसे वे पुतलियाँ जड़ हैं,
१४ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
वैसे ही ये भी जड़ हैं। यदि कहिये कि इनमें तो प्राण है तो जैसे लुहार की धौकनी श्वास को लेती और छोड़ती है, वैसे ही ये जीव भी चेष्टा करते हैं।
हे राम ! अपना वास्तव स्वरूप जो है सो ब्रह्म है। उसके प्रमाद से जीव मोह और कृपणता को प्राप्त होते हैं। जैसे लुहार की खाल वृथा श्वास लेती है, वैसे ही इनकी चेष्टा व्यर्थ है। इनकी चेष्टा और बोलना अनर्थ के निमित्त है। जैसे धनुष से जो बाण निकलता है, वह हिंसा के निमित्त है उससे और कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता, वैसे ही अज्ञानी की चेष्टा और बोलना अनर्थ और दुःख के निमित्त है, सुख के निमित्त नहीं और उसकी संगति भी कल्याण के निमित्त नहीं। जैसे जङ्गल के ठूँठ वृक्ष से छाया और फल की इच्छा करनी व्यर्थ है, उससे कुछ फल नहीं होता और न विश्राम के निमित्त छाया ही प्राप्त होती है; वैसे ही अज्ञानी जीव की संगति से सुख नहीं होता। उनको दान देना व्यर्थ है। जैसे कीचड़ में घृत डालना व्यर्थ होता है, वैसे ही मूर्खों को दिया दान व्यर्थ होता है। उनसे बोलना भी व्यर्थ है। जैसे यज्ञ में कुत्ते को बुलाना निष्फल है, वैसे ही उनसे बोलना निष्फल है। हे राम ! जो अज्ञानी जीव हैं, वे संसार में आते-जाते और जन्मते-मरते हैं और शरीर में आस्था करते हैं, वे पुत्र, दारा, बान्धव, धनादिक से ममत्व बुद्धि करते हैं। पर इस मिथ्यादृष्टि से वे दुःख पाते हैं और मुक्ति कदाचित् नहीं होती; क्योंकि वे अनात्मा में आत्मबुद्धि को त्याग नहीं करते और ममताबुद्धि में दृढ़ रहते हैं।
हे राम ! जो अज्ञानी हैं वे असत् पदार्थ को देखते हैं और वस्तुरूप की ओर से अन्धे हैं, इससे वे परमार्थ धन से विमुख रहते हैं। नरक का सार जो स्त्री आदि हैं, उनमें वे प्रीति करते हैं और उनको देखकर प्रसन्न होते हैं। जैसे मेघ को देखकर मोर प्रसन्न होता है, वैसे ही स्त्री आदि को देखकर मूर्ख प्रसन्न होते हैं। हे राम ! मूर्ख को मारने के निमित्त स्त्री विष की बेलि है। नेत्र उसके फूल हैं, होंठ पत्ते हैं, स्तन गुच्छे हैं और अज्ञानरूपी भँवरे वहाँ विराजमान होते हैं और उसका नाश करते
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १५
हैं। मतिरूपी तालाब में हर्षरूपी कमल और चित्तरूपी भँवरे सदा रहते हैं और अज्ञानरूपी नदी में दुःखरूपी लहरें और तृष्णारूपी बुलबुले उठते हैं। यह नदी मरणरूपी बड़वाग्नि में जा पड़ेगी।
हे राम ! जब जन्म होता है, तब जीव महागर्भ अग्नि से जलता हुआ निकलता है और महामूर्ख अवस्था में निकलकर दुखी होता है। वह जब यौवन अवस्था को प्राप्त होता है तब विषयों का सेवन करता है। वे भी दुःख के कारण होते हैं। फिर वृद्धावस्था को प्राप्त होता है। तब शरीर अशक्त होता है और हृदय को तृष्णा जलाती है। इस प्रकार जन्म-मरण अवस्था में जीव भटकते हैं। हे राम ! संसाररूपी कूप में मोहरूपी घटों की माला है और तृष्णा और वासनारूपी रस्सी से बँधे हुए जीव भ्रमते हैं। ज्ञानवान् को संसार कोई दुःख नहीं देता, गोपद की नाईं तुच्छ हो जाता है। पर अज्ञानी को समुद्र की तरह उससे उबरना कठिन होता है। वह