कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
तत्र तस्याविरासीच्च कार्तस्वरविमानगा। वरकन्यापरिवृता दिव्यकन्या स्वलङ्कृता॥१६४॥ सा तं मधुरया वाचा बभाषे मस्करिग्रहम्। विद्युन्मालेत्यभिधा यक्षी यक्ष्यश्चापरा इमाः॥१६५॥ तदितो मत्परिवाराद् गृहाणैकां यथारुचि। एतावदेव सिद्धं ते मन्त्रसाधनयानया॥१६६॥ त्वया हि नैव विज्ञातं पूर्णं मन्मन्त्रसाधनम्। अतोऽहं ते न सिद्धैव मान्थ क्लेशं वृथा कृथाः॥१६७॥ एवमुक्तस्तया यक्ष्या परिव्राडनुमान्य सः। यक्षिणीमग्रहीदेकां तस्मात्तत्परिवारात· ॥१६८॥ ततश्च विद्युन्माला सा तिरोभूतां च यक्षिणीम्। आदित्यशर्मा पप्रच्छ सिद्धां प्रव्राजकस्य या॥१६९॥ अप्यस्ति विद्युन्मालातो यक्षिणी काचिदुत्तमा। तन्मुखा यक्षिणी सा तं प्रत्युवाचास्ति सुन्दर॥१७०॥ विद्युन्माला चन्द्रलेखा तृतीया च सुलोचना। उत्तमा यक्षिणीष्वेता एतास्वपि सुलोचना॥१७१॥ इत्युक्त्वा सा यथाकालमागन्तुं यक्षिणी ययौ। आदित्यशर्मणा साकमगात्प्रव्राट् च तद्गृहम्॥१७२॥ तत्र प्रतिदिनं तस्मै प्रीता प्रव्राजकाय सा। प्रायच्छद्यक्षिणी भोगानिष्टान्कालोपगामिनी॥१७३॥ एकदादित्यशर्मा च प्रव्राजकमुखेन ताम्। सुलोचनामन्त्रविधिं को जानातीति पृष्टवान्॥१७४॥ सापि तन्मुख एवास्मन्मक्षिप्येव किलाब्रवीत्। अस्ति तुम्बवनं नाम स्थानं दक्षिणदिङ्मुखे॥१७५॥ तत्रास्ति विष्णुगुप्ताख्यो वणातीरकृतास्पदः। प्रव्राजको भदन्तान्यः स सङ्केत्ति सविस्तरम्॥१७६॥ श्रुत्वैतद्यक्षिणीवाक्यात्तं देशं सोत्सुको ययौ। आदित्यशर्मानुगतः प्रीत्या प्रव्राजकेन सः॥१७७॥ तत्रान्विष्य यथावृत्तं भदन्तमभिगम्य च। परिचर्यापरो भक्त्या त्रीणि वर्षाण्यसेवत॥१७८॥
अष्टम लम्बक ४०९
अष्टम लम्बक ४०९ श्मशान-भूमि में सोने के विमान में बैठी हुई और सुन्दरी कन्याओं से घिरी हुई एक दिव्य कन्या प्रकट हुई ॥१६४॥ वह कन्या मधुर वाणी द्वारा उस संन्यासी से बोली—'हे संन्यासी ! मैं विद्युन्माला नाम की यक्षिणी हूँ और ये भी दूसरी यक्षिणियाँ हैं ॥१६५॥ सो तुम मेरे परिवार में इच्छानुसार एक यक्षिणी को ले लो। तुम्हारी मन्त्र-साधना से इतनी ही सिद्धि हुई है ॥१६६॥ तुमने मेरे मन्त्र की विधि पूर्ण रूप से नहीं जानी। इसलिए, मैं तुम्हें सिद्ध नहीं हो सकी। अब तुम दूसरा कष्ट व्यर्थ न उठाओ' ॥१६७॥ उस यक्षिणी विद्युन्माला द्वारा इस प्रकार कहे गये संन्यासी ने उसकी बात मान ली और उसके परिवार से एक यक्षिणी ले ली ॥१६८॥ तदनन्तर, विद्युन्माला अदृश्य हो गई। तब आदित्यशर्मा ने उस यक्षिणी से जो उस संन्यासी को सिद्ध हुई थी पूछा—॥१६९॥ 'क्या विद्युन्माला से भी बढ़कर और कोई उत्तम यक्षिणी है ? तब वह बोली—'सुन्दर ! उत्तम यक्षिणियों में विद्युन्माला चन्द्रलेखा और सुलोचना तीन हैं। इन तीनों में भी सुलोचना अत्युत्तम है ॥१७०-१७१॥ इस प्रकार कहकर वह यक्षिणी यथासमय आने के लिए चली गई और वह संन्यासी आदित्यशर्मा के साथ उसके घर गया ॥१७२॥ तदनन्तर, प्रतिदिन नियत समय पर आनेवाली वह यक्षिणी प्रसन्न होकर उस परिव्राजक को अभीष्ट भोगों का प्रदान करती थी ॥१७३॥ एक बार आदित्यशर्मा ने परिव्राजक के द्वारा उस यक्षिणी से पूछा कि 'सुलोचना को सिद्ध करने की मन्त्रविधि को कौन जानता है' ॥१७४॥ उस यक्षिणी ने आदित्यशर्मा के सामने ही कहा—'दक्षिण दिशा की भूमि में गुल्मवन नाम का स्थान है। वहाँ पर वेणा नदी के किनारे स्थान बनाकर विद्युन्मुख नाम का मटन्थ (बौद्ध संन्यासी) रहता है। वह उसकी विधि को विस्तारपूर्वक जानता है' ॥१७५-१७६॥ यक्षिणी के मुँह से यह सुनकर उत्सुक आदित्यशर्मा प्रव्राजक के साथ वहाँ गया। वहाँ जाकर, और मटन्थ को ढूँढ़कर वह उसके समीप ही रहने लगा। तत्पश्चात् उसने तीन वर्षों तक भक्ति- पूर्वक उसकी सेवा की ॥१७७-१७८॥ ५२
उपाचरच्च यक्षिण्या परिव्राट्सिद्धया तया। यथोपयोगोपहृतैरुपचारैरमानुषैः ॥१७९॥ ततस्तुष्टो भदन्तोऽसौ तस्माआदित्यशर्मणे। ददौ सुलोचनामन्त्रमभित सविधानकम् ॥१८०॥ ततश्चादित्यशर्मा स मन्त्रं प्राप्य समाप्य च। होमं चकार सम्पूर्णं गत्वैकान्ते यथाविधि ॥१८१॥ ततस्तस्य विमानस्था यक्षिणी सा सुलोचना। प्रादुर्वभूव रूपेण जगदाश्चर्यदायिना ॥१८२॥ जगाद चैतमेहोहि सिद्धाऽहं तव किं पुनः। षण्मासं कन्यकाभावो नापनेयो मम त्वया ॥१८३॥ यदि मत्तो महावीर्यमृद्धिपात्रं सुलक्षणम्। सर्वज्ञकल्पमजितं पुत्रं सम्प्राप्तुमिच्छसि ॥१८४॥ इत्युक्त्वा सा तथेत्येनमुक्तवन्तं च यक्षिणी। आदायादित्यशर्माणं विमानेनालकां ययौ ॥१८५॥ स च तत्र समीपस्थां तांन्नपश्यन्नास्त सर्वदा। आदित्यशर्मा षण्मासानसिधाराव्रतं चरन् ॥