गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
कण्डिका २५ ॥
४२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २५ ॥ पिछले [ प्रश्न ] हैं--( मन्त्रः ) मन्त्र [ गूढ विचार ] में । १ । ( कल्पः ) कल्प [ संस्कारविधान ] में । २ । ( ब्राह्मणम् ) ब्राह्मण ग्रन्थ में । ३ । ( ऋग् ) ऋग्वेद में । ४ । ( यजुः ) यजुर्वेद में । ५ । ( साम ) सामवेद में । ६ । ( कस्मात् ब्रह्मवादिनः ओङ्कारम् ) किसलिये ब्रह्मवादी लोग ओङ्कार को ( आदितः कुर्वन्ति ) आरम्भ में करते हैं, ( किं दैवतम् ) क्या देवता है । ७ । ( किं ज्योतिषम् ) क्या ज्योति है । ८ । ( किं निरुक्तम् ) क्या निरुक्त है । ६ । ( किं स्थानम् ) क्या स्थान है । ( का प्रकृतिः ) क्या प्रकृति है । ११ । ( किं अध्यात्मम् ) क्या अध्यात्म [ आत्मज्ञान ] है । १२ । ( इति षट्त्रिंशत् प्रश्नाः ) यह छत्तीस प्रश्न हैं, ( पूर्वोत्तराणां त्रयः वर्गाः द्वादशकाः ) पहिले और पिछले प्रश्नों के तीन वर्ग द्वादशक [ बारह बारह के समूह ] हैं । ( एतैः ओङ्कारं व्याख्यास्यामः ) इन [ प्रश्नों ] से ओङ्कार की हम व्याख्या करेंगे ॥ २४ ॥ विशेषः--इन छत्तीस प्रश्नों के उत्तर आगे कण्डिका २६ से आरम्भ होंगे । कण्डिका २५ ॥ इन्द्रः प्रजापतिमपृच्छद् भगवन्नभिसूय पृच्छामीति, पृच्छ वत्सेत्यब्रवीत् किमयमोङ्कारः कस्य पुत्रः किञ्चैतच्छन्दः किञ्चैतद्वर्णः किञ्चैतद् ब्रह्मा ब्रह्म सम्पद्यते तस्माद् नै तद्ब्रह्मोङ्कारं पूर्वमालेभे स्वरितोदात्त एकाक्षर ओङ्कार ऋग्वेदे, त्रैस्वर्योदात्त एकाक्षर ओङ्कारो यजुर्वेदे, दीर्घप्लुतोदात्त एकाक्षर ओङ्कारः सामवेदे, ह्रस्वोदात्त एकाक्षर ओङ्कारोऽथर्ववेदे उदात्तोदात्तद्विपद अ उ इत्यर्द्ध- चतस्रो मात्रा मकारे व्यञ्जनमित्याहुर्या सा प्रथमा मात्रा ब्रह्मदेवतया रक्ता वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद ब्राह्मं पदं, या सा द्वितीया मात्रा विष्णुदेवतया कृष्णा वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद वैष्णवं पदं, या सा तृतीया मात्रेशान- देवत्या कपिला वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेदैशानं पद, या सार्द्धचतुर्थी मात्रा सर्वदेवतया व्यक्तीभूना खं विचरति शुद्धस्फटिकसन्निभा वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेत्पदनामकमोङ्कारस्य चोत्पत्तिंविप्रो यो न जानाति तत्पुनरुपनयनं तस्माद् ब्राह्मणवचनमादत्तंव्यं यथा लातव्यो गोत्रो ब्रह्मणः पुत्रो गायत्रं छन्दः शुक्लो वर्णं पुंसो वत्सो रुद्रो देवता ओङ्कारो वेदानाम् ॥ २५ ॥ कण्डिका २५ ॥ आख्यायिका ओंङ्कार के विषय में इन्द्र के प्रश्न और प्रजापति के उत्तर ॥ (इन्द्रः) इन्द्र [जीवात्मा] ने (प्रजापतिम् ) प्रजापति [इन्द्रिय आदि के पालने वाले जीवात्मा अर्थात् अपने ] से ( अपृच्छत् ) पूछा - ( भगवन् ) हे भगवन् ! [ ऐश्वर्य वाले ] ( अभिसूय ) [ विद्या में ] सब ओर से स्नान करके ( पृच्छामि इति ) मैं पूछता हूँ । [ प्रजापति ने कहा ]--( व स पृच्छ ) बच्चा ! पूछ (इति) ऐसा [प्रजापति] (अब्रवीत्) बोला-( किम् अयम् ओङ्कारः ) यह ओङ्कार क्या है-१, ( कस्य पुत्रः ) यह किस २५-( इन्द्रः ) जीवात्मा ( प्रजापतिम् ) प्रजानामिन्द्रियादीनां पालकमा- त्मानम् ( अभिसूय ) अभि + षुञ् अभिषवे-ल्यप् । विद्यायामभितः स्नात्वा ।
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २५ ॥ ४३ का पुत्र [ नरक से बचाने वाला सन्तान ] है--२, ( किञ्च एतत् छन्दः ) और यह क्या छन्द है [ आनन्ददायक कर्म वा गायत्री आदि छन्द ]--३, ( किं च एतत् वर्णं . ] और यह क्या रङ्ग है-४, ( किं च एतत् ब्रह्म ब्रह्मा सम्पद्यते ) और कौन से इस ब्रह्म को ब्रह्मा [ सब वेदों का जानने वाला ] प्राप्त करता है, ( तस्मात् वै तत् भद्रम् ओङ्कारं पूर्वम् आलेभे ) और उससे ही वह [ ब्रह्मा ] उस मंगलकारी ओङ्कार को पहिले पाता है--५ । [ यहाँ शंका होती है ]-( स्वरितोदात्तः एकाक्षरः ओंकारः ऋग्वेदे ) स्वरित और उदात्त स्वर वाला, एक अक्षर वाला, ओंकार ऋग्वेद में है । ( त्रैस्वर्योदात्तः एकाक्षरः ओंकारः यजुर्वेदे ) तीनों स्वर [ ह्रस्व दीर्घ प्लुत ] के सहित उदात्त एक अक्षर वाला ओंकार यजुर्वेद में है । ( दीर्घप्लुतोदात्तः एकाक्षरः ओंकारः सामवेदे ) दीर्घ- प्लुत के सहित उदात्त एक अक्षर वाला ओंकार सामवेद में है । ( ह्रस्वोदात्तः एकाक्षरः ओंकारः अथर्ववेदे ) ह्रस्व स्वर के साथ उदात्त एक अक्षर वाला ओंकार अथर्ववेद में है । ( उदात्तोदात्तद्विपदः अ उ इति अर्धचतस्रः मात्राः, मकारे व्यञ्जनम् इति आहुः ) उदात्त सहित उदात्त दो पद वाला अ उ यह साढ़े चार मात्रायें हैं और मकार में व्यञ्जन है, ऐसा कहते हैं । [ शंका समाधान ] ( या प्रथमा मात्रा सा ब्रह्मदेवतया वर्णेन रक्ता ) जो पहिली मात्रा है वह ब्रह्म देवता वाली रङ्ग से लाल है, ( यः तां नित्यं ध्यायते सः ब्राह्म्यं पदं गच्छेत् ) जो पुरुष नित्य उस [ मात्रा ] का ध्यान करे, वह ब्राह्म्य पद [ ब्रह्म के स्थान ] को प्राप्त हो । ( या द्वितीया मात्रा सा विष्णुदेवतया वर्णेन कृष्णा ) जो दूसरी स्वर मात्रा है वह विष्णु देवता वाली रङ्ग से काली है ( यः तां नित्यं ध्यायते सः वैष्णवं पदं गच्छेत् ) जो पुरुष उसका नित्य ध्यान करे वह वैष्णव पद [ विष्णु=सर्व- व्यापक परमात्मा के स्थान ] को पावे । ( या तृतीया मात्रा सा ऐशानदेवतया वर्णेन कपिला ) जो तीसरी स्वर मात्रा है वह ऐशान देवता वाली रङ्ग से पीली है, ( यः तां नित्यं ध्यायते सः ऐशानं पदं गच्छेत्) जो उस मात्रा का नित्य ध्यान करे, वह ऐशान पद [ ईशान सबके ईश्वर परमात्मा के स्थान ] को पावे । ( या अर्धचतुर्थी मात्रा, सा सर्वदेवतया व्यक्तीभूता खं विचरति वर्णेन शुद्धस्फटिकसन्निभा ) जो आधी के साथ चौथी [ डेढ़ ] स्वर मात्रा है वह सब देवताओं वाली प्रकाशमान होकर आकाश में विचरती है, रङ्ग से उज्ज्वल विल्लोरमणि के समान है, ( यः तां नित्यं ध्यायते स अनामकं पदं स्नातको भूत्वा ( त्रैस्वर्योदात्तः) त्रिस्वर-ष्यञ् । त्रिस्वरेण ह्रस्वदीर्घप्लुतेनोदात्तः । ( अर्धचतस्रः ) अर्धेन सह चतस्रः ( ध्यायते ) चिन्तयति ( गच्छेत् ) प्राप्नुयात् ( ब्राह्म्यम् ) ब्रह्मन्+ष्यञ् । ब्रह्मसम्बन्धि । ( अर्धचतुर्थी ) अर्धेन सह चतुर्थी ( व्यक्तीभूता ) प्रकाशमाना सती ( शुद्धस्फटिकसन्निभा ) उज्ज्वलस्फटिकमणिसदृशा ( अनामकम् ) नामशून्यम् ( उत्पत्तिः ) द्वितीयार्थे प्रथमा । उत्पत्तिम् ( उपनयनम् ) विद्यारम्भसंस्कारः ( ब्राह्मणवचनम् ) ब्रह्मवादिनः कथनम् ( लातव्यः ) ला
कण्डिका २६ ।
