BharatKosha
Back to the archive

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

तृतीय लम्बक ३३७

Page 378Permalink

तृतीय लम्बक ३३७ 'माता ! एक रात मैं यहाँ निवास करना चाहता हूँ'—ऐसा कहकर वह किसी बूढ़ी के मकान में घुसा ॥२५५॥ आश्रय देना स्वीकार करके तुरन्त ही उसका स्वागत करके दुःख-हृदया ब्राह्मणी उसके समीप आकर बोली—बेटा ! यह सारा घर मैंने तुम्हें ही दे दिया तुम इसे ले लो क्योंकि मेरा जीवन अब समाप्त हो रहा है' ॥२५६-२५७॥ 'तुम ऐसा क्यों कर रही हो?'—विदूषक से इस प्रकार पूछी गई वृद्धा फिर बोली—'सुनो मैं तुम्हें सब सुनाती हूँ' ॥२५८॥ बेटा इस नगर में देवसेन नामक राजा है। उसके एक परम सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई, जो भू-तल का भूषण थी ॥२५९॥ राजा ने 'मैंने इसे बड़े ही दुःख से पाया है'—ऐसा सोच अत्यन्त वात्सल्य-स्नेह-युक्त होकर उसका नाम 'दुःखलब्धिका' रखा ॥२६०॥ कुछ समय व्यतीत होने पर, यौवन को प्राप्त उस कन्या को अपने घर पर आये हुए कच्छप-देश के राजा के लिए दे दिया ॥२६१॥ वह कच्छपराज उसके साथ वास-घर में प्रवेश करते ही तत्क्षण मर गया ॥२६२॥ इस घटना से दुःखी होकर देवसेन ने वह कन्या दूसरे राजा को दी किन्तु वह भी इसी प्रकार मर गया ॥२६३॥ जब इस भय के कारण अन्य किसी राजा ने उस कन्या का वरण स्वीकार नहीं किया तब राजा ने अपने सेनापति को आज्ञा दी कि तुम इसी नगर से प्रतिदिन एक-एक ब्राह्मण या क्षत्रिय पुरुष को लाकर इस कन्या के शयनागार में भेजो। देखते हैं कि कबतक कितने मरते हैं। जो इसमें सफल हो जायगा नहीं मरेगा वही इसका पति होगा। आश्चर्यकारी दैव की गति-विधि जानी नहीं जा सकती ॥२६४-२६७॥ इस प्रकार राजा की आज्ञा से सेनापति प्रतिदिन पारी के क्रम से एक-एक सुन्दर पुरुष को लाता रहा ॥२६८॥ इस प्रकार क्रमशः एक सौ व्यक्ति मारे गये मुझ अभागिन का भी एक ही पुत्र है ॥२६९॥ ४३

३३८ कथासरित्सागरे

Page 379Permalink

३३८ कथासरित्सागरे

तस्य वारोऽद्य सम्प्राप्तस्तत्र गन्तु विपत्तय। तदभावे मया कार्य प्रातरग्निप्रवेशनम् ॥२७०॥ तज्जीवन्ती स्वहस्तेन तुभ्यं गुणवते गृहम्। ददामि सर्वं यन स्यां न पुनर्दुःखभागिनी ॥२७१॥ एवमुक्तवतीं धीरस्तामवोचद् विदूषकः । यद्यवमम्व तर्हि त्व मास्म विह्वलतां कृथा ॥२७२॥ अह सत्राय गच्छामि जीवत्वेकसुतस्तव । किमेत घातमामीति कृपा ते मयि मा च भूत् ॥२७३॥ सिद्धियोगाद्धि नास्त्येव भय सत्र गतस्य मे। एव विदूषकेणोक्ता ब्राह्मणी सा जगाद तम् ॥२७४॥ तर्हि पुण्यंममायातः कोऽपि देवो भवानिह। तत्त्राणान्देहिन् पुत्र ! कुशलं च तथारमनि ॥२७५॥ एव तया सोऽनुमत साय राजसुतागृहम्। सेनापतिनियुक्तेन किङ्करेण सम ययौ ॥२७६॥ तत्रापश्यन्नृपसुतां तां यौवनमवोद्धताम् । मत्तामनुच्चितस्फीतपुण्यमारानतामिव ॥२७७॥ ततो निशार्था शयने राजपुत्र्या तयाधिते । ध्यातोपनतमाग्नय खड्ग बिभ्रत्करेण सः ॥२७८॥ वासवेदमनि तत्रामीज्जाग्रदेव विद्रूपकः । पश्यामि तावत्को हन्ति नरानत्रेति धिस्तमन् ॥२७९॥ प्रसुप्ते च जने क्षिप्रावपावृतकपाटकम्। स द्वारदशादायान्तं घोरं राक्षसमद्रात् ॥२८०॥ स च द्वारिस्थितस्तत्र राक्षसो वासवान्तर । भुजं नरनताकाण्डयमदण्ड म्यवदायन् ॥२८१॥ विदूषकश्च चिच्छेद् धावित्वा सस्य तं क्रुधा। एक खड्गप्रहारेण बाहु सपदि रक्षसः ॥२८२॥ छिन्नबाहु पलाय्याशु जगाम स निशाचरः । भूयोऽनागमनायैव तन्मत्त्वोत्कर्षभीतिनः ॥२८३॥ प्रबुद्ध्वा वीक्ष्य पतिनं रक्तोद्वाहं नृपात्मजा। भीता च जातहर्षा च विस्मिता च बभूव सा ॥२८४॥

तृतीय लम्बक १३९

Page 380Permalink

तृतीय लम्बक १३९ उसकी पारी आज है। आज वह मरने के लिए जायगा। इसके मर जाने पर मैं प्रात काल आग में प्रवेश करके जल मरूँगी॥२७०॥ इसलिए जीवित अवस्था में तुम्हारे ऐसे गुणवान्‌ को आज भर दान देती हूँ जिससे फिर इस प्रकार का कष्ट न भोगना पड़े। ऐसा कहती हुई वृद्धा से धीरे-धीरे विदूषक बोला—अम्मा ! तुम घबराना मत। आज पारी में मैं जाऊँगा तुम्हारा एकलौता बेटा जीवित रहे। इसे क्यों मरवाऊँ—इस प्रकार तुम मुझपर दया भी न करना मेरे पास ऐसे सिद्धियोग हैं जिससे मुझे वहाँ जाकर मरने का भय नहीं है। ब्राह्मण के ऐसा कहने पर बूढ़ी बोली—॥२७१-२७४॥ मालूम होता है कि मेरे पुण्य-प्रभाव से तुम किसी देवता के रूप में आये हो इसलिए मेरे पुत्र को प्राण-दान करो और अपना भी कल्याण करो ॥२७५॥ इस प्रकार वृद्धा की सम्मति प्राप्त करके वह विदूषक सायंकाल सेनापति से नियुक्त किये गये दूत के साथ राजकन्या के यहाँ गया॥२७६॥ वहाँ जाकर उसने यौवन के मद में मदमाती और फूलों के न तोड़ने के कारण भार से झुकी हुई लता के समान राजकन्या को देखा॥२७७॥ तब रात्रि में राजकन्या के सो जाने पर पलंग पर ध्यान से प्राप्त अपनी तलवार को लिये हुए विदूषक जाग रहा था और यह सोच रहा था कि देखता हूँ यहाँ कौन है, जो मनुष्यों को मार देता है॥२७८-२७९॥ सब लोगों के सो जाने पर उसने किवाड़ों को खोलकर दरवाजे से घुसते हुए भीषण राक्षस को देखा ॥२८०॥ उसने द्वार पर खड़े-खड़े ही सैकड़ों पुरुषों के लिए यम-दण्ड के समान भीषण भुजा को घर के अन्दर डाला ॥२८१॥ विदूषक ने दौड़कर क्रोध से उसकी भुजा को एक ही खड्ग-प्रहार से काट डाला॥२८२॥ कटे हुए हाथवाला वह राक्षस मानों उसके उत्कृष्ट बल से डरकर फिर न आने के लिए शीघ्रता से भाग गया ॥२८३॥ राजकन्या ने जागकर उस कटकर गिरे हुए राक्षस के हाथ को देखा और उसे देखकर बड़ी प्रसन्न हुई तथा अचरज से चकित-सी रह गई॥२८४॥

