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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः २ ] यागकाण्डम् २१५

सर्गः २ ] यागकाण्डम् २१५

ऊर्ध्वपादश्चोर्ध्वनेत्र और्ध्वस्यस्त्रिशिखास्तथा । वृद्धगौतममान्धाव्य पर्णादश्चन्द्रसंज्ञकः ॥३०॥ ऋष्यशृङ्गो मतङ्गश्च जाबालिः कुम्भसंभवः । दधीचिः शौनकः सूतः सुमन्तुश्च लोमशस्तथा ॥ ३१ ॥ वाल्मीकिश्चापि दुर्वासा मुनिर्वेदनिधिर्महान् । एते चान्ये च मुनयः स्वाशिष्यतनयादिभिः ॥३२॥ केचित्पर्णाशनाः केचिद्वायुभक्षास्तथाऽपरे । कुशाग्रजलपानाश्च केचित्त्यक्ताशनास्तथा ॥ ३४ ॥ भिक्षाशनास्तथा केचित् पादसाधनाः परे । अयाञ्चाव्रतिनः केचिन्नोक्तसंभाषणाः परे ॥३५॥ केचिद्वल्कलसंवीताः केचित्काषायवासिणः मृगचर्मधराः केचित् केचिदाकाशावासिणः ॥३६॥ वृक्षपत्रवस्त्राश्च केचित्पञ्चाग्निसाधकाः । धूमपानव्रताः केचित् केचित्त्यक्तेषणाः परे ॥३७॥ एवं नानावनागमंगिग्दिग्देशान्तरादिषु । रामिनस्ते समायाताः सदारश्च सबालकाः ॥३८॥ सशिष्या रामचन्द्रस्य द्रष्टु यज्ञोत्सवं वरम् दशदिग्भ्यो मुनिश्रेष्ठाः कोटिशश्च दिने दिने । ३९. तान्सर्वान् रामचन्द्रोपि प्रत्युत्थानासनादिभिः । मधुपर्कादिपूजाभिरतोषयाम्यम् सादरम् ॥४०॥ यज्ञवाटे महारम्ये कामधेनुं शुचन्तः पूजयामास विधिवत्सर्वसम्पन्नपि ॥४१॥ सुवर्णशृंगभूषाभिः किंकिणीनूपुरादिभिः । एव ता शोभयित्वाऽथ प्रार्थयामास राघवः ॥४२॥ धेनो सागरसम्भुते त्वमन्नानि द्विजादिकान् दानमहैंस्त्वमध्वरे मे प्रसीद जगदम्बिके ॥४३॥ एवं संप्राथ्यं तां कामधेनु रामः प्रणम्य च बबन्ध पाकशालायां पट्टकूलामनोपरि ।४४॥ अथ सा सुरभिस्तुष्टा षड्रसाश्नानि सादरम् ददौ जनकनन्दिन्यै सा देवान्पद्मकर्मणि ॥४५॥ नाग्निकार्यं च तत्रासीत् पाकशालासु चैकता । इच्छाशनेः सदा पुष्टा बभूवुर्मुनिपुंगवाः ॥४६॥


भृगु भार्गव बृहस्पति, पौष्य, कण्व एकाद, त्रिपाद, ऊर्ध्वपाद ऊर्ध्वनेत्र ऊर्ध्वस्य, त्रिशिखा वृद्धगौतम, पर्णाद, चन्द्रसंज्ञक, । ३० । ३१ ॥ ऋष्यशृंग, मतङ्ग, जाबालि, अगस्त्य, दधीचि, शौनक, सूत सुमन्तु, लोमश, वाल्मीकि दुर्वासा ये एकसे एक विद्वान मुनिगण तथा और भी कितने ही ऋषि अपनी स्त्री-पुत्रों तथा शिष्योंके साथ आज आ रहे थे ॥ ३२ । ३३ ॥ उनमें बहुतसे ऐसे थे, जो केवल पत्ते खाकर रहते थे। कोई वायु पीकर रहते थे। कोई कुशक अग्रभागमें जल लेकर पीते और उसस काल यापन कर रहे थे । कुछ ऐसे थे जो जिन्होंने भोजनको त्याग ही दिया था ॥ ३४ ॥ कुछ ऋषि भिक्षान्न खाते थे, कोई दूसरेके हाथसे भोजनको करते थे (अपने हाथसे आग नहीं छूते थे) और कितने ही ऐसे थे जो किसीसे माँगना पसन्द नहीं करते थे। कोई कोई तो किसीसे सम्भाषण ही नहीं करते थे ॥ ३५ ॥ कुछ मुनि वल्कल वस्त्र पहनते हुए थे कोई गेरुआ कपड़ा धारण किये थे, कोई मृगचर्म पहने थे और कोई दिगम्बर (नंगे) थे ॥ ३६ ॥ कुछ महर्षि वृक्षके पत्तोंसे शरीर ढके हुए थे, कोई पंचाग्नि तापनेवाले थे, कोई धूम्रपान (गाँजेऔर चरस) का यत्न किये थे और कोई-काई ऐसे थे, जिनकी सब प्रकारकी इच्छाएं समाप्त हो गयी थीं ॥ ३७॥ इसी प्रकार कितने ही अङ्गों वनोंको पर्वतों, किन्हीं और आश्रमोंके निवासी ऋषि अपनी स्त्री तथा बच्चोंके साथ वहाँ आ पहुंचे थे । ३८ ॥ रामचन्द्रके उस अश्वमेध यज्ञको देखनेके लिए दशों दिशाओंसे करोड़ों ऋषि इसी तरह अपने शिष्यादिकोंके साथ वहाँ प्रतिदिन आ रहे थे। रामचन्द्र भी उनका प्रत्युत्थान आसन, मधुपर्कादिसे पूजन तथा आदर करते थे ॥ ३९ ॥ ४० ॥ उसी यज्ञभूमिमें रामचन्द्रजी विधिवूवर्क अनेक वस्त्रों और आभूषणोंसे कामधेनुका पूजन किया। उसकी सींगे सोनेसे मढ़ाईं तथा किंकिणी और नूपुर आदि पहनाये। इसी तरह उसको अलंकृत करके रामचन्द्रजीने प्रार्थना की—॥४१ ॥ ४२ । हे क्षीरसागरसे उत्पन्न होनेवाली कामधेने तुम हमारे अतिथिरूपमें आये हुए ब्राह्मणों को अन्नादिक दानसे तृप्त रखना। हे जगदम्बिके ! तुम मेरेपर प्रसन्न होओ ॥ ४३। इस प्रकार विनती करके एक गलीचा बिछाकर भोजनशाला (रसोईघर) में ले आकर कामधेनुको बाँध दिया । ४४ । इसके पश्चात् उस सुरभीने प्रसन्न होकर आदरपूर्वक छहों रसके अन्न सीताको दिये । उससे पाकशालामें न तो कोई भट्ठी जलती थी और न कोई पदार्थ बनाया जाता था। लेकिन

२१६ आनन्दरामायणे [ सर्ग २

यन्त्यान्कामान् रामचन्द्रश्चिन्तयामास चेतसि । तांस्तानुभौ मणी शीघ्रं कल्पयामासतुर्द्रुतम् ॥४७॥ यथार्थान्ताऽपि यान् कामांश्चिन्तयामास चेतसि। कामधेनुर्ददौ तांस्ताञ्छीघ्रं त्रैलोक्यदुर्लभान् ॥४८॥ सर्वत्र यज्ञवाटे हि द्विजार्यैश्च समन्ततः। पङ्क्तिषु भूमिजादीनां परिवेषणकर्मणि ॥४९॥ स्त्रीणां कङ्कणनादश्च शुश्रुवे नूपुरध्वनिः। अथ रामश्च सौमित्रिं समाहूयेदमब्रवीत् ॥५०॥ सीमाचारान्समाहूय मम वाक्यञ्च सादरम् । आज्ञापयस्व शीघ्रं त्वं शासनं यन्मरोच्यते ॥५१॥ ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽश्रमी यतिः। यःकश्चिद्याममायाति पथिकः स समाज्ञया। ५२॥ निवारणीयो युष्माभिर्न कदाप्यध्वरे मम। ममाज्ञां न प्रतीक्षध्वं कोपः कार्यो न कस्यचित्। ५३॥ इति रामवचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स लक्ष्मणः। सीमाचारान समाहूय राघवोक्तं न्यवेदयत् ।५४॥ ततो रामः पुनः प्राहः समाहूयाथ लक्ष्मणम्। ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थाश्रमी यतिः। ५५॥ मुनीनां दायिनां दाराः शिष्याः सम्बन्धिनास्तथा। पौरा जानपदाश्चास्तु तेषां संबधिनः स्त्रियः ॥५६॥ दासीदासजनाः सर्वे यद्यद्वाञ्छन्ति लक्ष्मण। मामपृष्ट्वा तु सर्वेषां दातव्यं ह्यविचारितम् । ५७॥ अन्त्यजावधि सर्वान्हि तोषयस्व निरन्तरम् । न केषामभिलाषा च विफला हि विधीयताम् ॥५८॥ अयोध्यां कामधेनुं च जानकीं कौस्तुभं मणिम् । चिन्तामणिं पुष्पकं च राज्यं कोशादिकं च मे ॥५९॥ एतेष्वपि च यो यद्वै याचयिष्यति तन्नया। न दत्तं चेति वै श्रुत्वा ममानोषो भविष्यति ॥६०॥ अतो ज्ञात्वा भयं मत्तो दत्तस्व ह्यविचारत। याञ्चाभङ्गः कृतश्चेद्धि मन्छिरोद्रोहो भविष्यति ॥६१॥ सदा स्मर शिरं मे त्वमिमां लक्ष्मण सादरम्। इति रामकृतां शिक्षाङ्गीकृत्य स लक्ष्मणः ॥६२॥ तथा चकार तत्सर्वं यथा रामेण शिक्षितम् ॥६३॥ इति श्रीमन्महीपतिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यागकाण्डे लक्ष्मणाज्ञाकरणं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

वहाँपर आये हुए सब ऋषि इच्छ भोजन कर करके प्रसन्न हो रहे थे । ४५ । ४६ ॥ जिन जिन वस्तुओंको राम- चन्द्रजीने अपने मनमें चाहा उन सबको उनके दो मणियों (कौस्तुभमणि तथा चिन्तामणि) ने बातकी बातमें पूर्ण कर दिया ॥ ४७॥ इसी तरह सीताजीने जो कुछ चाहा, सो कामधेनुने त्रैलोक्यकी दुर्लभ वस्तुओंको भी देकर उनकी इच्छा पूरी की । यज्ञभूमिके चारों ओर जब ब्राह्मणोंक मण्डली भोजन करनेके लिए बैठती थी और स्त्रियाँ उनका भोजन परोसनेके लिए आती थीं तब उनके भूषणोंकी मधुर ध्वनि सुनायी देती थी। इसके तदनन्तर रामचन्द्रजीने लक्ष्मणको बुलाकर इस प्रकार समझाया - । ४८। ४९॥ ५०॥ हमारे यज्ञभूमिके आस- पास रहनेवाले निवासियोंको सादर बुलाकर हमारी तरफसे यह समझा दो कि आश्रम लेकर जो कोई ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ सन्यासी मुनियोंके पण्डितों, उनके वस्त्र, शिष्य सम्बन्धी, पुरवासी, देशनिवासी और उनके सम्बन्धी, जो कोई यहाँ आ जाय, उसे कोई न रोके । उसका सत्कार करनेके लिए मेरी आज्ञाकी प्रतीक्षा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ५१-५३ ॥ रामचन्द्रजीके आज्ञानुसार लक्ष्मणजीने सब आस-पासके निवासियोंको जाकर समझा दिया। कुछ देर बाद रामचन्द्रजीने फिर लक्ष्मणको बुलाकर कहा कि मुनियोंकी स्त्रियों तथा बच्चों आदिको अथवा दास दासियोंको जिस किसी वस्तुकी आवश्यकता हो, वह बिना मुझसे पूछे उनके इच्छानुसार देते जाओ ॥ ५४-५७॥ चाण्डालसे लेकर विप्रतक प्रत्येक प्राणीको सन्तुष्ट करो। किसी को किसी प्रकारका कष्ट न होने पाये। किसीकी कोई अभिलाषा विफल न हो। अयोध्या, कामधेनु, सीता, कौस्तुभमणि पुष्पक विमान, राज्य तथा कोशादिक इन सब वस्तुओंको भी देनेसे यदि तुमने इनकार किया तो मैं तुम्हारे ऊपर बहुत नाराज होऊँगा। इसलिए मेरे क्रोधसे डरते हुए बिना किसी प्रकारका विचार किये सब अभ्यागतोंको उनकी अभिलषित वस्तुएँ देते जाओ। तुम किसीकी माँग खाली करोगे तो तुम्हें मेरा सिर काटनेका पातक लगेगा ॥५८-६१॥ हे लक्ष्मण ! सदा मेरी इन बातोंका ख्याल

सर्गः ३ ] यागकाण्डम् २१७

सर्गः ३ ] यागकाण्डम् २१७


तृतीयः सर्गः

(रामके यज्ञीय अश्वका सब ओर घूमकर अयोध्या लौटना)

श्रीरामदास उवाच

अथ मुक्तस्तदा वाजी राघवेण महात्मना । यज्ञांगः श्यामकर्णः स पूर्वदेशं ययौ जवात् ॥१॥
शत्रुघ्नेन च सैन्येन प्राप्तो भागीरथीपटम् । एतस्मिन्नन्तरे रामः स्वप्रतापं प्रदर्शयन् ॥२॥
चकार कौतुकं तत्र शत्रुघ्नस्य पुरो महत् । ब्रह्मावर्ते महादेशं त्यक्त्वा गङ्गातटं प्रति ॥३॥
यावत्प्राप्ताः श्यामकर्णश्चावदामूर्द्धनेर्निधा । गङ्गायां च महापूरो यत्र नौकाऽपि कुण्ठिता ॥४॥
शत्रुघ्नेनापि तद्दृष्ट्वा कुण्ठितां गतिमीक्ष्य च । कालानिक्रमभीत्या स निश्चिन्तं व्यचिन्तयन् ॥५॥
आदावेवापि मे विघ्नमुत्पन्नं गमने महत् । ग्रामे प्राथमिके यद्वन्मक्षिकापतनं तथा ॥६॥
तदीदानीं रामचन्द्रप्रतापेनास्तु मे गतिः । निश्चित्येत्थं स शत्रुघ्नो रथस्थो जाह्नवीतटे ॥७॥
स्थित्वा प्रोवाच गङ्गां प्रतिपूज्य मवित्वरम् । शृण्वन्तु सर्वलोकेषु मुनिदेवगणेषु च ॥८॥
देवि गङ्गे महापुण्ये यदि सत्यं शृणुष्वमे । दीयतां तर्हि पंथा मे शीघ्रं सैन्ययुतस्य च ॥९॥
इति शत्रुघ्नवचनं श्रुत्वा सा जाह्नवी तदा । स्ववेगं मंदयामास इरोदरं चाप्रदर्शयत् ॥१०॥
पद्भित्रोंऽजो तदा शीघ्रं परं तीरं ययौ क्षणात् । तथा सैन्येन शत्रुघ्नः ससुमन्त्रः ममाययौ ॥११॥
मागधाख्यं महादेशं स एव कीकटः स्मृतः । पूर्वरूपं महापूरो जाह्नव्यां मयभूव ह ॥१२॥
प्रतापं रामचन्द्रस्य सर्ववुद्ध्या महाद्भुतम् । चक्रुन्ते जयशब्दांश्च सीतारामस्यच मुहुः ॥१३॥
श्यामकर्णस्ततः शीघ्रं ययौ पूर्वांदिशं प्रति । मगधेशो नृपश्चाथ श्रुत्वा तुरंगमागतम् ॥१४॥
प्रत्युज्जगाम सैन्येन पुरुरुन्द्याथ वारणम् । निनायाश्वं पठित्वा मङ्गलपत्रं पुरं निजम् ॥१५॥


रखना भूलना नही। रामचन्द्रजीका शिक्षाका अनुकरण करके लक्ष्मणजीने वैसा ही किया, जैसा रामने कहा था ॥ ६२।६३ ॥ इति श्रीशतकोटिपरिमितहरिकथामृतान्तर्गतानन्दरामायणे राज्यकाण्डेयश्वमेधविधौत 'ज्येत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते यागकाण्डं लक्ष्मणाज्ञाकरणं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

