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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

दशम लम्बक ८७५

दशम लम्बक ८७५ जब वे बँटवारा करने लगे तब आपस में कम और अधिक भाग का झगड़ा खड़ा हो गया। तब उन्होंने एक वेदपाठी अध्यापक को निर्णायक माना। उसने कहा - 'तुम दोनों प्रत्येक वस्तु को दो भागों में बराबर बाँटो। इससे तुम दोनों में कम और अधिक का झगड़ा न होगा ॥१७३-१७४॥ मध्यस्थ (निर्णायक) की आज्ञा से उन दोनों ने मकान खाट बरतन पशु आदि सबके दो-दो बराबर टुकड़े करके बाँट लिये। अब उनके पिता की एक दासी रह गई। उसको भी काटकर उन दोनों ने दो टुकड़े कर डाले इस हत्या के अपराध में राजा ने उन दोनों का सब माल हरण करके उन्हें सजा दे दी ॥१७५-१७६॥ इस प्रकार, मूर्खजन धूर्तों के उपदेश से दोनों लोकों का नाश करते हैं। इसलिए, समझदार व्यक्ति को चाहिए कि वह धूर्तों का नहीं प्रत्युत विद्वानों की संगति करे ॥१७७॥ असन्तोष भी अच्छा नहीं होता। इस प्रसंग में एक कथा सुनो। कहीं पर कुछ साधु भिक्षा से सन्तोष कर हृष्ट-पुष्ट बने रहते थे। उन मोटे-ताजे साधुओं को देखकर कुछ मित्रों ने आपस में कहा - आश्चर्य है कि भीख माँगकर खानेवाले ये साधु भी इतने मोटे हुए हैं ॥१७८-१७९॥ तब उनमें से एक ने कहा - 'देखो मैं तुम्हें तमाशा दिखाता हूँ। भोजन करते हुए भी इन्हें मैं पहले के समान ही दुर्बल कर देता हूँ ॥१८०॥ ऐसा कहकर उसने उन साधुओं को क्रमशः अपने घर में निमन्त्रण देकर एक दिन बहुत- सुन्दर षड्रस भोजन कराया। वे मूर्ख साधु, उसके उत्तम और स्वादिष्ट भोजन का स्मरण करते हुए भिक्षा के भोजन से असन्तोष करने लगे और धीरे-धीरे दुर्बल हो गये ॥१८१ १८२॥ तब अपने मित्रों को बुलाकर उन साधुओं के सामने ही उस भोजन करानेवाले ने कहा- ॥१८३॥ 'मेरे यहाँ भोजन करने के पहले ये साधु भिक्षा के अन्न से ही हृष्ट-पुष्ट बने हुए थे। अब उस उत्तम भोजन का स्वाद पाकर इन्हें भिक्षा से असन्तोष हो गया इसलिए दुर्बल होने लगे ॥१८४॥ इसलिए, सुख चाहनेवाला बुद्धिमान् व्यक्ति मन को सदा सन्तुष्ट रखे। असन्तोष दोनों लोकों में असह्य और निरंतर दुःखदायी होता है' ॥१८५॥ इस प्रकार, उस मित्र से शिक्षा पाये हुए उसके मित्रों ने पापों के भांडार असन्तोष का त्याग कर दिया। सच है, सत्संग किसे कल्याणकारी नहीं होता ॥१८६॥

८७६ कथासरित्सागर

८७६ कथासरित्सागर सुवर्णमुग्धकथा अथ सुवर्णमुग्धस्य देवेदानीं निशम्यताम्। पुमान् कश्चिज्जल पातुं तडागमगमद्युवा ॥१८७॥ स जलोकोकहस्तस्य स्वर्णचूडस्य पक्षिणः। सुवर्णवर्णं तत्राम्भस्यपश्यत्प्रतिबिम्बकम् ॥१८८॥ सुवर्णमिति मत्वा तद्ग्रहीतुं प्रविवेश खम्। तडागं न च तत्राप दृष्टनष्टं चले जले ॥१८९॥ आरुह्यारुह्य च जले स तत्पश्यन् प्रविश्य तत्। पुनः पुनस्तडागाम्भो जिघृक्षुर्नाप किञ्चन ॥१९०॥ पित्रा च स्वेन दृष्टोऽथ पृष्टो निन्ये गृहं च सः। तां दृष्ट्वा प्रतिमां तोये खगं विद्राव्य बोधितः ॥१९१॥ निर्विमर्शा मृषाज्ञानैर्मुह्यन्त्येवमबुद्धयः। उपहास्याः परेषां च क्षोभ्याः स्वेषां भवन्ति च ॥१९२॥ मूर्खसेवकानां कथा अथ चान्यो महामूर्खवृत्तान्तोऽत्र निशम्यताम्। कस्याप्युष्ट्रोऽवसन्नोऽभूद्भारेण वणिजोऽध्वनि ॥१९३॥ स भृत्यानब्रवीत् कश्चिदुष्ट्रं गत्वान्यमानये। श्रित्त्वाधं योऽस्य करभस्याधं भारादितो हरेत् ॥१९४॥ मद्यागमं यथा वस्त्रपेटास्वेतासु न स्पृशेत्। अम्भश्चर्माणि युष्माभिस्तथा कार्यमिह स्थितैः ॥१९५॥ इत्युष्ट्रपार्श्वेऽवस्थाप्य भृत्यांस्तस्मिंस्ततो गते। वणिज्यकस्मादुन्नम्य प्रारेभे वर्षितुं घनः ॥१९६॥ तथा कार्यं यथा माम्भः पेटाश्चर्माणि संस्पृशेत्। इति न स्वामिना प्रोक्तमित्यालोच्याथ ते जडाः ॥१९७॥ कृष्ट्वा वस्त्राणि पेटाभ्यस्तैस्ते तान्यन्ववेष्टयन्। चर्माणि तेन वस्त्राणि विनेशुस्तेन वारिणा ॥१९८॥ पापा विमग्ने सकलो वस्त्रौघो नाशितोऽम्भसा। इत्यागतोऽथ स वणिक्क्रुद्धो भृत्यानभाषत ॥१९९॥ स्वयंवोदिष्टमुदकात् पेटाचर्माभिरक्षणम्। दोषस्तत्र च कोऽस्माकमिति तैऽपि तमभ्यधुः ॥२००॥

