भारतकोश
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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४१ नामव्युत्पत्तिपुरःसरं १चक्रेशीमाह— मातृमानप्रमेयाणां पुराणां परिपोषिणी । त्रिपुरामालिनी ख्याता चक्रेशी सर्वमोहिनी ॥ १५० ॥ २परसंवित्स्पन्दरूपत्वान्मातृमानमेयान्येव पुराणि, तेषां पुराणां परिपोषिणी प्रधानेनोपबृंहिणी। अत एव त्रिपुरामालिनी ख्याता निरुक्ता। ३चक्रेशी षष्ठचक्रेशी सर्वमोहिनी। ४एतत्कृतमोहवशादेव हि मातृमानप्रमेयरूपा ५प्रथा। तदुक्तं परा- पञ्चाशिकायाम्—"६स्वाङ्गरूपेषु ७भावेषु मायातत्त्वं विभेदधीः" (श्लो० २१) इति ॥१५०॥ विद्याशक्तिविशुद्धिं च सिद्धिं प्राकाम्यसंज्ञिताम् । एताः सर्वोपचारेण पूजयेद् देवताः क्रमात् ॥ १५१॥ मन्त्राः पुरुषवाच्याधिष्ठिताः, विद्याः स्त्रीरूपवाच्याधिष्ठिताः। अत एव नाम की व्युत्पत्ति के साथ चक्रेश्वरी का वर्णन करते हैं— माता, मान और प्रमेय लक्षण पुरत्रय की यह पोषिका है। इसीलिये यह सर्वमोहिनी चक्रेशी त्रिपुरामालिनी कहलाती है ॥ १५०॥ माता, मान और प्रमेय लक्षण पुरत्रय परा संवित् का ही स्पन्दन है। इन तीन पुरों को यह त्रिपुरामालिनी परिपुष्ट करती है, प्रधानतः इनका उपबृंहण करती है। इसीलिये यह इस नाम से प्रसिद्ध है। यह षष्ठ चक्र की स्वामिनी सबको मोह में डाले रहती है। यह चक्रेशी जिस मोह को पैदा करती है, उसी के कारण माता, मान और प्रमेय स्वरूप पुरत्रय की कल्पना सजीव हो उठती है। परापंचाशिका में बताया गया है—"यह सारा भाव जगत् शिव का अपना ही स्वरूप है। मायातत्त्व के ही कारण इनमें परस्पर भेदबुद्धि जग जाती है" ॥१५०॥ इस षष्ठ चक्र में त्रिपुराविद्या की शक्ति से प्राप्त हुई प्राकाम्य नामक सिद्धि के साथ चक्रेशी की और आवरण देवताओं की भी सभी उपचारों से पूजा करे ॥१५१॥ १पुरुष-देवता के वाचक मन्त्र और स्त्री-देवता की वाचक विद्या कहलाती है। इसी १. चक्रेश्वरो—क. ग.। २. 'पर''''बृंहिणी' इत्यस्य स्थाने 'सर्वेषां स्वप्रथाप्रदानेनोप- बृंहिणी' इति पाठः—ख. ने. ज. ब. उ.। ३. चक्रे षष्ठचक्रे—क. ग.। ४. अत एव तत्कृत—ख. ने. ज. उ.। ५. भेदप्रथा—झ.। ६. स्वांश—क. ग.। ७. भानेषु—क. ग., भागेषु—ख. ने. ज. झ. उ.। १. ऋजुविमर्शिनी (पृ० ४२-४३) मूल तथा टिप्पणी देखिये।

३४२ योगिनीहृदयम् [पूजासंकेतः विद्याशक्तेः सौभाग्यविद्यावर्णवाच्यायाः षट्त्रिंशत्तत्त्वमय्या विशुद्धिस्तदतीत- परचिल्लक्षणा, तद्रूपाम्। प्राकाम्यसंज्ञितां१ सिद्धिं कामना२नुरूपलक्षणाम्। तदुक्तं महाकविभिः- द्रवः संघातकठिनः स्थूलः सूक्ष्मो लघुर्गुरुः। व्यक्तो व्यक्तेतरश्चासि३ प्राकाम्यं ते विभूतिषु ॥ इति। (कु० स० २।११) एता देवताः४, क्रमात् प्रथमम् आवरणदेवताः, पश्चाच्चक्रेशीम्, ततः सिद्धि- मिति क्रमात्। सर्वोपचारेण। जाता५वेकवचनम्। ६सर्वोपचारैः पूजयेदि- त्यर्थः ॥१५१॥ सप्तमचक्रे पूजां सवासनामाह- निरुद्धवायुसंघट्टस्फुटितग्रन्थिमूलतः। हृदयान्तरसंवित्तिशून्यपुर्यष्टकात्मना ॥१५२॥ लिये विद्याशक्ति की, अर्थात् सौभाग्यविद्या नामक पंचदशाक्षरी विद्या की, जो कि छत्तीस तत्त्वों की समष्टिरूपिणी है, विशुद्धि तब होती है, जब कि तत्त्वातीत परचित्स्व- रूप में वह एकाकार हो जाय। इसी अवस्था में साधक अपनी कामनाओं के अनुरूप प्राकाम्य नामक सिद्धि को प्राप्त कर सकता है। इस सिद्धि के विषय में महाकवि कालि- दास ने कहा है- हे ब्रह्मन्! द्रव रसात्मक नदी, समुद्र आदि, संघातकठिन पर्वत आदि, स्थूल, सूक्ष्म लघु, गुरु, व्यक्त (कार्य) और अव्यक्त (कारण) इन सभी स्वरूपों में आप विद्यमान हैं। यह सब आपकी प्राकाम्य नामक सिद्धि का प्रसाद है। अर्थात् ये सब परस्पर विरोधी गुण प्राकाम्य नामक सिद्धि के प्रसाद से ही आप में विद्यमान हैं॥ इसका अभिप्राय यह है कि प्राकाम्य नामक सिद्धि के मिल जाने पर साधक उक्त सभी स्वरूपों को अपनी इच्छा के अनुसार प्राप्त कर सकता है। इस चक्र में उक्त देव- ताओं की क्रम से पूजा करनी चाहिये। १पहले आवरण देवताओं की, बाद में चक्रेशी की और तब सिद्धि की, इस क्रम से सभी उपचारों से इनकी पूजा करनी चाहिये ॥१५१॥ अब सातवें चक्र में वासना के साथ पूजाविधि बताते हैं- निरुद्ध वायु के संघट्ट से जिसको ग्रन्थियाँ खुल गई हैं, ऐसे मूलाधार चक्र से उठ कर हृदय पद्म में स्थित संवित्ति में जो सूक्ष्म पुर्यष्टक के रूप में स्थित हैं, १. संज्ञिकां-क. ग.। २. नारूप-क. ग. उ.। ३. श्चापि-क. ग.। ४. इतः परम्- 'सर्वज्ञाद्याश्चक्रेशीसिद्धियुताः' इत्यधिकं-ख. ने. ज. झ. उ.। ५. वेकत्वम्-ख. ज. झ.। ६. सर्वैरूप-ख. ने. झ.। १. इस पूरे प्रकरण में पूजा का यही क्रम जानना चाहिये।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४३ बीजरूपस्वरकलास्पृष्टवर्गानुसारतः । रहस्ययोगिनीर्देवीः¹ संसारदलनोज्ज्वले ॥१५३॥ सर्वरोगहरे चक्रे संस्थिता वीरवन्दिते । वशिन्याद्याः ²निरुद्धयोः परिहृतस्वैराचारयोः, वायोः प्राणापानयोः, संघट्टात् "गुद- माकुञ्च्य बहुशः प्राणापानौ निरुध्य च । संयोज्य ते" इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या संयोगात्, स्फुटितो ग्रन्थिः सुषुम्नान्तर्गतमूलाधारकमलपर्यन्तं वसन्, तादृशं मूलं मूलाधारम् । ततो हृदयान्तरसंवित्तिशून्यपुर्यष्टकात्मना । "ध्यायन् भुजगाकृतिं हुङ्कारविह्वलज्योतिः पवनक्षेपमनोभिर्गमयेदूर्ध्वम्" इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या मूला- दुत्थितायाः ³कुण्डलिनीरूपायाः "ततो हृदयपद्मान्तः स्फुरन्तीं सांविदीं⁴ कलाम्" (सु० ३४) इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या हृदयान्तरे स्फुरन्त्याः संवित्तेश्चिदात्मनः, चितिश्चत्तं च चैतन्यं चेतना⁵द्वयकर्म च । जीवः कला ⁶शरीरं च सूक्ष्मं पुर्यष्टकं मतम् ॥ उन वशिनी आदि देवियों की बीजरूप स्वर-कलाओं से संस्पृष्ट वर्गों का उच्चा- रण करते हुए पूजा करे । हे वीरवन्दिते ! ये वशिनी आदि रहस्ययोगिनी देवियाँ संसार के दलन में समर्थ सर्वरोगहर चक्र में निवास करती हैं ॥१५२-१५४॥ जिनकी मनमानी गति को रोक दिया गया है, उन प्राण और अपान वायुओं के संघट्ट से ग्रन्थियों का भेदन हो जाता है, अर्थात् "गुदा का संकोच कर और बार-बार प्राणायाम के अभ्यास से प्राण और अपान की गति को नियन्त्रित कर इनको एक में मिला देना चाहिये" किसी प्रामाणिक व्यक्ति के द्वारा बताई गई इस विधि से प्राण और अपान का संयोजन करने पर सुषुम्ना नाडी के अन्तर्गत मूलाधार आदि चक्रों में विद्यमान ग्रन्थियाँ टूट जाती हैं । तब मूलाधार से उठकर कुण्डलिनी शक्ति, हृदय में स्थित संवित्ति ही शून्य (सूक्ष्म) पुर्यष्टक का स्वरूप धारण कर लेती है । इस प्रसंग में किसी अभियुक्त ने कहा है—"भुजग (सर्प) के समान आकृति वाली कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करते हुए, हुंकार से इस कुण्ड- लिनी रूप दीपशिखा को कंपाते हुए, पवन की गति के साथ मन का संयोजन कर इसको ऊपर उठाये" । इसी तरह से मूलाधार से उठी इस कुण्डलिनी शक्ति का शिवानन्द मुनि के शब्दों में हृदयपद्म में स्फुरित हो रही संवित्ति कला के रूप में ध्यान करे । हृदय में स्फुरित हो रही इस संवित्ति कला से ही स्वच्छन्दसंग्रह में वर्णित सूक्ष्म पुर्यष्टक का स्फुरण होता है, जैसे कि— १. देवि-ख. ने. च. छ. ज. झ. ड. । २. 'निरु''''दुर्लक्ष्यत्वात्' नास्ति-ख. ने. ज. ड. । ३. कुण्डलिन्याः-झ. । ४. संविदं-झ. । ५. नेन्द्रिय-झ. । ६. च देवेशि-क. ग. झ. ।