श्रीरामदासजी फिर कहने लगे—रामचन्द्रजीके द्वारा छोड़ा हुआ वह यज्ञका अङ्गरूप श्यामकर्ण घोड़ा अयोध्यासे बड़े वेगके साथ पूर्व दिशाकी ओर चला ॥ १ ॥ पतन चलते शत्रुघ्न, सुमन्त तथा विशाल सेनाके साथ वह अश्व जाकर भागीरथी गङ्गा तटपर पहुंचा। इधर रामचन्द्रजीने अपना महिमा दिखाकर इच्छासे शत्रुघ्नजीके सामने एक विचित्र कौतुक उपस्थित किया वह यह कि ब्रह्मावर्त देशको छोड़कर गङ्गातट पहुंचत-पहुंचते उनके कान जा जुड़ा औ बन था वह सब समाप्त हो गया। गङ्गाका बाढ़से एक स्थानपर उनकी नौका भी रुक गयी ॥ २-४ ॥ शत्रुघ्न उस दारुण समयको देखा तो देर हो जानेके भयसे मन ही मन सोचने लगे और 'पहिले ही आवाम इतना बड़ा विघ्न आ पहुंचा। यह वही कहावत चरितार्थ हुई कि 'पहल ही ग्रासमे मक्खी आ गिरी' ॥ ५ । ६ ॥ अब मुझे इस समय केवल रामचन्द्रजीके प्रतापका भरोसा है। उसीसे मेरा निस्तार होगा । इस प्रकार निश्चय करके शत्रुघ्नजी रथपर बैठे ही बैठे जाह्नवीके तटपर आकर कहने लगे—॥ ७ ॥ हे महापुण्यशालिनी गंगे ! यदि आप यदि भगवान् रामचन्द्रजी सच्चरित्र हो तो आप सेनासहित मुझे रास्ता दे दीजिए । ८ । ९ ॥ इस प्रकार शत्रुघ्नके वचनको सुनकर गङ्गाजीने वेगको मन्द करके अपने मध्य भागसे शत्रुघ्नको रास्ता दे दिया । १० ॥ तब क्षणभरमें घोड़े और पैदल सैनिक चलकर गङ्गाके उस पार पहुंच गये । इस तरह समन्य शत्रुघ्न सुमन्त्रके साथ मगधदेश मध्यम जा पहुंचे, जिस देशको कीकट भी कहते है उन के घोड़े पार उतर जानेके बाद गङ्गाका प्रवाह पूर्वरूप वेगवान् हो गया॥११ ।१२॥ मगधनिवासी लोग रामचन्द्रके अद्भुत प्रतापको समझकर सीतारामके नामके जयजयकार करने लगे ॥ १३ ॥ वहाँसे अश्वमेध यज्ञके लिए छोड़ हुआ श्यामकर्ण घोड़ा पूर्व दिशाकी ओर चला। राजा मगधेश घोड़ेको आया हुआ सुनकर हाथीकी सवारीपर चढ़ तथा सेनाको लेकर अगवानीके लिए गये । घोड़ेके मस्तकपर बँधे हुए पत्रको पढ़कर उसकी नगरमें ले गये

२१८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

पूज्यादरात्स्वमर्त्यै तं शत्रुघ्नं विभवैर्निजैः । समस्तं निजकोशादि समर्प्य मघवाधिपः ॥१६॥ पौराञ् जानपदान्स्वस्त्रीः सुहृद्बान्धवमन्त्रिणः । पौरपत्नीर्जानपदपत्नीर्विप्रान् पुरोधसम् ॥१७॥ प्रेषयामास यानेने वाहनेश्च प्रति । स्वयं सैन्येन तुरगचरणान्नुलक्ष्य च ॥१८॥ शत्रुघ्नस्यागुवर्ती बद्धहस्तपुटो ययौ । एवं सर्वेऽपि राजानो ज्ञातव्याः सर्वदिक्स्थिताः ॥१९॥ न केनापि श्यामकर्णो बद्धो नृपतिना भुवि । इन्द्राद्यैर्निर्जरैर्नापि नासुरैः कदाचन ॥२०॥ ततो बाजी पूर्वदेशान्वङ्गवङ्गकलिङ्गकान् । तथा नानाविधान्देशान् विलंध्य जलधेस्तटम् ॥२१॥ दृष्ट्वा नृपकुलैर्युक्तो दक्षिणाभिमुखो ययौ । गोदावरीं नदीं तीर्त्वा देशांश्च च द्राविडम् ॥२२॥ अतिक्रम्यारवारारुणं देशं समतिक्रम्य च । काञ्चीप्रदेशान्सकलान्वंशन्नानाविधान्त्सुभान् ॥२३॥ कावेरीं समतिक्रम्य चोलदेशं विलङ्घ्य च सेतुबन्धं ततो दृष्ट्वा पश्चिमाभिमुखो ययौ ॥२४॥ ताम्रपर्णीं विलङ्घ्याथ समतिक्रम्य केरलान् । त्रिषट्प्रकारान् देशांश्च गोकर्णं च ततो ययौ ॥२५॥ कृष्णातौरप्रदेशांश्च समतिक्रम्य घोटकः । कर्णाटकं महादेशं समतिक्रम्य सत्तरम् ॥२६॥ कोंकणं समतिक्रम्य तत्तद्देशनृपैः सह । भीमान्देशान्म सकलाञ्छ्यामकर्णः शुभावहः ॥२७॥ पश्यन् ययौ महाराष्ट्रं गौतमीं तां विलङ्घ्य च । विदर्भ समतिक्रम्य ययावाभीरमंडलम् ॥२८॥ मालवं समतिक्रम्य तीर्त्वा पुण्यां महानदीम् । वीर्त्वा स श्रमनीं पुण्यां समतिक्रम्य गुर्ज्जरम् ॥२९॥ प्रभासं च ततो गत्वा ययावानर्त्तमुत्तमम् । सौवीरान् समतिक्रम्य ययौ बाजी स माधुरान् । सौराष्ट्रान्व्यतिक्रम्य मरुदेशं ययौ हयः ॥३०॥ धन्वदेशमतिक्रम्य ययौ सारस्वतातटम् । मत्स्यान् देशानतिक्रम्य ययौ बाजी म माठरान् ॥३१॥ शूरसेनानतिक्रम्य पांचालांस्तुङ्गरो ययौ । कुरुक्षेत्रं ततो गत्वाऽतिक्रम्य कुरुजांगलान् ॥३२॥ देशं कैकेयमुल्लंध्य ययौ काश्मीरमुत्तमम् भिल्लदेशं गौडदेशं यवनदेश ययौ हयः ॥३३॥ यवनांम्नाग्रदेशांश्च समतिक्रम्य वेगतः । पश्यन्नानाविधान् देशान् करतोयातटेन वै ॥३४॥

और बडे आदरके साथ अपनी संपत्तिसे शत्रुघ्नकी पूजा की । समस्त निज कोषादि शत्रुघ्नको अर्पण करके पुरवासियोंको, अपने कुटुम्बको, जनपदवासियोंको एवं अपन मित्र-बान्धवोंको वाहनांक साथ अश्वमेध यज्ञमें अगाड्या भेज दिया । किन्तु स्वयं सेनाके साथ जनुघ्नके दनुवर्ती होकर गणीय अश्वके चरणोंके लक्ष्य करके साथ-साथ चले । इसी तरह सब देशोंके राजा लोग शत्रुघ्नके वशवर्ती होकर अश्वके पीछे-पीछे चले ॥ १४-१९॥ पृथ्वीपर किसी भी राजाने श्यामकर्ण घोडंको नहीं बाँधा, न स्वयमें इन्द्रादि देवताओने और न पाताललोकके असुरोने उसे बाँधा । २० ॥ उसके बाद घोडा वङ्ग वङ्ग-कलिङ्गादि अनेक देशोंमें होता हुआ समुद्रतटपर पहुंचा । २१ ॥ बहसि नृपसमूहके साथ यह दक्षिण दिशामे गया । फिर गोदावरी नदीको पार करके आध्र, द्रविड, कारवार नामक देशोका अतिक्रमण करक नाना प्रकारके मनोहर प्रदेशोंमें घूमता हुआ कावेरी नदीको पार करके चोलदेशमें जा पहुंचा । वहांसे समुद्रतटपर सेतुबन्ध रामेश्वर होकर पश्चिम दिशामे गया ॥ २२-२४ ॥ बहसि वह घोड़ा ताम्रपर्णी नदीको लांघ तथा केरल देशका अतिक्रमण करके गोकर्ण तीर्थम जा पहुंचा ॥ २५ ॥ वहांसे कृष्णा नदी उतरकर वह घोड़ा कर्णाटकमें पहुंचा ॥ २६ ॥ वहाँसे कोंकण देशको पार करके सत्तरेशीय राजाओके साथ भीमा नदीको लांघता हुआ महाराष्ट्रमे जा पहुंचा ॥२७॥ वहाँपर गौतमी नदीको लांघकर विदर्भ देशमे होता हुआ आभीरमण्डलमे पहुँचा ॥ २८ ॥ वहाँस मालवा होता हुआ महानदी पुण्याका अतिक्रमण करके गूज्र्जरम पहुँचरा ॥ २९ ॥ वहाँसे प्रभास तीथम अ.कर आनत्त देशको गया । फिर सोवार आदि देशोंको पार करके घोड़ा मथुरा प्रदेशम गया । वहाँस सौराष्ट्र देशको लांघकर मरु-देश ( मारवाड ) में पहुंचा ॥ ३० ॥ उसके बाद धन्व नामक देशका अतिक्रमण करके सरस्वतीके तौरपर गया । वहाँसे मत्स्य देशमे घूमता हुआ माठर देशमें गया । ३१ ॥ उसके बाद वह श्यामकर्ण घोड़ा शूरसेन, पञ्चाल, कुरुक्षेत्र, जांगल एवं कैकय देशमें भ्रमण करता हुआ कश्मीर गया । वहाँसे भिल्लदेश,

सर्ग ११ ] यागकाण्डम् २१९

सर्ग ११ ] यागकाण्डम् २१९

ययौ वाजी वायुगत्या शीघ्रं ज्वालामुखों प्रति । दोषभास्यां फल्गोयां वीक्षा नैवाद्रतो गतः ॥३५॥ कर्मनाशाजलस्पर्शात् फल्गोराचमनात्। गंडक्यां बहुनागाधर्मः स्खलति कीर्तनात् ॥३६॥ हरिद्वारं ययौ बाजी ततो गङ्गातटेन हि। हिमाद्रेः सन्निधौ देशान् समतिक्रम्य वेगवान् ॥३७॥ बद्रिकाश्रममालोक्य कलापग्रामवासिभिः। संमानितस्तदा बाजी गत्वा तन्मानसं सरः ॥३८॥ दृष्ट्वा हरिसरक्षेत्रं मिथिलां प्राप सेनया। नानादेशानतिक्रम्य ह्यर्यावर्तं ययौ हयः ॥३९॥ दृष्ट्वा काशीं त्रिवेणीं च शतंर्वादीं ययौ जवात्। शृङ्गवेरपुरं गत्वा तमसां तां विलंघ्य च ॥४०॥ सरत्वा च नैमिषारण्यं समुल्लंघ्याथ गोमतीम्। ब्रह्मावर्ते सरो गत्वा पश्यन् देशान् मनोरमान् ॥४१॥ कोसलाख्यं महादेशं दृष्ट्वा बाजी मनोहरम्। ततः साकेतविषये यय्वभौ प्राप वाश्वरम् ॥४२॥ नानादेशनृपैः सार्धं शत्रुघ्नेनाभिरक्षितः। अगात श्यामकर्णं तं श्रुत्वा सीतापतिस्तदा ॥४३॥ आज्ञापयच्च सौमित्रिं सोऽपि प्रत्युज्जगाम तम्। पञ्चेन्द्रं पुरस्कृत्य मेरीदुन्दुभिनिःस्वनः ॥४४॥ ऋत्विग्भिर्वेदवेदांगपारगैर्जगैः। संपूज्याथ श्यामकर्णं नृपतींश्च सविस्तरम् ॥४५॥ मानयामास सौमित्रिः शनैरध्वरमण्डपम्। महात्मरो महान् सन्मदा तुरङ्गदर्शने ॥४६॥ दशयोजनपर्यन्तं सर्वत जनसंकुलम्। व्याप्तं सर्वं ततोऽप्योषपात्रहिंतृवर्णसंसदा ॥४७॥ हय सर्वत्र रक्षन्तः पूर्वसंदर्शिताञ्जनान्। पौरान् जानपदान्त्रांश्च बहुसंधा अमरापमाः ॥४८॥ मैन्चन् वभ्रमुः सर्वे स्वीयदर्श नकामुकाः। न प्रापुःशन तेषां उनीपेऽध्वरमण्डपे ॥४९॥ केचिचे दर्शनं स्वानां प्रपुष्यत्र परेऽहनि। केचित्तृतीये दिवसे पंचमे सप्तमेऽथ वा ॥५०॥ केचिद्दूरद्वियोगेन प्रापुः स्वानां दर्शनम्। केचित् पक्षानन्तरं हि मासेनानन्तर जनाः ॥५१॥ केषां वियोग एवापाद्दिग्भ्रमात् तदानुचर। तज्ज्ञात्वा रामचन्द्रोऽपि लक्ष्मणं प्राह सादरम् ५२।


चौहद्दर, कुरुक्षेत्र, ज्वालामुखी देश एवं मानसरोवर निमन्त्रण करता हुआ तथा उक्त तटवर्ती नानाविध मनोहर दृश्योंको देखता हुआ बड़े वेगसे ज्वालामुखक पावर्ती प्रदेशमें गया ॥ ३५-३८ ॥ वहाँसे कुरुक्षेत्रादि प्रदेशोंको पार करके अवध प्रदेश में आ गया। क्योंकि कर्मनाशा नदीका स्पर्श करनेसे, फल्गु नदीका आचमन करनेसे, गंडकी नदीकी बहुधा द्वारा तरंग और धार्मिक कर्म करके उसका आचमन करनेमें धर्मका क्षय होता है ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ यहाँसे वह गङ्गाके तट ही तट होकर हरिद्वार गया। पश्चात् हिमालयके प्रान्तमें जाकर बद्रिकाश्रम पहुँचा। वहाँसे कलापग्रामनिवासियोँका आतिथ्य सत्कार वह पाण्डि आर्यावर्त देशमें गया ॥ ३७-३९ ॥ वहाँसे काशी और गङ्गाके तटपर घूमता हुआ वेगपूर्वक अवधदेशमें गया। फिर शृङ्गवेरपुरमें जाकर तमसाको पार करके नैमिषारण्यमें गया। वहाँसे गोमती और ब्रह्मावर्त सरोवरको जाकर मनोहर दृश्योंको देखता हुआ कोसल देशमें पहुँचा। इस प्रकार सब ब्रह्माण्डको घूमता हुआ वह अश्व फिर अयोध्याके निकटवर्ती अश्वमेधके यज्ञमण्डप में पहुँचा ॥ ४०-४२ ॥ अनेक देशके राजाओंके साथ शत्रुघ्नसे अभिरक्षित दशार्योहित हुआ श्यामकर्ण अश्वको आया हुआ सुनकर सीतापति रामचन्द्रजीने उसको लानेके लिए लक्ष्मणको आज्ञा दी। लक्ष्मणजी हाथीपर बैठकर बड़े उत्साहके साथ उसकी अगवानी करनेके लिए गये, ऋषियोंयुक्त सब मण्डलपालों और राजाओंकी पूजा करके उस अश्वसहित यज्ञमण्डपमें ले आये। उस समय घोड़ेका देखनेके लिए प्रजावर्गमें बड़ा उत्साह था ॥ ४३-४५ ॥ यज्ञारम्भके समय अयोध्याके बाहर दस योजनतक सम्पूर्ण पृथ्वामण्डलके संग्रामी, राजाओं तथा अमीर-उम-रावोंसे भरा था ॥ ४७ ॥ यजन होता ही था कि श्यामकर्ण अश्वके साथ भ्रमण करके लौट हुए राजा लोग पहिलेसे बहुमूल्य अपने-अपने शुभ आश्रयको त्यागकर तुरन्त उसको देखनेकी इच्छामें इधर उधर घूमने लगे पर उस प्रकारनिक जनसमुदायमें उन लोगोंका प्राप्त नहीं कर सके ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ कोई परिजन सज्जन दूसरे दिन मित्र-बान्धवोंसे मिल सका। कोई तीसरे दिन कोई पांचवें रोज और कोई सातवें रोज मिला ॥ ५० ॥ किसीकोके मण्डपका द्विविध स्वतंत्रतोंका पता चला। किसीको एक पखवाड़ेके बाद और किसीको एक माहके बाद पता लगा ॥ ५१ ॥ किसीको वियोगका फल पता ही नहीं लगा। यह सुनकर भगवान रामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे

२२०आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

परस्परं वियोगोऽत्र संमर्देन तु लक्ष्मण जायते तत्र युक्तिं त्वं मत्तः श्रुत्वा कुरुष्व ताम् ॥५३॥
तमसायास्तटे शालां कृत्वाऽथ महतीं शुभाम् घोषणां च सर्वत्र महादुन्दुभिनिःस्वनैः ॥५४॥
येषां वियोगस्तैर्गत्वा तमसातटशोभिनाम् । शालां प्रवेश्यध्वं द्वि स्वानां योगोऽस्तु तत्र हि ॥५५॥
चतुष्पदादिवस्तूनि ज्ञात्वा यस्य लघून्यपि । तत्रैव स्थापनीयानि स्वं स्वं गृह्णन्तु ते जनाः ५६॥
इति रामवचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स लक्ष्मणः तथा चकार तन्मर्त्यं येन योगः परस्परम् ॥५७॥
सर्वे तत्र जनाः प्रापुः स्वानां स्त्रीबालमित्रिणाम् । चतुष्पदादिवस्तूनां तत्र लाभो बभूव ह ॥५८॥
यत्किंचिद्विस्मृतं येन दृष्ट्वाऽन्येन च कदा । शालायां स्थापितं दृष्ट्वा स्वयं जग्राह तत्र सः ॥५९॥
एवं श्रीरामयज्ञे हि संमर्दः संबभूव ह । न तत्र शुश्रुवे शब्दः कर्णेऽप्युक्तो जनैस्तदा ॥६०॥
तत्तन्ते पार्थिवाः सर्वे तस्थुर्वेश्मनरास्रसु ॥६१॥
इति शतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानंदरमायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे अश्वगमनं नाम तृतीयः सर्ग ॥ ३ ॥


चतुर्थः सर्गः

( रामका कुम्भोदर मुनिसे साक्षात्कार )
श्रीरामदास उवाच

अथ ते ऋत्विजः सर्वे मंगलैर्विधिभिः शुभैः । सम्यक् प्रवर्त्तयामासुर्वाजिमेधं यथाविधि ॥ १ ॥
तत्रर्त्विजो वाजिमेधे रत्नक्रीडेशयाम्बराः । मसदृश्या विरेजुस्ते यथा वृत्रहणोऽध्वरे ॥ २ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सुरैयसहितैः सुरैः । स्वामिना विघ्नराजेन पार्वत्या वृषमस्थितः । - ।
महेश्वरो यज्ञवाटं रामाहूतो ययौ गणैः । शिवमागतमाज्ञाय प्रत्युद्गम्याथ लक्ष्मणः । ४ ।
वारणेंद्र पुरस्कृत्य पताकाध्वजसंरणैः । नानाव्याद्यसुघोषश्च वारस्त्रीणां प्रनर्त्तनैः , ५ ॥


कहा—॥ ५२ ॥ यहाँ भीडके कारण परस्पर लागोंका वियोग हो जाता है। अतएव मैं एक युक्ति बतलाता हू। उसको करो । ५३ ॥ तमसा नदीके तटपर एक बड़ी आगे शाला बनवाओ और दुन्दुभी पिटवा दो कि भूले-भटकोंको खोजना हो तो तमसा नदीके तटपर जहाँ नयी शाला बनी हुई है, वहाँ जाओ । वहींपर भूले-भटकों-को लोग पाओगे ॥ ५४ । ५५ । लागोंको अशीम लकर छांटा छांटी का खोयी हुई वस्तुएँ स्वाजखाजकर वहाँ रखी हैं। वहाँ जिस-जिसकी जो-जो वस्तु हो, वह अपनी-अपनी वस्तु ले ले। इस प्रकार रामजीके वचन सुनकर लक्ष्मणने कहा—अच्छा महाराज ! ऐसा ही करूँगा । इसके बाद लक्ष्मणजीने ऐसी व्यवस्था की, जिससे सबका अपने वियुक्त बान्धवोंसे मिलाप होने लगा । ५६ । ५७ । वियुक्त बन्धु वहाँ गये और सबको अपने अपने स्त्री-पुत्र-मित्रादि और नतुष्पदादि पशु सभी खोई हुई चीजें मिल गयी। जहाँ-कहींपर जिससे जो वस्तु भूलसे छूट गई, उस वस्तुको राजानुचरोंने तथा जिसने देखी एंव जिसको मिली, उसने वहीं शालामे रखवा दी और जिसकी वह वस्तु थी, उसने वहाँ जाकर ल ली । ५८ ॥ ५९ ॥ इस प्रकार श्रीरामजीके यज्ञम एसी भीड़ हुई वि जिसके कारण कानमे कहा हुआ भी शब्द मनुष्योंको नहीं सुनाई पड़ता था । ६० ॥ सब भगवान्‌के दर्शन करके सब राजा लोग अपने-अपने स्त्री-पुत्र मित्रादिकोका लेकर अलग अलग तम्बूओं (खेमों) में रहने लगे । ६१ । इति श्रीमशतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीय यागकाण्डे अश्वगमनं नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

श्रीरामदास कहने लगे इसके अनन्तर सब ऋत्विक् मंगलमय कृत्योंके साथ-साथ शास्त्रानुसार अश्वमेध यज्ञ करवाने लगे ॥ १ ॥ उस समय यज्ञमें रत्नमय आभरणों और वस्त्रोंको पहिने हुए ऋत्विक् ऐसे सुशोभित हो रहे थे, जैसे इन्द्रके यज्ञम सुशोभित होते थे ॥ २ ॥ उसी समय वहाँ रामज क बुलावेसे बैलपर चढ़कर महादेव और पार्वतीजी आयीं । उनके संग इन्द्रादि देवता, स्वामिकार्तिकेय, गणेशजी एवं प्रमथादि सब गण भी आये ॥ ३ ॥ महादेवजीका आगमन सुनकर सम्पूर्ण नगर ध्वजा-पताका आदिसे सजाया गया ।

पादप्रक्षालनं शम्भोश्चकार मैथिली प्रभुः । स्वनाभिप्रजया गङ्गा गङ्गादिनिलया ॥ ८॥

सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् २२१


संपूज्य शंकरं भक्त्या चानयामास मण्डपम् । एवं सह पदान्यग्रे गत्वा समोद्य शंकरम् ॥ ६ ॥
नमस्कृत्य समानीय निवेश्य गिरिजाधवम् । हेमपात्रे भवेद्भक्त्य हेमपात्रे स्वहस्ततः ॥ ७॥
पादप्रक्षालनं शम्भोश्चकार मैथिली प्रभुः । स्वनाभिप्रजया गङ्गा गङ्गादिनिलया ॥ ८॥
जलधारां यथायोग्यां प्रोक्षयामास जननः। रामेने गता सीता दृष्ट्वा दद्युगणस्तदा ॥ ९॥
अनिमेषाः कंजनेत्रकटाक्षाः मन्दिगतय हि। तन्मयेऽनेधमः सम्मन्न न विदुः के वयं स्थित ॥ १०॥
तुष्टुवुस्तत्र कपिने सुराः श्रीरामयं मुदा। गन्धर्वा तुष्टुवुः केचित् प्रबद्धकरसम्पुटाः ॥११॥
एवं निर्जङ्गमानां मनोपस्त्वं ई शभूत्। अतोवस्य नयेद्दृष्ट्वा रूपं कोटिरविप्रभम् १२॥
अथ रामः सीतया हि शंकरं गिरिजापतिम् । स्वयं मपूज्य सकलान् देवान् सौमित्रिणा ऋषीन् ॥१३॥
पूजयित्वाद्वयंवोढाख्यं शङ्करं लोकशङ्करम् अद्य धन्योऽस्म्यहं दद दर्शनात्तत्र सीतया ॥१४॥
अद्य मे सूर्यवंशेऽस्मिन् जन्म सफलयतः शतम् इति रामस्य वचनं श्रुत्वा स शशिभूषणः ॥१५॥
विहस्य राघवं प्राह वेद्मि मायां हरे तव त्वन्तः सिक्तपले ब्रह्मा ज्ञानस्तस्मात्पुनाभवः ॥१६॥
मरीच्याद्याः मरुद्भृतुः पौत्राः सप्राहतांगजः। मरीचेः कश्यपः पुत्रः सूर्यस्तनिशंशवापकः ॥१७॥
कश्यपात्सविता जज्ञे पौत्रपौत्रम्वरं प्रभा। रवेरत्रानः सूर्यवंशस्तद्वंशे तव जन्म वै ॥१८॥
मद्दंशसम्भवः सूर्यः किं मां मोहयसि प्रभो देवानां कार्यसिद्धयर्थमवतीर्णोऽसि मायया ॥१९॥
कुरु क्रीडां यथेच्छं त्वं यात्रापञ्चारिकीर्मुखैः शिक्षां करोषि लोकानां बहुभ्यहं रोहिते तव ॥२०॥
इति श्रुत्वा शंभुवाक्यं माहागर्वी विहस्य च यज्ञकुण्डसमीपे तु तस्थतुर्गुह्यसन्निधौ ॥२१॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र समाजग्मुः सहस्रशः गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धास्तथा चाप्सरसां गणाः॥२२॥
लोकपालाश्च दिक्पालाः रमानलतिरोहिताः। नवग्रहाः षटृतवः पश्चिनस्थमगस्तथा ॥२३॥


वेश्याओक नाना प्रकारके नाच और अनेक तरह बाजे-गाजके साथ हाथीपर रहकर लक्ष्मणजी उनकी अगवानीके लिए गये ॥ ४॥ ५। व भक्तिपूर्वक शङ्करभगवान्‌का यज्ञमण्डपम ल आए। राजाज भा उनको आते देखा तो पाँव सात पग आगे बढकर शङ्करजीको प्रणाम किया शिव-पार्वतीका सत्कार करक सुवर्णमय सिंहासनपर बैठाया। सत्कार मद्य सदा रामने अपने हाथ स्वर्णखचित एक बडे मणक पात्रम दोनोंका पादप्रक्षालन किया। सवन न० के मस्तकपर गिरिजेश जलदान करते। सम्मुख देवतागण निमेष रहन नेत्रों से उन दोनोंकी अनुपम शोभा देखकर चित्तिलखित-से होगए उनका यह तक ज्ञान नही रहा कि वे कौन हैं। ६-१०। उस समय दवगण मुदित होकर श्रीरामचन्द्र और माता जानकीकी स्तुति करने लगे ॥ ११॥ इस प्रकार मन्त्रिगण भी जानकी कविके समान प्रभावाली अनुपम सौन्दर्य देखकर देवताओंका अभाव प्रसन्नता हुई ॥ १२॥ इसके बाद सीता और लक्ष्मणजी सहित रामजीने शिव-पार्वती तथा सब देवताओंकी पूजा का ॥ १३॥ सर्व सुख कल्याण कत्तव्य से शङ्करकी पूजा करके रामजी कहने लगे-हे भगवन् ! आज में धन्य हुआ॥ १४। आज भयंकर सूर्यवंश में जन्म लेने से मेरा जन्म धारण करना सफल हुआ। इस प्रकार रामजीक बचन सुनकर शशिशेखर श्री शङ्करजी ने कहा-हे राघव ! आपकी मायाको मैं जानता हूँ। आपके नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए और उस ब्रह्मासे सम्पूर्ण मुनिगण उत्पन्न हुए हैं ॥ १६॥ उन निष्पाप मरीचि प्रभृति म० मुनि उत्पन्न भये और उन मुनिगणों से सपूर्ण सृष्टि की विस्तृत किया ॥ १७॥ उन कश्यपके पुत्र सूर्य हुए। इस प्रकार आपके पौत्रक परम्परासे सूर्यवंश बना। उस सूर्यवंशम आपका जन्म हुआ यह सब आपकी माया ही है। किस प्रकार मुझे अपनी मायाजालमें फँसाते हैं? आप अपनी मायासे देवताओं के कार्यसिद्धि के लिए पूर्णरूप अवतीर्ण हुए हैं ॥ १८ ॥ १९ ॥ यात्रा-यज्ञादि कौतुकसे आप यथेच्छ क्रीड़ा करिये। में आपकी सब चष्टाओंको समझता हूँ। आप संसारको शिक्षित करनेके लिए ही ऐसा करते हैं। २०। इस प्रकार शिवजीके कथनको सुनकर सीता और रामजी हंसे। तदनन्तर वे यज्ञकुण्डके समीप स्थित गुह वसिष्ठक पास गये ॥ २१॥ इसी समय हजारों यक्ष, गन्धर्व, किन्नर,

२९२आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

ऋक्षाणि तिथयो योगा करणानि च राशयः । पर्वताम्भरसः सर्वे सागराश्च नदा अपि ॥२४॥ सरोवराणि नद्यश्च वाप्यः कूपह्रदास्तरे । धृत्वा जगद्रूपाणि ययुस्ते यज्ञमण्डपम् ॥२५॥ समागतश्च संपातिर्गुहो मकरध्वजः । प्रहायौ च लङ्काया राक्षसेश विभीषणः ॥२६॥ आतिना राघवेणापि सर्वं तस्थुः प्रपूजिताः । स्वनिर्दिके स्थापिताः पूर्व सर्वेश्वाभूर प्लवंगमाः ॥२७॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र समायातो मुनीश्वरः । कुम्भोदरो महातेजाः सीमाचार्यावलोकितः ॥२८॥ तं दृष्ट्वा भयभीतास्ते सर्वे प्रोचुः परस्परम् । हा कष्टं पुनरायातः सोऽय कुम्भोदरो मुनिः ॥२९॥ यात्राम्रमो राघवस्य यन्निमित्तो बभूव ह । यद्वाक्यादश्वमेधोऽपि सर्वेषां संबभूव ह ॥३०॥ महान् भ्रमांशपपुष्टे तु श्रमणो जगतीतले । अधुनाऽपि समायातः किमग्रे वै पुनर्भवेत् ॥३१॥ कुप्येत न तदृष्टो राघवस्यापि निंदकः । एवं नानाविधा वाचः सीमाचारगणोरिताः ॥३२॥ शृण्वन् कुम्भोदरस्तूष्णीं ययौ यज्ञभुवं प्रति । सदागमनपूर्वे स सीमाचारैर्निवेदितः ॥३३॥ धावद्भिर्वेपमानैश्च स्थलाद्गामिश्चरान्वितैः । राम राम महाबाहो हे लक्ष्मण शृणु प्रभो ॥३४॥ यात्रायज्ञश्च यद्वाक्यात् समायातः स वै पुनः । कुम्भोदरो मुनिश्रेष्ठो राम त्वय्यपि निष्ठुरः ॥३५॥ तद्द्तवचनं श्रुत्वा सर्वे तद्दर्शनात्सुकाः । त्यक्त्वा स्वीयानिकर्माणि चोत्सुरुस्तद्दिक्षया॥३६॥ ऋत्विजो राघवः सीता न भयं सेजिरे मुनेः । कुम्भोदरो यज्ञवाटं ययौ सर्वविलोकितः ॥३७॥ अतिखर्वः स्थूलशिराः श्याम्यरूपः महोदकः । स्थूलोदरः पिंगनेत्रः सर्पपाना जटाधरः ॥३८॥ चीरवासाः खर्वपादः खर्वहस्तो महामुनिः । पुरा किंचित् श्मश्रुयुक्तो धृतदण्डकमण्डलुः ॥३९॥ तं दृष्ट्वा सकला लोका भयं प्रापुः स्वचेतसि । पूर्वकर्म च संस्मृत्य श्रुत्य च परस्परम् ॥४०॥ एतस्मिन्नन्तरे रामः शीघ्रं प्रत्युद्जगाम तम् । मार्तण्डं प्रणम्येवाथ करं धृत्वा तु मंडपम् ॥४१॥

