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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

कर्मका बदला, बदले पर दृष्टान्त

जैसे कि, अभागको सुन्दर स्त्री त्यागकर जाती है वैसेही मादक पदार्थ (शराब, गॉजा, भंग, चरस, तम्बाकू, अफीम, धतूरा, मजूम आदि सर्व मादक पदार्थ) को सेवन करनेवालोंको बुद्धि भी त्यागकर चली जाती है।

मद्यपानके दोष—शराबकी मस्तीमें मा, बहिन, स्त्री, पुत्री आदि किसीका कुछ भी ध्यान नहीं होता, विधि, निषेध हराम हलालका कुछ भी विवेक नहीं होता, शराबके ही कारण लूत जैसा नवी महापापका भागी बना। मद्यप निर्लज्ज और महापातकी होता है उसमें शुभगुणकी गन्ध भी नहीं होती। वह सब शुभ-कर्मों का वैरी है। अहङ्कार और अभिमानसे भरा होता है, अपनेको अपने गुरु और पिता आदिक प्रतिष्ठित पुरुषोंसे बुद्धिमान् तथा अच्छा समझता है। शराबीकी नशेकी हालतमें कुत्ता उसके मुंहपर मूतकर चला जाता है और वह अभाग समझता है कि, मेरे मित्रने गुलाब छिड़का। शराब पीनेवाला, मूत लगे पागलके समान नाचता फिरता है। मद्यपके सब अङ्ग और इन्द्रियाँ ऐसी निर्बल हो जाती हैं कि, कोई काम ठीक ठीक नहीं होता। मदिरा पीनेसे शुद्धि शौच नष्ट हो जाता है। मदिरासे इस प्रकार दया नष्ट हो जाती है जैसे कि, अग्निके लगानेसे घास फूस जल जाते हैं। इसी प्रकार सब मादक पदार्थ दया, क्षमा, सत्य, धैर्य, विचार, शील, सन्तोष, शम, दम आदि सब सद्गुणोंको नष्ट कर देते हैं। ऐसा अवगुण कौन और पाप है जिसको नशेबाज नहीं करता, मादक पदार्थके सेवीसे कभी किसीकी भलाई नहीं हो सकती। शराबी और मादक पदार्थोंका व्यसनी सर्वदाही झूठा माना जाता है। उसको सच्चे भले मनुष्योंकी संगति कदापि नहीं प्राप्त होती।

मदके नशामें पड़ा हुआ मनुष्य पागलोंके समान गाता रोता, हंसता और क्रोध आदिक व्यवहार करता है। मद्य पीकरही कृष्ण भगवान्के पुत्रने दुर्वासा ऋषिकी हँसी की थी जिसके कारण यादवोंका वंश नष्ट हो गया। शराब और अन्य मादक पदार्थोंके सेवन करनेवालोंको किसी शास्त्र और धर्मके बुद्धि-मानोंने अच्छा नहीं गिना है उसकी निन्दाही की है। यदि शराब पुठठोंमें लग जाय तो आदमी फौरन् मर जायगा, यह सर्व रोगोंकी जड़ है मृत्युका चिह्न है लोक परलोकमें अप्रतिष्ठा और दुःख उपजानेवाली है। मदिरा पीनेसे ऐसे ऐसे पापकर्म होते हैं जो कभी नहीं भूलते।

उदाहरण—मैंने किसी किताबमें देखा था कि, फारस मुल्कका एक राहुजावा था। युवा अवस्थामें उसका गवना हुआ। मकसाबेके दिन भली प्रकार मद्य पीकर अपनी स्त्रीके मकान चला। जाते जाते नशेकी तरङ्गोंमें

अभक्ष्य पर कबीरसाहिब

मकानका रास्ता भूलकर एक कबरिस्तानमें चला गया । उसी दिन शामको एक पारसीकी बूढ़ी स्त्री मर गई थी, उसको कफनदेकर सुगन्धी अतर आदिक लगाकर, कबरिस्तानके मकानमें रख आये थे । शाहजादा भी भटकता भटकता कबरिस्तानके उसी मकानमें आगया, नशेकी तरङ्गमें मृतक बूढ़ीकोही अपनी रत्री समझकर जगाना और गुद गुदाना आरम्भ किया पर वह मुरदा कब जागनेवाली थी ? न जागनेपर शाहजादेके मनमें विचार आया कि, आज प्रथम रात्रि है इस हेतु लज्जासे नहीं बोलता । पीछे उसके साथ सम्भोग करने लगा जवानीके जोशमें सबेरैतक भ्रष्ट होता रहा । इधर तो दिनका प्रकाश होने लगा उधर उसका नशा भी उतरने लगा, चेत आनेपर अपनेको कबरिस्तानमें एक बूढ़ी मृतकके साथ लिपटा तथा जिह्वा को उसके मुंहमें डाले हुये देख उसकी लज्जा और पछतावेको क्या कहना था, वह वहाँसे बड़ी चिन्ता, लज्जा, शोक, ग्लानि और घृणाको लिये हुये वहां से चल दिया ।

मदिराके दोषोंपर पाश्चात्य तत्त्वज्ञ—यूरोपियन तत्त्वज्ञोंकी सम्मति है कि, मदिराका नशा सार भागके आधारपर है, यह कारबन, हैड्रोजन और आक्सिजन इन तीन तत्त्वोंसे बनता है ।

कीमियाइस्लाइमें लिखा है कि, दो भाग आक्सिजन, छः भाग हैड्रोजन और चार भाग कारबनसे अलकाहल बनता है । उसका यह गुण है कि, शारीरिक उष्णतापर रक्तकी सञ्चारण गतिको बहुत जोरसे बढ़ाता है, जिससे थोड़ीही देरमें चर्मपर पसीना आजाता है । शरीरकी बिजली घट जाती है, इसका यह नतीजा होता है कि यह आरोग्यताको एकदम नष्ट कर देता है ।

इसका असर मस्तिष्कपर भी पड़ता है कि, यह मस्तिष्कके रगोंमें गरमी डालकर बड़े वेगसे रक्तका सञ्चालन करता है, जिसे मस्तिष्कके ऊपर बड़ा दबाव पड़ता है । थोड़े दिनोंके पीछे मस्तिष्कका तत्व ढीला होजाता है ।

मस्तिष्ककी शाखायें पतली पतली नसें हैं जिनपर मनुष्य की प्रकृति और स्वभावका आधार है वे बिगड़ जाती हैं इसका यह परिणाम होता है कि, मध्यम मनुष्य लड़ाका, झगड़ालू, डरपोक और उत्साह हीन हो जाता है । शरीरके पुट्टोंपर रसदार पदार्थोंको जमानेके कारण उनको बेकार कर देता है शराबियोंके पुट्टे प्रायः ऐसे हुये होते हैं । उनको थोड़ा परिश्रम भी बहुत कठिन जान पड़ता है, हाथ पग अपने वश नहीं रहते, अन्तमें थर थराहटकी बीमारी हो जाती है ।

उसका हड्डियोंपर ऐसा असर होता है कि, उनमें फासफोरस उत्पन्न

नहीं होने देता, उनमें गोंद भी नहीं होने पाता, जिससे हड्डियाँ कठिन और निर्जीव हो जाती हैं जिसका परिणाम गठिया और ध्वजभङ्ग होता है।

चरबी (मज्जा) पर इसका ऐसा असर होता है कि, उनको सुखा देता है अलकाहल यानी मदिराके सारभागका स्वभाव है कि, चरबीको पतला करे यदि थोड़ी हो तो सुखा दे, इसलिये मद्य भी वँसाही करता है।

चमड़े पर इसका असर पड़नेसे उसपर नाना प्रकारके चर्मरोग उत्पन्न होते हैं, वैसेही इन्द्रियोंपर तथा अन्तरीय शक्तियोंपर भी इसका असर होता है थोड़े समयतक तो उनमें गरमी पैदा करके बड़ा जोश और बल पैदा कर देता है, फिर उसी प्रकारसे उसमें पूरी ठण्ढक और सुस्ती आ जाती है।

उपस्थ इन्द्रियोंके रोगोंको फैलानेसे प्रायः मसाना कमजोर हो जाता धातु पतली हो जाती है, विषयकी इच्छा बहुत बढ़ जाती है, पशु वृत्तिमें विशेषता हो जाती है, इस प्रकारसे थोड़े दिनमें मनुष्य नामर्द हो जाता है। मसाना कमजोर हो जाता है, शराबी कभी २ कपड़ोंमें पिशाब भी कर देता है। कलेजेके अन्तरङ्ग तत्वको मिलाकर चरबी बना देता है, खालके अन्दर जा पाचन शक्तिमें मिलकर पाचनशक्तिको नष्ट कर देता है, इसलिये शराबी प्रायः वमन किया करता है, थोड़ेही दिनोंमें उसकी पाचनशक्ति जाती रहती है वह किसी कामकी नहीं रहती। पेटकी शाखायें तथा अंतरियोंके उलटे हो जानेसे कबजकी बीमारी हो जाती है।

