भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

बालकाण्ड - सर्ग २: भारपीडिता पृथिवीका ब्रह्मादि देवताओंके पास जाना...

अध्यात्मरामायण [ सर्ग १


तथैव देहेन्द्रियकर्तुरात्मनः
कृतं परेऽध्यस्य जनो विमुह्यति ॥२२॥
किये हुए कर्मोंका आत्मामें आरोप करके मोहित हो जाते हैं ॥२२॥


नाहो न रात्रिः सवितुर्यथा भवेत्
प्रकाशरूपान्यभिचारतः क्वचित् ।
ज्ञानं तथाऽज्ञानमिदं द्वयं हरौ
रामे कथं स्थास्यति शुद्धचिद्धने ॥२३॥
प्रकाश-रूपताका कभी व्यभिचार न होनेसे जिस प्रकार सूर्यमें रात-दिनका भेद नहीं होता—वह सर्वदा एक समान प्रकाशमान रहता है—उसी प्रकार शुद्धचेतनघन भगवान् राममें ज्ञान और अज्ञान दोनों कैसे रह सकते हैं ? ॥२३॥


तस्मात्परानन्दमये रघूत्तमे
विज्ञानरूपे हि न विद्यते तमः ।
अज्ञानसाक्षिण्यरविन्दलोचने
मायाश्रयत्वान्न हि मोहकारणम् ॥२४॥
अतएव परानन्दस्वरूप विज्ञानघन अज्ञान-साक्षी कमलनयन भगवान् राममें अज्ञानका लेश भी नहीं है क्योंकि वे मायाके अधिष्ठान हैं इसलिये वह उन्हें मोहित नहीं कर सकती ॥२४॥


अत्र ते कथयिष्यामि रहस्यमपि दुर्लभम् ।
सीताराममरुत्सूनुसंवादं मोक्षसाधनम् ॥२५॥
हे पार्वति ! इस विषयमें मैं तुम्हें सीता, राम और हनुमान्‌जीका मोक्षका साधन-रूप संवाद सुनाता हूँ जो अत्यन्त गोपनीय और परम दुर्लभ है ॥२५॥


पुरा रामायणे रामो रावणं देवकण्टकम् ।
हत्वा रणे रणश्लाघी सपुत्रबलवाहनम् ॥२६॥
सीतया सह सुग्रीवलक्ष्मणाभ्यां समन्वितः ।
अयोध्यामगमद्रामो हनूमत्प्रमुखैर्वृतः ॥२७॥
पूर्वकालमें रामावतारके समय जब युद्धप्रिय श्रीरामचन्द्रजी देवताओंके कण्टकरूप रावणको संतान, सेना और वाहनोंके सहित युद्धमें मारकर सीता, सुग्रीव और लक्ष्मणके सहित हनुमान् आदि वानरोंसे घिरे हुए अयोध्यापुरीमें आये ॥ २६-२७ ॥


अभिषिक्तः परिवृतो वसिष्ठाद्यैर्महात्मभिः ।
सिंहासने समासीनः कोटिसूर्यसमप्रभः ॥२८॥
दृष्ट्वा तदा हनूमन्तं प्राञ्जलिं पुरतः स्थितम् ।
कृतकार्यं निराकाङ्क्षं ज्ञानापेक्षं महामतिम् ॥२९॥
रामः सीतामुवाचेदं ब्रूहि तत्त्वं हनूमते ।
निष्कल्मषोऽयं ज्ञानस्य पात्रं नौ नित्यभक्तिमान् ॥३०
और वहाँ आकर राज्याभिषेक होनेपर वसिष्ठ आदि महात्माओंसे घिर कर करोड़ों सूर्योंकी प्रभा धारणकर जब सिंहासनपर विराजमान हुए ॥२८॥ उस समय कृतकृत्य और भोगेच्छारहित महामति हनुमान्‌जीको ज्ञानाभिलाषासे अपने सम्मुख हाथ जोड़े खड़े देखकर श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीसे ऐसा कहा—"सीते ! यह हनुमान् हम दोनोंमें अत्यन्त भक्ति रखता है, इसलिये यह निष्पाप है और ज्ञानका सुयोग्य पात्र है। अतः तुम इसे मेरे तत्त्वका उपदेश करो" ॥ २९-३० ॥


तथेति जानकी प्राह तत्त्वं रामस्य निश्चितम् ।
हनूमते प्रपन्नाय सीता लोकविमोहिनी ॥३१॥
तब लोक-विमोहिनी जनकनन्दिनी सीताजी श्रीरामचन्द्रजीसे 'बहुत अच्छा' कह शरणागत हनुमान्‌को भगवान् रामका निश्चित तत्त्व बताने लगीं।३ १


रामं विद्धि परं ब्रह्म सच्चिदानन्दमद्वयम् ।
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सत्तामात्रमगोचरम् ॥३२॥
आनन्दं निर्मलं शान्तं निर्विकारं निरञ्जनम् ।
सर्वव्यापिनमात्मानं स्वप्रकाशमकल्मषम् ॥३३॥
सीताजीने कहा—"वत्स हनुमान् ! तुम रामको साक्षात् अद्वितीय सच्चिदानन्दघन परब्रह्म समझो; ये निःसन्देह समस्त उपाधियोंसे रहित, सत्तामात्र, इन्द्रियोंके अविषय, आनन्दघन, निर्मल, शान्त, निर्विकार, निरञ्जन, सर्व-व्यापक, स्वयंप्रकाश और पापहीन परमात्मा ही हैं ॥३२-३३॥


मां विद्धि मूलप्रकृतिं सर्गस्थित्यन्तकारिणीम् ।
तस्य सन्निधिमात्रेण सृजामीदमतान्द्रता ॥३४॥
और मुझे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और अन्त करनेवाली मूल-प्रकृति जानो। मैं ही निरालस्य होकर इनकी सन्निधिमात्रसे इस विश्वकी रचना किया

सर्ग १ ] बालकाण्डे


तत्सान्निध्यान्मया सृष्टं तस्मिन्नारोप्यतेऽबुधैः।<br>अयोध्यानगरे जन्म रघुवंशेऽतिनिर्मले ॥३५॥<br>विश्वामित्रसहायत्वं मखसंरक्षणं ततः।<br>अहल्याशापशमनं चापभङ्गो महेशितुः ॥३६॥<br>मत्पाणिग्रहणं पश्चाद्भार्गवस्य मदक्षयः।<br>अयोध्यानगरे वासो मया द्वादशवार्षिकः॥३७॥<br>दण्डकारण्यगमनं विराधवध एव च।<br>मायामारीचमरणं मायासीताहृतिस्तथा ॥३८॥<br>जटायुषो मोक्षलाभः कबन्धस्य तथैव च।<br>शबर्याः पूजनं पश्चात्सुग्रीवेण समागमः ॥३९॥<br>वालिनश्च वधः पश्चात्सीतान्वेषणमेव च।<br>सेतुबन्धश्च जलधौ लंकायाश्च निरोधनम् ॥४०॥<br>रावणस्य वधो युद्धे सपुत्रस्य दुरात्मनः।<br>विभीषणे राज्यदानं पुष्पकेण मया सह ॥४१॥<br>अयोध्यागमनं पश्चाद्राज्ये रामाभिषेचनम्।<br>एवमादीनि कर्माणि मयैवाचरितान्यपि।<br>आरोपयन्ति रामेऽस्मिन्निर्विकारेऽखिलात्मनि ४२<br>रामो न गच्छति न तिष्ठति नानुशोच-<br>त्याकाङ्क्षते त्यजति नो न करोति किञ्चित्।<br>आनन्दमूर्तिरचलः परिणामहीनो<br>मायागुणाननुगतो हि तथा विभाति ॥४३॥<br><br>ततो रामः स्वयं प्राह हनूमन्तमुपस्थितम्।<br>शृणु तत्त्वं प्रवक्ष्यामि ह्यात्मानात्मपरात्मनाम् ४४<br>आकाशस्य यथा भेदस्त्रिविधो दृश्यते महान्।<br>जलाशये महाकाशस्तदवच्छिन्न एव हि।<br>प्रतिबिम्बाख्यमपरं दृश्यते त्रिविधं नभः ॥४५॥करती हूँ ॥३४॥ तो भी इनकी सन्निधिमात्रसे की हुई मेरी रचनाको बुद्धिहीन लोग इनमें आरोपित कर लेते हैं। अतएव, अयोध्‍यापुरीमें अत्यन्त पवित्र रघुकुलमें इनका जन्म लेना ॥ ३५ ॥ फिर विश्वामित्रजीकी सहायता करना, उनके यज्ञकी रक्षा करना, अहल्याको शाप-मुक्त करना, श्रीमहादेवजीके धनुषको तोड़ना ॥ ३६ ॥ तत्पश्चात् मेरा पाणिग्रहण करना, परशुरामजीका गर्व-खण्डन करना तथा बारह वर्षतक मेरे साथ अयोध्‍यापुरीमें रहना ॥ ३७॥ फिर दण्डकारण्यमें जाना, विराधका वध करना, माया-मृगरूप मारीचका मारा जाना, मायामयी सीताका हरा जाना ॥ ३८ ॥ तदनन्तर जटायु और कबन्धका मुक्त होना, शबरीद्वारा भगवान्‌का पूजित होना और सुग्रीवसे मित्रता होना ॥ ३९ ॥ फिर बालिका वध करना, सीताजीकी खोज कराना, समुद्रका पुल बँधवाना और लङ्कापुरीको घेर लेना ॥ ४० ॥ तथा पुत्रोंके सहित दुरात्मा रावणको युद्धमें मारना एवं विभीषणको लङ्काका राज्य देकर पुष्पक-विमानद्वारा मेरे साथ अयोध्या लौट आना, फिर श्रीरामजीका राज्यपदपर अभिषिक्त होना—इत्यादि समस्त कर्म यद्यपि मेरे ही किये हुए हैं तो भी अज्ञानी लोग उन्हें इन निर्विकार सर्वात्मा भगवान् राममें आरोपित करते हैं ॥ ४१-४२ ॥ ये राम तो (वास्तवमें) न चलते हैं, न ठहरते हैं, न शोक करते हैं, न इच्छा करते हैं, न त्यागते हैं और न कोई अन्य क्रिया ही करते हैं। ये आनन्दस्वरूप, अविचल और परिणामहीन हैं, केवल मायाके गुणोंसे व्याप्त होनेके कारण ही ये वैसे प्रतीत होते हैं॥ ४३ ॥<br><br>तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने सम्मुख खड़े हुए पवनपुत्र हनुमान्‌से स्वयं कहा—"मैं तुम्हें आत्मा, अनात्मा और परमात्माका तत्त्व बताता हूँ, (सावधान होकर) सुनो ॥ ४४ ॥ जलाशयमें आकाशके तीन भेद स्पष्ट दिखायी देते हैं—एक महाकाश¹, दूसरा जला‌वच्छिन्न आकाश² और तीसरा प्रतिबिम्बाकाश³। जैसे आकाशके ये तीन बड़े-बड़े भेद दिखायी देते हैं ॥४५॥ उसी प्रकार चेतन भी तीन प्रकारका

¹ १, जो सर्वत्र व्याप्त है। ² २, जो केवल जलाशयमें ही परिमित है। ³ ३, जो जलमें प्रतिबिम्बित है।

अध्यात्मरामायणं[ सर्ग १

बुद्धयवच्छिन्नचैतन्यमेकं पूर्णमथापरम्।
आभासस्त्वपरं विम्बभूतमेवं त्रिधा चितिः॥४६॥

साभासबुद्धेः कर्तृत्वमविच्छिन्नेऽविकारिणि।
साक्षिण्यारोप्यते भ्रान्त्या जीवत्वं च तथाऽबुधैः॥४७

आभासस्तु मृषा बुद्धिरविद्याकार्यमुच्यते।
अविच्छिन्नं तु तद्ब्रह्म विच्छेदस्तु विकल्पतः ४८

अविच्छिन्नस्य पूर्णेन एकत्वं प्रतिपाद्यते।
तत्त्वमस्यादिवाक्यैश्च साभासस्याहमस्तथा॥४९॥

ऐक्यज्ञानं यदोत्पन्नं महावाक्येन चात्मनोः।
तदाऽविद्या स्वकार्यैश्च नश्यत्येव न संशयः॥५०॥

एतद्विज्ञाय मद्भक्तो मद्भावायोपपद्यते।
मद्भक्तिविमुखानां हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम्।
न ज्ञानं न च मोक्षः स्यात्तेषां जन्मशतैरपि॥५१॥

इदं रहस्यं हृदयं ममात्मनो
मयैव साक्षात्कथितं तवानघ।
मद्भक्तिहीनाय शठाय न त्वया
दातव्यमैन्द्रादपि राज्यतोऽधिकम्॥५२॥

श्रीमहादेव उवाच
एतत्तेऽभिहितं देवि श्रीरामहृदयं मया।
अतिगुह्यतमं हृद्यं पवित्रं पापशोधनम्॥५३॥
साक्षाद्रामेण कथितं सर्ववेदान्तसंग्रहम्।
यः पठेत्सततं भक्त्या स मुक्तो नात्र संशयः॥५४॥
ब्रह्महत्यादिपापानि बहुजन्मार्जितान्यपि।
नश्यन्त्येव न सन्देहो रामस्य वचनं यथा॥५५॥