१८६॥ ततस्तुष्टो धनाध्यक्षो दिव्येन विधिना स्वयम्। आदित्यशर्मणे तस्मै व्यतरत्तां सुलोचनाम् ॥१८७॥ तस्यां तस्य द्विजस्यात्र जातोऽयमहमात्मजः। पित्रा च मे कृतं नाम गुणशर्मेति सद्गुणात् ॥१८८॥ ततस्तत्रैव यक्षाधिपतेर्मणिधराभिधात्। क्रमाद्वेदाश्च विद्याश्च कलाश्चाधिगता मया ॥१८९॥ अथैकदा किमप्यागाच्छक्रोऽत्र धनवान्तिकम्। उत्तस्थुश्च तं दृष्ट्वा ये तत्रासत केचन ॥१९०॥ मत्पितादित्यशर्मा तु तत्कालं विधियोगतः। अन्यत्र गतचित्तत्वान्नोदतिष्ठत्ससम्भ्रमः ॥१९१॥ ततस्तमशपत्क्रुद्धः स शक्रो द्विजड प्रज। स्वमेव मर्त्यलोकं त गेहुं योग्यो भवानिति ॥१९२॥ प्रणिपत्यानुनीतोऽथ स सुलोचनया तया। शक्रोऽब्रवीत्तर्हि मा गान्मर्त्यलोकमयं स्वयम् ॥१९३॥
सप्तम लम्बक ४११
सप्तम लम्बक ४११ उस समय पहले संन्यासी की सिद्ध की गई यक्षिणी ही दिव्य उपचारों से उसकी सेवा करती रही ॥१७९॥ तब सेवा से सन्तुष्ट महन्त ने आदित्यशर्मा को सुलोचना की सिद्धि का मन्त्र और उसका विधान बता दिया ॥१८०॥ आदित्यशर्मा ने भी मंत्र प्राप्त करके और उसका नियमित जप समाप्त करके एकान्त में जाकर विधिपूर्वक हवन किया ॥१८१॥ तदनन्तर, जगत् के लिए आश्चर्यजनक रूपवाली सुलोचना यक्षिणी विमान पर बैठकर उसके सामने प्रकट हुई ॥१८२॥ और उससे बोली-'आओ आओ। मैं तुम्हें सिद्ध हो गई हूँ किन्तु छह महीनों तक तू मेरा कन्याभाव नष्ट न करना ॥१८३॥ यदि तुम मुझसे महावीर, सम्पत्तिशाली सुन्दर कंचनमाला सर्वज्ञ और अजेय पुत्र प्राप्त करना चाहते हो' ॥१८४॥ 'ऐसा ही करूँगा'—कहते हुए उस आदित्यशर्मा को वह यक्षिणी विमान द्वारा अलका नगरी को ले गई ॥१८५॥ तदनन्तर, वह आदित्यशर्मा छह महीनों तक पास में बैठी हुई उसको देखते हुए नियमा- नुसार असिधारा-व्रत करता रहा ॥१८६॥ उसके ब्रह्मचर्य-व्रत से सन्तुष्ट होकर कुबेर ने विधिपूर्वक वह सुलोचना यक्षिणी आदित्यशर्मा को दान कर दी ॥१८७॥ तब उसी सुलोचना यक्षिणी के गर्भ में उस ब्राह्मण द्वारा मैं उत्पन्न हुआ और मेरे पिता ने मेरे सद्गुणों के कारण मेरा नाम गुणशर्मा रख दिया ॥१८८॥ तब बड़ा होकर मैंने अलका नगरी में ही यक्षों के सरदार मनिभद्र से समग्र वेदों, अन्यान्य विद्याओं और कलाओं का अध्ययन किया ॥१८९॥ एकबार किसी कार्य के लिए इन्द्र कुबेर के पास आया। उसे देखकर जो भी बैठे थे उठ खड़े हुए ॥१९०॥ किन्तु वहाँ बैठे हुए मेरे पिता आदित्यशर्मा अन्यमनस्कता के कारण कुछ सोचते रह गये वे सम्मान के समय उठे नहीं ॥१९१॥ इस कारण क्रोध करके इन्द्र ने कहा—'रे जड़ तू अपने मर्त्यलोक में ही जा। तू यहाँ रहने योग्य नहीं है' ॥१९२॥ तब माता सुलोचना की करुण प्रार्थना करने पर इन्द्र ने कहा-यदि ऐसा है, तो यह न जाये इसका पुत्र ही जाय—॥१९३॥
४१२ कथासरित्सागर
४१२ कथासरित्सागर एतत्पुत्रस्तु यात्वेष पुत्रो भार्यैव बध्यते। मा भूद्भवचनं मोघमित्युक्त्वेन्द्रः शमं ययौ॥१९४॥ अतः पित्राहमानीय निजमातुलवेश्मनि। उज्जयिन्यां विनिक्षिप्तो भवितव्यं हि यस्य यत् ॥१९५॥ तत्राजायत सख्यं मे राजाश्रत्येन दैवतः। ततोऽत्र मम यद्वृत्तं तत्सर्वं शृणु वच्मि ते ॥१९६॥ इत्युक्त्वामूर्त्ववृत्तान्तं यदशोकवतीप्रसम् । यच्च राज्ञा कृतं तस्य मुदान्तं तदवर्णयत् ॥१९७॥ पुनश्चोवाच स ब्रह्मन्नित्थमस्मि पलायितः। देशान्तरं व्रजन्मार्गे भवन्तमिह दृष्टवान् ॥१९८॥ श्रुत्वैतद्ब्राह्मणस्तं स गुणशर्माणमभ्यधात्। तर्हि धन्योऽस्मि संवृत्तस्त्वदभ्यागमनात्प्रभो ॥१९९॥ तदेहि मे गृहं तावदग्निदत्तं च विद्धि माम्। नाम्ना मवप्रहारश्च ग्रामोऽयं निर्वृतो भव ॥२००॥ इत्युक्त्वा सोऽग्निदसस्तं गृहं प्रावेशयद्द्विजम्। ऋद्धिमद्गुणशर्माणं बहुगोमहिषीहयम् ॥२०१॥ तत्र स्नानाङ्गरागाभ्यां वस्त्रैराभरणैश्च तम्। अतिथिं मानयामास भोजनैर्विविधैश्च सः ॥२०२॥ अदर्शयच्च तस्मै स्वां काम्यरूपां सुरैरपि। लक्षणावेक्षणमिपात्सुन्दरीं नाम कन्यकाम् ॥२०३॥ गुणशर्मापि सोऽन्यत्समरूपां विलोक्य ताम्। सपत्न्योऽस्या भविष्यन्तीत्यन्निदत्तमुवाष तम् ॥२०४॥ नासायां तिलकोऽस्त्यस्यास्तत्सम्बन्धो भविष्यहम्। उरस्यस्ति द्वितीयोऽपि तयोश्चैतत्फलं विदुः ॥२०५॥ एवं तेनोक्ति सम्प्रा भ्रात्रा पितुरनुज्ञया। उद्घाटयत्युरो यावत्तावत्तिलकमदक्षत ॥२०६॥ ततोऽग्निदत्तः साश्चर्यो गुणशर्माणमभ्यधात्। सर्वज्ञस्त्वमिमो स्वस्यास्तिसको नानुमप्रभो ॥२०७॥ गपरम्यो हि भवन्तीह प्रायः धीमति भर्तरि। दरिद्रो विमुयादेशमपि कष्टं शुना यह ॥२०८॥
अष्टम लम्बक ४१५