कलेजेपर इसका परिणाम—हृदयका काम है कि, भोजनके साथ पिप्त मिलावे और कारबोलिक आदिकको रगोंके द्वारा फेफड़े तक पहुँचावे, शराब उसको कमजोर कर देती है, इस कारण मद्यपोंमेंसे सँकड़े पीछे निश्चानवे हृदयके रोगसे मर जाते हैं।

इसका फेफड़ेपर असर—फेफड़ा अधिक परिश्रमके कारण निर्बल हो जाता है, जिससे तपेदिक (विषमज्वर) दमा तथा सिलकी बीमारी हो जाती है।

धड़कन—हृदय रक्तके उलटने पलटनेके कारण धड़कता रहता है, मद्यप प्रायः सोते २ चिल्ला उठता है, इस प्रकार मद्यपकी जिन्दगी दुःखमय हो जाती है।

आँखोंपर मद्यका परिणाम—यह होता है कि, आँखोंका बल घट जाता है उनमें लाली छा जाती है, उसी तरह कानोंकी शक्ति भी घट जाती है, जिह्वा फूल जाती है, होठोंमें सूजन आ जाती है, जिसके कारण शुद्ध शब्द नहीं निकलता पाँव चलनेसे रह जाते हैं, कामदेवकी शक्ति घट जाती है।

तात्पर्य, अवर्ष

अंग्रेजी मछसे मृत्यु—एक प्रकारकी अंगरेजी मदिरा होती है, जिसमें भङ्ग मिलाते हैं, नशा तेज होनेके लिये कुचला भी मिला दिया करते हैं। हृदयमें उनका विष स्थान बना लेता है उसको कमजोर कर देता है, अन्तमें मनुष्य मर जाता है।

कोढ़की बीमारी—मदिरा पीनेसे कोढ़ उत्पन्न होता है, यह संसारमें दुःख और परलोकमें नरक दिखलाती है। पर मूर्ख मछपोंके लिये अनुपम पदार्थ है।

वृष्टान्त—एक मनुष्य टेम्प्रेसे सुसाइटीका पादरी था, उसके साथ उसके मछप मित्रोंने ठट्ठा किया यानी मछसे एक पीपा भरकर उसके पास भेंटके समान भेज दिया। जब वह पीपा पादरीके समक्ष आया तो उसने शराबको निकालकर एक चीनीके बरतनमें रक्खा। पहले एक शूकरको बुलाया उस बरतनको उसके सामने रख दिया कि, जिसमें शूकर कुछ पिये पर शूकर उसकी बू पातेही घबड़ाकर चिल्लाता हुआ भाग गया, उसने मदिरामें मुंह भी नहीं लगाया। पादरीने एक गदहेको बुलाया, उसके आगे भी वही शराब रखदिया, वह भी गन्ध सृंघतेही भाग गया, कुत्तेने भी वैसेही किया। फिर पादरीने उस मछको उसी पीपेमें भर और मित्रोंके पास भेजकर एक पत्र लिखा कि—

मेरे प्यारे मित्रों ! आपने मेरे पास जो भेंट भेजी उसको मैंने पहले शूकरके सामने रखी, पर उसके सृंघतेही वह विकल होकर भाग गया, पीछे क्रमशः गदहे और कुत्तेके पास भी रखी पर वे भी वैसेही घृणा करते हुए दुःखी होकर भाग गये, जिसको देखतेही कुत्ते, शूकर और गदहे भाग जाते हैं ऐसे घृणित और भयानक पदार्थ स्वीकार करनेवाला इनसे भी अधम होना चाहिये। मनुष्यके ग्रहण योग्य यह पदार्थ नहीं है। इसको तो वेही ग्रहण करे जो अपनेको उन कुत्ते आदिकोंसे भी नीच समझता होगा, इस कारण मैं इस भेंटको अपने यहाँ नहीं रखना चाहता, आपकोही मुबारक हो। यह शराब मनुष्यके लिये विष और विषोंका घर है। इन घृणित निषिद्ध मादक पदार्थोंने मनुष्यको ऐसा अन्धा कर दिया है कि, वे प्रकाशमें भी टटोलते फिरते हैं, उनको बिलकुल नहीं सूझता। सच और झूठका विवेक लोप हो गया।

ऐसेही व्यभिचार, चोरी, झूठ, ईर्षा, कपट, छल, विद्रोह, अभिमान, जूआ, नृत्य, भीख माँगना, भौड़पन आदि घृणित लज्जाहीन जितने कार्य हैं वे सब नर्ककी राह दिखलानेवाले हैं। मुक्तिमार्गके कट्टर शत्रु हैं, जो कोई मुक्ति चाहता है वो इनसे बचता रहे, नहीं तो अवश्य दुःख भोगेगा।

ऋग्वेद, पुरुषसूक्त, सूत्र

नजम—दिल लगा जिसका है बेमकरू हात । है ऊपर उसकेही बला आफात् ।
उसके दिलपर न रोशनीका चिराग । रास्त रहका उसे मिले न सुराग ॥
दिनमें फिरता टटोलते अन्धा । मिसल शबके करीहका बन्धा ।
साधु गुरुकी न उसमें इज्जत है । न खुदादानी उसमें लज्जत है ॥
खोय शैतान् बसूरते इस्मान है । मुजतरिब हाल औ परीशान् है ।
है यही शर्त अकल इन्सानी । कुर्ब उससे किनारा गरदानी ॥
बैठ हरगिज न साथ शैतानके । निजद जामत स्याह बख्तानके ।
सुहबत उनकीसे करसदा परहेज । बैठमत् मुहफिल उनकेसे बरखेज ॥
बल्कि तू हाथसे पकड़ले नाग । इन मुनशिशयोंसे जल्दतर भाग ॥
यही शैतान् तेरा क़ातिल है । ख्वाहिस उनकी ख्याल बातिल है ॥

**विशेषवक्तव्य—**इस भागमें वर्णन किये गये निषिद्ध घृणित दुःख उत्पादक मद्य, मांस तथा अन्य मादक पदार्थ और निषेध नीचकर्म ऐसे निकुट्ट हैं कि, मनुष्यके अन्तःकरणमें ज्ञानके प्रकाशको कदापि नहीं आने देते, जबतक इसका पूर्ण रीतिसे सङ्ग न छूट जावे तबतक सत्यगुरुका दर्शन नहीं होगा । इन निषेध दुष्टकर्मोंमेंसे एकमें भी मन लगा रहेगा तो कदापि ज्ञानका पथ न मिलेगा । ये घृणित पदार्थ तपेश्वरियोंके तपस्याको ऐसा नष्ट करते हैं जैसे आगकी चिनगारी रईको जला देती है । तीनों कालके तपस्वियोंकी संयमियोंकी बाहरी और भीतर शुभकर्मोंको नष्ट करनेमें शूरबीर हैं । यदि प्रगटरूपसे इनसे बचता रहे, पर अन्तरमें इनका बीज और बासना रहे, तो भी ज्ञानका प्रकाश नहीं मिल सकता । अन्तरके शुद्ध न होनेसे कदापि बाहर शुद्ध नहीं हो सकता । किसी अंशमें बाहर शुद्धताकी आवश्यकता नहीं भी होती पर अन्तरङ्ग शुद्धताकी तो अत्यन्त ही आवश्यकता है । कितने ऐसे महात्मा पाये जाते हैं, जिनका कि, बाहर तो देखने में भड़कीला नहीं होता, एवं लोग भी उनकी तरफ विशेष नहीं झुकते पर उनका हृदय ऐसा शुद्ध होता है कि, ईश्वरी ज्ञान का स्थानही होता है ।

इन घृणित पदार्थोंकी ओर सड़कल्प भी न दौड़े तो मनुष्य मुक्तिका अधिकारी हो सकता है । वासनाओंको रोककर इन्द्रियोंको वशकर निषेध पदार्थ और कर्मोंसे अलग रहकर, पूर्ण प्रयत्न करनेपर ही कल्याण की आशा हो सकती है । इस प्रकारसे प्रयत्न करने पर अन्तरिक्षसे सहायता मिलती है । परमात्मा इसकी कोशिश देखकर दयालू होता है । सच्चे अन्तःकरणसे प्रयत्न

ब्रह्मादि ऋषीश्वरोंके वचन मांस निषेधपर

करने पर किसी प्रकारकी रूकावट न हो तभी कार्य सिद्ध होता है तभी भगवान् सिद्धि देते हैं ।