३४४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या सूक्ष्मपुर्यष्टकानां सूक्ष्मतया दुर्लक्ष्यत्वा¹च्छून्य[त्व]- मिति। “हृत्पुण्डरीकं पुरमध्यसंस्थम्” (म० ना० ८।१६) इति ²श्रुत्युक्तरीत्या पुरं शरीरं चिदष्टकरूपं शून्यशरीरं शून्यपुर्यष्टकम्, तदात्मना तद्रूपेण³, संस्थिता इत्यनुषङ्गः। “द्विधेयं मातृका देवी बीजयोन्यात्मना स्थिता” (श्लो० ४०) इति परापञ्चाशिको⁴क्तरीत्या बीजरूपाः ⁵“स्वरा अकारादिविसर्गान्ताः कलाः षोडश, ताभिः स्पृष्टा अवर्गेण युता वर्गाः कचटतपयशाः, तेषाम् अनुसारतः “अवर्गः प्रथमो देवि वशिनो तत्र संस्थिता” (१।७७-८०) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्ताः⁶, “उद्धरेत् प्रथमं रेफम्” (१।८१-८६) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोद्धृतस्वस्वबीजानुसारतः क्रमात् स्वस्ववर्गान्ते स्वस्वबीजमुच्चार्य पूजयेदित्यर्थः । चिति, चित्त, चैतन्य, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, जीव, कला और शरीर इन आठ तत्त्वों को सूक्ष्म पुर्यष्टक माना जाता है ॥ यह सूक्ष्म पुर्यष्टक अपनी सूक्ष्मता के कारण बहुत कठिनाई से दिखायी पड़ता है, इसीलिये इसको 'शून्य' नाम से जाना जाता है। “हृदय पुण्डरीक (पद्म) पुर (शरीर) के मध्य में स्थित है” इस श्रुतिवचन के अनुसार चिदष्टकरूप यह शून्य-शरीर सूक्ष्म पुर्यं- ष्टक के नाम से प्रथित है। इनकी अधिष्ठात्री वशिनी आदि देवियाँ यहीं निवास करती हैं। परापंचाशिका में बताया गया है- “यह मातृका देवी बीज और योनि के भेद से द्विधा विभक्त हो जाती है”। ¹बीजरूप हैं अकार से विसर्ग पर्यन्त सोलह स्वर । इस सोलह कलाओं वाले अवर्ग के साथ क च ट त प य श के वर्ग के क्रम से इनका उद्धार किया जाता है। “हे देवि! पहला अवर्ग है, इसमें वशिनी स्थित है” इत्यादि क्रम से चतुःशती शास्त्र (१।७७-८०) में इनका उद्धार बताया गया है। वहीं (१।८१-९६) “पहले रेफ का उद्धार करे” इत्यादि क्रम से इनके बीजों का भी उद्धार किया गया है। तदनुसार सूक्ष्म पुर्यष्टक की स्वामिनी वशिनी आदि आठ शक्तियों की अपने अपने वर्ग के अन्त में अपने अपने बीजों का उच्चारण करते हुए ²पूजा करे। १. सूक्ष्ममत्र शून्यमित्युच्यते-ख. ने. ज. झ. उ. । २. श्रत्युक्त्या-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. णैताः-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कोक्त्या-ने. । ५. आदित्वरा अकारादिविसर्गान्ताः षोडशस्वराः कलाः, ताभिः-ख. ने. ज. उ. । ६. कत्वात्-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. दीपिकाकार ने पहले (२।३७) ककार आदि व्यंजनों को बीज माना है और वहाँ चिद्गगनचन्द्रिका के अतिरिक्त परापञ्चाशिका के प्रस्तुत श्लोक को भी प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है। पृ० १५४ की टिप्पणी देखिये ।
  2. शुभगोदय (पृ० २८६-२८७) में इसी क्रम से पूजाविधि बताई गई है।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४५ ननु चतुर्दशकोणादिषु १पूर्वंचक्रेषु देवतानां भूतलिपिमातृका२वर्णस्वरनवक- हादिपञ्चकटकतकचवर्गमयत्वमुक्तम्, अष्टकोणादिदेवतानां किमिति शिष्टपवर्ग- शषसमत्वं नोक्तमिति चेत्, ३सत्यम्, अष्टकोणदेवताबीजमनुक्तमप्यवगन्तव्यम् । बीजरूपस्वरकलास्पृष्टवर्गानुसारत इति तु वशिन्यादिदेवतापूजामन्त्रकथनम् । रहस्ययोगिनीः । सूक्ष्ममन्त्ररहस्यं पुर्यष्टकम्, तेन सह योगः संबन्धः कार्यकारण- लक्षणो यासां ता वशिन्याद्या योगिन्यः ४सूक्ष्मतया दुर्लक्ष्यपुर्यष्टकमयत्वाद गोपनीयाः। संसारदलनोज्ज्वले । अनित्याशुचिक्लेशरूपः५ संसारः, तस्य दलने हरणे, उज्ज्वले परप्रकाशतावन्मात्रे । अत एव ६सर्वरोगहरे चक्रे, सर्वं एवानित्या- शुचिक्लेशरूपसंसारो रोगः, तस्य हरणे पटुप्रभावशालिनि सप्तमचक्रे संस्थिता वशिन्याद्याः “अवर्गः प्रथमो देवि वशिनी तत्र संस्थिता” (१।७७) इति चतुःशती- शास्त्रोक्ताः, पूजयेदित्यनुषङ्गः ॥१५३-१५४॥ यहाँ शंका उठती है कि चतुर्दशकोण, बहिर्दशार और अन्तर्दशार चक्र में देवता का स्वरूप भूतलिपि मातृका के अनुसार वर्णित है। जैसे कि चतुर्दशकोण में नौ स्वर और हकार आदि पांच वर्ण हैं। बाह्य दशार में टवर्ग-तवर्ग तथा अन्तर्दशार में कवर्ग-चवर्ग हैं। इसी क्रम से अष्टकोण के देवताओं की अवशिष्ट पवर्ग और श ष स वर्णात्मकता का वर्णन यहाँ होना चाहिये, ऐसा क्यों नहीं किया गया ? समाधान यह है कि आपका कहना ठीक है। अष्टकोण के देवताओं के बीज यद्यपि यहाँ नहीं बताये गये हैं, तो भी बिना बताये ही उनके ये ही आठ बीज हैं, ऐसा जान लेना चाहिये । नववर्गात्मिका भूतलिपि के ४२ वर्ण तभी पूरे होते हैं। बीजरूपस्वरकला इत्यादि पंक्ति में वशिनी आदि देवताओं के पूजा-मन्त्रों का विधान किया गया है। इसकी व्याख्या ऊपर कर दी गई है। इनको रहस्ययोगिनी इसलिये कहा जाता है कि सूक्ष्म मन्त्र का रहस्य पुर्यष्टक में छिपा हुआ है। उस रहस्य के साथ वशिनी आदि का कार्यकारणरूप सम्बन्ध, संयोग बना हुआ है, अतः ये रहस्ययोगिनियाँ कहलाती हैं। अपनी सूक्ष्मता के कारण ये दुर्लक्ष्य हैं, अतः सूक्ष्मपुर्यष्टक की अधिष्ठात्री इन देवियों की उपासना अत्यन्त गोपनीय है। ये देवियाँ अनित्य, अशुचि, क्लेश आदि से भरे हुए इस संसार का नाश करने में समर्थ अपने पूर्ण प्रकाशमय स्वरूप वाले सर्वरोगहर चक्र में निवास करती हैं। अनित्यता, अपवित्रता आदि क्लेशों से भरा हुआ यह सारा संसार ही रोग है। इस रोग को दूर करने में १. 'पूर्वं' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । २. 'वर्ण' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ३. उच्यते- चतुर्दशकोणादिचक्रेषु देवतानामकारादिभूतलिपिवर्णमयताकथनेनैव शिष्टवर्गशषसमयत्व- मष्टकोणदेवता-झ. । ४. 'सूक्ष्म....तावन्मात्रे' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. रूपभेद इति क.विहाय सार्वत्रिकः पाठः । ६. 'सर्वरोगहरे चक्रे' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।