अष्टम लम्बक ४१५ क्योंकि, पुत्र आत्मा ही होता है। मेरा वचन व्यर्थ न जाय। इतना कहकर इन्द्र शान्त होगया ॥१९४॥ तब पिता ने मुझे उज्जयिनी में लाकर मामा के घर रख दिया जिसका जैसा भवितव्य है वैसा होता ही है॥१९५॥ उज्जयिनी में रहते हुए दैवयोग से वहाँ के राजा के साथ मेरी मित्रता हो गई। गुणशर्मा ने इस प्रकार अपना मूल समाचार कहकर रानी अशोकावती और राजा द्वारा किये गये युद्ध पर्यन्त की कथा उस ब्राह्मण से कह दी ॥१९६-१९७॥ और फिर बोला—'हे ब्राह्मण देवता इस प्रकार मैंने उज्जयिनी से भागते हुए मार्ग में आपके दर्शन किये' ॥१९८॥ यह सुनकर वह ब्राह्मण गुणशर्मा से बोला—'हे प्रभो यदि ऐसा है, तो तुम्हारे आगमन से मैं धन्य हो गया ! ॥१९९॥ आप मेरे घर पधारें। मेरा नाम अग्निदत्त है। यह गाँव भी मेरे ही नाम से है। अब आप निश्चिन्त हो जायें' ॥२००॥ इतना कहकर अग्निदत्त धन-धान्य गौ-भैंस और घोड़ों आदि से भरे हुए अपने घर में गुणशर्मा को ले गया ॥२०१॥ वहाँ ले जाकर उसने उबटन मालिश स्नान तथा सुन्दर वस्त्राभरणों एवं इत्र से गुणशर्मा का स्नेह-पूर्ण सम्मान किया और विविध प्रकार के भोजन कराये ॥२०२॥ तदनन्तर, लगन दिखाने के बहाने उसने देवताओं से भी चाही जानेवाली अपनी सुन्दरी कन्या उसको दिखा दी ॥२०३॥ अनुपम सुन्दरी उस कन्या के लक्षणों को देखकर गुणशर्मा ने कहा—'इसकी बहुत-सी सपत्नियां (सौतें) होंगी ॥२०४॥ इसकी नाक पर तिल है, इस कारण मैं ऐसा कह रहा हूँ और इसकी छाती में भी तिल है। यह फल उसी का है' ॥२०५॥ गुणशर्मा के ऐसा कहने पर उसके भाई ने पिता की आज्ञा से उसकी छाती खोलकर देखी, तो वहाँ तिल दिखाई दिया ॥२०६॥ तब पण्डित अग्निदत्त ने गुणशर्मा से कहा—'तुम सचमुच सर्वज्ञ हो किन्तु इसके ये दोनो तिल अशुभ फल देनेवाले नहीं हैं ॥२०७॥ पति के धनवान् होने पर ही सौतें होती हैं। दरिद्र तो एक स्त्री का भरण-पोषण भी कष्ट से करता है। बहुत-सी स्त्रियों की तो बात ही क्या' ॥२०८॥
४१४ कथासरित्सागर
४१४ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा गुणशर्मा तं प्रत्युवाच यथातथ भो । सुलक्षणाय ईदृश्या ह्याकुबेरशुभं कुतः ॥२०९॥ इत्यूचिवानप्रसङ्गेन पृष्टस्तस्मै शशंस सः । प्रत्यङ्गं तिलकादीनां फलं स्त्रीपुंसयोः पृथक् ॥२१०॥ यदा च गुणशर्माणं तं सा दृष्ट्वैव सुन्दरी । इत्येष पातु दृष्ट्यैव चकोरीवेन्दुमुत्सुका ॥२११॥ ततोऽग्निदत्तो विजने गुणशर्माणमाह तम् । महाभाग वदाम्येतां कल्यां ते सुन्दरीमहम् ॥२१२॥ मा गा विदेशं तिष्ठेह गृहे मम यथासुखम् । एतत्तद्वचनं श्रुत्वा गुणशर्माप्युवाच तम् ॥२१३॥ सत्यमेवं कृते किं किं न सौख्यं मम किं तु माम् । मिथ्याराजावमानाग्नितप्तं प्रीणाति नैव तत् ॥२१४॥ कान्ता चन्द्रोदयो वीणा पञ्चमध्वनिरित्यमी । ये मन्दयन्ति सुखितांस्तुषितान्यधयन्ति ते ॥२१५॥ जाया च स्वरसा रक्ता भवेदव्यभिचारिणी । अवशा पितृवत्ता तु स्यादशोकवती यथा ॥२१६॥ इतः प्रवेशानिकटा सा किं चोज्जयिनी पुरी । तद्वृद्धया स नृपो जातु मम कुर्यादुपद्रवम् ॥२१७॥ तत्परिभ्रम्य तीर्थानि प्रक्षाल्याजमकल्बिषम् ॥ शारीरमेतन्त्यक्ष्यामि भविष्याम्यथ निर्वृतः ॥२१८॥ इत्युक्तवन्तं प्रत्याह सोऽग्निदत्तो विहस्य तम् । तवापि मोहो यत्रेवृत्तत्रान्यस्य किमुच्यताम् ॥२१९॥ अज्ञावमानाद्दानिः का वद शुद्धाशयस्य ते । पङ्को हि नभसि क्षिप्तः क्षप्तुः पतति मूर्धनि ॥२२०॥ राजैव सोऽचिरात्प्राप्स्यत्यविशेषज्ञताफलम् । मोहान्धमविवेकं हि धीदिपराय न छेदते ॥२२१॥ किं चाशोकवतीं दृष्ट्वा वैरस्यं स्त्रीषु यत्तव । सतीं दृष्ट्वा न किं तासु श्रद्धां बध्नासि च रुदाणम् ॥२२२॥ निकटोञ्जयिनी वा चेत्तन्न दास्याम्यहं तथा । यथा त्वामिह तिष्ठन्तं नैव ज्ञास्यति कश्चन ॥२२३॥
अष्टम लम्बक ४१५
अष्टम लम्बक ४१५ यह सुनकर गुणशर्मा ने कहा—'ठीक है, ऐसी सुन्दर लक्षणोंवाली कन्या का वधुत्व ही क्यों होगा ? ॥२१०॥ इसी प्रसंग में अग्निदत्त के पूछने पर गुणशर्मा ने स्त्रियों और पुरुषों के भिन्न-भिन्न अंगों पर होनेवाले तिल आदि चिह्नों का पृथक्-पृथक् फल उसे बताया ॥२११॥ इधर वह सुन्दरी कन्या गुणशर्मा को देखकर चन्द्रमा को चकोरी जैसी आँखों से पी जाना चाहती थी ॥२१२॥ तब अग्निदत्त ने एकान्त में गुणशर्मा से कहा—'हे भाग्यशालिन्, मैं इस सुन्दरी नाम की कन्या को तुझे देता हूँ ॥२१३॥ विदेश न जाओ और यहीं मेरे घर में अपनी स्वतन्त्रता से रहो। उसकी यह बात सुनकर गुणशर्मा बोला—'सच है, ऐसा करने पर मुझे कौन-सा सुख प्राप्त नहीं हो सकता किन्तु राजा द्वारा किये गये झूठे अपमान की आग से जले हुए मुझे यह सब अच्छा नहीं लग रहा है॥