८७८ कथासरित्सागर

८७८ कथासरित्सागर घर्मस्वाद्रेषु नश्यन्ति वस्त्राणीति मयोदितम्। वस्त्राणामेव रक्षार्थमुक्तं वो न तु चर्मणाम्॥२०१॥ इत्युक्त्वा पान्यकरन्यस्तभारा वणिग्ततः। स गत्वा स्वगृहं भृत्यान् सर्वस्वं तानदण्डयत्॥२०२॥ एवमज्ञातहृदया मूर्खा कृत्वा विपर्ययम्। घ्नन्ति स्वार्थं परार्थं च तावुभावपि चोत्तरम्॥२०३॥ अपूपमुग्धकथा अथ चापूपिकामुग्धः सङ्क्षेपेण निशम्यताम्। क्रीणाति स्माप्यगः कश्चित्पणनाष्टावपूपकान्॥२०४॥ तेषां च यावत् षड्भुक्तं तावत्तेन न तृप्तवान्। सप्तमेनाथ भुक्तेन तृप्तिस्तस्योदपद्यत॥२०५॥ ततश्चक्रन्द स जडो मुषितोऽस्मि न किं मया। एष एवादितो भुक्तोऽपूपो येनास्मि तर्पितः॥२०६॥ नाशिताः किं वृथैवान्ये मया हस्तेन किं कृताः। इति शोचन् क्रमात्तृप्तिमजानञ्जहसे जनैः॥२०७॥ । ॥२०८॥ कस्यापि मूर्खसेवकस्य कथा कश्चिद्दासो हि वणिजा मूर्खः केनाप्यभाष्यत। रक्षेस्त्वं विपणीद्वारं क्षणं गेहं विशाम्यहम्॥२०९॥ इत्युक्तवति यातेऽस्मिन्वणिजि द्वारपट्टकम्। विपणीतो गृहीत्वांसे नाटो द्रष्टमगात्नटम्॥२१०॥ आगच्छंश्च ततो दृष्ट्वा वणिजा तेन भर्त्सितः। त्वदुक्तं रक्षितं द्वारं मयेदमिति सोऽब्रवीत्॥२११॥ अत्यनर्थाय सम्भवत्यरोक्तात्पर्यविजृम्भणम्। एष च महिषीमुग्धमपूर्वं शृणुताधुना ॥२१२॥ १ मूलपुस्तके श्लोकोऽयं लुप्तः।

दशम लम्बक ८७९

दशम लम्बक ८७९ 'चमड़े के भीगा होने से उसके भीतर रखे वस्त्र नष्ट हो जायेंगे-यह मैंने कपड़ों की रक्षा के लिए ही तो कहा था। चमड़े की रक्षा के लिए नहीं'—ऐसा कहकर उस बनिये ने ऊँट के दूसरे बच्चे पर भार लादा और वहाँ से घर गया। घर जाकर उसने सेवकों का सर्वस्व हरण करके उन्हें दंड दिया॥२ १२ २॥ इस प्रकार मूर्ख व्यक्ति हृदय की सच्ची भावना न समझकर सीधी बात को भी उल्टी समझते हैं और अपनी तथा दूसरों की हानि कर डालते हैं और वैसा ही उत्तर भी देते हैं॥२ १॥ अपूपमूर्ख की कथा इसी प्रकार मालपुए के मूर्ख की कथा संक्षेप में सुनो। किसी बटोही ने एक पैसे के आठ पूए खरीदे। उनमें से छह पूए खा लेने तक उसका पेट न भरा किन्तु सातवाँ पूवा खाते ही उसका पेट भर गया। यह देखकर वह खिसियाने लगा कि 'हाय मैं लुट गया। यदि मैं इस सातवें पूए को पहले खा जाता तो बाकी पूए नष्ट न होते। इसी एक से ही पेट भर जाता ? उसकी यह बात सुनकर वहाँ बैठ सभी व्यक्ति पेट पकड़-पकड़कर हँसने लगे ॥२ ४ २ ८॥ एक मूर्ख नौकर की कथा अब एक और महामूर्ख की कथा सुनो। किसी बनिये का मूर्ख सेवक था। बनिये ने उससे कहा-'दुकान के दरवाजे की रक्षा करना मैं थोड़ी देर के लिए घर जाता हूँ। बनिये के इस प्रकार कहकर चले जाने पर वह दुकान के दरवाजे को अपने कन्धे पर रखकर कहीं नट का खेल देखने चला गया। बनिये ने आकर जब यह देखा तब उसे खूब डाँटा। तब सेवक ने उत्तर दिया कि तुमने द्वार की रखवाली के लिए कहा था तब मैंने उसकी रक्षा कन्धे पर रखकर की ॥२ १-२११॥ इस प्रकार, किसी बात के भीतरी अर्थ को न समझकर मूर्ख केवल शब्द को ही पकड़ते हैं। इसी प्रकार एक महिष मूर्ख की कथा सुनो॥२१२॥

८०८ कथासरित्सागर

८०८ कथासरित्सागर घर्मस्वाङ्गेषु नश्यन्ति वस्त्राणीति मयोदितम्। वस्त्राणामेव रक्षार्थमुक्तं भो न तु घर्मणाम्॥२०१॥ इत्युक्त्वा भायकरभन्यस्तभारो वणिक्ततः। स गत्वा स्वगृहं भृत्यान् स्वस्वं तानवण्डयत्॥२०२॥ एवमज्ञातहृदया मूर्खा कृत्वा विपर्ययम्। घ्नन्ति स्वार्थं परार्थं च तावद्भवति नोत्तरम्॥२०३॥ अपूपमुग्धकथा अथ चापूपिकामुग्ध संक्षेपेण निशम्यताम्। क्रीणाति स्माप्यगं कश्चित्पणेनाष्टावपूपकान्॥२०४॥ तेषां च यावत् षड्भुङ्क्ते तावन्मेने न तृप्तताम्। सप्तमेनाथ भुक्तेन तृप्तिस्तस्योदपद्यत॥२०५॥ ततश्चक्रन्द स जडो मुषितोऽस्मि न किं मया। एष एवादितो भुक्तोऽपूपो येनास्मि तर्पितः॥२०६॥ नाशिता किं वृथैवाये मया हस्तेन किं कृताः। इति शोचन् क्रमात्तृप्तिमजानञ्जहसे जनैः॥२०७॥ । ॥२०८॥ कस्यापि मूर्खसेवकस्य कथा कश्चिद्दासो हि वणिजा मूर्खः केनाप्यमन्त्र्यत। रक्षेस्त्वं विपणीद्वारं क्षणं गेहं विशाम्यहम्॥२०९॥ इत्युक्तवति यातेऽस्मिन्वणिजि द्वारपट्टकम्। विपणीतो गृहीत्वाऽंसे वासो द्रष्टमगान्नटम्॥२१०॥ आगच्छंश्च ततो दृष्ट्वा वणिजा तेन भर्त्सितः। त्वदुक्तं रक्षितं द्वारं मयेदमिति सोऽब्रवीत्॥२११॥ हरयनर्थाय व्यर्थकपोरोक्षतात्पर्यविज्जडः। एवं च महिषीमुग्धमपूर्व शृणुताधुना॥२१२॥ १ मूलपुस्तके श्लोकोऽयं त्रुटितः।