सर्व धर्म

धर्मका प्रयोजन ।

इस लोक और पर लोकमें सुख मिले तथा अन्तमें मोक्ष भी मिल जाय, इस कारण संसारके सभी मतोंके लोग धर्मका अनुष्ठान करते हैं चाहे उन्होंने कुछ भी धर्मका अर्थ मसझ रखा हो पर उनकी श्रद्धा केवल कथित प्रयोजनोंके लिये ही होती हैं, इस कारण सभी मजहबवालोंके यहां धर्माचरणके येही प्रयोजन हैं इन्हींके लिये धर्माचरण है ।

धर्मका स्वरूप

अपनी अपनी मतिके अनुसार सभी धर्मोंके आचार्योंने धर्मके स्वरूपोंकी नियमात्मक कल्पनाएं की उन्हीं नियमोंको धर्म तथा उनके विरुद्धाचरणको अधर्म बतलाया, किसीने उनको ईश्वरकी आज्ञा बतलाई तथा किसीने वही उतरी हुई कहीं एवं किसीने अपनी शून्य समाधिके अकलंक अनुभव बतलाये । उनके अनुयायियोंने उन्हींको धर्म तथा दूसरे कामोंका अधर्म समझा । यहाँतक कि, प्रत्येक मजहबका व्यक्ति अपने पूर्वज धर्मको छोड़ दूसरे धर्मोंको अधर्म समझता है अपने नियमोंको उक्त प्रयोजन सिद्ध करनेवाला तथा दूसरोंके नियमोंको नरकमें पहुँचानेवाला मानता है ।

नियमोंकी आवश्यकता और सत्ता ।

जब कि—शरीर यात्राके निर्वाहके लिये भी नियमोंकी आवश्यकता रहती है और तो क्या आहार, विहार भी बिना नियमके सुखके स्थानमें दुःखका कारण बनते हैं एवं नियमानुसार किये हुए सुखोंके कारण होते हैं तो फिर दूसरों नियमोंका क्या कहना है ? प्रकृतिके पैमाने पर तुले हुए नियम निर्बाध चलते रहते हैं, जैसे दिनके करनेके कृत्य रातको कभी निर्बाध नहीं होते । क्योंकि प्रकृतिने रातको किसी दूसरे कामके लिये नियुक्त किया है । यही कारण है कि, काम करनेके जो प्रकाश आदि प्राकृतिक साधन दिनमें प्राप्त होते हैं वे रातमें प्राप्त नहीं होते, अतः प्रकृतिके अविरुद्ध नियमोंकी प्रत्येक प्राणधारीके लिये आवश्यकता है इसके विरुद्ध नियम, नियम नहीं कहे जा सकते ये नियमही धर्म कहलाते हैं इन्हींमें सारा संसार बँधा हुआ ।

नियमोंके भेद ।

इस प्रकार धर्मोंके दो भेद होगये । एक तो प्रकृतिके विरुद्ध जिनको कि,

हत्याके दोषी

प्रकृति सहन नहीं कर सकती दूसरे वे नियम हैं जो नियतिके नियंत्रणोंके ही परिस्फुट रूप हैं।

ईश्वरीय नियम ।

ईश्वरकी आज्ञा उसकी प्रकृतिके नियमोंके विरुद्ध कभी नहीं हो सकती। क्योंकि, प्रकृति उसीकी है उसीके जिम्मे संसारका निर्माण है अर्थात् उसीसे सब कुछ बना है। इस बातमें किसी भी ईश्वरवादी या खुदाबादी व्यक्तिको इनकार नहीं हो सकता कि, यह दुनिया जगदीशकी बताई हुई है फिर उसके मुखके कहे नियम उससे विरुद्ध कैसे हो सकते हैं? इससे हम इस निश्चय पर पहुँचे हैं कि, जो प्राकृतिक नियमोंका विरोध नहीं करते वे ईश्वरीय नियम हैं वही परमात्माके कहे हुए हो सकते हैं किन्तु जो प्राकृतिक नियमोंका विरोध करते हैं वे नियम परमात्माके बताये हुए नहीं हो सकते चाहे वो किसी भी मजहबके लोगोंने खुदाके भेरे कहकर अपना रखें हों।

परीक्षा ।

पहिली परीक्षा तो यही है कि, वे प्रकृतिके नियमोंके विरुद्ध न होने चाहिये। दूसरे उनमें अपनी आत्माकी सच्ची भावना भी ओतप्रोत होनी चाहिये। जो बात अपनी आत्माके सच्चे स्वरूपके प्रतिकूल हो वह कदापि धर्म नहीं हो सकता। तीसरी बात वह है कि, सबसे ईश्वर वादियोंका परमात्मा है। वह एक है अनेक नहीं हो सकता उसकी आज्ञा एक होगी जिसमें जन साधारणका हित निहित रहता है। यह काम परमात्माका नहीं हो सकता कि, एकको एक काम करनेमें पाप बता दे तथा दूसरेको पुण्य बतावे, उसकी आज्ञा सब मनुष्योंके लिये एक है जो सब धर्मोंमें अदुःखदायी एकसी बात है वही परमात्माकी आज्ञा है दूसरी परमात्माकी आज्ञाएँ नहीं हो सकती किन्तु वे केवल स्वार्थकी भावनासे सनी हुई बातें हैं।

धर्म क्या होता है? धर्म किसे कहते हैं? जब तक यह बात न जानता हो तब तक निकट रहने तथा अति उत्कट सम्बन्ध होनेपर भी उसको पहुँचानना कठिन है।

धारण—संसारमें नानाप्रकारके धर्म प्रचलित हैं। सब कोई अपने अपने धर्मकोही धर्म कहता है उसीको पसन्द करता है। दूसरे धर्मोंको बुरा समझता है। बहुतेरे तो ऐसे हैं जो अपने बाप दादेकी रीति, रस्म और तरीकोंकोही धर्म माने बैठे हैं। इसी प्रकार सब अपने अपने राग गाते हैं पर जबतक अपना सच्चा धर्म न जाना जाय तब तक पशु और मनुष्यमें कुछ भी विभिन्नता नहीं है। यहाँ

मांस त्यागका फल

मैं प्रगट करूँगा कि, अपना धर्म क्या है ? पर धर्म क्या है ? जो लोग अपने कुल रीतिको अथवा किसी विशेष नियमकोही धर्म माने बैठे हैं वे सब भूलमें फँसे हैं । जो नाना प्रकारके एकदेशीमें फँस धर्म द्वेषके लिये मरते मारते, निन्दा स्तुतिमें अपना दिन बिता रहे हैं, वे महान् अज्ञानतामें फँसकर अपने यथार्थ कर्तव्य और धर्मको कभी नहीं पा सकते ।

मत मतान्तरके प्रचारक—कालपुरुषने अनन्त प्रकारके मजहबोंको प्रचलित करके जीवधारियोंको फँसा मारा । यही मुख्य कारण है कि, सब मनुष्य अपने यथार्थ धर्मको छोड़कर कालपुरुषके धोखेमें पड़े हैं उसको पहचान नहीं सकते ।

ज्ञाता—कृष्णचन्द्रने अर्जुनसे महाभारत करवाकर पाण्डवोंको राज्यगद्दी पर बिठा दिया । अन्तमें, कृष्ण भगवान् पाण्डवोंसे अलग होगये और उन्हें उनका धर्म सँभालनेके लिये कहा । स्पष्ट तो उन्हें क्षत्रियोंका धर्म लड़ाई बतलाकर, लड़ाई कराई पर भीतरी औरही आशय रखा । इसका आशय कोई २ साधूही समझते हैं ज्ञानी ही यथार्थ धर्मकी सुधि जानते हैं ।

श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठिधात् ।

स्वधर्म निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

अर्थ—(सद्गुणोंसे युक्त पराये धर्मसे अपना धर्म गुणहीन भी हो तो भी श्रेष्ठ है, अपने धर्ममें मरना श्रेष्ठ है, पराया धर्म भयको प्राप्त करनेवाला है ।

यहां तो श्रीकृष्णचन्द्रने क्षत्रियधर्म बतलाकर अर्जुनको युद्धके लिये प्रस्तुत किया अर्जुनने भी युद्ध और रक्तपातही अपना धर्म समझा, पर श्रीकृष्ण भगवान्ने अर्जुनको इस श्लोकमें योगज्ञान आदिक सिखलाया जिससे धर्म जाननेका मार्ग मिले । प्रगट तो क्षत्रियधर्म बतलाया पर कृष्णके जितने वाक्य होते थे उन सभोंके दो अर्थ, दो भाव और दो आशय हुआ करते थे, मैंने इसी पुस्तकमें श्वपच सुदर्शनजीका वर्णन किया है, कि वह मनुष्य थे उनमें मनुष्यता थी जिसको कृष्ण भगवान्ने प्रगटरूपसे सबको दिखला दिया यह सिद्ध कर दिया कि, उतने लोगोमें सुदर्शनजीके अतिरिक्त कोई सच्चा भक्त मनुष्य न था । जो सच्चे मनुष्य हैं जिन्होंने यथार्थ मनुष्यत्वको पाया है वेही पर और अपर धर्मकी महिमा जान सकते हैं, वही अपना पराया समझ सकते हैं, दूसरा कोई नहीं जान सकता । इसीलिये विवेकवान् विचारवान्को, मनुष्य और अविवेकी मूर्खको पशु कहते हैं ।