Page 381Permalink

प्रातश्च ददृशे राज्ञा देवसेनेन तत्र सः। स्वसुतान्तःपुरद्वारि स्थितश्छिन्नच्युतो भुजः ॥२८५॥ इतः प्रभृति नेहायं प्रवेष्टव्यो नरैरिति। दत्तो विदूषकेणैव सुवीर्यं परिमार्गकः ॥२८६॥ ततो दिव्यप्रभावाय तस्मै प्रीतः स पार्थिवः। विदूषकाय तनयां तां ददौ विभवोत्तरम् ॥२८७॥ ततस्तया समं तत्र कान्तया स विदूषकः। तस्थौ दिनानि कतिचिद्रूपवत्येव सम्मदः ॥२८८॥ एकस्मिंश्च दिने सुप्तां राजपुत्रीं विहाय ताम्। स ततः प्रययौ रात्रौ तां भद्रां प्रति सत्वरः ॥२८९॥ राजपुत्री च सा प्रातस्तदवेक्षणदुःखिता। आसीदाश्वासिता पित्रा तत्प्रत्यावर्तनाशया ॥२९०॥ सोऽपि गच्छन्नहर्गच्छं क्रमात् प्राप विदूषकः। पूर्वाम्बुधेस्तटस्थां नगरीं ताम्रलिप्तिकाम् ॥२९१॥ तत्र चक्रे स केनापि वणिजा सह सङ्गतिम्। स्कन्ददासाभिधानेन पारमभ्ययियासता ॥२९२॥ तेनैव सह सोऽनल्पतदीयधनसम्भृतम्। यानपात्रं समारुह्य प्रतस्थेऽम्बुधिमर्थिना ॥२९३॥ ततः समुद्रमध्यं तद्यानपात्रमुपागतम्। अकस्मादभवद्रुद्धं व्यासक्तमिव केनचित् ॥२९४॥ उच्छ्रितेऽनिलवेगेन प्रयत्नैर्वा न विचचाल तत्। तदा स वणिगार्त्तः सन् स्कन्ददासोऽब्रवीदिदम् ॥२९५॥ यो मोक्षयति ससद्यमिव प्रवहणं मम। तस्मै निजधनार्धं च स्वसुतां च ददाम्यहम् ॥२९६॥ तच्छ्रुत्वैव जगादेदं धीरचेता विदूषकः। अहमत्रावतीर्यान्तर्विचिनोम्यम्बुधज्जलम् ॥२९७॥ क्षणाच्च मोक्षयाम्येतदद्य प्रवहणं तव। यूयं गाढमवलम्बध्वं बद्ध्वा मां पादरज्जुभिः ॥२९८॥ विमुक्ते च प्रवहणे तत्क्षणं वारिमध्यतः। उद्धर्त्तव्योऽस्मि युष्माभिरवलम्बन-रज्जुभिः ॥२९९॥

तृतीय लम्बक | १४१

Page 382Permalink

तृतीय लम्बक | १४१

प्रातःकाल राजा ने कन्या के शयनागार के द्वार पर पड़े हुए और कटकर गिरे हुए हाथ को देखा ॥२८५॥ राजा ने समझा कि विदूषक ने भय से लेकर यहाँ दूसरों का प्रवेश न हो, ऐसा सोचकर द्वार पर परिघ (अर्गल) के समान भुजा की अर्गला लगा दी है ॥२८६॥ तब अत्यन्त प्रसन्न राजा ने दिव्य प्रभावशाली विदूषक को धन के साथ कन्या प्रदान की। वह विदूषक भी मूर्तिमती सम्पत्ति के समान उस सुन्दरी राजकन्या के साथ कुछ दिनों तक रहा ॥२८७-२८८॥ एक बार मङ्गा से मिलने की शीघ्रता के कारण विदूषक रात में उठकर चल पड़ा ॥२८९॥ दूसरे दिन प्रातःकाल राजकुमारी उसे न देखकर अत्यन्त दुःखी हुई, किन्तु राजा ने उसके पुनः लौटने की आशा दिखाकर उसे धीरज बँधाया ॥२९०॥ वह विदूषक भी दिनरात चलते-चलते पूर्व समुद्र के समीप ताम्रलिप्ति नामक नगरी में पहुँचा ॥२९१॥ उसने वहाँ पर समुद्र-पार जाने की इच्छा रखनेवाले स्कन्ददास नामक व्यापारी वैश्य से मित्रता की ॥२९२॥ और अत्यधिक धन से भरे हुए उसके जहाज पर चढ़कर विदूषक ने समुद्र-मार्ग से यात्रा की ॥२९३॥ क्रमशः जहाज समुद्र के बीच पहुँच गया और किसी वस्तु से फँसकर वहीं अड़ गया ॥२९४॥ नाना से समुद्र की पूजा करने पर भी जब जहाज हिला नहीं, तब अत्यन्त दीनता से बनिये ने कहा कि 'मेरे इस फँसे हुए जहाज का जो छुड़ा देगा, उसे मैं अपनी संपत्ति का आधा हिस्सा और अपनी कन्या दे दूंगा' ॥२९५॥ यह सुनकर धैर्यशाली विदूषक ने कहा कि 'मैं पानी में उतरकर ज्ञात करता हूँ और तुरन्त इस फँसे जहाज को छुड़ाता हूँ' ॥२९६॥ 'तुम लोग मुझे सन और रस्सियों से कसकर बाँधो और ऊपर से पकड़े रहो ॥२९७॥ जब जहाज छूटकर चलने लगे तब तुमलोग उन रस्सियों द्वारा मुझे ऊपर खींच लेना' ॥२९८॥