द्वादश लम्बक ८८१

द्वादश लम्बक ८८१ महिषीमूर्ख की कथा कुछ गांव के लोगों ने किसी गँवार का भैंसा गांव के बाहर भीलों की बस्ती में ले जाकर वट-वृक्ष के नीचे मारकर खा लिया ॥२१३॥ उस भैंसावाले ने जाकर राजा से निवेदन किया। तदनन्तर, राजा ने भैंसा खानेवाले उन सभी गांववालों को बुलवाया ॥२१४॥ उनके सामने भैंसावाला गँवार बोला—'इन लोगों ने मेरे देखते-देखते मेरे भैंसे को तालाब के पास वटवृक्ष के नीचे मारकर खा लिया। यह सुनकर उनमें से एक वृद्ध मूर्ख ने कहा— 'इस गांव में न तो कोई तालाब है और न वट का ही वृक्ष इसलिए यह झूठ बोलता है। हमने इसका भैंसा कहाँ मारा और कहाँ खाया? ॥२१५ २१७॥ यह सुनकर भैंसावाला बोला—'तुम्हारे गांव की पूर्व दिशा में तालाब और वट का वृक्ष क्या नहीं है? ॥२१८॥ 'अष्टमी तिथि को तुमलोगों ने मेरे भैंसे को खाया है। उसके इस प्रकार कहने पर वह वृद्ध मूर्ख फिर बोला—'हमारे गांव में पूर्व दिशा ही नहीं है और न अष्टमी तिथि ही है। यह सुनकर हँसते हुए राजा ने उस मूर्ख को उत्साहित करते हुए कहा—'तू सच बोलनेवाला है, कुछ भी झूठ नहीं बोलता। अतः मुझे सच बता—'तुमने भैंसा खाया है या नहीं? ॥२१९ २२१॥ यह सुनकर वह मूर्ख बोला—'पिता के मरने के तीन वर्षों पश्चात् मैं उत्पन्न हुआ हूँ और उसी पिता ने मुझे यह चतुराई सिखाई है, इसलिए महाराज मैं झूठ कभी नहीं बोलता। हम लोगों ने इसका भैंसा खाया है, किन्तु और दूसरी बात जो यह कहता है, वह झूठी है। ॥२२२-२२३॥ यह सुनकर अपने अनुचरों के साथ राजा हँसी को न रोक सका और उसने भैंसावाले को मूल्य दिलाकर उन गँवारों को दंड दिया ॥२२४॥ मूर्खजन अपनी मूर्खता के अभिमान से अपने प्रति विश्वास कराने के लिए जो छिपाने योग्य नहीं है उसे छिपाते हैं और जो छिपाने योग्य है उसे प्रकट कर डालते हैं ॥२२५॥ किसी एक दरिद्र से उसकी युवती स्त्री बोली—'मैं एक उत्सव में अपने पिता के घर निमन्त्रित हूँ। अतः, कल प्रातः मैं वहाँ जाऊँगी ॥२२६॥ १११

८८० कथासरित्सागर

८८० कथासरित्सागर महिषमूर्खकथा कस्यचिन्महिषः कैश्चिद्ग्राम्यैर्ग्रामस्य वाह्यतः । नीत्वा वटस्तल भित्त्वावाटे व्यापाय भक्षितः ॥२१३॥ तेन गत्वाथ विज्ञप्तो महिषस्वामिना नृपः । ग्राम्यानानाययामास स तान् महिषभक्षकान् ॥२१४॥ तत्समक्ष स राजाग्रे महिषस्वाम्यभाषत । तडागनिकटे देव नीत्वा वटतरोरधः ॥२१५॥ एभिर्मे महिषो हत्वा भक्षितः पश्यतो जडैः । तच्छ्रुत्वान्येषु तूष्णीकेष्वेको वृद्धमूर्खोऽब्रवीदिदम् ॥२१६॥ तडाग एव नास्त्यस्मिन् ग्रामे न च वटः क्वचित् । मिथ्या वक्त्येष महिषः क्व हतो भक्षितोऽस्य वा ॥२१७॥ श्रुत्वैतन्महिषस्वामी सोऽब्रवीद्भास्ति किं वटः । तडागश्च स पूर्वस्यां दिशि ग्रामस्य तस्य च ॥२१८॥ अष्टम्यां च स युष्माभिर्भक्षितो महिषाऽत्र मे । इत्युक्तस्तेन स पुनर्वृद्धमूर्खोऽब्रवीदिदम् ॥२१९॥ पूर्वा दिगेव नास्त्यस्मद्ग्रामे नाप्यष्टमी तिथिः । एतच्छ्रुत्वा हसन् राजा तमाहोत्साह यच्छ्रडम् ॥२२०॥ त्वं सत्यवादी नासत्यं किञ्चिद्वदसि सुम्मम । सत्यं ब्रूहि स युष्माभिः किं भुक्तो महिषो न वा ॥२२१॥ एतच्छ्रुत्वा जडोऽब्रवीन्मृते पितरि वत्सरे । त्रिभिर्जातोऽस्मि तेनैव शिक्षितोऽस्म्युक्तिपाटवम् ॥२२२॥ तवत्सत्यं महाराज न कदाचिद्वदाम्यहम् । भुक्तोऽस्य महिषोऽस्माभिरस्यद्वक्ति मृषाह्यसौ ॥२२३॥ श्रुत्वैतत्सानुगो राजा हासं रोद्धुं स नाशक्तत् । निर्यात्य महिषं तस्य तांश्च ग्राम्यानदण्डयत् ॥२२४॥ इत्यगुह्यं निगूहन्ते गुह्यं प्रकटयन्ति च । मौर्घ्याभिमानेनादातुं मूर्खाः प्रत्ययमात्मनि ॥२२५॥ कश्चिद्धरिख गृहिणी षण्ढी मूर्खमभाषत । प्रातः पितृगृहं यास्याम्युत्सवेऽस्मि निमन्त्रिता ॥२२६॥

षष्ठम लम्बक ८८३

षष्ठम लम्बक ८८३ इसलिए यदि तुम कहीं से भी मेरे लिए, नीले कमलों की माला न लाये तो तुम मेरे पति नहीं और मैं तुम्हारी पत्नी नहीं' ॥२२७॥ अब वह पति बेचारा नीले कमल के पुष्पों के लिए राजा के तालाब में गया। उसमें जाने पर वहाँ के रक्षकों द्वारा कौन है इस प्रकार पूछे जाने पर उसने कहा 'मैं बकवा हूँ। तब वे यह सुनकर और उसे बाँधकर प्रातःकाल राजा के पास ले गये। वहाँ राजा के पूछने पर वह बकवे की बोली में बोला। तब भी राजा से बार-बार आग्रहपूर्वक पूछे जाने पर, उसके सच्चा वृत्तान्त सुना देने पर वह दयालु राजा द्वारा छोड़ दिया गया और घर आ गया ॥२२८-२३० ॥ किसी ब्राह्मण ने एक मूर्ख वैद्य से कहा- मेरे कुबड़े पुत्र का कूबड़ अन्दर कर दे। यह सुनकर वैद्य ने उससे कहा-'मुझे शत पैसे दे। यदि यह काम न करूँ तो इसके दसगुने (सौ पैसे) तुझ दूँगा ॥२३१ २३२ ॥ इस शर्त पर ब्राह्मण से दस पैसे लेकर उसके वैद्य ने स्वेद आदि उपचार करके उस पुत्र की चिकित्सा की ॥२३३॥ लेकिन सम्भव वह उसे ठीक न कर सका और उसके दसगुने अधिक पैसे उसे उस कुबड़े के पिता को लौटाने पड़े। भला कौन व्यक्ति कुबड़े को सीधा कर सकता है। इस प्रकार, असंभव कार्य करने की प्रतिज्ञा की डींग हाँकनेवाले मूर्खों के मार्ग में बुद्धिमान् व्यक्ति को नहीं पड़ना चाहिए ॥२३४ २३५॥ प्राज्ञमुख मन्त्री गोमुख से रात्रि में यह कथा सुनकर, युवराज नरवाहनदत्त अच्छी शिक्षा से प्रसन्न होकर उस पर बहुत सन्तुष्ट हुआ ॥२३६॥ इस कथा से मनोरंजन होने के कारण शक्तियशा के लिए उत्सुक होने पर भी अपने समान वय के मित्रों के साथ नरवाहनदत्त पलंग पर लेटकर नींद में सो गया ॥२३७॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त सप्तम तरंग रात बीतने और प्रातःकाल होने पर, प्राणप्यारी शक्तियशा के लिए उत्सुक नरवाहनदत्त उसका ध्यान करता हुआ व्याकुल हो गया ॥१॥