३४६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तासां ध्यानमाह— रक्तवर्णा वरदाभयमुद्रिताः ॥१५४॥ पुस्तकं जपमालां१ च दधानाः सिद्धयोगिनीः । सिद्धः परमशिवः, तेन २योगः संबन्धः पुर्यष्टका३त्मकतया तस्य ४जीव- त्वापादनलक्षणः, तद्वतीः । शिष्टं स्पष्टम् ॥१५४-१५५॥ शुद्धविद्याविशुद्धिं च भुक्तिसिद्धिं महेश्वरि ॥१५५॥ ईश्वरीं त्रिपुरा५सिद्धिं पूजयेद् बिन्दुतर्पणैः । “अहन्तेदन्तयोरैक्यमतिर्विद्या निगद्यते” (श्लो० २१) इति परापञ्चाशिकोक्त- रीत्या शिवाद्वैतप्रथालक्षणायाः शुद्धविद्याया विशुद्धिः “ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य पश्चाज्ज्ञानं परित्यजेत्” (त० धा० ३।४१) इति ६प्रतिपादितरीत्या ज्ञातृज्ञानज्ञेय- विभागशून्यनिर्विकल्पबोधलक्षणपरशिवसमावेशः, तद्रूपिणीम्, अत एव भुक्तिसिद्धिम् इस चक्र का स्पष्ट प्रभाव सबको विदित है। इसी चक्र में चतुःशती शास्त्र (१।७७- ७९) में वर्णित वशिनी आदि आठ शक्तियों की पूजा करे ॥१५३-१५४॥ अब इनका ध्यान बताते हैं— इन शक्तियों का वर्ण लाल है। इन सिद्धयोगिनियों के चार हाथ वर और अभय मुद्रा से तथा पुस्तक और जपमाला से अलंकृत हैं ॥१५४-१५५॥ परमशिव रूपी सिद्ध को ये योगिनियाँ अपने पुर्यष्टकमय शरीर से संयुक्त कर अज्ञ जीव बना देती हैं, इसीलिये इनको यहाँ सिद्धयोगिनियाँ कहा गया है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१५४-१५५॥ हे महेश्वरि ! शुद्धविद्या को विशुद्ध करने वाली भुक्ति सिद्धि की और चक्रेश्वरी त्रिपुरासिद्धि को यहाँ बिन्दुतर्पण द्वारा पूजा करे ॥१५५-१५६॥ परापंचाशिका में बताया गया है—"अहन्ता और इदन्ता में एकता को देखने वाली मति ही विद्या कहलाती है"। इस तरह से अद्वय शिवतत्त्व का ही सर्वत्र विस्तार देखने वाली मति शुद्धविद्या कहलाती है। "ज्ञान से ज्ञेय को जान लेने के बाद ज्ञान का भी परित्याग कर दे" इस उक्ति के अनुसार इस शुद्धविद्या का भी परित्याग कर उसकी विशुद्धि की जाती है। ऐसा करने से साधक ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय नामक विभागों से रहित निर्विकल्प बोधस्वरूप परमशिव में समाविष्ट हो जाता है। शुद्धविद्या की विशुद्धि के द्वारा परमशिव स्वरूप में समावेश दिलाने वाली यह चक्रेश्वरी विद्या भुक्तिसिद्धि की १. लाञ्च-ख. छ. झ. उ. । २. संयोगः-क. ग. । ३. कात्मतया-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. जीवतापा-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. रां सिद्धां-क. ग. । ६. वचनप्रति-ख. ने. ज. झ. उ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४७ विश्वं शिवादिभूम्यन्तं चमत्काररसाश्रयम् । ¹महीयसे महाभोक्त्रे महेशाय निवेदये ॥ (ग० स्तो०) इत्यभियुक्त२वचनोक्तरीत्या ३महाभुक्तिं विश्वविषयिणीं स्वसाधकस्य साधयति, तां चक्रेश्वरीं सप्तमचक्रेश्वरीम्, त्रिपुरासिद्धिं४ मातृमानमेयरूपाणां त्रिपुराणाम् ५उत्तीर्णपरमशिवलयलक्षणां सिद्धिम्, बिन्दुंतर्पणैरनामाङ्गुष्ठ६योगशिवशक्तिमेलन- मुद्रया द्रव्यबिन्दुतर्पणैः साक्षतकुसुमैः पूजयेदिति ॥१५५-१५७॥ अष्टमचक्रपूजां सवासनामाह— शक्तित्रयात्मिका देवि चिद्धामप्रसराः शिवाः७ ॥१५६॥ संवर्ताग्निकलारूपाः परमातिरहत्यकाः । पूर्णपूर्णस्वरूपायाः सिद्धेर्हेतुः सुरेश्वरि ॥१५७॥ भी अधिष्ठात्री है ।¹ भट्ट गंगाधर मिश्र के स्तोत्र में बताया गया है— अनेक आश्चर्य जनक पदार्थों से भरे हुए, अद्भुत रस की सृष्टि करने वाले, शिव से भूमि पर्यन्त विस्तार वाले इस विश्व को मैं महान् ऐश्वर्यशाली महाभोक्ता भगवान् महेश को समर्पित करता हूँ ।। इसके अनुसार यह सप्तम चक्रेश्वरी विद्या अपने साधक के लिये विश्वविषयिणी महाभुक्ति को उपस्थित कर देती है। इसीलिये भुक्तिसिद्धि की अधिष्ठात्री है । इसका नाम त्रिपुरासिद्धि इसलिये है कि यह माता, मान और मेय लक्षण त्रिपुरों से ऊपर उठाकर परम शिवतत्त्व में विलय रूप सिद्धि को प्रदान करने वाली है । अनामिका और अंगुष्ठ को मिलाने से शिवशक्तिमेलन मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से अक्षत, पुष्प के साथ साधित अर्घ्य के बिन्दुओं से तर्पण कर इस देवी का पूजन करना चाहिये ॥१५५-१५६॥ अष्टम चक्र की पूजा वासना के साथ बताते हैं— हे देवि ! शक्तित्रयात्मक, चिद्धामप्रसरात्मक, कल्याणकारिणी, संवर्ताग्नि- कलारूप परम अतिरहस्य योगिनियाँ पूर्णपूर्ण स्वरूप सिद्धि को प्रदान कर १. नास्त्येषा पङ्क्तिः-क. । २. क्तोक्त्या-ख. ने. झ. । ३. महाभुक्तिविश्वविषयिणी स्वसाधकस्य सिद्धयति-ख. विहाय सार्वत्रिकः पाठः । ४. सिद्धां-क. ग. ने. ज. । ५. सिद्धिमृत्तीर्ण-ख. ज. । ६. योगलक्षणया-ख. ज. झ. उ. । ७. पराः-क. ग. । ८. तुतयेश्वरि-क. उ. । १. भट्ट गंगाधर मिश्र के दो वचन पहले (पृ० ८५, २४३) उद्धृत हो चुके हैं। पृ० ८५ की पहली टिप्पणी देखिये । ऋजुविमर्शिनी (पृ० ६९) में वे दोनों वचन उपलब्ध हैं। प्रस्तुत तीसरा वचन भी वहीं (पृ० १३४) भट्ट गंगाधर स्तोत्र के नाम से उद्धृत है। इस श्लोक का उत्तरार्ध क. मातृका के अतिरिक्त प्रायः सभी में उपलब्ध है ।