१४९ कथासरित्सागर

Page 383Permalink

१४९ कथासरित्सागर तथेति तेन वणिजा तद्वचस्त्वभिनन्दित । बबन्धुः कर्णधारास्तं रज्जुबन्धेन कटयो ॥३०॥ तद्बढोऽवततारैव वारिधौ स विदूषकः । न जात्ववसरे प्राप्ते सत्त्ववानवसीदति ॥३१॥ ध्यातोपस्थितमार्गेण खड्गं कृत्वा च तं करे। वीरः प्रवहणस्याधो मध्यवारि विवेश सः ॥३२॥ तत्र चक्रे महाकायं सुप्तं पुरुषमैक्षत। जङ्घायां तस्य बद्धं च यानपात्रं व्यलोकयत् ॥३०३॥ बिच्छेद तां स जङ्घां च तस्य खड्गेन तत्क्षणम्। पचाल स प्रवहणं रोधमुक्तं तदैव तत् ॥३०४॥ तद्दृष्ट्वैव वणिक्पापश्छेदयामास तस्य तत्। विदूषकस्य रज्जूस्तां प्रक्षिप्तार्थस्तलोभतः ॥३०५॥ द्रुतमेव च मुक्तेन द्रुतं प्रवहणेन सः। स्वलोभस्येव महत्पारमम्बुनिधेर्ययौ ॥३६॥ विदूषकोऽपि स च्छिन्नरज्ज्वालम्बोऽम्बुमध्यगः। उन्मज्ज्य तत्तथा दृष्ट्वा धीरः क्षणमचिन्तयत् ॥३०७॥ किमिदं वणिजा तेन कृतं किमबबोध्यते। कृतघ्ना धनलोभान्धा मोपकारेष्वमक्षमाः ॥३८॥ तदेष कालः सुतरामधैकस्यास्य साम्प्रतम्। नहि सत्त्वावसादेन स्वाल्पाप्यापद् विलङ्घ्यते ॥३९॥ इति सञ्चिन्त्य तत्कालं जङ्घां तामारुरोह सः। या सान्तर्जलसुप्तस्य पुरुषस्य न्यकृन्तत ॥३१०॥ तया ततार नावव हस्तन्यस्ताम्बुरम्बुधिम्। दैवमेव हि साहाय्यं कुरुते सत्त्वशालिनाम् ॥३११॥ तं मारुतिमिवाम्भोधिपारं रामा१र्थमागतम्। ससत्त्वमुवाचवमन्तरिक्षात्सरस्वती ॥३१२॥ १ रामार्थ इत्यत्र क्लिष्टम्; मारुतिपक्षे रामस्यार्थः, विदूषक पक्षे च रामा = स्त्री, तस्यानिमित्ति ज्ञेयम् ।

तृतीय लम्बक १४१

Page 384Permalink

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (transcription) दिया गया है:

तृतीय लम्बक १४१ उस वैश्य के स्वीकार करने पर जहाज के स्वामियों ने इसे रस्सियों से दोनों ओर से कसकर बाँध दिया ॥१३१॥ इस प्रकार बँधा हुआ विदूषक समुद्र में उतर पड़ा। धीर पुरुष मौका आने पर कभी हिम्मत नहीं हारते ॥१३२॥ ध्यान करते ही उपस्थित होने वाले खड्ग को हाथ में लिये हुए विदूषक जहाज के नीचे पानी में गोता लगाकर गया ॥१३३॥ वहाँ उसने एक विशालकाय सोये हुए पुरुष को देखा जिसकी जाँघों में फँसकर जहाज रुक गया था ॥१३४॥ विदूषक ने तलवार से उसकी विशाल जंघा काट डाली और रुकावट हटने से जहाज चल पड़ा ॥१३५॥ यह देखकर उस दुष्ट (बेईमान) बनिये ने पोतित धन के लोभ से उसके शरीर से बँधी रस्सियों को काट डाला और वह वैश्य अपचरित्र के समान छूटे हुए जहाज से महान् लोभ के समान समुद्र के पार पहुँच गया ॥१३६॥ रस्सियों के कट जाने से समुद्र के बीच निराधार तैरता हुआ धीर विदूषक मन में निस्तब्ध सोचने लगा कि इस पापी बनिये ने यह क्या किया। अथवा क्या कहा जाय ? धन के लोभ में अन्धे मनुष्य उपकार को देखने या समझने में समर्थ नहीं होते ॥१३७॥ दुर्गा ! अब यह समय पछताने का नहीं है तैरने का ताँता देने पर छोटी-सी विपत्ति भी दूर नहीं की जा सकती यह तो भीषण विपत्ति है ॥१३८॥ ऐसा सोचकर वह उस जलेचर का बेड़ा जो उसने अन्दर सोए हुए पुरुष की काट दी थी ॥१३९॥ दोनों हाथों से कटे का भाग लेकर उसी जाँघ के सहारे विदूषक ने समुद्र को पार कर लिया। सच है साहसी का दैव भी सहायता देता है ॥१४०॥ रात के समय समुद्र के पार आए हुए हत्थाण्ड के समान उस धीर विदूषक का अन्धकार वाणी ने कहा—॥१४१॥

४४ कथासरित्सागर

Page 385Permalink

४४ कथासरित्सागर साधु साधु सुसत्त्वोऽस्ति कोऽन्यस्त्वत्तो विदूषक । अनेन तव धैर्येण तुष्टोऽस्मि तदिदं शृणु ॥३१३॥ प्राप्तोऽसि मग्नविषयममं सम्प्रत्यतोऽपि च। कार्कोटकाख्यं नगरं दिने प्राप्स्यसि सप्तमे ॥३१४॥ ततो लब्धधृतिर्गत्वा शीघ्रं प्राप्स्यसि चेप्सितम्। अहं चाराधितः पूर्वं भवता हव्यकव्यभुक् ॥३१५॥ मद्दत्ताश्च तवेदानीं क्षुत्तृष्णा न च वर्त्स्यति। सद्गच्छ सिद्धये विस्रब्धमित्युक्त्वा विरराम वाक् ॥३१६॥ विदूषकश्च सन्तुष्ट्वा प्रणम्याग्निं प्रहर्षितः। प्रतस्थे सप्तमे चाह्नि प्राप कार्कोटकं पुरम् ॥३१७॥ तत्र च प्रविवेशाथ मठमार्यैरधिष्ठितम्। नानादेशोद्भवस्तस्तैर्द्विजरम्यातिथिप्रिय ॥३१८॥ श्रीमन्ता निर्मितं राज्ञा तत्रत्यानार्यवर्मणा। ऋद्धं समग्रसौवर्णगृहदण्डकुलान्वितम् ॥३१९॥ तत्र सर्वैः कृतातिथ्यमकस्तं ब्राह्मणोऽतिथिम्। स्नानेन भोजनैर्वस्त्रैर्नीत्वा गृहमूपाचरत् ॥३२०॥ सायं च तमठस्थः सन् पुरे शुश्राव तत्र सः। विदूषकः सपट्टहं घोष्यमाणमिदं वचः ॥३२१॥ 'ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि परिणेतुं नृपात्मजाम्। प्रातरिच्छति यः सोऽद्य रात्रौ वसतु सद्गृहे ॥३२२॥ तच्छ्रुत्वा सनिमित्तं स तदाशङ्क्य च तत्क्षणम्। गन्तुं राजसुतावासमियाय प्रियसाहसः ॥३२३॥ ऊचुस्तं मठविप्रास्ते ब्रह्मन् मा साहसं कृथाः। सन्नं राजसुतासद्म तन्मृत्योर्विद्वन् मुखम् ॥३२४॥ यो हि तत्र प्रविशति क्षपायां न स जीवति। गता सुबहुवश्चैवमत्र साहसिकाः क्षयम् ॥३२५॥ इत्युक्तोऽपि स तैर्विप्रैरनङ्गीकृत तद्वचाः। विदूषको राजगृहं ययौ तत्किङ्करैः सह ॥३२६॥ तमार्यवर्मणा राज्ञा स्वयं दृष्ट्वाभिनन्दितः। विवेश तरसुतावासं नक्तमर्कं इवाभ्रकम् ॥३२७॥