है—एक तो बुद्धयवच्छिन्न चेतन (जो बुद्धिमें व्याप्त है), दूसरा जो सर्वत्र परिपूर्ण है और तीसरा जो बुद्धिमें प्रतिबिम्बित होता है—जिसको आभासचेतन कहते हैं॥४६॥ इनमेंसे केवल आभास-चेतनके सहित बुद्धिमें ही कर्तृत्व है अर्थात् चिदाभासके सहित बुद्धि ही सब कार्य करती है। किन्तु अज्ञजन भ्रान्तिवश निरवच्छिन्न, निर्विकार, साक्षी आत्मामें कर्तृत्व और जीवत्वका आरोप करते हैं अर्थात् उसे ही कर्त्ता-भोक्ता मान लेते हैं॥४७॥ (हमने जिसे जीव कहा है, उसमें) आभास-चेतन तो मिथ्या है (क्योंकि सभी आभास मिथ्या ही हुआ करते हैं)। बुद्धि अविद्याका कार्य है और परब्रह्म परमात्मा वास्तवमें विच्छेदरहित है अतः उसका विच्छेद भी विकल्पसे ही माना हुआ है॥४८॥ (इसी प्रकार उपाधियोंका बाध करते हुए) साभास अहंकरूप अवच्छिन्न चेतन (जीव) की 'तत्त्वमसि' (त. वह है) आदि महावाक्योंद्वारा पूर्ण चेतन (ब्रह्म) के साथ एकता बतलायी जाती है॥४९॥ जब महावाक्यद्वारा (इस-प्रकार) जीवात्मा और परमात्माकी एकताका ज्ञान उत्पन्न हो जाता है उस समय अपने कार्योंसहित अविद्या नष्ट हो ही जाती है—इसमें कोई सन्देह नहीं॥५०॥ मेरा भक्त इस उपर्युक्त तत्त्वको समझ-कर मेरे स्वरूपको प्राप्त होनेका पात्र हो जाता है; पर जो लोग मेरी भक्तिको छोड़कर शास्त्ररूप गढ़ेमें पड़े भटकते रहते हैं उन्हें सौ जन्मतक भी न तो ज्ञान होता है और न मोक्ष ही प्राप्त होता है॥५१॥ हे अनघ! यह परम रहस्य मुझ आत्मस्वरूप रामका हृदय है; और साक्षात् मैंने ही तुम्हें सुनाया है। यदि तुम्हें इन्द्रलोकके राज्यसे भी अधिक सम्पत्ति मिले तो भी तुम इसे मेरी भक्तिसे हीन किसी दुष्ट पुरुषको मत सुनाना"॥५२॥

श्रीमहादेवजी बोले—हे देवि! मैंने तुम्हें यह अत्यन्त गोपनीय, हृदयहारी, परम पवित्र और पापनाशक 'श्रीरामहृदय' सुनाया है॥५३॥ यह समस्त वेदान्तका सार-संग्रह साक्षात् श्रीरामचन्द्रजीका कहा हुआ है। जो कोई इसे भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह निस्सन्देह मुक्त हो जाता है॥५४॥ इसके पठन-मात्रसे अनेक जन्मोंके सञ्चित ब्रह्महत्यादि समस्त पाप निस्सन्देह नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि श्रीरामके वचन

सर्ग २ ] बालकाण्ड


योऽतिभ्रष्टोऽतिपापी परधनपरदा-<br>    रेषु नित्योद्यतो वा<br>स्तेयी ब्रह्मघ्नमातापितृवधनिरतो<br>    योगिवृन्दोपकारी।<br>यः संपूज्याभिरामं पठति च हृदयं<br>    रामचन्द्रस्य भक्त्या<br>योगीन्द्रैरप्यलभ्यं पदमिह लभते<br>  सर्वदेवैः स पूज्यम् ॥ ५६॥ऐसे ही हैं ॥ ५५ ॥ जो कोई अत्यन्त भ्रष्ट, अतिशय पापी, परधन और परस्त्रियोंमें सदा प्रवृत्त रहनेवाला, चोर, ब्रह्म-हत्यारा, माता-पिताका वध करनेमें लगा हुआ और योगिजनोंका अहित करनेवाला मनुष्य भी श्रीरामचन्द्रजीका पूजनकर इस रामहृदयका भक्तिपूर्वक पाठ करता है वह समस्त देवताओंके पूज्य उस परमपदको प्राप्त होता है जो योगिराजोंको भी परम दुर्लभ है ॥५६॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे<br>श्रीरामहृदयं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीय सर्ग

भारपीडिता पृथिवीका ब्रह्मादि देवताओंके पास जाना और भगवान्‌का उनकी प्रार्थनासे प्रकट होकर उन्हें धैर्य बँधाना।

पार्वत्युवाच<br>धन्यास्म्यनुगृहीतास्मि कृतार्थास्मि जगत्प्रभो।<br>विच्छिन्नो मेऽतिसन्देहग्रन्थिर्भवदनुग्रहात् ॥ १ ॥<br>त्वन्मुखाद्गलितं रामतत्त्वामृतरसायनम्।<br>पिबन्त्या मे मनो देव न तृप्यति भवापहम् ॥ २ ॥<br>श्रीरामस्य कथा त्वत्तः श्रुता संक्षेपतो मया।<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण स्फुटाक्षरम् ॥ ३ ॥<br><br>श्रीमहादेव उवाच<br>शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत्।<br>अध्यात्मरामचरितं रामेणोक्तं पुरा मम ॥ ४ ॥<br>तदद्य कथयिष्यामि शृणु तापत्रयापहम्।<br>यच्छ्रुत्वा मुच्यते जन्तुरज्ञानोत्थमहाभयात्।<br>प्राप्नोति परमासृद्धिं दीर्घायुः पुत्रसन्ततिम् ॥ ५ ॥<br>भूमिर्भारेण मग्ना दशवदनमुखा-<br>    शेषरक्षोगणानां<br>धृत्वा गोरूपमादौ दिविजमुनिजनैः<br>    साकमब्जासनस्य।पार्वतीजी बोलीं— हे जगत्प्रभो ! आपकी कृपासे अनुगृहीत होकर मैं धन्य और कृतकृत्य हो गयी तथा मेरी कठिन सन्देहग्रन्थि टूट गयी ॥ १ ॥ हे देव ! आपके मुखसे चूते हुए भवभयहारी रामतत्त्वरूप अमृतमय रसायनका पान करते-करते मेरा मन तृप्त नहीं होता ॥ २ ॥ मैंने आपके मुखसे श्रीरामचन्द्रजीकी कथा संक्षेपसे सुनी। अब मैं उसे स्पष्ट शब्दोंमें विस्तारपूर्वक सुनना चाहती हूँ ॥ ३ ॥<br><br>श्रीमहादेवजी बोले— हे देवि ! सुनो, मैं तुम्हें गुह्यसे भी गुह्य महान् अध्यात्मरामायण सुनाता हूँ जो पहले मुझे श्रीरामचन्द्रजीने ही सुनायी थी ॥ ४ ॥ अब मैं तुम्हें वह तापत्रयहारिणी अध्यात्मरामायण सुनाता हूँ, सावधान होकर सुनो। इसके सुननेसे जीव अज्ञानजन्य महाभयसे छूट जाता है और परम ऐश्वर्य, दीर्घ आयु तथा पुत्र-पौत्रादि प्राप्त करता है ॥ ५ ॥<br>एक बार रावण आदि राक्षसोंके भारसे व्यथित हो पृथिवी गौका रूप धारणकर देवता और मुनिजनोंके सहित श्रीब्रह्माजीके लोकको गयी। वहाँ पहुँचकर उसने रोते हुए, अपनेपर पड़ा हुआ सारा दुःख

· १० अध्यात्मरामायण [ सर्ग २


· गत्वा लोकं रुदन्ती व्यसनमुपगतं<br>    ब्रह्मणे प्राह सर्वं<br>ब्रह्मा ध्यात्वा मुहूर्तं सकलमपि हृदा-<br>    ऽवेदशेषामकत्वात् ॥ ६ ॥ब्रह्माजीसे कहा। तब ब्रह्माजीने एक मुहूर्ततक ध्यानस्थ हो अपने मनमें उसकी दुःख-निवृत्तिका सम्पूर्ण उपाय जान लिया क्योंकि वे सर्वान्तर्यामी हैं॥ ६ ॥ तत्पश्चात्
तस्मात्क्षीरसमुद्रतीरमगमद्<br>    ब्रह्माथ देवैर्वृतो<br>देव्या चाखिललोकहृत्स्थमजरं<br>    सर्वज्ञमीशं हरिम् ।<br>अस्तौषीच्छ्रुतिसिद्धनिर्मलपदैः<br>    स्तोत्रैः पुराणोद्भवै-<br>र्भक्त्या गद्गदया गिरातिविमलै-<br>    रानन्दवाष्पैर्वृतः ॥ ७ ॥वहाँसे समस्त देवताओंके सहित श्रीब्रह्माजी पृथिवीको साथ लेकर क्षीरसागरके तटपर गये और वहाँ उन्होंने अत्यन्त निर्मल आनन्दाश्रुओंसे परिप्लुत हो अखिल-लोकान्तर्यामी, अजर, सर्वज्ञ, भगवान् हरिकी अति निर्मल भक्तियुक्त गद्गद-वाणीसे श्रुतिसिद्ध विमल पदों और पुराणोक्त स्तोत्रोंद्वारा स्तुति की ॥ ७ ॥ तब सहस्रों
ततः स्फुरत्सहस्रांशुसहस्रसदृशप्रभः ।<br>आविरासीद्धरिः प्राच्यां दिशं व्यपनयंस्तमः ॥८॥देदीप्यमान सूर्योंके समान प्रभावान् भगवान् हरि (अपने तेजसे) सब दिशाओंके अन्धकारको दूर करते हुए पूर्व-दिशामें प्रकट हुए ॥ ८ ॥ पुण्य-
कथंचिद्ददृशूवान्ब्रह्मा दुर्दर्शमकृतात्मनाम् ।<br>इन्द्रनीलप्रतीकाशं सितास्यं पद्मलोचनम् ॥ ९ ॥हीन पुरुषोंके लिये अत्यन्त दुर्दर्शनीय भगवान् हरिको (उनके अमित तेजके कारण) ब्रह्माजीने भी बड़ी कठिनतासे देख पाया। इन्द्रनीलमणिके समान उनका तेजोमय श्याम वर्ण था, मुखपर मधुर मुसकान थी और कमलके समान विशाल और मनोहर नेत्र थे ॥ ९ ॥
किरीटहारकेयूरकुण्डलैः कटकादिभिः ।<br>विभ्राजमानं श्रीवत्सकौस्तुभप्रभयान्वितम् ॥१०॥वे किरीट, हार, केयूर, कुण्डल और कटक आदि आभूषणोंसे सुशोभित तथा श्रीवत्स और कौस्तुभमणिकी प्रभासे युक्त थे॥ १० ॥
स्तुवद्भिः सनकाद्यैश्च पार्षदैः परिवेष्टितम् । ·<br>शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविरोजितम् ॥११॥उन्हें स्तुति करते हुए सनकादि पार्षद चारों ओरसे घेरे हुए थे और उनकी शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमालासे अपूर्व शोभा हो रही थी ॥ ११ ॥
स्वर्णयज्ञोपवीतेन स्वर्णवर्णाम्बरेण च ।<br>श्रिया भूम्या च सहितं गरुडोपरि संस्थितम् ॥१२॥वे सुनहरे यज्ञोपवीत और पीताम्बरसे सुशोभित एवं लक्ष्मी और भूमिके सहित गरुडपर विराजमान थे।
हर्षगद्गदया वाचा स्तोतुं समुपचक्रमे ॥१३॥(उनकी ऐसी दिव्य छविको देखकर) पितामह ब्रह्माजी हर्षसे गद्गदकण्ठ हो स्तुति करने लगे ॥ १२-१३ ॥
ब्रह्मोवाच<br>नतोऽस्मि ते पदं देव प्राणबुद्धीन्द्रियात्मभिः ।<br>यच्चिन्त्यते कर्मपाशाद्दृष्टदि नित्यं मुमुक्षुभिः॥१४॥**ब्रह्माजी बोले—**हे देव ! कर्म-पाशसे मुक्त होनेके लिये मुमुक्षुजन अपने प्राण, बुद्धि, इन्द्रिय और मनसे जिनका नित्य चिन्तन करते हैं आपके उन चरणारविन्दों-को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १४ ॥
मायया गुणमय्या त्वं सृजस्यवसि लुम्पसि ।<br>जगत्वेन न ते लेप आनन्दानुभवात्मनः ॥१५॥आप अपनी त्रिगुणमयी मायाका आश्रय करके ही इस जगत्‌की उत्पत्ति, पालन और लय करते हैं; किन्तु ज्ञानानन्दस्वरूप आप इससे लिप्त नहीं होते ॥ १५ ॥
तथा शुद्धिर्न दुष्टानां दानाध्ययनकर्मभिः ।<br>शुद्धात्मता ते यशसि सदा भक्तिमतां यथा ॥१६॥हे भगवन् ! आपके विमल यशमें सदा प्रेम रखनेवाले भक्तोंका अन्तःकरण जैसा शुद्ध होता है वैसी शुद्धि मलिन अन्तःकरणवाले पुरुष दान और अध्ययन आदि शुभ कर्मोंसे नहीं प्राप्त कर सकते ॥ १६ ॥ अतः भक्त मुनि-