४४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २६ ॥ गच्छेत् ) जो पुरुष उस [ स्वर मात्रा ] का नित्य ध्यान करे, वह अनामक पद [ नामशून्य परमात्मा के स्थान ] को पावे । ( ओंकारस्य च उत्पत्तिः यः विप्रः न जानाति तत् पुनः उपनयनम् ) और ओंकार की उत्पत्ति को जो ब्राह्मण नहीं जानता उसका फिर उपनयन संस्कार होवे [ अर्थात् वेद की विद्या फिर आरम्भ से पढ़े ] । ( तस्मात् ब्राह्मणवचनम् आदर्त्तव्यम् ) इसलिये ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञानी ] का वचन आदर योग्य है-- [ पाँच प्रश्नों के यह उत्तर हैं ] ( यथा ) जैसे [ यह बात ] ( लातव्यः ) ग्रहण योग्य है । ( गोत्रः ) पृथिवी का रक्षक १, ( ब्रह्मणः पुत्रः ) ब्रह्मा का पुत्र [ कण्डिका १६ ] २, ( गायत्र छन्द ) गायत्री [ दैवी गायत्री ] छन्दः ३, ( शुक्लः वर्णः ) शुक्ल वर्ण [ आदित्य वर्ण ] ४, और ( पुंसः १ ) बढ़ाने वाला ( वत्सः ) बसाने वाला. ( रुद्रः ) ज्ञान देने वाला, ( वेदानां देवता ) सब वेदों का देवता [ प्रकाश्य विषय ] ( ओंकारः ) ओंकार है ५, ॥ २५ ॥ भावार्थः--मनुष्य को चाहिये कि ज्ञान पूर्वक ओंकार का विविध प्रकार ध्यान करके आत्म शक्ति बढ़ाकर सदा उन्नति करे ॥ २५ ॥ कण्डिका २६ । को धातुरित्यापृधातुरवतिमप्येके रूपसामान्यादर्थसामान्यन्नेदीयस्तस्मा- दापेरोङ्कारः सर्वमाप्नोतीत्यर्थः कृदन्तमर्थवत् प्रातिपदिकमदर्शनं प्रत्ययस्य नाम सम्पद्यते निपातेषु चैनं वैयाकरणा उदात्तं समामनन्ति तदव्ययीभूत मन्वर्थवाची शब्दो न व्येति कदाचनेति । सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥ को विकारी च्यवते प्रसारणमाप्नोति रावावपकारौ २ विकार्यावादित ओङ्कारो विक्रियते द्वितीयो मकार एवं द्विवर्ण एकाक्षर ओमित्योङ्कारो निर्वृत्तः ॥ २६ ॥ कण्डिका २६॥ कण्डिका २४ के ओम् विषयक प्रश्नों के उत्तर । ( कः धातुः इति ) कौन धातु है-[ इसका उत्तर ] ( आप्तुः धातुः अवतिम् आदाने--तव्यत् । ग्राह्यः ( गोत्रः ) गो + त्रैङ् पालने-कः । भूमिरक्षकः ( पुंसः १ ) पुंस अभिवर्धने--अच् । अभिवर्धकः ( वत्सः ) वृतृवदिवचिवसि० ( उ० ३ । ६२ ) वस निवासे--सः । निवासयिता ( रुद्रः ) रु गतौ--क्विप्, तुक् + रा दाने--कः ज्ञानदाता ( देवता ) प्रकाश्यविषयः । ( ओंकारः ) ओंकारस्य ( वेदानाम् ) वेदानां मध्ये ॥ १. यहाँ "पुमान् पुरुमना भवति । पुंसतेर्वा" ( निरु० ६ । १५ ) अर्थात् [ स्त्री की अपेक्षा ] बहुत उदार होता है, या पुरुषार्थी होता है, ऐसी व्युत्पत्ति निरुक्त की है। इसी प्रकार रुद्र के लिये निरुक्त १० । ५ देखें । सम्पा० ॥ २. भ्रष्टोऽयं पाठः । "आपाववकारौ" एष युक्तः पाठः प्रतीयते, तदनुसारी चार्थः संशोध्य प्रकाश्यते । जर्मनसंस्करणे तु "आप्नोतेराकारपकारौ" इति पाठः स चापि युक्तः । सम्पा० ॥
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २६ ॥ ४५ अपि एके ) आप् [ व्यापना ] धातु है, अवति [ रक्षा करना ] को भी कोई कोई [कहते हैं] ( रूपसामान्यात् अर्थसामान्यं नेदीयः तस्मात् आप्तेः ओंकारः सर्वम् आप्नोति इति अर्थः ) रूप की समानता [ धातु आदि की आकृति ] की अपेक्षा अर्थ की समानता अधिक निकट होती है, इसलिये आप् [ व्यापना ] धातु से ओंकार सबमे व्यापता है यह अर्थ है १ । ( कृदन्तम् अर्थवत् प्रातिपदिकम् ) कृदन्त अर्थवान् शब्द प्रातिपदिक होता है, [ अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ( पा० १ । २ । ४५ ) अर्थवान् शब्द धातु और प्रत्यय को छोड़ कर प्रातिपदिक होता है ] २ ( अदर्शनं प्रत्ययस्य नाम संपद्यते) प्रत्यय के [ लोप हो जाने की ] अदर्शन संज्ञा होती है । ३ [ प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् ( पा० १ । १ । ६२ ) प्रत्यय के लोप होने पर भी प्रत्यय से होने वाला कार्य होता है ] ( निपातेषु च एनं वैयाकरणाः उदात्तं समामनन्ति ) और निपातों में इस [ ओंकार ] को व्याकरण जानने वाले लोग उदात्त मानते हैं । ( तत् अव्ययीभूतम् अन्वर्थवाची शब्दः कदाचन न व्येति इति ) सो अव्यय होता हुआ पद, अनुकूल अर्थ बताने वाला शब्द कभी भी विकार नहीं पाता है । ( सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ) तीनो लिङ्गों में और सब विभक्तियों में जो सदृश है और जो सब वचनों में विकार नहीं पाता है, वह अव्यय [ विकारशून्य निपात ] है- [स्वरादिनिपातमव्ययम् (पा० १ । १ । ३७) स्वरादि तथा निपात अव्यय हैं] (कः विकारी) कौन विकार वाला है- [ इसका उत्तर ] ( आप्नोतिः प्रसारणं च्यवते ) आप् धातु [ व्यापना ] सम्प्रसारण को पाता है [ इग्यणः सम्प्रसारणम् ( पा० १ । १ । ५ ) यण् के स्थान में इक् करने को सम्प्रसारण कहते हैं ] ( आपो अवकारौ विकार्यौ ) आकार और पकार तथा अकार और वकार दोनों विकार योग्य हैं ( आदितः ओंकारः विक्रियते द्वितीयः मकारः ) आदि में ओंकार रूपान्तर वाला होता है और मकार दूसरा वर्ण है । ( एवं द्विवर्णः एकाक्षरः ओम् इति ओंकारः निर्वृत्तः ) इस प्रकार दो वर्ण [ ओ + म् ] वाला, एक अक्षर वाला ओम् अर्थात् ओंकार सिद्ध होता है ६, १०, ११ ॥ २६ ॥ भावार्थः- इस कण्डिका में यह विचारणीय है- कौन धातु है ? उत्तर-आप् वा आप्लृ [ व्यापना ] और अव [ रक्षा आदि करना ] । ( २ ) प्रातिपदिक क्या है ? उत्तर- कृदन्त अर्थवान् शब्द प्रातिपदिक हैं-( ३ ) स्वर क्या है ? उत्तर-उदात्त । ( ४ ) निपात क्या है ? उत्तर-अव्यय होकर निपात होता है (५) विकारी क्या है ? उत्तर-आप् धातु अर्थात् आप् और अव् दोनों धातु को संप्रसारण होता है, अर्थात् आप् के पकार को बकार होकर बकार को वकार, और वकार को उकार हुआ, इसी प्रकार अव् के वकार को सम्प्रसारण उकार फिर आप् धातु के आ और उ को, और अव् के अ उ को गुण ओ, मकार प्रत्यय होकर ओम् पद सिद्ध होता है । २६-(नेदीयः) अन्तिक-ईयसुन् । अन्तिकबाढयोर्नेदसाधौ ( पा० ५ । ३ । ६३ ) नेदादेशः । समीपतरम् ( सम्पद्यते ) प्राप्नोति ( वैयाकरणाः ) व्याकरण + अण् । न स्वाभ्यां पदान्ताभ्याम् पूर्वौ तु ताभ्यामैच् ( पा० ७ । ३ । ३) यकारात् पूर्वमैच् । व्याकरणवेत्तारः ( समामनन्ति ) म्ना अभ्यासे । मन्यन्ते । (निर्वृत्तः) वृतु वर्तने-क्तः । निष्पन्नः । साधितः ॥
कण्डिका २७ ॥
४६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २७ ॥ उणादि कोष में तो ओम् की सिद्धि इस प्रकार है--अवतेष्टिलोपश्च ( उ० १ । १४२ ) अव रक्षणे--मन्, अन् भाग का लोप और अव् को ऊठ् होकर और ऊठ् को गुण होकर ओम् शब्द सिद्ध हुआ ( ६ ) । कितने वर्ण वाला और ( ७ ) कितने अक्षर वाला है-इनके उत्तर, ओम् दो वर्ण वाला एक अक्षर वाला है। लिङ्ग, वचन, विभक्ति और निपात इन चार प्रश्नों के उत्तर 'सदृशं त्रिषु······' इस कारिका में हैं। ८, ६, १०, ११ । विशेष:--कण्डिका २४ के सब ३६ प्रश्नों के उत्तर कण्डिका २६ और २७ में हैं । हमारी समझ में ठीक ठीक नहीं बैठे, पाठक जन विचार लेवें ।। कण्डिका २७ ॥ कतिमात्र इत्यादेस्तिस्रो मात्रा अभ्यादाने हि प्लवते मकारश्चतुर्थीं किं स्थानमित्युभावोष्ठौ स्थानं नादानुप्रदानकरणौ च द्वयस्थानं सन्ध्यक्षरमवर्णलेशः कण्ठ्यो यथोक्तशेषः पूर्वो विवृतकरणस्थितश्च द्वितीयस्पृष्टकरणस्थितश्च न संयोगो विद्यत १ आख्यात पसर्गानुदात्तस्वरितलिङ्गविभक्तिवचनानि च संस्था- नाध्यायिन आचार्याः पूर्वे बभूवुः श्रवणादेव प्रतिपद्यन्ते न कारणं पृच्छन्त्यथापर- पक्षीयाणां कविः पञ्चालचण्डः परिपृच्छको बभूवां २ वु पृथगुद्गीथदोषान् भवन्तो ब्रुवन्त्विति तद्वाप्युपलक्षयेद्वर्णमक्षरपदांकशो विभक्तामृषिनिषेवितामिति वाचं स्तुवन्ति तस्मात् कारणं ब्रूमो वर्णानामयमिदं भविष्यतीति षडङ्गविदस्तत्तथाऽ धीमहे । किच्छन्द इति गायत्रं हि छन्दो गायत्री वै देवानामेकाक्षरा श्वेतवर्णा च व्याख्याता द्वौ द्वादशको वर्गावेतद् वै व्याकरणं धात्वर्थवचनं शैक्ष्यं छन्दो- वचनं चाथोत्तरो द्वौ द्वादशको वर्गों वेदरहसिकी व्याख्याता मन्त्रः कल्पो ब्राह्म- णमृग्यजुःसामाथर्वण्येषैषा व्याहृतिश्चतुर्णां वेदानामानुपूर्वेणों भूर्भुवःस्वरिति व्या- हृतयः ॥ २७ ॥ कण्डिका २७ ।। कण्डिका २४ के ओम् विषयक प्रश्नों के उत्तर ।। ( कतिमात्रः इति ) वह [ ओम् ] कितनी मात्रा वाला है ? [ उत्तर ] ( आदेः तिस्रः मात्राः अभ्यादाने हि प्लवते मकारः चतुर्थीम् ) आरम्भ से तीन मात्राओं को मन्त्र के आरम्भ में ही वह [ ओम् ] प्राप्त होता है [ प्लुत हो जाता है ] और मकार चौथी मात्रा को [ ओमभ्यादाने ( पा० ८ । २ । ७८ ) ओम् शब्द मन्त्र के आरम्भ में प्लुत होता है ] १२ । ( किं स्थानम् इति ) क्या स्थान २७--( विद्यते ) विद सत्तायाम् लट् । विद्यते । ज्ञायते (संस्थानाध्यायिनः) संस्थान+आ+ध्ये+चिन्तने-णिनिः । संस्थाचिन्तनशीलाः ( आचार्याः ) आङ् + चर गतौ-ण्यत् । वेदव्याख्यातारः ( पञ्चालचण्डः ) तभिविक्षिष्विडि० (उ० १ । ११८) १. 'विद्युते' इति पाठान्तरम् । २. बभूवां वु इत्यस्य स्थाने "बभूव" इति समीचीनः पाठः प्रतीयते । सम्पा० ॥