सिद्ध चारण एवं अप्सराओंका गण आया ॥ २२ ॥ सम्पूर्ण दिक्पाल, दिक्पाल तथा मन्दलनिवासी भी आये । नवो ग्रह, छट्टा ऋतुवें, साठो सम्वत्सर एवं तिथि नक्षत्र योग करण राश पर्वत वृक्ष समुद्र नद नदी कूप तालाब तथा अन्य सूक्ष्म प्राणी सभा अपने जङ्गम रूप धारण करके मण्डप में पधारे ॥२३-२५॥ गृध्रराज संपाति, निषादराज एवं मकरध्वज आये तदनन्तर सभा राक्षसोंके साथ लंकाके विभीषण जी आये ॥ २६ ॥ भगवान् रामने सबकी पूजा का और अपने समीप बैठाया वानर पहिलसे ही वहां टिके थे ॥ २७ ॥ इसी समय महातेजा कुम्भोदर मुनि आये। यज्ञ भूमिकी सीमा पर निवास करनेवालोंने उन्हें आते हुए देखा ॥ २८ । वे देखकर बड़े भयभीत हुए और बोले अहो ! बड़े कष्टकी बात है। यह तो फिर वह कुम्भोदर मुनि आ गये ॥ २९ ॥ जिनके कारण भगवान् रामको यात्राका कष्ट हुआ था, जिनके कारण हम सबका अश्वमेध हो गया ॥ ३० ॥ छःङ्ग के पीछे यज्ञ समाप्त हुआ से उधर उधरसे इधर घूमते हुए अत्यन्त कष्ट भये । अब यह फिर आये हैं। अब आगे क्या होगा, सा हमलोग नही जानते। यह रामचन्द्रका बड़ा निन्दक है ॥ ३१ ॥ इस प्रकार सीमाचारी लोगों की वाणियोको सुनते हुए कुम्भोदर चुपचाप यज्ञभूमिमे आये ॥ ३२ ॥ उनके आनके पूर्व ही बड़े वेगसे भागत-कांपते हुए दूतोंने आकर रामसे निवेदन किया-॥ ३३ ॥ हे राम ! हे महाबाहो लक्ष्मण हे प्रभो ! आप लोग सुने, जिसके वाक्यसे बारात गया और यज्ञ हुआ है वही कुम्भोदर मुनि फिर आये हैं। हे राम आपके ऊपर उनका बड़ा कठोर भाव है ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ इस तरह दूतके वाक्य सुनकर सब अपने अपने कार्योंको छोड़कर उन्हें देखनेको उठे ॥ ३६ ॥ ऋत्विक् लोग, सीता तथा रामजी मुनिस भयभीत नहीं हुए। उनके देखते-देखते वे कुम्भोदर मुनि यज्ञभूमिमे आ पहुंचे ॥ ३७॥ जो बड़े नाटे थे जिनका मस्तक बड़ा था जिनका तरुईसा उभार था, जिनके श्यामल रूप था। जो खटाई पहने हुए तथा स्थूल उदरवाले थे पीले-पीले जिनके नेत्र थे। वे कौपीन पहिने तथा जटा धारण किये थे ॥ ३८ ॥ चीर पहिने हुए व छोटे-छोटे हाथोंवाले थे। मुचा होनेसे जिनके मूंछ आ रही थी और जो दण्ड-कमण्डलु धारण किये हुए थे ॥ ३९ ॥ उनका देखकर सम्पूर्ण जनसमुदाय और पहिले के कृत्योंको सुन सुन और स्मरण कर-करके मन ही मन भयभीत हुआ ॥ ४० ॥ उसी समय राम

सर्गः ४ ] बालकाण्डम् २२३


आनयामास श्रीरामो ददौ हेमासनं वरम् । कुम्भोदरो मुनिः शीघ्रं भूमौ डण्डकमण्डलू ॥४२॥
स्थापयामास वीराणि ननाम रघुनायकम् । रामः शीघ्रं कराभ्यां तं प्रत्युत्थाप्य मुनीश्वरम् । ४३ ।
गाढमालिङ्गय बाहुभ्यां ततो मुनिमभाषत । नाहं योग्यो वदनार्थं त्वया राजवघातकः ॥४४॥
इति रामवचोध्वैर्बाणैः संताडितो हृदि । कुम्भोदरस्तदोवाच यतवाटे रघूत्तमम् । ४५॥
राम राम महाबाहो न कोपः क्रियतां मयि । अपराधक्षम्यहं ते हि क्षमस्व रघुनायक । ४६॥
न मया स्वार्थमिष्टार्थं दोषारोपः कृतस्त्वयि । कृतः परोपकारार्थं तथा कीर्त्यै तवापि च ॥४७ ।
शिक्षार्थं सर्वलोकानां लल्लोभं च त्वयापि हि । यथैते मुनयः सर्वे तव मन्त्रोन्ननिर्मिते ॥४८॥
शतशो भोजनं चक्रुस्तथा भुक्तं मयाऽपि च । तदा कुतो महस्कीर्तिर्भवन्न मे रघुनन्दन ॥४९॥
इति निश्चित्य हृदये मया पूर्वं हिताय हि । लोकानां च कृतो यत्त्वन्मय्यपि दोषानुकीर्तनैः ॥५०॥
नोचेद्यात्रामप्रयुक्तः कथं राम भवेत्तव । यत्र यत्र च देशेषु तीर्थेषूपवनेषु च । ५१
आश्रमागमग्रामेषु नदीवनगिरिष्वपि । ये ये मनुजाः सर्वत्र नाना रूपेषु सत्पथाः ॥५२ ।
तव दर्शनलाभस्तु तेषां जातः सुखप्रदः । तत्राहं कारणं मन्ये चात्मानं रघुनन्दन ॥५३॥
ममान्तमुपकारंस्तु जनैः सर्वत्र कीर्त्यते । कुम्भोदरप्रसादेन नः सीतारामदर्शनम् । ५४॥
जातं विषयलुब्धानामिति मे कृतकृत्यता । जाता समन्ततः कीर्तिन्त्वयि दोषानुकीर्तनात् ॥५५॥
तवापि कीर्तिः सर्वत्र जाताऽत्र रघुनन्दन । रामेश्वरश्च सर्वत्र रामतीर्थान्यनेकशः ॥५६॥
यावद्भूभ्यां प्रमीयेत तावत्कीर्तिंस्तथापि च । अन्यच्च लोकशिक्षाऽपि जाता मद्वाक्यकारणात् ।५७।
कुम्भोदरेण मुनिना राघवस्य महात्मनः । दोषारोपः कृतः पूर्वं कथं नो न भविष्यति । ५८।
स्वदोषपरिहारार्थं राघवेण महात्मना । तीर्थयात्रा कृता पूर्वमस्माकं का कथा पुनः । ५९॥
इति स्मृत्वा भयं चित्ते सर्वत्र जगतीतले । करिष्यन्ति जना यात्रां स्वदोषक्षालनाय हि । ६०॥


बड़ा सम्मानसे लाये और कुम्भोदरका गलास प्रणाम करके हाथम हाथ मिलाते हुए यज्ञमण्डपम न लाये और उन्हें सुवर्णनिर्मित आसन बैठनेक लिए दिया ॥ ४२॥ कुम्भोदरने भी शीघ्र ही भूमपर दण्ड कमण्डलु रख कर रघुनायक रामको प्रणाम किया । ४२॥ रामने शीघ्र मुनिको हाथाम उठा लिया और बाहुओंस दृढालिङ्गन करके बोले हे भगवन् ! रावणपालक मै आपकी वन्दना करन योग्य नहीं हूँ ।॥४३॥ ४४ । इस तरह रामके वाक्यवाणसे हृदयमे विद्ध कुम्भोदर रामसे कहने लगे ॥४५॥ हे राम ! हे महाबाहो ! आपको इस तरह मेरे ऊपर क्रोध नहीं करना चाहिए । मै आपका अपराधी हूँ। मुझ क्षमा करें ॥ ४६ ॥ मैने स्वार्थसिद्धिके लिए आपके उपर दोषारोपण नहीं किया था। किन्तु संसारका उपकार करनेके लिये, आपकी कीर्तिवृद्धिके लिए और संसारको शिक्षित करनेके लिए ही मैने ऐसा किया था सो आपन जान ही लिया होगा । ४७ ॥ ॥ ४८ ॥ जैसे इन मुनियोंने आपके अन्नसत्रम सैकडो बार भोजन किया है वैसे ही मैने भी भोजन किया है। आपकी और मेरी कीर्ति कैसे हो, पहलेसे ही यह निश्चय करके संसारके हितके लिए मैने आपकी निन्दा की थी ॥ ४९ ॥ ५० ॥ अन्यथा हे राम ! विभिन्न तीर्थों तथा देशोंके लिए आपकी यात्रा नहीं होती । विविध तीर्थ, नदी, बन बगीचा तथा आश्रमोंम जो मनुष्य नाना कर्मान लिप्त हो रहे है, उनका जो आपका सुखप्रद दर्शनलाभ हुआ । उसमे मैं अपनेको ही कारण मानता हूँ ॥ ५१-५३ ॥ सब मनुष्य सभी जगह मेरे इस उपकारका कीर्तन करते हैं । वे कहते हैं कि कुम्भोदरको कृपासे ही हम लोगांको सीतारामके दर्शन मिल गये ॥ ५४ ॥ आपके ऊपर दोषारोपण कर दम्प विषयो जनांका भी आपका दर्शन प्राप्त हुआ । इससे मैं कृतकृत्य हो गया और चारो तरफ आपकी कीर्ति फैल गयी ॥ ५५ ॥ जबतक भूमण्डलपर विविध रामेश्वर महादेव और रामतीर्थ रहेंगे, तबतक आपकी कीर्ति संसारमे स्थिर रहेगा ॥ ५६ ॥ और फिर मेरे दुर्व्वाक्यके कारण ही यह लोकशिक्षा भी हो गयी कि कुम्भोदर मुनिन जब रामजीको दोष लगाया तब हमलोगोको कैसे न लगेगा ॥ ५७ । ।५८॥ प्राचीन समयमें महात्मा रामचन्द्रने दोषोंको नष्ट करनेके लिए तीर्थ किया था तो फिर हमलोगोंका तो कहना

२२४आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

मयि ब्रह्मणि पूर्णे च दोषारोपः कथं भवेत् । पद्मपत्रे जलस्पर्शो न घटेत यथा तथा ॥६१॥
यस्य भ्रूभंगमात्रेण ब्रह्मांडप्रलयो भवेत् । ब्रह्मांडांतर्गतान् जीवान् हरसि त्वं यदा मुहुः ॥६२॥
तदा दावानलोत्पन्ने किं घटेत जनार्दन । सर्पाणां च कथं मृत्युर्विदधाति तवाज्ञया ॥६३॥
तत्र संख्याऽत्र का कार्या त्वया दोषाः कृतास्त्विति । यथा चित्राणि कुड्ये हि लिखितानि सहस्रशः ॥६४॥
संमार्जितानि तेनैव तत्र दोषो भवेत्कथम् । तथा त्वमपि श्रीराम त्रिधा भूत्वा त्रिभिर्गुणैः ॥६५॥
सृष्टिं करोषि रजसा सत्त्वरूपेण पालनम् । तमोरूपेण संहारं विधिर्विष्णुशिवात्मकः ॥६६॥
अस्माभिस्तव तोषार्थं तीर्थयात्रा विधीयते । तव तीर्थैस्तु किं राम तीर्थीभूतगुणस्य च ॥६७॥
सर्वतीर्थेषु मुख्या या कीर्त्यते स्वर्गधुनी भुवि । तव दक्षिणपादस्यांगुष्ठाग्रजनिता तु सा ॥६८॥
सर्वाघिरजसः स्पर्शात्पवित्रा कीर्तिता भुवि । तव पादरजोमिश्रा दृश्यतेऽद्यापि सा सिता ॥६९॥
रजांस्यद्यापि दृश्यन्ते तव भागीरथीजले । इति नानाविधैर्वाक्यैस्तोपयामास राघवम् ॥७०॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां श्रीरामस्यान्ववेक्ष्य च । स्तुत्वा रामं राघवेण पूजितः स्थितवान्मुनिः ॥७१॥
रामोऽपि गुरुसान्निध्ये तस्थौ सीतासमन्वितः । निजासनेषु सर्वत्र तस्थुस्ते सकला जनाः ॥७२॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे यानकाण्डे कुम्भोदरदर्शनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चमः सर्गः

( रामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र )
विष्णुदास उवाच

गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं वद सविस्तरम् । कुम्भोदरेण मुनिना यत्स्तोत्रं समुदीरितम् ॥ १ ॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां राघवस्य शुभप्रदम् । श्रवणे तस्य मे प्रीतिर्जाताऽस्ति कथयस्व तत् ॥ २ ॥


हो गया है ॥ ५९ ॥ इस तरह पृथ्वीतलपर मनुष्यमात्र अपने चित्तम भयका अनुभव करके स्वदाहपरिहारार्थ तीर्थयात्रा करेंगे ॥ ६० ॥ जैसे कमलके पत्तेपर जलका स्पर्श नहीं हो सकता, वैसे ही आप पूर्ण ब्रह्ममें दोषारोप नहीं हो सकता ॥ ६१ ॥ जिसके भ्रूभङ्गमात्रसे ब्रह्माण्डका प्रलय हो जाता है वहा आप ब्रह्माण्डान्तर्गत सब जीवों- को आनन्द विलीन करते हैं ॥ ६२ ॥ तब हे जनार्दन आपपर दावानल कैसे हो सकता है ? अब आप ही की आज्ञासे मृत्यु सबका क्षय करती है ॥ ६३ ॥ तब आपने कितने दोष किये हैं ? इसकी गणना कौन कर सकता है। ६४ ॥ जैसे किसीने भित्तिपर चित्र लिखा और फिर उमान अपने हाथसे मिटा दिया। तब उसमें क्या दोष हो सकता है। उसी तरह आप भी तीनों गुणोंसे तीन तरहके अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूपमें परिणत होकर रजोगुणसे सृष्टि, सत्त्वसे पालन और तमोगुणसे संहार करते हैं ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ हम लोग आपकी प्रसन्नताके लिए ही तीर्थयात्रा करते हैं। स्वतः तीर्थस्वरूप आपका तीर्थोसे क्या प्रयोजन है ॥ ६७ ॥ जिस गङ्गाकी लोग सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ मानते हैं, वह गङ्गा आपके दक्षिण पैरके अंगूठेस उत्पन्न हुई है ॥ ६८ ॥ वह आपके चरण रजस्पर्शसे ही पवित्र माना गया है इसी हाथन यह आज तक श्वेत दिखाई पड़ती है ॥ ६९ ॥ आज भी गङ्गाजीमे आपकी चरण-रज देख रहीं है। इस प्रकारके वाक्योंसे कुम्भोदरमुनि भगवान् रामको प्रसन्न किया ॥ ७० ॥ इसके बाद रामाष्टोत्तरशतनामसे रामकी स्तुति करके और रामके द्वारा पूजित होकर वे यथास्थान बैठ गये ॥ ७१ ॥ रामजी भी गुरुके समीप सीताके साथ जा बैठे। अन्यान्य लोग भी अपने-अपने आसनोंपर विराजमान हो गये ॥ ७२ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे कुम्भोदरदर्शनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

श्रीविष्णुदास बोले - हे गुरु ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। जो प्रश्न मैं पूछना चाहता हूँ, उसका आप विस्तृत उत्तर दीजिए ॥ १ ॥ कुम्भोदर मुनिने रामके जो अष्टोत्तरशत नामोंका शुभप्रद स्तोत्र कहा