सर्ग २] बालकाण्ड ११


अतस्तवाङ्घ्रिर्मे दृष्टश्चित्तदोषापनुत्तये ।<br>सद्योऽन्तर्हृदये नित्यं मुनिभिः सात्वतैर्वृतः ॥ १७॥जन जिनका निरन्तर अपने हृदयमें ध्यान करते हैं ऐसे आपके चरण-कमलोंका आज मैंने अपने अन्तःकरणके दोषोंका तत्क्षण नाश करनेके लिये दर्शन किया है ॥ १७ ॥
ब्रह्माद्यैः स्वार्थसिद्धयर्थमस्माभिः पूर्वसेवितः ।<br>अपरोक्षानुभूत्यर्थं ज्ञानिभिर्हृदि भावितः ॥ १८॥आपके इन चरण-कमलोंका पहले भी हम ब्रह्मा आदि देवगणने अपनी स्वार्थ-सिद्धिके लिये सेवन किया है और ज्ञानी मुनिजनोंने अपरोक्षानुभवके लिये अपने हृदयमें निरन्तर ध्यान किया है ॥ १८ ॥
तवाङ्घ्रिपूजानिर्माल्यतुलसीमालया विभो ।<br>स्पर्धते वक्षसि पदं लब्ध्वापि श्रीः सपत्निवत् ॥ १९॥हे विभो ! लक्ष्मीजी आपके वक्षःस्थलमें स्थान पाकर भी आपकी चरणपूजाके समय चढ़ी हुई तुलसीकी मालासे सौतकी तरह डाह करती हैं ॥ १९ ॥
अतस्त्वत्पादभक्तेषु तव भक्तिः श्रियोऽधिका ।<br>भक्तिमेवाभिवाञ्छन्ति त्वद्भक्ताः सारवेदिनः ॥ २०॥आपके चरण-कमलोंमें प्रेम रखनेवाले भक्तोंमें आपका प्रेम लक्ष्मीजीसे भी बढ़कर है । इसलिये आपके सारग्राही भक्तजन केवल आपकी भक्तिकी ही इच्छा करते हैं ॥ २० ॥
अतस्त्वत्पादकमले भक्तिरेव सदाऽस्तु मे ।<br>संसारामयतप्तानां भेषजं भक्तिरेव ते ॥ २१॥अतएव हे देव ! आपके चरण-कमलोंमें मेरी सर्वदा भक्ति रहे क्योंकि संसार-रोगके रोगियोंके लिये आपकी भक्ति ही एकमात्र औषध है ॥ २१ ॥
इति ब्रुवन्तं ब्रह्माणं बभाषे भगवान् हरिः ।<br>किं करोमीति तं वेधाः प्रत्युवाचातिहर्षितः ॥ २२॥इस प्रकार स्तुति करते हुए ब्रह्मासे भगवान् हरिने कहा, “मैं तुम्हारा क्या कार्य करूँ?” तब ब्रह्माने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे कहा ॥ २२ ॥
भगवन् रावणो नाम पौलस्त्यतनयो महान् ।<br>राक्षसानामधिपतिर्मद्दत्तवरदर्पितः ॥ २३॥“भगवन् ! पुलस्त्य-नन्दन विश्रवाका पुत्र रावण राक्षसोंका राजा है। वह मेरे वरके प्रभावसे अत्यन्त अभिमानी हो गया है ॥ २३ ॥
त्रिलोकीं लोकपालांश्च बाधते विश्वबाधकः ।<br>मानुषेण मृतिस्तस्य मया कल्याण कल्पिता ॥<br>अतस्त्वं मानुषो भूत्वा जहि देवरिपुं प्रभो ॥ २४॥वह सम्पूर्ण विश्वका बाधक तीनों लोकों और लोक-पालोंको पीड़ा पहुँचाता है। हे कल्याणरूप ! मैंने उसकी मृत्यु मनुष्यके हाथ रखी है। इसलिये हे प्रभो ! आप मनुष्य-रूप धारणकर उस देवशत्रुका वध कीजिये” ॥ २४ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>कश्यपस्य वरो दत्तस्तपसा तोषितेन मे ॥ २५॥<br>याचितः पुत्रभावाय तथेत्यङ्गीकृतं मया ।<br>स इदानीं दशरथो भूत्वा तिष्ठति भूतले ॥ २६॥**श्रीभगवान् बोले—**मैंने कश्यपकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर उन्हें वर दिया था। उन्होंने मुझसे पुत्ररूपसे उत्पन्न होनेकी प्रार्थना की थी, तब मैंने ‘बहुत अच्छा’ कह उसे स्वीकार कर लिया था। इस समय वे पृथिवीपर राजा दशरथ होकर विद्यमान हैं ॥ २५-२६ ॥
तस्याहं पुत्रतामेत्य कौसल्यायां शुभे दिने ।<br>चतुर्धात्मानमेवाहं सृजामीतरयोः पृथक् ॥ २७॥उन्हींके यहाँ पुत्ररूपसे पृथक्-पृथक् चार अंशोंमें प्रकट होकर मैं शुभ दिनमें कौशल्याके और अन्य दो माताओंके गर्भसे जन्म लूँगा ॥ २७ ॥
योगमायापि सीतेति जनकस्य गृहे तदा ।<br>उत्पत्स्यते तया सार्धं सर्वं सम्पादयाम्यहम् ॥<br>इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे विष्णुर्ब्रह्मा देवानथाब्रवीत् ॥ २८॥उसी समय मेरी योगमाया भी जनकजीके घरमें सीतारूपसे उत्पन्न होगी; उसको साथ लेकर मैं तुम्हारा सम्पूर्ण कार्य सिद्ध करूँगा। ऐसा कह भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये; तब ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा ॥ २८ ॥

बालकाण्ड - सर्ग ३: भगवान्‌का जन्म और बाल-लीला

१२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ३

ब्रह्मोवाच

संस्कृतहिन्दी
विष्णुर्मानुषरूपेण भविष्यति रघोः कुले ॥२९॥<br>यूयं सृजध्वं सर्वेऽपि वानरेष्वंशसम्भवान् ।<br>विष्णोः सहायं कुरुतं यावत्स्थास्यति भूतले ॥३०॥ब्रह्माजी बोले—भगवान् विष्णु रघुकुलमें मनुष्य-रूपसे अवतार लेंगे। तुम लोग भी सब अपने-अपने अंशसे वानर-वंशमें पुत्र उत्पन्न करो तथा जबतक श्रीविष्णु भगवान् भूलोकमें रहें तबतक उनकी सहायता करते रहो ॥ २९-३० ॥
इति देवान्समादिश्य समाश्वास्य च मेदिनीम्।<br>ययौ ब्रह्मा स्वभवनं विज्वरः सुखमास्थितः ॥३१॥इस प्रकार देवताओंको आज्ञा दे और पृथिवीको ढाढ़स बँधा ब्रह्माजी अपने लोकको चले गये और वहाँ निश्चिन्त होकर सुखपूर्वक रहने लगे ॥ ३१ ॥
देवाश्च सर्वे हरिरूपधारिणः<br>स्थिताः सहायार्थमितस्ततो हरेः ।<br>महाबलाः पर्वतवृक्षयोधिनः<br>प्रतीक्षमाणा भगवन्तमिश्वरम् ॥३२॥इधर समस्त देवगण पर्वत और वृक्षोंसे लड़नेवाले महाबलवान् वानरोंका रूप धारण कर भगवान्‌की सहायताके लिये उनकी प्रतीक्षा करते हुए जहाँ-तहाँ रहने लगे ॥ ३२ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
बालकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीय सर्ग

भगवान्‌का जन्म और बाललीला

श्रीमहादेव उवाच

संस्कृतहिन्दी
अथ राजा दशरथः श्रीमान्सत्यपरायणः ।<br>अयोध्यापतिर्वीरः सर्वलोकेषु विश्रुतः ॥ १॥<br>सोऽनपत्यत्वदुःखेन पीडितो गुरुमेकदा ।<br>वसिष्ठं स्वकुलाचार्यमभिवाद्येदमब्रवीत् ॥ २॥श्रीमहादेवजी बोले—एक बार सबलोकप्रसिद्ध सत्यपरायण श्रीमान् अयोध्यापति वीरवर महाराज दशरथने पुत्रके न होनेसे अत्यन्त दुःखित हो अपने कुलके आचार्य गुरुवर वशिष्ठजीको बुला उन्हें प्रणाम कर इस प्रकार कहा ॥ १-२ ॥
स्वामिन्पुत्राः कथं मे स्युः सर्वलक्षणलक्षिताः ।<br>पुत्रहीनस्य मे राज्यं सर्वं दुःखाय कल्पते ॥ ३॥"स्वामिन् ! यह बताइये कि मेरे सर्व सुलक्षणोंसे सम्पन्न पुत्र किस प्रकार हो सकते हैं ? क्योंकि बिना पुत्रके यह सम्पूर्ण राज्य मुझे दुःखरूप हो रहा है" ॥ ३ ॥
ततोऽब्रवीद्वसिष्ठस्तं भविष्यन्ति सुतास्तव ।<br>चत्वारः सत्त्वसम्पन्ना लोकपाला इवापराः ॥ ४॥तब राजा दशरथसे वशिष्ठजीने कहा—"तुम्हारे साक्षात् दूसरे लोकपालोंके समान अत्यन्त सामर्थ्यवान् चार पुत्र होंगे ॥ ४ ॥
शान्ताभर्तारमानीय ऋष्यशृङ्गं तपोधनम् ।<br>अस्माभिः सहितः पुत्रकामेष्टिं शीघ्रमाचर ॥ ५॥तुम शान्ताके पति तपोधन ऋष्यशृंग※ को बुलाकर शीघ्र ही हमें साथ लेकर पुत्रेष्टि-यज्ञका अनुष्ठान करो" ॥ ५ ॥

ऋष्यशृंग मुनिवर विभाण्डकके पुत्र थे । एक बार विभाण्डक मुनि एक कुण्डमें समाधि लगाये बैठे थे, उस समय उधरसे उर्वशी अप्सरा निकली । उसे देखकर मुनिका वीर्य स्खलित हो गया । उसे जलके साथ एक मृगी पी गयी । उसीसे इनका जन्म हुआ । माताके समान इनके शिरपर भी शृङ्ग (सींग) होनेकी सम्भावना थी, इसलिये पिता विभाण्डकने इनका नाम ऋष्यशृङ्ग रखा । एक बार अङ्ग देशमें घोर अनावृष्टि हुई । उस संबंध...

सर्ग ३ ] बालकाण्ड १३


तथेति मुनिनानीय मन्त्रिभिः सहितः शुचिः।
यज्ञकर्म समारेभे मुनिभिर्वीतकल्मषैः ॥ ६ ॥

श्रद्धया हूयमानेऽग्नौ तप्तजाम्बूनदप्रभः।
पायसं स्वर्णपात्रस्थं गृहीत्वोवाच हव्यवाट् ॥ ७ ॥

गृहाण पायसं दिव्यं पुत्रियं देवनिर्मितम् ।
लप्स्यसे परमात्मानं पुत्रत्वेन न संशयः ॥ ८ ॥

इत्युक्त्वा पायसं दत्त्वा राज्ञे सोऽन्तर्दधेऽनलः।
ववन्दे मुनिशार्दूलौ राजा लब्धमनोरथः ॥ ९ ॥

वसिष्ठऋष्यशृङ्गाभ्यामनुज्ञातो ददौ हविः ।
कौसल्यायै सकैकैय्यै अर्धमर्धं प्रयत्नतः ॥ १० ॥

ततः सुमित्रा संप्राप्ता जगृध्नुः पौत्रिकं चरुम् ।
कौसल्या तु स्वभागार्धं ददौ तस्यै मुदान्विता ॥ ११ ॥

कैकैयी च स्वभागार्धं ददौ प्रीतिसमन्विता ।
उपभुज्य चरुं सर्वाः स्त्रियो गर्भसमन्विताः ॥ १२ ॥

देवता इव रेजुस्ताः स्वभासा राजमन्दिरे ।
दशमे मासि कौसल्या सुषुवे पुत्रमद्भुतम् ॥ १३ ॥

मधुमासे सिते पक्षे नवम्यां कर्कटे शुभे ।
पुनर्वस्वृक्षसहिते उच्चस्थे ग्रहपञ्चके ॥ १४ ॥

मेषं पूषणि संप्राप्ते पुष्पवृष्टिसमाकुले ।
आविरासीज्जगन्नाथः परमात्मा सनातनः ॥ १५ ॥

नीलोत्पलदलश्यामः पीतवासाश्चतुर्भुजः ।
जलजारुणनेत्रान्तः स्फुरत्कुण्डलमण्डितः ॥ १६ ॥

राजाने "बहुत अच्छा" कह मुनिवर ऋष्यशृंगको बुलाया और मन्त्रियोंके सहित पवित्र होकर निष्पाप मुनिजनोंकी सहायतासे यज्ञानुष्ठानं आरंभ किया ॥ ६ ॥ यज्ञानुष्ठानके समय अग्निमें श्रद्धापूर्वक आहुति देनेपर तप्त सुवर्णके समान दीप्तिमान् हव्यवाहन भगवान् अग्नि एक स्वर्णपात्रमें पायस लेकर प्रकट हुए और बोले ॥ ७ ॥ "हे राजन् ! यह देवताओंकी बनायी हुई पुत्र-प्रदायिनी दिव्य पायस (खीर) लो । इसके द्वारा तुम निस्सन्देह साक्षात् परमात्माको पुत्ररूपसे प्राप्त करोगे" ॥ ८ ॥