अपने भीतर ही भ्रम देखता है और निकल नहीं सकता-थोड़ा भी उसको बहुत हो जाता है। जैसे पक्षी को पिंजड़े में और कोल्हू के बैल को घर ही में मार्ग दुस्तर हो जाता है, वैसे ही अज्ञानी को तुच्छ संसार बड़ा दुस्तर भासता है। हे राम ! जगत् को रमणीय जानकर जीव उसके जिन पदार्थों की इच्छा करता है, वे सब पञ्चभौतिक पदार्थ हैं। पर वह मोह से उनको सुन्दर जानता है, उनमें प्रीति करता है और उन्हें स्थिर जानता है। वे सब अनर्थ के निमित्त होते हैं।
हे राम ! अज्ञानरूपी चन्द्रमा के उदय से भोगरूपी वृक्ष पुष्ट होते हैं। वे जन्मों की परंपरारूपी रस को पाते हैं, कर्मरूपी जल से सिंचते हैं और पुण्य और पापरूपी मञ्जरी उनमें होती है। अज्ञानरूपी चन्द्रमा का अमृतवासना है और आशारूपी चकोर उसको देखकर प्रसन्न होता है। आशारूपी कमलिनी पर अज्ञानरूपी भँवरा बैठकर प्रसन्न होता है, इसलिए सब जगत् अज्ञान के कारण रमणीय भासता है। हे राम ! जिस ज्ञान से यह जगत् स्थित है, उसका प्रवाह सुनो । जब अज्ञानरूपी चन्द्रमा पूर्ण होकर स्थित होता है तब कामनारूपी क्षीरसमुद्र उमड़ता
१६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
है और उसमें अनेक तरंगे उठती हैं। उसके रस से तृष्णारूपी मञ्जरी पुष्ट होती है और काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी चकोर उसको देखकर प्रसन्न होते हैं। देहाभिमानरूपी रात्रि के निवृत्त होने पर विवेकरूपी सूर्य का उदय होता है । तब अज्ञानरूपी चन्द्रमा का प्रकाश निवृत्त हो जाता है । हे राम ! अज्ञान से जीव भ्रमते हैं और उनकी चेष्टा उल्टी हो जाती है । जो तुच्छ और नीच दुःखरूप पदार्थ है, उसको देखकर वे उनको सुखदायक और रमणीय जानते हैं और स्त्री को देख प्रसन्न होते हैं ।
कवीश्वर कहते हैं कि उसके कपोल कमल से, नेत्र भँवरे से, होठ हँसते हुए और भुजा बेलि की नाईं हैं। कञ्चन के कलश से स्तन हैं। उदर और वक्षःस्थल बहुत सुन्दर हैं। जंघाएँ केले के खंभे सी हैं। कवि जिम स्त्री की स्तुति करते हैं, वह रक्तमांस की पुतली है। कपोल भी रक्तमांस है। होठ भी रक्तमांस हैं। भुजा विष के वृक्ष की शाखा-सी हैं। स्तन भी रक्तमांस हैं और संपूर्ण शरीर भी रक्तमांस अस्थि से पूर्ण एक मूर्ति है । उसको जो रमणीय जानते हैं वे मूर्ख मोह से मोहित हुए हैं और अपने नाश की इच्छा करते हैं। जैसे सर्पिणी से जो कोई हित करेगा वह नष्ट होगा, वैसे ही इस स्त्री से प्रेम करने से नाश होगा । जैसे कदलीवन का महाबली हाथी काम से नीच गति पाता और संकट में पड़ता है और अंकुश सहकर अपमान को प्राप्त होता है। वह एक स्त्री की चाह से ही ऐसी गति को प्राप्त होता है । वैसे ही यह जीव स्त्री की इच्छा करके अनेक दुःख पाता है। जैसे दीपक को रमणीय जानकर पतङ्ग उस पर गिरता और नष्ट होता है, वैसे ही यह जीव स्त्री की इच्छा करता है और उसके संग से नाश को प्राप्त होता है । लक्ष्मी का आश्रय करके जो सुख की इच्छा करता है वह भी सुखी न होगा । जैसे पहाड़ दूर से देखने पर सुन्दर लगता है, वैसे ही यह भी देखने में सुन्दर लगती है । पर स्त्री का आश्रय करके जो सुख की इच्छा करे तो सुख न मिलेगा, अन्त में दुःख ही प्राप्त होगा । लक्ष्मी का भी यही हाल है । जब लक्ष्मी प्राप्त होती है, तब मनुष्य अनर्थ और
⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ १७
पाप करने लगता है और दुःख का पात्र होता है। और जब वह जाती है तब दुःख दे जाती है और वह उससे जलता रहता है। हे राम! जगत् में सुख की इच्छा करना व्यर्थ है। जीव जब पहले जन्म लेता है, तब भी दुःख सहता है। फिर जन्म लेकर जब मूर्ख और नीच बाल अवस्था को प्राप्त होता है तब कुछ विचार नहीं होता। उसमें दुःख पाता है। और कुछ शक्ति नहीं होती, उससे भी दुःख पाता है। जब यौवन अवस्थारूपी रात्रि आती है तब उसमें काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी निशाचर विचरते हैं और तृष्णारूपी पिशाचिनी घेरती है; क्योंकि उस अवस्था में विवेकरूपी चन्द्रमा नहीं उदय होता। इससे अन्धकार में वे सब क्रीड़ा करते हैं।
हे राम! यौवन अवस्थारूपी वर्षाकाल में बुद्धि आदि नदियाँ मलिनभाव को प्राप्त होती हैं। कामरूपी मेघ गर्जता है और तृष्णारूपी मोरनी उसको देख प्रसन्न होकर नृत्य करती है। फिर यौवन अवस्थारूपी चूहे को बुढ़ापारूपी बिल्ली खा लेती है और शरीर महाजर्जरीभूत हो निर्बल हो जाता है। तृष्णा बढ़ती जाती है और हृदय जलता है। निदान फिर मृत्युरूपी सिंह जरारूपी हरिणी को भक्षण कर लेता है। इस प्रकार मनुष्य उपजता और मरता है और आशारूपी रस्सी से बँधा हुआ घड़ी के लटकन की तरह भटकता है-शान्ति कदापि नहीं पाता। हे राम! यह ब्रह्माण्ड एक वृक्ष है। उसमें जीवरूपी पत्ते लगे हैं। वे कर्मरूपी वायु से हिलते हैं। उसमें अज्ञानरूपी जड़ता है। चित्तरूपी ऊँचा वृक्ष है, उस पर लोभादिक उलूक बैठते हैं। जगतरूपी सरोवर में शरीररूपी कमल है; उस पर जीवरूपी भँवरे आ बैठते हैं और कालरूपी हाथी आकर उनको चट कर जाता है।
हे राम! जनतारूपी जीर्ण पक्षी आशारूपी फंदे से बँधे हुए वासना-रूपी पिंजड़े में पड़े हैं। वे रागद्वेषरूपी अग्नि में जल-भुनकर काल-रूपी पुरुष के मुख में पड़े प्रवेश करते हैं। जनरूपी पक्षी उड़ते फिरते हैं। किसी दिन जब कालरूपी व्याध जाल फैलावेगा तब उनको फँसा लेगा। हे राम! संसाररूपी तालाब में जीवरूपी मछलियाँ हैं, और
१८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
कालरूपी बगुला उनको भोजन करता है । कालरूपी कुम्हार जन-रूपी मृत्तिका के बर्तन बनता है और वे शीघ्र ही फूट जाते हैं । जीवरूपी नदी कर्मरूपी तरङ्गों को फैलाती है और कालरूपी बड़वाग्नि में जा पड़ती है । जगतरूपी हाथी के मस्तक में जीवरूपी मोती है । उस हाथी को कालरूपी सिंह भोजन कर जाता है । वह कालरूपी भक्षक ऐसा है कि उसमें ब्रह्मा को भी नहीं छोड़ा । इस तरह सबको खाकर भी वह तृप्त नहीं होता । जैसे घृत की आहुति से अग्नि तृप्त नहीं होता वैसे ही काल जीवों के भोजन से तृप्त नहीं होता । हे राम ! एक निमेष में अनेक जगत् उपजते हैं और निमेष में लीन हो जाते हैं । सबके अभाव में जो शेष रहता है वह रुद्र है । फिर वह भी निवृत्त होता है और सबके पीछे एक परमतत्त्व ब्रह्मसत्ता रहती है । हे राम ! जो कुछ जगत् है वह अज्ञान से भासता है जन्म, मरण, बाल अवस्था, यौवन और वृद्धादिक विकार अज्ञान से भासते हैं और अज्ञान के नष्ट होने पर सब नष्ट हो जाते हैं । जब तक आत्मविचार नहीं उपजता तब तक अज्ञान रहता है और जब आत्मविचार उपजता है तब अज्ञानरूपी रात्रि निवृत्त हो जाती है, केवल ब्रह्मपद भासता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अज्ञानमाहात्म्य- वर्णनन्नाम षष्ठसर्गः ॥ ६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह संसाररूपी यौवन चेतनरूपी पर्वत के शृङ्ग पर स्थित है और अविद्यारूपी बेलि उसमें बढ़कर विकास को प्राप्त हुई है । सुख, दुःख, भाव, अभाव और अज्ञान उसके पत्र, फूल और फल हैं । जहाँ अविद्या सुखरूप होकर स्थित होती है वहाँ ऊँचे सुख का भोग कराती है और सत्य प्रतीत होती है, और जहाँ दुःखरूप होकर स्थित होती है वहाँ दुःखरूप भासती है । वे ही सुख व दुःख इसके फल हैं । दिन फूल हैं और रात्रि भँवरे हैं । जन्म अंकुर है और यह भोगरूपी रस से पूर्ण है । जब विचार का घुन अविद्यारूपी वृक्ष को खाने लगता है, तब नष्ट हो जाती है । जब तक विचाररूपी घुन नहीं लगा तब तक वह दिन-दिन बढ़ती और दृढ होती जाती है ।
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १८
हे राम ! अविद्यारूपी बेलि का मूल संवित् का फुरना है। उससे यह फैली है। तारागण उसके फूल हैं, चन्द्रमा और सूर्य उसका प्रकाश और दुष्कृत कर्मरूपी नरकस्थान कण्टक हैं। शुभ कर्मरूपी स्वर्ग उसके फूल हैं और सुख-दुःखरूपी फल इसमें लगते हैं । जीव उसके पत्ते हैं जो कालरूपी वायु से हिलते और जीर्ण होकर गिर पड़ते हैं। पृथ्वी उसकी त्वचा है, पर्वत पीड़ है। उसमें मरणरूपी छिद्र, जन्मरूपी अंकुर और मोहरूपी कलियाँ हैं, जिनके महासुन्दर गोरे अंग हैं। उनसे जीव मोहित होते हैं—जैसे स्त्री को देखकर पुरुष मोहित होते हैं। यह सात समुद्रों के जल से सींची जाती है और उससे पुष्ट होती है । उस बेलि में एक विषधर सर्पिणी रहती है । जो कोई उसके निकट जाता है, उसको काटती है और वह मूर्च्छित हो गिर पड़ता है। संसाररूपी मूर्च्छा की देनेवाली तृष्णारूपी सर्पिणी है । वह बेलि अन्यथा नष्ट नहीं होती; जब विचाररूपी घुन उसको लगे तो नष्ट हो जाती है। हे राम ! जो कुछ प्रपञ्च तुमको भासता है सो सब अविद्यारूप है, कहीं अविद्या जलरूप हुई है, कहीं पहाड़, कहीं नाग, कहीं देवता, कहीं दैत्य, कहीं पृथ्वी, कहीं चन्द्रमा, कहीं सूर्य, कहीं तारे, कहीं तम, कहीं प्रकाश, कहीं तेज, कहीं पाप, कहीं पुण्य, कहीं स्थावर, कहीं मूढ़रूप । कहीं अज्ञान से दीन और कहीं ज्ञान से आप ही क्षीण हो जाती है । कहीं तप-दान आदि से क्षीण होती है, कहीं पापादि से बढ़ती है, कहीं सूर्यरूप होकर प्रकाश करती है, कहीं स्थानरूप होती है, कहीं नरक में लीन है, कहीं स्वर्गनिवासी है, कहीं देवता होती है, कहीं क्रिमि होती है, कहीं विष्णु-रूप होकर स्थित हुई है, कहीं ब्रह्मा होकर स्थित है, कहीं रुद्र है, कहीं अग्निरूप है, कहीं पृथ्वीरूप हुई है और कहीं आकाश व कहीं भूत, भविष्यत् और वर्तमान हुई है। हे राम ! जो कुछ देखने में आता है वह सब महिमा इसी की है । ईश्वर से तृणपर्यन्त सब अविद्यारूप है । जो इस दृश्यजाल से अतीत है, उसको आत्मलाभ जानो ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्यालता- वर्णनन्नाम सप्तमस्सर्गः ॥ ७ ॥