अधर्म—काम, क्रोध, लोभ, मोह, युद्ध आदिक मनुष्यके यथार्थ धर्म नहीं, अपना धर्म तो वह है जिससे केवल अपना स्वरूप जाना जावे अपने यथार्थको प्राप्त करे ।

जग जाओ

धर्मकी जड़ ।

गुरु धर्मका मूल है, समस्त स्वसंवेदका कथन है कि, गुरुकी सेवा, अद्वा प्रेम, विश्वास और कृतज्ञतासे भक्ति मुक्ति प्राप्त होती है । गुरुको गोविन्द करके जानने पूजनसे अंतःकरण शुद्ध होकर सर्वज्ञता प्राप्त होती है केवल गुरुही धर्म और परमार्थकी जड़ है । जड़में पानी देनेसे फल फूल और पत्ते शाखा आदि सब पदार्थ पा सकेगा । जहां गुरुकी सेवा भक्ति नहीं वहां धर्मकी जड़ कट जाती है फिर तो 'मूलं नास्ति कुतः शाखा' की बात होती है गुरुकी सेवा पूजाके बराबर कोई तपस्या नहीं है । न भजनही है गुरुकी आज्ञा माननेसे पूरा होता है ।

गुरुपूजा अंगकी साखी ।

शिष्य पूजे गुरु आपना, गुरु पूजे सब साधु ।
कहें कबीर गुरु शिष्य को, मति है अगम अगाधु ॥
गुरु सौंजले शिष्यका, साधु संत को देत ।
कहें कबीरा सौंजसे, लागे हरिसे हेत ॥
गुरु पुजावे साधु को, साधु कहें गुरु पूज ।
अरस परस के खेलमें, भई अगमकी सूज ॥

गुरुभक्ति-जितने शुभकर्म संसारमें प्रचलित हैं सबसे बढ़कर गुरुपूजा है । जिस गुरुके द्वारा भक्ति मुक्ति प्राप्त होती है उसकी समता कौन कर सकता है ? कबीर साहबने बारम्बार कहा है कि, जो पुरुष जितनी गुरुकी सेवा तथा आज्ञापालन करेगा वह उतनीही शुद्धता और ज्ञान प्राप्त करेगा । गुरुसेवा पूर्णताको पहुँचाती है गोविन्द उसी गुरुकी मूर्तिसे प्रकट होकर काम पूरा कर-देता है । हों ध्यानकी पूरी निमग्नतामें गुरुकी सेवा नहीं हो सकती पर गुरुका ध्यान हो सकता है । ऐसी दशामें गुरुकी बारम्बार स्तुति कृतज्ञता और प्रार्थना करना उचित है जो कुछ ज्ञान तथा प्रकाश प्राप्त हो सब गुरुकी कृपासे ही हुआ समझना चाहिये जन्मभर गुरुकी कृतज्ञता माने कभी कृतघ्न न बने । दान, पुण्य, योग, याग, पूजा पाठ और व्रतादि सब कार्य गुरुकी आज्ञानुसार करे । गुरुसे बढ़कर दूसरा दानपात्र कौन है संसारमें नानाप्रकारके दुःखी जीव तो सदाही मिलते हैं पर गुरु सदा कहाँ प्राप्त होते । गुरुकी सेवा किसी महाभाग्य-वानको प्राप्त होती है । जिसको गुरु प्राप्त हो उसका धन्य भाग्य है । क्योंकि, गुरुकी सेवासे सब बन्धन छूट जाता है जो अपने गुरुके साथ, कपट, छल, झूठ, अभिमान, मान बढ़ाई हुशियारी चालाकी करता है, वह बड़ा अभागा है । गुरुको भी सब प्रकारसे शिष्यका बोध एवं सब शंका निवृत्त करना उचित है ।

श्रद्धा विश्वास—शिष्यको गुरुके उचित वाक्य पर विश्वास श्रद्धा रखना मुनासिब है । क्योंकि, गुरुके वचनकी श्रद्धाही भक्ति मुक्तिको प्राप्त कराती है । विश्वास श्रद्धाहीके साथ गुरु है, श्रद्धा विश्वासके छूट जानेपर नहीं रहती, विश्वास श्रद्धाही पर गुरु बैठा है । मुहम्मद साहबके नूरनामेमें लिखा है कि, खुदाने यकीनका एक वृक्ष उत्पन्न किया उसके ऊपर मुहम्मदकी रुहको मोरके समान बैठाया ।

आदि भक्ति शिवयोगी केरी । राखी गुप्त न जगमें फेरी ।

आदि गुरु विश्वासके वृक्षपर बैठाया गया, इस लिये गुरुकी बैठक वहीं हुई । जहाँ विश्वास नहीं, वहाँ गुरु नहीं, इसी लिये सब गुरुमुख लोगोंको ताकीद की गई है कि, अपने २ गुरुपर श्रद्धा विश्वास रखो यदि विश्वास नहीं रहेगा तो गुरुभी नहीं रहेगा । समस्त स्वसंबेद पुकारता है कि, गुरुको छोड़कर गोविन्दको कदापि नहीं पावेगा ।

गुरुदर्शन—चेलाको उचित है कि, गुरुका नित्य दर्शन करे । नित्य न हो सके तो दूसरे तीसरे दिवस तो अवश्यही करे, वह भी न हो सके तो सप्ताह अथवा पन्द्रह दिनमें जरूर करे । यदि पक्षपक्ष भी दर्शन न हो तो महीनामें एक बार, यदि यह भी न हो सके तो तीसरे महीने, यदि किसी कारण ऐसा भी न हो सके तो छठे महीने भेट पूजा सहित गुरुका दर्शन जरूरही करने जावे । यदि छठे महीने भी न हुआ तो वर्षमें दिन तो अवश्य सेवा बजावे । यदि वर्षमें दिवस भी गुरुकी सेवा पूजा न कर सके तो उसका कहीं भी ठिकाना नहीं । जैसे वृक्ष बिना जलके सूख जाता है उसी प्रकार चेला गुरुके दर्शन बिना अशुद्ध अंतः-करणका हो जाता है ।

गुरुमुखका कृत्य—इस संसारमें दो प्रकार मनुष्य हैं । गुरुमुख और मनमुख । गुरुमुख वे लोग हैं जो कि, गुरुकी सेवामें किसी प्रकारकी भी त्रुटी नहीं करते सर्वदा गुरुकी आज्ञा पालनमें ही लगे रहते हैं गुरुकी आज्ञाको पूर्णरीतिसे समझने और उसपर चलनेवाले पुरुष, पारखपदको प्राप्त होकर, सत्यपदको पहचान लेते हैं, ऐसेही मनुष्य अपना तन मन धन सब सत्यके लिये अर्पण करते हैं ।

मनमुख—वे लोग हैं जो गुरु और गुरुकी वाणीका कुछ आदर नहीं करते जो मनमें आता है वही करते हैं । ऐसे पुरुष अव्यवस्थित चित्तके होते हैं इसी कारण स्वेच्छाचारी तथा दूषित हृदयके भी होते हैं । मनमुख मान बड़ाई और वृथा अभिमानसे ग्रस्त होते हैं ।

दोनोंके कृत्य—गुरुमुख ईश्वर पूजक है और मनमुख बुत्तपरस्त है गुरुमुख

हिंसा पुण्य नहीं

तरेगा, मनमुख डूब मरेगा। सब प्रशंसा गुरुमुखके लिये है, सब धिक्कार और निन्दायें मनमुखके लिये हैं। गुरुमुखमें पूर्ण मनुष्यत्व वर्तता है मनमुख पशु धर्मोंमें रहनेके कारण बन्ध व वासनाओंमें फँस रहा है।

मनमुखके मुक्त न होनेका कारण—कितने लोग गुरुसे उपदेश तो ले लेते हैं पर सेवा करनेके समय भाग जाते हैं मनमुख होकर अपना जन्म गँवा देते हैं। वे मूर्ख यह नहीं सोचते विचारते कि, गुरुकी सेवा भक्ति बिना ईश्वर कैसे प्रसन्न होगा। पत्थरपर चक्रमक्क लगता है तब अग्नि निकलती है यदि पत्थर और चक्रमक्कका संयोगही न हो तो चिनगारी कैसे निकले? इसी प्रकार यदि चेला गुरुका सच्चा प्रेम-सम्बन्ध न हो तो ज्ञानका प्रकाश कैसे हो। यदि लोहा और पारसका संयोगही न हो तो सोना कैसे बनेगा? लोहा पारसका सम्बन्ध भी हो पर जब तक उनमें तनिक भी भेद रहे, तो सोना होना असंभव है।