८८२ कथासरित्सागर

८८२ कथासरित्सागर तत्त्वयोत्पलमालैका नानीता चेत्कुतोऽपि मे। तन्न भार्यास्मि ते नापि भर्त्ता मम भवानिति॥२२७॥ खर्वस्तद्दर्पो रात्रौ स राजकीयसरो ययौ। तत्र प्रविष्टश्च कोऽसीति दृष्ट्वापृच्छत्तं रक्षकः॥२२८॥ चक्रवाकोऽस्मीति च वदन् बद्ध्वा नीतः प्रगे स तैः। राज्ञाग्रे पृच्छ्यमानश्च चक्रवाकरुतं व्यधात्॥२२९॥ ततः स राजा हसितः स्वयं पृष्टोऽनुबन्धिना। मूर्खः कश्चित्सवृत्तान्तो मुक्तो दीनो यथाहतः॥२३०॥ कश्चिच्च मूर्खभीषक् केनाप्युक्तो द्विजन्मना। क्रकचं मम पुत्रस्य कुब्जस्याभ्यन्तरं नय॥२३१॥ एतच्छ्रुत्वाब्रवीद्वैद्यो दश देहि पणान् मम। ददामि ते दशगुणान्साधयामि न चेदिदम्॥२३२॥ एवं कृत्वा पणं तस्माद् गृहीत्वा तान् पणान्द्विजात्। स च स्वदाविभिः कुब्जमभजत्केवलं भिषक्॥२३३॥ न चाशकत् स्पष्टयितुं ददौ दशगुणान् पणान्। को हि कुब्जमृजूकर्तुं शक्नुयादिह मानुषम्॥२३४॥ हासायैवाशक्यार्थप्रतिज्ञानविकत्थनम् । तदीदृशैर्मूढमार्गे सञ्चरेत न बुद्धिमान्॥२३५॥ इति भद्रमुखात्स गोमुखात्ख्यातसचिवा मुग्धकथा निशम्य रात्रौ। नरवाहनदत्तराजापुत्रः सुमतिः प्रीतमनास्तुतोष तस्मै॥२३६॥ अभजच्च स तत्कथाविनोदान्छनकः शक्तियशःसमुत्सुकोऽपि। शयनीयमुपागतोऽथ निद्रां सवयोभिः सहितो निजैर्वयस्यैः॥२३७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे शक्तियशोलम्बके षष्ठस्तरङ्गः। सप्तमस्तरङ्गः गोमुखकथिता नवा मधुरा कथा। ततः प्रातः प्रबुद्धस्तां स शक्तियशसं प्रियाम्। नरवाहनदत्तोऽत्र ध्यायन् व्याकुलतां ययौ॥१॥

दशम लम्बक ८८५

दशम लम्बक ८८५ उसके विवाह की एक मास की अवधि को एक युग के समान मानते हुए नववधू के लिए उत्सुक-हृदय नरवाहनदत्त को चैन नहीं मिल रहा था। ॥२॥ गोमुख के मुख से यह समाचार जानकर उसके पिता वत्सराज ने स्नेह के कारण वसन्तक के साथ अपने मित्रों को भेजा ॥३॥ उनलोगों के गौरव (आश्वासन) से नरवाहनदत्त के कुछ धीरज धरने पर चतुर मन्त्री गोमुख ने वसन्तक से कहा—॥४॥ 'आर्य वसन्तक युवराज के मन को प्रसन्न करनेवाली कोई नई और रोचक कथा सुनाओ' ॥५॥ मयोधर और लक्ष्मीधर की कथा तब बुद्धिमान् वसन्तक ने कथा प्रारम्भ की। मालव देश में श्रीधर नाम का प्रसिद्ध और श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था। उसके यहाँ एक साथ दो बालक उत्पन्न हुए। बड़े का नाम यशोधर और छोटे का नाम लक्ष्मीधर था ॥६-७॥ युवावस्था में आये हुए वे दोनों भाई विद्याध्ययन के लिए पिता की आज्ञा से दूर देश को चले गये ॥८॥ क्रमशः मार्ग में चलते हुए उन्हें एक विशाल जगल मिला। वह पानी और पेड़ों की छाया से हीन था और तपी हुई बालू से भरा था। उसमें जाते हुए वे दोनों घाम से विकल और प्यास से व्याकुल होकर सायंकाल फल और छायावाले एक विशाल वृक्ष के समीप पहुँचे ॥९-११॥ उन्होंने उस वृक्ष के नीचे कलम से बनी हुई, शीतल और निर्मल जल से भरी हुई और कमलों की सुगन्धि से युक्त एक बावली देखी ॥११॥ उसमें नहाकर, भोजन करके और शीतल-मधुर जल पीकर तृप्त हुए वे दोनों एक पत्थर की चट्टान पर बैठकर विश्राम करने लगे ॥१२॥ सूर्य के अस्त हो जाने पर, सन्ध्या-वन्दन करके हिंसक जन्तुओं के भय से रात बिताने के लिए वे दोनों पेड़ पर चढ़ गये ॥१३॥ रात्रि होने पर उस बावली के जल के बीच से उनके देखते-देखते बहुत-से पुरुष निकले ॥१४॥ उनमें से कोई भूमि को साफ करने लगा कोई लीपने लगा और किसी ने वहाँ पाँच रंगों के फूल फैला दिये ॥१५॥