२१४-२१५॥ सुन्दरी स्त्री चन्द्रमा का उदय (चाँदनी) और वीणा की पंचम ध्वनि ये सब सुखी जनों को आनन्द देते हैं॥२१५॥ स्वयं (अपने से) आसक्त और अनुरागिणी स्त्री व्यभिचारिणी नहीं होती जैसे अशोक- वती ॥२१६॥ और भी बात है कि उज्जयिनी नगरी यहाँ से समीप है। इसलिए, मुझे यहाँ जानकर वह (राजा) किसी समय भी उपद्रव कर सकता है ॥२१७॥ अतः तीर्थों का भ्रमण करके और अपने पापों का प्रक्षालन कर इस शरीर को छोड़ूँगा तब सुखी हूँगा ॥२१८॥ यह सुनकर अग्निदत्त हँसकर बोला—'शुद्ध हृदयवाले तुम्हारे, एक मूर्ख के द्वारा अपमानित होने में क्या हानि है ? आकाश में फेंका हुआ कीचड़ फेंकनेवाले के सिर पर ही गिरता है। वह राजा शीघ्र ही अपनी मूर्खता का फल पायेगा। मोह से अन्धे और विवेक से विहीन व्यक्ति के पास लक्ष्मी अधिक दिन नहीं रहती ॥२१९-२२१॥ यदि तुम दुष्टा अशोकवती को देखकर स्त्रियों से विरक्त हो गये हो तो सती स्त्री को देखकर श्रद्धा भी उन पर क्यों नहीं करते ? तुम तो सती और असती के लक्षणों को जानते हो ॥२२२॥ उज्जयिनी यदि समीप है, तो तुम्हारा ऐसा प्रबन्ध करूँगा कि तुम्हें यहाँ रहते कोई जान न सकेगा ॥२२३॥
४१९ कथासरित्सागर
४१९ कथासरित्सागर तीर्थयात्रा सवष्टावा सञ्छस्ता तस्य सा बुधैः। सम्पत्तिविधिभङ्गः स्याद्वैदिके यस्य कर्मणि॥२२४॥ अन्यथा देवपित्रग्निप्रियाव्रतजपादिभिः। गृहे या पुण्यनिष्पत्तिः साध्वनि भ्रमतः कुतः॥२२५॥ भुजोपधाना भूशायी भिक्षाशी केवलोऽशनः। मुनेः समत्वं प्राप्यापि न क्लेशैर्मुच्यतेऽध्वगः॥२२६॥ देहत्यागात्सुखं यद्वा वाञ्छस्येष तव भ्रमः। इतः कष्टतरं दुःखममुत्र ह्यात्मघातिनाम्॥२२७॥ तदेषोऽनुचितो मोहो यूनश्च विदुषश्च ते। स्वयं विचारयावश्यं कर्तव्यं मद्वचस्तव॥२२८॥ कारयामीह गुप्तं ते भूगृहं पृथु सुन्दरम्। विवाह्य सुन्दरीं तत्र तिष्ठाज्ञातो यथेच्छसि॥२२९॥ इति तेनाग्निवत्तेन बोधितः स प्रयत्नतः। गुणशर्मा सभ्येत्येतत्प्रतिपद्य जगाद तम्॥२३०॥ कृतं मया ते वचनं को भार्या सुन्दरीं त्यजेत्। किं त्वेतामकृती नाहं परिणेष्यामि ते सुताम्॥२३१॥ आराधयाम्यहं तावद्देवं कञ्चित्सुसंयतः। येन तस्य कृतघ्नस्य राज्ञः कुर्यां प्रतिक्रियाम्॥२३२॥ इति तद्वचनं हृष्टः सोऽग्निवत्तोऽन्वमन्यत। सोऽपि तां गुणशर्माणि विशश्राम सुखं निशाम्॥२३३॥ अन्येद्युश्चाग्निवत्तोऽस्य सौख्यार्थं तत्र गुप्तिमत्। पातालवसतिप्रख्यं कारयामास भूगृहम्॥२३४॥ तत्रस्थश्चाग्निवत्तं स गुणशर्माब्रवीद्ग्रहः। इहान्तर्ब्रूहि कं देवं केन मन्त्रेण भक्तितः॥२३५॥ आराधयाम्यहं तावद्वरदं व्रतचर्यया। इत्युक्तवन्तं तं धीरमग्निवत्तोऽभ्यभाषत॥२३६॥ अस्ति स्वामिकुमारस्य मन्त्रो मे गुरुचोदितः। तेनाराधय तं देवं सेनान्यं तारकान्तकम्॥२३७॥ यस्य जन्माग्निभिर्देवैः प्रथितं शत्रुपीड़ितैः। दग्धोऽपि कामः सङ्कल्पजन्मा स्वर्गेण निर्मितः॥२३८॥
षष्ठम लम्बक ४१७
षष्ठम लम्बक ४१७ तीर्थ-यात्रा तुम्हें अभीष्ट है, किन्तु विद्वानों के कथनानुसार तीर्थ-यात्रा उसके लिए उचित है, जिसके पास वैदिक कर्म करने के लिए प्रचुर सम्पत्ति नहीं है ॥२२४॥ अन्यथा देवता, पितर, अग्नि की सेवा, व्रत एवं जप आदि से घर बैठे जो पुण्य की प्राप्ति हो सकती है, वह मार्ग में भटकनेवाले तीर्थयात्रियों को नहीं ॥२२५॥ भुजाओं की तकिया लगाये भूमि पर सोनेवाला, भिक्षाओं से भोजन प्राप्त करनेवाला, अकेला और दीन यात्री मुनियों की समता पाकर भी कष्टों से छुटकारा नहीं पाता ॥२२६॥ देह-त्याग से तुम जो सुख चाहते हो, वह तुम्हारी भूल है। आत्मघाती को परलोक में भी अत्यधिक कष्ट उठाने पड़ते हैं ॥२२७॥ अतः युवा और विद्वान् तुम्हारा यह निरा मोह है। स्वयं सोचो और मेरी बात मानो ॥२२८॥ मैं तुम्हारे लिए विशाल विस्तृत भू-गृह बनवा देता हूँ। तुम सुन्दरी से विवाह करके वहाँ अज्ञात रूप से रहो, जैसा तुम चाहते हो ॥२२९॥ अग्निदत्त द्वारा इस प्रकार समझाये गये गुणशर्मा ने उसकी बात मान ली और उससे कहा कि मैंने तुम्हारी बात मान ली। सुन्दरी जैसी पत्नी को कौन छोड़ सकता है। किन्तु असफल अवस्था में मैं तुम्हारी कन्या से विवाह न करूँगा। तबतक संयत स्थिति में रहकर किसी देवता की आराधना करता हूँ। जिससे उस कृतघ्न राजा से बदला ले सकूँ ॥२३०-२३२॥ प्रसन्न चित्त अग्निदत्त ने उसकी बात मान ली और गुणशर्मा ने भी उसके घर में रात्रि को सुखपूर्वक विश्राम किया ॥२३३॥ दूसरे ही दिन अग्निदत्त ने गुणशर्मा की सुविधा के लिए रक्षायुक्त और आवश्यकताओं से परिपूर्ण 'पाताल-वसति' नामक भू-गृह बनवाया ॥२३४॥ उस गृह में रहते हुए एक बार गुणशर्मा ने अग्निदत्त से एकान्त में कहा- यह बताइए कि मैं यहाँ रहकर किस देवता की भक्ति और व्रत विधानानुसार आराधना करूँ? ऐसा कहते हुए धैर्यशाली गुणशर्मा से अग्निदत्त ने कहा-'मैं गुरु द्वारा दीक्षा में प्राप्त स्वामी कार्तिक का मन्त्र जानता हूँ। उस मन्त्र से तुम तारक (तारकासुर)-निहन्ता देवसेनापति (कार्तिकेय) की आराधना करो ॥२३५-२३७॥ जिन कार्तिकेय के जन्म को चाहनेवाले असुरों से पीड़ित देवताओं द्वारा भेजे गये कामदेव को शिव ने दग्ध करके भी सफलप्रयत्न बना दिया ॥२३८॥ ५३