गुरुपूजाका महात्म्य—गोविन्दको कोई भी नहीं देख सकता गुरुको सब देख सकते हैं। गोविन्दके स्थानपर गुरुदेव पूजता है गुरुही की पूजा गोविन्दकी पूजा है। जो अपने गुरुको परमात्माका स्वरूप जानकर उसकी सेवा करता है वह तत्काल सत्यपुरुषको पा लेता है। गुरुकी उत्कृष्टता तीन लोकसे परे है। ये तीनोंलोक मनमुख हो रहे हैं इस कारण कोई भी मनुष्य गुरु की यथार्थ सेवा नहीं करता। गुरुके ऊपर संदेह करनेसे धर्मकी ध्वजा टूट जाती है। जिन्होंने गुरुको पूजा उनके दोनों लोक सुधरे जिन्होंने गुरुको न पूजा वे गुरुविमुख होकर उभय लोकसे भ्रष्ट हुये। सब मतवालोंमें कोई ही गुरुमुख होगा नहीं तो मनमुखोंकी संख्या अधिक है।

मजहिबीयोंकी ओर दृष्टि—प्रथम हिन्दुओंकी ओर ध्यान दो, इनमें प्रायः सभी गुरुविमुख देख पड़ते हैं सभीने गुरुसे मुख फेर लिया जब कभी किसी बातके जाननेकी आवश्यकता होती है, तो किसी से पूछ कर दान पुण्य कर दिया नहीं तो कुछ चिंताही नहीं। लाखों करोड़ोंमें कोईही गुरुमुख होगा।

मुसलमानोंकी ओर ध्यान दो तो मालूम होगा कि न कोई किसीका गुरु है न कोई किसीका चेला है प्रचलित रीतिसे किसी मुल्ला, मौलवी आदिसँ पूछकर रोजा निमाज सीख लेते हैं। न किसीका कोई गुरु न चेला है केवल बातोंही बातोंका मेला है।

फकीरोंमें कोई २ फ़िरका ऐसा है जहां गुरु चेलेका बिचार है।

यही दशा ईसाई (ख्रिश्चिटी) धर्मकी है। मूसई (यहूदी) भी उन्हीं की पैरवी करते हैं। इन दोनों धर्मोंमें तो नाम मात्रको भी गुरु शिष्यकी रीति

पश्चिमकी पुस्तकें, मूसाकी पुस्तक

नहीं जान पड़ती । केवल अपने २ आचार्य (नबी) का नाम ले लेकर धूम मचाते हैं । इसी प्रकार संसारभरके मतबादियों पक्षपातियों और विषयियोंकी दशा हो रही है ।

मनुष्यको उचित है कि, गुरुसे अधीन रहे सर्वदा उसकी आज्ञाका पालन करे पूरी प्रतिष्ठासे गुरुके सन्मुख रहे कभी ऊँचे शब्दसे बेअदबोंके समान धूण्टता प्रकट न करे गुरुसे अभिमान करनेपर अन्तःरण मैला हो जायगा ।

स्वसंवेदका सार— स्वसंवेदका संक्षेपमें सारांश केवल एक सार शब्द है । वह कहने सुननेमें नहीं आता, केवल सत्यगुरुकी कृपासे अपने विचार द्वाराही जाना जाता है । लोगोंको समझानेके लिये सारशब्द कहा जाता है । सार नाम है यथार्थ भेदका और शब्द नाम वाणीका है । शब्दका जो यथार्थ लक्ष्य हो उसे सार शब्द कहते हैं । उसको जो पहचाने वह हंस है वही मुक्त है । सारशब्दकी व्याख्यामें कबीर साहबने चौदह अरब ज्ञान कहे हैं । क्योंकि, सारशब्द बोली भाषामें नहीं आता, उपदेश सुनते २ विचार करते २ भाग्यवान्के समझमें आ जाता है । चारों युगोंसे कबीर साहब समझाते आये हैं अनन्त ग्रन्थ बर्णन किये हैं, जो कि स्वसंवेदके नामसे प्रसिद्ध हैं । वे सब केवल सारशब्दकी टीका हैं । जब सत्यपुरुषकी उत्पत्तिकी इच्छा हुई सूक्ष्मसे स्थूल हुआ । तब शून्यमें एक झाँई दृष्टि पड़ी, वही बिन्दीके आकारमें खड़ी हुई (०) ॥

बिन्दी— जब सारशब्द सूक्ष्मसे स्थूल हुआ बिन्दीरूप झाँई प्रगट हुई, उसीसे सब सृष्टि उत्पन्न हो गई । समस्त संसारमें यह बिन्दी है केवल उसी एक बिन्दीसे सब संसार है । देखो गयासुल्लोग्रातमें यह लिखा है, कि, समस्त संसारमें यह नुक्ता फँल गया । इसको अनुस्वार कहते हैं, इसका दूसरा नाम मकार भी है, इसी मकारको 'माया कहते हैं । इस मायाके मिथ्या, कपट, छल, शून्य, भ्रम, शक्ति और प्रकृति आदिके बहुत नाम हैं । मायाके अनन्त नाम हैं, वे सब केवल इस बिन्दीकी ही प्रशंसामें हैं सभी भ्रम हैं, इसी बिन्दीसे सब भ्रम हैं एक भी सत्य नहीं है ।

जब लेखनी कागद पर रखकर कुछ लिखना चाहते हैं, तो पहले बिन्दी बनती है, फिर उसीके पेटसे सब अक्षर निकलते हैं । यह सम्भव नहीं कि, कागद-पर लेखनी रखें बिन्दी न बने । अवश्य पहले विवश बिन्दी बनेगी फिर पीछे अक्षर, अक्षरसे शब्द शब्दसे लेख, फिर भाषा बनेगी । इस कारण लिखने


१ आदि मंगलके अर्थमें साकेतवासी श्रीविश्वनाथजीने सारा विस्तार बताया है किन्तु यहाँ मूका सारा पसार दिखाया है विज्ञान दोनों बातोंका विचार करें एवं सुधार कर पढ़ें ।

समीक्षा, कुर्बानीके प्रचारक समीक्षा, दूसरी पुस्तक जबूर

बोलनेका मूल कारण बिन्दीही है। यही माया और मिथ्या है जिस दशामें कि' सब लिखने और बोलनेकी जड़ मिथ्या है, तब लिखना और बोलना कैसे सत्य हो सकता है ? केवल यही बिन्दी सर्व लेख और वाणीमें प्रवेश कर रही है। इसका यथार्थ भेद सत्यगुरुके ज्ञान बिना कोई नहीं पा सकता। बड़े २ ऋषि मुनि, भक्त और तपस्वी, सिद्ध, साधु, इसी बिन्दीमें डबडब कर रहे हैं। यही, एक ऐसा महासागर है कि, किसी उपायसे इससे बाहर जानेकी युक्ति नहीं जान पड़ती। कौसीहू तपस्या और भजन न क्यों करे पर इससे पार होनेकी आशा डुराशा हो जाती है। बड़े आश्चर्यका खेल है ? इससे कौन बाहर निकाले ?

जब केवल एक बिन्दी अथवा अण्ड था, दूसरा कुछ भी न था, उस समय शब्द आदि भी कुछ नहीं थे। यह बिन्दी उत्पत्तिकी ओर झुकी तो वासनाओंसे पूर्ण हो गई। विषयके स्वादको चाहा, सांसारिक इच्छाओंकी राशि हो गई। अण्डरूप पिंजड़ेमें न रह सका इसीसे अण्डा फूट गया। शारीरिक सुखकी इच्छा उत्पन्न हुई, जिससे इसके दो स्वरूप हुये, एक माया, दूसरा ब्रह्म; यही माया और मन कहलाये। एकसे दो होनेपर उसीसे शब्द औरकारकी उत्पत्ति हुई। यही ॐ तीनलोक और चारवेदका मूल कारण हुआ। इसीको प्रणव बोलते हैं। यही एकसे अनेक होकर समस्त संसारमें फैल गया। इसीसे चारवेद प्रगट हुये उस पर लोग चलने लगे। पहले यही ॐ शब्द हुआ पीछे वेद हुए। इसीको नाद और वेद कहा जाता है। उत्पत्ति के प्रथम यह ॐ हुआ, इसका अर्थ दीनता और आधीनता है। जिसके मनमें दीनता और गरीबी स्थान करेगी वह सब लोकोंका राजा बनेगा। जो आधीनतासे नहीं आये उनका छुटकारा न हुआ। अनगिनती ज्ञानी और कर्मकाण्डी हुये जिन्होंने भजनको पूर्णता पर पहुँचाया पर आधीनता न होनेके कारण उनका पूरा न पड़ा।