८८४ कथासरित्सागर

८८४ कथासरित्सागर तद्विवाहावधौ शेषं मासस्य युगसन्निभम्। मन्वानो न रतिं लेभे नवोढोत्केन चेतसा ॥२॥ तद्बुद्ध्वा गोमुखमुखात् स्नेहात्तस्य पितान्तिकम्। वत्सराजः स्वसचिवान् प्राहिणोत्सवसन्तकान् ॥३॥ तद्गौरवात्तद्धैर्ये च तस्मिन् वत्सेश्वरात्मजे। विवग्धा गोमुखो मन्त्री बसन्तकमुवाच तम् ॥४॥ युवराजमनस्तुष्टिकरीमार्यवसन्तक । विचित्रां काञ्चिदाख्याहि कथामभिनवामिति ॥५॥ यशोधरलक्ष्मीधरब्राह्मणभ्रात्रोः कथा ततो वसन्तको धीमान्कथां वक्तुं प्रचक्रमे। मालवे धीधरो नाम प्रख्यातोऽभूद्विजोत्तमः ॥६॥ उत्पद्येते स्म तस्य द्वौ सदृशौ यमजौ सुतौ। ज्येष्ठो यशोधरो नाम तस्य लक्ष्मीधराऽनुजः ॥७॥ यौवनस्थं च तौ विद्याप्राप्तये भ्रातरावुभौ। देशान्तरं प्रतस्थाते सहितौ पितुराज्ञया ॥८॥ क्रमात् पथि व्रजन्तौ च प्रापतुस्तौ महाटवीम्। अजलामतारुच्छायां सन्तप्तसिकतास्थिताम् ॥९॥ तत्र यान्तौ परिक्लान्तावातपेन तृषा च तौ। एकं सफल्सच्छाद्यं साय सम्प्रापतुस्तरुम् ॥१०॥ मूले तस्य तरोश्चैकां वापीं पृथुमवस्थिताम्। शीतस्वच्छद्रुतसलिलीं कमलामोदवासिताम् ॥११॥ तस्यां स्नात्वा कृताहारौ पीतशीताम्बुनिर्वृतौ। पिनागङ्गारविष्टौ च क्षणं विश्राम्यत स्म तौ ॥१२॥ अस्नं गते रवौ सन्ध्यामुपास्य प्राणिनां भयात्। नतुं निशां भ्रातरो तौ समारुहदतुस्तरुम् ॥१३॥ निशाक्षणे च तत्रायात् पाश्यास्तस्मान्नभान्तरम्। उद्गच्छन्ति स्म पुरुषा बहवः पल्लवासनाः ॥१४॥ यथा वाचालयन् बुद्धिवद्भूमिगतो दक्षिणानिलम्। सचिन्त्य तत्र पुण्यानि पञ्चबाणोव्यवारयन् ॥१५॥

षष्ठम लम्बक ८८७

षष्ठम लम्बक ८८७ किसी ने वहाँ पर सोने का पलंग लाकर बिछा दिया किसी ने उस पर लिहाफ के साथ गद्दई बिछाईं, किसी ने सुन्दर पुष्प चुनकर सेज पर रख दिये । किसी ने उत्तमोत्तम भोजन- पात्र लाकर वृक्ष के नीचे एक ओर सजा दिये ॥१६-१७॥ तदनन्तर, उस बावली के तल से कामदेव को जीतनेवाला रूपवान् दिव्य आभूषणों से विभूषित और तलवार हाथ में लिये हुए एक दिव्य पुरुष बाहर निकला ॥१८॥ वहाँ आकर और उसके आसन पर बैठ जाने पर, उसका सारा सेवक-परिवार उसी बावली में डूब गया ॥१९॥ तब उसने बावली से दो स्त्रियों को निकाला उनमें एक सुन्दरी मन्द वेषधारिणी और मंगलसूचक वस्त्राभरणों से सुशोभित थी और दूसरी अत्यन्त सुन्दरी और भड़कीले वस्त्राभरणों से युक्त थी। वे दोनों उसकी पत्नियां थीं उनमें दूसरी यानी छोटी उसे अधिक प्यारी थी ॥२०-२१॥ तब पहली पतिव्रता स्त्री ने पति और सपत्नी (सौत) के आगे रत्न की दो थालियों में भोजन परोस दिया ॥२२॥ और, उन दोनों के भोजन कर लेने पर उस छठी स्त्री ने स्वयं भोजन किया। तदनन्तर, उसका पति दूसरी छोटी स्त्री के साथ पलँग पर आनन्द-विलास करके नींद में सो गया। तब उसकी बड़ी (पहली) स्त्री उसके पैर दबाने लगी और दूसरी स्त्री भी पलंग पर पड़ी हुई जाग रही थी। ऊपर से यह सब देखकर उन ब्राह्मण-बालकों ने उसी वृक्ष पर बैठे हुए आपस में कहा—'यह कौन होगा यह बात जानने के लिए पैर दबानेवाली इस स्त्री से पूछना चाहिए। ये सभी कोई दैवी व्यक्ति हैं' ॥ २३—२५॥ ऐसा सोचकर और वृक्ष से उतरकर जब वे पहली स्त्री की ओर चले तबतक दूसरी लेटी हुई स्त्री ने यशोधर को देख लिया और इतने में उस चञ्चलाक्षी वह सोये हुए पति के पलंग से उठकर उसके पास आकर कहने लगी—'मेरा उपभोग करो' ॥२७-२८॥ यशोधर ने उससे कहा 'पापिन तू दूसरे की स्त्री है और मैं दूसरा पुरुष हूँ। फिर, इस प्रकार क्या कहती है? तब वह स्त्री बोली—'मैं तेरे जैसे सौ पुरुषों का संगम कर चुकी हूँ तो मुझे क्या डर है? यदि विश्वास न हो तो मेरी इन सौ अंगूठियों को देखो' ॥२९-३ १ ॥

८८६ कथासरित्सागर

[header] ८८६ कथासरित्सागर [/header]

कश्चित्कनकपर्यङ्कमानीयात्र न्यवेशयत् । कश्चितस्ततार तस्मिंश्च तूलिकां प्रच्छदोत्तराम् ॥११६॥ केचित् पुष्पाङ्गरागादि पानमाहारमुत्तमम् । आनीय स्वापयामासुरेकमेकं तरोस्तले ॥११७॥ ततो वापीतलात्तस्माद्रूपेण जितमन्मथः । उदगात्पुरुषः खड्गी दिव्याभरणभूषितः ॥११८॥ तस्मिंस्तत्रासनासीने क्लृप्तमाल्यानुलेपनाः । सर्वे परिजनास्तस्यां वाप्यामेव ममज्जिरे ॥११९॥ अथोज्जगार स सुखादेकां भव्याकृतिं प्रियाम् । विनीतवेषां मञ्जुस्तमाल्याभरणधारिणीम् ॥१२०॥ द्वितीयां चातिरूपाढ्यां सद्वस्त्राभरणोज्ज्वलाम् । ते च भार्ये उभे तस्य पश्चिमा वल्लभा पुनः ॥१२१॥ ततोऽत्र रत्नपात्राणि न्यस्य पात्रद्वये तयोः । भर्तुः सपत्न्याश्चाहारं पानं चोपानयत्सती ॥१२२॥ तयोर्भुक्तवतोः सापि बुभुजे सोऽप्य तत्पतिः । पर्यङ्कशयनं भेजे तया साकं द्वितीयया ॥१२३॥ अनुभूय रतिक्रीडासुखं निद्रां जगाम सः । आद्या च भार्या सा तस्य पादसंवाहनं व्यधात् ॥१२४॥ द्वितीया साप्यनिद्रैव तस्याभूच्छयने प्रिया । दृष्ट्वैतत्तौ विप्रपुत्रौ तस्थतुर्धर्तुमिष्व ॥१२५॥ कोऽयं स्यादवतीर्यैतत् पादवाहिकामिमाम् । एतस्य किन्न पृच्छावः सर्वे ह्यविकृता अमी ॥१२६॥ अवतीर्याथ तौ यावदाद्यां तामुपसर्पतः । ययोधर तयोस्तावद्द्वितीया सा ददर्श तम् ॥१२७॥ उत्थाय शयनात् पत्युः सुप्तस्मोहामघापह्ला । तमुपेत्य सुरूपं सा मां भजस्वेत्यभाषत ॥१२८॥ पापे त्वं परदारा मे तथाहं परपूरुषः । तत्किमेवं ब्रवीषीति तेनोक्ता साब्रवीत् पुनः ॥१२९॥ त्वादृशानां भतन्नाह सङ्गता किं भयं तव । न चान्यस्यापि पश्यैतद्गृह्णीष्वशतं मम ॥१३०॥