१८ कथासरित्सागरं
१८ कथासरित्सागरं महेश्वरादग्निकुण्डाद्वने शरवणादपि। कृत्तिकाभ्यश्च शंसन्ति विचित्रं यस्य सम्भवम्॥२३९॥ जातेनैव जगत्कृत्स्नं क्षुब्धधैर्येण तेजसा। आनम्य येन निहतो दुर्जयस्तारकासुरः॥२४०॥ तन्मन्त्रमिममावृत्स्व मत्त इत्यभिधाय सः। अग्निवस्तो ददौ तस्मै मन्त्रं तं गुणशर्मणे॥२४१॥ सेनाराधितवांस्कन्दं गुणशर्मा स भूगृहे। तयोपचर्यमाणः सन्सुन्दर्या नियतव्रतः॥२४२॥ ततः प्रत्यक्षतामेत्य साक्षादेव स षण्मुखः। तुष्टोऽस्मि ते वरं पुत्र वृणीष्वेति तमादिशत्॥२४३॥ २४४॥ अक्षीणकोशो भूत्वा च महासेनं विजित्य च। गत्वाप्रतिहतः पुत्र पृथ्वीराज्यं करिष्यसि॥२४५॥ इति दत्त्वाधिकं तस्मै वरं स्कन्दस्तिरोदधे। सम्प्राप्ताक्षयकोषश्च गुणशर्मापि सोऽभवत्॥२४६॥ पृष्ट्वा सद्यः स्वमहिमोचितयाग्निवत्त— विप्रात्मजामनुविनाधिकबद्धभावाम् ॥ मान्मथसिद्धिमिव रूपवतीमुपेतां। तां सुन्दरीं स सुकृती विधिनोपयेमे॥२४७॥ अक्षीणकोशनिचयप्रभवप्रभावात् । सम्भूतभूरिगजबजिपदातिसैन्यः । दानप्रसादमिलिताखिलपार्थिवानां । रुन्धन्बलेरवनिमुज्जयिनीं जगाम॥२४८॥ प्रख्याप्य तस्यां तदशोकवत्याः प्रजास्वशीलं समरे च भूपम्। जित्वा महासेनमपास्य राज्यात्पृथ्वीपतित्वं स समाससाद॥२४९॥ अन्याश्च कन्याः परिणीय राज्ञामन्यैस्तटेष्वप्याप्तगजाश्वमुख्यैः। इष्टान्स भोगान्गुणशर्मसम्राट् चिराय मुद्वस्त स्म ससुन्दरीकः॥२५०॥
अष्टम लम्बक ४१९
अष्टम लम्बक ४१९ महेश्वर से अग्निकुंड से अग्नि से शर के वन से और कृत्तिकाओं से जिस स्वामी कार्तिकेय का विचित्र जन्म हुआ है, जिसने उत्पन्न होते ही अपने प्रचंड तेज से समस्त संसार को आनन्दित करके दुर्जय तारकासुर को मारा उस कार्तिकेय का मन्त्र मुझसे लो। इस प्रकार कहकर अग्निदत्त ने पुण्यशर्मा को मन्त्र-दीक्षा दी ॥२३९–२४१॥ उस पुण्यशर्मा ने सुन्दरी से सेवित होकर नियमित रूप से उस भू-गृह में उस मन्त्र द्वारा स्वामी कार्तिकेय की आराधना की ॥२४२॥ कुछ दिनों के उपरान्त भगवान् षडानन ने प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष होते हुए आज्ञा दी—'बेटा तुम पर मैं प्रसन्न हूँ वर माँगो' ॥२४३॥ २४४वां श्लोक त्रुटित है। पुण्यशर्मा द्वारा अभीष्ट वर माँगने पर षडानन ने कहा—'पुत्र ! तू अनन्त धन का स्वामी होकर और महासेन को जीतकर निष्कंटक पृथ्वी का राज्य करेगा' ॥२४५॥ इस प्रकार, माँग से भी अधिक वर प्रदान कर स्वामी कार्तिकेय अन्तर्हित हो गये और तदनन्तर पुण्यशर्मा को भी अक्षय धन की प्राप्ति हुई ॥२४६। अनुष्ठान की सिद्धि होने पर पुण्यशर्मा ने अपने महत्त्व और प्रभाव के अनुकूल समझकर चिरकालीन सेवा-सहवास से आसक्त अग्निदत्त की रूपवती कन्या सुन्दरी का मानो साक्षात् भावी कार्यसिद्धि के समान विधिपूर्वक पाणिग्रहण कर लिया ॥२४७॥ अक्षय धन-कोष की प्राप्ति के प्रभाव से प्रचुर हाथी घोड़े और पदातियों की सेना से युक्त पुण्यशर्मा ने शस्त्र के प्रभाव से मिलाए हुए दूसरे राजाओं की सेनाओं से भी उज्जयिनी नगरी को घेरते हुए उस पर आक्रमण कर दिया ॥२४८॥ उसने उज्जयिनी में जाकर रानी अशोकवती के दुराचार की घोषणा करके और युद्ध में राजा महासेन को जीतकर राज्य का अधिकार प्राप्त किया ॥२४९॥ राज्य प्राप्त कर और अन्य राजाओं की कन्याओं से विवाह करके समुद्र के तट तक राज्य का विस्तार करके सम्राट् पुण्यशर्मा उस सुन्दरी के साथ चिरकाल तक सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने लगा ॥२५ ॥
४२० कथासरित्सागर
४२० कथासरित्सागर इति पुष्यनिधोपाख्यानतो मूढबुद्धिः। सपदि विपदमाप प्राङ्महासेनभूपः। इति च स गुणशर्मा धैर्यमेकं सहायं। कृतमतिरवगम्य प्राप्तवानृद्धिमग्र्याम् ॥२५१॥ एव कथां स्वसचिवस्य मुखादुदारां। सूर्यप्रभो निशि निशम्य स वीतभीतेः। वीरो महासमरसागरमुत्तितीर्षु- रुत्साहमभ्यधिकमाप शनैश्च निद्रये ॥२५२॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके षष्ठस्तरङ्गः।