२० * योगवासिष्ठ *
राम ने पूछा, हे ब्रह्मन् ! विष्णु और हर आदिक तो शुद्ध आकार आकाश जाति है, इनको अविद्या तुम कहते हो ! यह सुनकर मुझको संशय उत्पन्न हुआ है। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! प्रथम यह सुनो कि अविद्या और तत्त्व किसको कहते हैं। जो अविद्यमान हो और विद्यमान भासे वह अविद्या है और जो सदा विद्यमान है उसको तत्त्व कहते हैं। हे राम ! शुद्ध संवित् और कल्पना से रहित जो चिन्मात्र आत्मसत्ता है वही तत्त्व है। उसमें जो अहं उल्लेख से संवेदनकल्पना पूर्णरूप से फुरी है वही चिन्मात्र संवित् का आभास है। वही संवेदन फुरकर स्थानभेद से सूक्ष्म, स्थूल और मध्यमभाव को प्राप्त हुआ है और फिर वही दृढ़ स्पन्द से मनन भाव को प्राप्त हुआ है। सात्त्विक, राजस और तामस, तीनों उसी के आकार हैं। वह अविद्या त्रिगुण प्राकृतधर्मिणी हुई है। और तीन गुण जो तुमसे कहे हैं, वे भी एक एक गुण तीन तीन प्रकार के हैं, जिससे अविद्या के गुण नव प्रकार के भेद को प्राप्त हुए हैं। जो कुछ तुमको दृश्य भासता है, वह अविद्या के नव गुणों में है। ऋषीश्वर, मुनीश्वर सिद्ध, नाग, विद्याधर और देवता अविद्या के सात्त्विकभाग हैं और उस सात्त्विक के विभाग में नाग सात्त्विक-तामस हैं, विद्याधर, सिद्ध, देवता और मुनीश्वर, अविद्या के सात्त्विक भाग में सात्त्विक-राजस हैं और हरिहरादिक केवल सात्त्विक हैं।
हे रामजी ! सात्त्विक जो प्रकृतभाग है उसमें जो तत्त्वज्ञ हुए हैं वे मोह को नहीं प्राप्त होते, क्योंकि वे मुक्तिरूप होते हैं। हरिहरादिक शुद्ध सात्त्विक हैं और सदा मुक्तिरूप होकर जगत् में स्थित हैं। वे जब तक जगत् में हैं, तब तक जीवन्मुक्त हैं और जब देहमुक्त हुए, तब परमेश्वर को प्राप्त होते हैं। हे राम ! अविद्या के दो रूप हैं। एक अविद्या विद्यारूप होती है—जैसे बीज फल होता है और फल बीज होता है। जैसे जल में बुलबुला उठता है वैसे ही अविद्या से विद्या उपजती है। और विद्या में अविद्या लीन होती है। जैसे काष्ठ में अग्नि उपजकर काष्ठ को जलाती है, वैसे ही विद्या अविद्या से उपजकर अविद्या का नाश करती है। वास्तव में सब चिदाकाश है। जैसे जल में तरङ्ग
- निर्वाण प्रकरण * २१
कल्पनामात्र है, वैसे ही विद्या अविद्या की भावनामात्र है। इसको त्याग कर शेष आत्मसत्ता ही रहती है।
अविद्या और विद्या आपस में प्रतियोगी हैं—जैसे तम और प्रकाश। इससे इन दोनों को त्यागकर आत्मसत्ता में स्थित हो। विद्या और अविद्या कल्पनामात्र हैं। विद्या के अभाव का नाम अविद्या है और अविद्या के अभाव का नाम विद्या है। यह प्रतियोगी कल्पना मिथ्या है। जब विद्या उपजती है, तब अविद्या को नष्ट करती है और फिर आप भी लीन हो जाती है—जैसे काष्ठ से उपजी अग्नि काष्ठ को जलाकर आप भी शान्त हो जाती है। उससे जो शेष रहता है, वह अनिर्वचनीय पद सर्वव्यापी है। जैसे वटबीज में पत्र, शाखा, फूल, फल और पत्ते होते हैं, वैसे ही सबमें एक अनुस्यूत सत्ता व्याप्त है। वही ब्रह्मतत्त्व सर्वशक्तिमान् है। उसी में सब शक्तियों का स्पन्दन है। वह आकाश में भी शून्य है। जैसे सूर्यकान्तमणि में अग्नि होती है और दूध में घृत है, वैसे ही सब जगत् में ब्रह्म व्याप्त हो रहा है। जैसे दधि के मथे बिना घृत नहीं निकलता, वैसे ही विचार बिना आत्मा नहीं भासता। जैसे अग्नि से चिनगारी और सूर्य से किरणें निकलती हैं, वैसे ही यह जगत् आत्मा का किञ्चनरूप है। जैसे घट का नाश होने पर भी घटाकाश अविनाशी है, वैसे ही जगत् के अभाव में भी आत्मा अविनाशी है।