दशम लम्बक ८८९

दशम लम्बक ८८९ एक-एक पुरुष से मैने एक-एक अंगूठी ली हैं' ऐसा कहकर उसने अपने आँचल की गाँठ से खोलकर उसे सौ अंगूठियाँ दिखा दीं ॥३१॥ तब यशोधर ने उससे कहा- 'तू सौ से समागम कर या साठ से मेरी तो तू माता है। मैं उसके समान पवित्र नहीं हूँ' ॥३२॥ इस प्रकार यशोधर से तिरस्कृत स्त्री ने क्रोध से अपने पति को जगाकर और उसे यशोधर को दिखाकर रोते हुए अपने पति से कहा- तुम्हारे सोये रहने पर इस पापी ने मुझे बलात्कार करके भ्रष्ट कर दिया है। उससे यह सुनते ही उसका पति तलवार खींचकर उठ खड़ा हुआ ॥३३-३४॥ तदनन्तर दूसरी पतिव्रता स्त्री ने उसके चरणों में गिरकर कहा- 'झूठे ही पाप न करो मेरी बात सुनो ॥३५॥ इस पापिन ने इसे देखकर, तुम्हारी बगल से उठकर इससे आग्रहपूर्वक संगम करने की प्रार्थना की किन्तु इस सज्जन ने इसे स्वीकार नहीं किया ॥३६॥ तू मेरी माता है ऐसा कहकर इसे फटकार दिया। इसी ईर्ष्या से इसने उसका वध कराने के लिए तुम्हें जगाया है ॥३७॥ हे स्वामिन्, इसने वृक्ष पर रात को ठहरे हुए एक सौ पथिकों के साथ समागम किया है और उनसे अंगूठियां ली हैं। वैर बढ़ने के भय से मैंने इस अकथनीय पाप की कथा तुमसे नहीं कही ॥३८-३९॥ यदि तुम्हें विश्वास न हो तो इसके आँचल में बँधी हुई अंगूठियां देखो। यह मेरा सती-धर्म नहीं है कि मैं स्वामी से झूठ बोलूँ ॥४०॥ हे स्वामिन् मेरे सतीत्व का विश्वास करने के लिए मेरा प्रभाव देखो। ऐसा कहकर उसने क्रोध से देखकर एक वृक्ष को भस्म कर डाला और फिर प्रसन्न दृष्टि से देखकर उसे फिर पहले से भी अधिक हरा-भरा बना दिया। यह देखकर उस का सन्तुष्ट पति उसे बड़ी देर तक आलिंगन करता रहा ॥४१-४२॥ और, उस दूसरी स्त्री के आँचल से अंगूठियां पाकर उस पति ने उसकी नाक काटकर उसे दूर कर दिया (निकाल दिया) ॥४३॥ और, पढ़ने के लिए जानेवाले उस यशोधर से क्षमा-प्रार्थना की तथा खेद और वैराग्य के साथ वह उससे बोला- मैं इन दोनों पत्नियों को हृदय में रखकर ईर्ष्या के कारण इनकी रक्षा करता रहा हूँ परन्तु आज इस दुष्टा स्त्री की रक्षा मैं न कर सका ॥४४-४५॥ ११२

४८८ कथासरित्सागर

४८८ कथासरित्सागर एकैकमङ्गुलीयं हि हृतमकैकशो मया। इत्युक्त्वा स्वाञ्चलात्तस्मायङ्गुलीयान्यदर्शयत् ॥३१॥ ततो यशोधरोऽवादीत् सङ्कुचध्वं शतेन वा। लक्षेण वा मम त्वं तु माता नाहं तवाविषः ॥३२॥ एव निराकृता तेन सा प्रबोध्य पतिं क्रुधा। यशोधरं तं सन्दर्श्य जगाद रुदती शठा। ३३॥ अनेन पाप्मना सुप्ते त्वय्यहं ध्वंसिता बलात्। तच्छ्रुत्वैव स उत्तस्थौ खड्गमाकृष्य तत्पतिः ॥३४॥ अथान्यया सा सती भार्या तं गृहीत्वैव पादयोः। अब्रवीन्मा कृथा मिथ्या पापं शृणु वचो मम ॥३५॥ अनया पापया दृष्ट्वा त्वत्पार्श्वोत्थितया हठात्। अर्थितोऽयं वशो नास्याः साधुस्तत्प्रत्यपद्यत ॥३६॥ माता मम त्वमित्युक्त्वा यदनेन निराकृता। प्राबोधयदधर्मात् त्वां वधायतस्य कोपतः ॥३७॥ अनया मत्समक्षं च रात्रिष्विह तरौ स्थिता। हृताङ्गुलीयका भुक्ताः शतसंख्याः प्रगोऽध्वगाः ॥३८॥ द्वेषसम्भावनमगम्या मया चोक्तं न जातु ते। अद्य त्वत्पापभीत्यैवमबाध्यमहमब्रवम् ॥३९॥ वस्त्राञ्चलग्नेऽङ्गुलीयानि पश्यास्याः प्रत्ययो न चेत्। न चैष मे सतीधर्मो यद्गत्यनृतं वचः ॥४०॥ सतीत्वप्रत्ययायमं प्रभावं पश्य मे प्रभो। इत्युक्त्वा भस्म चक्रे सा तद् यं क्रोधवीक्षितम् ॥४१॥ प्रसाददृष्टे च पुनस्तं पूर्वाभ्यधिकं व्यधात्। तद्दृष्ट्वा स चिराद् भर्त्ता तुष्टस्तामुपगूहवान् ॥४२॥ निरास च द्वितीयां तां छित्त्वा नासां कुगेहिनीम्। अङ्गुलीयानि सम्प्राप्य तद्वस्त्रान्तात्स उत्पसि ॥४३॥ क्षमयामास किल तं दृष्ट्वाभ्ययनपाठकम्। यशोधरं भ्रातृपुत्रं संनिवेद्य जगाद च ॥४४॥ भार्ये हृदि निघायैते रक्ष्यामोऽप्यविघातसदा। तथाप्येषा न शकिता पापैका रक्षितुं मया ॥४५॥