सर्गः ५ ] यज्ञकाण्डम् २२५

सर्गः ५ ] यज्ञकाण्डम् २२५


श्रीरामदास उवाच

शृणु शिष्य महाबुद्धे सम्यक् पृष्टं त्वया मम । अष्टोत्तरशतं नाम्नां राघवस्य वदाम्यहम् ॥ ३ ॥
सर्वेश्वरः सर्वमयः सर्वभूतोपकारकः । सर्वेषामुपकारार्थं यः साकारो निराकृतिः ॥ ४ ॥
स एवैत्य लोकेऽस्मिन् समग्रभयनाशनः । यदा यदा हि लोकानां भयमुत्पद्यते तदा ॥ ५ ॥
अवतीर्यावनीं श्रीमान् दुष्टदैत्यशिरोरत्नन् । मत्स्यकूर्मवराहादिरूपेण परमार्थदृक् ॥ ६ ॥
तत्कालेषु च सर्वेषु सर्वसद्रूपधारकम् । साधूनां मयचित्तानां भक्तानां बत्सरुत्सलः ॥ ७ ॥
उपकर्तुं निराकारः सकारेण जायते । अत्रास्य जायतेऽनन्तो विभूतो भूःभारतः । ८ ॥
तदा तदाऽवतरति भक्तानामनुकम्पया । क्षीराब्धौ देवदेवेशो लक्ष्मीनारायणो विभुः । ९ ॥
अशेषैः शङ्खचक्राभ्यां दैवतैरंशादिभिः सह । शेषोऽभूल्लक्ष्मणो लक्ष्मीर्जानकी सुखचक्रके ॥१०॥
आदी भरतशत्रुघ्नौ देवाः सर्वेऽपि वानराः । प्रापन् पुरैव सर्वेऽपि देवानां भयशांतये ॥११॥
तत्र नारायणो देवः श्रीराम इति विश्रुतः । सर्वलोकापकाराय भूमौ स्वयमवातरत् ॥१२।
ध्यानमात्रेण देवेशो महापातकनाशनम् । कीर्तनश्रवणाभ्यां च हत्याकोटिनिवारणः ॥१३।
कलौ स कीर्तनेनैव सर्वं पापं व्यपोहति । राम रामेति रामेति ये वदन्त्यतिपापिनः ॥१४।
पापकोटिसहस्रेभ्यस्तानुद्धरति नान्यथा । अष्टोत्तरशतं नाम्नां तस्य स्तोत्रं वदाम्यहम् ।१५।

ॐ अस्य श्रीरामचन्द्रनामाष्टोत्तरशतमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । जानकीवल्लभः श्रीरामचन्द्रो देवता । ॐ बीजम् । नमः शक्तिः । श्रीरामचन्द्रः कीलकम् । श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः । ॐ नमो भगवते राजाधिराजाय परमात्मने हृदयाय नमः । ॐ नमो भगवते विद्याधिराजाय हयग्रीवाय शिरसे स्वाहा । ॐ नमो भगवते जानकीवल्लभाय नमः शिखायै वषट् ।


हैं, उसे सुननेकी मेरी प्रबल इच्छा है। वह कहिए ॥ २॥ श्रीरामदास बोले-हे महाबुद्ध शिष्य ! सुनो ! तुमने अच्छा प्रश्न पूछा है। मैं तुम्हें रामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र सुना रहा हूँ ॥ ३ । राम सर्वेश्वर हैं, सर्वमय हैं और सब प्राणियोंका उपकार करनेवाले हैं वे निराकार होते हुए भी संसारके कल्याणार्थ साकार मनुष्यदेह धारण करते हैं । ४ । जब जब प्रजाको भय होता है, तब-तब उस भयको नष्ट करनेके लिये वे इस लोकमें अवतार होते हैं ॥ ५ । अवतीर्ण होकर वे मत्स्य-कूर्म-वराहादि रूपसे दानववृन्दका विनाश करते हैं । भगवान् जो कुछ करते हैं, वह सब परमार्थकी दृष्टिसे ही करते हैं ॥ ६ ॥ वे भक्तवत्सल प्रभु समदर्शी हैं। साधुओं और भक्तोंके उपकारार्थ निराकार होते हुए भी अल्पकालमें ही साकार हो जाते हैं। वे मूलपावन प्रभु अनन्त एवं अज हैं और इन्हीं नामोंसे प्रसिद्ध हैं । वे समय समयपर भक्तोंपर अनुकम्पा करके अवतार्य होते हैं। वे देवदेव इन्द्रके भी शासक हैं। वे क्षीरसागरमें शयन करते हैं और सर्वत्र व्यापक हैं ॥ ७-९॥ वे ही लक्ष्मीनारायण वखिल देवोंके साथ त्रैलोक्यके भयप्रशम्यथं रामरूपसे संसारमें अवतीर्ण हुए । शेष लक्ष्मण बने । लक्ष्मी जानकी बनी और भगवान्‌के पार्षद शङ्ख-चक्र भरत-शत्रुघ्नके रूपमें उत्पन्न हुए और सब देवता वानर बने ॥ १० ॥ ११ ॥ जो श्रीराम इसी नामसे प्रसिद्ध हैं, वे साक्षात् नारायण हैं और लोकोपकारार्थ समहन्त स्वयं अवतरे हैं ॥ १२ ॥ उन भगवान् रामके ध्यानमात्रसे महापातक भी नष्ट हो जाते हैं। वे कीर्तन श्रवण करनेसे कोटि हत्याओंके पापको भी निवारण कर देते हैं ॥ १३ ॥ वे भगवान् कलियुगमें नाम कीर्तन करनेसे ही सब पापोंको नष्ट कर देते हैं। जो घोर पापी भी रामरूप उच्चारण करते हैं तो राम उनका सहस्रकोटि पापोंसे उद्धार कर देते हैं। उन भगवान्‌के अष्टोत्तरशतनाममन्त्रको कहता हूँ ॥१४। १५॥ रामचन्द्रके इस महान्तर रामनाम मन्त्रके ब्रह्मा ऋषि हैं । अनुष्टुप् छन्द है । जानकीवल्लभ श्रीरामचन्द्रना-मक देवता हैं। ॐ बीज है। नमः शक्ति है। श्रीरामचन्द्र कीलक है । श्रीरामप्रीत्यर्थ इसका विनियोग होता है । ॐ हृदयमें बैठे हुए राजाधिराज परमात्मस्वरूप भगवान्‌को बारम्बार नमस्कार है। मस्तकमें विराजमान विद्याधिराज हयग्रीव भगवान्‌को नमस्कार है। शिखामें विराजमान जानकीवल्लभ भगवान्‌को नमस्कार और

२२६ आनन्दरामायणे [सर्गः ६


ॐ नमो भगवते रघुनन्दनायामिततेजसे कवचाय हुम् । ॐ नमो भगवते क्षीराब्धिमध्यस्थाय शरायणाय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ नमो भगवते सर्वप्रकाशाय रामाय अस्त्राय फट् । इति षडंगन्यासः । एवं अंगुलिन्यासः कार्यः ।

अथ ध्यानम्

मन्दारकुंतिपुण्यधामविलसद्वक्षःस्थलं कोमल शांतं शांतमहेंद्रनीलरुचिशोभं सहस्राननम् ।
वंदेऽहं रघुनंदन सुरपतिं कोदण्डदीक्षागुरुं रामं सर्वजगत्सुसेवितपदं सीतामनोवल्लभम् ॥१६॥

सहस्रशीर्षे वै तुभ्यं सहस्राक्षाय ते नमः । नमः सहस्रहस्ताय सहस्रचरणाय च ॥१७॥
नमो जीमूतवर्णाय नमस्ते विश्वतोमुख । अच्युताय नमस्तुभ्यं नमस्ते शेषशायिने ॥१८॥
नमो हिरण्यगर्भाय पंचभूतात्मने नमः । नमः मूलप्रकृतये देवानां हितकारिणे ॥१९॥
नमस्ते सर्वलोकेश सर्वदुःखनिषूदन । शंखचक्रगदापद्मजटामुकुटधारिणे ॥२०॥
नमो धर्माय तत्त्वाय ज्योतिषां ज्योतिषे नमः । ॐ नमो वासुदेवाय नमो दशरथात्मज ॥२१॥
नमो नमस्ते राजेन्द्र सर्वसम्पत्प्रदाय च । नमः कारुण्यरूपाय कैकेयीप्रियकारिणे ॥२२॥
नमो दांताय शांताय विश्वामित्रप्रियाय ते । यज्ञेश च नमस्तुभ्यं नमस्ते क्रतुपालक ॥२३॥
नमो नमः केशवाय नमो माधाय शार्ङ्गिणे । नमस्ते रामचन्द्राय नमो नारायणाय च ॥२४॥
नमस्ते रामचन्द्राय माधवाय नमो नमः । गोविन्दाय नमस्तुभ्यं नमस्ते परमात्मने ॥२५॥
नमस्ते विष्णुरूपाय रघुनाथाय ते नमः । नमस्तेऽनाथनाथाय नमस्ते मधुसूदन ॥२६॥
त्रिविक्रम नमस्तेऽस्तु सीतायाः पतये नमः । वामनाय नमस्तुभ्यं नमस्ते राघवाय च ॥२७॥
नमो नमः श्रीधराय जानकीवल्लभाय च । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश कदर्पाय नमो नमः ॥२८॥


वषट्कार है। बाहुओमें कवचरूपेण विद्यमान अमिततेज उन रघुनन्दनको नमस्कार है, जिनके हुङ्कारमात्रसे सब शत्रु नष्ट हो जाते हैं। नेत्रोंमें वौषट् अर्थात् ज्योतिस्सम्पन्न विद्यमान तथा क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। अस्त्रस्वरूप फट्स्वरूप और सर्वप्रकाश स्वरूप रामको नमस्कार है। इस प्रकार भगवान्‌को छहों अङ्गोंमें न्यास अर्थात् विराजमान करे। इसी तरह अंगुलियोंमें न्यास करे। अब महर्षि एक श्लोकमें रामका ध्यान करके स्तोत्र आरम्भ होता है। जिनकी मनोहर आकृति है जो पुण्यधाम है। मालाओंसे जिनका वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा है, जो कोमल एवं शान्त हैं। जो सुन्दर महेन्द्रनीलमणिकी कान्तिके समान सुशोभित हैं। जो धनुर्वेदकी शिक्षा में संसारके गुरु हैं, संसार जिनके चरणोंको पूजता है, उन सुरपति रूप सीताके प्राणवल्लभ रामको मैं प्रणाम करता हूँ॥१६॥ हे राम ! सहस्र मस्तकवाले आपको नमस्कार है। मेघके समान कान्तिवाले आपको नमस्कार है। हे विश्वतोमुख ! आपको नमस्कार है। अच्युतको नमस्कार है ! शेषशायीको प्रणाम है ॥१७॥१८॥ हिरण्यगर्भको प्रणाम है। पञ्चभूतात्माको प्रणाम है । मूलप्रकृतिको नमस्कार है ॥१९॥ हे सर्वलोकनाथ ! सब दुःखोंको दूर करनेवाले ! आपको प्रणाम है। हे शंख चक्र गदा पद्म तथा जटा-मुकुट धारण करनेवाले राम आपको नमस्कार है ॥२०॥ धर्मस्वरूप आपको प्रणाम है। तत्त्वस्वरूपको प्रणाम है। ज्योतियोंकी भी ज्योतिको नमस्कार है। वसुदेवके पुत्रको प्रणाम है। दशरथपुत्र रामको प्रणाम है। २१॥ हे राजेन्द्र ! सब संपत्ति देनेवाले आपको प्रणाम है। हे दयाके मूर्त्तस्वरूप तथा कैकेयीके प्रिय करनेवाले ! आपको नमस्कार है ॥२२॥ दान्त, शान्त एवं विश्वामित्रके प्रियकर्ता आपको प्रणाम है। हे यज्ञेश ! हे ऋतुपालक ! आपको प्रणाम है ॥२३॥ केशवको नमस्कार है। शार्ङ्गिको नमस्कार है। रामचन्द्रके लिए नमस्कार है। नारायणके लिए नमस्कार है । २४ । हे रामचन्द्र ! आपको प्रणाम है। हे माधव ! आपको प्रणाम है। हे गोविन्द ! हे परमात्मन् ! आपका नमस्कार है । २५ ॥ हे विष्णुरूप रघुनाथ ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे दीनोंके नाथ मधुसूदन ! आपको प्रणाम है ॥ २६ ॥ हे त्रिविक्रम ! हे सीतायते ! हे वामन ! हे रामचन्द्र ! मैं

सर्गः २ ] युद्धकाण्डम् ७२३

सर्गः २ ] युद्धकाण्डम् ७२३


नमस्ते भरताग्रज ईश्वरत्वाद्यकारिणे । नमो गजानन च नमस्ते लक्ष्मणप्रिय । २९ ।
नमो नमस्ते काकुत्स्थ नमो दाशरथाय च । विभीषणपरित्रातः संकटनाश च ॥ ३० ॥
वासुदेव नमस्तेऽस्तु नमस्ते शंकराय च । प्रद्युम्नाय नमस्तुभ्यमनिरुद्धाय ते नमः ॥ ३१ ॥
सदमङ्गलिरूपाय नमस्ते पुरुषोत्तम । यज्ञांगाय नमस्तेऽस्तु मखसाधनरूप च ॥ ३२ ॥
खरदूषणहर्त्रे श्रीनृसिंहाय ते नमः । अच्युताय नमस्तुभ्यं नमस्ते सेतुबन्धक ॥ ३३ ॥
जनार्दन नमस्तेऽस्तु नमो हनूमदाश्रय । उपेन्द्रचन्द्रबंधाय मारीचवधनाय च ॥ ३४ ॥
नमो बालिवहरण नमः सुग्रीवराज्यद । जामदग्न्यमदच्छेद्रे हरये नमः ॥ ३५ ॥
नमो नमस्ते कृष्णाय नमस्ते भरताग्रज । नमस्ते पितृभक्ताय नमः शत्रुघ्नपूर्वज ॥ ३६ ॥
अयोध्याधिपते तुभ्यं नमः शत्रुघ्नसेवित । नमो नित्याय सत्याय बुद्ध्यादिक्लेशहारिणे ॥ ३७ ॥
अद्वैतमलरूपाय ज्ञानगम्याय ते नमः । नमः पूर्णाय रम्याय माधवाय चिदात्मने ॥ ३८ ॥
अयोध्मेशाय श्रेष्ठाय चिन्मात्राय परमात्मने । नमोऽरण्योद्धारगाय नमस्ते चापभञ्जिने ॥ ३९ ॥
सीतागपाय सेव्याय स्तुत्याय परमेष्ठिने । नमस्ते बाणहस्ताय नमः कोदण्डधारिणे ॥ ४० ॥
नमः कबन्धहन्त्रे च बालिहन्त्रे नमोऽस्तु ते । नमस्तेऽस्तु दशग्रीवप्रजसंहारकारिणे १०८ ॥ ४१ ॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां रामचन्द्रस्य पावनम् । रहस्योक्तं मया श्रेष्ठं सर्वपातकनाशनम् ॥ ४२ ॥
भ्रमन्ति ये ह्यलोके प्राण्यरूपवशानुगाः । तस्य कीर्त्तनमात्रेण जना यास्यन्ति सद्गतिम् ॥ ४३ ॥
तावद्विजृम्भन्ते पाप ब्रह्महत्यापुरःसरम् । यावन्नामाष्टकशतं पुरुषो न विकीर्त्तयेत् ॥ ४४ ॥
तावत्कलेर्महोत्साहो निःशंकं संप्रवर्त्तते । यावच्छ्रीरामचन्द्रस्य शतनाम्नां न कीर्त्तनम् ॥ ४५ ॥
तावद्यमभटाः क्रूराः संचरिष्यन्ति निर्भयाः । यावच्छ्रीरामचन्द्रस्य शतनाम्नां न कीर्त्तनम् ॥ ४६ ॥
तावत्स्वरूपं रामस्य दुर्बोधं प्राणिनां स्फुटम् । यावन्न निष्ठा रामनाममाहात्म्यमृतमत् ॥ ४७ ॥