हे राम ! जैसे चुम्बक पत्थर की सत्ता से जड़ लोहा चेष्टा करता है परन्तु चुम्बक सदा अकर्ता ही रहता है, वैसे ही आत्मा की सत्ता से जगत् देहादिक चेष्टा करते हैं और चेतन होते हैं, परन्तु आत्मा सदा अकर्ता है। इस जगत् का बीज चैतन्य आत्मसत्ता है और उसमें संवित्, संवेदन आदि शब्द भी कल्पनामात्र हैं। जैसे जल को कहते हैं कि बहुत सुन्दर और चञ्चल है और जल ही जल है, वैसे ही संवेदन आदि सब चैतन्यरूप हैं। जहाँ न किञ्चन है, न अकिञ्चन है, वही तुम्हारा स्वरूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्यानिराकरणं नामाष्टमसर्गः ॥ ८ ॥
२२ * योगवाशिष्ठ *
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! स्थावर-जङ्गम जो कुछ जगत् तुमको भासता है, वह आधिभौतिकता को नहीं प्राप्त हुआ । वह सब चिदाकाशरूप है । उसमें कुछ भाव-अभाव की कल्पना नहीं और जीवादिक भेद भी नहीं । हमको तो भेदकल्पना कुछ नहीं भासती । जैसे रस्सी में सर्प का अभाव है, वैसे ही ब्रह्म में भेदकल्पना का अभाव है । हे राम ! आत्मा के अज्ञान से भेदकल्पना भासती है और आत्मा के जाने से भेदकल्पना मिट जाती है । वही सर्वसंपदा का अन्त है । शुद्ध चैतन्य में चित्त का सम्बन्ध होने का नाम अविद्या है । जो पुरुष चित्त की उपाधि से रहित चिन्मात्र है, वह शरीर का नाश होने पर नष्ट नहीं होता और शरीर के उपजे में नहीं उपजता । शरीर के उपजने और नष्ट होने में वह सदा एकरस ज्यों का त्यों स्थित है । जैसे घट के उपजने और मिटने में घटाकार ज्यों का त्यों रहता है वैसे ही शरीर के भाव-अभाव में आत्मा ज्यों का त्यों है । जैसे बालक दौड़ता है तो उसको सूर्य भी दौड़ता जान पड़ता है और स्थित होने में स्थित लगता है, परन्तु सूर्य ज्यों का त्यों है, वैसे ही चित्त की चञ्चलता से मूर्ख जन आत्मा को व्याकुल देखते हैं, चित्त की अचलता में अचल देखते हैं और चित्त के उपजने में उपजता देखते हैं, परन्तु आत्मा सदा ज्यों का त्यों है । जैसे मकड़ी अपने जाले से आप ही घिरती है और निकल नहीं सकती, वैसे ही जीव अपनी वासना से ही बँधते हैं ।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! अत्यन्त मूर्खता के अधिष्ठान जो स्थावर आदिक हैं उनकी वासना कैसी होती है, सो कृपा करके कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो स्थावर जीव हैं, वे अमनसत्ता को नहीं प्राप्त हुए । वे केवल मन अवस्था में भी प्रतिष्ठित नहीं, पर मध्य अवस्था में हैं । उनकी पुर्यष्टका सुषुप्तिरूप है । वह केवल दुःख का कारण है । उनका मन नहीं नष्ट हुआ, वे सुषुप्ति अवस्था में जडरूप स्थित हैं । वे काल पाकर जागेंगे अभी उनकी सत्ता मूकजड़ होकर स्थित है । राम ने पूछा, हे देवताओं में श्रेष्ठ ! यदि उनकी सत्ता अद्वैतरूप होकर स्थावर
निर्वाण प्रकरण
२३