दशम लम्बक ८९१

दशम लम्बक ८९१ बिजली को कौन स्थिर रख सकता है और चंचल (दुराचारिणी) स्त्री की कौन रक्षा कर सकता है ? सती स्त्री केवल एक अपने चरित्र से ही रक्षित होती है ॥४६॥ रक्षा की गई पतिव्रता दोनों लोकों में पति की रक्षा करती है, जैसा कि शाप और वर देने में इस स्त्री ने मेरी रक्षा की है ॥४७॥ इसकी कृपा से मैं इस व्यभिचारिणी स्त्री के सम्पर्क से बचा और उत्तम ब्राह्मण की हत्या के पाप से भी बचा' ॥४८॥ इस प्रकार कहकर और यशोधर को बैठाकर उसने पूछा—'तुम दोनों कहाँ से आये हो और कहाँ जा रहे हो यह मुझे बताओ' तब यशोधर ने अपना वृत्तान्त बताकर और उसका विश्वास प्राप्त करके कुतूहलवश उससे भी पूछा—॥४९-५०॥ हे महापुरुष यदि गुप्त रखने की बात न हो तो यह बताओ कि ऐसा भोग प्राप्त करने पर भी तुम्हें यह जलवास कैसे मिला ? ॥५१॥ 'यह सुनकर, सुनो कहता हूँ' ऐसा कहकर वह पुरुष उससे बोला— हिमालय के दक्षिण की ओर कश्मीर नाम का देश है जिसे मानो ब्रह्मा ने मनुष्यों के लिए, स्वर्ग का कौतूहल दूर करने के हेतु बनाया है ॥५२-५३॥ जहाँ कैलास और श्वेतद्वीप के मुख्य निवास को छोड़कर शिव और विष्णु सैकड़ों स्थलों में स्वयं प्रादुर्भूत होकर निवास करते हैं। जो देश वितस्ता नदी के जल से पवित्र एवं शूर तथा विद्वान् व्यक्तियों से भरा है जो छल कपट आदि दोषों से शून्य है अर्थात् जहाँ छल कपट का नाम नहीं है और जिसे परस्यात् शत्रु भी विजित नहीं कर सकते ॥५४-५५॥ मैं उस कश्मीर में भवनर्मा मात्र का सामान्य स्थिति का ग्रामवासी ब्राह्मण-पुत्र था। पूर्वजन्म में मेरी दो पत्नियाँ थीं। मैंने किसी समय भिक्षुओं के साथ सम्पर्क हो जाने के कारण शास्त्र में कहे गये उपाषथ नाम के नियम व्रत को स्वीकार किया ॥५६-५७॥ उस व्रत के प्रायः समाप्त हो जाने पर मेरी सेज पर मेरी पापिनी पत्नी हठपूर्वक आकर सो गई ॥५८॥ रात के चौथे प्रहर में अपने व्रत का ध्यान न रहा हुआ मोह के वश में मैंने उस स्त्री के साथ समागम कर लिया। इस उस व्रत का इतना ही खण्डन हो जाने से मैं जल-पुरुष बनकर यहाँ उत्पन्न हो गया। और वे ही दोनों पत्नियां यहाँ भी मेरी पत्नियां हुईं ॥ -९ ॥

८९ कथासरित्सागर

८९ कथासरित्सागर विद्युतं कः स्थिरीकुर्यात्को रक्षेच्चपलां स्त्रियम्। साध्वी यदि परं स्वेन शीलेनैकेन रक्ष्यते ॥४६॥ तद्रक्षिता सा भर्त्तारं रक्षत्युभयलोकयोः । यथानया धापवरक्षमयाद्यास्मि रक्षितः ॥४७॥ एतत्प्रसादात् कुलटासङ्गमोऽप्यगतो मम। न चोपनतमप्युग्रं सद्भिप्रवषपातकम् ॥४८॥ इत्युक्त्वा स तमप्राक्षीदुपवेश्य यशोधरम्। आगतोऽसि कुतः कुत्र भ्रमषः कथ्यतामिति ॥४९॥ ततो यशोधरस्तस्मै स्ववृत्तान्तं निवेद्य सः। विश्वासं प्राप्य पप्रच्छ तमप्यथ कुतूहलात् ॥५०॥ न रहस्यं महाभाग यदि तत्प्रब्रूहि मज्जुना। कस्त्वमीदृशि भोगेऽपि किं च ते जलवासिता ॥५१॥ तच्छ्रुत्वा श‍ृणुतां वच्मीत्युक्त्वा स पुरुषस्तदा। जलवासी स्ववृत्तान्तमथ वक्तुं प्रचक्रमे ॥५२॥ हिमवद्दक्षिणो देशः काश्मीराख्योऽस्ति यं विधिः। स्वर्गकौतूहलं कत्तुं मर्त्यानामिव निर्ममे ॥५३॥ यत्र विस्मृत्य कैलासश्वेतद्वीपसुखस्थितिम्। स्वयम्भुवौ स्थानशतान्यभ्यासाते हराच्युतौ ॥५४॥ वितस्ताजलपूतो यः शूरविद्वज्जनाकुलः। अजेयश्छत्रदोषाणां द्विषतां हस्तिनामपि ॥५५॥ तत्राहं भवशर्माख्यो ग्रामवासी किलाभवम्। द्विजातिपुत्रः सामान्यो द्विभार्यः पूर्वजन्मनि ॥५६॥ सोऽहं कदाचित् सञ्जातसन्तप्तो मिथुभिः सह। उपोषणस्य नियमं तच्छास्त्रोक्तं गृहीतवान् ॥५७॥ तस्मिन् समाप्तप्राये च नियमे शयने मम। पापा हठादुपैत्यैका भार्या सुप्तवती किल ॥५८॥ तुर्ये तु यामे विस्मृत्य तद्व्रतं सन्निषेवणम्। निद्रामोहातया साकं रतं सेपितवानहम् ॥५९॥ तन्मात्रखण्डिते तस्मिन्व्रतेऽहं जलपूरुषः। इहाय जातस्ते द्वे च भार्ये जाते इहापि मे ॥६०॥

दशम लम्बक ८९१

दशम लम्बक ८९१ बिजली को कौन स्थिर रख सकता है और चपल (दुराचारिणी) स्त्री को कौन रक्षा कर सकता है? सती स्त्री केवल एक अपने चरित्र से ही रक्षित होती है॥४६॥ रक्षा की गई पतिव्रता दोनों लोकों में पति की रक्षा करती है, जैसा कि शाप और वर देने में इस स्त्री ने मेरी रक्षा की है॥४७॥ इसकी कृपा से मैं इस व्यभिचारिणी स्त्री के सम्पर्क से बचा और उत्तम ब्राह्मण की हत्या के पाप से भी बचा' ॥४८॥ इस प्रकार कहकर और यशोधर को बैठाकर उसने पूछा-'तुम दोनों कहाँ से आये हो और कहाँ जा रहे हो यह मुझे बताओ' तब यशोधर ने अपना वृत्तान्त बताकर और उसका विश्वास प्राप्त करके कुतूहलवश उससे भी पूछा-॥४९-५०॥ 'हे महापुरुष यदि गुप्त रखने की बात न हो तो यह बताओ कि ऐसे भोग प्राप्त करने पर भी तुम्हें यह वनवास कैसे मिला ? ॥५१॥ यह सुनकर, 'सुनो कहता हूँ' ऐसा कहकर वह पुरुष उससे बोला-'हिमालय के दक्षिण की ओर कश्मीर नाम का देश है जिसे मानो ब्रह्मा ने मनुष्यों के लिए स्वर्ग का कौतूहल दूर करने के हेतु बनाया है ॥५२-५३॥ जहाँ कैलास और श्वेतद्वीप के मुख्य निवास को छोड़कर शिव और विष्णु सैकड़ों स्थानों में स्वयं प्रादुर्भूत होकर निवास करते हैं। जो देश वितस्ता नदी के जल से पवित्र एवं शूर तथा विद्वान् व्यक्तियों से भरा है, जो छल कपट आदि दोषों से अजेय है अर्थात् जहाँ छल कपट का नाम नहीं है और जिसे बलवान् शत्रु भी विजित नहीं कर सकते ॥५४-५५॥ मैं उस कश्मीर में भवशर्मा नाम का सामान्य स्थिति का ग्रामवासी ब्राह्मण-पुत्र था। पूर्वजन्म में मेरी दो पत्नियाँ थीं। मैंने किसी समय भिक्षुओं के साथ सम्पर्क हो जाने के कारण शास्त्र में कहे गये उपोषध नाम के नियम-व्रत को स्वीकार किया ॥५६-५७॥ उस व्रत के प्रायः समाप्त हो जाने पर मेरी सेज पर मेरी पापिनी पत्नी उत्सुक जाकर सो गई ॥५८॥ रात के चौथे प्रहर में अपने व्रत का ध्यान न रहता हुआ नींद के नशे में मैंने उस स्त्री के साथ समागम कर लिया। इस उस व्रत का इतना ही खण्डन हो जाने से मैं झाड़-गुल्म बनकर यहाँ उत्पन्न हो गया। और, वे ही दोनों पत्नियाँ यहाँ भी मेरी पत्नियाँ हुईं ॥५९-६०॥