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २७ ॥ ४७ है ? [ उत्तर ] ( उभो ओष्ठौ स्थानं नादानुप्रदानकरणौ च ) [ उकार और मकार के ] दोनों ओंठ स्थान हैं और दोनों नाद बढ़ाने वाले प्रयत्न हैं, (द्वयस्थानं सन्ध्यक्षरम्) दो स्थान व ला सन्धि-अक्षर होता है, (अवर्णलेशः कण्ठचः) अकार वर्णमात्र कण्ठ स्थान वाला है, (यथोक्तशेषः पूर्वः विवृतकरणस्थितः च ) और ऊपर कहे हुए [ उकार मकार ] का शेष पहिला वर्ण [ अकार ] विवृति प्रयत्न में ठहरा हुआ है, (द्वितीयः स्पृष्टकरणस्थितः च ) और दूसरा [ मकार ] स्पृष्ट प्रयत्न में ठहरा हुआ है। ६, १०, १३, १४, १५ [ कौन संयोग है, इसका उत्तर ] ( संयोगः न विद्यते ) संयोग नहीं है । [ हलोऽनन्तराः संयोगः ( पा० १ । १ । ७ ) मध्य में अच् विना हल् संयोग हो ] १६, [ कौन आख्यात है, कौन उपसर्ग है, कौन स्वर है, कौन लिङ्ग है, कौन विभक्ति है, कौन वचन है--इन छह प्रश्नों के उत्तर ] (संस्थानाध्यायिनः पूर्वे आचार्याः बभूवुः आख्यातोपसर्गानुदात्तस्वरितलिङ्गविभक्तिवचनानि च श्रवणात् एव प्रतिपद्यन्ते कारणं न पृच्छन्ति ) व्यवस्था विचारने वाले पहिले आचार्य हुए थे, आख्यात, उपसर्ग, अनुदात्त, स्वरित, लिंग, विभक्ति और वचन को सुनने से ही वे जान लेते हैं और कारण को नहीं पूछते । १७-२३ [ देखो कण्डिका २६ ] ( अथ अपरपक्षीयाणां कविः पञ्चालचण्डः परिपृच्छकः बभूवाम् = बभूव ) फिर दूसरे पक्ष वालों का कवि पञ्चाल देशवासियों में तीव्र मनुष्य पूंछने वाला हुआ। ( उद्गीथदोषान् तु पृथक् भवन्तः ब्रुवन्तु इति ) उद्गीथ [ उत्तम रीति से वेद गाने ] के दोषों को निश्चय करके अलग अलग अ प [ आचार्य ] लोग बतावें, (तद्व वा अपि वर्ण-अक्षर-पद-अंकशः विभक्त्याम् उपलक्षयेत् ) और वह भी वर्ण वर्ण, अक्षर अक्षर, पद पद, और अंक अंक, करके विभक्ति में बतावे । [ इसका उत्तर ] ( ऋषि- निषेवितां वाचम् स्तुवन्ति इति तस्मात् कारणं ब्रूमः ) ऋषियों की निरन्तर सेवित वाणी को लोग सराहते हैं, इसलिए हम कारण बतलाते हैं। ( वर्णानाम् अयम् इदं भविष्यति इति षडंगविदः तत् तथा अधीमहे ) वर्णों में यह वर्ण यह रूप हो जायेगा, यह षडङ्ग [ शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष यह वेद के छह अङ्ग ] जानने वाले [ मानते हैं ], उसको वैसा ही हम पढ़ते हैं । ( किं छन्दः इति ) क्या छन्द है ? [ उत्तर ] ( गायत्रं हि छन्दः ) गायत्री ही छन्द है । ( देवानां गायत्री वै एकाक्षरा श्वेतवर्णा च व्याख्याता ) देवताओं की गायत्री [ पिङ्गल शास्त्र की देवी गायत्री ] एक अक्षर वाली और श्वेतवर्ण की कही गई है ॥ २४ ॥ ( द्वौ द्वादशकौ वगौ एतत् वै व्याकरणम् धात्वर्थवचनं शैक्ष्यं छन्दोवचनं च ) दो द्वादशक [ बारह बारह के ] वर्ग हैं, यह धातु और अर्थ बताने वाला, छन्द बताने पचि विस्तारे व्यक्तीकरणे च कालन् प्रत्ययः । अमन्ताड् डः ( उ० १ । ११४ ) चण दाने हिंसाने च डप्रत्ययः, यद्वा चडि कोपे-घञ् । पञ्चालेषु देशविशेषवासिषु चण्डः क्रूरनः (परिपृच्छकः) प्रच्छ जिज्ञासायां-ण्वुल् । सर्गतः प्रश्नकर्ता ( तु)
कण्डिका २८ ॥
४८ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २८ ॥ वाला शिक्षा योग्य व्याकरण है [अर्थात् चौबीस भाग में व्याकरण विषय है]। (अथ उत्तरौ द्वौ द्वादशकौ वर्गौ वेदरहसिकी व्याख्याता) और पिछले दो बारह बारह के वर्ग [द्विवचन = एकवचन, अर्थात् पिछला एक द्वादशक] है, [इनमें] वेदरहसिकी [वेदों की निर्जन स्थान में विचारने योग्य विद्या] बतलायी गयी है। (मन्त्रः कल्पः ब्राह्मणम् ऋग् यजुः साम अथर्वाणि एषा व्याहृतिः) मन्त्र [गूढ़ विचार] में, कल्प में ब्राह्मण ग्रन्थ में, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में यह [ओम्] व्याहृति है, १-८। (चतुर्णां वेदानाम् आनुपूर्व्येण ओम् भूः भुवः स्वः इति व्याहृतयः) चारों वेदों की क्रम से ओम् भूः, भुवः, स्वः, व्याहृतियां हैं, ६--१२ [मिलान करो कण्डिका ६ तथा १७-२१]। २७ ॥ भावार्थ:--मनुष्य व्याकरण आदि से ओम् शब्द के अर्थों को एकान्त में विचार कर विघ्नों को हटाकर आनन्द भोगे । २७ ॥ विशेष:--कण्डिका २४ के सब ३६ प्रश्नों के उत्तर कण्डिका २६ और २७ में हैं। हमारी समझ में ठीक ठीक नहीं बैठे, पाठक जन विचार लें ॥ कण्डिका २८ ॥ असमीक्षप्रवल्हितानि श्रूयन्ते द्वापरादावृषीणामेकदेशो दोषपतिरिह चिन्तामापेदे त्रिभिः सोमः पातव्यः समाप्तमिव भवति तस्मादृग्यजुःसामान्य- पकन्तेजांस्यासंस्तत्र महर्षयः परिदेवयाञ्चक्रिरे महच्छोकभयं प्राप्ताः स्मो न चैतत् सर्वैः समभिहितं ते वयं भगवन्तमेवोपधावाम सर्वेषामेव शर्म भवानीति ते तथेत्युक्त्वा तूष्णीमतिष्ठन्नानुपसंग्रभ्य इत्युपसीदामीति नीचैर्बभूवुः। स एभ्य उपनीय प्रोवाच मामिकामेव व्याहृतिमादितः आदितः कृणुध्वमित्येवं मामका आधीयन्ते। नर्ते भृग्वङ्गिरोविद्भ्यः सोमः पातव्य ऋत्विजः पराभवन्ति यजमाना रजसापध्वस्यति श्रुतिश्चापध्वस्ता तिष्ठतीत्येवमेवोत्तरोत्तराद्योगात्तोकं तोकम्प्र- शाश्वमित्येवं प्रतापो न पराभविष्यतीति तथा ह तथा ह भगवन्निति प्रतिपेदिर आप्याययंस्ते तथा वीतशोकभया बभूवुः। तस्माद् ब्रह्मवादिन ओंकारमादितः कुर्वन्ति ॥ २८ ॥ कण्डिका २८ । ओम् को आदि में बोलने का वर्णन ॥ (असमीक्षप्रवल्हितानि श्रूयन्ते) विचारशून्य उड़ाऊ बातें सुनी जाती है- (द्वापरादौ ऋषीणाम् एकदेशः दोषपतिः इह चिन्ताम् आपेदे त्रिभिःसोमः पातव्यः समाप्तम् इव भवति) द्वापर के आरम्भ में ऋषियों के बीच एक देश का रहने वाला निश्चययेन (वेदरहसिकी) वेदानां रहस्या निर्जनदेशे विचारणीया विद्या (शंक्ष्यम्) शिक्षा--ण्यत् । शिक्षणीयम् ॥ ९८-(असमीक्षप्रवल्हितानि) न+सम्+ईक्ष दर्शने-घञ्, प्र+ह्वल चलने-क्तः । समीक्षण पर्यालोचनेन विना प्रर्चलितानि वचांसि (दोषपतिः)
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २८ ।। ४९ दोषपति ( बुराइयों का स्वामी ) इस बात में चिन्ता करने लगा—तीन [ वेदविशेषों ] के साथ सोमरस पीना चाहिये—पूरा किया हुआ सा कर्म होता है । ( तस्मात् ऋग्यजुः सामानि अपक्रान्ततेजांसि आसन् ) उससे [ चौथे वेद के छूट जाने से ] ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद बिना तेज वाले हो गये । ( तत्र महर्षयः परिदेवयाञ्चक्रिरे ) उस पर महर्षि लोग विलाप करने लगे—( महत् शोकभयं प्राप्ताः स्मः ) हमको बड़ा शोक और भय प्राप्त हुआ है । ( न च एतत्, सर्वैः समभिहितम् ) और यही नहीं [ किन्तु ] सबने मिलकर कहा—( ते वयम् भगवन्तम् एव उपधावाम ) सो हम ऐश्वर्यवान् [ ओम् ] के ही पास दौड़ कर चलें । [ वे गये और ओम् ने कहा ]— ( सर्वेषाम् एव शर्म भवानि इति ) सब लोगों का ही शरण [ रक्षा साधन ] मैं हो जाऊँ । ( तथा इति ते उक्त्वा तूष्णीम् अतिष्ठन् ) वैसा हो—ऐसा कहकर वे चुपचाप बैठ गये । [ फिर बोले ] ( न अनुपसन्नेभ्यः इति ) पास न रहने वालों [ नास्तिकों ] के लिये [ शरण ] मत हो [ ओम् बोला ] ( उपोसीदामि इति ) [ तुम्हारे ] अति समीप मैं बैठता हूँ । ( नीचैः बभूवुः ) वे [ ऋषि ] नीचे को हो गये । ( सः उपनीय एभ्यः प्र उवाच ) वह [ ओम् ] पास जाकर इनसे कहने लगा— ( मामिकाम् एव व्याहृतिम् आदितः आदितः कृणुध्वम् इति एवं मामकाः आधीयन्ते ) मेरी ही व्याहृति को प्रत्येक मन्त्र के आदि में करो, इस प्रकार मेरे लोग सब ओर से धारण किये जाते हैं । ( भृग्वङ्गिरोविद्भ्यः ऋते सोमः न पातव्यः ) भृगु अङ्गिराओं [ प्रकाशमान ५ ात्मा के चारों वेदों ] के जानने वाले के बिना सोम रस न पीना चाहिये । [ जो दूसरे लोग सोम रस पीवें तो ] ( ऋत्विजः पराभवन्ति यजमानः रजसा अपध्वस्यति श्रुतिः च अपध्वस्ता तिष्ठति इति ) ऋत्विज् लोग हार जाते हैं, यजमान राग [ मोह ] से गिर पड़ता है और श्रुति नष्ट होकर रहती है—( एवम् एव उत्तरोत्तरात् योगात् तोकं तोकं प्रशाध्वम् इति ) इस प्रकार से ही पिछले पिछले संयोग से संतान संतान को शासन करो, ( एवं प्रतापः न पराभविष्यति इति ) इस प्रकार प्रताप न हार पावेगा । ( तथा आह तथा आह ) वैसा ही उसने कहा, वैसा ही उसने कहा । [ ऋषि लोग बोले ] ( भगवन् इति ) हे भगवन् ! [ हम वैसा ही करेंगे ] ( प्रतिपेदिरे आप्याययन् ) वे समीप गये और बढ़ने लगे । ( ते तथा वीतशोकभयाः बभूवुः ) निन्दितकर्मणां पालकः ( अपक्रान्ततेजांसि ) विगतज्योतींषि (परिदेवयाञ्चक्रिरे) परि+दिवु परिकूजने—चुरादित्वात् णिच्, प्रत्ययान्तत्वात् आम् प्रत्ययः । अया- मन्ता० ( पा० ६ । ४ । ५५ ) इति णेरयादेशः, कृञ्चानुप्रयुज्यते० ( पा० ३ । १ । ४० ) इति कृञ् धातोरनुप्रयोगः । लिटि बहुवचने 'चक्रिरे' इति रूपम् । विलापं कृतवन्तः । ( न ) निषेधे ( अनुपसन्नेभ्यः ) नञ्+उप+षद्ऌ गतौ—क्तः । असमीपस्थेभ्यः । नास्तिकेभ्यः ( मामिकाम् ) मदीयाम् (ऋते) विना (योगात्) संयोगात् (प्रशाध्वम्) प्रशासनं कुरुत ( भगवन् ) हे ऐश्वर्यवन् ॥ ४