आपका बारम्बार प्रणाम करता हूँ ॥ २७ ॥ हे माधव ! हे जानकवल्लभ ! हृषीकेश ! कन्दर्प ! मैं आपको बारम्बार प्रणाम करता हूँ ॥ २८ ॥ हे रघुनाथ ! हे कीर्त्तय-हूर्त्तकारिन् ! कमलनयन ! लक्ष्मणप्रिय ! मैं आपको पुनः पुनः प्रणाम करता हूँ ॥ २९ ॥ हे काकुत्स्थ ! दशरथनन्दन ! संकटनाशन ! विभीषणसंरक्षक ! आपका मैं पुनः पुनः प्रणाम करता हूँ ॥ ३० ॥ हे वासुदेव ! शंकरप्रिय प्रद्युम्न ! अनिरुद्ध ! मैं आपका पुनः पुनः प्रणाम करता हूँ ॥ ३१ ॥ हे सदसद्मूर्त्तिस्वरूप ! पुरुषोत्तम ! यज्ञांगस्वरूप ! मखसाधनरूप ! आपको कोटिशः प्रणाम है ॥ ३२ ॥ हे खरदूषणहन्ता ! श्रीनृसिंह ! अच्युत ! सेतुबन्धनकारिन् राम ! आपका कोटिशः प्रणाम है ॥ ३३ ॥ हे जनार्दन ! हनुमदाश्रय ! उपेन्द्रचन्द्रबंधी ! मारीचवधभंजनकारिन् ! आपको कोटिशः प्रणाम है ॥ ३४ ॥ हे बालिवधहरण ! सुग्रीवराज्यद ! जामदग्नि ! महादुःखहर हरे ! आपको कोटिशः प्रणाम है ॥ ३५ ॥ हे कृष्ण ! भरताग्रज ! पितृभक्त ! शत्रुघ्नपूर्वज ! मैं आपका सहस्रों बार प्रणाम करता हूँ ॥ ३६ ॥ हे अयोध्याधिपते ! शत्रुघ्नसेवित ! नित्यसत्य ! बुद्ध्यादिक्लेशनाशक ! आपको प्रणाम है ॥ ३७ ॥ हे अद्वैत मङ्गलस्वरूप ! ज्ञानगम्य ! माधव ! पूर्ण ! रम्य ! चिदात्मन् ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ ॥ ३८ ॥ हे अयोध्याेश श्रेष्ठ ! चिन्मात्र ! परमात्मन् ! बहुदण्डाधारक ! सुचापभञ्जन् आपका प्रणाम है ॥ ३९ ॥ हे सीतासेव्य ! स्तुत्य ! परमेष्ठिन् ! बाणहस्त ! धनुर्धारिन् ! आपको अनेकशः प्रणाम है ॥ ४० ॥ हे कबन्धहन्त ! पालिहन्त ! दशग्रीवप्रायसंहार-कारिन् ! मैं आपको पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ ॥ ४१ ॥ सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला श्रेष्ठ एवं पावन रामचन्द्रका यह अष्टोत्तरशतनामरत्न मैंने तुमसे कहा ॥ ४२ ॥ हे द्विज ! जो प्राणी अपने दुर्भागयवश इस लोकमें भ्रमण करते हैं। इस स्तोत्रके पठनमात्रसे वे सद्गतिको प्राप्त होंगे ॥ ४३ ॥ ब्रह्महत्यादि पाप तभीतक उपद्रव करते हैं, जब तक पुरुष इस स्तोत्रका पाठ नहीं करता ॥ ४४ ॥ प्रणाश तभी तक कलिकृत प्रबल रहता है जब तक यह रामचन्द्रके इस स्तोत्रका स्मरण पठन नहीं करता ॥ ४५ ॥ तभी तक भयंकर यमराजके दूतगण निर्भय विचरण करते हैं, जबतक प्राणी इस स्तोत्रका पाठ नहीं करता ॥ ४६ ॥ तब तक रामका स्वरूपशक्तियानको

२२८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६


कीर्त्तितं पठितं चित्ते धृतं संस्मारितं मुदा । अन्यतः शृण्वदन्मर्त्यैः सोऽपि मुच्येत पातकात् ॥ ४८ ॥ ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं यदि वाञ्छति । रामस्तोत्रं मासमेकं पठित्वा मुच्यते नरः ॥ ४९ ॥ दुष्प्रतिग्रहदुर्भोक्तृदुरालापादिजम्भवम् । पापं सकृत्कीर्तनेन रामस्तोत्रं विनाशयेत् ॥ ५० ॥ श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासोपामशतानि च । अर्हन्ति नाल्पां श्रीरामनामकीर्तिकलामपि ॥ ५१ ॥ अष्टोत्तरशतं नाम्नां सीतारामस्य पावनम् । अस्य संकीर्तनादेव सर्वान् कामाँल्लभेनरः ॥ ५२ ॥ पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी धनमाप्नुयात् । स्त्रियं प्राप्नोति पत्न्यर्थी स्तोत्रपाठश्रवादिनः ॥ ५३ ॥ कुम्भोदरेण मुनिना येन स्तोत्रेण राघवः । स्तुतः पूर्वं यज्ञवाटे तदेतत्ते मयोदितम् ॥ ५४ ॥

इति श्रीमत्कोटिरमचचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे श्रीरामनामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठः सर्गः

( रामकी दिनचर्या )

श्रीरामदास उवाच

अथ कुम्भोदरे दिव्ये चासनोपरि संस्थिते । यज्ञस्तम्भे श्यामकर्णं बबन्धुस्ते हि ऋत्विजः ॥ १ ॥ तस्याङ्गानि समस्तानि पृथङ् मन्त्रैर्यथाविधि । मन्त्रयित्वापि शमित्रा तं निजघ्नुर्द्विजपुङ्गवाः ॥ २ ॥ तन्मांसखण्डैराज्याक्तैर्होमं चक्रुः सविस्तरम् । तथा नानाविधैर्द्रव्यैः सक्तुपायसगोधूमैः ॥ ३ ॥ मध्वाक्ततिलदूर्वाद्यैः समिधाभिश्च सादरम् । गोघृतेन वसोर्धारां वह्नौ स्थूलामखण्डिताम् ॥ ४ ॥ गोशृङ्गेनोर्ध्वबद्धेन ददुर्मन्त्रैः सविस्तरम् । चिरकालं होमकुण्डे यावद्यज्ञसमापनम् ॥ ५ ॥ तदा धूमचयैर्व्याप्तमाकाशं च समन्ततः । नाद्यापि दृश्यते शुभ्रं नीलाभं प्रहृश्यते ॥ ६ ॥ चैत्रमासे महापुण्ये वसन्ततौ सुखावहे । एवं प्रवर्त्तयामासुर्वाजिमेधं मुनीश्वराः ॥ ७ ॥


दुर्बोध रहता है, जबतक इस उत्तम स्तोत्रमें निष्ठा नहीं होती ॥ ४७ ॥ जो इसको पढ़ता और कीर्तन करता है, जो डम चित्तमें धारण करता है, प्रेमसे स्मरण करता है और औरोंसे सुनता है, वह भी पातकोंसे छूट जाता है ॥ ४८ ॥ जो ब्रह्महत्यादि पापोंकी निष्कृति चाहता हो, वह पुरुष एक महीने इसका पाठ करे ॥ ४९ ॥ इसके एक बार कीर्तन करनेसे मनुष्य दुष्प्रतिग्रह, दुर्भोज्य तथा दुरालापादिजन्य पापोंसे छूट जाता है ॥ ५० ॥ श्रुति-स्मृति-पुराण-इतिहास-आगम (वेद) और स्मृति इसकी सोलहवीं कलाको भी नहीं पहुंचते ॥ ५१ ॥ श्रीसीतारामके इस पावन अष्टोत्तरशतनामका जो मनुष्य पाठ करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। इसका पाठ एवं श्रवण करनेसे पुत्रार्थीको पुत्र, धनार्थीको धन और स्त्री चाहनेवालेको स्त्री मिलती है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ बागस्त्य मुनिने जिस स्तोत्रके द्वारा अश्वमेध यज्ञमें रामचन्द्रकी स्तुति की थी, वही स्तोत्र मैंने तुमसे कहा है ॥ ५४ ॥

इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे श्रीरामनामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

श्रीरामदास बोले—इसके अनन्तर कुम्भोदर मुनि दिव्य आसनपर बैठ गये । उधर ऋत्विक् लोगोंने यज्ञस्तम्भमें श्यामकर्ण अश्वको बांध दिया ॥ १ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! उसके अंगोंको शास्त्रानुसार मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके ब्राह्मणोंने उसका वध किया ॥ २ ॥ तब घृतमें सने हुए घोड़ेके मांसखण्डों एवं सक्तु पायस गोधूम आदि नाना द्रव्योंसे ऋत्विक् लोग हवन करने लगे ॥ ३ ॥ हे हूं! मधुमें सने हुए तिल, दूर्वा, समिधा तथा गोघृतकी अखंड एवं स्थूल वसोर्धाराको अग्निमे छोड़ने लगे ॥ ४ ॥ चिरकाल पर्यन्त जब तक यज्ञ समाप्त नहीं हुआ, तबतक वे ऊपर बँधे हुए गोशृङ्गके द्वारा होमकुण्डमें समन्त्र आहुति देने रहे ॥ ५ ॥ इसके सम्पूर्ण आकाश-मंडल धूमसमूहसे व्याप्त हो गया । उसीके कारण आज भी आकाश श्वेत नहीं, नीला ही दीखता है । सुखावह वसन्त ऋतु एवं पुनीत चैत्रमासमें इस तरह वे मुनीश्वर लोग वह अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे ॥ ६ ॥ ७ ॥

सर्गः ६ ] यागकाण्डम् २२९

सर्गः ६ ] यागकाण्डम् २२९

ईजुस्ते यज्ञविधिना हविर्होत्रादिलालपैः । शङ्खतूर्यस्वनैर्नादैर्ब्रह्मघोषैर्महेश्वरम् ॥ ८ ॥ प्रत्यहं प्रातरुत्थाय रामचन्द्रः सर्मयया । नत्वा शम्भुं च देवेशानमुनींश्चापि पृथक्पृथक् ॥ ९ ॥ कौसल्याद्याश्च मातॄश्च कामधेनुं हृदि स्थितम् । चिन्तामणिं कोशाध्यक्षं कल्पवृक्षं द्विजोत्तमम् ॥ १० ॥ पृष्ठतः यज्ञवाटस्य देवतां यज्ञपूरुषम् । ततो गङ्गागमनार्थे समाज्ञाप्य यथाविधि ॥ ११ ॥ कृत्वा नित्यविधिं सर्वं पूजयामास शङ्करम् । उपहारान् समर्प्याथ कामधेनुसमुद्गतान् ॥ १२ ॥ समानितान् रत्नपात्रैः सीताया शृण्वदन्तः । ततः संप्रूजयामास धेनुं विधिपूर्वकं स विस्तरम् ॥ १३ ॥ ऋत्विजश्च तु मण्डपस्थांश्चैव सुहृद्विदां । प्रदाने ऋत्विजः सर्व यदाज्ञा मुमुचून् ॥ १४ ॥ स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा सम्पूज्यस्य महेश्वरैः । गमाज्ञयाऽथ सौमित्रिनृपादीनां प्रपूजनम् ॥ १५ ॥ दिव्यैर्नानोपहारार्थैः कामधेनुसमुद्भवैः । ततश्चकार सौमित्रिनृपादीनां प्रपूजनम् ॥ १६ ॥ तथा सीताऽथ साऽप्याज्ञाप्योर्मिला लक्ष्मणप्रिया ॥ १७ ॥ मांडवी श्रुतकीर्तिश्च सर्वस्त्रीकः प्रपूजयत् । अथ ते ऋत्विजश्वक्रुः स्वाहाकारैर्यथाविधि ॥ १८ ॥ होमं नानाविधैर्द्रव्यैः सुगन्धैर्यज्ञमण्डपे । पुरोडाशान् वरान् दिव्यान्भक्षयन्तोऽप्यमानवाः ॥ १९ ॥ वाजिमेधे राघवस्य साक्षाद्देवाः स्वयं मुदा । हवींषि भक्षयामासुःप्रत्यक्षाणि पावके ॥ २० ॥ अस्तु वौषडिति प्रोचुराद्ययातः स मेघवत् । श्रूयते यज्ञशालासु मन्त्रान्वितवशाननः ॥ २१ ॥ मध्ये कुण्डं महारम्यं व्याप्तमृत्विजनैः शुभम् । ततो मुनीश्वराः सर्वे ततो देवाः समन्ततः ॥ २२ ॥ ततः सर्वाः स्त्रियः श्रेष्ठास्ततो विद्याधराः स्थिताः । ततो यक्षाश्च गन्धर्वाः किन्नराः प्लवगास्तथाः ॥ २३ ॥ ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे तत्तत्तेषां तु सेवकाः । ततः स्थिता वश्याश्चैवान्येनो माघवशंवदाः ॥ २४ ॥ ददृशुः संस्थिता यज्ञमण्डपे यज्ञकौतुकम् । मध्याह्नावधि हुत्वा ते ऋत्विजश्च प्रतिष्ठरन् ॥ २५ ॥

इत्याख्यान एवं क्रियाश्राव नियम वैदिक अग्निहोत्र दीक्षा प्राकृत एवं वैदिक विधियोंसे संपादन कर रहे थे ॥ ८ ॥ रामचन्द्रजी नित्य प्रातःकाल उठ तथा शौचादि क्रियाओंसे निवृत्त होकर शंभु, ब्रह्मा एवं अन्य देवताओंका, मुनियोंका, कामधेनुका, हृदयस्थ चिन्तामणिका, कल्पवृक्षके समान कान्तान् को, सुवर्ण का, पृष्ठपर विराजमान, यक्षक देवता तथा यज्ञ भगवान्‌को प्रणाम करते थे ॥ ९ ॥ १० ॥ इसके बाद यथाविधि गंगातटपर जाकर स्नान करते थे ॥ ११ ॥ इसके अनन्तर सम्पूर्ण दैनिक कृत्य करते और कामधेनुसे प्राप्त उपहारोंकी भेंट देते थे ॥ १२ ॥ सीताके द्वारा रत्नपात्रमें लाये गये सब रसोंसे कामधेनुकी पूजा करके बाद विस्तारपूर्वक ब्रह्माकी पूजा करते थे ॥ १३ ॥ तदनन्तर ऋत्विजोंकी पूजा करके याज्ञिकोंके पास बैठ जाते थे। ऋत्विक्, होता एवं सब मुनीश्वर भी नित्यकर्मोंको समाप्त करक यज्ञमण्डपमें बैठ जाते थे। रामकी आज्ञासे लक्ष्मणजी उनकी पूजा करते थे ॥ १४ ॥ १५ ॥ बादमें कामधेनुसे उत्पन्न नाना प्रकारके स्वर्गीय उपहारोंसे राजाओंकी पूजा करते थे ॥ १६ ॥ दिव्य वस्त्राभरणों तथा विविध पक्वान्नोंसे लक्ष्मणप्रिया उर्मिला एवं माण्डवी-श्रुतकीर्ति प्रभृति स्त्रियां भी सीताके आज्ञानुसार सब स्त्रियोंका पूजन करती थीं ॥ १७ ॥ इस तरह प्रत्येक मनुष्योंकी यथायोग्य पूजा हो चुकनेके बाद ऋत्विक् लोग स्वाहाकारो द्वारा विविध सुगन्धित द्रव्योंसे यज्ञमण्डपमें हवन करते थे ॥ १८ ॥ सीता और राम दृष्टियोंकी तृप्तिपर भेंट एवं दिव्य पुरोडाशों को खाती थे ॥ १९ ॥ रामचन्द्रजीके अश्वमेध यज्ञमें देवता प्रत्यक्ष प्रकट होकर बड़े आनन्दसे अग्निमें प्राक्षित हवियोंको खाते थे ॥ २० ॥ ऋत्विक् लोग 'अस्तु वौषट्' इस प्रकार बोलते थे और बाजे बजाते थे। जिनका मेघध्वनिके सदृश गम्भीर बांथ समस्त यज्ञशालामें सुनायी पड़ता था ॥ २१ ॥ मध्यमें रमणीय एवं ऋत्विकजनोंसे व्याप्त हवनकुण्ड था। उनके पास मुनीश्वर बैठे थे। चारों तरफ देवता बैठे थे ॥ २२ ॥ इसके बाद सम्पूर्ण स्त्रियाँ थीं। उनके बाद विद्याधर बैठे थे। उनके बाद यक्ष, यक्षोंके बाद गन्धर्व, गन्धर्वोंके बाद किन्नर, किन्नरोंके बाद बन्दर, उनके बाद क्षत्रिय, क्षत्रियोंके बाद सेवकवर्ग, उनके बाद वैश्यादि, उनके बाद मगध और बंदीजन बैठे थे ॥ २३ ॥ २४ ॥ इस तरह अपने-अपने स्थानपर बैठे हुए सब लोग यज्ञका कौतुक देख रहे थे ॥ २५ ॥