८९२ कथासरित्सागर

८९२ कथासरित्सागर एका सा कुष्टा पापा द्वितीयेयं पतिव्रता। खण्डितस्यापि तस्येदृक्प्रभावो नियमस्य मे॥६१॥ जातिं स्मरामि यद्यञ्च रात्रौ भोगा ममादृशाः। यदि नाखण्डयिष्यं तदिव स्यां मे न जन्म तत्॥६२॥ इत्याख्याय स्ववृत्तान्तमतिथी तावपूजयत्। समृष्टभोजनैर्दिव्यवस्त्रैश्च भ्रातरावुभौ॥६३॥ ततोऽस्य सा सती भार्या पूर्ववृत्तमवेत्य तत्। विन्यस्य जानुनी भूमाविन्दुं पश्यन्त्यभाषत॥६४॥ भो लोकपालाः सत्यं चेदहं साध्वी पतिव्रता। तदम्बुवाहमुक्तोऽद्य स्वर्गं यात्वेष मे पतिः॥६५॥ इत्युक्तवत्यामवस्थां सा विमानमवातरत्। तदारूढौ च तौ स्वर्गं दम्पती सह जग्मतुः॥६६॥ असाध्यं सत्यसाध्वीनां किमस्ति हि जगत्त्रये। तौ च विप्रौ तदालोक्य विस्मयं ययतुः परम्॥६७॥ नीत्वा च रात्रिमुष ते प्रभाते स यक्षोभटः। लक्ष्मीधरश्च विप्रो तौ भ्रातरौ प्रस्थितौ ततः॥६८॥ सायं च निर्जनारण्ये वृक्षमूलमथापतुः। जलप्रेप्सू च तस्मात्तौ वृक्षाच्छ्रुणुवतुर्गिरम्॥६९॥ हे विप्रौ तिष्ठतं तावदहमाद्य करोमि वाम्। स्नानान्नपानैरातिथ्यं गृहे मे ह्यागतौ युवाम्॥७०॥ इत्युक्त्वा व्यरमद्वाक्यं जज्ञे तत्राम्बुवापिका। अथोपतस्थे तत्तीरे विचित्रं पानभोजनम्॥७१॥ किमेतदिति साश्चर्यौ ततस्तौ द्विजपुत्रकौ। स्नात्वा वाप्यां यथाकाममाहाराद्यत्र चक्रतुः॥७२॥ ततः सन्ध्यामुपास्यन्तौ यावत्तत्तले स्थितौ। तावच्च कोऽपि पुरुषस्तरोस्तस्मादवातरत्॥७३॥ स चाभिवादितस्ताभ्यां विहितस्वागतः क्रमात्। उपविष्टो द्विजातिभ्यां को भवानित्यपृच्छयत॥७४॥ ततः स पुरुषोऽब्रवीत् पुरेह दुर्गतो द्विजः। अभूवन् तस्य न जाता देवान्धभ्रमणसङ्गतिः॥७५॥

दशम लम्बक ८१५

दशम लम्बक ८१५ जिनमें एक बहू पापिन और व्यभिचारिणी थी और दूसरी यह पतिव्रता है। खंडित व्रत का भी इतना प्रभाव है कि मैं पूर्व जन्म का स्मरण भी करता हूँ। यदि मैं अपना व्रत खंडित न करता तो यहाँ मेरा जन्म भी न होता ॥६१-६२॥ इस प्रकार, अपना समाचार कहकर उस पुरुष ने उन दोनों भाइयों को दिव्य भोजन और वस्त्रादि से सम्मानित किया ॥६३॥ तब उस पुरुष की सती पत्नी ने यह समाचार को जानकर, भूमि पर घुटने टेककर और चन्द्रमा की ओर देखकर यह कहा—॥६४॥ 'हे लोकपालो यदि मैं सचमुच पतिव्रता हूँ तो मेरा पति इस जल-वास से मुक्त होकर स्वर्ग को जाय' ॥६५॥ उसके इस प्रकार कहते ही आकाश से विमान उतरा और उस पर चढ़े हुए वे दम्पती (पति-पत्नी) स्वर्ग को चले गये ॥६६॥ सच है सच्ची पतिव्रताओं के लिए तीनों लोकों में असाध्य क्या है ? वे दोनों ब्राह्मण- पुत्र यह दृश्य देखकर अत्यन्त आश्चर्य-चकित हो गये ॥६७॥ शेष रात्रि को व्यतीत कर प्रातःकाल ही वे दोनों ब्राह्मण-पुत्र वहाँ से आगे चल पड़े ॥६८॥ और सायंकाल एक निर्जन वन में जल की इच्छा करते हुए जब वे एक वृक्ष के नीचे खड़े हुए, तब उन्होंने उस वृक्ष से यह वाणी सुनी—॥६९॥ 'हे ब्राह्मणो ठहरो मैं अभी आप दोनों का स्नान और भोजन आदि से आतिथ्य करता हूँ क्योंकि तुम दोनों मेरे घर पर आये हो। ॥७०॥ ऐसा कहकर वह वाणी बन्द हो गई। तदनन्तर, वहीं एक सुन्दर बावली बन गई और उसके किनारे विविध प्रकार की भोजन-पान-सामग्री उपस्थित हो गई। 'यह क्या है' इस प्रकार आश्चर्य-चकित उन दोनों ब्राह्मण-पुत्रों ने वापी में स्नान करके भोजन किया ॥७१-७२॥ तदनंतर, सन्ध्या करके जब वे वृक्ष के नीचे बैठे तभी एक सुन्दर पुरुष उस वृक्ष से उतरा ॥७३॥ उन ब्राह्मणों से प्रणाम किया गया वह पुरुष उनका स्वागत करके स्वयं जब बैठ गया तब उससे उन ब्राह्मण-पुत्रों ने पूछा कि 'तुम कौन हो' ? ॥७४॥ तब वह पुरुष बोला कि मैं पहले जन्म में एक दरिद्र ब्राह्मण था। दैवयोग से कुछ धर्मात्मा (जैन साधुओं) से मेरी संगति हो गई ॥७५॥