कण्डिका २६ ॥
५० गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २९ ॥ वे इस प्रकार से शोक रहित और निर्भय हो गये । ( तस्माद् ब्रह्मवादिनः ओङ्कारम् आदितः कुर्वन्ति ) इसलिये ब्रह्मवादी लोग ओङ्कार को आदि में करते हैं ॥ २८ ॥ भावार्थः—ब्रह्मवादी लोग ओङ्कार को प्रत्येक मन्त्र के आरम्भ में बोल कर निर्भय होकर आनन्द पाते हैं ॥ २८ ॥ कण्डिका २६ ॥ किं देवतमित्यृचामग्निर्देवतन्तदेव ज्योतिर्गायत्रं छन्दः पृथिवी स्थानम् । अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातममित्येवमादिं कृत्वा ऋग्वेदमध्येते । यजुषां वायुर्देवतं तदेव ज्योतिः त्रैष्टुभं छन्दोऽन्तरिक्षं स्थानम् । इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण इत्येवमादिं कृत्वा यजुर्वेदमध्येते । साम्नामादित्यो देवतं तदेव ज्योतिर्जागतं छन्दो द्यौः स्थानम् । अग्न आयाहि वीतये गृणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि बर्हिषीत्येवमादिं कृत्वा सामवेदमध्येते । अथर्वणां चन्द्रमा देवतं तदेव ज्योतिः सर्वाणि छन्दांस्यापः स्थानम् । शन्नो देवीरभिष्टय इत्येवमादिं कृत्वा अथर्ववेदमध्येते । अद्भ्यः स्थावरजङ्गमो भूत- ग्रामः सम्भवति, तस्मात् सर्वमापोमयं भूतं सर्वं भृग्वङ्गिरोमयम् । अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिता इत्यविति प्रकृतिरपामोङ्कारेण चैतस्माद् व्यासः पुरोवाच भृग्वङ्गिरोविदा संस्कृतोऽन्यान् वेदानधीयीत नान्यत्र संस्कृतो भृग्वङ्गिरसोऽधीयीत अथ सामवेदे खिलश्रुतिः ब्रह्मचर्येण चैतस्मादथर्वाङ्गिरसो ह यो वेद स वेद सर्वमिति ब्राह्मणम् ॥ २९ ॥ कण्डिका २९ ॥ चारों वेद और देवता आदि ॥ ( किं देवतम् इति ) क्या देवता है, [ और क्या ज्योति क्या छन्द और क्या स्थान है इनका उत्तर ] ( ऋचाम् अग्निः देवतं तत् एव ज्योतिः गायत्रं छन्दः पृथिवी स्थानम् ) ऋग्वेद के मन्त्रों में [ पहिले मन्त्र का ] अग्नि देवता, वही ज्योति, गायत्री छन्द, पृथिवी स्थान है। ( अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम्—इति एवम् आदिं कृत्वा ऋग्वेदम् अधीयते ) अग्निमीडे—इत्यादि ऋग्वेद के पहिले मन्त्र को इस प्रकार आरम्भ करके ऋग्वेद पढ़ते हैं । ( यजुषां वायु देवतं तत् एव ज्योतिः त्रैष्टुभं छन्दः अन्तरिक्षम् स्थानम् ) यजुर्वेद के मन्त्रों में [ पहिले मन्त्र का ] वायु देवता, वही ज्योति, त्रिष्टुप् छन्द और अन्तरिक्ष [ मध्यलोक ] स्थान है । ( इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे—इति एवम् आदिं कृत्वा यजुर्वेदम् अधीयते ) इषे २६—( ऋचाम् ) ऋग्वेद मन्त्राणां मध्ये ( गायत्रम् ) स्वार्थे अण् । गायत्री । ( अधीयते ) अधि + इङ् अध्ययने-लट् बहुवचनम् । पठन्ति ( त्रैष्टुभम् ) स्वार्थे अण् । त्रिष्टप् ( जागतम् ) स्वार्थे अण् । जगती ( आपः ) व्यापकानि जलानि ॥
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २३ ॥ ५१
त्वा-इत्यादि यजुर्वेद के पहिले मन्त्र को इस प्रकार आरम्भ करके यजुर्वेद पढ़ते हैं । ( साम्नाम् आदित्यः देवतं तत् एव ज्योतिः जागतं छन्दः द्यौः स्थानम् ) सामवेद के मन्त्रों में [ पहिले मन्त्र का ] आदित्य देवता, वही ज्योति, जगती छन्द और प्रकाश लोक स्थान है । ( अग्न आयाहि वीतये गृणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि बर्हिषि-इति एवम् आदिं कृत्वा सामवेदम् अधीयते ) अग्न आयाहि० इत्यादि [ साम- वेद के पहिले मन्त्र को ] इस प्रकार आरम्भ करके सामवेद पढ़ते हैं [ इस मन्त्र का छन्द गायत्री है, यहाँ जागत वा जगती माना है ] । ( अथर्वणां चन्द्रमाः देवतं तत् एव ज्योतिः, सर्वाणि छन्दांसि, आपः स्थानम् ) अथर्ववेद के मन्त्रों में [ इस मन्त्र का ] चन्द्रमा देवता, वही ज्योति, सब छन्द, आप् [ व्यापक जल ] स्थान है । ( शन्नो देवीरभिष्टये इति एवम् आदिं कृत्वा अथर्ववेदम् अधीयते ) शन्नो देवीः-इत्यादि अथर्ववेद के मन्त्र को इस प्रकार आरम्भ करके अथर्ववेद पढ़ते हैं । [ यह मन्त्र अथर्ववेद काण्ड १ सूक्त ६ का पहिला मन्त्र है, अथर्ववेद का पहिला मन्त्र यह है- ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः । वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे । शन्नो देवीः--इस मन्त्र का छन्द गायत्री है और यहाँ सब छन्द माने हैं । ] ( अद्भ्यः स्थावरजङ्गमः भूतग्रामः सम्भवति, तस्मात् सर्वम् आपोमयम्, सर्वं भूतं भृग्वङ्गिरोमयम् ) आप् [ जल ] से स्थावर और जङ्गम प्राणियों का समूह उत्पन्न होता है, इसलिये सब जगत् आपोमय [ जल से परिपूर्ण ] है और सब प्राणीमात्र भृग्वङ्गिरोमय [ प्रकाशमान ज्ञान वाले परमात्मा से परिपूर्ण ] हैं, ( एते त्रयःवेदाः भृगून् अङ्गिरसः अन्तरा श्रिताः इति, अप् इति, अपां प्रकृतिः ओङ्कारेण च ) और यह तीनों वेद [ अर्थात् कर्म उपासना ज्ञान ] प्रकाशमान ज्ञान वाले [ चारों वेदों ] के भीतर आश्रित हैं, [ अन्तर्गत हैं--देखो कण्डिका ३६ ], यही अप्, व्यापक जल रूप परमात्मा है और ओङ्कार द्वारा जलों की प्रकृति [ रचना ] है [ कौन प्रकृति है-कण्डिका २४ के प्रश्न का यह उत्तर है ] । ( एतस्मात् व्यासः पुरा उवाच ) इसलिये व्यास [ वेदों के अर्थ प्रकाश करने वाले मुनि ] ने पहिले कहा था- ( अद्भ्यः ) जलेभ्यः ( भूतग्रामः ) प्राणिसमूहः ( सम्भवति ) उत्पद्यते ( आपो- मयम् ) जलपरिपूर्णम् । ( भूतम् ) प्राणिसमूहः ( भृग्वङ्गिरोमयम् ) प्रकाश- मानज्ञानस्वरूपपरमात्मना परिपूर्णम् ( अन्तरा ) विना ( त्रयः वेदाः ) कर्मोपासना- ज्ञानरूपाः ( भृगून् ) प्रकाशमानान् ( अङ्गिरसः ) ज्ञानयुक्तांश्चतुर्वेदान् ( अप् ) व्यापकजलरूपपरमात्मा ( प्रकृतिः ) रचना ( अपाम् ) जलानाम् ( व्यासः ) वि+ असु क्षेपणे - घञ् । विशेषेण वेदार्थप्रकाशको विद्वान् (पुरा) अग्रे (भृग्वङ्गिरोविदा) प्रकाशमानज्ञानयुक्तचतुर्वेदज्ञेन ( संस्कृतः ) उपनयनादिसंस्कारं प्राप्तः ( अन्यान् वेदान् ) वेदभिन्नशास्त्राणि ( अधीयीत ) पठेत् । ( अन्यत्र ) वेदभिन्नशास्त्रेषु ( भृग्वङ्गिरसः ) प्रकाशमानज्ञानयुक्तचतुर्वेदान् (खिल्श्रुतिः) खिल् कणश आदाने- कः । सारभूतमन्त्रः ( वेदः ) विद ज्ञाने--कर्तरि घञ् । वेत्ता ।