अग्निदेव ऐसा कहकर और वह खीर राजाको देकर अन्तर्धान हो गये । तदनन्तर राजाने सफल-मनोरथ हो मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ और ऋष्यशृङ्गकी चरण-वन्दना की और उन दोनोंकी आज्ञासे बड़ी सावधानीके साथ वह हवि महारानी कौसल्या और कैकेयीमें आधी-आधी बाँट दी ॥ ९-१० ॥ तदनन्तर उस पुत्र देनेवाले चरुको लेनेकी इच्छासे सुमित्राजी भी वहाँ आ पहुँचीं । इसपर कौसल्याजीने प्रसन्नतापूर्वक अपने भागमेंसे आधा उन्हें दे दिया ॥ ११॥ तथा कैकेयीने भी प्रीतिपूर्वक अपने भागमेंसे आधा सुमित्राको दिया । इस प्रकार उस हविको खाकर सभी रानियाँ गर्भवती हो गयीं ॥ १२ ॥

वे तीनों रानियाँ उस राजभवनमें अपनी कान्तिसे देवताओंके समान शोभा पाने लगीं । फिर दशवाँ महीना लगनेपर कौसल्याने एक अद्भुत बालकको जन्म दिया ॥ १३ ॥ चैत्रमासके शुक्ल-पक्षकी नवमीके दिन कर्क-लग्नमें पुनर्वसु-नक्षत्रके समय जब कि पाँच ग्रह उच्च स्थानमें तथा सूर्य मेषराशिपर थे तब (मध्याह्न-कालमें) सनातन परमात्मा जगन्नाथका आविर्भाव हुआ । उस समय आकाश दिव्य पुष्पोंकी वर्षासे पूर्ण हो गया ॥ १४-१५॥ जो नीलकमलदलके समान श्यामवर्ण हैं, पीताम्बर पहिने हुए हैं और चार भुजाएँ धारण किये हैं तथा जिनके नेत्रोंके भीतरका भाग अरुण


मुनियोंने अङ्गनरेश रोमपादसे कहा, यदि बाल्यब्रह्मचारी ऋष्यशृङ्गको यहाँ स्त्रियाँ लावें तो वृष्टि हो । राजाने इसके लिये वेश्याओंको नियुक्त किया । उनमेंसे एक ब्रह्मचारीका वेष बनाकर उन्हें मोहित कर ले आयी । उनके अङ्गदेशमें आते ही पुष्कल वर्षा हो गयी । राजाने उनका ऐसा अद्भुत प्रभाव देखकर उन्हें अपनी कन्या शान्ता विवाह दीं । कहीं-कहीं ऐसा भी कहा जाता है कि यह शान्ता महाराज दशरथकी पुत्री थी और इन्होंने इसे अपने मित्र रोमपादको गोद दे दिया था ।

१० १४ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ३


सहस्रार्कप्रतीकाशः किरीटी कुञ्चितालकः ।
शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविराजितः ॥१७॥

अनुग्रहाख्यहृत्स्थेन्दुसूचकस्मितचन्द्रिकः ।
करुणारससम्पूर्णविशालोत्पललोचनः ।
श्रीवत्सहारकेयूरनूपुरादिविभूषणः ॥१८॥

दृष्ट्वा तं परमात्मानं कौसल्या विस्मयाकुला ।
हर्षाश्रुपूर्णनयना नत्वा प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥१९॥

कौसल्योवाच

देवदेव नमस्तेऽस्तु शङ्खचक्रगदाधर ।
परमात्माऽच्युतोऽनन्तः पूर्णस्त्वं पुरुषोत्तमः॥२०॥

वदन्त्यगोचरं वाचां बुद्ध्यादीनामतीन्द्रियम् ।
त्वां वेदवादिनः सत्तामात्रं ज्ञानैकविग्रहम् ॥२१॥

त्वमेव मायया विश्वं सृजस्यवसि हंसि च ।
सत्त्वादिगुणसंयुक्तस्तुर्य एवामलः सदा ॥२२॥

करोषीव न कर्ता त्वं गच्छसीव न गच्छसि ।
शृणोषि न शृणोषीव पश्यसीव न पश्यसि ॥२३॥

अप्राणो ह्यमनाः शुद्ध इत्यादि श्रुतिरब्रवीत् ।
समः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्नपि न लक्ष्यसे ॥२४॥

अज्ञानध्वान्तचित्तानां व्यक्त एव सुमेधसाम् ।
जठरे तव दृश्यन्ते ब्रह्माण्डाः परमाणवः ॥२५॥

त्वं ममोदरसम्भूत इति लोकान्विडम्बसे ।
भक्तेषु पारवश्यं ते दृष्टं मेऽद्य रघूत्तम ॥२६॥

संसारसागरे मग्ना पतिपुत्रधनादिषु ।
भ्रमामि मायया तेऽद्य पादमूलमुपागता ॥२७॥


कमलके समान शोभायमान है, कानोंमें कान्तिमान् कुण्डल सुशोभित हैं ॥ १६ ॥ हजारों सूर्योंके समान जिनका प्रकाश है, जिनके शिरपर प्रकाशमान मुकुट और घुँघराली अलकें हैं, हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म तथा गलेमें वैजयन्ती-माला विराजमान है ॥ १७ ॥ जिनके मुख-कमलपर हृदयस्थ अनुग्रहरूप चन्द्रमाकी सूचना देनेवाली मुस्कानरूप चन्द्रिका छिटक रही है, जिनके करुणा-रस-पूर्ण नयन कमलदलके समान विशाल हैं तथा जो श्रीवत्स, हार, केयूर और नूपुर आदि आभूषणोंसे विभूषित हैं ॥ १८ ॥ पुत्ररूपसे प्रकट हुए उन परमात्माको देखकर कौसल्याने विस्मयसे व्याकुल हो, नेत्रोंमें आनन्दाश्रु-भर, हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए कहा ॥१९॥

श्रीकौसल्याजी बोलीं— हे देवदेव ! आपको नमस्कार है; हे शंख-चक्र-गदा-धर ! आप अच्युत और अनन्त परमात्मा हैं तथा सर्वत्र पूर्ण पुरुषोत्तम हैं ॥२०॥ वेदवादीगण आपको मन और वाणी आदिके अविषय तथा इन्द्रियोंसे अतीत सत्तामात्र और एकमात्र ज्ञान-स्वरूप बतलाते हैं ॥ २१ ॥ आप ही अपनी मायाके आश्रयसे सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे युक्त होकर इस विश्वकी रचना, पालन और संहार करते हैं तथापि वास्तवमें आप सदा निर्मल तुरीय पदमें स्थित हैं ॥ २२ ॥ आप कर्त्ता नहीं हैं तथापि करते-से प्रतीत होते हैं; चलते नहीं हैं फिर भी चलते-से मालूम पड़ते हैं, न सुनते हुए भी सुनते-से दिखायी देते हैं और न देखकर भी देखते हुए-से प्रतीत होते हैं ॥२३॥ भगवती श्रुति भी कहती है कि आप 'प्राण और मनसे रहित तथा शुद्ध' हैं। आप समस्त प्राणियोंमें समान-भावसे स्थित हैं, तथापि जिनका अन्तःकरण अज्ञानान्धकारसे ढँका हुआ है उन्हें आप दिखायी नहीं देते, आपका साक्षात्कार सुबुद्धि पुरुषोंको ही होता है । हे भगवन् ! आपके उदरमें अनेकों ब्रह्माण्ड परमाणुओंके समान दिखलायी देते हैं तथापि 'आपने मेरे पेटसे जन्म लिया' ऐसा जो आप लोगोंमें प्रकट कर रहे हैं इससे मैंने आज आपकी भक्त-वत्सलता देख ली ॥ २४–२६ ॥ हे प्रभो ! मैं आपकी मायासे मोहित होकर संसार-सागरमें डूबी हुई पति, पुत्र और धन आदिके फेरमें पड़ रही थी; आज परम सौभाग्यवश आपके चरण-कमलोंकी शरणमें आयी हूँ ॥ २७ ॥ हे देव !

सर्ग ३ ]बालकाण्ड१५


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देव त्वद्रूपमेतन्मे सदा तिष्ठतु मानसे।<br>आवृणोतु न मां माया तव विश्वविमोहिनी ॥२८॥आपकी यह मनोहर मूर्ति सदा मेरे हृदयमें विराजमान रहे और आपकी विश्व-विमोहिनी माया मुझे न व्यापे ॥२८॥
उपसंहर विश्वात्मन्नदो रूपमलौकिकम् ।<br>दर्शयस्व महानन्द बालभावं सुकोमलम् ॥<br>ललितालिङ्गनालापैस्तरिष्याम्युत्कटं तमः ॥२९॥हे विश्वात्मन् ! अपने इस अलौकिक रूपका उपसंहार कीजिये और परम आनन्ददायक सुकोमल बालरूप धारण कीजिये जिसके अति सुखद आलिंगन और सम्भाषणादिसे मैं घोर अज्ञानान्धकारको पार कर जाऊँगी ॥ २९ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>यद्यदिष्टं तवास्त्यम्ब तत्तद्भवतु नान्यथा ॥३०॥<br>अहं तु ब्रह्मणा पूर्वं भूमेर्भारापनुत्तये ।<br>प्रार्थितो रावणं हन्तुं मानुषत्वमुपागतः ॥३१॥<br>त्वया दशरथेनाहं तपसाऽऽराधितः पुरा ।<br>मत्पुत्रत्वाभिकाङ्क्षिण्या तथा कृतमनिन्दिते ॥३२॥<br>रूपमेतच्चया दृष्टं प्राक्तनं तपसः फलम् ।<br>मद्दर्शनं विमोक्षाय कल्पते ह्यन्यदुर्लभम् ॥३३॥<br>संवादमावयोर्र्यस्तु पठेद्वा श‍ृणुयादपि ।<br>स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृतिं लभेत् ॥३४॥**श्रीभगवान् बोले—**हे मात: ! आप जो-जो चाहती हैं वही हो, उसके विरुद्ध कुछ भी न हो। पूर्वकालमें मुझसे पृथिवीका भार उतारनेके लिये ब्रह्माने प्रार्थना की थी, अतः रावणादि निशाचरोंको मारनेके लिये ही मैंने मनुष्यरूपसे अवतार लिया है ॥३०-३१॥ हे अनिन्दिते ! दशरथजीके सहित तुमने भी मुझे पुत्ररूप-से प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्या करते हुए मेरी आराधना की थी। उसीको मैंने इस समय प्रकट होकर पूर्ण किया है ॥३२॥ तुमने अपनी पूर्व तपस्याके फलसे ही मेरा यह दिव्य रूप देखा है। मेरा दर्शन मोक्ष-पद देनेवाला होता है; पुण्यहीन जनोंके लिये इसका दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है ॥३३॥ जो व्यक्ति हमारे इस संवादको पढ़ेगा या सुनेगा वह मेरी सारूप्य मुक्ति (समानरूपता) प्राप्त करेगा और मरणकालमें उसे मेरा स्मरण रहेगा ॥३४॥
इत्युक्त्वा मातरं रामो बालो भूत्वा रुरोद ह ।<br>बालत्वेऽपीन्द्रनीलाभो विशालाक्षोऽतिसुन्दरः ३५<br>बालारुणप्रतीकाशो ललिताखिललोकपः ।मातासे इस प्रकार कह भगवान् बालरूप होकर रोने लगे। उनका बालरूप भी इन्द्रनीलमणिके समान श्यामवर्ण, बड़े-बड़े नेत्रोंवाला और अति सुन्दर था ॥३५॥ वह प्रभातकालीन बालसूर्यके समान अरुण-ज्योतिर्मय था । भगवान्‌ने अवतरित होकर उस सुमनोहर बालरूपसे सभी लोकपालोंको परम आनन्दित कर दिया।
अथ राजा दशरथः श्रुत्वा पुत्रोद्भवोत्सवम् ।<br>आनन्दार्णवमग्नोऽसावाययौ गुरुणा सह ॥३६॥तत्पश्चात् जब महाराज दशरथजीने पुत्रोत्पत्ति-का शुभ समाचार सुना तो वे मानो आनन्द-समुद्रमें डूब गये और गुरु वशिष्ठजीके साथ राजभवनमें आये ॥३६॥
रामं राजीवपत्राक्षं दृष्ट्वा हर्षाश्रुसंप्लुतः ।<br>गुरुणा जातकर्माणि कर्तव्यानि चकार सः ॥३७॥वहाँ आकर कमलनयन रामको देखकर वे आनन्दाश्रुओं-से पूर्ण हो गये और गुरुजीद्वारा उनके जातकर्म आदि आवश्यक संस्कार कराये ॥३७॥
कैकेयी चाथ भरतमसूत कमलेक्षणा ।<br>सुमित्रायां यमौ जातौ पूर्णेन्दुसदृशाननौ ॥३८॥तदनन्तर कमलनयनी कैकेयीसे भरतका जन्म हुआ और सुमित्रासे पूर्णचन्द्रके समान मुखवाले दो यमज बालक उत्पन्न हुए ॥३८॥
तदा ग्रामसहस्राणि ब्राह्मणेभ्यो मुदा ददौ ।<br>सुवर्णानि च रत्नानि वासांसि सुरभीः शुभाः ॥३९॥उस समय महाराज दशरथने अति उत्साहपूर्वक सहस्रों ग्राम, बहुत-सा सुवर्ण, अनेक रत्न, नाना प्रकारके वस्त्र और शुभलक्षणोंवाली अनेकों गौएँ ब्राह्मणोंको दीं ॥३९॥
१६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ३