जिस दिशामें वेद सत्य परमात्माका ज्ञान बतलानेमें असमर्थ है, उस दशामें वेदपाठियोंको एक चैतन्य परमात्माकी उपासना क्योंकर मालूम हो सकती है ? जो सूक्ष्मविषयको अर्थात् माया और शुद्ध ब्रह्मकी उपासनाके भेदको नहीं समझता वो मनुष्यत्वसे शून्य है। जहांतक माया है वहां सब भ्रम है। जितने समाचार कहनेवाले हैं, सब मायाके ही देशका समाचार कहते हैं। सत्य लोकके समाचार कहनेवाले शब्दको युक्तिसेही बतलाते हैं। उनकी युक्ति उनके साथ होती है। दूसरा उनकी युक्ति जान नहीं सकता। मनुष्यको उचित है कि, एक शुद्ध चैतन्य परमात्माकी उपासना करे। जो सत्य परमात्माकी उपासनाकी ओर लगना चाहता है वह माया और मायिक दोनोंसे भिन्न हो जाता है। जब-

इञ्जीलका कथन, कुरान व हदीस, समीक्षा

तक माया और मायिकोंमें फँसा रहता है, तब तक अद्वितीयसत्यपुरुषकी उपासनाके योग्य नहीं होता । क्योंकि, दोनोंमें ही भेद वाद है । दोनोंका उपदेश भेद ही है, भेदसे भिन्न उनका उपदेश कदापि नहीं हो सकता चारों वेदोंने स्वरूप प्रगट किया, तो प्रथम भारत वासियोंको प्राप्त हुये, लोगोंने उनकी आज्ञापार चलना आरम्भ किया । यद्यपि कतिपय धर्मोंके लोग आजकल उसके विरुद्ध भी चल रहे हैं ।

वेदके टीकाकारोंने, ऊँकारके यथार्थ आशय और अर्थको न समझा, इसका कारण केवल उनके ज्ञानकी अपूर्णता है । वेद तो किसीसे स्वयं कुछ नहीं कहते न बोलतेही हैं, जिससे कि अपने उपदेशको प्रगट कर सकें लोगोंको शिक्षा दें तथा कहें कि, तुम अमुक वेद मन्त्रकी व्याख्या इस प्रकार करो इस प्रकार न करो । इसी कारण सब टीकाकारोंने अपनी २ बुद्धि और पहुँचके अनुसार जैसा चाहा टीका करदी उन्होंने यह कुछ भी न सोचा कि, मेरा विचार सत्य अथवा असत्य । इस कारण वेदके आशयको वही समझ सकते हैं, जिनका अन्तःकरण ज्ञानके यथार्थ प्रकाशसे पूर्ण है । दूसरे नहीं ।

इस ऊँकार की यथार्थताको न जाननेके कारण ही वेदपाठी लोग आवागमनमें फँसे रहते हैं । अद्वैतमें कुछ विकार नहीं, द्वैतमें है । अद्वैतमें वेद वाणी कुछ नहीं । जितने वेदपाठी हैं अपनी बुद्धिपर भरोसा रखते हैं, जिस बुद्धिपर भरोसा रखते हैं उस बुद्धि की पहुँच अद्वैत तक है ही नहीं, फिर वेदपाठियोंको क्या सहारा रहा, वे असहाय हैं । जो अद्वैतके खोजा हैं वे द्वैतमें कदापि वृत्ती नहीं लगाते । जो अनेकमें मन लगाते हैं वे एककी प्राप्ति नहीं कर सकते । आशा तृष्णा द्वैतमें है, अद्वैतमें पग धरते ही सांसारिक विचार और सङ्कल्प छोड़ने पड़ेंगे । जब तक सांसारिक ध्यान है तब तक माया है, कोई उपाय क्यों न करे छुटकारा नहीं हो सकता ।

तौरेतकी आज्ञाएं ।

१-एक खुदाकी पूजा करो, २-बुतपरस्ती मत करो, ३- खुदाका नाम बे फ़ाइदा मत ला, ४-सबतका दिन पाक रखो, ५-माता पिताकी प्रतिष्ठा करो, ६-खून मत करो, ७-व्यभिचार मत करो, ८-चोरी मत करो, ९-अपने पड़ोसीको प्यार करो, १०-झूठ गवाही मत दो । ये दश आज्ञायें तौरेतके सार हैं । प्रगट तो इनका अर्थ सब कोई समझ लेता है, परन्तु यथार्थमें इनका अर्थ इस प्रकार समझना चाहिये ।

१-एक खुदा (ईश्वर) की पूजा-करो—कहनेवालेका आशय तो यह

है कि, मेरी पूजा करो, सुननेवाला भी यही समझता है कि जो ईश्वर मुझसे बातकर रहा है उसीकी पूजा उचित है। वक्ता श्रोता दोनोंके आशय और संमति उनके अनुसारही है।

समोक्षा—पर मेरी सम्मति तो एक ईश्वरकी पूजाके ावषयमें यह है कि जो कुछ आँखोंसे देखा जाता है, कानोंसे सुना जाता है, स्पर्श किया जाता है, रस लिया जाता है, संधा जाता है अथवा किसी बाहरी वा भीतरों ज्ञानेन्द्रियसे कर्म अनुभव होता है यह सब द्वैतरूप माया है। वहाँ अद्वैतका पता नहीं बरन् अनेक हैं। अतः हजरत मूसाने खुदाकी बातको अपने कानसे सुना खुदाको अपने आँखोंसे देखा। जो देखा सुना जाता है वह द्वैत है, अद्वैतमें नहीं है। इससे मूसाने खुदाको अपनी आँखोंसे देखा उससे जो कुछ सुना सब माया ही हुई। मूसाने मायाहीकी आज्ञाको माना। एक खुदाको न किसीने देखा और न किसीने उसका वचन सुना। क्योंकि, अन्तरदृष्टिसे जो कोई एक ईश्वरको देखता है तो उसको खुदाको देखने एवं उसके वचनको सुननेकी आवश्यकता नहीं होती। वह सबमें सब जगह एक समान वर्तमान है फिर किसका वचन सुनें, किसको देखें। उनके अपने ही मन और वचनसे खुदाके वचन खण्डित होते हैं। क्योंकि भीतर और बाहर तो सब वही है। परमात्मा सदा वर्तमान है फिर किस विशेष स्थानमें जाकर ईश्वरका वचन सुनें एवं सुननेका मुहताज बनें, श्रोताकी ऐसी क्या जरूरत है।

निराकार निरवयवका पता नहीं—यदि मूसा अपने अन्तरकी ज्ञान-दृष्टिसे ईश्वरको पहचानते उसके पदको जानते तो अवश्य वर्णन करते कि यह खुदा कौन है। किधरसे आया? किधरको गया? उसको रहनेकी जगह कहाँ है? क्या सामर्थ्य रखता है? विस्तारसे सारा हाल प्रगट हो जाता, कदापि न छिपा रहता। अरबदेशमें जितने विश्वासी पेंगम्बर हुये किसीने इस खुदाका विस्तृत वृत्तान्त प्रगट नहीं किया केवल प्रकाश और थोडा सामर्थ्य देखकर उसकी आज्ञा मानते आये। किसीने उसको न पहचाना। सब एक दूसरे की बातपर विश्वास करते चले आये। केवल बाहरी भड़क देख लो, भीतरी भेदको किसीने नहीं जाना। ऐसा अन्तरप्रकाश उनमेंसे किसीको नहीं हुआ कि यथार्थ को मालूम कर सके जिस खुदाके शासनको मूसाने माना उसी खुदाकी भक्ति आदमसे लेकर आजतक सब करते आते हैं। उसी खुदाकी आज्ञायोंको मानना अपना धर्म सममत है यही उनका विश्वास है। जो कुछ उन पीर पेंगम्बरोंने देखा वह सब भ्रम है, वह बेचून बेचारा खुदा यानी निराकार निरवयव परमात्मा

हिंसाका न्याय, गोहत्याका निषेध

शुद्ध है उसमें कोई मिलाबट नहीं । जिसमें कुछ मेल है वह द्वैत है मायाका खेल है । बिना पारख गुरुके सत्य परमात्माकी भक्ति कोई नहीं बतला सकता । एक परमात्माकी भक्ति बही है कि, पहले उस परमात्माको पहचाने । जबतक ईश्वरका ज्ञान न हो, तबतक भक्ति कैसे हो सकती है ? पहले ज्ञान होगा, पीछे भक्ति होगी । नये पुराने पैगम्बरोंमेंसे किसीकी भी सत्य अद्वितीय ईश्वरका ज्ञान होता तो वे अवश्य एक परमात्माकी भक्ति करते ।

खुदाने आदमको अपने रूपमें बनाया—आदम पांच तत्वके संयोगसे बना था । इससे प्रमाणित होता है कि, उसका खुदा भी पांचतत्वसे भिन्न नहीं था । आकाशके रंगका खुदा सांसारिक तत्वोंके संयोगसे पृथक नहीं है । यद्यपि उससे बहुत ऐश्वर्य और सामर्थ्य है तो भी वह अद्वितीय और एक नहीं ठहर सकता ।

मूसाकी उत्पत्ति नामक पहली किताबको ३ बाबकी २२ आयतसे स्पष्ट है कि, यह अपने साथी मण्डलीमें से एकके समान था । इस आयतसे स्पष्ट भेद प्रगट होता है, उसमें अद्वैतपना और एकता सिद्धि नहीं होती । खुदा अद्वितीय और भेद रहित, एक नहीं, वरन् अनन्त खुदा प्रमाणित होते हैं, जो भिन्न भिन्न ब्रह्माण्डोंमें खुदाई करते हैं । जब मूसाने स्वयं एक अद्वितीय परमात्माकी भक्तिका आनन्द न उठाया तो वे दूसरोंको क्या बतला सकते हैं ?