२३० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

ततो माध्याह्निकं कर्तुं ययूस्तेऽ वग्यु नदीषु, कृत्वा माध्याह्निकं कर्म गत्वा तु यज्ञमण्डपे । २६॥ द्रव्यासनं तु सम्प्रेष्य नामरेखपदं स्थितः । दद्याद्याश्चाग्रगश्चाञ्च तन्मूर्द्धन्यासनोपरि । २७॥ लक्ष्मणस्वान् प्रपूज्याथ भरतेन स शत्रुहा । मध्येऽप्य हेमपात्राणि मर्यषां गुरुवस्तदा ॥२८॥ जानकीं त्वत्वरामास परिवेषणकर्मण । अथ सांतानिना रम्या नया सा मांडवी शुभा । २९॥ श्रुवकीर्तिमिशिवन्यः सुहत्पत्न्यः सहस्रशः । परिवेषणकर्माण चक्रुस्ता यज्ञमण्डपं ॥३०॥ नानाविघरसवंश्च कामधेनुःसुसुर्ब्वे । मुनायणादकाः सर्वे तोषमापुस्तदाऽध्वरं ॥३१॥ मीनादीनां ह न रीगां तदा यज्ञस्य मंडपे । नूपुरणा किंकिणीनां शुश्रूवे मवतो ध्वनिः ॥३२॥ यथेच्छ भुजतां सर्वं याच्यता यद्धृदि स्थितम् । मा शङ्का भोजने कार्या त्यक्तव्यं यन्न रोचते ॥३३॥ अयाचितानि देयानि पक्वान्नानि यथारुचि । अखण्डिताज्यधाराञ्च कार्या राघवशासनात् ॥३४॥ गृह्णीतां किञ्चिदुत्सृज्ये नेति नेति द्विजाः पुनः । इति भोजनकाले वै शुश्रुवे सर्वतो ध्वनिः ॥३५॥ किंचिदपेक्षित स्वामिनिति रामेण प्रार्थिताः । चक्रुस्ते भोजनं सर्वे दीजता व्यञ्जनादिभिः ॥३६॥ उर्लेकणोदकैरूच्छ्वैः रूङ्गशुद्धिं मुनीश्वरी । ततो गृहीत्वाऽत्यूत्वा मुनयस्ते तु निर्जराः ॥३७॥ गृहीत्वा दमुद्रां हि राघवेण पृथक् पृथक् । समर्पितां दक्षिणार्थं जग्मुर्वामस्थलानि हि ॥३८॥ ततः पूर्वोपचारार्थैः कथितैरथ पार्थिवाः । चक्रुस्ते भोजनं सर्वं चकुरेषामस्ततः परम् ॥३९॥ स्त्रीणां भोजनशालासु पूर्व भुक्त्वाऽवरस्त्रियः । सहिता मुनिपत्नीभिस्ततस्ताः क्षत्रियस्त्रियः ॥४०॥ चक्रुर् भोजनं सर्वाः सीतया प्रार्थिता मुहुः । ततो वैश्यास्तथच्छ्रूः पौग्न र्यस्ततः परम् ॥४१॥ तत शूद्रास्त्वथार्येषु मुदा चक्रुश्च भोजनम् । शालासु पुरनार्या च ततो वानरराक्षसाः ॥४२॥ ऋक्षाः पौरा जानपदायर्जुर्माजनमुत्तमम् । ततः शूद्रादयः सर्व ततः पार्थिवसत्रकाः ॥४३।


ऋत्विक् लोग मध्याह्नस्त स्नानाद्यवश्यक हवन कृत्य माध्याह्निक कृत्य करनेके लिए सरयूपर जात भये ॥ २६ ॥ माध्याह्निक कृत्य करके वे यज्ञमण्डपमें जिसका स्थान पूर्वनिर्मित आसान पर बैठ जन थे उसी तरह अपना अपना कृत्य समाप्त करके देवता भी दिव्य आसनपर विराज गये ॥ २७ ॥ तदनन्तर भरत, लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न उनकी पूजा करके सुवर्णके भोजनपात्र उनके सामने रख दिये ॥ २८ ॥ तब भगवान् रामचन्द्र ने अन्न परोसनेके लिए सीताको आज्ञा दई थी । तब सीता, ऊर्मिला, मण्डवी, श्रुतकीर्ति एव हजारस मित्रपत्नियां परोसती थीं । २९ ॥ ३० ॥ नाना प्रकारका उन उत्कृष्ट भोजनसामग्रियोंसे व मुनश्वरादिक अत्यंत प्रसन्न होते थे । ३१ ॥ जिस समय सीता प्रभृति स्त्रियां यज्ञमण्डपमें भोजन परोसती थीं, उस समय नूपुरों एवं किकिणियोंका मधुर ध्वान सबन सुनाई पड़ता था ॥३२॥ सब लोग यथेष्ट भोजन करें, जो पसंद हो सो मांगें, भोजनके विषयमें कोई किसी तरहकी शंका न करे और जिसका जो पदार्थ न रुचे, उस छोड़ दें । बिना मांग ही यथेष्ट पक्वान्न दो और उनका आज्योद्य अखण्ड घृतधारा डालो । इस प्रकार रामचन्द्र परोसनेवालाको आज्ञा देते थे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ परोसनेवाले कहते थे और लीजिये, ब्राह्मण कहते थे 'नही'। इस प्रकार भोजनकालम सर्वत्र यही ध्वनि सुनाई पड़ती थी । ३५॥ भगवान् रामचन्द्रजी कहते थे-भगवन् ! क्या चाहिये ? इसके उत्तरमें ब्राह्मण सब पागूर्ण हैं ऐसा कहते थे। इस प्रकार आनन्दके साथ पक्वान्नां द्वारा स्रात हुए विप्रगण भोजन करते थे ॥ ३६ ॥ भोजनान्तर ठण्डे एवं उष्णोदकसे हस्त-दन्त शुद्धि करके व ताम्बूल खाते थे ॥ ३७ ॥ इसके बाद राम द्वारा दक्षिणार्थ समर्पित स्वर्णमुद्राको लेकर वे मुन वर एवं देवता डरपर चले जाते थे ॥ ३८ ॥ इसके बाद पूर्वोक्त उपचारास राजालाग भोजन करते थे । तदुपरा्न्त वैश्यप भोजन करतेथ ॥ ३६ ॥ स्त्रियाक भाजनाशालान पहल दवाङ्गनार्थे, फिर मुनिपलियां और उनके बाद क्षत्रियपत्नियां भाजन करती थी । तदनन्तर सभा न्वियों सीताकी प्रार्थना-पर भोजन करतो थी । इसके बाद वणिक् स्त्रियां तदुपरात्न पुरनारियां एव शूहवणिप भाजन करते थे । पुरवासी भोजनालयम बानर, राक्षस, ऋक्ष, पुरवासा, शूद्रा द एवं राजनयक पे सब क्रमशः भोजन करते थे

सर्गः ६ ] यागकाण्डम् २३१


न कश्चित् क्षुधितस्तत्र नासीत्कस्य निषेधनम् । ततो रामः सुहन्मित्रैर्बंधुभिः सचिवादिभिः । ४४।
चकार भोजनं स्वस्थः सीतया प्रार्थितो मुहुः । यावन्तो भूमिकणिका यावन्तस्तोयबिन्दवः ॥४५॥
यावत्युडूनि गगने तावन्तो राघवध्वरे । प्रत्यहं भोजनं चक्रुर्विप्राद्यास्तत्स्त्रियोऽपि च ॥४६
शुभ्रिर्मंत्रिपत्नीभिस्तथा देवपत्नीभिः । चकार भोजनं सीता दिव्यान्र्नैः स्वस्थ्यमानसा । ४७
ततश्चतुर्थप्रहरे मणीं कृत्वा तु मंडपे । कथाभिः कीर्त्तनाद्यैर्निः शास्त्रवादैः सुपूण्यदैः ॥४८।
वारस्त्रीणां नृत्त्यगीतैर्निन्चे रामो दिनक्षयम् । सन्ध्यादिकं कृत । पुनहूत्वा यथाविधि । ४९।
पूर्वोक्तैस्तु कथाद्यैश्च निशायाः प्रहरद्वयम् । मणीं क्रम्य निद्रार्थं मवानीतान्पृथग्दा । ५० ।
गत्वा स्वस्वस्थलं सर्वे निद्रां चक्रुर्यथामुखम् । पट्टकूलासने भूमौ सीतया स जितेंद्रियः । ५१ ।
चकार निद्रां श्रीरामो हृदि चिन्तयेष्टदेवताः । आज्ञाभंगो नरेन्द्राणां विप्राणां मानखंडनम् ॥ ५२ ।
पृथक् शय्या च नारीणामशस्त्रवध उच्यते । यतः स सीतया युक्तश्चकार शरणं प्रभुः । ५३ ।
एवमासीत्प्रत्यहं वै दिनचर्याऽध्वरे प्रभोः ॥ ५४ ।
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे
यज्ञ रं भे रामदिनचर्यावर्णनं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ।


सप्तमः सर्गः

( ध्वजारोपणव्रतकी महिमा )
श्रीरामदास उवाच
सौत्येऽहन्यवनीपालो याजकान्ससदस्पतीन् । अपूजयन्महाभागान् यथावत्सुसमाहितः ॥ १ ।
अथ चैत्रे सिते पक्षे राजानः प्रतिपत्तिथौ । ध्वजानारोपयामासुर्विधिनाऽध्वरमण्डपे ॥ २ ॥
श्रीविष्णुदास उवाच
आरोपिता ध्वजाः प्रोक्ताः पार्थिवैर्यज्ञमण्डपे । गुरो तेषां विधानं मां सम्यग्वक्तुं त्वमर्हसि । ३ ।


॥ ४०-४३ ॥ किसीके लिए भोजनका निषेध नहीं था। अर्थात् कोई भूखा नहीं रहता था। सबके भोजन कर लेनेके बाद रामचन्द्रजी स्वयं सीताके बारम्बार प्रार्थना करनेपर अपने पुत्र, मित्र, बन्धु एवं सचिवोंके साथ भोजन करते थे ॥ ४४। पृथ्वीमें जितनी रेणुकण हैं जितने जलविन्दु हैं तथा आकाशम जितने नक्षत्र हैं उतनी संख्यामें ब्राह्मण प्रभृति पुरुष एवं स्त्रीवृन्द रामचन्द्रके यज्ञमें प्रतिदिन भोजन करत थे ॥ ४५ । ४६ । रामचन्द्रके भोजनोपरान्त श्रीसीताजी भी सास, मन्त्रिपत्नी तथा देवपत्नियोंके साथ दिव्य अन्न खाती थीं । ४७॥ पुनः चौथे पहर यज्ञमण्डपमें सभा करके कथा, हरिकीर्तन, पुण्यप्रद शास्त्रचर्चा तथा वेश्याओंके नृत्यगान द्वारा राम अवशिष्ट समय बिताते थे । ४८ । पुनः सायंकाल सन्ध्या एवं हवनकृत्य पूर्ण करके कथादिके द्वारा रात्रिके दो प्रहर बिताकर सब लोगोंको शयन करनका आज्ञा देत थे ॥ ४९ । ५० ॥ तब सब लोग अपने अपने स्थानों- पर सानन्द शयन करते थे। राम भी अपने इष्टदेवताका हृदयमें स्मरण करके भूमिपर पट्टदुकूलासन बिछा तथा जितन्द्रिय होकर सीताके साथ सोते थे ॥ ५१ ॥ राजाओंकी आज्ञा तोडना, ब्राह्मणोंका मानमर्दन एवं स्त्रियोंकी पृथक् शय्या करना अशस्त्रवध कहलाता है। अतः भगवान् रामचन्द्र सीताके साथ ही सोते थे ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ इस प्रकार यज्ञमें भगवान्‌का वह प्रतिदिनका काम था ॥ ५४ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्ड यज्ञारम्भे रामचर्यावर्णनं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

श्रीरामदास कहने लगे— सौत्यपर्वके दिन राजा रामचन्द्रने सावधान होकर याजकों एवं सदस्योंकी यथावत् पूजा की ॥ १ ॥ चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदाके दिन राजालोग विधिपूर्वक यज्ञमण्डपके ऊपर ध्वजाओंको फहराने लगे । २॥ विष्णुदासने कहा— हे गुरो ! आपने कहा कि राजा लोग यज्ञमण्डपके ऊपर ध्वजा

२३२आनन्दरामायणे[ सर्गः ७

श्रीरामदास उवाच

सम्यक्प्रश्नः कृतः शिष्य त्वया लोकोपकारकः । सावधानमना भूत्वा शृणुष्व त्वं मयोच्यते ॥ ४ ॥
नारम्भ्यां व्रतं चैवं पूर्वदृष्ट्या सभागमम् आरोपितो ध्वजाः सर्वेर्यज्ञवाटे तदा मुदा ॥ ५ ॥
ते चेद्विष्णुगृहेन्वागेष्वारोपणीया ध्वजा नृभिः । मधुशुक्लदशम्यां वा पुण्यायां प्रतिपत्तिथौ ॥ ६ ॥
अथवा रोपणं कार्यं श्रीरामनवमीदिने । मधुशुक्लदशम्यां वा दशम्यामश्विने सिते ॥ ७ ॥
अथवोजेऽथ नभसि शुक्लप्रतिपदोऽपि भो द्विज । एते कल्पा मया प्रोक्ता व्रतस्यास्य नरोत्तमः ॥ ८ ॥
अधुना संप्रवक्ष्यामि ध्वजारोपणमुत्तमम् । व्रतं पापहरं पुण्यं रामसंतोषकारकम् ॥ ९ ॥
यः कुर्याद्विष्णुभवने ध्वजारोपणसंज्ञकम् । महत्पुण्यं विचित्सार्थैः किमन्त्यैर्बहुभाषितैः ॥ १० ॥
हेमभारसहस्रं तु यो दद्याच्च कुटुम्बिने । तत्फलं समवाप्नोति ध्वजारोपणकर्मणः ॥ ११ ॥
ध्वजारोपणतुल्यं स्थान्न गंगास्नानमुत्तमम् । न वरा तुलसीसेवा शिवलिंगप्रपूजनम् ॥ १२ ॥
अहोऽश्वमेधोऽश्वमेधोऽयं महत्कर्म सर्वपापहरं कर्म ध्वजारोपणसंज्ञितम् ॥ १३ ॥
तानि सर्वाणि वक्ष्यामि शृणु त्वं गदतो मम ॥ १४ ॥
अथ चैत्रे सिते पक्षे व्रतं हि प्रतिपत्तिथौ । मधुशुक्लदशम्यां वा नवम्यां राघवस्य वा ॥ १५ ॥
कार्यं वाऽऽश्विनमासस्य दशम्यां शुक्लपक्षके । ऊर्जशुक्लप्रतिपदि दशम्यां वा विधीयताम् ॥ १६ ॥
अवश्यं चैत्रमासे हि कार्यं चैतद्व्रतोत्तमम् । अतिक्रान्ते चैत्रमासे कार्यं चैतरवर्षेषु ॥ १७ ॥
चैत्रशुक्लप्रतिपदि प्रभाते प्रयतो नरः । स्नानं कुर्यात्प्रयत्नेन दन्तधावनपूर्वकम् ॥ १८ ॥
ततः कृत्वा नित्यकर्म पश्चाद्विष्णुं समर्चयेत् । चतुर्भिर्ब्राह्मणैः सार्द्धं कृत्वा च स्वस्तिवाचनम् ॥ १९ ॥
नान्दीश्राद्धं प्रकुर्वीत ध्वजारोपणकर्मणि । ध्वजस्तम्भौ च गायत्र्या प्रोक्षयेद्वस्त्रसंयुतौ ॥ २० ॥
पताकयोर्लेखनीयौ वैनतेयाञ्जनासुतौ । सूर्यं चन्द्रं मारुतिं च वैनतेयं प्रपूजयेत् ॥ २१ ॥
धातारं च विधातारं पूजयेत्कुम्भकद्वये । हरिद्राऽक्षतदूर्वाद्यैः शुक्लपुष्पैर्विशेषतः ॥ २२ ॥