शरीर में स्थित है तो मुक्त अवस्था उनके निकट है, यह सिद्ध हुआ । वशिष्ठजी बोले हे राम! मुक्ति कैसे निकट होती है ? मुक्ति तब होती है, जब बुद्धिपूर्वक वस्तु को विचारे और यथाभूत अर्थ देख पड़े । जब सत्ता समान का बोध हो तब केवल आत्मपद प्राप्त होता है । हे राम ! जब ज्यों का त्यों पदार्थ जानकर वासना को त्याग करे, तब सत्ता समान पद प्राप्त होता है ।
प्रथम अध्यात्मशास्त्र को विचारे और उसमें जो सार है उसकी बारम्बार भावना करे, तब उससे जो प्राप्त हो वही सत्ता समान परब्रह्म कहलाता है । स्थावर के भीतर वासना है; परन्तु बाहर नहीं दिखती; क्योंकि उनकी सुषुप्ति वासना है । जैसे बीज में अंकुर होता है और फिर उगता है, वैसे ही उनके जन्म होंगे और वासना जगेगी । उनके भीतर जगत् की सत्ता है, पर बाहर नजर नहीं आती । वे सुषुप्ति के समान जड़धर्मा हैं । वे अनन्त जन्मों में दुःख पावेंगे । हे राम ! स्थावर जो अब जड़धर्मी सुषुप्तिपद में स्थित हैं, वे बारम्बार जन्म पावेंगे । जैसे बीज में पत्र, टाल, फूल और फल अवस्थित होते हैं और मृत्तिका में घट बनने की शक्ति है, वैसे ही स्थावर में वासना स्थित है । जिसमें वासनारूपी बीज है, वह सुषुप्तिरूप कहलाता है और वह सिद्धता, जो मुक्ति है, उसे नहीं प्राप्त होती । जहाँ निर्जीव वासना है, व तुरीय पद है और वह सिद्धता को प्राप्त करती है ।
हे राम ! जब चित्तशक्ति दृढ़ वासना से मिली होती है, तब स्थावर होती है और वह फिर जगती है । जैसे कोई कर्म करता हुआ सो जाता है तो सुषुप्ति से उठकर फिर वही कर्म करने लगता है, क्योंकि कर्मरूपी वासना उसके भीतर रहती है, वैसे ही स्थावर वासना से फिर जन्म पावेंगे । जब वह वासना हृदय से दग्ध हो, तब जन्म का कारण नहीं होती । आत्मसत्ता समानभाव से घट पट आदि सब पदार्थों में स्थित है । जैसे वर्षाकाल का एक ही मेघ नानारूप होकर स्थित होता है, वैसे एक ही आत्मसत्ता सब पदार्थों में स्थित है । सबमें आत्मा ही व्याप रहा है । ऐसी दृष्टि से जो रहित है, उसको विपर्यय उल्टी दृष्टि
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<div align="center">❊ योगवाशिष्ठ ❊</div>भ्रमदायक होती है। जब आत्मदृष्टि प्राप्त होती है, तब सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। हे राम ! असम्यकदृष्टि को ही बुद्धिमान् लोग अविद्या कहते हैं। वह अविद्या जगत् का कारण है और उससे सब प्रपंच का पसारा होता है। जब उससे रहित अपना स्वरूप भासित हो, तब अविद्या नष्ट होती है। जैसे बर्फ की कणिका धूप से नष्ट हो जाती है वैसे ही शुद्ध स्वरूप के अभ्यास से अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे स्वप्न में उठकर जीव जब अपना स्वरूप देखता है, तब फिर स्वप्न की ओर नहीं जाता वैसे ही शुद्ध स्वरूप के अभ्यास से सम्पूर्ण भ्रम निवृत्त हो जाते हैं।