यस्मिन् रमन्ते मुनयो विद्ययाऽज्ञानविप्लवे ।
तं गुरुः प्राह रामेति रमणाद्राम इत्यपि ॥४०॥

भरणाद्भरतो नाम लक्ष्मणं लक्षणान्वितम् ।
शत्रुघ्नं शत्रुहन्तारमेवं गुरुरभाषत ॥४१॥

लक्ष्मणो रामचन्द्रेण शत्रुघ्नो भरतेन च ।
द्वन्द्वीभूय चरन्तौ तौ पायसांशानुसारतः ॥४२॥

रामस्तु लक्ष्मणेनाथ विचरन्बाललीलया ।
रमयामास पितरौ चेष्टितैर्मुग्धभाषितैः ॥४३॥

भाले स्वर्णमयाश्वत्थपर्णमुक्ताफलप्रभम् ।
कण्ठे रत्नमणिव्रातमध्यद्वीपिनखाञ्चितम् ॥४४॥

कर्णयोः स्वर्णसम्पन्नरक्तार्जुनसटालुकम् ।
शिञ्जानमणिमञ्जीरकटिसूत्राङ्गदैर्वृतम् ॥४५॥

स्मितवक्त्रालपदशनमिन्द्रनीलमणिप्रभम् ।
अङ्गणे रिङ्गमाणं तं तर्णकाननु सर्वतः ॥४६॥

दृष्ट्वा दशरथो राजा कौसल्या मुमुदे तदा ।
भोक्ष्यमाणो दशरथो राममेहीति चासकृत् ॥४७॥

आह्वयत्यतिहर्षेण प्रेम्णा नायाति लीलया ।
आनयेति च कौसल्यामाह सा सस्मिता सुतम् ॥४८॥

धावत्यपि न शक्नोति स्प्रष्टुं योगिमनोगतिम् ।
प्रहसन्स्वयमायाति कर्दमाङ्कितपाणिना ॥४९॥

किञ्चिद्गृह्णीत्वा कवलं पुनरेव पलायते ।
कौसल्या जननी तस्य मासि मासि प्रकुर्वती ॥५०॥

वायनानि विचित्राणि समलङ्कृत्य राघवम् ।


विज्ञानके द्वारा अज्ञानके नष्ट हो जानेपर मुनिजन जिनमें रमण करते हैं अथवा जो अपनी सुन्दरतासे भक्तजनोंके चित्तोंको रमाते (आनन्दमग्न करते) हैं, उनका नाम गुरु वशिष्ठजीने 'राम' रखा ॥४०॥ इसी प्रकार गुरुजीने, संसारका पोषण करनेवाला होनेसे दूसरे पुत्रका नाम 'भरत', समस्त सुलक्षण-सम्पन्न होनेसे तीसरेका नाम 'लक्ष्मण' और शत्रुओंका घातक होनेसे चौथे पुत्रका नाम 'शत्रुघ्न' रखा ॥४१॥ कौसल्या और कैकेयीके दिये हुए पायसांशोंके अनुसार लक्ष्मणजी रामचन्द्रजीके और शत्रुघ्नजी भरतजीके जोड़ीदार होकर रहने लगे ॥ ४२ ॥ लक्ष्मणजीके साथ विचरते हुए श्रीरामचन्द्रजी अपनी बाल-लीलाओं, चेष्टाओं और भोली-भाली बातोंसे माता-पिताको आनन्दित करने लगे ॥ ४३ ॥

जिसके ललाटपर मोतियोंसे सजाया हुआ देदीप्यमान सुवर्णमय अश्वत्थपत्र (पीपलका पत्ता) तथा गलेमें रत्न और मणिसमूहके साथ बीच-बीचमें व्याघ्रनख सजाकर गूँथी हुई लड़ियाँ सुशोभित हैं ॥ ४४ ॥ कानोंमें अर्जुनवृक्षके कच्चे फलोंके समान रत्नजटित सुवर्णके आभूषण लटक रहे हैं, तथा जो झनकारते हुए मणिमय नूपुर सुवर्णमेखला और बाजुबन्दसे विभूषित हैं॥४५॥ उस इन्द्रनील-मणिकी-सी आभावाले तथा स्वल्प दाँतोंसे युक्त मुसकाते हुए मुखवाले बालकको राजभवनके आँगनमें बछड़ेके पीछे-पीछे सब ओर बालगतिसे दौड़ते देख महाराज दशरथ और माता कौसल्या अति आनन्दित होते थे। जिस समय महाराज भोजन करने बैठते तो 'राम ! आ' ऐसा कह-कहकर अति हर्ष और प्रेमपूर्वक उन्हें बारम्बार बुलाते । जब खेलमें लगे रहनेके कारण वे न आते तो वे कौसल्यासे 'इसे पकड़ ला' ऐसा कहकर उन्हें लानेके लिये कहते। किन्तु जो योगिजनोंके चित्तके एकमात्र आश्रय हैं ऐसे पुत्रको कौसल्याजी हँसकर दौड़ती हुई भी न पकड़ पातीं। (उस समय माताको थकी देखकर) वे स्वयं ही कीचमें सने हुए हाथोंसे हँसते-हँसते वहाँ आ जाते और एक-आध ग्रास खाकर ही फिर भाग जाते ॥ ४६-४९ ॥ माता कौसल्या रामको भली प्रकार वस्त्राभूषण पहिनाकर प्रतिमास व्यञ्जन बनातीं और वर्ष लगनेपर पूजा,

सर्ग ३ ]बालकाण्ड१७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अपूपान्मोदकान्कृत्वा कर्णशष्कुलिकास्तथा।<br>कर्णपूरांश्च विविधान् वर्षवृद्धौ च वायनम् ॥५१॥लड्डू, पूरी, कचौड़ी आदि विविध व्यञ्जन बनाकर (ब्राह्मण-भोजनादि) द्वारा उत्सव मनाती थीं ॥५०-५१॥
गृहकृत्यं तया त्यक्तं तस्य चापल्यकारणात् ।<br>एकदा रघुनाथोऽसौ गतो मातरमन्तिके ॥५२॥रामकी चपलताके कारण कौसल्याने घरका काम करना छोड़ दिया था । एक दिन रामजी माताके पास गये ॥५२॥ और कहा—"माता ! मुझे कुछ खानेको दे।" किन्तु काममें लगी होनेसे माताने न सुना । तब क्रोधित होकर उन्होंने डण्डेसे सब बर्तन फोड़ डाले ॥५३॥ तथा छींकेपर रखे हुए गोरस और माखनको गिरा लिया और उसे तथा वहाँ रखे हुए समस्त दूध-दहीको भी क्रमशः लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नको बाँट दिया । तब रसोइयेने जाकर माता कौसल्यासे कहा । वह हँसती हुई पकड़नेको दौड़ीं ॥५४-५५॥
भोजनं देहि मे मातर्न श्रुतं कार्यसक्तया ।<br>ततः क्रोधेन भाण्डानि लगुडेनाहनत्तदा ॥५३॥
शिक्यस्थं पातयामास गव्यं च नवनीतकम् ।<br>लक्ष्मणाय ददौ रामो भरताय यथाक्रमम् ॥५४॥
शत्रुघ्नाय ददौ पश्चाद्दधि दुग्धं तथैव च ।<br>सूदेन कथिते मात्रे हास्यं कृत्वा प्रधावति ॥५५॥
आगतां तां विलोक्याथ ततः सर्वैः पलायितम् ।<br>कौसल्या धावमानापि प्रस्खलन्ती पदे पदे ॥५६॥माताको आती देखकर वे सब बालक भाग गये । माता कौसल्या भी उनके पीछे दौड़ीं, किन्तु वे पग-पगपर फिसलने लगीं ॥५६॥
रघुनाथं करे धृत्वा किञ्चिन्नोवाच भामिनी ।<br>बालभावं समाश्रित्य मन्दं मन्दं रुरोद ह ॥५७॥अन्तमें उन्होंने रामको पकड़ लिया, किन्तु कहा कुछ भी नहीं । उस समय रामजी बालभावसे धीरे-धीरे रोने लगे ॥५७॥
ते सर्वे लालिता मात्रा गाढमालिङ्ग्य यत्नतः।<br>एवमानन्दसन्दोहजगदानन्दकारकः ॥५८॥तब उन सबको भयभीत देखकर माताने उन्हें बड़े प्रेमसे हृदय लगाकर प्यार किया । इस प्रकार जगदानन्दकारक आनन्दघन भगवान् राम मायामय बालरूप धारणकर राजदम्पति दशरथ और कौसल्याको आनन्दित करने लगे । तदुपरान्त कुछ काल बीतनेपर उन चारों भाइयोंने कौमार-अवस्था में प्रवेश किया ॥५८-५९॥
मायाबालवपुर्धृत्वा रमयामास दम्पती ।<br>अथ कालेन ते सर्वे कौमारं प्रतिपेदिरे ॥५९॥
उपनीता वसिष्ठेन सर्वविद्याविशारदाः ।<br>धनुर्वेदे च निरताः सर्वशास्त्रार्थवेदिनः ॥६०॥तब वसिष्ठजीने उनका उपनयन-संस्कार किया और लीलासे ही नररूप धारण करनेवाले सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी (चारों भाई) समस्त शास्त्रोंका मर्म जाननेवाले तथा धनुर्वेद आदि सम्पूर्ण विद्याओंके पारगामी हो गये । उन सब भाइयोंमें लक्ष्मणजी सेव्य-सेवक-भावसे आदरपूर्वक सदा रामचन्द्रजीका अनुगमन करते थे और उसी प्रकार शत्रुघ्नजी सदा भरतजीकी सेवामें उपस्थित रहते थे । भगवान् राम नित्यप्रति लक्ष्मणजीके सहित धनुष, बाण और तरकश धारणकर घोड़ेपर सवार हो मृगयाके लिये वनको जाते और वहाँ दुष्ट मृगोंको मारकर उन सबको पिताजीके अर्पण कर देते ॥६०-६३॥ प्रातःकाल उठकर स्नान
बभूवुर्जगतां नाथा लीलया नररूपिणः ।<br>लक्ष्मणस्तु सदा राममनुगच्छति सादरम् ॥६१॥
सेव्यसेवकभावेन शत्रुघ्नो भरतं तथा ।<br>रामश्चापधरो नित्यं तूणीबाणान्वितः प्रभुः ॥६२॥
अश्वारूढो वनं याति मृगयायै सलक्ष्मणः ।<br>हत्वा दुष्टमृगान्सर्वांन्पित्रे सर्वं न्यवेदयत् ॥६३॥

बालकाण्ड - सर्ग ४: विश्वामित्रजीका आगमन; राम और लक्ष्मणका उनके साथ जाना...

१८अध्यात्मरामायण[सर्ग ४

प्रातरुत्थाय सुस्नातः पितरावभिवाद्य च ।
पौरकार्याणि सर्वाणि करोति विनयान्वितः ॥ ६४ ॥
बन्धुभिः सहितो नित्यं भुक्त्वा मुनिभिरन्वहम् ।
धर्मशास्त्ररहस्यानि शृणोति व्याकरोति च ॥ ६५ ॥
एवं परात्मा मनुजावतारो
मनुष्यलोकाननुसृत्य सर्वम् ।
चक्रेऽविकारी परिणामहीनो
विचार्यमाणे न करोति किञ्चित् ॥ ६६ ॥

करनेके अनन्तर वे माता-पिताको प्रणाम करते और फिर नम्रतापूर्वक नगर-निवासियोंके समस्त कार्य करते ॥ ६४ ॥ फिर भाइयोंसहित भोजन करके नित्यप्रति मुनिजनोंसे धर्मशास्त्रोंका मर्म सुनते और स्वयं भी उनकी व्याख्या करते ॥ ६५ ॥
इस प्रकार अविकारी और परिणामहीन परमात्मा मनुष्यावतार लेकर मनुष्योंके आचरणका अनुगमन करते हुए समस्त कार्य किये; पर विचार करके देखा जाय तो वे कुछ भी नहीं करते ॥ ६६ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥


चतुर्थ सर्ग

विश्वामित्रजीका आगमन; राम और लक्ष्मणका उनके साथ जाना और ताटकाका वध करना ।

श्रीमहादेव उवाच
कदाचित्कौशिकोऽभ्यागादयोध्यां ज्वलनप्रभः ।
द्रष्टुं रामं परात्मानं जातं ज्ञात्वा स्वमायया ॥ १ ॥

दृष्ट्वा दशरथो राजा प्रत्युत्थायाचिरेण तु ।
वसिष्ठेन समागम्य पूजयित्वा यथाविधि ॥ २ ॥

अभिवाद्य मुनिं राजा प्राञ्जलिर्भक्तिनम्रधीः ।
कृतार्थोऽस्मि मुनीन्द्राद्यं त्वदागमनकारणात् ॥ ३ ॥

त्वद्विधा यद्गृहं यान्ति तत्रैवायान्ति संपदः ।
यदर्थमागतोऽसि त्वं ब्रूहि सत्यं करोमि तत् ॥ ४ ॥

विश्वामित्रोऽपि तं प्रीतः प्रत्युवाच महामतिः ।
अहं पर्वणि संप्राप्ते दृष्ट्वा यष्टुं सुरान्पितॄन् ॥ ५ ॥