५२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २६ ॥ ( भृग्वङ्गिरोविदा संस्कृतः अन्यान् वेदान् अधीयीत ) प्रकाशमान ज्ञानवाला [ चारों वेदों के जानने वाले ] से संस्कार किया हुआ [ पढ़ाया हुआ पुरुष ] दूसरे वेदों [ शास्त्रों ] को पढ़े, ( अन्यत्र संस्कृतः भृग्वङ्गिरसः न अधीयीत ) दूसरे [ शास्त्रों ] में संस्कार किया हुआ पुरुष प्रकाशमान ज्ञानवाले [ चारों वेदों ] को न पढ़े । ( अथ सामवेदे खिलश्रुतिः ) और सामवेद में भी खिलश्रुति [ सारभूत मन्त्र ] है—( ब्रह्मचर्येण च एतस्मात् अथर्वाङ्गिरसः ह यः वेद सः वेद सर्वम् इति ब्राह्मणम् ) और इसलिये ब्रह्मचर्य्य के साथ निश्चल ब्रह्म के ज्ञानों [ चारों वेदों ] को निश्चय करके जो जानने वाला है वह सब जानता है, यह ब्राह्मण [ ब्रह्म ज्ञान ] है ॥ २६ ॥ भावार्थः—ब्रह्मचर्य्य के साथ वेदों में देवता, ज्योति, और स्थान का विचार करके मनुष्य सब विद्याओं में निपुण होवे ॥ २६ ॥ विशेषः—यहाँ प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १—अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥ ऋ० १ । १ । १ ॥ ( पुरोहितम् ) सबके अगुआ, ( यज्ञस्य ) श्रेष्ठ कर्म के ( देवम् ) प्रकाशक, ( ऋत्विजम् ) सब ऋतुओं में पूजनीय ( होतारम् ) दान करने हारे और ( रत्नधातमम् ) अत्यन्त रत्नों के धारण करने वाले ( अग्निम् ) अग्नि [ ज्ञानमय परमेश्वर ] की ( ईडे ) मैं बड़ाई करता हूँ ॥ २—इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण आप्यायध्वमघ्न्या इन्द्राय भागं प्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मा मा व स्तेन ईशत माघश- शँसो ध्रुवा अस्मिन् गोपतौ स्यात बह्वीर्यजमानस्य पशून् पाहि ॥ यजु० १ । १ ॥ [ हे प्रजागण ! ] मैं ( त्वा ) तुझमें ( इषे ) व्यापक हूँ, मैं ( त्वा ) तुझको ( ऊर्जे १ ) बलवान् बनाता हूँ । [ हे प्रजाओ ! ] ( वायवः ) तुम सब वायु [ वेगवान् ] ( स्थ ) हो, ( देवः ) प्रकाशमय, ( सविता ) सबका चलाने वाला परमेश्वर ( वः ) तुमको ( श्रेष्ठतमाय ) अत्यन्त श्रेष्ठ ( कर्मणे ) कर्म के लिये ( प्र + अर्पयतु ) आगे बढ़ावे । ( अघ्न्याः ) हे अवध्य वा अहिंसक प्रजाओ ! ( इन्द्राय परम ऐश्वर्य के लिये ( भागम् ) अपने भाग को ( आ ) भली भांति ( प्यायध्वम् ) तुम बढ़ाओ, ( प्रजावतीः ) हे उत्तम सन्तान वाली, ( अनमीवाः ) मानसिक पीड़ा से रहित और ( अयक्ष्माः ) क्षय आदि , शारीरिक रोग से रहित प्रजाओ ! ( स्तेनः ) चोर डाकू ( व ) तुम पर ( मा ईशत ) राज्य न कर सकें, और ( मा अघशंसः )"न कोई पाप चिन्तक [ राज्य कर सके ] ' और तुम ( ध्रुवाः ) निश्चल चित्त और ( बह्वी ) बहुत सी होकर ( अस्मिन् ) इस ( गोपतौ ) स्वर्ग वा पृथ्वी वा गो आदि के रक्षक परमेश्वर में ( स्यात ) वर्तमान रहो । [ हे प्रजागण ! ] ( यजमानस्य ) यज्ञकर्ता धर्मात्मा पुरुष के ( पशून् ) दोपाये और चौपाये जीवों की ( पाहि ) तू रक्षा कर ॥
१. यहाँ 'इषे' 'ऊर्जे' पद चतुर्थ्यन्त हैं । तिङन्तानुसारी अर्थ चिन्त्य है । सम्पा० ॥
कण्डिका ३०
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३० ॥ ५३ २ ३ १ २ . ३१२ ३ २ ३ १ २ १ २२ ३ १.२ ३--अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि बर्हिषि ॥ साम० पू० १ । १ । ( अग्ने ) हे अग्नि ! [ ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ] ( वीतये ) ज्ञान के लिए और ( हव्यदातये ) भोजन की शुद्धि वा दान के लिये ( गृणानः ) उपदेश करता हुआ तू ( आ याहि ) आ । ( होता ) तू दानी होकर ( बर्हिषि ) यज्ञ में ( नि सत्सि ) सदा बैठता है ॥ ४-शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु 'पीतये । शंयोरभि स्रवन्तु नः ॥ अथ० १ । ६ । १, यजु० ३६ । १२ ॥ ( देवीः ) दिव्य गुण से युक्त ( आपः ) जल- धारायें वा सर्वव्यापक परमेश्वर ( नः ) हमारे ( अभिष्टये ) पूर्ण यज्ञ वा अभिलाषा के लिये ( पीतये ) पान रक्षा वा वृद्धि के लिए ( शम् ) सुखदायक ( भवन्तु ) होवे और ( नः अभि ) हमारे ऊपर ( शंयोः ) सुख की ( स्रवन्तु ) वर्षा करे ॥ कण्डिका ३० अध्यात्ममात्मभेषज्यमात्मकैवल्यमोंकारः, आत्मानं निरुध्य सङ्गममात्रीं भूतार्थचिन्तां चिन्तयेदतिक्रम्य वेदेभ्य सर्वपरमध्यात्मफल प्राप्नोतीत्यर्थः, सवितर्कं ज्ञानमयमित्येतैः प्रश्नैः प्रतिवचनैश्च यथार्थं पदमनुविचिन्त्य प्रकरणज्ञो हि प्रबलो विषयी स्यात्, सर्वस्मिन्वाकोवाक्य इति ब्राह्मणम् ॥ ३० ॥ कण्डिका ३० ओङ्कार का चिन्तन और उसका फल ॥ ( अध्यात्मम्, आत्मभेषज्यम्, आत्मकैवल्यम् ओङ्कारः ) [ आत्मज्ञान का अधिकरण क्या है - कण्डिका २४, उत्तर ] आत्मज्ञान का अधिकरण, आत्मा का औषध और आत्मा का मोक्ष सुख ओङ्कार है । ( सङ्गममात्रीं भूतार्थचिन्तां निरुध्य आत्मानम् चिन्तयेत् ) संगति का लेश रखने वाली प्राणियों की चिन्ता को रोक कर आत्मा [ परमात्मा ] को विचारे । ( अतिक्रम्य वेदेभ्यः सर्वपरम् अध्यात्मफलं प्राप्नोति इति अर्थः, सवितर्कं ज्ञानमयम् इति ) [ चिन्ता को ] उल्लंघन करके वेदों के द्वारा अर्थात् सबसे श्रेष्ठ आत्मज्ञान के फल को पाता है, यह अर्थ है, अर्थात् वितर्कों [ विचारों ] के सहित ज्ञान से परिपूर्ण [ परमात्मा को पाता है ] । ( एतैः प्रश्नैः प्रतिवचनैः च यथार्थं पदम् अनुविचिन्त्य प्रकरणज्ञः हि प्रबलः विषयी स्यात् ) इन प्रश्नों और उत्तरों से [ कण्डिका २४-२६ ] यथार्थ पद [ सुबन्त और तिङन्त शब्द ] को निरन्तर विचार कर प्रबल प्रकरण जानने वाला, और विषय समझने वाला मनुष्य होवे । ( सर्वस्मिन् ३०-( अध्यात्मम् ) आत्मज्ञानाधिकरणम् । ( आत्मभेषज्यम् ) आत्मो- षधम् ( आत्मकैवल्यम् ) आत्ममोक्षसुखम् ( आत्मानम् ) परमात्मानम् ( निरुध्य ) प्रतिरुध्य ( सङ्गममात्रीम् ) सङ्गतिशीलाम् ( भूतार्थचिन्ताम् ) प्राणिविषयकस्मृतिम् ( अतिक्रम्य ) तां चिन्तामुल्लंघ्य ( सर्वपरम् ) सर्वोत्कृष्टम् ( अध्यात्मफलम् )
कण्डिका ३१ ॥
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५४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३१ ॥ वाकोवाक्यम् इति ब्राह्मणम् ) सभी [ उपर्युक्त ] प्रश्नोत्तरात्मक स्थलों में यही ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञान ] है ॥ ३० ॥ भावार्थः-मनुष्य को चाहिये कि ओम् को सर्वाधार जानकर उसका चिन्तन करता हुआ आत्म-सामर्थ्य बढ़ावे और विषय को भली भांति समझ कर ठीक ठीक अर्थ का ग्रहण करे ॥ ३० ॥ कण्डिका ३१ ॥ एतद्ध स्मैतद् विद्वांसमेकादशाक्षमौद्गल्यं ग्लावो मैत्रेयोऽभ्याजगाम । स तस्मिन् ब्रह्मचर्यं वसतो¹ विज्ञायोवाच किं स्विन्मर्यादा² अयं तं मौद्गल्यो अध्येति यदस्मिन् ब्रह्मचर्यं वसतीति तद्धि मौद्गल्यस्यान्तेवासी शुश्राव स आचार्यायाव्रज्याचचष्टे, दुरधीयानं वा अयं भवन्तमवोचद्योऽयमद्यातिथिर्भवति । किं सोम्य विद्धानीति । त्रीन् वेदान् ब्रूते भो३ इति तस्य सौम्य यो विस्पष्टो विजि- गीषोऽन्तेवासी तन्मे ह्वयेति, तमाजुहाव, तमभ्युवाचासाविति भो३ इति किं सोम्य त आचार्य्योऽध्येतीति, त्रीन् वेदान् ब्रूते भो३ इति, यन्नु खलु सौम्यासमाभिः सर्वे वेदा मुखतो गृहीताः कथन्त एवमाचार्य्यो भाषते कथं नु शिष्टाः शिष्टेभ्य एवं भाषेरन् यं ह्येनमहं प्रश्नं पृच्छामि न तं विवक्ष्यति न ह्येनमध्यैतीति । स ह मौद्गल्यः स्वमन्तेवासिनमुवाच, परेहि सोम्य ग्लावं मैत्रेयमुपसीदाधीहि भोः सावित्रीं गायत्रीञ्चतुर्विंशतियोनिं द्वादशमिथुनां यस्या भृग्वाङ्गिरसश्चक्षुर्यस्यां सर्व- मिदं श्रितं, तां भवान् प्रब्रवीत्विति स चेत्सोम्य दुरधीयानो भविष्यत्याचार्य्योवाच ब्रह्मचारी ब्रह्मचारिणे सावित्रीं प्राहैति वक्ष्यति, तत्त्वं ब्रूयात् दुरधीयानन्तं वै भवान् मौद्गल्यमवोचत् स त्वा यं प्रश्नमप्राक्षीन्न तं व्यवोचः पुरा संवत्सरादार्त्ति- मार्कुप्स्यसीति ॥ ३१ ॥ कण्डिका ३१ ॥ मौद्गल्य और मैत्रेय की कथा ॥ ( एतद् ह स्म एतत् ) यह बहुत प्रसिद्ध है— विद्वांसम् एकादशाक्षम् मौद्गल्यम् ग्लावः मैत्रेयः अभ्याजगाम ) विद्वान् [ दो कान, दो आंख, दो नथने, एक मुख, एक ब्रह्मरन्ध्र एक नाभि, एक उपस्थ एक पायु ] ग्यारह इन्द्रियों से युक्त शरीर वाले [ सर्वथा स्वस्थ ] मौद्गल्य [ मुद्गल ऋषि के सन्तान ] के पास ग्लाव [ चन्द्र- आत्मज्ञानफलम् (पदम्) सुप्तिङन्तं पदम् (पा० १ । ४ । १४) (विषयी) इन्द्रियगोचरज्ञानयुक्तः । ( वाकोवाक्यम् ) क० २१ द्र० । ३१–( एकादशाक्षम् ) अक्षू व्याप्तौ—अच् । नासिकाश्रोत्रनेत्राणां द्वयं द्वयं मुखमेकं ब्रह्मरन्ध्रमेकं नाभ्या सहाधःस्थानि त्रीणि, इत्थमेकादश अक्षाणि इन्द्रि- याणि यस्मिन् तच्छरीरम्, ततः अर्शआद्यच् । एकादशेन्द्रिययुक्तशरीरवन्तं १. पू० सं० "वसतीति" इति पाठः । सम्पा० ॥ २. अत्र जर्मनसंस्करगे 'मर्या' इति पाठः । सोऽपि युक्तः । तथा च "मर्या इति मनुष्यनाम मर्यादामिधानं वा स्यात् । मर्यादा मर्येरादीयते" इति निरुक्तम् ४ । २ ॥ सम्पा० ॥