तृतीय लम्बक १४५

Page 386Permalink

तृतीय लम्बक १४५ हे विदूषक ! बहुत अच्छा तुम सच्चे वीर पुरुष हो । तुम्हारे जैसा और दूसरा कौन है। तुम्हारे इस धैर्य से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अब तुम सुनो ॥३१३॥ 'इस समय तुम नग्नदेश में आये हो यहाँ से सात दिनों में कर्कोटक नगर में पहुँचोगे । वहाँ पहुँचकर तुम्हें धैर्य प्राप्त होगा तब अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करोगे। तुमने हव्य-कव्य खाने वाले मेरी पहले आराधना की थी ॥३१४ ३१५॥ अब मेरे ही वरदान से तुम्हें भूख-प्यास नही सतावेगी। तुम अपनी कार्य-सिद्धि के लिए जाओ'—ऐसा कहकर आकाशवाणी बन्द हो गई ॥३१६॥ विदूषक इस आकाशवाणी को सुनकर हर्षित हुआ और अग्नि को प्रणाम करके चला एवं सातवें दिन कर्कोटक नगर में पहुँच गया ॥३१७॥ वहाँ पहुँचकर वह एक मठ में रुका जिसमें श्रेष्ठ अन्न तथा अतिथियों से स्नेह रखने वाले भिन्न-भिन्न देशों के निवासी ब्राह्मण निवास करते थे ॥३१८॥ वह मठ वहाँ के राजा आर्यवर्मा ने बनवाया था और बहुत समृद्ध था ॥३१९॥ उसमें सुवर्ण की सुन्दर देव प्रतिमा थी। मठ के निवासिया ने विदूषक का स्वागत किया। एक ब्राह्मण उस अतिथि (विदूषक) को घर ले गया और घर ले जाकर स्नान भोजन और वस्त्रों से उसकी सेवा की ॥३२०॥ सायंकाल उस मठ में जाकर ठहरे हुए उसने नगाड़े के साथ की जाती हुई यह घोषणा सुनी ॥३२१॥ कि जो कोई भी ब्राह्मण या क्षत्रिय राजकुमारी को ब्याहने के लिए चाहता हो वह आज रात को राजकुमारी के घर में निवास करे ॥३२२॥ यह सुनकर साहसी विदूषक को इस घोषणा में किसी कारण की आशंका न करके रात में वहाँ जाने के लिए तैयार हो गया ॥३२३॥ उसे उद्यत देखकर मठ-निवासी ब्राह्मण ने उसे कहा—हे ब्राह्मण ! ऐसा साहस न करना। वह राजकुमारी का भवन नही वह मृत्यु का खुला हुआ मुँह है। उसमे रात को जो प्रवेश करता है वह जीवित नही रहता अनेक साहसी व्यक्ति गये और मर गए ॥३२४ ३२५॥ उन मठवासी ब्राह्मणों के बहुत मना करने पर भी उनकी बात को अस्वीकार करके विदूषक राजसेवकों के साथ वहाँ गया ॥३२६॥ वहाँ पर राजा आर्यवर्मा ने उसे देखकर अभिनन्दन (स्वागत) किया और रात को वह राजकन्या के शयनागार में इस प्रकार घुसा जैसे रात्रि का रात्रि में सूर्य प्रवेश करता है ॥३२७॥ ४४

१४५ कथासरित्सागर

Page 387Permalink

१४५ कथासरित्सागर ददर्श राजकन्यां च साक्षात्कृत्यानुरागिणीम् । नराक्ष्यदुःखबिधुरं पश्यन्तीं सालसां दृशा ॥१२८॥ आसीच्च जागद्देवान्न स रात्राववलोकयन् । करे कृपाणमाग्नेयं चिन्तितोपनतं दधत् ॥१२९॥ अकस्माच्च महाघोरं ददर्श द्वारि राक्षसम् । छिन्नदक्षिणबाहुत्वात् प्रसारितभुजान्तरम् ॥१३०॥ दृष्ट्वा व्यचिन्तयंश्चासो हन्त सोऽयं निशाचरः । यस्य बाहुर्मया छिन्नो नगरे पौण्ड्रवर्धने ॥१३१॥ तदद्य न पुनर्बाहौ प्रहरिष्याम्यसो हि मे । पलाय्य पूर्ववद्गच्छेत्तस्मात्साधु निहन्म्यमुम् ॥१३२॥ इत्यालोच्य प्रधाव्यैव कचेष्वाकृष्य तस्य सः । राक्षसस्य शिरश्छेत्तुं समारेभे विदूषकः ॥१३३॥ तत्क्षणं भीतभीतश्च समुवाच स राक्षसः । मा मां वधीः सुसत्त्वस्त्वं तत्कुरुष्व कृपामिति ॥१३४॥ किं नामा त्वं च केयं च तव चेष्टेति तेन सः । मुक्त्वा पृष्टश्च वीरेण पुनराह स राक्षसः ॥१३५॥ यमदंष्ट्राभिधानस्य ममाभूतां सुते इमे । इयमेका तथान्या च पौण्ड्रवर्धनवासिनी ॥१३६॥ अधीरपुरुषासक्तारक्षणीय नृपात्मजे । शङ्कराज्ञा प्रसादो हि ममाभूदयमीदृशः ॥१३७॥ तत्राद्यो बाहुरेकेन छिन्नो मे पौण्ड्रवर्धने । त्वया चाद्य जितोस्मीह तत्समाप्तमिदं मम ॥१३८॥ तच्छ्रुत्वा स विहस्यैनं प्रत्युवाच विदूषकः । ममैव स भुजस्तत्र लूनस्ते पौण्ड्रवर्धने ॥१३९॥ राक्षसोऽप्यवदत्तर्हि देशांशस्त्वं न मानुषः । मन्ये त्वदर्थमेवाभूच्छर्वस्यानुग्रहः स मे ॥१४०॥ तदिदानीं सुहृन्मे त्वं यदा मां च स्मरिष्यसि । तदाहं सन्निधास्ये ते सिद्धये सङ्कटेष्वपि ॥१४१॥ एवं स राक्षसो मैत्र्या वरयित्वा विदूषकम् । तेनाभिनन्दितवचा यमदंष्ट्रस्तिरोदधे ॥१४२॥