बूत परिस्तीको खुदा परस्ति—अद्वैत ज्ञानके विषयमें, स्व सम्बेदकी शिक्षा बिना जो कुछ कहा जाता है वह मिथ्या है । हिन्दू जिन तीन ईश्वरोंकी भक्ति करते आते हैं उन्हीं तीन खुदाओंकी भक्ति इबराहीमने भी की । अगणित सिद्ध साधु और महात्मा इन तीनों ईश्वरोंके तुल्य पद पर स्थित हैं । अनन्त उनसे ही बढ़कर हैं कितने उनसे घटकर हैं । यदि एक अद्वितीय परमात्माकी भक्तिकी सुधि नहीं हुई तो वेद और किताबोंके पढ़नेसे क्या लाभ ? उसकी सुधि हुये बिना मनुष्यत्व कहाँ है ? जहाँ एक अद्वितीय परमात्मा की भक्ति है वहाँ वेद और किताब सब गूंगे हैं । नाद और वेद पांच अहंकारके घरेमें हैं, पांचों अहंकार मायासे हैं मायाके सब कौतुकोंमें सने हुये हैं । यह सारा संसार मायाकी पूजा करता है, उसकी भक्तिको ही ईश्वरकी भक्ति मानता है । जो कुछ इस जीवने मान लिया है उसको वही सत्य जान पड़ता है, उसी पर विश्वास जमा हुआ है । इसके ईश्वरकी शक्ति सीमाबद्ध है, असीम नहीं है । यह खुदा नाशमान है, अविनाशी नहीं । क्योंकि, महाप्रलयके समय इस खुदाईका झण्डा उठ जावेगा । यदि मूसाका खुदा अद्वैत और एक ठहरा तो हम लोग सब मनुष्य

समीक्षा हजका यम

अपनी २ जगहमें, अद्वैत और एक हैं क्योंकि, एकके समान दूसरा कदापि नहीं। फिर खुदाकी भक्तिकी कोई आवश्यकता नहीं। क्योंकि, ईश्वरोंके सामर्थ्य और ऐश्वर्यमें भेद है, कोई अधिक है कोई कम है। मूसाके अनुयायी प्रायः बुत्परस्ती कर करके खुदाके कोपमें पड़े, यदि वे एक अद्वितीयकी भक्ति जानते तो बुत्परस्ती क्यों करते? सुलेमान जैसा बुद्धिमान् तत्त्वज्ञ और खुदाका प्यारा जिसको कि, खुदाने तीन बार दर्शन और बहुतसे बर्दान दिये थे वह खुदासे विमुख होकर बुत्परस्तीमें फँस जावे? यह सम्भव नहीं कि, जो कोई एक परमात्माकी भक्ति जाने, वह फिर बुत्परस्तीमें फँसे। इसी कारण समस्त इव्रानी धोखेमें पड़े हुए बुत्परस्तीको खुदापरस्ती समझ रहे हैं।

तीनों तुच्छ हैं—सुलेमानने जब अपने बाप दादेका राज्य पाया, खुदाने उनको दर्शन देकर कहा कि, ऐ सुलेमान! तुझको पैगम्बरी, राज्य और तत्त्वज्ञानमें तीनों पदार्थ प्रदान करता हूँ, तेरे समान न कोई हुआ न होगा। जिस दशामें कि, खुदाने सुलेमानको ये तीनों पदार्थ, प्रदान किये उस दशामें भी सुलेमानको इतना विचार नहीं हुआ कि, अपनेको अयोग्य कर्मसे बचावे। इससे प्रमाणित होता है कि, ये तीनों पदार्थ तुच्छ हैं। ईश्वरीय ज्ञान (आत्मज्ञान) के तुल्य कोई दूसरा पदार्थ नहीं है।

हज़रत आदम सब पैगम्बरोंमें श्रेष्ठ तथा खुदाके प्यारे पुत्र हैं, ये खुदा उनके साथ वही भलाई करता था जो कि, पिता पुत्रके साथ करता है। खुदाने मना किया कि, ऐ आदम! तू इस वृक्षका फल न खाना, सावधान रहना, शैतान तेरा शत्रु है। वाह! फल खाना तो मना किया शैतानको शत्रु भी बतलाया पर इतना ज्ञान नहीं दिया, जिससे आदम शैतान तथा उसके कपटको समझ सकता। इससे यह सिद्ध होता है कि, उस खुदाको ज्ञान देनेकी सामर्थ्यही नहीं थी, अथवा आदमको छलसे भिन्नितसे बाहर करना चाहता था। खुदाका यह कर्तव्य दो बातोंसे पृथक् नहीं, एक तो कपट, दूसरी ज्ञान देनेकी असमर्थता। जब खुदाहीकी यह दशा हो, तो अपने भक्तोंको मुक्ति किस प्रकार दे दे किस प्रकार अँधेरेसे निकल सके।

२ बुत्परस्ती मत करो—अब जानना चाहिये कि, काम कामनासे शरीर-धारीकी भक्ति करनेका नाम बुत्परस्ती है, वे जड़ हों अथवा चैतन्य जीवित अथवा मृतक एकही समान है। मूसाका खुदा कहता है कि, “बुत्परस्ती मत करो” इसका यह आशय हुआ कि, जो तुमारे दृष्टिमें मेरी प्रतिमा है, उसकी पूजा करो दूसरेकी न करो क्योंकि, मैं बुतों (प्रतिमाओं) में श्रेष्ठ बुत हूँ। सब

अनुचितका विधाता, समीक्षा समता कबीर साहिब, सात्विक भोजन धारणा, श्रेणियाँ और भोजन, स्वसंबेदमें, मांसकी पेसाबसे तुलना

बुतोंपर मुझे बड़ाई है, मेरी आज्ञामें सब बुत हैं । अतः खुदाने खूरूजमें मूससे कहा कि, मैं मिसरकी सब बुतोंको दण्ड दूंगा, यदि वे पत्थरकीही होतीं तो दण्ड किसको देता गन्दी वासनासे शरीरधारीकी पूजा करना मनुष्योंका काम नहीं बरन् जो लोग आत्मज्ञानसे खाली हैं वे बुत परिश्ती करते हैं । बुतपरस्तोंमें आठ प्रकारकी बुतपरिस्ती है, १—मिट्टीकी, २—कागदकी, ३—धातुकी, ४—पत्थरकी और ५—ध्यानकी छबि अर्थात् जैसा मन चाहे वैसी, ६—प्रत्यक्ष अर्थात् देहवान् मनुष्यकी पूजा, ७—प्रत्यक्षका ध्यानमें पूजना, ८—उसको अपने दिलके भीतर पूजना । ये आठ प्रकारकी बुतपरिस्ती है । प्रत्यक्ष बुतकी पूजा सब बनी इसराईल करते आये हैं । सुलेमानने जीवित और मृतक दोनोंकी पूजा की थी । उपासनाके लिये भगवानकी मूर्ति पूजा बुतपरिस्ती नहीं है ।

३ खुदाका नाम बेफायदा मत लो—जो खुदाको जानतेही नहीं वे उसका नाम क्योंकर ले सकते हैं ? खुदाका नाम तो खुदाको पहचाननेवाले जानते हैं । बिना ईश्वरी उपदेशके ज्ञानवालोंके ईश्वरका नाम लेना निरर्थक है । ईश्वरने जिसको नाम बतलाया, वह अवश्य उसका नाम जानता होगा क्योंकि ईश्वरसे प्रथम दूसराही कोई नहीं था सबसे पहले वही एक अद्वितीय था । जबतक पूरे सत्यगुरुकी शिक्षा न मिले, तबतक उस अद्वैत शुद्ध चैतन्यका नाम क्यों कर जान सकता है ?