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३१ ॥ ५५ वंशीय ] मैत्रेय [ मित्रयु का शिष्य ] आया । ( सः तस्मिन् ब्रह्मचर्यं वसतः विज्ञाय उवाच ) वह [ मौद्गल्य में ] उस [ स्थान ] पर ब्रह्मचर्य्य [ वेदाभ्यास और इन्द्रियनिग्रह ] से रहते हुये का ज्ञान कर [ मैत्रेय ] बोला-( किं स्वित् मर्यादाः अयं मौद्गल्यः तम् अध्येति यत् अस्मिन् ब्रह्मचर्य्यं वसति इति ) यह क्या मर्यादायें [ प्रशस्त जीवन पद्धतियां ] हैं [ जिनको सीखने के लिये ] यह मौद्गल्य उस [ वेद ] को पढ़ता है जिसके लिये इस ब्रह्मचर्य्य में मनुष्य रहता है [ अर्थात् वेदाभ्यास के लिए इतना ब्रह्मचर्य करना ठीक नहीं है ] । ( तत् हि मौद्गल्यस्य अन्तेवासी शुश्राव ) यह बात मौद्गल्य के शिष्य ने सुनी । ( सः आचार्य्याय आव्रज्य आचचष्टे ) वह आचार्य से आकर बोला-( अयं भवन्तं वै दुरधीयानम् अवोचत् यः अयम् अद्य अतिथिः भवति ) इसने आपको निश्चय करके कुपढ़ बताया है जो यह आज अतिथि है । [ मौद्गल्य ने कहा ] ( किं सौम्य विद्वान् इति ) हे सौम्य ! [ प्रियदर्शन ] क्या वह विद्वान् है ? [ शिष्य बोला ] ( त्रीन् वेदान् ब्रूते भो३ इति ) महाराज ! वह तीनों वेद बोलता है । [ मौद्गल्य ने कहा ] ( सौम्य विजिगीषो तस्य यः विस्पष्टः अन्तेवासी तम् मे ह्वय इति ) हे प्रियदर्शन, जीतने की इच्छा करने वाले ! उसका जो विशेष करके स्पष्ट शिष्य है, उसे मेरे पास बुला । ( तम् आजुहाव ) वह [ शिष्य ] उसे बुला लाया, ( तम् अभ्युवाच ) और उस [ मौद्गल्य ] से बोला- ( असौ इति भो३ इति ) महाराज ! वह यह है । [ मौद्गल्य ने कहा ] ( सौम्य ते आचार्यः किम् अध्येति इति ) हे प्रियदर्शन ! तेरा आचार्य क्या पढ़ता है । [ वह बोला ] ( त्रीन् वेदान् ब्रूते भो३ इति ) महाराज ! वह तीनों वेदों को बोलता है । [ मौद्गल्य ने कहा ] ( सौम्य यत् नु खलु अस्माभिः सर्वे वेदाः मुखतः गृहीताः कथं ते आचार्यः एवं भाषते ) हे सौम्य ! क्योंकि हमने सब वेद मुख से ग्रहण किये हैं, तेरा आचार्य कैसे ऐसा कहता है । ( कथं नु शिष्टाः शिष्टेभ्यः एवं भाषेरन् ) कैसे शिष्ट लोग शिष्टों से ऐसा बोलें । ( यं हि एनं प्रश्नम् अहं पृच्छामि न तं विवक्ष्यति न हि एनम् अध्येति इति ) जिस इस प्रश्न को मैं पूछता हूँ [ जो ] उसको वह न बतायेगा, वह इस [ वेद ] को नहीं पढ़ता है । ( सः ह मौद्गल्यः स्वम् अन्तेवासिनम् उवाच ) फिर वह मौद्गल्य अपने शिष्य से बोला-( सौम्य परेहि ग्लावं मैत्रेयम् उपसीद ) हे प्रियदर्शन ! · सर्वथास्वास्यम् ( मौद्गल्यम् ) मुदिग्रोगंगौ ( उ० १ । १८८ ) मुद हर्षे - गक् । मुद्गं हर्ष लाति गृह्णातीति । मुद्ग + ला आदाने-कः । मुद्गलो मुनिः । ततः ष्यञ् । मुद्गलस्य सन्तानम् (ग्लावः) ग्लानुदिभ्यां डौः ( उ० २ । ६४ ) ग्लै हर्षक्षये डौः । ग्लौश्चन्द्रः । ग्लौ-अण् । चन्द्रवंशीयः ( मैत्रेयः ) मृग्य्वादयश्च ( उ० १ । ३७ ) मित्र+या प्रापणे कुः । मित्रयुर्लोकव्यवहारवित् । मित्रयोः अपत्य- मिति । गृष्ट्यादिभ्यश्च ( पा० ४ । १ । १३६ ) मित्रयु-ढञ् । दाण्डिनायनहास्ति- नायन ० ( पा० ६ । ४ । १७४ ) युशब्दलोपः । मैत्र-एय । यस्येति च ( पा० ६ । ४ । १४८ ) मैत्र इत्यस्य अकारलोपः । मित्रयोरपत्यं पुमान् ( अन्तेवासी ) अन्ते + वस निवासे-णिनिः । क्षयवासवासिस्र्वकालात् ( पा० ६ । ३ । १८ ) सप्तम्या
कण्डिका ३२ ॥
५६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३२ ॥ जा और चन्द्रवंशीय मैत्रेय से मिल, [ और कह ] ( भोः चतुर्विंशतियोनिं द्वादशमिथुनां सावित्रीं गायत्रीम् अब्रूहि ) महाराज ! चौबीस योनि [ उत्पत्ति स्थान ] वाली, बारह जोड़ा वाली [ देखो कण्डिका ], सविता देवता वाली गायत्री को पढ़ ( यस्याः भृग्वङ्गिरसः चक्षुः यस्यां सर्वम् इदं श्रितम्, ताम् भवान् प्रब्रवीतु इति ) जिसके भृगु-आङ्गिरस [ प्रकाशमान सब वेद ] नेत्र हैं, और जिसमें यह सब ठहरा हुआ है, आप उस गायत्री को समझावें । ( आचार्य्यः उवाच ) फिर आचार्य [ मौद्गल्य ] ने कहा- (सोम्य सः चेत् दुरधीयानः भविष्यति, [ भवान् ] वक्ष्यति, ब्रह्मचारी ब्रह्मचारिणे सावित्रीं प्राह ) हे सौम्य ! जो वह कुपढ़ होवे, [ आप ] कहें, ब्रह्मचारी ब्रह्मचारी को सावित्री [ सविता देवता वाली ] गायत्री बताता है । ( तत्त्वं [ भवान् ] ब्रूयात् ) [ तब आप ] ठीक ठीक कह दें-( भवान् वै तं मौद्गल्यं दुरधीयानम् अवोचत् ) आपने ही उस मौद्गल्य को कुपढ़ कहा है, ( सः त्वा यं प्रश्नम् अप्राक्षीत् तं पुरा न व्यवोचः, संवत्सरात् आर्तिम् आक्रुप्स्यसि इति ) उसने तुझसे जो प्रश्न पूंछा था, वह तूने हमारे सामने नहीं बताया है, एक वर्ष तुझे पीड़ा खींचनी होगी ॥ ३१ ॥ भावार्थः-मनुष्य परिश्रम से प्रश्नोत्तर के साथ वेदों का विचार कर तत्त्व का ग्रहण करें ॥ ३१ ॥ कण्डिका ३२ ॥ स तत्राजगाम यत्रेत्तरो बभूव, तं ह पप्रच्छ स ह न प्रतिपेदे, तं होवाच दुरधीयानं तं वै भवान् मौद्गल्यमवोचत्, स त्वा यं प्रश्नमप्राक्षीन्न तं व्यवोचः अलुक् । अन्ते विद्यामध्येतुमध्यापकसमीपे वसतीति । शिष्यः । ( आचार्य्याय ) आङ् + चर गतौ-ण्यत् । वेदाध्यापकाय । "उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विजः । सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्य प्रचक्षते"-मनु० २ । १४० ( अतिथिः ) ऋतन्त्यञ्जि० ( उ० ४ । २ ) अत सातत्यगमने- इथिन् । न विद्यते नियता तिथि- रस्येति वा । सदा भ्रमणशीलः अभ्यागतः ( सौम्य ) सोमो देवता अस्य । सोमाट् टघण् ( पा० ४ । २ । ३० ) सोम-टघण् । सोमवत् स्वभावयुक्तः । प्रिय- दर्शन, मनोज्ञ ( विजिगीषो ) हे जेतुमिच्छुक ( शिष्टाः ) शासु अनुशिष्टौ- क्तः । सुबोधाः । धीराः ( विवक्ष्यति ) विविधं कथयिष्यति ( परेहि ) समीपे गच्छ (उपसीद) प्राप्नुहि ( अधीहि ) अधीष्व । पठ । ( सावित्रीम् ) सवितृ-अण् । सवितृ- देवतावतीम् ( गायत्रीम् ) अमिनक्षियजि० ( उ० ३ । १०५ ) गै गाने-अत्रन्, स च णित् । आतो युक् चिण्कृतोः ( पा० ७ । ३ । ३३ ) इति युक्, स्त्रियां ङीष् । गायत्री गायतेः स्तुतिकर्मणस्त्रिगमना वा विपरीता । गायतो मुखादुदपतदिति च ब्राह्मणम्-निरू० ७ । १२ । यद्वा, गायन्तं त्रायते । गै गाने-शतृ + त्रैङ् पालने- कः । स्तुत्यं वेदमन्त्रविशेषम् । गायतां रक्षिकामृचम् ( योनिम् ) उत्पत्तिस्थानम् । ( तत्त्वम् ) यथार्थम् ( पुरा ) अग्रे ( आर्तिम् ) आङ् + ऋ गतौ हिंसने च- क्तिन् । पीडाम ( आक्रुप्स्यसि ) आकर्षणे करिष्यसि ॥
कण्डिका ३२ ॥ मौद्गल्य और मैत्रेय का गायत्री मन्त्र पर