३४८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः सर्वसिद्धिमयाख्ये तु चक्रे त्वायुधभूषिते¹। स्थिताः कामेश्वरीपूर्वश्चतस्रः पीठदेवताः ॥१५८॥ शक्तित्रयात्मिका इच्छाज्ञानक्रियात्मिकाः। चिद्धामप्रसराः चितः संविदोऽ- म्बिका२ख्याया धाम्नां किरणानां वामाज्येष्ठारौद्र्यात्मकानाम् ओड्डीशषष्ठीश- मित्रेशाख्यानां प्रसराः स्पन्दभूताः, ३सर्वावरणप्रधानभूतत्वात्। संवर्ताग्निकला- रूपाः संवर्ताग्निविश्वघस्मरः परमशिवोऽस्वरः४, तस्य कला हकारः, तद्रूपा- स्तदात्मिकाः, शान्ताशक्त्यवयवभूतत्वात्। परमातिरहस्यकाः परमाः सर्वावरण- देव५ताभ्योऽतिरहस्यका मनोबुद्ध्यहङ्काररूपोपाधित्रयपरिस्फुरत्परचिदाधाररूपत्वा- दत्यन्तगोपनीयाः। पूर्णापूर्णस्वरूपायाः पूर्णा परशिवसमावेशरूपत्वात्, ६[अ]- पूर्णस्वरूपा विश्वविषयत्वात्, तादृशायाः सिद्धेर् उभयात्मिकायाः। सर्वस्य क्षित्यादिशिवान्तस्थ परशिवविश्रान्तिलक्षणायाः सिद्धेर्जीवन्मुक्तेर्हेतुतया, सर्व- वाली हैं। हे सुरेश्वरि ! सर्वसिद्धिमय चक्र में आयुधों से भूषित कामेश्वरी प्रभृति चार पीठदेवियाँ निवास करती हैं ॥१५६-१५८॥ इच्छा, ज्ञान और क्रिया ये तीन शक्तियाँ हैं। चिद्धामप्रसर का अर्थ है चिति शक्ति, संविदात्मक अम्बिका शक्ति की किरणों का प्रसार। वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियों का तथा ओड्डीश, षष्ठीश और मित्रेश नामक नाथों का स्पन्दन (प्रसार) कामेश्वरी आदि शक्तियों से ही होता है, जो कि अन्य सभी आवरण देवताओं की अपेक्षा प्रधान हैं। ये देवियाँ संवर्ताग्निकलारूप भी हैं। संवर्ताग्नि यहाँ सारे विश्व को भस्म कर देने वाला परमशिव है। उसकी कला हकार है। ये शक्तियाँ हकारात्मक हैं, क्योंकि शान्ता शक्ति की ये अवयवभूत हैं, उससे उत्पन्न हुई हैं। इसीलिये इनको परम अति- रहस्य योगिनियों के नाम से जाना जाता है। सभी आवरण देवताओं में इनका स्वरूप अत्यन्त रहस्यमय है। मन, बुद्धि और अहंकार रूप तीन उपाधियों के माध्यम से इनमें परा चितिशक्ति का स्वरूप स्फुरित होता है। इसलिये इनका स्वरूप अत्यन्त गोपनीय है। परमशिव का समावेश जहाँ सिद्ध होता है, वह सिद्धि पूर्णस्वरूपा है। जहाँ विषयाकार समावेश सिद्ध होता है, वह सिद्धि अपूर्णस्वरूपा है। इन उभयविध सिद्धियों को प्रदान करने वाली ये देवियाँ सर्वसिद्धिमय चक्र में निवास करती हैं। इसको सर्व- सिद्धिमय इसलिये कहते हैं कि पृथिवी से शिवपर्यन्त समस्त विश्व को यह परमशिव में १. षिताः-क. ग.। २. कादेव्याः-ने. झ.। ३. 'सर्वा****त्वात्' नास्ति-ख. ज. उ.। ४. 'अस्वरः' नास्ति-क. ग.। ५. ताभ्यः सर्वावरणप्रधानरूपत्वादतिगो-ख. ज. झ. उ.। ६. पूर्णस्वरूपायाः पूर्णतत्त्वमनु विश्वविषया सिद्धिस्तादृश्याः सिद्धेर्हेतुस्तदात्मिकायाः-ख. ने. ज. उ.।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४९ सिद्धिमयाख्ये निरुक्त(१।८४)सर्वसिद्धिमय^१नाम्नि, आयुधभूषिते^२ कामेश्वरी- कामेश्वरयोरायुधैः^३ शरचापपाशाङ्कुशैरष्टभिर्मिथुनीकृतैः “पश्चिमोत्तरपौरस्त्य- दक्षिणाशाक्रमेण तु” (१।१७९) इत्यादिवचतुःशतीशास्त्रोक्तरीत्याऽलङ्कृते^४ । तेन^५ आयुधानां ^६कामेश्वर्यावरणान्तःपातित्वं सिद्धम् ; चक्रेऽष्टमे स्थिताः कामेश्वरी- पूर्वाः “कामेश्वरीमग्रकोणे” (१।१८२) इति चतुःशतोशास्त्रो^७क्तरीत्या, चतस्रः पीठ- देवताः, पीठानि “का पू जा ओ इति क्रमात्” (१।४१) इति पूर्वोक्तानि मनोबुद्ध्य- हङ्कारचित्तलक्षणानि, तेषु संक्रान्ता देवताः परप्रकाशावयव^८भूतवामाज्येष्ठारौ- द्र्यम्बिकामयमित्रेशषष्ठीशओड्डीशचर्यानाथशिवाङ्कस्थास्तद्विमर्शशक्त्यंशभूतेच्छा- ज्ञानक्रियाशान्तामयकामेश्वरीवज्रेश्वरीभगमालिनीमहात्रिपुरसुन्दर्यश्चतस्र इति नवमचक्रदेवतया सह संकलनात् । अष्टमचक्रे तु तिस्र एव कामेश्वर्याद्याः सायुधाः ॥१५६-१५८॥ विश्राम रूप सिद्धि को, जीवन्मुक्तावस्था को दिलाने वाला है। सर्वसिद्धि पद की निर्वक्ति पहले (१।८४) बताई जा चुकी है। यह चक्र कामेश्वर और कामेश्वरी के आयुधों से अलंकृत है। शर, चाप, बाण और अंकुश को मिथुनीकृत करने पर, अर्थात् कामेश्वर और कामेश्वरी के आयुधों के रूप में मिलाकर गिनने पर इनकी संख्या आठ हो जाती है। इनका विन्यास चतुःशती शास्त्र (१।१७९) के अनुसार-“पश्चिम, उत्तर, पूर्व और दक्षिण दिशा के क्रम से” करना चाहिये। इस तरह से यह चक्र कामेश्वर और कामेश्वरी के आठ आयुधों से अलंकृत है। इससे यह सिद्ध होता है कि इन आयुधों की कामेश्वरी आदि आवरण देवताओं के साथ पूजा करनी चाहिये। अष्टम चक्र में स्थित कामेश्वरी आदि देवियाँ चतुःशती शास्त्र (१।१८२) में वर्णित हैं। ये चार पीठदेवता हैं। का पू जा ओ नामक पीठों का वर्णन पहले (१।४१) आ चुका है। ये पीठ ^१मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त का प्रतिनिधित्व करते हैं। परप्रकाश के अवयवभूत वामा, ज्येष्ठा, रौद्री और अम्बिका शक्तिमय मित्रेश, षष्ठीश, ओड्डीश और चर्यानाथ के अंक (गोद) में स्थित विमर्श शक्ति की अवयवभूत इच्छा, ज्ञान, क्रिया और शान्ता शक्तिमय कामेश्वरी, वज्रेश्वरी, भगमालिनी और महात्रिपुरसुन्दरी नामक चार देवियाँ इनमें संक्रान्त होती हैं। यहाँ यह समझ लेना चाहिये कि नवम चक्र की स्वामिनी का भी संकलन करने पर ही इनकी संख्या चार होती है। अष्टम चक्र में तो केवल कामेश्वरो आदि तीन देवियों और आयुधों का ही पूजा होती है ॥१५६-१५८॥ १. मयानन्दे-ख. ने. ज. उ. । २. षिताः-क. ग. । ३. 'आयुधैः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ४. ताश्च-क. ग. । ५. तेन-इति केवलं झमातृकायां दृश्यते । ६. कामेश्वर- कामेश्वर्योश्चरणा-क. ग. । ७. शास्त्रोक्ताश्च-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. भूता-ज. झ. । १. पृ० ६१ पर उद्धृत सौभाग्यसुधोदय के चार श्लोकों में इस विषय की चर्चा पहले आ चुका है।

३५० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः आयुधदेवतानां ध्यानमाह— आयुधोस्त्वतिरक्ताभाः स्वायुधोज्ज्वलमस्तकाः । वरदाभयहस्ताश्च पूज्या १ध्यातृफलप्रदाः ॥१५९॥ त्वदीयाश्च मदीयाश्च पुंस्त्रीवश्यविधायिनः । आयुधा आयुध३देवताः, छान्दसत्वात् पुंल्लिङ्गप्रयोगः । स्वायुधोज्ज्वल- मस्तकाः स्वाधिष्ठितायुधपरि४कलितमस्तकाः । महापद्मवनान्तस्थां कारणानन्दविग्रहाम् । मदङ्कोपाश्रयां देवीमिच्छाकामफलप्रदाम् ॥ भवतीम् (३।१११-११२) इति पूर्वोक्तरीत्या महापद्मवनान्तस्थानाश्रितेश्वरस्य विश्वगुरोर्ममाङ्कस्थाया अनाश्रितकलायास्तव संबन्धिनो बाणधनुःपाशाङ्कुशाः पुंवश्यविधायिनः, तादृशस्य मम संबन्धिनो बाणधनुःपाशाङ्कुशाः स्त्रीवश्यविधायिन इत्यर्थः । तदुक्तं चतुःशतीशास्त्रे— आयुध देवताओं का ध्यान बताते हैं— ये आयुध चटकीली लाल आभा (कान्ति) वाले हैं । इनके मस्तक पर अपना ही स्वरूप अंकित है । वर और अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं । अपना ध्यान करने वाले को अभीष्ट फल देने वाले हैं । इसी चक्र में इनकी भी पूजा करनी चाहिये । तुम्हारे (कामेश्वरी के) आयुध पुरुष को और मेरे (कामेश्वर के) आयुध स्त्री को वश में करने में समर्थ हैं ॥१५९-१६०॥ आयुध शब्द से यहाँ आयुधदेवताओं का ग्रहण किया जाता है । आयुध शब्द का पुंलिंग में प्रयोग वैदिक पद्धति से किया गया है । ये आयुध अपने अपने मस्तक पर अपनी ही आकृति धारण किये रहते हैं । "महापद्मवन में विराजमान, कारणानन्द शरीरवाली, इच्छानुसार सभी कामनाओं को पूरा करने वाली तुम मेरे अंक में विराज- मान हो" इस तरह से पहले (३।१११-११२) यहाँ महापद्मवन में स्थित विश्वगुरु कामेश्वर की गोद में विराजमान अनाश्रित कला भगवती का वर्णन किया गया है । इस युगल स्वरूप में से तुम्हारे (कामेश्वरी सम्बन्धी) बाण, धनुष, पाश और अंकुश का प्रयोग पुरुषों को वश में करने के लिये तथा मेरे (कामेश्वर के) बाण, धनुष, पाश और अंकुश का प्रयोग स्त्रियों को वश में करने के लिये किया जाता है । चतुःशती शास्त्र (४।६०-६१) में इनका वर्णन इस तरह से किया गया है— १. धा अपि-ख. ने. छ. ज. झ. । २. व्रत-क. ग., प्रीति-उ. । ३. धाधिदे-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कल्पित-ख. ने. ज. झ. उ. ।