...। जो उस ध्वजारोपणका क्या विधान है यह कृपा करके मुझे बताइए ॥ ३ । श्रीरामदासजीने कहा कि-हे शिष्य ! तुमने अच्छा प्रश्न किया है। यह प्रश्न लोकोपकारक है। तुम सावधान होकर सुनो। मैं कहता हूँ ॥ ४ ॥ ध्वजारोपणका कार्य समयको प्राप्त जानकर राजाओंने यज्ञमण्डपमें ध्वजाओंको आरोपित करना आरम्भ कर दिया ॥ ५ ॥ यज्ञका समय न हो तो चैत्र शुक्लपक्षकी प्रतिपदा विष्णुमन्दिरके ऊपर ध्वजा आरोपित करे ॥ ६ ॥ अथवा रामनवमी दशमी तथा विजयादशमीको ध्वजारोपण करे । ७॥ अथवा कार्तिकशुक्ल प्रतिपदाको ध्वजारोपण करे । ये ही विधियाँ ध्वजारोपणके लिए उत्तम होती हैं जो मैंने तुम्हें बतलायी है ॥ ८ ॥ अब मैं ध्वजारोहण व्रतका विधान बतलाता हूँ यह व्रत रामको अत्यन्त प्रिय और अमोघ पुण्यात्पादक है ॥ ९ ॥ इस विषयमें अधिक बहुतों की आवश्यकता नहीं है। जो प्राणी विष्णुमन्दिरके ऊपर ध्वजारोपण करता है, उसकी ब्रह्मादिक पदमा भी पूजा करना * ॥ १० ॥ कुटुम्बी विप्रको हजार तोला सुवर्ण दानम जो फल प्राप्त होता है, वही फल ध्वजारोपणका भी है ॥ ११ ॥ ध्वजारोपण कर्मके समान न गङ्गास्नान है न तुलसीसेवा और न शिवपूजा ही है । १२ ॥ यह कार्य इतना उत्तम है कि इसको करनेसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं । १३ ॥ इसका सब विधान मैं तुम्हें बतलाता हूँ- सुनो ॥ १४ । इसको करनेका चैत्रादि मास उपयुक्त समय है । यदि इनमेंसे पहला समय न मिले तो इतर वर्षमें ही ध्वजारोपण करे ॥ १५-१७ ॥ चैत्र शुक्ल प्रतिपदाको प्रातःकाल दन्तधावनपूर्वक स्नान करे । १८ । फिर नित्यकर्मसे निवृत्त होकर विष्णुभगवान्- की पूजा करे । तदनन्तर चार ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराके नान्दीश्राद्ध करे और वस्त्रामृत ध्वजाओंको गायत्रीमन्त्रसे प्रोक्षित करे ॥१९॥ उन ध्वजाओंमें गरुड़ और हनुमान्जीका चित्र बना रहे । फिर उसपर सूर्य चन्द्र- गरुड़ एंव हनुमानजीकी पूजा करे । तदनन्तर दो घरोंपर हरिद्रा, अक्षत, दूर्वा एवं विशेष करके श्वेत पुष्प-

सर्गः ७ ] | यागकाण्डम् | २३३

सर्गः ७ ] | यागकाण्डम् | २३३

ततो गोचर्ममात्रं तु स्थण्डिलं चापलिप्य च। शालावाग्निं समुद्धृत्य स्थापयेद्वह्निकल्पवत् ॥२३। जुहुयात्पायसेनेव घृतेनाष्टोत्तरं शतम् । प्रथमं पौरुषं सूक्तं विष्णोर्नूकमनन्तरम् ॥२४॥ ततश्च वैनतेयाय स्वाहेत्यष्टहुतीस्तथा। मातङ्गेनाहुतीश्च कृत्वा स्वाहेति होमयेत् ॥२५। सोमो धेनुं समुच्चार्य जुहुयात्सम्पदन्तरम्। वैष्णवं मन्त्रमन्त्रं जपेत्तत्र शान्तिसूक्तानि भक्तितः ॥२६। रात्रौ जागरणं कुर्यादग्रतो हरेः शुचिः। एवं नवदिनं कार्यं पूजनं परमोत्सवः ॥२७॥ यथाऽग्रे जागरणं कुर्यान्नित्यं सुकीर्तनैः। ततो दशांशमष्टमिं सम्पूज्याथ व्रती शुचिः । २८। प्रातः स्नात्वा नित्यकर्म समाप्य च ततः परम्। गन्धपुष्पादिभिर्देवानर्चयेत्पूर्ववत्क्रमात् ॥२९॥ ततो मङ्गलवाद्यैश्च शुक्लपर्यङ्कके शोभने। नृत्यैश्च स्तोत्रपठनैर्नयेद्विष्ण्वालयं ध्वजम् ॥३०॥ देवस्य द्वारदेशे वा शिखरे वा मुदान्वितः। सुस्थिरं स्थापयेद्ध्वजं ध्वजस्तम्भं सुशोभितम् ॥३१॥ मधुपूपाक्षतैर्दीपैर्धूपैर्नमनोरमैः। भक्ष्यभोज्यादिसंयुक्तैर्नैवेद्यैश्च हरिं यजेत् ॥३२। आप्रतिपदारभ्य दशम्यवधि सत्वरैः। ध्वजयोः पूजनं कुर्यादेकादश्यां हरिन्मन्दिरे ॥३३। आरोपणीयं शिखरे पुरतो वा यथामुखम्। अथवा रोपणौयो हि दशम्यां तौ ध्वजोत्तमो। ३४। नवम्यां वा द्वितीयायां चतुर्थ्यामष्टमीदिने। पञ्चम्यां वा रोपणीयो तौ पूर्वं पूज्य यथाविधि ॥३५। व्रतस्य प्रतिपद्येव प्रारम्भोनतरे दिने। पूर्वोक्तेषु हरेः कार्यो न मासेष्वितरेषु च ॥३६॥ माघामितचतुर्दश्यामेवं शम्भोर्गृहे ध्वजो। नन्दीभृङ्ग्यङ्कितौ कृत्वा रोपणीयो यथाविधि ॥३७॥ आश्विनस्य सिताष्टम्यां मधोर्वा गिरिजागृहे। नभस्यस्य चतुर्थ्यां हि प्रोक्तो गणपतेर्गृहे ॥३८। मार्गशीर्षे शुक्लषष्ठयामेवं मार्तण्डमद्गृहे। एवं हि सर्वदेवानामुत्तरादिवसेष्वपि ॥३९।


के पत्र और विधानकी पूजा करे। तदनन्तर गोचर्ममात्र स्थण्डिलके ऊपर परिसमूहनादि पञ्चभूमस्कार करके रक्षणयोग्य गृहोक्त विधानसे कुण्डमे अग्नि स्थापित करे ॥ २०-२३॥ पुनः क्रमशः पायस और घृतसे आघार-आज्यभाग नामकी अष्टात्तरशत आहुति दे। अथवा आधारराज्यभागको आहुति देकर पुनः क्रमशः पायस और घृतकी अष्टोत्तरशत आहुति दे। प्रथम आहुतियां पुरुषसूक्तके मन्त्रोंसे और दूसरी आहुतियां विष्णोर्नूकं इस मन्त्रसे दे ॥ २४ ॥ फिर गरुडके निमित्त आठ आहुतियां और मातङ्गिके निमित्त आठ आहुतिये हवन करे 'गरुडाय स्वाहा' मन्त्रसे पहली आठ आहुतियां एवं 'मातङ्गये स्वाहा' इस मन्त्रसे दूसरी आठ आहुतियां दे ॥ २५ ॥ पुनः 'सोमो धेनु' मंत्रका उच्चारव करके संसम्पूक्त हवन करे। तदनन्तर सौर मन्त्रोंका जप और शान्तिसूक्तका पाठ करे ॥ २६ ॥ रात्रिमे श्रीहरिके समीप जागरण करे। फिर दशमी-को सम्भ्रमसबके साथ भगवान्‌का पूजन करे ॥ २७ ॥ नित्य हरिकीर्तन करके नवरात्र पर्यन्त जागरण करे। दशवे दिन प्रातः स्नान-संध्यादि नित्यकृत्योंसे निवृत्त होकर पूर्ववत् पूजनसम्भारसे भगवान्‌की पूजा करे ॥ २८ ॥ २९ ॥ इसके बाद मंगलमय वाद्य-गाजेके साथ स्त्रापपात्र करते हुए ध्वजाको विष्णुमन्दिरमे ले जाय ॥ ३० ॥ मन्दिरके द्वार तथा शिखरपर पुष्पमालासे सुशोभित ध्वजका स्थापित करे। ३१ ॥ वहां गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप एवं भक्ष्य-भोज्यादि युक्त नैवेद्यसे श्रीहरिका पूजन करे अथवा प्रतिपदासे लेकर दशमी तक क्रमसे ध्वजाओंकी पूजा करके एकादशीको विष्णुमन्दिरके शिखर या द्वारपर उन ध्वजाओ-को स्थापित करे। अथवा दशमीको ही स्थापित कर दे । ३२-३४ । अथवा द्वितीया, चतुर्थी षष्ठी, अष्टमी तथा नवमीको सुविधानुसार समय देखकर उपर्युक्त विधानसे पूजा करके ध्वजा स्थापित करे ॥ ३५ ॥ किन्तु व्रतका प्रारम्भ प्रतिपदाको ही होता है। श्रीहरिके निमित्त ध्वजारोपण पूर्वोक्त मासोंमें ही करे, अन्य मासमे नहीं । ३६ ।। इसी प्रकार माघकृष्ण चतुर्दशीका शिवालयपर ध्वजारोपण करे। उस ध्वजामें यथाविध नन्दी और भृङ्गीकी अंकित करे ॥ ३७ । आश्विन शुक्ल अष्टमीको या चैत्रके नवरात्रमे पार्वतीके मन्दिरपर ध्वजा फहराये। भाद्रपद चतुर्थीको गणेशके मन्दिरपर ध्वजारोपण करे। ३८ ।। मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठिको सूर्यके मन्दिरपर ध्वजस्थापन करे। इस प्रकार देवताओ के उत्तरादिवसमें ही यह कार्य सम्पन्न करे ॥ ३९ ॥

२३४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७


मधूर्जाश्विनमासेषु विना विष्णोर्न चेतरे । एवं देवालये स्थाप्य शोभनौ तौ ध्वजोत्तमौ ॥४०॥
संपूज्य विष्णुं विधिवत् वित्तशाठ्यं विना ततः । प्रदक्षिणमनुव्रज्य स्तोत्रेणेदमुदीरयेत् ॥४१॥
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज ॥४२॥
येनेदमखिलं जातं यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् । लयमेष्यति यत्रैतत् प्रणतोऽस्मि माधवम् ॥४३॥
न जानंति परं देवं मयं ब्रह्मादयः सुराः । योगिनो यं प्रशंसति तं वंदे ज्ञानरूपिणम् ॥४४॥
अन्तरिक्षं तु यन्नाभिर्द्यामूर्धा यस्य चैव हि । पादादभूच्च वै पृथ्वीं तं वंदे विश्वरूपिणम् ॥४५॥
यस्य श्रोत्रे दिशः सर्वा यच्चक्षुर्दिनकृच्छशी । ऋक्सामयजुषो येन तं वंदे ब्रह्मरूपिणम् ॥४६॥
यन्मुखाद्ब्राह्मणा जाता यद्बाह्वोश्चाभवन्नृपाः । वैश्या यस्योद्गता जाताः पद्भ्यां शूद्रस्त्वजायत ॥४७॥
मनसश्चंद्रमा जातो दिनेशश्चक्षुषस्तथा । प्राणेभ्यः पवनो जातो मुखादग्निरजायत ॥४८॥
पापसं दाहमात्रेण वदंति पुरुषं तु यम् । स्वभावविमलं शुद्धं निर्विकारं निरंजनम् ॥४९॥
क्षीराब्धिशायिनं देवमनवद्यमपराजितम् । सहस्रकमलं विष्णुं भक्तिगम्यं नमाम्यहम् ॥५०॥
पृथ्व्यादीनि भूतानि तन्मात्राणींद्रियाणि च । सुसूक्ष्माणि च येनासंस्तं वंदे सर्वतोमुखम् ॥५१॥
यदब्रह्म परमं धाम सर्वलोकोत्तमोत्तमम् । निर्गुणं परमं सूक्ष्मं प्रणतोऽस्मि पुनः पुनः ॥५२॥
निर्विकारमजं शुद्धं सर्वज्ञं वह्निमीश्वरम् । यमामनंति योगींद्राः सर्वकारणकारणम् ॥५३॥
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकदाः । त्रीँल्लोकान् व्याप्य भूतात्मा भुंक्ते विषयमव्ययः ॥५४॥
निर्गुणः परमानंदः स मे विष्णुः प्रसीदतु । हृदयस्थोऽपि दूरस्थो मायया मोहितात्मनाम् ॥५५।
ज्ञानिनां सर्वधर्मस्थु स मे विष्णुः प्रसीदतु । चतुर्भिञ्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पंचभिरेव च ॥५६।
हृयते च पुनर्द्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदतु । ज्ञानिनां कर्मणा चैव तथा भक्तिमतां नृणाम् ॥५७॥

चैत्र आश्विन तथा कार्तिक इन तीन मासामें विष्णुके सिवाय अन्य देवताकाक लिए ध्वजारोपण नहीं करना चाहिए ॥ ४० ॥ इस प्रकार वित्तशाठ्य त्यागकर देवालयपर ध्वजारोपण करक विधिवत् विष्णुको पूजा करे । तदनन्तर प्रदक्षिणा करके इस स्तोत्रका पाठ करे—। ४१ ॥ हे पुण्डरीकाक्ष ! हे हृषीकश ! हे महापुरुषपूर्वज ! आपको बनकणः प्रणाम है ॥ ४२ ॥ जिससे यह संसार उत्पन्न हुआ है, जिसके आधारपर टिका हुआ है और जिसमें लय होगर, मै उन माधव भगवान्‌को प्रणाम करता हूँ ॥ ४३ ॥ जिसका ब्रह्मादि देवता भो भला भांति नहीं जानन और योगी जिनकी प्रशंसा करते हैं, उन परब्रह्म परमा त्मक। म प्रणाम करता हूँ ॥४४॥ अन्तरिक्ष जिसको नाभि है आकाश जिसका मस्तक है ओर जिसके चरणसे भूमि उत्पन्न हुई है, मैं उस ब्रह्माण्डको प्रणाम करता हूँ ॥ ४५ ॥ दिशाए जिसके कान हैं, सूर्य एवं चन्द्र जिसके नेत्र हैं, ऋक्साम एवं यजुर्वेद जिससे उत्पन्न हुए हैं, उस ब्रह्माको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४६ ॥ जिसके मुखस ब्राह्मण, बाहुसे क्षत्रिय, ऊरुस्थलसे वैश्य और पैरोंसे शुद्र उत्पन्न हुए हैं, उन ई वरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४७ ॥ स्वभावतः निरंजन, निष्कल, निर्विकार एवं शुद्ध परमात्माक नामस्मरणमात्रने समस्त पापसमूह नष्ट हो जाता है ॥ ४८ ॥ जिसके मनसे चन्द्रमा, चक्षुष सूर्य प्राणोंसे पवन एव मुखसे अग्नि उत्पन्न हुआ है, उस परमात्माको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४९ ॥ क्षीरसागरम शयन करनेवाले, अशोक प्रेमी, भक्तिगम्य, अपराजित और अनन्तस्वरूप विष्णुको मै प्रणाम करता हूँ ॥ ५० । पृथिव्यादि पञ्चभूत, तन्मात्रा, एकादश इन्द्रियाँ और सूक्ष्म प्राणसमूह जिससे उत्पन्न हुए हैं, उन सर्वतोमुख भगवान्‌को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५१ ॥ जो ब्रह्म है, सर्वलोकोत्तम उत्तम है निर्गुण हे एवं परम सूक्ष्म है, उस परमात्माको मै पुन प्रणाम करता हूँ ॥ ५२ । योगन्द्रजन जिसको निर्विकार अज, शुद्ध, ईश्वर एवं संसारका आदि कारण कहते हैं, उस परब्रह्मको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५३ ॥ जो विश्वव्यापक और अव्यय है, जो एक होता हुआ भी अलग-अलग पञ्च महाभूतों एवं तीनों लोकोंमें व्याप्त है, उस भूतात्माको मै प्रणाम करता हूँ ॥ ५४ ॥ जो निर्गुण है, परमानन्दस्वरूप है और हृदयमें रहते हुए भी जिस प्राणीको आत्मा मायासे मुग्ध है, वह उससे दूर है ॥ ५५ ॥ जो ज्ञानियोंका सर्वस्व है। वह विष्णु