यदारभे तदा दैत्या विघ्नं कुर्वन्ति नित्यशः ।
मारीचश्च सुबाहुश्चापरे चानुचरास्तयोः ॥ ६ ॥

श्रीमहादेवजी बोले— एक बार अग्निके समान तेजस्वी महर्षि विश्वामित्र परमात्माको अपनी ही मायासे रामरूपमें प्रकट हुए जान उनके दर्शन करनेके लिये अयोध्या-पुरीमें आये ॥ १ ॥ उन्हें देखते ही महाराज दशरथ तुरन्त उठ खड़े हुए और वसिष्ठजीके सहित आगे आकर उनका स्वागत किया और यथाविधि पूजन तथा अभिवादन कर राजाने भक्ति-विनम्र-चित्तसे हाथ जोड़कर मुनिसे कहा—"हे मुनीन्द्र ! आपके शुभागमनसे आज मैं कृतकृत्य हो गया ॥ २-३ ॥ जिस घरमें आप-जैसे महानुभाव पधारते हैं उसमें सभी सम्पत्तियाँ आ जाती हैं । अब आप यह बताइये कि आपका शुभागमन किसलिये हुआ है ? मैं आपसे सत्य कहता हूँ, मैं आपकी आज्ञाका पालन अवश्य करूँगा" ॥ ४ ॥

तत्र महामति विश्वामित्रजीने उनसे कहा—"जब कभी पर्वकाल उपस्थित हुआ देखकर मैं देव और पितृगणों-के लिये यजन करना आरम्भ करता हूँ तो सदा ही मारीच, सुबाहु और उनके अन्यान्य अनुयायी दैत्यगण उसमें विघ्न डाल देते हैं ॥ ५-६ ॥ अतएव उनका

सर्ग ४ ] बालकाण्ड [ १९


अतस्तयोर्वधार्थाय ज्येष्ठं रामं प्रयच्छ मे ।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा तव श्रेयो भविष्यति ॥७॥

वसिष्ठेन सहामन्त्र्य दीयतां यदि रोचते ।
पप्रच्छ गुरुमेकान्ते राजा चिन्तापरायणः ॥८॥

किं करोमि गुरो रामं त्यक्तुं नोत्सहते मनः ।
बहुवर्षसहस्रान्ते कष्टेनोत्पादिताः सुताः ॥९॥

चत्वारोऽमरतुल्यास्ते तेषां रामोऽतिवल्लभः ।
रामस्त्वितो गच्छति चेन्न जीवामि कथञ्चन ॥१०॥

प्रत्याख्यातो यदि मुनिः शापं दास्यत्यसंशयः ।
कथं श्रेयो भवेन्मह्यमसत्यं चापि न स्पृशेत् ॥११॥

वसिष्ठ उवाच

शृणु राजन्देवगुह्यं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
रामो न मानुषो जातः परमात्मा सनातनः ॥१२॥

भूमेर्भारावताराय ब्रह्मणा प्रार्थितः पुरा ।
स एव जातो भवने कौसल्यायां तवानघ ॥१३॥

त्वं तु प्रजापतिः पूर्वं कश्यपो ब्रह्मणः सुतः ।
कौसल्या चादितिर्देवमाता पूर्वं यशस्विनी ।

भवन्तौ तप उग्रं वै तेपाथे बहुवत्सरम् ॥१४॥
अग्राम्यविषयौ विष्णुपूजाध्यानैकतत्परौ ।

तदा प्रसन्नो भगवान्वरदो भक्तवत्सलः ॥१५॥
वृणीष्व वरमित्युक्ते त्वं मे पुत्रो भवामल ।

इति त्वया याचितोऽसौ भगवान्भूतभावनः ॥१६॥
तथेत्युक्त्वाऽद्य पुत्रस्ते जातो रामः स एव हि ।

शेषस्तु लक्ष्मणो राजन् राममेवान्वपद्यत ॥१७॥
जातौ भरतशत्रुघ्नौ शङ्खचक्रे गदाभृतः ।
योगमायापि सीतेति जाता जनकनन्दिनी ॥१८॥


वध करनेके लिये तुम अपने बड़े पुत्र रामको भाई लक्ष्मणके सहित मुझे दो, इससे तुम्हारा भी परम कल्याण होगा ॥७॥ इस विषयमें वसिष्ठजीसे सम्मति करके यदि तुम्हारी इच्छा हो तो तुम मुझे दोनों कुमारोंको दे दो।" तब राजाने चिन्ताकुल होकर एकान्तमें गुरुजीसे पूछा ॥८॥ "हे गुरो ! सहस्रों वर्ष बीतनेपर बड़े कष्टसे मुझे ये देवताओंके सदृश चार पुत्र मिले हैं। इनमें राम मुझे बहुत ही प्रिय है, सो अब मैं क्या करूँ ? मेरा चित्त तो रामको छोड़नेके लिये तैयार नहीं है। यदि राम यहाँसे चला जायगा तो मैं किसी प्रकार भी जी नहीं सकूँगा ॥९-१०॥ परन्तु यदि मैं सूखा जवाब दूँ तो यह निश्चय है कि मुनि मुझे शाप दे देंगे। अतः अब यह बताइये कि मेरा हित किस प्रकार हो और मैं असत्य-भाषणसे भी कैसे बचूँ ?" ॥११॥

**वसिष्ठजी बोले—**राजन् ! यह देवताओंकी गुह्य लीला सुनो, इसे किसी प्रकार प्रकट न होने देना चाहिये। ये राम मनुष्य नहीं हैं साक्षात् पुराण-पुरुष परमात्मा ही (अपनी मायासे) इस रूपमें प्रकट हुए हैं ॥१२॥ हे अनघ ! पूर्वकालमें पृथिवीका भार उतारनेके लिये ब्रह्माजीने भगवान्‌से प्रार्थना की थी, उसे पूर्ण करनेके लिये उन परमेश्वरने तुम्हारे यहाँ कौसल्याके गर्भसे जन्म लिया है ॥१३॥ पूर्व जन्ममें तुम ब्रह्माजीके पुत्र प्रजापति कश्यप थे और यशस्विनी कौसल्या देवमाता अदिति थीं। उस समय तुम दोनोंने बहुत वर्षोंतक ग्राम्य-विषयोंसे रहित और एकमात्र भगवान् विष्णुकी पूजामें तत्पर रहकर बड़ा उग्र तप किया। तब कालान्तरमें भक्तवत्सल वरदायक भगवान्‌ने तुम दोनोंपर प्रसन्न होकर कहा कि 'वर माँगो' तो तुमने (भगवान्‌से) यही माँगा कि 'हे निरञ्जन ! आप हमारे पुत्र हों' तब भूतभावन भगवान्‌ने कहा कि 'ऐसा ही हो।' इसलिये वे ही विष्णु भगवान् इस समय रामरूपसे तुम्हारे पुत्र हुए हैं और (उनकी सेवा करनेके लिये) शेषजी लक्ष्मणके रूपमें प्रकट होकर उनके अनुयायी हुए हैं ॥१४—१७॥ भगवान् गदाधरके शङ्ख और चक्रने भरत और शत्रुघ्नके रूपसे अवतार लिया है तथा योगमाया जनक-दुलारी सीताजी होकर प्रकट हुई हैं ॥१८॥ इस

२० अध्यात्मरामायण [ सर्ग ४


विश्वामित्रोऽपि रामाय तां योजयितुमागतः।
एतद्गुह्यतमं राजन्न वक्तव्यं कदाचन ॥१९॥

अतः प्रीतेन मनसा पूजयित्वाऽथ कौशिकम्।
प्रेषयस्व रमानाथं राघवं सहलक्ष्मणम् ॥२०॥

वसिष्ठेनैवमुक्तस्तु राजा दशरथस्तदा।
कृतकृत्यमिवात्मानं मेने प्रमुदितान्तरः ॥२१॥

आहूय रामरामेति लक्ष्मणेति च सादरम्।
आलिङ्ग्य मूर्धन्यवघ्राय कौशिकाय समर्पयत्॥२२॥

ततोऽतिहृष्टो भगवान्विश्वामित्रः प्रतापवान्।
आशीर्भिरभिनन्द्याथ आगतौ रामलक्ष्मणौ ॥२३॥

गृहीत्वा चापतूणीरवाणखड्गधरौ ययौ।
किञ्चिद्देशमतिक्रम्य राममाहूय भक्तितः ॥२४॥

ददौ वलां चातिबलां विद्ये द्वे देवनिर्मिते।
ययोर्ग्रहणमात्रेण क्षुत्क्षामादि न जायते ॥२५॥

तत उत्तीर्य गङ्गां ते ताटकावनमागमन्।
विश्वामित्रस्तदा प्राह रामं सत्यपराक्रमम् ॥२६॥

अत्रास्ति ताटका नाम राक्षसी कामरूपिणी।
बाधते लोकमखिलं जहि तामविचारयन् ॥२७॥

तथेति धनुरादाय सगुणं रघुनन्दनः।
टङ्कारमकरोत्तेन शब्देनापूरयद्वनम् ॥२८॥

तच्छ्रुत्वासहमाना सा ताटका घोररूपिणी।
क्रोधसंमूर्च्छिता राममभिदुद्राव मेघवत् ॥२९॥

तामेकेन शरेणाशु ताडयामास वक्षसि।
पपात विपिने घोरा वमन्ती रुधिरं बहु ॥३०॥


समय विश्वामित्रजी रामसे सीताका संयोग करानेके लिये ही आये हैं। हे राजन् ! यह रहस्य अत्यन्त गुह्य है, इसे कभी प्रकाशित मत करना ॥ १९ ॥ (अब सम्पूर्ण रहस्य तुमको मालूम हो गया है) इसलिये अब तुम प्रसन्न-चित्तसे श्रीविश्वामित्रजीका सत्कार करके लक्ष्मीपति श्रीरघुनाथजीको लक्ष्मणसहित इनके साथ भेज दो॥२०॥

वसिष्ठजीके इस प्रकार कहनेपर राजा दशरथने उस समय अपनेको कृतकृत्य माना और प्रसन्न-चित्तसे आदरपूर्वक 'हे राम ! हे राम ! हे लक्ष्मण !' ऐसा कहकर पुकारा तथा उन दोनों भाइयोंके आनेपर उन्हें हृदयसे लगाकर और शिर सूंघकर श्रीविश्वामित्रजीको सौंप दिया ॥ २१-२२ ॥ तब अति प्रतापी भगवान् विश्वामित्रजीने उन्हें अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक आशीर्वाद देकर सम्मानित किया और फिर धनुष, तरकश, बाण एवं खड्ग आदिसे सुसज्जित होकर अपने पास आये हुए राम और लक्ष्मणको साथ लेकर वहाँसे चल पड़े। थोड़ी दूर जानेपर विश्वामित्रजीने भक्तिपूर्वक रामको बुलाया और उन्हें देव-निर्मित बला और अतिबला नामकी ऐसी दो विद्याएँ दीं, जिनके ग्रहण करने-से ही क्षुधा और दुर्बलता आदिकी बाधा नहीं होती ॥ २३-२५ ॥

तदनन्तर गङ्गाजीको पार कर वे ताटकावनमें आये; तब विश्वामित्रजीने सत्यपराक्रमी रामसे कहा ॥ २६ ॥ "यहाँ एक ताटका नामकी इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी रहती है जो इस प्रदेशके समस्त निवासियोंको अत्यन्त कष्ट पहुँचाती है, तुम बिना कुछ सोच-विचार किये उसे मार डालो ॥ २७॥ तब रघुनाथजीने 'बहुत अच्छा' कह धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर टंकार किया, जिसके शब्दसे वह सम्पूर्ण वन गुञ्जायमान हो गया ॥ २८ ॥ उस शब्दको सुनकर घोररूपिणी ताटका उसे सहन न कर सकने-के कारण क्रोधसे पागल होकर मेघके समान रामकी ओर दौड़ी ॥ २९ ॥ भगवान् रामने तुरन्त ही उसके वक्षःस्थलमें एक बाण मारा, जिससे वह घोर राक्षसी बहुत-सा रुधिर उगलती हुई उस वनमें गिर पड़ी ॥३०॥ फिर शापवश पिशाचताको प्राप्त हुई वह ताटका श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे शापमुक्त होकर एक सर्वाङ्कार-

बालकाण्ड - सर्ग ५: मारीच और सुबाहुका दमन तथा अहिल्योद्धार

सर्ग ५ ]बालकाण्ड२१


ततोऽतिसुन्दरी यक्षी सर्वाभरणभूषिता ।
शापात्पिशाचतां प्राप्ता मुक्ता रामप्रसादतः ॥ ३१ ॥
नत्वा रामं परिक्रम्य गता रामाज्ञया दिवम् ॥ ३२ ॥
ततोऽतिहृष्टः परिरभ्य रामं
मूर्ध्न्यवघ्राय विचिन्त्य किञ्चित् ।
सर्वास्त्रजालं सरहस्यमन्त्रं
प्रीत्याऽभिरामाय ददौ मुनीन्द्रः ॥ ३३ ॥

विभूषिता परम सुन्दरी यक्षिणी हो गयी तथा रामचन्द्रजीकी परिक्रमा करके उन्हें प्रणामकर उनकी आज्ञासे स्वर्गलोकको चली गयी ॥ ३१-३२ ॥ तब मुनिवर विश्वामित्रजीने अति हर्षित होकर रामजीका आलिंगन किया और उनका शिर सूँघकर कुछ सोच-विचारकर रहस्य और मन्त्रादिके सहित समस्त अस्त्र-शस्त्र प्रीतिपूर्वक अभिराम रामको दिये ॥ ३३ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चम सर्ग