सप्तमस्तरङ्गः सूर्यप्रभचरितम्: अन्तिमं युद्धम् ततः सूर्यप्रभः प्रातरुत्थाय सचिवैः सह। दानवादिवलैः सर्वैर्युतो युद्धभुवं ययौ ॥१॥ आययो श्रुतशर्मा च विद्याधरबलैर्वृतः। आजग्मुश्च पुनर्द्रष्टुं सर्वे देवासुरादयः ॥२॥ सैन्ये द्वे अपि ते व्यूहावर्धचन्द्रौ च चक्रतुः। प्रावर्त्तत ततो युद्धं बलयोरुभयोस्तयोः ॥३॥ ससाध्वसमभिधावन्तो निकृन्तन्तः परस्परम्। पत्रास्ता प्रजविनो युध्यन्ते स्म शरा अपि ॥४॥ कोशानानप्रनिर्यताः सुदीर्घाः पीतशोणिताः। लोलाः खड्गलसा रेजुः कृतान्तरसना इव ॥५॥ शूरोत्कृष्टक्रमाम्भोजसम्पतच्चञ्चत्खड्गहतिः । राजहंसक्षयायासीत्तदाहवमहासुरः ॥६॥ उत्प्लद्भिः पतद्भिश्च निर्लूनैः शूरमूर्धभिः। कृतान्तकन्दुकक्रीडासभिमा समिवाबभौ ॥७॥ क्षतजासेकनिर्धूतधूलिध्मान्ते रणाजिरे। महारथानामभवद्वन्द्वायुद्धान्यमर्षिणाम् ॥८॥
अष्टम लम्बक ४२१
अष्टम लम्बक ४२१ इस प्रकार पुण्डरीकाक्ष के अज्ञान से मूर्खबुद्धि महासेन ने विरक्ति प्राप्त की और गुणशर्मा ने धैर्य धारण कर पूर्ण शक्रता और सर्वोत्कृष्ट राज्यलक्ष्मी प्राप्त की ॥२५१॥ अपने मन्त्री शास्त्रान्वित इस प्रकार की उदार कथा को सुनकर समर-रूपी महासागर को पार करने की इच्छा से सूर्यप्रभ ने अधिक उत्साह प्राप्त किया और धीरे धीरे सो गया ॥२५२॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का षष्ठ तरङ्ग समाप्त सप्तम तरङ्ग सूर्यप्रभ का वृतान्त अन्तिम युद्ध रात बीतने पर प्रातःकाल मदिरा के साथ शय्या से उठकर सूर्यप्रभ अपनी दानव और मानव-सेना को लेकर रणभूमि में गया ॥१॥ उधर विद्याधरों की सेनासहित श्रुतशर्मा भी युद्ध के मैदान में आकर डट गया और देवता असुर आदि भी प्रतिज्ञा के समान आकाश में युद्ध का दृश्य देखने के लिए आ गये ॥२॥ उस दिन दोनों ओर की सेनाओं में अर्धचन्द्र व्यूह बनाये गये और उसके पश्चात् दोनों सेनाओं में सङ्ग्राम आरम्भ हुआ ॥३॥ अस्त्रशस्त्रों के साथ दोनों ओर से दौड़ते हुए वीर आपस में एक दूसरे को काटते हुए और रक्ताक्त हुए हाथी भी दोनों आपस में टकरा-टकराकर युद्ध करने लगे ॥४॥ बाणों की धूलि में छिपी लक्ष्मी और खून की प्याली भरकर चलती हुई तलवारें मानो यम की प्रीक्षा के समान रणभूमि में लहलहा रही थीं ॥५॥ शस्त्रसञ्चालन से गिरे हुए हाथ-कङ्कालों पर गिरते हुए यक्ष-राक्षसों ... के सिरों को काट रहे थे ॥६॥ युद्ध के अन्ध और विकराल वातावरण के समय वीरों के पैर कटकर गिरते ... ... रही थी ॥७॥ उस समय दोनों ओर के ... ... ॥८-९-१०-११-१२-१३...॥ १. एक प्रकार का सैन्यव्यूह। २. युद्ध का फैसला।
आसीत्सूर्यप्रभस्यात्र संग्रामः श्रुतशर्मणा। दामोदरेण च समं प्रभासस्याहवोऽभवत् ॥१९॥ महोत्पातेन सार्कं च सिद्धार्थो युयुधे सदा। प्रहस्तो ब्रह्मगुप्तेन सङ्क्रमेन च बीतभीः ॥२०॥ प्रज्ञाढ्यश्चन्द्रगुप्तेनाप्यक्रमेण प्रियङ्करः। युयुधे सर्वदमनः सहैवातिबलेन च ॥२१॥ धुरन्धरेण युयुधे स कुञ्जरकुमारकः। अन्ये महारथाश्चान्यैरयुध्यन्त पृथक्पृथक् ॥२२॥ तत्र पूर्वं महोत्पातः प्रतिहत्य शरैः शरान्। सिद्धार्थस्य धनुश्छित्त्वा जघानाश्वांससारथीन् ॥२३॥ विरथः सोऽपि सिद्धार्थो धावित्वा तस्य तं रुषा। अयोदण्डेन महता साश्वं रथमचूर्णयत् ॥२४॥ ततस्तं पादचारी स सिद्धार्थं पादचारिणम्। बाहुयुद्धेन धरण्यां महोत्पातम्पातयत् ॥२५॥ यावच्चेच्छति निष्पेष्टुं स तं तावत्स खेचरः। भगेन रक्षितः पित्रा प्रोत्थाय प्रययौ रणात् ॥२६॥ प्रहस्तब्रह्मगुप्तौ चाप्यन्योन्यं विरथीकृतौ। करणैः खड्गयुद्धेन युध्यते स्म पृथग्विधैः ॥२७॥ प्रहस्तश्छासिनिर्मूनचर्माणं करणक्रमात्। युक्त्या तं पातयामास ब्रह्मगुप्तं भुवस्तले ॥२८॥ पतितस्य शिरस्तस्य स यावच्छेत्तुमिच्छति। तावन्निवारितो दूरात्पित्रास्य ब्रह्मणा स्वयम् ॥२९॥ सुता रक्षितुमायाता यूयं न प्रेक्षितुं रणम्। इत्युक्त्वा दानवाः सर्वे देवान्निजघ्नुस्तदा ॥३०॥ तावद्वीतभयश्छिन्नधन्वानं हतसारथिम्। जघान हृदये विद्ध्वा प्रद्युम्नास्त्रेण संङ्क्रमम् ॥३१॥ प्रज्ञाढ्यश्चन्द्रगुप्तं च पदातिं रथवांस्तयात्। पदातिं खड्गयुद्धेन न्यवधीत्कृतमस्तकम् ॥३२॥ ततः पुष्णवशत्रुश्च स्वममात्यं धनञ्जयम्। प्रज्ञाढ्ये योजयामास युद्धं चासीत्तयो क्षमम् ॥३३॥
अष्टम लम्बक ४२३