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३२ ॥ ५७ पुरा संवत्सरादार्त्तिमाकृष्यसीति । स ह मैत्रेयः स्वानन्तेवासिन उवाच यथार्थं भवन्तो यथागृहं यथामनो विप्रसृज्यन्तां दुर्धीयानं वा अहं मौद्गल्यमवोचं स मा यं प्रश्नमप्राक्षीन्न तं व्यवोचं, तमुपैष्यामि शान्तिं करिष्यामीति । स ह मैत्रेयः प्रातः समित्पाणिर्मौद्गल्यमुपससादासावाहं भो मैत्रेयः किमर्थमिति दुर्धी- यानं वा अहं भवन्तमवोचं त्वं मा यम्प्रश्नमप्राक्षीर्न तं व्यवोचं त्वामुपैष्यामि शान्तिं करिष्यामीति, स होवाचात्र वा उपेतश्च सर्वञ्च कृतं पापकेन त्वा यानेन चरन्तमाहुरथोऽयं मम कल्याणस्तं ते ददामि तेन याहीति । स होवाचंतदेवात्रा- त्विषञ्चानृशंस्यञ्च यथा भवानाहोपायामित्येवं भवन्तमिति तं होपेयाय तं होपेत्य पप्रच्छ किँस्विदाहुर्भोंः सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयः किमाहुर्धियो विचक्ष्व यदि ताः प्रविश्य प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति । तस्मा एतत् प्रोवाच वेदाश्छन्दांसि सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयो- ऽन्त्रमाहुः कर्माणि धियस्तदु ते ब्रवीमि प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति । तमुपसङ्गृह्य पप्रच्छाधीहि भोः कः सविता का सावित्री ॥ ३२ ॥ कण्डिका ३२ ॥ मौद्गल्य और मैत्रेय का गायत्री मन्त्र पर वार्तालाप ॥ ( सः तत्र आजगाम यत्र इतरः बभूव ) वह वहां आया जहां दूसरा [ मैत्रेय ] था । ( तं ह पप्रच्छ सः ह न प्रतिपेदे ) उससे उसने पूंछा और वह [ मैत्रेय ] न बता सका। (तं ह उवाच ) उस [मैत्रेय] से वह बोला - ( भवान् तं मौद्गल्यं दुर्धीयानम् अवोचत् ) आपने उस मौद्गल्य को कुपढ़ बताया है, ( सः त्वा यं प्रश्नम् अप्राक्षीत् तं पुरा न व्यवोचः संवत्सरात् आर्त्तिम् आकृष्यसि इति ) उसने तुझसे जो प्रश्न पूंछा था वह तूने हमारे सामने नहीं बताया है, एक वर्ष तक तुझे पीड़ा खींचनी होगी। ( सः ह मैत्रेयः स्वान् अन्तेवासिनः यथार्थम् उवाच ) वह मैत्रेय अपने शिष्यों से ठीक ठीक बोला-( भवन्तः यथागृहं यथामनः विप्रसृज्यन्ताम् ) आप लोग अपने अपने घर को जैसा मन हो चले जावें, ( अहं वै मौद्गल्यं दुर्धीयानम् अवोचम् ) मैंने मौद्गल्य को कुपढ़ बताया है, ( सः मा यं प्रश्नम् अप्राक्षीत् तं न व्यवोचम् ) उसने मुझसे जो प्रश्न पूंछा था वह मैंने न बताया, ( तम् उपैष्यामि शान्तिं करिष्यामि इति ) मैं उसके पास जाऊँगा और उसको शान्ति [ सन्तुष्टता ] करूंगा । ( सः ह ३२--( प्रतिपेदे ) प्रतिपादितवान् । बोधितवान् ( यथागृहम् ) गृहमन- तिक्रम्य ( यथामनः ) यथेच्छम् ( विप्रसृज्यन्ताम् ) विविधं प्रकर्षेण गच्छन्ताम् ( शान्तिम् ) सन्तोषम् । प्रसन्नताम् ( समित्पाणिः ) होमार्थं हस्तयोः समिधा- युक्तः ( आग्रहम् ) आग्रह-अर्शआद्यच् । अनुग्रहवन्तम् ( कृतम् ) करोते.-- भूतकाले क्तः। कृतवन्तः (पापकेन) पापयुक्तेन । दुःखकरेण (आहुः) मनुष्याः कथ- यन्ति ( कल्याणः ) मङ्गलकरः (अत्विषम् ) नञ् + त्विष दीप्तौ--कः। त्वेषप्रतीका
५४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३२ ॥ समित्पाणिः मैत्रेयः प्रातः आग्रहं मौद्गल्यम् उपससाद ) वह [ यज्ञ के लिये ] समिधा हाथ में लिये हुये प्रातःकाल अनुग्रहशील मौद्गल्य के पास पहुँचा [ और बोला ] ( भो असौ मैत्रेयः ) महाराज ! वह मैं मैत्रेय हूँ [ मौद्गल्य ने कहा-( किम् अर्थम् इति ) किसलिये ? [ मैत्रेय बोला ]-( अहं वै भवन्तं दुरधीयानम् अवोचम् ) मैंने आपको कुपढ़ बताया है, ( त्वं मा यं प्रश्नम् अप्राक्षीः तं न व्यवोचम् ) तूने मुझसे जो प्रश्न पूंछा था, वह मैंने नहीं बताया, ( त्वाम् उपैष्यामि शान्तिं करिष्यामि इति ) तेरे पास आऊँगा और तेरी शान्ति करूँगा । ( सः ह उवाच ) वह [ मौद्गल्य बोला ]-- ( अत्र वै उपेतं च सर्वं च कृतं त्वा पापकेन यानेन चरन्तम् आहुः ) यहां पर आये हुये सब काम कर चुके हुये तुझको पापी रथ से चलता हुआ बताते हैं, ( अयम् मम रथः कल्याणः तं ते ददामि तेन याहि इति ) यह मेरा [ शिक्षारूपी ] रथ कल्याण- कारी है, वह मैं तुझे देता हूँ उससे चल । ( सः ह उवाच ) वह [ मैत्रेय ] बोला-- ( एतत् एव अत्र अविषं च अनृशंस्यं च ) यही [ आप का ] कर्म यहां अभय और अक्रूर [ अति दयालु ] है । ( यया भवान् आह, एवं भवन्तम् उप-आयाम् इति ) जैसा आप कहते हैं वैसे ही आप के पास मैं आया हूँ । ( तं ह उप--इयाय ) वह उस [ मौद्गल्य ] के पास आया, ( तां ह उपेत्य पप्रच्छ ) और पास आकर उससे पूंछा-( भोः सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य, कवयः किंस्वित् आहुः ) हे महाराज ! सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य-इसका अर्थ कवि लोग क्या कहते हैं, ( धियः किम् आहुः ) और धियः, इस पद को वे क्या कहते हैं, (विचक्ष्व ) सो बता । ( यदि सविता प्रविश्य ताः प्रचोदयात् याभिः एति इति ) यदि सविता प्रवेश करके उन्हें [ कर्मों वा बुद्धियों को ] आगे बढ़ाता है, जिनसे वह चलता है । ( तस्मै एतत् प्र उवाच ) उस [ उस मैत्रेय ] से वह यह बात बोला--( वेदाः छन्दांसि ) वेद छन्द [ आनन्द देने वाले कर्म ] हैं, ( कवयः देवस्य सवितुः वरेण्यं भर्गः अन्नम् आहुः ) कवि लोग प्रकाशवान् सविता [ सबके चलाने वाले ] के अति श्रेष्ठ भर्गः [ तेज ] को अन्न कहते हैं । ( कर्माणि धियः तत् उ ते ब्रवीमि ) धियः मयप्रतीका--निरु० १० । २१ अभयं कर्म (अनृशंस्यम् ) नृन् शंस्यति नृशंसम् । नञ् + शंसु हिंसायाम्-अण्, स्वार्थे यत् । अक्रूरम् । अतिदयालु कर्म ( उपायाम् ) उप + आङ् + या प्रापणे-लङ् । समीपे आगच्छम् । (उपेयाय) उप + इण् गतौ-लिट् । आजगाम ( सवितुः ) षू प्रसवे प्रेरणे च-तृच् । सविता सर्वस्य प्रसविता--निरु० १० । ३१ सर्वप्रेरकस्य ( वरेण्यम् ) वृञ एण्यः ( उ० ३ । ६८ ) वृञ् वरणे- एण्यः । स्वीकरणीयम् । अतिश्रेष्ठम् (भर्गः ) अव्यञ्जिजयृजिभृञिभ्यः कुश्व ( उ० ४ । २१६) भृजी भर्जने = पाके-असुन्, कुत्वञ्च । तेजः (कवयः ) विद्वांसः ( विचक्ष्व ) विविधं कथय ( प्रचोदयात् ) प्रेरयेत् ( उपसंगृह्य ) आदरेण प्राप्य । ( अधीहि ) अन्तर्गतण्यर्थः । अध्यापय ( सविता ) प्रेरकः ( सावित्री ) सवितृ- अण् । सवितृदेवताका । सवितुः प्रेरकस्योपासिका ॥
कण्डिका ३३ ॥
कर्म हैं, यह भी तुझे बताता हूँ, ( सविता प्रचोदयात्, याभिः एति इति ) [ जिनको ] सविता [ सबका चलाने वाला ] आगे बढ़ाता है और जिनसे चलता है । ( तम् उपसंगृह्य पप्रच्छ ) उसके पास आदर से जाकर उस [ मैत्रेय ] ने पूछा--( भोः अधीहि कः सविता का सावित्री ) महाराज ! पढ़ाओ कौन सविता है कौन सावित्री है ॥ ३२ ॥ भावार्थः-मनुष्यों को प्रश्नोत्तर करके गायत्री आदि वेद मन्त्रों के अर्थ समझने चाहियें ॥ ३२ ॥ विशेषः-त्रिपदा सावित्री वा गायत्री मन्त्र--तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धी- महि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ ऋ० ३ । ६२ । १०, यजु० ३ । ३५; २२ । ६; ३० । २; ३६ । ३; साम० उ० ६ । ३ । १० । ( तत् ) उस ( देवस्य ) प्रकाशमय ( सवितुः ) सबके चलाने हारे जगदीश्वर के ( वरेण्यम् ) अति उत्तम ( भर्गः ) ज्योति को ( धीमहि ) हम धारण करें, ( यः ) जो परमेश्वर ( नः ) हमारी ( धियः ) बुद्धियों वा कर्मों को ( प्रचोदयात् ) आगे बढ़ावे ॥ कण्डिका ३३ ॥ मन एव सविता, वाक् सावित्री, यत्र ह्येव मनस्तद् वाक्, यत्र वै वाक् तन्मनः, इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम्, १ अग्निरैव सविता पृथिवी सावित्री, यत्र ह्येवाग्निस्तत् पृथिवी यत्र वै पृथिवी तदग्निरित्येते द्वे योनी एकं मिथुनं, २ वायु- रेव सविताऽन्तरिक्षं सावित्री यत्र ह्येव वायुस्तदन्तरिक्षं, यत्र वा अन्तरिक्षं तद्वा- युरित्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ३, आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री यत्र ह्येवादित्यस्तद्द्यौर्यत्र वै द्यौस्तदादित्य इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनं ४, चन्द्रमा एव सविता, नक्षत्राणि सावित्री, यत्र ह्येव चन्द्रमास्तन्नक्षत्राणि यत्र वै नक्ष- त्राणि तच्चन्द्रमा, इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ५, अहुरेव सविता, रात्रिः सावित्री, यत्र ह्येवाहस्तद्रात्रैर्यत्र वै रात्रिस्तदहरित्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ६, उष्णमेव सविता, शीतं सावित्री यत्र ह्येवोष्णं, तच्छीतं, यत्र वै शीतं तदुष्ण- मित्येते द्वे योनी एकं मिथुनम्, अब्भ्रमेव सविता, वर्षं सावित्री, यत्र ह्येवा- ब्भ्रन्तद्वर्षं यत्र वै वर्षं तदब्भ्रमित्येते द्वे योनी एकं मिथुनं ८, विद्युदेव सविता स्तनयित्नुः सावित्री यत्र ह्येव विद्युत् तत् स्तनयित्नुः यत्र वै स्तनयित्नुस्तद्विद्युदित्येते द्वे योनी एकं मिथुनं ९, प्राण एव सविता अन्नं सावित्री, यत्र ह्येव प्राणस्तदन्नं यत्र वा अन्नं तत् प्राण इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनं १०, वेदा एव सविता छन्दांसि सावित्री, यत्र ह्येव वेदास्तच्छन्दांसि यत्र वैच्छन्दांसि तद् वेदा इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनं ११, यज्ञ एव सविता, दक्षिणा सावित्री, यत्र ह्येव यज्ञस्तत् दक्षिणा यत्र ३३-(योनी) वहिश्रिश्रुयुद्रु० ( उ० ४ । ५१ ) यु मिश्रणामिश्रणयोः- निः। योनिरुदकनाम--निघ० १ । १२ गृहनाम--निघ० ३ । ४ उत्पत्ति-