तृतीय लम्बक १४७

Page 388Permalink

तृतीय लम्बक १४७ उसने वहाँ जाकर आकार से प्रेममयी और निराशा के दुख से व्याकुल एवं आँसू भरे नेत्रों से निहारती हुई राजकन्या को देखा॥१२८॥ विदूषक वहाँ सतर्क होकर स्मरणमात्र से उपस्थित होनेवाले अग्नि देवता के खड्ग को हाथ में लिये हुए रात-भर जागता रहा। सहसा उसने शयनागार के द्वार पर एक अत्यन्त भीषण राक्षस को देखा जो दाहिना हाथ कट जाने से छाती को फैलाये हुए था॥१२९ ३० ॥ उसे देखकर विदूषक ने सोचा कि आह! यह तो वही राक्षस है जिसका हाथ मैंने पौण्ड्रवर्धन नगर में काटा था॥१३१॥ तो आज इसका हाथ नहीं काटता नहीं तो यह पहले की तरह भागकर कहीं चला जायगा। अतः इसे भली भाँति मार डालता हूँ॥१३२॥ ऐसा सोचकर और दौड़कर उसने उसके बालों को पकड़ा और वध करने के लिए तलवार उठाई॥१३३॥ तब वह डरा हुआ राक्षस बोला—'तुम मुझे मत मारो तुम साहसी वीर पुरुष हो। मुझ पर दया करो'॥१३४॥ 'तुम कौन हो ? और तुम्हारा यह क्या कार्य है ? इस प्रकार वीर विदूषक के पूछने पर वह राक्षस फिर बोला॥१३५॥ 'मैं मयवेष्ट नामक राक्षस हूँ। मेरी दो कन्याएँ हैं, एक तो यह और दूसरी पौण्ड्रवर्धन राजा की॥१३६॥ 'इन दोनों कन्याओं की कायर पुरुषों के संसर्ग से रक्षा करना'—इस प्रकार भगवान् शिव की आज्ञा हुई। इसमें एक वीर ने पहले पौण्ड्रवर्धन में मेरी भुजा काटी और आज तुमने मुझे जीत लिया। अब मेरा यह कार्य समाप्त हुआ' ॥१३७-१३९॥ राक्षस ने और कहा कि 'तुम पुरुष नहीं देवता का अंश हो। समझता हूँ तुम्हारे लिए ही शिवजी की आज्ञा की कृपा हुई थी॥१४०॥ अब तुम मेरे मित्र हो गये। तुम जब कभी संकट में स्मरण करोगे तब मैं तुम्हारी सफलता के लिए उपस्थित रहूँगा' ॥१४१॥ इस प्रकार विदूषक को मित्रता से वरण करके और उसकी स्वीकृति प्राप्त करके राक्षस मयवेष्ट अन्तर्धान हो गया॥१४२॥

Page 389Permalink

विदूषकोऽपि सानन्दमभिनन्दितविक्रमः। राजपुत्र्या तया सत्र हृष्टस्तामनयन्निशाम् ॥३४३॥ प्रातश्च ज्ञातवृत्तान्तस्तुष्टस्तस्मै ददौ नृपः। विभवैः सह शौर्यैकपताकामिव तां सुताम् ॥३४४॥ स तया सह तत्रासीद्रात्रीः काश्चिद् विदूषकः। पवात्पदमिवोच्छन्त्या लक्ष्म्येव गुणवत्तया ॥३४५॥ एकदा च निशि स्वरं ततः प्रायात्प्रियोत्सुकः। लब्धदिव्यरसास्वादः को हि रज्येदसान्तरे ॥३४६॥ नगराच्च विनिर्गत्य स च सस्मार राक्षसम्। स्मृतमात्रमागतं तं च जगाद रचितानतिम् ॥३४७॥ सिद्धक्षेत्रे प्रयातव्यमुदयाद्रौ मया सखे। मद्राविद्याधरीहेतोस्तत्त्वं सत्र मां नय ॥३४८॥ तथेत्युक्तवतस्तस्य स्कन्धमारुह्य रक्षसः। ययौ च स तया गत्या दुर्गां षष्टियोजनीम् ॥३४९॥ प्रातश्च तीर्त्वा शीतोदामलङ्घ्यां मानुषैर्नदीम्। उदयाद्रेश्र्च प्रापसन्निकर्षमयत्नतः ॥३५०॥ अय स पर्वत श्रीमानुदयाख्यः पुरस्तव। अत्रोपरि च नास्त्येव सिद्धिधाम्नि गतिर्मम ॥३५१॥ इत्युक्त्वा राक्षसे तस्मिन्प्राप्तानुज्ञे तिरोहिते। दीर्घिकां स ददर्शैकां रम्यां सत्र विदूषकः ॥३५२॥ वदन्त्या स्वागतमिव भ्रमद्भ्रमरगुञ्जितैः। तस्यास्तीरे न्यषीदच्च फुल्लपद्माननश्रियः ॥३५३॥ स्त्रीणामिवात्र चापल्पत्त्वचपंक्तिः सुविस्तरात्। अद्य प्रियागमे मार्गस्त्वेतेसि ब्रुवतीमिव ॥३५४॥ अरूढव्योऽय गिरिमैरयस्तद्विह्व वर क्षणम्। स्थितो भवामि पश्यामि कस्यय पदपद्धतिः ॥३५५॥ इति चिन्तयतस्तस्य तत्र तोयार्थमाययुः। गृहीतकाञ्चनघटा भव्या सुयहवः स्त्रियः ॥३५६॥ वारिपूरितकुम्भाश्च ताः स पप्रच्छ योषितः। कस्येदं नीयते तोयमिति प्रणयपेशलम् ॥३५७॥

तृतीय लम्बक ३४९

Page 390Permalink

तृतीय लम्बक ३४९ राजकुमारी से साहस और वीरता के लिए प्रशंसित प्रछन्नचित्त विदूषक ने वहीं रात बिताई ॥५४३॥ प्रातःकाल राजा ने सब वृत्तान्त जानकर विदूषक के शौर्य की अद्वितीय पताका के समान उस राजपुत्री को पर्याप्त दहेज (धन) के साथ उसके लिए दे दिया ॥५४४॥ विदूषक ने उसके गुणों से बँधी हुई अतएव उसका साथ न छोड़ती हुई लक्ष्मी के समान उन कुछ रात्रियों को राजकुमारी के साथ व्यतीत किया ॥५४५॥ एक दिन भद्रा के प्रति उत्सुक विदूषक रात में चुपचाप चल दिया। सच है, दिव्य रस का आस्वाद प्राप्त कर लेने पर कौन दूसरे रसों की चाह करता है? ॥५४६॥ नगर से बाहर निकलकर विदूषक ने राक्षस का स्मरण किया। स्मरण करते ही उपस्थित और नमस्कार करते हुए राक्षस को विदूषक ने कहा ॥५४७॥ 'मित्र ! मुझे उदय पर्वत पर सिद्धक्षेत्र में भद्रा नाम की विद्याधरी के लिए जाना है, इस लिए तुम मुझे वहाँ ले चलो' ॥५४८॥ 'ठीक है, चलो ऐसा कहते हुए राक्षस के कन्धे पर चढ़कर वह विदूषक रातो-रात दुर्गम और साठ योजन लम्बी शीतोदा नदी के किनारे पहुँचा। प्रातःकाल मनुष्यों के लिए अगम्य शीतोदा नामक नदी को पार करके, बिना परिश्रम ही उदयाचल के समीप जा पहुँचा ॥५४९-५०॥ उदय पर्वत के समीप पहुँच कर राक्षस ने कहा— श्रीमान् ! यह तुम्हारे सामने उदय पर्वत है। सिद्धों के निवास-स्थान इस पर्वत पर मेरी गति नहीं है ॥५५१॥ ऐसा कहकर और विदूषक की आज्ञा पाकर राक्षस के अन्तर्धान होने पर विदूषक ने वहाँ एक सुन्दर बावली देखी ॥५५२॥ खिले हुए कमलों से मुख-शोभा को धारण करती हुई वह बावली गुँजारते हुए भौरों के शब्दों से मानो उसका स्वागत कर रही थी ॥५५३॥ उस बावली के तट पर उसने स्त्रियों के पैरों की पंक्तियाँ देखीं जो मानों उसे यह कह रही थीं कि तुम्हारी प्रियतमा के मिलने का मार्ग यही है ॥५५४॥ विदूषक ने सोचा कि यह पर्वत मनुष्यों के लिए अलङ्घनीय है। अतः यहीं बैठकर देखता हूँ कि यह पैरों की पंक्तियाँ किस की हैं? ॥५५५॥ वह ऐसा सोच ही रहा था कि बहुत-सी सुन्दरियाँ सोने के घड़े लिये हुए जल भरने के लिए बावली पर आई ॥५५६॥ पानी से घड़े भर लेने के अनन्तर विदूषक ने उन सुन्दरियों से स्नेह-गरम शब्दों में पूछा कि यह जल किसके लिए ले जा रही हो ॥५५७॥