अष्टम लम्बक ४२३ सूर्यप्रभ का श्रुतधर्मा के साथ और प्रभास का दामोदर के साथ द्वन्द्व-युद्ध प्रारम्भ हुआ। इसी प्रकार, महोत्पात के साथ सिद्धार्थ का, ब्रह्मगुप्त के साथ प्रहस्त का और संगम के साथ वीतमति का, चन्द्रगुप्त के साथ प्रहास्य का, अक्रम के साथ प्रियंकर का और अतिबल के साथ सर्वदमन का द्वन्द्व-युद्ध होने लगा ॥९-११॥ इसी प्रकार, सुरेश्वर के साथ कुंजरकुमार भिड़ गया और अन्यान्य महारथियों के साथ अन्यान्य महारथी भिड़ गये ॥१२॥ उनमें पहले महोत्पात ने बाणों से सिद्धार्थ के बाणों को और धनुष को काटकर उसके सारथी और घोड़ों को भी मार डाला ॥१३॥ रथहीन और क्रुद्ध सिद्धार्थ ने भी रथ से कूदकर और दौड़कर लोहे के डंडे से महोत्पात के रथ को भी चूर चूर कर डाला ॥१४॥ तब सिद्धार्थ ने महोत्पात के साथ बाहुयुद्ध करके उसे पटक दिया और जब पटककर उसे मार डालना चाहा तब उसके पिता यम देवता ने उसकी रक्षा की और वह रणभूमि से उठकर भाग गया ॥१५-१६॥ प्रहस्त और ब्रह्मगुप्त परस्पर रथहीन होकर पृथक् पृथक् पैंतरेबाजी के साथ तलवारों से लड़ रहे थे। प्रहस्त ने तलवार से उसकी ढाल को काटकर पैंतरेबाजी के क्रम से ब्रह्मगुप्त को पृथ्वी पर गिरा दिया ॥१७-१८॥ जब प्रहस्त गिरे हुए ब्रह्मगुप्त का सिर तलवार से काटने लगा तब उसके पिता ब्रह्मा ने दूर से ही उसे स्वयं रोक दिया ॥१९॥ 'तुम सब लोग अपने पुत्रों की रक्षा करने आये हो, युद्ध देखने नहीं' इस प्रकार कहते हुए सभी दानव देवताओं की हँसी उड़ाने लगे ॥२०॥ इतने में ही वीतमय (वीतमिति) ने धनुष काटकर और सारथी को मारकर, हृदय पर बाणों की वर्षा करके संक्रम को प्रद्युम्नास्त्र से मार डाला ॥२१॥ रथ के दूर चले जाने से पैदल लड़ते हुए प्रहास्य ने रथहीन और पैदल युद्ध करते हुए चन्द्रगुप्त का मस्तक खड्ग-युद्ध में काट डाला ॥२२॥ तब पुत्र के वध से क्रुद्ध चन्द्रमा स्वयं युद्ध-भूमि में उतरकर प्रहास्य से लड़ने लगा। फलतः उन दोनों का युद्ध बराबर का हुआ ॥२३॥
४२४ कथासरित्सागर
४२४ कथासरित्सागर प्रियङ्करश्च विरथां विरथं रथनाशतः। एकखड्गप्रहारेण करोति स्माश्रर्मं द्विधा ॥२४॥ छिन्ने धनुषि निक्षिप्तनकुशेन हृदि क्षतम्। हतवान्सर्वदमनो हेलयातिबलं रणे ॥२५॥ ततो धुरन्धरं तं च स कुञ्जरकुमारकः। अस्त्रप्रत्यस्त्रयुद्धेन चकार विरथं मुहुः ॥२६॥ मुहुर्विक्रमशक्तिश्च तस्मै रथमडौकयत्। ररक्ष सङ्कटे च षाप्यस्त्रैरस्त्राणि वारयन् ॥२७॥ स कुञ्जरकुमारोऽथ धावित्वा महतीं शिलाम्। क्रुद्धो विक्रमशक्तेर्दाक् चिक्षेप स्यन्दनोपरि ॥२८॥ गते विक्रमशक्तौ च चूर्णितस्यन्दनं ततः। तयैव शिलया तं स धुरन्धरमचूर्णयत् ॥२९॥ सूर्यप्रभ प्रयुक्तोऽपि सहात्र श्रुतशर्मणा। विरोचनवचक्रोग्राञ्जघानैकैकुषा दसम् ॥३०॥ तत्क्रोधावश्विनौ देवौ युद्धायापतितौ शरैः। सुनीथः प्रतिजग्राह तेषां युद्धमभून्महत् ॥३१॥ स्थिरबुद्धिश्च संग्रामे शक्त्या हत्वा पराक्रमम्। वसुभिस्तद्वधक्रुद्धैः सहाष्टाभिरयुध्यत ॥३२॥ विरथीकृतमात्रं च प्रभासो वीक्ष्य मर्दनम्। वामोदररणासक्तोऽप्येकनेत्रेणवधीत् ॥३३॥ प्रकम्पनोऽस्त्रयुद्धेन हत्वा तेजःप्रभं युधि। युयुधे तद्वधक्रुद्धेनाग्निना सह साप्रतम् ॥३४॥ धूमकेतोश्च समरे यमदंष्ट्रं निजघ्नुषः। कुपितेन यमेनामूत्सह् युद्धं सुदारुणम् ॥३५॥ चूर्णयित्वा स शिलया सिंहदंष्ट्रः सुरोपमम्। समं निर्ऋतिना युद्धे तद्बषामर्षशालिना ॥३६॥ कालचक्रोऽपि चक्रेण चक्रे वायुबलं द्विधा। अयुध्यत च तत्कोपाञ्ज्वलन्ता वायुना सह ॥३७॥ स्पैर्नागाद्विवृक्षाणां महामायो विमोहदम्। कुबेरदत्तं हतवांस्तार्क्ष्यबन्ध्यामिरुद्ययत् ॥३८॥
षष्ठम लम्बक ४२५
षष्ठम लम्बक ४२५ रथहीन प्रियंकर ने तलवार के एक ही प्रहार से रथहीन अक्रम के दो टुकड़े कर डाले ॥२४॥ फेंके हुए अंकुश से धनुष के कटने पर धर्मदमन ने अतिबल को सहज में ही मार डाला॥२५॥ तब कुंजरकुमार ने अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों के युद्ध में रथहीन बुरबर को बार-बार मारा ॥२६॥ विक्रमशक्ति बुरबर के लिए बार-बार रथ उपस्थित करता था और अस्त्रों से अस्त्रों को दूर कर अपनी रक्षा कर रहा था। तब कुंजरकुमार ने क्रुद्ध होकर दौड़ते हुए, भारी पत्थर उठाकर विक्रमशक्ति के रथ पर फेंका ॥२७-२८॥ रथ के चूर-चूर हो जाने और विक्रमशक्ति के भाग जाने पर कुंजरकुमार ने उसी पत्थर की मार से बुरबर को चूर्ण-विचूर्ण कर डाला ॥२९॥ सूर्यप्रभ ने श्रुतशर्मा से युद्ध करते हुए भी विरोचन को मार देने के क्रोध से एक ही बाण से दम को मार डाला ॥३०॥ पुत्र-वध के क्रोध से अश्विनीकुमार देवता युद्ध के लिए उतर आये। सुनीथ ने उनको रोका तो उन दोनों में घमासान युद्ध मच गया ॥३१॥ स्थिरबुद्धि शक्ति (अस्त्र) से पराक्रम को मारकर उसके वध से क्रुद्ध आठ वसुओं के साथ लड़ने लगा ॥३२॥ दामोदर से युद्धरत प्रभास ने घास को रथहीन करनेवाले मथन को एक बाण से मार डाला ॥