तृतीयाः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५१ मादनैर्मदनो भूत्वा पाशाङ्कुशधनुःशरैः । क्षोभयेत् स्वर्गभूलोकपातालतलयोषितः ॥ तथैव शाक्तैर्देवेशि त्रिपुरीकृतविग्रहः । ^१क्षोभयेद् देवगन्धर्वसिद्धविद्याधरानपि ॥ (४।६०-६१) स्पष्टमन्यत् ॥१५९-१६०॥ चतुःशतीशास्त्रेऽनुद्धृतत्वाच्छक्तिबाणात्मबीजान्युद्धरति— त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमँज्जाणान्ताः सुरेश्वरि ॥१६०॥ द्वितीयस्वरसंयुक्ता एते बाणास्त्वदीयाकाः । श्रीकण्ठादिन्यासपरिपाट्या त्वगादीनां धातूनां यवर्णादयः पञ्च, एते द्वितीय- स्वरसंयुक्ता बाणाः । आकारो द्वितीयः स्वरः, सामर्थ्याद् बिन्दुरपि ^३लक्ष्यते । त्वदीयाका बाणाः ^४त्वत्संबन्धिबाणबीजानि । तत्र यकारस्त्वगात्मकः, रेफोऽसृ- गात्मकः, लकारो मांसात्मकः, वकारो मेदस्वरूपः । ^५अस्थिमज्जाणन्तिशब्दोऽस्थि- शिव संबन्धी पाश, अंकुश, धनुष और बाण को धारण कर स्वयं शिवस्वरूप हो साधक स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और पाताल तल में विद्यमान स्त्रियों को भी क्षुब्ध कर देता है। इसी तरह से हे देवेशि ! शक्ति संबन्धी आयुधों को धारण कर त्रिपुरा स्वरूप हुआ साधक देव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर आदि को भी क्षुब्ध कर देता है ॥ बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१५९-१६०॥ चतुःशती शास्त्र में उद्धृत न होने से अब यहाँ शक्ति के बाण बीजों का उद्धार किया जा रहा है— हे सुरेश्वरि ! त्वक्, असृक्, मांस, मेदा और अस्थिमज्जान्त (शुक्र) धातुओं के वाचक वर्णों को द्वितीय स्वर से संयुक्त कर देने पर तुम्हारे (शक्ति के) बाण- बीज बनते हैं ॥१६०-१६१॥ श्रीकण्ठ न्यास में बताई गई पद्धति से त्वक् आदि पांच धातुओं के ^१यकार आदि पाँच वर्ण होते हैं। इनको द्वितीय स्वर से संयुक्त करने पर ये बाणबीज बन जाते हैं। दूसरा स्वर आकार है। बीज पद को सार्थक करने के लिये बिन्दु भी इनके साथ जोड़ा जाता है। इस तरह से तुम्हारे बाण, शक्तिसंबन्धी बाणबीज बनते हैं। यहाँ यकार त्वगात्मक, रेफ असृगात्मक, लकार मांसात्मक और वकार मेदास्वरूप है। अस्थिमज्जा- १. साधयेद्-मु. । २. शुक्लानां च महे-क. ग. । ३. लभ्यते-क. ग. । ४. तव धनुषि बाण-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. अस्थिशब्द उपरि स्थितेन शुक्लात्मकेन सकारेणा- न्वेति-क. ग. ।

  1. तन्त्राभिधान में संगृहीत प्रकारान्तर मन्त्राभिधान (पृ० १९-२१) में यह विषय देखा जा सकता है।

३५० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः आयुधदेवतानां ध्यानमाह— आयुधोस्त्वतिरक्ताभाः स्वायुधोज्ज्वलमस्तकाः । वरदाभयहस्ताश्च पूज्या १ध्यातृफलप्रदाः ॥१५९॥ त्वदीयाश्च मदीयाश्च पुंस्त्रीवश्यविधायिनः । आयुधा आयुध३देवताः, छान्दसत्वात् पुंल्लिङ्गप्रयोगः । स्वायुधोज्ज्वल- मस्तकाः स्वाधिष्ठितायुधपरि४कलितमस्तकाः । महापद्मवनान्तस्थां कारणानन्दविग्रहाम् । मदङ्गोपाश्रयां देवीमिच्छाकामफलप्रदाम् ॥ भवतीम् (३।१११-११२) इति पूर्वोक्तरीत्या महापद्मवनान्तस्थानाश्रितेश्वरस्य विश्वगुरोर्मामङ्कस्थाया अनाश्रितकलायास्तव संबन्धिनो बाणधनुःपाशाङ्कुशाः पुंवश्यविधायिनः, तादृशस्य मम संबन्धिनो बाणधनुःपाशाङ्कुशाः स्त्रीवश्यविधायिन इत्यर्थः । तदुक्तं चतुःशतीशास्त्रे— आयुध देवताओं का ध्यान बताते हैं— ये आयुध चटकीली लाल आभा (कान्ति) वाले हैं। इनके मस्तक पर अपना ही स्वरूप अंकित है। वर और अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं। अपना ध्यान करने वाले को अभीष्ट फल देने वाले हैं। इसी चक्र में इनकी भी पूजा करनी चाहिये। तुम्हारे (कामेश्वरी के) आयुध पुरुष को और मेरे (कामेश्वर के) आयुध स्त्री को वश में करने में समर्थ हैं ॥१५९-१६०॥ आयुध शब्द से यहाँ आयुधदेवताओं का ग्रहण किया जाता है। आयुध शब्द का पुंलिंग में प्रयोग वैदिक पद्धति से किया गया है। ये आयुध अपने अपने मस्तक पर अपनी ही आकृति धारण किये रहते हैं। "महापद्मवन में बिराजमान, कारणानन्द शरीरवाली, इच्छानुसार सभी कामनाओं को पूरा करने वाली तुम मेरे अंक में विराज- मान हो" इस तरह से पहले (३।१११-११२) यहाँ महापद्मवन में स्थित विश्वगुरु कामेश्वर की गोद में विराजमान अनाश्रित कला भगवती का वर्णन किया गया है। इस युगल स्वरूप में से तुम्हारे (कामेश्वरी सम्बन्धी) बाण, धनुष, पाश और अंकुश का प्रयोग पुरुषों को वश में करने के लिये तथा मेरे (कामेश्वर के) बाण, धनुष, पाश और अंकुश का प्रयोग स्त्रियों को वश में करने के लिये किया जाता है। चतुःशती शास्त्र (४।६०-६१) में इनका वर्णन इस तरह से किया गया है— १. धा अपि-ख. ने. छ. ज. झ. । २. व्रत-क. ग., प्रीति-उ. । ३. धाधिदे-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कल्पित-ख. ने. ज. झ. उ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५१ मादनैर्मदनो भूत्वा पाशाङ्कुशधनुःशरैः । क्षोभयेत् स्वर्गभूलोकपातालतलयोषितः ॥ तथैव शाक्तैर्देवेशि त्रिपुरीकृतविग्रहः । १क्षोभयेद् देवगन्धर्वसिद्धविद्याधरानपि ॥ (४।६०-६१) स्पष्टमन्यत् ॥१५९-१६०॥ चतुःशतीशास्त्रेऽनुद्धृतत्वाच्छक्तिबाणात्मबीजान्युद्धरति— त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमँज्जार्णान्ताः सुरेश्वरि ॥१६०॥ द्वितीयस्वरसंयुक्ता एते बाणास्तवदीयाः । श्रीकण्ठादिन्यासपरिपाट्या त्वगादीनां धातूनां यवर्णादयः पञ्च, एते द्वितीय- स्वरसंयुक्ता बाणाः । आकारो द्वितीयः स्वरः, सामर्थ्याद् बिन्दुरपि ३लक्ष्यते । त्वदीयाका बाणाः ४त्वत्संबन्धिबाणबीजानि । तत्र यकारस्त्वगात्मकः, रेफोऽसृ- गात्मकः, लकारो मांसात्मकः, वकारो मेदस्वरूपः । ५अस्थिमज्जार्णान्तशब्दोऽस्थि- शिव संबन्धी पाश, अंकुश, धनुष और बाण को धारण कर स्वयं शिवस्वरूप हो साधक स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और पाताल तल में विद्यमान स्त्रियों को भी क्षुब्ध कर देता है । इसी तरह से हे देवेशि ! शक्ति संबन्धी आयुधों को धारण कर त्रिपुरा स्वरूप हुआ साधक देव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर आदि को भी क्षुब्ध कर देता है ॥ बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१५९-१६०॥ चतुःशती शास्त्र में उद्धृत न होने से अब यहाँ शक्ति के बाण बीजों का उद्धार किया जा रहा है— हे सुरेश्वरि ! त्वक्, असृक्, मांस, मेदा और अस्थिमज्जान्त (शुक्र) धातुओं के वाचक वर्णों को द्वितीय स्वर से संयुक्त कर देने पर तुम्हारे (शक्ति के) बाण- बीज बनते हैं ॥१६०-१६१॥ श्रीकण्ठ न्यास में बताई गई पद्धति से त्वक् आदि पांच धातुओं के १यकार आदि पांच वर्ण होते हैं । इनको द्वितीय स्वर से संयुक्त करने पर ये बाणबीज बन जाते हैं । दूसरा स्वर आकार है । बीज पद को सार्थक करने के लिये बिन्दु भी इनके साथ जोड़ा जाता है । इस तरह से तुम्हारे बाण, शक्तिसंबन्धी बाणबीज बनते हैं । यहाँ यकार त्वगात्मक, रेफ असृगात्मक, लकार मांसात्मक और वकार मेदास्वरूप है । अस्थिमज्जा- १. साधयेद्-मु. । २. शुक्लानां च महे-क. ग. । ३. लभ्यते-क. ग. । ४. तव धनुषि बाण-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. अस्थिशब्द उपरि स्थितेन शुक्लात्मकेन सकारेणा- न्वेति-क. ग. ।