३५ कथासरित्सागर

Page 391Permalink

३५ कथासरित्सागर आस्ते विद्याधरी भद्रा भद्रानामात्र पर्वते। इदं स्नानोदकं तस्या इति ताश्च तमब्रुवन् ॥३५८॥ चित्रं धातेव धीराणामारब्धोद्दामकर्मणाम्। परितुष्यन् सामग्रीं घटयत्युपयोगिनीम् ॥३५९॥ यथैका साहसं स्त्री तासां मध्यादुवाच तम्। महाभाग ! मम स्कन्धे कुम्भ उत्क्षिप्यतामिति ॥३६०॥ तथेति च घटे तस्याः स्कन्धोत्क्षिप्ते स बुद्धिमान्। निदधे भद्रया पूर्वं दत्तं रत्नाङ्गुलीयकम् ॥३६१॥ उपाविशच्च तत्रैव स पुनर्वीथिकातले। ताश्च तज्जसमादाय ययुर्भद्रागृहं स्त्रियः ॥३६२॥ यत्र ताभिश्च भद्रायास्तावत्स्नानाम्बु दीयते। तावत्तस्यास्तदुत्सङ्गे निपपाताङ्गुलीयकम् ॥३६३॥ तद्दृष्ट्वा प्रत्यभिज्ञाय भद्रा पप्रच्छ ताः सखीः। दृष्टः किं कोऽपि युष्माभिरिहापूर्वो पुमानिति ॥३६४॥ दृष्ट एको ऽस्माभिर्मानुषो वापिकातटे। तेनोत्क्षिप्तो घटश्चायमिति प्रत्यब्रुवंश्च ताः ॥३६५॥ ततो भद्रा अब्रवीच्छीघ्रं प्रक्लृप्तस्नानमण्डनम्। इहानयत गत्वा तं स हि मर्त्यः समागतः ॥३६६॥ इत्युक्ते भद्रया गत्वा यथावस्तु निवेद्य च। स्नातश्च सद्यस्त्याभिस्तत्रानिन्ये विदूषकः ॥३६७॥ प्रातश्च स ददर्शात्र भद्रां मार्गोन्मुखीं चिरात्। निजसत्त्वतरोः साक्षात् पक्वामिव फलश्रियम् ॥३६८॥ सापि दृष्ट्वा तमुत्थाय हर्षबाष्पाम्बुसीकरैः। दत्तार्घेव बबन्धास्य कण्ठे भुजलतास्रजम् ॥३६९॥ परस्परालिङ्गितयोस्तयोः स्वेदच्छलादिव। अतिपीडनतः स्नेहः सस्यन्दे चिरसम्भृतः ॥३७०॥ अथोपविष्टयोरन्योन्यमक्ष्णोस्तृप्तौ विलोकने। उभौ शतगुणीभूतामिवोत्कण्ठामुदूहतुः ॥३७१॥ आगतोऽसि कथं भूमिमिमामिति च भद्रया। परिपृष्टः स तत्कालमुवाचेदं विदूषकः ॥३७२॥

तृतीय लम्बक ३५१

Page 392Permalink

तृतीय लम्बक ३५१ उन सुन्दरियों ने कहा—भद्र ! इस पर्वत पर भद्रा नाम की विद्याधरी निवास करती है। यह उसके स्नान का जल है॥३५८॥ यह सत्य है कि साहसिक कार्यों को प्रारम्भ करनेवाले वीरों के लिए विधाता स्वयं ही उपयोगी सामग्री घटित कर देता है॥३५९॥ इतने में ही उन सुन्दरियों में से एक बोली—हे महापुरुष ! घड़े को मेरे कन्धे पर रख दो॥३६०॥ तब बुद्धिमान् विदूषक ने घड़े को उसके कन्धे पर रखते हुए, भद्रा की दी हुई रत्नों की अंगूठी को उस (घड़े) में धीरे से रख दिया॥३६१॥ और उसी बावली के किनारे फिर बैठ गया। वे स्त्रियाँ पानी लेकर भद्रा के घर चली गई। वहाँ जब वे भद्रा को पानी देकर स्नान कराने लगीं तब वह अंगूठी (भद्रा) उसकी गोद में गिर पड़ी॥३६२-३६३॥ उसे देखकर भद्रा ने सहेलियों से पूछा कि क्या तुम लोगों ने किसी नये मनुष्य को देखा है॥३६४॥ उन्होंने कहा—हाँ हम लोगों ने नदी के किनारे एक जवान मनुष्य को देखा है उसने ही यह घड़ा भी उठवा दिया था॥३६५॥ तब भद्रा बोली—तुम लोग उसे स्नान और वेश-भूषा आदि से सज्जित करके शीघ्र ही मेरे पास ले आओ वह मेरा पति आया है॥३६६॥ भद्रा के इस प्रकार कहने पर और सब कुछ विदूषक से निवेदन करके उसकी सहेलियाँ स्नान किये विदूषक को भद्रा के पास ले आईं॥३६७॥ विदूषक ने उत्सुकता के साथ राह देखती हुई भद्रा को अपने साहस-रूपी वृक्ष के पके हुए फल के समान देखा॥३६८॥ भद्रा भी उसे देखकर हर्ष के आँसुओं से मानों अर्घ्य देती हुई उसके गले में लिपट गई और उसे अपनी भुज-लता रूपी पाश से बाँध लिया ॥३६९ ३७ ० ॥ तदनन्तर बैठे हुए दोनों परस्पर देखते हुए अघाते नहीं थे। मानों सैकड़ोंगुनी बढ़ी हुई सात्कंठा (चाह) उनमें भरी थी॥३७१॥ 'इस स्थान पर कैसे आये ? भद्रा के इस प्रकार पूछने पर विदूषक उसी समय बोला—॥३७२॥