हे राम ! जब जीव वस्तु को वस्तु जानता है, तब अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे प्रकाश में अन्धकार नष्ट हो जाता है। पर दीपक को हाथ में लेकर देखिये तो अन्धकार की कोई मूर्ति नजर नहीं आती, और जैसे उष्णता से घृत का पिंड गल जाता है, वैसे ही आत्मा के दर्शन होने पर अविद्या नहीं रहती। वास्तव में अविद्या कोई वस्तु नहीं। वह अविचार से सिद्ध है और विचार करने से लीन हो जाती है। जैसे प्रकाश में तम लीन हो जाता है, वैसे ही विचार से अविद्या लीन हो जाती है। अज्ञान में अविद्या की प्रतीति होती है। जब तक आत्मतत्त्व को नहीं देखता, तब तक अविद्या की प्रतीति होती है और जब आत्मा को देखता है, तब अविद्या का अभाव हो जाता है। प्रथम यह विचार करे कि रक्त, मांस और अस्थि का बना जो शरीर है, उसमें "मैं क्या वस्तु हूँ? सत्य क्या है? और असत्य क्या है?" इस विचार से जिसका अभाव होता है, वह असत्य है और जिसका अभाव नहीं होता, वह सत्य है। फिर अन्वय व्यतिरेक से विचारे। कार्यकल्पित के होने पर भी हो और उसके अभाव में भी जो हो सो अन्वय सत्य है। देहादि के भाव में भी जो आत्मा का अधिष्ठान है और इनके अभाव में भी निरुपाधि सिद्ध है, वह सत्य है और देहादिक व्यतिरेक असत्य है।
ऐसे विचार कर आत्मतत्त्व का अभ्यास करे और असत् देहादिक से वैराग्य करे, तब निश्चय ही अविद्या लीन हो जाती है, क्योंकि वह वास्तव नहीं है, असतरूप है। उसके नष्ट होने पर जो शेष रहे, वह
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २५
निष्किञ्चन है, सत्य है, ब्रह्म निरन्तर है। वह तत्त्ववस्तु ग्रहण करने योग्य है। हे राम! ऐसे विचार करने से अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे ऊख का रस जब जिह्वा से लगता है, तब अवश्य स्वाद आता है, वैसे ही आत्मविचार से अविद्या अवश्य नष्ट हो जाती है। यदि वास्तव में कहिये तो अविद्या भी कुछ भिन्न वस्तु नहीं, एक अखंड ब्रह्मतत्त्व है। जिससे घट, पट, रथ आदिक पदार्थ भिन्न भिन्न भासते हैं, उसको अविद्या जानो और जिससे सबमें एक ब्रह्मभावना होती है उसको विद्या जानो। इस विद्या से अविद्या नष्ट हो जायगी।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्याचिकित्सावर्णनं नाम नवमस्सर्गः॥ ९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! बोध के निमित्त मैं तुमसे बारम्बार सत्य का सार कहता हूँ। वह यही है कि भावना के अभ्यास बिना आत्मा का साक्षात्कार न होगा। यह जो अज्ञान अविद्या है, वह अनन्त जन्म से दृढ़ हुआ भीतर बाहर दिखाई देता है। आत्मा सब इन्द्रियों से अगोचर है। जब मन सहित षट् इन्द्रियों का अभाव हो, तब केवल शान्ति प्राप्त होती है। हे राम! जो कुछ वृत्ति बहिर्मुख फुरती है, वह अविद्या है; क्योंकि वह वृत्ति प्रपंच को आत्मतत्त्व से भिन्न जानकर फुरती है और जो अन्तर्मुख आत्मा की ओर फुरती है, वह विद्या है। वही अविद्या का नाश करेगी। अविद्या के दो रूप हैं—एक प्रधान रूप और दूसरा निकृष्ट रूप। उस अविद्या से विद्या उपजकर अविद्या का नाश करती है और फिर आप भी नष्ट हो जाती है, जैसे बाँस से अग्नि उपजती और बाँस को जलाकर आप भी शान्त हो आती है, वैसे ही जो अन्तर्मुख है, वह प्रधान रूप विद्या है और जो बहिर्मुख है, वह निकृष्ट रूप अविद्या है। इससे अविद्याभाव का नाश करे।
हे राम! अभ्यास के बिना कुछ सिद्ध नहीं होता। जो कुछ किसी को प्राप्त होता है वह अभ्यासरूपी वृक्ष का ही फल है। चिरकाल अविद्या का दृढ़ अभ्यास होने से अविद्या दृढ़ हुई है। जब आत्मज्ञान के निमित्त यत्न करके दृढ़ अभ्यास करोगे, तब अविद्या नष्ट हो जायगी।