मारीच और सुबाहुका दमन तथा अहक्योद्धार

श्रीमहादेव उवाच

तत्र कामाश्रमे रम्ये कानने मुनिसङ्कुले ।
उषित्वा रजनीमेकां प्रभाते प्रस्थिताः शनैः ॥ १ ॥

**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! तदुपरात्त विश्वामित्रजीके सहित वे दोनों भाई एक रात मुनिजनसंकुलित अति सुन्दर उस कामा श्रम नामक वनमें रहकर प्रातःकाल होते ही धीरे-धीरे वहाँसे चले ॥ १ ॥

सिद्धाश्रमं गताः सर्वे सिद्धचारणसेवितम् ।
विश्वामित्रेण संदिष्टा मुनयस्तन्निवासिनः ॥ २ ॥
पूजां च महतीं चक्रू रामलक्ष्मणयोर्द्रुतम् ।
श्रीरामः कौशिकं प्राह मुने दीक्षां प्रविश्यताम् ॥ ३ ॥
दर्शयस्व महाभाग कुतस्तौ राक्षसाधमौ ।
तथेत्युक्त्वा मुनिर्यष्टुमारेभे मुनिभिः सह ॥ ४ ॥

तब वे सब सिद्ध और चारणोंसे सेवित सिद्धाश्रमपर आये । वहाँके रहनेवाले मुनिजनोंने विश्वामित्रजीकी आज्ञासे शीघ्रतापूर्वक राम और लक्ष्मणका बड़ा सत्कार किया । तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने विश्वामित्रजीसे कहा—"हे मुने ! आप दीक्षामें स्थित होइये ॥ २-३ ॥ और हे महाभाग ! हमें केवल यह दिखा दीजिये कि वे राक्षसाधम कहाँ हैं ?" तब मुनिवरने 'बहुत अच्छा' कहकर अन्य मुनियोंके साथ यज्ञ करना आरम्भ कर दिया ॥ ४ ॥

मध्याह्ने ददृशाते तौ राक्षसौ कामरूपिणौ ।
मारीचश्च सुबाहुश्च वर्षन्तौ रुधिरास्थिनी ॥ ५ ॥

मध्याह्नके समय मारीच और सुबाहु नामक वे दोनों कामरूपी राक्षस रक्त और अस्थियोंकी वर्षा करते दिखायी दिये ॥ ५ ॥

रामोऽपि धनुरवादाय द्वौ बाणौ सन्दधे सुधीः ।
आकर्णान्तं समाकृष्य विससर्ज तयोः पृथक् ॥ ६ ॥

बुद्धिमान् रामने भी दो बाण लेकर धनुषपर चढ़ाये और कर्णपर्यन्त खींचकर अलग-अलग उन दोनों राक्षसोंकी ओर छोड़े ॥ ६ ॥

तयोरेकस्तु मारीचं भ्रामयञ्छतयोजनम् ।
पातयामास जलधौ तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ७ ॥

उनमेंसे एक बाणने मारीचको आकाशमें घुमाते हुए सौ योजनकी दूरीपर समुद्रमें गिरा दिया । यह एक बड़ा ही आश्चर्य-सा हो गया ॥ ७ ॥

द्वितीयोऽग्निमयो बाणः सुबाहुमजयत्क्षणात् ।
अपरे लक्ष्मणेनाशु हतास्तदनुयायिनः ॥ ८ ॥

दूसरे अग्निमय बाणने क्षणभरमें सुबाहुको भस्म कर डाला तथा जो उनके अन्यान्य अनुयायी थे उन सबको तुरन्त ही लक्ष्मणजीने मार डाला ॥ ८ ॥

२२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ५

पुष्पौघैराकिरन्देवा राघवं सहलक्ष्मणम्।<br>देवदुन्दुभयो नेदुस्तुष्टुवुः सिद्धचारणाः ॥ ९॥<br>विश्वामित्रस्तु संपूज्य पूजाहं रघुनन्दनम्।<br>अङ्के निवेश्य चालिङ्ग्य भक्त्या बाष्पाकुलेक्षणः १०<br>भोजयित्वा सह भ्रात्रा रामं पक्वफलादिभिः।<br>पुराणवाक्यैर्मधुरैर्निनाय दिवसत्रयम् ॥११॥<br>चतुर्थेऽहनि संप्राप्ते कौशिको राममब्रवीत् ।<br>राम राम महायज्ञं द्रष्टुं गच्छामहे वयम् ॥१२॥<br>विदेहराजनेगरे जनकस्य महात्मनः।<br>तत्र माहेश्वरं चापमस्ति न्यस्तं पिनाकिना ॥१३॥<br>द्रक्ष्यसि त्वं महासत्त्वं पूज्यसे जनकेन च।<br>इत्युक्त्वा मुनिभिस्ताभ्यां ययौ गङ्गासमीपगम् १४<br>गौतमस्याश्रमं पुण्यं यत्राहल्यास्थिता तपः।<br>दिव्यपुष्पफलोपेतपादपैः परिवेष्टितम् ॥१५॥ | | उस समय देवताओंने लक्ष्मणजीके सहित श्रीरघुनाथजीपर फूल बरसाये और देवदुन्दुभि आदि बाजोंका घोष किया तथा सिद्ध और चारणगण उनकी स्तुति करने लगे ॥ ९॥ विश्वामित्रजीने पूजनीय रघुनाथजीका भली प्रकार पूजन किया और उन्हें गोदमें ले नेत्रोंमें भक्तिपूर्वक प्रेमाश्रु भरकर गले लगा लिया ॥ १०॥ फिर भाई लक्ष्मणके सहित रामको पके फल आदि खिलाकर पुराण और इतिहासादिकों मधुर कथाएँ सुनाते हुए तीन दिन बिताये ॥ ११ ॥ चौथा दिन आनेपर विश्वामित्रजीने रामसे कहा-"हे राम ! महात्मा जनकजीका बड़ा भारी यज्ञ देखनेके लिये हम-लोग जनकपुर चलेंगे। वहाँ श्रीमहादेवजीका धरोहरके रूपमें रखा हुआ एक बड़ा भारी धनुष है ॥१२-१३॥ उस सुदृढ़ धनुषको तुम देखोगे और महाराज जनक तुम्हारा भली प्रकार सत्कार करेंगे।" विश्वामित्र-जी इस प्रकार कह मुनियोंको और राम-लक्ष्मणको साथ ले गङ्गाजीके निकट मुनिश्रेष्ठ गौतमजीके उस पवित्र आश्रमपर आये जो दिव्य और पवित्र फलों-वाले वृक्षोंसे घिरा हुआ था और जहाँ अहल्या तप कर रही थी ॥ १४-१५ ॥ मृगपक्षिगणैर्हीनं नानाजन्तुविवर्जितम् ।<br>दृष्ट्वोवाच मुनिं श्रीमान् रामो राजीवलोचनः ॥१६॥<br>कस्यैतदाश्रमपदं भाति भास्वच्छुभं महत् ।<br>पत्रपुष्पफलैर्युक्तं जन्तुभिः परिवर्जितम् ॥१७॥<br>आह्लादयति मे चेतो भगवन् ब्रूहि तत्त्वतः ॥१८॥ | | कमलनयन श्रीमान् रामजीने उस आश्रमको मृग, पक्षी तथा नाना प्रकारके जीवोंसे रहित देख मुनिवर कौशिकसे कहा ॥ १६ ॥ "यह पत्र, पुष्प और फल आदिसे सम्पन्न तथा जीवशून्य महान् आश्रम जो बड़ा सुन्दर, रमणीय और पवित्र दीख पड़ता है, किसका है ? भगवन् ! इसे देखकर मेरा चित्त अति आह्लादित हो रहा है; आप इसका सब वृत्तान्त यथावत् कहिये ॥ १७-१८ ॥ विश्वामित्र उवाच<br>शृणु राम पुरा वृत्तं गौतमो लोकविश्रुतः ।<br>सर्वधर्मभृतां श्रेष्ठस्तपसाराधयन् हरिम् ॥१९॥<br>तस्मै ब्रह्मा ददौ कन्यामहल्यां लोकसुन्दरीम् ।<br>ब्रह्मचर्येण सन्तुष्टः शुश्रूषणपरायणाम् ॥२०॥<br>तया सार्द्धमिहावात्सीद्गौतमस्तपतां वरः ।<br>शक्रस्तु तां धर्षयितुमन्तरं प्रेप्सुरन्वहम् ॥२१॥ | | श्रीविश्वामित्रजी बोले—हे राम ! इस आश्रमका पूर्व-वृत्तान्त सुनो। पहले इस आश्रममें जगद्विख्यात धार्मिक-श्रेष्ठ मुनिवर गौतमजी तपस्याद्वारा श्रीहरिकी आराधना करते हुए रहते थे ॥ १९ ॥ उनके ब्रह्मचर्यसे सन्तुष्ट होकर भगवान् ब्रह्माजीने उनकी सेवाके लिये उन्हें अहल्या नामकी एक लोक-सुन्दरी सेवा-परायणा कन्या दी ॥ २० ॥ और तापसप्रवर गौतमजी उस अहल्याके साथ यहाँ रहने लगे, इधर देवराज इन्द्र अहल्याके रूप-लावण्यपर मुग्ध होकर नित्य-प्रति उसके साथ रमण करनेका अवसर देखने लगे ॥२१॥

सर्ग ५] बालकाण्ड २३


कदाचिन्मुनिवेषेण गौतमे निर्गते गृहात् ।<br>धर्षयित्वाऽथ निरगाच्चरितं मुनिरप्यगात् ॥२२॥<br>दृष्ट्वा यान्तं स्वरूपेण मुनिः परमकोपनः ।<br>पप्रच्छ कस्त्वं दुष्टात्मन्मम रूपधरोऽधमः ॥२३॥<br>सत्यं ब्रूहि न चेद्भस्म करिष्यामि न संशयः ।<br>सोऽब्रवीद्देवराजोऽहं पाहि मां कामकिङ्करम् ॥२४॥<br>कृतं जुगुप्सितं कर्म मया कुत्सितचेतसा ।<br>गौतमः क्रोधताम्राक्षः शशाप दिविजाधिपम् ॥२५॥<br>योनिलम्पट दुष्टात्मन्सहस्रभगवान्भव ।<br>शप्त्वा तं देवराजानं प्रविश्य स्वाश्रमं द्रुतम् ॥२६॥<br>दृष्ट्वाऽहल्यां वेपमानां प्राञ्जलिं गौतमोऽब्रवीत् ।<br>दुष्टे त्वं तिष्ठ दुर्वृत्ते शिलायामाश्रमे मम ॥२७॥<br>निराहारा दिवारात्रं तपः परममास्थिता ।<br>आतपानिलवर्षादिसहिष्णुः परमेश्वरम् ॥२८॥<br>ध्यायन्ती राममेकाग्रमनसा हृदि संस्थितम् ।<br>नानाजन्तुविहीनोऽयमाश्रमो मे भविष्यति ॥२९॥<br>एवं वर्षसहस्रेषु ह्यनेकेषु गतेषु च ।<br>रामो दाशरथिः श्रीमानागमिष्यति सानुजः ॥३०॥<br>यदा त्वदाश्रयशिलां पादाभ्यामाक्रमिष्यति ।<br>तदैव धूतपापा त्वं रामं संपूज्य भक्तितः ॥३१॥<br>परिक्रम्य नमस्कृत्य स्तुत्वा शापाद्विमोक्ष्यसे ।<br>पूर्ववन्मम शुश्रूषां करिष्यसि यथासुखम् ॥३२॥<br>इत्युक्त्वा गौतमः प्रागाद्धिमवन्तं नगोत्तमम् ।<br>तदाद्यहल्या भूतानामदृश्या स्वाश्रमे शुभे ॥३३॥<br>तव पादरजःस्पर्शं काङ्क्षते पवनाशना ।<br>आस्तेऽद्यापि रघुश्रेष्ठ तपो दुष्करमास्थिता ॥३४॥<br>पावयस्व मुनेर्भार्यामहल्यां ब्रह्मणः सुताम् ।<br>इत्युक्त्वा राघवं हस्ते गृहीत्वा मुनिपुङ्गवः ॥३५॥एक दिन मुनिवर गौतमके बाहर चले जानेपर वह गौतमके रूपसे अहल्याके साथ रमण कर जल्दीसे वहाँसे चलता बना, इसी समय मुनि भी वहाँ लौट आये ॥२२॥ उसे अपना रूप धारण कर वहाँसे जाते देख गौतम मुनिने अत्यन्त कुपित होकर पूछा—"रे दुष्टात्मा ! रे अधम ! मेरे रूपको धारण करनेवाला तू कौन है ? ॥२३॥ सच-सच बता, नहीं तो मैं तुझे अभी भस्म कर दूँगा—इसमें सन्देह न करना।" तब वह बोला—"भगवन् ! मैं कामके वशीभूत देवराज इन्द्र हूँ, मेरी रक्षा कीजिये ॥२४॥ मुझ पापात्माने बड़ा घृणित कार्य किया है।" तब गौतमने क्रोधसे आँखें लाल कर देवराजको शाप दिया ॥२५॥ "हे दुष्टात्मन् ! तू योनि-लम्पट है इसलिये तेरे शरीरमें सहस्र भग हो जायँ।" इस प्रकार देवराजको शाप देकर मुनिने अपने आश्रममें प्रवेश किया तो देखा कि अहल्या भयसे काँपती हुई हाथ जोड़े खड़ी है। उसे देखकर गौतमने कहा—"हे दुष्टे ! तू मेरे आश्रममें शिलामें निवास कर ॥२६-२७॥ यहाँ तू निराहार रहकर धूप, वायु और वर्षा आदिको सहन करती हुई दिन-रात तपस्या कर और एकाग्रचित्तसे हृदयमें विराजमान परमात्मा रामका ध्यान कर। अबसे यह मेरा आश्रम विविध प्रकारके जीव-जन्तुओं-से रहित हो जायगा ॥२८-२९॥ इसी प्रकार कई हजार वर्ष बीत जानेपर यहाँ दशरथ-नन्दन श्रीरामचन्द्रजी भाई लक्ष्मणके साथ आयेंगे ॥३०॥ जिस समय वे तेरी आश्रयभूत शिलापर अपने दोनों चरण रखेंगे उसी समय तू पाप-मुक्त हो जायगी, तथा भक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीका पूजन कर उनकी परिक्रमा और नमस्कारपूर्वक स्तुति कर शापसे छूट जायगी और फिर पूर्ववत् मेरी सुखपूर्वक सेवा करने लगेगी" ॥३१-३२॥ ऐसा कहकर महर्षि गौतम पर्वतश्रेष्ठ हिमालयपर चले गये। हे रघुश्रेष्ठ ! उसी दिनसे यह अहल्या वायु-भक्षण करती हुई कठोर तपस्यामें स्थित हो आपके चरण-रजके स्पर्शकी कामनासे आजतक प्राणियोंसे अलक्षिता रहकर अपने शुभ आश्रममें रहती है ॥३३-३४॥ हे राम ! अब तुम ब्रह्माजीकी पुत्री गौतम-पत्नी अहल्याका उद्धार करो।<br>मुनिवर विश्वामित्रजीने ऐसा कह रघुनाथजीका
२४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ५