कण्डिका ३३ ॥ सावित्री वा गायत्री मन्त्र के चौबीस उत्पत्ति
६० गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३३ ॥ वै दक्षिणास्तद्यज्ञ इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् १२, एतद्ध स्मैतद्विद्वांसमोपाका- रिमासस्तुर्ब्रह्मचारी ते संस्थित इत्यथैत आसस्तुराचित इव चितो बभूवाथो- त्थाय प्राव्राजोदित्येतद्वाऽहं वेद नैतासु योनिष्वित एतेभ्यो वा मिथुनेभ्यः सम्भूतो ब्रह्मचारी मम पुरायुषः प्रेयादिति ॥ ३३ ॥ कण्डिका ३३ ॥ सावित्री वा गायत्री मन्त्र के चौबीस उत्पत्ति स्थान और बारह जोड़ा ॥ (मनः एव सविता वाक् सावित्री) [मौद्गल्य ने कहा]—मन ही सविता [चलाने वाला] और वाणी सावित्री [चलाने वाले की उपासिका वा सेविका है, (यत्र हि एव मनः तत् वाक्, यत्र वै वाक् तत् मनः इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम्) जहां पर ही मन है, वहां वाणी है जहां पर ही वाणी है वहां मन है, यह दो योनि [उत्पत्ति स्थान] और एक जोड़ा है। १। (अग्निः एव सविता पृथिवी सावित्री) अग्नि ही सविता [चलाने वाला] और पृथिवी सावित्री [चलाने वाले की उपासिका] है, (यत्र हि एव अग्निः तत् पृथिवी यत्र वै पृथिवी तत् अग्निः इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम्) जहां पर ही अग्नि है वहां पृथिवी है, जहां पर ही पृथिवी है वहां अग्नि है, यह दो उत्पत्तिस्थान और एक जोड़ा है। २। (वायुः एव सविता अन्तरिक्षम् सावित्री) वायु ही सविता और अन्तरिक्ष सावित्री है, (यत्र हि एव वायुः तत् अन्तरिक्षम् यत्र वै अन्तरिक्षं तत् वायुः इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम्) जहां पर ही वायु है वहां अन्तरिक्ष है, और जहां पर ही अन्तरिक्ष है वहां वायु है, यह दो उत्पत्ति- स्थान और एक जोड़ा है। ३। (आदित्यः एव सविता द्यौः सावित्री) सूर्य ही चलाने वाला और प्रकाश चलाने वाले की सेवा करने वाली है, (यत्र हि एव आदित्यः तत् द्यौः यत्र वै द्यौः तत् आदित्यः इति द्वे योनी एकं मिथुनम्) जहां पर ही सूर्य है वहां प्रकाश है, जहां पर ही प्रकाश है वहां सूर्य है, यह दो उत्पत्तिस्थान और एक जोड़ा है। ४। (चन्द्रमाः एव सविता नक्षत्राणि सावित्री) चन्द्रमा ही चलाने वाला और नक्षत्र चलाने वालों की सेवा करने वाली है, (यत्र हि एव चन्द्रमाः तत् नक्षत्राणि यत्र वै नक्षत्राणि तत् चन्द्रमाः इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम्) जहां पर ही चन्द्रमा है, वहां नक्षत्र [तारागण] हैं, जहां पर ही नक्षत्र हैं वहां चन्द्रमा है यह दो उत्पत्ति स्थानम् (मिथुनम्) क्षुधिपिशिमिथिभ्यः कित् (उ० ३। ५५) मिथ वधे मेधायां च—उनन् कित् । द्वयोः संयोगः । (अवभृथम्) अपो विभर्ति, अप्+भृञ् भरणे—कः । मेघः (विद्युत्) भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जि० (पा० ३। २। १७७) वि+द्युत दीप्तौ—क्विप् । तडित् । अशनिः (स्तनयित्नुः) स्तनितनिहिष्वपुषिगदि- मदिभ्यो णेरित्नुच् (उ० ३। २९) स्तन देव शब्दे—इत्नूच् । मेघशब्दः । (प्राणः) प्र+अन जीवने—घञ् । नासाग्रस्थानवर्ती वायुः, तस्य कर्म बहिर्गमनम् (अन्नम्) ऋवृजॄसिद्रुपन्थनिखपिभ्यो नित् (उ० ३। १०) अन जीवने-नः प्रत्ययः । यद्वा
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३३ ॥ ६१ स्थान और एक जोड़ा है । ५ । ( अहः एव सविता, रात्रिः सावित्री, ) दिन ही सविता है और रात्रि सावित्री है. ( यत्र हि एव अहः तत् रात्रिः यत्र वै रात्रिः तत् अहः इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां पर ही दिन है वहां रात्रि है, जहां पर ही रात्रि है वहां दिन है, यह दो उत्पत्ति स्थान और एक जोड़ा है । ६ । ( उष्णम् एव सविता, शीतं सावित्री ) ताप ही चलाने वाला और ठण्ड चलाने वाले की सेवा करने वाली है, ( यत्र हि एव उष्णं तत् शीतम् यत्र वै शीतं तत् उष्णम् इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां पर ही ताप है वहां ठण्ड है, जहां पर ही ठण्ड है वहां ताप है, यह दो उत्पत्ति स्थान और एक जोड़ा है । ७ । ( अन्भ्रम् एव सविता वर्षम् सावित्री ) मेघ ही सविता और वर्षा स वित्री है, ( यत्र हि एव अभ्रम् तत् वर्षम् यत्र वै वर्ष तत् अब्भ्रम्, इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां पर ही मेघ है वहां वर्षा है, जहां पर ही वर्षा है वहां मेघ है यह दो उत्पत्ति स्थान और एक जोड़ा है । ८ । ( विद्युत् एव सविता स्तनयित्नुः सावित्री ) बिजुली ही चलाने वाला और गर्जन चलाने वाले की सेवा करने वाली है, ( यत्र हि एव विद्युत् तत् स्तनयित्नुः यत्र वै स्तनयित्नुः तत् विद्युत् इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां पर ही बिजुली है वहां गर्जन है. जहां पर ही गर्जन है वहां बिजुली है, यह दो उत्पत्तिस्थान और एक जोड़ा है । ९ । ( प्राणः एव सविता अन्नं सावित्री ) प्राण ही सविता है, अन्न सावित्री है ( यत्र हि एव प्राणः तत् अन्नं यत्र वै अन्नं तत् प्राणः इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां ही प्राण है, वहां अन्न है, जहां ही अन्न है वहां प्राण है, यह दो उत्पत्ति स्थान और एक जोड़ा है । १० । ( वेदाः एव सविता छन्दांसि सावित्री ) सब वेद ही चलाने वाला है और छन्द [ आनन्दकारक कर्म वा गायत्री आदि छन्द ] चलाने वाले की सेवा करने वाली है, ( यत्र हि एव वेदाः तत् छन्दांसि, यत्र वै छन्दांसि तत् वेदाः इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां पर ही वेद हैं वहां छन्द हैं, जहां पर छन्द हैं वहां वेद हैं, यह दो उत्पत्तिस्थान और एक जोड़ा है । ११ । ( यज्ञः एव सविता दक्षिणाः सावित्री ) यज्ञ [ देवपूजा, सङ्गतिकरण और दान ] ही सविता है और दक्षिणायें सावित्री हैं, ( यत्र हि एव यज्ञः तत् दक्षिणाः, यत्र वै दक्षिणाः तत् यज्ञः, इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां पर ही यज्ञ है वहां दक्षिणायें हैं, जहां पर ही दक्षिणायें हैं वहां यज्ञ है, यह दो उत्पत्ति स्थान और एक जोड़ा है । १२ । [ यह चौबीस उत्पत्ति स्थान और बारह जोड़ा हुये-देखो क० ३१ ] ( एतत् ह स्म एतत् ) यह बहुत प्रसिद्ध है-( विद्वांसम् ) अद् भक्षणे-क्तः । खाद्यपदार्थः ( छन्दांसि ) चन्देरादेश्च छः ( उ० ४ । २१६ ) चदि आह्लादने-असुन् चस्य छः । आनन्दप्रदानि कर्माणि । गायत्र्यादीनि वा । ( ओपाकारिम् ) आ + उप + अकारिम् । करोतेः लुङि रूपमार्षम् । अकार्षम् । आसमन्तात् उपकृतवानस्मि ( आसस्तुः ) सितनिगमिमसि० ( उ० १ । ६६ ) आङ् ईषदर्थे + षस स्वप्ने-तुन् । अल्पशयनः ( संस्थितः ) सम्यक् स्थितः ( एतः ) हिसमृगृण्वि० ( उ० ३ । ८६) इण् गतो-तुन् गतिशीलः । पुरुषार्थी । (आचितः)