सत्य कबीर वचन

जो निगुरा सुमिरण करे, दिनमें सौ सौ बार ।

नगर नायका सत्य करे, जरे कौनकी लार ॥

जो कोई गुरुमुख हो उसीका नाम लेना ठीक है, जिसके गुरुही नहीं वह नाम क्या ले ? इस संसारमें जितने नाम प्रसिद्ध हैं सब मायाके हैं, कोई भी ईश्वर का नहीं । ईश्वरका नाम सच्चे सन्तोंके अन्तःकरणमें है, वो योग्य और बुद्धिमान् अधिकारीको बतलाते हैं सच्चे सन्तकी सच्चे मनसे सेवा करने पर सन्त और साहबकी कृपा दृष्टि होती है नाम मिलता है । वर्तमानकालमें कोई गुरुको खोजताही नहीं । किसीसे कोई नाम पूछ लिया, अथवा सुन लिया, वही नाम लेकर दिन रात माला फेरा करता है । उसका नाम लेना निरर्थक है, कोई गुरु है न चेला, कोई आज्ञाकारी है न सेवक । मूस तो कलके समान गतिमान किया गया था कि, बनी इसराईलको उपदेश करे । जो विधि निषेध उसके खुदाकी ओरसे मिला वही दूसरोंको समझाता रहा । मूस स्वतन्त्र नहीं था, दूसरोंकी आज्ञासे काम करता था । अपने खुदाकी आज्ञाकारितामें मूसको किसी प्रकार

४० दिनके बाद काफिर, जीवके देखते जीवहत्याका निषेध

की अटक नहीं थी, न किसी प्रकारका सन्देह था। फिर मूसा क्या पूछे कि, "खुदाका नाम बे फायदा लेना किसको कहते हैं? बे फायदा लेना क्या है?" संसारमें जितने नाम हैं उनमें कौनसा नाम निष्फल और कौनसा सफल है? अथवा सबही नाम निष्फल हैं? किसीमें कुछ लाभ भी है? किस स्थान पर निष्फल है कहां पर सफल है? जबतक इसका स्पष्टीकरण न हो, तबतक तो जीव एकदम अंधेरेमें पड़ा रहेगा। यह मैंने कहीं लिखा न देखा कि, यहाँ खुदाका नाम लेना, यहाँ न लेना। ईश्वरकेही नाम लेनेसे आदमी पापोंसे शुद्ध होता है। जब ईश्वरका नामही लेना निष्फल हुआ तो क्या नाम लेकर भजन करेगा? मुक्तिका कौनसा मार्ग रहा? न खुदाहीने कुछ स्पष्टीकरण किया न मूसानेही स्पष्ट बतलाया। फिर तो सबको भटक भटककर मरना पड़ा। अब बे किस राह चलें? क्या करें? किस प्रकार खुदाका नाम लें? जो निष्फल न हो। कौन पथदर्शक गुरु खोजें? जो सत्य-मार्ग बतलावे, जिससे व्यर्थ ईश्वरका नाम न ले? यह तो पूर्ण गुरुके बिना कदापि नहीं जाना जा सकता क्योंकि, पापोंको नष्ट करनेके लिये केवल नामहीका सहारा है, जब वही व्यर्थ होगया तो छुटकारेका सहाराही न रहा। इसी भूलमें सब मूसबी और ईसाई पड़े हैं क्योंकि, हिन्दू और मूसलमान जब कोई काम आरम्भ करते हैं तो अपने अपने ईश्वरका नाम ले लेते हैं। चाहे कोई अपने गुरुका अथवा ईश्वरका, जिसको वह श्रेष्ठ समझता है उसका नाम लेकरही कार्य आरम्भ करता है। किसी न किसी प्रकार उसका ध्यान परमात्माकी ओर होता है, जिससे अन्तःकरणकी शुद्धता होती है। मैंने किसी ईसाई महाशयको किसी कामके आरम्भमें अथवा किसी पुस्तकके आदिमें नाम लेते और लिखते न देखा, न पढ़ने पढ़ानेके समयही ईश्वरका नाम लेते हैं। इसी तृतीय आज्ञाके अनुसार यह सब काम होते हैं। जिस नामको जपकर भवसागर तर जाते हैं उसी नामका यह रङ्ग ढङ्ग हुआ, तो अब क्या सहारा रहा? असहाय हो गये। मैंने किसी ईसाईकी किताबके आदिमें परमात्माका नाम न देखा। यह विचार उन लोगोंका ऐसा दृढ़ हुआ है कि, जितने अंग्रेजी पढ़नेवाले हैं, प्रायः ईश्वरका नाम नहीं लेते। इस कर्तव्यसे लोगोंके अन्तः-करणपर अन्धकार छा गया। भजन भक्तिकी ओर लोग तनिक भी ध्यान नहीं देते, करणपर अन्धकार छा गया। भजन भक्तिकी ओर लोग तनिक भी ध्यान नहीं देते, सब लोभ और तृष्णाकी ओर झुके हुये हैं। मनुष्यकी मुक्तिका सबसे बड़ा कारण जाता रहा। उदारता, शौर्य, न्याय और शील ये मुक्तिके चार साधन हैं। अब वह उदारता कहां है जो पहिले लोग अपनी आवश्यक और प्यारी वस्तुको भी परमात्माके लिये दे देते थे। अब वह शौर्य (वीरता) कहां गई कि, जिससे भजन

और भक्तितमें, परोपकारमें, सत्यमार्गके ग्रहण करनेमें कट जाते, मर जाते थे, तो भी न हटते थे । हां आजकल इतनी बात तो अवश्य है कि, सांसारिक बुरे काम और आसुरी व्यवहारमें बड़ी शूरता प्रगट करते हैं । वह न्याय भी अब नहीं है, क्योंकि, सबसे पहले न्याय यही है कि, परमात्माके ऋणको अदा करें । माता, पिता अपने पराये सबके साथ अपना कर्तव्य पूरा करें । शील (सदाचरण) में भी दोष आगया । लोग हजारों रुपया कमाते हैं, अपना पेट भरते हैं पर दूसरा दुखिया देखता हो तो उसकी सहायता नहीं करते । ईश्वरके नामसे कुछ देनेमें महा कठिनता बीतती है । अतः उदारताके बदले लोभ, लालच और कृपणता देख पड़ती है । शौर्यताके बदले डरपोकपना निज स्वार्थपना और बेइमानी प्रगट हो रही है । न्यायके बदले अन्याय और हठधरम्मी प्रचलित हो रही है । शीलके बदले कठोरता, परनिन्दा, चुगली, चपारी आदि होगये इस प्रकारसे ईश्वरका नाम छोड़तेही लोगों के अन्तःकरणमें आसुरी सम्पत्तिका वास हो गया । जो नामके अभ्यासी पुरुषोंके साथ ये चारों गुण अवश्य होंगे ।

४ सबतका दिन पाक रखो — प्रगट तो यही अर्थ है कि, छः दिन मनुष्य काम करे सातवें दिन कोई काम न करके केवल भजन करे । पर यथार्थमें वह सबतका दिन है । जिस दिन मनुष्यको संसारसे घृणा और वैराग्य आ जावे । सांसारिक । व्यवहार छोड़कर प्रेममें ऐसा भग्न होवे कि, अपने शरीरकी भी सुधि न रहे, निश्चलतासे भजन करे, भजनमें तनिक भी दोषता हो जाने पर सबतका दिन अशुद्ध हो जायगा ।

५ मातापिताकी प्रतिष्ठा करो — प्रगट तो लोग जो अर्थ समझते हैं वही है, पर उसका यथार्थ अर्थ यह समझना चाहिये कि, हमें वह काम करना चाहिये, जिससे माता पिताकी प्रतिष्ठा और सुकृती बढे । ऐसा कर्म केवल एक सत्य परमात्माकी भक्ति है । जिसका पुत्र ज्ञानी भक्त होगा उसके माता पिता प्रतिष्ठाको प्राप्त करेंगे; जैसे धर्मदासजीके पूर्वज, श्वपच सुदर्शन आदिके माता पिता । अपनी संतानकी भजनसे परंधामको पहुच गये । जिस माताने सन्त उत्पन्न न किया उसने कुछ भी नहीं किया । क्या सब मनुष्य सन्तान पुत्र उत्पन्न नहीं करते ? पर जिसने सन्त पुत्र उत्पन्न किया उसनेही पुत्र उत्पन्न किया बाकी सब कुपुत्र हैं । माता पिताको यथार्थ सुख और प्रतिष्ठा देनेवाले केवल सन्तही हैं । इस कारण सबको उचित है कि, अपने माता पिताको प्रतिष्ठा दें । अब यहांपर मैं थोड़ासा इसका विवरण लिखता हूं । जो कबीर साहबने मातृगर्भके विषयमें कहा है । जब बालक मातृगर्भमें रहता है, तब उस दुःख और कष्टमेंसे व्याकुल होकर बहुत विनय