  1. तन्त्राभिधान में संगृहीत प्रकारान्तर मन्त्राभिधान (पृ० १९-२१) में यह विषय देखा जा सकता है ।

३५२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः मज्जयोरुपरि स्थितं शुक्रात्मकं सकारं लक्षयति । चतुः^१शतीशास्त्रेऽप्यनुक्तानां कामेश्वरबाणबीजानाम्—"आदौ ^२पादावरेण्याख्यां ^३संयुजेन्नलरक्रमे" इति स्वच्छन्दसंग्रहोद्धृतत्वादागमान्तरेषु प्रसिद्धत्वान्नात्रोद्धारः क्रियते ॥१६०-१६१॥ वामादीनां पुराणां तु जननी त्रिपुराम्बिका ॥१६१॥ परस्वातन्त्र्यरूपत्वादिक्षासिद्धिर्महेश्वरि । एताः सर्वोपचारेण पूजयेत् तु वरानने ॥१६२॥ वामादीनां वामाज्येष्ठारौद्र्याख्यानां मित्रेशादिरूपाणां ^४मिच्छाज्ञानक्रिया^५त्मक- विमर्शशक्त्यंशकामेश्वर्याद्यधि^६ष्ठानत्वात् पुरशब्दवाच्यत्वम्, तेषां त्रिपु- राणां जननी समष्टिरूपत्वादम्बिकाशक्ति^७रेव त्रिपुराम्बिका, निरुक्ता ^८चक्रे- श्वरीति शेषः। "स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गिरत्यपि" इत्याज्ञावतारोक्तरीत्या परशिवस्य विश्वसर्जनसंहारलक्षणस्वातन्त्र्यलक्षणेच्छासिद्धि ^९रेतच्चक्राचर्कस्य र्णान्त शब्द अस्थि और मज्जा के ऊपर स्थित शुक्रात्मक सकार को लक्षित करता है। चतुःशती शास्त्र में कामेश्वर के बाण बीजों का भी उद्धार नहीं बताया गया है किन्तु उनका उद्धार 'स्वच्छन्दसंग्रह में बता दिया गया है और आगमान्तर में भी ये प्रसिद्ध हैं, अतः उनका उद्धार यहाँ नहीं किया गया है ॥१६०-१६१॥ त्रिपुराम्बिका वामा आदि तीन पुरों की जननी है। हे महेश्वरि ! अपनी परम स्वातन्त्र्य शक्ति के कारण यह अपने साधक को इच्छासिद्धि प्रदान करने वाली है। हे वरानने ! इस अष्टम चक्र में इन सबकी पूजा करनी चाहिये ॥१६१-१६२॥ मित्रेश आदि तीन प्रकाशों की अंशभूत वामा, ज्येष्ठा और रौद्री नामक शक्तियों में इच्छा, ज्ञान और क्रियात्मक विमर्शांशभूत कामेश्वरी आदि शक्तियां अधिष्ठित हैं, अतः वामा आदि को यहाँ पुर नाम दिया गया है। इन तीनों पुरों की जननी समष्टिस्वरूपिणी अम्बिका शक्ति है। इसी को 'त्रिपुराम्बिका' कहते हैं। इस अष्टम चक्रेश्वरी का ही स्वरूप यहाँ बताया गया है। आज्ञावतार के वर्णन के अनुसार यह शक्ति सारे जगत् १. शत्यामप्यनुद्धृतानां-क. ग.। २. यायो-झ. । ३. रक्तयोर्नीलरक्तयोः-ख. ने. ज. उ. ब., संयुजेन्नीलरक्तयोः-झ. । ४. णां पुराणामि-ख. झ. उ. । ५. मय-ख. ज. झ. उ. । ६. ष्ठितत्वात्-क. ग. । ७. क्तेरेतत् त्रि-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. चक्रेशी-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. रेतदर्च-ख. ने. ज. झ. उ. । १. दीपिका में उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचन से तो यह विषय स्पष्ट नहीं होता, किन्तु ऋजुविमर्शिनी (पृ० २५५) तथा सुभगोदय (पृ० २९५) में कामेश्वरी और कामेश्वर के बाणबीजों का उद्धार स्वरूप बताया गया है।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५३ सिद्धयति, १सेयमिच्छासिद्धिरस्मिन् चक्रे स्थितेत्यर्थः । एता आयुधदेवताः कामेश्व- र्याद्याश्चक्रे२श्वरीसिद्धियुताः सर्वोपचारैर्गन्धादिभिरुपचारैः पूजयेत् ॥१६१-१६२॥ नवमचक्रपूजां सवासनामाह— सर्वानन्दमये देवि परब्रह्मात्मके परे । चक्रे संवित्तिरूपा च महात्रिपुरसुन्दरी ॥१६३॥ स्वैराचारेण सम्पूज्या त्वहन्तेदन्तयोः समा । महाकामकलारूपा “आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्” (तै० उ० ३।६), “एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति” (बृ० उ० ४।३।३२) इति ३श्रुत्युक्तरीत्या सर्वानन्द- समष्टिभूतपरमानन्दमयत्वात् परब्रह्मात्मके । अत एव परे विश्वोत्तीर्णे । ४परम- शिवस्पन्दमयत्वाच्चक्रे नवमे संवित्तिरूपा, “स्वसंवित् त्रिपुरा देवी लौहित्यं तद्वि- मर्शनम्” इत्यभियुक्त५वचनोक्तरीत्या वेदकवेद्ययोरहन्तेदन्तयोः समा मध्यस्था को निगलती और उगलती रहती है। इस शक्ति की उपासना करने वाले को भी विश्व की सृष्टि और संहार करने की स्वातन्त्र्य (सामर्थ्य) स्वरूपिणी इच्छासिद्धि प्राप्त हो जाती है। अतः इस इच्छासिद्धि की भी इसी चक्र में पूजा की जाती है। इन सबकी— आयुध देवताओं की, कामेश्वरी आदि तीन देवियों की और इच्छासिद्धि के साथ चक्रेश्वरी त्रिपुराम्विका की—गन्ध, पुष्प आदि सभी उपचारों से यहाँ पूजा करनी चाहिये ॥१६१-१६२॥ नवम चक्र की पूजाविधि वासना के साथ बताते हैं— हे देवि ! परब्रह्मात्मक सर्वानन्दमय श्रेष्ठ चक्र में संवित्ति स्वरूपिणी महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा स्वैराचार से करनी चाहिये। महाकामकला स्वरूपिणी यह देवी अहन्ता और इदन्ता इन दोनों ही स्थितियों में समान स्वरूप वाली है ॥१६३-१६४॥ “ऋषि (भृगु वारुणि) ने जान लिया कि आनन्द ही ब्रह्म है”, “इसी ब्रह्मानन्द की एक मात्रा का अन्य प्राणी उपभोग करते हैं” इत्यादि श्रुतियों के प्रमाण से सर्वानन्द के समष्टिभूत परमानन्दमय परब्रह्मात्मक इस विश्वोत्तीर्ण परम चक्र में परमशिव का स्पन्दन स्पष्ट भासित होने लगता है, इसीलिये यह संवित्तिस्वरूप है। १किसी अभि- युक्त ने कहा है—“स्वसंवित् ही त्रिपुरा है और उसकी ललाई ही विमर्श शक्ति है”। १. अतः सेय-क.ग. । २. श्चक्रेशी-झ. उ. । ३. श्रुत्युक्ता-ख. ने. ग. झ .उ. । ४. परशिवानन्दमय-ख. ने. । ५. युक्तोक्त-ख. ने. ग. झ. उ. ।