३३॥ प्रकम्पन नामक दानव अस्त्रयुद्ध में तेजप्रभ को मारकर उसके वध से क्रुद्ध अग्निदेव से युद्ध करने लगा ॥३४॥ यमपुत्र यमदंष्ट्र को मारनेवाले धूमकेतु दानव का उसके पिता यमराज के साथ युद्ध हुआ ॥३५॥ सिंहदंष्ट्र पत्थर के प्रहार से सुरोपण को मारकर उसके वध से क्रुद्ध निर्ऋति देवता से युद्ध करने लगा ॥३६॥ कालचक्र दानव ने चक्र से वायुबल (विद्याधर) के दो टुकड़े कर दिये। इस कारण क्रुद्ध उसके पिता वायु के साथ उसका युद्ध होने लगा ॥३७॥ महामाय दानव ने सर्प पहाड़ वृक्ष आदि नाना प्रकार के रूप धारण करनेवाले कुबेरदत्त नामक विद्याधर को गरुड़ वज्र और अग्नि का रूप धारण करके मार डाला ॥३८॥ ५४
४२१ कथासरित्सागरः
४२१ कथासरित्सागरः तत श्च कुबेरोऽत्र तेन साकमयुध्यत। एवमन्येऽप्ययुध्यन्त सुरा स्वांशावधृक्तया ॥३९॥ निजघ्निरञ्जसाऽन्येऽपि ये ते विद्याधराधिपाः। उत्पतद्भिः प्रतिपदं सशैलैर्मनुजदानवैः ॥४०॥ तावच्चात्र प्रभासस्य सह दामोदरेण यत्। परम्परास्त्रप्रत्यस्त्रभीमं युद्धमवर्त्तत ॥४१॥ अथ दामोदरश्छिन्नधन्वा निहतसारथिः। आसाद्य चापं शङ्खाद्यं स्वयं रथमिनोऽयुध्यत ॥४२॥ ताञ्चापि दृष्ट्वा साश्चर्यं पप्रच्छेन्द्रोऽम्बुजासनम्। हीयमाने प्रति कथं तुष्टोऽसि भगवन्निति ॥४३॥ ततो ब्रह्मा जगादेनं कथं न तस्य तुष्यत। इयच्चिरं प्रभासेन सह योऽनेन युध्यते ॥४४॥ दामोदरं हरञ्च विना मुञ्चन्ति हि कः। एतस्य हि प्रभासस्य सर्वैष्यत्या सुरा रणः ॥४५॥ मधुनिर्नाम यो ह्यासीदसुरः सुरमर्द्दनः। प्रद्युम्नवधतप्तोऽज्ञः शबरत्वमवाप सः ॥४६॥ सच प्रभासो जातोऽद्य पुत्रो भागस्य दुज्जयः। भागार्द्धः पूरुमभवद्वरन्निर्मलारुण्डः ॥४७॥ भूत्वा हिरण्यकशिपुस्ततो भूत्वा बलिस्ततः। मुकुन्दसख्ये सुरेषु योऽभून्गोत्रं मुदप्रमोदः सः ॥४८॥ हिरण्याक्षस्य याभूतत्राणं गुर्वीचायुरावयम्। प्रह्लादाख्यः स एवात्र यद्गर्भं दानवेश्वरः ॥४९॥ स दुष्प्राभिविषाणोऽसौ पुनर्ज्ञातो हलोत्सुकः। सान्तान्यः स्वामी पद्मरागाद्यधिपाः ॥५०॥ तानेतानपि ... विष्णुरप्यन्वभासत। विद्याधराणां चक्रं बलिनान्निहतारयः ॥५१॥ न ... तान्ज्ञात्वा ... ॥ ... ॥५२॥ ... ॥ ... ॥५३॥
अष्टम लम्बक ४२७
[Header] अष्टम लम्बक ४२७
इस कारण क्रुद्ध कुबेर महामाय से युद्ध करने लगा। इसी प्रकार अनेक देवता अपने अपने आंशिक पुत्र विद्याधरों के मारे जाने के कारण क्रुद्ध होकर दानवों और मानवों से युद्ध करने लगे ॥३९॥ पल-पल में उछलते हुए मानवों और दानवों ने अनेक प्रसिद्ध विद्याधर राजाओं और उनके सरदारों को मार डाला ॥४०॥ इधर प्रभास के साथ दामोदर का अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों के द्वारा घमासान युद्ध चल रहा था। कुछ समय कटे हुए धनुष और मरे हुए सारथीवाले दामोदर ने, दूसरा धनुष संभाल और स्वयं घोड़े की लगाम पकड़कर युद्ध किया ॥४१-४२॥ दामोदर को साधुवाद देते हुए ब्रह्मा से इन्द्र ने पूछा—'प्रभो हारते हुए दामोदर को आप साधुवाद क्यों दे रहे हैं? ॥४३॥ तब ब्रह्मा ने कहा—'क्यों न साधुवाद दूँ। यह दामोदर इस प्रभास के साथ इतनी देर तक जमकर युद्ध कर रहा है यह साधारण बात नहीं है ॥४४॥ भगवान् विष्णु के अंश-स्वरूप दामोदर के अतिरिक्त कौन इस प्रभास से युद्ध कर सकता है। क्योंकि अकेले प्रभास के लिए युद्ध में सभी देवता एक साथ मिलकर भी कम हैं ॥४५॥ पूर्वकाल में युद्ध में सुरों का मर्दन करनेवाला नमुचि नाम का जो असुर था वह दूसरे जन्म में सर्वस्तनमय प्रबल नाम से उत्पन्न हुआ। वही अब यह भास का पुत्र प्रभास हुआ है। भास भी पहले कालनेमि नाम का महान् असुर था। दूसरे जन्म में वह हिरण्यकशिपु नाम का दैत्य हुआ। तदनन्तर कपिंजल के नाम से अवतीर्ण हुआ। शुमुंडीक नाम का जो असुर था वह आज सूर्यप्रभ हुआ है। पहले जन्म में हिरण्याक्ष नाम का जो दैत्य था वह अब सुनीथ के रूप में है। प्रहस्त आदि ये सभी पूर्वजन्म के दैत्य और दानव हैं ॥४६-४९॥ तुम लोगों ने पहले जिन असुरों को मारा था वे ही इस समय मानव और दानव के रूप में अवतीर्ण हुए हैं। इसीलिए, मय आदि सभी उनके पक्ष में हैं ॥५०॥ सूर्यप्रभ आदि द्वारा किये गये यज्ञ के स्विष्टकृत् हवन के प्रभाव से बन्धन-मुक्त होकर बलि भी आज युद्ध देखने आया है ॥५१॥ यह (बलि) अपने सत्य-वचन की रक्षा के लिए पाताल-लोक में ही रहता है। तुम्हारा राज्य-काल समाप्त होने पर वही इन्द्र बनेगा ॥५२॥ इस समय ये दानव और मानव शिवजी की कृपा के पात्र हैं। अब यह तुम्हारे विजय का समय नहीं है। इसलिए सन्धि कर लो। आग्रह (हठ) करने से क्या लाभ है? ॥५३॥