१५२ कथासरित्सागर

Page 393Permalink

१५२ कथासरित्सागर समालम्ब्य भवरत्नहमारुह्य प्रागसदायान् । सुबहुनागतोऽस्मीह किमन्यद् वच्मि सुन्दरि ! ॥३७३॥ सञ्छ्रुत्वा तस्य दृष्ट्वा तामनपेक्षितजीविताम्। प्रीतिं काष्ठागतस्नेहा सा भद्रा समभाषत ॥३७४॥ आर्यपुत्र न मे कार्य सखीभिन च सिद्धिभिः। त्वं मे प्राणा गुणक्रीता दासी चाहं तव प्रभो ! ॥३७५॥ विदूषकस्ततोऽवादीत्तार्हगच्छ मया सह। मुक्त्वा दिव्यमिमं भोगं वस्तुमुज्जयिनीं प्रिये॥३७६॥ तथेति प्रतिपन्ने सा भद्रा सपदि तद्गृहम्। तरङ्गुल्पपरिभ्रष्टा विद्याश्च तृणवज्जहौ ॥३७७॥ ततस्तया समं सद्यं स विशद्याम तां निशाम्। क्लप्तोपचारस्तत्सख्या योगेश्वर्या विदूषक ॥३७८॥ प्रातश्च भद्रया साकमवतीर्योदयाद्रितः। सस्मार यमदंष्ट्रं तं राक्षसं स पुन कृती ॥३७९॥ स्मृतमात्रागतस्योक्त्वा गन्तव्याध्वक्रमं निजम्। सस्याऽऽरोह स स्कन्धे भद्रामारोप्य तां पुरः॥३८०॥ सापि सेहे तवत्युग्रराक्षसांसाधिरोहणम्। अनुराग-परायत्ता कुर्वते किं न योषितः ॥३८१॥ रक्षोऽधिरूढश्च तत स प्रतस्थे प्रियासखः। विदूषकः पुनः प्राप तच्च कार्कोटक पुरम् ॥३८२॥ रक्षोदर्शनसंत्रास तत्र व्यालोकितो जनः। दृष्ट्वायमर्त्तनृपतिं स्वां भार्यां मार्गति स्म च ॥३८३॥ दत्तां तेम गृहीत्वा च तत्सुतां तां भुजङ्गिताम्। तश्व राक्षसास्कन्धः स प्रतस्थे पुरातनः ॥३८४॥ गत्वाम्बुधेस्तटे प्राप पापं तं वणिजं च सः। यनास्य वारिधौ पूर्वं छिन्नाः क्षिप्तस्य रज्जवः ॥३८५॥ जहार तस्य च सुतां वणिजः स धनेः सह। प्रागम्बुधौ प्रवहणप्रमोचनपणार्जिताम् ॥३८६॥ धनापहारमेवास्य वधं मेने च पाप्मनः। कवर्त्तणां पुरे प्राप्ता प्रायण प्रार्थसञ्चयाः ॥३८७॥

तृतीय लम्बक १५३

Page 394Permalink

तृतीय लम्बक १५३ 'तुम्हारे प्रेम के सहारे अनेक प्रकार के प्राण-संशयों को प्राप्त करते हुए आया हूँ और क्या कहूँ ?' यह सुनकर और प्राणों की परवा न करनेवाले उसके प्रेम को देखकर अत्यन्त स्नेह- पूर्ण भद्रा उससे बोली—॥१७३। १७४॥ 'आर्यपुत्र ! मुझे अपनी सखियों या सिद्धियों से कुछ भी प्रयोजन नहीं। हे स्वामी ! मैं तो तुम्हारे गुणों से खरीदी हुई दासी हूँ' ॥१७५॥ तब विदूषक बोला—'यदि ऐसा है तो मेरे साथ आओ। इस दिव्य भोग को छोड़कर उज्जयिनी रहने के लिए चलो' ॥१७६॥ भद्रा ने तुरन्त उसकी बात स्वीकार कर ली और इस प्रकार का विचार करने से नष्ट हुई विद्या को तृण के समान छोड़ दिया ॥१७७॥ भद्रा की सभी योगेश्वरों के समस्त प्रबन्ध करने पर विदूषक ने उस रात को वहीं विश्राम किया ॥१७८॥ और प्रातःकाल ही भद्रा के साथ उदयाचल से नीचे उतर कर यमदंष्ट्र नामक राक्षस को विदूषक ने फिर याद किया ॥१७९॥ स्मरण करते ही उपस्थित राक्षस को मार्ग के कायक्रम बताकर और भद्रा को उसके कन्धे पर चढ़ाकर विदूषक स्वयं भी उस पर सवार हो गया ॥१८०॥ उस अति कोमल भद्रा ने भी राक्षस के कठोर कन्धे पर चढ़ने का कष्ट सहन किया। प्रेम-परार्धीन रमणियां क्या नहीं करतीं ? ॥१८१॥ प्रेयसी के साथ राक्षस पर सवार विदूषक फिर उसी कर्कोटक नगर में पहुँचा ॥१८२॥ राक्षस को देखने के कारण व्याकुल जनता न देखा जाता हुआ विदूषक जरा आर्यवर्मा के समीप गया और अपनी पत्नी को सौंपा ॥१८३॥ कान-फूसूफ़ से ज्ञात की हुई आर्यवर्मा की लड़की को साथ लेकर उसी प्रकार राक्षस पर सवार होकर वह वर्द्धमान नगर में चला ॥१८४॥ समुद्र के तट पर पहुँच कर उसने उस पूर्व बनिये को पकड़ा, जिसके छोटे जहाज को छुड़ाकर लाने से उसकी कन्या को जीत लिया था और जिसने पहले रानी बनकर उस नगर में रहने के लिए छोड़ दिया था ॥१८५॥ विदूषक ने उसको सब बात बतलाकर विदा किया। सजनता को ही उसने बीज के रूप में उगा हुआ, क्योंकि यश ही मनुष्य का दूसरा जन्म होता है ॥१८६॥ इस प्रकार बनिये की बेटी को लेकर उसी राक्षस-रूपी रथ पर बैठा हुआ विदूषक उठा और राजकुमारी के रम्य आवास के तट गया ॥१८७॥ ४५