संस्कृत मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
दर्शयामास चाहल्यामुग्रेण तपसा स्थिताम् ।<br>रामः शिलां पदा स्पृष्ट्वा तां चापश्यत्तपोधनाम् ३६<br>ननाम राघवोऽहल्यां रामोऽहमिति चाब्रवीत् ।<br><br>ततो दृष्ट्वा रघुश्रेष्ठं पीतकौशेयवाससम् ॥३७॥<br>चतुर्भुजं शङ्खचक्रगदापङ्कजधारिणम् ।<br>धनुर्बाणधरं रामं लक्ष्मणेन समन्वितम् ॥३८॥<br>स्मितवक्त्रं पद्मनेत्रं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम् ।<br>नीलमाणिक्यसङ्काशं द्योतयन्तं दिशो दश ॥३९॥<br>दृष्ट्वा रामं रमानाथं हर्षविस्फारितेक्षणा ।<br>गौतमस्य वचः स्मृत्वा ज्ञात्वा नारायणं परम् ॥४०॥<br>सम्पूज्य विधिवद्राममर्ध्यादिभिरनिन्दिता ।<br>हर्षाश्रुजलनेत्रान्ता दण्डवत्प्रणिपत्य सा ॥४१॥<br>उत्थाय च पुनर्द्दष्ट्वा रामं राजीवलोचनम् ।<br>पुलकाङ्कितसर्वाङ्गा गिरा गद्गदयैडत ॥४२॥<br><br>अहल्योवाच<br>अहो कृतार्थाऽस्मि जगन्निवास ते<br>पादाम्बुजसंलग्नरजःकणादहम् ।<br>स्पृशामि यत्पद्मजशङ्करादिभि-<br>र्विमृग्यते रन्धितमानसैः सदा ॥४३॥<br>अहो विचित्रं तव राम चेष्टितं<br>मनुष्यभावेन विमोहितं जगत् ।<br>चलस्यजस्रं चरणादिवर्जितः<br>सम्पूर्ण आनन्दमयोऽतिमायिकः ॥४४॥<br>यत्पादपङ्कजपरागपवित्रगात्रा<br>भागीरथी भवविरिञ्चिमुखान्पुनाति ।<br>साक्षात्स एव मम दृग्विषयो यदास्ते<br>किं वर्ण्यते मम पुराकृतभागधेयम् ॥४५॥<br>मर्त्यावतारे मनुजाकृतिं हरिं<br>रामाभिधेयं रमणीयदेहिनम् ।<br>धनुर्धरं पद्मविशाललोचनं<br>भजामि नित्यं न परान्मजिष्ये ॥४६॥हाथ पकड़ उन्हें उग्र तपमें स्थित अहल्याको दिखलाया । तब श्रीरामचन्द्रजीने अपने चरणसे उस शिलाको स्पर्शकर तपस्विनी अहल्याको देखा ॥ ३५-३६ ॥ उसे देखकर भगवान् रामने 'मैं राम हूँ' ऐसा कहकर प्रणाम किया ।<br><br>तब अहल्याने रेशमी पीताम्बर धारण किये श्रीरघुनाथजीको देखा ॥ ३७ ॥ उनकी चारों भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे, कन्धेपर धनुष-बाण विराजमान थे तथा साथमें श्रीलक्ष्मणजी थे ॥ ३८ ॥ उनका मुख मुसकान-युक्त, नेत्र कमलदलके समान और वक्षःस्थल श्रीवत्साङ्कसे सुशोभित था । अपने नीलमणि-सदृश श्याम विग्रहसे वे दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे ॥ ३९ ॥ रमानाथ श्रीरामचन्द्रको देखकर अहल्याके नेत्र हर्षसे खिल गये और उसे मुनिवर गौतमके वाक्योंका स्मरण हो आया । तब उन्हें साक्षात् श्रीनारायण जान उस अनिन्दिताने अर्ध्यादिसे उनका विधिवत् पूजन किया और नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम किया ॥ ४०-४१ ॥ फिर खड़ी होकर वह कमलनयन भगवान् रामको देख सर्वांगसे पुलकित हो गद्गदवाणीसे उनकी स्तुति करने लगी ॥ ४२ ॥<br><br>अहल्या बोली—हे जगन्निवास ! आपके चरण-कमलोंके रजःकणका स्पर्श कर आज मैं कृतार्थ हो गयी । अहो !(बड़े भाग्यकी बात है कि) आपके जिन पादार-विन्दोंका ब्रह्मा और शंकर आदि एकाग्र-चित्तसे सर्वदा अनुसन्धान किया करते हैं उन्हींका आज मैं स्पर्श कर रही हूँ ॥ ४३ ॥ हे राम ! आपकी लीलाएं बड़ी विचित्र हैं, आपके मानुष-भावसे सम्पूर्ण जगत् मोहित हो रहा है । आप पूर्णानन्दमय और अति मायावी हैं; क्योंकि चरणादिहीन होकर भी आप निरन्तर चलते रहते हैं ॥ ४४ ॥ जिनके चरण-कमलके परागसे पवित्र हुई श्रीगङ्गाजी शिव और ब्रह्मा आदि जगदीश्वरोंको भी पवित्र करती हैं, आज साक्षात् वे ही मेरे नेत्रोंके विषय हो रहे हैं—मैं अपने पूर्वकृत पुण्यकर्मोंका किस प्रकार वर्णन करूँ ? ॥ ४५ ॥ जिन्होंने परम सुन्दर मानव-देहसे मर्त्यलोकमें अवतार लिया है, मैं उन धनुषधारी कमलदल-लोचन भगवान् रामको सर्वदा भजती हूँ, और किसीको भी नहीं भजना चाहती ॥ ४६ ॥
सर्ग ५ ]बालकाण्ड२५

यत्पादपङ्कजरजः श्रुतिभिर्विमृग्यं<br>यन्नाभिपङ्कजभवः कमलासनश्च ।<br>यन्नामसाररसिको भगवान्पुरारि-<br>स्तं रामचन्द्रमनिशं हृदि भावयामि ॥४७॥ | जिनके चरण-कमलोंकी रजको श्रुति भी ढूँढ़ती रहती है, जिनकी नाभिसे उत्पन्न हुए कमलसे ब्रह्माजी प्रकट हुए हैं तथा जिनके नामामृतके भगवान् शंकर रसिक हैं उन श्रीरामचन्द्रजीका मैं अपने हृदयमें अहर्निश ध्यान करती हूँ ॥ ४७ ॥ यस्यावतारचरितानि विरिञ्चिलोके<br>गायन्ति नारदमुखा भवपद्मजाद्याः ।<br>आनन्दजाश्रुपरिपिक्तकुचाग्रसीमा<br>वागीश्वरी च तमहं शरणं प्रपद्ये ॥४८॥ | जिनके अवतार-चरित्रोंका नारदादि देवर्षिगण, ब्रह्मा और महादेव आदि देवेश्वरगण तथा आनन्दाश्रुओंसे जिनके कुचमण्डल भीगे हुए हैं वे सरस्वतीजी भी ब्रह्मलोकमें निरन्तर गान किया करती हैं उन प्रभुकी मैं शरण लेती हूँ ॥ ४८ ॥ सोऽयं परात्मा पुरुषः पुराण<br>एकः स्वयंज्योतिरनन्त आद्यः ।<br>मायातनूं लोकविमोहनीयां<br>धत्ते परानुग्रह एष रामः ॥४९॥ | उन्हीं पुराण-पुरुष परमात्मा रामने संसारपर परम अनुग्रह करनेके लिये स्वयंप्रकाश, अनन्त और सबके आदिकारण होते हुए भी यह जगन्मोहन मायामय रूप धारण किया है ॥ ४९ ॥ अयं हि विश्वोद्भवसंयमाना-<br>मेकः स्वमायागुणविम्वितो यः ।<br>विरिञ्चिविष्ण्वीश्वरनामभेदान्<br>धत्ते स्वतन्त्रः परिपूर्ण आत्मा ॥५०॥ | जो अकेले ही संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाशके लिये अपनी मायाके गुणोंका आश्रयकर ब्रह्मा, विष्णु और महादेव नामक विभिन्न रूप धारण करते हैं वे स्वतन्त्र और परिपूर्ण आत्मा आप ही हैं ॥५०॥ नमोऽस्तु ते राम तवाङ्घ्रिपङ्कजं<br>श्रिया धृतं वक्षसि लालितं प्रियात् ।<br>आक्रान्तमेकेन जगत्त्रयं पुरा<br>ध्येयं मुनीन्द्रैरभिमानवर्जितैः ॥५१॥ | हे राम ! आपके जिन चरण-कमलोंको श्रीलक्ष्मीजी अपने वक्षःस्थलपर रखकर बड़े प्रेमसे लाड़ लड़ाती हैं, जिन्होंने पूर्वकालमें (बलि-बन्धनके समय ) एक ही पगमें सम्पूर्ण त्रिलोकी माप ली थी तथा अभिमान-हीन मुनिजन जिनका निरन्तर ध्यान किया करते हैं उन आपके चरण-कमलोंको मैं नमस्कार करती हूँ ॥५१॥ जगतामादिभूतस्त्वं जगत्त्वं जगदाश्रयः ।<br>सर्वभूतेष्वसंयुक्त एको भाति भवान्परः ॥५२॥ | हे प्रभो ! आप ही जगत्के आदिकारण, आप ही जगत्-रूप और आप ही उसके आश्रय हैं, तथापि आप समस्त प्राणियोंसे पृथक् हैं और अद्वितीय परब्रह्मरूपसे प्रकाशमान हैं ॥ ५२ ॥ ओंकारवाच्यस्त्वं राम वाचामविषयः पुमान् ।<br>वाच्यवाचकभेदेन भवानेव जगन्मयः ॥५३॥ | हे राम ! आप ओंकारके वाच्य हैं तथा आप ही वाणीके अगोचर परम पुरुष हैं । हे प्रभो ! वाच्य-वाचक (शब्द-अर्थ) भेदसे आप ही सम्पूर्ण जगत्-रूप हैं ॥ ५३ ॥ कार्यकारणकर्तृत्वफलसाधनभेदतः ।<br>एको विभासि राम त्वं मायया बहुरूपया ॥५४॥ | हे राम ! आप अकेले ही बहु-रूपमयी मायाके आश्रयसे कार्य, कारण, कर्त्तृत्व, फल और साधनादिके भेदसे अनेक रूपोंमें भासमान हो रहे हैं ॥ ५४ ॥ त्वन्मायामोहितधियस्त्वां न जानन्ति तत्त्वतः।<br>मानुषं त्वाभिमन्यन्ते मायिनं परमेश्वरम् ॥५५॥ | आपकी मायासे जिनकी बुद्धि मोहित हो रही है वे लोग आपका वास्तविक रूप नहीं जान सकते । आप मायापति परमेश्वरको वे मूढ़-जन साधारण मनुष्य समझते हैं ॥५५॥ आकाशवत्त्वं सर्वत्र बहिरन्तर्गतोऽमलः ।<br>असङ्गो ह्यचलो नित्यः शुद्धो बुद्धः सदव्ययः॥५६॥ | आप आकाशके समान बाहर-भीतर सब ओर विराजमान, निर्मल, असङ्ग, अचल, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सत्यस्वरूप और अव्यय हैं ॥ ५६ ॥ हे विभो ! मैं मूढ़ और अज्ञानी स्त्री-जाति