  1. प्रस्तुत श्लोक को भी भास्करराय ने नित्याषोडशिकार्णव (५।४१) का अंग मानकर उसकी व्याख्या की है। (द्र० सेतुबन्ध, पृ० १२६) २३

३५४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः संवित्तिर्महात्रिपुरसुन्दरी पूर्वोक्त (१।८५) निर्वचना। महाकामकलारूपा प्रकाश- विमर्श¹सामरस्यमहाबिन्दुत्रयमयहार्धकला महाकामकला, तद्रूपा “बिन्दुं संकल्प्य वक्त्रं तु” (१।१८५) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्तरीत्या। ²स्वैराचारेण सम्पूज्य, यत्र यत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत्। तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं संप्रकाशते॥ (श्लो० ७८) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या निजेच्छानुरूपैरिन्द्रियप्रीणनैर्द्रव्यैः परिस्फुर- त्परमानुसन्धानलक्षणेन स्वैराचारेण सम्पूज्य, स्वसंविद्देवता भावनीयेत्यर्थः ॥१६३-१६४॥ प्राप्तिसिद्धिमाह— पीठविद्यादिसिद्धिदा ॥१६४॥ महामुद्रामयी देवीपूज्य। “का पू जा ओ इति क्रमात्” (१।४१) इति पूर्वोक्ताः पीठाश्चत्वारः। विद्याः वाग्भवकामराजशक्ति³तुरीयबीजात्मिकाः। आदिशब्दाद् देवताः कामेश्वर्याद्या- इस तरह से यह संवित् वेद्य और वेदक दशा में, अहन्ता और इदन्ता की स्थिति में समान स्वरूप वाली है, अर्थात् सभी अवस्थाओं में यह मध्यस्थ रूप में विद्यमान है। इस तरह से यह मध्यस्थ संवित्ति ही महात्रिपुरसुन्दरी है। इसकी निरुक्ति पहले (१।८५) बताई जा चुकी है। यह महाकामकला स्वरूपिणी है। प्रकाश और विमर्श के सामरस्य स्वरूप तीन महाबिन्दुओं वाली हार्धकला को ही महाकामकला कहा जाता है। यह नवम चक्रेश्वरी महाकामकला स्वरूपिणी है। चतुःशती शास्त्र (१।१८५) में इसका स्वरूप बताया गया है। स्वैराचार से इसकी पूजा करनी चाहिये। विज्ञान- भैरव भट्टारक का कहना है— जहाँ जहाँ मन को तुष्टि हो, वहीं मन को स्थिर कर देना चाहिये। ऐसा करने से उसी में अपना परमानन्दात्मक स्वात्मस्वरूप प्रकाशित हो उठता है॥ इसी पद्धति से अपनी इच्छा के अनुसार इन्द्रियों को तृप्त करने वाले द्रव्यों से, इन्हीं में अपने स्वात्मस्वरूप को खोजता हुआ साधक यथेच्छ आचरण द्वारा नवम चक्रेश्वरी की पूजा और भावना करे ॥१६३-१६४॥ प्राप्ति नामक सिद्धि का अब वर्णन करते हैं— यह देवी पीठ, विद्या आदि की प्राप्तिरूप सिद्धि को देने वाली है। महा- मुद्रामयी इस देवी की पूजा यहीं की जाती है ॥१६४-१६५॥ का पू जा ओ के क्रम से चार पीठ पहले (१।४१) बताये जा चुके हैं। वाग्भव, १. व्याससमासमयबिन्दुत्रयहार्धकला—क. झ.। २. 'स्वैरा''''कोक्तरीत्या' नास्ति— क.। ३. तूर्यबीजा—ते., ज.।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५५ श्चतस्रः। तेषां ^१तुरीयातीतपदपरशिवविश्रान्तिलय^२लक्षणां सिद्धिं ददाति प्रापयतीति प्राप्तिसिद्धिः। महामुद्रामयी महामुद्रा सर्व^३मुद्रासमष्टिभूतत्वाद् योनिमुद्रा, तन्मयी पूज्येत्यर्थः ॥१६४-१६५॥ पञ्चदशात्मिका । ^४तत्तत्तिथिमयी नित्या नवमी भैरवी परा ॥१६६॥ प्रतिचक्रं ^५समुद्रास्तु चक्रसंकेतकोदिताः^६। पञ्चदशात्मिका पञ्चदशाक्षर्या विद्याया वाच्यभूता पञ्चदशभूतगुणात्मिका। तत्तत्तिथिमयी प्रतिपदादिपञ्चदशतिथि^७रूपा। नित्या निजसुखमयनित्यनिरुपमा- कारा। नवमी भैरवी परा। "मूलविद्या तथा ^८प्रोक्ता" (२।५) इति पूर्वोक्तरीत्या मूलविद्यारूपनवमचक्रेश्वरी विद्या^९ षोडशकलात्मिका मूलदेवी नवमचक्रेश्वरी ^१०पूज्येत्यर्थः। प्रतिचक्रं त्रैलोक्यमोहनादिष्वेकेकस्मिन् चक्रे। चक्रसंकेत^११कोदिताः कामराज, शक्ति और तुरीय बीजात्मक विद्याओं का भी वर्णन किया जा चुका है। आदि शब्द से कामेश्वरी आदि चार देवियों का ग्रहण किया जाता है। इन सबको परशिव- स्वरूप तुरीयातीत पद में विश्रान्ति देने वाली, उसमें लीन कर देने वाली सिद्धि को प्राप्त करा देने वाली यह देवी प्राप्तिसिद्धि स्वरूपिणी है। यही देवी महामुद्रामयी भी है। सभी मुद्राओं की समष्टिरूपिणी योनिमुद्रा को महामुद्रा कहा जाता है। योनिमुद्रामयी महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा यहीं करनी चाहिये ॥१६४-१६५॥ पंचदश भूतगुणात्मिका, प्रतिपदादि तिथिरूपिणी पन्द्रह देवियां तिथि- नित्या और नवीं पराभैरवी मूलविद्या कहलाती हैं। इन सबकी यहाँ पूजा करनी चाहिये। चक्रसंकेत में वर्णित मुद्राओं का पूजन तो प्रत्येक चक्र में अलग अलग होना चाहिये ॥१६५-१६६॥ पंचदशात्मिका का अर्थ पंचदशाक्षरी विद्या के वाच्यभूत पन्द्रह भूतगुण शब्द, स्पर्श आदि से सम्पन्न प्रतिपदादि तिथियों की अधिष्ठात्री पन्द्रह तिथिनित्यायँ है। इनको नित्या इसलिये कहते हैं कि ये सब निज सुखमय नित्य निरुपम आकार से सम्पन्न हैं। इन अवयव नित्याओं से सम्पन्न नवीं पराभैरवी अवयवी नित्या है। पहले (२।५) बताया जा चुका है—"इसी को मूलविद्या भी कहते हैं"। यह मूलविद्या ही नवम चक्रेश्वरी विद्या है और यही अवयव और अवयवी नित्याओं के भेद से सोलह कला वाली मूल देवी है। नवम चक्र की स्वामिनी के रूप में इसकी पूजा की जाती है। प्रतिचक्र का १. तुर्या—ख. ने. ज. झ. उ.। २. 'लय' नास्ति—क. ग.। ३. विद्या—क. ग.। ४. संपूज्या परमेशानि तत्तत्तिथिमयी परा—ख. ने. च. छ. ज. उ.। ५. तु मु—ख. च. छ. ज. झ.। ६. तचोदिताः—ख. च. छ. ज. झ.। ७. पद—ने. ज. झ. उ.। ८. ख्याता— क. ग.। ९. विद्यामुच्चार्य नवमचक्रेश्वरीविद्या या षोडश—ख. ने. ज. झ. उ.। १०. संपू- जयेन्ने—ने. उ.। ११. ते चोदिताः—ख. ज. उ.।