१५४ कथासरित्सागर

Page 395Permalink

१५४ कथासरित्सागर ततो रक्षोरथात्स्वस्तामानीय वणिक्सुताम्। स मद्राजपुत्रीभ्यां सहवोदपतन्नभः ॥३८८॥ दर्शयन्निजकान्तानां द्युमार्गेण ततार च। विलसत्सत्त्वसंरम्भं स्वपौरुषमिवाम्बुधिम् ॥३८९॥ प्राप तच्च स भूयोऽपि नगरं पौण्ड्रवर्धनम्। दृष्टः सविस्मयं सर्वैर्वाहनीकृतराक्षसः ॥३९०॥ तत्र तां देवसेनस्य सुतां राज्ञश्चिरोत्सुकाम्। भार्यां सम्भावयामास राक्षसावजयार्जिताम् ॥३९१॥ रुध्यमानोऽपि तत्पित्रा स स्वदेशसमुत्सुकः। गृहीत्वा तामपि ततः प्रायादुज्जयिनीं प्रति ॥३९२॥ अचिरेण च तां प्राप पुरीं राक्षसयोगतः। बहिर्गतामिवारामीयवेशदर्शननिर्वृतिम् ॥३९३॥ अधोपरिस्थितस्तस्य महाकायस्य रक्षसः। अस्पृष्टद्भूध्रकान्तिप्रकटितारमनः ॥३९४॥ स जनैर्ददृशे तत्र शिखरे ज्वसितोषधौ। द्यक्षाङ्क इव पूर्वाद्रिसवयस्यो विदूषकः ॥३९५॥ ततो विस्मितविभ्रस्ते जने श्रुत्वेत्थाम् भूपतिः। आदित्यसेनो निरगात्स्वश्वशुरोऽस्य तदा पुरः ॥३९६॥ विदूषकस्तु दृष्ट्वा तमवतीर्णाशु राक्षसात्। प्रणम्य नृपमभ्यागाद्भूयोऽप्यभिननन्द तम् ॥३९७॥ अवतार्यैव तत्स्कन्धात् स्वभार्यास्ततोऽग्रिणः। मुमोच शापपाराय राक्षसः स विदूषकः ॥३९८॥ गते च राक्षसे तस्मिन्स तन सह भूभुजा। श्वशुरेण सभार्यः सन् प्राविशद्राजमन्दिरम् ॥३९९॥ तत्र तां प्रथमां भार्यां तनयां तस्य भूपतेः। आनन्दयदुपागत्य चिरोत्कण्ठावशीकृताम् ॥४००॥ कयमेतास्त्वया भार्याः प्राप्ताः कद्नप राक्षसाः। इति पृष्टः स राज्ञाथ सवमस्मै शशंस तत् ॥४०१॥ ततः प्रभावतुष्टेन तेन तस्य महीभृता। जामातुर्निजराज्याय प्रदत्त कायवंदिना ॥४०२॥

तृतीय लम्बक १५५

Page 396Permalink

[Page Header] तृतीय लम्बक १५५

आकाश-मार्ग से समुद्र में किये गये अपने पौरुष का वर्णन करता हुआ विदूषक क्रमशः समुद्र पार कर गया ॥३८८॥ इस प्रकार, वह क्रमशः पौण्ड्र-वर्धन नगर में पहुँचा। राक्षस को वाहन बनाये हुए उस विदूषक को सभी पुरवासी आश्चर्य से देख रहे थे ॥३८९-३९०॥ पौण्ड्रवर्धन नगर में विदूषक ने राक्षस को पराजित की हुई चिरकाल से उत्सुक देवसेन राजा की कन्या का स्वाभत किया ॥३९१॥ राजा देवसेन द्वारा रोका जाता हुआ भी विदूषक उज्जैन जाने के लिए उत्सुक हो रहा था अतः वहाँ रुका नही और उसे भी साथ लेकर उज्जैन पहुँचा ॥३९२-३९३॥ विशाल शरीरवाले राक्षस के ऊपर बैठे हुए और कन्धे पर बैठी हुई अपनी वधू की शोभा से शोभित होते हुए विदूषक को उज्जयनी की जनता ने जलती हुई ओषधियोंवाले पूर्वाचल के शिखर पर चमकते हुए चन्द्रमा के समान देखा ॥३९४-३९५॥ नागरिकों के आश्चर्यचकित और व्याकुल होने पर समस्त वृन्तान्त जानकर विदूषक का श्वसुर राजा आदित्यसेन उसके सम्मुख आया ॥३९६॥ तब विदूषक ने राक्षस के कन्धे से शीघ्र ही उतरकर राजा को प्रणाम किया। राजा ने भी उसका अभिनन्दन किया ॥३९७॥ तदनन्तर विदूषक ने राक्षस के कन्धे पर बैठी हुई सभी पत्नियों को उतारकर उसे स्वतन्त्रता-पूर्वक विचरण करने के लिए छोड़ दिया ॥३९८॥ राक्षस के चले जाने पर विदूषक अपनी पत्नियों को लिये हुए राजा के साथ राजभवन में गया। राजभवन में जाकर राजा की कन्या और अपनी प्रथम पत्नी से मिला जो चिरकालीन विरह के कारण अत्यन्त उत्कण्ठित हो रही थी ॥३९९-४००॥ उज्जयिनी-नरेश आदित्यसेन ने विदूषक के प्रभाव को देखकर उसे अपने जामाता का आधा राज्य प्रदान कर दिया ॥४०१॥ राजा ने विदूषक से पूछा कि ये इतनी पत्नियां कैसे प्राप्त कीं और यह राक्षस कौन है? विदूषक ने क्रमशः सारा वृत्तान्त सुना दिया ॥४०२॥

१५६ कथासरित्सागर

Page 397Permalink

१५६ कथासरित्सागर सत्यशौच स राजाभूद् विप्रो मूर्खा विद्रूपकः। समुच्छ्रितसितच्छत्रो विधूतोभयचामरः॥४०३॥ सदा च मङ्गलाऽतोद्य-वाद्यनिर्ह्रादनिर्भरम्। प्रहर्षमुक्तनादेव रराजोज्जयिनी पुरी॥४०४॥ इत्याप्तराज्यविभवः क्रमशः स कृत्स्नां जित्वा महीमखिलराजकपूजिताङ्घ्रिः। तामि समं विगतमत्सरमिव ताभि र्भ्रातृंस्तदधिरभरस्त निजप्रयामि॥४०५॥ इत्यनुकूले दैवे भजति निजं सत्वमेव धीराणाम्। लक्ष्मीरासाकर्षणसिद्धमहामोदमन्त्रत्वम्॥४०६॥ इत्थं श्रुत्वा वत्सराजस्य वक्त्राच्चित्रामेतामद्भुतार्थां कथां ते। पार्श्वसीना मन्त्रिमुख्यास्त्य सर्वे देव्यौ चापि प्रीतिमग्र्यामवापुः॥४ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे लावानककलम्बके चतुर्थस्तरङ्गः।

पञ्चमस्तरङ्गः वत्सराजकृतं विद्याराधनम् ततो वत्सेश्वरं प्राह तत्र यौगन्धरायणः। राजन्! दैवानुकूल्यं च विद्यते पौरुषं च ते॥१॥ नीतिमार्गे च वयमप्यत्र किञ्चित् कृतश्रमाः। तद्यथा चिन्तितं शीघ्रं कुरुष्व विजयं दिशाम्॥२॥ इत्युक्ते मन्त्रिमुख्येन राजा वत्सेश्वरोऽब्रवीत्। अस्त्वेतद् बहुविघ्नास्तु सदा कल्याणसिद्धयः॥३॥ अतस्तदर्थं तपसा शम्भुमाराधयाम्यहम्। विना हि तत्प्रसादेन कुतो वाञ्छितसिद्धयः॥४॥ तच्छ्रुत्वा च तपस्तस्य मन्त्रिणोऽप्यनुमेनिरे। सेतुबन्धोद्यतस्याब्धौ रामस्येव कपीश्वराः॥५॥


१ चतुर्विध वाद्यानां संमिश्रितः शब्दः 'आतोद्य' इत्युच्यते।