३५६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः १"योनिप्राचुर्यतः सैषा सर्वसंक्षोभिणी पुनः" (१।५९) इत्यादिना चक्रसंकेते चक्रे विहिताः सर्वमुद्राः सर्वसंक्षोभिण्याद्यास्तत्तच्चक्रमुद्रास्तत्तच्चक्रेषु पूज्या इति योज्यम् ।।१६५-१६६।। नित्यक्लिन्नादिकाश्चैव काम्यकर्मानुसारतः ।।१६६।। चतुरस्रान्तराले वा त्रिकोणे वा यजेत् सुधीः । कामेश्वरीभगमालिन्योरावरणान्तःपातित्वात् २तयोर्मध्यत्रिकोणाग्रवाम- कोणयोः स्थितिरुक्ता । शिष्टाः— नित्यक्लिन्ना३ तथा नित्या भेरुण्डा वह्निवासिनी ।। महाविद्येश्वरी दूती त्वरिता कुलसुन्दरी । नित्या नीलपताका च विजया सर्वमङ्गला ।। ज्वालामालिनी चित्रा च (१।२६-२८) इति चतुःशतीशास्त्रोक्तास्त्रयोदशनित्यास्त्रिकोणे वा, श्रीचक्रमध्यत्रिकोणे वा, चतु- रस्रान्तराले वा षोडशदलचतुरस्रान्तराले वा काम्यकर्मानुसारतः वश्यादिकाम्य- कर्मानुरूपवर्णध्यानपुष्पादिभिः । सुधीः तत्तत्काम्यकर्म४विधानविषयज्ञो ५यजेत् ।।१६६-१६७।। अभिप्राय यह है कि त्रैलोक्यमोहन आदि एक एक चक्र में चक्रसंकेत प्रकरण में उपदिष्ट सर्वसंक्षोभिणी आदि सभी नौ मुद्राओं को उस उस चक्र की मुद्रा के रूप में उन उन चक्रों में पूजा होनी चाहिये ।।१६५-१६६।। काम्य कर्म के अनुसार प्रयोग करने वाले विद्वान् को चाहिये कि वह चतुरस्र के अन्तराल में अथवा त्रिकोण में नित्यक्लिन्ना आदि तिथिनित्याओं की पूजा करे ।।१६६-१६७।। पन्द्रह तिथिनित्याओं में १कामेश्वरी और भगमालिनी के नाम भी पठित हैं। मध्यत्रिकोण के अग्र भाग और वाम कोण में इनको पूजाविधि बताई जा चुकी है। बाकी की नित्यक्लिन्ना, भेरुण्डा, वह्निवासिनी, महाविद्येश्वरी, दूती, त्वरिता, कुलसुन्दरी, नित्या, नीलपताका, विजया, सर्वमंगला, ज्वालामालिनी और चित्रा नामक चतुःशती शास्त्र (१।२६-२८) में प्रोक्त तेरह नित्याओं की पूजा त्रिकोण में, अर्थात् श्रीचक्र के मध्य में स्थित त्रिकोण में, अथवा चतुरस्रान्तराल में, अर्थात् षोडशदल और चतुरस्र के बीच में वशीकरण आदि काम्य कर्मों के अनुरूप वर्ण, ध्यान, पुष्प आदि से पूजा १. ‘योनि''''स्तत्तत्’ नास्ति-क. ग.। २. तन्मध्य-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. न्नाभिधा-मु. । ४. कर्मानुवि-ख. । ५. 'यजेत्' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । १. यहाँ अमृतानन्द तिथिनित्याओं से त्रिकोण स्थित कामेश्वरी एवं भगमालिनी का अभेद मान कर व्याख्या करते हैं, जब कि भास्करराय इनमें भेद मानते हैं। अमृतानन्द

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५७ चक्रपूजामुपसंहरन् कुलदीपनिवेदनमाह— अलिना पिशितैर्गन्धैर्धूपैराराध्य देवताः ॥१६७॥ चक्रपूजां विधायेत्थं कुलदीपं निवेदयेत् । अन्तर्बहिर्भासमानं स्वप्रकाशोज्ज्वलं प्रिये ॥१६८॥ अलिना हेतुना। १पिशितगन्धधूपशब्दाः स्पष्टार्थाः। देवताः त्रैलोक्यमोहनादि- बैन्दवान्तनवचक्रगताः, अलिपिशितगन्ध २धूपैराराध्य, इत्थ पूर्वोक्तरीत्या चक्रपूजां विधाय कुलदीपम्, कुलं षट्त्रिंशत्तत्त्वसमुदायरूपं शरीरम्, तत्र भवं ३ दीपम्, "ततो हृदयपद्मान्तः स्फुरन्तीं सांविदीं४ कलाम्" (सु० ३४) इत्यभियुक्त ५वचनोक्त- रीत्या हृदयान्तर्भासमानं संवित्कलारूपं दीपम्, इन्द्रियद्वारा बहिरर्थेषु तद्रूपेण ६भासमानम्, अत एव स्वप्रकाशोज्ज्वलं तत्र प्रमाणनिरपेक्षप्रतीतिकं निर्वाणरहितं करनी चाहिये। यहां सुधी पद का अर्थ है उन उन काम्य कर्मों के विधि-विधान को अच्छी तरह से जानने वाला ॥१६६-१६७॥ चक्रपूजा का उपसंहार करते हुए कुलदीप के निवेदन की विधि बताते हैं— अलि, पिशित, गन्ध, धूप आदि से सभी देवताओं की आराधना करने के बाद चक्रपूजा की समाप्ति पर कुलदीप प्रज्वलित करे । हे प्रिये ! यह कुलदीप अपने प्रकाश की उज्ज्वल आभा से हृदय के भीतर और बाहर भी आलोक फैलाने वाला है ॥१६७-१६८॥ अलि का अर्थ हेतु द्रव्य है। पिशित, गन्ध और धूप शब्दों का अर्थ स्पष्ट है। त्रैलोक्यमोहन से बैन्दव पर्यन्त सभी नौ चक्रों में निवास करने वाले देवताओं की अलि, पिशित, गन्ध, धूप आदि से ऊपर बताई पद्धति के अनुसार आराधना कर लेने के उपरान्त कुलदीप को प्रज्वलित करना चाहिये। कुल शब्द का अर्थ है छत्तीस तत्त्वों का समुदाय स्वरूप यह शरीर । इस शरीर में दीपक जलाना चाहिये। शिवानन्द मुनि के अनुसार "हृदय रूपी कमल में स्फुरित होने वाली सांविदी कला ही दीपक है"। संवित्कला के स्फुरण से हृदय के भीतर प्रज्वलित यह दीप इन्द्रियों के द्वारा बाह्य पदार्थों में अपना प्रकाश फैलाता है। अपने इस अद्भुत उज्ज्वल प्रकाश से यह दीपक हृदय के भीतर और बाहर भी बिना किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा रखे भासित होता रहता है और यह कभी १. पिशितैर्मांसैः-क. ग. ने. । २. धूपदीपै-क. ग. । ३. 'भवं' नास्ति-ख. ने.०ज. झ. ड. । ४. संविदं-ख. ने. ज. झ. ड. । ५. युक्तोक्त-ख. ने. ज. झ. ड. । ६. 'भासमानं' नास्ति-ख. ज. झ. ड. । की व्याख्या का खण्डन करते समय वे वज्रेश्वरी का उल्लेख करते हैं, किन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि तिथिनित्याओं में वज्रेश्वरी की गणना नहीं है।

३५८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः च १कुलदीपं निवेदयेत् । पुनः प्रत्यङ्मुखतया तेनैव द्वारेणान्तः संविद्विश्रान्ति- स्तन्निवेदनं नाम ॥१६७-१६८॥ पुष्पाञ्जलिं ततः कृत्वा जपं कुर्यात् समाहितः । संयम्येन्द्रियसंचारं प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् । एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्यजपो जपः ॥ इति २प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या समाहितः३ नियतेन्द्रियः, नादरूपमन्त्रो- च्चारणलक्षणं जपं कुर्यात् । शिष्टं स्पष्टम् ॥१६९॥ जपप्रकारमाह४— कूटत्रये महादेवि कुण्डलीत्रितयेऽपि च ॥१६९॥ चक्राणां पूर्वपूर्वेषां नादरूपेण योजनम् । कूटत्रये कूटानां वाग्भवकामराजशक्तिबीजाख्यानां त्रये । कुण्डलीत्रितयेऽपि च । कुण्डलीनां त्रितयं ५कुण्डलीत्रयम्, “आधारं ६हृदयं बिन्दुस्थानं च परिकी- र्तितम्” इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तेषु आधारहृदयभ्रूमध्येषु स्थितानां बीजत्रयशिखर- बुझता नहीं है । इस तरह के कुलदीप को देवियों को समर्पित करे । बाहर की तरफ दौड़ रही इन्द्रिय-वृत्तियों को अन्तर्मुख बना कर, उसी इन्द्रिय-मार्ग से उनको भीतर ले जा कर अपने संवित्स्वभाव में उनको विलीन कर देना हो, उनको विश्राम दिला देना ही यहाँ निवेदन शब्द का अर्थ है ॥१६७-१६८॥ तब पुष्पांजलि प्रदान कर समाहित चित्त से जप करे ॥ किसी प्रामाणिक१ व्यक्ति ने जप के विषय में कहा है— इन्द्रियों के बाहरी संचार को रोक कर आन्तर नाद का उच्चारण करे । वास्तविक जप इसी को कहा जाता है । बाह्य जप वस्तुतः जप नहीं है ॥ साधक को चाहिये कि वह अपनी इन्द्रियों को वश में करके नादरूप मन्त्र का उच्चारण करते हुए जप करे । बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१६९॥ अब इस जप की विधि बताते हैं— हे महादेवि ! तीन कूटों में और तीन कुण्डलियों में एक एक चक्र का नाद के रूप में संयोजन हो जप कहलाता है ॥१६९-१७०॥ कूटत्रय का अर्थ है वाग्भव, कामराज और शक्ति नामक तीन बीज और कुण्डली- त्रय का अर्थ स्वच्छन्दसंग्रह के प्रमाण पर आधार, हृदय और बिन्दुस्थान है । इसका १. ‘कुलदीपं’ नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. प्रमाण-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. हिते- न्द्रियः-ख. ने. ज. उ. । ४. मेवाह-ख. झ. उ. । ५. ‘कुण्डलीत्रयम्’ नास्ति-क. ग. । ६. चैव हृद्बिन्दु-ख. ने. ज. झ. । I. पृ० २२७ की दूसरी टिप्पणी देखिये ।